तितली

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तितली

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चौबे जी ने एक बार माधुरी की ओर देखा और माधुरी ने अनवरी को। तीनों का भीतर-ही-भीतर एक दल-सा बंध गया। इधर मां, बेटे की ओर होने लगी-और शैला, जो व्यवधान था, उसकी खाई में पुल बनाने लगी।

श्यामदुलारी का हृदय, बेटे का काम की बातों में मन लगाते देखकर, मिठास से भरने लगा। उन्होंने कहा-अच्छा; तो मैं अब पूजा करने जाती हूं। बीबी! मिस अनवरी को जाने दो, कल आ जाएंगी। हां, एक बात तो मैं भूल ही गई थी-मिस अनवरी, आप आने लगिए, तो कृष्णमोहन को छुट्टी दिलाकर साथ लिवाते आइएगा।

श्यामदुलारी ने माधुरी को भी प्रसन्न करने का उपाय निकाल ही लिया! अनवरी ने कहा-बहुत अच्छा।

शैला ने कहा-मैं आपके पास आकर कभी-कभी बैठा करूं, इसके लिए क्या आप मुझे आज्ञा देगी मां जी!

क्यों नहीं; आपका घर है, चाहे जब चली आया करें। मुझे तो अपने देश की कहानी आपने सुनाई ही नहीं!

नहीं; मैं इसलिए आज्ञा मांगती थी कि मेरे आने से आपको कष्ट न हो। मुझे अलग कुर्सी पर बैठाया कीजिए। मैं आपको छुऊंगी नहीं शैला ने बड़ी सरलता से कहा।

श्यामदुलरि ने हंसकर कहा-वाह! यह तो मेरे सिर पर अच्छा कलंक है। क्या मैं किसी को छूती नहीं? आप आइए, मुझे आपकी बातें बड़ी मीठी लगती हैं।

इन्द्रदेव ने देखा कि उनके हृदय का बोझ टल गया-शैला ने मां के समीप पहंचने का अपना पथ बना लिया। उन्होंने इसे अपनी विजय समझी। वह मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि शैला ने उठते हुए नमस्कार करके कहा-मां जी, मुझसे मूल हो सकती है, अपराध नहीं। तब भी, आप लोगों की स्नेह-छाया में मुझे सुख की अधिक आशाहै।

श्यामदुलारी का स्नेह-सिक्त हृदय भर उठा। एक दूर देश की बालिका कितना मधुर हृदय लिये उनके द्वार पर खड़ी है।

श्यामदुलारी स्नान करने चली गईं।

इन्द्रदेव के साथ शैला धीरे-धीरे बड़ी कोठी की ओर चली जा रही थी। मोटर के लिए चौबेजी गए थे, तब तक दालान में अनवरी से माधुरी कहने लगी-तुमने ठीक कहा था मिस अनवरी!

उसने माधुरी को अधिक खुलने का अवसर देते हुए कहा-मैंने क्या ठीक कहा था? यही, शैला के संबंध में…

अनवरी गंभीर बन गई। उसने कहा-बीबी रानी! तुम लोगों को इनसे कभी काम नहीं पड़ा है। ये सब जादूगर हैं। देखा न मां जी को कैसा अपनी ओर ढुलका लिया-मोम बन गई। क्या यूं ही सात समुद्र तेरह नदी पार करके यह आई है! और…

पर तुमने भी मिस अनवरी! शैला को अच्छा एक उखाड़ दिया! थोड़ा-सा तो वह सोचेगी, बंगले से हटना उसे अखरेगा। क्यों?-बीच ही में माधुरी ने कहा। ________________

वह भी घुटी हुई है, कैसा पी गई! बीबी को कसक तो होगी ही! बीबी रानी, मैं तुमसे फिर कहती हूं तुम अपनी देखो। आपके भाई साहब तो नदी की बाढ़ में बह रहे हैं। मैं कल तो न आ सकूँगी। हां, जल्दी आने की… नहीं-नहीं अनवरी! कल, कल तुमको अवश्य आना होगा। इस समय तुम्हारी सहायता की बड़ी आवश्यकता है। उस चुडैल को, जिस तरह हो, नीचा… माधुरी आगे कुछ न कह सकी, उसका क्रोध कपोलों पर लाल हो रहा था। ___ मानव-स्वभाव है; वह अपने सुख को विस्तृत करना चाहता है। और भी, केवल अपने सुख से ही सुखी नहीं होता, कभी-कभी दूसरों को दुखी करके, अपमानित करके, अपने मान को, सुख को प्रतिष्ठित करता है। माधुरी के मन में अनवरी के द्वारा जो आग जलाई गई है, वह कई रूप बदलकर उसके कोने-कोने में झलसाने लगी है उसके मनमें लोभ तो जाग ही उठा था। अधिकारच्यत होने की आशंका ने उसे और भी संदिग्ध और प्रयत्नशील बना दिया। उसके गौरव की चांदनी शैला की उषा में फीकी पड़ेगी ही, इसकी दृढ़ संभावना थी, और अब वह युद्ध के लिए तत्पर थी। चौबेजी को खींचने के लिए उसने मन-ही-मन सोच लिया! एक सम्मिलित कुटुंब में राष्ट्रनीति ने अधिकार जमा लिया। स्व-पक्ष और पर-पक्ष का सृजन होने लगा। – चौबेजी कम चतर न थे। माधरी को उन्होंने अधिक समीप समझा। ढले भी उसी ओर। मोटर लेकर जब वह आए, तो उन्होंने कहा—बीबी रानी। हम लोगों ने बड़े सरकार का समय और दरबार देखा है। अब यह सब नहीं देखा जाता। तुम्हीं बचाओगी तो यह राज बचेगा, नहीं तो गया। मैं अब उसके लिए चाय बनाना नहीं चाहता! मुझे जवाब मिल जाए, यही अच्छा है। ____ मोटर पर बैठते हुए अनवरी ने कहा—घबराइए मत चौबेजी, बीबी रानी आपके लिए कोई बात उठा न रखेंगी।

गंगा की लहरियों पर मध्यान्ह के सूर्य की किरणें नाच रही थीं। उन्हें अपने चंचल हाथों से अस्त-व्यस्त करती हुई, कमर-भर जल में खड़ी, मलिया छींटे उड़ा रही थी। करारे के ऊपर मल्लाहों की छोटी-सी बस्ती थी। सात घर मल्लाहों और तीन घर कहारों के थे। मलिया और रामदीन का घर भी वहीं था। दोपहर को छावनी से छुट्टी लेकर, दोनों ही अपने घर आए थे। रामदीन करारे से उतरता हआ कहने लगा-मलिया, मैं भी आया। मलिया हँसकर बोली—मैं तो जाती हूं। जाओगी क्यों? वाह?—कहते हुए रामदीन ‘धम' से गंगा में कूद पड़ा। थोड़ी दूर पर एक बुड्ढा मल्लाह बंसी डाले बैठा था, उसने क्रोध से कहा—देखो रामदीन, तुम छावनी के नौकर हो, इससे मैं डर न जाऊंगा। मछली न फंसी, तो तुम्हारी बुरी गत कर दूंगा। ________________

तैरते हुए रामदीन ने कहा—अरे क्यों बिगड़ रहे हो दादा! आज कितने दिनों बाद छुट्टी मिली है। ऊधम मचाने अब कहां आता हूं। तैरते हुए तीर की ओर लौटकर उसने मलिया के पास पहुंचने का ज्यों ही उपक्रम किया, वह गंगा से निकलने लगी। रामदीन ने कहा—अरे क्या मैं काट लूंगा? मलिया, ठहर न! वह रुक गई। रामदीन ने धीरे से पास आकर पूछा—क्यों रे, तेरी सगाई पक्की हो गई? उसने कहा—धत! रामदीन ने कहा—तो आज मैं तेरे चाचा से कहूं कि… मलिया ने बीच ही में बात काटकर कहा—देखो, मुझे गाली दोगे तो.. .हां, कहे देती 'hca " क्या कहे देती है? क्या मुझे डराती है? अब तो मुझे तेरी बीबी रानी का डर नहीं। मलिया, तू जानती है छोटी कोठी में मेम साहब जब से आई हैं, तब से मैं ही उनका खाना बनाता हूं चौबेजी का काम भी मैं ही करता हूं? अब तो… ___ मेम साहब के भरोसे कूद रहे हो न! देखो तो तुम्हारी मेम साहब की दुर्दशा चार दिन में होती है। बीबी रानी… क्या…बकती है! चल, अपना काम देख! वह तो कहती थीं कि रामदीन, तुझको मैं सरकार से कहकर खेत दिलवा दूंगी। वहीं… । चल, अपना मुंह देख, मुझसे चला है सगाई करने! तीन ही दिन में छोटी कोठी से भी तेरी मेम साहब भागती हैं। तब लेना खेत! अरे तो क्या… आगे रामदीन कुछ न बोल सका; क्योंकि एक गौर वर्ण की प्रौढ़ा स्त्री धोती लिये हुए उत्तर की ओर से धीरे-धीरे गंगा में उतर रही थी। उसे देखते ही दोनों की सिट्टी भूल गई। दोनों ही गंगा जल में से निकलकर उसे अभिवादन करके भलेमानसों की तरह अपनी-अपनी धोती पहनने लगे। उस स्त्री के अंग पर कोई आभषण न था. और न तो कोई सधवा का चिन्ह! था केवल उज्ज्वलता का पवित्र तेज, जो उसकी मोटी-सी धोती के बाहर भी प्रकट था। एक पत्थर पर अपनी धोती रखते हुए उसने घूमकर पूछा—क्यों रे रामदीन, तुझे कभी घंटे भर की भी छुट्टी नहीं मिलती? आज अठवारों हो गया, कोई सौदा ले आना है। तेरी नानी कहती थी, आज रामदीन आने वाला है। सो तू आज आने पर भी यहीं धमाचौकड़ी मचा रहा है? ____मालकिन! मैं नहाकर कोट में आ ही रहा था। यही मलिया बड़ी पाजी है, इसने धोती पर पानी के छींटे…सरकार… रामदीन अपनी बनावटी बात को आगे न बढ़ा सका। बीच ही में मलिया अपनी सफाई देती हुई बोल उठी—इसकी छाती फट जाए, झूठा कहीं का! मालकिन, यह मुझको दे रहा है। इसका घमंड बढ़ गया है। मेम साहब का खानसामा बन गया है, तो चला है मुझसे सगाई करने! मालकिन अपनी आती हुई हँसी को रोककर बोलीं वह देख , इसकी नानी आ रही है , उसी से कह दे। मलिया , सचमुच रामदीन पाजी हो गया है। दोनों ने देखा , बुढ़िया रामदीन की नानी — तांबे का एक घड़ा लिये धीरे – धीरे आ रही है । मालकिन स्नान करने लगी। कभी – कभी स्नान करने के लिए वह इधर आ जाती , तो कई काम करती हुई जातीं । भाई मधुबन के लिए मछली लेना और मल्लाही -टोली की किसी प्रजा को सहेजकर गृहस्थी का और कोई काम करा लेना भी उनके नहाने का उद्देश्य होता । उनको देखते ही बूढ़े मल्लाह ने अपनी बंसी खींची । मछली फंस चुकी थी । वह स्नान करके सूर्य को प्रणाम करती हुई जब ऊपर आकर खड़ी हुईं तो मल्लाह ने मछली सामने लाकर रख दी । उन्होंने रामदीन से कहा — इसे लेता चल । । मलिया ने बुढ़िया के स्नान कर लेने पर उसके लाए हुए घड़े को भर लिया । मालकिन की गीली धोती लेकर बुढ़िया उनके साथ हो गई । मल्लाह ने कहा — मालकिन , आज इस पाजी रामदीन को बिना मारे मैं न छोड़ता । आज कई दिन पर मैं मधुबन बाबू के लिए मछली फंसाने बैठा था , यह आकर ऊधम मचाने लगा । इसी की चाल से बड़ा – सा रोहू आकर निकल गया । आज लगा है छावनी की नौकरी करने, तो घमंड का ठिकाना ही नहीं । हम लोग आपकी प्रजा हैं मालकिन ! यह बूढ़ा इस बात को नहीं भूल सकता । अभी कल का लड़का — यह क्या जाने कि धामपुर के असली मालिक — चार आने के पुराने हिस्सेदार — कौन हैं । मालकिन , बेईमानी से वह सब चला गया , तो क्या हुआ ? हम लोग अपने मालिक को न पहचानेंगे? ___ मालकिन को उसका यह व्याख्यान अच्छा न लगा । उनके अच्छे दिनों का स्मरण करा देने की उस समय कोई आवश्यकता न थी । किंतु सीधा और बूढ़ा मल्लाह उस बिगड़े घर की बड़ाई में और कहता ही क्या ? शेरकोट के कुलीन जमींदार मधुबन के पास अब तीन बीघे खेत और वही खंडहर – सा शेरकोट है, इसके अतिरिक्त और कुछ चाहे न बचा हो ; किंतु पुरानी गौरव – गाथाएं तो आज भी सजीव हैं । किसी समय शेरकोट के नाम से लोग सम्मान से सिर झुकाते थे। ____ मधुबन के लिए वंश- गौरव का अभिमान छोड़कर , मुकदमे में सब कुछ हारकर , जब उसके पिता मर गए , तो उसकी बड़ी विधवा बहन ने आकर भाई को संभाला था । उसकी ससुराल संपन्न थी ; किंतु विधवा राजकुमारी के दरिद्र भाई को कौन देखता! उसी ने शेरकोट के खंडहर में दीपक जलाने का काम अपने हाथों में लिया ! शेरकोट मल्लाही -टोले के समीप उत्तर की ओर बड़े- से ऊंचेटीले पर था । मल्लाही टोला और शेरकोट के बीच एक बड़ा – सा वट – वृक्ष था । वहीं दो – चार बड़े- बड़े पत्थर थे। उसी के नीचे स्नान करने का घाट था । मल्लाही-टोले में अब तो केवल दस घरों की बस्ती है । परंतु जब शेरकोट के अच्छे दिन थे, तो उसकी प्रजा से काम करने वालों से यह गांव भरा था । शेरकोट के विभव के साथ वहां की प्रजा धीरे – धीरे इधर – उधर जीविका की खोज में खिसकने लगी । मल्लाहों की जीविका तो गंगातट से ही थी ; वे कहां जाते ? उन्हीं के साथ ________________

दो-तीन कहारों के भी घर बच रहे—उस छोटी-सी बस्ती में। कहीं-कहीं पुराने घरों की गिरी हुई भीतों के ढूह अपने दारिद्र्य -मंडित सिर को ऊंचा करने की चेष्टा में संलग्न थे, जिसके किसी सिरे पर टूटी हुई धरनें, उन घरों का सिर फोड़ने वाली लाठी की तरह, अड़ी पड़ी थीं! उधर शेरकोट का छोटा-सा मिट्टी का ध्वस्त दुर्ग था! अब उसका नाममात्र है, और है उसके दो ओर नाले की खाई—एक और गंगा। एक पथ गांव में जाने के लिए था। घर सब गिर चुके थे। दो-तीन कोठरियों के साथ एकआँगन बच रहा था। भारत का वह मध्यकाल था, जब प्रतिदिन आक्रमणों के भय से एक छोटे-से भूमिपति को भी दुर्ग की आवश्यकता होती थी। ऊंची-नीची होने के कारण, शेरकोट में अधिक भूमि होने पर भी, खेती के काम में नहीं आ सकती थी। तो भी राजकुमारी ने उसमें फल-फूल और साग-भाजी का आयोजन कर लिया था। शेरकोट के खंडहर में घुसते हुए राजकुमारी ने बूढ़े मल्लाह को विदा किया। वह बूढ़ा मनुष्य कोट का कोई भी काम करने के लिए प्रस्तुत रहता। उसने जाते जाते कहामालकिन, जब कोई काम हो, कहलवा देना, हम लोग आपकी पुरानी प्रजा हैं, नमक खाया उसकी इस सहानुभूति से राजकुमारी को रोमांच हो गया। उसने कहा—तुमसे न कहलवाऊंगी, तो काम कैसे चलेगा; और कब नहीं कहलवाया है? बूढ़ा दोनों हाथों को अपने सिर से लगाकर लौट गया। रामदीन ने एक बार जैसे सांस ली। उसने कहा—तो मालकिन, कहिए, नौकरी छोड़ जो प्रेरणा उसे बूढ़े मल्लाह से मिली थी, वही उत्तेजित हो रही थी। राजकुमारी ने कहा—पागल! नौकरी छोड़ देगा, तो खेत छिन जाएगा। गांव में रहने पावेगा फिर? अब हम लोगों के वह दिन नहीं रहे कि तुमको नौकर रख लूंगी। मैंने तो इसलिए कहा था कि मधुबन ने कहीं पर खेत बनाया है; वही बाबाजी की बनजरिया में। कहता था कि 'बहन, एक भी मजूर नहीं मिला!' फिर बाबाजी और उसने मिलकर हल चलाया! सुनता है रे रामदीन, अब बड़े घर के लोग हल चलाने लगे, मजूर नहीं मिलते, बाबाजी तो यह सब बात मानते ही नहीं। उन्होंने मधुबन से भी हल चलवाया। वह कहते हैं कि 'हल चलाने से बड़े लोगों की जात नहीं चली जाती। अपना काम हम नहीं करेंगे, तो दूसरा कौन करेगा।' आज-कल इस देश में जो न हो जाए। कहां मधुबन का वंश, कहां हलचलाना! बाबाजी ने उसको पढ़ाया-लिखाया और भी न जाने क्या-क्या सिखाया। वह जाता है शहर यहां से बोझ लिवाकर सौदा बेचने! जब मैं कुछ कहती हूं; तो कहता है- 'बहन! वह सब रामकहानी के दिन बीत गए। काम करके खाने में लाज कैसी। किसी की चोरी करता हूं या भीख मांगता हूं?' धीरे-धीरे मजूर होता जा रहा है। मधुबन हल चलावे, यह कैसे सह सकती हूं। इसी से तो कहती हूं कि क्या दो घंटे जाकर तू उसका काम नहीं कर सकता था! दोपहर को खाने-नहाने की छुट्टी तो किसी तरह मिलती है। कैसे क्या कहूं अभी न जाऊं तो रोटी भी रसोईदार इधर-उधर फेंक देगा। फिर दिन भर टापता रह जाऊंगा। मालकिन, पहले से कह दिया जाए, तो कोई उपाय भी निकाल लूं। ________________

अच्छा, जा; कल आना तो मुझसे भेंट करके जाना; भूलना मत! समझा न? मधुबन मिले तो भेज दो। रामदीन ने मछली रखते हुए सिर झुकाकर अभिवादन किया। फिर मलिया की ओर देखता हुआ वह चला गया। __रामदीन की नानी धूप में धोती फैलाकर रसोई-घर की ओर मछली लेकर गई। वह चौके में आग-पानी जुटाने लगी। ___मलिया मालकिन के पास बैठ गई थी। राजकुमारी ने उनसे पूछा–मलिया! तेरी ससुराल के लोग कभी पूछते हैं? उसने कहा नहीं मालकिन, अब क्यों पूछने लगे। राजकुमारी ने कहा—तो रामदीन से तेरी सगाई कर दूं न? आओ मालकिन, इसीलिए मुझको… राजकुमारी उसकी इस लज्जित मूर्ति को देखकर रुक गईं। उन्होंने बात बदलने के लिए कहा—तो आज-कल तू वहां रात-दिन रहती है? – क्यों न रहूंगी। बीबीरानी माधुरी की तरेर-भरी आँखें देखकर ही छठी का दूध याद आता है। अरे बाप रे! मालकिन, वहां से जब घर आती हूं तो जैसे बाघ के मुंह से निकल आती हूं। इधर तो उनकी आँखें और भी चढ़ी रहती हैं। चौबे, जो पहले कुंवर साहब की रसोई बनाता था, आकर न मालूम क्या धीरे-धीरे फुसफुसा जाता है। बस फिर क्या पूछना! जिसकी दुर्दशा होनी हो वही सामने पड़ जाए। क्यों रे, चौबे तो पहले तेरे कुंवर साहब के बड़े पक्षपाती थे। अब क्या हुआ जो… छावनी की बातें अच्छी तरह सुनने के लिए राजकुमारी ने पूछा। कोई भी स्वार्थ न हो: किंत अन्य लोगों के कलह से थोड़ी देर मनोविनोद कर लेने की मात्रा मनष्य की साधारण मनोवृत्तियों में प्राय: मिलती है। राजकुमारी के कुतूहल की तृप्ति भी उससे क्यों न होती? __मलिया कहने लगी मालकिन! यह सब मैं क्या जानूं, पहले तो चौबेजी बड़े हंसमुख बने रहते थे। पर जब से बड़ी सरकार आई हैं; तब से चौबेजी इसी दरबार की ओर झुके रहते हैं। कंवर साहब से तो नहीं पर मेम साहब से वह चिढ़ते हैं। कहते हैं. उसकी रसोई बनाना हमारा काम नहीं है। बबिरिनिा से और भी न जाने क्या-क्या उसकी निंदा करते हैं। सुना था, एक दिन वह रसोई बना रहे थे, भूल से मेम साहब जूते पहने रसोई-घर में चली आईं, तभी से वह चिढ़ गए, पर कुछ कह नहीं सकते थे। जब बड़ी सरकार आ गईं, तो उन्होंने इधर ही अपना डेरा जमाया। अब तो वहछोटी कोठी जाकर, वहां क्या-क्या चाहिए —यही देख आते हैं क्यों रे! क्या तेरे कुंवर साहब इस मेम से ब्याह करेंगे? मैं क्या जाएं मालकिन! अब छुट्टी मिले। जाऊं, नहीं तो रसोईदार महाराज ही दोचार बात सुनावेंगे। अच्छा, जा, अभी तो चाचा के पास जाएगी न? हां, इधर से होती हुई चली जाऊंगी—कहकर मलिया अपने घर चली। राजकुमारी से आकर रामदीन की नानी ने कहा—चलिए, अपनी रसोई देखिए। अभी मधुबन बाबू तो नहीं आए। राजकुमारी ने एक बार शेरकोट के उजड़े खंडहर की ओर देखा और धीरे-धीरे रसोईघर की ओर चलीं । रोटी सेंकते हुए राजकुमारी ने पूछा – बुढ़िया , तूने मलिया के चाचा से कभी कहा था ।

क्या मालकिन ?

रामदीन से मलिया की सगाई के लिए । अब कब तक तू अकेली रहेगी ? अपने पेट के लिए तो वह पाजी जुटा ले ; सगाई करके क्या करेगा मालकिन ! ब्याह होता मधुबन बाबू का ; हम लोगों को वह दिन आखों से देखने को मिलता… किसका रे बुढ़िया ! — कहते हुए मधुबन ने आते ही उसकी पीठ थपथपा दी ।

राजकुमारी ने कहा — रोटी खाने का अब समय हुआ है न ? मधु ! तुम कितना जलाते हो ।

बहन ! मैं अपने आलू और मटर का पानी बरा रहा था , आज मेरा खेत सिंच गया । कहकर वह हंस पड़ा । वह प्रसन्न था ; किंतु राजकुमारी अपने पिता के वंश का वह विगत वैभव सोच रही थी ; उनको हंसी न आई ।

इन्द्रदेव की कचहरी में आज कुछ असाधारण उत्तेजना थी । चिकों के भीतर स्त्रियों का समूह, बाहर पास – पड़ोस के देहातियों का जमाव था । शैला भी अपनी कुर्सी पर अलग बैठी थीं । बनजरिया वाले बाबाजी अपनी कहानी सुनाने वाले थे, क्योंकि गोभी के लिए उसमें खेत बन गया था । उसी को लेकर तहसीलदार ने इन्द्रदेव को समझाया कि बनजरिया में बोने – जोतने का खेत है। उस पर एकरेज — या और भी जो कुछ कानून के वैध उपायों से देन लगाया जा सकता हो — लगाना ही चाहिए । और, इस बाबा को तो यहां से हटाना ही । होगा ; क्योंकि गांव के लोग इससे तंग आ गए हैं । यहसमाजी है, लडुकों को न जाने क्या क्या सिखाता है — ऊंची जाति के लड़के हल चलाने लगे हैं । नीचों को बराबर कलकत्ता बंबई कमाने जाने के लिए उकसाया करता है । इसके कारण लोगों को हलवाहों और मजूरों का मिलना असंभव हो गया है । तिस पर भी यह बनजरिया देवनन्दन के नाम की है। वह मर गया , अब लावारिस कानून के अनुसार यह जमींदार की है — इत्यादि । इन्द्रदेव ने सब सुनकर कहा कि बुड्ढे की बात भी सुन लेनी चाहिए । उससे कह भी दिया गया है। उसको बुलवाया जाए । आज इसीलिए रामनाथ आए हैं , और साथ में लिवाते आए हैं तितली को । तितली इस जन – समूह में संकुचित – सी एक खंभे की आड़ में आधी छिपी हुई बैठी है । इन्द्रदेव का संकेत पाकर रामनाथ ने कहना आरंभ किया बार्टली साहब की नील – कोठी टूट चुकी थी । नील का काम बंद हो चला था । जैसा आज भी दिखाई देता है, तब भी उस गोदाम के हौज और पक्की नालियां अपना खाली मुंह खोले पड़ी रहती थीं , जिससे नीम की छाया में गाएं बैठकर विश्राम लेती थीं । पर बार्टली साहब को वह ऊंचे टीले का बंगला, जिसके नीचे बड़ा – सा ताल था , बहुत ही पसंद था । नील गोदाम बंद हो जाने पर भी उनका बहुत – सा रुपया दादनी में फंसा था । किसानों को नील बोना तो बंद कर देना पड़ा , पर रुपया देना ही पड़ता। अन्न की खेती से उतना रुपया कहां निकलता , इसलिए आस- पास के किसानों में बड़ी हलचल मची थी । बार्टली के किसान – आसामियों में एक देवनन्दन भी थे। मैं उनका आश्रित ब्राह्मण था । मुझे अन्न मिलता था और मैं काशी में जाकर पढ़ता था । काशी की उन दिनों की पंडित मंडली में स्वामी दयानन्द के आ जाने से हलचल मची हुई थी । दुर्गाकुंड के उस शास्त्रार्थ में मैं भी अपने गुरुजी के साथ दर्शक – रूप से था ; जिसमें स्वामीजी के साथ बनारसी चाल चली गई थी । ताली तो मैंने भी पीट दी थी । मैं क्वीन्स कॉलेज के एग्लो – संस्कृत -विभाग में पढ़ता था । मुझे वह नाटक अच्छा न लगा । उस निर्भीक संन्यासी की ओर मेरा मन आकर्षित हो गया । वहां से लौटकर गुरुजी से मेरी कहा – सुनी हो गई , और जब मैं स्वामीजी का पक्ष समर्थन करने लगा, तो गुरुजी ने मुझे नास्तिक कहकर फटकारा । देवनन्दन का पत्र भी मुझे मिल चुका था कि कई कारणों से अन्न देना वह बंद करते हैं । मैं अपनी गठरी पीठ पर लादे हुए झुंझलाहट से भरा नील -गोदाम के नीचे से अपने गांव में लौटा जा रहा था । देखा कि देवनन्दन को नील कोठी का पियादा काले खां पकड़े हुए ले जा रहा है । देवनन्दन सिंहपुर के प्रमुख किसान और आप ही लोगों के जाति -बांधव थे। उनकी यह दशा ! रोम – रोम उनके अन्न से पला था । मैं भी उनके साथ बार्टली के सामने जा पहुंचा। _ उस समय कुर्सियों पर बैठे हुए बार्टली और उनकी बहन जेन आपस में कुछ बातें कर रहे थे। जेन ने कहा — भाई! इधर जब से वह चले गए हैं , मेरी चिंता बढ़ रही है । न जाने क्यों , मुझे उन पर संदेह होने लगा है। मैं भी घर जाना चाहती हूं । तुम जानती हो कि मैंने स्मिथ का कभी अपमान नहीं किया , और सच तो यह है कि मैं उसको प्यार करता हूं। किंतु क्या करूं , उसका जैसा उग्र स्वभाव है, वह तो तुम जानती हो । मैं भला अभी काम छोड़कर कैसे चलूंगा! – बार्टली ने कहा । जब यह काम ही बंद हो गया , तब यहां रहने का क्या काम है। देखती हूं कि जो रुपया तुम्हारा निकल भी आता है, उसे यहां जमींदारी में फंसाते जा रहे हो । क्या तुम यहीं बसना चाहते हो ? — जेन ने कहा । तब तुम क्या चाहती हो । — बार्टली ने अन्यमनस्क भाव से पूर्व की धीरे – धीरे सूखने वाली झील को देखते हुए कहा । नील का काम बंद हो गया , पर अब हम लोगों को रुपए की कमी नहीं। जो कुछ हो , यहां से बेचकर इंग्लैंड लौट चलें । मेरा प्रसव- काल समीप है । मैं गांव के घर में ही जाकर रहना चाहती हूं । समझा न ? — जेन ने सरलता से कहा। इतनी जल्दी! असंभव, अभी बहुत रुपया बाकी पड़ा है। ठहरो, मैं पहले इन लोगों से बात कर लूं । — बार्टली ने रूखे स्वर से कहा । देवनन्दन ने सलाम करते हुए कुछ कहना चाहा कि बीच ही में बात काटकर काले खां ________________

ने कहा—सरकार, बहुत कहने पर यह आया है। देवनन्दन ने रोष-भरे नेत्रों से काले को देखा। बार्टली ने कहा—रुपया देते हो कि तुम्हारा दूसरा… जेन उठकर जाने लगी थी। बीच ही में देवनन्दन ने उसे हाथ जोड़ते हुए कहा- मेरी स्त्री को लड़का होने वाला है, और लड़की… जेन आगे न सुन सकी। उसने कहा—बार्टली, जाने दो उसे, उसकी स्त्री का… ___ तुम चलो चाय के कमरे में, मैं अभी आता हूं।—कहते हुए बार्टली ने जेन को तीखी आखों से देखा। दुखी होकर जेन चली गई। देवनन्दन की कोई विनती नहीं सुनी गई! बार्टली ने कहा—काले खां, इसको यहीं कोठरी में बंद करो और तीन घंटे में रुपए न मिलें, तो बीस हंटर लगाकर तब मुझसे कहना। बार्टली की ठोकर से जब देवनन्दन पृथ्वी चूमने लगा, तब वह चाय पीने चला गया। मेरे हृदय में वह देवनन्दन का अपमान घाव कर गया। मैं अब तक तो केवल वह दृश्य देख रहा था। किंतु क्षण-भर में मैंने अपना कर्तव्य निर्धारित कर लिया। मैंने कहा—काले खां, भूलना मत, मेरा नाम है रामनाथ। आज तुमने यदि देवनन्दन को मारा-पीटा, तो मैं तुम्हें जीता न छोडूंगा। मैं रुपए ले आता हूं। क्रोध और आवेश में कहने को तो मैं यह कहकर गांव में चला आया: पर रुपए कहां से आते! मैं उन्हीं के पट्टीदार के पास पहुंचा; पर सूद का मोल-भाव होने लगा। उनकी स्थावर संपत्ति पर्याप्त न थी। हिंदुओं में परस्पर तनिक भी सहानुभूति नहीं! मैं जल उठा। मनुष्य, मनुष्य के दुख-सुख से सौदा करने लगता है और उसका मापदंड बन जाता है रुपया। मैंने कहा—अच्छा, अच्छा, धामपुर में मेरी कृष्णार्पण माफी है, उसे भी मैं रेहन कर दूंगा। तहसीलदार साहब ने कहा कि इस बनजरिया के नंबर पर पहले देवनन्दन का नाम था, सो ठीक है। मैंने ही उसके संबंध में रेहन करके फिर इसी माफी को देवनन्दन के नाम बेच दिया। अब मेरे मन में गांव से घोर धृणा हो गई थी। मैं भ्रमण के लिए निकला। गांव पर मेरे लिए कोई बंधन नहीं रह गया। तीर्थों, नगरों और पहाड़ों में मैं घूमता था और गली, चौमुहानी, कुओं पर, तालाबों और घाटों के किनारे, मैं व्याख्यान देने लगा। मेरा विषय था हिंद-जाति का उदबोधन। मैं प्रायः उनकी धनलिप्सा: गह-प्रेम और छोटे-से-छोटे हिंद गृहस्थ की राजमनोवृत्ति की निंदा किया करता! आप देखते नहीं कि हिंदू की छोटी-सी गृहस्थी में कड़ा-करकट तक जुटा रखने की चाल है, और उन पर प्राण से बढ़कर मोह! दसपांच गहने, दो-चार बर्तन, उनको बीसों बार बंधक करना और घर में कलह करना, यही हिंदू-घरों में आए दिन के दृश्य हैं। जीवन का जैसे कोई लक्ष्य नहीं! पद-दलित रहते-रहते उनकी सामूहिक चेतना जैसे नष्ट हो गई है। अन्य जाति के लोग मिट्टी या चीनी के बरतन में उत्तम स्निग्ध भोजन करते हैं। हिंदू चांदी की थाली में भी सतू घोलकर पीता है। मेरी कटुता उत्तेजित हो जाती, तो और भी इसी तरह की बातें बकता। कभी तो पैसे मिलते और कहींकहीं धक्के भी। पर मेरे लिए दूसरा काम नहीं। इसी धुन में मैं कितने बरसों तक घूमता रहा। नर्मदा के तट से घूमकर मैं उज्जैन जा रहा था। अकस्मात् बिना किसी स्टेशन के गाड़ी खड़ी हो गई। मैंने पूछा-क्या है? ________________

साथ के यात्री लोग भी चकित थे। इतने में रेल के गार्ड ने कहा-भुखमरों की भीड़ रेलवे-लाइन पर खड़ी है। मैं गाड़ी से उतरकर वह भीषण दृश्य देखने लगा। संसार का नग्न चित्र, जिसमें पीड़ा का, दुःख का, तांडव नृत्य था। बिना वस्त्र के सैकड़ों नर-कंकाल, इंजिन के सामने लाइन पर खड़े-खड़े और गिरे हए, मुत्य की आशा में टक लगाए थे। मैं रो उठा। मेरे हृदय में अभाव की भीषणता, जो चिनगारी के रूप में थी, अब ज्वाला-सी धधकने लगी। चतुर गार्ड ने झोली में चंदा के पैसे एकत्र करके कंगलों में बांट दिया और वे समीप के बाजार की ओर दौड़ पड़े। हां, दौड़े। उन अभागों को अन्न की आशा ने बल दिया। वे गिरतेपड़ते चले। मैं भी चला। उनके पीछे-पीछे यह देखते जाता था कि पेड़ों में पत्तियां नहीं बची हैं। टिड्डियां भी इस तरह उन्हें नहीं खा सकतीं; वे तो नस छोड़ देती हैं। मैंने देखा कि वे भुखमरे बाजार में घुसे; किंतु मैं नहीं जा सका। बाजार के बाहर ही एक वृक्ष के बिना पत्तों वाली डालों के नीचे एक व्यक्ति पड़ा हुआ अपना हाथ मुंह तक ले जाता है और उसे चाटकर हटा लेता है। पास ही एक छोटा-सा जीव और भी निस्तब्ध पड़ा है। मैं दौड़कर अपने लोटे में दूध मोल ले आया। उसके गले में धीरे-धीरे टपकाने लगा। वह आख खोलकर पास ही पड़े हुए शिशु को देखने लगा। शिशु की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। मैं उसे दूध पिलाने लगा। कहकर बुड्ढा रामनाथ एक बार ठहर गया। उसने चारों ओर देखकर अपनी आखों को उस खंभे की आड़ में ठहरा दिया, जहां तितली बैठी थी। शैला रूमाल से अपनी औखें पोंछ रही थी, और सुनने वाली जनता चुपचाप स्तब्ध थी। बुड्ढे ने फिर कहना आरंभ किया—आप लोगों को कष्ट होता है। दुख और दर्द की कहानी सुनाकर मैंने अवश्य आप लोगों का समय नष्ट किया। किंतु करता क्या! अच्छा, जाने दीजिए, मैं अब बहुत संक्षेप में कहता हूं हां, तो वह व्यक्ति थे देवनन्दन जिनकी समस्त भू-संपत्ति नीलाम हो गई। धूर-धूर बिक गई। दो संतानों का शरीरांत हो गया। तब उस बची हुई कन्या को लेकर स्त्री के साथ वह परदेश में भीख मांगने चले थे। उस अभागे को नहीं मालूम था कि वह किधर जा रहा था। उस समय अकाल था। कौन भीख देता? जिनके पास रुपया था, उन्हें अपनी चिंता थी। अस्तु, कुलीन वंश की सुकुमारी कुलवधू अधिक कष्ट न सह सकी, वह मर गई। तब देवनन्दन इस शिशु को लेकर घूमने लगे। वह भी मुमूर्ष हो रहा था। उन्होंने बड़े कष्ट से मुझे पहचानकर केवल इतना कहा—रामनाथ, मैंने सब कुछ बेच दिया; पर तुम्हारा धामपुर का खेत नहीं बेचा है, और यह तितली तुम्हारी शरण में है। मैं तो चला। हां, वह चल बसे। मैंने तितली को गोद में उठा लिया। आगे बुड्ढा कुछ न कह सका; क्योंकि तितली सचमुच चीत्कार करती हुई मुर्छित हो गई थी और शैला उसके पास पहुंचकर उसे प्रफुल्लित करने में लग गई थी। ________________

इन्द्रदेव आराम कुर्सी पर लेट गए थे, और सुनने वाले धीरे-धीरे खिसकने लगे।

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द्वितीय खंड पूस की चांदनी गांव के निर्जन प्रांत में हल्के कुहासे के रूप में साकार हो रही थी। शीतल पवन जब घनी अमराइयों में हरहराहट उत्पन्न करता, तब स्पर्श न होने पर भी गाढ़े के कुरते पहनने वाले किसान अलावों की ओर खिसकने लगते। शैला खड़ी होकर एक ऐसे ही अलाव का दृश्य देख रही थी, जिसके चारों ओर छः-सात किसान बैठे हुए तमाखू पी रहे थे। गाढ़े की दोहर और कंबल उनमें से दो ही के पास थे। और सब कुरते और इकहरी चद्दरों में 'हू—हा' कर रहे थे। " शैला जब महुए की छाया से हटकर उन लोगों के सामने आई तो, वे लोग अपनी बातचीत बंद कर असमंजस में पड़े कि मेम साहब से क्या कहें। शैला को सभी पहचानते थे। उसने पूछा—यह अलाव किसका है? महंगू महतो का सरकार—एक सोलह बरस के लड़के ने कहा। दूर से आते हुए मधुबन ने पूछा-क्या है रामजस? मधु भइया, यही मेम साहब पूछ रही थीं। रामजस ने कहा। मधुबन ने शैला को नमस्कार करते हुए कहा—क्या कोई काम है? कहीं जाना हो तो मैं पहुंचा दूं। नहीं-नहीं मधुबन! मैं भी आग के पास बैठना चाहती हूं। मधुबन पुआल का छोटा-सा बंडल ले आया। शैला बैठ गई। मधुबन को वहां पाकर उसके मन में जो हिचक थी, वह निकल गई। ____महंगू के घर के सामने ही एक अलाव लगा था, महंगू वहां पर तमाखू-चिलम का प्रबंध रखता। दो-चार किसान, लड़के-बच्चे उस जगह प्राय: एकत्र रहते। महंगू की चिलम कभी ठंडी न होती। बुड्ढा पुराना किसान था। उस गांव के सब अच्छे टुकड़े उसकी जोत में थे। लड़के और पोते गृहस्थी करते थे, वह बैठा तमाखू पिया करता। उसने भी मेम साहब का नाम सुना था; शैला की दयालुता से परिचित था। उसकी सेवा और सत्कार के लिए मनही-मन कोई बात सोच रहा था। __ सहसा शैला ने मधुबन से पूछा–मधुबन! तुम जानते हो, बार्टली साहब की नीलकोठी यहां से कितनी दूर है? वह कल के लड़के हैं मेम साहब! उन्हें क्या मालूम कि बार्टली साहब कौन थे; मुझसे पूछिए। मेरा रोआं-रोआं उन्हीं लोगों के अन्न का पला हुआ है—महंगू ने कहा। अहा! तब तुम उन्हें जानते हो? बार्टली को जानता हूं। बड़े कठोर थे। दया तो उनके पास फटकती न थी—कहते-कहते ________________

अलाव के प्रकाश में बुड्ढे के मुख पर धृणा की दो-तीन रेखाएं गहरी हो गईं। फिर वह संभल कर कहने लगा—पर उनकी बहन जेन माया-ममता की मूर्ति थी। कितने ही बार्टली के सताए हुए लोग उन्हीं के रुपए से छुटकारा पाते, जिसे वह छिपाकर देती थीं। और, मुझ पर तो उनकी बड़ी दया रहती थी। मैं उनकी नौकरी कर चुका हूं। मैं लड़कपन से ही उन्हीं की सेवा में रहता था। यह सब खेती-बाड़ी गृहस्थी उन्हीं की दी हुई है। उनके जाने के समय मैं कितना रोया था!—कहते-कहते बुड्ढे की आखों से पुराने आंसू बहने लगे। शैला ने बात सुनने के लिए फिर कहा—तो तुम उनके पास नौकरी कर चुके हो? अच्छा तो वही नील-कोठी अरे मेम साहब, वह नील-कोठी अब काहे को है, वह तो है भुतही कोठी! अब उधर कोई जाता भी नहीं, गिर रही है। जेन के कई बच्चे वहीं मर गए हैं। वह अपने भाई से बारबार कहती कि मैं देश जाऊंगी: पर बार्टली ने जाने न दिया। जब वह मरे, तभी जेन को यहां से जाने का अवसर मिला। मुझसे कहा था कि महंगू, जब बाबा होगा, तो तुमको बुलाऊंगी उसे खेलाने के लिए, आ जाना; मैं दूसरे पर भरोसा नहीं करूंगी। मुझे ऐसा ही मानती थीं। चली गईं, तब से उनका कोई पक्का समाचार नहीं मिला। पीछे एक साहब से, —जब वह यहां का बंदोबस्त करने आया था, सुना—कि जेन का पति स्मिथ साहब बड़ा पाजी है, उसने जेन का सब रुपया उड़ा डाला। वह बेचारी बड़ी दुःखी हैं। मैं यहां से क्या करता मेम साहब! शैला चुपचाप सुन रही थी। उसके मन में आंधी उठ रही थी; किंतु मुख पर धैर्य की शीतलता थी। उसने कहा—महंगू, मैं तुम्हारी मालकिन को जानती हूं। क्या अभी जीती हैं मेम साहब?—बुड्ढे ने बड़े उल्लास से पूछा। उसके हाथ का हुक्का छूटते-छूटते बचा। नहीं, वह तो मर गईं। उनकी एक लड़की है। अहा! कितनी बड़ी होगी वह! मैं एक बार देख तो पाता? अच्छा, जब समय आवेगा तो तुम देख लोगे। पहले यह तो बताओ कि मैं नील-कोठी देखना चाहती हूं; इस समय कोई वहां मेरे साथ चल सकता है? सब किसान एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। भूतही कोठी में इस रात को कौन जाएगा। महंगू ने कहा—मैं बूढ़ा हूं, रात को सूझता कम है। मधुबन ने कहा—मेम साहब, मैं चल सकता हूं। साहस पाकर लड़के रामजस ने कहा—मैं भी चलूंगा भइया। मधुबन ने कहा—तुम्हारी इच्छा! कंधे पर अपनी लाठी रखे, मधुबन आगे, उसके पीछे शैला तब रामजस; तीनों उस चांदनी में पगडंडी से चलने लगे। चुपचाप कुछ दूर निकल जाने पर शैला ने पूछा–मधुबन, खेती से तुम्हारा काम चल जाता है? तुम्हारे घर पर और कौन है? मेम साहब! काम तो किसी तरह चलता ही है। दो-तीन बीघे की खेती ही क्या? बहन है बेचारी; न जाने कैसे सब जुटा लेती है। आज-कल तो नहीं, हां जब मटर हो जाएगी, गांवों में कोल्हू चलने ही लगे हैं, तब फिर कोई चिंता नहीं। तुम शिकार नहीं करते? ________________

कभी-कभी मछली पर बंसी डाल देता हूं। और कौन शिकार करूं? बहन तुम्हारी यहीं रहती है? हां मेम साहब, उसी ने मुझे पाला है—कहते हुए मधुबन ने कहा—देखिए, यह गड्ढा है। संभलकर आइए। अब हम लोग कच्ची सड़क पर आ गए हैं। __ अच्छा मधुबन। तुमने यह तो कहा ही नहीं कि तितली कहां है, दिखाई नहीं पड़ी। उस दिन जब रामनाथ उसको लिवा ले गया, तब से तो उसका पता न लगा। उसका क्या हाल सब कठोर हैं, निर्दयी हैं—मन-ही-मन कहते हुए अन्यमनस्क भाव से मधुबन ने अपना कंधा हिला दिया? क्या मधुबन! कहते क्यों नहीं। __उसी दिन से वह बेचारी पड़ी है। उधर सुना है कि तहसीलदार ने बेदखली कराने का पूरा प्रबंध कर लिया है! मेम साहब, गरीब की कोई सुनता है? आप ही कहिए न! किसी ब्याह में रमुआ ने दस रुपए लिये। वह हल चलाता मर गया। जिसका ब्याह हुआ उस दस रुपए से, वह भी उन्हीं रुपयों में हल चलाने लगा। उसके भी लड़के यदि हल चलाने के डर से घबराकर कलकत्ता भाग जाएं, तो इसमें बाबाजी का क्या दोष है? कुछ नहीं शैला ने कहा। फिर आप तो जानती नहीं। यह तहसीलदार पहले मेरे यहां काम करता था। गोदाम वाले साहब से, एक बात पर उकसाकर, मेरे पिताजी को लड़ा दिया। मुकदमे में जब मेरा सब साफ हो गया, तो जाकर यह धामपुर की छावनी में नौकरी करने लगा। इसको दानव की तरह लड़ने का चसका है, सो भी अदालत का ही। नहीं तो किसी एक दिन इसकी लड़ने की साध मिटा देता। मैं किसी दिन इसकी नस तोड़ दूं, तो मुझे चैन मिले। इसके कलेजे में कतरनी-से कीड़े दिन-रात कलबलाया करते हैं। यह तहसीलदार तुम्हारे यहां… . अरे यह बात मैं क्रोध में कह गया मेम साहब; जो समय बीत गया, उसे सोच कर क्या करूंगा। अब तो मैं एक साधारण किसान हूं। शेरकोट का… ___चलते-चलते शैला ने कहा—क्या कहा, शेरकोट न! हां-तहसीलदार ने कहा था कि शेरकोट ही बैंक बनाने के लिए अच्छा स्थान है! कहां है वह? मधुबन गुर्रा उठा भूखे भेड़िए की तरह। उस ठंडी रात में उसे अपना क्रोध दमन करने से पसीना हो आया। बोला नहीं। शैला भी सामने एक ऊंचा-सा टीला देखकर अन्यमनस्क हो गई जो चांदनी रात में रहस्य के स्तूप-सा उदास बैठा था। रामजस सहसा पीछे से चिल्ला उठा—अब तो पहुंच गए मधुबन भइया! मधुबन ने गंभीरता से कहा हूं। शैला चुपचाप टूटी हुई सीढ़ियों से चढ़ने लगी। उस नीरस रजनी में पुरानी कोठी, बहुत दिनों के बाद तीन नए आगंतुकों को देखकर, जैसे व्यंग्य की हंसी हंसने लगी। अभी ये लोग दालान में पहुंचने भी न पाए थे कि एक सियार उसमें से निकल कर भागा। हां, भयभीत मनुष्य पहले ही आक्रमण करता है। रामजस ने डरकर उस पर डंडा चलाया। किंतु ________________

वह निकल गया। शैला ने कहा—मैं भीतर चलूंगी। चलिए, पर अंधेरे में कोई जानवर. मधुबन चुप रहा। आगे उसके मन में शेरकोट में बैंक बनाने की बात आ गई। वह चुपचाप एक पत्थर पर बैठ गया। शैला भी भीतर न जाकर झील की ओर चली गई। पत्थरों की पुरानी चौकियां अभी वहां पड़ी थीं। उन्हीं में से एक पर बैठकर वह सूखती हुई झील को देखने लगी। देखते-देखते उसके मन में विषाद और करुणा का भाव जागृत होकर उसे उदास बनाने लगा। शैला को दृढ़ विश्वास हो गया कि जिस पत्थर पर वह बैठी है, उसी पर उसकी माता जेन आकर बैठती थी। अज्ञात अतीत को जानने की भावना उसे अंधकार में पूर्वपरिचितों के समीप ले जाने का प्रयत्न करने लगी। जीवन में यह विचित्र शृंखला है। जिस दिन से उसे बार्टली और जेन का संबंध इस भमि से विदित हआ. उसी दिन से उसकी मानस-लहरियों में हलचल हुई। पहले उसके हृदय ने तर्क-वितर्क किया। फिर बाल्यकाल की सुनी हुई बातों ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी माता जेन ने अपने जीवन के सुखी दिनों को यहीं बिताया है। अवश्य उसकी माता भारत के एक नील-व्यवसायी की कन्या थी। फिर जब उसके संबंध में यहां प्रमाण भी मिलता है, तब उसे संदेह करने का कोई कारण नहीं। अज्ञात नियति की प्रेरणा उसे किस सत्र से यहां खींच लाई है, यही उसके हृदय का प्रश्न था। वह सोचने लगी, यहां पर उसकी माता की कितनी सुखद स्मृतियां शून्य में विलीन हो गईं। आह! उसके दुःख से भरे वे अंतिम दिन कितने प्यार से इन स्थलों को स्मरण करते रहे होंगे। इसी झील में छोटी-सी नाव पर उस अतीतकाल में वह कितनी बार घूमकर इसी कोठी में लौटकर चली आई होगी। उसे कल्पना की एकाग्रता ने माता के पैरों की चाप तक सनवा दी। उसे मालम हआ कि उस खंडहर की सीढ़ियों पर सचमच कोई चढ़ रहा है। वह घूमकर खड़ी हो गई; किंतु रामजस और मधुबन के अतिरिक्त कोई नहीं दिखाई दिया। वह फिर बैठ गई और दोनों हाथों से अपना मुंह ढककर सिसकने लगी। ____ माता का प्यार उसकी स्मृति मात्र से ही उसे सहलाने लगा। उस भयावने खंडहर में माता का स्नेह जैसे बिखर रहा था। वह जीवन में पहली बार इस अनुभूति से परिचित हुई। उसे विश्वास हो गया कि यही उसका जन्म-जन्म का आवास है. आज तक वह जो सकी थी, वह सब विदेश की यात्रा थी। आखों के सामने दो घड़ी के मनोरंजन करने वाले दृश्य, सो भी उसमें कटुता की मात्रा ही अधिक थी, जो कष्ट झेलने वाली सहनशील मनोवृत्ति के निदर्शन थे। आज उसे वास्तविक विश्राम मिला। वह और भी बैठती; किंतु मधुबन ने कहा–रामजस, तुमको जाड़ा लग रहा है क्या? नहीं भइया, यही सोचता हूं कि कहीं एक चिलम… पागल, यहां से गांव में जाकर लौटने में घंटों लग जाएंगे। तो न सही—कहकर वह अपनी कमली मुट्टियों में दबाने लगा। शैला की एकाग्रता भंग हो गई। उसने पूछा–मधुबन, क्या हम लोगों को चलना चाहिए? रात बहुत हो चली, वह देखिए, सातों तारे इतने ऊपर चढ़ आए हैं। छावनी पहुंचतेपहुंचते हम लोगों को आधी रात हो जाएगी। तब चलो—कहकर शैला निस्तब्ध टीले से नीचे उतरने लगी। मधुबन और रामजस ________________

उसके आगे और पीछे थे। वह यंत्र-चालित पुतली की तरह पथ अतिक्रम कर रही थी, और मन में सोच रही थी, अपने अतीत जीवन की घटनाएं। दुर्वृत्त पिता की अत्याचार-लीलाएं फिर माता जेन का छटपटाते हुए कष्टमय जीवन से छुट्टी पाना, उस प्रभाव की भीषणता में अनाथिनी होकर भिखमंगों और आवारों के दल में जाकर पेट भरने की आरंभिक शिक्षा, धीरे-धीरे उसका अभ्यास; फिर सहसा इन्द्रदेव से भेंट—संध्या के क्रमश: प्रकाशित होने वाले नक्षत्रों की तरह उसके शून्य, मलिन और उदास अंतस्तल के आकाश में प्रज्वलित होने लगे। वह सोचने लगी नियति दुस्तर समुद्र को पार कराती है, चिरकाल के अतीत को वर्तमान से क्षण-भर में जोड़ देती है, और अपरिचित मानवता-सिंधु में से उसी एक से परिचय करा देती है, जिससे जीवन की अग्रगामिनी धारा अपना पथ निर्दिष्ट करती है। कहां भारत, कहां मैं और कहां इन्द्रदेव! और फिर तितली! जिसके कारण मझे अपनी माता की उदारता के स्वर्गीय संगीत सुनने को मिले, यह पावन प्रदेश देखने को मिला! । उसके मन में अनेक दुराशाएं जाग उठीं। आज तक वह संतुष्ट थी। अभावपूर्ण जीवन इन्द्रदेव की कृतज्ञता में आबद्ध और संतुष्ट था। किंतु इस दृश्य ने उसे कर्मक्षेत्र में उतरते के लिए एक स्पर्धामय आमंत्रण दिया। उसका सरल जीवन जैसे चतुर और सजग होने के लिए व्यस्त हो उठा। वह कच्ची सड़क से धीरे-धीरे चली जा रही थी। पीछे से मोटर की आवाज सुन पड़ी। वह हटकर चलने लगी। किंतु मोटर उसके पास आकर रुक गई। भीतर से अनवरी ने पुकारा —मिस शैला हैं क्या? हां। छावनी पर ही चल रही हैं न? आइए न। धन्यवाद। आप चलिए, मैं आती हूं। अन्यमनस्क भाव से शैला ने कह दिया। पर अनवरी सहज में छोड़ने वाली नहीं। उसने अपने पास बैठे हुए कृष्णमोहन से धीरे-से कहा —यह तुम्हारी मामी हैं; उन्हें जाकर बुला लो। शैला उस फुसफुसाहट को सुनने के लिए वहां ठहरी न थी। आगे बढ़कर कृष्णमोहन ने नमस्कार करके कहा—आइए न। शैला कृष्णमोहन का अनुरोध न टाल सकी। मोटर के प्रकाश में उसका प्यारा मुख अधिक आग्रहपूर्ण और विनीत दिखाई पड़ा। . शैला ने मधुबन से कहा—मधुबन, कल छावनी पर अवश्य आना। कृष्णमोहन के साथ शैला मोटर में बैठ गई। तहसीलदार ने कागजों पर बड़ी सरकार से हस्ताक्षर करा ही लिया; क्योंकि शैला की योजना के अनुसार किसानों का एक बैंक और एक होमियोपैथी का निःशुल्क औषधालय ________________

सबसे पहले खुलना चाहिए। गांव का जो स्कूल है, उसे ही अधिक उन्नत बनाया जा सकता है। तीसरे दिन जहां बाजार लगता है, वहीं एक अच्छा-सा देहाती बाजार बसाना होगा, जिसमें करघे के कपड़े, अन्न, बिसाती-खाना और आवश्यक चीजें बिक सकें। गृहशिल्प को प्रोत्साहन देने के लिए वहीं से प्रयत्न किया जा सकता है। किसानों में खेतों के छोटे-छोटे टुकड़े बदलकर उनका एक जगह चक बनाना होगा, जिसमें खेती की सुविधा हो। इसके लिए जमींदार को अनेक तरह की सुविधाएं देनी होगी। यह सबसे पीछे होगा। बैंक पहले खुलना चाहिए। कलेक्टर ने इसके लिए विशेष आग्रह किया है। तहसीलदार के सुझाने पर शैला ने शेरकोट को ही बैंक के लिए अधिक उपयुक्त लिख दिया था; किंतु मधुबन के पिता की जमींदराि नीलाम खरीद हुई थी श्यामदुलारी के नाम। वह हिस्सा अभी तक उन्हीं के नाम से खेवट में था। इसलिए श्यामदुलारी ने थोड़ी-सी गर्व की हंसी हंसते हुए हस्ताक्षर करने पर कहा तहसीलदार! अब तो मुझे इससे छुट्टी दो। इन्द्र से ही जो कुछ हो, लिखवाया-पढ़वाया करो। तहसीलदार ने चश्मे में से माधुरी की ओर देखकर कहा—सरकार, यह मैं कैसे कह सकता हूं कि आप अपना अधिकार छोड़ दें। न मालूम क्या समझकर आपके नाम से बड़े सरकार ने यह हिस्सा खरीदा था। आप इसे जो चाहें कर सकती हैं। यदि आप किसी के नाम इसकी स्पष्ट लिखा-पड़ी न करें, तो यह कानून के अनुसार बीबीरानी का हो सकता है। छोटे सरकार से तो इसका कोई संबंध… श्यामदुलारी ने कड़ी निगाह से तहसीलदार को देखा। उसमें संकेत था उसे चुप करने के लिए; किंतु कूटनीति-चतुर व्यक्ति ने थोड़ी-सी संधि पाते ही, जो कुछ कहना था कह डाला! ___माधुरी इस आकस्मिक उद्घाटन से घबराकर दूसरी ओर देखने लगी थी? वह मन में सोच रही थी, मुझे क्या करना चाहिए? ___माधुरी के जीवन में प्रेम नहीं, सरलता नहीं, स्निग्धता भी उतनी न थी। स्त्री के लिए जिस कोमल स्पर्श की अत्यंत आवश्यकता होती है, वह श्यामलाल से कभी मिला नहीं। तो भी मन को किसी तरह संतोष चाहिए। पिता के घर का अधिकार ही उसके लिए मन बहलाने का खिलौना था। वह भी जानती थी कि यह वास्तविक नहीं, तो भी जब कुछ नहीं मिलता तो मानव-हृदय कृत्रिम को ही वास्तविक बनाने की चेष्टा करता है। माधुरी भी अब तक यही कर रही थी। चौबेजी कब चूकने वाले थे! उन्होंने खांसकर कहना आरंभ किया—बड़े सरकार सब समझते थे। विलायत भेजकर जो कछ होने वाला था. वह सब अपनी दर-दष्टि से देख रहे थे। इसी से उन्होंने यह प्रबंध कर दिया था, तहसीलदार साहब ने इस समय उसको प्रकट कर दिया। यह अच्छा ही किया। आगे आपकी इच्छा। ___श्यामदुलारी ऊब रही थीं; क्योंकि सब कुछ जानते हुए भी वह नहीं चाहती थीं कि उनकी दोनों संतानों में भेद का बीजारोपण हो। इन स्वयंसेवक सम्मतिदाताओं से वह घबरा गईं। माधुरी ने इस क्षोभ को ताड़ लिया। उसने कहा—इस समय तो आपका काम हो ही ________________

गया, अब आप लोग जाइए। तहसीलदार ने सिर झुकाकर विनयपूर्वक विदा ली। चौबेजी भी बाहर चले गए। __ श्यामदुलारी के मौन हो जाने से वहां का वातावरण कुंठित-सा हो गया। माधुरी जैसे कुछ कहने में संकुचित थी। कुछ देर तक यही अवस्था बनी रही। फिर सहसा माधरी ने कहा क्यों मां। क्या सोच रही हो? यह भला कौन-सी बात है इतनी सोचने-विचारने की! ये लोग तो ऐसी व्यर्थ की बातें निकालने में बड़े चतुर हैं ही। तुमको तो यह काम पहले ही कर डालना चाहिए। किंतु क्या कर डालना चाहिए, उसे साफ-साफ माधुरी ने भी अभी नहीं सोचा था। वह केवल मन बहलाने वाली कुछ बातें करना चाहती थी। किंतु श्यामदुलारी के सामने यह एक विचारणीय प्रश्न था। उन्होंने सिर उठाकर गहरी दृष्टि से देखते हुए पूछा—क्या? ___माधुरी क्षण-भर चुप रही, तो भी उसने साहस बटोरकर कहा भाई साहब का नाम उस पर भी चढ़वा दो, झगड़ा मिटे। श्यामदुलारी ने सिर झुका लिया। वह सोचने लगी। उनके सामने एक समस्या खड़ी हो गई थी। समस्याएं तो जीवन में बहुत-सी रहती हैं, किंतु वे दूसरों के स्वार्थों और रुचि तथा करुचि के द्वारा कभी-कभी जैसे सजीव होकर जीवन के साथ लड़ने के लिए कमर कसे हए दिखाई पड़ती हैं। ___ श्यामदुलारी के सामने उनका जीवन इन चतुर लोगों की कुशल कल्पना के द्वारा निस्सहाय वैधव्य के रूप में खड़ा हो गया। दूसरी ओर थी वास्तविकता से वंचित माधुरी के कृत्रिम भावी जीवन की दीर्घकालव्यापिनी दःख रेखा। एक क्षण में ही नारी-हदय ने अपनी जाति की स ने अपनी जाति की सहानुभूति से अपने को आपाद-मस्तक ढक लिया। माधुरी की ओर देखते हुए श्यामदुलारी की औखें छलछला उठीं। उन्हें मालूम हुआ कि माधुरी उस संपत्ति को इन्द्रदेव के नाम करने का घोर विरोध कर रही है। उसकी निस्सहाय अवस्था, उसके पति की हृदय-हीनता और कृष्णमोहन का भविष्य—सब उसकी ओर से श्यामदुलारी की वृद्धि को सहायता देने लगे। ____ माधुरी ने कहने को तो कह दिया! परंतु फिर उसने आंख नहीं उठाई। सिर झुकाकर नीचे की ओर देखने लगी। श्यामदुलारी ने कहा-माधुरी, अभी इसकी आवश्यकता नहीं है। तू सब बातों में टांग मत अड़ाया कर। मैं जैसा समझूगी, करूंगी। ____माधुरी इस मीठी झिड़की से मन-ही-मन प्रसन्न हुई। वह नहाने चली गई, सो भी रूठने का-सा अभिनय करते हुए। श्यामदुलारी मन-ही-मन हंसी।

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सहसा एक दिन इन्द्रदेव को यह चेतना हुई कि वह जो कुछ पहले थे, अब नहीं रहे! उन्हें पहले भी कुछ-कुछ ऐसा भान होता था कि परदे पर एक दूसरा चित्र तैयारी से आने वाला है; पर उसके इतना शीघ्र आने की संभावना न थी। शैला के लिए वह बार-बार सोचने लगे थे। उसकी क्या स्थिति होगी, यही वह अभी नहीं समझ पाते थे। कभी-कभी वह शैला के संसर्ग से अपने को मुक्त करने की भी चेष्टा करने लगते—यह भी विरक्ति के कारण नहीं, केवल उसका गौरव बनाने के लिए। उनके कुटुंब वालों के मन में शैला को वेश्या से अधिक समझने की कल्पना भी नहीं हो सकती थी। यह प्रच्छन्न व्यंग्य उन्हें व्यथित कर देता था। उधर शैला भी इससे अपरिचित थी—ऐसी बात नहीं। तब भी इन्द्रदेव से अलग होने की कल्पना उसके मन में नहीं उठती थी। इसी बीच में उसने शहर में जाकर मिशनरी सोसाइटी से भी बातचीत की थी। उन लोगों ने स्कूल खोलकर शिक्षा देने के लिए उसे उकसाया। __किंतु उसने मिशनरी होना स्वीकार नहीं किया। इधर वह बाबा रामनाथ के यहां हितोपदेश पढ़ने भी जाती थी अर्थात् इन्द्रदेव और शैला दोनों ही अपने को बहलाने की चिंता में थे। वे इस उलझन को स्पष्ट करने के लिए क्या-क्या करने की बातें सोचते थे, पर एक-दूसरे से कहने में संकुचित ही नहीं, किंतु भयभीत भी थे; क्योंकि इन्द्रदेव के परिवार में घटनाएं बड़े वेग से विकसित हो रही थीं। किसी भी क्षण में विस्फोट होकर कलह प्रकट हो सकता था। इमली के पेड़ के नीचे आरामकुर्सियों पर शैला और इन्द्रदेव बैठकर एक-दूसरे को चुपचाप देख रहे थे। प्रभात की उजली धूप टेबल पर बिछे हुए रेशमी कपड़ों पर, रह-रहकर तड़प उठती थी, जिस पर धरे हुए फूलदान के गुलाबों में से एक भीनी महक उठकर उनके वातावरण को सुगंधपूर्ण कर रही थी। इन्द्रदेव ने जैसे घबराकर कहा-शैला क्या! तुम कुछ देख रही हो? सब कुछ। किंतु इतने विचारमूढ़ क्यों हो रहे हो? यही समझ में नहीं आता। तुम्हारी वह कल्पना सफल होती नहीं दिखाई देती। इसी का मुझे दुःख है। किंतु अभी हम लोगों ने उसके लिए कुछ किया भी तो नहीं। कर नहीं सकते। यह मैं नहीं मानती। तुमको कुछ मालूम है कि तुम्हारे संबंध में यहां कैसी बातें फैलाई जा रही हैं? हां! मैं रात-रात को घूमा करती हूं जो भारतीय स्त्रियों के लिए ठीक नहीं। मैं रामनाथ के यहां संस्कृत पढ़ने जाती हूं। यह भी बुरा करती हूं। और, तुमको भी बिगाड़ रही हूं। यही बात न? अच्छा, इन बातों के किसी-किसी अंश पर देखती हूं कि तुम भी अधिक ध्यान देने लगे हो। नहीं तो इतना सोचने-विचारने की क्या आवश्यकता थी? मैं इतना ही नहीं। मैं अब इसलिए चिंतित हूं कि अपना और तुम्हारा संबंध स्पष्ट कर दूं। यह ओछा अपवाद अधिक सहन नहीं किया जा सकता। किंतु मैं अभी उस प्रश्न पर विचारने की आवश्यकता ही नहीं समझती!– शैला ने ________________

ईषत् हंसी से कहा। क्यों? तुम्हारे संसर्ग से जो मैंने सीखा है, उसका पहला पाठ यही है कि दूसरे मुझको क्या कहते हैं, इस पर इतना ध्यान देने की आवश्यकता नहीं। पहले मुझे ही अपने विषय में सच्ची जानकारी होनी चाहिए। मैं चाहती हूं कि तुम्हारी जमींदारी के दातव्य विभाग से जो खर्च स्वीकृत हुआ है, उसी में मैं अपना और औषधालय का काम चलाऊं। बैंक में भी कुछ काम कर सकू तो उससे भी कुछ मिल जाया करेगा और मेरी स्वतंत्र स्थिति इन प्रवादों को स्वयं ही स्पष्ट कर देगी। बात तो ठीक है— इन्द्रदेव ने कुछ सोचकर धीरे-से कहा। पर इसके लिए तुमको एक प्रबंध कर देना पड़ेगा। पहले मैंने सोचा था कि गांव में कई जगह कर्म-केंद्र की सष्टि हो सकती है। भिन्न-भिन्न शक्ति वाले अपने-अपने काम में जट जाएंगे। किंतु अब मैं देखती हूं कि इसमें बड़ी बाधा है, और मैं उन पर इस तरह नियंत्रण न कर सकूँगी। इसलिए बैंक और औषधालय, ग्राम सुधार और प्रचार-विभाग, सब एक ही स्थान पर हों। तो ठीक है! शेरकोट में ही सब विभागों के लिए कमरे बनवाने की व्यवस्था कर दो न! किंतु इसमें मैं एक भूल कर गई हूं। क्या उसके सुधारने का कोई उपाय नहीं है? भूल कैसी? कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जान-बूझकर एक रहस्यपूर्ण घटना को जन्म देते हैं। स्वयं उसमें पड़ते हैं और दूसरों को भी फंसाते हैं। मैं भी शेरकोट को बैंक के लिए चुनने में कुछ इस तरह मूर्ख बनाई गई हूं। इन्द्रदेव ने हंसते हए कहा मैं देख रहा हं कि तुम अधिक भावनामयी होती जा रही हो। यह संदेह अच्छा नहीं। शेरकोट के लिए तो मां ने सब प्रबंध कर भी दिया है। अब फिर क्या हुआ? शेरकोट एक पुराने वंश की स्मृति है। उसे मिटा देना ठीक नहीं। अभी मधुबन नाम का एक युवक उसका मालिक है। तहसीलदार से उसकी कुछ अनबनहै, इसलिए यह… मधुबन! अच्छा तो मैं क्या कर सकता हूं। तुम बैंक न भी बनवाओ, तो होता क्या है। अब तो वह बेचारा उस शेरकोट से निकाला ही जाएगा। __तुम एक बार मां से कहो न! और नीलवाली कोठी की मरम्मत करा दो, इसमें रुपए भी कम लगेंगे, और… _ निलवाली कोठी!—आश्चर्य से इन्द्रदेव ने उसकी ओर देखा। हां, क्यों? अरे वह तो भूतही कोठी कही जाती है। जहां मनुष्य नहीं रहते वहीं तो भूत रह सकेंगे? इन्द्रदेव! मैं उस कोठी को बहुत प्यार करती हूं। कब से शैला?— हंसते हुए इन्द्र ने उसका हाथ पकड़ लिया। इन्द्र। तुम नहीं जानते। मेरी मां यहीं कुछ दिनों तक रह चुकी है। इन्द्रदेव की औखें जैसे बड़ी हो गईं। उन्होंने कुर्सी से उठ खड़े होकर कहा—तुम क्या कह रही हो ? बैठो और सुनो । मैं वही कह रही हूं जिसके मुझे सच होने का विश्वास हो रहा है। तुम इसके लिए कुछ करो। मुझे तुमसे दान लेने में तो कोई संकोच नहीं। आज तक तुम्हारे ही दान पर मैं जी रही हूं ; किंतु वहां रहने देकर मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता तुम दे सकते हो । और , मेरी जीविका का उपाय भी कर सकते हो । शैला की इस दीनता से घबराकर इन्द्रदेव ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा शैला ! तुम काम – काज की इतनी बातें करने लगी हो कि मुझे आश्चर्य हो रहा है। जीवन में यह परिवर्तन सहसा होता है; किंतु यह क्या ! तुम मुझको एक बार ही कोई अन्य व्यक्ति क्यों समझ बैठी हो ? मैं तुमको दान दूंगा ? कितने आश्चर्य की बात ! यह सत्य है इन्द्रदेव ! इसे छिपाने से कोई लाभ नहीं । अवस्था ऐसी है कि अब मैं तुमसे अलग होने की कल्पना करके दुखी होती हूं किंतु थोड़ी दूर हटे बिना काम भी नहीं चलता । तुमको और अपने को समान अंतर पर रखकर , कुछ दिन परीक्षा लेकर , तब मन से पूछंगी । क्या पूछोगी शैला कि वह क्या चाहता है। तब तक के लिए यही प्रबंध करना ठीक होगा । मुझे काम करना पड़ेगा , और काम किए बिना यहां रहना मेरे लिए असंभव है। अपनी रियासत में मुझे एक नौकरी और रहने की जगह देकर मेरे बोझ से तुम इस समय के लिए छुट्टी पा जाओ, और स्वतंत्र होकर कुछ अपने विषय में भी सोच लो । शैला बड़ी गंभीरता से उनकी ओर देखते हुए फिर कहने लगी – हम लोगों के पश्चिमी जीवन का यह संस्कार है कि व्यक्ति को स्वावलंब पर खड़े होना चाहिए। तुम्हारे भारतीय हृदय में , जो कौटुम्बिक कोमलता में पला है, परस्पर सहानुभूति की – सहायता की बड़ी आशाएं , परंपरागत संस्कृति के कारण , बलवती रहती हैं ।किंतु मेरा जीवन कैसा रहा है, उसे तुमसे अधिक कौन जान सकता है! मुझसे काम लो और बदले में कुछ दो । अच्छा , यह सब मैं कर लूंगा ; पर मधुबन के शेरकोट का क्या होगा ? मैं नहीं कहना चाहता । मां न जाने क्या मन में सोचेंगी । जबकि उन्होंने एक बार कह दिया , तब उसके प्रतिकूल जाना उनकी प्रकृति के विरुद्ध है। तो भी तुम स्वयं कहकर देख लो । यह मैं नहीं पसंद करती इन्द्रदेव ! मैं चाहती हूं कि जो कुछ कहना हो , अपनी माताजी से तुम्हीं कहो । दूसरों से वही बात सुनने , पर जिसे कि अपनों से सुनने की आशा रहती है मनुष्य के मन में एक ठेस लगती है । यह बात अपने घर में तुम आरंभ न करो। देखो शैला । वह आरंभ हो चुकी है, अब उसे रोकने में असमर्थ हूं। तब भी तुम कहती हो , तो मैं ही कहकर देखूगा कि क्या होता है । अच्छा तो जाओ, तुम्हारे हितोपदेश के पाठ का यही समय है न ! वाह ! क्या अच्छा तुमने यह स्वांग बनाया है । शैला ने स्निग्ध दृष्टि से इन्द्रदेव को देखकर कहा – यह स्वांग नहीं है, मैं तुम्हारे समीप आने का प्रयत्न कर रही हूं- तुम्हारी संस्कृति का अध्ययन करके । __ अनवरी को आते देखकर उल्लास से इन्द्रदेव ने कहा – शैला ! शेरकोट वाली बात अनवरी से ही मां तक पहुंचाई जा सकती है । शैला प्रतिवाद करना ही चाहती थी कि अनवरी सामने आकर खड़ी हो गई। उसने कहा – आज कई दिन से आप उधर नहीं आई हैं । सरकार पूछ रही थीं कि .. .

अरे पहले बैठ तो जाइए। -कुर्सी खिसकाते हुए शैला ने कहा, मैं तो स्वयं अभी चलने के लिए तैयार हो रही थी।

अच्छा

हां, शेरकोट के बारे में रानी साहिबा से मुझे कुछ कहना था। मेरे भ्रम से एक बड़ी बुरी बात हो रही है, उसे रोकने के लिए…

क्या?

मधुबन बेचारा अपनी झोंपड़ी से भी निकाल दिया जाएगा। उसके बाप-दादों की डीह है। मैंने बिना समझे-बूझे बैंक के लिए वही जगह पसंद की। उस भूल को सुधारने के लिए मैं अभी ही आने वाली थी।

__मधुबन! हां, वही न, जो उस दिन रात को आपके साथ था, जब आप नील-कोठी से आ रही थीं? उस पर तो आपको दया करनी ही चाहिए-कहकर अनवरी ने भेद-भरी दृष्टि से इन्द्रदेव की ओर देखा।

इन्द्रदेव कुर्सी छोड़ उठ खड़े हुए।

शैला ने निराश दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए कहा-तो इस मेरी दया में आपकी सहायता की भी आवश्यकता हो सकती है। चलिए।

क्यों बेटी! तुमने सोच-विचार लिया? -कोठरी के बाहर बैठे हुए रामनाथ ने पूछा। भीतर से राजकुमारी ने कहा-बाबाजी, हम लोग इस समय ब्याह करने के लिए रुपए कहां से लावें? रुपयों से ब्याह नहीं होगा बेटी! ब्याह होगा मधुबन से तितली का। तुम इसे स्वीकार कर लो; और जो कुछ होगा मैं देख लूंगा। मैं अब बूढ़ा हुआ, तितली को तुम लोगों की स्नेहछाया में दिए बिना मैं कैसे सुख से मरूंगा? अच्छा, पर एक बात और भी आपने समझ ली है? क्या मधुबन, तितली के साथ गृहस्थी चलाने के लिए, दुःख-सुख भोगने के लिए तैयार है? वह अपनी सुध-बुध तो रखता ही नहीं। भला उसके गले एक बछिया बांधकर क्या आप ठीक करेंगे? ___ सुनो बेटी, दस बीघा तितली के, और तुम लोगों के जो खेत हैं-सब मिलाकर एक छोटी-सी गृहस्थी अच्छी तरह चल सकेगी। फिर तुमको तो यही सब देखना है, करना है, सब संभाल लोगी। मधुबन भी पढ़ा-लिखा परिश्रमी लड़का है। लग-लपटकर अपना घर चला ही लेगा। ___मधुबन से भी आप पूछ लीजिए। वह मेरी बात सुनता कब है। कई बार मैंने कहा कि अपना घर देख, वह हंस देता है, जैसे उसे इसकी चिंता ही नहीं। हम लोग न जाने कैसे अपना पेट भर लेते हैं। फिर पराई लड़की घर में ले आकर तो उसी तरह नहीं चल सकता? तुम भूलती हो बेटी! पराई लड़की समझता तो मैं उसके ब्याह की यहां चर्चा न ________________

चलाता। मधुबन और तितली दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचान गए हैं। और तितली पर तुमको दया ही नहीं करनी होगी, तुम उसे प्यार भी करोगी। उसे तुमने इधर देखा है? नहीं, अब तो वह बहुत दिन से इधर आती ही नहीं। आज मेम साहब के साथ वह भी नहाने गई है। शैला का नाम तो तुमने सुना होगा? वही जो यहां के जमींदार इन्द्रदेव के साथ विलायत से आई है। बड़ी अच्छी सुशील लड़की है। वह भी मेरे यहां संस्कृत पड़ती है। तुम चलकर उन दोनों से बात भी कर लो और देख भी लो। ___ अच्छा, मैं अभी आती हूं। __ मैं भी चलता हूं बेटी! मधुबन उनके संग नहीं है। मल्लाह को तो सहेज दिया हे। तो चलूं! रामनाथ नहाने के घाट की ओर चले। राजकुमारी भी रामदीन की नानी के साथ गंगा की ओर चली। ___ अभी वह शेरकोट से बाहर निकलकर पथ पर आई थी कि सामने से चौबेजी दिखाई पड़े। राजकुमारी ने एक बार बूंघट खींचकर मुडते हुए निकल जाना चाहा। किंतु चौबे ने सामने आकर टोक ही दिया-भाभी हैं क्या? अरे मैं तो पहचान ही न सका! दख में सब लोग पहचान लें, ऐसा तो नहीं होता। राजकुमारी ने अनखाते हए कहा। अरे नहीं-नहीं! मैं भला भूल जाऊंगा? नौकरी ठहरी। बराबर सोचता हूं कि एक दिन शेरकोट चलूं पर छुट्टी मिले तब तो। आज मैंने भी निश्चय कर लिया था कि भेंट करूंगा ही। चौबेजी के मुंह पर एक स्निग्धता छा गई थी; वह मुस्कराने की चेष्टा करने लगे। किंतु मैं नहाने जा रही हूं। अच्छी बात है, मैं थोड़ी देर में आऊंगा।—कहकर चौबेजी दूसरी ओर चले गए, और राजकुमारी को पथ चलना दूभर हो गया! कितने बरस पहले की बात है! जब वह ससुराल में थी, विधवा होने पर भी बहुत-सा दुख, मान-अपमान भरा समय वह बिता चुकी थी। वह ससुराल की गृहस्थी में बोझ-सी हो उठी थी। चचेरी सास के व्यंग्य से नित्य ही घड़ी-दो-घड़ी कोने में मुंह डालकर रोना पड़ता। सब कुछ सहकर भी वहीं खटना पड़ता। ससुराल के पुरोहितों में चौबेजी का घराना था। चौबे प्राय: आते-जाते-वैसे ही, जैसे घर के प्राणी; और गांव के सहज नाते से राजकुमारी के वह देवर होते-हंसने-बोलने की बाधा नहीं थी। राजकुमारी के पति के सामने से ही यह व्यवहार था। विधवा होने पर भी वह छूटा नहीं। उस निराशा और कष्ट के जीवन में भी कभी-कभी चौबे आकर हंसी की रेखा खींच देते। दोनों के हृदय में एह सहज स्निग्धता और सहानुभूति थी। दिन-दिन वहीं बढ़ने लगी। स्त्री का हृदय था; एक दुलार का प्रत्याशी उसमें कोई मलिनता न चौबे भी अज्ञात भाव से उसी का अनुकरण कर रहे थे। पर वह कुछ जैसे अंधकार में चल रहे थे। राजकुमारी फिर भी सावधान थी! एक दिन सहसा नियमित गालियां सुनने के समय जब चौबे का नाम भी उसमें मिलकर भीषण अट्टहास कर उठा, तब राजकुमारी अपने मन में न जाने क्यों वास्तविकता ________________

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