चन्द्रकांता सन्तति २

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चन्द्रकांता सन्तति २

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हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय कुन्दन (धनपति) ने तहखाने में से किशोरी को निकाल ले जाने का इरादा किया था तो बारह नम्बर की कोठरी में पहुँचने के पहले तहखाने के दरवाजे में ताला लगा दिया था। मगर रोहतासगढ़ दखल होने के बाद तहखाने वाली किताब की मदद से, जो दारोगा के पास रहा करती थी, वे दरवाजे पुनः खोल दिए गए थे और इसलिए दीवानखाने की राह से तहखाने में फिर आमद-रफ्त शुरू हो गई थी।

एक दिन आधी रात के बाद राजा दिग्विजयसिंह के पलंग पर बैठी हुई गौहर ने इच्छा प्रकट की कि मैं तहखाने में चलकर राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को देखा चाहती हूँ। राजा दिग्विजयसिंह उसकी मुहब्बत में चूर हो रहे थे, दीन-दुनिया की खबर भूले हुए थे, तहखाने के कायदे पर ध्यान न देकर गौहर को तहखाने में ले चले।

अभी पहला दरवाजा भी न खोला था कि यकायक एक भयानक आवाज आई। मालूम हुआ कि मानों हजारों तोपें एक साथ छूटी हैं। तमाम किला हिल उठा। गौहर बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी, दिग्विजयसिंह भी खड़ा न रह सका।

जब दिग्विजयसिंह को होश आया, छत पर चढ़ गया और शहर की तरफ देखने लगा। शहर में बेहिसाब आग लगी हुई थी, सैकड़ों घर जल रहे थे, अग्निदेव ने अपना पूरा दखल जमा लिया था, आग के बड़े-बड़े शोले आसमान की तरफ उठ रहे थे। यह हाल देखते ही दिग्विजयसिंह ने सिर पीटा और कहा, "यह सब फसाद वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का है! बेशक उन लोगों ने मैगजीन में आग लगा दी और वह भयंकर आवाज मैगजीन के उड़ने की ही थी। हाय, आज सैकड़ों घर तबाह हो गये होंगे! इस समय वह कम्बख्त साधू अगर मेरे सामने होता तो मैं उसकी दाढ़ी नोंच लेता, जिसके बहकाने से वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद किया!"

दिग्विजयसिंह घबरा कर राजमहल के बाहर निकला और तब उसे निश्चय हो गया कि जो कुछ उसने सोचा था, ठीक निकला। नौकरों ने खबर दी कि न मालूम किसने मैगजीन में आग लगा दी, जिसके सबब से सैकड़ों घर तबाह हो गए। उसी समय शहर में ऐसी आग लग गई जो अभी तक बुझाए नहीं बुझती। खबर के सुनते ही दिग्विजयसिंह अपने कमरे में लौट गया और बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

बेशक यह सब काम वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का ही था। इस आग-लगी में रामनारायण को भी तोपों में कीलें ठोंकने का खूब मौका हाथ लगा। रामानन्द दीवान घबरा कर घर से बाहर निकला और तहकीकात करने के लिए अकेला ही शहर की तरफ चला। रास्ते में चुन्नीलाल ने हाथ पकड़ लिया और कहा, "दीवानजी, बन्दगी!" बेमौके की बन्दगी से रामानन्द कुढ़ उठा और उसने चुन्नीलाल पर तलवार चलाई। चुन्नीलाल उछल कर दूर जा खड़ा हुआ और उस वार को बचा गया, मगर चुन्नीलाल के वार ने रामानन्द का काम तमाम कर दिया। उसकी भुजाली रामानन्द की गर्दन पर ऐसी बैठी कि सिर कट कर दूर जा गिरा।

अब हमको यह भी लिखना चाहिए कि भैरोंसिंह ने किस तरह मैगजीन में आग लगाई। भैरोंसिंह ने एक मोमबत्ती ऐसी तैयार की जो केवल दो घण्टे तक जल सकती थी अर्थात् उसमें दो घण्टे से ज्यादे देर तक जलने लायक मोम न था, और उस मोमबत्ती के बीचों-बीच में आतिशबाजी का एक अनार बनाया जिसमें आधी मोमबत्ती जब जल जाय तो आप से आप अनार में आग लगे। जब इस तरह की मोमबत्ती तैयार हो गई तो उसने अपने दोनों साथियों से कहा कि "मैं मैगजीन में आग लगाने जाता हूँ, अपनी फिक्र आप कर लूँगा। तुम लोग किसी ऐसी जगह जाकर छिपो जहाँ मैदान या किले की मजबूत दीवार हो, मगर इसके पहले शहर में आग लगा दो।" इसके बाद भैरोंसिंह मैगजीन के पास पहुँचे और इस फिक्र में लगे कि मौका मिले तो कमन्द लगा कर उसके अन्दर जायँ। यह इमारत बहुत बड़ी तो न थी, मगर मजबूत थी। दीवार बहुत चौड़ी और ऊँची थी। फाटक बहुत बड़ा और लोहे का था। पहरे पर पचास आदमी नंगी तलवारें लिये हर वक्त मुस्तैद रहते थे। इस मैगजीन के चारों तरफ से कोई आदमी आग लेकर नहीं जाने पाता था।

चन्द्रमा अस्त हो गया और पिछली रात की अँधेरी चारों तरफ फैल गई। निद्रादेवी की हुकूमत में सभी पड़े हुए थे यहाँ तक कि पहरे वालों की आँखें भी झिपी पडती थीं। उसी समय मौका पाकर भैरोंसिंह ने मैगजीन के पिछली तरफ कमन्द लगाई। दीवार के ऊपर चढ़ जाने के बाद कमन्द खींच ली और फिर उसी के सहारे उतर गए। मैगजीन के अन्दर हजारों थैले बारूद के गँजे हुए पड़े थे, तोप के गोलों का ढेर लगा हुआ था, बहुत-सी तोपें भी पड़ी हुई थीं। भैरोंसिंह ने यह मोमबत्ती जलाई और बारूद के थैलों के पास जमीन पर लगाकर खड़ी कर दी, इसके बाद फुर्ती से मैगजीन के बाहर हो गए और जहाँ तक दूर निकल जाते बना, निकल गए। उसी के घण्टे भर बाद (जब मोमबत्ती का अनार छूटा होगा) बारूद में आग लगी और मैगजीन की इमारत जड़ बुनियाद से नष्ट हो गई। हजारों आदमी मरे और सैकड़ों मकान गिर पड़े, बल्कि यों कहना चाहिए कि उसकी आवाज से रोहतासढ़ का किला दहल उठा, जरूर कई कोस तक इसकी भयानक आवाज गई होगी। पहाड़ी के नीचे वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में जब यह आवाज पहुँची तो दोनों सेनापति समझ गए कि मैगजीन में आग लगी, क्योंकि ऐसी भयानक आवाज सिवाय मैगजीन उड़ने के और किसी तरह से नहीं हो सकती। बेशक यह काम भैरोंसिंह का है।

मैगजीन उड़ने का विश्वास होते ही दोनों सेनापति बहुत प्रसन्न हुए और समझ गए कि अब रोहतासगढ़ का किला फतह कर लिया, क्योंकि जब बारूद का खजाना ही उड़ गया तो किले वाले तोपों के जरिये से हमें कैसे रोक सकते हैं। दोनों सेनापतियों ने यह सोचकर, कि अब विलम्ब करना मुनासिब नहीं है, किले पर चढ़ाई कर दी और दो हजार आदमियों को साथ ले नाहरसिंह पहाड़ पर चढ़ने लगा। यद्यपि दोनों सेनापति इस बात को समझते थे कि मैगजीन उड़ गई है, तो भी कुछ बारूद तोपखाने में जरूर होगी, मगर यह खयाल उनके बढ़े हुए हौसले को किसी तरह रोक न सका।

इधर दिग्विजयसिंह अपनी जिन्दगी से बिल्कुल नाउम्मीद हो बैठा। जब उसे यह खबर पहुँची कि रामानन्द दीवान (या ऐयार) भी मारा गया और बहुत-सी तोपें भी कील ठुक जाने के कारण बर्बाद हो गईं, तब वह और बेचैन हो गया और मालूम होने लगा कि मौत नंगी तलवार लिए सामने खड़ी है। वह पहर दिन चढ़े तक पागलों की तरह चारों तरफ दौड़ता रहा और तब एकान्त में बैठकर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। जब उसे जान बचाने की कोई तरकीब न सूझी और यह निश्चय हो गया कि अब रोहतासगढ़ का किला किसी तरह नहीं रह सकता और दुश्मन लोग भी मुझे किसी तरह जीता नहीं छोड़ सकते, तब वह हाथ में नंगी तलवार लेकर उठा और तहखाने की ताली निकाल कर यह कहता हुआ तहखाने की तरफ चला कि "जब मेरी जान बच ही नहीं सकती तो वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों वगैरह को क्यों जीता छोडूँ? आज मैं अपने हाथ से उन लोगों के सिर काटूँगा!"

दिग्विजयसिंह हाथ में नंगी तलवार लिए हुए अकेला ही तहखाने में गया, मगर जब उस दालान में पहुँचा जिसमें हथकड़ियों और बेड़ियों से कसे हुए वीरेन्द्रसिंह वगैरह रखे गए थे, तो उसको खाली पाया। वह ताज्जुब में आकर चारों तरफ देखने और सोचने लगा कि कैदी लोग कहाँ गायब हो गए। मालूम होता है कि यहाँ भी ऐयार लोग आ पहुँचे, मगर देखना चाहिए कि किस राह से पहुँचे?

दिग्विजयसिंह उस सुरंग में गया जो कब्रिस्तान की तरफ निकल गई थी। वहाँ का दरवाजा उसी तरह बन्द पाया जैसा कि उसने अपने हाथ से बन्द किया था। आखिर लाचार सिर पीटता हुआ लौट आया और दीवानखाने में बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

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तोप में रंजक देने की जो प्याली होती है, उसके छेद में कील ठोंक देने से तोप बेकाम हो जाती है।

11

इस जगह मुख्तसिर ही में यह भी लिख देना मुनासिब मालूम होता है कि रोहतासगढ़ तहखाने में से राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग क्यों कर छूटे और कहाँ गए।

हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय गौहर 'जोगिया' का संकेत देकर रोहतासगढ़ किले में दाखिल हुई उसके थोड़ी ही देर बाद एक लम्बे कद का आदमी भी, जो असल में भूतनाथ था, 'जोगिया' का संकेत देकर किले के अन्दर चला गया। न मालूम उसने वहाँ क्या-क्या कार्रवाई की, मगर जिस समय मैगजीन उड़ाई गई थी, उस समय वह एक चोबदार की सूरत बना राजमहल के आस-पास घूम रहा था। जब राजा दिग्विजयसिंह घबरा कर महल के बाहर निकला था और चारों तरफ कोलाहल मचा हुआ था, वह इस तरह महल के अन्दर घुस गया कि किसी को गुमान भी न हुआ। इसके पास ठीक वैसी ही ताली मौजूद थी जैसी तहखाने की ताली राजा दिग्विजयसिंह के पास थी। भूतनाथ जल्दी-जल्दी उस घर में पहुँचा जिसमें तहखाने के अन्दर जाने का रास्ता था। उसने तुरन्त दरवाजा खोला और अन्दर जाकर उसी ताली से फिर बन्द कर दिया। उस दरवाजे में एक ही ताली बाहर-भीतर दोनों तरफ से लगती थी। कई दरवाजों को खोलता हुआ वह उस दालान में पहुँचा जिसमें वीरेन्द्रसिंह वगैरह कैद थे और राजा वीरेन्द्रसिंह के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। राजा वीरेन्द्रसिंह उस समय बड़ी चिन्ता में थे। मैगजीन उड़ने की आवाज उनके कान तक भी पहुँची थी, बल्कि मालूम रहे कि उस आवाज के सदमे से समूचा तहखाना हिल गया। वे भी यही सोच रहे थे कि शायद हमारे ऐयार लोग किले के अन्दर पहुँच गए। जिस समय भूतनाथ हाथ जोड़ कर उनके सामने जा खड़ा हुआ, वे चौंके और भुतनाथ की तरफ देखकर बोले "तू कौन है और यहाँ क्यों आया?" भूतनाथ––यद्यपि मैं इस समय एक चोबदार की सूरत में हूँ, मगर मैं हूँ कोई दूसरा ही, मेरा नाम भूतनाथ है मैं आप लोगों को इस कैद से छुड़ाने आया हूँ और इसका इनाम पहले ही ले लिया चाहता हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब में आकर) इस समय मेरे पास क्या है जो मैं इनाम में दूँ?

भूतनाथ––जो मैं चाहता हूँ वह इस समय भी आपके पास मौजूद है।

वीरेन्द्रसिंह––यदि मेरे पास मौजूद है तो मैं उसे देने को तैयार हूँ। माँग, क्या माँगता है?

भूतनाथ––बस, मैं यही माँगता हूँ कि आप मेरा कसूर माफ कर दें! और कुछ नहीं चाहता।

वीरेन्द्रसिंह––मगर मैं कुछ नहीं जानता कि तू कौन है और तूने क्या अपराध किया है जिसे मैं माफ कर दूँ।

भूतनाथ––इसका जवाब मैं इस समय नहीं दे सकता। बस, आप देर न करें, मेरा कसूर माफ कर दें जिससे आप लोगों को यहाँ से जल्द छुड़ाऊँ। समय बहुत कम है, बिलम्ब करने से पछताना पड़ेगा।

तेजसिंह––पहले तुम्हें कसूर साफ-साफ कह देना चाहिए।

भूतनाथ––ऐसा नहीं हो सकता!

भूतनाथ की बातें सुनकर सभी हैरान थे और सोचते थे कि यह विचित्र आदमी है जौ जबर्दस्ती अपना कसूर माफ करा रहा है और यह भी नहीं कहता कि उसने क्या किया है। इसमें शक नहीं कि यदि हम लोगों को यहाँ से छुड़ा देगा तो भारी अहसान करेगा, मगर इसके बदले में यह केवल इतना ही माँगता है कि इसका कसूर माफ कर दिया जाय। तो यह मामला क्या है! आखिर बहुत-कुछ सोच-समझकर राजा वीरेन्द्रसिंह ने भूतनाथ से कहा, "खैर जो हो, मैंने तेरा कसूर माफ किया।"

इतना सुनते ही भूतनाथ हँसा और बारह नम्बर की कोठरी के पास जाकर उसी ताली से, जो उसके पास थी, कोठरी का दरवाजा खोला। पाठक महाशय भूले न होंगे, उन्हें याद होगा कि इसी कोठरी किशोरी को दिग्विजयसिंह ने डाल दिया था और इसी कोठरी में से उसे कुन्दन ले भागी थी।

कोठरी का दरवाजा खुलते ही हाथ में नेजा लिए वही राक्षसी दिखाई पड़ी जिसका हाल ऊपर लिख चुके हैं और जिसके सबब से कमला, भैरोंसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल किले के अन्दर पहुँचे थे। इस समय तहखाने में केवल एक चिराग जल रहा था जिसकी कुछ रोशनी चारों तरफ फैली हुई थी। मगर जब वह राक्षसी कोठरी के बाहर निकली तो उसके नेजे की चमक से तहखाने में दिन की तरह उजाला हो गया। भयानक सूरत के साथ उसके नेजे ने सभी को ताज्जुब में डाल दिया। उस औरत ने भूतनाथ से पूछा, "तुम्हारा काम हो गया?" इसके जवाब में भूतनाथ ने से कहा––"हाँ!"

उस राक्षसी ने राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर कहा, "सभी को लेकर आप इस कोठरी में आवें और तहखाने के बाहर निकल चलें, मैं इसी राह से आप लोगों

च॰ स॰-2-3

को तहखाने के बाहर कर देती हूँ।" यह बात सभी को मालूम ही थी इसी बारह नम्बर की कोठरी में से किशोरी गायब हो गई थी, इसलिए सभी को विश्वास था कि इस कोठरी में से कोई रास्ता बाहर निकल जाने के लिए जरूर है।

सभी की हथकड़ी-बेड़ी खोल दी गई। इसके बाद सब कोई उस कोठरी में घुसे और उस राक्षसी की मदद से तहखाने के बाहर हो गये। जाते समय राक्षसी ने उस कोठरी को बन्द कर दिया। बाहर होते ही राक्षसी और भूतनाथ राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह से बिना कुछ कहे चले गए और जंगल में घुसकर देखते-ही-देखते नजरों से गायब हो गए। उन दोनों के बारे में सभी को शक बना ही रहा।

12

दो पहर दिन चढ़ने के पहले ही फौज लेकर नाहरसिंह रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर चढ़ गया। उस समय दुश्मनों ने लाचार होकर फाटक खोल दिया और लड़-भिड़ कर जान देने पर तैयार हो गये। किले की कुल फौज फाटक पर उमड़ आई और फाटक के बाहर मैदान में घोर युद्ध होने लगा। नाहरसिंह की बहादुरी देखने योग्य थी। वह हाथ में तलवार लिए जिस तरफ को निकल जाता था, पूरा सफाया कर देता था। उसकी बहादुरी देखकर उसकी मातहत फौज की भी हिम्मत दूनी हो गई और वह ककड़ी की तरह दुश्मनों को काटने लगी। उसी समय पाँच सौ बहादुरों को साथ लिए राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और तेजसिंह बगैरह भी आ पहुँचे और उस फौज में मिल गये जो नाहरसिंह की मातहती में लड़ रही थी। ये पाँच सौ आदमी उन्हीं की फौज के थे जो दो-दो, चार-चार करके पहाड़ के ऊपर चढ़ाये गए थे। तहखाने से बाहर निकलने पर राजा वीरेन्द्रसिंह से मुलाकात हुई थी और सब एक जगह हो गये थे।

जिस समय किले वालों को यह मालूम हुआ कि राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह भी उस फौज में आ मिले, उस समय उनकी हिम्मत बिल्कुल जाती रही। बिना दिल का हौसला निकाले ही उन लोगों ने हथियार रख दिए और सुलह का डंका बजा दिया। पहाड़ी के नीचे से और फौज भी पहुँच गई और रोहतासगढ़ में राजा वीरेन्द्रसिंह की अमलदारी हो गई। जिस समय राजा वीरेन्द्र सिंह दीवानखाने में पहुँचे वहाँ राजा दिग्विजयसिंह की लाश पाई गई। मालूम हुआ कि उसने आत्मघात कर लिया। उसकी हालत पर राजा वीरेन्द्रसिंह देर तक अफसोस करते रहे।

राजा वीरेन्द्रसिंह ने कुँअर आनन्दसिंह को गद्दी पर बैठाया। सभी ने नजरें दीं। उसी समय कमला भी आ पहुँची। उसने किले में पहुँच कर कोई ऐसा काम नहीं किया था जो लिखने लायक हो। हाँ, गिल्लन के सहित गौहर को जरूर गिरफ्तार कर लिया था। दिग्विजय सिंह की रानी अपने पति के साथ सती हुई। रामानन्द की स्त्री भी अपने पति के साथ जल मरी। शहर में कुमार के नाम की मुनादी करा दी गई और यह कहला दिया गया कि जो रोहतासगढ़ से निकल जाना चाहे वह खुशी से चला जाय! दिग्विजयसिंह के मरने से जिसे कष्ट हुआ हो वह यदि हमारे भरोसे पर यहाँ रहेगा तो उसे किसी तरह का दुःख न होगा। हर एक की मदद की जायगी और जो जिस लायक है उसकी खातिर की जायगी। इन सब कामों के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह ने कुल हाल की चिट्ठी लिखकर अपने पिता के पास रवाना की।

दूसरे दिन राजा वीरेन्द्रसिंह ने एकान्त में कमला को बुलाया। उस समय उनके पास कुँअर आनन्दसिंह, तेजसिंह, भैरोंसिंह, तारासिंह वगैरह ऐयार लोग ही बैठे थे, अर्थात् सिवाय आपस वालों के कोई भी बाहरी आदमी नहीं था। राजा वीरेन्द्रसिंह ने कमला से पूछा, "कमला, तू इतने दिनों तक कहाँ रही? तेरे ऊपर क्या-क्या मुसीबतें आई, और तू किशोरी का क्या-क्या हाल जानती है, सो मैं सुना चाहता हूँ।"

कमला––(हाथ जोड़कर) जो कुछ मुसीबतें मुझ पर आईं और जो कुछ किशोरी का हाल मैं जानती हूँ सब अर्ज करती हूँ। अपनी प्यारी किशोरी से छूटने के बाद मैं बहुत ही परेशान हुई। अग्निदत्त की लड़की कामिनी ने जब किशोरी को अपने बाप के पंजे से छुड़ाया और खुद भी निकल खड़ी हुई तो पुन: मैं उन लोगों से जा मिली और बहुत दिनों तक गयाजी में रही और वहीं बहुत सी विचित्र बातें हुईं।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, गयाजी का बहुत-कुछ हाल तुम लोगों के बारे में देवीसिंह की जुबानी मुझे मालूम हुआ था और यह भी जाना गया कि जिन दिनों इन्द्रजीतसिंह बीमार था, उसके कमरे में जो-जो अद्भुत बातें देखने-सुनने में आईं, सब कामिनी ही की कार्रवाइयाँ थीं, मगर उनमें से कई बातों का भेद अभी तक मालूम नहीं हुआ।

कमला––वह क्या?

वीरेन्द्रसिंह––एक तो यह कि तुम लोग उस कोठरी में किस रास्ते से आती जाती थीं? दूसरे, लड़ाई किससे हुई थी? वह कटा हाथ जो कोठरी में पाया गया, किसका था, और बिना सिर की लाश किसकी थी?

कमला––वह भेद भी मैं आपसे कहती हूँ। गयाजी में फलगू नदी के किनारे एक मन्दिर श्री राधाकृष्णजी का है। उसी मन्दिर में से एक रास्ता महल में जाने का है जो उस कोठरी में निकला है जिसका हाल माधवी, अग्निदत्त और कामिनी के सिवाय किसी को मालूम नहीं। कामिनी की बदौलत मुझे और किशोरी को मालूम हुआ। उसी रास्ते हम लोग आते-जाते थे। वह रास्ता बड़ा ही विचित्र है, उसका हाल मैं जुबानी नहीं समझा सकती। गयाजी चलने के बाद जब मौका मिलेगा तो ले चलकर उसे दिखाऊँगी, हम लोगों का उस मकान में आना-जाना नेकनीयती के साथ होता था। मगर जब माधवी गयाजी में पहुँची तो बदला लेने की नीयत से एक आदमी और अपनी ऐयारा को साथ ले उसी राह से महल की तरफ रवाना हुई। उसे उस समय तक शायद हम लोगों का हाल मालूम न था। इत्तिफाक से हम तीनों आदमी भी उसी समय सुरंग में घुसे, आखिर नतीजा यह हुआ कि उस कोठरी में पहुँच कर लड़ाई हो गई। माधवी के साथ का आदमी मारा गया। वह कलाई माधवी की थी और मेरे हाथ से कटी थी। अन्त में उसकी ऐयारा उस आदमी का सिर और माधवी को लेकर चली गई। हम लोगों ने उस समय रोकना मुनासिब न समझा।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ ठीक है, ऐसा ही हुआ है। यह हाल मुझे मालूम था, मगर शक मिटाने के लिए तुमसे पूछा था।

कमला––(ताज्जुब में आकर) आपको कैसे मालूम हुआ?

वीरेन्द्रसिंह––मुझसे देवीसिंह ने कहा था और देवीसिंह को उस साधु ने कहा था जो रामशिला पहाड़ी के सामने फलगू नदी के बीच वाले भयानक टीले पर रहता था। देवीसिंह की जुबानी बाबाजी ने मुझे एक सन्देशा भी कहला भेजा था, मौका मिलने पर मैं जरूर उनके हुक्म की तामील करूँगा।

कमला––वह सन्देशा क्या था?

वीरेन्द्रसिंह––सो इस समय न कहूँगा। हाँ, यह तो बता कि कामिनी का और उन डाकुओं का साथ क्योंकर हुआ जो गयाजी की रिआया को दुःख देते थे?

कमला––कामिनी का उन डाकुओं से मिलना केवल उन लोगों को धोखा देने के लिए था। वे डाकू सब अग्निदत्त की तरफ से तनख्वाह और लूट के माल में कुछ हिस्सा भी पाते थे। वे लोग कामिनी को पहचानते थे और उसकी इज्जत करते थे। उस समय उन लोगों को यह नहीं मालूम था कि कामिनी अपने बाप से रंज होकर घर से निकली है उससे डरते थे और जो वह कहती थी करते थे। आखिर कामिनी ने धोखा देकर उन लोगों को मरवा डाला और मेरे ही हाथ से उन डाकुओं की जानें गईं। वे डाकू लोग जहाँ रहते थे, आपको मालूम हुआ ही होगा।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, मालूम हुआ है। जो कुछ मेरा शक था, मिट गया, अब उस विषय में विशेष कुछ मालूम करने की कोई जरूरत नहीं है। अब मैं यह पूछता हूँ कि इस रोहतासगढ़ वाले आदमी जब किशोरी को ले भागे, तब तेरा और कामिनी का क्या हाल हुआ?

कमला––कामिनी को साथ लेकर मैं उस खँडहर से, जिसमें नाहरसिंह और कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लड़ाई हुई थी, बाहर निकली और किशोरी को छुड़ाने की धुन में रवाना हुई, मगर कुछ कर न सकी, बल्कि यों कहना चाहिए कि अभी तक मारी फिरती हूँ। यद्यपि इस रोहतासगढ़ के महल तक पहुँच चुकी थी, मगर मेरे हाथ से कोई काम न निकला।

वीरेन्द्रसिंह––खैर, कोई हर्ज नहीं। अच्छा, यह बता कि अब कामिनी कहाँ है!

कमला––कामिनी को मेरे चाचा शेरसिंह ने अपने एक दोस्त के घर में रक्खा है मगर मुझे यह नहीं मालूम कि वह कौन है ओर कहाँ रहता है।

वीरेन्द्रसिंह––शेरसिंह से कामिनी क्योंकर मिली?

कमला––यहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक खँडहर है। शेरसिंह से मिलने के लिए कामिनी को साथ लेकर मैं उसी खँडहर में गई थी। मगर अब सुनने में आया है कि शेर सिंह ने आपकी ताबेदारी कबूल कर ली और आपने उन्हें कहीं भेजा है।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, वह देवीसिंह को साथ लेकर इन्द्रजीत को छुड़ाने के लिए गये हैं मगर न मालूम, क्या हुआ कि अभी तक नहीं लौटे। कमला––कुँअर इन्द्रजीतसिंह तो यहाँ से दूर न थे और चाचा को वह जगह मालूम थी, अब तक उन्हें लौट आना चाहिए था।

वीरेन्द्रसिंह––क्या तुझे भी वह जगह मालूम है?

कमला––जी हाँ, आप जब चाहें चलें, मुझे रास्ता बखूबी मालूम है।

इस समय कुँअर आनन्दसिंह ने, जो सिर झुकाए सब बातें सुन रहे थे, अपने पिता की तरफ देखा और कहा, "यदि आज्ञा हो तो मैं कमला के साथ भाई की खोज में जाऊँ?" इसके जवाब में राजा वीरेन्द्र सिंह ने सिर हिलाया अर्थात् उनकी अर्जी मंजूर नहीं की।

राजा वीरेन्द्रसिंह और कमला में जो कुछ बातें हो रही थीं, सब कोई गौर से सुन रहे थे। यह कहना जरा मुश्किल है कि उस समय कुँअर आनन्दसिंह की क्या दशा थी। कामिनी के वे सच्चे आशिक थे, मगर वाह रे दिल, इस इश्क को उन्होंने जैसा छिपाया उन्हीं का काम था। इस समय वे कमला की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे। उन्हें निश्चय था कि जिस जगह शेरसिंह ने कामिनी को रक्खा है, वह जगह कमला को मालूम है मगर किसी कारण से बताती नहीं, इसलिए कमला के साथ भाई की खोज में जाने के के लिए पिता से आज्ञा माँगी। इसके सिवाय कामिनी के विषय में और भी बहुत-सी बातें कमला से पूछना चाहते थे। मगर क्या करें, लाचार कि उनकी अर्जी नामंजूर की गई और वे कलेजा मसोस कर रह गए।

इसके बाद आनन्दसिंह फिर अपने पिता के सामने गए और हाथ जोड़कर बोले, "मैं एक बात और अर्ज किया चाहता हूँ।"

वीरेन्द्रसिंह––वह क्या?

आनन्दसिंह––इस रोहतासगढ़ की गद्दी पर मैं बैठाया गया हूँ परन्तु मेरी इच्छा है कि बतौर सूबेदार के यहाँ का राज्य किसी के सुपुर्द कर दिया जाय।

आनन्दसिंह की बात सुन राजा वीरेन्द्रसिंह गौर में पड़ गए और कुछ देर तक सोचने के बाद बोले, "हाँ, मैं तुम्हारी इस राय को पसन्द करता हूँ और इसका बन्दोबस्त तुम्हारे ही ऊपर छोड़ता हूँ। तुम जिसे चाहो, इस काम के लिए चुन लो।"

आनन्दसिंह ने झुक कर सलाम किया और उन लोगों की तरफ देखा जो वहाँ मौजूद थे। इस समय सभी के दिल में खुटका पैदा हुआ और सभी इस बात से डरने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि यहाँ का बन्दोबस्त मेरे सुपुर्द किया जाय, क्योंकि उन लोगों में से कोई भी ऐसा न था जो अपने मालिक का साथ छोड़ना पसन्द करता। आखिर आनन्द सिंह ने सोच-समझ कर अर्ज किया––

आनन्दसिंह––मैं इस काम के लिए पण्डित जगन्नाथ ज्योतिषी को पसन्द करता हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––अच्छी बात है, कोई हर्ज नहीं।

ज्योतिषीजी ने बहुत-कुछ उज्र किया, बावेला मचाया, मगर कुछ सुना नहीं गया। उसी दिन से मुद्दत तक रोहतासगढ़ ब्राह्मणों की हुकूमत में रहा और यह हुकूमत हुमायूँ के जमाने में 944 हिजरी तक कायम रही। इसके बाद 945 में दगाबाज शेरखाँ ने (यह दूसरा शेरखाँ था) रोहतासगढ़ के राजा चिन्तामन ब्राह्मण को धोखा देकर किले पर अपना कब्जा कर लिया।

13

तहखाने में बैठी हुई कामिनी को जब किसी के आने की आहट मालूम हुई तब वह सीढ़ी की तरफ देखने लगी मगर आने वाले अभी छत ही पर थे। उसने समझा कि कमला या शेरसिंह आते होंगे, मगर जब उसे कई आदमियों के पैरों की धमधमाहट मालूम हुई तब वह घबराई। उसका खयाल दुश्मनों की तरफ गया और वह अपने बचाव का ढंग करने लगी।

ऊपर के कमरे से तहखाने में उतरने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं, उनके नीचे एक छोटी कोठरी बनी हुई थी। इसी कोठरी में शेरसिंह का असबाब रहा करता था और इस समय भी उनका असबाव इसी के अन्दर था। इसके अन्दर जाने के लिए एक छोटा सा दरवाजा था और लोहे का मजबूत मगर हलका पल्ला लगा हुआ था। दरवाजा बन्द करने के लिए बाहर की तरफ कोई जंजीर या कुण्डी न थी, मगर भीतर की तरफ एक अड़ानी लगी हुई थी जो दरवाज़ा बन्द करने के लिए काफी थी। दरवाजे के पल्ले में एक सूराख था जिस पर गौर करने से मालूम होता था कि वह ताली लगाने की जगह है।

कामिनी ने तुरन्त चिराग बुझा दिया और अपने बिछावन को बगल में दबा कर उसी कोठरी के अन्दर चले जाने के बाद भीतर से दरवाजा बन्द कर लिया। यह काम कामिनी ने बड़ी जल्दी और दबे-पैर किया। थोड़ी ही देर में कामिनी को मालूम हुआ कि आने वाले अब सीढ़ी उतर रहे हैं और साथ ही इसके ताली लगाने वाले छेद में से मशाल की रोशनी भी उस कोठरी के अन्दर पहुँची जिसमें कामिनी छिपी हुई थी। वह छेद में आँख लगाकर देखने लगी कि कौन आया है और क्या करता है।

सिपाहियाना ठाठ के पाँच आदमी ढाल-तलवार लगाये हुए दिखाई पड़े। एक के हाथ में मशाल थी और चार आदमी एक सन्दूक को उठा कर लाये थे। जमीन पर सन्दूक रख देने के बाद पाँचों आदमी बैठ कर दम लेने और आपस में यों बातचीत करने लगे––

मशालची––जहन्नुम में जाय ऐसी नौकरी, दौड़ते-दौड़ते हैरान हो गये, ओफ!

दूसरा––खैर, दौड़ना और हैरान होना भी सुफल होता अगर कोई नेक काम हम लोगों के सुपुर्द होता।

तीसरा––भाई, चाहे जो हो, मगर बेगुनाहों का खून नाहक मुझसे तो नहीं किया जाता!

चौथा––मुश्किल तो यह है कि हम लोग इनकार भी नहीं कर सकते और भाग भी नहीं सकते। पाँचवाँ––परसों जो हुक्म हुआ है सो तुमने सुना या नहीं!

मशालची––हाँ, मुझे मालूम है।

तीसरा––मैंने नहीं सुना, क्योंकि मैं नानक का पता लगाने गया था।

पाँचवाँ––परसों यह हुक्म दिया गया है कि जो कोई कामिनी को पकड़ लायेगा या पता लगा देगा उसे मुँहमाँगी चीज इनाम में दी जायगी।

तीसरा––हम लोगों की ऐसी किस्मत कहाँ कि कामिनी हाथ लगे!

दूसरा––(चौंक कर) चुप रहो, देखो, किसी की आवाज आ रही है!

किशोरी से बात करते-करते जब किसी के आने की आहट मालूम हुई तो कामिनी चुप हो गई थी। किशोरी को ताज्जुब मालूम हुआ कि यकायक कामिनी चुप क्यों हो गई? थोड़ी देर तक राह देखती रही कि शायद अब बोले, मगर जब देर हो गई तो उसने खुद पुकारा और कहा, "क्यों बहिन, चुप क्यों हो गई?" यही आवाज उन पाँचों आदमियों ने सुनी थी। उन लोगों ने बातें करना छोड़ दिया और आवाज की तरफ ध्यान लगाया। फिर आवाज आई––"बहिन कामिनी, कुछ कहो तो सही, तुम चुप क्यों हो गईं? क्या ऐसे समय में तुमने भी मुझे छोड़ दिया! बात करना भी बुरा मालूम होता है!"

किशोरी की बातें सुनकर पाँचों आदमी ताज्जुब में आ गये और उन लोगों को एक प्रकार की खुशी हुई।

एक––उसी किशोरी की आवाज है, मगर वह कामिनी को क्यों पुकार रही है? क्या कामिनी उसके पास पहुँच गई?

दूसरा––क्या पागलपन की बातें कर रहे हो? कामिनी अगर किशोरी के पास पहुँच जाती तो वह पुकारती क्यों? धीरे-धीरे आपस में बात करती या इस तरह उसे लानत देती?

तीसरा––अजी, यह तो वही है, मैं समझता हूँ कि कामिनी इस कोठरी में जरूर आई थी।

दूसरा––आई थी तो गई कहाँ?

चौथा––हम लोगों के आने के पहले ही कहीं चली गई होगी।

दूसरा––(हँस कर) क्या खूब! अजी किशोरी का यह कहना––"क्यों बहिन, चुप क्यों हो गईं!" इस बात को साबित करता है कि वह अभी-अभी इस कोठरी में मौजूद थी।

पाँचवाँ––तुम्हारा कहना ठीक है मगर यहाँ तो कामिनी की बू तक नहीं आती।

दूसरा––(चारों तरफ देख और उस कोठरी की तरफ इशारा करके) इसी में होगी।

पाँचों ही यह कहने लगे कि 'कामिनी जरूर इसी कोठरी में होगी, हम लोगों के आने की आहट पाकर छिप गई है।' आखिर सब उस कोठरी के पास गए, एक ने दरवाजे में धक्का मारा और किवाड़ बन्द पाकर कहा, "है––है, जरूर इसी में है!"

कोठरी के अन्दर छिपकर बैठी बेचारी कामिनी सब बातें सुन रही थी और ताली के छेद में से सभी को देख भी रही थी। ऊपर लिखी बातों ने उसका कलेजा दहला दिया, यहाँ तक कि वह अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो गई और उसे निश्चय हो गया कि अब ये लोग मुझे गिरफ्तार कर लेंगे।

पाँचों आदमी इस फिक्र में लगे कि किस तरह दरवाजा खुले और कामिनी को गिरफ्तार कर लें। एक ने कहा, "दरवाजा तोड़ दो!" दूसरे ने हँस कर जवाब दिया, "शायद यह तुम्हारे किए हो सकेगा।"

उन पाँचों ने बहुत कुछ जोर कामिनी को पुकारा, दिलासा दिया, धमकी दी, जान बचा देने का वादा किया और समझाया मगर कुछ काम न चला। कामिनी बोली तक नहीं। आखिर उनमें से एक ने जो सबसे चालाक और होशियार था कहा, "अगर इस दरवाजे को हम पहले कभी बन्द देखते तो जरूर समझते कि किसी जानकार ने बाहर ताला लगाकर बन्द किया है, मगर अभी थोड़े ही दिन हुए इस कोठरी को मैंने खुला देखा था, इसमें किसी का असबाब पड़ा हुआ था। जो हो यह तो निश्चय हो गया कि कामिनी इस कोठरी के अन्दर घुस कर बैठी है, अब बाबाजी आवें तो इस कोठरी का दरवाजा खुले। (कुछ सोचकर) अब तो यही मुनासिब है कि हम लोगों में से एक आदमी जाय और बाकी चार आदमी बारी-बारी से यहाँ पहरा दें, जिससे कामिनी निकलकर भाग न जाय। आखिर इस कोठरी में कब तक छिप कर बैठी रहेगी या अपनी भूख-प्यास का क्या बन्दोबस्त करेगी?"

सभी ने इस राय को पसन्द किया। एक आदमी अपने मालिक को खबर करने चला गया, एक तहखाने में उसी जगह बैठा रहा और तीन आदमी बाहर खँडहर में निकल आए और इधर-उधर टहलने लगे। सवेरा हो गया और पूरब तरफ सूर्य की लालिमा दिखाई देने लगी।

बेचारी कामिनी की जान आफत में फँस गई, देखना चाहिए क्या होता है, मगर उसने निश्चय कर लिया कि भूख और प्यास से चाहे जान निकल जाय, मगर कोठरी के बाहर न निकलूँगी।

उस बेचारी को कोठरी के अन्दर घुस कर बैठे तीन दिन हो गए। भूख और प्यास से उस बेचारी की क्या अवस्था हो गई होगी, यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं। लिखने की कोई आवश्यकता नहीं।

हम ऊपर लिख आए हैं कि उन पाँचों में से एक आदमी अपने मालिक को खबर करने चला गया और बाकी चार इसलिए रह गए कि बारी-बारी से पहरा दें, जिससे कामिनी निकलकर भाग न जाय।

तीसरे दिन इनमें से तीन आदमी आपस में बातें करते और घूमते-फिरते खँडहर के बाहर निकले और फाटक पर खड़े होकर बातें करने लगे।

एक––इसमें कोई शक नहीं कि हम लोगों का नसीब जाग गया।

दूसरा––नसीब जागा तो हम नहीं कह सकते, हाँ इतनी बात है कि रकम गहरी हाथ लगेगी।

तीसरा––मुँहमाँगा इनाम क्या हम नहीं पा सकते? दूसरा––नहीं।

तीसरा––सो क्यों?

दूसरा––हम लोग कामिनी को अगर पकड़ ले जाते तो मुँहमाँगा इनाम पाते, सो तो हुआ नहीं, कामिनी कोठरी के अन्दर घुस बैठी और हम लोग दरवाजा खोलकर उसे निकाल न सके, लाचार हो बाबाजी को बुलाना पड़ा, ऐसी अवस्था में जो कुछ इनाम मिल जाय वही बहुत है।

पहिला––इतना तो कहला भेजा कि हम लोगों ने कामिनी को इस तहखाने में फँसा रखा है।

दूसरा––खैर जो होगा, देखा जायगा, इस समय तो हम लोगों की जीत-ही-जीत मालूम होती है। कामिनी और किशोरी दोनों को ही हमारे मालिक की किस्मत ने इस तहखाने में कैद कर रखा है।

तीसरा––(चौंककर) जरा इधर तो देखो ये लोग कौन हैं, मालूम होता है कि इन लोगों ने हमारी बातें लीं।

खँडहर के बाहर बाएँ तरफ कुछ हट कर एक नीम का पेड़ था और उस पेड़ के नीचे एक कुआँ था। इस समय दो साधु उस कुएँ पर बैठे इन तीनों की बातें सुन रहे थे। जब उन तीनों को यह बात मालूम हुई तो डरे और उन साधुओं के पास जाकर बातचीत करने लगे––

एक आदमी––तुम दोनों यहाँ क्यों बैठे हो?

एक साधु––हमारी खुशी!

एक आदमी––अच्छा, अब हम कहते हैं कि उठो और यहाँ से चले जाओ।

एक साधु––तू है कौन, जो तेरी बात मानें?

एक आदमी––(तलवार खींचकर) यह न जानना कि साधु समझ के छोड़ दूँगा, नाहक गुस्सा मत दिलाओ।

साधु––(हँसकर) वाह रे बन्दर-घुड़की! अबे, क्या तू हम लोगों को साधु समझ रहा है?

इतना सुनते ही तीनों आदमियों ने गौर करके साधुओं को देखा और यकायक यह कहते हुए कि 'हाय, गजब हो गया, यहाँ से भागो, यहाँ से भागो' वहाँ से भागे। जहाँ तक हो सका, उन लोगों ने भागने में कसर न की। दोनों साधुओं ने उन लोगों को रोकना मुनासिब न समझा, और भागने दिया।

अब वे दोनों साधु वहाँ से उठे, और बातें करते हुए खँडहर के अन्दर घुसे। घूमते-फिरते दालान में पहुँचे और दरवाजा खोलते हुए उस तहखाने में उतर गए जिसमें कामिनी थी। इस तहखाने और दरवाजे का हाल हम ऊपर लिख आए हैं, पुनः लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। हाँ, इतना जरूर कहेंगे कि रंग-ढंग से मालूम होता था कि ये दोनों साधु तहखाने और उसके रास्ते को बखूबी जानते हैं, नहीं तो ऐसा आदमी, जो दरवाजे का भेद न जानता हो, उस तहखाने में किसी तरह नहीं पहुँच सकता था। जब दोनों साधु तहखाने में पहुँचे तो वहाँ एक सिपाही को पाया और सन्दूक पर भी नजर पड़ी। एक मोमबत्ती आले पर जल रही थी। वह सिपाही इन दोनों को देख चौंका, और तलवार खींचकर सामना करने पर मुस्तैद हुआ। एक साधु ने झपटकर उसकी कलाई पकड़ ली, और दूसरे ने उसकी गर्दन में एक ऐसा घूँसा जमाया कि वह चक्कर खाकर गिर पड़ा। उसकी तलवार छीन ली गई और बेहोश कर चादर से, जो कमर में लपेटी हुई थी, उसकी मुश्कें बाँध दी गई। इसके बाद दोनों साधु उस सन्दूक की तरफ बढ़े। सन्दूक में ताला लगा हुआ न था, बल्कि एक रस्सी उसके चारों तरफ लपेटी हुई थी। रस्सी खोली गई और उस सन्दूक का पल्ला उठाया गया, एक साधु ने मोमबत्ती हाथ में ली और झाँक कर सन्दूक के अन्दर देखा, देखते ही "हाय!" कह कर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद दूसरे ने देखा, और उसकी भी यही अवस्था हुई।

छठवाँ भाग

1

वे दोनों साधु, जो सन्दूक के अन्दर झाँक न मालूम क्या देख कर बेहोश हो गए थे, थोड़ी देर बाद होश में आए और चीख-चीख कर रोने लगे। एक ने कहा "हाय हाय इन्द्रजीतसिंह, तुम्हें क्या हो गया! तुमने तो किसी के साथ बुराई न की थी, फिर किस कम्बख्त ने तुम्हारे साथ बदी की? प्यारे कुमार, तुमने बड़ा बुरा धोखा दिया, हम लोगों को छोड़ कर चले गए, क्या दोस्ती का हक इसी तरह अदा करते हैं? हाय, हम लोग जी कर क्या करेंगे, अपना काला मुँह ले कर कहाँ जाएँगे? हमको अपने भाई से बढ़कर मानने वाला अब दुनिया में कौन रह गया! तुम हमें किसके सुपुर्द करके चले गये?"

दूसरा बोला––"प्यारे कुमार, कुछ तो बोलो! जरा अपने दुश्मनों का नाम तो बताओ, कुछ कहो तो सही कि किस बेईमान ने तुम्हें मार कर इस सन्दूक में डाल दिया? हाय अब हम तुम्हारी माँ बेचारी चन्द्रकान्ता के पास कौन मुँह लेकर जायेंगे? किस मुँह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे होनहार लड़के को किसी ने मार डाला! नहीं-नहीं, ऐसा न होगा, हम लोग जीते जी अब लौट कर घर न जायँगे, इसी जगह जान दे देंगे। नहीं नहीं, अभी तो हमें उससे बदला लेना है जिसने हमारा सर्वनाश कर डाला। प्यारे कुमार, जरा तो मुँह से बोलो, जरा आँखें खोल कर देखो तो सही, तुम्हारे पास कौन खड़ा रहा है। क्या तुम हमें भूल गए? हाय, यह यकायक कहाँ से गजब आकर टूट पड़ा!"

अब तो पाठक समझ गए होंगे कि इस सन्दूक में कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और ये दोनों साधु उनके दोस्त भैरोंसिंह और तारासिंह थे। इन दोनों के रोने से कामिनी असल बात समझ गई, वह झट कोठरी के बाहर निकल आई और मोमबत्ती की रोशनी में कुमार की लाश देख जोर-जोर से रोने लगी। किशोरी इस तहखाने के बगल वाली कोठरी में थी। उसने जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह का नाम ले-लेकर रोने की आवाज सुनी तो उसकी अजब हालत हो गई। उसका पका हुआ दिल इस लायक न था कि इतनी ठेस सम्हाल सके, बस एक दफे 'हाय' की आवाज तो उसके मुँह से निकली मगर फिर तन-बदन की सुध न रही। वह ऐसी जगह न थी कि कोई उसके पास जाए या सम्हाले और देखें कि उसकी क्या हालत है।

भैरोसिंह और तारासिंह ने जो कामिनी को देखा, तो वह लोग फूट-फूट कर रोने लगे। तहखाने में हाहाकार मच गया। घंटे भर यही हालत रही। जब कामिनी ने रो क्या कहा कि 'इसी बगल वाली कोठरी में बेचारी किशोरी भी है,हाय,हम लोगों का रोना सुनकर उस बेचारी की क्या अवस्था हुई होगी।'तब भैरोसिंह और तारासिंह चुप हुए और कामिनी का मुंह देखने लगे।

भैरोसिंह——तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि यहां किशोरी भी है?

कामिनी——मैं उससे बातें कर चुकी हूं।

तारासिंह-क्या तुम बड़ी देर से इस तहखाने में हो?

कामिनी-देर क्या, मैं तो कई दिनों से भूखी प्यासी इस तहखाने में कैद हूं। (उस आदमी की तरफ इशारा करके) या मेरा पहरा देता था।

भैरोसिंह-खैर, जो होना था सो हो गया। अब हम लोग अगर रोने-धोने में लगे रहेंगे, तो इसके दुश्मन का पता ना लगा सकेंगे और न उससे बदला ही ले सकेंगे। यों तो जन्म भर रोना ही है परंतु उसके दुश्मन से बदला ले लेंगे तो कलेजे में कुछ ठंडक पड़ेगी। हाय, जब महाराज यहां आएंगे तो हम किस मुंह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे लड़के की लाश इस तहखाने में पाई गई।

इसके बाद भैरोसिंह ने इस तहखाने में आने का बाकी हाल कहा तथा यह भी बताया कि"जब खंडार के बाहर कुए पर हम दोनों आदमी बैठे थे, तभी तीन आदमियों की बातचीत से मालूम हो गया कि तुमको उन लोगों ने कैद कर लिया है। परंतु यह आशा न ठीक है हम तुम्हें इस अवस्था मैं देखेंगे। उन लोगों ने मुझे देखा तो पहचान कर डरे और भाग गये, मगर मुझे यह मालूम हुआ कि वह लोग कौन है और उन्होंने मुझे कैसे पहचाना?"

कामिनी-(हाथ का इशारा करके) उन्हीं लोगों में से एक ही अभी है जिसे तुमने बांध रखा है।

भैरोसिंह-(उस आदमी से) बता, तू कौन है?

आदमी-बताने को तो मैं सब-कुछ बता सकता हूं, परंतु मेरी जान किसी तरह न बचेगी। भैरोंसिंह––क्या तुझे अपने मालिक का डर है?

आदमी––जी हाँ।

भैरोंसिंह––मैं वादा करता हूँ कि तेरी जान बचाऊँगा, और तुझे बहुत-कुछ इनाम भी दिलाऊँगा।

आदमी––इस वादे से मेरी तबीयत नहीं भरती। क्योंकि मुझे तो आप लोगों के ही बचने की उम्मीद नहीं। हाय, क्या आफत में जान फँसी है अगर कुछ कहें तो मालिक के हाथ से मारे जायें और न कहें तो इन लोगों के हाथ से दुःख भोगें!

भैरोंसिंह––तेरी बातों से मालूम होता है कि तेरा मालिक बहुत जल्द ही यहाँ आना चाहता है?

आदमी––बेशक ऐसा ही है।

यह सुनते ही भैरोंसिंह ने तारासिंह के कान में कुछ कहा और उनका ऐयारी का बटुआ लेकर अपना बटुआ उन्हें दे दिया जिसे ले वे तुरन्त वहाँ से रवाना हुए और तहखाने के बाहर निकल गए। तारासिंह ने जल्दी-जल्दी खँडहर के बाहर होकर उस कुएँ में से एक लुटिया पानी खींचा और बटुए में से कोई चीज निकाल कर पत्थर पर रगड़ जल में घोलकर पी ली। फिर एक लुटिया जल निकाल कर वही चीज पत्थर पर घिस पानी में मिलाई और बहुत जल्द तहखाने में पहुँचे। जल की लुटिया भैरोंसिंह के हाथ में दी, भैरोंसिंह ने बटुए से कुछ खाने की चीज निकाली और कामिनी से कहा, "इसे खाकर तुम यह जल पी लो।"

कामिनी––भला खाने और जल पीने का यह कौन-सा मौका है? यद्यपि मैं कई दिनों से भूखी हूँ, परन्तु क्या कुमार की लाश के सिरहाने बैठकर मैं खा सकूँगी, क्या यह अन्न मेरे गले के नीचे उतरेगा?

भैरोंसिंह––हाय! इस बात का मैं कुछ भी जवाब नहीं दे सकता। खैर, इस पानी में से थोड़ा तुम्हें पीना ही पड़ेगा। अगर इससे इन्कार करोगी तो हम सब लोग मारे जायँगे। (धीरे से कुछ कहकर) बस, देर न करो।

कामिनी––अगर ऐसा है तो मैं इन्कार नहीं कर सकती।

भैरोंसिंह ने उस लुटिया में से आधा जल कामिनी को पिलाया और आधा आप पीकर लुटिया तारासिंह के हवाले की। तारासिंह तुरन्त तहखाने में से बाहर निकल आए और जहाँ तक जल्द हो सका, इधर-उधर से सूखी हुई लकड़ियाँ और कण्डे बटोर कर खँडहर के बीच में एक जगह रक्खा, तब बटुए में से चकमक पत्थर निकाला और उसमें से आग झाड़ कर गोठों और लकड़ियों को सुलगाया।

तारासिंह यह सब काम बड़ी फुर्ती से कर रहे थे और घड़ी-घड़ी में खँडहर के बाहर मैदान की तरफ देखते भी जाते थे। आग सुलगाने के बाद जब तारासिंह ने मैदान की तरफ देखा तो बहुत दूर पर गर्द उड़ती हुई दिखाई दी। वह अपने काम में फिर जल्दी करने लगे। बटुए में से एक शीशी निकाली जिसमें किसी प्रकार का तेल था, वह तेल आग में डाल दिया, आग पर दो-तीन दफे पानी का छींटा दिया, फिर मैदान की तरफ देखा। मालूम हुआ कि दस-पन्द्रह आदमी घोड़ों पर सवार बड़ी तेजी से इसी तरफ आ रहे हैं। उस समय तारासिंह के मुँह से यकायक निकल पड़ा––"ओफ, अगर जरा भी देर होती तो काम बिगड़ चुका था, खैर, अब यह लोग कहाँ जा सकते हैं।"

आग में से बहुत ज्यादा धुआँ निकला और खँडहर भर में फैल गया। इसके बाद तारासिंह खँडहर के बाहर निकले और कुएँ के पास जाकर नीम के पेड़ पर चढ़ गए तथा अपने को घने पत्तों की आड़ में छिपा लिया। वह पेड़ इतना ऊँचा था कि उस पर से खँडहर के भीतर का मैदान साफ नजर पड़ता था। वे सवार, जिन्हें तारासिंह ने दूर से देखा था, अब खंडहर के पास आ पहुँचे, तारासिंह ने पेड़ पर चढ़े-चढ़े गिना तो मालूम हुआ कि बारह सवार है। उनमें सबके आगे एक साधु था जिसकी सफेद दाढ़ी नाभि तक पहुँच रही थी।

पाठक,यह वही बाबाजी है जिन्होंने रोहतासगढ़ मैं राजा दिग्विजय सिंह के पास रात के समय पहुँच कर उन्हें भड़काया और राजा बिरेंद्रसिंह वगैरह को कैद कराया था।

खंडहर के पास पहुँचकर वे लोग रुके। घोड़े की बागडोरें पत्थरों से अटका कर दस आदमी तो खंडहर के अन्दर घुसे और दो आदमी घोड़े की हिफाजत के लिए बाहर रह गये।

खंडहर के अंदर धुआँ देखकर बुड्ढे साधु ने कहा, "यह धुआँ कैसा है?"

एक––किसी मुसाफिर ने आकर रसोई बनाई होगी।

दूसरा––मगर धुआँ बहुत कड़वा है।

तीसरा––ओफ, आँखों से और नाक से पानी बहने लगा।

साधु––अगर किसी मुसाफिर ने यहाँ आकर रसोई पकाई होगी तो हांडी, पत्थर और पानी का बर्तन इत्यादि कुछ और भी तो यहाँ दिखाई देता। (एक आदमी की तरफ देख कर) हमें इस दोहे का रंग बेढब मालूम होता है, इसकी कड़वाहट इसकी रंगत और इसकी बू कहे देती है की धुएँ में बेहोशी का असर है। है, है, जरूर ऐसा ही है, कुछ अमल भी आ चला और सिर भी घूमने लगा! (जोर से) अरे बाहादुरो,बेशक तुम लोग धोखे में डाले गए, यहाँ कोई ऐयार आ पहुँचा है,क्या ताज्जुब है, अगर तहखाने में से कामिनी को निकालकर ले गया हो।

नीम के पेड़ पर बैठे हुए तारासिंह उस साधु की सब बातें सुन रहे थे क्योंकि वह नीम का पेड़ खँडहर के फाटक के पास ही था। साधु की बातें अभी पूरी न होने पाई हे के खँडहर के पिछवाड़े की तरफ से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। मालूम होता है कि साधु की आखिरी बात उसने सुन ली थी, क्योंकि पहुँचने के साथ ही उसने पुकार कर कहा,"नहीं-नहीं, कामिनी को कोई निकाल कर नहीं ले गया मगर इसमें भी संदेह नहीं कि वीरेंद्रसिंह के दो ऐयार यहाँ आए हैं,एक तहखाने के अंदर है दूसरा (हाथ से इशारा करके) इस नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है।"

साधु––बस,तब तो मार लिया। बेशक हम लोग आफत में फँस गए है परंतु कामिनी और इंद्रजीत, यह तुम लोग तहखाने में पहुँचा चुके हो, अब बाहर नहीं जा सकते। ताज्जुब नहीं है कि इन ऐयारों ने इंद्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो! देखो, मैं शाहदरवाजे को अभी ऐसा बन्द करता हूँ की फिर ऐयार का बाप भी तहखाने में नहीं जा सकेगा।

इसके जवाब में उस आदमी ने, जो अभी दौड़ता हुआ आया था, कहाँ की "हमारा एक आदमी भी तहखाने में ही है।"

साधु––खैर,अब तो उसका भी उसी तहखाने में घुट कर मर जाना बेहतर है।

तारासिंह ने उस आदमी को पहचान लिया जो खँडहर के पिछवाड़े की तरफ से दौड़ता हुआ आया था। या उन्हीं दोनों आदमियों में से एक था जो भैरोसिंह और तारासिंह को कुएँ पर देख डर के मारे भाग गए थे। ना मालूम कहाँ छुप रहा था जो इस समय बाबा जी को देखकर बेधड़क आ पहुँचा।

साधु ने धुएँ का ख्याल बिल्कुल ही ना किया और खँडहर के अंदर जाकर न मालूम किस कोठरी में घुस गया।

तारासिंह को कुँअर इन्द्रजीतसिंह के मरने का जितना गम था, उसे पाठक से समझ सकते हैं परन्तु उसको उस समय बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब साधु के मुँह से यह सुना कि "ताज्जुब नहीं कि ऐयारों ने इन्द्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो!" बल्कि यों कहना चाहिए कि इस बात से तारासिंह को खुश कर दिया। वे अपने दिल में सोचने लगे कि बेशक हम लोगों ने धोखा खाया, मगर ना मालूम उन्हें कैसी दवा खिलाई गई जिसने बिल्कुल मुर्दा ही बना दिया। यदि इस समय भैरोसिंह के पास पहुँचकर खुशखबरी सुनाई जाती है तो क्या हाँ अच्छी बात थी। मगर कम्बख्त साधु तो कहता है कि मैं शाहदरवाजे को ही बन्द कर देता हूँ जिसने फिर कोई आदमी तहखाने में न जा सके। यदि ऐसा हुआ तो बड़ी ही मुश्किल होगी। इन्द्रजीतसिंह अगर जीते भी है तो अब मर जायेंगे! न मालूम यह शाहदरवाजा कौन सा है और किस तरह खुलता और बन्द होता है?

वे लोग तो सुन ही चुके थे कि वीरेंद्रसिंह का एक ऐयार नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है। बाबाजी शाहदरवाजा बन्द करने चले गये, मगर तारासिंह को इसकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, क्योंकि वे इस बात को बखूबी जानते थे कि बेहोशी का धुआँ जो इस खँडहर में फैला हुआ है, अब इन लोगों को ज्यादा देर तक ठहरने ना देगा, थोड़ी ही देर में बेहोशी आ जाएगी और फिर किसी योग्य न रहेंगे, और आखिर वैसा ही हुआ।

यद्यपि वे लोग ज्यादा धुएँ में नहीं फँसे थे, तो भी जो कुछ उन लोगों की आँखों और नाक की राह से पेट में चला गया था, वही उन लोगों को बेदम करने के लिए काफी था। वे लोग कुएँ पर आ पहुँचे और चारों तरफ से उस नीम के पेड़ को घेर लिया। इस समय उन लोगों की अवस्था शराबियों की सी हो रही थी। उसी समय तारासिंह ने पेड़ पर से चिल्लाकर कहा, "ओ हो हो हो, क्या अच्छे वक्त पर हमारा मालिका पहुँचा। जब जरूरत इन कमबख्तों की जान जाएगी!"

तारासिंह की बात सुनते ही वे लोग ताज्जुब मैं आ गया और मैदान की तरफ देखने लगे। वास्तव में पूरब की तरफ गर्दन उठ रही थी और मालूम होता था कि किसी राजा की सवारी इस तरफ आ रही है। उन लोगों के दिमाग पर आप बेहोशी का असर अच्छी तरह हो चुका था। वे लोग बैठ गए और फिर जमीन पर लेट कर दिन दुनिया से बेखबर हो गए।

तारासिंह की निगाह उसी गर्द की तरफ थी। धीरे-धीरे आदमी और घोड़े दिखाई देने लगे और जब थोड़ी दूर रह गये तो साफ मालूम होता है कि कई सवालों को साथ लिए राजा वीरेंद्रसिंह आ पहुँचे। ऐयारों ने तेजसिंह और पंडित बद्रीनाथ उनके साथ और मुश्की घोड़े पर सवार कमला आगे आगे जा रही थी। जब तक वे लोग खँडहर के पास आवे, तब तक तारासिंह पेड़ के नीचे उतरे, कुएँ में से एक लुटिया जल निकाल कर मुँह धोया और कुछ आगे बढ़ कर उन लोगों से मिले। वीरेंद्रसिंह ने तारा सिंह से पूछा,"कहो, क्या हाल है?"

तारासिंह––विचित्र हाल है।

वीरेंद्रसिंह––सो क्यों, भैरौं कहाँ है?

तारासिंह––भैरोंसिंह इसी खँडहर के तहखाने में है,और किशोरी, कामिनी तथा कुँवर इन्द्रजीतसिंह भी उसी तक आने में कैद है।

तारासिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह का जो कुछ हाल तहखाने में देखा था, वह किसी से कहना मुनासिब न समझा, क्योंकि सुनते हुए लोग अधमरे हो जाते और किसी काम लायक ना रहते और वीरेंद्रसिंह की तो न मालूम क्या हालत होती, शिवाय इसके यह भी मालूम हो ही चुका था कि कुँवर इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं है। ऐसी अवस्था में उन लोगों को बुरी खबर सुनाना बुद्धिमानी के बाहर था, इसलिए तारासिंह ने इन्द्रजीतसिंह के बारे में बहुत-सी बातें बनाकर कहीं, जैसे कि आगे चलकर मालूम होगा।

कुँवर आनंदसिंह ने जब तारासिंह की जुबानी यह सुना कि कामिनी भी इसी तहखाने में कैद है तो बहुत ही खुश हुए और सोचने लगे कि अब थोड़ी देर में माशूका से मुलाकात हुआ ही चाहती है। ईश्वर ने बड़ी कृपा की कि ढूँढ़ने और पता लगाने की नौबत न पहुँची। उन्होंने सोचा कि बस, अब हमारा दु:खान्त नाटक सुखान्त हुआ है चाहता है।

वीरेंद्रसिंह ने तारासिंह से पूछा,"क्या तुमने अपनी आँखों से उन लोगों को इस तहखाने में क्या देखा है?"

तारासिंह––जी हाँ,कुँवर इन्द्रजीतसिंह और कामिनी से तो हम दोनों आदमी मिल चुके हैं और भैरोंसिंह उन दोनों के पास ही है, मगर किशोरी को हम लोग न देख सके, कामिनी की जुबानी मालूम हुआ कि जिस तहखाने में हुआ है उसी के बगल वाली कोठरी में किशोरी भी कैद है। पर कोई तरकीब ऐसी ना निकली जिससे हम लोग किशोरी तक पहुँच सकते।

वीरेंद्रसिंह––क्या यहाँ की कोठरियों और दरवाजों में किसी तरह का भेद है?

तारासिंह––भेद क्या, मुझे तो यह एक छोटा तिलिस्म ही मालूम होता है!

वीरेंद्रसिंह––भला तुम और भैरोंसिंह इन्द्रजीतसिंह के पास तक पहुँच गए तो उसे तहखाने के बाहर क्यों न ले आए?

तारासिंह––(कुछ अटककर) मुलाकात होने पर हम लोग उसी तरह खाने में बैठ कर बातें करने लगे। दुश्मन का एक आदमी उस तहखाने में कैदियों की निगहबानी कर रहा था। कैदी हथकड़ी और बेड़ी के सबब बेबस थे। जब हम दोनों ने उस आदमी को गिरफ्तार किया और हाल जानने के लिए बहुत-कुछ मारा-पीटा, तब वह राह पर आया। उसकी जुबानी मालूम हुआ कि हम लोगों का दुश्मन अर्थात् उसका मालिक बहुत से आदमियों को साथ ले यहाँ आया ही चाहता है। तब भैरोंसिंह ने मुझे कहा कि इस समय हम लोगों का इस तहखाने से बाहर निकलना मुनासिब नहीं है, कौन ठिकाना बाहर निकलकर दुश्मनों से मुलाकात हो जाय। वे लोग बहुत होंगे और हम लोग केवल तीन आदमी हैं ताज्जुब नहीं कि तकलीफ उठानी पड़े, इससे यही बेहतर है कि तुम बाहर जाओ और जब दुश्मन लोग इस खँडहर में आ जायें, तो उन्हें किसी तरह गिरफ्तार करी। उन्हीं की आज्ञा पाकर मैं अकेला तहखाने के बाहर निकल आया और मैंने दुश्मनों को गिरफ्तार भी कर लिया।

तेजसिंह––(खुश होकर और हाथ का इशारा करके) मालूम होता है कि वे लोग जो उस पेड़ के नीचे पड़े हैं और कुछ खँडहर के दरवाजे पर दिखाई देते हैं, सब तुम्हारी ही कारीगरी से बेहोश हुए हैं। उन्हें किस तरह बेहोश किया?

तारासिंह––खँडहर के अन्दर आग सुलगाई और उसमें बेहोशी की दवा डाली, जब तक वे लोग आवें तब तक धुआँ अच्छी तरह फैल गया। ऐसी कड़ी दवा से वे लोग क्योंकर बच सकते थे, जरा-सा धुआँ आँख में लगना बहुत था। दुश्मन के केवल दो आदमी बच गये हैं, (घोड़ों की तरफ देखकर) मालूम होता है, आपको आते देख वे लोग भाग गए, यह क्या हुआ!

तेजसिंह––(चारों तरफ देखकर) जाने दो, क्या हर्ज है। हाँ तो अब हम लोगों को तहखाने में चलना चाहिए।

तारासिंह––शायद अब हम लोग तहखाने में न जा सकें।

कमला––सो क्यों?

तारासिंह––उन लोगों में एक साधु भी था, वह बड़ा ही चालाक और होशियार था। आँख में धुआँ लगते ही समझ गया कि इसमें बेहोशी का असर है, अब दम के दम में हम लोग बेहोश हो जायेंगे। उसी समय एक आदमी ने जो पहले हमलोगों को देखकर भाग गया था और छिपकर मेरी कार्रवाई देख रहा था, पहुँचकर उसे हमलोगों के आने की खबर दे दी और यह भी कह दिया कि अभी तक कामिनी, किशोरी और इन्द्रजीतसिंह तहखाने में हैं बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार भी तहखाने में है। यह सुनते ही वह कुछ खुश हुआ और बोला, "अब हमलोग तो बेहोश हुआ ही चाहते हैं, धोखे में पड़ ही चुके हैं, मगर अब हम यहाँ के शाहदरवाजे को बन्द कर देते हैं, फिर किसी की मजाल नहीं कि तहखाने में जा सके और उन लोगों को निकाल सके जो तहखाने के अन्दर अभी तक बैठे हुए हैं।" इस बात को सुनकर उस जासूस ने कहा कि 'हमलोगों का एक आदमी भी उसी तहखाने में है।' साधु ने जवाब दिया कि 'अब उसका भी उसी में घुटकर मर जाना बेहतर होगा।' फिर न मालूम क्या हुआ और उस साधु ने क्या किया अथवा शादरवाजा कौन है और किस तरह खुलता या बन्द होता है!

च॰ स॰-2-4

तारासिंह की इस बात ने सभी को तरद्दुद में डाल दिया और थोड़ी देर तक वे लोग सोच-विचार में पड़े रहे इसके बाद कमला ने कहा, "पहले खँडहर में चलकर तहखाने का दरवाजा खोलना चाहिए, देखें खुलता है या नहीं, अगर खुल गया तो सोच-विचार की कुछ जरूरत नहीं, यदि न खुल सका तो देखा जायगा।"

इस बात को सभी ने पसन्द किया और राजा वीरेन्द्रसिंह ने कमला को आगे चलने और तहखाने का दरवाजा खोलने के लिए कहा। खँडहर में इस समय धुआँ कुछ भी न था, सब साफ हो चुका था। कमला सभी को साथ लिए हुए उस दालान में पहुँची जहाँ से तहखाने में जाने का रास्ता था। मोमबत्ती जला कर हाथ में ली और बगल वाली कोठरी में जाकर मोमबत्ती तारासिंह के हाथ में दे दी। इस कोठरी में एक आलमारी थी जिसके पल्लों में दो मुढें लगे हुए थे। इन्हीं मुट्ठों के घुमाने से दरवाजा खुल जाता था और फिर एक कोठरी में पहुँच जाने से तहखाने में उतरने के लिए सीढ़ियाँ मिलती थीं। इस समय कमला ने इन्हीं दोनों मुट्ठों को कई वार घुमाया, वे घूम तो गए मगर दरवाजा न खुला। इसके बाद तारासिंह ने और फिर तेजसिंह ने भी उद्योग किया मगर कोई काम न चला। तब तो सभी का जी बेचैन हो गया और विश्वास हो गया कि उस बेईमान साधु ने जो कुछ कहा, सो किया। इस खंडहर में कोई शाहदरवाजा जरूर है जिसे साधु ने बन्द कर दिया और जिसके सबब से यह दरवाजा अब नहीं खुलता।

सब लोग उस कोठरी से बाहर निकले और उस साधु को ढूँढ़ने लगे। खँडहर में और नीम के पेड़ के नीचे आठ आदमी बेहोश हुए थे जो सब इकट्ठे किए गए। दो आदमी जो घोड़ों की हिफाजत करने के लिए रह गये थे और बेहोश नहीं हुए थे वे तो न मालूम कहाँ भाग ही गए थे, अब साधु रह गए सो उनके शरीर का कहीं पता न लगा। चारों तरफ खोज होने लगी।

राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और तारासिंह को साथ लिए हुए कमला उस कोठरी में पहुँची जिसमें दीवार के साथ लगी हुई पत्थर की मूरत थी, जिसमें एक दफे रात के समय कामिनी जा चुकी थी, और जिसका हाल ऊपर के किसी बयान में लिखा जा चुका है। इसी कोठरी में पत्थर की मूरत के पास ही साधु महाशय बेहोश पड़े हुए थे।

तेजसिंह––(मूरत को अच्छी तरह देखकर) मालूम होता है कि शाहदरवाजे से इस मूरत का कोई सम्बन्ध है।

वीरेन्द्रसिंह––शायद ऐसा ही हो, क्योंकि मुझे यह खँडहर तिलिस्मी मालूम होता है। हाय, बेचारा लड़का इस समय कैसी मुसीबत में पड़ा हुआ है। अब दरवाजा खुलने की तरकीब किससे पूछी जाय और उसका कैसे पता लगे? मेरी राय तो यह है कि इस खँडहर में जो कुछ मिट्टी-चूना पड़ा है, सब बाहर फिकवाकर जगह साफ करा दी जाय और दीवार तथा जमीन भी खोदी जाय।

तेजसिंह––मेरी भी यही राय है।

तारासिंह––जमीन और दीवार खुदने से जरूर काम चल जायगा। तहखाने की दीवार खोदकर हम लोग अपना रास्ता निकाल लेंगे, बल्कि और भी बहुत-सी बातों का पता लग जायगा।

वीरेन्द्रसिंह––(तेजसिंह की तरफ देख कर) बहुत जल्द बन्दोबस्त करो और दो आदमी रोहतासगढ़ भेज कर एक हजार आदमी की फौज बहुत जल्द मँगवाओ। वह फौज ऐसी हो कि सब काम कर सके, अर्थात् जमीन खोदने, सेंध लगाने, सड़क बनाने इत्यादि का काम बखूबी जानती हो।

तेजसिंह––बहुत खूब।

राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ-साथ सौ आदमी आये हुए थे। वे सब-के-सब काम में लग गये। बेहोश दुश्मनों के हाथ-पैर बाँध दिये गये और उन्हें उठा कर एक दालान में रख देने के बाद सब लोग खँडहर की मिट्ठी उठा-उठाकर बाहर फेंकने लगे। जल्दी के मारे मालिकों ने भी काम में हाथ लगाया।

रात हो गई। कई मशाल भी जलाये गये, मिट्टी की सफाई बराबर जारी रही, मगर तारासिंह का विचित्र हाल था, उन्हें घड़ी-घड़ी रुलाई आती थी, और उसे वे बड़ी मुश्किल से रोकते थे। यद्यपि तारासिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह का हाल बहुत-कुछ झूठ-सच मिलाकर राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा था, मगर वे बखूबी जानते थे कि इन्द्रजीतसिंह की अवस्था अच्छी नहीं है, उनकी लाश तो अपनी आँखों से देख ही चुके थे, परन्तु साधु की बातों ने उनकी कुछ तसल्ली कर दी थी। वे समझ गये थे कि इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं, बल्कि बेहोश हैं, मगर अफसोस तो यह है कि यह बात केवल तारासिंह को ही मालूम है, भैरोंसिंह को भी यदि इस बात की खबर होती, तो तहखाने में बैठे-बैठे कुमार को होश में लाने का कुछ उद्योग करते। कहीं ऐसा न हो कि बेहोशी में ही कुमार की जान निकल जाय, ऐसी कड़ी बेहोशी का नतीजा अच्छा नहीं होता है, इसके अतिरिक्त कई दिनों से कुमार बेहोशी की अवस्था में पड़े हैं, बेहोशी भी ऐसी कि जिसने बिल्कुल ही मुर्दा बना दिया, क्या जाने, जीते भी हैं या वास्तव में मर ही गये।

ऐसी-ऐसी बातों के विचार से तारासिंह बहुत ही बेचैन थे, मगर अपने दिल का हाल किसी से कहते नहीं थे।

यहाँ से थोड़ी दूर पर एक गाँव था। कई आदमी दौड़ गये और कुदाल-फावड़ा इत्यादि जमीन खोदने का सामान वहाँ से ले आये और बहुत से मजदूरों को साथ लिवाते आये। रात-भर काम लगा रहा, और सवेरा होते-होते तक खँडहर साफ हो गया।

अब उस दालान की खुदाई शुरू हुई, जिसके बगल वाली कोठरी के अन्दर से तहखाने में जाने का रास्ता था। हाथ-भर तक जमीन खुदने के बाद लोहे की सतह निकल आई, जिसमें छेद होना भी मुश्किल था। यह देखकर वीरेन्द्रसिंह को भी बहुत रंज हुआ और उन्होंने खण्डहर के बीच की जमीन अर्थात् चौक को खोदने का हुक्म दिया।

दूसरे दिन चौक की खुदाई से छुट्टी मिली। खुद जाने पर वहाँ एक छोटी-सी खूबसूरत बावली निकली; जिसके चारों तरफ छोटी-छोटी संगमरमर की सीढ़ियाँ थीं। यह बावली दस गज से ज्यादा गहरी न थी, और इसके नीचे की सतह तीन गज चौड़ी और इतनी ही लम्बी होगी। दो पहर दिन चढ़ते-चढ़ते उस बावली की मिट्टी निकल गई और नीचे की सतह में एक पीतल की एक मूरत दिखाई पड़ी। मूरत बहुत बड़ी न थी, एक हिरन का शेर ने शिकार किया था, हिरन की गर्दन का आधा हिस्सा शेर के मुँह में था। मूरत बहुत ही खूबसूरत और कीमती थी, मगर मिट्टी के अन्दर बहुत दिनों तक दबे रहने से मैली और खराब हो रही थी। वीरेन्द्रसिंह ने उसे अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर साफ करने का हुक्म दिया।

वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह से कहा, "इस खुदाई में समय भी नष्ट हुआ, और काम भी न निकला।"

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