तितली
तितली
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प्रथम खंड
1.
क्यों बेटी! मधुवा आज कितने पैसे ले आया?
नौ आने, बापू!
कुल नौ आने! और कुछ नहीं?
पांच सेर आटा भी दे गया है। कहता था, एक रुपए का इतना ही मिला।
वाह रे समय—कहकर बुड्ढा एक बार चित होकर सांस लेने लगा।
कुतूहल से लड़की ने पूछा कैसा समय बापू?
बुड्ढा चुप रहा।
यौवन के व्यंजन दिखाई देने से क्या हुआ, अब भी उसका मन दूध का धोया है। उसे लड़की कहना ही अधिक संगत होगा।
उसने फिर पूछा—कैसा समय बापू?
चिथड़ों से लिपटा हुआ लंबा-चौड़ा, अस्थि-पंजर झनझना उठा खांसकर उसने कहा —जिस भयानक अकाल का स्मरण करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिस पिशाच की अग्नि-क्रीड़ा में खेलती हुई तुझको मैंने पाया था, वही संवत 55 का अकाल आज के सुकाल से भी सदय था—कोमल था। तब भी आठ सेर का अन्न बिकता था। आज पांच सेर की बिक्री में भी कहीं जूं नहीं रेंगती, जैसे—सब धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं। कोई अकाल कहकर चिल्लाता नहीं। ओह! मैं भल रहा हं। कितने ही मनष्य तभी से एक बार भोजन करने के अभ्यासी हो गए हैं। जाने दे, होगा कुछ बंजो! जो सामने आवे, उसे झेलना चाहिए।
बंजो, मटकी में डेढ़ पाव दूध, चार कंडों पर गरम कर रही थी। उफनाते हुए दूध को उतारकर उसने कुतूहल से पूछा—बापू! उस अकाल में तुमने मुझे पाया था! लो, दूध पीकर मुझे वह पूरी कथा सुनाओ।
बुड्ढे ने करवट बदलकर, दूध लेते हुए, बंजो की आंखों में खेलते हुए आश्चर्य को देखा। वह कुछ सोचता हुआ दूध पीने लगा।
थोड़ा-सा पीकर उसने पूछा-अरे तूने दूध अपने लिए रख लिया है?
बंजो चुप रही। बुड्ढा खड़खड़ा उठा—तू बड़ी पाजी है, रोटी किससे खाएगी रे?
सिर झुकाए हुए, बंजो ने कहा—नमक और तेल से मुझे रोटी अच्छी लगती है बापू!
बचा हुआ दूध पीकर बुड्ढा फिर कहने लगा यही समय है, देखती है न! गाएं डेढ पाव दूध देती हैं! मुझे तो आश्चर्य होता है कि उन सूखी ठठरियों में से इतना दूध भी कैसे निकलता है!
मधुवा दबे पांव आकर उसी झोपड़ी के एक कोने में खड़ा हो गया। बुड्ढे ने उसकी ओर देखकर पूछा–मधुवा, आज तू क्या-क्या ले गया था?
डेढ़ सेर घुमची, एक बोझा महुआ का पत्ता और एक खांचा कंडा बाबाजी!–मधुवा ने हाथ जोड़कर कहा।
इन सबका दाम एक रुपया नौ आना ही मिला?
चार पैसे बंधू को मजूरी में दिए थे।
अभी दो सेर घुमची और होगी बापू! बहुत-सी फलियां वनबेरी के झुरमुट में हैं, झड़ जाने पर उन्हें बटोर लूंगी। बंजो ने कहा। बुड्ढा मुस्कुराया। फिर उसने कहा मधुवा! तू गायों को अच्छी तरह चराता नहीं बेटा! देख तो, धवली कितनी दुबली हो गई है!
कहां चरावें, कुछ ऊसर-परती कहीं चरने के लिए बची भी है?—मधुवा ने कहा।
बंजो अपनी भूरी लटों को हटाते हुए बोली—मधुवा गंगा में घंटों नहाता है बापू! गाएं अपने मन से चरा करती हैं! यह जब बुलाता है,तभी सब चली आती हैं।
बंजो की बात न सुनते हुए बाबाजी ने कहा-तू ठीक कहता है मधुवा! पशुओं को खाते-खाते मनुष्य, पशुओं के भोजन की जगह भी खाने लगे। ओह! कितना इनका पेट बढ़ गया है! वाह रे समय!!
मधुवा बीच ही में बोल उठा—बंजो, बनिया ने कहा है कि सरफोंका की पत्ती दे जाना,अब मैं जाता हूं।
कहकर वह झोपड़ी के बाहर चला गया।
संध्या गांव की सीमा में धीरे-धीरे आने लगी। अंधकार के साथ ही ठंड बढ़ चली। गंगा की कछार की झाड़ियों में सन्नाटा भरने लगा। नालों के करारों में चरवाहों के गति गूंज रहे थे।
बंजो दीप जलाने लगी। उस दरिद्र कुटीर के निर्मम अंधकार में दीपक की ज्योति तारा-सी चमकने लगी। बुड्ढे ने पुकारा-बंजो
आयी—कहती हुई वह बुड्ढे की खाट के पास आ बैठी और उसका सिर सहलाने लगी। कुछ ठहरकर बोली—बापू! उस अकाल का हाल न सुनाओगे?
तू सुनेगी बंजो क्या करेगी सुनकर बेटी? तू मेरी बेटी है और मैं तेरा बूढ़ा बाप! तेरे लिए इतना जान लेना बहुत है।
नहीं बापू! सुना दो मुझे वह अकाल की कहानी—बंजो ने मचलते हुए कहा।
धांय-धांय-धांय…!!!
गंगा-तट बंदूक के धड़ाके से मुखरित हो गया। बंजो कुतूहल से झोपड़ी के बाहर चली आई।
वहां एक घिरा हुआ मैदान था। कई बीघा की समतल भूमि—जिसके चारों ओर, दस लढे की चौड़ी, झाड़ियों की दीवार थी जिसमें कितने ही सिरिस, महुआ, नीम और जामुन के वृक्ष थे—जिन पर घुमची, सतावर और करंज, इत्यादि की लतरें झूल रही थीं। नीचे की भूमि में मटेस के चौड़े-चौड़े पत्तों की हरियाली थी। बीच-बीच में वनबेर ने भी अपनी कंटीली डालों को इन्हीं सबों से उलझा लिया था।
वह एक सघन झुरमुट था—जिसे बाहर से देखकर यह अनुमान करना कठिन था कि इसके भीतर इतना लंबा-चौड़ा मैदान हो सकता है।
देहात के मुक्त आकाश में अंधकार धीरे-धीरे फैल रहा था। अभी सूर्य की अस्तकालीन लालिमा आकाश के उच्च प्रदेश में स्थित पतले बादलों में गुलाबी आभा दे रही थी।
बंजो, बंदूक का शब्द सुनकर, बाहर तो आई; परंतु वह एकटक उसी गुलाबी आकाश को देखने लगी। काली रेखाओं-सी भयभीत कराकुल पक्षियों की पंक्तियां 'करररर-करी' करती हुई संध्या की उस शांत चित्रपटी के अनुराग पर कालिमा फेरने लगी थीं।
हाय राम! इन कांटों में-कहां आ फंसा!
बंजो कान लगाकर सुनने लगी।
फिर किसी ने कहा-नीचे करार की ओर उतरने में तो गिर जाने का डर है, इधर ये कांटेदार झाड़ियां! अब किधर जाऊं?
बंजो समझ गई कि शिकार खेलने वालों में से कोई इधर आ गया है। उसके हृदय में विरक्ति हुई— उंह, शिकारी पर दया दिखाने की क्या आवश्यकता? भटकने दो।
वह घूमकर उसी मैदान में बैठी हुई एक श्यामा गौ को देखने लगी। बड़ा मधुर शब्द सुन पड़ा-चौबेजी! आप कहां हैं?
अब बंजो को बाध्य होकर उधर जाना पड़ा। पहले कांटों में फंसने वाले व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा—खड़ी रहिए; इधर नहीं ऊहूं- ऊं! उसी नीम के नीचे ठहरिए, मैं आता हूं! इधर बड़ा ऊंचा-नीचा है।
चौबेजी, यहां तो मिट्टी काटकर बड़ी अच्छी सीढ़ियां बनी हैं;मैं तो उन्हीं से ऊपर आई हूं।—रमणी के कोमल कंठ से यह सुन पड़ा।
बंजो को उसकी मिठास ने अपनी ओर आकृष्ट किया। जंगली हिरन के समान कान उठाकर वह सुनने लगी।
झाड़ियों के रौंदे जाने का शब्द हुआ फिर वही पहिला व्यक्ति बोल उठा लीजिए, मैं तो किसी तरह आ पहुंचा, अब गिरा तब गिरा, राम-राम! कैसी सांसत! सरकार से मैं कह रहा था कि मुझे न ले चलिए। मैं यहीं चूड़ा-मटर की खिचड़ी बनाऊंगा। पर आपने भी जब कहा, तब तो मुझे आना ही पड़ा। भला आप क्यों चली आईं?
इन्द्रदेव ने कहा कि सुर्खाब इधर बहुत हैं, मैं उनके मुलायम पैरों के लिए आई। सच चौबेजी, लालच में मैं चली आई। किंतु छरों से उनका मरना देखने में मुझे सुख तो न मिला। आह! कितना बेधड़क वे गंगा के किनारे टहलते थे! उन पर विनचेस्टर-रिपीटर के छरों की चोट! बिल्कुल ठीक नहीं। मैं आज ही इन्द्रदेव को शिकार खेलने से रोकूगी—आज ही।
अब किधर चला जाए?—उत्तर में किसी ने कहा।
चौबेजी ने डग बढ़ाकर कहा—मेरे पीछे-पीछे चली आइए।
किंतु मिट्टी बह जाने से मोटी जड़ नीम की उभर आई थी, उसने ऐसी करारी ठोकर लगाई कि चौबेजी मुंह के बल गिरे।
रमणी चिल्ला उठी। उस धमाके और चिल्लाहट ने बंजो को विचलित कर दिया।वह कंटीली झाड़ी को खींचकर अंधेरे में भी ठीक-ठीक उसी सीढ़ी के पास जाकर खड़ी हो गई, जिसके पास नीम का वृक्ष था।
उसने देखा कि चौबेजी बुरी तरह गिरे हैं। उनके घुटने में चोट आ गई है। वह स्वयं
नहीं उठ सकते।
सुकुमारी सुंदरी के बूते के बाहर की यह बात थी। बंजो ने हाथ लगा दिया। चौबेजी किसी तरह कांखते हुए उठे।
अंधकार के साथ-साथ सर्दी बढ़ने लगी थी। बंजो की सहायता से सुंदरी, चौबेजी को लिवा ले चली; पर कहां? यह तो बंजो ही जानती थी।
झोपड़ी में बुड्ढा पुकार रहा था-बंजो! बंजो!! बड़ी पगली है। कहां घूम रही है? बंजो, चली आ! झुरमुट में घुसते हुए चौबेजी तो कराहते थे, पर सुंदरी उस वन-विहंगिनी की ओर आंखें गड़ाकर देख रही थी और अभ्यास के अनुसार धन्यवाद भी दे रही थी।
दूर से किसी की पुकार सुन पड़ी शैला! शैला!! . ये तीनों, झाड़ियों की दीवार पार करके, मैदान में आ गए थे।
बंजो के सहारे चौबेजी को छोड़कर शैला फिरहरी की तरह घूम पड़ी। वह नीम के नीचे खड़ी होकर कहने लगी—इसी सीढ़ी से इन्द्रदेव—बहुत ठीक सीढ़ी है। हां, संभालकर चले आओ। चौबेजी का तो घुटना ही टूट गया है! हां, ठीक है, चले आओ! कहीं-कहीं जड़ें बुरी तरह से निकल आई हैं उन्हें बचाकर आना।
नीचे से इन्द्रदेव ने कहा—सच कहना शैला क्या चौबे का घुटना टूट गया? ओहो, तो कैसे वह इतनी दूर चलेगा! नहीं-नहीं, तुम हंसी करती हो।
ऊपर आकर देख लो, नहीं भी टूट सकता है! नहीं भी टूट सकता है? वाह! यह एक ही रही। अच्छा, लो, मैं आ ही पहुंचा।
एक लंबा-सा युवक, कंधे पर बंदूक रखे, ऊपर चढ़ रहा था। शैला, नीम के नीचे खड़ी, गंगा के करारे की ओर झांक रही थी यह इन्द्रदेव को सावधान करती थी ठोकरों ठीक मार्ग से। ___ तब तक उस युवक ने हाथ बढ़ाया—दो हाथ मिले!
नीम के नीचे खड़े होकर, इन्द्रदेव ने शैला के कोमल हाथों को दबाकर कहा—करारे की मिट्टी काटकर देहातियों ने कामचलाऊ सीढ़ियां अच्छी बना ली हैं। शैला कितना सुंदर दश्य है! नीचे धीरे-धीरे गंगा बह रही है. अंधकार से मिली हई उस पार के वक्षों की श्रेणी शितिज की कोर में गाढ़ी कालिमा की बेल बना रही है, और ऊपर…
पहले चलकर चौबेजी को देख लो, फिर दृश्य देखना।—बीच ही में रोककर शैला ने कहा।
अरे हां, यह तो मैं भूल ही गया था? चलो किधर चलूं? यहां तो तुम ही पथ-प्रदर्शक हो।—कहकर इन्द्रदेव हंस पड़े।
दोनों, झोपड़ियों के भीतर घुसे। एक अपरिचित बालिका के सहारे चौबेजी को कराहते देखकर इन्द्रदेव ने कहा तो क्या सचमुच में यह मान लूं कि तुम्हारा घुटना टूट गया? मैं इस पर कभी विश्वास नहीं कर सकता। चौबे तुम्हारे घुटने 'टूटने वाली हड्डी' के बने ही नहीं!
सरकार यही तो मैं भी सोचता हुआ चलने का प्रयत्न कर रहा हूँ। परंत..आह! बड़ी पीड़ा है, मोच आ गई होगी। तो भी इस छोकरी के सहारे थोड़ी दूर चल सकूँगा। चलिए ।
चौबेजी ने कहा।
अभी तक बंजो से किसी ने न पूछा था कि तू कौन है,कहां रहती है,या हम लोगों को कहां लिए जा रही है।
बंजो ने स्वयं ही कहा—पास ही झोपड़ी है। आप लोग वहीं तक चलिए; फिर जैसी इच्छा।
सब बंजो के साथ मैदान के उस छोर पर जलने वाले दीपक के सम्मुख चले, जहां से "बंजो! बंजो!” कहकर कोई पुकार रहा था। बंजो ने कहा—आती हूं!
झोपड़ी के दूसरे भाग के पास पहुंचकर बंजो क्षण-भर के लिए रुकी। चौबेजी को छप्पर के नीचे पड़ी हुई एक खाट पर बैठने का संकेत करके वह घूमी ही थी कि बुड्ढे ने कहा—बंजो! कहां है रे? अकाल की कहानी और अपनी कथा न सुनेगी? मुझे नींद आ रही हैं।
आ गई—कहती हुई बंजो भीतर चली गई। बगल के छप्पर के नीचे इन्द्रदेव और शैला खड़े रहे! चौबेजी खाट पर बैठे थे, किंतु कराहने की व्याकुलता दबाकर। एक लड़की के । आश्रय में आकर इन्द्रदेव भी चकित सोच रहे थे—कहीं यह बुड्ढा हम लोगों के यहां आने से चिढेगा तो नहीं।
सब चुपचाप थे। बुड्ढे ने कहा—कहां रही तू बंजो! एक आदमी को चोट लगी थी, उसी…। तो-तू क्या कर रही थी? वह चल नहीं सकता था, उसी को सहारा देकर
मरा नहीं, बच गया। गोली चलने का शिकार खेलने का आनंद नहीं मिला! अच्छा, तो तू उनका उपकार करने गई थी। पगली! यह मैं मानता हूं कि मनुष्य को कभीकभी अनिच्छा से भी कोई काम कर लेना पड़ता है; पर…नहीं…जान-बूझकर किसी उपकार-अपकार के चक्र में न पड़ना ही अच्छा है। बंजो पल-भर की भावुकता मनुष्य के जीवन को कहां-से-कहां खींच ले जाती है, तू अभी नहीं जानती। बैठ, ऐसी ही भावुकता को लेकर मुझे जो कुछ भोगना पड़ा है, वही सुनाने के लिए तो मैं तुझे खोज रहा था।
बापू… क्या है रे! बैठती क्यों नहीं? वे लोग यहां आ गए हैं…
ओहो तू बड़ी पुण्यात्मा है…तो फिर लिवा ही आई है, तो उन्हें बिठा दे छप्पर में और दसरी जगह ही कौन है? और बंजो! अतिथि को बिठा देने से ही नहीं काम चल जाता। दो-चार टिक्कर सेंकने की भी…समझी? नहीं-नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं कहते हुए इन्द्रदेव बुड्ढे के सामने आ गए। बुड्ढे ने धुंधले प्रकाश में देखा-पूरा साहबी ठाट! उसने कहा—आप साहब यहां…
तुम घबराओ मत, हम लोगों को छावनी तक पहुंच जाने पर किसी बात की असुविधा न रहेगी। चौबेजी को चोट आ गई है वह सवारी न मिलने पर रात-भर यहां पड़े रहेंगे। सवेरे देखा जाएगा। छावनी की पगडंडी पा जाने पर हम लोग स्वयं चले जाएंगे। कोई… इन्द्रदेव को रोककर बूड्ढे ने कहा–आप धामपुर की छावनी पर जाना चाहते हैं? जमींदार के मेहमान हैं न? बंजो! मधुवा को बुला दे, नहीं तू ही इन लोगों को बनजरिया के बाहर उत्तर वाली पगडंडी पर पहुंचा दे। मधुवा!! ओ रे मधुवा!–चौबेजी को रहने दीजिए, कोई चिंता नहीं।
बंजो ने कहा-रहने दो बापू। मैं ही जाती हूं।
शैला ने चौबेजी से कहा-तो आप यहीं रहिए, मैं जाकर सवारी भेजती हूं।
रात को झंझट बढ़ाने की आवश्यकता नहीं, बटुए में जलपान का सामान है। कंबल भी है। मैं इसी जगह रात-भर में इसे सेंक-सांक कर ठीक कर लूगा। आप लोग जाइए।—चौबे ने कहा।
इन्द्रदेव ने पुकारा-शैला! आओ, हम लोग चलें।
शैला उसी झोपड़ी में आई। वहीं से बाहर निकलने का पथ। बंजो के पीछे दोनों झोपड़ी से निकले।
लेटे हुए बुड्ढे ने देखा—इतनी गोरी, इतनी सुंदर, लक्ष्मी-सी स्त्री इस जंगल-उजाड़ में कहां! फिर सोचने लगा—चलो, दो तो गए। यदि वे भी यहीं रहते, तो खाट-कंबल और सब सामान कहां से जुटता। अच्छा चौबेजी हैं तो ब्राह्मण उनको कुछ अड़चन न होगी; पर इन साहबी ठाट के लोगों के लिए मेरी झोपड़ी में कहां…ऊंह! गए, चलो, अच्छा हुआ। बंजो आ जाए, तो उसकी चोट तेल लगाकर सेंक दे।
बुड्ढे को फिर खांसी आने लगी। वह खांसता हुआ इधर के विचारों से छुट्टी पाने की चेष्टा करने लगा।
उधर चौबेजी गोरसी में सुलगते हुए कंडों पर हाथ गरम करके घुटना सेंक रहे थे। इतने में बंजो मधुवा के साथ लौट आई।
बापू! जो आए थे,जिन्हें मैं पहुंचाने गई थी, वही तो धामपुर के जमींदार हैं। लालटेन लेकर कई नौकर-चाकर उन्हें खोज रहे थे। पगडंडी पर ही उन लोगों से भेंट हुई। मधुवा के साथ मैं लौट आई।
एक सांस में बंजो कहने को तो कह गई, पर बुड्ढे की समझ में कुछ न आया। उसने कहा—मधुवा! उस शीशी में जो जड़ी का तेल है, उसे लगाकर ब्राह्मण का घुटना सेंक दे, उसे चोट आ गई है।
मधुवा तेल लेकर घुटना सेंकने चला।
बंजो पुआल में कंबल लेकर घुसी। कुछ पुआल और कुछ कंबल से गले तक शरीर ढक कर वह सोने का अभिनय करने लगी। पलकों पर ठंड लगने से बीच-बीच में वह आंख खोलने-मुंदने का खिलवाड़ कर रही थी। जब आंखें बंद रहतीं, तब एक गोरा-गोरा मुंहकरुणा की मिठास से भरा हुआ गोल-मटोल नन्हा-सा मुंह-उसके सामने हंसने लगता। उसमें ममता का आकर्षण था। आख खुलने पर वही पुरानी झोपड़ी की छाजन! अत्यंत विरोधी दृश्य!! दोनों ने उसके कुतूहल-पूर्ण हृदय के साथ छेड़छाड़ की, किंतु विजय हुई आंख बंद करने की। शैला के संगीत के समान सुंदर शब्द उसकी हत्तंत्री में झनझना उठे! शैला के समीप होने की—उसके हृदय में स्थान पाने की—बलवती वासना बंजो के मन में जगी। वह सोते-सोते स्वप्न देखने लगी। स्वप्न देखते-देखते शैला के साथ खेलने लगी। मधुवा से तेल मलवाते हुए चौबेजी ने पूछा-क्यों जी! तुम यहां कहां रहते हो? क्या काम करते हो? क्या तुम इस बुड्ढे के यहां नौकर हो? उसके लड़के तो नहीं मालूम पड़ते?
परंतु मधुवा चुप था।
चौबेजी ने घबराकर कहा—बस करो, अब दर्द नहीं रहा। वाह-वाह!
यह तेल है या जादू! जाओ भाई, तुम भी सो रहो। नहीं-नहीं ठहरो तो, मुझे थोड़ा पानी पिला दो।
मधुवा चुपचाप उठा और पानी के लिए चला। तब चौबेजी ने धीरे-से बटुआ खोलकर मिठाई निकाली, और खाने लगे। मधुवा इतने में न जाने कब लोटे में जल रखकर चला गया था।
और बंजो सो गई थी। आज उसने नमक और तेल से अपनी रोटी भी नहीं खाई। आज पेट के बदले उसके हृदय में भूख लगी थी। शैला से मित्रता शैला से मधुर परिचय के लिए न-जाने कहां की साध उमड़ पड़ी थी। सपने-पर-सपने देख रही थी। उस स्वप्न की मिठास में उसके मुख पर प्रसन्नता की रेखा उस दरिद्र-कुटीर में नाच रही थी।
2.
धामपुर एक बड़ा ताल्लुका है। उसमें चौदह गांव हैं। गंगा के किनारे-किनारे उसका विस्तार दूर तक चला गया है। इन्द्रदेव यहीं के युवक जमींदार थे। पिता को राजा की उपाधि मिली थी।
बी.ए. पास करके जब इन्द्रदेव ने बैरिस्टरी के लिए विलायत-यात्रा की, तब पिता के मन में बड़ा उत्साह था।
किंतु इन्द्रदेव धनी के लड़के थे। उन्हें पढ़ने-लिखने की उतनी आवश्यकता न थी, जितनी लंदन का सामाजिक बनने की!
लंदन नगर में भी उन्हें पूर्व और पश्चिम का प्रत्यक्ष परिचय मिला। पूर्वी भाग में। पश्चिमी जनता का जो साधारण समुदाय है, उतना ही विरोधपूर्ण है, जितना कि विस्तृत पूर्व और पश्चिम का। एक ओर सुगंध जल के फव्वारे छूटते हैं, बिजली से गरम कमरों में जाते ही कपड़े उतार देने की आवश्यकता होती है;दूसरी ओर बरफ और पाले में दूकानों के चबूतरों के नीचे अर्ध-नग्न दरिद्रों का रात्रि-निवास।
इन्द्रदेव कभी-कभी उस पूर्वी भाग में सैर के लिए चले जाते थे।
एक शिशिर रजनी थी। इन्द्रदेव मित्रों के निमंत्रण से लौटकर सड़क के किनारे, मुंह पर अत्यंत शीतल पवन का तीखा अनुभव करते हुए, बिजली के प्रकाश में धीरे-धीरे अपने मेस' की ओर लौट रहे थे। पल के नीचे पहंचकर वह रुक गए। उन्होंने देखा-कितने ही अभागे, पुल की कमानी के नीचे अपना रात्रि-निवास बनाए हुए, आपस में लड़-झगडु रहे हैं। एक रोटी पूरी ही खा जाएगा!–इतना बड़ा अत्याचार न सह सकने के कारण जब तक स्त्री उसके हाथ से छीन लेने के लिए अपनी शराब की खुमारी से भरी आखों को चढ़ाती ही रहती है, तब तक लड़का उचककर छीन लेता है। चटपट तमाचों का शब्द होना तुमुल युद्ध के आरंभ होने की सूचना देता है। धौल-धप्पड़, गाली-गलौज, बीच-बीच में फूहड़ हंसी भी सुनाई पड़ जाती है।
इन्द्रदेव चुपचाप वह दृश्य देख रहे थे सोच रहे थे—इतना अकूत धन विदेशों से ले आकर भी क्या इन साहसी उद्योगियों ने अपने देश की दरिद्रता का नाश किया? अन्य देशों की प्रकृति का रक्त इन लोगों की कितनी प्यास बुझा सका है?
सहसा एक लंबी-सी पतली-दुबली लड़की ने पास आकर कुछ याचना की। इन्द्रदेव ने गहरी दृष्टि से उस विवर्ण मुख को देखकर पूछा–क्यों, तुम्हारे पिता-माता नहीं हैं?
पिता जेल में हैं, माता मर गई है।
और इतने अनाथालय?
उनमें जगह नहीं!
तुम्हारे कपड़े से शराब की दुर्गंध आ रही है। क्या तुम…
'जैक' बहुत ज्यादा पी गया था, उसी ने कै कर दिया है। दूसरा कपड़ा नहीं जो बदलूं; बड़ी सर्दी है। कहकर लड़की ने अपनी छाती के पास का कपड़ा मुट्ठियों में समेट लिया।
तुम नौकरी क्यों नहीं कर लेती?
रखता कौन है? हम लोगों को तो वे बदमाश, गिरह-कट, आवारा समझते हैं। पास खड़े होने तो…
आगे उस लड़की के दांत आपस में लड़कर बजने लगे। वह स्पष्ट कुछ न कह सकी।
इन्द्रदेव होंठ काटते हुए क्षण-भर विचार करने लगे। एक छोकरे ने आकर लड़की को धक्का देकर कहा—जो पाती, सब शराब पी जाती है। इसको देना–न देना सब बराबर है।
लड़की ने क्रोध से कहा—जैक! अपनी करनी मुझ पर क्यों लादता है? तू ही मांग ले; मैं जाती हूं।
वह घूमकर जाने के लिए तैयार थी कि इन्द्रदेव ने कहा—अच्छा सुनो तो, तुम पास के भोजनालय तक चलो, तुमको खाने के लिए, और मिल सका तो कोई भी दिलवादूंगा।
छोकरा 'हो-हो-हो!' करके हंस पड़ा। बोला—जा न शैला। आज की रात तो गर्मी से बिता ले. फिर कल देखा जाएगा।
उसका अश्लील व्यंग्य इन्द्रदेव को व्यथित कर रहा था; किंतु शैला ने कहा—चलिए।
दोनों चल पड़े। इन्द्रदेव आगे थे, पीछे शैला। लंदन का विद्युत-प्रकाश निस्तब्ध होकर उन दोनों का निर्विकार पद-विशेप देख रहा था। सहसा घूमकर इन्द्रदेव ने पूछा-तुम्हारा नाम 'शैला' है न?
'हां' कहकर फिर वह चुपचाप सिर नीचा किए अनुसरण करने लगी।
इन्द्रदेव ने फिर ठहरकर पूछा—कहां चलोगी? भोजनालय में या हम लोगों के मेस में?
'जहां कहिए' कहकर वह चुपचाप चल रही थी। उसकी अविचल धीरता से मन-ही-मन कुढ़ते हुए इन्द्रदेव मेस की ओर ही चले।
उस मेस में तीन भारतीय छात्र थे। मकान वाली एक बुढ़िया थी। उसके किए सब काम होता न था। इन्द्रदेव ही उन छात्रों के प्रमुख थे। उनकी सम्मत से सब लोगों ने शैला' ________________
को परिचारिका-रूप में स्वीकार किया। और, जब शैला से पूछा गया, तोउसने अपनी स्वाभाविक उदार दृष्टि इन्द्रदेव के मुंह पर जमाकर कहा यदि आप कहते हैं तो मुझे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। भिखमंगिन होने से यह बुरा तो न होगा। इन्द्रदेव अपने मित्रों के मुस्कुराने पर भी मन-ही-मन सिहर उठे। बालिका के विश्वास पर उन्हें भय मालूम होने लगा। तब भी उन्होंने समस्त साहस बटोरकर कहा-शैला, कोई भय नहीं, तुम यहां स्वयं सुखी रहोगी और हम लोगों की भी सहायता करोगी। मकान वाली बुढिया ने जब यह सुना, तो एक बार झल्लाई। उसने शैला के पास जाकर, उसकी ठोढ़ी पकड़कर, आंखें गड़ाकर, उसके मुंह को और फिर सारे अंग को इस तीखी चितवन से देखा, जैसे कोई सौदागर किसी जानवर को खरीदने से पहले उसे देखता हो। किंतु शैला के मुंह पर तो एक उदासीन धैर्य आसन जमाए था, जिसको कितनी ही कुटिल दृष्टि क्यों न हो, विचलित नहीं कर सकती। बुढिया ने कहा—रह जा बेटी, ये लोग भी अच्छे आदमी हैं। शैला उसी दिन से मेस में रहने लगी। भारतीयों के साथ बैठकर वह प्राय: भारत के देहातों, पहाड़ी तथा प्राकृतिक दृश्यों के संबंध में इन्द्रदेव से कतहलपर्ण प्रश्र किया करती। बैरिस्टरी का डिप्लोमा मिलने के साथ ही इन्द्रदेव को पिता के मरने का शोकसमाचार मिला। उस समय शैला की सांत्वना और स्नेहपूर्ण व्यवहार ने इन्द्रदेव के मन को बहुत-कुछ बहलाया। मकान वाली बुढिया उसे बहुत प्यार करती, इन्द्रदेव के सद्व्यवहार और चारित्र्य पर वह बहुत प्रसन्न थी। इन्द्रदेव ने जब शैला को भारत चलने के लिए व शैला भी भारत चली आई। इन्द्रदेव ने शहर के महल में न रहकर धामपुर के बंगले में ही अभी रहने का प्रबंध किया। अभी धामपुर आए इन्द्रदेव और शैला को दो सप्ताह से अधिक न हुए थे। इंग्लैंड से ही इन्द्रदेव ने शैला को हिंदी से खूब परिचित कराया। वह अच्छी हिंदी बोलने लगी थी। देहाती किसानों के घर जाकर उनके साथ घरेल बातें करने का चसका लग गया था खाट पर बैठकर वह बड़े मजे से उनसे बातें करती, साड़ी पहनने का उसने अभ्यास कर लिया था और उसे फबती भी अच्छी। शैला और इन्द्रदेव दोनों इस मनोविनोद से प्रसन्न थे। वे गंगा के किनारे-किनारे धीरेधीरे बात करते चले जा रहे थे। कृषक-बालिकाएं बरतन मांज रही थीं। मल्लाहों के लड़के अपने डोंगी पर बैठे हुए मछली फंसाने की कटिया तोल रहे थे। दो-एकबड़ी-बड़ी नावें, माल से लदी हुईं, गंगा के प्रशांत जल पर धीरे-धीरे संतरण कर रही थीं। वह प्रभात था! शैला बड़े कुतूहल से भारतीय वातावरण में नीले आकाश, उजली धूप और सहज ग्रामीण शांति का निरीक्षण कर रही थी। वह बातें भी करती जाती थी। गंगा की लहर से सुंदर कटे हुए बालू के नीचे करारों में पक्षियों के एक सुंदर छोटे-से झुंड को विचरते देखकर उसने उनका नाम पूछा! इन्द्रदेव ने कहा ये सुर्खाब हैं, इनके परों का तो तुम लोगों के यहां भी उपयोग होता समर्थन किया। इन्द ________________
है। देखो, ये कितने कोमल हैं। यह कहकर इन्द्रदेव ने दो-तीन गिरे हुए परों को उठाकर शैला के हाथ में दे दिया। ‘फाइन'!-नहीं-नहीं, माफ करो इन्द्रदेव! अच्छा, इन्हें कहूं कोमल। सुंदर!—कहती हुई, शैला ने हंस दिया। शैला! इनके लिए मेरे देश में एक कहावत है। यहां के कवियों ने अपनी कविता में इनका बड़ा करुण वर्णन किया है। गंभीरता से इन्द्रदेव ने कहा। क्या . इन्हें चक्रवाक कहते हैं। इनके जोड़े दिन-भर तो साथ-साथ घूमते रहते हैं, किंतु संध्या जब होती है, तभी ये अलग हो जाते हैं। फिर ये रात-भर नहीं मिलने पाते। कोई रोक देता है क्या? प्रकृति; कहा जाता है कि इनके लिए यही विधाता का विधान है। ओह। बड़ी कठोरता है।—कहती हुई शैला एक क्षण के लिए अन्यमनस्क हो गई। कुछ दूर चुपचाप चलने पर इन्द्रदेव ने कहा-शैला। हम लोग नीम के पास आ गए। देखो, यही सीढ़ी है; चलो देखें, चौबे क्या कर रहा है। पालना नहीं-नहीं-पालकी तो पहुंच गई होगी इन्द्रदेव। यह भी कोई सवारी है? तुम्हारे यहां रईस लोग इसी पर चढ़ते हैं— आदमियों पर। क्यों? बिना किसी बीमारी के! यह तो अच्छा तमाशा है! —कहकर शैला ने हंस दिया। अब तो बीमारों के बदले डॉक्टर ही यहां पालकी पर चढ़ते हैं शैला! लो, पहले तुम्हीं सीढ़ी पर चढ़ो। ___दोनों सीढ़ी पर चढ़कर बातें करते हुए बनजरिया में पहुंचे। देखते हैं, तो चौबेजी अपने सामान से लैस खड़े हैं। शैला ने हंसकर पूछा-चौबेजी! आप तो पालकी पर जाएंगे? मुझे हुआ क्या है। रामदीन को आज बिना मारे मैं न छोडूंगा। सरकार! उसने बड़ा तंग किया। मुझे गोद में उठाकर पालकी पर बिठाता था। छावनी पर चलकर उस बदमाश छोकरे की खबर लूंगा। बरा क्या करता था? मेरे कहने से वह बेचारा तो तम्हारी सेवा करना चाहता था और तुम चिढ़ते थे। अच्छा, चलो तुम पालकी में बैठो।— इन्द्रदेव ने कहा। फिर वही—पालकी में बैठो! क्या मेरा ब्याह होगा? ठहरो भी, तुम्हारा घुटना तो टूट गया है न। तुम चलोगे कैसे? तेल क्या था, बिल्कुल जादू! मेम साहब ने जो दवा का बॉक्स मेरे बटुए में रख दिया था-वही, जिसमें सागूदाना की-सी गोलियां रहती हैं—मैं खोल डाला। एक शीशी गोली खा डाली। न गुड तीता न मीठा–सच मानिए मेम साहब। आपकी दवा मेरे-जैसे उजड्डों के लिए नहीं। मेरा तो विश्वास है कि उस तेल ने मुझे रातभर में चंगा कर दिया। मैं अब पालकी पर न चढूंगा। गांव-भर में मेरी दिल्लगी राम-राम!! शैला हँस रही थी। इन्द्रदेव ने कहा-चौबे! होमियोपैथी में बीमारी की दवा नहीं होती, दवा की बीमारी होती है। क्यों शैला! इन्द्रदेव! तुमने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। नहीं तो इसकी हंसी न उड़ाते।
अच्छा, चलो उस लड़की को तो बुलावें। वह कहां है? उसे कल कुछ इनाम नहीं दिया। बड़ी अच्छी लड़की है। झोपड़ी में से लठिया टेकते हुए बुड्ढा निकल आया। उसके पीछे बंजो थी। शैला ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया, और कहने लगी-ओह! तुम रात को चली आईं, मैं तो खोज रही थी। तुम बड़ी नेक,…!
बंजो आश्चर्य से उसका मुंह देख रही थी। इन्द्रदेव ने कहा-बुड्ढे। तुम बहुत बीमार हो न? हां सरकार! मुझे नहीं मालूम था, रात को आप…
उसका सोच मत करो। तुम कौन कहानी कह रहे थे—रात को बंजो को क्या सुना रहे थे? मुझको सुनाओगे, चलो छावनी पर।
सरकार; मैं बीमार हूं। बुड्ढा हूं। बीमार हूं।
शैला ने कहा ठीक इन्द्रदेव, अच्छा सोची। इस बुड्ढे की कहानी बड़ी अच्छी होगी। लिवा चलो इसे। बंजो तुम्हारी कहानी हम लोग भी सुनेंगे। चलो।
इन्द्रदेव ने कहा—अच्छा तो होगा।
चौबेजी ने कहा—अच्छा तो होगा सरकार! मैं भी मधुवा को साथ लिवा चलूंगा। शायद फिर घुटना टूटे, तेल मलवाना पड़े और इन गायों को भी हांक ले चलूं, दूध भी—
सब हँस पड़े; परंतु बुड्ढा बड़े संकट में पड़ा। कुछ बोला नहीं; वह एकटक शैला का मुंह देख रहा था। एक अपरिचित! किंतु जिससे परिचय बढ़ाने के लिए मन चंचल हो उठे। माया-ममता से भरा-पूरा मुख!
बुड्ढा डरा नहीं, वह समीप होने की मानसिक चेष्टा करने लगा। साहस बटोरकर उसने कहा—सरकार! जहां कहिए, वहीं चलूं।
3.
चारों ओर ऊंचे-ऊंचे खंभों पर लंबे-चौड़े दालान, जिनसे सटे हुए सुंदर कमरों में सुखासन, उजली सेज, सुंदर लैंप, बड़े-बड़े शीशे, टेबिल पर फूलदान, अलमारियों में सुनहरी जिल्दों से मढ़ी हुई पुस्तकें—सभी कुछ उस छावनी में पर्याप्त है। आस-पास, दफ्तर के लिए, नौकरों के लिए तथा और भी कितने ही आवश्यक कामों के लिए छोटे-मोटे घर बने हैं। शहर के मकान में न जाकर, इन्द्रदेव ने विलायत से लौटकर यहीं रहना जो पसंद किया है, उसके कई कारणों में इस कोठी की सुंदर भूमिका और आसपास का रमणीय वातावरण भी है। शैला के लिए तो दूसरी जगह कदापि उपयुक्त न होती। छावनी के उत्तर नाले के किनारे ऊंचे चौतरे की हरी-हरी दूबों से भरी हुई भूमि पर कुर्सी का सिरा पकड़े तन्मयता से वह नाले का गंगा में मिलना देख रही थी। उसका लंबा और ढीला गाउन मधुर पवन से आंदोलित हो रहा था। कुशल शिल्पी के हाथों से बनी हुई संगमरमर की सौंदर्य-प्रतिमा-सी वह बड़ी भली मालूम हो रही थी। दालान में चौबेजी उसके लिए चाय बना रहे थे। सांयकाल का सूर्य अब लाल बिंब ________________
मात्र रह गया था, सो भी दूर की ऊंची हरियाली के नीचे जाना ही चाहता था। इन्द्रदेव अभी तक नहीं आए थे। चाय ले जाने में चौबेजी और सुस्ती कर रहे थे। उनकी चाय शैला को बड़ी अच्छी लगी। वह चौबेजी के मसाले पर लटू थी। रामदीन ने चाय की टेबिल लाकर रख दी। शैला की तन्मयता भंग हुई। उसने मुस्कुराते हुए, इन्द्रदेव से कुछ मधुर सम्भाषण करने के लिए, मुंह फिराया; किंतु इन्द्रदेव को न देखकर वह रामदीन से बोली—क्या अभी इन्द्रदेव नहीं आए हैं? नटखट रामदीन हँसी छिपाते हुए एक आंख का कोना दबाकर होंठ के कोने को ऊपर चढ़ा देता था। शैला उसे देखकर खूब हँसती, क्योंकि रामदीन का कोई उत्तर बिना इस कुटिल हंसी के मिलना असंभव था! उसने अभ्यास के अनुसार आधा हंसकर कहा—जी, आ रहे हैं सरकार! बड़ी सरकार के आने की… बड़ी सरकार? हां, बड़ी सरकार! वह भी आ रही हैं। कौन है वह? बड़ी सरकारदेखो रामदीन, समझाकर कहो। हंसना पीछे। बड़ी सरकार का अनुवाद करने में उसके सामने बड़ी बाधाएं उपस्थित हुईं; किंतु उन सबको हटाकर उसने कह दिया—सरकार की मां आई हैं। उनके लिए गंगा-किनारे वाली छोटी कोठी साफ़ कराने का प्रबंध देखने गए हैं। वहां से आते ही होंगे। आते ही होंगे? क्या अभी देर है? रामदीन कुछ उत्तर देना चाहता था कि बनारसी साड़ी का आंचल कंधे पर से पीठ की ओर लटकाए: हाथ में छोटा-सा बेग लिये एक संदरी वहां आकर खड़ी हो गई। शैला ने उसकी ओर गंभीरता से देखा। उसने भी अधिक खोजने वाली आंखों से शैला को देखा। दृष्टि-विनियम में एक-दूसरे को पहचानने की चेष्टा होने लगी; किंतु कोई बोलता न था। शैला बड़ी असुविधा में पड़ी। वह अपरिचित से क्या बातचीत करे? उसने पूछाआप क्या चाहती हैं? आने वाली ने नम्र मुस्कान से कहा—मेरा नाम मिस अनवरी है। क्या किया जाए, जब कोई परिचय कराने वाला नहीं तो ऐसा करना ही पड़ता है। मैं कुंवर साहब की मां को देखने के लिए आया करती हूं। आपको मिस शैला समझ लूं? ___जी—कहकर शैला ने कुर्सी बढ़ा दी और शीतल दृष्टि से उसे बैठने का संकेत किया। उधर चौबेजी चाय ले आ रहे थे। शैला ने भी एक कुर्सी पर बैठते हुए कहा-आपके लिए भी… अनवरी और शैला आमने-सामने बैठी हुई एक-दूसरे को परखने लगी। अनवरी की सारी प्रगल्भता धीरे-धीरे लुप्त हो चली। जिस गर्मी से उसने अपना परिचय अपने-आप दे दिया था, वह चाय के गर्म प्याले के सामने ठंडी हो चली थी। शैला ने चाय के छोटे-से पात्र से उठते हुए धुएं को देखते हुए कहा—कुंवर साहब की मां भी सुना, आ गई हैं? ________________
मुझे तो नहीं मालूम, मैं अपनी मोटर से यहीं उतर पड़ी थी। उनके साथ ही आती; पर क्या करूं, देर हो गई। किसी को पूछ आने के लिए भेजिएगा? मुझे तो आपसे सहायता मिलनी चाहिए मिस अनवरी शैला ने हंसकर कहाआपके कुंवर साहब आ जाएं, तो प्रबंध… अरे शैला! यह कौन… ___ इन्द्रदेव! तुम अब तक क्या कर रहे थे-कहकर शैला ने मिस अनवरी की ओर संकेत करते हुए कहा—आप मिस अनवरी… फिर अपने होठ को गर्म चाय में डुबो दिया, जैसे उन्हें हंसने का दंड मिला हो। इन्द्रदेव ने अभिनंदन करते हुए कहा-मां जब से आईं, तभी से पूछ रही हैं, उनकी रीढ़ में दर्द हो रहा है। आपकी उनसे भेंट नहीं हुई क्या? जी नहीं; मैंने समझा, यहीं होगी। फिर जब यहां चाय मिलने का भरोसा था, तो थोड़ा यहीं ठहरना अच्छा हुआ—कहकर अनवरी मुस्कराने लगी। इन्द्रदेव ने साधारण हंसी हंसते हुए कहा—अच्छी बात है, चाय पी लीजिए। चौबेजी आपको वहां पहुंचा देंगे। ____तीनों चुपचाप चाय पीने लगे। इन्द्रदेव ने कहा—चौबे! आज तुम्हारी गुजराती चाय बड़ी अच्छी रही। एक प्याला ले आओ, और उसके साथ और भी कछ… चौबे सोहन-पापड़ी के टुकड़े और चायदानी लेकर जब आए, तो मिस अनवरी उठकर खड़ी हो गई। इन्द्रदेव ने कहा—वाह, आप तो चली जा रही हैं। इसे भी तो चखिए। शैला ने मुस्कुराते हुए कहा—बैठिए भी, आप तो यहां पर मेरी ही मेहमान होकर रह सकेंगी। हां, इसको तो मैं भूल गई थी—कहकर अनवरी बैठ गई। चौबेजी ने सबको चाय दे दी, और अब वह प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब अनवरी चलेगी। पर अनवरी तो वहां से उठने का नाम ही न लेती थी। वह कभी इन्द्रदेव और कभी शैला को देखती, फिर संध्या की आने वाली कालिमा की प्रतीक्षा करती हुई नीले आकाश में आंख लड़ाने लगती। उधर इन्द्रदेव इस बनावटी सन्नाटे से ऊब चले थे। सहसा चौबेजी ने कहा—सरकार! वह बुड्ढा आया है, उसकी कहानी कब सुनिएगा? मैं लालटेन लेता आऊं? . फिर अनवरी की ओर देखते हुए कहने लगे अभी आपको भी छोटी कोठी में पहुंचाना होगा। अनवरी को जैसे धक्का लगा। वह झटपट उठकर खड़ी हो गई। चौबेजी उसे साथ लेकर चले। इन्द्रदेव ने गहरी सांस लेकर कहा—शैला! क्या इन्द्रदेव? मां से भेंट करोगी? चलूं? अच्छा, कल सवेरे!
इन्द्रदेव की माता श्यामदुलारी पुराने अभिजात – कुल की विधवा हैं । प्राय : बीमार रहा करती हैं । किंतु मुख -मंडल पर गर्व की दीप्ति , आज्ञा देने की तत्परता और छिपी हुई सरल दया भी अंकित है ? वह सरकार हैं । उनके आस -पास अनावश्यक गृहस्थी के नाम पर जुटाई गई अगणित सामग्री का बिखरा रहना आवश्यक है। आठ से कम दासियों से उनका काम चल ही नहीं सकता । दो पुजारी और ठाकुरजी का संभार अलग । इन सबके आज्ञा- पालन के लिए कहारों का पूरा दल । बहंगी पर गंगाजल और भोजन का सामान ढोते हुए कहारों का आना -जाना श्यामदुलारी की आंखें सदैव देखना चाहती थीं । बेटा विलायत से लौट आया है । एक दिन उनसे मिलकर उनकी चरण – रज लेकर वह छावनी में चला आया और यहीं रहने लगा । लोग कहते हैं कि इन्द्रदेव के कानों में जब यह समाचार किसी मतलब से पहुंचा दिया गया कि चरण छूकर आपके चले आने पर माताजी ने फिर से स्नान किया , तो फिर वह मकान पर न ठहर सके । किंतु श्यामदुलारी की प्रकृति ही ऐसी है। उसने ऐसा किया हो , तो कोई आश्चर्य नहीं । तब भी श्यामदुलारी को तो यही विश्वास दिलाया गया कि — साथ में मेम नहीं आई है! श्यामदुलारी अपने बेटे को संभालना चाहती थीं । बेटी माधुरी से पूछकर यही निश्चित हुआ कि सब लोग छावनी पर ही कुछ दिन चलकर रहें । वहीं इन्द्रदेव को सुधार लिया जाएगा । माधुरी घर की प्रबंधकी है। वह दक्ष, चिड़चिड़े स्वभाव की सुंदरी युवती है। माता श्यामदुलारी भी उसके अनुशासन को मानती हैं और भीतर – ही – भीतर दबती भी हैं । माधुरी का पति उसकी खोज – खबर नहीं लेता । उसे लेने की आवश्यकता ही क्या ? माधुरी धनी घर की लाड़ली बेटी है। इसलिए बाबू श्यामलाल को इस अवसर से लाभ उठाने की पूरी सुविधा है। श्यामदुलारी, बेटी और दामाद दोनों को प्रसन्न रखने की चेष्टा में लगी रहती हैं । बहत बुलाने पर कभी साल- भर में बाबू श्यामलाल कलकत्ता से दो -तीन दिन के लिए चले आते हैं । उनका व्यवसाय न नष्ट हो जाए, इसलिए जल्द चले जाते हैं — अर्थात् रेस की टीप , बगीचों के जुए, स्टीमरों की पार्टियां और भी कितने ही ऐसे काम हैं , जिनमें चूक जाने से बड़ी हानि उठाने की संभावना है । माधुरी शासन करने की क्षमता रखती है । भाई इन्द्रदेव पढ़ते थे; इसलिए माता की रुग्णावस्था में घर – गृहस्थी का बोझ दूसरा कौन संभालता ? ___ माधुरी की अभिभावकता में माता श्यामदुलारी सोती हैं सपना देखती हैं । इसलिए माधुरी भी साथ ही आई हैं । चौकी पर मोटे – से गद्दे पर तकिया सहारे बैठी वह कुछ हिसाब देख रही थी । पेट्रोल -लैंप के तीव्र प्रकाश में उसकी उठी हुई नाक की छाया दीवार पर बहुत लंबी- सी दिखाई पड़ती है। मलिया बड़ी नटखट छोकरी है। वह पान का डिब्बा लिये हुए, उस छाया को देखकर, जोर से हंसना चाहती है; पर माधुरी के डर से अपने होठों को दांत से दबाए चुपचाप खड़ी है । मिस अनवरी की छाया से वह चौंक उठी । उसने चुलबुलेपन से कहा — मेम साहब , सलाम ! माधुरी ने सिर उठाकर देखा और कहा—आइए, हम लोग बड़ी देर से आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मां का दर्द तो बहुत बढ़ गया है। ___ माधुरी के पास ही बैठते हुए अनवरी ने—बीबी, तुमको देखने के लिए जी ललचाया रहता है, मां को तो देगी ही कहकर उसके हाथों को दबा दिया। माधुरी ने झेंपकर कहा-आहा तुम तो मेम और साहब दोनों ही हो न? अच्छा, यह तो बताओ, तुम्हारे ठहरने का क्या प्रबंध करूं? आज रात को तो मोटर से शहर लौट जाने न दूंगी। अभी मां पूजा कर रही हैं, एक घंटे में खाली होगी, फिर घंटों उनको देखने में लग जाएगा। बजेगा दो और जाना है तीस मील! आज रात को तुमको रहना ही होगा। . अनवरी ने मुस्कुराते हुए कहा—सो तो बीबी, तुम्हारी भाभी ने मुझे न्योता ही दिया माधुरी क्षण-भर के लिए चुप हो गई। फिर बोली—अनवरी, ऐसी दिल्लगी न करो, यह बात मुझे ही नहीं, घर भर को खटक रही है। लेकिन भाई साहब तो कहते हैं कि वह हमारी दोस्त है! हां—बीबी, दोस्ती नहीं तो क्या दुश्मनी से कोई इतना बड़ा… माधुरी ने भीतर के कमरे की ओर देखते हुए उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और धीरेधीरे कहने लगी—प्यारी अनवरी! क्या इस चुडैल से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं? हम लोग क्या करें? कोई बस नहीं चलता। धीरे-धीरे सब हो जाएगा। लेकिन तुम्हें बुरा न लगे, तो मैं एक बात पूछ लूं। क्या? कुंवर साहब इससे ब्याह कर लें, तो तुम्हारा क्या? ऐसा न कहो अनवरी! तुम्हारी मां तो फिर तुमको ही… उंह तुम क्या बक रही हो! अच्छा तो मैं कुछ दिन यहां रहूं तो… तो रहो न मेरी रानी।
हाथ-मुंह धोकर मुलायम तौलिए से हाथ पोंछती हुई अनवरी बड़े-से दर्पण के सामने खड़ी थी। शैला अपने सोफा पर बैठी हुई रेशमी रूमाल पर कोई नाम कसीदे से काढ़ रही थी। अनवरी सहसा चंचलता से पास जाकर उन अक्षरों को पढ़ने लगी। शैला ने अपनी भोली आंखों को एक बार ऊपर उठाया, सामने से सूर्योदय की पीली किरणों ने उन्हें धक्का दिया, वे फिर नीचे झुक गईं। अनवरी ने कहा—मिस शैला! क्या कुंवर साहब का नाम है? जी—नीचा सिर किए हुए शैला ने कहा। क्या आप रोज सवेरे एक रूमाल उनको देती हैं? यह तो अच्छी बोहनी है!—कहकर ________________
अनवरी खिलखिला उठी। शैला को उसकी यह हंसी अच्छी न लगी। रात-भर उसे अच्छी नींद भी न आई थी। इन्द्रदेव ने अपनी माता से उसे मिलाने की जो उत्सुकता नहीं दिखलाई, उल्टे एक ढिलाई का आभास दिया, वही उसे खटक रहा था। अनवरी ने हंसी करके उसको चौंकाना चाहा; किंतु उसके हृदय में जैसे हंसने की सामग्री न थी? इन्द्रदेव ने कमरे के भीतर प्रवेश करते हुए कहा—शैला! आज तुम टहलने नहीं जा सकी? मुझे तो आज किसानों की बातों से छुट्टी न मिलेगी। दिन भी चढ़ रहा है। क्यों न मिस अनवरी को साथ लेकर घूम आओ! अनवरी ने ठाट से उठकर कहा—आदाबअर्ज है कुंवर साहब! बड़ी खुशी से! चलिए न! आज कुंवर साहब का काम मैं ही करूंगी शैला इस प्रगल्भता से ऊपर न उठ सकी। इन्द्रदेव और अनवरी को आत्म-समर्पण करते हुए उसने कहा—अच्छी बात है, चलिए। इन्द्रदेव बाहर चले गए। खेतों में अंकुरों की हरियाली फैली पड़ी थी। चौखूटे, तिकोने, और भी कितने आकारों के टुकड़े, मिट्टी की पेड़ों से अलगाए हुए, चारों ओर समतल में फैले थे। बीच-बीच में आम, नीम और महुए के दो-एक पेड़ जैसे उनकी रखवाली के लिए खड़े थे। मिट्टी की संकरी पगडंडी पर आगे शैला और पीछे-पीछे अनवरी चल रही थीं। दोनों चुपचाप पैर रखती हुई चली जा रही थीं। पगडंडी से थोड़ी दूर पर एक झोपड़ी थी, जिस पर लौकी और कुंभडे की लतर चढ़ी थी। उसमें से कुछ बात करने का शब्द सुनाई पड़ रहा था। शैला उसी ओर मुड़ी। वह झोंपड़ी के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने देखा, देखा, मधुवा अपनी टूटी खाट पर बैठा हुआ बंजो से कुछ कह रहा है। बंजो ने उत्तर में कहा—तब क्या करोगे मधुबन! अभी एक पानी चाहिए। तुम्हारा आलू सोराकर ऐसा ही रह जाएगा? ढाई रुपए के बिना! महंगू महतो उधार हल नहीं देंगे? मटर भी सूख जाएगी। ___अरे आज मैं मधुबन कहां से बन गया रे बंजो पीट दूंगा जो मुझे मधुवा न कहेगी। मैं तुझे तितली कहकर न पुकारूंगा। सुना न? हल उधार नहीं मिलेगा, महतो ने साफ-साफ कह दिया है। दस विस्से मटर और दस बिस्से आलू के लिए खेत मैंने अपनी जोत में रखकर बाकी दो बीघे जौ-गेहं बोने के लिए उसे साझे में दे दिया है। यह भी खेत नहीं मिला, इसी की उसे चिढ़ है। कहता है कि अभी मेरा हल खाली नहीं है। __ तब तुमने इस एक बीघे को भी क्यों नहीं दे दिया! __मैंने सोचा कि शहर तो मैं जाया की करता हूं। नया आलू और मटर वहां अच्छे दामों पर बेचकर कुछ पैसे भी लूंगा; और बंजो जाड़े में इस झोपड़ी में बैठे-बैठे रात को उन्हें भूनकर खाने में कम सुख तो नहीं! अभी एक कंबल लेना जरूरी है। तो बापू से कहते क्यों नहीं? वह तुम्हें ढाई रुपया दे देंगे। उनसे कुछ मांगा, तो यही समझेंगे कि मधुवा मेरा कुछ काम कर देता है, उसी की मजूरी चाहता है। मुझे जो पढ़ाते हैं, उसकी गुरु-दक्षिणा मैं उन्हें क्या देता हूं? तितली! जो भगवान करेंगे, वही अच्छा होगा। अच्छा तो मधुबन! जाती हूं। अभी बापू छावनी से लौटकर नहीं आए। जी घबराता ________________
यह कहकर जब वह लौटने लगी, तो मधुबन ने कहा-अच्छा, फिर आज से मैं रहा मधुबन और तुम तितली। यही न? दोनों की आंखें आंखें एक क्षण के लिए मिली—स्नेहपूर्ण आदान-प्रदान करने के लिए। मधुबन उठ खड़ा हुआ, तितली बाहर चली आई। उसने देखा, शैला और अनवरी चुपचाप खड़ी हैं! वह सकुचा गई। शैला ने सहज मुस्कुराहट से कहा—तब तुम्हारा नाम तितली हे क्यों? हां-कहकर तितली ने सिर झुका लिया। आज जैसे उसे अकेले में मधुबन से बातें करते हुए समग्र संसार ने देखकर व्यंग्य से हंस दिया हो। वह संकोच में गड़ी जा रही थी। शैला ने उसकी ठोढ़ी उठाकर कहा—लो, यह पांच रुपए तुम्हारे उस दिन की मजूरी के हैं। मैं, में न लगी। बाप बिगड़ेंगे। वह चंचल हो उठी। किंतु शैला कब मानने वाली थी। उसने कहा—देखो, इसमें ढाई रुपए तो मधुबन को दे दो, वह अपना खेत सींच ले और बाकी अपने पास रख लो। फिर कभी काम देगा। अब मधुबन भी निकल आया था। वह विचार-विमूढ था, क्या कहे! तब तक तितली को रुपया न लेते देखकर शैला ने मधुबन के हाथ में रुपया रख दिया, और कहा—बाकी रुपया जब तितली मांगे तो दे देना। समझा न? मैं तुम लोगों को छावनी पर बुलाऊं, तो चले आना। ___ दोनों चुप थे। अनवरी अब तक चुप थी; किंतु उसके हृदय ने इस सौहार्द को अधिक सहने से अस्वीकार कर दिया। उसने कहा—हो चुका, चलिए भी। धूप निकल आई है। शैला अनवरी के साथ घूम पड़ी। उसके हृदय में एक उल्लास था। जैसे कोई धार्मिक मनुष्य अपना प्रातः-कृत्य समाप्त कर चुका हो। दोनों धीरे-धीरे ग्राम-पथ पर चलने लगीं। अनवरी ने धीरे-से प्रसगं छेड़ दिया मिस शैला! आपको इन देहाती लोगों से बातचीत करने में बड़ा सुख मिलता है। मिस अनवरी! सुख! अरे मुझे तो इनके पास जीवन का सच्चा स्वरूप मिलता है, जिसमें ठोस मेहनत, अटूट विश्वास और संतोष से भरी शांति हंसती-खेलती है। लंदन की भीड़ से दबी हुई मनुष्यता में मैं ऊब उठी थी, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं दुख भी उठा चुकी हूं। दुखी के साथ दुखी की सहानुभूति होना स्वाभाविक है। आपको यदि इस जीवन में सुख-ही-सुख मिला है तो… नहीं-नहीं, हम लोगों को सुख-दुख जीवन से अलग होकर कभी दिखाई नहीं पड़ा। रुपयों की कमी ने मुझे पढ़ाया और मैं नर्स का काम करने लगी। जब अस्पताल का काम छोड़कर अपनी डॉक्टरी का धंधा मैंने फैलाया, तो मुझे रुपयों की कमी न रही। पर मुझे तो यही समझ पड़ता है कि मेहनत-मजूरी करते हुए अपने दिन बिता लेना, किसी के गले पड़ने से अच्छा है। ___ अनवरी यह कहते हुए शैला की ओर गहरी दृष्टि से देखने लगी। वह उसकी बगल में आ गई थी। सीधा व्यंग्य न खल जाए इसलिए उसने और भी कहा हम मसलमानों को तो मालिक की मर्जी पर अपने को छोड़ देना पड़ता है, फिर सुख-दुख की अलग-अलग परख ________________
करने की किसको पड़ी है। शैला ने जैसे चौंककर कहा तो क्या स्त्रियां अपने लिए कुछ भी नहीं कर सकतीं? उन्हें अपने लिए सोचने का अधिकार भी नहीं है? बहुत करोगी मिस शैला, तो यही कि किसी को अपने काम का बना लोगी। जैसा सब जगह हम लोगों की जाति किया करती है। पर उसमें दुख होगा कि सुख, इसका निपटारा तो वही मालिक कर सकता है। शैला न जाने कितनी बातें सोचती हुई चुप हो गई। वह केवल इस व्यंग्य पर विचार करती हुई चलने लगी। उत्तर देने के लिए उसका मन बेचैन था; पर अनवरी को उत्तर देने में उसे बहुत-सी बातें कहनी पड़ेंगी। वह क्या सब कहने लायक हैं? और यह प्रश्न भी उसके मन में आने लगा कि अनवरी कुछ अभिप्राय रखकर तो बात नहीं कर रही है। उसको भारतीय वायुमंडल का पूरा ज्ञान नहीं था। उसने देखा था केवल इन्द्रदेव को, जिसमें श्रद्धा और स्नेह का ही आभास मिला था। संदेह का विकृत चित्र उसके सामने उपस्थित करके अपने मन में अनवरी क्या सोच रही है, यही धीरे-धीरे विचारती हुई वह छावनी की ओर लौटने लगी। ___ अनवरी ने सौहार्द बढ़ाने के लिए कुछ दूसरा प्रसंग छेड़ना चाहा; किंतु वह सौजन्य के अनुरोध से संक्षिप्त उत्तर मात्र देती हुई छावनी पर पहुंची। अभी इन्द्रदेव का दरबार लगा हआ था। आरामकी पर लेटे हए वह कोई कागज देख रहे थे। एक बड़ी-सी दरी बिछी थी। उस पर कुछ किसान बैठे थे। इन लोगों के जाते ही दो कुर्सियां और आ गईं। पर इन्द्रदेव ने अपने तहसीलदार से कहा—इस पोखरी का झगड़ा बिना पहले का कागज देखे समझ में नहीं आएगा। इसे दूसरे दिन के लिए रखिए। तहसीलदार इन्द्रदेव के बाप के साथ काम कर चुका था। वह इन्द्रदेव से काम लेना चाहता था। उसने कहा—लेकिन दो-एक कागज तो आज ही देख लीजिए, उनकी बेदखली जल्दी होनी चाहिए। __अच्छा, मैं चाय पीकर अभी आता हूं।—कहकर इन्द्रदेव शैला और अनवरी के साथ कमरे में चले गए। बुड्ढे से अब न रहा गया। उसने कहा, तहसीलदार साहब, मैं कल से यहां बैठा हूं। मुझे क्यों तंग किया जा रहा है! तहसीलदार ने चश्मे के भीतर से आंखें तरेरते हुए कहा—रामनाथ हो न? तंग किया जा रहा है! हूं! बैठो अभी। दस बीघे की जोत बिना लगान दिए हड़प किए बैठे हो और कहते हो, मुझे तंग किया जा रहा है। क्या कहा? दस बीघे! अरे तहसीलदार साहब, क्या अब जंगल-परती में भी बैठने न दोगे? और वह तो न जाने कब से कृष्णार्पण लगी हुई बनजरिया है! वही तो बची है, और तो सब आप लोगों के पेट में चला गया। क्या उसे भी छीनना चाहते हो? तहसीलदार चुपचाप उसे घूरने लगा। ___ इन्द्रदेव शैला के साथ बाहर चले आए। अनवरी के लिए देर से माधुरी की भेजी हुई लौंडी खड़ी थी। वह उसके साथ छोटी कोठी में चली गई। इन्द्रदेव ने बुड्ढे को देखकर तहसीलदार को संकेत किया। तहसीलदार अभी बुड्ढे रामनाथ की बात नहीं छेड़ना चाहता था। किंतु इन्द्रदेव के संकेत से उसे कहना ही पड़ा—इसका नाम रामनाथ है। यह ________________
बनजरिया पर कुछ लगान नहीं देता। एकरेज जो लगा है, वह भी नहीं देना चाहता। कहता है—कृष्णार्पण माफी पर लगान कैसा? इन्द्रदेव ने रामनाथ को देखकर पूछा—क्यों, उस दिन हम लोग तुम्हारी ही झोंपड़ी पर गए थे? हां सरकार! तो एकरेज तो तुमको देना ही चाहिए। सरकारी मालगुजारी तो तुम्हारे लिए हम अपने आप से नहीं दे सकते। तहसीलदार से न रहा गया, बीच ही में बोल उठा—अभी तो यह भी नहीं मालूम कि यह बनजरिया का होता कौन है। पुराने कागजों में वह थी देवनन्दन के नाम। उसके मर जाने पर बनजरिया पड़ी रही। फिर इसने आकर उसमें आसन जमा लिया। बुड्ढा झनझना उठा। उसने कहा हम कौन हैं, इसको बताने के लिए थोड़ा समय चाहिए सरकार! क्या आप सुनेंगे? शैला ने अपने संकेत से उत्सुकता प्रकट की। किंतु इन्द्रदेव ने कहा—चलो, अभी माताजी के पास चलना है। फिर किसी दिन सुनूंगा। रामनाथ आज तुम जाओ; फिर मैं बुलाऊंगा, तब आना। रामनाथ ने उठकर कहा—अच्छा सरकार! चौबेजी बटुआ लिये पान मुंह में दाबे आकर खड़े हो गए। उनके मुख पर एक विचित्र कुतूहल था। वह मन-ही-मन सोच रहे थे—आज शैला बड़ी सरकार के सामने जाएगी। अनवरी भी वहीं है, और वहीं है बीबीरानी माधुरी! हे भगवान्! शैला, इन्द्रदेव और चौबेजी छोटी कोठी की ओर चले। मधबन के हाथ में था रुपया और पैरों में फरती, वह महंग महतो के खेत पर जा रहा था। बीच में छावनी पर से लौटते हुए रामनाथ से भेंट हो गई। मधुबन के प्रणाम करने पर रामनाथ ने अश्विर्वाद देकर पूछा कहां जा रहे हो मधुबन? आज पहला दिन है, बाबाजी ने उसे मधुवा न कहकर मधुबन नाम से पुकारा। वह भीतर-ही-भीतर जैसे प्रसन्न हो उठा। अभी-अभी तितली से उसके हृदय की बातें हो चुकी थीं। उसकी तरी छाती में भरी थी। उसने कहा बाबाजी. रुपया देने जा रहा है। महंग से पुरवट के लिए कहा था—आलू और मटर सींचने के लिए। वह बहाना करता था, और हल भी उधार देने से मुकर गया। मेरा खेत भी जोतता है और मुझी से बढ़-बढ़कर बातें करता रामनाथ ने कहा—भला रे, तू पुरवट के लिए तो रुपया देने जाता है—सिंचाई होगी; पर हल क्या करेगा? आज-कल कौन-सा नया खेत जोतेगा? मधुबन ने क्षण-भर सोचकर कहा-बाबाजी, तितली ने मुझसे चार पहर के लिए कहीं से हल उधार मांगा था। सिरिस के पेड़ के पास बनजरिया में बहुत दिनों से थोड़ा खेत बनाने का वह विचार कर रही है, जहां बरसात में बहुत-सी खाद भी हम लोगों ने डाल रखी थी। पिछाड़ होगी तो क्या, गोभी बोने का… ___ दुत पागल! तो इसके लिए इतने दिनों तक कानाफूसी करने की कौन-सी बात थी? मुझसे कहती! अच्छा, तो रुपया तुझे मिला? हां बाबाजी, मेम साहब ने तितली को पांच रुपया दिया था, वही तो मेरे पास है। मेम साहब ने रुपया दिया था! बंजो को? तू कहता क्या है?
हां, मेरे ही हाथ में तो दिया। वह तो लेती न थी। कहती थी, बापू बिगड़ेंगे! किसी दिन मेम साहब का उसने कोई काम कर दिया था, उसी की मजूरी बाबाजी! मेम साहब बड़ी अच्छी हैं।
रामनाथ चुप होकर सोचने लगा। उधर मधुबन चाहता था, बुड्ढा उसे छुट्टी दे। वह खड़ा-खड़ा ऊबने लगा। उत्साह उसे उकसाता था कि महंगू के पास पहुंचकर उसके आगे रुपए फेंक दे और अभी हल लाकर बंजो का छोटा-सा गोभी का खेत बना दे। बुड्ढा न जाने कहां से छींक की तरह उसके मार्ग में बाधा-सा आ पहुंचा।
रामनाथ सोच रहा था छावनी की बात! अभी-अभी तहसीलदार ने जो रूप दिखलाया था. वही उसके सामने नाचने लगा था। उसे जैसे बनजरिया की काया-पलट होने के साथ ही अपना भविष्य उत्पातपूर्ण दिखाई देने लगा। तितली उसमें नया खेत बनाने जा रही है। तब भी न जाने क्या सोचकर उसने कहा-जाओ मधुबन, हल ले जाओ।
मधुबन तो उछलता हुआ चला जा रहा था। किंतु रामनाथ धीरे-धीरे बनजरिया की ओर चला।
तितली गायों को चराकर लौटा ले जा रही थी। मधुबन तो हल ले जाने गया था। वह उनको अकेली कैसे छोड़ देती। धूप कड़ी हो चली थी। रामनाथ ने उसे दूर से देखा। तितली अब दूर से पूरी स्त्री-सी दिखाई पड़ती थी।
रामनाथ एक दूसरी बात सोचने लगा। बनजरिया के पास पहुंचकर उसने पुकारातितली!
उसने लौटकर प्रफुल्ल बदन से उत्तर दिया- 'बापू!'
श्यामदुलारी आज न जाने कितनी बातें सोचकर बैठी थीं-लड़का ही तो है, उसे दो बात खरी-खोटी सुनाकर डांट-डपटकर न रखने से काम नहीं चलेगा-पर विलायत हो आया है। बैरिस्टरी पास कर चुका है। कहीं जवाब दे बैठा तो! अच्छा…आज वह मेम की छोकरी भी साथ आएगी। इस निर्लज्जता का कोई ठिकाना है! कहीं ऐसा न हो कि साहब की वह कोई निकल आवे! तब उसे कुछ कहना तो ठीक न होगा। अभी दो महीने पहले कलेक्टर साहब जब मिलने आए थे, तो उन्होंने कहा था- ‘रानी साहब, आपके ताल्लुके में नमूने के गांव बसाने का बंदोबस्त किया जाएगा। इसमें बड़ी-बड़ी खेतियां, किसानों के बैंक और सहकार की संस्थाएं खुलेंगी। सरकार भी मदद देगी।' तब उसको कुछ कहना ठीक न होगा। माधुरी की क्या राय है? वह तो कहती है- 'मां, जाने दो, भाई साहब को कुछ मत कहो?' तो क्या वह अपने मन से बिगड़ता चला जाएगा। सो नहीं हो सकता। अच्छा, जाने दो। माधुरी के मन में अनवरी की बात रह-रहकर मरोर उठती थी। इन्द्रदेव क्या यह घर ________________
संभाल सकेंगे? यदि नहीं, तो मैं क्यों बनाने की चेष्टा करूं। उसके मन में तेरह बरस के कृष्णमोहन का ध्यान आ गया। थियासोफिकल स्कूल में वह पढ़ता है। पिता बाबू श्यामलाल उसकी ओर से निश्चित थे। हां, उसके भविष्य की चिंता तो उसकी माता माधुरी को ही थी। तब भी वह जैसे अपने को धोखे में डालने के लिए कह बैठती-जैसा जिसके भाग्य में होगा, वही होकर रहेगा। अनवरी इस कुटुंब की मानसिक हलचल में दत्तचित्त होकर उसका अध्ययन कर रही थी। न जाने क्यों, तीनों चुप होकर मन-ही-मन सोच रही थीं। पलंग पर श्यामदुलारी मोटी-सी तकिया के सहारे बैठी थीं। चौकी पर चांदनी बिछी थी। माधुरी और अनवरी वहीं बैठी हुई एक-दूसरे का मुंह देख रही थीं। तीन-चार कुर्सियां पड़ी थीं। छोटी कोठी का यह बाहरी कमरा था। श्यामदुलारी यहीं पर सबसे बात करती, मिलती-जुलती थीं; क्योंकि उनका निज का प्रकोष्ठ तो देव-मंदिर के समान पवित्र, अस्पृश्य और दुर्गम्य था? बिना स्नान किए-कपड़ा बदले, वहां कौन जा सकता था! बाहर पैरों का शब्द सुनाई पड़ा। तीनों स्त्रियां सजग हो गईं, माधुरी अपनी साड़ी का किनारा संवारने लगी। अनवरी एक उंगली से कान के पास के बालों को ऊपर उठाने लगी और, श्यामदुलारी थोड़ा खांसने लगी। इन्द्रदेव शैला और चौबेजी के साथ, भीतर आए। माता को प्रणाम किया। श्यामदुलराि ने 'सुखी रहो' कहते हुए देखा कि वह गोरी मेम भी दोनों हाथों की पतली उंगलियों में बनारसी साड़ी का सुनहला अंचल दबाए नमस्कार कर रही है। अनवरी उठकर खड़ी हो गई। माधुरी चौकी पर ही थोड़ा खिसक गई। माता ने बैठने का संकेत किया। पर वह भीतर से शैला से बोलने के लिए उत्सुक थी। इन्द्रदेव ने कहा-मिस अनवरी! मां का दर्द अभी अच्छा नहीं हुआ। इसके लिए आप क्या कर रही हैं। क्यों मां, अभी दर्द में कमी तो नहीं है? है क्यों नहीं बेटा! तुमको देखकर दर्द दूर भाग जाता है। श्यामदुलारी ने मधुरता से कहा। – तब तो भाई साहब, आप यहीं मां के पास रहिए। दर्द पास न आवेगा। -माधुरी ने कहा। लेकिन बबिरिनिा! और लोग क्या करेंगे? कुंवर साहब यहीं घर में बैठे रहेंगे, तो जो लोग मिलने-जुलने वाले हैं, वे कहां जाएंगे! ____ -अनवरी ने व्यंग्य से कहा। यह बात श्यामदलारी को अच्छी न लगी। उन्होंने कहा-मैं तो चाहती हैं कि इन्द्र मेरी आखों से ओझल न हो। वह करता ही क्या है मिस अनवरी! शिकार खेलने में ज्यादा मन लगाता है। क्यों, विलायत में इसकी बड़ी चाल है न! अच्छा बेटा! यह मेम साहब कौन है? इनका तो तुमने परिचय ही नहीं दिया। मां, इंग्लैंड में यही मेरा सब प्रबंध करती थी। मेरे खाने-पीने का, पढ़ने-लिखने का, कभी जब अस्वस्थ हो जाता तो डॉक्टरों का, और रात-रात-भर जागकर नियमपूर्वक दवा देने का काम यही करती थी। इनका मैं चिर-ऋणी हूं। इनकी इच्छा हुई कि मैं भारतवर्ष ________________
देलूंगी।
इसी से चली आई हैं न! अच्छा बेटा! इनको कोई कष्ट तो नहीं? हम लोग इनके शिष्टाचार से अपरिचित हैं। चौबेजी! आप ही न मेम साहब के लिए…ओ इनका नाम क्या है, यह पूछना तो मैं भूल ही गई।
मेरा नाम 'शैला' है मां जी! शैला की बोली घंटी की तरह गूंज उठी! श्यामदुलारी के मन में ममता उमड़ आई। उन्होंने कहा-चौबेजी! देखिए, इनको कोई कष्ट न होने पावे। इन्द्रदेव तो लड़का है, वह कभी काहे को इनकी सुविधा की खोज-खबर लेता होगा। जी सरकार! मेम साहब बड़ी चतुर हैं। वह तो कुंवर साहब का प्रबंध स्वयं आदेश देकर कराती रहती हैं। हम लोग तो अभी सीख रहे हैं। बड़े सरकार के समय में जो व्यवस्था थी, उसी से तो अब काम नहीं चल सकता! इन्द्रदेव घबरा गए थे। उन्हें कभी चौबे, कभी अनवरी पर क्रोध आता; पर वह बहाली देते रहे। __ माधुरी ने कहा-अच्छा तो भाई साहब! अभी शहर चलने की इच्छा नहीं है क्या? अब तो यहां कड़ी देहाती सर्दी पड़ेगी। नहीं, अभी तो यहीं रहूंगा। क्यों मां, यहां कोई कष्ट तो नहीं है?—इन्द्रदेव ने पूछा। अनवरी ने कहा-इस छोटी कोठी में साफ हवा कम आती है। और तो कोई…हां, बीबीरानी, मैं यह तो कहना भूल ही गई थी कि मुझे आज शहर चले जाना चाहिए। कई रोगियों को आज ही तक के लिए दवा दे आई हूं। मोटर तो मिल जाएगी न? ठहरिए, आप तो न जाने क्यों घबराई हैं। अभी तो मां की दवा…माधुरी की बात पूरी न होने पाई कि अनवरी ने कहा-दवा खाएगी तो नहीं, यही लगाने की दवा है। लगाते रहिए, मुझे रोक कर क्या कीजिएगा। हां, यहां साफ हवा मिलनी चाहिए, इसके लिए आप सोचिए। __चौबेजी बीच में बोल उठे-तो बड़ी सरकार उस कोठी में रहें, खुले हुए कमरे और दालान उसमें तो हैं ही। बोलने के लिए तो बोल गए; पर चौबेजी कई बातें सोचकर दांत से अपनी जीभ दबाने लगे। उनकी इच्छा तो हुई कि अपने कान भी पकड़ लें; पर साहस न हुआ। इन्द्रदेव चुप रहे। शैला ने कहा-मां जी! बड़ी कोठी में चलिए। यहां न रहिए। -वह बेचारी मूल गई कि श्यामदुलारी उसके साथ कैसे रहेंगी! श्यामदुलारी ने इन्द्रदेव का चेहरा देखा। वह उतरा हुआ तो नहीं था; किंतु उस पर उत्साह भी न था। माधुरी ने शैला को स्वयं कहते हुए जब सुना, तो वह बोली-अच्छा तो है मां! मेम साहब और अनवरी बीबी इसमें आ जाएंगी। हम लोग वहीं चलकर रहें। अनवरी ने कहा-मुझे एक दिन में लौट आने दीजिए। श्यामदुलारी ने देखा कि काम तो हो चला है, अब इस बात को यहीं रोक देना चाहिए। वह बोली-बेटा! कलेक्टर साहब ने नमूने का गांव बसाने का जो नक्शा भेजा था, उसे तुमने देखा? नहीं मां, अभी तो नहीं-शैला के पास वह है। इन्हें गांवों से बड़ा प्रेम है। मैंने इन्हीं के ऊपर यह भार छोड़ दिया है। इसके लिए यही एक योजना तैयार करने में लगी हैं। श्यामदुलरि सावधान हो गईं। शैला ने कहा-मां जी, अभी तो मैं गांवों में जाकर यहां की बातें समझने लगी हूं। फिर भी बहुत-सी बातें अभी नहीं समझ सकी हूं। किसी दिन आपको अवकाश रहे, तो मैं नक्शा ले आऊं?
JIM – Assistente
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