कायाकल्प
कायाकल्प
https://hi.wikisource.org/wiki/कायाकल्प
दोपहर का समय था, पर चारों तरफ अंधेरा था। आकाश में तारे छिटके हुए थे। ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था मानो संसार से जीवन का लोप हो गया हो। हवा भी बन्द हो गयी थी। सूर्यग्रहण लगा हुआ था। त्रिवेणी के घाट पर यात्रियों की भीड़ थी—ऐसी भीड़ जिसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती। वे सभी हिन्दू, जिनके दिल में श्रद्धा और धर्म का अनुराग था, भारत के हर एक प्रान्त से इस महान् अवसर पर त्रिवेणी की पावन धारा में अपने पापों का विसर्जन करने के लिए आ पहुँचे थे, मानो उस अँधेरे में भक्ति और विश्वास ने अधर्म पर छापा मारने के लिए अपनी असंख्य सेना सजायी हो। लोग इतने उत्साह से त्रिवेणी के संकरे घाट की ओर गिरते-पड़ते लपके चले जाते थे कि यदि जल की शीतल धारा की जगह अग्नि का जलता हुआ कुण्ड होता, तो भी लोग उसमें कूदते हुए जरा भी न झिझकते!
कितने आदमी कुचल गये, कितने डूब गये, कितने खो गये, कितने अपंग हो गये, इसका अनुमान करना कठिन है। धर्म का विकट संग्राम था। एक तो सूर्यग्रहण, उसपर यह असाधारण और अद्भुत प्राकृतिक छटा! सारा दृष्य धार्मिक वृत्तियों को जगानेवाला था। दोपहर को तारों का प्रकाश माया के परदे को फाड़कर आत्मा को आलोकित करता हुया मालूम होता था। वैज्ञानिकों की बात जाने दीजिए; पर जनता में न जाने कितने दिनों से यह विश्वास फैला हुया था कि तारागण दिन को कहीं किसी सागर में डूब जाते हैं। आज वही तारागण आखों के सामने चमक रहे थे। फिर भक्ति क्यों न जाग उठे! सद्वृत्तियाँ क्यों न आँखें खोल दें!
घण्टे भर के बाद फिर प्रकाश होने लगा, तारागण फिर अदृश्य हो गये, सूर्य भगवान् की समाधि टूटने लगी।
यात्रीगण अपने-अपने पापों की गठरियाँ त्रिवेणी में डाल-डालकर जाने लगे। सन्ध्या होते-होते घाट पर सन्नाटा छा गया। हाँ, कुछ घायल, कुछ अधमरे प्राणी जहाँ-तहाँ पड़े कराह रहे थे और ऊँचे करार से कुछ दूर एक नाली में पड़ी तीन-चार साल की एक लड़की चिल्ला-चिल्लाकर रो रही थी।
सेवा समितियों के युवक, जो अब तक भीड़ सँभालने का विफल प्रयत्न कर रहे थे, अब डोलियाँ कंधों पर ले-लेकर घायलों और भूले-भटकों को खबर लेने या पहुँचे। सेवा और दया का कितना अनुपम दृश्य था!
सहसा एक युवक के कानों में उस बालिका के रोने की आवाज पड़ी। अपने जयी से बोला-यशोदा, उधर कोई लड़का रो रहा है। यशोदा-हाँ, मालूम तो होता है। इन मूर्खों को कोई कैसे समझाये कि यहाँ बच्चों को लाने का काम नहीं। चलो, देखें।
दोनों ने उधर जाकर देखा, तो एक बालिका नाली में पड़ी रो रही है। गोरा रङ्ग था, भरा हुआ शरीर, बड़ी बड़ी आँखें, गोरा मुखड़ा, सिर से पाँव तक गहनों से लदी हुई। किसी अच्छे घर की लड़की थी। रोते-रोते उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। इन दोनों युवकों को देखकर डरी और चिल्लाकर रो पड़ी। यशोदा ने उसे गोद में उठा लिया और प्यार करके बोले-बेटी, रो मत, हम तुझे तेरी अम्मा के घर पहुँचा देंगे। तुझी को खोज रहे थे। तेरे बाप का क्या नाम है?
लड़की चुप तो हो गयी, पर संशय की दृष्टि से देख देख सिसक रही थी। इस प्रश्न का कोई उत्तर न दे सकी।
यशोदा ने फिर चुमकारकर पूछा—बेटी, तेरा घर कहाँ है?
लड़की ने कोई जवाब न दिया।
यशोदा—अब बताओ महमूद, क्या करें?
महमूद एक अमीर मुसलमान का लड़का था। यशोदानन्दन से उसकी बड़ी दोस्ती थी। उनके साथ यह भी सेवासमिति में दाखिल हो गया था। बोला-क्या बताऊँ? कैंप में ले चलो, शायद कुछ पता चले।
यशोदा—अभागे जरा-जरा से बच्चों को लाते हैं और इतना भी नहीं करते कि उन्हें अपना नाम और पता तो याद करा दें।
महमूद—क्यों बिटिया, तुम्हारे बाबूजी का क्या नाम है?
लड़की ने धीरे से कहा—बाबूजी!
महमूद—तुम्हारा घर इसी शहर में है या कहीं और?
लड़की—मैं तो बाबूदी के साथ लेल पर आई थी!
महमूद—तुम्हारे बाबूदी क्या करते हैं?
लड़की—कुछ नहीं कलते।
यशोदा—इस वक्त अगर इसका बाप मिल जाय, तो सच कहता हूँ, बिना मारे न छोडूँ! बचा गहने पहनाकर लाये थे, जाने कोई तमाशा देखने आये हों।
महमूद—और मेरा जी चाहता है कि तुम्हें पीटूँ। मियाँ बीवी यहाँ आये तो बच्चे को किस पर छोड़ आते? घर में और कोई न हो तो?
यशोदा—तो फिर उन्हीं को यहाँ आने की क्या जरूरत थी।
महमूद—तुम atheist ( नास्तिक ) हो, तुम क्या जानो कि सच्चा मजहबी जोश किसे कहते हैं?
यशोदा—ऐसे मजहबी जोश को दूर से ही सलाम करता हूँ। इस वक्त दोनों मियाँ-बीवी हाय हाय कर रहे होंगे।
महमूद—कौन जाने, वे भी यहीं कुचल कुचला गये हों।
लड़की ने साहस कर कहा—तुम हमें घल पहुँचा दोगे? बाबूदी तुमको पैछा देंगे।
यशोदा—अच्छा बेटी, चलो तुम्हारे बाबूदी को खोजें।
दोनों मित्र बालिका को लिये हुए कैम्प में आये; पर यहाँ कुछ पता न चला। तब दोनों उस तरफ गये जहाँ मैदान में बहुत से यात्री पड़े हुए थे। महमूद ने बालिका को कन्धे पर बैठा लिया और यशोदानन्दन चारों तरफ चिल्लाते फिरे—यह किसकी लड़की है? किसी की लड़की तो नहीं खो गयी? यह आवाजें सुनकर कितने ही यात्री 'हाँ-हाँ, कहाँ-कहाँ' करके दौड़े; पर लड़की को देखकर निराश लौट गये।
चिराग जले तक दोनों मित्र घूमते रहे। नीचे-ऊपर, किले के आस-पास, रेल के स्टेशन पर, अलोपी देवी के मन्दिर की तरफ यात्री-ही-यात्री पड़े हुए थे; पर बालिका के माता-पिता का कहीं पता न चला। आखिर निराश होकर दोनों आदमी कैम्प लौट आये।
दूसरे दिन समिति के और कई सेवकों ने फिर पता लगाना शुरू किया। दिन भर दौड़े, सारा प्रयाग छान मारा, सभी धर्मशालाओं की खाक छानी; पर कहीं पता न चला।
तीसरे दिन समाचार-पत्रो में नोटिस दिया गया और दो दिन वहाँ और रहकर समिति आगरे लौट गयी। लड़की को भी अपने साथ लेती गयी। उसे आशा थी कि समाचार-पत्रों से शायद सफलता हो। जब समाचार-पत्रों से कुछ पता न चला तब विवश होकर कार्यकर्ताओं ने उसे वहाँ के अनाथालय में रख दिया। महाशय यशोदानन्दन ही उस अनाथालय के मैनेजर थे।
२
बनारस में महात्मा कबीर के चौरे के निकट मुंशी वज्रधरसिंह का मकान है। आप हैं तो राजपूत, पर अपने को 'मुंशी' लिखते और कहते हैं। 'मुन्शी' की उपाधि से आपको बहुत प्रेम है। 'ठाकुर' के साथ आपको गँवारपन का बोध होता है, इसलिए हम भी आपको मुन्शीजी कहेंगे। आप कई साल से सरकारी पेंशन पाते हैं। बहुत छोटे पद से तरक्की करते करते आपने अन्त मे तहसीलदारी का उच्च पद प्राप्त कर लिया था। यद्यपि आप उस महान् पद पर तीन मास से अधिक न रहे और उतने दिन भी केवल एवज पर रहे; पर आप अपने को 'साबिक तहसीलदार' लिखते थे और मुहल्लेवाले भी उन्हें खुश करने को 'तहसीलदार साहब' ही कहते थे। यह नाम सुनकर आप खुशी से अकड़ जाते है पर पेंशन केवल २५) मिलती थी; इसलिए तहसीलदार साहब को बाजार-हाट खुद ही करना पड़ता था। घर मे चार प्राणियों का खर्च था। एक लड़की थी, एक लड़का और स्त्री। लड़के का नाम चक्रधर था। वह इतना जहीन था कि पिता के पेन्शन के जमाने मे जब घर से किसी प्रकार की सहायता न मिल सकती थी, केवल अपने बुद्धि-बल से उसने एम० ए० की उपाधि प्राप्त कर ली थी। मुन्शीजीने पहले ही से सिफारिश पहुँचानी शुरू की थी। दरबारदारी की
कला में वह निपुण थे। हुक्काम को सलाम करने का उन्हें मरज था । हाकिमों के दिये हुए सैकड़ों प्रशसा पत्र उनकी अतुल सम्पत्ति थे। उन्हें वह बङे गर्व से दूसरी का दिखाया करते थे। कोई नया हाकिम आये, उससे जरूर रब्त-जब्त कर लेते थे। हुक्काम ने चक्रधर का ख्याल करने के वादे भी किये थे, लेकिन जब परीक्षा का नतीजा निकला और मुन्शीजीने चक्रधर से कमिश्नर के यहाँ चलने को कहा, तो उन्हाने जाने से साफ इनकार किया।
मुन्शीनीने त्योरी चढ़ाकर पूछा-क्यो ? क्या घर बैठे तुम्हे नोकरी मिल जायगी?
चक्रघर मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।
वज्रधर-~यह खब्त तुम्हें कब से सवार हुया ? नौकरी के सिवा और करोगे ही क्या?
चक्रधर-मैं आजाद रहना चाहता हूँ।
वज्रधर-आजाद रहना था, तो एम० ए० क्यो पास किया ?
चक्रधर इसीलिए कि आजादी का महत्व समझूंँ।
उस दिन से पिता और पुत्र में आये-दिन बमचख मचती रहती थी। मुंशीजा बुढापे में भी शौकीन आदमी थे। अच्छा सा खाने और अच्छा पहनने की इच्छा अभी तक बनी हुई थी। अब तक इसी खयाल से दिल को समझाते थे कि लइका नोकर हो जायगा तो मौज करेंगे।अब लड़के का रंग देखकर बार-बार झुँझलाते और उमे काम-चोर, घमण्डी, मूर्ख कहकर अपना गुस्सा उतारते रहते थे । अभी तुम्हें कुछ नहीं सूझती, जब मैं मर जाऊँगा तब सूझेगो । तब सिर पर हाथ रखकर रोओगे | लाख बार कह दिया-बेटा, यह जमाना खुशामद और सलामी का है। तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेंत भो न पूछेगा। तुम बैठे आजादी का मजा उठा रहे हो और तुम्हारे पीछेवाले वाजी मारे जाते हैं। वह जमाना लद गया, जब विद्वानो की कद्र थी, अब तो विद्वान् टके सेर मिलते है, कोई बात नहीं पूछता । जैसे और भी चीजें बनाने के कारखाने खुल गये हैं, उसी तरह विद्वानों के कारखान है, और उनकी संख्या हर साल बढती जाती है।
चक्रधर पिता का अदब करते थे, उनका जवाब तो न देते, पर अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए उन्होंने जो मार्ग तय कर लिया था, उससे वह न हटते थे। उन्हें यह हास्यासद मालूम होता था कि आदमी केवल पेट पालने के लिए आधी उम्र पढ़ने में लगा दे। अगर पेट पालना ही जीवन का आदर्श हो, तो पढने का जरूरत ही क्या है। मजदूर एक अच्छर भी नहीं जानता, फिर भी वह अपना और अपने बाल बच्चों का पेट बड़े मजे से पाल लेता है । विद्या के साथ जीवन का आदर्श कुछ ऊँचा न हुआ, तो पढना व्यर्थ है। विद्या को जीविका का साधन बनाते उन्हें लज्जा आती थी। वह भूखों मर जाते, लेकिन नौकरी के लिए आवेदन पत्र लेकर कहीं न नाते । विद्याभ्यास के दिनों में भी वह सेवा कार्य में अग्रसर रहा करते थे अब तो इसके सिवा उन्हें और कुछ सूझता ही न था। दीनों की सेवा और ता में जो आनन्द और आत्मगौरव था, वह दफ्तर में बैठकर कलम घिसने कहांँ।
इस प्रकार दो साल गुजर गये। मुशी वज्रधर ने समझा था, जब यह भूत इसके सर से उतर नायगा, शादी-व्याह की फिक्र होगी, तो आप-ही-आप नौकरी की तलाश पङेगा! जवानी का नशा बहुत दिन तक नहीं ठहरता । लेकिन जब दो साल जाने पर भी भूत के उतरने का कोई लक्षण न दिखायी दिया, तो एक उन्होंने चक्रधर को खूब फटकारा-दुनिया का दस्तूर है कि पहले अपने घर में जलाकर तब मसजिद में जलाते हैं। तुम अपने घर को अंधेरा रखकर मसजिद को रोशन करना चाहते हो। जो मनुष्य अपनों का पालन न कर सका, वह ख़ुदा की किस मुँह से मदद करेगा। मै बुढापे में खाने कपड़े को तरसू और अफसरो का कल्याण करते फिरो। मैंने तुम्हें पैदा किया, दूसरो ने नहीं, मैने तुम्हें पोसा, दूसरो ने नहीं, मैं गोद में लेकर हकीम वैद्यों के द्वार-द्वार दौड़ता फिरा, नहीं | तुम पर सबसे ज्यादा हक मेरा है, दूसरो का नहीं।
चक्रधर अब पिता की इच्छा से मुँह न मोड़ सके। उन्हें अपने कॉलेज ही मे जगह मिल सकती थी। वहाँ सभी उनका आदर करते थे; लेकिन यह उन्हे न था। बस कोई ऐसा धन्धा चाहते थे, जिससे थोड़ी देर रोज काम करके अपने की मदद कर सके। एक घण्टे से अधिक समय न देना चाहते थे । सयोग से शपुर के दीवान ठाकुर हरिसेवकसिंह को अपनी लड़की को पढ़ाने के लिए सुयोग्य और सच्चरित्र अध्यापक को जरूरत पड़ी। उन्होंने कालेज के प्रधानाध्यापक को इस विषय म एक पत्र लिखा । वेतन ३०) मासिक तक रक्खा । कालेज का प्राध्यापक इतने वेतन पर राजी न हुआ । आखिर उन्होने चक्रधर को उस काम में लगा दिया। काम बड़ी जिम्मेदारी का था, किन्तु चक्रधर इतने सुशील, इतने परिश्रमी और इतने सयमी थे कि उन पर सत्रको पूरा विश्वास था।
दूसरे दिन से चक्रधर ने लडकी को पढ़ाना शुरू कर दिया ।
३
कई महीने बीत गये । चक्रधर महीने के अन्त में रुपए लाते और माता के हाथ रख देते। अपने लिए उन्हे रुपए की कोई जरूरत न थी। दो मोटे कुरतों पर काट देते थे। हाँ, पुस्तको से उन्हें रुचि यो; पर इसके लिए कॉलेज का पुस्तकालय खुला हुआ था, सेवा कार्य के लिए चन्दों से रुपये या जाते थे । मुंशी वज्रघर द भी कुछ सीधा हो गया । डरे कि इससे ज्यादा दबाऊँ, तो शायद यह भो हाथ से निकल जाय। समझ गये कि जब तक विवाह की बेङी पाँव मे न पड़ेगी यह महाशय काबू आयेंगे । वह बेङी बनवाने का विचार करने लगे।
मनोरमा की उम्र अभी १३ वर्ष से अधिक न हो, लेकिन वक्रधर को उसे पढ़ाते हुए बड़ी झेप होती थी। वह यही प्रयत्न करते थे कि टाकुर साहेब की उपस्थिति ही में उसे पढायें। यदि कभी ठाकुर साहब कही चले नाते, तो चक्रधर को महान् संकट का सामना करना पड़ता था।
एक दिन चक्रधर इसी सकट मे जा फँसे । ठाकुर माहब कही गये हुए थे। चक्रधर कुरसी पर बैठे, पर मनोरमा की ओर न ताककर द्वार की ओर ताक रहे थे, मानो वहाँ बैठते डरते हों। मनोरमा वाल्मीकीय रामायण पढ रही थी। उसने दो-तीन बार चक्रधर की और ताका, पर उन्हें द्वार की ओर ताकते देखकर फिर किताब देखने लगी। उसके मन में सीता के वनवास पर एक शङ्का हुई थी और वह इसका समाधान करना चाहती थी। चक्रधर ने द्वार की ओर ताकते हुए पूछा-चुप क्यों बैठी हो, आज का पाठ क्यों नहीं पढती ?
मनोरमा-मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ, आज्ञा हो तो पूछूंँ ?
चक्रधर ने कातर भाव से कहा- क्या बात है ?
मनोरमा-रामचन्द्र ने सीताजी को घर से निकाला, तो वह चली क्यों गयी ?
चक्रधर-और क्या करती ?
मनोरमा-वह जाने से इनकार कर सकती थी। एक तो राज्य पर उनका अधिकार भी रामचन्द्र ही के समान था, दूसरे वह निर्दोष थी। अगर वह यह अन्याय न स्वीकार करतीं, तो क्या उन पर कोई आपत्ति हो सकती थी ?
चक्रधर-हमारे यहाँ पुरुषों की आज्ञा मानना स्त्रियों का परम धर्म माना गया है। यदि सीताजी पति की आज्ञा न मानतीं, तो वह भारतीय सती के आदर्श से गिर जाती।
मनोरमा यह तो मै जानती हूँ कि स्त्री को पुरुष की आज्ञा माननी चाहिए। लेकिन क्या सभी दशाओं में ? जब राजा से साधारण प्रजा न्याय का दावा कर सकती है, तो क्या उसकी स्त्री नहीं कर सकती ? जब गमचन्द्र ने सीता की परीक्षा ले ली थी. और अन्त:करण से उन्हें पवित्र समझते थे, तो केवल झूठी निन्दा से बचने के लिए उन्हें घर से निकाल देना कहाँ का न्याय था?
चक्रधर-राज धर्म का आदर्श भी तो पालन करना था !
मनोरमा-तो क्या दोनों प्राणी जानते थे कि हम संसार के लिए आदर्श खड़ा कर रहे हैं ? इससे तो यह सिद्ध होता है कि वे कोई अभिनय कर रहे थे। अगर आदर्श भी मान लें, तो यह ऐसा आदर्श है, जो सत्य की हत्या करके पाला गया है। यह आदर्श नहीं है, चरित्र की दुर्बलता है। मैं आपसे पूछती हूँ, आप रामचन्द्र की जगह होते, तो क्या आप भी सीता को घर से निकाल देते ?
चक्रधर बड़े असमंस में पड़ गये। उनके मन में स्वयं यही शङ्का और लगभग इसी उम्र में पैदा हुई थी, पर वह इसका समाधान न कर सके थे। अब साफ साफ जवाब देने की जरूरत पड़ी, तो बगलें झॉकने लगे। मनोरमा ने उन्हें चुप देखकर फिर पूछा-क्या आप भी उन्हें घर से निकाल देते?
चक्रधर-नहीं, मै तो शायद न निकालता ।
मनोरमा-आप निन्दा की जरा भी परवा न करते ?
चक्रघर-नहीं, मैं झूठी निन्दा की परवा न करता ।
मनोरमा की आँखें खुशी से चमक उठीं, प्रफुल्लित होकर बोली-यही बात मेरे भी मन में थी। मैंने दादाजी से, भाई जी से, पण्डितजी से, लौंगी अम्मों से, भाभी से यही शङ्का की, पर सब लोग यही कहते थे कि रामचन्द्र तो भगवान् हैं, उनके विषय में कोई शङ्का हो ही नही सकती। आपने आज मेरे मन की बात कही । मैं जानती थी कि आप यही जवाब देंगे। इसीलिए मैने आपसे पूछा था । अब मै उन लोगो को खूब भाड़े हाथों लूँगी।
उस दिन से मनोरमा को चक्रधर से कुछ स्नेह हो गया। पढ़ने-लिखने से उसे विशेष रुचि हो गयी, चक्रधर उसे जो काम करने को दे जाते, वह उसे अवश्य पूरा करती । पहले की भांति अब हीले-हवाले न करती । जब उनके पाने का समय होता, तो वह पहले ही से आकर बैठ जाती और उनका इन्तजार करती। अब उसे उनसे अपने मन के भाव प्रकट करते हुए संकोच न होता। वह जानती थी कि कम से कम यहाँ उनका निरादर न होगा, उनकी हसी न उड़ायी जायगी।
ठाकुर हरिसेवकसिह की आदत थी कि पहले दो चार महीनो तक तो नौकरों का वेतन ठीक समय पर दे देते; पर ज्यों ज्यों नौकर पुराना होता जाता था, उन्हें उसके वेतन की याद भूलती जाती थी। उनके यहाँ कई नौकर ऐसे भी पड़े थे, जिन्होंने बरसों से अपने वेतन नहीं पाये थे । चक्रधर को भी इधर चार महीनों से कुछ न मिला था। न वह आप-ही-आप देते थे, न चक्रधर संकोचवश मांँगते थे। उधर घर मे रोज तकरार होती थी। मुशी वजधर बार बार तकाजे करते, झंझलाते-मॉगते क्यों नहीं ? क्या मुँह मे दही जमाया हुआ है, या काम नहीं करते ? लिहाज भले आदमी का किया जाता है । ऐसे लुच्चो का लिहाज नहीं किया जाता, जो मुफ्त मे काम कराना चाहते हैं । आखिर एक दिन चक्रधर ने विवश हो ठाकुर साहब को एक पुरजा लिखकर अपना वेतन मॉगा। ठाकुर साहब ने पुरजा लौटा दिया-व्यर्थ को लिखापढ़ी करने की उन्हें फुरसत न थी और कहा-उनको जो कुछ कहना हो खुद आकर कहें। चक्रधर शरमाते हुए गये और बहुत-कुछ शिष्टाचार के बाद रुपए मांगे । ठाकुर साहब हँसकर बोले-वाह बाबूजी, वाह ! आप भी अच्छे मौजी जीव है । चार महीनों से वेतन नहीं मिला और आपने एक बार भी न मॉगा। अब तो आपके पूरे १२०) हो गये। मेरा हाथ इस वक्त तंग है। जरा दस-पाँच दिन ठहरिए । आपको महीने महीने अपना वितन ले लेना चाहिए था। सोचिए, मुझे एक मुश्त देने में कितनी असुविधा होगी । खैर, जाइये दस पाँच दिन मे रुपये मिल जायेंगे । चक्रधर कुछ न कह सके । लौटे, तो मुँह पर घोर निराशा छायी हुई थी। आज दादाजी शायद जीता न छोड़ेंगे। इस ख्याल से उनका दिल काँपने लगा। मनोरमा ने उनका पुरजा अपने पिता के पास ले जाते हुए राह में पढ़ लिया था। उन्हें उदास देखकर पूछा-दादाजी ने आपसे क्या कहा !
चक्रधर उसके सामने रुपये पैसे का जिक्र न करना चाहते थे । झेंपते हुए बोले- कुछ तो नहीं ।
मनोरमा-आपको रुपए नहीं दिये ?
चक्रधर का मुंह लाल हो गया। बोले-मिल जायँगे ।
मनोरमा-आपको १२०) चाहिए न ?
चक्रधर-इस वक्त कोई ऐसी जरूरत नहीं है ।
मनोरमा-जरूरत न होती तो श्राप मांगते ही न । दादाजी से बड़ा ऐब है कि 'किसी के रुपये देते हुए उन्हें मोह लगता है। देखिए, मैं जाकर'
चक्रधर ने रोककर कहा-नहीं नहीं, कोई जरूरत नहीं।
मनोरमा ने न माना | तुरन्त घर मे गई और एक क्षण में पूरे रुपये लाकर मेज पर रख दिये, मानो कहीं गिने गिनाये रक्खे हुए थे।
चक्रधर-तुमने ठाकुर साहब को व्यर्थ कष्ट दिया ।
मनोरमा-मेने उन्हें कष्ट नहीं दिया। उनसे तो कहा भी नहीं। दादाजी किसी की जरूरत नहीं समझते। अगर अपने लिए कभी मोटर मॅगपानी हो तो तुरत मंगवा लेंगे, पहाड़ों पर जाना हो, तो तुरन्त चले जायेंगे, पर जिसके रुपए पाते हैं, उसको न देंगे।
वह तो पढने बैठ गयी, लेकिन चक्रधर के सामने यह समस्या पड़ी कि रुपए लुंँ, या न लुँ। उन्होंने निश्चय किया कि न लेना चाहिए । पाठ हो चुकने पर यह उठ खड़े हुए और बिना रुपये लिये बाहर निकल आये । मनोरमा रुपये लिये हुए पीछे पीछे बरामदे तक आयी । बार-बार कहती रही- इसे आप लेते जाइए, जब दादाजा दें, तो मुझे लौटा दीजिएगा। पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गये।
४
चक्रघर डरते हुए घर पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है; उसपर कालीन विछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उसपर बैठे हुए है। उनके सामने हो एक कुरसी पर मुशी वज्रधर बैठे फर्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था । चक्रधर के प्राण सूख गये । अनुमान से ताड़ गये कि यह महाशय वर की खोज में आये हैं । निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा, तो अनुमान सच्चा निकला | वोले-दादाजी ने इनसे क्या कहा ?
निर्मला ने मुस्कराकर कहा-नानी क्यों मरी जाती है, क्या जन्म भर क्वारे ही
रहोगे ! जाओ, बाहर बैठो; तुम्हारी तो बड़ी देर से जोहाई हो रही है। आज क्यों इतनी देर लगायी?
चक्रधर-यह है कौन ?
निर्मला-आगरे के कोई वकील है, मुंशी यशोदानन्दन !
चक्रधर-मै तो घूमने जाता हूँ। जब यह यमदूत चला जायगा, तो आऊँगा।
निर्मला-वाह रे शर्मीले ! तेरा-सा लड़का तो देखा ही नहीं। आ, जरा सिर में तेल डाल दूं, बाल न जाने कैसे बिखरे हुए हैं। साफ कपड़े पहनकर जरा देर के लिए बाहर जाकर बैठ ।
चक्रधर-घर में भोजन भी है कि व्याह ही कर देने का जी चाहता है ? मैं कहे देता हूँ, विवाह न करूँगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय ।
किन्तु स्नेहमयी माता कब सुननेवाली थी। उसने उन्हें जबरदस्ती पकडकर सिर में तेल डाल दिया सन्दूक से एक धुला हुआ कुरता निकाल लायी और यों पहनाने लगी, जैसे कोई बच्चे को पहनाये । चक्रधर ने गरदन फेर ली।
निर्मला-मुझसे शरारत करेगा, तो मार बैठूँगी। इधर ला सिर ! क्या जन्म- भर छटे सॉड़ बने रहने का जी चाहता है ? क्या मुझसे मरते दम तक चूल्हा-चक्की कराता रहेगा ? कुछ दिनों तो बहू का सुख उठा लेने दे।
चक्रधर-तुमसे कौन कहता है भोजन बनाने को ? मैं कल से बना दिया करूँगा। मंगला को क्यों छोड़ रखा है ?
निर्मला- अब मैं मारनेवाली ही हूँ। आज तक कभी न मारा; पर आज पीट चलूँगी, नहीं तो जाकर चुपके से बाहर बैठ ।
इतने में मुशीजी ने पुकारा-नन्हें, क्या कर रहे हो ? जरा यहाँ तो आओ।
चक्रधर के रहे-साहे होश भी उड़ गये। बोले-जाता तो हुँ, लेकिन कहे देता हूँ, मैं यह जुआ गले मे न डालुगा । जीवन में मनुष्य का यही काम नहीं है कि विवाह कर ले, बच्चों का बाप बन जाय और कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर गृहस्थी मे जुत जाय।
निर्मला-सारी दुनिया जो करती है, वही तुम्हें भी करना पड़ेगा | मनुष्य का जन्म होता ही किस लिए है ?
चक्रधर-हजारों काम है।
निर्मला-रुपए आज भी नहीं लाये क्या ? कैसे आदमी हैं कि चार-चार महीने हो गये, रुपए देने का नाम ही नहीं लेते ! जाकर अपने दादा को किसी बहाने से भेज दो। कहीं से जाकर रुपए लायें। कुछ दावत आवत का सामान करना ही पड़ेगा, नहीं तो कहेंगे कि नाम बड़े और दर्शन थोड़े।
चक्रधर बाहर आये, तो मुंशी यशोदानन्दन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लगा लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए बोले–अब की 'सरस्वती' मे आपका लेख दे
चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैमनस्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताये हैं, वे वहुत ही विचारपूर्ण हैं।
इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयता-पूर्ण आलोचना ने चक्रधर को मोहित कर लिया। वह कुछ जवाब देना ही चाहते थे कि मुशी बज्रधर बोल उठे-आज बहुत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ बातचीत होने लगी क्या? (यशोदानन्दन से) राजा साहब की इनके ऊपर बड़ी कृपा है। बिलकुल लड़कों की तरह मानते हैं। इनकी बातें सुनने से उनका जी ही नहीं भरता। (नाई से) देख, चिलम बदल दे और जाकर झिनकू से कह दे, सितार वितार लेंकर थोड़ी देर के लिए यहाँ आ जाय। इधर ही से गणेश के घर जाकर कहना कि तहसीलदार साहब ने एक हाँड़ी अच्छा दही माँगा है। कह देना, दही खराव हुआ, तो दाम न मिलेंगे।
यह हुक्म देकर मुशीजी घर मे चले गये। उधर की फ्रिक थी, पर मेहमान को छोड़कर न जा सकते थे। आज उनका ठाट बाट देखते ही बनता था। अपना अल्पकालीन तहसीलदारी के समय का आलपाके का चोंगा निकाला था उसी जमाने की मदील भी सिर पर थी। आँखों में सुरमा भी था, बालों में तेल भी, मानो उन्हीं का व्याह होनेवाला है। चक्रधर शरमा रहे थे कि यह महाशय इनके वेश पर दिल में क्या कहते होंगे। राजा साहब की बात सुनकर तो वह गड़-से गये।
मुशीजी चले गये, तो यशोदानन्दन बोले— अब आपका क्या काम करने का इरादा है?
चक्रधर— अभी तो कुछ निश्चय नहीं किया है, हाँ, यह इरादा है कि कुछ दिनों आजाद रहकर सेवा कार्य करूँँ।
यशोदा— इससे बढकर क्या हो सकता है। आप जितने उत्साह से समिति को चला रहे हैं, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। आप-जैसे उत्साही युवकों का ऊँचे आदर्शों के साथ सेवा क्षेत्र में आना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्हीं गुणों ने मुझे आपकी ओर खींचा है। यह तो आपको मालूम ही होगा कि मैं किस इरादे से आया हूँ। अगर मुझे धन या जायदाद की परवा होती, तो यहाँ न आता! मेरी दृष्टि में चरित्र का जो मूल्य है, वह और किसी वस्तु का नहीं।
चक्रधर ने ऑखें नीची करके कहा— लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता। मेरा विचार है कि गृहस्थी में फँसकर कोई तन मन से सेवा कार्य नहीं कर सकता।
यशोदा— ऐसी बात तो नहीं। इस वक्त भी जितने आदमी सेवा कार्य कर रहे हैं, वे प्राय सभी बाल-बच्चोंवाले आदमी हैं।
चक्रधर— इसी से तो सेवा कार्य इतना शिथिल है!
यशोदा— मैं समझता हूँ कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक से हों, तो स्त्री पुरुष के कामो में वाधक होने के बदले सहायक हो सकती है। मेरी पुत्री कायाकल्प] १५
का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप दोनों एक साथ रहकर सुखी होंगे। उसे कपड़े का शौक नहीं, गहने का शौक नहीं; अपनी हैसियत को बढ़ाकर दिखाने की धुन नहीं। आप के साथ वह मोटे-से-मोटे वस्त्र और मोटे-से-मोटे भोजन में सन्तुष्ट रहेगी। अगर आप इसे अत्युक्ति न समझें, तो मैं यहॉ तक कह सकता हूँ कि ईश्वर ने आपको उसके लिए बनाया है और उसको आपके लिए। सेवा-कार्य में वह हमेशा आपसे एक कदम आगे रहेगी। अँगरेजी, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत पढ़ी हुई है; घर के कामों में इतनी कुशल है कि मैं नही समझता, उसके बिना मेरी गृहस्थी कैसे चलेगी? मेरी दो बहुएँ हैं, लड़की की मा है; किन्तु सब-की-सब फूहड़; किसी में भी वह तमीज नहीं। रही शक्ल सूरत, वह भी आपको इस तसवीर से मालूम हो जायगी।
यह कहकर यशोदानन्दन ने कहार से तसवीर मॅगवायी और चक्रधर के सामने रखते हुए बोले— मै तो इसमें कोई हरज नहीं समझता। लडके को क्या खबर है कि मुझे बहू कैसी मिलेगी। स्त्री मे कितने ही गुण हों, लेकिन यदि उसकी सूरत पुरुष को पसन्द न आयी, तो वह उसकी नजरो से गिर जाती है, और उनका दाम्पत्य-जीवन दुःखमय हो जाता है। मैं तो यहॉ तक कहता हूँ कि वर और कन्या में दो चार बार मुलाकात भी हो जानी चाहिए। कन्या के लिए तो वह अनिवार्य है। पुरुष को स्त्री पसन्द न आयी, तो वह और शादियाँ कर सकता है। स्त्री को पुरुष पसन्द न आया, तो उसकी सारी उम्र रोते ही गुजरेगी।
चक्रधर के पेट में चूहे दौडने लगे कि तसवीर क्योंकर ध्यान से देखूँँ। वहाँ देखते शरम आती थी, मेहमान को अकेला छोडकर घर में न जाते बनता था। कई मिनठ तक तो सब्र किये बैठे रहे, लेकिन न रहा गया। पान की तश्तरी और तसवीर लिये हुए घर में चले आए। चाहते थे कि अपने कमरे में जाकर देखें कि निर्मला ने पूछा— क्या बातचीत हुई? कुछ देंगे दिलायेंगे कि वही ५१) वालो मे हैं?
चक्रधर ने उग्र होकर कहा— अगर तुम मेरे सामने देने दिलाने का नाम लोगी तो जहर खा लूँगा।
निर्मला— वाह रे! तो क्या पचीस बरस तक यों ही पाला-पोसा है क्या? मुँह घो रखें!
चक्रधर— तो बाजार में खडा करके वेच क्यो नहीं लेती? देखो, कै टके मिलते हैं?
निर्मला— तुम तो अभी से ससुर के पक्ष मे मुझसे लड़ने लगे। व्याह के नाम ही में कुछ जादू है क्या!
इतने में चक्रधर को छोटी बहन मगला तश्तरी में पान रखकर उनको देने लगा तो कागज में लिपटी हुई तस्वीर उसे नजर आयी। उसने तस्वीर ले ली और लालटेन के सामने ले जाकर बोली— यह बहू की तस्वीर है। देखो, कितनी सुन्दर है! झिनकू—(यशोदानन्दन से) हुजूर को गाने का शौक मालूम होता है।
यशोदा॰—अजी, जब था तब था। सितार वितार की दो-चार गतें बजा लेता था। अब सब छोड़-छाड़ दिया।
झिनकू—कितना ही छोड़-छाड़ दिया है, लेकिन आजकल के नौसिखियों से अच्छे ही होंगे। अब की आप ही की हो।
यशोदानन्दन ने भी दो-चार बार इनकार करने के बाद काफी की धुन में एक ठुमरी छेड़ दी। उनका गला मँजा हुया था, इस कला में निपुण थे, ऐसा मस्त है होकर गाया कि सुनने वाले झूम-झूम गये। उनकी सुरीली तान साज में मिल जाती थी। वज्रधर ने तो वाह-वाह का तार बाँध दिया। झिनकू के भी छक्के छुट गये। मजा यह कि साथ-ही-साथ सितार भी बजाते थे। आस पास के लोग आकर जमा हो गये। समाँ बँध गया। चक्रधर ने यह आवाज सुनी, तो दिल में कहा—यह महाशय भी उसी टुकरी के लोगों में है, उसी रंग में रँगे हुए। अब झेंप जाती रही। बाहर आकर बैठ गये।
वज्रघर ने कहा—भाई साहब, आपने तो कमाल कर दिया। बहुत दिनों से ऐसा गाना न सुना था। कैसी रही, झिनकू?
झिनकू—हुजूर, कुछ न पूछिए, सिर धुन रहा हूँ। मेरी तो अब गाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। आपने हम सबी का रंग फीका कर दिया। पुराने जमाने के रईसों की क्या बातें हैं।
यशोदा॰—कभी-कभी जी बदला लिया करता हूँ, वह भी लुक छिपकर। लड़के सुनते हैं, तो कानों पर हाथ रख लेते हैं। मैं समझता हूँ, जिसमे यह रस नहीं, वह किसी सोहबत में बैठने लायक नहीं। क्यों बाबू चक्रधर, आपको तो शौक होगा?
वज्रधर—जी, छू नहीं गया। बस, अपने लड़कों का हाल समझिए।
चक्रधर ने झेंपते हुए कहा—मैं गाने को बुरा नहीं समझता। हाँ, इतना जरूर चाहता हूँ कि शरीफ लोग शरीफों ही में गायें बजायें।
यशोदा॰—गुणियों की जात पात नहीं देखी जाती। हमने तो बरसों एक अन्धे फकीर की गुलामी की, तब जाके सितार बजाना आया।
आधीरात के करीब गाना बन्द हुआ। लोगों ने भोजन किया। जब मुंशी यशोदानन्दन बाहर आकर बैठे, तो वज्रधर ने पूछा—आपसे कुछ बातचीत हुई?
यशोदा—जी हाँ, हुई, लेकिन साफ नहीं खुले।
वज्रधर—विवाह के नाम से चिढ़ता है।
यशोदा॰—अब शायद राजी हो जायँ।
वज्रघर—अजी, सैकड़ें आदमी आ-आकर लौट गये। कई आदमी तो दस दस हजार तक देने पर तैयार थे। एक साहब तो अपनी रियासत ही लिख देते थे, लेकिन इसने हामी न भरी। दोनों श्रादमी सोये। प्रातःकाल यशोदानन्दन ने चक्रवर से पूछा-क्यों बेटा, एक दिन के लिए मेरे साथ आगरे चलोगे ?
चक्रधर -मुझे तो आप इस जजाल मे न फंसायें, तो वहुत अच्छा हो ।
यशोदा० -तुम्हें मजाल में नहीं फँसाता वेटा, तुम्हें ऐसा सच्चा मन्त्री, ऐसा सच्चा सहायक और ऐसा सन्या मित्र दे रहा हूँ, जो तुम्हारे उद्देश्यों को पूरा करना अपने जीवन का मुख्य कर्त्तव्य समझेगी । मै स्वार्थवश ऐसा नहीं कह रहा हूँ। मै स्वय गरे की हिन्द-सभा का मन्त्री हूँ और सेवा कार्य का महत्व समझता हूँ। अगर मै समझता कि यह सम्बन्ध आपके काम में बाधक होगा, तो कभी आग्रह न करता । मैं चाहता हूँ कि आप एक बार अहल्या से मिल लें। यों तो मैं मन से आपको अपना दामाद बना चका, पर अहल्या की अनुमति ले लेनी आवश्यक समझता हूँ। आप भी शायद यह पसन्द न करेंगे कि मैं इस विषय में स्वेच्छा से काम लूँ। आप शरमायें नहीं, यों समझ लीजिए कि आप मेरे दामाद हो चुके; केवल मेरे साथ सैर करने चल रहे है। आपको देखकर आपकी सास, साले सभी खुश होगे।
चक्रधर बडे सकटा में पड़े। सिद्धान्त-रूप से वह विवाह के विषय में स्त्रियों को पूरी स्वाधीनता देने के पान में थे; पर इस समय प्रागरे जाते हुए उन्हें बढ़ा सकोच हो रहा था । कहीं उसकी इच्छा न हुई तो ? कौन बड़ा सजीला जवान हूँ, बात चीत करने में भी तो चतुर नही, और उसके सामने तो शायद मेरा मुँह ही न खुले । यही उसने मन फीका कर लिया, तो मेरे लिए डूब मरने की जगह होगी। फिर कपड़े लते भी नहीं है, बस, यही दो कुरतों को पूँजी है । बहुत हैस-वैस के बाद बोले-पापसे सच कहता हूँ, मैं अपने को ऐसी . ऐसी सुयोग्य स्त्री के योग्य नहीं समझता।
यशोदा०-इन हीलों से मैं पापका दामन छोड़नेवाला नही हूँ। मैं आपके मनोभावों को समझ रहा हूँ। आप सकोच के कारण ऐसा कह रहे हैं; पर ग्रहल्या उन चचल लड़कियों में नहीं है, जिसके सामने जाते हुए आपको शरमाना पड़े। आप उसकी सरलता देखकर प्रसन्न होंगे। हाँ, मैं इतना कर सकता हूँ कि आपकी ख़ातिर से पहले यह कहूँ कि आप परदेशी आदमी है, यहाँ सैर करने आये हैं । स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे। मैंने समझा, सीधे आदमी है, होटल मे लुट जायँगे, साथ लेता अाया । क्यो, कैसी रहेगी?
चक्रधर ने अपनी प्रसन्नता को छिपाकर कहा- क्या यह नहीं हो सकता कि मै और किसी समय आ जाऊँ ?
यशोदा०-नहीं, मै इस काम मे विलम्ब नहीं करना चाहता। में तो उसी को लाकर दो चार दिन के लिए यहाँ ठहरा सकता हूँ, पर शायद अापक घर के लोग यह पसन्द न करेंगे।
चक्रवर ने सोचा-अगर मैने और ज्यादा टालमटोल की, तो कही यह महाशय सचमुच ही अहल्या को यहाँ न पहुंचा दें। तब तो सारा परदा ही खुल जायगा ! घर की दशा देखकर अवश्य ही उसका दिल फिर जायगा। एक तो जरा-सा घर, कहीं बैठने की जगह नही, उसपर न कोई साज, न सामान । विवाह हो जाने के बाद दूसरी बात हो जाती है। लड़की कितने ही बड़े घराने की हो, समझ लेती है, अब तो यही मेरा घर है-अच्छा हो या बुरा। दो चार दिन अपनी तक्दीर को रोकर शान्त हो जाती है । बोले-जी हाँ, यह मुनासिब नहीं मालूम होता । मैं ही चला चलूँगा।
घर में विद्या का प्रचार होने से प्रायः सभी प्राणी कुछ न कुछ उदार हो जाते है। निर्मला तो खुशी से राजी हो गयी। हाँ, मुन्शी वज्रघर को कुछ सकोच हुअा, लेकिन यह समझकर कि यह महाशय लड़के पर लट्टू हो रहे हैं, कोई अच्छी रकम दे मरेगे, उन्होंने भी कोई आपत्ति न की। अब केवल ठाकुर हरिसेवकसिह को सूचना देनी थी। चक्रधर यों तीसरे पहर पढाने जाया करते थे, पर श्रान ६ बजते-बजते ना पहुंचे।
ठाकुर साहब इस वक्त अपनी प्राणेश्वरी लौंगी से कुछ बातें कर रहे थे। मनोरमा की माता का देहान्त हो चुका था। लौंगी उस वक्त लौडी थी। उसने इतनी कुशलता से घर सँभाला कि ठाकुर साब उसपर रीझ गये और उसे गृहिणी के रिक्त स्थान पर अभिषिक्त कर दिया । नाम और गुण मे इतना प्रत्यक्ष विरोध बहुत कम होगा। लोग कहते हैं, पहले वह इतनी दुबली थी कि फूक टो तो उड़ जाय, पर गृहिणी.का पद पाते ही उसकी प्रतिमा स्थूल रूप धारण करने लगी।
क्षीण जलधारा बरसात की नदी की भाँति बढ़ने लगी और इस समय तो स्थूल प्रतिमा की विशाल मूति थी, अचल और अपार । बरसाती नदी का जल गढ़हो और.गढ़हियों में भर गया था। बस, जल ही जल दिखायी देता था। न आँखों का पता या, न नाक का, न मुँह का, सभी जगह स्थूलता व्याप्त हो रही थी, पर बाहर की.स्थूलता ने अन्दर की कोमलता को अक्षुण्ण रखा था। सरल, सदय, हँसमुख, सहन-शोल स्त्री थी, निसने सारे घर को वशीभूत कर लिया था। यह उसी की सजनता यो,.जो नौकरों को वेतन न मिलने पर भी जाने न देती थी। मनोरमा पर तो वह प्राण देती थी। ईर्ष्या, क्रोध, मत्सर उसे छू भी न गया था । वह उदार न हो, पर कृपण न यी । ठाकुर साहब कभी कभी उसपर भी बिगड़ जाते थे, मारने दौड़ते थे, दो-एक वार.मारा भी था, पर उसके माथे पर जरा भी बल न आता था । ठाकुर साहब का सिर भी दुखे, तो उसकी जान निकल जाती थी। वह उसकी स्नेहमयी सेवा ही थी, जिसने ऐसे हिंसक जीव को जकड़ रखा था।
इस वक्त दोनों प्राणियों में कोई बहस छिड़ी हुई थी। ठाकुर साहव झला भल्ला-कर बोल रहे थे, और लौंगी अपराधियों की भाँति सिर झुकाये खड़ी थी कि मनोरमा ने आकर कहा-वावूनी आये हुए हैं, आपसे कुछ कहना चाहते हैं ।
ठाकुर साहब की भौहें तन गयीं। बोले-कहना क्या चाहते होगे, रुपए मॉगने. श्राये होंगे। अच्छा, नाकर कह दो कि श्राते है, बैठिए । लौंगी-इनके रुपए दे क्यों नहीं देते ? वेचारे गरीब आदमी हैं; सकोच के मारे नहीं मांगते, कई महीने तो चढ गये ?
ठाकुर-यह भी तुम्हारी मुर्खता थी जिसकी बदौलत मुझे यह तावान देना पड़ता है। कहता था कि कोई ईसाइने रख लो, दो-चार रुपये में काम चल जायगा। तुमने कहा-नहीं, कोई लायक आदमी होना चाहिए। इनके लायक होने मे शक नहीं; पर यह तो बुरा मालूम होता है कि जब देखो रुपए के लिए सिर पर सवार । अभी कल कह दिया कि घबराइए नही, दस-पाँच दिनों मे मिल जायेंगे। तब तक फिर भूत की तरह सवार हो गये।
लौंगो-कोई ऐसी ही जरूरत या पढ़ी होगी, तभी आये होंगे । १२०) हुए न ? मैं लाये देती हूँ।
ठाकुर-हॉ, सन्दूक खोल कर लाना तो कोई कठिन काम नहो । अखर तो उने होती है, जिसे कुआँ खोदना पड़ता है।
लोगी-वही कुऑ तो उन्होने भी खोदा है । तुम्हें चार महीने तक कुछ न मिले, तो क्या हाल होगा, साचो। मुझे तो वेचारे पर दया पाती है।
कह कहकर लौंगी गयी ओर रुपये लाकर ठाकुर साहब से बोली-लो, दे आयो । सुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों।
ठाकुर-लायी भी तो रुपये, नोट न थे क्या ?
लौंगी-जैसे नोट वैसे पर क्या इसमे भी कुछ भेद है?
ठाकुर-अब तुमसे क्या कहूँ। अच्छा, रख दो, जाता हूँ। पानी तो नहीं वरस रहा है कि भींग रहे होगे।
ठाकुर साहब ने झंझलाकर रुपए उठा लिये पोर बाहर चले; लेकिन रास्ते में.क्रोध शान्त हो गया। चक्रधर के पास पहुंचे, तो विनय के देवता बने हुए थे।
चक्रधर-पापको कष्ट देने..
ठाकुर-नही-नहीं, मुझे कई कष्ट नहीं हुआ। नेने आपसे दस-पॉच दिन में देने का वादा किया था। मेरे पास रुपए न थे, पर स्त्रियों को तो आप जानते हैं;कितनी चतुर होती हैं । घर में सए निकल पाए । यह लीजिए।
चक्रधर-मै इस वक्त एक दूसरे हो काम से पाया हूँ। मुझे एक काम ते अागरे जाना है । शायद दो-तीन दिन लगेगे। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।
ठाकुर-हॉ हाँ, शौक से जाइए, मुझने पूछने की जरूरत न थी।
ठाकुर साहब अन्दर चले गये, तो मनोरमा ने पूछा-आप आगरे क्या करने ला रहे हैं?
चक्रधर-एक जरूरत से ज्ञाता हूँ।
मनोरमा-कोई बीमार है क्या ?
चक्रधर-नहीं, बीमार कोई नहीं है । मनोरमा- फिर क्या काम है, बताते क्यों नहीं ? जब तक न तलाइएगा, में जाने न दूंगी।
चक्रधर-लौटवर बता दूंगा।
मनोरमा-जी नहीं, मै यह नहीं मानती, अभी बतलाइए।
चक्रधर-एक मित्र मे मिलने जाता हूँ।
मनोरमा-आप मुस्करा रहे हैं ! में समझ गयी, नौकरी की तलाश में जाते हैं।
चक्रधर नहीं मनोरमा, यह बात नहीं है। मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।
मनोरमा-तो क्या आप हमेशा इसी तरह देहातो मे घुमा करेंगे ?
चक्रधर-विचार तो ऐसा ही है, फिर जैसी ईश्वर की इच्छा।
मनोरमा-आप रुपए कहाँ से लायेंगे? उन कामों के लिए भी तो रुपयो की जरूरत होती होगी?
चक्रधर-भिक्षा माँगूंगा । पुण्य कार्य भिक्षा हो पर चलते हैं।
मनोरमा-तो पानकल भी आप भिक्षा मांगते होंगे ?
चक्रधर–हॉ, मॉगता क्यो नहीं । न मागू, तो काम कैसे चले ।
मनोरमा-मुझसे तो अापने कभी नहीं मांगा।
चक्रधर-तुम्हारे ऊपर तो विश्वास है कि जब मॉDगा, तब दे दोगी, इसीलिए कोई विशेष काम पा पड़ने पर मॉगूगा।
मनोरमा-और जो उस वक्त मेरे पास न हुए तो।
चक्रघर- तो फिर कभी मॉगूंगा।
मनोरमा-तो श्राप मुझसे अभी माँग लीजिए, अभी मेरे पास रुपए है, दे दूंगी। फिर आप न जाने किस वक मॉग बैठे ।
यह कहकर मनोरमा अन्दर गयी और क्लवाले १२०) रुपए लाकर चक्रधर के सामने रख दिये।
चक्रधर इस वक्त तो मुझे जरूरत नहीं । फिर कभी ले लूँगा।
मनोरमा-जी नहीं, लेते जाइए। मेरे पास खर्च हो जायेंगे | एक दफे भी बाजार गयी, तो यह गायब हो जायेंगे । इसी डर के मारे मैं बाजार नहीं जाती।
चक्रधर-तुमने ठाकुर साहब से पूछ लिया है ?
मनोरमा उनसे क्यों पूछ् ? गुड़िया लाती हूँ, तो उनसे नहीं पूछती, तो फिर.इसके लिए उनसे क्यों पूछ ?
चक्रधर–तो फिर यो मै न लूँगा । यह स्थिति और ही है। यह ख्याल हो सकता है कि मेने तुमसे रुपए ठग लिये । तुम्ही सोचो, हो सकता है या नहीं।
मनोरमा–अच्छा, आप अमानत समझकर अपने पास रखे रहिए। इतने में सामने से मुश्की घोड़ों की फिटन नाती हुई दिखायी दी। घोड़ों के साजों पर गगा ममुनी काम किया हुआ था। चार सवार भाले उठाये पीछे दौड़ते चले पात थे । चक्रघर-कोई रानी मालूम होती है ।
मनोरमा-जगदीशपुर की महारानी है । जब उनके यहाँ जाती हूँ, मुझे एक.गिनी देती हैं । ये आठों गिनियाँ उन्हीं की दी हुई हैं । न जाने क्यों मुझे बहुत.मानती हैं।
चक्रधर-इनको कोठी दुर्गाकुण्ड की तरफ है न ? मैं एक दिन इनके यहाँ भिक्षा माँगने जाऊँगा।
मनोरमा-मैं जगदीशपुर की रानी होती, तो आपको बिना माँगे ही बहुत-सा धन – दे देती।
चक्रधर ने मुस्कराकर कहा-तब भूल जाती।
मनोरमा-जी नहीं, मै कभी न भूलती।
चक्रधर-अच्छा, कभी याद दिलाउँगा। इस वक्त यह रुपए अपने ही पास रहने दो।
मनोरमा – अापको इन्हे लेते सकोच क्यों होता है ? रुपए मेरे हैं, महारानी ने मुझे.दिये हैं । मै इन्हें पानी में डाल सकती हूँ, किसीको मुझे रोकने का क्या अधिकार है । आप न लेंगे तो मै सच कहती हूँ, याज ही जाकर इन्हें गगा में फेंक पाऊँगी।
चक्रधर ने धर्म-संकट में पड़कर कहा-तुम इतना अाग्रह करती हो, तो मै लिये लेता हूँ, लेकिन इसे अमानत समझगा।
मनोरमा प्रसन्न होकर बोली-हॉ, अमानत ही समझ लीजिए।
चक्रधर-तो मैं नाता हूँ । किताब देखती रहना ।
मनोरमा-अाप अगर मुझसे बिना बताये चले जायेंगे, तो मैं कुछ न पढगी।
चक्रधर-यह तो बड़ी टेढ़ी शर्त है । बतला ही हूँ। अच्छा, हँसना मत । तुम जरा भी मुस्कराई और मैं चला।
मनोरमा-में दोनों हाथों से मुंह बन्द किये लेती है।
चक्रधर ने झंपते हुए कहा- मेरे विवाह की कुछ बातचीत है | मेरी तो इच्छा नहीं है; पर एक महाशय जबरदस्ती खींचे लिये जाते हैं ।
यह कहकर चक्रधर उठ खड़े हुए। मनोरमा भी उनके साथ साथ आयो । जब वह बरामदे से नीचे उतरे, तो प्रणाम किया और तुरत अपने कमरे में लौट प्रायी। उसकी आँखे डबडवायी हुई थीं और बार-चार रुलाई अाती थी, मानो चक्रधर किसी दूर देश जा रहे हो!
५
सन्ध्या समय जब रेलगाड़ी बनारस से चली, तो यशोदानन्दन ने चक्रधर से पूछा-क्यों भैया, तुम्हारी राय में झूठ बोलना किसी दशा मे क्षम्य है, या नहीं?.
चक्रधर ने विस्मित होकर कहा-मै तो समझता हूँ, नहीं।
यशोदा-किसी भी दशा मे नहीं ? चक्रधर-मैं तो यही कहूँगा कि किसी दशा में भी नहीं, हालाँकि कुछ लोग परोपकार के लिए असत्य को क्षम्य समझते हैं ।
यशोदा०-मैं भी उन्हीं लोगों मे हूँ। मेरा ख्याल है कि पूरा वृत्तान्त सुनकर शायद आप भी मुझसे सहमत हो जायँ । मेने अहल्या के विषय में आप से झूठी बातें कही है । वह वास्तवमे मेरी लड़की नहीं है । उसके माता-पिता का हमें कुछ भी पता नहीं।
चक्रधर ने बड़ी-बड़ी आँखें करके कहा-तो फिर अापके यहाँ कैसे पायी ।
यशोदा०-विचित्र कथा है। १५ वर्ष हुए, एक बार सूर्यग्रहण लगा था । मैं उन दिनों कालेज में था। हमारी एक सेवा समिति थी। हम लोग उसी म्नान के अवसर पर यात्रियों की सेवा करने प्रयाग याये थे। तुम तो उस वक्त बहुत छोटे-मे रहे होगे । इतना बड़ा मेला फिर नही लगा । वही हमें यह लड़की एक नाली मे पड़ी
रोती मिली । । न जाने उसके माँ बाप नदी मे हव गये, या भीड़ मे कुचल गये । बहुत खोज की, पर उनका पता न लगा। विवश होकर उसे साथ लेते गये । ४५ वर्ष तक तो उसे अनाथालय मे रखा, लेकिन जब कार्यकर्तायों की पृट के कारण अनाथालय वन्द हो गया, तो अपने ही घर में उसका पालन पोषण करने लगा। जन्म से न हो,पर सरकारों से वह हमारी लडकी है। उसके कुलीन होने मे भी सन्देह नहा । उसका शील, स्वभाव और चातुर्य देखकर अच्छे-अच्छे घरों की स्त्रियाँ चकित रह जाती हैं । मै इधर एक साल से उसके लिए योग्य वर की तलाश में था। ऐसा आदमी चाहता था, जो स्थिति को जानकर उसे सहर्ष स्वीकार करे और पाकर अपने को धन्य समझे । पनों में आपके लेख देखकर और आपके सेवाकार्य को प्रशसा सुनकर मेरो धारणा हो गयी कि आप ही उसके लिए सबसे योग्य है । यह निश्चय करके आपके यहाँ पाया। मैंने आपसे सारा वृत्तान्त कह दिया । अब आपको अख्तियार है, उसे अपनायें या त्यागें । हाँ, इतना कह सकता हूँ कि ऐसा रन श्राप फिर न पायेंगे | में यह जानता हूँ कि आपके पिताजी को यह बात असह्य होगी, पर यह भी जानता हूँ कि वोरात्माएँ सत्कार्य में विरोध की परवा नही करतो और अन्त मे उस पर विजय हो पाती हैं।
चक्रधर गहरे विचार में पड़ गये । एक तरफ अहल्या का अनुपम सौन्दर्य और उज्ज्वल चरित्र था, दूसरी ओर माता पिता का विरोध और लोक-निन्दा का भय, मन मे तर्क सग्राम होने लगा यशोदानन्दन ने उन्हें असमजस में पड़े देखकर कहा-श्राप चिन्तित देख पडते हैं और चिन्ता की बात भी है, लेकिन जब आप जैसे सुश-क्षित और उदार पुरुष विरोध और भय के कारण कर्तव्य और न्याय से मुंह मोड़ें,तो फिर हमारा उद्धार हो चुका । मै अापसे सच कहता हूँ, यदि मेरे दो पुत्रों में से एक भी क्वॉरा होता और अहल्या उसे स्वीकार करती, तो मैं बढ़े हर्प स उसका विवाह उससे कर देता । अापके सामाजिक विचारो की स्वतन्त्रता का परिचय पाकर ही मने अापके ऊपर इस बालिका के उद्धार का भार रखा है और यदि आपने भी अपने कर्तव्य को न समझा, तो मैं नहीं कह सकता, उस अवला की क्या दशा होगी।
चक्रधर रूप-लावण्य की अोर मे तो ऑखें बन्द कर सकते थे; लेकिन उदार के भाव को दवाना उनके लिए असम्भव था । वह स्वतन्त्रता के उपासक थे और निर्भी-कता स्वतन्त्रता की पहली सीढी है। उनके मन ने कहा- क्या यह काम ऐसा है कि समाज हॅसे ? समाज को इसकी प्रशसा करनी चाहिए। अगर ऐसे काम के लिए कोई मेरा तिरस्कार करे, तो मैं तृण बराबर भी उसकी परवाह न करूँगा। चाहे वह मेरे माता-पिता ही हों। दृढ़ भाव से बोले-मेरी ओर से आप जरा भो शंका न करें। मैं इतना भीरु नहीं हूँ कि ऐसे कामों में समाज-निन्दा से डरूँ। माता-पिता को प्रसन्न रखना मेरा धर्म है; लेकिन कर्तव्य और न्याय की हत्या करके नहीं । कर्तव्य के सामने माता पिता की इच्छा का मूल्य नहीं है ।
यशोदानन्दन ने चक्रधर को गले लगाते हुए कहा- भैया, तुमसे ऐसी ही आशा थी।
यह कहकर यशोदानन्दन ने अपना सितार उठा लिया और बजाने लगे । चक्र-घर को कभी सितार की ध्वनि इतनी प्रिय, इतनी मधुर न लगी थी। और न चॉदनी कभी इतनी सुहृदय और विहसित | दायें-बायें चाँदनी छिटकी हुई थी और उसकी-मन्द छटा मे अहल्या रेलगाडी के साथ, अगणित रूप धारण किये दोड़तो चली जाती थी। कभी वह उछलकर आकाश जा पहुँचती थी, कभी नदियों की चन्द्र-चञ्चल तरगो मे । यशोदानन्दन को न कभी इतना उल्लास हुअा था, न चक्र घर का कभी इतना गर्व, दोनों अानन्द-कल्पना मे हवे हुए थे।
गाडी नागरे पहुंची, तो दिन निकल आया था । सुनहरा नगर हरे हरे कुजों के बीच में विश्राम कर रहा था, मानों वालक माता की गोद में सोया हो।
इस नगर को देखते ही चक्रधर को कितनी हो ऐतिहासिक घटनाएँ याद आ गयों । सारा नगर किसी उजडे हुए घर की भॉति श्री-हीन हो रहा था ।
मुशी यशोदानन्दन अभी कुलियों को पुकार रहे थे कि उनकी निगाह पुलिस के सिपाहियो पर पड़ी। चारों तरफ पहरा था। मुसाफिरों के बिस्तरे, सन्दूक खोल-खोलकर देखे जाने लगे। एक थानेदार ने यशोदानन्दन का भी असबाब देखना शुरू किया।
यशोदानन्दन ने आश्चर्य से पूछा-क्यों माहव, ग्राज यह सख्ती क्यों है ?
थानेदार-आप लोगों ने जो कॉटे बोये हैं, उन्ही का फल है। शहर में फिसाद हो गया है।
यशोदा-अभी तीन दिन पहले तो अमन का राज्य था, यह भूत कहाँ से उठ खड़ा हुया?
इतने मे समिति का एक तेवक दौड़ता हुआ या पहुँचा । यशोदानन्दन ने ग्रागे बढकर पूछा-क्यों राधामोहन, यह क्या मामला हो गयो ? अभी जिस दिन म गया हूँ, उस दिन तक तो दगे का कोई लक्षण न था।
राधा-जिस दिन श्राप गये, उसी दिन पंजाब से मौलवी दीनमुहम्मद साहब का श्रागमन हुअा। खुले मैदान मे मुसलमानों का एक बड़ा जलसा हुया । उसमें मौलाना साहब ने न जाने क्या लहर उगला कि तभी से मुसलमानो को कुरबानी की धुन सवार है। इधर हिन्दुत्रों को भी यह जिद है कि चाहे खून की नदी बह जाय, पर कुरबानी न होने पायेगी। दोनों तरफ से तैयारियाँ हो रही है, हम लोग तो समझाकर हार गये।
यशोदानन्दन ने पूछा-ख्वाना महमूद कुछ न बोले ।
राधा-वही तो उस जलसे के प्रधान थे।
यशोदानन्दन आँखें फाड़कर बोले-ख्वाजा महमूद !
राधा~जी हॉ, ख्वाना महमूद | आप उन्हें फरिश्ता समझे, असल में वे रेंगे सियार हैं। हम लोग हमेशा से कहते पाते हैं कि इनसे होशियार र हए, लेकिन आपको न जाने क्यों उन पर इतना विश्वास था ।
यशोदानन्दन ने श्रात्म ग्लानि से पीड़ित होकर कहा-जिस आदमी को श्राज २५ बरसों से देखता अाता हूँ, जिसके साथ कालेज में पढा, जो इसी समिति का किसी जमाने में मेम्बर था, उसपर क्योंकर विश्वास न करता। दुनिया कुछ कहे, पर मुझे ख्वाजा महमूद पर कभी शक न होगा।
राधा-आपको अख्तियार है कि उन्हें देवता समझे, मगर अभी अभी आप देखेंगे कि वह कितनी मुस्तैदी से कुरबानी की तैयारियों कर रहे हैं। उन्होने देहातों से लठैत बुलाये हैं, उन्हीं ने गौएँ मोल ली हैं और उन्हीं के द्वार पर कुरबानी होने जा रही है।
यशादा०– ख्वाना महमूद के द्वार पर कुरबानी होगी। उनके द्वार पर इसके पहले या तो मेरी कुरबानी हो जायगी, या ख्वाजा महमूद की। तॉगेवाले को बुलाओ।
राधा-बहुत अच्छा हो यदि आप इस समय यही ठहर जायें ।
यशादा०-वाह-वाह ! शहर में आग लगी हुई है और तुम कहते हो, मैं यहीं रह जाऊँ । जो औरो पर बीतेगी वही मुझपर भी बीतेगी, इससे क्या भागना । तुम लोगों ने बड़ी भूल की कि मुझे पहले से सूचना न दी ।
राधा-कल दोपहर तक तो हमें खुद हो न मालूम था कि क्या गुल खिल रहा है। ख्वाजा साहब के पास गये तो उन्होंने विश्वास दिलाया कि कुरबानी न होने पायेगी, आप लोग इत्मीनान रखें । हमसे तो यह कहा, उधर शाम ही को लठैत श्रा पहुँचे और मुसलमानों का डेपुटेशन सिटी मैजिस्ट्रेट के पास कुरबानी की सूचना देने पहुँच गया ।
यशादा.-महमूद भी डेपुटेशन में थे ? राधा-~वही तो उसके कर्ता-धर्ता थे, भला वही क्यों न होते ? हमारा तो विचार है कि वही इस फिसाद की जड़ हैं।
यशोदा–अगर महमूद मे सचमुच यह काया पलट हो गयी है, तो मैं यही कहूँगा कि धर्म से ज्यादा द्वेष पैदा करनेवालो वस्तु ससार में नहीं। और कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो महमूद में द्वेष के भाव पैदा कर सके । चलो, पहले उन्हीं से बातें होगी। मेरे द्वार पर तो इस वक्त बड़ा जमाव होगा।
राधा-जी हॉ, इधर आपके द्वार पर जमाव है, उधर ख्वाजा साहब के ! बीच मे थोडी-सी जगह खाली है। ' तीनों श्रादमी तांगे पर बैठकर चले | सड़कों पर पुलिस के जवान चक्कर लगा रहे थे । मुसाफिरों की छड़ियाँ छीन ली जाती थी। दो-चार आदमी भी साथ न खड़े होने पाते थे। सिपाही तुरन्त ललकारता था। दुकानें सब बन्द थीं, कुंजड़े भी साग वेचते न नजर आते थे । हॉ, गलियों में लोग जमा हो-होकर बातें कर रहे थे।
कुछ दूर तक तीनो श्रादमी मोन धारण किये बैठे रहे। चक्रधर शक्ति होकर इधर उधर ताक रहे थे। जरा भी घोड़ा रुक जाता, तो उनका दिल धड़कने लगता कि किसी ने तॉगा रोक तो नहीं लिया, लेकिन यशोदानन्दन के मुख पर ग्लानि का गहरा चिन्ह दिखायी दे रहा था। उनके मुहल्ले में आज तक कभी कुरबानी न हुई थी। हिंदू और मुसलमान का भेद ही न मालूम होता था। उन्हें आश्चर्य होता था कि और शहरों में कैसे हिन्द-मुसलमानों में झगडे हो जाते हैं। और तीन ही दिन मे यह नौबत आ गयी।
सहसा उन्होंने उत्तेजित होकर कहा-राधामोहन, देखो, मै तो यहीं उतरा जाता हूँ ! जरा महमूद से मिलूंगा। तुम इन वावू साहब को लेकर घर जाओ । श्राप मेरे एक मित्र के लड़के हैं, यहाँ सैर करने आये हैं। बैठक में आपकी चारपाई डलवा देना और देखो, अगर देवसयोग से मैं लौटकर न आ सकूँ, तो घबराने की बात नहीं । जब लोग खून खच्चर करने पर तुले हुए हैं, तो सब कुछ सम्भव है और में उन अाद-मियों में नहीं हूं कि गौ को हत्या होते देखू और शान्त खड़ा रहूँ। अगर मै लाटकर न पा सक, तो तुम घर में हला देना कि अहल्या का पाणि ग्रहण आप ही के साथ, कर दिया जाय।
यह कहकर उन्होंने कोचवान से ताँगा रोकने को कहा।
चक्रधर में भी आपके साथ ही रहना चाहता हूँ।
यशोदा-नही भैया, तुम मेरे मेहमान हो, तुम्हें मेरे साथ रहने की जरूरत नहीं। तुम चलो, में भी अभी पाता हूँ।
चक्रधर-क्या पार समझते है कि गौ रक्षा आप ही का धर्म है, मेरा धर्म नहीं ?
यशोदा-नहीं, यह बात नहीं वेटा । तुम मेरे मेहमान हो और तुम्हारी रक्षा करना मेरा धर्म है। इस वक्त ताँगा धीरे-धीरे ख्वाजा महमूद के मकान के सामने या पहुँचा। हजारों आदमियों का जमाव था। यद्यपि किसी के हाथ में लाठी या डण्डे न थे, पर उनके मुख जिहाद के जोश से तमतमाये हुए थे। यशोदानन्दन को देखते ही कई आदमी उनकी तरफ लपके, लेकिन जब उन्होंने जोर से कहा— तुमसे लड़ने नहीं आया हूँ। कहाँ हैं ख्वाजा महमूद? मुमकिन हो तो जरा उन्हें बुला लो, तो लोग हट गये?
जरा देर में एक लम्बा सा आदमी, गाढे़ को अचकन पहने, आकर खड़ा हो गया। भरा हुआ बदन था, लम्बी दाढ़ी, जिसके कुछ बाल खिचड़ी हो गये थे और गोरा रंग। मुख से शिष्टता झलक रही थी। यही ख्वाजा महमूद थे।
यशोदानन्दन ने त्योरियाँ बदलकर कहा—क्यों ख्वाजा साहब, आपको याद है, इस मुहल्ले में कभी कुरबानी हुई है?
महमूद—जी नहीं, जहाँ तक मेरा ख्याल है, यहाँ कभी कुरबानी नहीं हुई।
यशोदा॰—तो फिर आज आप यहाँ कुरबानी करने की नयी रम्म क्यों निकाल रहे हैं?
महमूद—इसलिए कि कुरबानी करना हमारा हक है। अब तक हम आपके जजबात का लिहाज करते थे, अपने माने हुए हक को भूल गये थे, लेकिन जब आप लोग अपने हकों के सामने हमारे जजबात की परवा नहीं करते, तो कोई वजह नहीं कि हम अपने हकों के सामने आपके जजबात की परवा करें। मुसलमानों को शुद्धि करने का आप को पूरा हक हासिल है, लेकिन कम-से कम पाँच सौ बरसों मे आपके यहाँ शुद्धि की कोई मिसाल नहीं मिलती। आप लोगों ने एक मुर्दा हक को जिन्दा किया है। इसीलिए न, कि मुसलमानों की ताकत और असर कम हो जाय। जब आप हमें जेर करने के लिए नये नये हथियार निकाल रहे हैं, तो हमारे लिए इसके सिवा और क्या चारा है कि अपने हथियारों को दूनी ताकत से चलायें।
यशोदा॰—इसके यह मानी है कि कल आप हमारे द्वारों पर, हमारे मन्दिरों के सामने, कुरबानी करें और हम चुपचाप देखा करें। आप यहाँ हरगिज कुरबानी नहीं कर सकते और करेंगे, तो इसकी जिम्मेदारी आपके सिर होगी।
यह कहकर यशोदानन्दन फिर ताँगे पर बैठे। दस-पाँच आदमियों ने ताँगे को रोकना चाहा, पर कोचवान ने घोड़ा तेज कर दिया। दम के दम ताँगा उड़ता हुया यशोदानन्दन के द्वार पर पहुँच गया, जहाँ हजारो आदमी खड़े थे। इन्हें देखते हो चारों तरफ हलचल मच गयी। लोगों ने चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। अभी तक फोज का अफसर न था, फौज दुविधे में पड़ी हुई थी, समझ में न आता था कि क्या करें। सेनापति के आते ही सिपाहियों में जान-सी पड़ गयी, जैसे सूखे धान मे पानी पड़ जाय।
यशोदानन्दन ताँगे से उतर पड़े और ललकारकर बोले—क्यों भाइयो, क्या विचार है? यहाँ कुरबानी होगी? आप जानते हैं, इस मुहल्ले में आज तक कभी कुर वानी नहीं हुई । अगर आज हम यहाँ कुरबानी करने देंगे, तो कौन कह सकता है कि कल को हमारे मन्दिर के सामने गौ-हत्या न होगी!
कई आवाजें एक साथ आयी- हम मर मिटेंगे, पर यहाँ कुरबानी न होने देंगे।
यशोदा– खूब सोच लो, क्या करने जा रहे हो। वह लोग सब तरह से लैस.हैं । ऐसा न हो कि तुम लाठियो के पहले ही वार में वहाँ से भाग खडे हो ?
कई आवाजें एक साथ न्यायी-भाइयो, सुन लो; अगर कोई पीछे कदम हटायेगा,तो उसे गौ-हत्या का पाप लगेगा।
एक सिक्ख जवान-अजी देखिए, छक्के छुड़ा देगे।
एक पजाबी हिन्दू-एक एक को गरदन तोड के रख दूंगा।
आदमियों को यों उत्तेजित करके यशोदानन्दन आगे बढे और जनता 'महावीर'और 'श्रीरामचन्द्र' की जय ध्वनि से वायुमण्डल को कम्पायमान करती हुई उनके पीछे चली। उधर मुसलमानो ने भी डण्डे सँभाले । करीब था कि दोनों दलो मे मुठभेड़ हो जाय कि एकाएक चक्रधर आगे बढ़कर यशोदानन्दन के सामने खड़े हो गये और विनीत, किन्तु दृढ़ भाव से बोले-आप अगर उधर जाते हैं, तो मेरी छाती पर पाँव रखकर जाइए । मेरे देखते यह अनर्थ न होने पायेगा ।
यशोदानन्दन ने चिढ़कर कहा हट जानो। अगर एक क्षण की भी देर हुई, तो फिर पछताने के सिवा और कुछ हाथ न आयेगा।
चक्रधर-पाप लोग वहाँ जाकर करेंगे क्या ?
यशोदा० — हम इन जालिमों से गौ को छीन लेंगे।
चक्रधर-अहिसा का नियम गौत्री ही के लिए नहीं, मनुष्यों के लिए भी तो है ।
यशोदा-कैसी बातें करते हो, जी! क्या यहाँ खडे होकर अपनी ऑखो से गो की हत्या होते देखें?
चक्रधर-अगर आप एक बार दिल थामकर देख लेंगे, तो यकीन है कि फिर.आपको कभी यह दृश्य न देखना पडे । ।
यशोदा-हम इतने उदार नहीं है ।
चक्रधर-ऐसे अवसर पर भी ?
थशोदा०-हम महान्-से-महान् उद्देश्य के लिए भी यह मूल्य नहीं दे सकते । इन दामों स्वर्ग भी महँगा है।
चक्रधर-मित्रो, जरा विचार से काम लो।
कई अावाजे-विचार से काम लेना कायरों का काम है।
एक सिक्ख जवान-जब डण्डे से काम लेने का मौका पाए, तो विचार को बन्द करके रख देना चाहिए।
चक्रधर-तो फिर जाइए; लेकिन उस गौ को बचाने के लिए आप को अपने एक -भाई का खून करना पड़ेगा। सहसा एक पत्थर किसी तरफ से आकर चक्रवर के सिर मे लगा। खून की धारा बह निकली, लेकिन चक्रधर अपनी जगह से हिले नहीं । सिर थामकर बोले-अगर मेरे रक्त से आपकी क्रोधाग्नि शान्त होती हो, तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। अगर मेरा खून और कई जानों की रक्षा कर सके, तो इससे उत्तम कौन सी मृत्यु होगी।
फिर दूसरा पत्थर श्राया, पर अव को चक्रधर को चोट न लगी। पत्थर कानों के पास से निकल गया ।
यशोदानन्दन गरजकर बोले- यह कौन पत्थर फेंक रहा है ? सामने क्यों नहीं याता? क्या वह समझता है कि उसी ने गो रक्षा का ठीका ले लिया है ? अगर वह बड़ा वीर है तो क्यों नहीं चन्द कटम प्रागे श्राफर अपनी वीरता दिखाता ? पीछे खड़ा पत्थर क्यों फेकता है ?
एक अावाज-धर्म-द्रोहियों को मारना अधर्म नहीं है ?
JIM – Assistente
Jim IA: pode errar. Não digite dados pessoais. Suas mensagens são processadas por um serviço externo.
Deixe um comentário