कायाकल्प

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कायाकल्प

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यशोदानन्दन-जिसे तुम धर्म का द्रोही समझते हो, वह तुमसे कहीं सञ्चा हिन्दू है।

एक अावाज-सच्चे हिन्दू वही तो होते हैं, जो मोके पर बगले झॉकने लगे और शहर छोडकर दो चार दिन के लिए खिसक जायें ।

कई यादमी-~यह कौन मन्त्री पर आक्षेप कर रहा है.? कोई उसकी जमान पकड़ कर क्यों नहीं खींच लेता ?

यशोदानन्दन-श्राप लोग सुन रहे हैं, मुझपर जैसे-कैसे टोप लगाये जा रहे हैं । मैं सच्चा हिन्दू नही हूँ, मैं मौका पड़ने पर बगले झाँकता हूँ और जान बचाने के लिए शहर से भाग जाता हूँ। ऐसा अादमी अापका मन्त्री बनने के योग्य नहीं है | आप उस श्रादमी को अपना मन्त्री बनायें, जिसे आप सच्चा हिन्दू समझते हों। मैं धर्म से पहले अपने यात्म गौरव की रक्षा करना चाहता हूँ।

कई प्रादमी-महाशय, श्रापको ऐसे मुँहफट आदमियों की बात का खयाल न करना चाहिए।

यशोदा०—यह मेरी पचीस बरसों की सेवा का उपहार है । जिस सेवा का फल अपमान हो, उसे दूर हो से मेरा सलाम है ।

यह कहते हुए मुशी यशोदानन्दन घर की तरफ चले । कई आदमियों ने उन्हें रोकना चाहा, कई श्रादमी उनके पैरो पडने लगे, लेकिन उन्होंने एक न मानी। वह तेजस्वी आदमी थे। अपनी सस्था पर स्वेच्छाचारी राजाओं की भॉति शासन करना चाहते थे ।अालोचनायों को सहन करने की उनमे सामर्थ्य ही न थी।

उनके जाते ही यहाँ आपस में 'तू तू, मैं-मैं होने लगी। एक दूसरे पर आक्षेप करने लगा। गालियों की नौवत आयी, यहाँ तक कि दो चार श्रादमियों से हाथा-पाई मी हो गयी। चक्रधर ने जब देखा कि इधर से अब कोई शंका नहीं है, तो वह लपककर मुसल मानों के सामने आ पहुंचे और उच्च स्वर से बोले-हजरात, मै कुछ अर्ज करने की इजाजत चाहता हूँ।

एक आदमी-सुनो, सुनो, यही तो अभी हिन्दुओं के सामने खडा था।

दूसरा अादमी-दुश्मनों के कदम उखड़ गये । सब भागे जा रहे हैं ।

तीसरा आदमी-इसी ने शायद उन्हें समझा-बुझाकर हटा दिया है । देखो,-क्या कहता है ?

चक्रधर-अगर इस गाय की कुरबानी करना श्राप अपना मजहबी फर्ज समझते हों, तो शोक से कीजिए । मैं श्रापके मजहबी मामले में दखल नहीं दे रहा हूँ। लेकिन क्या यह लाजमी है कि इसो जगह कुरबानी की जाय ।

एक आदमी-हमारी खुशी है; जहाँ चाहेगे, कुरबानी करेंगे, तुमसे मतलब ?

चक्रधर-वेशक, मुझे बोलने का कोई हक नहीं है, लेकिन इस नाम की जो इजत मेरे दिल में है, वह मुझे बोलने के लिए मजबूर कर रही है। इसलाम ने कमी दूसरे मजहबवाला को दिलजारी नहीं की। उसने हमेशा दूसरो के जजबात का एहत-राम किया है। वगद द और रूम, स्पेन और मित्र की तारीखें उस मजहबी अाजादी को शाहिद हैं, जो इसलाम ने उन्हें अता को थीं। अगर आप हिन्दू जजगत का लिहाज करके किसी दूसरी जगह कुरबानी करें, तो यकीनन इसलाम के वकार मे फर्क न पायेगा!

एक मौलवी ने जोर देकर कहा-रेमी मीठा-मीठी बातें हमने बहुत सुनी हैं । कुरबानो यहीं होगी। जब दूसरे हमारे कार जन करते हैं, तो हम उनके जजबात का क्यो लिहाज करें?

ख्वाजा महसूद बड़े गौर से चक्रधर की बाते सुन रहे थे। मोलवी साहब की उद्दण्डता पर चिढ़कर बोले- क्या शरीयत का हुक्म है कि कुरबानी यही हो ? किसी दूसरी जगह नहीं की जा सकती ?

मौलवी साहब ने ख्वाना महमूद को तरफ अविश्वास की दृष्टि से देखकर कहा-मजहब के मामले में उलमा के सिवा पार किसी को दखल देने का मजाज नही है।

ख्याजाचुरा न मानिएगा, मोलवी साहब ! अगर दस सिपाही याकर यहाँ खड़े हो जॉय, तो चग ले झॉकने लगिएगा!

मौलवी-किसीकी मजाल है कि हमारे दीनी उभूर में मजाहमत करे।

खाजा-आपको तो अपने हलवे मांडे से काम है, जिम्मेदारो तो हमारे ऊपर आयेगो, दुकाने तो हमारी लुटेगी, श्रापके पास फटे बोरिये और फूटे बधने के सिवा ओर क्या रखा है। जब वे लोग मसलहत देखकर किनारा कर गये, ता हमे भी अपनी जिद से बाज अा जाना चाहिए। क्या आप समझते है, वे लोग यारले डर- कर भागे? हमारे दुगुने अादमी थे । अगर चढ़ पाते, तो संभलना मुश्किल हो जाता। मौलवी-जनाव, जिहाद करना कोई खालाजी का घर नहीं । श्राप दुनिया के वन्दे हैं, दीन हकीकत क्या समझे ?

ख्वाग-बना है, आपकी शहादत तो कही नहीं गयी है । जिल्लत तो हमारी है ।। मौलवी-भाइयो, आप लोग ख्वाजा साहब की ज्यादती देख रहे हैं । श्राप ही फैसला कीजिए कि दीन मामलात मे उलमा का फैसला वाजिब है, या उमरा का एक मोटेताजे दटियल श्रादमी ने कहा- आप विस्मिल्लाह कीजिए । उमरा को.दीन से कोई सरोकार नहीं।

यह सुनते ही एक श्रादमी बड़ा सा छुरा लेकर निकल पड़ा और कई यादमी गाय की सींगें पकड़ने लगे। गाय अब तक तो चुपचाप खड़ी थी। छुरा देखते ही वह छटपटाने लगी। चक्रघर यह दृश्य देखकर तिलमिला उठे। निराशा और क्रोध से काँपते हुए बोले भाइयो, एक गरीब, वेकस जानवर को मारना बहादुरी नहीं। खुदा वेकसों के खून से नहीं खुश होता। अगर नवॉमर्दी दिखानी है तो क्सिी शेर का शिक्षार करो, किसी चीते को मारो, किसी जगली सुअर का पीछा करो। उसकी कुरबानी से, मुमकिन है, खुदा खुश हो । जब तक हिन्दू सामने खड़े थे, किसी को हिम्मत न पड़ी कि छुरा हाथ में लेता। नव वे चले गये, तो आप लोग शेर हो गये ?

एक आदमी-तो क्यों चले गये ? मैदान में खड़े क्यो न रहे ? गौ-रक्षा का जोश दिखाते । दुम दबाकर भाग क्यों खड़े हुए ?

चक्रधर-भाग नही खड़े हुए और न लड़ने मे वे आपसे कम ही है। उनकी समझ में यह बात आ गयी कि जानवर की हिमायत में इन्सान का खून बहाना इन्सान को मुनासिब नहीं।

मौलवी-शुक्र है, उन्हें इतनी समझ तो अायी !

चक्रधर-लेकिन आप तो अभी तक उनकी दिलनारी पर कमर बाँधे हुए है। खैर, श्रापको अख्तियार है, जो चाहें, करें। मगर मै यकीन के साथ कहता हूँ कि यह दिलजारी एक दिन रग लायेगी। यह न समझिए कि इस वक्त कोई हिन्दू मैदान में नहीं है । हर एक कुरबानी हिन्दुस्तान के २१ करोड़ हिन्दुओं के दिलों मे जख्म कर देती है, और इतनी बड़ी तादाद के दिलों को दुखाना बड़ी से बड़ी कौम के लिए भी एक दिन पछतावे का वाइस हो सक्ता है। अगर आपकी गिना है, तो शोक से खाइए । लाखों गौएँ रोज करल होती है, हिन्दू सिर नहीं उठाते । फिर यह क्योंकर मुमकिन है कि वह आपके मजहबी मामले में दखल दें ? हिन्दुओ से ज्यादा वेतअस्सुव कौम दुनिया में नहीं है, लेकिन जव श्राप उनकी दिलजारी और महन दिलजारी के लिए कुरबानी करते हैं, तो उनको जरूर सदमा होता है । और उनके दिलों में जो शोला उठता है, उसका श्राप कयास नहीं कर सकते। अगर श्रापको यकीन न आये,तो देख लीनिये कि इस गाय के साथ ही एक हिन्दू कितनी खुशी से अपनी जान दे देता है! यह कहते हुए चक्रधर ने तेजी से लपककर गाय की गरदन पकड़ ली और बोले-आज आपको इस गौ के साथ एक इन्सान की भी कुरबानी करनी पड़ेगी।

सभी आदमी चकित हो-होकर चक्रधर की ओर ताकने लगे। मौलवी साहब ने क्रोध से उन्मत्त होकर कहा-कलाम-पाक की कसम, हट जाओ, वरना गजब हो जायगा।

चक्रधर-हो जाने दीजिए। खुदा की यही मरजी है कि आज गाय के साथ मेरी भी कुरबानी हो।

ख्वाजा महमूद-क्यो भई, तुम्हारा घर कहाँ है?

चक्रधर-परदेशी मुसाफिर हूँ।

ख्वाजा-कसम, खुदा की, तुम जैसा दिलेर आदमी नहीं देखा। नाम के लिए तो गाय को माता कहनेवाले बहुत हैं; पर ऐसे बिरले ही देखे, जो गौ के पीछे जान लड़ा दें। तुम कलमा क्यों नही पढ़ लेते?

चक्रधर-मै एक खुदा का कायल हूँ। वही सारे जहान का खालिक और मालिक है। फिर और किस पर ईमान लाऊँ?

ख्वाजा-वल्लाह, तब तो तुम सच्चे मुसलमानो हो। हमारे हजरत को अल्लाह ताला का रसूल मानते हो?

चक्रघर-बेशक मानता हूँ, उनकी इज्जत करता हूँ और उनकी तौहीद का कायल

ख़्वाजा-हमारे साथ खाने-पीने से परहेज तो नही करते?

चक्रधर-जरूर करता हूँ, उसी तरह, जैसे किसी ब्राह्मण के साथ खाने से परहेज करता हूँ, अगर वह पाक-साफ न हो।

ख्वाजा-काश, तुम-जैसे समझदार तुम्हारे और भाई भी होते। मगर यहाँ तो लोग हमे मलिच्छ कहते हैं। यहाँ तक कि हमे कुत्तों से भी नजिस समझते हैं। उनकी थालियों में कुत्ते खाते हैं। पर मुसलमान उनके गिलास में पानी नहीं पी सकता। वल्लाह, आपसे मिलकर दिल खुश हो गया। अब कुछ कुछ उम्मीद हो रही है कि शायद दोनों कौमो में इत्तफाक हो जाय। अब आप जाइए। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि कुरवानी न होगी।

चक्रधर-और साहबों से तो पूछिए।

कई आवाजें-होती तो जरूर, लेकिन अब न होगी। आप वाकई दिलेर आदमी हैं।

ख्वाजा-यहाँ आप कहाँ ठहरे हुए हैं? मै आपसे मिलूँगा।

चक्रधर-बाप क्यों तकलीफ उठायेंगे, मैं खुद हाजिर हूँगा।

ख्वाजा महमूद ने चक्रधर को गले लगाकर रुखसत किया। इधर उसी वक्त गाय

की पगहिया खोल दी गयी। वह जान लेकर भागी। और लोग भी इस 'नौजवान' की 'हिम्मत' और 'जवाँमर्दी' को नारीफ करते हुए चले।

चक्रधर को आते देखकर यशोदानन्दन अपने कमरे से निकल पाये यार उन्हें छाती से लगाते हुए बोले-भैया, आज तुम्हारा धैर्य और साहस देसकर मैं दंग रह गया। तुम्हें देखकर मुझे अपने ऊपर लज्जा या रही है। तुमने आज हमारी लाज रख ली। अगर यहाँ कुरबानी हो जाती, तो हम मुँह दिखाने लायक भी न रहते।

एक बूदा–आज तुमने वह काम कर दिखाया, जो सैकड़ो आदमियों के रक्त पात से भी न होता।

चक्रधर-मैंने कुछ भी नहीं किया। यह उन लोगा की शराफत थी कि उन्होंने मेरी अनुनय-विनय सुन ली।

यशोदा०–अरे भाई, रोने का भी तो दृग होता है। अनुनय विनय हमने भी सैकड़ा ही बार की, लेकिन हर दफे गुत्थी और उलझतो हो गयी। आइए, आपके घाव को मरहम-पट्टी तो हो जाय!

चक्रधर को कमरे में बिठाकर यशोदानन्दन ने घर में जाकर अपनी स्त्री वागीश्वरी से कहा – आज मेरे एक दोस्त की दावत करनी होगी। भोजन खूब दिल लगाकर बनाना। अहल्या, आज तुम्हारी पाक परीक्षा होगी।

अहल्या-वह कौन आदमी था दादा, जिसने मुसलमानो के हाथों से गौ की रक्षा को?

यशोदा०–वही तो मेरे दोस्त हैं, जिनकी दावत करने को कह रहा हूँ। बेचारे रास्ते में मिल गये। यहाँ सैर करने आये है। मसूरी जायेंगे।

अहल्या-वागीश्वरी से) अम्माँ, जरा उन्हें अन्दर बुला लेना, तो दर्शन करेंगे। दादा, मैं कोठे पर बैठी सब तमाशा देख रही थी। जब हिन्दुओं ने उनपर पत्थर फेकना शुरू किया, तो ऐसा क्रोध आता था कि वहीं से फटकारूँ। बेचारे के सिर से खून निकलने लगा, लेकिन वह जरा भी न बोले। जब वह मुसलमानों के सामने आकर खड़े हुए, तो मेरा कलेजा धड़कने लगा कि कहीं सब के सब उनपर टूट न पड़े। बड़े ही साहसी आदमी मालूम होते हैं? सिर में चोट आयी है क्या?

यशोदा०-हाँ, खून जम गया है, लेकिन उन्हें उसकी कुछ परवा ही नहीं। डॉक्टर को बुला रहा हूँ।

वागीश्वरी-खा पी चुकें, तो जरा देर के लिए यहीं भेज देना। मेरे लडकों की जोड़ी तो हैं?

यशोदा०-अच्छी बात है। जरा सफाई कर लेना।

पड़ोस में एक डॉक्टर रहते थे। यशोनन्दन ने उन्हें बुलाकर घाव पर पट्टी वधवा दी। फिर देर तक बातें होती रहीं। धीरे-धीरे सारा मुहल्ला जमा हो गया। कई श्रद्धालु-जनों ने तो चक्रधर के चरण छुए। आखिर भोजन का समय पाया।

जब लोग खाने बैठे, तो यशोदानन्दन ने कहा- भाई, बाबूजी से जो कुछ कहना हो, कह लो; फिर मुझसे शिकायत न करना कि तुम उन्हें नहीं लाये। बाबूजी, इस घर की तथा मुहल्ले की कई स्त्रियों की इच्छा है कि आपके दर्शन करें। आपको कोई आपत्ति तो नहीं है?

वागीश्वरी-हाँ बेटा, जरा देर के लिए चले आना; नहीं तो अपने घर जाके कहोगे न कि मैंने जिन लोगों के लिए जान लड़ा दी, उन्होंने बात भी न पूछी।

चक्रधर ने शरमाते हुए कहा-आप लोगों ने मेरी जो खातिर की है, वह कभी नहीं भूल सकता। उसके लिए मैं सदैव आपका एहसान मानता रहूंगा।

ज्योही लोग चौके से उठे, अहल्या ने कमरे की सफाई करनी शुरू की। दीवार की तस्वीरे साफ की, फर्श फिर से झाड़कर विछाया, एक छोटी सी मेज पर फूलो का गिलास रख दिया, एक कोने में अगरबत्ती जलाकर रख दी। पान बनाकर तश्तरी में रखे। इन कामों से फुरसत पाकर उसने एकान्त मे बैट कर फूलों को एक माला गॅयनी शुरू की। मन में सोचती थी कि न जाने कौन हैं, स्वभाव कितना सरल है। लजाने मे तो औरतो से भी बढे हुए हैं। खाना खा चुके, पर सिर न उठाया। देखने मे ब्राह्मण मालूम होते हैं। चेहरा देखकर तो कोई नहीं कह सकता कि यह इतने साहसी होंगे।

सहसा वागीश्वरी ने आकर कहा- बेटी, दोनों आदमी आ रहे हैं। साड़ी तो बदल लो।

अहल्या 'ऊँह' करके रह गयी। हॉ, उसकी छाती में धड़कन होने लगी। एक क्षण में यशोदानन्दनजी चक्रधर को लिये हुए कमरे में आये। वागीश्वरी और अहल्या दोनो खड़ी हो गयीं। यशोदानन्दन ने चक्रधर को कालीन पर बैठा दिया और खुद बाहर चले गये। वागीश्वरी पखा झलने लगी; लेकिन अहल्या मूर्ति को भॉति खड़ी रही।

चक्रधर ने उढ़ती हुई निगाहा से अहल्या को देखा। ऐसा मालूम हुआ, माना कोमल, लिग्ध एवं सुगन्धमय प्रकाश की लहर सी आँखों मे समा गयी।

वागीश्वरी ने मिठाई की तश्तरी सामने रखते हुए कहा-कुछ जलपान कर लो भैया, तुमने कुछ खाना भी तो नहीं खाया। तुम जैसे वीरो को सवा सेर से कम न खाना चाहिए। धन्य है वह माता, जिसने ऐसे बालक को जन्म दिया! अहल्या, जरा गिलास में पानी तो ला। भैा, जब तुम मुसलमानों के सामने अकेले खड़े थे तो यह ईश्वर से तुम्हारी कुशल मना रही थी। जाने कितनी मनौतियाँ कर डालीं। कहाँ है वह माला, जो तूने गयी थी? अब पहनाती क्या नहीं?

अहल्या ने लजाते हुए कॉपते हाथों से बोला चक्रधर के गले में माला डाल दी, और आहिस्ता से बोली- क्या सिर ज्यादा चोट ती?

चक्रधर–नहीं तो; बाबूजी ने ख्वाहमख्वाह पट्टी बॅधवा दी। । वागीश्वरी–जब तुम्हें चोट लगी है, तब इसे इतना क्रोध याया था कि उस यादमी को पा जाती, तो मुँह नोच लेती। क्या काम करते हो, बेटा?

चक्रधर–अभी तो कुछ नहीं करता, पड़े-पड़े खाया करता हूँ, मगर जल्द ही कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। धन से तो मुझे बहुत प्रेम नहीं है और मिल भी जाय, तो मुझे उसको भोगने के लिए दूसरों की मदद लेना पड़े। हॉ, इतना अवश्य चाहता हूँ कि किसी का आश्रित होकर न रहना पड़े।

वागीश्वरी–कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलती क्या?

चक्रधर-नौकरी करने को तो मेरी इच्छा ही नहीं है। मैने पक्का निश्चय कर लिया है कि नौकरी न करूँगा। न मुझे खाने का शौक है, न पहनने का, न ठाट बाट का, मेरा निर्वाह बहुत थोड़े मे हो सकता है।

वागीश्वरी–और जब विवाह हो जायगा, तब क्या करोगे।

चक्रधर—उस उक्त सिर पर जो आयेगी, देखी जायगी। अभी से क्यों उसको चिन्ता करूँ?

वागीश्वरी-जल-पान तो कर लो, या मिठाई भी नहीं खाते?

चक्रधर मिठाइयाँ खाने लगे। इतने में महरी ने पाकर कहा- बड़ी बहूजी, मेरे लाला को रात से खाँसी आ रही है, तिल-भर भी नही रुकनी, कोई दवाई दे दो।

वागीश्वरी दवा देने चली गयी। अहल्या अकेली रह गयी तो चक्र वर ने उसकी ओर देखकर कहा-आपको मेरे कारण बड़ा कष्ट हुआ। मै तो इस उपहार के योग्य न था।

अहल्या-वह उपहार नहीं, भक्त की भेंट है।

चक्रधर–मेरा परम सौभाग्य है कि बैठे बैठाये इस पद को पहुँच गया।

अहल्या–आपने आज इस शहर के हिन्दू मात्र की लाज रख ली। क्या और पानी हूँ?

चक्रधर-तृप्त हो गया। आज मालूम हुआ कि जल में कितना स्वाद है। शायद अमृत मे भी यह स्वाद न होगा।

वागीश्वरी ने आकर मुस्कराते हुए कहा–भैया, तुमने तो आधी भी मिठाइयाँ नहीं खायीं। क्या उसे देखकर भूख-प्यास बन्द हो गयी? यह मोहनी है, जरा इससे सचेत रहना।

अहल्या–अम्मॉ, तुम छोटे बड़े किसी का लिहाज नहीं करतीं!

वागीश्वरी-अच्छा, बताओ, तुमने इनकी रक्षा के लिए कौन कौन सी मनौतियाँ की थी?

अहल्या-मुझे आप दिक करेंगी, तो चली जाऊँगी।

चक्रघर यहाँ कोई घण्टे भर तक बैठे रहे। वागीश्वरी ने उनके घर का सारा वृत्तात पूछा-कै भाई हैं, कै बहिन हैं, पितानी क्या करते हैं, बहनो का विवाह हुआ है या

नहीं? चक्रधर को उसके व्यवहार में इतना मातृ-स्नेह भरा मालूम होता था, मानों उससे उनका पुराना परिचय है! चार बजते-बजते ख्वाजा महमूद के आने की खबर पाकर चक्रधर बाहर चले आये। और भी कितने ही आदमी मिलने आये थे। शाम तक उन लोगों से बातें होती रहीं। निश्चय हुआ कि एक पचायत बनायी जाय और आपस के झगड़े उसी के द्वारा तब हुआ करें। चक्रधर को भी लोगों ने उस पंचायत का एक मेम्बर बनाया। रात को जब अहल्या और वागीश्वरी छत पर लेटी, तो वागीश्वरी ने पूछा–अहल्या, सो गयी क्या?

अहल्या-नहीं अम्मा, जाग तो रही हूँ।

वागीश्वरी~हाँ, आज तुझे क्यों नींद आयेगी। इनसे व्याह करेगी?

अहल्या–अम्मा, मुझे गालियाँ दोगी, तो मैं नीचे जाकर लेटुंगी, चाहे मच्छर भले ही नोच खाये।

वागीश्वरी- अरे, तो मै कौन-सी गाली दे रही हूँ। क्या व्याह न करेगी? ऐसा अच्छा वर तुझे और कहाँ मिलेगा?

अहल्या–तुम न मानोगी, लो, मैं जाती हूँ।

वागीश्वरी-मै दिल्लगी नहीं कर रही हूँ, सचमुच पूछती हूँ। तुम्हारी इच्छा हो, तो बातचीत की जाय। अपनी ही बिरादरी के हैं। कौन जाने, राजी हो जायें।

अहल्या -सब बातें जानकर भी?

वागीश्वरी-तुम्हारे बाबूजी ने सारी कथा पहले ही सुना दी है।

अहल्या–तो कही माने न?

वागीश्वरी–टालो मत, दिल की बात साफ-साफ कह दो।

अहल्या–तुम मेरे दिल का हाल मुझसे अधिक जानती हो, फिर मुझसे क्यों पूछती हो? वागीश्वरी वह धनी नहीं, याद रखो।

अहल्या–मै धन की लोडी कभी नहीं रही।

वागीश्वरी–तो अब तुम्हें सशय में क्यो रखूँ। तुम्हारे बाबूजी तुमसे मिलाने है के लिए इन्हें काशी से लाये हैं। इनके पेस और कुछ हो या न हो, हृदय अवश् है। और ऐसा हृदय, जो बहुत कम लोगो के हिस्सों में आता है। ऐसा स्वामी पाक तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।

अहल्या ने डबडबायी हुई आँखों से वागीश्वरी को देखा, पर मुंह से कुछ न बोली कृतज्ञता शब्दों में आकर शिष्टाचार का रूप धारण कर लेती है। उसका मौलिक रूप वही है, जो आँखों से बाहर निकलते हुए कॉपता और लजाता है।

६

मुशी वज्रधर उन रेल के मुसाफिरों में थे, जो पहले तो गाड़ी मे खड़े होने व जगह मांगते हैं, फिर बैठने की फिक्र करने लगते हैं और अन्त में सोने की तैयारी क

देते हैं। चक्रधर एक बड़ी रियासत के दीवान की लड़की को पढायें और वह इस स्वर्ण सयोग से लाभ न उठायें। यह क्योकर हो सकता था। दीवान साहब को सलाम करने आने जाने लगे। बातें करने में तो निगुण थे ही, दो ही चार मुलाकाता में उनका सिफा जम गया। इस परिचय ने शीघ्र ही मित्रता का रूप धारण किया। एक दिन दीवान साहब के साथ वह रानी जगदीशपुर के दरबार में जा पहुँचे और ऐसी लच्छेदार बातें की, अपनी तहसीलदारी की ऐसी जीट उड़ायी कि रानीजी मुग्ध हो गयी। कोई क्या तहसीलदारी करेगा। जिस इलाके मे मै था, वहाँ के यादमी अाज तक मुझे याद करते हैं । डींग नहीं मारता, डींग मारने की मेरी ग्राटत नहो, लेकिन जिम इलाके मे मुश्किल से ५० हजार वसल होता था, उसा इलाके से साल के अन्दर मैने दो लाख वमूल करके दिखा दिया और लुत्फ यह कि किसी को हिरासत में रसने या कुरकी करने की जरूरत नही पड़ी।

ऐसे कार्य कुशल यादमी की सभी जगह जरूरत रहती है। रानी ने सोचा- इस अादमी को रख लें, तो इलाके की ग्रामदनी बढ जाय । ठार साहब से सलाह की । यहाँ तो पहले ही से सारी बातें सघी बधी थी । ठाकुर साहब ने रग और भी चोखा कर दिया। उनके दोस्तों मे यही ऐसे थे, जिसपर लौगी की असीम कृपा दृष्टि थी। दूसरी ही सलामी में मुशीजी को २५) मासिक की तहसीलदारी मिल गयी। मुँह माँगी मुराद पूरी हुई । सवारी के लिए घोड़ा भी मिल गया। सोने का सुहागा हो गया ।

अब मुशीजी की पाँचों अगुली घी में थी। जहाँ महीने में एक बार भी महफिल न जमने पाती थी, वहाँ अब तीसों दिन जमघट होने लगा। इतने बडे अहलकार के लिए शराब की क्या कमी | कभी इलाके पर चुपके से दस-बीस बोतले खिचवा लेते कभी शहर के किसी कलवार पर धौस जमाकर दो चार बोतल ऐंठ लेते । बिना हरे फिटकरी रग चोखा हो जाता था। एक कहार भी नोकर रख लिया और ठाकुर साहब के घर से दो चार कुरसियाँ उठवा लाये | उनके हौसले बहुत ऊँचे न थे, केवल एक भले आदमी की भाँति जीवन व्यतीत करना चाहते थे। इस नौकरो ने उनके हौसले को बहुत-कुछ पूरा कर दिया, लेकिन यह जानते थे कि इस नौकरी का कोई ठिकाना नहीं । रईसों का मिजाज एक सा नहीं रहता। मान लिया, रानी साहब के साथ निभ ही गयी, तो कै दिन । राना साहब आते ही पुराने नौकरों को निकाल बाहर करेंगे । जब दीवान साहब ही न रहेंगे, तो मेरी क्या हस्ती। इसलिए उन्होंने पहले ही से नये राजा साहब के यहाँ आना जाना शुरू कर दिया था। इनका नाम ठाकुर विशालसिंह था । रानी साहब के चचेरे देवर होते थे। उनके दादा दो भाई थे । बड़े भाई रियासत के मालिक थे । उन्हीं के वशजों ने दो पीढियो तक राज्य का आनन्द भोगा था । अब रानी के निस्सन्तान होने के कारण विशाल सिंह के भाग्य उदय हुए थे। दो-चार गाँव जो उनके दादा को गुजारे के लिए मिले थे, उन्हीं को रेहन वय करके इन लोगों ने ५० वर्ष काट दिये थे- यहाँ तक कि विशालसिंह के पास अब इतनी भी सम्पत्ति न थी कि गुजर बसर के लिए काफी होती । उसपर कुल-मर्यादा का पालन करना आवश्यक था। वह महारानी के पट्टीदार थे और इस हैसियत का निर्वाह करने के लिए उन्हें नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ो, सभी कुछ रखना पड़ता था | अभी तक परम्परा को नकल होती चली आती थी। दशहरे के दिन उत्सव जरूर मनाया जाता, जन्माष्टमी के दिन जरूर धूमधाम होती।

प्रातःकाल था, माघ की ठण्ड पड़ रही थी। मुन्शीजी ने गरम पानी से स्नान किया और चौकी से उतरे। मगर खड़ाऊँ उलटे रखे हुए थे । कहार खडा था कि यह जायँ,तो धोती छाट! मुन्शीजी ने उलटे खड़ाऊँ देखे, तो कहार को डॉटा-तुझसे कितनी बार कह चुका कि खड़ाऊँ सीधे रखा कर | तुझे याद क्यों नहीं रहता ? बना, उलटे खड़ाऊँ पर कैसे पैर रखूँ ? आज तो मैं छोड़ देता हूँ, लेकिन कन जो तूने उलटे खड़ाऊँ रखे, तो इतना पीटगा कि तू भी याद करेगा।

कार ने कॉपते हुए हाथों से खडाऊँ सीधे कर दिये।

निर्मला ने हलवा बना रखा था । मुन्शीजी पाकर एक कुरसी पर बैठ गये और जलता हुअा हलवा मुंह में डाल लिया बारे किसी तरह उसे निगल गये और आँखों से पानी पोंछते हुए ब'ले-तुम्हारा कोई काम ठीक नहीं होता | जलता हुया हलवा सामने रख दिया । आखिर मेरा मुँह जलाने से तुम्हें कुछ मिल तो नहीं गया ।

निर्मला-जरा हाथ से देख क्यो न लिया ?

वज्रधर – वाह, उलटा चोर कोतवालै बाटे | मुझीको उल्लू बनाती हो । तुम्हें खुद सोच लेना चाहिए था कि जलता हुया हलमा खा गये, तो मुंह की क्या दशा होगी। लेकिन तुम्हें क्या परवा | लल्लू कहाँ हैं ?

निर्मला- लल्लू मुझसे कहके कही जाते हैं ? पहर रात रहे, न जाने किधर चले गये । नाने कहीं किसानों की सभा होनेवाली है। वहीं गये हैं ।

वनधर-वहाँ दिन-भर भूखा मरेगा ! न जाने इसके सिर से यह भूत कत्र उतरेगा? मुझसे कल दारोगाजी कहते थे, श्राप लड़के को सॅभालिए, नहीं तो धोखा खाइएगा। समझ में नहीं याar, क्या करूँ । मेरे इलाके के ग्रादमी भी इन सभागों मे अब जाने लगे हैं और मुझे खौफ हो रहा है कि कहीं रानी साहब के कानो में भनक पड़ गयी, तो मेरे सिर हो जायेंगी। मैं यह तो मानता है कि अहलकार लोग गरीबों को बहुत सताते हैं, मगर किया क्या जाय, सताये बगैर काम भी तो नहीं चलता। आखिर उनका गुजर बसर कैसे हो ! पिसानो को समझाना बुरा नहीं, लेकिन ग्राग मे कुदना तो बुरी बात है । मेरो तो मुनने को उसने कसम खा ली है, मगर तुम क्यों नहीं समझाती ?

निर्मला-जो याग में कृदेगा, आप जलेगा, मुझे क्या करना है । उससे बहस कौन करे । आज सवेरे-सवेरे कहाँ जा रहे हो ?

वनधर-जरा ठाकुर विशालसिंह के यहाँ जाता हूँ।

निर्मला-टोपहर तक तो लौट अायोगे न ? दूं। हॉ, इसका वादा करता हूँ कि रियासत मिलने के साल भर बाद भर कौड़ी कौड़ी सूद के साथ चुका दूंगा । सच्ची बात तो यह है कि मुझे पहले ही मालुम था कि इस शर्त पर कोई महाजन रुपए देने पर राजी न होगा । ये बला के चघह होते हैं। मुझे तो इनके नाम से चिढ है । मेरा वश चले, तो ग्राज इन सबों को तोप पर उड़ा दूं। जितना डर मुझे इनसे लगता है, उतना साँप मे भी नहीं लगता। इन्हीं के हाथों ग्रान मेरी यह दुर्गति है, नहीं तो इस गयी बीती दशा में भी यादमी होता। इन नर पिशाचों ने सारा रक्त चूस लिया । पिताजी ने केवल पाँच हजार लिये थे, जिनके पचास हजार हो गये । और मेरे तीन गाँव, जो इस वक्त दो लाख को सस्ते ये, नीलाम हो गये। पिताजी का मुझे यह अन्तिम उपदेश था कि कर्ज कभी मत लेना। इसी शोक में उन्होंने देह त्याग दी।

यहाँ श्रमी यह बातें हो ही रही थी कि जनानखाने में से कलह शब्द आने लगे। मालूम होता था, कई स्त्रियो मे सग्राम छिड़ा हुया है। ठाकुर साहब ये कर्कश पाब्द सुनते ही विकल हो गये, उनके माथे पर बल पड़ गये, मुख तेजहीन हो गया । यही उनके जीवन की सबसे दारुण व्यथा थी । यही काँटा था, जो नित्य उनके हृदय मे खटका करता था । उनकी बड़ी स्त्री का नाम वसुमती था। वह अत्यन्त गर्वशीला थी;नाक पर मक्खी भी न बैठने देती । उनको तलवार सदैव म्यान से बाहर रहती थी। वह अपनी सपत्नियों पर उसी भाँति शासन करना चाहती थी, जैसे कोई सास अपनी बहुश्री पर करती है । वह यह भूल जाती थी कि ये उनकी बहुएँ नहीं, सप नयाँ हैं । जो उनकी हाँ म हाँ मिनाता, उसपर प्राण देती थी, किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध जरा भी कोई बात हो जातो, तो सिंहनी का सा विकराल रूप धारण कर लेती थी।

दूसरी स्त्री का नाम रामप्रिया था। यह रानी जगदीशपुर की सगी बहन थी । उनके पिता पुगने खिलाड़ी थे, दो दस्ती झाड़ते थे, दो-धारी तलवार से लडते थे । रामप्रिया दया और विनय की मूर्ति थी, बड़ी विचारशील और वाक्य-मधुर, जितना कोमल अग था, उतना ही कोमल हृदय भी था। वह घर में इस तरह रहती थी मानों थी ही नही। उन्हें पुस्तको से विशेष रुचि थी, हरदम कुछ न कुछ पढ़ा लिखा करती थीं। सब से अलग-विलग रहती थी, न किसी के लेने मे, न देने में, न किसी से वैर, न प्रेम।

तीसरी महिला का नाम रोहिणी या । ठाकुर साहब का उनपर विशेष प्रेम या, और वह भी प्रापण से उनकी सेवा करती थी। इनमे प्रेम की मात्रा अधिक थी या माया को इसका निर्णय करना कठिन था। उन्हें यह असह्य था कि ठाकुर साहन उनकी सौतो से बात चीत भी करें। वसुमनी कर्कशा होने पर भी मलिन हृदयान थी, जो कुछ मन में होता, वही मुख म । एक बार मुँह से बात निकाल डालने पर फिर उसके हृदय पर उसका कोई चित न रहता था। रोहिणी द्वेष को पालती थी, जैसे- चिड़िया अपने अण्डे को सेतो है । वह जितना मुँह से कहती थी, उससे कही अधिक मन मे रखती थी। ठाकुर साहब ने अन्दर जाकर वसुमती से कहा–तुम घर में रहने दोगी या नहीं ? जरा भी शरम-लिहाज नहीं कि बाहर कौन बैठा हुया है। बस, जब देखो, सग्राम मचाbरहता है । इस जिन्दगी से तग पा गया । सुनते-सुनते कलेजे में नासूर पड़ गये ।

वसुमती-कर्म तो तुमने किये हैं, भोगेगा कौन ?

ठाकुर-तो जहर दे दो। जला जलाकर मारने से क्या फायदा !

वसुमती-क्या वह महारानी लडने के लिए कम थी कि तुम उनका पक्ष लेकर श्रा दौड़े ? पूछते क्यों नहीं, क्या हुआ, जो तीरों की बौछार करने लगी ?

रोहिणी–अाप चाहती हैं कि मैं कान पकड़कर उठाऊ, या बैठाऊँ, तो यहाँ कुछ आपके गॉव मे नहीं बसी हूँ । क्यों कोई अापसे थर-थर कॉपा करे!

ठाकुर-आखिर कुछ मालुम भी तो हो, क्या बात हुई ?

रोहिणी–वही हुई, जो रोज होती है । मैंने हिरिया से कहा, नरा मेरे सिर मे तेल डाल दे । मालकिन ने उसे तेल डालते देखा, तो श्राग हो गयीं। तलवार खींचे हुए आ पहुंची और उसका हाथ पकड़कर खींच ले गयी । अाज अाप निश्चित कर लीजिए कि हिरिया उन्हीं की लौडी है या मेरी भी। यह निश्चय किये बिना आप यहाँ से न जाने पायेंगे।

वसुमती-वह क्या निश्चय करेगे, निश्चय मैं करूँगी। हिरिया मेरे साथ मेरे नैहर से आयी है और मेरो लौडो है । किसी दूसरे का उस पर कोई दावा नहीं है ।

रोहिणी–सुना आपने ? हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्ही की लौंडी है।

ठाकुर-हिरिया इस घर में रहेगी, तो उसे सब का काम करना पड़ेगा।

वसुमती यह सुनकर जल उठी। नागिन की भाँति फुफकारकर बोली- इस वक्त तो अापने चहेती रानी की ऐसी डिग्री कर दी, मानो यहाँ उन्हीं का राज्य है। ऐसे ही न्यायशील होते, तो सन्तान का मुँह देखने को न तरसते ।

ठाकुर साहब को ये शब्द बाण-से लगे । कुछ जवान न दिया। बाहर आकर कई मिनट तक मर्माहत दशा में बैठे रहे । वसुमती इतनी मुंहफट है, यह उन्हे अाज मालूम हुया । सोचा, मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही थी, जिस पर वह इतना झल्ला जाती। मैने क्या बुरा कहा कि हिरिया को सबका काम करना पड़ेगा। अगर हिरिया केवल उसी का काम करती है, तो दो महरियाँ और रखनी पड़ती हैं । क्या वसुमती इतना भी नहीं समझतो ? ताना ही देना था, तो और कोई लगती हुई बात कह देती। यह तो कठोर से कठोर ग्राघात है, जो वह मुझ पर कर सकती थी। ऐसी स्त्री का तो मुँह न देखना चाहिए।

सहमा उन्हें एक बात सूझी। मुशीजी से बोले–ज्योतिष की भविष्यवाणी के विषय में आपके क्या विचार है । क्या यह हमेशा सच निकलती है ?

मुंशोजी असमजस में पड़े कि इसका क्या जवाब दूं। कैसा जवाब रुचिकर होगा– यह उनकी समझ में न पाया । अंधेरे में टटोलते हुए बोले–यह तो उसी विद्या के विषय में कहा ना सकता है, जहाँ अनुम न से काम न लिया जाय । ज्योतिष में बहुत-कुछ पूर्व अनुभव और अनुमान हो से काम लिया जाता है।

ठाकुर–बस, ठीक यही मेरा विचार है । अगर ज्योतिप मुझे धनी बतलाये, तो यह आवश्यक नहीं कि मैं धनी हो जाऊँ । ज्योतिप के धनी कहने पर भी सम्भव है कि मैं निन्दगी भर कौड़ियों को मुहताज रहूँ । इमी भाँति ज्योतिष का दरिद्र लक्ष्मी का कृपा पात्र भी हो सकता है, क्यों ?

मुशीजी को अब भी पॉव जमाने को भूमि न मिली । सन्दिग्ध भाव से बोले-हाँ, ज्योतिष की धारणा जब अनुष्ठानों से बदली जा सकती है, तो उसे विधि का लेख क्यों समझा जाय ?

ठाकुर साहब ने बड़ी उत्सुकता से पूछा- अनुष्ठानों पर श्रापका विश्वास है ?

मुशीजीको जमीन मिल गयी । बोले-~अवश्य ।

विशालसिह यह तो जानते थे कि अनुराना से शकायों का निवारण होता है । शनि, राहु ग्रादि का शमन करने के अनुशनों से परिचित थे । बहुत दिनो से मगल का व्रत भी रखते थे, लेकिन इन अनुराना पर अन उन्हें विश्वास न था । वह कोई ऐसा अनुष्ठान करना चाहते थे जो किसी तरद निष्फल ही न हो | बोले- यदि यार यहाँ के किसी विद्वान् ज्योतिषी से परिचित हों, तो कृपा करके उन्हें मेरे यहाँ भेज दोजि एगा । मुझे एक विषय में उनसे कुछ पूछना है ।

मुशी-अाज ही लीजिए, यहाँ एक से एक बढकर ज्योतिषी पड़े हुए हैं। श्राप.मुझे कोई गैर न समझिए । जब, जिस काम को इच्छा हा, मुझे कहला भेजिए ।.सिर के बल दौड़ा श्राऊँगा। बाजार से काई अच्छी चीज मॅगानी हो, मुझे हुक्म दीजिए, किसी वैद्य या हकीम की जरूरत हो, मुझे सूचना दीजिए। मैं तो जैसे महारानीनी को समझता हूँ, वैसे ही श्रापको भी समझता हूँ।

ठाकुर-मुझे श्रापसे ऐसी ही श्राशा है। जरा रानी साहबा का कुशल-समाचार जल्द जल्द भेजिएगा। वहाँ अापके सिवा मेग और कोई नहीं है । श्राप ही के ऊपर मेरा भरोसा है । जरा देखिएगा, कोई चीज इधर उधर न होने पाये, यार लोग नोच-खसोट न शुरू कर दें।

मुशी-आप इससे निश्चिन्त रहें । मैं देख भाल करता रहूँगा।

ठाकुर-हो सके, तो जर( यह भी पता लगाइएगा कि रानी ने कहाँ-कहाँ से कितने रुपये कर्ज लिये हैं।

मुशी-समझ गया, यह तो सहज ही में मालूम हो सकता है।

ठाकुर– जरा इसका भी पता लगाइएगा कि याजकल उनका भोजन कौन बनाता है। पहले तो उनके मैके ही की कोई स्त्री थी। मालूम नहीं, अब भी वही बनाती है, या कोई दूसरा रसोइया रखा गया है । चक्रधर ने ठाकुर साहब के मन का भाव ताडकर दृढ़ता से कहा-महाराज, क्षमा कीजिएगा, मै आपका सेवक हूँ, पर रानी जी का भी सेवक हूँ। उनका शत्रु नही हूँ। और वह दोनों सिह और सिहनी की भाँति लड़ सकते हैं। मै गीदड़ की भॉति स्वार्थ के लिए बीच मे कूदना अपमान-जनक समझता हूँ। मै वहाँ तक तो आपकी सेवा कर सकता हूँ, जहाँ तक रानीजी का अहित न हो । मै तो दोनों का भिक्षुक हूँ।

ठाकुर साहब दिल मे शरमाये, पर इसके साथ मुंशीजी पर उनका विश्वास और हो गया । बात बनाते हुए बोले-नहीं, नहीं, मेरा मतलब आपने गलत समझा। छी: ! मै इतना नीच नही । मै केवल इसलिए पूछता था कि नया रसोइया है या नहीं । अगर वह सुपात्र है, तो वही मेरा भी भोजन बनाता रहेगा। ठाकुर साहब ने बात तो बनायी, पर उन्हें स्वय ज्ञात हो गया कि बात बनी नहीं ।

झेप मिटाने को वह एक समाचार पत्र देखने लगे, मानों उन्हें विश्वास हो गया शीजी ने उनकी बात सच मान ली ।

इतने मे हिरिया ने आकर मुंशीजी से कहा–बाबा, मालकिन ने कहा है कि श्राप लगे, तो मुझसे मिल लीजिएगा।

ठाकुर साहब ने गरज कर कहा-ऐसी क्या बात है, जिसको कहने की इतनी जल्दी है। इन बेचारे को देर हो रही है, कुछ निठल्ले थोड़े ही है कि बैठे बैठे औरतों का सुना करें । जा, अन्दर बैठ ।

यह कह कर ठाकुर साहब उठ खड़े हुए, मानो मुशी जी को विदा कर रहे हैं । वह ती को उनसे बातें करने का अवसर न देना चाहते थे । मुशीजी को भी अब विवश विदा माँगनी पड़ी।

मुंशीजी यहाँ से चले तो उनके दिल मे एक शंका समायी हुई थी कि ठाकुर साहब मुझसे नाराज तो नहीं हो गये। हाँ, इतना सन्तोष था कि मैने कोई बुरा काम नहीं । यदि वह सच्ची बात कहने के लिए नाराज हो जाते हैं, तो हो जायँ। मै क्यों साहब का बुरा चेतू । बहुत होगा, राजा होने पर मुझे जवाब दे देगे । इसकी क्या चिंता। इस विचार से मुंशीजी और अकड़कर घोड़े पर बैठ गये। वह इतने खुश थे, । हवा में उड़े जा रहे हैं। उनकी आत्मा कभी इतनी गौरवोन्मत्त न हुई थी। ताओं को कभी उन्होंने इतना तुच्छ न समझा था।

७

चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुंच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य । उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे । बार बार पाते थे और पूछकर लौट जाते जब वह पाँचवें दिन घर पहुंचे तो लोग मिलने और बधाई देने या पहुँचे । नगर सभ्य समाज मुक्तकंठ से उनकी तारीफ कर रहा था । यबपि चक्रघर गभीर आदमी पर अपनी कीति की प्रशंसा से उन्हें सच्चा अानन्द मिल रहा था । मुसलमानो की सख्या के विषय में किसी को भ्रम होता, तो वह तुरन्त उमे ठोक कर देते थे-एक हजार ? अजी, पूरे पाँच हजार श्रादमी ये पोर सभी को त्योरियाँ चढी हुई। मालूम देता था, मुझे खड़ा निगल जायेगे। नान पर खेल गया और क्या कहूँ। कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें चक्रधर की वह अनुनय-विनय अपमानजनक जान पढ़ती थी। उनका खयाल था कि इससे तो मुसलमान और भी शेर हो गये होंगे । इन लोगों से चक्रधर को घण्टों बहस करनी पडी, पर वे कायल न हुए । मुसलमानों में भी चक्रधर की तारीफ हो रही थी। दोचार श्रादमी मिलने भी अाये, लेकिन हिन्दुओं का जमघट देसकर 'लौट गये।

और लोग तो तारीफ कर रहे थे, पर मुशी वनधर लड़के की नादानी पर बिगड़ रहे थे। तुम्हीं को क्यों यह भूत सवार हो जाता है ? क्या तुम्हारी ही जान सस्ती है ? तुम्ही को अपनी जान भारी पड़ी है ? क्या वहाँ यार लोग न थे, फिर तुम क्यो अाग म कृदने गये ? मान लो, मुसलमानों ने हाय चला दिया होता, तो क्या करते ? फिर तो कोई साहब पास न फटकते ! ये हजारों यादमी, नो अाज खुशी के मारे फूले नहीं समाते, बात तक न पूछते । निर्मला तो इतनी विगढ़ी कि चक्रधर से बात न करना चाहती थी।

शाम को चक्रधर मनोरमा के घर गये । वह बगीचे में दौड़-दौड़कर हजारे से पौधों को सींच रही थी। पानी से कपड़े लथपथ हो गये थे। उन्हें देखते ही हजारा फेंककर दौड़ी और पास श्राकर बोली-पाप कर पाये, बाबूजी ? मैं पत्रों मे रोज वहाँ का समाचार देखती थी और मोचती थी कि ग्राप यहाँ पायेंगे, तो यापकी पूजा करूँगी । श्राप न होते तो वहाँ जरूर दगा हो जाता। पापको बिगडे हुए मुसलमाना के सामने अकेले जाते हुए जरा भी शका न हुई ?

चक्रधर ने कुरसी पर बैठते हुए कहा-जरा भी नहीं ! मुझे तो यही धुन थी कि इस वक्त कुरबानी न होने दूंगा, इसके सिवा दिल में और कोई खयाल न था। अब सोचता हूँ, तो अाश्चर्य होता है कि मुझमे इतना बल और साहस कहाँ से आ गया था। मैं तो यही कहूंगा कि मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं । फिसाद से वे भा उतना ही डरते हैं, जितना हिन्दू । शान्ति की इच्छा भी उनमें हिन्दुओ से कम नहा है । लोगों का यह खयाल कि मुसलमान लोग हिन्दुओं पर राज्य करने का स्वप्न देख रहे हैं बिलकुल गलत है। मुसलमानों को केवल यह शका हो गयी है कि हिन्दू उनस पुराना वैर चुकाना चाहते हैं, और उनकी हस्ती को मिटा देने की फिक्र कर रहे हैं। इसी भय से वे जरा-जरा सी बात पर तिनक उठते हैं और मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं।

मनोरमा-मैंने तो जब पढा कि ग्राप उन बौखलाये हए आदमियों के सामन निःशक भाव से खड़े थे, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये। आगे पढने की हिम्मत न पड़ती थी कि कहीं कोई बुरी खबर न हो । क्षमा कीजिएगा, मैं उस समय वहाँ होती, तो श्रापको पकडकर खींच लाती । आपको अपनी जान का जरा भो मोह नहीं है।

चक्रधर-( हँसकर ) जान और हई किस लिए १ पेट पालने ही के लिए तो हम आदमी नही बनाये गये हैं। हमारे जीवन का अादर्श कुछ तो ऊँचा होना चाहिए, विशेषकर उन लोगों का, जो सभ्य कहलाते हैं । ठाट से रहना हो सभ्यता नहीं।

मनोरमा-(मुस्कराकर ) अच्छा, अगर इस वक्त आपको पाँच लाख रुपए मिल जायँ, तो श्राप लें या न लें।

चक्रधर-कह नहीं सकता, मनोरमा उस वक्त दिल की क्या हालत हो । दान तो न लूँगा, पड़ा हुआ धन भी न लॅगा; लेकिन अगर किसी ऐसी विधि से मिले कि उसे लेने मे आत्मा की हत्या न होती हो, तो शायद मैं प्रलोभन को रोक न सकूँ पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उसे भोग-विलास मे न उड़ाऊँगा। धन की में निन्दा नहीं करता, उससे मुझे डर लगता है। दूसरों का आश्रित बनना तो लज्जा की बात है, लेकिन जीवन को इतना सरल रखना चाहता हूँ कि सारी शक्ति धन कमाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने ही मे न लगानी पड़े।

मनोरमा–धन के बिना परोपकार भी तो नही हो सकता ?

चक्रधर-परोपकार में करना नहीं चाहता, मुझमे इतनी सामर्थ्य ही नहीं। यह तो वे ही लोग कर सकते हैं, जिन पर ईश्वर की कृपा दृष्टि हो । मै परोपकार के लिए अपने जीवन को सरल नहीं बनाना चाहता; बल्कि अपने उपकार के लिए, अपनी आत्मा के सुधार के लिए । मुझे अपने ऊपर इतना भरोसा नहीं है कि धन पाकर भी भाग में न पड़ जाऊँ । इसलिए मैं उससे दूर ही रहना चाहता हूँ।

मनोरमा–अच्छा, अब यह तो बतलाइए कि आपसे वधूजी ने क्या बातें की ? (मुस्कराकर ) मैं तो जानती हूँ, आपने कई बात-चीत न को होगी, चुपचाप लजाये बैठे रहे होंगे । उसी तरह वह भी आपके सामने आकर खड़ी हो गयी होगी और खड़ी-खड़ी चली गयी होंगी।

चक्रधर शरम से सिर मुकाकर बोले- हाँ, मनोरमा, हुआ तो ऐसा ही । मेरी समझ ही मे न पाता था कि क्या बातें करूँ। उसने दो एक बार कुछ बोलने का साहस भी किया।

मनोरमा-ग्रापको देखकर खुश तो बहुत हुई होगी।

चक्रधर–(शरमाकर ) किसी के मन का हाल मै क्या जानू ?

मनोरमा ने अत्यन्त सरल भाव से कहा- सब मालूम हो जाता है। पाप मुझसे बता नहीं रहे हैं । कम-से-कम उनकी इच्छा तो मालूम ही हो गयी होगी । मे तो सम-झती हूँ, जो विवाह लड़की की इच्छा के विरुद्ध किया जाता है वह विवाह ही नहीं है । आपका क्या विचार है ?

चक्रधर बड़े असमञ्जस में पड़े । मनोरमा से ऐसी बातें करते उन्हें सकोच होता था । डरते थे कि कहीं ठाकुर साहब को सबर मिल जाय-~सरला मनोरमा ही कह दे–तो वह समझेगे, मै इसके सामाजिक विचारो मे क्राति पैदा करना चाहता हूँ, श्रत्र तक उन्हें शात न था कि ठाकुर साहब किन विचारों के यादमी है। हाँ, उनके गङ्गा-स्नान से यह अाभास होता था कि वह सनातन धर्म के भक्त हैं। सिर झुकाकर बोले–मनोरमा, हमारे यहाँ विवाह का अाधार प्रेम यार इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है । इच्छा चश्वल है, क्षण-क्षण में बदलती रहती है । कर्तव्य स्थायो है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

मनोरमा-अगर यह बात है, तो पुराने जमाने में स्वयम्बर क्यों होते थे ?

चक्रधर–स्वयम्बर मे कन्या की इच्छा ही सर्व प्रधान नहीं है तो थी । वह वीर-युग था, और वीरता ही मनुष्य का सबसे उज्ज्वल गुण समझा जाता था । लोग अाजकन वैवाहिक प्रथा सुधारने का प्रयत्न तो कर रहे है।

मनोरमा-जानती हूँ, लेकिन कहीं सुधार हो रहा है ? माता पिता धन देखकर लट्ट हो जाते हैं | इच्छा अस्थायी है, मानती हूँ, लेकिन एक बार अनुमति देने के बाद फिर लड़की को पछताने के लिए कोई हीला नही रहता।

चक्रधर-~अपने मन को समझाने के लिए तों की कभी कमी नहीं रहती, मनोरमा कर्तव्य ही ऐसा श्रादर्श है, जो कभी धोसा नहीं दे सकता ।

मनोरमा–हाँ, लेकिन प्रादर्श अादर्श ही रहता है, यथार्थ नहीं हो सकता । (मुस्कराकर ) यदि आप ही का विवाह किसी कानी, काली-कलूटी स्त्री से हो जाय, तो क्या श्रापको दु ख न होगा? वोलिए । क्या आप समझते हैं कि लड़की का विवाह किसी खूसट से हो जाता है, तो उसे दु ख नही होता। उसका बम च ते तो वह पति का मुँह तक न देखे । लेकिन इन बातों को जाने दीजिए । वधूजी बहुत सुन्दर हैं ?

चक्रवर ने बात टालने के लिए कहा-सुन्दरता मनोभावों पर निर्भर होती है। माता अपने कुरूप बालक को भी सुन्दर समझती है ।

मनोरमा–श्राप तो ऐसी बातें कर रहे हैं, जैसे भागना चाहते हो । क्या माता किसी सुन्दर बालक को देखकर यह नहीं सोचती कि मेरा भी बालक ऐसा ही होता।

चक्रधर ने लजित होकर कहा- मेरा श्राशय यह न था। मै यही कहना चाहता था कि सुन्दरता के विषय में सब की राय एक-सी नहीं हो सकती

मनोरमा–श्राप फिर भागने लगे। मै जब आपसे यह प्रश्न करती हूँ, तो उसका साफ मतलब यह है कि आप उन्हें सुन्दर समझते हैं या नहीं?

चक्रवर लजा से सिर झुकाकर बोले–ऐसी बुरी तो नहीं है।

मनोरमा–तब तो श्राम उन्हें खूब प्यार करेंगे ?

चक्रधर-प्रेम केवल रूप का भक्त नहीं होता ।

सहसा घर के अन्दर से किसी के कर्कश शब्द कान में आये, फिर लौंगो का रोना सुनायी दिया । चक्रधर ने पूछा- यह तो लौंगी रो रही है ? मनोरमा-जी हॉ ! आपसे तो भाई साहब से भेंट नहीं हुई। गुरुसेवकसिह नाम है। कई महीनो से देहात में जमीदारी का काम करते हैं। हैं तो मेरे सगे भाई और पढ़े-लिखे भी खब है। लेकिन भलमनसी छ भी नहीं गयी। जब पाते है. लौंगी अम्मा से झूठ-मूठ तकरार करते हैं । न जाने उसमे इन्हें क्या अदावत है।

इतने में गुरुसेवकसिह लाल-लाल आँखें किये निकल पाये और मनोरमा से बोले-बाबूजी कहाँ गये हैं ? तुझे मालूम है कब तक पायेंगे ? मैं ग्राज ही फैसला कर लेना चाहता हूँ।

गुरुसेवेकसिंह की उम्र २५ वर्ष से अधिक न थी। लम्वे, छरहरे एवं रूपवान् थे, आँखों पर ऐनक थी, मुंह में पान का बीड़ा, देह पर तनजेब का कुरता, माँग निकली हुई । बहुत शौकीन आदमी थे ।

चक्रधर को बैठे देखकर वह कुछ झिझके और अन्दर लौटना ही चाहते थे कि लौंगो रोती हुई याकर चक्रधर के पास खड़ी हो गया और बोली-बाबूजी, इन्हें सम-झाइए कि में अब बुढ़ापे मे कहाँ जाऊँ ? इतनी उम्र तो इस घर में कटी, अब किसके द्वार पर जाऊँ ? जहाँ इतने नौकरों-चाकरो के लिए खाने को रोटियाँ हैं, क्या वहाँ मेरे लिए एक टुकड़ा भी नहीं ? बाबूजी, सच कहती हूँ, मैंने इन्हें अपना दूध पिलाकर पाला है: मालकिन के दूध न होता था, और अब यह मुझे घर से निकालने पर तुले हुए हैं। गुरुसेवकसिंह की इच्छा तो न थी कि चक्रधर से इस कलह के सम्बन्ध में कुछ कहें। लेकिन जब लौगी ने उन्हें पंच बनाने में सकोच न किया, तो वह भी खुल पड़े। बोले-महाशय, इससे यह पूछिए कि पात्र यह बुढ़िया हुई, इसके मरने के दिन आये, क्यों नहीं किसी तीर्थस्थान में जाकर अपने कलुधित जीवन के बचे हुए दिन काटती ? मैंने दादाजी से कहा था कि इसे वृन्दावन पहुँचा दीजिए, और वह तैयार भी हो गये थे, पर इसने सैकड़ों बहाने किये और वहाँ न गयी । आपसे तो अब कोई परदा नहीं है, इसके कारण मैने यहाँ रहना छोड़ दिया। इसके साथ इस घर में रहते हुए मुझे लजायाती है। इसे इसकी जरा भी परवाह नहीं कि जो लोग सुनते होंगे, तो दिल मे क्या कहते होंगे। हमे कही मुँह दिखाने की जगह नहीं रही। मनोरमा अव सयानी हुई। उसका विवाह करना है या नहीं। इसके घर में रहते हुए हम किस भले यादमी के द्वार पर ना सकते हैं। मगर इसे इन बातों की बिलकुल चिन्ता नही । वस मरते दम तक घर को स्वामिनी बनी रहना चाहती है। दादाजी भी सठिया गये हैं, उन्हें मानापमान की जरा भी फिक्र नहीं । इसने उनपर न जाने क्या मोहिनी डाल दी है कि इसके पीछे मुझमे लड़ने पर तैयार रहते हैं। श्राज मैं निश्चय करके पाया हूँ कि इसे घर के बाहर निकारकर ही छोडूंगा । या तो यह किसी दूसरे मकान में रहे, या किसी तीर्थ स्थान को प्रस्थान करे। लौगी-तो बच्चा सुनो, जब तक मालिक जीता है, लोंगी इसी घर में रहेगी भार इसी तरह रहेगी। जब वह न रहेगा, तो जो कुछ सिर पर पड़ेगी, झेल लॅगी । जो तुम चाहो कि लोगी गली गली ठोकरें खाये, तो यह न होगा ! मै लौडी नहीं हूँ कि घर से बाहर जाकर रहूँ। तुम्हें यह कहते लजा नहीं श्राती? चार भाँवरें फिर जाने से ही व्याइ नहीं हो जाता । मैंने अपने मालिक की जितनी सेवा की है और करने को तैयार हूँ, उतनी कौन ब्याहता करेगी ? लाये तो हो बहू, कभी उठकर एक लुटिया पानी भी देती है ? खायी है कभी उसकी बनायो हुई कोई चीन ? नाम से कोई व्याहता नहीं होती, सेवा और प्रेम से होती है।

गुरुसेवक-यह तो मैं जानता हूँ कि तुझे बातें बहुत करनी अाती हैं, पर अपने मुंह से जो चाहे बने, मैं तुझे लौंडो ही समझता हूँ।

लौंगी-तुम्हारे समझने से क्या होता है, अभी तो मेरा मालिक जीता है। भगवान्ठ से अमर करें ! जब तक जीती हूँ, इसी तरह रहूँगी, चाहे तुम्हें अच्छा लगे या बुरा । निसने जवानी में बाँह पकड़ी, वह क्या अब छोड़ देगा? भगवान् को कौन मुँह दिखायेगा?

यह कहती हुई लौंगी घर में चली गयी। मनोरमा चुपचाप सिर मुकाये दोनों को चातें सुन रही थी। उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था । मातृ स्नेह का जो कुछ सुख उसे मिला था, लौंगी ही से मिला था। उसकी माता तो उसे गोद में छोड़कर परलोक सिधारी थी। उस एहसान को वह कभी न भूल सकती थी। अब भी लौंगी उसपर प्राण देती थी। इसलिए गुरुसेवकसिंह की यह निर्दयता उसे बहुत बुरी मालूम होती थी।

लौंगी के जाते ही गुरुसेवकसिंह बड़े शान्त भाव से एक कुरसी पर बैठ गये और चक्रघर से बोले-महाशय, आपसे मिलने की इच्छा हो रही थी और इस समय मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी था। आपने श्रागरे को समस्या जिस बुद्धिमानी से हल की उसकी जितनी प्रशसा की जाय, कम है।

चक्रधर-वह तो मेरा कर्तव्य ही था ?

गुरुसेवक-इसीलिए कि श्रापके कर्तव्य का अादर्श बहुत ऊँचा है। १०० में ६६ श्रादमी तो ऐसे अवसर पर लड़ माना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। मुश्किल से एक आदमी ऐसा निकलता है, जो धैर्य से काम ले । शान्ति के लिए आत्म-समर्पण करनेवाला तो लाख-दो-लाख में एक होता है। श्राप विलक्षण धैर्य और साहस के मनुष्य हैं । मैंने भी अपने इलाके में कुछ लड़कों का खेल-सा कर रखा है, वहाँ पठानों के कई बड़े-बड़े गाँव हैं, उन्हों से मिले हुए ठाकुरों के भी कई गाँव हैं। पहले पठानों और ठाकुरों में इतना मेल था कि शादी-गमी, तील त्योहार में एक दूसरे के साथ शरीक होते थे, लेकिन अब तो यह हाल है कि कोई त्योहार ऐसा नहीं जाता, जिसमें खून-खच्चर या कम से कम मार पीट न हो । श्राप अगर दो-एक दिन के लिए वहाँ चले तो श्रापस में बहुत कुछ सफाई हो जाय ! मुसलमानों ने अपने पत्रों में श्रापका जिक देखा है और शौक से श्रापका स्वागत करेंगे । अापके उपदेशों का बहुत कुछ असर पड़ सकता है।

चक्रधर-बातों में असर डालना तो ईश्वर की इच्छा के अधीन है। हॉ, मैं श्रापके साथ चलने को तैयार हूँ। मुझसे जो सेवा हो सकेगी, वह उठा न रखूगा | कन चलने का इरादा है ? गुरुसेवक-चलता तो इसी गाडी से, लेकिन मै इस कुलटा को अबकी निकाल बाहर किये वगैर नहीं जाना चाहता। दादाजी ने रोक-टोक की, तो मनोरमा को लेता जाऊँगा और फिर इस घर में कदम न रखेगा। सोचिए तो, कितनी बड़ी बदनामी है।

चक्रधर बड़े संकट में पड़ गये। विरोध की कटुता को मिटाने के लिए मुस्कराते हुए बोले-मेरे और आपके सामाजिक विचारों में बड़ा अन्तर है। मैं बिल्कुल भ्रष्ट हो गया हूँ।

गुरुसेवक-क्या आप लौंगी का यहाँ रहना अनुचित नहीं समझते ?

चक्रधर-जी नहीं, खानदान की बदनामी अवश्य है; लेकिन मैं बदनामी के भय से अन्याय करने की सलाह नहीं दे सकता । क्षमा कीजिएगा, मैं बड़ी निर्भीकता से अपना मत प्रकट कर रहा हूँ।

गुरुसेवक-नहीं, नहीं: मैं बुरा नहीं मान रहा हूँ। (मुस्कराकर ) इतना उजड्ड नहीं हूँ कि किसी मित्र की सच्ची राय न सुन सकू। अगर श्राप मुझे समझा दें कि उसका यहाँ रहना उचित है, तो मैं श्रापका बहुत अनुगृहीत हूँगा । मैं खुद नहीं चाहता कि मेरे हाथों किसी को अकारण कष्ट पहुँचे ।

चक्रघर-जब किती पुरुष का एक स्त्री के साथ पति-पत्नी का-सा सम्बन्ध हो जाय, तो पुरुष का धर्म है कि जब तक स्त्री की ओर से कोई विरुद्ध प्राचरण न देखे, उस सम्बन्ध को निबाहे।

गुरुसेवक-चाहे स्त्री कितनी ही नीच जाति की हो ?

चक्रधर-हाँ, चाहे किसी भी जाति की हो ।

मनोरमा यह जवाब सुनकर गर्व से फूल उठी । वह आवेश में उठ खड़ी हुई और पुलकित होकर खिड़की के बाहर झॉकने लगी। गुरुसेवकसिंह वहाँ न होते, तो वह जरूर कह उठती-आप मेरे मुँह से बात ले गये।

एकाएक फिटन को श्रावाज आयी और ठाकुर साहब उतरकर अन्दर गये । गुरु- सेवकसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले । वह डर रहे थे कि लौंगी अवसर पाकर कहीं उनके कान न भर दे।

जब वह चले गये, तो मनोरमा बोली-आपने मेरे मन की बात कही। बहुत सी बातों में मेरे विचार आपके विचारों से मिलते हैं।

चक्रधर-उन्हें बुरा तो जरूर लगा होगा!

मनोरमा-वह फिर वापसे बहस करने आते होंगे। अगर श्राज मौका न मिलेगा तो कल करेंगे । अबको वह शास्त्रों के प्रमाण पेश करेंगे, देख लीजिएगा!

चक्रधर-खैर, यह तो बताओ कि तुमने इन चार-पाँच दिनों में क्या काम किया !

मनोरमा-मैंने तो किताब तक नहीं खोली। वस, समाचार पढ़ती थी और वही चात सोचती थी । आप नहीं रहते, तो मेरा किसी काम में जो नहीं लगता। आप श्रन कमी बाहर न जाइएगा। चक्रधर ने मनोरमा की पोर देखा, तो उसकी श्रॉखें सजल हो गयी थी। सोचने लगे-बालिका का हृदय कितना सरल, कितना उदार, कितना के मल और कितना भावमय है!

८

जगदीशपुर की रानी देवप्रिया का जीवन केवल दो शब्दो में समाप्त हो जाता था-विनोद और विलास । इस वृद्धावस्था में भी उनकी विलास-वृत्ति अणुमात्र भी कम न हुई थी। हमारी कर्मेन्द्रियाँ भले ही जर्जर हो जाये, चेप्टाएँ तो वृद्ध नहीं होती ! कहते हैं, बुढ़ापा मरी हुई अभिलाषायो की समाधि है, या पुराने पापो का पश्चात्ताप, पर रानी देवप्रिया का बुढापा अतृप्त तृष्णा थी और अपूर्ण विलासाराधना । वह दान पुण्य बहुत करती थी; साल मे दो चार यज्ञ भी कर लिया करती थी, साधु-सन्तों पर उनकी असीम श्रद्धा थी और इस धर्मनिष्ठा में उनका ऐहिक स्वार्थ छिपा होता था। परलोक की उन्हें कभी भूलकर भी याद न श्राती थी। वह भूल गई थीं कि इस जीवन के बाद भी कुछ है। उनके दान और स्नान का मुख्य उद्देश्य था-शारीरिक विकारों से निवृत्ति, विलास में रत रहने की परम योग्यता । यदि वह किसी देवता को प्रसन्न कर सकतीं, तो कदाचित् उससे यही वरदान माँगती कि वह कभी बूढ़ी न हो। इस पूजा और व्रत के सिवा वह इस महान् उद्देश्य को पूरा करने के लिए भाँति भाँति के रसों और पुष्टिकारक औषधियों का सेवन करती रहती थी। झुर्रियाँ मिटाने और रग को चमकाने के लिए भी कितने ही प्रकार के पाउडरों, उपटनों और तेलों से काम लिया जाता था । वृद्धावस्था उनके लिए नरक से कम भयङ्कर न थी। चिन्ता को तो वह अपने पास न फटकने देती थी। रियासत उनके भोग विलास का साधन मात्र यी। प्रजा को क्या कष्ट होता है, उनपर कैसे-कैसे अत्याचार होते हैं, सूखे झूरे की विपत्ति क्योकर उनका सर्वनाश कर देती है, इन बातों की ओर कभी उनका ध्यान न जाता था। उन्हें जिस समय जितने धन की जरूरत हो, उतना तुरन्त देना मैनेजर का काम था । वह ऋण लेकर दे, चोरी करे, या प्रजा का गला काटे, इससे उन्हें कोई प्रयोजन न था।

यों तो रानी साहब को हरएक प्रकार के विनोद से समान प्रेम था। चाहे वह थिएटर हो, या पहलवानों का दगल, या अँगरेजी नाच, पर उनके जीवन की सबसे अानन्दमय घड़ियाँ वे होती थीं, जब वह युवकों और युवतियों के साथ प्रेम-क्रीड़ा करती थीं। इस मण्डली में बैठकर उन्हें श्रात्म प्रवचना का सबसे अच्छा अवसर मिलता था । वह भूल जाती थीं कि मेरा यौवन काल बीत चुका है। अपने बुझे हुए यौवन दीपक को युवा की प्रज्ज्वलित स्फूति से जलाना चाहती थीं, किन्तु इस धुन में वह कितने ही अन्य विलासान्ध प्राणियों की भाँति नीचो को मुंह न लगाती थीं। काशी प्रानेवाले राजकुमारों और रानकुमारियो ही से उनका सहवास रहता था। आनेवालों की कमी न यो । एक न-एक हमेशा ही अाता रहता था । रानी की अतिथि-शाला हमेशा श्राबाद रहती थी। उन्हें युवकों की आँखों में खुब जने की सनक-सी थी। वह चाहती थीं कि मेरे सौन्दर्य-दीपक पर युवक पतंगे की भाँति श्राकर गिरें । उनकी रसमयी कल्पना प्रेम के आघात-प्रत्याघात से एक विशेष स्फूर्ति का अनुभव करती थी।

एक दिन ठाकुर हरिसेवकसिंह मनोरमा को रानी साहब के पास ले गये । रानी उसे देखकर मोहित हो गयीं। तबसे दिन में एक बार उससे जरूर मिलती। वह किसी कारण से न पाती तो उसे बुला भेजती । उसका मधुर गाना सुनकर वह मुग्ध हो जाती थी। हरिसेवक सिह का उद्देश्य कदाचित् यही था कि वहाँ मनोरमा को रईसो और राज-कुमारों को श्राकर्षित करने का मौका मिलेगा।

भदों की अँधेरी रात थी । मूसलाधार वर्षा हो रही थी। रानी साहब को ग्रान कुछ ज्वर था, चेष्टा गिरी हुई थी, सिर उठाने को जी न चाहता था, पर पड़े रहने का अव-सर न था । हर्पपुर के राजकुमार को आज उन्होंने निमन्त्रित किया था। उनके आदर- सत्कार का काम करना जरूरी था। उनके सहवास के सुख से वह अग्ने को वचित न कर सकती थीं। उनके आने का समय भी निकट था। रानी ने बड़ी मुश्किल से उठकर पाइने में अपनी सूरत देखी। उनके हृदय पर आघात-सा हुआ । मुख प्रभात-चन्द्र की भॉति मन्द हो रहा था।

रानी ने सोचा-अभी राजकुमार आते होंगे । क्या मैं उनसे इसी दशा मे मिलूँगी ? ससार में क्या कोई ऐसी सञ्जीवनी नहीं है, जो काल के कुटिल चिह्न को मिटा दे ? ऐसी वस्तु कहीं मिल जाती, तो मे अपना सारा राज्य वेचकर उसे ले लेती। जब भोगने की सामर्थ्य ही न हो, तो राज्य से और सुख ही क्या ! हा निर्दयी काल ! तूने मेरा कोई प्रयत्न सफल न होने दिया।

राजकुमार अब अाते होंगे, मुझे तैयार हो जाना चाहिए । ज्वर है, कोई परवा नहीं। मालूम नहीं, जीवन में फिर ऐसा अवसर मिले या न मिले।

सामने मेज पर एक अलबम रखा था। रानी ने राजकुमार का चित्र निकालकर देखा । कितना सहास मुख था, कितना तपस्वी स्वरूप, कितनी सुधामयी छवि !

रानी एक अारामकुरसी पर लेटकर सोचने लगी-यह चित्र न जाने क्यों मेरे चित्त को इतने जोर से खींच रहा है। मेरा चित्त कभी इतना चंचल न हुआ था । इसी अल-चम में और भी कई चित्र हैं, जो इससे कहीं सुन्दर हैं, लेकिन उन नवयुवकों को मैंने कठपुतलियों की तरह नचाकर छोड़ा। यह एक ऐसा चित्र है, जो मेरे हृदय में भूली हुई बातों को याद दिला रहा है, जिसके सामने ताकते हुए मुझे लज्जा-मी अाती है !

रानी ने घड़ी की ओर अातुर नेत्रों से देखा । ६ वन रहे थे । अब वह लेटी न रह सको सँभलकर उठी; अालमारी में से एक शीशी निकाली। उसमें से कई वू दे एक प्याली में डाली और आँखें बन्द करके पी गयी । इसका चमत्कारिक अगर हुया, मानो कोई कुम्हलाया हुआ फूल ताजा हो जाय; कोई सूखी पत्ती हरी हो जाय । उनके मुख-मण्डल पर अामा दौड़ गयी। आँखों में चंचल सजीवता का विकास हो गया, शरीर में नये रक्त का प्रवाह-सा होने लगा। उन्होंने फिर आईने की ओर देखा और उनके अधरों पर एक मृदुल हास्य की झलक दिखाई दी। उनके उठने की अाहट पाकर लौंडी कमरे में आकर खड़ी हो गयी । यह उनकी नाइन थी। गुजराती नाम था।

रानी-समय बहुत थोड़ा है, जल्दी कर ।

गुजराती-रानियों को कैसी जल्दी | जिसे मिलना होगा, वह स्वय पायेगा और बैठा रहेगा।

रानी-महीं, आज ऐसा ही अवसर है।

नाइन बड़ी निपुण थी, तुरन्त शृगारदान खोलकर बैठ गयी और रानी का शृगार करने लगी, मानों कोई चित्रकार तसवीर में रंग भर रहा हो । बाघ घटा भी न गुजरा था कि उसने रानी के केश गुथकर नागिन की सी लटें डाल दी । कपोलों पर एक ऐसा रंग भरा कि झुरियाँ गायब हो गयी और मुख पर मनोहर आभा झलकने लगी। ऐसा मालूम होने लगा, मानो कोई सुन्दरी युवती सोकर उठी है। वही अलसाया हुश्रा अग था, वही मतवाली आँखें । रानी ने आईने को श्रोर देखा और प्रसन्न होकर बोलीं— गुजराती, तेरे हाथ में कोई जादू है। मै तुझे अपने साथ स्वर्ग में ले चलूँगी । वहाँ तो देवता लोग होंगे, तेरी मदद की और भी जरूरत होगी।

गुजराती-आप कमी इनाम तो देती नहीं। बस, बखान करके रह जाती है !

रानी-अच्छा, बता क्या लेगी ?

गुजराती-मै लुंगी, तो वही लूँगी, जो कई बार माँग चुकी हूँ। रुपए-पैसे लेकर मुझे क्या करना है!

यह एक दीवारगीर पर रखी हुई मदन की छोटो-सी मूर्ति थी। चतुर मूर्तिकार ने इस पर कुछ ऐसी कारीगरी की थी जिससे कि दिन के साथ उसका भी रंग बदलता रहता था।

गुजराती-अच्छा, तो न दीजिए, लेकिन फिर मुझसे कभी न पूछिएगा कि क्या लेगी?

रानी-क्या मुझसे नाराज हो गयी ? (चौंककर) वह रोशनी दिखायी दी | कुवर साहब श्रा गये ! मैं झूला-घर में जाती हूँ। वहीं लाना।

यह कहकर रानी ने फिर वही शीशी निकाली और दुगुनी मात्रा में दवा पीकर झूला घर की ओर चलीं। यह एक विशाल भवन था, बहुत ऊँचा और इतना लम्बा-चौड़ा कि झूले पर बैठकर खूब पैग ली जा सकती थी। रेशम को डोरियों में पड़ा हुआ एक पटरा छत से लटक रहा था पर चित्रकारो ने ऐसी कारीगरी की थी कि मालूम होता था, किसी वृक्ष को डाल में पड़ा हुआ है। पौधों, झाड़ियों और लताओं ने उसे यमुना तट का कुब्ज-सा बना दिया था। कई हिरन और मोर इधर-उधर विचरा करते थे। रात का उस भवन में पहुँचकर सहसा यह ज्ञान न होता था कि यह कोई भवन है। पानी का रिमझिम बरसना, ऊपर से हल्की-हल्की फुहारों का पड़ना, हौल में जल यक्षियों का क्रीड़ा करना~यह सब किसी उपवन की शोभा दरसाता था। रानी झूले की डोरी पकड़कर खड़ी हो गयीं और एक हिरन के बच्चे को बुलाकर उसका मुंह सहलाने लगीं। सहसा कदमों की आहट हुई। रानी मेहमान का स्वागत करने के लिए द्वार पर आयीं पर यह राजकुमार न थे, मनोरमा थी। रानी को कुछ निराशा तो हुई; किन्तु मनोरमा भी आज के अभिनय की पात्री थी। उन्होंने उसे बुलवा भेजा था।

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