कर्मभूमि
काशी ने खिसियाकर कहा–देखो, अगर कुछ हो जाय तो जानें।
अमर ने गर्व से कहा–अगर धैर्य से काम लोगे, तो सब कुछ हो जायगा। हल्लड़ मचाओगे, तो कुछ न होगा, उल्टे और डण्डे पड़ेंगे।
सलोनी ने कहा–जब मोटे स्वामी माने!
गूदड़ ने चौधरीपन की ली–मानेंगे कैसे नहीं, उनको मानना पड़ेगा।
एक काले युवक ने जो स्वामीजी के उग्र भक्तों में था, लज्जित होकर कहा–भैया, जिस लगन से तुम काम करते हो, कोई क्या करेगा।
दूसरे दिन उसी कड़ाई से प्यादों ने डांट-फटकार की; लेकिन तीसरे दिन से वह कुछ नर्म हो गये। सारे इलाके में ख़बर फैल गयी कि महन्तजी ने आधी छूट के लिए सरकार को लिखा है। स्वामीजी जिस गांव में जाते, वहाँ लोग उन पर आवाजें कसते। स्वामीजी अपनी रट अब भी लगाये जाते थे। यह सब धोखा है कुछ होना-हवाना नहीं है, उन्हें अपनी बात की आ पड़ी थी। असामियों की उन्हें उतनी फ़िक्र न थी, जितनी अपने पक्ष की। अगर आधी छूट का हुक्म आ जाता, तो शायद वह यहाँ से भाग जाते। इस वक्त तो वह इस वादे को धोखा साबित करने की चेष्टा करते थे, और यद्यपि जनता उनके हाथ में न थी, पर कुछ-न-कुछ आदमी उनकी बातें सुन ही लेते थे। हाँ इस कान सुन कर उस कान उड़ा देते।
दिन गुज़रने लगे, मगर कोई हुक्म नहीं आया। फिर लोगों में सन्देह पैदा होने लगा। जब दो सप्ताह निकल गये, तो अमर सदर गया और वहाँ सलीम के साथ हाकिम जिला मि० ग़ज़नवी से मिला। मि० ग़ज़नवी लम्बे, दुबले, गोरे, शौकीन आदमी थे। उनकी नाक इतनी लम्बी और चिबुक इतना गोल था कि हास्य-मूर्ति-से लगते थे और ये भी बड़े विनोदी। काम उतना ही करते थे, जितना ज़रूरी होता था और जिसके न करने से जवाब तलब हो सकता था; लेकिन दिल के साफ, उदार, परोपकारी आदमी थे। जब अमर ने गाँवों की हालत उनसे बयान की, तो हँसकर बोले–आपके महन्तजी ने फ़रमाया है, सरकार जितनी मालगुजारी छोड़ दे, मैं उतनी ही लगान छोड़ दूंगा। हैं मुन्सिफ़मिज़ाज!
अमर ने शंका की–तो इसमें बेइन्साफ़ी क्या है?
'बेइन्साफ़ी यही है कि उनके करोड़ों रुपये बैंक में जमा हैं, सरकार पर अरबों कर्ज है।'
'तो आपने उनकी तजवीज पर कोई हुक्म दिया?'
'इतनी जल्द! भला छ: महीने तो गुज़रने दीजिए। अभी हम काश्तकारों की हालत की जाँच करेंगे, उसकी रिपोर्ट भेजी जायगी, रिपोर्ट पर गौर किया जायगा, तब कहीं कोई हुक्म मिलेगा।'
'तब तक तो असामियों के बारे-न्यारे हो जायँगे। अजब नहीं कि फ़साद शुरू हो जाय।'
'तो क्या आप चाहते हैं, सरकार अपनी वज़ा छोड़ दे! यह दफ्तरी हुकूमत है जनाब! यहाँ सभी काम ज़ाब्ते के साथ होते हैं। आप हमें गालियाँ दें, हम आपका कुछ नहीं कर सकते। पुलिस में रिपोर्ट होगी, पुलिस आपका चालान करेगी। होगा वही, जो मैं चाहूँगा, मगर ज़ाब्ते के साथ। खैर, यह तो मज़ाक था। आपके दोस्त मि० सलीम बहुत जल्द उस इलाके की तहकीकात करेंगे; मगर देखिए, झूठी शहादतें न पेश कीजिएगा, कि यहाँ से निकाले जायँ। मि० सलीम आपकी बड़ी तारीफ़ करते हैं; मगर भाई, मैं तुम लोगों से डरता हूँ। खासकर तुम्हारे उस स्वामी से। बड़ा ही मुफसिद आदमी है। उसे फँसा क्यों नहीं देते। मैंने सुना है वह तुम्हें बदनाम करता फिरता है।'
इतना बड़ा अफ़सर अमर से इतनी बेतकल्लुफ़ी से बातें कर रहा था, फिर उसे क्यों न नशा हो जाता? सचमुच आत्मानन्द आग लगा रहा है। अगर वह गिरफ्तार हो जाय, तो इलाके में शान्ति हो जाय। स्वामी साहसी है, यथार्थ वक्ता है, देश का सच्चा सेवक है; लेकिन इस वक्त उसका गिरफ्तार हो जाना ही अच्छा।
उसने कुछ इस भाव से जवाब दिया कि उसके मनोभाव प्रकट न हों, पर स्वामी पर वार चल जाय–मुझे तो उनसे कोई शिकायत नहीं है, उन्हें अख़तियार है, मुझे जितना चाहें बदनाम करें।
ग़ज़नवी ने सलीम से कहा–तुम नोट कर लो मि० सलीम। कल हल्के के थानेदार को लिख दो, इस स्वामी की ख़बर ले। बस, अब सरकारी काम ख़त्म। मैंने सुना है मि० अमर, कि आप औरतों को वश में करने का कोई मंत्र जानते हैं।
अमर ने सलीम की गरदन पकड़ कर कहा–तुमने मुझे बदनाम किया होगा।
सलीम बोला–तुम्हें तुम्हारी हरकतें बदनाम कर रही हैं, मैं क्यों करने लगा।
ग़ज़नवी ने बाँकपन के साथ कहा–तुम्हारी बीबी गजब की दिलेर औरत है भई! आजकल म्युनिसिपैलिटी से उनकी ज़ोर-आज़माई है और मझे यकीन है बोर्ड को झुकना पड़ेगा। मगर भई, मेरी बीवी ऐसी होती, तो मैं फ़कीर हो जाता। वल्लाह!
अमर ने हँसकर कहा–क्यों, आपको तो और खुश होना चाहिए था।
ग़ज़नवी–जी हाँ! वह तो जनाब का दिल ही जानता होगा।
सलीम–उन्हीं के खौफ़ से तो यह भागे हुए हैं।
ग़ज़नवी–यहाँ कोई जलसा करके उन्हें बुलाना चाहिए।
सलीम–क्यों बैठे-बिठाये ज़हमत मोल लीजिएगा। वह आई और शहर में आग लगी, हमें बंगलो में निकलना पड़ा।
ग़ज़नवी–अजी, यह तो एक दिन होना ही है। यह अमीरों की हुकूमत अब थोड़े दिनों की मेहमान है। इस मुल्क में अंग्रेजों का राज है; इसलिए, हममें जो अमीर हैं और जो कुदरती तौर पर अमीरों की तरफ खड़े होते, वह भी ग़रीबों की तरफ खड़े होने में खुश है क्योंकि ग़रीबों के साथ इन्हें कम-से-कम इज्जत मिलेगी, उधर तो यह डौल भी नहीं है। मैं अपने को इसी जमाअत में समझता हूँ।
तीनों मित्रों में बड़ी रात तक बेतकल्लुफी से बातें होती रहीं। सलीम ने अमर को पहले ही खूब तारीफ कर दी थी। इसलिए उसकी गँवारू सूरत होने पर भी ग़ज़नवी बराबरी के भाव से मिला। सलीम के लिए हुकूमत नयी चीज़ थी। अपने नये जूते की तरह उसे कीचड़ और पानी से बचाता था। ग़ज़नवी हुकूमत का आदी हो चुका था और जानता था कि पाँव नये जूते से कहीं ज्यादा कीमती चीज़ है। रमणी-चर्चा उसके कुतूहल, आनन्द और मनोरंजन का मुख्य विषय था। क्वाँरों की रसिकता बहुत धीरे-धीरे सूखने वाली वस्तु है। उनकी अतृप्त लालसा प्रायः रसिकता के रूप में प्रगट होती है।
अमर ने ग़ज़नवी से पूछा–आपने शादी क्यों नहीं की? मेरे एक मित्र प्रोफेसर डाक्टर शांतिकुमार है, वह भी शादी नहीं करते। आप लोग औरतों से डरते होंगे।
ग़ज़नवी ने कुछ याद कर के कहा–शांतिकुमार वही तो हैं, खूबसूरत से, गोरे-चिट्टे, गठे हुए बदन के आदमी! अजी, वह तो मेरे साथ पढ़ता था यार। हम दोनों आक्सफोर्ड में थे। मैंने लिटरेचर लिया था, उसने पोलिटिकल फिलासोफी ली थी। मैं उसे खूब बनाया करता था। युनिवर्सिटी में है न? अक्सर उसकी याद आती थी।
सलीम ने उनके इस्तीफे, ट्रस्ट और नगर-कार्य का ज़िक्र किया।
ग़ज़नवी ने गर्दन हिलायी, मानो कोई रहस्य पा गया है–तो यह कहिए, आप लोग उनके शागिर्द है। हम दोनों में अक्सर शादी के मसले पर बातें होती थीं। मुझे तो डाक्टरों ने मना किया था; क्योंकि उस वक्त मुझ में टी० बी० की कुछ अलामतें नजर आ रही थीं। जवान बेवा छोड़ जाने के खयाल से मेरी रूह काँपती थी। तबसे मेरी गुज़रान तीर-तुक्के पर ही है। शांतिकुमार को तो कौमी खिदमत और जाने क्या-क्या खब्त था; मगर ताज्जुब यह कि अभी तक उस ख़ब्त ने उसका गला नहीं छोड़ा। मैं समझता हूँ, अब उसकी हिम्मत न पड़ती होगी। मेरे ही हमसिन तो थे। ज़रा उनका पता तो बताना, मैं उन्हें यहाँ आने की दावत दूंगा।
सलीम ने सिर हिलाया–उन्हें फुरसत कहाँ। मैंने बुलाया था, नहीं आये।
ग़ज़नवी मुसकराये–तुमने निज के तौर पर बुलाया होगा। किसी इंस्टिट्यूशन की तरफ से बुलाओ और कुछ चन्दा करा देने का वादा लो, फिर देखो, चारों हाथ-पाँव से दौड़े आते हैं या नहीं। इन कौमी खादिमों की जान चन्दा है, ईमान चन्दा है और शायद खुदा भी चन्दा है। जिसे देखो, चन्दे की हाय-हाय। मैंने कई बार इन ख़ादिमों को चरका दिया, उस वक्त इन ख़ादिमों की सूरत देखने ही से ताल्लुक रखती है। गालियाँ देते हैं, पैंतरे बदलते हैं, ज़बान से तोप के गोले छोड़ते हैं, और आप उनके बौखलेपन का मजा उठा रहे हैं। मैंने तो एक बार एक लीडर साहब को पागलखाने में बन्द कर दिया था। कहते हैं अपने को कौम का ख़ादिम और लीडर समझते हैं।
सबेरे मि० ग़ज़नवी ने अमर को अपने मोटर पर गाँव में पहुँचा दिया। अमर के गर्व और आनन्द का वारापार न था। अफ़सरों की सोहबत ने कुछ अफ़सरी की शान पैदा कर दी थी। हाकिम परगना तुम्हारी हालत जाँच करने आ रहे हैं। ख़बरदार, कोई उनके सामने झूठा बयान न दे। जो कुछ वह पूछें, उनका ठीक-ठीक जवाब दो। न अपनी दशा को छिपाओ, न बढ़ा कर बताओ। तहकीकात सच्ची होनी चाहिए। मि० सलीम बड़े नेक और ग़रीब-दोस्त आदमी हैं। तहक़ीक़ात में देर ज़रूर लगेगी; लेकिन राज्य व्यवस्था में देर लगती ही है। इतना बड़ा इलाका है, महीनों घूमने में लग जायँगे। तब तक तुम लोग खरीफ़ का काम शुरू कर दो। रुपये में आठ आने छूट का मैं जिम्मा लेता हूँ। सब्र का फल मीठा होता है, इतना समझ लो।
स्वामी आत्मानन्द को भी अब विश्वास आ गया। उन्होंने देखा, अमर अकेला ही सारा यश लिये जाता है और मेरे पल्ले अपयश के सिवा और कुछ नहीं पड़ता, तो उन्होंने पहलू बदला। एक जलसे में दोनों एक ही मंच से बोले। स्वामीजी झुके, अमर ने कुछ हाथ बढ़ाया। फिर दोनों में सहयोग हो गया।
इधर असाढ़ की वर्षा शुरू हुई, उधर सलीम तहकीकात करने आ पहुँचा। दो-चार गाँवों में असामियों के बयान लिखे भी; लेकिन एक ही सप्ताह में ऊब गया। पहाड़ी डाकबँगले में भूत की तरह अकेले पड़े रहना उसके लिए कठिन तपस्या थी। एक दिन बीमारी का बहाना कर के भाग खड़ा हुआ, और एक महीने तक टाल-मटोल करता रहा। आख़िर जब ऊपर से डाँट पड़ी और ग़ज़नवी ने सख़्त ताकीद की, तो फिर चला। उस वक्त सावन की झड़ी लग गयी थी, नदी-नाले भर गये थे, और कुछ ठण्डक आ गयी थी। पहाड़ियों पर हरियाली छा गयी थी, मोर बोलने लगे थे। इस प्राकृतिक शोभा ने देहातों को चमका दिया था।
कई दिन के बाद आज बादल खुले थे। महन्तजी ने सरकारी फ़ैसले के आने तक रुपये में चार आने छूट की घोषणा कर दी थी और कारिन्दे बकाया वसूल करने की फिर चेष्टा करने लगे थे। दो-चार असामियों के साथ उन्होंने सख्ती भी की थी। इस नयी समस्या पर विचार करने के लिए आज गंगा-तट पर एक विराट् सभा हो रही थी। भोला चौधरी सभापति बनाये गये थे और स्वामी आत्मानन्द का भाषण हो रहा था–सज्जनो, तुम लोगों में ऐसे बहुत कम हैं, जिन्होंने आधा लगान न दे दिया हो। अभी तक तो आधे की चिन्ता थी। अब केवल आधे-के-आधे की चिन्ता है। तुम लोग खुशी से दो-दो आने और दे दो, सरकार महन्तजी की मालगुजारी में कुछ-न-कुछ छूट अवश्य करेगी। अब की छ: आने छूट पर सन्तुष्ट हो जाना चाहिये। आगे की फ़सल में अगर अनाज का यही भाव रहा, तो हमें आशा है कि आठ आने की छूट मिल जायगी। यह मेरा प्रस्ताव है, आप लोग इस पर विचार करें। मेरे मित्र अमरकान्तजी की भी यही राय है। अगर आप लोग कोई और प्रस्ताव करना चाहते हैं तो हम उस पर विचार करने को भी तैयार हैं।
इसी वक्त डाकिये ने सभा में आकर अमरकान्त के हाथ में एक लिफ़ाफ़ा रख दिया। पते की लिखावट ने बता दिया कि नैना का पत्र है। पढ़ते ही जैसे उस पर नशा छा गया। मुद्रा पर ऐसा तेज आ गया, जैसे अग्नि में आहुति पड़ गयी हो। गर्व भरी आँखों से इधर-उधर देखा। मन के भाव जैसे छलांगें मारने लगे। सुखदा की गिरफ्तारी और जेल यात्रा का वृत्तान्त था। अहा! वह जेल गयी और वह यहाँ पड़ा हुआ है। उसे बाहर रहने का क्या अधिकार है। वह कोमलांगी जेल में है, जो कड़ी दृष्टि भी न सह सकती थी, जिसे रेशमी वस्त्र भी चुभते थे, मखमली गद्दे भी गड़ते थे, वह आज जेल की यातना सह रही है? वह आदर्श नारी, वह देश की लाज रखनेवाली, वह कुल-लक्ष्मी आज जेल में है। अमर के हृदय का सारा रक्त सुखदा के चरणों पर गिरकर बह जाने के लिये मचल उठा। सुखदा! सुखदा! चारों ओर वही मूर्ति थी। सन्ध्या की लालिमा से रंजित गंगा की लहरों पर बैठी हुई कौन चली जा रही है? सुखदा! सामने की श्याम पर्वतमाला में गोधूलि का हार गले में डाले कौन खड़ी है? सुखदा! अमर विक्षिप्तों की भाँति कई कदम आगे दौड़ा, मानों उसको पद-रज मस्तक पर लगा लेना चाहता हो।
सभा में कौन क्या बोला इसकी ख़बर नहीं। वह खुद क्या बोला, इसकी भी उसे खबर नहीं। जब लोग अपने-अपने गांवों को लौटे तो चंद्रमा का प्रकाश फैल गया था। अमरकान्त का अन्तःकरण कृतज्ञता से परिपूर्ण था। उसे अपने ऊपर किसी की रक्षा का साया ज्योत्स्ना की भाँति फैला हुआ जान पड़ा। उसे प्रतीत हआ, जैसे उसके जीवन में कोई विधान है, कोई आदेश है कोई आशीर्वाद है, कोई सत्य है, और वह पग-पग पर उसे सँभालता है, बचाता है। एक महान् इच्छा, एक महान् चेतना के संसर्ग का आज उसे पहली बार अनुभव हुआ।
सहसा मुन्नी ने पुकारा–लाला, आज तो तुमने आग ही लगा दी।
अमर ने चौंककर कहा–मैंने!
तब उसे अपने भाषण का एक-एक शब्द याद आ गया। उसने मन्त्री का हाथ पकड़कर कहा–हाँ मुन्नी, अब हमें वही करना पड़ेगा, जो मैंने कहा। जब तक हम लगान देना बन्द न करेंगे, सरकार यों ही टालती रहेगी।
मुन्नी सशंक होकर बोली–आग में कूद रहे हो, और क्या!
अमर ने ठट्टा मार कर कहा–आग में कूदने से स्वर्ग मिलेगा। दूसरा मार्ग नहीं है!
मुन्नी चकित होकर उसका मुख देखने लगी। इस कथन में हँसने का क्या प्रयोजन है, वह समझ न सकी।
६
सलीम यहाँ से कोई सात-आठ मील पर डाक-बँगले में पड़ा हुआ था। हलके के थानेदार ने रात ही को उसे सभा की खबर दी और अमरकान्त का भाषण भी सुनाया। उसे इन सभाओं की रिपोर्ट करते रहने की ताकीद कर दी गयी थी।
सलीम को बड़ा आश्चर्य हुआ। अभी एक दिन पहले अमर उससे मिला था, और यद्यपि उसने महन्त की इस नयी कार्रवाई का विरोध किया था; पर उसके विरोध में केवल खेद था, क्रोध का नाम भी न था। आज एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया? उसने थानेदार से पूछा–महन्तजी की तरफ से कोई खास ज्यादती तो नहीं हुई?
थानेदार ने जैसे इस शंका को जड़ से काटने के लिये तत्पर हो कर कहा—बिल्कुल नहीं हुजूर। उन्होंने तो सख्त ताकीद कर दी थी कि असामियों पर किसी किस्म का जुल्म न किया जाय। बेचारे ने अपनी तरफ से चार आने की छूट दे दी, गाली-गुफ़्ता तो मामूली बात है!
'जलसे पर तकरीर का क्या असर हुआ?'
'हुजूर यही समझ लीजिए, जैसे पुआल में आग लग जाय। महन्तजी के इलाके में बड़ी मुश्किल से लगान वसूल होगा।'
सलीम ने आकाश की तरफ देखकर पूछा–आप इस वक्त मेरे साथ सदर चलने को तैयार हैं?
थानेदार को क्या उज्र हो सकता था। सलीम के जी में एक बार आया कि जरा अमर से मिले लेकिन फिर सोचा, अगर अमर उसके समझाने से माननेवाला होता, तो यह आग ही क्यों लगाता।
सहसा थानेदार ने पूछा–हुजूर से तो इनकी जान-पहचान है?
सलीम ने चिढ़ कर कहा—यह आपसे किसने कहा? मेरी सैकड़ों से जान-पहचान है, तो फिर? अगर मेरा लड़का भी क़ानून के खिलाफ़ काम करे, तो मुझे उसकी तंबीह करनी पड़ेगी।
थानेदार ने खुशामद की—मेरा यह मतलब नहीं था हुजूर! हुजूर से जान-पहचान होने पर भी उन्होंने हुजूर को बदनाम करने में ताम्मुल न किया, मेरी यही मंशा थी।
सलीम ने कुछ जवाब तो न दिया; पर यह उस मुआमले का नया पहलू था। अमर को उसके इलाके में यह तूफान न उठाना चाहिए था। आखिर अफ़सरान यही तो समझेंगे कि यह नया आदमी है, अपने इलाके पर इसका रोब नहीं है।
बादल फिर घिरा आता था। रास्ता भी ख़राब था। उस पर अँधेरी रात, नदियों का उतार; मगर उसका ग़ज़नवी से मिलना ज़रूरी था। कोई तजर्बेकार अफ़सर इस क़दर बदहवास न होता; पर सलीम था नया आदमी।
दोनों आदमी रात-भर की हैरानी के बाद सबेरे मदर पहुँचे। आज
मियाँ सलीम को आँटे दाल का भाव मालूम हुआ। यहाँ केवल हुकूमत नहीं है, हैरानी और जोखिम भी है, इसका अनुभव हुआ। जब पानी का झोंका आता या कोई नाला सामने आ पड़ता, तो वह इस्तीफ़ा देने की ठान लेता—यह नौकरी है या बला है! मजे से जिन्दगी गुजरती थी। यहाँ कूत्ते-खसी में आ फंँसा। लानत है ऐसी नौकरी पर! कहीं मोटर खड्ड में जा पड़े, तो हड्डियों का भी पता न लगे। नयी मोटर चौपट हो गयी।
बँगले पर पहुँचकर उसने कपड़े बदले, नाश्ता किया और आठ बजे ग़ज़नवी के पास जा पहुँचा। थानेदार कोतवाली में ठहरा था। उसी वक्त बह भी हाज़िर हुआ।
ग़ज़नवी ने वृत्तान्त सुनकर कहा–अमरकान्त कुछ दीवाना तो नहीं हो गया है? बातचीत से तो बड़ा शरीफ़ मालूम होता था; मगर लीडरी भी मुसीबत है। बेचारा कैसे नाम पैदा करे। शायद हजरत समझे होंगे, यह लोग तो दोस्त हो ही गये, अब क्या फ़िक्र। 'सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का!' और ज़िलों में भी तो शोरिश है। मुमकिन है, वहाँ से ताकीद हुई हो। सूझी है इन सभों को दूर की। हक यह है कि किसानों की हालत नाजुक है। यों भी बेचारों को पेटभर दाना न मिलता था, अब तो जिन्सें और भी सस्ती हो गयीं, पूरा लगान कहां, आधे की भी गुंजाइश नहीं है, मगर सरकार का इन्तजाम तो होना ही चाहिए। हुकूमत में कुछ-न-कुछ खौफ़ और रोब का होना भी जरूरी है, नहीं उसकी सुनेगा कौन। किसानों को आज यक़ीन हो जाय कि आधा लगान देकर उनकी जान बच सकती है, तो कल वह चौथाई पर लड़ेंगे और परसों पूरी मुआफ़ी का मुतालबा करेंगे। मैं तो समझता हूँ, आप जाकर लाला अमरकान्त को गिरफ्तार कर लें। एक बार कुछ हलचल मचेगी, मुमकिन है, दो-चार गाँवों में फ़साद भी हो; मगर खुले हुए फसाद को रोकना उतना मुश्किल नहीं है, जितना इस हवा को। मवाद जब फोड़े की सूरत में आ जाता है, तो उसे चीरकर निकाल दिया जा सकता है। लेकिन वही दिल-दिमाग की तरफ चला जाय, तो ज़िन्दगी का खात्मा हो जायगा। आप अपने साथ सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस को भी ले लें और अमर को दफा १२४ में गिरफ्तार कर लें। उस स्वामी को भी लीजिए। दारोगाजी आप जाकर माहब बहादुर से कहिए, तैयार रहें। सलीम ने व्यथित कण्ठ से कहा–मैं जानता कि यहाँ आते-ही-आते इस अजाब में जान फंँसेगी, तो किसी और जिले को कोशिश करता। क्या अब मेरा तबादला नहीं हो सकता?
थानेदार ने पूछा–हुजूर कोई खत न देंगे?
ग़ज़नवी ने डाँट बतायी–ख़त की जरूरत नहीं है। क्या तुम इतना भी नहीं कह सकते?
थानेदार सलाम करके चला गया, तो सलीम ने कहा–आपने इसे बुरी तरह डाँटा, बेचारा रुआँसा हो गया। आदमी अच्छा है।
ग़ज़नवी ने मुसकराकर कहा–जी हाँ, बहुत अच्छा आदमी है। रसद खूब पहुँचाता होगा; मगर रिआया से उसकी दसगुनी वसूल करता है। जहाँ किसी मातहत ने ज़रूरत से ज्यादा खिदमत और खुशामद की, मैं समझ जाता हूँ कि यह छटा हुआ गुर्गा है। आपकी लियाकत का यह हाल है कि इलाके में सदा वारदातें होती हैं, एक का भी पता नहीं चलता। इसे झुठी शहादतें बनाना भी नहीं आता। बस खुशामद की रोटियाँ खाता है। अगर सरकार पुलिस का सुधार कर सके, तो स्वराज्य की माँग पचास साल के लिए टल सकती है। आज कोई शरीफ़ आदमी पुलिस से सरोकार नहीं रखना चाहता। थाने को बदमाशों का अड्डा समझकर उधर से मुंह फेर लेता है। यह सीगा इस राज का कलंक है। अगर आपको अपने दोस्त को गिरफ्तार करने में तकल्लुफ़ हो, तो मैं डी० एस० पी० को ही भेज दूं। उन्हें गिरफ्तार करना अब हमारा फर्ज हो गया है। अगर आप यह नहीं चाहते कि उनकी जिल्लत हो, तो आप जाइए। अपनी दोस्ती का हक़ अदा करने ही के लिए जाइए। मैं जानता हूँ, आपको सदमा हो रहा है। मुझे खुद रंज है। उस थोड़ी देर की मुलाकात में ही मेरे दिल पर उनका सिक्का जम गया। मैं उनके नेक इरादों की क़द्र करता हूँ; लेकिन हम और वह दो कैम्पों में हैं। स्वराज्य हम भी चाहते हैं; मगर इनक़लाब की सूरत में नहीं। हालाँकि कभी-कभी मुझे भी ऐसा मालूम होता है कि इनक़लाब के सिवा हमारे लिए दूसरा रास्ता नहीं हैं। इतनी फौज रखने की क्या जरूरत है, जो सरकार की आमदनी का आधा हजम कर जाय। फ़ौज का खर्च आधा कर दिया जाय, तो किसानों का लगान बड़ी आसानी से आधा हो सकता है। मुझे अगर
स्वराज्य से कोई ख़ौफ है तो यह कि मुसलमानों की हालत कहीं और खराब न हो जाय। गलत तवारीखें पढ़-पढ़ कर दोनों फिरके एक दूसरे के दुश्मन हो गये हैं और मुमकिन नहीं कि हिन्दू मौका पाकर मुसलमानों से पुरानी अदावतों का बदला न लें, लेकिन इस ख्याल से तसल्ली होती है कि इस बीसवीं सदी में हिन्दुओं जैसी पढ़ी-लिखी जमाअत मज़हबी गरोहबन्दी की पनाह नहीं ले सकती। मज़हब का दौर तो ख़त्म हो रहा है; बल्कि यों कहो कि ख़त्म हो गया। सिर्फ हिन्दुस्तान में उसमें कुछ-कुछ जान बाकी है। यह तो दौलत का ज़माना है। अब कौम में अमीर और ग़रीब, जायदादवाले और मर-भुखे, अपनी-अपनी जमाअतें बनायेंगे। उनमें कहीं ज्यादा खूंरेजी होगी, कहीं ज्यादा तंगदिली होगी। आखिर एक-दो सदी के बाद दुनिया में एक सल्तनत हो जायगी। सबका एक कानून एक निज़ाम होगा, कौम के खादिम कौम पर हुकूमत करेंगे, मजहब शख्सी चीज़ होगी। न कोई राजा होगा, न कोई परजा।
फ़ोन की घण्टी बजी, ग़ज़नवी ने चोंगा कान से लगाया–मि० सलीम कब चलेंगे?
ग़ज़नवी ने पूछा–आप कब तैयार होंगे?
'मैं तैयार हूँ।'
'तो एक घण्टे में आ जाइए।'
सलीम ने लम्बी साँस खींचकर कहा–तो मुझे जाना ही पड़ेगा?
'बेशक! मैं आपके और अपने दोस्त को पुलिस के हाथ में नहीं देना चाहता।'
'किसी हीले से अमर को यहीं बुला क्यों न लिया जाय?'
'वह इस वक्त नहीं आयेंगे।'
सलीम ने सोचा, अपने शहर में जब यह ख़बर पहुँचेगी कि मैंने अमर को गिरफ्तार किया, तो मुझ पर कितने जूते पड़ेंगे! शांतिकुमार तो नोच ही खायेंगे और सकीना तो शायद मेरा मुँह देखना भी पसन्द न करे। इस ख़्याल से वह काँप उठा। सोने की हँसिया न उगलते बनती थी, न निगलते।
उसने उठकर कहा–आप डी० एम० पी० को भेज दें। मैं नहीं जाना चाहता। ग़ज़नवी ने गंभीर होकर पूछा–आप चाहते हैं कि उन्हें वहीं से हथकड़ियाँ पहनाकर और कमर में रस्सी डालकर चार कांसटेबलों के साथ लाया जाय और जब पुलिस उन्हें लेकर चले तो उसे भीड़ को हटाने के लिए गोलियाँ चलानी पड़ें?
सलीम ने घबड़ाकर कहा–क्या डी० एस० पी० को इन साख्तियों से रोका नहीं जा सकता?
'अमरकान्त आपके दोस्त हैं, डी० एस० पी० के दोस्त नहीं।'
'तो फिर आप डी० एस० पी० को मेरे साथ न भेजें।'
'आप अमर को यहाँ ला सकते हैं?'
'दग़ा करनी पड़ेगी।'
'अच्छी बात है, आप जाइए, मैं डी० एस० पी० को मना किए देता हूँ।'
'मैं वहाँ कुछ कहूँगा ही नहीं।'
'इसका आपको अख्तियार है।'
सलीम अपने डेरे पर लौटा, तो ऐसा रंजीदा था, गोया अपना कोई अज़ीज़ मर गया हो। आते ही आते उसने सकीना, शांतिकुमार, लाला समरकान्त, नैना, सबों को एक-एक खत लिखकर अपनी मजबूरी और दुःख प्रकट किया। सकीना को उसने लिखा–मेरे दिल पर इस वक्त जो गुज़र रही है, वह मैं तुमसे बयान नहीं कर सकता! शायद अपने जिगर पर खंजर चलाते हुए भी मुझे इससे ज्यादा दर्द न होता। जिसकी मुहब्बत मुझे यहाँ खींच लाई, उसी को मैं आज इन ज़ालिम हाथों से गिरफ्तार करने जा रहा हूँ। सकीना, खुदा के लिए मुझे कमीना, बेदर्द और खुदगरज न समझो! मैं खून के आँसू रो रहा हूँ। इसे अपने आँचल से पोंछ दो। मुझ पर अमर के इतने एहसान है कि मुझे उनके पसीने की जगह अपना खून बहाना चाहिए था; पर मैं उनके खून का मजा ले रहा हूँ। मेरे गले में शिकारी का तौक़ है और उसके इशारे पर मैं वह सब कुछ करने पर मजबूर हूँ, जो मुझे न करना लाजिम था। मुझ पर रहम करो, सकीना! मैं बदनसीब हूँ।
खानसामा ने आकर पूछा–हुजूर, खाना तैयार है।
सलीम ने सिर झुकाये हुए कहा–मुझे भूख नहीं है।
खानसामा पूछना चाहता था, हुजूर की तबीयत कैसी है। मेज पर कई लिखे खत देखकर डर रहा था कि घर से कोई बरी खबर तो नहीं आई।
सलीम ने सिर उठाया और हसरत भरे स्वर में बोला–उस दिन वह मेरे एक दोस्त नहीं आये थे, वहीं देहातियों की-सी सूरत बनाये हुए। वह मेरे बचपन के साथी है। हम दोनों ने एक ही कालेज में पढ़ा। घर के लखपती आदमी हैं। बाप हैं, बाल-बच्चे हैं। इतने लायक हैं कि मुझे उन्होंने पढ़ाया। चाहते, तो किसी अच्छे ओहदे पर होते। फिर उनके घर ही किस बात की कमी है; मगर गरीबों का इतना दर्द है कि घर-बार छोड़कर यहीं एक गाँव में किसानों की खिदमत कर रहे हैं। उन्हीं को गिरफ्तार करने का मुझे हुक्म हुआ है।
खानसामा और समीप आकर जमीन पर बैठ गया–क्या क़सूर किया था हुजूर उन बाबू साहब ने?
'क़सूर कोई नहीं, यही कि किसानों की मुसीबत उनसे नहीं देखी जाती।'
'हुजूर ने बड़े साहब को समझाया नहीं?'
'मेरे दिल पर इस वक्त जो कुछ गुजर रही है, वह मैं ही जानता हूँ हनीफ़, आदमी नहीं फरिश्ता है। यह है सरकारी नौकरी।'
'तो हुजूर को जाना पड़ेगा?'
'हाँ, इसी वक्त! इस तरह दोस्ती का हक़ अदा किया जाता है!'
'तो उन बाबू साहब को नजरबन्द किया जायगा हुजूर?'
'खुदा जाने क्या किया जायगा। ड्राइवर से कहो, मोटर लाये। शाम तक लौट आना जरूरी है।'
ज़रा देर में मोटर आ गयी। सलीम उसमें आकर बैठा तो उसकी आँखें सजल थीं।
७
आज कई दिन के बाद तीसरे पहर सूर्यदेव ने पृथ्वी की पुकार सुनी और जैसे समाधि से निकलकर उसे आशीर्वाद दे रहे थे। पृथ्वी मानो अंचल फैलाये उनका आशीर्वाद बटोर रही थी। इसी वक्त स्वामी आत्मानन्द और अमरकान्त दोनों दो दिशाओं से मदरसे में आये।
अमरकान्त ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा–हम लोगों ने कितना अच्छा प्रोग्राम बनाया था कि एक साथ लौटे। एक क्षण का भी विलंब न हुआ। कुछ खा-पीकर फिर निकलें और आठ बजते-बजते लौट आयें।
आत्मानन्द ने भूमि पर लेटकर कहा–भैया, अभी तो मुझसे एक पग न चला जायगा, हाँ प्राण लेना चाहो, तो ले लो। दौड़ते-दौड़ले कचूमर निकल गया। पहले शर्बत बनवाओ, पीकर ठण्डे हों, तो आँखें खुलें।
'तो फिर आज काम समाप्त हो चुका।'
'हो या भाड़ में जाय, क्या प्राण दे दें। तुमसे हो सकता है करो, मुझसे तो नहीं हो सकता।'
अमर ने मुसकराकर कहा—यार! मुझसे दूने तो हो, फिर भी चें बोल गये। मुझे अपना बल और अपना पाचन दे दो, फिर देखो, मैं क्या करता हूँ।
आत्मानन्द ने सोचा था, उनकी पीठ ठोंकी जायगी, यहाँ उनके पौरुष पर आक्षेप हुआ। बोले—तुम मरना चाहते हो, मैं जीना चाहता हूँ।
'जीने का उद्देश्य तो कर्म है।'
'हाँ, मेरे जीवन का उद्देश्य कर्म ही है। तुम्हारे जीवन का उद्देश्य तो अकाल मृत्यु है।'
'अच्छा शर्बत पिलवाता हूँ, उसमें दही भी डलवा दूँ?'
'हाँ, दही की मात्रा अधिक हो और दो लोटे से कम न हो। इसके दो घण्टे के बाद भोजन चाहिए।'
'मार डाला! तब तक तो दिन ही ग़ायब हो जायगा।'
अमर ने मुन्नी को बुलाकर शर्बत बनाने को कहा—और स्वामीजी के बराबर ही ज़मीन पर लेटकर पूछा—इलाके की क्या हालत है?
'मुझे तो भय हो रहा है कि लोग धोखा देंगे। बेदखली शुरू हुई, तो बहुतों के आसन डोल जायेंगे।'
'तुम तो दार्शनिक न थे, यह घी पत्ते पर या पत्ता घी पर की शंका कहाँ से लाये?' 'ऐसा काम ही क्यों किया जाय, जिसका अन्त लज्जा और अपमान हो। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे बड़ी निराशा हुई।'
'इसका अर्थ यह है, कि आप इस आन्दोलन के नायक बनने के योग्य नहीं हैं। नेता में आत्मविश्वास, साहस और धैर्य, ये मुख्य लक्षण हैं।
मुन्नी शर्बत बनाकर लाई। आत्मानन्द ने कमण्डल भर लिया और एक साँस में चढ़ा गये। अमरकान्त एक कटोरे से ज्यादा न पी सका।
आत्मानन्द ने मुँह चिढ़ाकर कहा—बस! फिर भी आप अपने को मनुष्य कहते हैं।
अमर ने जवाब दिया–बहुत खाना पशुओं का काम है।
'जो खा नहीं सकता वह काम क्या करेगा।'
'नहीं, जो कम खाता है, वही काम करता है, पेटू के लिए सबसे बड़ा काम भोजन पचाना है।'
सलोनी कल से बीमार थी। अमर उसे देखने चला था, कि मदरसे के सामने ही मोटर आते देखकर रुक गया। शायद इस गाँव में मोटर पहली बार आई है। वह सोच रहा था, किसका मोटर है, कि सलीम उसमें से उतर पड़ा। अमर ने लपककर हाथ मिलाया–कोई ज़रूरी काम था, मुझे क्यों न बुला लिया?
दोनों आदमी मदरसे में आये। अमर ने एक खाट लाकर डाल दी और बोला–तुम्हारी क्या खातिर करूँ। यहाँ तो फकीरों की हालत है। शर्बत बनाऊँ?
सलीम ने सिगार जलाते हुए कहा–नहीं, कोई तकल्लुफ नहीं। मि० गजनवी तुमसे किसी मुआमले में सलाह करना चाहते हैं। मैं आज ही जा रहा हूँ। सोचा तुम्हें भी लेता चलूं। तुमने तो कल आग लगा ही दी। अब तहक़ीक़ात से क्या फायदा होगा। वह तो बेकार हो गयीं।
अमर ने कुछ झिझकते हुए कहा—महन्तजी ने मजबूर कर दिया। क्या करता।
सलीम ने दोस्ती की आड़ ली—मगर इतना तो सोचते कि यह मेरा इलाका है और यहाँ की सारी जिम्मेदारी मुझ पर है। मैंने सड़क के किनारे अक्सर गाँवों में लोगों के जमाव देखे। कहीं-कहीं तो मेरी मोटर पर पत्थर भी कर्मभूमि
फेंके गये। यह अच्छे आसार नहीं हैं। मुझे खौफ़ है, कोई हंगामा न हो जाय। अपने हक के लिए या बेजा जुल्म के खिलाफ़ रिआया में जोश हो, तो मैं इसे बुरा नहीं समझता, लेकिन यह लोग कायदे-कानून के अन्दर रहेंगे, मुझे इसमें शक है। तुमने गूगों को आवाज़ दी, सोतों को जगाया; लेकिन ऐसी तहरीक के लिए जितने जब्त और सब्र की जरूरत है, उसका दसवाँ हिस्सा भी मुझे नजर नहीं आता।
अमर को इस कथन में शासन-पक्ष की गन्ध आयी। बोला—तुम्हें यकीन है कि तुम भी वही गलती नहीं कर रहे जो हुक्काम किया करते हैं? जिनकी जिन्दगी आराम और फ़रागत से गुजर रही है, उनके लिए सब्र और जब्त की हाँक लगाना आसान है, लेकिन जिनकी जिन्दगी का हरेक दिन एक नयी मुसीबत है, वह नजात के अपनी जनवासी चाल से आने का इन्तजार नहीं कर सकते। वह उसे खींच लाना चाहते हैं, और जल्द-से-जल्द।
'मगर नजात के पहले कयामत आयेगी, यह भी याद रहे।'
'हमारे लिए यह अंधेर ही कयामत है। जब पैदावार लागत से भी कम हो, तो लगान की गुंजाइश कहाँ। उस पर भी हम आठ आने पर राजी थे; मगर बारह आने हम किसी तरह नहीं दे सकते। आखिर सरकार किफायत क्यों नहीं करती? पुलिस और फौज और इन्तजाम पर क्यों इतनी बेदर्दी से रुपये उड़ाये जाते हैं? किसान गूंगे हैं, बेबस हैं, कमजोर हैं। क्या इसलिए सारा नजला उन्हीं पर गिरना चाहिए?'
सलीम ने अधिकार-गर्व से कहा–इसका नतीजा क्या होगा, जानते हो? गांव-के-गाँव बरबाद हो जायेंगे, फौजी कानून जारी हो जायगा, जायद पुलिस बैठा दी जायगी, फ़स्लें नीलाम कर दी जायगी, जमीनें जब्त हो जायँगी। कयामत का सामना होगा।
अमरकान्त ने अविचलित भाव से कहा–जो कुछ भी हो, मर-मिटना जुल्म के सामने सिर झुकाने से अच्छा है।
मदरसे के सामने हुजूम बढ़ता जाता था। सलीम ने विवाद का अन्त करने के लिए कहा—चलो इस मुआमले पर रास्ते में बहस करेंगे। देर हो रही है।
अमर ने चटपट कुरता गले में डाला और आत्मानन्द से दो-चार जरूरी बाते करके आ गया। दोनों आदमी आकर मोटर पर बैठे। मोटर चली तो सलीम की आँखों में आँसू डबडबाये हुए थे।
अमर ने सशंक होकर पूछा–मेरे साथ दगा तो नहीं कर रहे हो?
सलीम ने अमर के गले लिपट कर कहा–इसके सिवा और दूसरा रास्ता न था। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें पुलिस के हाथों ज़लील किया जाय।
'तो ज़रा ठहरो, मैं अपनी कुछ ज़रूरी चीज़ें तो ले लूँ।'
'हाँ हाँ, ले लो, लेकिन राज़ खुल गया, तो यहाँ मेरी लाश नज़र आयेगी।'
'तो चलो कोई मुज़ायका नहीं।'
गाँव के बाहर निकले ही थे कि मुन्नी आती हई दिखाई दी। अमर ने मोटर रुकवाकर पूछा–तुम कहाँ गयी थीं मुन्नी? धोबी से मेरे कपड़े लेकर रख लेना, सलोनी काकी के लिए मेरी कोठरी में ताक पर दवा रखी है। पिला देना।
मुन्नी ने सहमी हुई आँखों से देखकर पूछा–तुम कहाँ जाते हो?
'एक दोस्त के यहाँ दावत खाने जा रहा हूँ।'
मोटर चली। मुन्नी ने पूछा–कब तक आओगे?
अमर ने सिर निकालकर उसे दोनों हाथ जोड़कर कहा–जब भाग्य लाये।
साथ पढ़े, साथ के खेले, दो अभिन्न मित्र, जिनमें धौल धप्पा, हँसी-मज़ाक सब कुछ होता रहता था, परिस्थितियों के चक्कर में पड़कर दो अलग रास्तों पर जा रहे थे। लक्ष्य दोनों का एक था, उद्देश्य एक, दोनों ही देशभक्त, दोनों ही किसानों के शुभेच्छु; पर एक अफसर था, दूसरा क़ैदी। दोनों उठे हुए बैठे थे, पर जैसे बीच में कोई दीवार खड़ी हो। अमर प्रसन्न था, मानो शहादत के ज़ीने पर चढ़ रहा हो। सलीम दुःखी था, जैसे भरी सभा में अपनी जगह से उठा दिया गया हो। विकास के सिद्धान्त खुली सभा में समर्थन करके उसकी आत्मा विजयी होती, निरंकुशता की शरण लेकर वह जैसे कोठरी में छिपा बैठा था।
सहसा सलीम ने मुसकराने की चेष्टा करके कहा–क्यों अमर, मुझसे खफा हो! अमर ने प्रसन्न मुख से कहा–बिल्कुल नहीं। मैं तुम्हें अपना वही पुराना दोस्त समझ रहा हूँ। उसूलों की लड़ाई हमेशा होती रही है और होता रहेगी! दोस्ती में इससे फ़र्क नहीं आता।
सलीम ने अपनी सफ़ाई दी–भाई, इन्सान इन्सान है, दो मुखालिफ गिरोहों में आकर दिल में कीना या मलाल पैदा हो जाय, तो ताज्जुब नहीं। पहले डी० एस० पी० को भेजने की सलाह थी; पर मैंने इसे मुनासिव न समझा।
'इसके लिए मैं तुम्हारा बड़ा एहसानमन्द हूँ। मेरे ऊपर कोई मुकदमा चलाया जायगा?'
'हाँ तुम्हारी तकरीरों की रिपोर्ट मौजूद है, और शहादतें भी जमा हो गयी है। तुम्हारा क्या खयाल है, तुम्हारी गिरफ्तारी से यह शोरिश दब जायगी या नहीं?'
'कुछ कह नहीं सकता। अगर मेरी गिरफ्तारी या सज़ा से दब जाय, तो इसका दब जाना ही अच्छा।'
उसने एक क्षण के बाद फिर कहा–रिआया को मालूम है कि उनके क्या-क्या हक़ हैं। यह भी मालूम है कि हकों की हिफ़ाज़त के लिए कुरबानियाँ करनी पड़ती हैं। मेरा फ़र्ज़ यहीं तक ख़त्म हो गया। अब वह जानें और उनका काम जाने। मुमकिन है, सख्तियों से दब जायँ, मुमकिन है, न दबें; लेकिन दबें या उठे, उन्हें चोट ज़रूर लगी है। रिआया का दब जाना, किसी सरकार की कामयाबी की दलील नहीं है।
मोटर के जाते ही सत्य मुन्नी के सामने चमक उठा। वह आवेश में चिल्ला उठी–लाला पकड़ गये! और उसी आवेश में मोटर के पीछे दौड़ी। चिल्लाती जाती थी–लाला पकड़ गये।
वर्षाकाल में किसानों की हार में बहुत काम नहीं होता। अधिकतर लोग घरों पर होते हैं। मुन्नी की आवाज मानो खतरे का बिगुल थी। दम-के-दम में सारे गाँव में यह आवाज़ गूँज उठी–भैया पकड़ गये!
स्त्रियाँ घरों में से निकल पड़ी–पकड़ गये!
क्षण-भर में सारा गाँव जमा हो गया और सड़क की तरफ दौड़ा। मोटर घुमकर सड़क से जा रही थी। पगडंडियों का एक सीधा रास्ता था। लोगों ने अनुमान किया, अभी इस रास्ते मोटर पकड़ी जा सकती है। सब उसी रास्ते दौड़े।
काशी–मरना तो एक दिन है ही।
मुन्नी ने कहा–पकड़ना है, तो सबको पकड़ें। ले चलें सबको।
पयाग बोला—सरकार का काम है चोर बदमाशों को पकड़ना या ऐसो को जो दूसरों के लिए जान लड़ा रहे हैं? वह देखो मोटर आ रही है। बस, सब रास्ते में खड़े हो जाओ। कोई न हटना, चिल्लाने दो।
सलीम मोटर रोकता हुआ बोला–अब कहो भाई, निकालूँ पिस्तौल?
अमर ने उसका हाथ पकड़कर कहा–नहीं-नहीं, मैं इन्हें समझाये देता हूँ।
'मझे पुलिस के दो-चार आदमियों को साथ ले लेना था।'
"घबड़ाओ मत, पहले मैं मरूँगा, फिर तुम्हारे ऊपर कोई हाथ उठायेगा।'
अमर ने तुरन्त मोटर से सिर निकालकर कहा–बहनो और भाइयो, अब मझे विदा कीजिए। आप लोगों के सत्संग में मुझे जितना स्नेह और सुख मिला, उसे मैं कभी भूल नहीं सकता। मैं परदेशी मुसाफिर था। आपने मुझे स्थान दिया, आदर दिया, प्रेम दिया। मुझसे भी जो कुछ सेवा हो सकी, वह मैंने की। अगर मुझसे कुछ भूल-चूक हुई हो, तो क्षमा करना। जिस काम का बीड़ा उठाया है, उसे छोड़ना मत, यही मेरी याचना है। सब काम ज्यों-का-त्यों होता रहे, यही सबसे बड़ा उपहार है, जो आप मुझे दे सकते हैं। प्यारे बालको, मैं जा रहा हूँ, लेकिन मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा।
काशी ने कहा–भैया, हम सब तुम्हारे साथ चलने को तैयार हैं।
अमर ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—नेवता तो मझे मिला है, तुम लोग कैसे जाओगे?
किसी के पास इसका जवाब न था। भैया बात ही ऐसी कहते हैं कि किसी से उसका जवाब नहीं बन पड़ता।
मुन्नी सबसे पीछे खड़ी थी, उसकी आँखें सजल थीं। इस दशा में अमर के सामने कैसे जाय। हृदय में जिस दीपक को जलाये, वह अपने अँधेरे जीवन में प्रकाश का स्वप्न देख रही थी, वह दीपक कोई उसके हदय से निकाले लिये जाता है। वह सूना अन्धकार क्या फिर वह सह सकेगी!
सहसा उसने उत्तेजित होकर कहा–इतने जने खड़े ताकते क्या हो! उतार लो मोटर से! जन-समूह में एक हलचल मची। एक ने दूसरे की ओर कैदियों की तरह देखा; कोई बोला नहीं।
मुन्नी ने फिर ललकारा–खड़े ताकते क्या हो, तुम लोगों में कुछ हया है या नहीं! जब पुलिस और फौज इलाके को खून से रंग देती, तभी…
अमर ने मोटर से निकलकर कहा—मुन्नी, तुम बुद्धिमती होकर ऐसी बातें कर रही हो! मेरे मुँह में कालिख मत लगाओ।
मुन्नी उन्मत्तों की भाँति बोली—में बुद्धिमान् नहीं, मैं तो मूरख हूँ, गॅवारिन हूँ। आदमी एक-एक पत्ती के लिए सिर कटा देता है, एक-एक बात पर जान दे देता है। क्या हम लोग खड़े ताकते रहें और तुम्हें कोई पकड़ ले जाय? तुमने कोई चोरी की है, डाका मारा है?
कई आदमी उत्तेजित होकर मोटर की ओर बढ़े; पर अमरकान्त की डाँट सुनकर ठिठक गये–क्या करते हो! पीछे हट जाओ। अगर मेरे इतने दिनों की सेवा और शिक्षा का यही फल है, तो मैं कहूँगा कि मेरा सारा परिश्रम धूल में मिल गया। यह हमारा धर्म-युद्ध है और हमारी जीत हमारे त्याग, हमारे बलिदान और हमारे सत्य पर है।
जादू का-सा असर हुआ। लोग रास्ते से हट गये। अमर मोटर में बैठ गया और मोटर चली।
मुन्नी ने आँखों में क्षोभ और क्रोध के आँसू भर अमरकान्त को प्रणाम किया। मोटर के साथ जैसे उसका हृदय भी उड़ा जाता हो।
तीसरा भाग
१
लाला समरकान्त की जिन्दगी के सारे मंसूबे धूल में मिल गये। उन्होंने कल्पना की थी कि जीवन-संध्या में अपना सर्वस्व बेटे को सौंपकर और बेटी का विवाह करके किसी एकान्त में बैठकर भगवत्-भजन में विश्राम लेंगे, लेकिन मन की मन में ही रह गई। यह मानी हुई बात थी, कि वह अन्तिम साँस तक विश्राम लेने वाले प्राणी न थे। लड़के को बढ़ते देखकर उनका हौसला और बढ़ता, लेकिन कहने को हो गया। बीच में अमर कुछ ढरें पर आता हुआ जान पड़ता था, लेकिन जब उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई, तो अब उससे क्या आशा की जा सकती थी। अमर में और चाहे जितनी बुराइयां हों उसके चरित्र के विषय में कोई सन्देह न था, पर कुसंगति में पड़कर उसने धर्म भी खोया, चरित्र भी खोया, और कुल मर्यादा भी खोई। लाला जी कुत्सित सम्बन्ध को बहुत बुरा न समझते थे। रईसों में यह प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। वह रईस ही क्या, जो इस तरह का खेल न खेले, लेकिन धर्म छोड़ने को तैयार हो जाना, खुले खजाने समाज की मर्यादाओ को तोड़ डालना यह तो पागलपन है, बल्कि गधापन।
समरकान्त का व्यावहारिक जीवन उनके धार्मिक जीवन से बिल्कुल अलग था। व्यवहार और व्यापार में वह धोखा-धड़ी, छल-प्रपंच, सब कुछ क्षम्य समझते थे। व्यापार-नीति में सन या कपास में कचरा भर देना, घी में आलू या घुइयाँ गबड़ देना, औचित्य से बाहर न था, पर बिना स्नान किये वह मुंह में पानी न डालते थे। इन चालीस वर्षों में ऐसा शायद ही कोई दिन हुआ हो, कि उन्होंने सन्ध्या-समय की आरती न ली हो और तुलसी-दल माथे पर न चढ़ाया हो। एकादशी को बराबर निर्जल व्रत रखते थे। सारांश यह कि उनका धर्म आडम्बर-मात्र था, जिसका उनके जीवन से कोई प्रयोजन न था।
सलीम के घर से लौटकर पहला काम जो लाला ने किया, वह सुखदा को
फटकारना था। इसके बाद नैना की बारी आयो। दोनों को रुलाकर वह अपने कमरे में गये और खुद रोने लगे।
रातोरात यह खबर सारे शहर में फैल गयी। तरह-तरह की मिस्कौट होने लगी। समरकान्त दिन भर घर से नहीं निकले। यहाँ तक कि आज गंगा-स्नान करने भी न गये। कई असामी रुपये लेकर आये। मुनीम तिजोरी की कुंजी माँगने गया। लालाजी ने ऐसा डाँटा कि वह चुपके से बाहर निकल आया। असामी रुपये लेकर लौट गये।
खिदमतगार ने चाँदी का गड़गड़ा लाकर सामने रख दिया। तंबाकू जल गया, लालाजी ने निगाली भी मुँह में न ली।
दस बजे सुखदा ने आकर कहा–आप क्या भोजन कीजिएगा?
लालाजी ने उसे कठोर आँखों से देखकर कहा–मुझे भूख नहीं हैं।
सुखदा चली गयी। दिन भर किसी ने कुछ न खाया।
नौ बजे रात को नैना ने आकर कहा–दादा, आरती में न जाइएगा?
लालाजी चौंके–हाँ हाँ, जाऊँगा क्यों नहीं। तुम लोगों ने कुछ खाया कि नहीं?
नैना बोली–किसी की इच्छा ही न थी। कौन खाता?
'तो क्या उसके पीछे सारा घर प्राण देगा?'
सुखदा इसी समय तैयार होकर आ गयी। बोली–जब आप ही प्राण दे रहे हैं, तो दूसरों पर बिगड़ने का आपको क्या अधिकार है?
लालाजी चादर ओढ़कर जाते हुए बोले–मेरा क्या बिगड़ा है कि में प्राण दूँ। यहाँ था, तो मुझे कौन-सा सुख देता था। मैंने तो बेटे का सुख ही नहीं जाना। तब भी जलाता था, अब भी जला रहा है। चलो भोजन बनाओ मैं आकर खाऊँगा, जो गया उसे जाने दो। जो हैं उन्हीं को उस जानेवाले की कसर पूरी करनी है। मैं क्यो प्राण देने लगा। मैंने पुत्र को जन्म दिया। उसका विवाह भी मैने किया। सारी गृहस्थी मैंने बनायी। इसके चलाने का भार मुझ पर है। मुझे अब बहुत दिन जीना है। मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि इस लौंडे को यह सूझी क्या? पठानिन की पोती अप्सरा नहीं हो सकती। फिर उसके पीछे वह क्यों इतना लट्टू हो गया? उसका तो ऐसा स्वभाव न था। इसी को भगवान् की लीला कहते हैं। ठाकुर-द्वारे में लोग जमा हो गये। लाला समरकान्त को देखते ही कई सज्जनों ने पूछा–अमर कहीं चले गये क्या सेठजी! क्या बात हुई?
लालाजी ने जैसे इस बात को काटते हुए कहा–कुछ नहीं, उसकी बहुत दिनों से घूमने-धामने की इच्छा थी, पूर्वजन्म का तपस्वी है कोई, उसका बस चले, तो मेरी सारी गृहस्थी एक दिन में लुटा दे। मझसे यह नहीं देखा जाता। बस, यही झगड़ा है। मैंने गरीबी का मजा भी चखा है। अमीरी का मजा भी चखा है। उसने अभी गारीबी का मज़ा नहीं चखा। साल छ: महीने उसका मजा चख लेगा, तो आँख खुल जायँगी। तब उसे मालूम होगा कि जनता की सेवा भी वही लोग कर सकते हैं, जिनके पास धन है। घर में भोजन का आधार न होता, तो मेम्बरी भी न मिलती।
किसी को और कुछ पूछने का साहस न हुआ। मगर मूर्ख पुजारी पूछ ही बैठा–सुना, किसी जुलाहे की लड़की से फंस गये थे?
यह अक्खड़ प्रश्न सुनकर लोगों ने जीभ काटकर मुँह फेर लिये। लालाजी ने पुजारी को रक्त भरी आँखों से देखा और ऊँचे स्वर में बोले–हाँ, फँस गये थे, तो फिर ? कृष्ण भगवान् ने एक हजार रानियों के साथ नहीं भोग किया था? राजा शान्तनु ने मछुए की कन्या से नहीं भोग किया था? कौन राजा है, जिसके महल में दो सौ रानियाँ न हों? अगर उसने किया, तो कोई नयी बात नहीं की। तुम-जैसों के लिए यही जवाब हैं। समझदारों के लिए यह जवाब है कि जिसके घर में अप्सरा-सी स्त्री हो, वह क्यों जूठी पत्तल चाटने लगा। मोहन-भोग खानेवाले आदमी चबैने पर नहीं गिरते।
यह कहते हुए लालाजी प्रतिमा के संमुख गये; पर आज उनके मन में वह श्रद्धा न थी। दुःखी आशा से ईश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से। दुःखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढ़ती जाती है। सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है। वह ईश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है। लालाजी का व्यथित हृदय आज सोने और रेशम से जगमगाती हुई प्रतिमा में धैर्य और सन्तोष का सन्देश न पा सका। कल तक यही प्रतिमा उन्हें बल और उत्साह प्रदान करती थी। उसी प्रतिमा से आज उनका विपद्ग्रस्त मन विद्रोह कर रहा था। उनकी भक्ति का यही पुरस्कार है? उनके स्नान, व्रत और निष्ठा का यही फल है?
वह चलने लगे, तो ब्रह्मचारी जी बोले–लालाजी, अबकी यहाँ श्री वाल्मीकीय कथा का विचार है।
लालाजी ने पीछे फिरकर कहा–हाँ हाँ, होने दो।
एक बाबू साहब ने कहा–यहाँ तो किसी में इतना सामर्थ्य नहीं है।
समरकान्त ने उत्साह से कहा–हाँ हाँ, मैं उसका सारा भार लेने को तैयार हूँ। भगवद् भजन से बढ़कर धन का सदुपयोग और क्या होगा?
उनका यह उत्साह देखकर लोग चकित हो गये। वह कृपण थे और किसी धर्मकार्य में अग्रसर न होते थे। लोगों ने समझा था, इससे दस-बीस रुपये ही मिल जायँ तो बहुत है ! उन्हें यों बाजी मारते देखकर और लोग भी गरमाये।
सेठ धनीराम ने कहा–आपसे सारा भार लेने को नहीं कहा जाता लालाजी ! आप लक्ष्मीपात्र हैं सही; पर औरों को भी तो श्रद्धा है। चन्दे से होने दीजिए।
समरकान्त बोले–तो और लोग आपस में चन्दा कर लें। जितनी कमी रह जायगी, वह मैं पूरी कर दूँगा।
धनीराम को भय हुआ, कहीं, यह महाशय सस्ते न छूट जायँ। बोले–यह नहीं, आपको जितना लिखना हो लिख दें।
समरकान्त ने होड़ के भाव से कहा–पहले आप लिखिए।
काग़ज़, क़लम, दावात लाया गया। धनीराम ने लिखा १०१)
समरकान्त ने ब्रह्मचारी जी से पूछा–आपके अनुमान से कुल कितना खर्च होगा?
ब्रह्मचारी जी का तख़मीना एक हजार का था।
समरकान्त ने ८९९) लिख दिये, और वहाँ से चल दिये। सच्ची श्रद्धा की कमी को वह धन से पूरा करना चाहते थे। धर्म की क्षति जिस अनुपात से होती है, उसी अनुपात से आडम्बर की वृद्धि होती है।
This work is in the public domain in the United States because it was first published outside the United States (and not published in the U.S. within 30 days), and it was first published before 1989 without complying with U.S. copyright formalities (renewal and/or copyright notice) and it was in the public domain in its home country on the URAA date (January 1, 1996 for most countries).
Public domain Public domain false false
तीसरा भाग
१
लाला समरकान्त की जिन्दगी के सारे मंसूबे धूल में मिल गये। उन्होंने कल्पना की थी कि जीवन-संध्या में अपना सर्वस्व बेटे को सौंपकर और बेटी का विवाह करके किसी एकान्त में बैठकर भगवत्-भजन में विश्राम लेंगे, लेकिन मन की मन में ही रह गई। यह मानी हुई बात थी, कि वह अन्तिम साँस तक विश्राम लेने वाले प्राणी न थे। लड़के को बढ़ते देखकर उनका हौसला और बढ़ता, लेकिन कहने को हो गया। बीच में अमर कुछ ढरें पर आता हुआ जान पड़ता था, लेकिन जब उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई, तो अब उससे क्या आशा की जा सकती थी। अमर में और चाहे जितनी बुराइयां हों उसके चरित्र के विषय में कोई सन्देह न था, पर कुसंगति में पड़कर उसने धर्म भी खोया, चरित्र भी खोया, और कुल मर्यादा भी खोई। लाला जी कुत्सित सम्बन्ध को बहुत बुरा न समझते थे। रईसों में यह प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। वह रईस ही क्या, जो इस तरह का खेल न खेले, लेकिन धर्म छोड़ने को तैयार हो जाना, खुले खजाने समाज की मर्यादाओ को तोड़ डालना यह तो पागलपन है, बल्कि गधापन।
समरकान्त का व्यावहारिक जीवन उनके धार्मिक जीवन से बिल्कुल अलग था। व्यवहार और व्यापार में वह धोखा-धड़ी, छल-प्रपंच, सब कुछ क्षम्य समझते थे। व्यापार-नीति में सन या कपास में कचरा भर देना, घी में आलू या घुइयाँ गबड़ देना, औचित्य से बाहर न था, पर बिना स्नान किये वह मुंह में पानी न डालते थे। इन चालीस वर्षों में ऐसा शायद ही कोई दिन हुआ हो, कि उन्होंने सन्ध्या-समय की आरती न ली हो और तुलसी-दल माथे पर न चढ़ाया हो। एकादशी को बराबर निर्जल व्रत रखते थे। सारांश यह कि उनका धर्म आडम्बर-मात्र था, जिसका उनके जीवन से कोई प्रयोजन न था।
सलीम के घर से लौटकर पहला काम जो लाला ने किया, वह सुखदा को
फटकारना था। इसके बाद नैना की बारी आयो। दोनों को रुलाकर वह अपने कमरे में गये और खुद रोने लगे।
रातोरात यह खबर सारे शहर में फैल गयी। तरह-तरह की मिस्कौट होने लगी। समरकान्त दिन भर घर से नहीं निकले। यहाँ तक कि आज गंगा-स्नान करने भी न गये। कई असामी रुपये लेकर आये। मुनीम तिजोरी की कुंजी माँगने गया। लालाजी ने ऐसा डाँटा कि वह चुपके से बाहर निकल आया। असामी रुपये लेकर लौट गये।
खिदमतगार ने चाँदी का गड़गड़ा लाकर सामने रख दिया। तंबाकू जल गया, लालाजी ने निगाली भी मुँह में न ली।
दस बजे सुखदा ने आकर कहा–आप क्या भोजन कीजिएगा?
लालाजी ने उसे कठोर आँखों से देखकर कहा–मुझे भूख नहीं हैं।
सुखदा चली गयी। दिन भर किसी ने कुछ न खाया।
नौ बजे रात को नैना ने आकर कहा–दादा, आरती में न जाइएगा?
लालाजी चौंके–हाँ हाँ, जाऊँगा क्यों नहीं। तुम लोगों ने कुछ खाया कि नहीं?
नैना बोली–किसी की इच्छा ही न थी। कौन खाता?
'तो क्या उसके पीछे सारा घर प्राण देगा?'
सुखदा इसी समय तैयार होकर आ गयी। बोली–जब आप ही प्राण दे रहे हैं, तो दूसरों पर बिगड़ने का आपको क्या अधिकार है?
लालाजी चादर ओढ़कर जाते हुए बोले–मेरा क्या बिगड़ा है कि में प्राण दूँ। यहाँ था, तो मुझे कौन-सा सुख देता था। मैंने तो बेटे का सुख ही नहीं जाना। तब भी जलाता था, अब भी जला रहा है। चलो भोजन बनाओ मैं आकर खाऊँगा, जो गया उसे जाने दो। जो हैं उन्हीं को उस जानेवाले की कसर पूरी करनी है। मैं क्यो प्राण देने लगा। मैंने पुत्र को जन्म दिया। उसका विवाह भी मैने किया। सारी गृहस्थी मैंने बनायी। इसके चलाने का भार मुझ पर है। मुझे अब बहुत दिन जीना है। मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि इस लौंडे को यह सूझी क्या? पठानिन की पोती अप्सरा नहीं हो सकती। फिर उसके पीछे वह क्यों इतना लट्टू हो गया? उसका तो ऐसा स्वभाव न था। इसी को भगवान् की लीला कहते हैं। ठाकुर-द्वारे में लोग जमा हो गये। लाला समरकान्त को देखते ही कई सज्जनों ने पूछा–अमर कहीं चले गये क्या सेठजी! क्या बात हुई?
लालाजी ने जैसे इस बात को काटते हुए कहा–कुछ नहीं, उसकी बहुत दिनों से घूमने-धामने की इच्छा थी, पूर्वजन्म का तपस्वी है कोई, उसका बस चले, तो मेरी सारी गृहस्थी एक दिन में लुटा दे। मझसे यह नहीं देखा जाता। बस, यही झगड़ा है। मैंने गरीबी का मजा भी चखा है। अमीरी का मजा भी चखा है। उसने अभी गारीबी का मज़ा नहीं चखा। साल छ: महीने उसका मजा चख लेगा, तो आँख खुल जायँगी। तब उसे मालूम होगा कि जनता की सेवा भी वही लोग कर सकते हैं, जिनके पास धन है। घर में भोजन का आधार न होता, तो मेम्बरी भी न मिलती।
किसी को और कुछ पूछने का साहस न हुआ। मगर मूर्ख पुजारी पूछ ही बैठा–सुना, किसी जुलाहे की लड़की से फंस गये थे?
यह अक्खड़ प्रश्न सुनकर लोगों ने जीभ काटकर मुँह फेर लिये। लालाजी ने पुजारी को रक्त भरी आँखों से देखा और ऊँचे स्वर में बोले–हाँ, फँस गये थे, तो फिर ? कृष्ण भगवान् ने एक हजार रानियों के साथ नहीं भोग किया था? राजा शान्तनु ने मछुए की कन्या से नहीं भोग किया था? कौन राजा है, जिसके महल में दो सौ रानियाँ न हों? अगर उसने किया, तो कोई नयी बात नहीं की। तुम-जैसों के लिए यही जवाब हैं। समझदारों के लिए यह जवाब है कि जिसके घर में अप्सरा-सी स्त्री हो, वह क्यों जूठी पत्तल चाटने लगा। मोहन-भोग खानेवाले आदमी चबैने पर नहीं गिरते।
यह कहते हुए लालाजी प्रतिमा के संमुख गये; पर आज उनके मन में वह श्रद्धा न थी। दुःखी आशा से ईश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से। दुःखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढ़ती जाती है। सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है। वह ईश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है। लालाजी का व्यथित हृदय आज सोने और रेशम से जगमगाती हुई प्रतिमा में धैर्य और सन्तोष का सन्देश न पा सका। कल तक यही प्रतिमा उन्हें बल और उत्साह प्रदान करती थी। उसी प्रतिमा से आज उनका विपद्ग्रस्त मन विद्रोह कर रहा था। उनकी भक्ति का यही पुरस्कार है? उनके स्नान, व्रत और निष्ठा का यही फल है?
वह चलने लगे, तो ब्रह्मचारी जी बोले–लालाजी, अबकी यहाँ श्री वाल्मीकीय कथा का विचार है।
लालाजी ने पीछे फिरकर कहा–हाँ हाँ, होने दो।
एक बाबू साहब ने कहा–यहाँ तो किसी में इतना सामर्थ्य नहीं है।
समरकान्त ने उत्साह से कहा–हाँ हाँ, मैं उसका सारा भार लेने को तैयार हूँ। भगवद् भजन से बढ़कर धन का सदुपयोग और क्या होगा?
उनका यह उत्साह देखकर लोग चकित हो गये। वह कृपण थे और किसी धर्मकार्य में अग्रसर न होते थे। लोगों ने समझा था, इससे दस-बीस रुपये ही मिल जायँ तो बहुत है ! उन्हें यों बाजी मारते देखकर और लोग भी गरमाये।
सेठ धनीराम ने कहा–आपसे सारा भार लेने को नहीं कहा जाता लालाजी ! आप लक्ष्मीपात्र हैं सही; पर औरों को भी तो श्रद्धा है। चन्दे से होने दीजिए।
समरकान्त बोले–तो और लोग आपस में चन्दा कर लें। जितनी कमी रह जायगी, वह मैं पूरी कर दूँगा।
धनीराम को भय हुआ, कहीं, यह महाशय सस्ते न छूट जायँ। बोले–यह नहीं, आपको जितना लिखना हो लिख दें।
समरकान्त ने होड़ के भाव से कहा–पहले आप लिखिए।
काग़ज़, क़लम, दावात लाया गया। धनीराम ने लिखा १०१)
समरकान्त ने ब्रह्मचारी जी से पूछा–आपके अनुमान से कुल कितना खर्च होगा?
ब्रह्मचारी जी का तख़मीना एक हजार का था।
समरकान्त ने ८९९) लिख दिये, और वहाँ से चल दिये। सच्ची श्रद्धा की कमी को वह धन से पूरा करना चाहते थे। धर्म की क्षति जिस अनुपात से होती है, उसी अनुपात से आडम्बर की वृद्धि होती है।
२
अमरकान्त का पत्र लिये हुए नैना अन्दर आयी, तो सुखदा ने पूछा–किसका पत्र है? नैना ने खत पाते ही पढ़ डाला था। बोली–भैया का।
सुखदा ने पूछा–अच्छा! उनका खत है ? कहाँ हैं ?
'हरिद्वार के पास किसी गाँव में हैं।'
आज पाँच महीनों से दोनों में अमरकान्त की चर्चा न हई थी। मानों वह कोई घाव था, जिसको छूते दोनों ही के दिल काँपते थे। सुखदा ने फिर कुछ न पूछा। बच्चे के लिए फ्राक सी रही थी। फिर सीने लगी।
नैना पत्र का जवाब लिखने लगी। इसी वक्त वह जवाब भेज देगी। आज पाँच महीने में आपको मेरी सुधि आई है। जाने क्या-क्या लिखना चाहती थी। कई घंटों के बाद वह खत तैयार हुआ, जो हम पहले ही देख चुके हैं। खत लेकर वह भाभी को दिखाने गयी। सूखदा ने देखने की ज़रूरत न समझी।
नैना ने हताश होकर पूछा–तुम्हारी तरफ़ से भी कुछ लिख दूँ ?
'नहीं कुछ नहीं।'
'तुम्हीं अपने हाथ से लिख दो !'
'मुझे कुछ नहीं लिखना है।'
नैना रुआँसी होकर चली गयी। खत डाक में भेज दिया गया।
सुखदा को अमर के नाम से भी चिढ़ है। उसके कमरे में अमर की एक तसवीर थी, उसे उसने तोड़कर फेंक दिया था। अब उसके पास अमर की याद दिलानेवाली कोई चीज न थी। यहाँ तक कि बालक से भी उसका जी हट गया था। वह अब अधिकतर नैना के पास रहता था। स्नेह के बदले वह अब उस पर दया करती थी; पर इस पराजय ने उसे हताश नहीं किया, उसका आत्माभिमान कई गुना बढ़ गया है। आत्मनिर्भर भी अब कहीं ज्यादा हो गयी है। वह अब किसी की अपेक्षा नहीं करना चाहती। स्नेह के दबाव के सिवा और किसी दबाव से उसका मन विद्रोह करने लगता है। उसकी विलासिता मानो मान के वन में खो गयी है !
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सकीना से उसे लेशमात्र भी द्वेष नहीं है। वह उसे भी अपनी ही तरह, बल्कि अपने से अधिक दुःखी समझती है। उसकी कितनी बदनामी हुई, और अब बेचारी उस निर्दयी के नाम को रो रही है। वह सारा उन्माद जाता रहा। ऐसे छिछोरों का एतबार ही क्या !
वहाँ कोई दूसरा शिकार फाँस लिया होगा। उससे मिलने की उसे बड़ी इच्छा थी, पर सोच कर रह जाती थी।
एक दिन पठानिन से मालूम हुआ कि सकीना बहुत बीमार है। उस दिन सुखदा ने उससे मिलने का निश्चय कर लिया। नैना को भी साथ ले लिया। पठानिन ने रास्ते में कहा–मेरे सामने तो उसका मुँह ही बन्द हो जायगा। मुझसे तो तभी से बोल-चाल नहीं है। मैं तुम्हें घर दिखाकर कहीं चली जाऊँगी। ऐसी अच्छी शादी हो रही थी, इसने मंजूर ही न किया। मैं भी चुप हूँ, देखूँ कब तक उसके नाम को बैठी रहती है। मेरे जीते-जी तो लाला घर में क़दम रखने न पायेंगे। हाँ, पीछे की नहीं कह सकती।
सुखदा ने छेड़ा–किसी दिन उनका खत आ जाय और सकीना चली जाय, तो क्या करोगी?
बुढिया आँखें निकालकर बोली–मजाल है कि इस तरह चली जाय। खून पी जाऊँ।
सुखदा ने फिर छेड़ा–जब वह मुसलमान होने को कहते हैं, तब तुम्हें क्या इन्कार है?
पठानिन ने कानों पर हाथ रखकर कहा–अरे बेटा! जिसका जिन्दगी भर नमक खाया, उसका घर उजाड़कर अपना घर बसाऊँ! यह शरीफ़ों का काम नहीं है। मेरी तो समझ ही में नहीं आता, इस छोकरी में क्या देखकर भैया रीझ पड़े।
अपना घर दिखाकर पठानिन तो पड़ोस के एक घर में चली गयी, दोनों युवतियों ने सकीना के द्वार की कुंडी खटखटाई। सकीना ने उठकर द्वार खोल दिया। दोनों को देखकर वह घबड़ा-सी गयी। जैसे कहीं भागना चाहती है। कहाँ बैठाये, क्या सत्कार करे !
सुखदा ने कहा–तुम परेशान न हो बहन, हम इस खाट पर बैठ जाते हैं। तुम तो जैसे घुलती जाती हो। एक वेवफ़ा मर्द के चकमे में पड़कर क्या जान दे दोगी?
सकीना का पीला चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसे ऐसा जान पड़ा कि सुखदा मुझसे जवाब तलब कर रही है–तुमने मेरा बना-बनाया घर क्यों उजाड़ दिया ? इसका सकीना के पास कोई जवाब न था। वह कांड कुछ इस
आकस्मिक रूप से हुआ कि वह स्वयं कुछ न समझ सकी। पहले बादल का एक टुकड़ा आकाश के एक कोने में दिखाई दिया। देखते-देखते सारा आकाश मेघाच्छन्न हो गया और ऐसे ज़ोर की आँधी चली कि वह खुद उसमें उड़ गयी। वह क्या बताये, कैसे क्या हुआ। बादल के उस टुकड़े को देखकर कौन कह सकता था, आँधी आ रही है।
उसने सिर झुकाकर कहा–औरत की ज़िन्दगी और है ही किसलिए बहनजी? वह अपने दिल से लाचार है, जिससे वफ़ा की उम्मीद करती है, वही दग़ा करता है। उसका क्या अख्तियार, लेकिन बेवफ़ाओं से मुहब्बत न हो, तो मुहब्बत में मज़ा ही क्या रहे। शिकवा-शिकायत, रोना-धोना, बेताबी और बेकारी यही तो मुहब्बत के मजे हैं, फिर मैं तो वफ़ा की उम्मीद भी नहीं करती थी। मैं उस वक्त भी इतना जानती थी कि यह आँधी दो-चार घड़ी की मेहमान है, लेकिन मेरी तस्कीन के लिए तो इतना ही काफी था कि जिस आदमी की मैं दिल में सबसे ज्यादा इज्जत करने लगी थी, उसने मुझे इस लायक तो समझा। मैं इस काग़ज़ की नाव पर बैठकर भी सागर को पार कर दूँगी।
JIM – Assistente
Jim IA: pode errar. Não digite dados pessoais. Suas mensagens são processadas por um serviço externo.
Deixe um comentário