गल्प समुच्चय
सड़क सामने आ गई। कोचवान बैठा ऊँघ रहा था। उसे 'साहब' के इतना शीघ्र लौट आने पर बड़ा आश्चर्य और दुःख हुआ—ग़रीब की नींद भी पूरी न होने पाई, गाड़ी रवाना हुई औंर आध घण्टे में बँगले पर पहुंच गई।
बिहारी का विचार था, कि उमा ड्राइंग-रुम में पड़ी हुई अपनी हालत पर अफसोस करती होगी, या सो गई होगी; लेकिन ड्राइंग रूम ख़ाली पड़ा था, वहाँ कोई न था। उन्होंने शयनागार में जाकर देखा, उमा वहाँ भी न थी। एक-एक कमरे में जाकर देखा—उमा कहीं भी दिखाई न दी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।
नौकर बरामदे में पड़ा सो रहा था, बाबू साहब ने उसे जगाया और पूछा—मलकिन कहाँ हैं?
"हूजूर कुछ बताया नहीं, कहीं घूमने गई हैं।'
बिहारी का माथा ठनका, सहस्रों शङ्कायें घेरने लगीं—यह क्या माजरा है? ज़िन्दगी से आजिज़ आकर उसने कहीं जान तो नहीं दे दी? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। उमा ऐसी नादान नहीं, उससे ऐसी मूर्खता नहीं हो सकती। फिर, क्या बात है? आखिर वह गई कहाँ? कुछ समझ में नहीं आता। बिहारी इसी उलझन में फंसे हुए एक कोच पर आकर लेट गये। वे इस दशा में दस मिनट रहे होंगे, कि उन्हें किसी गाड़ी के पहियों की आवाज सुनाई दी। वे झपटकर बाहर आये।
उमा गाड़ी से उतर रही थी और एक सफ़ेदपोश महाशय बँगले से बाहर जा रहे थे। बिहारी ने उमा से पूछा—कहाँ से आ रही हो?
"सिनेमा देखने गई थी।"
"और कौन साथ था?"
"रतन थे।"
"तुमने मुझे नहीं बताया, कि सिनेमा देखने जाओगी?"
"क्या तुम मुझे अपनी सारी बातें बताया करते हो?"
बिहारी निहत्तर हो गये। आज वे स्वयं अपनी दृष्टि में दोषी थे।
(५)
प्रतिक्रिया आरम्भ हो चुकी थी। बिहारी अब विशेषतः घर ही पर रहते थे। उनका हृदय एक बार फिर दाम्पत्य के सरल सुखों के लिये लालायित हो उठा; किन्तु वे जितना प्रेम करने का प्रयत्न करते, उमा उनसे उतना ही दूर भागती। उसे उनसे डर-सा लगता था—उनसे मिलने में अधिक वेदना होती थी। अब वह उन्हें अपना शुद्ध विमल प्रेम नहीं दे सकती थी। उनका उसके शरीर पर अधिकार अवश्य था; किन्तु उसका स्वतन्त्र हृदय और उसमें बहता हुआ प्रेम का निर्मल स्रोत अब दूसरे का हो चुका था। वह बिहारी की ओर से जितना खिंचती, रतन की ओर उतना ही बढ़ती। बिहारी देख रहे थे कि वह उनकी ओर से उदासीन हो रही है; परन्तु उनकी समझ में कोई कारण न आता था।
(६)
यौवन और वासना का अटूट सम्बन्ध है। वासना प्रेम का घातक है; किन्तु प्रेम को वासना के तीव्र आघातों से बचाये रखना बिरले का ही काम है। कौन है, जो आत्म-संयम का महत्त्व नहीं जानता? कौन ऐसा है, जो हृदय को वासना की कालिमा से पवित्र रखने का प्रयत्न नहीं करता? परन्तु, सुन्दरी के भेद-भरे नयनों का एक साधारण कटाक्ष, उसके सरस अधरों की सरल मुस्कान, उसके अञ्चल की एक लहर, चित्त को चञ्चल कर देने के लिए बहुत है।
रतन काम के बाणों का वीरता के साथ सामना कर रहे थे; परन्तु एक सहस्र सैनिक के तीव्र आघातों का बेचारा निहत्था आदमी कब तक सामना कर सकता है? जानते थे कि हार निकट है; किन्तु वे निरुपाय थे। रतन सोचते—इस प्रेम का कहाँ अन्त होगा? उमा मुझसे प्रेम अवश्य करती है; किन्तु यह प्रेम उसी समय तक है, जब तक हमारा सम्बन्ध निष्काम है। यदि मुझसे जरा-सी भी असावधानी हुई, तो वह मुझसे अवश्य घृणा करने लगेगी लेकिन मैं कितने दिनों तक दामन बचा-बचा कर चलूँगा? मैं अपने दिल को अपने वश में नहीं रख सकता। यदि बिहारी को ये बातें मालूम हो गई, तो वे क्या कहेंगे? दोस्ती, मुरौवत सबका अन्त हो जायगा और बदनाम भी हो जाऊँगा। मैं वहाँ जाता ही क्यों हूँ? अच्छा, आज से कभी न जाऊँगा; परन्तु इस पवित्र संकल्प का उसी समय अन्त हो जाता, जब उमा के यहाँ से बुलावा आता।
उमा के हृदय में प्रतिशोध की इच्छा प्रबल थी। वह बिहारी को दिखा देना चाहती थी कि स्त्री केवल पुरुषों की इच्छाओं की दासी नहीं—उसके अपने भी स्वत्व हैं, अधिकार हैं, इच्छाएँ हैं। रतन उसकी कार्य-सिद्धि के साधन-मात्र थे। उमा नित्य नया श्रृङ्गार करती, नये-नये, आभूषण पहनती, नई-नई साड़ियाँ बदलती, रतन को रिझाती और उनका साहस बढ़ाती। इस कार्य में कहाँ तक इच्छाओं का भाग था और कहाँ तक उस गुप्त प्रेरणा का, जो हमें अज्ञात रूपसे कार्य-सम्पादन में योग देती है—यह कहना कठिन है! किन्तु इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं कि उमा में कार्य-सिद्धि की वह प्रबल कामना थी, जो बलिदान के मूल्य की परवा नहीं करती।
फागुन का महीना था, सन्ध्या का समय। ऋतुराज के आगमन के आनन्द में कुसुम-कुञ्ज और पुण्य-उद्यान सौरभ, सौन्दर्य, अलङ्कार और रङ्ग से वैसे ही सजे हुए थे, जैसे परदेश से लौटे हुए पतियों का स्वागत करने के लिए युवती रमणियाँ शृङ्गार करती हैं। उमा और रतन वाटिका में टहल रहे थे। उमा ने गुलाब का एक अधखिला फूल तोड़ा और रतन के कोट में लगाने लगी। एक तो सौरभ, रङ्ग और समीर की उत्तेजक शक्ति, और फिर प्रेमी के कोमल करों का मधुर स्पर्श—रतन सिहर उठे, बदन में बिजली-सी दौड़ गई, हृदय की गति तीव्र हो गई। उमा की उँगलियाँ अपना काम पूरा कर चुकी थीं, वह हाथ हटाना ही चाहती थी कि रतन ने विद्युत-वेग से उमा की कुसुम-कोमल हथेली अपने गर्म हाथों में ले ली। उमा का मुख आरक्त हो गया, आँखें नीली हो गई। उसके हृदय में लज्जा अधिक थी, या विजयोल्लास—यह कहना कठिन है। इसी समय बँगले में किसी गाड़ी के प्रवेश करने का शब्द हुआ। उमा ने हाथ छुड़ा लिया और शीघ्रता से वाटिका के बाहर चली गई। गाड़ी में बिहारी आये थे। बिहारी ने उमा को वाटिका से निकलते देख लिया। उन्हें कुछ सन्देह हुआ। वे गाड़ी से उतरते ही बाग़ में गये और रतन को मानसिक विकलता की दशा में भूमि की ओर ताकते हुए पाया। रतन को बिहारी के आने की खबर तक न हुई, वे वैसे ही खड़े रहे। बिहारी उलटे पैर लौट आये। सन्देह में अंकुर फूट पड़ा। उमा की उदासीनता का कारण स्पष्ट हो गया। बिहारी ने सोचा—ये महाशय आज-कल यहाँ क्यों चक्कर काटा करते हैं। पहले तो इतनी कृपा न करते थे। इसमें कुछ-न-कुछ भेद अवश्य है।
(७)
रतन की इस समय वह दशा थी, जो पहली बार शराब पीने पर नशा उतरने के बाद हो जाती है। आत्मिक वेदना भी थी, पश्चात्ताप भी था। मानसिक अशांति की दशा में सोचते थे——
उमा ने मन में क्या सोचा होगा? कहीं मुझे चरित्रहीन न समझने लगे। उसने कुछ कहा नहीं, चुपचाप बाहर चली गई-इसका क्या मतलब है? उसने ज़रूर बुरा माना होगा। मुझसे बड़ी ग़लती हुई, मुझे उस समय न-जाने क्या हो गया था। उमा से आँखें मिलाकर अब कैसे बातें करूँगा? नहीं, अब मैं वहाँ कभी न जाऊँगा। रतन इसी उलझन में बड़ी रात तक जागते रहे। अन्त में निद्रादेवी को उनकी शोचनीय दशा पर दया आ गई।
रतन ने उमा के यहाँ न जाने का आज पहली ही बार सङ्कल्प न किया था। उनके इस प्रकार के इरादों का मूल्य सिद्ध हो चुका था। वे इस बात से स्वयं लज्जित थे।
वाटिकावाली घटना को कई दिन बीत गये। रतन ने अभूतपूर्ण दृढ़ता दिखाई—सङ्कल्प में शिथिलता न आने दी। इस बीच में उमा के पास से कोई बुलावा न आया। रतन का यह सन्देह कि उमा मुझपर नाराज़ है, ज़ोर पकड़ता जाता था। उनकी मानसिक अशांति बहुत कुछ घट गई थी। उन्हें थोड़ा-बहुत दुःख अवश्य था; किन्तु वे मन को इस प्रकार समझाते—चलो अच्छा हुआ, बला से जान छूटी। अब बात छिपी रह जायगी। मुझे अपनी भूल भी मालूम हो गई; नहीं तो न जाने कब तक धोखे में रहता—साधारण सहानुभूति को प्रेम समझ बैठा, कितनी बड़ी नादानी थी। एक दिन सन्ध्या-समय वायु-सेवन के बाद रतन जब होस्टेल लौटे तब उन्हें अपने कमरे में एक बन्द लिफाफा पड़ा मिला। रतन ने लिफ़ाफ़ा उठाकर देखा, हस्त-लिपि उमा की थी। रतन का हृदय वेग से धड़कने लगा। काँपते हुए हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। पत्र में लिखा था—
'प्रिय रतन,
आज पाँच दिन हो गये। तुमने सूरत नहीं दिखाई। क्या मुझसे नाराज़ हो? बड़ी प्रतीक्षा कराते हो? परन्तु इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, दोष मेरा है कि प्रेम के हाथों ऐसी बिक गई। अब कब आओगे? आज सध्या-समय अवश्य आना। मैं तुम्हारा इन्तज़ार करूँगी।
दर्शनाभिलाषिनी,
उमा।'
पत्र देखकर रतन को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा था कि उमा ने खूब खरी-खोटी सुनाई होगी; लेकिन यहाँ तो पाँसा ही पलटा हुआ था। रतन के हदय-सागर में आनन्द की लहरें उठने लगीं। आज पहला ही अवसर था कि उमा ने स्पष्ट शब्दों में अपने मन की बात कही। आज उन्हें प्रत्येक वस्तु में सुन्दरता दिखाई देती थी और प्रत्येक वस्तु में स्वाभाविक सहानुभूति। नीरव गगन में वसन्त की मधुर श्री फूटी पड़ती थी। कुसुम-कुञ्जों से आती हुई समीर सुगन्ध से लदी हुई थी। सामने वृक्ष पर चहकती हुई छोटी-छोटी चिड़ियों के सुमधुर कल-रव में प्रेम के राग थे। रतन चाहते तो थे कि न जायँ; किन्तु कोई प्रबल प्रेरणा उन्हें उमा के घर की ओर बलात् खींचे लिये जाती थी, पैर स्वयं चले जाते थे। इच्छा-शक्ति विवश थी।
(८)
गोधूलि का समय था। आकाश में फैली हुई लाली निशा-सुन्दरी की काली चादर में छिपी जाती थी। बिहारीलाल अपने बँगले के आहाते में वेग से घुसे और सीधे वाटिका में चले गये। उनकी दशा इस समय उस गुप्तचर की-सी थी, जो कोई रहस्य खोलने में व्यस्त हो। बिहारी ने ध्यान से इधर-उधर देखना शुरू किया, माता प्रकृति अपने सुकुमार बच्चों को थपकी देतो हुई सुला रही थीं; किन्तु चञ्चल वासन्ती समीर एक न चलने देता था। लताएँ और पुष्प हठी बालकों के समान मचलते और सिर हिलाते; परन्तु यह प्रेम-क्रीड़ा देखने के लिए बिहारी के आँखें न थीं। उन्हें कुछ और ही धुन सवार थी। उनकी भेद-भरी आँखें जिन्हें ढूँढ़ती थी, वे यहाँ दिखाई न दिये। बिहारी ने सोचा—क्या वार खाली जायगा? वे कुञ्ज की ओर बढ़े। लता-भवन सूना पड़ा था। बिहारी को बड़ी निराशा हुई। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उमा और रतन इस समय वहाँ अवश्य होंगे। उन्हें मिलने का अवसर देने के लिए आज वे प्रातःकाल से ही घर से बाहर चले गये थे। वे पास ही पड़ी हुई एक बेंच पर बैठ गये, मस्तिष्क में विचार-तरङ्गे उठने लगीं।
बिहारी आत्म-विस्मृत की दशा में बड़ो देर तक बैठ रहे। सहसा उन्होंने चौंककर सामने देखा। चन्द्रमा की स्वर्ण रश्मियाँ पत्तों के झुर्मुट से छन-छनकर वाटिका में मन्द-मन्द रहस्यमय प्रकाश फैला रही थीं। स्वर्ण-रक्त-रञ्जिय चन्द्रमा ऐसा जान पड़ता था, मानो किसी सुन्दरी के मुख पर लज्जावश गुलाबी दौड़ गई हो। बिहारी को किसी के बात-चीत करने की आहट मिली। वे उठकर शीघ्रता से एक सघन वृक्ष की आड़ में छिपकर देखने लगे। आगन्तुक कोई और नहीं, उमा और रतन ही थे। दोनों पास आ गये। बिहारी के कौतूहल का इस समय कुछ ठिकाना न था।
रतन ने कहा—आज मेरे जीवन का स्वर्ण-दिवस है।
उमा ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—और मेरा भी।
अपने भाग्य को धन्यवाद दूँ, या इन प्यारे हाथों को—यह कहते हुए रतन ने उमा की कोमल हथेली अपने जलते हुए हाथों में ले ली और तप्त अधरों से उस पर प्रेम का प्रथम चिह्न अङ्कित कर दिया।
बिहारी को अब अधिक प्रमाण की आवश्यकता न थी। वे अब ज्यादा न देख सके, झपटे और क्रोध एवं घृणा की मूर्ति बने हुए उन दोनों के सामने जाकर खड़े हो गये। उमा और रतन क्षण-भर तक हतबुद्धि से ताकते रहे। आश्चर्य और क्षुद्रता मूर्तिमान हो गई थी। उमा सँभली और चुपचाप वाटिका से बाहर चली गई। रतन ने भी जाना चाहा; किन्तु बिहारी ने व्यंग्य-वाक्य से रोककर कहा—जाते कहाँ हैं महोदय? ठहरिए, मेरी भी सुनते जाइए। रतन अपराधी बालक के सदृश ठिठककर रह गये।
बिहारी ने घृणा-मिश्रित क्रोध से कहा—रतन, क्या दोस्ती और मुरौवत-का बदला यहीं रह गया है? किसी दुश्मन के गले पर छुरी चलाते, तो मरदानगी होती, यह क्या कि दोस्त ही का गला काटो।
रतन कोई उत्तर न दे सके। बिहारी का क्रोध दुगना हो गया,नेत्रों से ज्वाला निकलने लगी।
'बोलो, क्या जवाब देते हो? बोलो, नहीं तो इसी पिस्तौल से अपना और तुम्हारा दोनों का भेजा उड़ा दूंगा।'—बिहारी ने पतलून की जेब से एक रिवाल्वर निकाल लिया।
रतन का हृदय भय से काँप उठा। बचने का कोई मार्ग दिखाई न दिया। सहसा उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने जेब से एक कागज़ निकाला। यह उमा का पत्र था। रतन ने बिहारी को पत्र देकर कहा—बिहारी, इसमें मेरा ही क़सूर नहीं। यह ख़त इस बात का सबूत है।
बिहारी ने पत्र को ले लिया और दिया सलाई जलाकर उसके प्रकाश में पढ़ा। बिहारी का विचार था कि सारा अपराध रतन का है; लेकिन पत्र से बात कुछ और हुई। बिहारी पत्र लिये हुए बाग़ से बाहर चले गये।
रतन वहीं मूर्त्तिवत् खड़े रह गये। आवेश में आकर उन्होंने पत्र दे तो दिया; परन्तु क्षण-भर में अपनी भूल ज्ञात हो गई, उनका हृदय खेद और ग्लानि से भर गया। लज्जा से कटे जाते थे—कैसी घोर नीचता है! कैसी अक्षम्य कायरता! प्रेमिका के पत्र को जिसका मूल्य प्राणों से अधिक होना चाहिए, प्राण-रक्षा का यन्त्र बनाना—इससे घृणित कौन-सी कायरता हो सकती है। यदि प्राण देकर भी रतन को पत्र बापस मिल सकता तो उन्हें उसे लेने में तनिक भी संकोच न होता; किन्तु यह वैसा ही कठिन था, जैसे मुख से निकली हुई बात या कमान से निकले हुए तीर का वापस लौटना!
(९)
उमा खेद और दुख की मूर्ति बनी हुई बैठी थी—खेद इस आकस्मिक घटना पर था; दुःख भण्डा फूट जाने का। बिहारी ने कमरे में प्रवेश किया। उसके मुख पर वह गाम्भीर्य था, जो क्रोध और घृणा की अन्तिम सीमा है। बिहारी ने उमा के सामने उसका प्रेम-पत्र फेंक दिया; किन्तु मुख से कुछ न कह सके। उमा पर वज्रपात-सा हुआ। उसके लिए वह पत्र वैसा ही था, जैसे अभियुक्त के लिए अदालत का फैसला। उमा हत-बुद्धि-सी मूर्तिवत् बैठी रही।
उमा की खामोशी ने बिहारी की जवान खोल दी—उमा,मुझे तुमसे ऐसी आशा न थी। मुझे स्वन में भी यह आशङ्का न थी कि तुम इतना नीचे गिर जाओगी। ऐसा छिछोरापन! मेरे विश्वास का यों मटियामेट!
उमा अब अधिक न सुन सकी। अपराधी मनुष्य साधु-चरित्र आदमी की कड़ी-से-कड़ी बात सुन सकता है; किन्तु उस मनुष्य का साधारण आक्षेप भी असह्य हो जाता है, जिसके चरित्र के विषय में उसे स्वयं सन्देह हो। उमा को केवल सन्देह ही नहीं था, उसके पास प्रमाण भी था। फिर वह बिहारी की बातें कैसे सह लेती? प्रतिघात की मात्रा प्रबल हो गई। उमा का अङ्ग-अङ्गल फड़कने लगा। उसकी दशा छेड़ी हुई सर्पिणी के समान हो गई। उमा ने बिहारी को सरोष नेत्रों से देखकर उत्तर दिया-लेकिन इसकी सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है। क्या तुमने प्रेम का स्वाँग भरकर मुझे जाल में नहीं फंसाया? मेरी आशाओं का खून नहीं किया? तुम्हें मुझसे नहीं मेरे धन से प्रेम था।
"यह सरासर झूठा आक्षेप है मेरा प्रेम सत्य था और मैं उस पर अब से घण्टे-भर पहले दृढ़ रहा हूँ; लेकिन अब मेरी आँखों का परदा उठ गया।"
"झूठ नहीं बिलकुल सच है, तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया बाजारू औरतों के पीछे दौड़ते फिरे।"
बिहारी ने कृत्रिम क्रोध से कहा—उमा अब मैं ज्यादा सहन नहीं कर सकता। अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए, मुझ पर मिथ्या आक्षेप करती हो।
"यह बात झूठी नहीं है, मेरे पास इसका सबूत है"—यह कहकर उमा उठी और अपने शृंगार-गृह में चली गई। सन्दूक खोलकर एक पत्र निकाला। यह श्यामा का वही पत्र था, जिसे उसने बिहारी की जेब से निकाल लिया था। उमा ने पत्र लाकर बिहारी के सामने फेंक दिया। बिहारी ने पत्र उठाकर पढ़ा और उमा की ओर आश्चर्य-पूर्ण नेत्रों से देखा। वे निरुत्तर हो गये, अधिक कुछ न कह सके। उमा उठकर बाहर चली गई। उसके नेत्रों में विजय-गर्व था।
उमा जीती अवश्य; किन्तु उसके हृदय में विजय का आह्लाद न था, पराजय की दारुण-वेदना थी। सजग आत्मा हृदय में चुटकियाँ ले रही थी। अधिकारों की रक्षा के लिए चरित्र का बलिदान! आज वह स्वयं अपनी दृष्टि में गिर गई। वह धन और वैभव की गोद में पली थी, प्रेम और स्नेह उसके जीवन का आधार था। आज वह प्रेम के लिए किसका मुँह ताके-पुरुष समाज का, जो आज उसे धूर्तों एवं कायरों से भरा दिखाई देता था? अब वह जीवित रहे, तो किसके बल पर? उसे अपना अस्तित्व शून्य एवं निरर्थक जान पड़ता था। उमा अभिमानिनी थी। जब वह अपने श्रृङ्गार-गृह में जाकर शीशे के सामने खड़ी होती, और अपनी सुन्दरता अवलोकन करती, तब उसके नेत्रों में गर्व का मद छा जाता, हृदय में विजय-कामना हिलोरें लेने लगती। आज उसने शीशे के सामने खड़े होकर अपने एक-एक अङ्ग को ध्यान से देखा; किन्तु आज वह आनन्द, वह उल्लास न प्राप्त हुआ। उसे अपने सौन्दर्य से भी घृणा हो गई।
(१०)
बिहारी का क्रोध अब बिलकुल शान्त हो गया था! वे वाटिका में बैठे हुए घटना-क्रम पर निष्पक्ष होकर विचार कर रहे थे। उमा के ये शब्द कि 'इसकी सारी ज़िम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है' अभी तक उनके कानों गूंज रहे थे। वे ज्यों-ज्यों विचार करते, उन्हें अपना ही दोष दिखाई देता। यदि मैं श्यामा के कृत्रिम प्रेम में न फँसता, तो आज यह दिन क्यों देखना पड़ता? यद्यपि मैंने स्वार्थ वश उमा से विवाह किया था; किन्तु उमा मुझसे प्रेम करती थी, यदि वह मुझसे प्रेम न करती होती, तो रतन को छोड़कर मुझसे विवाह ही क्यों करती? मेरे हृदय में शनैः-शनैः में अंकुरित हुआ—हाँ, यह निरन्तर सहवास के कारण अवश्य था। हम दोनों एक दूसरे के साथ सुखी थे; परन्तु मैंने स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारी। उमा के प्रेम की अवहेलना की। ऐसी दशा में मुझसे उसके मन का फिर जाना स्वाभाविक ही था। यह मानव-स्वभाव है, इसमें उमा का दोष नहीं? सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही है। जब सारा दोष मेरा ही है, तब मुझे उमा से नाराज़ होने का कोई हक़ नहीं। अब क्या करुँ? उमा से मेल कर लेना चाहिए।
इस निश्चय के बाद बिहारी उठकर भीतर गये। ड्राइंग-रूम में दीवार पर लगी हुई घड़ी में डेढ़ बजा था। बिहारी ने सोचा—उमा सो रही होगी। वे शयनागार की ओर गये। धीरे से दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश किया। मेज पर जलती हुई मोमबत्ती ऐसी जान पड़ती थी, मानों किसी क़बर पर जलता हुआ चिराग़ आँसू बहा रहा हो। उमा पलग पर पड़ी हुई थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो कमरे में फैला हुआ प्रकाश उसके लावण्य का प्रकाश है। बिहारी धीरे-धीरे आगे बढ़े। वे झुके और उमा के बन्द नेत्रों पर क्षमा और प्रेम का चिह्न अङ्कित कर दिया; परन्तु सहसा वे चौंक पड़े और उमा के मुख की ओर ध्यान से देखने लगे। कलाई पर हाथ रक्खा, नब्ज का कहीं पता न था। हृदय पर हाथ रक्खा, गति स्थगित हो चुकी थी। चिराग बुझ चुका था, यात्रा समाप्त हो चुकी थी। उमा का निर्जीव शरीर मृत्यु-शय्या पर पड़ा था। फर्श पर एक खाली शीशी पड़ी थी, जिस पर अँगरेजी अक्षरों में लिखा था-'विष'। बिहारी के मुख से एक चीख निकल गई। वे लास से लिपट गये। बिहारी के प्रेमाश्रु से भीगा हुआ उमा का आभाहीन मुख ऐसा जान पड़ता था, मानो अरुणोदय के समय ओस में नहाया हुआ कोमल पुष्प हो!
श्रीप्रेमचंदजी के
(१) मौलिक-उपन्यास
कायाकल्प ३॥) प्रेमाश्रम ३॥)
रंगभूमि ६) सेवासदन ३)
वरदान २) निर्मला २॥)
ग़बन ३।।) प्रतिज्ञा १॥)
(२) गल्प संग्रह
प्रेम-पुर्णिमा २) प्रेम-प्रसून १॥)
प्रेम-प्रमोद २॥) प्रेम-प्रतिमा २)
प्रेम-पच्चीसी २॥) प्रेम-तीर्थ १॥)
सप्तसरोज ॥) नवनिधि ॥।)
प्रेम-द्वादशी १।) प्रेम-चतुर्थी ॥)
पाँच-फूल ।।।) सप्त-सुमन ।।)
(३)नाटक
संग्राम १॥) कर्बला २)
(४)अनुवादित तथा संकलित
आज़ाद कथा (पहला भाग)२॥)
" " (दूसरा भाग) २)
अहंकार॥=)महात्मा शेखशादी॥)
गल्प-समुच्चय २॥) अवतार॥)
गल्प रत्न १)
भारत-विख्यात
उपन्यास सम्राट्
श्रीप्रेमचंदजी
लिखित
सब पुस्तकें तो यहाँ मिलेंगी
ही; पर यदि
आपको
हिन्दुस्तान-भर की
किसी भी
हिन्दी पुस्तक की आवश्यकता
हो,तो सीधे आप एक कार्ड
हमारे पास लिख दीजिए।
सब पुस्तकें घर बैठे
वी॰पी॰ पार्सल द्वारा
आपको
मिल जायँगी।
यह पता नोट कर लें—
सरस्वती-प्रेस,बनारस सिटी
कमलावती
________
(१)
"रुस्तम !"
"जनाब!"
"क्या यह वही स्थान है?"
"जी हाँ, यह वही गुर्जर-प्रदेश है।"
"रुस्तम! क्या सत्य ही यह गुर्ज्जर-प्रदेश है? क्या हम लोगों ने इसी को ध्वंस करने का विचार किया है? क्या इसी के लिये हमने यह छद्म-वेष रचा है? रुस्तम! सच कहो, क्या यही समुद्र-मेखला, गिरि-किरीटिनी, गुर्ज्जर-भूमि है?"
"हुजूर जो अनुमान करते हैं वह सत्य है। कृष्ण-वर्ण छाया के सदृश सम्मुख जो देख पड़ती है वही गुर्जर की तटभूमि है।"
"रुस्तम, इन पर्वत-श्रेणियों की शोभा तो देखो, कितने ऊँचे हैं! जान पड़ता है कि गगन-नीलिमा को स्पर्श करने के लिये ये गर्व भाव से इतने उन्नत हो गये हैं। कैसा अलौकिक सौन्दर्य है! ऐसा दृश्य हमने अफगानिस्थान में कभी नहीं देखा था। रुस्तम, यह स्वर्ग-भूमि तो नहीं है? इसके मलय-प्रवाह में कैसी संजीविनी शक्ति है! चन्द्र-ज्योत्स्ना कैसी उज्ज्वल और स्निग्ध है।" सन्ध्या का समय है। गुर्ज्जर-तट की ओर एक नाव धीरे-धीरे जा रही है। माँझी हिन्दू हैं और आरोहीगण हिन्दू-वेषी मुसलमान। संख्या में वे लोग ६ हैं। चार तो नाव के भीतर थे, और दो ऊपर बैठे कथोपकथन कर रहे थे। पाठकों ने अभी उन्हीं लोगों का वार्तालाप सुना है।
जिस समय की कथा हम लिख रहे हैं, उस समय ग़जनीपति सुलतान महमूद भारतवर्ष पर आक्रमण-पर-आक्रमण कर रहा था। भारत के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध नगरों का ध्वंस कर, इस बार उसने गुर्ज्जर पर कठोर दृष्टिपात किया था। गुर्ज्जर में सोमनाथ का प्रसिद्ध मन्दिर था। सुलतान उसी को हस्तगत करना चाहता था; पर उसका लेना सहज नहीं था। उसके अधीश्वर थे, गुर्जर देशाधिपति। महमूद ने सुना था कि गुजर का अधिपति बड़ा पराक्रमी है। उनका सैन्यबल कितना है, यह जानने की इच्छा से सुलतान ने स्थल-पथ से तीन बार गुप-चर भेजे; पर एक भी लौट कर न आया। उन लोगों का कुछ संवाद भी न मिला।
इस बार महमूद ने अपने भ्रातृ-पुत्र से, ग़ज़नी के भविष्य अधिकारी शाह जमालखाँ और प्रधान सेनापति रुस्तम को भेजा था। इनके साथ चार सैनिक भी आये थे। ये लोग स्थल-पथ से न आकर समुद्र-पथ से आये। रुस्तमखाँ ने अनेक बार सुलतान के साथ उत्तर-भारत में यात्रा की थी। वह अनेक भाषा जानता था, गुर्ज्जर-देश को भी भाषा से अनभिज्ञ न था, इससे यात्रा में इन लोगों को कष्ट न सहना पड़ा और न किसी ने इन पर सन्देह ही किया। दो दिन समुद्र में बिताकर तीसरे दिन ये सोमनाथ-बन्दर पहुँच गये।
नाव खड़ी की गई। सब उतरे। रुस्तम ने माँझियों को एक सुवर्ण-मुद्रा दी। वह मुद्रा गुजरात की ही थी, जो पहले से प्राप्त कर ली गई थी। माँझी गण बिदा हुए और ये लोग भी पाषाणखण्डों पर बैठकर बिश्राम करने लगे।
समीप में ही सोमनाथ का मन्दिर था। उसके स्वर्ण-मण्डित शिखर पर चन्द्र-रश्मि के पड़ने के कारण एक अपूर्व शोभा होती थी। वह शोभा अनिर्वचनीय थी।
क्रमशः सन्ध्या बढ़ने लगी। आरती का समय आया। भगवान् सोमनाथ की आरती होने लगी। दमामा और घंटों की ध्वनि मिलकर एक गम्भीर नाद उत्पन्न करती थी। वह नाद समुद्र के भीषण गर्जन से मिलकर आकाश-मंडल को कँपा देता था। आरती हो जाने पर वेद-पाठी ब्राह्मण सुमधुर स्वर से सोमनाथ की स्तुति करने लगे। निशा की निस्तब्धता को भंगकर वह स्वर क्रमशः पवन में फैलने जगा । उस मधुर स्वर से चन्द्रालोक-प्लावित पृथ्वीतल पुलकायमान हो उठा।
शाह जमाल स्थिर दृष्टि से उधर ही देख रहा था। वह न जाने क्या सोचता था!
रुस्तम बोला—हुजूर की क्या मरजी है? चलिये, किसी मुसाफिरख़ाने में चलकर ठहरें। हमें अपनी चिन्ता नहीं है; पर आप को कष्ट न हो। सुलतान ने हमें यही आज्ञा दी है। जमालखाँ ने विरक्त होकर कहा—चुप, चुप, रुस्तम! सुलतान का नाम लेने की क्या जरूरत है? जानते नहीं हो, हम लोग कहाँ हैं?—रुस्तम चुप हो गया। भूल उसी की थी।
जमालखाँ ने कहा—रुस्तम, कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। क्या नगर में इससे अच्छा स्थान मिलेगा? हम लोग यहीं विश्राम करेंगे। इधर देखो, क्या वे सब तारे हैं? अहो, क्या इस देश के तारों में इतना वर्ण-वैचित्र्य है? देखो तो सही, नीले, पीले,लाल और श्वेत तारागणों से, इस नभ-मण्डल की कैसी शोभा हो रही है!
रुस्तम—जनाब, आप भूल करते हैं। ये तारे नहीं, सोमनाथ के मन्दिर-शिखर में लगे हुए रत्न हैं।
जमाल—हाँ, सोमनाथ का क्या इतना ऐश्वर्य !
रुस्तम—जनाब, सोमनाथ का ऐश्वर्य विश्व-विश्रुत है।
जमाल—जब बाहर इतना है, तब भीतर न-जाने कितना होगा! पर रुस्तम, सच कहो, ऐसा कभी तुमने कहीं देखा भी था? ऊपर आकाश में चन्द्र की निर्मल ज्योति, नीचे उसी विमल ज्योति से प्लावित मन्दिर-चूड़ा में स्थित रत्नो की ज्योति ! रुस्तम,क्या कहीं और भी ऐसा होगा? मैं गुर्जर की यह नैसर्गिक शोभा देखकर मुग्ध हो गया।
रुस्तम—जनाब, और कहीं आप ऐसा न देखियेगा। सुलतान इसीलिये तो हस्तगत करना चाहते हैं और छद्म-वेष धारण कर हम लोगों के यहाँ आने का प्रयोजन भी यही है। जमालखाँ ने एक दीर्घ निःश्वास लेकर कहा—रुस्तम, क्या कहते हो? हम लोग इस सुन्दर देश को नष्ट करेंगे? इस स्वर्ण-भूमि को ध्वंस करेंगे? अग्नि-दाह कर इस नन्दन-कानन को भस्म करेंगे ? क्या खुदा ने इसीलिये इसको इतनी शोभा-सम्पत्ति दी है? क्या हम लोग इस शान्ति-मय देश को शोणित-मय करेंगे? नहीं, नहीं। रुस्तम, ऐसा कभी नहीं होगा। हम ऐसा कदापि नहीं करेंगे।
रुस्तमखाँ घोर हिन्दू-द्वेषी, सुलतान का उपयुक्त सेनापति था। वह यह बात सुन नहीं सका; पर करता क्या? धीरे से बोला—आखिर आपका मन्सूबा क्या है?
जमालखाँ—यह तो हमने पहले ही बतला दिया। रुस्तम,जिस विजय-वासना ने सुलतान के हृदय को पापाण बना दिया है, जिसके कारण उन्होंने भारत को आज ध्वंस कर डाला है,खुदा की पवित्र भूमि में रक्त प्रवाह बहाया है, जिसके कारण भारत आज श्मशान हो गया है, वह दुर्दमनीय वासना हमारे हृदय में नहीं है। मैं अफगानिस्थान के पार्वत्य राज्य से ही सन्तुष्ट हूँ, मुझे यह ऐश्वर्य नहीं चाहिये। मैं सच कहता हूँ, मुझसे इस सौन्दर्य-शालिनी भूमि के सर्वनाश का कार्य नहीं बनेगा।
रुस्तम ने गम्भीर स्वर से कहा—जनाब, आप कहते क्या हैं? आते समय सुलतान ने आपको यह तलवार दी थी, इसे स्पर्श कर आपने सुलतान की आज्ञा-पालन करने की प्रतिज्ञा की थी। क्या आप अपनी तलवार की गौरव-रक्षा नहीं करेंगे? जमाल—रुस्तम, स्वाधीन अफ़ग़ानिस्थान मेरी जन्म-भूमि है और मैं एक स्वाधीन नराधिप के क्रोड़ में आजन्म परिपालित हुआ हूँ। वह स्वाधीनता मैं नहीं छोड़ सकता। सुलतान को मैंने अपनी देह बेच दी; पर अपने विवेक को नहीं बेचा है। इस देह पर सुलतान का पूरा अधिकार है; पर मेरा विवेक स्वाधीन है। उस पर सुलतान का कोई अधिकार नहीं है। सुलतान चाहें, तो अभी मैं उनके लिये प्राण दे दूँ और वे इस प्राण-विहीन देह को लेकर कुत्तों के सामने डाल दे; पर मैं अपने विवेक के विरुद्ध काम नहीं करूंँगा। रुस्तम, तुम यह तलवार ले लो, इसे सुलतान के पैरों के नीचे डालकर कहना, कि जमाल अब अफ़ग़ानिस्थान को नहीं लौटेगा। वह अब स्वाधीन है। वे उसके अपराध की मार्जना करें; यही उसका अन्तिम अनुरोध है।
यह कहकर शाह जमाल ने रुस्तम की ओर देखा। रुस्तम चुप था। जमालख़ ने फिर कहना शुरू किया—रुस्तम, चुप क्यों हो? क्या तुम्हारे हृदय में पीड़ा नहीं होती? तुम भी वीर-श्रेष्ठ, स्वाधीनता की गोद वर्द्धित, तेजस्वी अफ़ग़ान हो; हाय! यह क्या करते हो? रुस्तम! उस दिन का स्मरण क्यों नहीं करते, जब तुमने अपने अपूर्व साहस से सुलतान की प्राण-रक्षा की थी और जब सुलतान ने कृतज्ञ होकर तुम्हें पुरस्कार देना चाहा था ? याद है, तब तुमने क्या कहा था? 'जनाब, बन्दा आपकी प्रजा है। प्रजा का कर्तव्य है, राजा की रक्षा करना। पुरस्कार का कोई प्रयोजन नहीं।' रुस्तम, तुम्हारा वह तेज कहाँ है? तुम्हारा वह दर्प,
वह साहस और वह वीरत्व अब कहाँ है? आज तुच्छ धन और सम्मान के लोभ से रुस्तम! वीर रुस्तम! सुलतान के एक घृणित कार्य का समर्थन करता है! एक दिन जो साहस दरिद्र रुस्तम ने दिखलाया था, वह आज धनिक रुस्तम नहीं दिखला सकता!! हाय, हाय, रुस्तम, यह क्या करते हो? ज़रा सोचो तो सही, तुम यह क्या करने चले हो?—शाहज़ादा चुप हो गया। रुस्तम सोचने लगा—शाहज़ादे का कहना सच है। सुलतान सत्य ही अन्याय करते हैं। तब क्या रुस्तम सुलतान के विरुद्ध चलेगा? उनकी आज्ञा भंग करेगा? सावधान, रुस्तम! सावधान! शाह जमाल कुछ भी करें; पर तुम सुलतान के बिरुद्ध काम मत करना; नहीं तो तुम्हारी हृदयेश्वरी, प्रियतमा रुखिया बीबी और प्रिय पुत्र, जिन्हें तुम सुलतान के महल में छोड़ आये हो, जल्लादों के हाथ पड़ेंगे। सुलतान उन लोगों को जीता न छोड़ेगा।
रुस्तम बोला— तब आपकी इच्छा क्या है? हम लोग यहीं भिक्षा माँगकर जीवन व्यतीत करें, अथवा गुप्त-चर के हाथ पड़कर प्राण खोवें?
शाह जमाल— क्यों? भिक्षा क्यों माँगेंगे? क्या गुर्जर-देशवासियों में दया और आतिथ्य-सत्कार का इतना अभाव है? विश्वास रक्खो, यदि हम लोगगुर्जर-नृपति से अपना सारा हाल कह देंगे, तो वे हम लोगों का अनिष्ट नहीं करेंगे! सुनते हैं कि हिन्दू शरणागत शत्रुओं का वध नहीं करते। तब किसका भय?
रुस्तम और सह न सका। वह उन्माद-वश भृकुटि-भंग कर
बोला—शाहज़ादे, आप हमें क्षमा कीजिये। आप विश्वासघातक के समान यह कह रहे हैं। हमसे यह न होगा।
विश्वास-घातक!—शाहजमाल का शरीर जल उठा। रुस्तम की यह घृष्टता सह्य न हो सकी। तुरन्त तलवार खोंच, व्याघ्र के समान भीषण गजना कर बोले—शैतान, तेरी इतनी स्पर्धा! एक अन्याय के समर्थन न करने से हम विश्वास-घातक हो गये!
चन्द्र के आलोक में जमाल खाँ की तलवार चमक उठी। क्षणभर में एक भयानक काण्ड हो जाता; परन्तु दैवेच्छा से वह रुक गई। उसी समय पीछे से किसी न जमाल खाँ का हाथ पकड़ लिया। स्वतः शाहज़ादे ने पीछे फिर कर देखा। वह एक रमणी थी। शाहज़ादा विस्मय-विमुग्ध हो बोला—तुम कोन हो? हमारे काम में विघ्न क्यों डाला?
(२)
उस रमणी ने हंसकर तिरस्कार-व्यञ्जक स्वर से कहा—आत्म-विवाद कभी अच्छा नहीं होता। आप लोग क्यों विवाद करते थे?
शाहजमाल ने ऐसा कंठ-स्वर कभी नहीं सुना था। वीणा-ध्वनि के समान वह स्वर अत्यन्त मधुर था। उत्तर देने के लिये वह कामिनी की ओर फिरा; पर उस रूप-राशि की ओर वह देखता ही रह गया। उत्तर न दे सका। उसने मन-ही-मन सोचा—ऐसी अपूर्व रूप-राशि और फिर ऐसी अलौकिक शक्ति! निश्चय ही यह रमणी कोई देवी है।—उस रमणी ने फिर कहा—गुर्जर की यह
पवित्र भूमि किसी विदेशी के रक्त से रञ्जित न हो, यही हमारी इच्छा थी और इसीलिये हमने तुम्हारे हाथ से तलवार ले ली।
शाहज़ादे ने चकित होकर पूछा—यह तुमसे किसने कहा कि हम लोग विदेशी हैं?
रमणी—तुम्हारे इस कार्य ने। गुर्जर-देश के सम्पूर्ण अधिवासी, हज़ार कारण होने पर भी, अपने देश-बन्धु के शोणित से इस भूमि को कलंकित न करेंगे और तुम यही करने चले थे।
शाह—(उठकर) रमणी! तुम कौन हो?
रमणी—मैं भगवान् सोमनाथ की दासी हूँ।
शाह—क्या तुमने हम लोगों की सब बातें सुन ली?
रमणी—हाँ।
शाह—बताओ तो हम कौन हैं?
रमणी—आप गुर्जर के घोर शत्रु हैं।
शाह—(हँसकर) रमणी, तुमने भूल की है, हम लोग काश्मीर के वणिक् हैं।
रमणी—नहीं साहब, मैं भूलती नहीं हूँ। आप सुलतान महमूद के भ्रातृ-पुत्र शाहज़ादे हैं और ये रुस्तम।
शाह जमाल चमक उठा। मुख मलीन हो गया। वह बोला—रमणी, तुम्हारे साथ और कोई है?
रमणी—नहीं साहब, मैं अकेली हूँ।
शाह जमाल—तुम एक रूपवती रमणी हो। फिर भी अकेली ही फिरती हो! रमणी—कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। गुर्जर स्वाधीन देश है। यहाँ हिंदू बसते हैं। पर-स्त्री और पर-कन्या को सब भगिनी-भाव से देखते हैं। साहब, इस देश में रमणी को विपद् की आशंका नहीं रहती।
शाह जमाल—समझ गया; पर हम तुम्हारा पूरा परिचय चाहते हैं।
रमणी—इससे अधिक मैं नहीं कह सकती।
शाह जमाल ने मन-ही-मन उस रमणी के साहस की बहुत प्रशंसा की; फिर कठोर स्वर से बोले—रमणी, परिचय न देने से बिपद् में पड़ोगी।
रमणी—विपद् में कौन डालेगा?
शाह—हम और हमारे साथी।
रमणी—आपके और कितने साथी हैं?
शाह—चार।
रमणी—क्या वे भी आपके समान वीर हैं, क्या स्वाधीनता की लीला-भूमि अगानिस्थान के सब वीर, रमणी पर अत्याचार करते हैं?
रुस्तम यह सह न सका। उसने तलवार खींच ली। रमणी ने शीघ्रता से रुस्तम का हाथ पकड़कर ऐसा झटका दिया कि, तलवार हाथ से छिटककर दूर जा गिरी।
रुस्तम विस्मय-सहित बोल उठा—मां, तुम कौन हो?
रमणी ने हँसकर कहा—मैं भगवान् सोमनाथ की दासी हूँ। रुस्तम-क्या गुर्जर को सब रमणियाँ ऐसी ही शक्तिशालिनी हैं?
रमणी—जिस देश में स्वय शक्ति के अवतार महा-काल भैरव सोमनाथ बिराजते हैं, वहाँ की अधिकांश रमणियाँ ऐसी ही हैं।
इसी समय शाहजादे ने कहा-रुस्तम, इस रमणी को धन्यवाद दो। इसी के कारण आज यह पवित्र भूमि हम लोगों के रुधिर-प्रवाह से कलंकित होने से बची। चलो, हम लोग अब लौटें। यह यात्रा निष्फल हुई।
रमणी ने पूछा—कहाँ जाइयेगा?
शाह जमाल—अधिकतर सिन्धुदेश।
रमणी—अभी आपको नाव कैसे मिलेगी? फिर एक बात और है कि आप हमारे अतिथि हैं, बिना आतिथ्य स्वीकार किये आप जा कैसे सकते हैं?
शाह—तब हम क्या करें?
रमणी—आपको हमारे साथ चलना पड़ेगा। आप हमारे अतिथि हैं।
शाह—तुम्हारा विश्वास क्या?
रमणी—विश्वास! हमारा बचन।
शाह—यदि हम न जायें, तो क्या करोगी?
रमणी—आप को जाना ही पड़ेगा।
यह कह रमणी ने एक शंख निकाल कर फूंका। शंखनाद के
होते ही क्षण भर में वहाँ १०० शस्त्रधारी सैनिक आ पहुँचे। उनमें से एक ने आगे बढ़कर कहा—माँ, क्या आज्ञा है।
रमणी ने हँसकर कहा—कुछ नहीं। यों ही एक बार तुम्हें देखने की इच्छा हुई। अब तुम लोग जाओ।
क्षण-भर में वे लोग जहाँ से आये थे वहीं चले गये।
शाह जमाल ने यह देखकर कहा—"अच्छा, हम चलते हैं;पर एक बात की प्रतिज्ञा करो।
रमणी—किस बात की?
शाह—दगा तो नहीं करोगी?
रमणी—ना, भगवान् सोमनाथ हमें ऐसी मति न दें।
शाह—और एक बात । हमारा परिचय किसी को न देना।
रमणी—स्वीकार है।
शाह—और कल सूर्योदय के पहले हमें बिदा दे देना और एक नाव भी ठीक करना।
रमणी—यह भी स्वीकार है।
शाह जमाल ने रुस्तम की ओर देखकर कहा—रुस्तम, उन लोगों को भी बुला लो।
रुस्तम ने एक सीटी बजाई, जिसे सुनते ही वे चारों सैनिक भी आ गये।
रमणी आगे-आगे चलने लगी और वे लोग विस्मय-विमुग्ध होकर पीछे-पीछे जाने लगे।
(३)
कुछ दूर चलने के बाद एक वृहत् अट्टालिका मिली। वहाँ १० शस्त्रधारी सैनिक इधर-उधर घूम रहे थे। रमणी ने शाहज़ादे की ओर देख कर कहा—महाशय! आप यहाँ निश्शंक आइये। राजपूत अपने अतिथि का अनिष्ट कभी नहीं करते। घोर शत्रु भी यदि अतिथि होकर आवे, तो वह हम लोगों का पूजनीय है।
इसके बाद उसने एक सैनिक की ओर देखकर कहा—भैरव,ये लोग हमारे अतिथि हैं। इनको विश्राम-स्थान बतलाओ।—भैरव ने आकर कहा—चलिये महाशय ।
रमणी एक ओर चली गई और शाह जमाल तथा उसके साथियों ने उस बृहत् अट्टालिका में प्रवेश किया। भैरव इनको एक सजे हुए कमरे में ले गया। वहाँ इनसे कहा—यह कमरा आपके लिये है और यह दूसरा कमरा आपके भृत्यों के लिए।
यह कहकर भैरव चला गया। शाह जमाल की आज्ञा पाकर वे चारों सैनिक भी दूसरे कमरे में चले गये। उस कमरे में केवल शाह जमाल और रुस्तम रह गये।
शाह जमाल ने कहा—रुस्तम !
रुस्तम—जनाब।
शाह—यह क्या व्यापार है ? कुछ समझ में आता है ?
रुस्तम—जनाब! कुछ नहीं।
शाह—इनका उद्देश्य क्या है? अतिथि बनाना या इसी मिस से बन्दी करना? रुस्तम—बन्दी होने में अब क्या कसर है?
शाह—और यह रमणी कौन है ?
रुस्तम—हुजूर, मैं कुछ नहीं कह सकता।
और कुछ बात नहीं हुई। इसी समय भैरव चार भृत्यों के साथ आ पहुँचा।
भैरव बोला—हमारी माताजी का अनुरोध है कि अब अब आप लोग भोजन करें। यहाँ जो कुछ मिल सकता है, वही आपके लिए लाया गया है। फल, कन्द-मूल और दुग्ध को छोड़ और कुछ नहीं है। कल प्रातःकाल माताजी से साक्षात् होगा।—भैरव चला गया और ये लोग भोजन कर सोने की चेष्टा करने लगे। शाहज़ादे को छोड़, घड़ी-भर में सब घोर निन्द्रा में अचेत हो गये।
शाहज़ादे को नींद नहीं आई। वह जागता ही रहा। आज तक शाहज़ादे के हृदय में किसी रमणी का चित्र अंकित नहीं हुआ था; पर उस गुर्जर-रमणी के अपूर्व-सौंदर्य, अगम्य साहस और आतिथ्य-सत्कार ने उसके हृदय पर एक बड़ा आघात कर दिया था। उस आघात के कारण उसका हृदय जल रहा था। शाहज़ादे को ज़रा भी शान्ति नहीं मिलती थी।
रात व्यतीत हो गयी। आकाश में प्रातःकाल की लालिमा फैलने लगी। रुस्तम भी सोकर उठा और चारों सैनिक भी। भैरव फिर आया। शाहजादे को प्रणाम कर बोला—रानीजी जानना चाहती हैं, कि आप लोगों को कल कुछ कष्ट तो नहीं हुआ? शाह—रानीजी कौन? जिन्होंने हमें आश्रय दिया है?— हाँ।
शाह—रानीजी को हमारी ओर से धन्यवाद देकर कहना, हम लोग उनके बड़े कृतज्ञ हैं। अब वे हमें बिदा करें।
भैरव—आप लोग प्रातःकाल के कार्यो से यदि निवृत्ति हो चुके हों, तो अभी प्रस्थान कीजिये। नाव तैयार है।
शाह—गुर्जर के अतिथि आपकी रानी के निकट और एक बात के प्रार्थी हैं।
भैरव—कहिये।
शाह—यही कि वे स्वयं आकर हमें बिदा देवें।
भैरव—असम्भव, ऐसा कभी नहीं हो सकता।
शाह—क्यों? कल तो वे हमारे साथ आई थीं!
भैरव—पर वह आना कर्तव्य के अनुरोध से था, आज कदापि नहीं आ सकतीं।
शाह—हम मुसलमान हैं। अपने आमंत्रित अतिथि को पूरे सम्मान-सहित बिदा करते हैं। देखते हैं कि गुर्जर की रानी शिष्टाचार की आदर्श नहीं हैं। वे अपने श्रेष्ठ अतिथि का अपमान करने में संकोच नहीं करतीं।
भैरव का मुख लाल हो गया। उसने तलवार पर हाथ रक्खा,
इसी समय पीछे से किसी ने कहा—सावधान! भैरव! सावधान! अतिथि का अपमान मत करना।
भैरव ने चौंककर पीछे देखा कि स्वयं रानी कमलावती खड़ी हैं।
शाह जमाल ने देखा कि, इस बार कमलावती का मुख खुला नहीं है, वह अवगुण्ठन से आवृत है।
कमलावती ने शाह जमाल की ओर देखकर कहा—जनाब! आप गुर्ज्जर पर कलंक आरोपण करने के लिये उद्यत हो गये थे; इसीलिये मुझे आना पड़ा। यह ध्यान रखिए कि गुर्ज्जर की रानी अपने अतिथि के साथ अशिष्ट व्यवहार नहीं करती।
कमलावती यह कहकर चुप हो गई। शाह जमाल ने सिर नीचा कर लिया। कमलावती ने फिर गम्भीर स्वर से कहा—जनाब, मैं अब अधिक समय तक नहीं ठहर सकती; क्योंकि पूजा का समय जा रहा है। यदि हम से कुछ भूल हुई हो, तो उसे आ क्षमा करें; भूल सभी से हो जाती है। हाँ यह भी कहे देती हूँ कि आप फिर कभी छद्म-वेष से गुर्ज्जर-प्रदेश में न आइयेगा,नहीं तो आप विपद् में पड़ेंगे।
कमलावती शीघ्रता से चली गई। जैसे विद्युत् क्षण-भर में आकाश-मण्डल में प्रकट होकर फिर लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह शीघ्रता से आई और शीघ्रता से ही चली गई। शाह जमाल देखता ही रह गया।
सेनापति रुस्तम ने कहा—शाहज़ादे! अब आप वृथा विलम्ब क्यों करते हैं? शाहज़ादे ने एक दीर्घ निःश्वास परित्याग कर कहा—रुस्तम,चलो, अब यहाँ ठहरने का काम नहीं है।
सब लोग आगे बढ़े और भैरव भी उनके पीछे चला।
(४)
"मां, क्या यह काम अच्छा हुआ?"
"इसमें बुरा क्या हुआ भैरव?"
"मुसलमान हमारे शत्रु हैं। और फिर, जो यहाँ आये थे, वे लोग हमारे घोर शत्रु हैं।"
"कुछ भी हो; पर थे तो हमारे अतिथि!"
"जान पड़ता है, गुर्ज्जर पर शीघ्र ही विपद् आवेगी।"
"यह कैसे जाना?"
"उन लोगों की बातचीत से मालूम हुआ।"
"कुछ चिन्ता की बात नहीं है। भैरव, तुम भय मत करो, गुर्जरवासी निर्बल नहीं है। कुमार सिंह की शक्ति अभी क्षीण नहीं हुई। गुर्ज्जर का अभी कुछ भी अनिष्ट न होगा।"
पीछे से किसी ने कहा—"सत्य है कमला! गुर्जरवासी निर्बल नहीं हैं।"
कमलावती ने मुँह फेरकर देखा, तो कुमार पीछे खड़े हँस रहे हैं। भैरव कुमार को देखकर अन्यत्र चला गया। कमला ने चिन्तित स्वर से कहा—कुमार! हम लोगों पर विपद् आनेवाली है।
कुमार बोले—विपद्! कमला, जब तक सुलतान महमूद
जीवित है, तब तक विपद् का अभाव न रहेगा; पर यह ध्यान रक्खो , हम भी विपद् को ही खोजते रहते हैं।
कमला ने कठोर दृष्टि-पात कर पूछा—कैसे?
कुमार—क्या यह नहीं जानती हो? स्मरण है, सोमनाथ के मन्दिर में आपने क्या प्रतिज्ञा की थी और क्या स्वीकार किया था? यदि विपद् न आयेगी, तो कुमार सिंह का बाहु-बल कैसे प्रगट होगा?
कमला गम्भीर होकर बोली—कुमार, यह समय सुख-कल्पना करने का नहीं है। गुर्जर का सारा भार तुम पर है। पिता वृद्ध हैं। वे तुम पर विश्वास करते हैं।
कुमार—यह सब जानता हूँ। जीवन रहते मैं कर्त्तव्य से पराङ्मुख न हूँगा। तुम इसकी चिन्ता मत करो। पर मुझे एक बात की चिन्ता है।
कमला—कौन बात? मुझसे संकोच न करना।
कुमार—कमला, युद्ध में सब अनिश्चित रहता है। कौन जानता है कि क्या होगा? यदि कहीं मैं युद्ध में मारा जाऊँ?
कमला—कुमार, तो मैं स्वर्ग में जाकर तुम्हारे चरणों को चूमूँगी।
कुमार—कमला, मैं यही सुनना चाहता था। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे लिये ही नीच 'महमूद' गुज्जर पर आक्रमण करेगा।
कमला—यह आपने कैसे जाना? कुमार—सुलतान का भ्रातृ-पुत्र शाह जमाल तुम्हें देख कर उन्मत्त-सा हो गया है वही सेनापति होकर आवेगा, यह भैरव ने हमसे कहा है। वह उन लोगों के साथ बड़ी दूर तक गया था। उसने यह बात उन लोगों के मुख से सुनी है।
यह सुनकर कमलावती के हृदय में भय होने लगा। एक अनिष्ट की आशंका होने लगी। क्या उसके लिये उसकी जननी जन्मभूमि का सर्वनाश होगा? क्या उसी के लिये शाह जमाल गुर्जर पर आक्रमण करेगा?
कुछ क्षण बाद कमलावती ने कहा—कुमार, तुम इसका भय मत करो। मैं राजपूत की कन्या हूँ। मैं अपना घर्म भली-भाँति जानती हूँ समय आने पर हम लोगों के लिये चिताग्नि चन्दन-प्रलेप के समान शीतल हो जाती है।
कुमार के नेत्रों में जल भर आया। वे वहाँ से चले गये। कमलावती ने आकाश की ओर देख कर करुण-स्वर से कहा—भगवन, सोमनाथ! सहस्रो कमलावती चाहे काल के भीषण स्रोत में बह जाँय ; पर देखना प्रभो, कुमार गुर्जर की रक्षा भली भाँति करें।
(५)
सिन्धुदेश में समुद्र-तीर से दस कोस पर सुलतान महमूद ने एक नगर बसाया था। वह अब भी महमूदाबाद के नाम से प्रसिद्ध है। भारत में राज्य स्थापित करना, यह महमूद का आन्तरिक उद्देश्य न था और इसके लिये उसने प्रयत्न भी नहीं किया। उसकी इच्छा थी—असंख्य रत्न-संग्रह करना। इसी इच्छा को पूरी करने के लिये महमूद ने भारत पर अनेक बार आक्रमण किया और दैवेच्छा से वह सदा सफल-मनोरथ ही होता रहा। उसकी राजधानी, ग़ज़नी, भारत-ऐश्वर्य से अलकापुरी के तुल्य हो गई; परन्तु महमूद सन्तुष्ट न हुआ।
सोमनाथ के ऐश्वर्य की कथा सुनकर उसने गुर्जर पर भी धावा करने का निश्चय किया; परन्तु उसे सुयोग न मिलता था। उसने अनेक बार चेष्टा की; परन्तु कुछ कर न सका। इस बार उसने शाहज़ादा शाह जमाल और सेनापति रुस्तम को भेजा। हिन्दू वणिक के वेष में उन लोगों ने गुर्ज्जर-देश में प्रवेश भी किया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह पाठकगण जानते ही हैं।
राज-कन्या कमलावती के आदेश से भैरव उन लोगों को एक निरापद् स्थान तक पहुँचाकर गुर्ज्जर को लौट आया। मार्ग में शाह जमाल और रुस्तक पिश्तो-भाषा में वार्तालाप करते थे। शाह जमाल ने कई बार कमलावती का नामोल्लेख किया। भैरव पिश्तो नहीं जानता था, इससे कुछ समझ न सका; पर गुर्ज्जर की माता प्रत्यक्ष देवी कमलावती का पवित्र नाम उन म्लेच्छों के मुख से सुनकर भैरव का सारा शरीर जलने लगा। एक बार उसके मन में आया, कि नाव को समुद्र में डुबा दे, जिससे गुर्ज्जर के दो प्रबल शत्रुओं का नाश हो जाय; पर उसी समय कमलावती का अन्तिम वचन उसके ध्यान में आ गया—देखना भैरव, इन लोगों का कुछ भी अनिष्ट न हो। शत्रु होने पर भी ये लोग हमारे
अतिथि हैं।—भैरव ने तुरन्त ही अपने हृदय की उत्तेजना को दबा लिया; पर इतना उसने समझ लिया, कि गुर्जर पर यवन लोग शीघ्र ही आक्रमण करेंगे; परन्तु इस बार सोमनाथ के विश्व विश्रुत ऐश्वर्य के लिये नहीं, कमलावती के लिये। शाहज़ादा के हृदय में एक भीषड़ अग्नि धधक रही थी, उसी की शान्ति के लिये वह किसी-न-किसी दिन गुज्जर पर विपद् लावेगा।
(६)
महमूदाबाद आकर शाह जमाल ने सुना, कि सुलतान महमूद आखेट के लिये निकले हैं। शाहज़ादा वहीं सुलतान की राह देखने लगा। रुस्तम भी उसके साथ ठहरा रहा।
यहाँ आकर रुस्तम ने देखा, कि शाहज़ादा अब हमको प्रसन्न करने की चेष्टा में सदा लगा रहता है। चालाक रुस्तम समझ गया कि शाह जमाल क्यों खुशामद करता है। बात यह थी, कि रुस्तम सुलतान का प्रधान सेनापति था। फिर उस पर सुलतान का पूर्ण विश्वास था। शाहज़ादे ने सोचा, कि रुस्तम से विवाद करना अच्छा न हुआ। क्षण-भर में उत्तेजना के वश उसने जो कुछ कह डाला था, उसके लिये वह पश्चाताप करने लगा। फिर उन्हें भय था, कि रुस्तम कहीं यह सब बात सुलतान से जाकर न कह दे। यही सब सोच-विचार कर शाह जमाल रुस्तम की खुशामद में लगा रहता था। रुस्तम शाह जमाल पर आन्तरिक स्नेह रखता था। वह कभी नहीं चाहता था, कि शाह का कुछ अनिष्ट हो। सन्ध्या के समय एक निर्जन कमरे में बैठे शाह जमाल और रुस्तम वार्तालाप कर रहे हैं। शाह जमाल ने कहा—रुस्तम साहब, आपने हमारी बे-अदबी तो माफ़ कर दी?
रुस्तम—जनाब का लड़कपन अभी नहीं गया है। इसी से उस दिन ऐसी बात हो गई; पर हमने मन में उसे कभी नहीं रक्खा। हुजूर, यह ध्यान रक्खें, कि ऐसी छोटी-छोटी बातों पर रुस्तम कभी ध्यान नहीं देता।
शाह—हमसे एक बात की प्रतिज्ञा करो।
रुस्तम—कहिए।
शाह—उस दिन की बात तो तुम सुलतान से कभी न कहोगे?
रुस्तम—आज तक मैंने मिथ्या-भाषण नहीं किया है। आपके लिये मैं वह भी करूंँगा। आप विश्वास करें, सुलतान को यह बात कभी न मालूम होगी।
शाह—रुस्तम हमने भी दृढ़ नियम किया है, कि हम सुलतान की आज्ञा कभी न भङ्ग करेंगे।
रुस्तम—तो क्या आप गुर्जर पर, उनके कहने से, आक्रमण करेंगे?
शाह—ज़रूर।
रुस्तम—यह क्या? शाहज़ादे, यह सब कमलावती के लिये तो नहीं है?
शाह—वही बात है रुस्तम!
रुस्तम—पर आप यह जान लें, कि गुर्जर को ध्वंस किये बिना
आप कमलावती को नहीं पा सकते। जब तक गुर्ज्जर में एक भी राजपूत जीता रहेगा, तब तक आप निरापद् नहीं हो सकते।
शाह जमाल—हाँ, रुस्तम, अबकी बार हम गुर्जर को बिल्कुल ध्वंस कर डालेंगे, उसे एक बार ही श्मशान बना देंगे। जिस प्रदेश की प्राकृतिक शोभा ने कभी हमें मुग्ध कर लिया था, उसी प्रदेश को—तुम देख लेना—हम प्रेत-भूमि बनाकर छोड़ेंगे।
रुस्तम—कमलावती क्या इतनी सुन्दरी है?
शाह जमाल—रुस्तम! तुम उस रूप का मूल्य नहीं जानते।
रुस्तम कुछ कहना चाहता था कि सुलतान महमूद स्वय आ पहुँचा। उन्हें देखकर शाह के चेहरे का रंग उड़ गया। रुस्तम का भी हृदय काँप उठा। दोनों आसन त्यागकर ससम्भ्रम उठ बैठे।
सुल्तान ने, गंभीर स्वर में, जमाल की ओर देखकर कहा—जमाल, गुर्ज्जर का क्या संवाद है?
शाह जमाल—जहाँपनाह, संवाद शुभ है।
सुलतान—गुर्ज्जर-पति का सेना-बल कितना है?
शाह जमाल—हम लोगों से बहुत कम!
सुलतान—गुर्ज्जर-विजय करने के लिए तुम्हें कितनी सेना चाहिए?
शाह जमाल—दस हज़ार।
सुलतान—दस हजार! तुमको दस और रुस्तम को पाँच हज़ार देने से हमारा बाहु-बल शिथिल हो जायगा। शाह जमाल—गुर्ज्जर की सेना खूब सुरक्षित है।
सुलतान—जानता हूँ; पर मुझे आश्चर्य है कि ग़ज़नी का भविष्य अधिकारी अफ़ग़ान-सैनिक का बल नहीं जानता!
शाह जमाल के हृदय में यह बात तीर-सी लगी। उसने तेजी से कहा—जहाँपनाह, हम केवल पाँच हजार सेना लेकर युद्ध में जाने के लिए प्रस्तुत हैं। आपके आशीर्वाद से मैं इतनी ही सेना से गुर्ज्जर-विजय करूंँगा। यदि नहीं, तो युद्ध में ही प्राण-त्याग करूँगा; लौटूंगा नहीं।—सुलतान शाह जमाल को पुत्र के समान चाहता था। यह बात सुनकर उसके नेत्रों में जल भर आया। उसने कहा—जमाल, हम तुम्हें दस हजार सेना देंगे; पर तीन हजार रुस्तम के अधीन रहकर तुम्हारी पार्श्व-रक्षा करेगी। कल ही युद्ध-यात्रा करो। हाँ, एक बात और कहनी है, गुर्ज्जर-पति को बन्दी कर हमारे पास भेजना। यदि जीता हाथ न आवे, तो सिर काटकर भेजना।
शाह—जहाँपनाह, मैं वैसा ही करूँगा।
सुलतान—हाँ और एक बात।
शाह—आज्ञा।
सुलतान—हम सुनते हैं, गुर्ज्जर-राज कन्या कमलावती अत्यन्त सुन्दरी है। हम उसे बेगम बनाना चाहते हैं; इसलिये तुम उसे सम्मान-सहित हमारे पास भेजना।
शाह जमाल के मस्तक पर सहसा वज्रपात हो गया। सारा संसार अन्धकार-मय बोध होने लगा; पर उपाय क्या था? कहना पड़ा—बन्दा आपकी आज्ञा का पालन करेगा, आप निश्चिन्त रहें।
सुलतान और कुछ न बोला, वहाँ से शीघ्र चला गया।
शाह जमाल के हृदयाकाश में आशा का जो उज्ज्वल आलोक प्रकट हुआ था, वह अन्धकारमय निराशा में परिणत हो गया। वह सुख का स्वप्न चला गया।
गुर्ज्जर-विजय करने का पहले जैसा उत्साह था, वैसा अब न रहा। शाह विषण्ण मुख से बोला—रुस्तम युद्ध के लिए प्रस्तुत हो। खुदा को मंजूर है वही होगा।
(७)
भैरव हाँफता-हाँफता कमलावती के कमरे के पास आकर विकृत स्वर से बोला—मा, मा!
कमलावती ने बाहर आकर कहा—कौन है? भैरव! क्या बात है?
भैरव ने कहा-मा, सर्वनाश उपस्थित है!
कमलावती ने डरकर पूछा—क्यों, क्या हुआ?
भैरव-मुसलमानों की सेना गुर्जर के समीप आ गई है।
कमलावती—कितनी सेना?
भैरव—प्रायः बीस हजार।
कमला—बी-स-ह-जा-र—!!!
भैरव-हाँ, मा, इससे अधिक होगी—कम नहीं। कमला—गुर्जर की रक्षा कैसे होगी? भैरव, हमारी सेना दस हजार से अधिक नहीं है।
भैरव—हाँ, मा, और—और तुम्हारी कैसे रक्षा होगी, मा!
कमलावती का मुख लाल हो गया, फिर तुरन्त ही वह लालिमा चली गई। कमला गम्भीर हो कर बोली—भैरव, हमारी कौन चिन्ता? क्या तू भूल गया कि मैं राजपूत-कन्या हूँ। हम लोगों को मृत्यु से भय नहीं है। अपनी जन्म-भूमि की चिन्ता कर। पिता कहाँ हैं?
भैरव—नगर के बाहर व्यूह-रचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे सोमनाथ के चरण-तल में रहकर युद्ध करेंगे। वे ही हमारी रक्षा करेंगे।—कमला कातर स्वर से बोल उठी—भगवान् सोमनाथ, क्या होगा? क्या करोगे? प्रभो!
सहसा कुमारसिंह वहाँ युद्ध-वेष में आ पहुँचा। कमलावती कुमार का हाथ पकड़कर बोली—कुमार अब क्या होगा?—कुमार उत्साह-पूर्ण स्वर से बोला—किसी का भय नहीं है। कमला, स्वयं स्वयंभू हमारे पृष्ठ पोषक हैं। जहाँ सोमनाथ महाकाल के रूप में विराजमान हैं और जहाँ साक्षात् शक्तिमयी देवी तुम हो, वहाँ कमला, हम लोगों को भय किस बात का है? तुम हमें प्रसन्न मुख से बिदा दो। कमला सजल नेत्रों से बोली—कुमार, आज न-जाने क्यों मेरा हृदय काँपता है? न-जाने क्यों अनिष्ट की आशंका होती है? हाय! इस सर्वनाश और अनर्थ की जड़ मैं ही हूँ। हाय! मैंने क्यों शैतान जमाल को आश्रय दिया? कुमार—कमला, यह विषाद करने का समय नहीं है। तुम राजपूत-कन्या हो। धैर्य धरो। मैं जाता हूँ; पर एक बात और कहनी है। मुसलमानों का कोई विश्वास नहीं। युद्ध में जय-पराजय दोनों मिलती हैं। कौन जानता हैं, कहीं हमारी पराजय हो और उन लोगों की जय। यदि कहीं ऐसा हो, तब तुम्हें आत्मरक्षा के लिये समय न मिलेगा; इसलिए यह मैं तुम्हें दिये जाता हूँ। विपद् पड़ने पर अपनी धर्म-रक्षा के लिए तुम इस विष का सदुपयोग करना। मेरी मृत्यु हो जाने और तुम्हारे पिता के स्वर्ग-गत होने पर, कमला! तुम यह जान रक्खो, देवता भी तुम्हारी रक्षा न कर सकेंगे। उस समय यही विष तुम्हारी और तुम्हारे धर्म की रक्षा करेगा। जब तुम सुन लेना कि कुमार अब संसार में नहीं रहा, तब तुम विष-पान कर अपनी पवित्र आत्मा की रक्षा करना।
यह कहकर कुमार ने कमलावती के हाथ में एक काग़ज़ की पुड़िया दे दी और फिर सजल नेत्रों से युद्ध-भूमी की ओर प्रस्थान किया। भैरव दूसरे कमरे में था। कुमार को जाते देखकर वह भी उनके पीछे हो गया।
(८)
सन्ध्या हुई। गुर्ज्जर-सेना पठानों से पराजित हुई। सूर्यदेव गुर्ज्जर के पराजय का कलङ्क न सह क्रोध में लोहित वर्ण धारणकर आकाश-मण्डल में अदृश्य होगये।
उस दिन भगवान सोमनाथ के मन्दिर में आरती नहीं हुई। उस दिन देव-मन्दिर के घण्ट-निनाद और ब्राह्मणों के स्तोत्र-पाठ से
आकाश नहीं गूँजा। दिगन्त मुखरित नहीं हुआ। उस दिन समुद्र तरङ्ग घोर गर्जना नहीं करती थीं। उस दिन गुर्जर की सौन्दर्यशालिनी भूमि विभीषिकामय श्मशान के समान हो गई थी।
भगवान् सोमनाथ श्मशान ही में रहते हैं। वही उनका निवास स्थान है; पर इस श्मशान में चिता-भस्म नहीं है। उनके स्थान में उनके एकान्त भक्त गुजरवासियों का हृदय-शोणित बह रहा है।
क्रमशः रजनी गम्भीर होने लगी। अन्धकार बढ़ने लगा। कमलावती अपने पिता की मृत-देह के लिए चिता रचकर भैरव के साथ फिर युद्ध-भूमि में आई। उस महाश्मशान में वह प्रेतनी के समान घूम रही है। पीछे-पीछे मशाल हाथ में लिए भैरव था। भैरव मृत-देहों के मुख के पास मशाल ले जाता था। फिर निराशा पूर्ण स्वर से कहता था—नहीं, नहीं ये कुमार नहीं हैं। वायु भी हताश होकर कहता था—नहीं ये कुमार नहीं हैं। उस श्मशान-क्षेत्र में स्थित वृक्षों के पत्ते भी कहने लगते—नहीं, ये कुमारसिंह नहीं है। चन्द्र-हीन अकाश-मंडल के तारे भी कह उठते थे— कुमारसिह कहाँ हैं? उन्हें कहाँ खोजती हो? वे तो हमारे राज्य मे हैं कमलावती निराश होकर फिर दूसरा मृत देह की ओर जाती थी।
इसी समय उस अन्धकार-मय श्मशान-भूमि में दो मनुष्य का आकृत दीख पड़ी। मूर्तिद्वय, भैरव और कमलावती के समीप आये। कमलावती ने उन दोनों को पहचान लिया और भैरव ने भी। उनमें से एक शाह जमाल था और दूसरा रुस्तम। कमलावती ने तिरस्कार-पूर्ण स्वर से कहा—शैतान, नराधम,तूने क्यों हमारा सर्वनाश किया? क्या हमारे आतिथ्य-सत्कार का यही पुरस्कार है?—शाह जमाल ने उस तिरस्कार का उत्तर न दिया। वह इस सयय कमलावती की ओर स्थिर दृष्टि से देखता था। जिसके लिए आज उसने गुर्ज्जर को प्रेत-भूमि कर दी है, उसे सामने खड़ी देखकर शाह जमाल उन्मत्त हो उठा। फिर विकृत स्वर से बोला—कमला! तुम यहाँ क्यों घूम रही हो? यह हम अनुमान से कह सकते हैं कि कदाचित तुम कुमारसिंह को मृत देह लेना चाहती हो; पर कुमार मरे नहीं हैं, आहत हैं और हमारे शिविर में बन्दी हैं। कमला हम कृतघ्न नहीं हैं। यदि तुम चाहो, तो हम अभी उन्हें स्वाधीन कर दें; पर इसके लिये मैं तुम्हें लेना चाहता हूँ।—इसके बाद शाह जमाल उत्तेजित स्वर से कहने लगा—कमला, सुलतान तुम्हें बेगम बनाना चाहते हैं और मैं तुम्हें अपनी हृदयेश्वरी, अपनी प्राणेश्वरी करना चाहता हूँ। मैं ग़ज़नी का भावी सुलतान हूँ; पर कमला तुम्हारे लिए मैं वह राज्य छोड़े देता हूँ। मैं तुम्हें चाहता हूँ। मैंने निश्चय कर लिया है कि अब मैं अफ़ग़ानिस्तान न लौटूंँगा। इसी देश में एक कुटी बनाकर मैं तुम्हारे साथ सुख से रहूँगा। मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए। कमला, प्राणेश्वरी कमला! एक बार कहो, तुम मेरी हो।—इतना कहकर शाह जमाल कमलावती को आलिङ्गन करने के लिए दौड़ा। एकाएक पीछे से एक बन्दूक की आवाज़ आई। शाह जमाल आहत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। शीघ्र ही वह आघात-
कारी सब के सम्मुख आया। उसे देख रुस्तम के आश्चर्य की सीमा न रही; क्योंकि वह स्वयं सुलतान महमूद था।
भू-पतित शाहज़ादे की ओर देखकर सुलतान बोला—शैतान, विश्वास-घातक! नफर, क्या इसीलिए मैंने तुझ पर इतना विश्वास किया था? मैंने तुझे क्या नहीं दिया? और फिर तूने मेरे ही साथ दग़ा की। महमूदाबाद में मैंने छिपकर तेरी बातें सुन ली थीं। एक सैनिक के वेष में मैं तेरे पीछे-पीछे यहाँ तक आया और यहाँ आज मैंने तुझे इस दग़ाबाज़ी के लिए पूरा पुरस्कार दे दिया।
यह कहकर सुलतान पीछे लौटा; देखा, वहाँ कमलावती और भैरव कोई नहीं हैं, रुस्तम खड़ा है। सुलतान ने पूछा—रुस्तम, ये दोनों कहाँ चले गये?
रुस्तम ने कहा—जहाँ पनाह, मैं कह नहीं सकता, कहाँ गये। मैंने खयाल नहीं किया।
सुलतान—रुस्तम, तुम इस लाश को उठाकर मेरे पीछे-पीछे आओ।—रुस्तम शाह जमाल की लाश उठाकर सुलतान के पोछे-पीछे चला। शिविर में जाने से मालूम हुआ, कि कुमारसिंह भी न जाने कैसे छूटकर निकल गये! सुलतान ने कहा—रुस्तम, इस बार हम दुश्मनों को शिकस्त न कर सके। चलो फिर कभी देखा जायगा।
सुलतान महमूद के लौट जाने पर कुमारसिंह ने कमलावती का पाणिग्रहण किया। कमलावती के पिता की भी यही अन्तिम इच्छा थी। कुमारसिंह उनके बाद गुर्ज्जर के अधीश्वर हुए।
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ताई
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( १ )
ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?"—कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा।
बाबू साहब ने दोनों बाहें फैलाकर कहा—हाँ बेटा, ला देंगे।
उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले-क्या करेगा रेलगाड़ी?
बालक बोला—उसमें बैठ के बली दूल जायेंगे। हम भी जायँगे, चुन्नी को भी ले जायँगे। बाबूजी को नहीं ले जायेंगे। हमें लेलगाली नहीं ला देते । ताऊजी, तुम ला दोगे, तो तुम्हें ले जायेंगे।
JIM – Assistente
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