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  • गल्प समुच्चय

    गल्प समुच्चय

    Aproximadamente 103.452 palavras.

    सड़क सामने आ गई। कोचवान बैठा ऊँघ रहा था। उसे 'साहब' के इतना शीघ्र लौट आने पर बड़ा आश्चर्य और दुःख हुआ—ग़रीब की नींद भी पूरी न होने पाई, गाड़ी रवाना हुई औंर आध घण्टे में बँगले पर पहुंच गई।

    बिहारी का विचार था, कि उमा ड्राइंग-रुम में पड़ी हुई अपनी हालत पर अफसोस करती होगी, या सो गई होगी; लेकिन ड्राइंग रूम ख़ाली पड़ा था, वहाँ कोई न था। उन्होंने शयनागार में जाकर देखा, उमा वहाँ भी न थी। एक-एक कमरे में जाकर देखा—उमा कहीं भी दिखाई न दी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।

    नौकर बरामदे में पड़ा सो रहा था, बाबू साहब ने उसे जगाया और पूछा—मलकिन कहाँ हैं?

    "हूजूर कुछ बताया नहीं, कहीं घूमने गई हैं।'

    बिहारी का माथा ठनका, सहस्रों शङ्कायें घेरने लगीं—यह क्या माजरा है? ज़िन्दगी से आजिज़ आकर उसने कहीं जान तो नहीं दे दी? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। उमा ऐसी नादान नहीं, उससे ऐसी मूर्खता नहीं हो सकती। फिर, क्या बात है? आखिर वह गई कहाँ? कुछ समझ में नहीं आता। बिहारी इसी उलझन में फंसे हुए एक कोच पर आकर लेट गये। वे इस दशा में दस मिनट रहे होंगे, कि उन्हें किसी गाड़ी के पहियों की आवाज सुनाई दी। वे झपटकर बाहर आये।

    उमा गाड़ी से उतर रही थी और एक सफ़ेदपोश महाशय बँगले से बाहर जा रहे थे। बिहारी ने उमा से पूछा—कहाँ से आ रही हो?

    "सिनेमा देखने गई थी।"

    "और कौन साथ था?"

    "रतन थे।"

    "तुमने मुझे नहीं बताया, कि सिनेमा देखने जाओगी?"

    "क्या तुम मुझे अपनी सारी बातें बताया करते हो?"

    बिहारी निहत्तर हो गये। आज वे स्वयं अपनी दृष्टि में दोषी थे।

    (५)

    प्रतिक्रिया आरम्भ हो चुकी थी। बिहारी अब विशेषतः घर ही पर रहते थे। उनका हृदय एक बार फिर दाम्पत्य के सरल सुखों के लिये लालायित हो उठा; किन्तु वे जितना प्रेम करने का प्रयत्न करते, उमा उनसे उतना ही दूर भागती। उसे उनसे डर-सा लगता था—उनसे मिलने में अधिक वेदना होती थी। अब वह उन्हें अपना शुद्ध विमल प्रेम नहीं दे सकती थी। उनका उसके शरीर पर अधिकार अवश्य था; किन्तु उसका स्वतन्त्र हृदय और उसमें बहता हुआ प्रेम का निर्मल स्रोत अब दूसरे का हो चुका था। वह बिहारी की ओर से जितना खिंचती, रतन की ओर उतना ही बढ़ती। बिहारी देख रहे थे कि वह उनकी ओर से उदासीन हो रही है; परन्तु उनकी समझ में कोई कारण न आता था।

    (६)

    यौवन और वासना का अटूट सम्बन्ध है। वासना प्रेम का घातक है; किन्तु प्रेम को वासना के तीव्र आघातों से बचाये रखना बिरले का ही काम है। कौन है, जो आत्म-संयम का महत्त्व नहीं जानता? कौन ऐसा है, जो हृदय को वासना की कालिमा से पवित्र रखने का प्रयत्न नहीं करता? परन्तु, सुन्दरी के भेद-भरे नयनों का एक साधारण कटाक्ष, उसके सरस अधरों की सरल मुस्कान, उसके अञ्चल की एक लहर, चित्त को चञ्चल कर देने के लिए बहुत है।

    रतन काम के बाणों का वीरता के साथ सामना कर रहे थे; परन्तु एक सहस्र सैनिक के तीव्र आघातों का बेचारा निहत्था आदमी कब तक सामना कर सकता है? जानते थे कि हार निकट है; किन्तु वे निरुपाय थे। रतन सोचते—इस प्रेम का कहाँ अन्त होगा? उमा मुझसे प्रेम अवश्य करती है; किन्तु यह प्रेम उसी समय तक है, जब तक हमारा सम्बन्ध निष्काम है। यदि मुझसे जरा-सी भी असावधानी हुई, तो वह मुझसे अवश्य घृणा करने लगेगी लेकिन मैं कितने दिनों तक दामन बचा-बचा कर चलूँगा? मैं अपने दिल को अपने वश में नहीं रख सकता। यदि बिहारी को ये बातें मालूम हो गई, तो वे क्या कहेंगे? दोस्ती, मुरौवत सबका अन्त हो जायगा और बदनाम भी हो जाऊँगा। मैं वहाँ जाता ही क्यों हूँ? अच्छा, आज से कभी न जाऊँगा; परन्तु इस पवित्र संकल्प का उसी समय अन्त हो जाता, जब उमा के यहाँ से बुलावा आता।

    उमा के हृदय में प्रतिशोध की इच्छा प्रबल थी। वह बिहारी को दिखा देना चाहती थी कि स्त्री केवल पुरुषों की इच्छाओं की दासी नहीं—उसके अपने भी स्वत्व हैं, अधिकार हैं, इच्छाएँ हैं। रतन उसकी कार्य-सिद्धि के साधन-मात्र थे। उमा नित्य नया श्रृङ्गार करती, नये-नये, आभूषण पहनती, नई-नई साड़ियाँ बदलती, रतन को रिझाती और उनका साहस बढ़ाती। इस कार्य में कहाँ तक इच्छाओं का भाग था और कहाँ तक उस गुप्त प्रेरणा का, जो हमें अज्ञात रूपसे कार्य-सम्पादन में योग देती है—यह कहना कठिन है! किन्तु इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं कि उमा में कार्य-सिद्धि की वह प्रबल कामना थी, जो बलिदान के मूल्य की परवा नहीं करती।

    फागुन का महीना था, सन्ध्या का समय। ऋतुराज के आगमन के आनन्द में कुसुम-कुञ्ज और पुण्य-उद्यान सौरभ, सौन्दर्य, अलङ्कार और रङ्ग से वैसे ही सजे हुए थे, जैसे परदेश से लौटे हुए पतियों का स्वागत करने के लिए युवती रमणियाँ शृङ्गार करती हैं। उमा और रतन वाटिका में टहल रहे थे। उमा ने गुलाब का एक अधखिला फूल तोड़ा और रतन के कोट में लगाने लगी। एक तो सौरभ, रङ्ग और समीर की उत्तेजक शक्ति, और फिर प्रेमी के कोमल करों का मधुर स्पर्श—रतन सिहर उठे, बदन में बिजली-सी दौड़ गई, हृदय की गति तीव्र हो गई। उमा की उँगलियाँ अपना काम पूरा कर चुकी थीं, वह हाथ हटाना ही चाहती थी कि रतन ने विद्युत-वेग से उमा की कुसुम-कोमल हथेली अपने गर्म हाथों में ले ली। उमा का मुख आरक्त हो गया, आँखें नीली हो गई। उसके हृदय में लज्जा अधिक थी, या विजयोल्लास—यह कहना कठिन है। इसी समय बँगले में किसी गाड़ी के प्रवेश करने का शब्द हुआ। उमा ने हाथ छुड़ा लिया और शीघ्रता से वाटिका के बाहर चली गई। गाड़ी में बिहारी आये थे। बिहारी ने उमा को वाटिका से निकलते देख लिया। उन्हें कुछ सन्देह हुआ। वे गाड़ी से उतरते ही बाग़ में गये और रतन को मानसिक विकलता की दशा में भूमि की ओर ताकते हुए पाया। रतन को बिहारी के आने की खबर तक न हुई, वे वैसे ही खड़े रहे। बिहारी उलटे पैर लौट आये। सन्देह में अंकुर फूट पड़ा। उमा की उदासीनता का कारण स्पष्ट हो गया। बिहारी ने सोचा—ये महाशय आज-कल यहाँ क्यों चक्कर काटा करते हैं। पहले तो इतनी कृपा न करते थे। इसमें कुछ-न-कुछ भेद अवश्य है।

    (७)

    रतन की इस समय वह दशा थी, जो पहली बार शराब पीने पर नशा उतरने के बाद हो जाती है। आत्मिक वेदना भी थी, पश्चात्ताप भी था। मानसिक अशांति की दशा में सोचते थे——

    उमा ने मन में क्या सोचा होगा? कहीं मुझे चरित्रहीन न समझने लगे। उसने कुछ कहा नहीं, चुपचाप बाहर चली गई-इसका क्या मतलब है? उसने ज़रूर बुरा माना होगा। मुझसे बड़ी ग़लती हुई, मुझे उस समय न-जाने क्या हो गया था। उमा से आँखें मिलाकर अब कैसे बातें करूँगा? नहीं, अब मैं वहाँ कभी न जाऊँगा। रतन इसी उलझन में बड़ी रात तक जागते रहे। अन्त में निद्रादेवी को उनकी शोचनीय दशा पर दया आ गई।

    रतन ने उमा के यहाँ न जाने का आज पहली ही बार सङ्कल्प न किया था। उनके इस प्रकार के इरादों का मूल्य सिद्ध हो चुका था। वे इस बात से स्वयं लज्जित थे।

    वाटिकावाली घटना को कई दिन बीत गये। रतन ने अभूतपूर्ण दृढ़ता दिखाई—सङ्कल्प में शिथिलता न आने दी। इस बीच में उमा के पास से कोई बुलावा न आया। रतन का यह सन्देह कि उमा मुझपर नाराज़ है, ज़ोर पकड़ता जाता था। उनकी मानसिक अशांति बहुत कुछ घट गई थी। उन्हें थोड़ा-बहुत दुःख अवश्य था; किन्तु वे मन को इस प्रकार समझाते—चलो अच्छा हुआ, बला से जान छूटी। अब बात छिपी रह जायगी। मुझे अपनी भूल भी मालूम हो गई; नहीं तो न जाने कब तक धोखे में रहता—साधारण सहानुभूति को प्रेम समझ बैठा, कितनी बड़ी नादानी थी। एक दिन सन्ध्या-समय वायु-सेवन के बाद रतन जब होस्टेल लौटे तब उन्हें अपने कमरे में एक बन्द लिफाफा पड़ा मिला। रतन ने लिफ़ाफ़ा उठाकर देखा, हस्त-लिपि उमा की थी। रतन का हृदय वेग से धड़कने लगा। काँपते हुए हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। पत्र में लिखा था—

    'प्रिय रतन,

    आज पाँच दिन हो गये। तुमने सूरत नहीं दिखाई। क्या मुझसे नाराज़ हो? बड़ी प्रतीक्षा कराते हो? परन्तु इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, दोष मेरा है कि प्रेम के हाथों ऐसी बिक गई। अब कब आओगे? आज सध्या-समय अवश्य आना। मैं तुम्हारा इन्तज़ार करूँगी।

    दर्शनाभिलाषिनी,

    उमा।'

    पत्र देखकर रतन को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा था कि उमा ने खूब खरी-खोटी सुनाई होगी; लेकिन यहाँ तो पाँसा ही पलटा हुआ था। रतन के हदय-सागर में आनन्द की लहरें उठने लगीं। आज पहला ही अवसर था कि उमा ने स्पष्ट शब्दों में अपने मन की बात कही। आज उन्हें प्रत्येक वस्तु में सुन्दरता दिखाई देती थी और प्रत्येक वस्तु में स्वाभाविक सहानुभूति। नीरव गगन में वसन्त की मधुर श्री फूटी पड़ती थी। कुसुम-कुञ्जों से आती हुई समीर सुगन्ध से लदी हुई थी। सामने वृक्ष पर चहकती हुई छोटी-छोटी चिड़ियों के सुमधुर कल-रव में प्रेम के राग थे। रतन चाहते तो थे कि न जायँ; किन्तु कोई प्रबल प्रेरणा उन्हें उमा के घर की ओर बलात् खींचे लिये जाती थी, पैर स्वयं चले जाते थे। इच्छा-शक्ति विवश थी।

    (८)

    गोधूलि का समय था। आकाश में फैली हुई लाली निशा-सुन्दरी की काली चादर में छिपी जाती थी। बिहारीलाल अपने बँगले के आहाते में वेग से घुसे और सीधे वाटिका में चले गये। उनकी दशा इस समय उस गुप्तचर की-सी थी, जो कोई रहस्य खोलने में व्यस्त हो। बिहारी ने ध्यान से इधर-उधर देखना शुरू किया, माता प्रकृति अपने सुकुमार बच्चों को थपकी देतो हुई सुला रही थीं; किन्तु चञ्चल वासन्ती समीर एक न चलने देता था। लताएँ और पुष्प हठी बालकों के समान मचलते और सिर हिलाते; परन्तु यह प्रेम-क्रीड़ा देखने के लिए बिहारी के आँखें न थीं। उन्हें कुछ और ही धुन सवार थी। उनकी भेद-भरी आँखें जिन्हें ढूँढ़ती थी, वे यहाँ दिखाई न दिये। बिहारी ने सोचा—क्या वार खाली जायगा? वे कुञ्ज की ओर बढ़े। लता-भवन सूना पड़ा था। बिहारी को बड़ी निराशा हुई। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उमा और रतन इस समय वहाँ अवश्य होंगे। उन्हें मिलने का अवसर देने के लिए आज वे प्रातःकाल से ही घर से बाहर चले गये थे। वे पास ही पड़ी हुई एक बेंच पर बैठ गये, मस्तिष्क में विचार-तरङ्गे उठने लगीं।

    बिहारी आत्म-विस्मृत की दशा में बड़ो देर तक बैठ रहे। सहसा उन्होंने चौंककर सामने देखा। चन्द्रमा की स्वर्ण रश्मियाँ पत्तों के झुर्मुट से छन-छनकर वाटिका में मन्द-मन्द रहस्यमय प्रकाश फैला रही थीं। स्वर्ण-रक्त-रञ्जिय चन्द्रमा ऐसा जान पड़ता था, मानो किसी सुन्दरी के मुख पर लज्जावश गुलाबी दौड़ गई हो। बिहारी को किसी के बात-चीत करने की आहट मिली। वे उठकर शीघ्रता से एक सघन वृक्ष की आड़ में छिपकर देखने लगे। आगन्तुक कोई और नहीं, उमा और रतन ही थे। दोनों पास आ गये। बिहारी के कौतूहल का इस समय कुछ ठिकाना न था।

    रतन ने कहा—आज मेरे जीवन का स्वर्ण-दिवस है।

    उमा ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—और मेरा भी।

    अपने भाग्य को धन्यवाद दूँ, या इन प्यारे हाथों को—यह कहते हुए रतन ने उमा की कोमल हथेली अपने जलते हुए हाथों में ले ली और तप्त अधरों से उस पर प्रेम का प्रथम चिह्न अङ्कित कर दिया।

    बिहारी को अब अधिक प्रमाण की आवश्यकता न थी। वे अब ज्यादा न देख सके, झपटे और क्रोध एवं घृणा की मूर्ति बने हुए उन दोनों के सामने जाकर खड़े हो गये। उमा और रतन क्षण-भर तक हतबुद्धि से ताकते रहे। आश्चर्य और क्षुद्रता मूर्तिमान हो गई थी। उमा सँभली और चुपचाप वाटिका से बाहर चली गई। रतन ने भी जाना चाहा; किन्तु बिहारी ने व्यंग्य-वाक्य से रोककर कहा—जाते कहाँ हैं महोदय? ठहरिए, मेरी भी सुनते जाइए। रतन अपराधी बालक के सदृश ठिठककर रह गये।

    बिहारी ने घृणा-मिश्रित क्रोध से कहा—रतन, क्या दोस्ती और मुरौवत-का बदला यहीं रह गया है? किसी दुश्मन के गले पर छुरी चलाते, तो मरदानगी होती, यह क्या कि दोस्त ही का गला काटो।

    रतन कोई उत्तर न दे सके। बिहारी का क्रोध दुगना हो गया,नेत्रों से ज्वाला निकलने लगी।

    'बोलो, क्या जवाब देते हो? बोलो, नहीं तो इसी पिस्तौल से अपना और तुम्हारा दोनों का भेजा उड़ा दूंगा।'—बिहारी ने पतलून की जेब से एक रिवाल्वर निकाल लिया।

    रतन का हृदय भय से काँप उठा। बचने का कोई मार्ग दिखाई न दिया। सहसा उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने जेब से एक कागज़ निकाला। यह उमा का पत्र था। रतन ने बिहारी को पत्र देकर कहा—बिहारी, इसमें मेरा ही क़सूर नहीं। यह ख़त इस बात का सबूत है।

    बिहारी ने पत्र को ले लिया और दिया सलाई जलाकर उसके प्रकाश में पढ़ा। बिहारी का विचार था कि सारा अपराध रतन का है; लेकिन पत्र से बात कुछ और हुई। बिहारी पत्र लिये हुए बाग़ से बाहर चले गये।

    रतन वहीं मूर्त्तिवत् खड़े रह गये। आवेश में आकर उन्होंने पत्र दे तो दिया; परन्तु क्षण-भर में अपनी भूल ज्ञात हो गई, उनका हृदय खेद और ग्लानि से भर गया। लज्जा से कटे जाते थे—कैसी घोर नीचता है! कैसी अक्षम्य कायरता! प्रेमिका के पत्र को जिसका मूल्य प्राणों से अधिक होना चाहिए, प्राण-रक्षा का यन्त्र बनाना—इससे घृणित कौन-सी कायरता हो सकती है। यदि प्राण देकर भी रतन को पत्र बापस मिल सकता तो उन्हें उसे लेने में तनिक भी संकोच न होता; किन्तु यह वैसा ही कठिन था, जैसे मुख से निकली हुई बात या कमान से निकले हुए तीर का वापस लौटना!

    (९)

    उमा खेद और दुख की मूर्ति बनी हुई बैठी थी—खेद इस आकस्मिक घटना पर था; दुःख भण्डा फूट जाने का। बिहारी ने कमरे में प्रवेश किया। उसके मुख पर वह गाम्भीर्य था, जो क्रोध और घृणा की अन्तिम सीमा है। बिहारी ने उमा के सामने उसका प्रेम-पत्र फेंक दिया; किन्तु मुख से कुछ न कह सके। उमा पर वज्रपात-सा हुआ। उसके लिए वह पत्र वैसा ही था, जैसे अभियुक्त के लिए अदालत का फैसला। उमा हत-बुद्धि-सी मूर्तिवत् बैठी रही।

    उमा की खामोशी ने बिहारी की जवान खोल दी—उमा,मुझे तुमसे ऐसी आशा न थी। मुझे स्वन में भी यह आशङ्का न थी कि तुम इतना नीचे गिर जाओगी। ऐसा छिछोरापन! मेरे विश्वास का यों मटियामेट!

    उमा अब अधिक न सुन सकी। अपराधी मनुष्य साधु-चरित्र आदमी की कड़ी-से-कड़ी बात सुन सकता है; किन्तु उस मनुष्य का साधारण आक्षेप भी असह्य हो जाता है, जिसके चरित्र के विषय में उसे स्वयं सन्देह हो। उमा को केवल सन्देह ही नहीं था, उसके पास प्रमाण भी था। फिर वह बिहारी की बातें कैसे सह लेती? प्रतिघात की मात्रा प्रबल हो गई। उमा का अङ्ग-अङ्गल फड़कने लगा। उसकी दशा छेड़ी हुई सर्पिणी के समान हो गई। उमा ने बिहारी को सरोष नेत्रों से देखकर उत्तर दिया-लेकिन इसकी सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है। क्या तुमने प्रेम का स्वाँग भरकर मुझे जाल में नहीं फंसाया? मेरी आशाओं का खून नहीं किया? तुम्हें मुझसे नहीं मेरे धन से प्रेम था।

    "यह सरासर झूठा आक्षेप है मेरा प्रेम सत्य था और मैं उस पर अब से घण्टे-भर पहले दृढ़ रहा हूँ; लेकिन अब मेरी आँखों का परदा उठ गया।"

    "झूठ नहीं बिलकुल सच है, तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया बाजारू औरतों के पीछे दौड़ते फिरे।"

    बिहारी ने कृत्रिम क्रोध से कहा—उमा अब मैं ज्यादा सहन नहीं कर सकता। अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए, मुझ पर मिथ्या आक्षेप करती हो।

    "यह बात झूठी नहीं है, मेरे पास इसका सबूत है"—यह कहकर उमा उठी और अपने शृंगार-गृह में चली गई। सन्दूक खोलकर एक पत्र निकाला। यह श्यामा का वही पत्र था, जिसे उसने बिहारी की जेब से निकाल लिया था। उमा ने पत्र लाकर बिहारी के सामने फेंक दिया। बिहारी ने पत्र उठाकर पढ़ा और उमा की ओर आश्चर्य-पूर्ण नेत्रों से देखा। वे निरुत्तर हो गये, अधिक कुछ न कह सके। उमा उठकर बाहर चली गई। उसके नेत्रों में विजय-गर्व था।

    उमा जीती अवश्य; किन्तु उसके हृदय में विजय का आह्लाद न था, पराजय की दारुण-वेदना थी। सजग आत्मा हृदय में चुटकियाँ ले रही थी। अधिकारों की रक्षा के लिए चरित्र का बलिदान! आज वह स्वयं अपनी दृष्टि में गिर गई। वह धन और वैभव की गोद में पली थी, प्रेम और स्नेह उसके जीवन का आधार था। आज वह प्रेम के लिए किसका मुँह ताके-पुरुष समाज का, जो आज उसे धूर्तों एवं कायरों से भरा दिखाई देता था? अब वह जीवित रहे, तो किसके बल पर? उसे अपना अस्तित्व शून्य एवं निरर्थक जान पड़ता था। उमा अभिमानिनी थी। जब वह अपने श्रृङ्गार-गृह में जाकर शीशे के सामने खड़ी होती, और अपनी सुन्दरता अवलोकन करती, तब उसके नेत्रों में गर्व का मद छा जाता, हृदय में विजय-कामना हिलोरें लेने लगती। आज उसने शीशे के सामने खड़े होकर अपने एक-एक अङ्ग को ध्यान से देखा; किन्तु आज वह आनन्द, वह उल्लास न प्राप्त हुआ। उसे अपने सौन्दर्य से भी घृणा हो गई।

    (१०)

    बिहारी का क्रोध अब बिलकुल शान्त हो गया था! वे वाटिका में बैठे हुए घटना-क्रम पर निष्पक्ष होकर विचार कर रहे थे। उमा के ये शब्द कि 'इसकी सारी ज़िम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है' अभी तक उनके कानों गूंज रहे थे। वे ज्यों-ज्यों विचार करते, उन्हें अपना ही दोष दिखाई देता। यदि मैं श्यामा के कृत्रिम प्रेम में न फँसता, तो आज यह दिन क्यों देखना पड़ता? यद्यपि मैंने स्वार्थ वश उमा से विवाह किया था; किन्तु उमा मुझसे प्रेम करती थी, यदि वह मुझसे प्रेम न करती होती, तो रतन को छोड़कर मुझसे विवाह ही क्यों करती? मेरे हृदय में शनैः-शनैः में अंकुरित हुआ—हाँ, यह निरन्तर सहवास के कारण अवश्य था। हम दोनों एक दूसरे के साथ सुखी थे; परन्तु मैंने स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारी। उमा के प्रेम की अवहेलना की। ऐसी दशा में मुझसे उसके मन का फिर जाना स्वाभाविक ही था। यह मानव-स्वभाव है, इसमें उमा का दोष नहीं? सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही है। जब सारा दोष मेरा ही है, तब मुझे उमा से नाराज़ होने का कोई हक़ नहीं। अब क्या करुँ? उमा से मेल कर लेना चाहिए।

    इस निश्चय के बाद बिहारी उठकर भीतर गये। ड्राइंग-रूम में दीवार पर लगी हुई घड़ी में डेढ़ बजा था। बिहारी ने सोचा—उमा सो रही होगी। वे शयनागार की ओर गये। धीरे से दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश किया। मेज पर जलती हुई मोमबत्ती ऐसी जान पड़ती थी, मानों किसी क़बर पर जलता हुआ चिराग़ आँसू बहा रहा हो। उमा पलग पर पड़ी हुई थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो कमरे में फैला हुआ प्रकाश उसके लावण्य का प्रकाश है। बिहारी धीरे-धीरे आगे बढ़े। वे झुके और उमा के बन्द नेत्रों पर क्षमा और प्रेम का चिह्न अङ्कित कर दिया; परन्तु सहसा वे चौंक पड़े और उमा के मुख की ओर ध्यान से देखने लगे। कलाई पर हाथ रक्खा, नब्ज का कहीं पता न था। हृदय पर हाथ रक्खा, गति स्थगित हो चुकी थी। चिराग बुझ चुका था, यात्रा समाप्त हो चुकी थी। उमा का निर्जीव शरीर मृत्यु-शय्या पर पड़ा था। फर्श पर एक खाली शीशी पड़ी थी, जिस पर अँगरेजी अक्षरों में लिखा था-'विष'। बिहारी के मुख से एक चीख निकल गई। वे लास से लिपट गये। बिहारी के प्रेमाश्रु से भीगा हुआ उमा का आभाहीन मुख ऐसा जान पड़ता था, मानो अरुणोदय के समय ओस में नहाया हुआ कोमल पुष्प हो!

    श्रीप्रेमचंदजी के

    ⁠ (१) मौलिक-उपन्यास

    कायाकल्प ३॥) प्रेमाश्रम ३॥)

    रंगभूमि ६) सेवासदन ३)

    वरदान २) निर्मला २॥)

    ग़बन ३।।) प्रतिज्ञा १॥)

    ⁠ (२) गल्प संग्रह

    प्रेम-पुर्णिमा २) प्रेम-प्रसून १॥)

    प्रेम-प्रमोद २॥) प्रेम-प्रतिमा २)

    प्रेम-पच्चीसी २॥) प्रेम-तीर्थ १॥)

    सप्तसरोज ॥) नवनिधि ॥।)

    प्रेम-द्वादशी १।) प्रेम-चतुर्थी ॥)

    पाँच-फूल ।।।) सप्त-सुमन ।।)

    ⁠ (३)नाटक

    संग्राम १॥) कर्बला २)

    (४)अनुवादित तथा संकलित

    आज़ाद कथा (पहला भाग)२॥)

    " " ⁠ (दूसरा भाग) २)

    अहंकार॥=)महात्मा शेखशादी॥)

    गल्प-समुच्चय २॥) अवतार॥)

    गल्प रत्न १)

    ⁠ भारत-विख्यात

    उपन्यास सम्राट्

    श्रीप्रेमचंदजी

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    (१)

    "रुस्तम !"

    "जनाब!"

    "क्या यह वही स्थान है?"

    "जी हाँ, यह वही गुर्जर-प्रदेश है।"

    "रुस्तम! क्या सत्य ही यह गुर्ज्जर-प्रदेश है? क्या हम लोगों ने इसी को ध्वंस करने का विचार किया है? क्या इसी के लिये हमने यह छद्म-वेष रचा है? रुस्तम! सच कहो, क्या यही समुद्र-मेखला, गिरि-किरीटिनी, गुर्ज्जर-भूमि है?"

    "हुजूर जो अनुमान करते हैं वह सत्य है। कृष्ण-वर्ण छाया के सदृश सम्मुख जो देख पड़ती है वही गुर्जर की तटभूमि है।"

    "रुस्तम, इन पर्वत-श्रेणियों की शोभा तो देखो, कितने ऊँचे हैं! जान पड़ता है कि गगन-नीलिमा को स्पर्श करने के लिये ये गर्व भाव से इतने उन्नत हो गये हैं। कैसा अलौकिक सौन्दर्य है! ऐसा दृश्य हमने अफगानिस्थान में कभी नहीं देखा था। रुस्तम, यह स्वर्ग-भूमि तो नहीं है? इसके मलय-प्रवाह में कैसी संजीविनी शक्ति है! चन्द्र-ज्योत्स्ना कैसी उज्ज्वल और स्निग्ध है।" सन्ध्या का समय है। गुर्ज्जर-तट की ओर एक नाव धीरे-धीरे जा रही है। माँझी हिन्दू हैं और आरोहीगण हिन्दू-वेषी मुसलमान। संख्या में वे लोग ६ हैं। चार तो नाव के भीतर थे, और दो ऊपर बैठे कथोपकथन कर रहे थे। पाठकों ने अभी उन्हीं लोगों का वार्तालाप सुना है।

    जिस समय की कथा हम लिख रहे हैं, उस समय ग़जनीपति सुलतान महमूद भारतवर्ष पर आक्रमण-पर-आक्रमण कर रहा था। भारत के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध नगरों का ध्वंस कर, इस बार उसने गुर्ज्जर पर कठोर दृष्टिपात किया था। गुर्ज्जर में सोमनाथ का प्रसिद्ध मन्दिर था। सुलतान उसी को हस्तगत करना चाहता था; पर उसका लेना सहज नहीं था। उसके अधीश्वर थे, गुर्जर देशाधिपति। महमूद ने सुना था कि गुजर का अधिपति बड़ा पराक्रमी है। उनका सैन्यबल कितना है, यह जानने की इच्छा‌ से सुलतान ने स्थल-पथ से तीन बार गुप-चर भेजे; पर एक भी लौट कर न आया। उन लोगों का कुछ संवाद भी न मिला।

    इस बार महमूद ने अपने भ्रातृ-पुत्र से, ग़ज़नी के भविष्य अधिकारी शाह जमालखाँ और प्रधान सेनापति रुस्तम को भेजा था। इनके साथ चार सैनिक भी आये थे। ये लोग स्थल-पथ से न आकर समुद्र-पथ से आये। रुस्तमखाँ ने अनेक बार सुलतान के साथ उत्तर-भारत में यात्रा की थी। वह अनेक भाषा जानता था, गुर्ज्जर-देश को भी भाषा से अनभिज्ञ न था, इससे यात्रा में इन लोगों को कष्ट न सहना पड़ा और न किसी ने इन पर सन्देह ही किया। दो दिन समुद्र में बिताकर तीसरे दिन ये सोमनाथ-बन्दर पहुँच गये।

    नाव खड़ी की गई। सब उतरे। रुस्तम ने माँझियों को एक सुवर्ण-मुद्रा दी। वह मुद्रा गुजरात की ही थी, जो पहले से प्राप्त कर ली गई थी। माँझी गण बिदा हुए और ये लोग भी पाषाणखण्डों पर बैठकर बिश्राम करने लगे।

    समीप में ही सोमनाथ का मन्दिर था। उसके स्वर्ण-मण्डित शिखर पर चन्द्र-रश्मि के पड़ने के कारण एक अपूर्व शोभा होती थी। वह शोभा अनिर्वचनीय थी।

    क्रमशः सन्ध्या बढ़ने लगी। आरती का समय आया। भगवान् सोमनाथ की आरती होने लगी। दमामा और घंटों की ध्वनि मिलकर एक गम्भीर नाद उत्पन्न करती थी। वह नाद समुद्र के भीषण गर्जन से मिलकर आकाश-मंडल को कँपा देता था। आरती हो जाने पर वेद-पाठी ब्राह्मण सुमधुर स्वर से सोमनाथ की स्तुति करने लगे। निशा की निस्तब्धता को भंगकर वह स्वर क्रमशः पवन में फैलने जगा । उस मधुर स्वर से चन्द्रालोक-प्लावित पृथ्वीतल पुलकायमान हो उठा।

    शाह जमाल स्थिर दृष्टि से उधर ही देख रहा था। वह न जाने क्या सोचता था!

    रुस्तम बोला—हुजूर की क्या मरजी है? चलिये, किसी मुसाफिरख़ाने में चलकर ठहरें। हमें अपनी चिन्ता नहीं है; पर आप को कष्ट न हो। सुलतान ने हमें यही आज्ञा दी है। जमालखाँ ने विरक्त होकर कहा—चुप, चुप, रुस्तम! सुलतान का नाम लेने की क्या जरूरत है? जानते नहीं हो, हम लोग कहाँ हैं?—रुस्तम चुप हो गया। भूल उसी की थी।

    जमालखाँ ने कहा—रुस्तम, कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। क्या नगर में इससे अच्छा स्थान मिलेगा? हम लोग यहीं विश्राम करेंगे। इधर देखो, क्या वे सब तारे हैं? अहो, क्या इस देश के तारों में इतना वर्ण-वैचित्र्य है? देखो तो सही, नीले, पीले,लाल और श्वेत तारागणों से, इस नभ-मण्डल की कैसी शोभा हो रही है!

    रुस्तम—जनाब, आप भूल करते हैं। ये तारे नहीं, सोमनाथ के मन्दिर-शिखर में लगे हुए रत्न हैं।

    जमाल—हाँ, सोमनाथ का क्या इतना ऐश्वर्य !

    रुस्तम—जनाब, सोमनाथ का ऐश्वर्य विश्व-विश्रुत है।

    जमाल—जब बाहर इतना है, तब भीतर न-जाने कितना होगा! पर रुस्तम, सच कहो, ऐसा कभी तुमने कहीं देखा भी था? ऊपर आकाश में चन्द्र की निर्मल ज्योति, नीचे उसी विमल ज्योति से प्लावित मन्दिर-चूड़ा में स्थित रत्नो की ज्योति ! रुस्तम,क्या कहीं और भी ऐसा होगा? मैं गुर्जर की यह नैसर्गिक शोभा देखकर मुग्ध हो गया।

    रुस्तम—जनाब, और कहीं आप ऐसा न देखियेगा। सुलतान इसीलिये तो हस्तगत करना चाहते हैं और छद्म-वेष धारण कर हम लोगों के यहाँ आने का प्रयोजन भी यही है। जमालखाँ ने एक दीर्घ निःश्वास लेकर कहा—रुस्तम, क्या कहते हो? हम लोग इस सुन्दर देश को नष्ट करेंगे? इस स्वर्ण-भूमि को ध्वंस करेंगे? अग्नि-दाह कर इस नन्दन-कानन को भस्म करेंगे ? क्या खुदा ने इसीलिये इसको इतनी शोभा-सम्पत्ति दी है? क्या हम लोग इस शान्ति-मय देश को शोणित-मय करेंगे? नहीं, नहीं। रुस्तम, ऐसा कभी नहीं होगा। हम ऐसा कदापि नहीं करेंगे।

    रुस्तमखाँ घोर हिन्दू-द्वेषी, सुलतान का उपयुक्त सेनापति था। वह यह बात सुन नहीं सका; पर करता क्या? धीरे से बोला—आखिर आपका मन्सूबा क्या है?

    जमालखाँ—यह तो हमने पहले ही बतला दिया। रुस्तम,जिस विजय-वासना ने सुलतान के हृदय को पापाण बना दिया है, जिसके कारण उन्होंने भारत को आज ध्वंस कर डाला है,खुदा की पवित्र भूमि में रक्त प्रवाह बहाया है, जिसके कारण भारत आज श्मशान हो गया है, वह दुर्दमनीय वासना हमारे हृदय में नहीं है। मैं अफगानिस्थान के पार्वत्य राज्य से ही सन्तुष्ट हूँ, मुझे यह ऐश्वर्य नहीं चाहिये। मैं सच कहता हूँ, मुझसे इस सौन्दर्य-शालिनी भूमि के सर्वनाश का कार्य नहीं बनेगा।

    रुस्तम ने गम्भीर स्वर से कहा—जनाब, आप कहते क्या हैं? आते समय सुलतान ने आपको यह तलवार दी थी, इसे स्पर्श कर आपने सुलतान की आज्ञा-पालन करने की प्रतिज्ञा की थी। क्या आप अपनी तलवार की गौरव-रक्षा नहीं करेंगे? जमाल—रुस्तम, स्वाधीन अफ़ग़ानिस्थान मेरी जन्म-भूमि है और मैं एक स्वाधीन नराधिप के क्रोड़ में आजन्म परिपालित हुआ हूँ। वह स्वाधीनता मैं नहीं छोड़ सकता। सुलतान को मैंने अपनी देह बेच दी; पर अपने विवेक को नहीं बेचा है। इस देह पर सुलतान का पूरा अधिकार है; पर मेरा विवेक स्वाधीन है। उस पर सुलतान का कोई अधिकार नहीं है। सुलतान चाहें, तो अभी मैं उनके लिये प्राण दे दूँ और वे इस प्राण-विहीन देह को लेकर कुत्तों के सामने डाल दे; पर मैं अपने विवेक के विरुद्ध काम नहीं करूंँगा। रुस्तम, तुम यह तलवार ले लो, इसे सुलतान के पैरों के नीचे डालकर कहना, कि जमाल अब अफ़ग़ानिस्थान को नहीं लौटेगा। वह अब स्वाधीन है। वे उसके अपराध की मार्जना करें; यही उसका अन्तिम अनुरोध है।

    यह कहकर शाह जमाल ने रुस्तम की ओर देखा। रुस्तम चुप था। जमालख़ ने फिर कहना शुरू किया—रुस्तम, चुप क्यों हो? क्या तुम्हारे हृदय में पीड़ा नहीं होती? तुम भी वीर-श्रेष्ठ, स्वाधीनता की गोद वर्द्धित, तेजस्वी अफ़ग़ान हो; हाय! यह क्या करते हो? रुस्तम! उस दिन का स्मरण क्यों नहीं करते, जब तुमने अपने अपूर्व साहस से सुलतान की प्राण-रक्षा की थी और जब सुलतान ने कृतज्ञ होकर तुम्हें पुरस्कार देना चाहा था ? याद है, तब तुमने क्या कहा था? 'जनाब, बन्दा आपकी प्रजा है। प्रजा का कर्तव्य है, राजा की रक्षा करना। पुरस्कार का कोई प्रयोजन नहीं।' रुस्तम, तुम्हारा वह तेज कहाँ है? तुम्हारा वह दर्प,

    वह साहस और वह वीरत्व अब कहाँ है? आज तुच्छ धन और सम्मान के लोभ से रुस्तम! वीर रुस्तम! सुलतान के एक घृणित कार्य का समर्थन करता है! एक दिन जो साहस दरिद्र रुस्तम ने दिखलाया था, वह आज धनिक रुस्तम नहीं दिखला सकता!! हाय, हाय, रुस्तम, यह क्या करते हो? ज़रा सोचो तो सही, तुम यह क्या करने चले हो?—शाहज़ादा चुप हो गया। रुस्तम सोचने लगा—शाहज़ादे का कहना सच है। सुलतान सत्य ही अन्याय करते हैं। तब क्या रुस्तम सुलतान के विरुद्ध चलेगा? उनकी आज्ञा भंग करेगा? सावधान, रुस्तम! सावधान! शाह जमाल कुछ भी करें; पर तुम सुलतान के बिरुद्ध काम मत करना; नहीं तो तुम्हारी हृदयेश्वरी, प्रियतमा रुखिया बीबी और प्रिय पुत्र, जिन्हें तुम सुलतान के महल में छोड़ आये हो, जल्लादों के हाथ पड़ेंगे। सुलतान उन लोगों को जीता न छोड़ेगा।

    रुस्तम बोला— तब आपकी इच्छा क्या है? हम लोग यहीं भिक्षा माँगकर जीवन व्यतीत करें, अथवा गुप्त-चर के हाथ पड़कर प्राण खोवें?

    शाह जमाल— क्यों? भिक्षा क्यों माँगेंगे? क्या गुर्जर-देशवासियों में दया और आतिथ्य-सत्कार का इतना अभाव है? विश्वास रक्खो, यदि हम लोगगुर्जर-नृपति से अपना सारा हाल कह देंगे, तो वे हम लोगों का अनिष्ट नहीं करेंगे! सुनते हैं कि हिन्दू शरणागत शत्रुओं का वध नहीं करते। तब किसका भय?

    रुस्तम और सह न सका। वह उन्माद-वश भृकुटि-भंग कर

    बोला—शाहज़ादे, आप हमें क्षमा कीजिये। आप विश्वासघातक के समान यह कह रहे हैं। हमसे यह न होगा।

    विश्वास-घातक!—शाहजमाल का शरीर जल उठा। रुस्तम की यह घृष्टता सह्य न हो सकी। तुरन्त तलवार खोंच, व्याघ्र के समान भीषण गजना कर बोले—शैतान, तेरी इतनी स्पर्धा! एक अन्याय के समर्थन न करने से हम विश्वास-घातक हो गये!

    चन्द्र के आलोक में जमाल खाँ की तलवार चमक उठी। क्षणभर में एक भयानक काण्ड हो जाता; परन्तु दैवेच्छा से वह रुक गई। उसी समय पीछे से किसी न जमाल खाँ का हाथ पकड़ लिया। स्वतः शाहज़ादे ने पीछे फिर कर देखा। वह एक रमणी थी। शाहज़ादा विस्मय-विमुग्ध हो बोला—तुम कोन हो? हमारे काम में विघ्न क्यों डाला?

    (२)

    उस रमणी ने हंसकर तिरस्कार-व्यञ्जक स्वर से कहा—आत्म-विवाद कभी अच्छा नहीं होता। आप लोग क्यों विवाद करते थे?

    शाहजमाल ने ऐसा कंठ-स्वर कभी नहीं सुना था। वीणा-ध्वनि के समान वह स्वर अत्यन्त मधुर था। उत्तर देने के लिये वह कामिनी की ओर फिरा; पर उस रूप-राशि की ओर वह देखता ही रह गया। उत्तर न दे सका। उसने मन-ही-मन सोचा—ऐसी अपूर्व रूप-राशि और फिर ऐसी अलौकिक शक्ति! निश्चय ही यह रमणी कोई देवी है।—उस रमणी ने फिर कहा—गुर्जर की यह

    पवित्र भूमि किसी विदेशी के रक्त से रञ्जित न हो, यही हमारी इच्छा थी और इसीलिये हमने तुम्हारे हाथ से तलवार ले ली।

    शाहज़ादे ने चकित होकर पूछा—यह तुमसे किसने कहा कि हम लोग विदेशी हैं?

    रमणी—तुम्हारे इस कार्य ने। गुर्जर-देश के सम्पूर्ण अधिवासी, हज़ार कारण होने पर भी, अपने देश-बन्धु के शोणित से इस भूमि को कलंकित न करेंगे और तुम यही करने चले थे।

    शाह—(उठकर) रमणी! तुम कौन हो?

    रमणी—मैं भगवान् सोमनाथ की दासी हूँ।

    शाह—क्या तुमने हम लोगों की सब बातें सुन ली?

    रमणी—हाँ।

    शाह—बताओ तो हम कौन हैं?

    रमणी—आप गुर्जर के घोर शत्रु हैं।

    शाह—(हँसकर) रमणी, तुमने भूल की है, हम लोग काश्मीर के वणिक् हैं।

    रमणी—नहीं साहब, मैं भूलती नहीं हूँ। आप सुलतान महमूद के भ्रातृ-पुत्र शाहज़ादे हैं और ये रुस्तम।

    शाह जमाल चमक उठा। मुख मलीन हो गया। वह बोला—रमणी, तुम्हारे साथ और कोई है?

    रमणी—नहीं साहब, मैं अकेली हूँ।

    शाह जमाल—तुम एक रूपवती रमणी हो। फिर भी अकेली ही फिरती हो! रमणी—कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। गुर्जर स्वाधीन देश है। यहाँ हिंदू बसते हैं। पर-स्त्री और पर-कन्या को सब भगिनी-भाव से देखते हैं। साहब, इस देश में रमणी को विपद् की आशंका नहीं रहती।

    शाह जमाल—समझ गया; पर हम तुम्हारा पूरा परिचय चाहते हैं।

    रमणी—इससे अधिक मैं नहीं कह सकती।

    शाह जमाल ने मन-ही-मन उस रमणी के साहस की बहुत प्रशंसा की; फिर कठोर स्वर से बोले—रमणी, परिचय न देने से बिपद् में पड़ोगी।

    रमणी—विपद् में कौन डालेगा?

    शाह—हम और हमारे साथी।

    रमणी—आपके और कितने साथी हैं?

    शाह—चार।

    रमणी—क्या वे भी आपके समान वीर हैं, क्या स्वाधीनता की लीला-भूमि अगानिस्थान के सब वीर, रमणी पर अत्याचार करते हैं?

    रुस्तम यह सह न सका। उसने तलवार खींच ली। रमणी ने शीघ्रता से रुस्तम का हाथ पकड़कर ऐसा झटका दिया कि, तलवार हाथ से छिटककर दूर जा गिरी।

    रुस्तम विस्मय-सहित बोल उठा—मां, तुम कौन हो?

    रमणी ने हँसकर कहा—मैं भगवान् सोमनाथ की दासी हूँ। रुस्तम-क्या गुर्जर को सब रमणियाँ ऐसी ही शक्तिशालिनी हैं?

    रमणी—जिस देश में स्वय शक्ति के अवतार महा-काल भैरव सोमनाथ बिराजते हैं, वहाँ की अधिकांश रमणियाँ ऐसी ही हैं।

    इसी समय शाहजादे ने कहा-रुस्तम, इस रमणी को धन्यवाद दो। इसी के कारण आज यह पवित्र भूमि हम लोगों के रुधिर-प्रवाह से कलंकित होने से बची। चलो, हम लोग अब लौटें। यह यात्रा निष्फल हुई।

    रमणी ने पूछा—कहाँ जाइयेगा?

    शाह जमाल—अधिकतर सिन्धुदेश।

    रमणी—अभी आपको नाव कैसे मिलेगी? फिर एक बात और है कि आप हमारे अतिथि हैं, बिना आतिथ्य स्वीकार किये आप जा कैसे सकते हैं?

    शाह—तब हम क्या करें?

    रमणी—आपको हमारे साथ चलना पड़ेगा। आप हमारे अतिथि हैं।

    शाह—तुम्हारा विश्वास क्या?

    रमणी—विश्वास! हमारा बचन।

    शाह—यदि हम न जायें, तो क्या करोगी?

    रमणी—आप को जाना ही पड़ेगा।

    यह कह रमणी ने एक शंख निकाल कर फूंका। शंखनाद के

    होते ही क्षण भर में वहाँ १०० शस्त्रधारी सैनिक आ पहुँचे। उनमें से एक ने आगे बढ़कर कहा—माँ, क्या आज्ञा है।

    रमणी ने हँसकर कहा—कुछ नहीं। यों ही एक बार तुम्हें देखने की इच्छा हुई। अब तुम लोग जाओ।

    क्षण-भर में वे लोग जहाँ से आये थे वहीं चले गये।

    शाह जमाल ने यह देखकर कहा—"अच्छा, हम चलते हैं;पर एक बात की प्रतिज्ञा करो।

    रमणी—किस बात की?

    शाह—दगा तो नहीं करोगी?

    रमणी—ना, भगवान् सोमनाथ हमें ऐसी मति न दें।

    शाह—और एक बात । हमारा परिचय किसी को न देना।

    रमणी—स्वीकार है।

    शाह—और कल सूर्योदय के पहले हमें बिदा दे देना और एक नाव भी ठीक करना।

    रमणी—यह भी स्वीकार है।

    शाह जमाल ने रुस्तम की ओर देखकर कहा—रुस्तम, उन लोगों को भी बुला लो।

    रुस्तम ने एक सीटी बजाई, जिसे सुनते ही वे चारों सैनिक भी आ गये।

    रमणी आगे-आगे चलने लगी और वे लोग विस्मय-विमुग्ध होकर पीछे-पीछे जाने लगे।

    (३)

    कुछ दूर चलने के बाद एक वृहत् अट्टालिका मिली। वहाँ १० शस्त्रधारी सैनिक इधर-उधर घूम रहे थे। रमणी ने शाहज़ादे की ओर देख कर कहा—महाशय! आप यहाँ निश्शंक आइये। राजपूत अपने अतिथि का अनिष्ट कभी नहीं करते। घोर शत्रु भी यदि अतिथि होकर आवे, तो वह हम लोगों का पूजनीय है।

    इसके बाद उसने एक सैनिक की ओर देखकर कहा—भैरव,ये लोग हमारे अतिथि हैं। इनको विश्राम-स्थान बतलाओ।—भैरव ने आकर कहा—चलिये महाशय ।

    रमणी एक ओर चली गई और शाह जमाल तथा उसके साथियों ने उस बृहत् अट्टालिका में प्रवेश किया। भैरव इनको एक सजे हुए कमरे में ले गया। वहाँ इनसे कहा—यह कमरा आपके लिये है और यह दूसरा कमरा आपके भृत्यों के लिए।

    यह कहकर भैरव चला गया। शाह जमाल की आज्ञा पाकर वे चारों सैनिक भी दूसरे कमरे में चले गये। उस कमरे में केवल शाह जमाल और रुस्तम रह गये।

    शाह जमाल ने कहा—रुस्तम !

    रुस्तम—जनाब।

    शाह—यह क्या व्यापार है ? कुछ समझ में आता है ?

    रुस्तम—जनाब! कुछ नहीं।

    शाह—इनका उद्देश्य क्या है? अतिथि बनाना या इसी मिस से बन्दी करना? रुस्तम—बन्दी होने में अब क्या कसर है?

    शाह—और यह रमणी कौन है ?

    रुस्तम—हुजूर, मैं कुछ नहीं कह सकता।

    और कुछ बात नहीं हुई। इसी समय भैरव चार भृत्यों के साथ आ पहुँचा।

    भैरव बोला—हमारी माताजी का अनुरोध है कि अब अब आप लोग भोजन करें। यहाँ जो कुछ मिल सकता है, वही आपके लिए लाया गया है। फल, कन्द-मूल और दुग्ध को छोड़ और कुछ नहीं है। कल प्रातःकाल माताजी से साक्षात् होगा।—भैरव चला गया और ये लोग भोजन कर सोने की चेष्टा करने लगे। शाहज़ादे को छोड़, घड़ी-भर में सब घोर निन्द्रा में अचेत हो गये।

    शाहज़ादे को नींद नहीं आई। वह जागता ही रहा। आज तक शाहज़ादे के हृदय में किसी रमणी का चित्र अंकित नहीं हुआ था; पर उस गुर्जर-रमणी के अपूर्व-सौंदर्य, अगम्य साहस और आतिथ्य-सत्कार ने उसके हृदय पर एक बड़ा आघात कर दिया था। उस आघात के कारण उसका हृदय जल रहा था। शाहज़ादे को ज़रा भी शान्ति नहीं मिलती थी।

    रात व्यतीत हो गयी। आकाश में प्रातःकाल की लालिमा फैलने लगी। रुस्तम भी सोकर उठा और चारों सैनिक भी। भैरव फिर आया। शाहजादे को प्रणाम कर बोला—रानीजी जानना चाहती हैं, कि आप लोगों को कल कुछ कष्ट तो नहीं हुआ? शाह—रानीजी कौन? जिन्होंने हमें आश्रय दिया है?— हाँ।

    शाह—रानीजी को हमारी ओर से धन्यवाद देकर कहना, हम लोग उनके बड़े कृतज्ञ हैं। अब वे हमें बिदा करें।

    भैरव—आप लोग प्रातःकाल के कार्यो से यदि निवृत्ति हो चुके हों, तो अभी प्रस्थान कीजिये। नाव तैयार है।

    शाह—गुर्जर के अतिथि आपकी रानी के निकट और एक बात के प्रार्थी हैं।

    भैरव—कहिये।

    शाह—यही कि वे स्वयं आकर हमें बिदा देवें।

    भैरव—असम्भव, ऐसा कभी नहीं हो सकता।

    शाह—क्यों? कल तो वे हमारे साथ आई थीं!

    भैरव—पर वह आना कर्तव्य के अनुरोध से था, आज कदापि नहीं आ सकतीं।

    शाह—हम मुसलमान हैं। अपने आमंत्रित अतिथि को पूरे सम्मान-सहित बिदा करते हैं। देखते हैं कि गुर्जर की रानी शिष्टाचार की आदर्श नहीं हैं। वे अपने श्रेष्ठ अतिथि का अपमान करने में संकोच नहीं करतीं।

    भैरव का मुख लाल हो गया। उसने तलवार पर हाथ रक्खा,

    इसी समय पीछे से किसी ने कहा—सावधान! भैरव! सावधान! अतिथि का अपमान मत करना।

    भैरव ने चौंककर पीछे देखा कि स्वयं रानी कमलावती खड़ी हैं।

    शाह जमाल ने देखा कि, इस बार कमलावती का मुख खुला नहीं है, वह अवगुण्ठन से आवृत है।

    कमलावती ने शाह जमाल की ओर देखकर कहा—जनाब! आप गुर्ज्जर पर कलंक आरोपण करने के लिये उद्यत हो गये थे; इसीलिये मुझे आना पड़ा। यह ध्यान रखिए कि गुर्ज्जर की रानी अपने अतिथि के साथ अशिष्ट व्यवहार नहीं करती।

    कमलावती यह कहकर चुप हो गई। शाह जमाल ने सिर नीचा कर लिया। कमलावती ने फिर गम्भीर स्वर से कहा—जनाब, मैं अब अधिक समय तक नहीं ठहर सकती; क्योंकि पूजा का समय जा रहा है। यदि हम से कुछ भूल हुई हो, तो उसे आ क्षमा करें; भूल सभी से हो जाती है। हाँ यह भी कहे देती हूँ कि आप फिर कभी छद्म-वेष से गुर्ज्जर-प्रदेश में न आइयेगा,नहीं तो आप विपद् में पड़ेंगे।

    कमलावती शीघ्रता से चली गई। जैसे विद्युत् क्षण-भर में आकाश-मण्डल में प्रकट होकर फिर लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह शीघ्रता से आई और शीघ्रता से ही चली गई। शाह जमाल देखता ही रह गया।

    सेनापति रुस्तम ने कहा—शाहज़ादे! अब आप वृथा विलम्ब क्यों करते हैं? शाहज़ादे ने एक दीर्घ निःश्वास परित्याग कर कहा—रुस्तम,चलो, अब यहाँ ठहरने का काम नहीं है।

    सब लोग आगे बढ़े और भैरव भी उनके पीछे चला।

    (४)

    "मां, क्या यह काम अच्छा हुआ?"

    "इसमें बुरा क्या हुआ भैरव?"

    "मुसलमान हमारे शत्रु हैं। और फिर, जो यहाँ आये थे, वे लोग हमारे घोर शत्रु हैं।"

    "कुछ भी हो; पर थे तो हमारे अतिथि!"

    "जान पड़ता है, गुर्ज्जर पर शीघ्र ही विपद् आवेगी।"

    "यह कैसे जाना?"

    "उन लोगों की बातचीत से मालूम हुआ।"

    "कुछ चिन्ता की बात नहीं है। भैरव, तुम भय मत करो, गुर्जरवासी निर्बल नहीं है। कुमार सिंह की शक्ति अभी क्षीण नहीं हुई। गुर्ज्जर का अभी कुछ भी अनिष्ट न होगा।"

    पीछे से किसी ने कहा—"सत्य है कमला! गुर्जरवासी निर्बल नहीं हैं।"

    कमलावती ने मुँह फेरकर देखा, तो कुमार पीछे खड़े हँस रहे हैं। भैरव कुमार को देखकर अन्यत्र चला गया। कमला ने चिन्तित स्वर से कहा—कुमार! हम लोगों पर विपद् आनेवाली है।

    कुमार बोले—विपद्! कमला, जब तक सुलतान महमूद

    जीवित है, तब तक विपद् का अभाव न रहेगा; पर यह ध्यान रक्खो , हम भी विपद् को ही खोजते रहते हैं।

    कमला ने कठोर दृष्टि-पात कर पूछा—कैसे?

    कुमार—क्या यह नहीं जानती हो? स्मरण है, सोमनाथ के मन्दिर में आपने क्या प्रतिज्ञा की थी और क्या स्वीकार किया था? यदि विपद् न आयेगी, तो कुमार सिंह का बाहु-बल कैसे प्रगट होगा?

    कमला गम्भीर होकर बोली—कुमार, यह समय सुख-कल्पना करने का नहीं है। गुर्जर का सारा भार तुम पर है। पिता वृद्ध हैं। वे तुम पर विश्वास करते हैं।

    कुमार—यह सब जानता हूँ। जीवन रहते मैं कर्त्तव्य से पराङ्मुख न हूँगा। तुम इसकी चिन्ता मत करो। पर मुझे एक बात की चिन्ता है।

    कमला—कौन बात? मुझसे संकोच न करना।

    कुमार—कमला, युद्ध में सब अनिश्चित रहता है। कौन जानता है कि क्या होगा? यदि कहीं मैं युद्ध में मारा जाऊँ?

    कमला—कुमार, तो मैं स्वर्ग में जाकर तुम्हारे चरणों को चूमूँगी।

    कुमार—कमला, मैं यही सुनना चाहता था। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे लिये ही नीच 'महमूद' गुज्जर पर आक्रमण करेगा।

    कमला—यह आपने कैसे जाना? कुमार—सुलतान का भ्रातृ-पुत्र शाह जमाल तुम्हें देख कर उन्मत्त-सा हो गया है वही सेनापति होकर आवेगा, यह भैरव ने हमसे कहा है। वह उन लोगों के साथ बड़ी दूर तक गया था। उसने यह बात उन लोगों के मुख से सुनी है।

    यह सुनकर कमलावती के हृदय में भय होने लगा। एक अनिष्ट की आशंका होने लगी। क्या उसके लिये उसकी जननी जन्मभूमि का सर्वनाश होगा? क्या उसी के लिये शाह जमाल गुर्जर पर आक्रमण करेगा?

    कुछ क्षण बाद कमलावती ने कहा—कुमार, तुम इसका भय मत करो। मैं राजपूत की कन्या हूँ। मैं अपना घर्म भली-भाँति जानती हूँ समय आने पर हम लोगों के लिये चिताग्नि चन्दन-प्रलेप के समान शीतल हो जाती है।

    कुमार के नेत्रों में जल भर आया। वे वहाँ से चले गये। कमलावती ने आकाश की ओर देख कर करुण-स्वर से कहा—भगवन, सोमनाथ! सहस्रो कमलावती चाहे काल के भीषण स्रोत में बह जाँय ; पर देखना प्रभो, कुमार गुर्जर की रक्षा भली भाँति करें।

    (५)

    सिन्धुदेश में समुद्र-तीर से दस कोस पर सुलतान महमूद ने एक नगर बसाया था। वह अब भी महमूदाबाद के नाम से प्रसिद्ध है। भारत में राज्य स्थापित करना, यह महमूद का आन्तरिक उद्देश्य न था और इसके लिये उसने प्रयत्न भी नहीं किया। उसकी इच्छा थी—असंख्य रत्न-संग्रह करना। इसी इच्छा को पूरी करने के लिये महमूद ने भारत पर अनेक बार आक्रमण किया और दैवेच्छा से वह सदा सफल-मनोरथ ही होता रहा। उसकी राजधानी, ग़ज़नी, भारत-ऐश्वर्य से अलकापुरी के तुल्य हो गई; परन्तु महमूद सन्तुष्ट न हुआ।

    सोमनाथ के ऐश्वर्य की कथा सुनकर उसने गुर्जर पर भी धावा करने का निश्चय किया; परन्तु उसे सुयोग न मिलता था। उसने अनेक बार चेष्टा की; परन्तु कुछ कर न सका। इस बार उसने शाहज़ादा शाह जमाल और सेनापति रुस्तम को भेजा। हिन्दू वणिक के वेष में उन लोगों ने गुर्ज्जर-देश में प्रवेश भी किया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह पाठकगण जानते ही हैं।

    राज-कन्या कमलावती के आदेश से भैरव उन लोगों को एक निरापद् स्थान तक पहुँचाकर गुर्ज्जर को लौट आया। मार्ग में शाह जमाल और रुस्तक पिश्तो-भाषा में वार्तालाप करते थे। शाह जमाल ने कई बार कमलावती का नामोल्लेख किया। भैरव पिश्तो नहीं जानता था, इससे कुछ समझ न सका; पर गुर्ज्जर की माता प्रत्यक्ष देवी कमलावती का पवित्र नाम उन म्लेच्छों के मुख से सुनकर भैरव का सारा शरीर जलने लगा। एक बार उसके मन में आया, कि नाव को समुद्र में डुबा दे, जिससे गुर्ज्जर के दो प्रबल शत्रुओं का नाश हो जाय; पर उसी समय कमलावती का अन्तिम वचन उसके ध्यान में आ गया—देखना भैरव, इन लोगों का कुछ भी अनिष्ट न हो। शत्रु होने पर भी ये लोग हमारे

    अतिथि हैं।—भैरव ने तुरन्त ही अपने हृदय की उत्तेजना को दबा लिया; पर इतना उसने समझ लिया, कि गुर्जर पर यवन लोग शीघ्र ही आक्रमण करेंगे; परन्तु इस बार सोमनाथ के विश्व विश्रुत ऐश्वर्य के लिये नहीं, कमलावती के लिये। शाहज़ादा के हृदय में एक भीषड़ अग्नि धधक रही थी, उसी की शान्ति के लिये वह किसी-न-किसी दिन गुज्जर पर विपद् लावेगा।

    (६)

    महमूदाबाद आकर शाह जमाल ने सुना, कि सुलतान महमूद आखेट के लिये निकले हैं। शाहज़ादा वहीं सुलतान की राह देखने लगा। रुस्तम भी उसके साथ ठहरा रहा।

    यहाँ आकर रुस्तम ने देखा, कि शाहज़ादा अब हमको प्रसन्न करने की चेष्टा में सदा लगा रहता है। चालाक रुस्तम समझ गया कि शाह जमाल क्यों खुशामद करता है। बात यह थी, कि रुस्तम सुलतान का प्रधान सेनापति था। फिर उस पर सुलतान का पूर्ण विश्वास था। शाहज़ादे ने सोचा, कि रुस्तम से विवाद करना अच्छा न हुआ। क्षण-भर में उत्तेजना के वश उसने जो कुछ कह डाला था, उसके लिये वह पश्चाताप करने लगा। फिर उन्हें भय था, कि रुस्तम कहीं यह सब बात सुलतान से जाकर न कह दे। यही सब सोच-विचार कर शाह जमाल रुस्तम की खुशामद में लगा रहता था। रुस्तम शाह जमाल पर आन्तरिक स्नेह रखता था। वह कभी नहीं चाहता था, कि शाह का कुछ अनिष्ट हो। सन्ध्या के समय एक निर्जन कमरे में बैठे शाह जमाल और रुस्तम वार्तालाप कर रहे हैं। शाह जमाल ने कहा—रुस्तम साहब, आपने हमारी बे-अदबी तो माफ़ कर दी?

    रुस्तम—जनाब का लड़कपन अभी नहीं गया है। इसी से उस दिन ऐसी बात हो गई; पर हमने मन में उसे कभी नहीं रक्खा। हुजूर, यह ध्यान रक्खें, कि ऐसी छोटी-छोटी बातों पर रुस्तम कभी ध्यान नहीं देता।

    शाह—हमसे एक बात की प्रतिज्ञा करो।

    रुस्तम—कहिए।

    शाह—उस दिन की बात तो तुम सुलतान से कभी न कहोगे?

    रुस्तम—आज तक मैंने मिथ्या-भाषण नहीं किया है। आपके लिये मैं वह भी करूंँगा। आप विश्वास करें, सुलतान को यह बात कभी न मालूम होगी।

    शाह—रुस्तम हमने भी दृढ़ नियम किया है, कि हम सुलतान की आज्ञा कभी न भङ्ग करेंगे।

    रुस्तम—तो क्या आप गुर्जर पर, उनके कहने से, आक्रमण करेंगे?

    शाह—ज़रूर।

    रुस्तम—यह क्या? शाहज़ादे, यह सब कमलावती के लिये तो नहीं है?

    शाह—वही बात है रुस्तम!

    रुस्तम—पर आप यह जान लें, कि गुर्जर को ध्वंस किये बिना

    आप कमलावती को नहीं पा सकते। जब तक गुर्ज्जर में एक भी राजपूत जीता रहेगा, तब तक आप निरापद् नहीं हो सकते।

    शाह जमाल—हाँ, रुस्तम, अबकी बार हम गुर्जर को बिल्कुल ध्वंस कर डालेंगे, उसे एक बार ही श्मशान बना देंगे। जिस प्रदेश की प्राकृतिक शोभा ने कभी हमें मुग्ध कर लिया था, उसी प्रदेश को—तुम देख लेना—हम प्रेत-भूमि बनाकर छोड़ेंगे।

    रुस्तम—कमलावती क्या इतनी सुन्दरी है?

    शाह जमाल—रुस्तम! तुम उस रूप का मूल्य नहीं जानते।

    रुस्तम कुछ कहना चाहता था कि सुलतान महमूद स्वय आ पहुँचा। उन्हें देखकर शाह के चेहरे का रंग उड़ गया। रुस्तम का भी हृदय काँप उठा। दोनों आसन त्यागकर ससम्भ्रम उठ बैठे।

    सुल्तान ने, गंभीर स्वर में, जमाल की ओर देखकर कहा—जमाल, गुर्ज्जर का क्या संवाद है?

    शाह जमाल—जहाँपनाह, संवाद शुभ है।

    सुलतान—गुर्ज्जर-पति का सेना-बल कितना है?

    शाह जमाल—हम लोगों से बहुत कम!

    सुलतान—गुर्ज्जर-विजय करने के लिए तुम्हें कितनी सेना चाहिए?

    शाह जमाल—दस हज़ार।

    सुलतान—दस हजार! तुमको दस और रुस्तम को पाँच हज़ार देने से हमारा बाहु-बल शिथिल हो जायगा। शाह जमाल—गुर्ज्जर की सेना खूब सुरक्षित है।

    सुलतान—जानता हूँ; पर मुझे आश्चर्य है कि ग़ज़नी का भविष्य अधिकारी अफ़ग़ान-सैनिक का बल नहीं जानता!

    शाह जमाल के हृदय में यह बात तीर-सी लगी। उसने तेजी से कहा—जहाँपनाह, हम केवल पाँच हजार सेना लेकर युद्ध में जाने के लिए प्रस्तुत हैं। आपके आशीर्वाद से मैं इतनी ही सेना से गुर्ज्जर-विजय करूंँगा। यदि नहीं, तो युद्ध में ही प्राण-त्याग करूँगा; लौटूंगा नहीं।—सुलतान शाह जमाल को पुत्र के समान चाहता था। यह बात सुनकर उसके नेत्रों में जल भर आया। उसने कहा—जमाल, हम तुम्हें दस हजार सेना देंगे; पर तीन हजार रुस्तम के अधीन रहकर तुम्हारी पार्श्व-रक्षा करेगी। कल ही युद्ध-यात्रा करो। हाँ, एक बात और कहनी है, गुर्ज्जर-पति को बन्दी कर हमारे पास भेजना। यदि जीता हाथ न आवे, तो सिर काटकर भेजना।

    शाह—जहाँपनाह, मैं वैसा ही करूँगा।

    सुलतान—हाँ और एक बात।

    शाह—आज्ञा।

    सुलतान—हम सुनते हैं, गुर्ज्जर-राज कन्या कमलावती अत्यन्त सुन्दरी है। हम उसे बेगम बनाना चाहते हैं; इसलिये तुम उसे सम्मान-सहित हमारे पास भेजना।

    शाह जमाल के मस्तक पर सहसा वज्रपात हो गया। सारा संसार अन्धकार-मय बोध होने लगा; पर उपाय क्या था? कहना पड़ा—बन्दा आपकी आज्ञा का पालन करेगा, आप निश्चिन्त रहें।

    सुलतान और कुछ न बोला, वहाँ से शीघ्र चला गया।

    शाह जमाल के हृदयाकाश में आशा का जो उज्ज्वल आलोक प्रकट हुआ था, वह अन्धकारमय निराशा में परिणत हो गया। वह सुख का स्वप्न चला गया।

    गुर्ज्जर-विजय करने का पहले जैसा उत्साह था, वैसा अब न रहा। शाह विषण्ण मुख से बोला—रुस्तम युद्ध के लिए प्रस्तुत हो। खुदा को मंजूर है वही होगा।

    (७)

    भैरव हाँफता-हाँफता कमलावती के कमरे के पास आकर विकृत स्वर से बोला—मा, मा!

    कमलावती ने बाहर आकर कहा—कौन है? भैरव! क्या बात है?

    भैरव ने कहा-मा, सर्वनाश उपस्थित है!

    कमलावती ने डरकर पूछा—क्यों, क्या हुआ?

    भैरव-मुसलमानों की सेना गुर्जर के समीप आ गई है।

    कमलावती—कितनी सेना?

    भैरव—प्रायः बीस हजार।

    कमला—बी-स-ह-जा-र—!!!

    भैरव-हाँ, मा, इससे अधिक होगी—कम नहीं। कमला—गुर्जर की रक्षा कैसे होगी? भैरव, हमारी सेना दस हजार से अधिक नहीं है।

    भैरव—हाँ, मा, और—और तुम्हारी कैसे रक्षा होगी, मा!

    कमलावती का मुख लाल हो गया, फिर तुरन्त ही वह लालिमा चली गई। कमला गम्भीर हो कर बोली—भैरव, हमारी कौन चिन्ता? क्या तू भूल गया कि मैं राजपूत-कन्या हूँ। हम लोगों को मृत्यु से भय नहीं है। अपनी जन्म-भूमि की चिन्ता कर। पिता कहाँ हैं?

    भैरव—नगर के बाहर व्यूह-रचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे सोमनाथ के चरण-तल में रहकर युद्ध करेंगे। वे ही हमारी रक्षा करेंगे।—कमला कातर स्वर से बोल उठी—भगवान् सोमनाथ, क्या होगा? क्या करोगे? प्रभो!

    सहसा कुमारसिंह वहाँ युद्ध-वेष में आ पहुँचा। कमलावती कुमार का हाथ पकड़कर बोली—कुमार अब क्या होगा?—कुमार उत्साह-पूर्ण स्वर से बोला—किसी का भय नहीं है। कमला, स्वयं स्वयंभू हमारे पृष्ठ पोषक हैं। जहाँ सोमनाथ महाकाल के रूप में विराजमान हैं और जहाँ साक्षात् शक्तिमयी देवी तुम हो, वहाँ कमला, हम लोगों को भय किस बात का है? तुम हमें प्रसन्न मुख से बिदा दो। कमला सजल नेत्रों से बोली—कुमार, आज न-जाने क्यों मेरा हृदय काँपता है? न-जाने क्यों अनिष्ट की आशंका होती है? हाय! इस सर्वनाश और अनर्थ की जड़ मैं ही हूँ। हाय! मैंने क्यों शैतान जमाल को आश्रय दिया? कुमार—कमला, यह विषाद करने का समय नहीं है। तुम राजपूत-कन्या हो। धैर्य धरो। मैं जाता हूँ; पर एक बात और कहनी है। मुसलमानों का कोई विश्वास नहीं। युद्ध में जय-पराजय दोनों मिलती हैं। कौन जानता हैं, कहीं हमारी पराजय हो और उन लोगों की जय। यदि कहीं ऐसा हो, तब तुम्हें आत्मरक्षा के लिये समय न मिलेगा; इसलिए यह मैं तुम्हें दिये जाता हूँ। विपद् पड़ने पर अपनी धर्म-रक्षा के लिए तुम इस विष का सदुपयोग करना। मेरी मृत्यु हो जाने और तुम्हारे पिता के स्वर्ग-गत होने पर, कमला! तुम यह जान रक्खो, देवता भी तुम्हारी रक्षा न कर सकेंगे। उस समय यही विष तुम्हारी और तुम्हारे धर्म की रक्षा करेगा। जब तुम सुन लेना कि कुमार अब संसार में नहीं रहा, तब तुम विष-पान कर अपनी पवित्र आत्मा की रक्षा करना।

    यह कहकर कुमार ने कमलावती के हाथ में एक काग़ज़ की पुड़िया दे दी और फिर सजल नेत्रों से युद्ध-भूमी की ओर प्रस्थान किया। भैरव दूसरे कमरे में था। कुमार को जाते देखकर वह भी उनके पीछे हो गया।

    (८)

    सन्ध्या हुई। गुर्ज्जर-सेना पठानों से पराजित हुई। सूर्यदेव गुर्ज्जर के पराजय का कलङ्क न सह क्रोध में लोहित वर्ण धारणकर आकाश-मण्डल में अदृश्य होगये।

    उस दिन भगवान सोमनाथ के मन्दिर में आरती नहीं हुई। उस दिन देव-मन्दिर के घण्ट-निनाद और ब्राह्मणों के स्तोत्र-पाठ से

    आकाश नहीं गूँजा। दिगन्त मुखरित नहीं हुआ। उस दिन समुद्र तरङ्ग घोर गर्जना नहीं करती थीं। उस दिन गुर्जर की सौन्दर्यशालिनी भूमि विभीषिकामय श्मशान के समान हो गई थी।

    भगवान् सोमनाथ श्मशान ही में रहते हैं। वही उनका निवास स्थान है; पर इस श्मशान में चिता-भस्म नहीं है। उनके स्थान में उनके एकान्त भक्त गुजरवासियों का हृदय-शोणित बह रहा है।

    क्रमशः रजनी गम्भीर होने लगी। अन्धकार बढ़ने लगा। कमलावती अपने पिता की मृत-देह के लिए चिता रचकर भैरव के साथ फिर युद्ध-भूमि में आई। उस महाश्मशान में वह प्रेतनी के समान घूम रही है। पीछे-पीछे मशाल हाथ में लिए भैरव था। भैरव मृत-देहों के मुख के पास मशाल ले जाता था। फिर निराशा पूर्ण स्वर से कहता था—नहीं, नहीं ये कुमार नहीं हैं। वायु भी हताश होकर कहता था—नहीं ये कुमार नहीं हैं। उस श्मशान-क्षेत्र में स्थित वृक्षों के पत्ते भी कहने लगते—नहीं, ये कुमारसिंह नहीं है। चन्द्र-हीन अकाश-मंडल के तारे भी कह उठते थे— कुमारसिह कहाँ हैं? उन्हें कहाँ खोजती हो? वे तो हमारे राज्य मे हैं कमलावती निराश होकर फिर दूसरा मृत देह की ओर जाती थी।

    इसी समय उस अन्धकार-मय श्मशान-भूमि में दो मनुष्य का आकृत दीख पड़ी। मूर्तिद्वय, भैरव और कमलावती के समीप आये। कमलावती ने उन दोनों को पहचान लिया और भैरव ने भी। उनमें से एक शाह जमाल था और दूसरा रुस्तम। कमलावती ने तिरस्कार-पूर्ण स्वर से कहा—शैतान, नराधम,तूने क्यों हमारा सर्वनाश किया? क्या हमारे आतिथ्य-सत्कार का यही पुरस्कार है?—शाह जमाल ने उस तिरस्कार का उत्तर न दिया। वह इस सयय कमलावती की ओर स्थिर दृष्टि से देखता था। जिसके लिए आज उसने गुर्ज्जर को प्रेत-भूमि कर दी है, उसे सामने खड़ी देखकर शाह जमाल उन्मत्त हो उठा। फिर विकृत स्वर से बोला—कमला! तुम यहाँ क्यों घूम रही हो? यह हम अनुमान से कह सकते हैं कि कदाचित तुम कुमारसिंह को मृत देह लेना चाहती हो; पर कुमार मरे नहीं हैं, आहत हैं और हमारे शिविर में बन्दी हैं। कमला हम कृतघ्न नहीं हैं। यदि तुम चाहो, तो हम अभी उन्हें स्वाधीन कर दें; पर इसके लिये मैं तुम्हें लेना चाहता हूँ।—इसके बाद शाह जमाल उत्तेजित स्वर से कहने लगा—कमला, सुलतान तुम्हें बेगम बनाना चाहते हैं और मैं तुम्हें अपनी हृदयेश्वरी, अपनी प्राणेश्वरी करना चाहता हूँ। मैं ग़ज़नी का भावी सुलतान हूँ; पर कमला तुम्हारे लिए मैं वह राज्य छोड़े देता हूँ। मैं तुम्हें चाहता हूँ। मैंने निश्चय कर लिया है कि अब मैं अफ़ग़ानिस्तान न लौटूंँगा। इसी देश में एक कुटी बनाकर मैं तुम्हारे साथ सुख से रहूँगा। मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए। कमला, प्राणेश्वरी कमला! एक बार कहो, तुम मेरी हो।—इतना कहकर शाह जमाल कमलावती को आलिङ्गन करने के लिए दौड़ा। एकाएक पीछे से एक बन्दूक की आवाज़ आई। शाह जमाल आहत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। शीघ्र ही वह आघात-

    कारी सब के सम्मुख आया। उसे देख रुस्तम के आश्चर्य की सीमा न रही; क्योंकि वह स्वयं सुलतान महमूद था।

    भू-पतित शाहज़ादे की ओर देखकर सुलतान बोला—शैतान, विश्वास-घातक! नफर, क्या इसीलिए मैंने तुझ पर इतना विश्वास किया था? मैंने तुझे क्या नहीं दिया? और फिर तूने मेरे ही साथ दग़ा की। महमूदाबाद में मैंने छिपकर तेरी बातें सुन ली थीं। एक सैनिक के वेष में मैं तेरे पीछे-पीछे यहाँ तक आया और यहाँ आज मैंने तुझे इस दग़ाबाज़ी के लिए पूरा पुरस्कार दे दिया।

    यह कहकर सुलतान पीछे लौटा; देखा, वहाँ कमलावती और भैरव कोई नहीं हैं, रुस्तम खड़ा है। सुलतान ने पूछा—रुस्तम, ये दोनों कहाँ चले गये?

    रुस्तम ने कहा—जहाँ पनाह, मैं कह नहीं सकता, कहाँ गये। मैंने खयाल नहीं किया।

    सुलतान—रुस्तम, तुम इस लाश को उठाकर मेरे पीछे-पीछे आओ।—रुस्तम शाह जमाल की लाश उठाकर सुलतान के पोछे-पीछे चला। शिविर में जाने से मालूम हुआ, कि कुमारसिंह भी न जाने कैसे छूटकर निकल गये! सुलतान ने कहा—रुस्तम, इस बार हम दुश्मनों को शिकस्त न कर सके। चलो फिर कभी देखा जायगा।

    सुलतान महमूद के लौट जाने पर कुमारसिंह ने कमलावती का पाणिग्रहण किया। कमलावती के पिता की भी यही अन्तिम इच्छा थी। कुमारसिंह उनके बाद गुर्ज्जर के अधीश्वर हुए।

    _______

    ताई

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    ( १ )

    ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?"—कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा।

    बाबू साहब ने दोनों बाहें फैलाकर कहा—हाँ बेटा, ला देंगे।

    उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले-क्या करेगा रेलगाड़ी?

    बालक बोला—उसमें बैठ के बली दूल जायेंगे। हम भी जायँगे, चुन्नी को भी ले जायँगे। बाबूजी को नहीं ले जायेंगे। हमें लेलगाली नहीं ला देते । ताऊजी, तुम ला दोगे, तो तुम्हें ले जायेंगे।

  • कायाकल्प

    कायाकल्प

    Aproximadamente 248.859 palavras.

    कायाकल्प
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    दोपहर का समय था, पर चारों तरफ अंधेरा था। आकाश में तारे छिटके हुए थे। ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था मानो संसार से जीवन का लोप हो गया हो। हवा भी बन्द हो गयी थी। सूर्यग्रहण लगा हुआ था। त्रिवेणी के घाट पर यात्रियों की भीड़ थी—ऐसी भीड़ जिसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती। वे सभी हिन्दू, जिनके दिल में श्रद्धा और धर्म का अनुराग था, भारत के हर एक प्रान्त से इस महान् अवसर पर त्रिवेणी की पावन धारा में अपने पापों का विसर्जन करने के लिए आ पहुँचे थे, मानो उस अँधेरे में भक्ति और विश्वास ने अधर्म पर छापा मारने के लिए अपनी असंख्य सेना सजायी हो। लोग इतने उत्साह से त्रिवेणी के संकरे घाट की ओर गिरते-पड़ते लपके चले जाते थे कि यदि जल की शीतल धारा की जगह अग्नि का जलता हुआ कुण्ड होता, तो भी लोग उसमें कूदते हुए जरा भी न झिझकते!

    कितने आदमी कुचल गये, कितने डूब गये, कितने खो गये, कितने अपंग हो गये, इसका अनुमान करना कठिन है। धर्म का विकट संग्राम था। एक तो सूर्यग्रहण, उसपर यह असाधारण और अद्भुत प्राकृतिक छटा! सारा दृष्य धार्मिक वृत्तियों को जगानेवाला था। दोपहर को तारों का प्रकाश माया के परदे को फाड़कर आत्मा को आलोकित करता हुया मालूम होता था। वैज्ञानिकों की बात जाने दीजिए; पर जनता में न जाने कितने दिनों से यह विश्वास फैला हुया था कि तारागण दिन को कहीं किसी सागर में डूब जाते हैं। आज वही तारागण आखों के सामने चमक रहे थे। फिर भक्ति क्यों न जाग उठे! सद्वृत्तियाँ क्यों न आँखें खोल दें!

    घण्टे भर के बाद फिर प्रकाश होने लगा, तारागण फिर अदृश्य हो गये, सूर्य भगवान् की समाधि टूटने लगी।

    यात्रीगण अपने-अपने पापों की गठरियाँ त्रिवेणी में डाल-डालकर जाने लगे। सन्ध्या होते-होते घाट पर सन्नाटा छा गया। हाँ, कुछ घायल, कुछ अधमरे प्राणी जहाँ-तहाँ पड़े कराह रहे थे और ऊँचे करार से कुछ दूर एक नाली में पड़ी तीन-चार साल की एक लड़की चिल्ला-चिल्लाकर रो रही थी।

    सेवा समितियों के युवक, जो अब तक भीड़ सँभालने का विफल प्रयत्न कर रहे थे, अब डोलियाँ कंधों पर ले-लेकर घायलों और भूले-भटकों को खबर लेने या पहुँचे। सेवा और दया का कितना अनुपम दृश्य था!

    सहसा एक युवक के कानों में उस बालिका के रोने की आवाज पड़ी। अपने जयी से बोला-यशोदा, उधर कोई लड़का रो रहा है। यशोदा-हाँ, मालूम तो होता है। इन मूर्खों को कोई कैसे समझाये कि यहाँ बच्चों को लाने का काम नहीं। चलो, देखें।

    दोनों ने उधर जाकर देखा, तो एक बालिका नाली में पड़ी रो रही है। गोरा रङ्ग था, भरा हुआ शरीर, बड़ी बड़ी आँखें, गोरा मुखड़ा, सिर से पाँव तक गहनों से लदी हुई। किसी अच्छे घर की लड़की थी। रोते-रोते उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। इन दोनों युवकों को देखकर डरी और चिल्लाकर रो पड़ी। यशोदा ने उसे गोद में उठा लिया और प्यार करके बोले-बेटी, रो मत, हम तुझे तेरी अम्मा के घर पहुँचा देंगे। तुझी को खोज रहे थे। तेरे बाप का क्या नाम है?

    लड़की चुप तो हो गयी, पर संशय की दृष्टि से देख देख सिसक रही थी। इस प्रश्न का कोई उत्तर न दे सकी।

    यशोदा ने फिर चुमकारकर पूछा—बेटी, तेरा घर कहाँ है?

    लड़की ने कोई जवाब न दिया।

    यशोदा—अब बताओ महमूद, क्या करें?

    महमूद एक अमीर मुसलमान का लड़का था। यशोदानन्दन से उसकी बड़ी दोस्ती थी। उनके साथ यह भी सेवासमिति में दाखिल हो गया था। बोला-क्या बताऊँ? कैंप में ले चलो, शायद कुछ पता चले।

    यशोदा—अभागे जरा-जरा से बच्चों को लाते हैं और इतना भी नहीं करते कि उन्हें अपना नाम और पता तो याद करा दें।

    महमूद—क्यों बिटिया, तुम्हारे बाबूजी का क्या नाम है?

    लड़की ने धीरे से कहा—बाबूजी!

    महमूद—तुम्हारा घर इसी शहर में है या कहीं और?

    लड़की—मैं तो बाबूदी के साथ लेल पर आई थी!

    महमूद—तुम्हारे बाबूदी क्या करते हैं?

    लड़की—कुछ नहीं कलते।

    यशोदा—इस वक्त अगर इसका बाप मिल जाय, तो सच कहता हूँ, बिना मारे न छोडूँ! बचा गहने पहनाकर लाये थे, जाने कोई तमाशा देखने आये हों।

    महमूद—और मेरा जी चाहता है कि तुम्हें पीटूँ। मियाँ बीवी यहाँ आये तो बच्चे को किस पर छोड़ आते? घर में और कोई न हो तो?

    यशोदा—तो फिर उन्हीं को यहाँ आने की क्या जरूरत थी।

    महमूद—तुम atheist ( नास्तिक ) हो, तुम क्या जानो कि सच्चा मजहबी जोश किसे कहते हैं?

    यशोदा—ऐसे मजहबी जोश को दूर से ही सलाम करता हूँ। इस वक्त दोनों मियाँ-बीवी हाय हाय कर रहे होंगे।

    महमूद—कौन जाने, वे भी यहीं कुचल कुचला गये हों।

    लड़की ने साहस कर कहा—तुम हमें घल पहुँचा दोगे? बाबूदी तुमको पैछा देंगे।

    यशोदा—अच्छा बेटी, चलो तुम्हारे बाबूदी को खोजें।

    दोनों मित्र बालिका को लिये हुए कैम्प में आये; पर यहाँ कुछ पता न चला। तब दोनों उस तरफ गये जहाँ मैदान में बहुत से यात्री पड़े हुए थे। महमूद ने बालिका को कन्धे पर बैठा लिया और यशोदानन्दन चारों तरफ चिल्लाते फिरे—यह किसकी लड़की है? किसी की लड़की तो नहीं खो गयी? यह आवाजें सुनकर कितने ही यात्री 'हाँ-हाँ, कहाँ-कहाँ' करके दौड़े; पर लड़की को देखकर निराश लौट गये।

    चिराग जले तक दोनों मित्र घूमते रहे। नीचे-ऊपर, किले के आस-पास, रेल के स्टेशन पर, अलोपी देवी के मन्दिर की तरफ यात्री-ही-यात्री पड़े हुए थे; पर बालिका के माता-पिता का कहीं पता न चला। आखिर निराश होकर दोनों आदमी कैम्प लौट आये।

    दूसरे दिन समिति के और कई सेवकों ने फिर पता लगाना शुरू किया। दिन भर दौड़े, सारा प्रयाग छान मारा, सभी धर्मशालाओं की खाक छानी; पर कहीं पता न चला।

    तीसरे दिन समाचार-पत्रो में नोटिस दिया गया और दो दिन वहाँ और रहकर समिति आगरे लौट गयी। लड़की को भी अपने साथ लेती गयी। उसे आशा थी कि समाचार-पत्रों से शायद सफलता हो। जब समाचार-पत्रों से कुछ पता न चला तब विवश होकर कार्यकर्ताओं ने उसे वहाँ के अनाथालय में रख दिया। महाशय यशोदानन्दन ही उस अनाथालय के मैनेजर थे।

    २

    बनारस में महात्मा कबीर के चौरे के निकट मुंशी वज्रधरसिंह का मकान है। आप हैं तो राजपूत, पर अपने को 'मुंशी' लिखते और कहते हैं। 'मुन्शी' की उपाधि से आपको बहुत प्रेम है। 'ठाकुर' के साथ आपको गँवारपन का बोध होता है, इसलिए हम भी आपको मुन्शीजी कहेंगे। आप कई साल से सरकारी पेंशन पाते हैं। बहुत छोटे पद से तरक्की करते करते आपने अन्त मे तहसीलदारी का उच्च पद प्राप्त कर लिया था। यद्यपि आप उस महान् पद पर तीन मास से अधिक न रहे और उतने दिन भी केवल एवज पर रहे; पर आप अपने को 'साबिक तहसीलदार' लिखते थे और मुहल्लेवाले भी उन्हें खुश करने को 'तहसीलदार साहब' ही कहते थे। यह नाम सुनकर आप खुशी से अकड़ जाते है पर पेंशन केवल २५) मिलती थी; इसलिए तहसीलदार साहब को बाजार-हाट खुद ही करना पड़ता था। घर मे चार प्राणियों का खर्च था। एक लड़की थी, एक लड़का और स्त्री। लड़के का नाम चक्रधर था। वह इतना जहीन था कि पिता के पेन्शन के जमाने मे जब घर से किसी प्रकार की सहायता न मिल सकती थी, केवल अपने बुद्धि-बल से उसने एम० ए० की उपाधि प्राप्त कर ली थी। मुन्शीजीने पहले ही से सिफारिश पहुँचानी शुरू की थी। दरबारदारी की

    कला में वह निपुण थे। हुक्काम को सलाम करने का उन्हें मरज था । हाकिमों के दिये हुए सैकड़ों प्रशसा पत्र उनकी अतुल सम्पत्ति थे। उन्हें वह बङे गर्व से दूसरी का दिखाया करते थे। कोई नया हाकिम आये, उससे जरूर रब्त-जब्त कर लेते थे। हुक्काम ने चक्रधर का ख्याल करने के वादे भी किये थे, लेकिन जब परीक्षा का नतीजा निकला और मुन्शीजीने चक्रधर से कमिश्नर के यहाँ चलने को कहा, तो उन्हाने जाने से साफ इनकार किया।

    मुन्शीनीने त्योरी चढ़ाकर पूछा-क्यो ? क्या घर बैठे तुम्हे नोकरी मिल जायगी?

    चक्रघर मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।

    वज्रधर-~यह खब्त तुम्हें कब से सवार हुया ? नौकरी के सिवा और करोगे ही क्या?

    चक्रधर-मैं आजाद रहना चाहता हूँ।

    वज्रधर-आजाद रहना था, तो एम० ए० क्यो पास किया ?

    चक्रधर इसीलिए कि आजादी का महत्व समझूंँ।

    उस दिन से पिता और पुत्र में आये-दिन बमचख मचती रहती थी। मुंशीजा बुढापे में भी शौकीन आदमी थे। अच्छा सा खाने और अच्छा पहनने की इच्छा अभी तक बनी हुई थी। अब तक इसी खयाल से दिल को समझाते थे कि लइका नोकर हो जायगा तो मौज करेंगे।अब लड़के का रंग देखकर बार-बार झुँझलाते और उमे काम-चोर, घमण्डी, मूर्ख कहकर अपना गुस्सा उतारते रहते थे । अभी तुम्हें कुछ नहीं सूझती, जब मैं मर जाऊँगा तब सूझेगो । तब सिर पर हाथ रखकर रोओगे | लाख बार कह दिया-बेटा, यह जमाना खुशामद और सलामी का है। तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेंत भो न पूछेगा। तुम बैठे आजादी का मजा उठा रहे हो और तुम्हारे पीछेवाले वाजी मारे जाते हैं। वह जमाना लद गया, जब विद्वानो की कद्र थी, अब तो विद्वान् टके सेर मिलते है, कोई बात नहीं पूछता । जैसे और भी चीजें बनाने के कारखाने खुल गये हैं, उसी तरह विद्वानों के कारखान है, और उनकी संख्या हर साल बढती जाती है।

    चक्रधर पिता का अदब करते थे, उनका जवाब तो न देते, पर अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए उन्होंने जो मार्ग तय कर लिया था, उससे वह न हटते थे। उन्हें यह हास्यासद मालूम होता था कि आदमी केवल पेट पालने के लिए आधी उम्र पढ़ने में लगा दे। अगर पेट पालना ही जीवन का आदर्श हो, तो पढने का जरूरत ही क्या है। मजदूर एक अच्छर भी नहीं जानता, फिर भी वह अपना और अपने बाल बच्चों का पेट बड़े मजे से पाल लेता है । विद्या के साथ जीवन का आदर्श कुछ ऊँचा न हुआ, तो पढना व्यर्थ है। विद्या को जीविका का साधन बनाते उन्हें लज्जा आती थी। वह भूखों मर जाते, लेकिन नौकरी के लिए आवेदन पत्र लेकर कहीं न नाते । विद्याभ्यास के दिनों में भी वह सेवा कार्य में अग्रसर रहा करते थे अब तो इसके सिवा उन्हें और कुछ सूझता ही न था। दीनों की सेवा और ता में जो आनन्द और आत्मगौरव था, वह दफ्तर में बैठकर कलम घिसने कहांँ।

    इस प्रकार दो साल गुजर गये। मुशी वज्रधर ने समझा था, जब यह भूत इसके सर से उतर नायगा, शादी-व्याह की फिक्र होगी, तो आप-ही-आप नौकरी की तलाश पङेगा! जवानी का नशा बहुत दिन तक नहीं ठहरता । लेकिन जब दो साल जाने पर भी भूत के उतरने का कोई लक्षण न दिखायी दिया, तो एक उन्होंने चक्रधर को खूब फटकारा-दुनिया का दस्तूर है कि पहले अपने घर में जलाकर तब मसजिद में जलाते हैं। तुम अपने घर को अंधेरा रखकर मसजिद को रोशन करना चाहते हो। जो मनुष्य अपनों का पालन न कर सका, वह ख़ुदा की किस मुँह से मदद करेगा। मै बुढापे में खाने कपड़े को तरसू और अफसरो का कल्याण करते फिरो। मैंने तुम्हें पैदा किया, दूसरो ने नहीं, मैने तुम्हें पोसा, दूसरो ने नहीं, मैं गोद में लेकर हकीम वैद्यों के द्वार-द्वार दौड़ता फिरा, नहीं | तुम पर सबसे ज्यादा हक मेरा है, दूसरो का नहीं।

    चक्रधर अब पिता की इच्छा से मुँह न मोड़ सके। उन्हें अपने कॉलेज ही मे जगह मिल सकती थी। वहाँ सभी उनका आदर करते थे; लेकिन यह उन्हे न था। बस कोई ऐसा धन्धा चाहते थे, जिससे थोड़ी देर रोज काम करके अपने की मदद कर सके। एक घण्टे से अधिक समय न देना चाहते थे । सयोग से शपुर के दीवान ठाकुर हरिसेवकसिंह को अपनी लड़की को पढ़ाने के लिए सुयोग्य और सच्चरित्र अध्यापक को जरूरत पड़ी। उन्होंने कालेज के प्रधानाध्यापक को इस विषय म एक पत्र लिखा । वेतन ३०) मासिक तक रक्खा । कालेज का प्राध्यापक इतने वेतन पर राजी न हुआ । आखिर उन्होने चक्रधर को उस काम में लगा दिया। काम बड़ी जिम्मेदारी का था, किन्तु चक्रधर इतने सुशील, इतने परिश्रमी और इतने सयमी थे कि उन पर सत्रको पूरा विश्वास था।

    दूसरे दिन से चक्रधर ने लडकी को पढ़ाना शुरू कर दिया ।

    ३

    कई महीने बीत गये । चक्रधर महीने के अन्त में रुपए लाते और माता के हाथ रख देते। अपने लिए उन्हे रुपए की कोई जरूरत न थी। दो मोटे कुरतों पर काट देते थे। हाँ, पुस्तको से उन्हें रुचि यो; पर इसके लिए कॉलेज का पुस्तकालय खुला हुआ था, सेवा कार्य के लिए चन्दों से रुपये या जाते थे । मुंशी वज्रघर द भी कुछ सीधा हो गया । डरे कि इससे ज्यादा दबाऊँ, तो शायद यह भो हाथ से निकल जाय। समझ गये कि जब तक विवाह की बेङी पाँव मे न पड़ेगी यह महाशय काबू आयेंगे । वह बेङी बनवाने का विचार करने लगे।

    मनोरमा की उम्र अभी १३ वर्ष से अधिक न हो, लेकिन वक्रधर को उसे पढ़ाते हुए बड़ी झेप होती थी। वह यही प्रयत्न करते थे कि टाकुर साहेब की उपस्थिति ही में उसे पढायें। यदि कभी ठाकुर साहब कही चले नाते, तो चक्रधर को महान् संकट का सामना करना पड़ता था।

    एक दिन चक्रधर इसी सकट मे जा फँसे । ठाकुर माहब कही गये हुए थे। चक्रधर कुरसी पर बैठे, पर मनोरमा की ओर न ताककर द्वार की ओर ताक रहे थे, मानो वहाँ बैठते डरते हों। मनोरमा वाल्मीकीय रामायण पढ रही थी। उसने दो-तीन बार चक्रधर की और ताका, पर उन्हें द्वार की ओर ताकते देखकर फिर किताब देखने लगी। उसके मन में सीता के वनवास पर एक शङ्का हुई थी और वह इसका समाधान करना चाहती थी। चक्रधर ने द्वार की ओर ताकते हुए पूछा-चुप क्यों बैठी हो, आज का पाठ क्यों नहीं पढती ?

    मनोरमा-मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ, आज्ञा हो तो पूछूंँ ?

    चक्रधर ने कातर भाव से कहा- क्या बात है ?

    मनोरमा-रामचन्द्र ने सीताजी को घर से निकाला, तो वह चली क्यों गयी ?

    चक्रधर-और क्या करती ?

    मनोरमा-वह जाने से इनकार कर सकती थी। एक तो राज्य पर उनका अधिकार भी रामचन्द्र ही के समान था, दूसरे वह निर्दोष थी। अगर वह यह अन्याय न स्वीकार करतीं, तो क्या उन पर कोई आपत्ति हो सकती थी ?

    चक्रधर-हमारे यहाँ पुरुषों की आज्ञा मानना स्त्रियों का परम धर्म माना गया है। यदि सीताजी पति की आज्ञा न मानतीं, तो वह भारतीय सती के आदर्श से गिर जाती।

    मनोरमा यह तो मै जानती हूँ कि स्त्री को पुरुष की आज्ञा माननी चाहिए। लेकिन क्या सभी दशाओं में ? जब राजा से साधारण प्रजा न्याय का दावा कर सकती है, तो क्या उसकी स्त्री नहीं कर सकती ? जब गमचन्द्र ने सीता की परीक्षा ले ली थी. और अन्त:करण से उन्हें पवित्र समझते थे, तो केवल झूठी निन्दा से बचने के लिए उन्हें घर से निकाल देना कहाँ का न्याय था?

    चक्रधर-राज धर्म का आदर्श भी तो पालन करना था !

    मनोरमा-तो क्या दोनों प्राणी जानते थे कि हम संसार के लिए आदर्श खड़ा कर रहे हैं ? इससे तो यह सिद्ध होता है कि वे कोई अभिनय कर रहे थे। अगर आदर्श भी मान लें, तो यह ऐसा आदर्श है, जो सत्य की हत्या करके पाला गया है। यह आदर्श नहीं है, चरित्र की दुर्बलता है। मैं आपसे पूछती हूँ, आप रामचन्द्र की जगह होते, तो क्या आप भी सीता को घर से निकाल देते ?

    चक्रधर बड़े असमंस में पड़ गये। उनके मन में स्वयं यही शङ्का और लगभग इसी उम्र में पैदा हुई थी, पर वह इसका समाधान न कर सके थे। अब साफ साफ जवाब देने की जरूरत पड़ी, तो बगलें झॉकने लगे। मनोरमा ने उन्हें चुप देखकर फिर पूछा-क्या आप भी उन्हें घर से निकाल देते?

    चक्रधर-नहीं, मै तो शायद न निकालता ।

    मनोरमा-आप निन्दा की जरा भी परवा न करते ?

    चक्रघर-नहीं, मैं झूठी निन्दा की परवा न करता ।

    मनोरमा की आँखें खुशी से चमक उठीं, प्रफुल्लित होकर बोली-यही बात मेरे भी मन में थी। मैंने दादाजी से, भाई जी से, पण्डितजी से, लौंगी अम्मों से, भाभी से यही शङ्का की, पर सब लोग यही कहते थे कि रामचन्द्र तो भगवान् हैं, उनके विषय में कोई शङ्का हो ही नही सकती। आपने आज मेरे मन की बात कही । मैं जानती थी कि आप यही जवाब देंगे। इसीलिए मैने आपसे पूछा था । अब मै उन लोगो को खूब भाड़े हाथों लूँगी।

    उस दिन से मनोरमा को चक्रधर से कुछ स्नेह हो गया। पढ़ने-लिखने से उसे विशेष रुचि हो गयी, चक्रधर उसे जो काम करने को दे जाते, वह उसे अवश्य पूरा करती । पहले की भांति अब हीले-हवाले न करती । जब उनके पाने का समय होता, तो वह पहले ही से आकर बैठ जाती और उनका इन्तजार करती। अब उसे उनसे अपने मन के भाव प्रकट करते हुए संकोच न होता। वह जानती थी कि कम से कम यहाँ उनका निरादर न होगा, उनकी हसी न उड़ायी जायगी।

    ठाकुर हरिसेवकसिह की आदत थी कि पहले दो चार महीनो तक तो नौकरों का वेतन ठीक समय पर दे देते; पर ज्यों ज्यों नौकर पुराना होता जाता था, उन्हें उसके वेतन की याद भूलती जाती थी। उनके यहाँ कई नौकर ऐसे भी पड़े थे, जिन्होंने बरसों से अपने वेतन नहीं पाये थे । चक्रधर को भी इधर चार महीनों से कुछ न मिला था। न वह आप-ही-आप देते थे, न चक्रधर संकोचवश मांँगते थे। उधर घर मे रोज तकरार होती थी। मुशी वजधर बार बार तकाजे करते, झंझलाते-मॉगते क्यों नहीं ? क्या मुँह मे दही जमाया हुआ है, या काम नहीं करते ? लिहाज भले आदमी का किया जाता है । ऐसे लुच्चो का लिहाज नहीं किया जाता, जो मुफ्त मे काम कराना चाहते हैं । आखिर एक दिन चक्रधर ने विवश हो ठाकुर साहब को एक पुरजा लिखकर अपना वेतन मॉगा। ठाकुर साहब ने पुरजा लौटा दिया-व्यर्थ को लिखापढ़ी करने की उन्हें फुरसत न थी और कहा-उनको जो कुछ कहना हो खुद आकर कहें। चक्रधर शरमाते हुए गये और बहुत-कुछ शिष्टाचार के बाद रुपए मांगे । ठाकुर साहब हँसकर बोले-वाह बाबूजी, वाह ! आप भी अच्छे मौजी जीव है । चार महीनों से वेतन नहीं मिला और आपने एक बार भी न मॉगा। अब तो आपके पूरे १२०) हो गये। मेरा हाथ इस वक्त तंग है। जरा दस-पाँच दिन ठहरिए । आपको महीने महीने अपना वितन ले लेना चाहिए था। सोचिए, मुझे एक मुश्त देने में कितनी असुविधा होगी । खैर, जाइये दस पाँच दिन मे रुपये मिल जायेंगे । चक्रधर कुछ न कह सके । लौटे, तो मुँह पर घोर निराशा छायी हुई थी। आज दादाजी शायद जीता न छोड़ेंगे। इस ख्याल से उनका दिल काँपने लगा। मनोरमा ने उनका पुरजा अपने पिता के पास ले जाते हुए राह में पढ़ लिया था। उन्हें उदास देखकर पूछा-दादाजी ने आपसे क्या कहा !

    चक्रधर उसके सामने रुपये पैसे का जिक्र न करना चाहते थे । झेंपते हुए बोले- कुछ तो नहीं ।

    मनोरमा-आपको रुपए नहीं दिये ?

    चक्रधर का मुंह लाल हो गया। बोले-मिल जायँगे ।

    मनोरमा-आपको १२०) चाहिए न ?

    चक्रधर-इस वक्त कोई ऐसी जरूरत नहीं है ।

    मनोरमा-जरूरत न होती तो श्राप मांगते ही न । दादाजी से बड़ा ऐब है कि 'किसी के रुपये देते हुए उन्हें मोह लगता है। देखिए, मैं जाकर'

    चक्रधर ने रोककर कहा-नहीं नहीं, कोई जरूरत नहीं।

    मनोरमा ने न माना | तुरन्त घर मे गई और एक क्षण में पूरे रुपये लाकर मेज पर रख दिये, मानो कहीं गिने गिनाये रक्खे हुए थे।

    चक्रधर-तुमने ठाकुर साहब को व्यर्थ कष्ट दिया ।

    मनोरमा-मेने उन्हें कष्ट नहीं दिया। उनसे तो कहा भी नहीं। दादाजी किसी की जरूरत नहीं समझते। अगर अपने लिए कभी मोटर मॅगपानी हो तो तुरत मंगवा लेंगे, पहाड़ों पर जाना हो, तो तुरन्त चले जायेंगे, पर जिसके रुपए पाते हैं, उसको न देंगे।

    वह तो पढने बैठ गयी, लेकिन चक्रधर के सामने यह समस्या पड़ी कि रुपए लुंँ, या न लुँ। उन्होंने निश्चय किया कि न लेना चाहिए । पाठ हो चुकने पर यह उठ खड़े हुए और बिना रुपये लिये बाहर निकल आये । मनोरमा रुपये लिये हुए पीछे पीछे बरामदे तक आयी । बार-बार कहती रही- इसे आप लेते जाइए, जब दादाजा दें, तो मुझे लौटा दीजिएगा। पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गये।

    ४

    चक्रघर डरते हुए घर पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है; उसपर कालीन विछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उसपर बैठे हुए है। उनके सामने हो एक कुरसी पर मुशी वज्रधर बैठे फर्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था । चक्रधर के प्राण सूख गये । अनुमान से ताड़ गये कि यह महाशय वर की खोज में आये हैं । निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा, तो अनुमान सच्चा निकला | वोले-दादाजी ने इनसे क्या कहा ?

    निर्मला ने मुस्कराकर कहा-नानी क्यों मरी जाती है, क्या जन्म भर क्वारे ही‌

    रहोगे ! जाओ, बाहर बैठो; तुम्हारी तो बड़ी देर से जोहाई हो रही है। आज क्यों इतनी देर लगायी?

    चक्रधर-यह है कौन ?

    निर्मला-आगरे के कोई वकील है, मुंशी यशोदानन्दन !

    चक्रधर-मै तो घूमने जाता हूँ। जब यह यमदूत चला जायगा, तो आऊँगा।

    निर्मला-वाह रे शर्मीले ! तेरा-सा लड़का तो देखा ही नहीं। आ, जरा सिर में तेल डाल दूं, बाल न जाने कैसे बिखरे हुए हैं। साफ कपड़े पहनकर जरा देर के लिए बाहर जाकर बैठ ।

    चक्रधर-घर में भोजन भी है कि व्याह ही कर देने का जी चाहता है ? मैं कहे देता हूँ, विवाह न करूँगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय ।

    किन्तु स्नेहमयी माता कब सुननेवाली थी। उसने उन्हें जबरदस्ती पकडकर सिर में तेल डाल दिया सन्दूक से एक धुला हुआ कुरता निकाल लायी और यों पहनाने लगी, जैसे कोई बच्चे को पहनाये । चक्रधर ने गरदन फेर ली।

    निर्मला-मुझसे शरारत करेगा, तो मार बैठूँगी। इधर ला सिर ! क्या जन्म- भर छटे सॉड़ बने रहने का जी चाहता है ? क्या मुझसे मरते दम तक चूल्हा-चक्की कराता रहेगा ? कुछ दिनों तो बहू का सुख उठा लेने दे।

    चक्रधर-तुमसे कौन कहता है भोजन बनाने को ? मैं कल से बना दिया करूँगा। मंगला को क्यों छोड़ रखा है ?

    निर्मला- अब मैं मारनेवाली ही हूँ। आज तक कभी न मारा; पर आज पीट चलूँगी, नहीं तो जाकर चुपके से बाहर बैठ ।

    इतने में मुशीजी ने पुकारा-नन्हें, क्या कर रहे हो ? जरा यहाँ तो आओ।

    चक्रधर के रहे-साहे होश भी उड़ गये। बोले-जाता तो हुँ, लेकिन कहे देता हूँ, मैं यह जुआ गले मे न डालुगा । जीवन में मनुष्य का यही काम नहीं है कि विवाह कर ले, बच्चों का बाप बन जाय और कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर गृहस्थी मे जुत जाय।

    निर्मला-सारी दुनिया जो करती है, वही तुम्हें भी करना पड़ेगा | मनुष्य का जन्म होता ही किस लिए है ?

    चक्रधर-हजारों काम है।

    निर्मला-रुपए आज भी नहीं लाये क्या ? कैसे आदमी हैं कि चार-चार महीने हो गये, रुपए देने का नाम ही नहीं लेते ! जाकर अपने दादा को किसी बहाने से भेज दो। कहीं से जाकर रुपए लायें। कुछ दावत आवत का सामान करना ही पड़ेगा, नहीं तो कहेंगे कि नाम बड़े और दर्शन थोड़े।

    चक्रधर बाहर आये, तो मुंशी यशोदानन्दन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लगा लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए बोले–अब की 'सरस्वती' मे आपका लेख दे‌

    चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैमनस्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताये हैं, वे वहुत ही विचारपूर्ण हैं।

    इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयता-पूर्ण आलोचना ने चक्रधर को मोहित कर लिया। वह कुछ जवाब देना ही चाहते थे कि मुशी बज्रधर बोल उठे-आज बहुत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ बातचीत होने लगी क्या? (यशोदानन्दन से) राजा साहब की इनके ऊपर बड़ी कृपा है। बिलकुल लड़कों की तरह मानते हैं। इनकी बातें सुनने से उनका जी ही नहीं भरता। (नाई से) देख, चिलम बदल दे और जाकर झिनकू से कह दे, सितार वितार लेंकर थोड़ी देर के लिए यहाँ आ जाय। इधर ही से गणेश के घर जाकर कहना कि तहसीलदार साहब ने एक हाँड़ी अच्छा दही माँगा है। कह देना, दही खराव हुआ, तो दाम न मिलेंगे।

    यह हुक्म देकर मुशीजी घर मे चले गये। उधर की फ्रिक थी, पर मेहमान को छोड़कर न जा सकते थे। आज उनका ठाट बाट देखते ही बनता था। अपना अल्पकालीन तहसीलदारी के समय का आलपाके का चोंगा निकाला था उसी जमाने की मदील भी सिर पर थी। आँखों में सुरमा भी था, बालों में तेल भी, मानो उन्हीं का व्याह होनेवाला है। चक्रधर शरमा रहे थे कि यह महाशय इनके वेश पर दिल में क्या कहते होंगे। राजा साहब की बात सुनकर तो वह गड़-से गये।

    मुशीजी चले गये, तो यशोदानन्दन बोले— अब आपका क्या काम करने का इरादा है?

    चक्रधर— अभी तो कुछ निश्चय नहीं किया है, हाँ, यह इरादा है कि कुछ दिनों आजाद रहकर सेवा कार्य करूँँ।

    यशोदा— इससे बढकर क्या हो सकता है। आप जितने उत्साह से समिति को चला रहे हैं, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। आप-जैसे उत्साही युवकों का ऊँचे आदर्शों के साथ सेवा क्षेत्र में आना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्हीं गुणों ने मुझे आपकी ओर खींचा है। यह तो आपको मालूम ही होगा कि मैं किस इरादे से आया हूँ। अगर मुझे धन या जायदाद की परवा होती, तो यहाँ न आता! मेरी दृष्टि में चरित्र का जो मूल्य है, वह और किसी वस्तु का नहीं।

    चक्रधर ने ऑखें नीची करके कहा— लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता। मेरा विचार है कि गृहस्थी में फँसकर कोई तन मन से सेवा कार्य नहीं कर सकता।

    यशोदा— ऐसी बात तो नहीं। इस वक्त भी जितने आदमी सेवा कार्य कर रहे हैं, वे प्राय सभी बाल-बच्चोंवाले आदमी हैं।

    चक्रधर— इसी से तो सेवा कार्य इतना शिथिल है!

    यशोदा— मैं समझता हूँ कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक से हों, तो स्त्री पुरुष के कामो में वाधक होने के बदले सहायक हो सकती है। मेरी पुत्री कायाकल्प] १५

    का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप दोनों एक साथ रहकर सुखी होंगे। उसे कपड़े का शौक नहीं, गहने का शौक नहीं; अपनी हैसियत को बढ़ाकर दिखाने की धुन नहीं। आप के साथ वह मोटे-से-मोटे वस्त्र और मोटे-से-मोटे भोजन में सन्तुष्ट रहेगी। अगर आप इसे अत्युक्ति न समझें, तो मैं यहॉ तक कह सकता हूँ कि ईश्वर ने आपको उसके लिए बनाया है और उसको आपके लिए। सेवा-कार्य में वह हमेशा आपसे एक कदम आगे रहेगी। अँगरेजी, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत पढ़ी हुई है; घर के कामों में इतनी कुशल है कि मैं नही समझता, उसके बिना मेरी गृहस्थी कैसे चलेगी? मेरी दो बहुएँ हैं, लड़की की मा है; किन्तु सब-की-सब फूहड़; किसी में भी वह तमीज नहीं। रही शक्ल सूरत, वह भी आपको इस तसवीर से मालूम हो जायगी।

    यह कहकर यशोदानन्दन ने कहार से तसवीर मॅगवायी और चक्रधर के सामने रखते हुए बोले— मै तो इसमें कोई हरज नहीं समझता। लडके को क्या खबर है कि मुझे बहू कैसी मिलेगी। स्त्री मे कितने ही गुण हों, लेकिन यदि उसकी सूरत पुरुष को पसन्द न आयी, तो वह उसकी नजरो से गिर जाती है, और उनका दाम्पत्य-जीवन दुःखमय हो जाता है। मैं तो यहॉ तक कहता हूँ कि वर और कन्या में दो चार बार मुलाकात भी हो जानी चाहिए। कन्या के लिए तो वह अनिवार्य है। पुरुष को स्त्री पसन्द न आयी, तो वह और शादियाँ कर सकता है। स्त्री को पुरुष पसन्द न आया, तो उसकी सारी उम्र रोते ही गुजरेगी।

    चक्रधर के पेट में चूहे दौडने लगे कि तसवीर क्योंकर ध्यान से देखूँँ। वहाँ देखते शरम आती थी, मेहमान को अकेला छोडकर घर में न जाते बनता था। कई मिनठ तक तो सब्र किये बैठे रहे, लेकिन न रहा गया। पान की तश्तरी और तसवीर लिये हुए घर में चले आए। चाहते थे कि अपने कमरे में जाकर देखें कि निर्मला ने पूछा— क्या बातचीत हुई? कुछ देंगे दिलायेंगे कि वही ५१) वालो मे हैं?

    चक्रधर ने उग्र होकर कहा— अगर तुम मेरे सामने देने दिलाने का नाम लोगी तो जहर खा लूँगा।

    निर्मला— वाह रे! तो क्या पचीस बरस तक यों ही पाला-पोसा है क्या? मुँह घो रखें!

    चक्रधर— तो बाजार में खडा करके वेच क्यो नहीं लेती? देखो, कै टके मिलते हैं?

    निर्मला— तुम तो अभी से ससुर के पक्ष मे मुझसे लड़ने लगे। व्याह के नाम ही में कुछ जादू है क्या!

    इतने में चक्रधर को छोटी बहन मगला तश्तरी में पान रखकर उनको देने लगा तो कागज में लिपटी हुई तस्वीर उसे नजर आयी। उसने तस्वीर ले ली और लालटेन के सामने ले जाकर बोली— यह बहू की तस्वीर है। देखो, कितनी सुन्दर है! झिनकू—(यशोदानन्दन से) हुजूर को गाने का शौक मालूम होता है।

    यशोदा॰—अजी, जब था तब था। सितार वितार की दो-चार गतें बजा लेता था। अब सब छोड़-छाड़ दिया।

    झिनकू—कितना ही छोड़-छाड़ दिया है, लेकिन आजकल के नौसिखियों से अच्छे ही होंगे। अब की आप ही की हो।

    यशोदानन्दन ने भी दो-चार बार इनकार करने के बाद काफी की धुन में एक ठुमरी छेड़ दी। उनका गला मँजा हुया था, इस कला में निपुण थे, ऐसा मस्त है होकर गाया कि सुनने वाले झूम-झूम गये। उनकी सुरीली तान साज में मिल जाती थी। वज्रधर ने तो वाह-वाह का तार बाँध दिया। झिनकू के भी छक्के छुट गये। मजा यह कि साथ-ही-साथ सितार भी बजाते थे। आस पास के लोग आकर जमा हो गये। समाँ बँध गया। चक्रधर ने यह आवाज सुनी, तो दिल में कहा—यह महाशय भी उसी टुकरी के लोगों में है, उसी रंग में रँगे हुए। अब झेंप जाती रही। बाहर आकर बैठ गये।

    वज्रघर ने कहा—भाई साहब, आपने तो कमाल कर दिया। बहुत दिनों से ऐसा गाना न सुना था। कैसी रही, झिनकू?

    झिनकू—हुजूर, कुछ न पूछिए, सिर धुन रहा हूँ। मेरी तो अब गाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। आपने हम सबी का रंग फीका कर दिया। पुराने जमाने के रईसों की क्या बातें हैं।

    यशोदा॰—कभी-कभी जी बदला लिया करता हूँ, वह भी लुक छिपकर। लड़के सुनते हैं, तो कानों पर हाथ रख लेते हैं। मैं समझता हूँ, जिसमे यह रस नहीं, वह किसी सोहबत में बैठने लायक नहीं। क्यों बाबू चक्रधर, आपको तो शौक होगा?

    वज्रधर—जी, छू नहीं गया। बस, अपने लड़कों का हाल समझिए।

    चक्रधर ने झेंपते हुए कहा—मैं गाने को बुरा नहीं समझता। हाँ, इतना जरूर चाहता हूँ कि शरीफ लोग शरीफों ही में गायें बजायें।

    यशोदा॰—गुणियों की जात पात नहीं देखी जाती। हमने तो बरसों एक अन्धे फकीर की गुलामी की, तब जाके सितार बजाना आया।

    आधीरात के करीब गाना बन्द हुआ। लोगों ने भोजन किया। जब मुंशी यशोदानन्दन बाहर आकर बैठे, तो वज्रधर ने पूछा—आपसे कुछ बातचीत हुई?

    यशोदा—जी हाँ, हुई, लेकिन साफ नहीं खुले।

    वज्रधर—विवाह के नाम से चिढ़ता है।

    यशोदा॰—अब शायद राजी हो जायँ।

    वज्रघर—अजी, सैकड़ें आदमी आ-आकर लौट गये। कई आदमी तो दस दस हजार तक देने पर तैयार थे। एक साहब तो अपनी रियासत ही लिख देते थे, लेकिन इसने हामी न भरी। दोनों श्रादमी सोये। प्रातःकाल यशोदानन्दन ने चक्रवर से पूछा-क्यों बेटा, एक दिन के लिए मेरे साथ आगरे चलोगे ?

    चक्रधर -मुझे तो आप इस जजाल मे न फंसायें, तो वहुत अच्छा हो ।

    यशोदा० -तुम्हें मजाल में नहीं फँसाता वेटा, तुम्हें ऐसा सच्चा मन्त्री, ऐसा सच्चा सहायक और ऐसा सन्या मित्र दे रहा हूँ, जो तुम्हारे उद्देश्यों को पूरा करना अपने जीवन का मुख्य कर्त्तव्य समझेगी । मै स्वार्थवश ऐसा नहीं कह रहा हूँ। मै स्वय गरे की हिन्द-सभा का मन्त्री हूँ और सेवा कार्य का महत्व समझता हूँ। अगर मै समझता कि यह सम्बन्ध आपके काम में बाधक होगा, तो कभी आग्रह न करता । मैं चाहता हूँ कि आप एक बार अहल्या से मिल लें। यों तो मैं मन से आपको अपना दामाद बना चका, पर अहल्या की अनुमति ले लेनी आवश्यक समझता हूँ। आप भी शायद यह पसन्द न करेंगे कि मैं इस विषय में स्वेच्छा से काम लूँ। आप शरमायें नहीं, यों समझ लीजिए कि आप मेरे दामाद हो चुके; केवल मेरे साथ सैर करने चल रहे है। आपको देखकर आपकी सास, साले सभी खुश होगे।

    चक्रधर बडे सकटा में पड़े। सिद्धान्त-रूप से वह विवाह के विषय में स्त्रियों को पूरी स्वाधीनता देने के पान में थे; पर इस समय प्रागरे जाते हुए उन्हें बढ़ा सकोच हो रहा था । कहीं उसकी इच्छा न हुई तो ? कौन बड़ा सजीला जवान हूँ, बात चीत करने में भी तो चतुर नही, और उसके सामने तो शायद मेरा मुँह ही न खुले । यही उसने मन फीका कर लिया, तो मेरे लिए डूब मरने की जगह होगी। फिर कपड़े लते भी नहीं है, बस, यही दो कुरतों को पूँजी है । बहुत हैस-वैस के बाद बोले-पापसे सच कहता हूँ, मैं अपने को ऐसी . ऐसी सुयोग्य स्त्री के योग्य नहीं समझता।

    यशोदा०-इन हीलों से मैं पापका दामन छोड़नेवाला नही हूँ। मैं आपके मनोभावों को समझ रहा हूँ। आप सकोच के कारण ऐसा कह रहे हैं; पर ग्रहल्या उन चचल लड़कियों में नहीं है, जिसके सामने जाते हुए आपको शरमाना पड़े। आप उसकी सरलता देखकर प्रसन्न होंगे। हाँ, मैं इतना कर सकता हूँ कि आपकी ख़ातिर से पहले यह कहूँ कि आप परदेशी आदमी है, यहाँ सैर करने आये हैं । स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे। मैंने समझा, सीधे आदमी है, होटल मे लुट जायँगे, साथ लेता अाया । क्यो, कैसी रहेगी?

    चक्रधर ने अपनी प्रसन्नता को छिपाकर कहा- क्या यह नहीं हो सकता कि मै और किसी समय आ जाऊँ ?

    यशोदा०-नहीं, मै इस काम मे विलम्ब नहीं करना चाहता। में तो उसी को लाकर दो चार दिन के लिए यहाँ ठहरा सकता हूँ, पर शायद अापक घर के लोग यह पसन्द न करेंगे।

    चक्रवर ने सोचा-अगर मैने और ज्यादा टालमटोल की, तो कही यह महाशय सचमुच ही अहल्या को यहाँ न पहुंचा दें। तब तो सारा परदा ही खुल जायगा ! घर की दशा देखकर अवश्य ही उसका दिल फिर जायगा। एक तो जरा-सा घर, कहीं बैठने की जगह नही, उसपर न कोई साज, न सामान । विवाह हो जाने के बाद दूसरी बात हो जाती है। लड़की कितने ही बड़े घराने की हो, समझ लेती है, अब तो यही मेरा घर है-अच्छा हो या बुरा। दो चार दिन अपनी तक्दीर को रोकर शान्त हो जाती है । बोले-जी हाँ, यह मुनासिब नहीं मालूम होता । मैं ही चला चलूँगा।

    घर में विद्या का प्रचार होने से प्रायः सभी प्राणी कुछ न कुछ उदार हो जाते है। निर्मला तो खुशी से राजी हो गयी। हाँ, मुन्शी वज्रघर को कुछ सकोच हुअा, लेकिन यह समझकर कि यह महाशय लड़के पर लट्टू हो रहे हैं, कोई अच्छी रकम दे मरेगे, उन्होंने भी कोई आपत्ति न की। अब केवल ठाकुर हरिसेवकसिह को सूचना देनी थी। चक्रधर यों तीसरे पहर पढाने जाया करते थे, पर श्रान ६ बजते-बजते ना पहुंचे।

    ठाकुर साहब इस वक्त अपनी प्राणेश्वरी लौंगी से कुछ बातें कर रहे थे। मनोरमा की माता का देहान्त हो चुका था। लौंगी उस वक्त लौडी थी। उसने इतनी कुशलता से घर सँभाला कि ठाकुर साब उसपर रीझ गये और उसे गृहिणी के रिक्त स्थान पर अभिषिक्त कर दिया । नाम और गुण मे इतना प्रत्यक्ष विरोध बहुत कम होगा। लोग कहते हैं, पहले वह इतनी दुबली थी कि फूक टो तो उड़ जाय, पर गृहिणी.का पद पाते ही उसकी प्रतिमा स्थूल रूप धारण करने लगी।

    क्षीण जलधारा बरसात की नदी की भाँति बढ़ने लगी और इस समय तो स्थूल प्रतिमा की विशाल मूति थी, अचल और अपार । बरसाती नदी का जल गढ़हो और.गढ़हियों में भर गया था। बस, जल ही जल दिखायी देता था। न आँखों का पता या, न नाक का, न मुँह का, सभी जगह स्थूलता व्याप्त हो रही थी, पर बाहर की.स्थूलता ने अन्दर की कोमलता को अक्षुण्ण रखा था। सरल, सदय, हँसमुख, सहन-शोल स्त्री थी, निसने सारे घर को वशीभूत कर लिया था। यह उसी की सजनता यो,.जो नौकरों को वेतन न मिलने पर भी जाने न देती थी। मनोरमा पर तो वह प्राण देती थी। ईर्ष्या, क्रोध, मत्सर उसे छू भी न गया था । वह उदार न हो, पर कृपण न यी । ठाकुर साहब कभी कभी उसपर भी बिगड़ जाते थे, मारने दौड़ते थे, दो-एक वार.मारा भी था, पर उसके माथे पर जरा भी बल न आता था । ठाकुर साहब का सिर भी दुखे, तो उसकी जान निकल जाती थी। वह उसकी स्नेहमयी सेवा ही थी, जिसने ऐसे हिंसक जीव को जकड़ रखा था।

    इस वक्त दोनों प्राणियों में कोई बहस छिड़ी हुई थी। ठाकुर साहव झला भल्ला-कर बोल रहे थे, और लौंगी अपराधियों की भाँति सिर झुकाये खड़ी थी कि मनोरमा ने आकर कहा-वावूनी आये हुए हैं, आपसे कुछ कहना चाहते हैं ।

    ठाकुर साहब की भौहें तन गयीं। बोले-कहना क्या चाहते होगे, रुपए मॉगने. श्राये होंगे। अच्छा, नाकर कह दो कि श्राते है, बैठिए । लौंगी-इनके रुपए दे क्यों नहीं देते ? वेचारे गरीब आदमी हैं; सकोच के मारे नहीं मांगते, कई महीने तो चढ गये ?

    ठाकुर-यह भी तुम्हारी मुर्खता थी जिसकी बदौलत मुझे यह तावान देना पड़ता है। कहता था कि कोई ईसाइने रख लो, दो-चार रुपये में काम चल जायगा। तुमने कहा-नहीं, कोई लायक आदमी होना चाहिए। इनके लायक होने मे शक नहीं; पर यह तो बुरा मालूम होता है कि जब देखो रुपए के लिए सिर पर सवार । अभी कल कह दिया कि घबराइए नही, दस-पाँच दिनों मे मिल जायेंगे। तब तक फिर भूत की तरह सवार हो गये।

    लौंगो-कोई ऐसी ही जरूरत या पढ़ी होगी, तभी आये होंगे । १२०) हुए न ? मैं लाये देती हूँ।

    ठाकुर-हॉ, सन्दूक खोल कर लाना तो कोई कठिन काम नहो । अखर तो उने होती है, जिसे कुआँ खोदना पड़ता है।

    लोगी-वही कुऑ तो उन्होने भी खोदा है । तुम्हें चार महीने तक कुछ न मिले, तो क्या हाल होगा, साचो। मुझे तो वेचारे पर दया पाती है।

    कह कहकर लौंगी गयी ओर रुपये लाकर ठाकुर साहब से बोली-लो, दे आयो । सुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों।

    ठाकुर-लायी भी तो रुपये, नोट न थे क्या ?

    लौंगी-जैसे नोट वैसे पर क्या इसमे भी कुछ भेद है?

    ठाकुर-अब तुमसे क्या कहूँ। अच्छा, रख दो, जाता हूँ। पानी तो नहीं वरस रहा है कि भींग रहे होगे।

    ठाकुर साहब ने झंझलाकर रुपए उठा लिये पोर बाहर चले; लेकिन रास्ते में.क्रोध शान्त हो गया। चक्रधर के पास पहुंचे, तो विनय के देवता बने हुए थे।

    चक्रधर-पापको कष्ट देने..

    ठाकुर-नही-नहीं, मुझे कई कष्ट नहीं हुआ। नेने आपसे दस-पॉच दिन में देने का वादा किया था। मेरे पास रुपए न थे, पर स्त्रियों को तो आप जानते हैं;कितनी चतुर होती हैं । घर में सए निकल पाए । यह लीजिए।

    चक्रधर-मै इस वक्त एक दूसरे हो काम से पाया हूँ। मुझे एक काम ते अागरे जाना है । शायद दो-तीन दिन लगेगे। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।

    ठाकुर-हॉ हाँ, शौक से जाइए, मुझने पूछने की जरूरत न थी।

    ठाकुर साहब अन्दर चले गये, तो मनोरमा ने पूछा-आप आगरे क्या करने ला रहे हैं?

    चक्रधर-एक जरूरत से ज्ञाता हूँ।

    मनोरमा-कोई बीमार है क्या ?

    चक्रधर-नहीं, बीमार कोई नहीं है । मनोरमा- फिर क्या काम है, बताते क्यों नहीं ? जब तक न तलाइएगा, में जाने न दूंगी।

    चक्रधर-लौटवर बता दूंगा।

    मनोरमा-जी नहीं, मै यह नहीं मानती, अभी बतलाइए।

    चक्रधर-एक मित्र मे मिलने जाता हूँ।

    मनोरमा-आप मुस्करा रहे हैं ! में समझ गयी, नौकरी की तलाश में जाते हैं।

    चक्रधर नहीं मनोरमा, यह बात नहीं है। मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।

    मनोरमा-तो क्या आप हमेशा इसी तरह देहातो मे घुमा करेंगे ?

    चक्रधर-विचार तो ऐसा ही है, फिर जैसी ईश्वर की इच्छा।

    मनोरमा-आप रुपए कहाँ से लायेंगे? उन कामों के लिए भी तो रुपयो की जरूरत होती होगी?

    चक्रधर-भिक्षा माँगूंगा । पुण्य कार्य भिक्षा हो पर चलते हैं।

    मनोरमा-तो पानकल भी आप भिक्षा मांगते होंगे ?

    चक्रधर–हॉ, मॉगता क्यो नहीं । न मागू, तो काम कैसे चले ।

    मनोरमा-मुझसे तो अापने कभी नहीं मांगा।

    चक्रधर-तुम्हारे ऊपर तो विश्वास है कि जब मॉDगा, तब दे दोगी, इसीलिए कोई विशेष काम पा पड़ने पर मॉगूगा।

    मनोरमा-और जो उस वक्त मेरे पास न हुए तो।

    चक्रघर- तो फिर कभी मॉगूंगा।

    मनोरमा-तो श्राप मुझसे अभी माँग लीजिए, अभी मेरे पास रुपए है, दे दूंगी। फिर आप न जाने किस वक मॉग बैठे ।

    यह कहकर मनोरमा अन्दर गयी और क्लवाले १२०) रुपए लाकर चक्रधर के सामने रख दिये।

    चक्रधर इस वक्त तो मुझे जरूरत नहीं । फिर कभी ले लूँगा।

    मनोरमा-जी नहीं, लेते जाइए। मेरे पास खर्च हो जायेंगे | एक दफे भी बाजार गयी, तो यह गायब हो जायेंगे । इसी डर के मारे मैं बाजार नहीं जाती।

    चक्रधर-तुमने ठाकुर साहब से पूछ लिया है ?

    मनोरमा उनसे क्यों पूछ् ? गुड़िया लाती हूँ, तो उनसे नहीं पूछती, तो फिर.इसके लिए उनसे क्यों पूछ ?

    चक्रधर–तो फिर यो मै न लूँगा । यह स्थिति और ही है। यह ख्याल हो सकता है कि मेने तुमसे रुपए ठग लिये । तुम्ही सोचो, हो सकता है या नहीं।

    मनोरमा–अच्छा, आप अमानत समझकर अपने पास रखे रहिए। इतने में सामने से मुश्की घोड़ों की फिटन नाती हुई दिखायी दी। घोड़ों के साजों पर गगा ममुनी काम किया हुआ था। चार सवार भाले उठाये पीछे दौड़ते चले पात थे । चक्रघर-कोई रानी मालूम होती है ।

    मनोरमा-जगदीशपुर की महारानी है । जब उनके यहाँ जाती हूँ, मुझे एक.गिनी देती हैं । ये आठों गिनियाँ उन्हीं की दी हुई हैं । न जाने क्यों मुझे बहुत.मानती हैं।

    चक्रधर-इनको कोठी दुर्गाकुण्ड की तरफ है न ? मैं एक दिन इनके यहाँ भिक्षा माँगने जाऊँगा।

    मनोरमा-मैं जगदीशपुर की रानी होती, तो आपको बिना माँगे ही बहुत-सा धन – दे देती।

    चक्रधर ने मुस्कराकर कहा-तब भूल जाती।

    मनोरमा-जी नहीं, मै कभी न भूलती।

    चक्रधर-अच्छा, कभी याद दिलाउँगा। इस वक्त यह रुपए अपने ही पास रहने दो।

    मनोरमा – अापको इन्हे लेते सकोच क्यों होता है ? रुपए मेरे हैं, महारानी ने मुझे.दिये हैं । मै इन्हें पानी में डाल सकती हूँ, किसीको मुझे रोकने का क्या अधिकार है । आप न लेंगे तो मै सच कहती हूँ, याज ही जाकर इन्हें गगा में फेंक पाऊँगी।

    चक्रधर ने धर्म-संकट में पड़कर कहा-तुम इतना अाग्रह करती हो, तो मै लिये लेता हूँ, लेकिन इसे अमानत समझगा।

    मनोरमा प्रसन्न होकर बोली-हॉ, अमानत ही समझ लीजिए।

    चक्रधर-तो मैं नाता हूँ । किताब देखती रहना ।

    मनोरमा-अाप अगर मुझसे बिना बताये चले जायेंगे, तो मैं कुछ न पढगी।

    चक्रधर-यह तो बड़ी टेढ़ी शर्त है । बतला ही हूँ। अच्छा, हँसना मत । तुम जरा भी मुस्कराई और मैं चला।

    मनोरमा-में दोनों हाथों से मुंह बन्द किये लेती है।

    चक्रधर ने झंपते हुए कहा- मेरे विवाह की कुछ बातचीत है | मेरी तो इच्छा नहीं है; पर एक महाशय जबरदस्ती खींचे लिये जाते हैं ।

    यह कहकर चक्रधर उठ खड़े हुए। मनोरमा भी उनके साथ साथ आयो । जब वह बरामदे से नीचे उतरे, तो प्रणाम किया और तुरत अपने कमरे में लौट प्रायी। उसकी आँखे डबडवायी हुई थीं और बार-चार रुलाई अाती थी, मानो चक्रधर किसी दूर देश जा रहे हो!

    ५

    सन्ध्या समय जब रेलगाड़ी बनारस से चली, तो यशोदानन्दन ने चक्रधर से पूछा-क्यों भैया, तुम्हारी राय में झूठ बोलना किसी दशा मे क्षम्य है, या नहीं?.

    चक्रधर ने विस्मित होकर कहा-मै तो समझता हूँ, नहीं।

    यशोदा-किसी भी दशा मे नहीं ? चक्रधर-मैं तो यही कहूँगा कि किसी दशा में भी नहीं, हालाँकि कुछ लोग परोपकार के लिए असत्य को क्षम्य समझते हैं ।

    यशोदा०-मैं भी उन्हीं लोगों मे हूँ। मेरा ख्याल है कि पूरा वृत्तान्त सुनकर शायद आप भी मुझसे सहमत हो जायँ । मेने अहल्या के विषय में आप से झूठी बातें कही है । वह वास्तवमे मेरी लड़की नहीं है । उसके माता-पिता का हमें कुछ भी पता नहीं।

    चक्रधर ने बड़ी-बड़ी आँखें करके कहा-तो फिर अापके यहाँ कैसे पायी ।

    यशोदा०-विचित्र कथा है। १५ वर्ष हुए, एक बार सूर्यग्रहण लगा था । मैं उन दिनों कालेज में था। हमारी एक सेवा समिति थी। हम लोग उसी म्नान के अवसर पर यात्रियों की सेवा करने प्रयाग याये थे। तुम तो उस वक्त बहुत छोटे-मे रहे होगे । इतना बड़ा मेला फिर नही लगा । वही हमें यह लड़की एक नाली मे पड़ी

    रोती मिली । । न जाने उसके माँ बाप नदी मे हव गये, या भीड़ मे कुचल गये । बहुत खोज की, पर उनका पता न लगा। विवश होकर उसे साथ लेते गये । ४५ वर्ष तक तो उसे अनाथालय मे रखा, लेकिन जब कार्यकर्तायों की पृट के कारण अनाथालय वन्द हो गया, तो अपने ही घर में उसका पालन पोषण करने लगा। जन्म से न हो,पर सरकारों से वह हमारी लडकी है। उसके कुलीन होने मे भी सन्देह नहा । उसका शील, स्वभाव और चातुर्य देखकर अच्छे-अच्छे घरों की स्त्रियाँ चकित रह जाती हैं । मै इधर एक साल से उसके लिए योग्य वर की तलाश में था। ऐसा आदमी चाहता था, जो स्थिति को जानकर उसे सहर्ष स्वीकार करे और पाकर अपने को धन्य समझे । पनों में आपके लेख देखकर और आपके सेवाकार्य को प्रशसा सुनकर मेरो धारणा हो गयी कि आप ही उसके लिए सबसे योग्य है । यह निश्चय करके आपके यहाँ पाया। मैंने आपसे सारा वृत्तान्त कह दिया । अब आपको अख्तियार है, उसे अपनायें या त्यागें । हाँ, इतना कह सकता हूँ कि ऐसा रन श्राप फिर न पायेंगे | में यह जानता हूँ कि आपके पिताजी को यह बात असह्य होगी, पर यह भी जानता हूँ कि वोरात्माएँ सत्कार्य में विरोध की परवा नही करतो और अन्त मे उस पर विजय हो पाती हैं।

    चक्रधर गहरे विचार में पड़ गये । एक तरफ अहल्या का अनुपम सौन्दर्य और उज्ज्वल चरित्र था, दूसरी ओर माता पिता का विरोध और लोक-निन्दा का भय, मन मे तर्क सग्राम होने लगा यशोदानन्दन ने उन्हें असमजस में पड़े देखकर कहा-श्राप चिन्तित देख पडते हैं और चिन्ता की बात भी है, लेकिन जब आप जैसे सुश-क्षित और उदार पुरुष विरोध और भय के कारण कर्तव्य और न्याय से मुंह मोड़ें,तो फिर हमारा उद्धार हो चुका । मै अापसे सच कहता हूँ, यदि मेरे दो पुत्रों में से एक भी क्वॉरा होता और अहल्या उसे स्वीकार करती, तो मैं बढ़े हर्प स उसका विवाह उससे कर देता । अापके सामाजिक विचारो की स्वतन्त्रता का परिचय पाकर ही मने अापके ऊपर इस बालिका के उद्धार का भार रखा है और यदि आपने भी अपने कर्तव्य को न समझा, तो मैं नहीं कह सकता, उस अवला की क्या दशा होगी।

    चक्रधर रूप-लावण्य की अोर मे तो ऑखें बन्द कर सकते थे; लेकिन उदार के भाव को दवाना उनके लिए असम्भव था । वह स्वतन्त्रता के उपासक थे और निर्भी-कता स्वतन्त्रता की पहली सीढी है। उनके मन ने कहा- क्या यह काम ऐसा है कि समाज हॅसे ? समाज को इसकी प्रशसा करनी चाहिए। अगर ऐसे काम के लिए कोई मेरा तिरस्कार करे, तो मैं तृण बराबर भी उसकी परवाह न करूँगा। चाहे वह मेरे माता-पिता ही हों। दृढ़ भाव से बोले-मेरी ओर से आप जरा भो शंका न करें। मैं इतना भीरु नहीं हूँ कि ऐसे कामों में समाज-निन्दा से डरूँ। माता-पिता को प्रसन्न रखना मेरा धर्म है; लेकिन कर्तव्य और न्याय की हत्या करके नहीं । कर्तव्य के सामने माता पिता की इच्छा का मूल्य नहीं है ।

    यशोदानन्दन ने चक्रधर को गले लगाते हुए कहा- भैया, तुमसे ऐसी ही आशा थी।

    यह कहकर यशोदानन्दन ने अपना सितार उठा लिया और बजाने लगे । चक्र-घर को कभी सितार की ध्वनि इतनी प्रिय, इतनी मधुर न लगी थी। और न चॉदनी कभी इतनी सुहृदय और विहसित | दायें-बायें चाँदनी छिटकी हुई थी और उसकी-मन्द छटा मे अहल्या रेलगाडी के साथ, अगणित रूप धारण किये दोड़तो चली जाती थी। कभी वह उछलकर आकाश जा पहुँचती थी, कभी नदियों की चन्द्र-चञ्चल तरगो मे । यशोदानन्दन को न कभी इतना उल्लास हुअा था, न चक्र घर का कभी इतना गर्व, दोनों अानन्द-कल्पना मे हवे हुए थे।

    गाडी नागरे पहुंची, तो दिन निकल आया था । सुनहरा नगर हरे हरे कुजों के बीच में विश्राम कर रहा था, मानों वालक माता की गोद में सोया हो।

    इस नगर को देखते ही चक्रधर को कितनी हो ऐतिहासिक घटनाएँ याद आ गयों । सारा नगर किसी उजडे हुए घर की भॉति श्री-हीन हो रहा था ।

    मुशी यशोदानन्दन अभी कुलियों को पुकार रहे थे कि उनकी निगाह पुलिस के सिपाहियो पर पड़ी। चारों तरफ पहरा था। मुसाफिरों के बिस्तरे, सन्दूक खोल-खोलकर देखे जाने लगे। एक थानेदार ने यशोदानन्दन का भी असबाब देखना शुरू किया।

    यशोदानन्दन ने आश्चर्य से पूछा-क्यों माहव, ग्राज यह सख्ती क्यों है ?

    थानेदार-आप लोगों ने जो कॉटे बोये हैं, उन्ही का फल है। शहर में फिसाद हो गया है।

    यशोदा-अभी तीन दिन पहले तो अमन का राज्य था, यह भूत कहाँ से उठ खड़ा हुया?

    इतने मे समिति का एक तेवक दौड़ता हुआ या पहुँचा । यशोदानन्दन ने ग्रागे बढकर पूछा-क्यों राधामोहन, यह क्या मामला हो गयो ? अभी जिस दिन म गया हूँ, उस दिन तक तो दगे का कोई लक्षण न था।

    राधा-जिस दिन श्राप गये, उसी दिन पंजाब से मौलवी दीनमुहम्मद साहब का श्रागमन हुअा। खुले मैदान मे मुसलमानों का एक बड़ा जलसा हुया । उसमें मौलाना साहब ने न जाने क्या लहर उगला कि तभी से मुसलमानो को कुरबानी की धुन सवार है। इधर हिन्दुत्रों को भी यह जिद है कि चाहे खून की नदी बह जाय, पर कुरबानी न होने पायेगी। दोनों तरफ से तैयारियाँ हो रही है, हम लोग तो समझाकर हार गये।

    यशोदानन्दन ने पूछा-ख्वाना महमूद कुछ न बोले ।

    राधा-वही तो उस जलसे के प्रधान थे।

    यशोदानन्दन आँखें फाड़कर बोले-ख्वाजा महमूद !

    राधा~जी हॉ, ख्वाना महमूद | आप उन्हें फरिश्ता समझे, असल में वे रेंगे सियार हैं। हम लोग हमेशा से कहते पाते हैं कि इनसे होशियार र हए, लेकिन आपको न जाने क्यों उन पर इतना विश्वास था ।

    यशोदानन्दन ने श्रात्म ग्लानि से पीड़ित होकर कहा-जिस आदमी को श्राज २५ बरसों से देखता अाता हूँ, जिसके साथ कालेज में पढा, जो इसी समिति का किसी जमाने में मेम्बर था, उसपर क्योंकर विश्वास न करता। दुनिया कुछ कहे, पर मुझे ख्वाजा महमूद पर कभी शक न होगा।

    राधा-आपको अख्तियार है कि उन्हें देवता समझे, मगर अभी अभी आप देखेंगे कि वह कितनी मुस्तैदी से कुरबानी की तैयारियों कर रहे हैं। उन्होने देहातों से लठैत बुलाये हैं, उन्हीं ने गौएँ मोल ली हैं और उन्हीं के द्वार पर कुरबानी होने जा रही है।

    यशादा०– ख्वाना महमूद के द्वार पर कुरबानी होगी। उनके द्वार पर इसके पहले या तो मेरी कुरबानी हो जायगी, या ख्वाजा महमूद की। तॉगेवाले को बुलाओ।

    राधा-बहुत अच्छा हो यदि आप इस समय यही ठहर जायें ।

    यशादा०-वाह-वाह ! शहर में आग लगी हुई है और तुम कहते हो, मैं यहीं रह जाऊँ । जो औरो पर बीतेगी वही मुझपर भी बीतेगी, इससे क्या भागना । तुम लोगों ने बड़ी भूल की कि मुझे पहले से सूचना न दी ।

    राधा-कल दोपहर तक तो हमें खुद हो न मालूम था कि क्या गुल खिल रहा है। ख्वाजा साहब के पास गये तो उन्होंने विश्वास दिलाया कि कुरबानी न होने पायेगी, आप लोग इत्मीनान रखें । हमसे तो यह कहा, उधर शाम ही को लठैत श्रा पहुँचे और मुसलमानों का डेपुटेशन सिटी मैजिस्ट्रेट के पास कुरबानी की सूचना देने पहुँच गया ।

    यशादा.-महमूद भी डेपुटेशन में थे ? राधा-~वही तो उसके कर्ता-धर्ता थे, भला वही क्यों न होते ? हमारा तो विचार है कि वही इस फिसाद की जड़ हैं।

    यशोदा–अगर महमूद मे सचमुच यह काया पलट हो गयी है, तो मैं यही कहूँगा कि धर्म से ज्यादा द्वेष पैदा करनेवालो वस्तु ससार में नहीं। और कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो महमूद में द्वेष के भाव पैदा कर सके । चलो, पहले उन्हीं से बातें होगी। मेरे द्वार पर तो इस वक्त बड़ा जमाव होगा।

    राधा-जी हॉ, इधर आपके द्वार पर जमाव है, उधर ख्वाजा साहब के ! बीच मे थोडी-सी जगह खाली है। ' तीनों श्रादमी तांगे पर बैठकर चले | सड़कों पर पुलिस के जवान चक्कर लगा रहे थे । मुसाफिरों की छड़ियाँ छीन ली जाती थी। दो-चार आदमी भी साथ न खड़े होने पाते थे। सिपाही तुरन्त ललकारता था। दुकानें सब बन्द थीं, कुंजड़े भी साग वेचते न नजर आते थे । हॉ, गलियों में लोग जमा हो-होकर बातें कर रहे थे।

    कुछ दूर तक तीनो श्रादमी मोन धारण किये बैठे रहे। चक्रधर शक्ति होकर इधर उधर ताक रहे थे। जरा भी घोड़ा रुक जाता, तो उनका दिल धड़कने लगता कि किसी ने तॉगा रोक तो नहीं लिया, लेकिन यशोदानन्दन के मुख पर ग्लानि का गहरा चिन्ह दिखायी दे रहा था। उनके मुहल्ले में आज तक कभी कुरबानी न हुई थी। हिंदू और मुसलमान का भेद ही न मालूम होता था। उन्हें आश्चर्य होता था कि और शहरों में कैसे हिन्द-मुसलमानों में झगडे हो जाते हैं। और तीन ही दिन मे यह नौबत आ गयी।

    सहसा उन्होंने उत्तेजित होकर कहा-राधामोहन, देखो, मै तो यहीं उतरा जाता हूँ ! जरा महमूद से मिलूंगा। तुम इन वावू साहब को लेकर घर जाओ । श्राप मेरे एक मित्र के लड़के हैं, यहाँ सैर करने आये हैं। बैठक में आपकी चारपाई डलवा देना और देखो, अगर देवसयोग से मैं लौटकर न आ सकूँ, तो घबराने की बात नहीं । जब लोग खून खच्चर करने पर तुले हुए हैं, तो सब कुछ सम्भव है और में उन अाद-मियों में नहीं हूं कि गौ को हत्या होते देखू और शान्त खड़ा रहूँ। अगर मै लाटकर न पा सक, तो तुम घर में हला देना कि अहल्या का पाणि ग्रहण आप ही के साथ, कर दिया जाय।

    यह कहकर उन्होंने कोचवान से ताँगा रोकने को कहा।

    चक्रधर में भी आपके साथ ही रहना चाहता हूँ।

    यशोदा-नही भैया, तुम मेरे मेहमान हो, तुम्हें मेरे साथ रहने की जरूरत नहीं। तुम चलो, में भी अभी पाता हूँ।

    चक्रधर-क्या पार समझते है कि गौ रक्षा आप ही का धर्म है, मेरा धर्म नहीं ?

    यशोदा-नहीं, यह बात नहीं वेटा । तुम मेरे मेहमान हो और तुम्हारी रक्षा करना मेरा धर्म है। इस वक्त ताँगा धीरे-धीरे ख्वाजा महमूद के मकान के सामने या पहुँचा। हजारों आदमियों का जमाव था। यद्यपि किसी के हाथ में लाठी या डण्डे न थे, पर उनके मुख जिहाद के जोश से तमतमाये हुए थे। यशोदानन्दन को देखते ही कई आदमी उनकी तरफ लपके, लेकिन जब उन्होंने जोर से कहा— तुमसे लड़ने नहीं आया हूँ। कहाँ हैं ख्वाजा महमूद? मुमकिन हो तो जरा उन्हें बुला लो, तो लोग हट गये?

    जरा देर में एक लम्बा सा आदमी, गाढे़ को अचकन पहने, आकर खड़ा हो गया। भरा हुआ बदन था, लम्बी दाढ़ी, जिसके कुछ बाल खिचड़ी हो गये थे और गोरा रंग। मुख से शिष्टता झलक रही थी। यही ख्वाजा महमूद थे।

    यशोदानन्दन ने त्योरियाँ बदलकर कहा—क्यों ख्वाजा साहब, आपको याद है, इस मुहल्ले में कभी कुरबानी हुई है?

    महमूद—जी नहीं, जहाँ तक मेरा ख्याल है, यहाँ कभी कुरबानी नहीं हुई।

    यशोदा॰—तो फिर आज आप यहाँ कुरबानी करने की नयी रम्म क्यों निकाल रहे हैं?

    महमूद—इसलिए कि कुरबानी करना हमारा हक है। अब तक हम आपके जजबात का लिहाज करते थे, अपने माने हुए हक को भूल गये थे, लेकिन जब आप लोग अपने हकों के सामने हमारे जजबात की परवा नहीं करते, तो कोई वजह नहीं कि हम अपने हकों के सामने आपके जजबात की परवा करें। मुसलमानों को शुद्धि करने का आप को पूरा हक हासिल है, लेकिन कम-से कम पाँच सौ बरसों मे आपके यहाँ शुद्धि की कोई मिसाल नहीं मिलती। आप लोगों ने एक मुर्दा हक को जिन्दा किया है। इसीलिए न, कि मुसलमानों की ताकत और असर कम हो जाय। जब आप हमें जेर करने के लिए नये नये हथियार निकाल रहे हैं, तो हमारे लिए इसके सिवा और क्या चारा है कि अपने हथियारों को दूनी ताकत से चलायें।

    यशोदा॰—इसके यह मानी है कि कल आप हमारे द्वारों पर, हमारे मन्दिरों के सामने, कुरबानी करें और हम चुपचाप देखा करें। आप यहाँ हरगिज कुरबानी नहीं कर सकते और करेंगे, तो इसकी जिम्मेदारी आपके सिर होगी।

    यह कहकर यशोदानन्दन फिर ताँगे पर बैठे। दस-पाँच आदमियों ने ताँगे को रोकना चाहा, पर कोचवान ने घोड़ा तेज कर दिया। दम के दम ताँगा उड़ता हुया यशोदानन्दन के द्वार पर पहुँच गया, जहाँ हजारो आदमी खड़े थे। इन्हें देखते हो चारों तरफ हलचल मच गयी। लोगों ने चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। अभी तक फोज का अफसर न था, फौज दुविधे में पड़ी हुई थी, समझ में न आता था कि क्या करें। सेनापति के आते ही सिपाहियों में जान-सी पड़ गयी, जैसे सूखे धान मे पानी पड़ जाय।

    यशोदानन्दन ताँगे से उतर पड़े और ललकारकर बोले—क्यों भाइयो, क्या विचार है? यहाँ कुरबानी होगी? आप जानते हैं, इस मुहल्ले में आज तक कभी कुर वानी नहीं हुई । अगर आज हम यहाँ कुरबानी करने देंगे, तो कौन कह सकता है कि कल को हमारे मन्दिर के सामने गौ-हत्या न होगी!

    कई आवाजें एक साथ आयी- हम मर मिटेंगे, पर यहाँ कुरबानी न होने देंगे।

    यशोदा– खूब सोच लो, क्या करने जा रहे हो। वह लोग सब तरह से लैस.हैं । ऐसा न हो कि तुम लाठियो के पहले ही वार में वहाँ से भाग खडे हो ?

    कई आवाजें एक साथ न्यायी-भाइयो, सुन लो; अगर कोई पीछे कदम हटायेगा,तो उसे गौ-हत्या का पाप लगेगा।

    एक सिक्ख जवान-अजी देखिए, छक्के छुड़ा देगे।

    एक पजाबी हिन्दू-एक एक को गरदन तोड के रख दूंगा।

    आदमियों को यों उत्तेजित करके यशोदानन्दन आगे बढे और जनता 'महावीर'और 'श्रीरामचन्द्र' की जय ध्वनि से वायुमण्डल को कम्पायमान करती हुई उनके पीछे चली। उधर मुसलमानो ने भी डण्डे सँभाले । करीब था कि दोनों दलो मे मुठभेड़ हो जाय कि एकाएक चक्रधर आगे बढ़कर यशोदानन्दन के सामने खड़े हो गये और विनीत, किन्तु दृढ़ भाव से बोले-आप अगर उधर जाते हैं, तो मेरी छाती पर पाँव रखकर जाइए । मेरे देखते यह अनर्थ न होने पायेगा ।

    यशोदानन्दन ने चिढ़कर कहा हट जानो। अगर एक क्षण की भी देर हुई, तो फिर पछताने के सिवा और कुछ हाथ न आयेगा।

    चक्रधर-पाप लोग वहाँ जाकर करेंगे क्या ?

    यशोदा० — हम इन जालिमों से गौ को छीन लेंगे।

    चक्रधर-अहिसा का नियम गौत्री ही के लिए नहीं, मनुष्यों के लिए भी तो है ।

    यशोदा-कैसी बातें करते हो, जी! क्या यहाँ खडे होकर अपनी ऑखो से गो की हत्या होते देखें?

    चक्रधर-अगर आप एक बार दिल थामकर देख लेंगे, तो यकीन है कि फिर.आपको कभी यह दृश्य न देखना पडे । ।

    यशोदा-हम इतने उदार नहीं है ।

    चक्रधर-ऐसे अवसर पर भी ?

    थशोदा०-हम महान्-से-महान् उद्देश्य के लिए भी यह मूल्य नहीं दे सकते । इन दामों स्वर्ग भी महँगा है।

    चक्रधर-मित्रो, जरा विचार से काम लो।

    कई अावाजे-विचार से काम लेना कायरों का काम है।

    एक सिक्ख जवान-जब डण्डे से काम लेने का मौका पाए, तो विचार को बन्द करके रख देना चाहिए।

    चक्रधर-तो फिर जाइए; लेकिन उस गौ को बचाने के लिए आप को अपने एक -भाई का खून करना पड़ेगा। सहसा एक पत्थर किसी तरफ से आकर चक्रवर के सिर मे लगा। खून की धारा बह निकली, लेकिन चक्रधर अपनी जगह से हिले नहीं । सिर थामकर बोले-अगर मेरे रक्त से आपकी क्रोधाग्नि शान्त होती हो, तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। अगर मेरा खून और कई जानों की रक्षा कर सके, तो इससे उत्तम कौन सी मृत्यु होगी।

    फिर दूसरा पत्थर श्राया, पर अव को चक्रधर को चोट न लगी। पत्थर कानों के पास से निकल गया ।

    यशोदानन्दन गरजकर बोले- यह कौन पत्थर फेंक रहा है ? सामने क्यों नहीं याता? क्या वह समझता है कि उसी ने गो रक्षा का ठीका ले लिया है ? अगर वह बड़ा वीर है तो क्यों नहीं चन्द कटम प्रागे श्राफर अपनी वीरता दिखाता ? पीछे खड़ा पत्थर क्यों फेकता है ?

    एक अावाज-धर्म-द्रोहियों को मारना अधर्म नहीं है ?

  • कुछ विचार

    कुछ विचार

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    कुछ विचार
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    उपन्यास

    उपन्यास की परिभाषा विद्वानों ने कई प्रकार से की है, लेकिन यह क़ायदा है कि जो चीज़ जितनी ही सरल होती है, उसकी परिभाषा उतनी ही मुश्किल होती है। कविता की परिभाषा आज तक नहीं हो सकी। जितने विद्वान हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं। किन्हीं दो विद्वानों की रायें नहीं मिलतीं। उपन्यास के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। इसकी कोई ऐसो परिभाषा नहीं हैं जिस पर सभी लोग सहमत हों।

    मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र-मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।

    किन्हीं भी दो आदमियों की सूरतें नहीं मिलतीं, उसी भाँति आद- मियों के चरित्र भी नहीं मिलते। जैसे सब आदमियों के हाथ, पाँव, आँखें, कान, नाक, मुँह होते हैं––पर उतनी समानता पर भी जिस तरह उनमें विभिन्नता मौजूद रहती है, उसी भाँति, सब आदमियों के चरित्र में भी बहुत कुछ समानता होते हुए कुछ विभिन्नताएँ होती हैं। यही चरित्र-सम्बन्धी समानता और विभिन्नता––अभिन्नत्व में भिन्नत्व और विभिन्नत्व में अभिन्नत्व, दिखाना उपन्यास का मुख्य कर्तव्य है।

    सन्तान-प्रेम मानव-चरित्र का एक व्यापक गुण है। ऐसा कौन प्राणी होगा जिसे अपनी सन्तान प्यारी न हो। लेकिन इस सन्तान-प्रेम की मात्राएँ हैं––उसके भेद हैं। कोई तो सन्तान के लिए मर मिटता है, उसके लिए कुछ छोड़ जाने के लिए आप नाना प्रकार के कष्ट झेलता है, लेकिन, धर्म-भीरुता के कारण अनुचित रीति से धन-संचय नहीं करता; उसे शंका होती है कि कहीं इसका परिणाम हमारी सन्तान के लिए बुरा न हो। कोई ऐसा होता है कि औचित्य का लेश-मात्र भी

    विचार नहीं करता––जिस तरह भी हो कुछ धन संचय कर जाना अपना ध्येय समझता है, चाहे इसके लिए उसे दूसरों का गला ही क्यों न काटना पड़े––वह सन्तान-प्रेम पर अपनी आत्मा को भी बलिदान कर देता है। एक तीसरा सन्तान-प्रेम वह है जहाँ सन्तान का चरित्र प्रधान कारण होता है––जब कि पिता सन्तान का कुचरित्र देखकर उससे उदासीन हो जाता है––उसके लिये कुछ छोड़ जाना या कर जाना व्यर्थ समझता है। अगर आप विचार करेंगे तो इसी सन्तान-प्रेम के अगणित भेद आपको मिलेंगे। इसी भाँति अन्य मानव-गुणों की भी मात्राएँ और भेद हैं। हमारा चरित्राध्ययन जितना ही सूक्ष्म––जितना ही विस्तृत होगा, उतनी सफलता से हम चरित्रों का चित्रण कर सकेंगे। सन्तान-प्रेम की एक दशा यह भी है जब पुत्र को कुमार्ग पर चलते देख कर पिता उसका घातक शत्रु हो जाता है। वह भी सन्तान-प्रेम ही है जब पिता के लिए पुत्र घी का लड्डू होता है, जिसका टेढ़ापन उसके स्वाद में बाधक नहीं होता। वह सन्तान-प्रेम भी देखने में आता है जहाँ शराबी, जुआरी पिता पुत्र-प्रेम के वशीभूत होकर ये सारी बुरी आदतें छोड़ देता है।

    अब यहाँ प्रश्न होता है उपन्यासकार को इन चरित्रों का अध्ययन करके उनको पाठक के सामने रख देना चाहिए––उसमें अपनी तरफ़ से काट-छाँट, कमी वेशी कुछ न करनी चाहिए, या किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये चरित्रों में कुछ परिवर्तन भी कर देना चाहिए?

    यहीं से उपन्यासों के दो गरोह हो गये हैं। एक आदर्शवादी, दूसरा यथार्थवादी।

    यथार्थवादी चरित्रों को पाठक के सामने उनके यथार्थ नग्न रूप में रख देता है। उसे इससे कुछ मतलब नहीं कि सच्चरित्रता का परिणाम बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा––उसके चरित्र अपनी कमज़ोरियाँ या ख़ुबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन-लीला समाप्त करते हैं। संसार में सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नहीं होता; बल्कि इसके विपरीत हुआ करता है––नेक आदमी धक्के खाते हैं, यातनाएँ सहते हैं, मुसीबतें झेलते हैं, अपमानित होते हैं,––उनको नेकी का फल उलटा मिलता है, बुरे आदमी चैन करते हैं, नामवर होते हैं, यशस्वी बनते हैं––उनको बदी का फल उलटा मिलता है। (प्रकृति का नियम विचित्र है!) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियों में जकड़ा होता है और चूँकि संसार में बुरे चरित्रों की ही प्रधानता है––यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र में भी कुछ न कुछ दाग़-धब्बे रहते हैं, इसलिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नज़र आने लगती है।

    इसमें सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिये यथार्थवाद अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं काला दिखायें जितना वह वास्तव में है। लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है। फिर मानव-स्वभाव की एक विशेषता यह भी है कि वह जिस छल और क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे संसार में उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले––वह भूल जाय कि मैं चिन्ताओं के बंधन में पड़ा हुआ हूँ; जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हों; जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल में ख्याल होता है कि जब हमें क़िस्से-कहानियों में भी उन्हीं लोगों से साबक़ा है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़े ही क्यों?

    अँधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा होती है कि किसी बाग़ में निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का आनंद उठायें।––इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते हैं, जो स्वार्थ और वासना से रहित होते हैं, जो साधु प्रकृति के होते हैं। यद्यपि ऐसे चरित्र व्यवहार-कुशल नहीं होते, उनकी सरलता उन्हें सांसारिक विषयों में धोखा देती है; लेकिन काँइएपन से ऊबे हुए प्राणियों को ऐसे सरल, ऐसे व्यावहारिक ज्ञान-विहीन चरित्रों के दर्शन से एक विशेष आनंद होता है।

    यथार्थवाद यदि हमारी आँखें खोल देता है,तो आदर्शवाद हमें उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुँचा देता है। लेकिन जहाँ आदर्शवाद में यह गुण है, वहाँ इस बात की भी शंका है कि हम ऐसे चरित्रों को न चित्रित कर बैठें जो सिद्धांतों की मूर्तिमात्र हो––जिनमें जीवन न हो। किसी देवता की कामना करना मुश्किल नहीं है, लेकिन उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।

    इसलिए वही उपन्यास उच्च कोटि के समझे जाते हैं, जहाँ यथार्थ और आदर्श का समावेश हो गया हो। उसे आप 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' कह सकते हैं। आदर्श को सजीव बनाने ही के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिये और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है। उपन्यासकार की सबसे बड़ी विभूति ऐसे चरित्रों की सृष्टि है, जो अपने सद्व्यवहार और सद्विचार से पाठक को मोहित कर ले। जिस उपन्यास के चरित्रों में यह गुण नहीं है वह दो कौड़ी का है।

    चरित्र को उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि वह निर्दोष हो––महान् से महान् पुरुषों में भी कुछ न कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं––चरित्र को सजीव बनाने के लिए उसकी कमज़ोरियों का दिग्दर्शन कराने से कोई हानि नहीं होती। बल्कि यही कमज़ोरियाँ उस चरित्र को मनुष्य बना देतो हैं। निर्दोष चरित्र तो देवता हो जायगा और हम उसे समझ ही न सकेंगे। ऐसे चरित्र का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। हमारे प्राचीन साहित्य पर आदर्श की छाप

    लगी हुई है। वह केवल मनोरंजन के लिए न था। उसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ आत्मपरिष्कार भी था। साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसख़रों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है।—कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिये। इस मनोरथ को सिद्ध करने के लिए ज़रूरत है कि उसके चरित्र positive हों, जो, प्रलोभनों के आगे सिर न झुकायें; बल्कि उनको परास्त करें; जो वासनाओं के पंजे में न फँसे; बल्कि उनका दमन करे; जो किसी विजयी सेनापति की भाँति शत्रुओं का संहार करके विजय-नाद करते हुए निकले। ऐसे ही चरित्रों का हमारे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

    साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाय। 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलम्बित हो; ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और विराग, दुःख और लज्जा––ये सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं, इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती।

    जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आज-कल परिस्थितियाँ इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नये-नये विचार पैदा हो रहे हैं, कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख ही नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियों का असर न पड़े—वह उनसे आन्दोलित न हो। यही कारण है कि आजकल भारतवर्ष के ही नहीं, यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान् भी अपनी रचना द्वारा किसी 'वाद' का प्रचार कर रहे हैं। वे इसकी परवा नहीं करते कि इससे हमारी रचना जीवित रहेगी या नहीं; अपने मत की पुष्टि करना ही उनका ध्येय है, इसके सिवाय उन्हें कोई इच्छा नहीं। मगर यह क्योंकर मान लिया जाय कि जो उपन्यास किसी विचार के प्रचार के लिए लिखा जाता है, उसका महत्त्व क्षणिक होता है? विक्टर ह्यगो का 'ला मिज़रेबुल', टालस्टाय के अनेक ग्रन्थ, डिकेन्स की कितनी ही रचनाएँ, विचार-प्रधान होते हुए उच्च कोटि की साहित्यिक हैं और अब तक उनका आकर्षण कम नहीं हुआ। आज भी शॉ, वल्स आदि बड़े-बड़े लेखकों के ग्रन्थ प्रचार ही के उद्देश्य से लिखे जा रहे हैं।

    हमारा ख्याल है कि क्यों न कुशल साहित्यकार कोई विचार-प्रधान रचना भी इतनी सुन्दरता से करे जिसमें मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों का संघर्ष निभता रहे? 'कला के लिए कला' का समय वह होता है जब देश सम्पन्न और सुखी हो। जब हम देखते हैं कि हम भाँति-भाँति के राजनीतिक और सामाजिक बंधनों में जकड़े हुए हैं, जिधर निगाह उठती है दुःख और दरिद्रता के भीषण दृश्य दिखाई देते हैं, विपत्ति का करुण क्रंदन सुनाई देता है, तो कैसे संभव है कि किसी विचारशील प्राणी का हृदय न दहल उठे? हाँ, उपन्यासकार को इसका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये कि उसके विचार परोक्ष रूप से व्यक्त हों, उपन्यास की स्वाभाविकता में उस विचार के समावेश से कोई विघ्न न पड़ने पाये; अन्यथा उपन्यास नीरस हो जायगा।

    डिफेंस इंग्लैंड का बहुत प्रसिद्ध उपन्यासकार हो चुका है। 'पिकविक पेपर्स' उसकी एक अमर हास्य-रस-प्रधान रचना है। 'पिकविक' का नाम एक शिकरम गाड़ी के मुसाफिरों की ज़ुबान से डिकेंस के कान में आया। बस, नाम के अनुरूप ही चरित्र, आकार, वेष—सबकी रचना हो गई। 'साइलस मार्नर' भी अँगरेज़ी का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। जार्ज इलियट ने, जो इसकी लेखिका हैं, लिखा है कि अपने बचपन में उन्होंने एक फेरी लगानेवाले जुलाहे को पीठ पर कपड़े के थान लादे हुए कई बार देखा था। वह तसवीर उनके हृदय-पट पर अङ्कित हो गई थी और समय पर इस उपन्यास के रूप में प्रकट हुई। 'स्कारलेट लेटर' भी हॅथर्न की बहुत ही सुंदर, मर्मस्पर्शिनी रचना है। इस पुस्तक का बीजांकुर उन्हें एक पुराने मुकदमे की मिसिल से मिला। भारतवर्ष में अभी उपन्यासकारों के जीवन-चरित्र लिखे नहीं गये, इसलिए भारतीय उपन्यास-साहित्य से कोई उदाहरण देना कठिन है। 'रङ्गभूमि' का बीजांकुर हमें एक अंधे भिखारी से मिला जो हमारे गाँव में रहता था। एक ज़रा-सा इशारा, एक ज़रा-सा बीज, लेखक के मस्तिष्क में पहुँचकर इतना विशाल वृक्ष बन जाता है कि लोग उस पर आश्चर्य करने लगते हैं। 'एम॰ ऐंड्रूज हिम' रडयार्ड किपलिंग की एक उत्कृष्ट काव्य-रचना है। किपलिंग साहब ने अपने एक नोट में लिखा है कि एक दिन एक इञ्जीनियर साहब ने रात को अपनी जीवन-कथा सुनाई थी। वही उस काव्य का आधार थी। एक और प्रसिद्ध उपन्यासकार का कथन है कि उसे अपने उपन्यासों के चरित्र अपने पड़ोसियों में मिले। वह घण्टों अपनी खिड़की के सामने बैठे लोगों को आते-जाते सूक्ष्म दृष्टि से देखा करते और उनकी बातों को ध्यान से सुना करते थे। 'जेन आयर' भी उपन्यास के प्रेमियों ने अवश्य पढ़ी होगी। दो लेखिकाओं में इस विषय पर बहस हो रही थी कि उपन्यास की नायिका रूपवती होनी चाहिये या नहीं। 'जेन आयर' की लेखिका ने कहा, 'मैं ऐसा उपन्यास लिखूँगी जिसकी नायिका रूपवती न होते हुए भी आकर्षक होगी।' इसका फल था 'जेन आयर।'

    बहुधा लेखकों को पुस्तकों से अपनी रचनाओं के लिए अंकुर मिल जाते हैं। हाल केन का नाम पाठकों ने सुना है। आपकी एक उत्तम रचना का हिन्दी अनुवाद हाल ही में 'अमरपुरी' के नाम से हुआ है। आप लिखते हैं कि मुझे बाइबिल से प्लाट मिलते हैं। 'मेटरलिंक' बेलजियम के जगद्विख्यात नाटककार हैं। उन्हें बेलजियम का शेक्सपियर कहते हैं। उनका 'मोमाबोन' नामक ड्रामा ब्राउनिंग की एक कविता से प्रेरित हुआ था और 'मेरी मैगडालीन' एक जर्मन ड्रामा से! शेक्सपियर के नाटकों का मूल स्थान खोज-खोजकर कितने ही विद्वानों ने 'डाक्टर' की उपाधि प्राप्त कर ली है। कितने वर्तमान औपन्यासिकों और नाटककारों ने शेक्सपियर से सहायता ली है, इसकी खोज करके भी कितने ही लोग 'डाक्टर' बन सकते हैं। 'तिलिस्म होशरुबा' फारसी का एक वृहत् पोथा है जिसके रचयिता अकबर के दरबार वाले फैज़ी कहे जाते हैं, हालाँकि हमें यह मानने में संदेह है। इस पोथे का उर्दू में भी अनुवाद हो गया है। कम से कम २०,००० पृष्ठों की पुस्तक होगी। स्व॰ बाबू देवकीनंदन खत्री ने 'चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता-संतति' का बीजांकुर 'तिलिस्म होशरुबा' से ही लिया होगा, ऐसा अनुमान होता है।

    संसार-साहित्य में कुछ ऐसी कथाएँ हैं जिन पर हज़ारों बरसों से लेखकगण आख्यायिकाएँ लिखते आये हैं और शायद हज़ारों वर्षों तक लिखते जायँगे। हमारी पौराणिक कथाओं पर न जाने कितने नाटक और कितनी कथाएँ रची गई हैं। यूरोप में भी यूनान की पौराणिक गाथा कवि-कल्पना के लिए अशेष आधार है। 'दो भाइयों की कथा', जिसका पता पहले मिश्र देश के तीन हज़ार वर्ष पुराने लेखों से मिला था, फ्रान्स से भारतवर्ष तक की एक दर्जन से अधिक प्रसिद्ध भाषाओं के साहित्य में समाविष्ट हो गई है। यहाँ तक कि बाइबिल में उस कथा की एक घटना ज्यों की त्यों मिलती है।

    किन्तु, यह समझना भूल होगी कि लेखकगण आलस्य या कल्पना-शक्ति के अभाव के कारण प्राचीन कथाओं का उपयोग करते हैं। बात यह है कि नये कथानक में वह रस, वह आकर्षण, नहीं होता जो पुराने कथानकों में पाया जाता है। हाँ, उनका कलेवर नवीन होना चाहिए। 'शकुंतला' पर यदि कोई उपन्यास लिखा जाय, तो वह कितना मर्मस्पर्शी होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं।

    रचना-शक्ति थोड़ी-बहुत सभी प्राणियों में रहती है। जो उसमें अभ्यस्त हो चुके हैं उन्हें तो फिर झिझक नहीं रहती—क़लम उठाया और लिखने लगे; लेकिन नये लेखकों को पहले कुछ लिखते समय ऐसी झिझक होती है मानो वे दरिया में कूदने जा रहे हों। बहुधा एक तुच्छ-सी घटना उनके मस्तिष्क पर प्रेरक का काम कर जाती है। किसीका नाम सुनकर, कोई स्वप्न देखकर, कोई चित्र देखकर, उनकी कल्पना जाग उठती है। किसी व्यक्ति पर किस प्रेरणा का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, यह उस व्यक्ति पर निर्भर है। किसी की कल्पना दृश्य विषयों से उभरती है, किसी की गंध से, किसी की श्रवण से,—किसी की नये, सुरम्य स्थान की सैर से इस विषय में यथेष्ट सहायता मिलती है। नदी के तट पर अकेले भ्रमण करने से बहुधा नई-नई कल्पनाएँ जाग्रत् होती हैं।

    ईश्वरदत्त शक्ति मुख्य वस्तु है। जब तक यह शक्ति न होगी उपदेश, शिक्षा, अभ्यास सभी निष्फल जायगा। मगर यह प्रकट कैसे हो कि किसमें यह शक्ति है, किसमें नहीं? कभी इसका सबूत मिलने में बरसों गुजर जाते हैं और बहुत परिश्रम नष्ट हो जाता है। अमेरिका के एक पत्र-संपादक ने इसकी परीक्षा करने का नया ढंग निकाला है। दल के दल युवकों में से कौन रत्न है और कौन पाषाण? वह एक काग़ज़ के टुकड़े पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम लिख देता है और उम्मेदवार को वह टुकड़ा देकर उस नाम के सम्बंध में ताबड़तोड़ प्रश्न करना शुरू करता है—उसके बालों का रंग क्या है? उसके कपड़े कैसे हैं? कहाँ रहती है? उसका बाप क्या काम करता है? जीवन में उसकी मुख्य अभिलाषा क्या है? आदि। यदि युवक महोदय ने इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर न दिये, तो उन्हें अयोग्य समझकर बिदा कर देता है। जिसकी निरीक्षण-शक्ति इतनी शिथिल हो, वह उसके विचार में उपन्यास-लेखक नहीं बन सकता। इस परीक्षा-विभाग में नवीनता तो अवश्य है; पर भ्रामकता की मात्रा भी कम नहीं है।

    लेखकों इन लिए एक नोटबुक का रहना बहुत आवश्यक है। यद्यपि इन पंक्तियों के लेखक ने कभी नोटबुक नहीं रखी; पर इसकी ज़रूरत को वह स्वीकार करता है। कोई नई चीज़, कोई अनोखी सूरत, कोई सुरम्य दृश्य देखकर नोटबुक में दर्ज कर लेने से बड़ा काम निकलता यूरोप में लेखकों के पास उस वक्त तक नोटबुक अवश्य रहती है

    जब तक उनका मस्तिष्क इस योग्य नहीं बनता कि हर एक प्रकार की चीज़ों को वे अलग-अलग ख़ानों में संगृहीत कर लें। बरसों के अभ्यास के बाद यह योग्यता प्राप्त हो जाती है इसमें सन्देह नहीं; लेकिन आरम्भकाल में तो नोटबुक का रखना परमावश्यक है। यदि लेखक चाहता है कि उसके दृश्य सजीव हों, उसके वर्णन स्वाभाविक हों, तो उसे अनिवार्यतः इससे काम लेना पड़ेगा। देेखिये, एक उपन्यासकार की नोटबुक का नमूना—

    'अगस्त २१, १२ बजे दिन, एक नौका पर एक आदमी, श्याम वर्ण, सुफेद बाल, आँखें तिरछी, पलकें भारी, ओठ ऊपर को उठे हुए और मोटे, मूँछे ऐंठी हुईं।

    'सितम्बर १, समुद्र का दृश्य, बादल श्याम और श्वेत, पानी में सूर्य का प्रतिविम्ब काला, हरा, चमकीला; लहरें फेनदार, उनका ऊपरी भाग उजला। लहरों का शोर, लहरों के छींटे से झाग उड़ती हुई।'

    उन्हीं महाशय से जब पूछा गया कि आपको कहानियों के प्लाट कहाँ मिलते हैं? तो आपने कहा, 'चारों तरफ।—अगर लेखक अपनी आँखें खुली रखे, तो उसे हवा में से भी कहानियाँ मिल सकती हैं। रेलगाड़ी में, नौकाओं पर, समाचार-पत्रों में, मनुष्य के वार्तालाप में और हज़ारों जगहों से सुन्दर कहानियाँ बनाई जा सकती हैं। कई सालों के अभ्यास के बाद देख-भाल स्वाभाविक हो जाती है, निगाह आप ही आप अपने मतलब की बात छाँट लेती है। दो साल हुए, मैं एक मित्र के साथ सैर करने गया। बातों ही बातों में यह चर्चा छिड़ गई कि यदि दो के सिवा संसार के और सब मनुष्य मार डाले जायँ तो क्या हो? इस अंकुर से मैंने कई सुन्दर कहानियाँ सोच निकाली।'

    इस विषय में तो उपन्यास-कला के सभी विशारद सहमत हैं कि उपन्यासों के लिए पुस्तकों से मसाला न लेकर जीवन ही से लेना चाहिये। वालटर बेसेंट अपनी 'उपन्यास-कला' नामक पुस्तक में लिखते हैं—

    'उपन्यासकार को अपनी सामग्री, आले पर रखी हुई पुस्तकों से

    नहीं, उन मनुष्यों के जीवन से लेनी चाहिए जो उसे नित्य ही चारों तरफ मिलते रहते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकांश लोग अपनी आँखों से काम नहीं लेते। कुछ लोगों को यह शंका भी होती है कि मनुष्यों में जितने अच्छे नमूने थे वे तो पूर्वकालीन लेखकों ने लिख डाले, अब हमारे लिए क्या बाक़ी रहा? यह सत्य है; लेकिन अगर पहले किसी ने बूढ़े कंजूस, उड़ाऊ युवक, जुआरी, शराबी, रंगीन युवती आदि का चित्रण किया है, तो क्या अब उसी वर्ग के दूसरे चरित्र नहीं मिल सकते? पुस्तकों में नये चरित्र न मिलें; पर जीवन में नवीनता का अभाव कभी नहीं रहा।'

    हेनरी जेम्स ने इस विषय में जो विचार प्रकट किये हैं, वह भी देखिये—

    'अगर किसी लेखक की बुद्धि कल्पना-कुशल है तो वह सूक्ष्मतम भावों से जीवन को व्यक्त कर देती है, वह वायु के स्पंदन को भी जीवन प्रदान कर सकती है। लेकिन कल्पना के लिए कुछ आधार अवश्य चाहिये। जिस तरुणी लेखिका ने कभी सैनिक छावनियाँ नहीं देखीं उससे यह कहने में कुछ भी अनौचित्य नहीं है कि आप सैनिक जीवन में हाथ न डालें। मैं एक अँग्रेज़ उपन्यासकार को जानता हूँ जिसने अपनी एक कहानी में फ्रान्स के प्रोटेस्टेंट युवकों के जीवन का अच्छा चित्र खींचा था। उस पर साहित्यिक संसार में बड़ी चर्चा रही। उससे लोगों ने पूछा—आपको इन समाज के निरीक्षण करने का ऐसा अवसर कहाँ मिला? (फ्रान्स रोमन कैथोलिक देश है और प्रोटेस्टेंट वहाँ साधारणतः नहीं दिखाई पड़ते।) मालूम हुआ कि उसने एक बार, केवल एक बार, कई प्रोटेस्टेंट युवकों को बैठे और बातें करते देखा था। बस, एक बार का देखना उसके लिए पारस हो गया। उसे वह आधार मिल गया जिस पर कल्पना अपना विशाल भवन निर्माण था ती है। उसमें वह ईश्वरदत्त शक्ति मौजूद थी जो एक इञ्च से एक योजन की ख़बर लाती है और जो शिल्पी के लिए बड़े महत्त्व की वस्तु है।'

    मिस्टर जी॰ के॰ चेस्टरटन जासूसी कहानियाँ लिखने में बड़े प्रवीण

    हैं। आपने ऐसी कहानियाँ लिखने का जो नियम बताया है वह बहुत शिक्षाप्रद है। हम उसका आशय लिखते हैं—

    'कहानी में जो रहस्य हो उसे कई भागों में बाँटना चाहिये। पहले छोटी-सी बात खुले, फिर उससे कुछ बड़ी और अंत में रहस्य खुल जाय। लेकिन हरएक भाग में कुछ न कुछ रहस्योंद्धाटन अवश्य होना चाहिये जिसमें पाठक की इच्छा सब-कुछ जानने के लिए बलवती होती चली जाय। इस प्रकार की कहानियों में इस बात का ध्यान रखना परमावश्यक है कि कहानी के अंत में रहस्य खोलने के लिए कोई नया चरित्र न लाया जाय। जासूसी कहानियों में यही सबसे बड़ा दोष है। रहस्य के खुलने में तभी मज़ा है जब कि वही चरित्र अपराधी सिद्ध हो जिस पर कोई भूलकर भी सन्देह न कर सकता था।'

    उपन्यास-कला में यह बात भी बड़े महत्त्व की है कि लेखक क्या लिखे और क्या छोड़ दे। पाठक कल्पनाशील होता है। इसलिए वह ऐसी बातें पढ़ना पसन्द नहीं करता जिनकी वह आसानी से कल्पना कर सकता है। वह यह नहीं चाहता कि लेखक सब-कुछ ख़ुद कह डाले और पाठक की कल्पना के लिए कुछ भी बाक़ी न छोड़े। वह कहानी का ख़ाका-मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल लेखक वही है जो यह अनुमान कर ले कि कौन-सी बात पाठक स्वयं सोच लेगा और कौन-सी बात उसे लिखकर स्पष्ट कर देनी चाहिये। कहानी या उपन्यास में पाठक की कल्पना के लिए जितनी ही अधिक सामग्री हो उतनी ही वह कहानी रोचक होगी। यदि लेखक आवश्यकता से कम बतलाता है तो कहानी आशयहीन हो जाती है, ज़्यादा बतलाता है तो कहानी में मज़ा नहीं आता। किसी चरित्र की रूपरेखा या किसी दृश्य को चित्रित करते समय हुलिया-नवीसी करने की ज़रूरत नहीं। दो-चार वाक्यों में मुख्य-मुख्य बातें कह देनी चाहियें। किसी दृश्य को तुरत देखकर उसका वर्णन करने से बहुत-सी अनावश्यक बातों के आ जाने की सम्भावना रहती है। कुछ दिनों के बाद अनावश्यक बातें आप ही आप मस्तिष्क से निकल जाती हैं, केवल मुख्य बातें स्मृति पर अंकित रह जाती हैं। तब उस दृश्य के वर्णन करने में अनावश्यक बातें न रहेंगी। आवश्यक और अनावश्यक कथन का एक उदाहरण देकर हम अपना आशय और स्पष्ट करना चाहते हैं—

    दो मित्र संध्या समय मिलते हैं। सुविधा के लिए हम उन्हें 'राम' और 'श्याम' कहेंगे।

    राम—गुड ईवनिंग श्याम, कहो आनन्द तो है?

    श्याम—हलो राम, तुम आज किधर भूल पड़े?

    राम—कहो क्या रङ्ग-ढंग है? तुम तो भले ईद के चाँद हो गये।

    श्याम—मैं तो ईद का चाँद न था, हाँ, आप गूलर के फूल भले ही हो गये।

    राम—चलते हो संगीतालय की तरफ?

    श्याम—हाँ चलो।

    लेखक यदि ऐसे बच्चों के लिए कहानी नहीं लिख रहा है जिन्हें अभिवादन की मोटी-मोटी बातें बताना ही उसका ध्येय है तो वह केवल इतना ही लिख देगा—

    'अभिवादन के पश्चात् दोनों मित्रों ने संगीतालय की राह ली।'

    उपन्यास का विषय

    उपन्यास का क्षेत्र, अपने विषय के लिहाज़ से, दूसरी ललित कलाओं से कही ज़्यादा विस्तृत है। 'वाल्टर बेसेंट' ने इस विषय पर शब्दों में विचार प्रकट किये हैं—

    'उपन्यास के विषय का विस्तार मानव-चरित्र से किसी क़दर कम नहीं है। उसका सम्बन्ध अपने चरित्रों के कर्म और विचार, उनका देवत्व और पशुत्व, उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से है। मनोभाव के विभिन्न रूप और भिन्न-भिन्न दशाओं में उनका विकास उपन्यास के मुख्य विषय हैं।'

    इसी विषय-विस्तार ने उपन्यास को संसार-साहित्य का प्रधान अंग बना दिया है। अगर आपको इतिहास से प्रेम है तो आप अपने उपन्यास में गहरे से गहरे ऐतिहासिक तत्त्वों का निरूपण कर सकते हैं। अगर आपको दर्शन से रुचि है, तो आप उपन्सास में महान दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन कर सकते हैं। अगर आप में कवित्व-शक्ति है तो उपन्यास में उसके लिए भी काफी गुञ्जाइश है। समाज, नीति, विज्ञान, पुरातत्त्व आदि सभी विषयों के लिए उपन्यास में स्थान है। यहाँ लेखक को अपनी क़लम का जौहर दिखाने का जितना अवसर मिल सकता है, उतना साहित्य के और किसी अंग में नहीं मिल सकता; लेकिन इसका यह आशय नहीं कि उपन्यासकार के लिए कोई बन्धन ही नहीं है। उपन्यास का विषय-विस्तार ही उपन्यासकार को बेड़ियों में जकड़ देता है। तंग सड़कों पर चलनेवालों के लिए अपने लक्ष्य पर पहुँचना उतना कठिन नहीं है, जितना एक लम्बे-चौड़े मार्गहीन मैदान में चलनेवालों के लिए।

    उपन्यासकार का प्रधान गुण उसकी सृजन-शक्ति है। अगर उसमें इसका अभाव है, तो वह अपने काम में भी सफल नहीं हो सकता। उसमें और चाहे जितने अभाव हों; पर कल्पना-शक्ति की प्रखरता अनिवार्य है। अगर उसमें यह शक्ति मौजूद है तो वह ऐसे कितने दृश्यों, दशाओं और मनोभावों का चित्रण कर सकता है जिनका उसे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। अगर इस शक्ति की कमी है, तो चाहे उसने कितना ही देशाटन क्यों न किया हो, वह कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसके अनुभव का क्षेत्र कितना ही विस्तृत क्यों न हो, उसकी रचना में सरसता नहीं आ सकती। ऐसे कितने ही लेखक हैं जिनमें मानव-चरित्र के रहस्यों का बहुत मनोरंजक सूक्ष्म और प्रभाव डालनेवाली शैली में बयान करने की शक्ति मौजूद है; लेकिन कल्पना की कमी के कारण वे अपने चरित्रों में जीवन का संचार नहीं कर सकते, जीती-जागती तसवीरें नहीं खींच सकते। उनकी रचनाओं को पढ़कर हमें यह ख्याल नहीं होता कि हम कोई सच्ची घटना देख रहे हैं।

    इसमें सन्देह नहीं कि उपन्यास की रचना-शैली सजीव और प्रभावोत्पादक होनी चाहिये; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम शब्दों का गोरखधन्धा रचकर पाठक को इस भ्रम में डाल दें कि इसमें ज़रूर कोई न कोई गूढ़ आशय है। जिस तरह किसी आदमी का ठाट-बाट देखकर हम उसकी वास्तविक स्थिति के विषय में ग़लत राय क़ायम कर लिया करते हैं, उसी तरह उपन्यासों के शाब्दिक आडम्बर देखकर भी हम ख़्याल करने लगते हैं कि कोई महत्त्व की बात छिपी हुई है। सम्भव है, ऐसे लेखक को थोड़ी देर के लिए यश मिल जाय; किन्तु जनता उन्हीं उपन्यासों को आदर का स्थान देती है जिनकी विशेषता उनकी गूढ़ता नहीं, उनकी सरलता होती है।

    उपन्यासकार को इसका अधिकार है कि वह अपनी कथा को घटना-वैचित्र्य से रोचक बनाये; लेकिन शर्त यह है कि प्रत्येक घटना असली ढाँचे से निकट सम्बन्ध रखती हो; इतना ही नहीं, बल्कि उसमें इस तरह घुल-मिल गई हो कि कथा का आवश्यक अंग बन जाय, अन्यथा उपन्यास की दशा उस घर की-सी हो जायगी जिसके हरएक हिस्से अलग-अलग हों। जब लेखक अपने मुख्य विषय से हटकर किसी दूसरे प्रश्न पर बहस करने लगता है तो वह पाठक के उस आनन्द में बाधक हो जाता है जो उसे कथा में आ रहा था। उपन्यास में वही घटनाएँ, वही विचार, लाना चाहिये जिनसे कथा का माधुर्य बढ़ जाय, जो प्लाट के विकास में सहायक हों अथवा चरित्रों के गुप्त मनोभावों का प्रदर्शन करते हों पुरानी कथाओं में लेखक का उद्देश्य घटना-वैचित्र्य दिखाना होता था; इसलिए वह एक कथा में कई उपकथाएँ मिलाकर अपना उद्देश्य पूरा करता था। साम्प्रतकालीन उपन्यासों में लेखक का उद्देश्य मनोभावों और चरित्र के रहस्यों का खोलना होता है; अतएव यह आवश्यक है कि वह अपने चरित्रों को सूक्ष्म दृष्टि से देखे, उसके चरित्रों का कोई भाग उसकी निगाह से न बचने पाये। ऐसे उपन्यास मै उपकथाओं की गुञ्जाइश नहीं होती।

    यह सच है कि संसार की प्रत्येक वस्तु उपन्यास का उपयुक्त विषय बन सकती है। प्रकृति का प्रत्येक रहस्य, मानव-जीवन का हरएक पहलू, जब किसी सुयोग्य लेखक की कलम से निकलता है तो वह साहित्य का रत्न बन जाता है। लेकिन इसके साथ ही विषय का महत्त्व और उसकी गहराई भी उपन्यास के सफल होने में बहुत सहायक होती है। यह ज़रूरी नहीं कि हमारे चरित्रनायक ऊँची श्रेणी के ही मनुष्य हों। हर्ष और शोक, प्रेम और अनुराग, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य-मात्र में व्यापक हैं। हमें केवल हृदय के उन तारों पर चोट लगानी चाहिये जिनकी झंकार से पाठकों के हृदय पर भी वैसा ही प्रभाव हो। सफल उपन्यासकार का सबसे बड़ा लक्षण है कि वह अपने पाठकों के हृदय में उन्हीं भावों को जागरित कर दे जो उसके पात्रों में हो। पाठक भूल जाय कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा है—उसके और पात्रों के बीच में आत्मीयता का भाव उत्पन्न हो जाय।

    मनुष्य की सहानुभूति साधारण स्थिति में तब तक जागरित नहीं होती जब तक कि उसके लिए उस पर विशेष रूप से आघात किया जाय। हमारे हृदय के अंतरतम भाव साधारण दशाओं में आन्दोलित नहीं होते। इसके लिए ऐसी घटनाओं की कल्पना करनी होती है जो हमारा दिल हिला दे, जो हमारे भावों की गहराई तक पहुँच जायँ। अगर किसी अबला की पराधीन दशा का अनुभव कराना हो तो इस घटना से ज़्यादा प्रभाव डालनेवाली और कौन घटना हो सकती है कि शकुन्तला राजा दुष्यंत के दरबार में आकर खड़ी होती है और राजा उसे न पहचानकर उसकी उपेक्षा करता है? खेद है कि आजकल के उपन्यासों में गहरे भावों को स्पर्श करने का बहुत कम मसाला रहता है। अधिकांश उपन्यास गहरे और प्रचण्ड भावों का प्रदर्शन नहीं करते। हम आये-दिन की साधारण बातों ही में उलझकर रह जाते हैं।

    इस विषय में अभी तक मतभेद है कि उपन्यास में मानवीय दुर्बलताओं और कुवासनाओं का, कमज़ोरियों और अपकीर्तियों का, विशद वर्णन वांछनीय है या नहीं; मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि जो लेखक अपने को इन्हीं विषयों में बाँध लेता है वह कभी उस कलाविद् की महानता को नहीं पा सकता जो जीवन-संग्राम में एक मनुष्य की आंतरिक दशा को, सत् और असत् के संघर्ष और अंत में सत्य की विजय को, मार्मिक ढंग से दर्शाता है। यथार्थवाद का यह आशय नहीं है कि हम अपनी दृष्टि को अंधकार की ओर ही केन्द्रित कर दें। अंधकार में मनुष्य को अंधकार के सिवा और सूझ ही क्या सकता है? बेशक, चुटकियाँ लेना, यहाँ तक कि नश्तर लगाना, भी कभी-कभी आवश्यक होता है; लेकिन दैहिक व्यथा चाहे नश्तर से दूर हो जाय, मानसिक व्यथा सहानुभूति और उदारता से ही शान्त हो सकती है। किसी को नीच समझकर हम उसे ऊँचा नहीं बना सकते; बल्कि उसे और नीचे गिरा देंगे। कायर यह कहने से बहादुर न हो जायगा कि 'तुम कायर हो।' हमें यह दिखाना पड़ेगा कि उसमें साहस, बल और धैर्य—सब कुछ है, केवल उसे जगाने की ज़रूरत है। साहित्य का सम्बन्ध सत्य और सुंदर से है, यह हमें न भूलना चाहिये।

    मगर आजकल कुकर्म, हत्या, चोरी, डाके से भरे हुए उपन्यासों को जैसे बाढ़-सी आ गई है। साहित्य के इतिहास में ऐसा कोई समय न था जब ऐसे कुरुचिपूर्ण उपन्यासों की इतनी भरमार रही हो। जासूसी के उपन्यासों में क्यों इतना आनंद आता है? क्या इसका कारण यह है कि पहले से अब लोग ज़्यादा पापासक्त हो गये हैं? जिस समय लोगों को यह दावा है कि मानव-समाज नैतिक और बौद्धिक उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ है, यह कौन स्वीकार करेगा कि हमारी समाज पतन की ओर जा रहा है? शायद, इसका यह कारण हो कि इस व्यावसायिक शांति के युग में ऐसी घटनाओं का अभाव हो गया है जो मनुष्य के कुतूहल-प्रेम को संतुष्ट कर सकें––जो उसमें सनसनी पैदा कर दें। या इसका यह कारण हो सकता है कि मनुष्य की धन-लिप्सा उपन्यास के चरित्रों को धन के लोभ से कुकर्म करते देखकर प्रसन्न होती है। ऐसे उपन्यासों में यही तो होता है कि कोई आदमी लोभ-वश किसी धनाढ्य पुरुष की हत्या कर डालता है, या उसे किसी संकट में फँसाकर उससे मनमानी रकम ऐंठ लेता है। फिर जासूस आते हैं, वकील आते हैं और मुजरिम गिरफ्तार होता है, उसे सज़ा मिलती है। ऐसी रुचि को प्रेम, अनुराग या उत्सर्ग की कथाओं में आनंद नहीं आ सकता। भारत में वह व्यावसायिक वृद्धि तो नहीं हुई; लेकिन ऐसे उपन्यासों की भरमार शुरू हो गई। अगर मेरा अनुमान ग़लत नहीं है तो ऐसे उपन्यासों की खपत इस देश में भी अधिक होती है। इस कुरुचि का परिणाम रूसी उपन्यास लेखक मैक्सिम गोर्की के शब्दों में ऐसे वातावरण का पैदा होना है जो कुकर्म की प्रवृत्ति को द्दढ़ करता है। इससे यह तो स्पष्ट ही है कि मनुष्य में पशु-वृत्तियाँ इतनी प्रबल होती जा रही हैं कि अब उसके हृदय में कोमल भावों के लिए स्थान ही नहीं रहा।

    उपन्यास के चरित्रों का चित्रण जितना ही स्पष्ट, गहरा और विकासपूर्ण होगा उतना ही पढ़नेवालों पर उसका असर पड़ेगा; और यह लेखक की रचना-शक्ति पर निर्भर है। जिस तरह किसी मनुष्य को देखते ही हम उसके मनोभावों से परिचित नहीं हो जाते, ज्यों-ज्यों हमारी घनिष्ठता उससे बढ़ती है, त्यों-त्यों उसके मनोरहस्य खुलते हैं, उसी तरह उपन्यास के चरित्र भी लेखक की कल्पना में पूर्ण रूप से नहीं आ जाते; बल्कि उनमें क्रमशः विकास होता जाता है। यह विकास इतने गुप्त—अस्पष्ट रूप से होता है कि पढ़नेवाले को किसी तबदीली का ज्ञान भी नहीं होता। अगर चरित्रों में किसी का विकास रुक जाय तो उसे उपन्यास से निकाल देना चाहिये, क्योंकि उपन्यास चरित्रों के विकास का ही विषय है। अगर उसमें विकास-दोष है, तो वह उपन्यास कमज़ोर हो जायगा। कोई चरित्र अंत में भी वैसा ही रहे जैसा वह पहले था—उसके बल-बुद्धि और भावों का विकास न हो, तो वह असफल चरित्र है।

    इस दृष्टि से जब हम हिन्दी के वर्तमान उपन्यासों को देखते हैं तो निराशा होती है। अधिकांश चरित्र ऐसे ही मिलेंगे जो काम तो बहुतेरे करते हैं; 'लेकिन जैसे जो काम वे आदि में करते, उसी तरह वही अंत में भी करते हैं।

    कोई उपन्यास शुरू करने के लिए यदि हम उन चरित्रों का एक मानसिक चित्र बना लिया करें तो फिर उनका विकास दिखाने में हमें सरलता होगी। यह कहने की भी ज़रूरत नहीं है, विकास परिस्थिति के अनुसार स्वाभाविक हो, अर्थात्—पाठक और लेखक दोनों इस विषय में सहमत हों। अगर पाठक का यह भाव हो कि इस दशा में ऐसा नहीं होना चाहिये था तो इसका यह आशय हो सकता है कि लेखक अपने चरित्र के अङ्कित करने में असफल रहा। चरित्रों में कुछ न कुछ विशेषता भी रहनी चाहिये। जिस तरह संसार में कोई दो व्यक्ति समान नहीं होते, उसी भाँति उपन्यास में भी न होना चाहिये। कुछ लोग तो बातचीत या शक्ल-सूरत से विशेषता उत्पन्न कर देते हैं; लेकिन असली अंतर तो वह है, जो चरित्रों में हो।

    उपन्यास में वार्तालाप जितना अधिक हो और लेखक की क़लम से जितना ही कम लिखा जाय, उतना ही उपन्यास सुंदर होगा। वार्तालाप केवल रस्मी नहीं होना चाहिये। प्रत्येक वाक्य को—जो किसी चरित्र के मुँह से निकले—उसके मनोभावों और चरित्र पर कुछ न कुछ प्रकाश डालना चाहिये। बातचीत का स्वाभाविक, परिस्थितियों के अनुकूल, सरल और सूक्ष्म होना ज़रूरी है। हमारे उपन्यासों में अकसर बातचीत भी उसी शैली में कराई जाती है मानो लेखक खुद लिख रहा हो। शिक्षित-समाज की भाषा तो सर्वत्र एक है, हाँ भिन्न-भिन्न जातियों की ज़ुबान पर उसका रूप कुछ न कुछ बदल जाता है। बंगाली, मारवाड़ी और ऐंग्लो इण्डियन भी कभी-कभी बहुत शुद्ध हिन्दी बोलते पाये जाते हैं; लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं; पर ग्रामीण बातचीत कभी-कभी हमें दुबिधा में डाल देती है। बिहार की ग्रामीण भाषा शायद दिल्ली के आसपास का आदमी समझ ही न सकेगा।

    वास्तव में कोई रचना रचयिता के मनोभावों का, उसके चरित्र का, उसके जीवनादर्श का, उसके दर्शन का आईना होती है। जिसके हृदय में देश की लगन है उसके चरित्र, घटनावली और परिस्थितियाँ सभी उसी रंग में रँगी हुई नज़र आयेंगी। लहरी आनंदी लेखकों के चरित्रों में भी अधिकांश चरित्र ऐसे ही होंगे जिन्हें जगत्-गति नहीं व्यापती। वे जासूसी, तिलिस्मी चीज़ें लिखा करते हैं। अगर लेखक आशावादी है तो उसकी रचना में आशावादिता छलकती रहेगी, अगर वह शोकवादी है तो, बहुत प्रयत्न करने पर भी, वह अपने चरित्रों को ज़िन्दादिल न बना सकेगा। 'आज़ाद-कथा' को उठा लीजिये, तुरंत मालूम हो जायगा कि लेखक हँसने-हँसानेवाला जीव है जो जीवन को गम्भीर विचार के योग्य नहीं समझता। जहाँ उसने समाज के प्रश्नों को उठाया है वहाँ शैली शिथिल हो गई है।

    जिस उपन्यास को समाप्त करने के बाद पाठक अपने अंदर उत्कर्ष का अनुभव करे, उसके सद्भाव जाग उठें, वही सफल उपन्यास है। जिसके भाव गहरे हैं, प्रखर हैं,—जो जीवन में बद्दू बनकर नहीं, बल्कि सवार बनकर चलता है, जो उद्योग करता है और विफल होता है, उठने की कोशिश करता है और गिरता है, जो वास्तविक जीवन की गहराइयों में डूबा है, जिसने ज़िन्दगी के ऊँच-नीच देखे हैं, सम्पत्ति और विपत्ति का सामना किया है, जिसकी ज़िन्दगी मखमली गद्दों पर

    ही नहीं गुज़रती, वही लेखक ऐसे उपन्यास रच सकता है जिनमें प्रकाश, जीवन और आनंद-प्रदान की सामर्थ्य होगी।

    उपन्यास के पाठकों की रुचि भी अब बदलती जा रही है। अब उन्हें केवल लेखक की कल्पनाओं से संतोष नहीं होता। कल्पना कुछ भी हो, कल्पना ही है। वह यथार्थ का स्थान नहीं ले सकती। भविष्य उन्हीं उपन्यासों का है जो अनुभूति पर खड़े हों।

    इसका आशय यह है कि भविष्य में उपन्यास में कल्पना कम, सत्य अधिक होगा; हमारे चरित्र कल्पित न होंगे, बल्कि व्यक्तियों के जीवन पर आधारित होंगे। किसी हद तक तो अब भी ऐसा होता है; पर बहुधा हम परिस्थितियों का ऐसा क्रम बाँधते हैं कि अंत स्वाभाविक होने पर भी वह होता है जो हम चाहते हैं। हम स्वाभाविकता का स्वाँग जितनी खूबसूरती से भर सके, उतने ही सफल होते हैं; लेकिन भविष्य में पाठक इस स्वाँग से संतुष्ट न होगा।

    यों कहना चाहिये कि भावी उपन्यास जीवन-चरित होगा, चाहे किसी बड़े आदमी का या छोटे आदमी का। उसकी छुटाई-बड़ाई का फ़ैसला उन कठिनाइयों से किया जायगा कि जिन पर उसने विजय पाई है। हाँ, वह चरित्र इस ढंग से लिखा जायगा कि उपन्यास मालूम हो। अभी हम झूठ को सच बनाकर दिखाना चाहते हैं, भविष्य में सच को झूठ बनाकर दिखाना होगा। किसी किसान का चरित्र हो, या किसी देश-भक्त का, या किसी बड़े आदमी का; पर उसका आधार यथार्थ पर होगा। तब यह काम उससे कठिन होगा जितना अब है; क्योंकि ऐसे बहुत कम लोग हैं, जिन्हें बहुत-से मनुष्यों को भीतर से जानने का गौरव प्राप्त हो।

    उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी

    यह बात सभी लोग मानते हैं कि राष्ट्र को दृढ़ और बलवान बनाने के लिए देश में सांस्कृतिक एकता का होना बहुत आवश्यक है। और किसी राष्ट्र की भाषा तथा लिपि इस सांस्कृतिक एकता का एक विशेष अङ्ग है। श्रीमती ख़लीदा अदीब ख़ानम ने अपने एक भाषण में कहा था कि तुर्की जाति और राष्ट्र की एकता तुर्की भाषा के कारण ही हुई है। और यह निश्चित बात है कि राष्ट्रीय भाषा के बिना किसी राष्ट्र के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं हो सकती। जब तक भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा न हो, तब तक वह राष्ट्रीयता का दावा नहीं कर सकता। सम्भव है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष एक राष्ट्र रहा हो; परन्तु बौद्धों के पतन के उपरान्त उसकी राष्ट्रीयता का भी अन्त हो गया था। यद्यपि देश में सांस्कृतिक एकता वर्तमान थी, तो भी भाषाओं के भेद ने देश को खण्ड-खण्ड करने का काम और भी सुगम कर दिया था। मुसलमानों के शासन काल में भी जो कुछ हुआ था, उसमें भिन्न-भिन्न प्रान्तों का राजनीतिक एकीकरण तो हो गया था, परन्तु उस समय भी देश में राष्ट्रीयता का अस्तित्व नहीं था। और सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता की भावना अपेक्षाकृत बहुत थोड़े दिनों से संसार में उत्पन्न हुई है और इसे उत्पन्न हुए लगभग दो सौ वर्षों से अधिक नहीं हुए। भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का आरम्भ अंगरेज़ी राज्य की स्थापना के साथ-साथ हुआ था। और उसी की दृढ़ता के साथ-साथ इसकी भी वृद्धि हो रही है। लेकिन इस समय राजनीतिक पराधीनता के अतिरिक्त देश के भिन्न-भिन्न अङ्गों और तत्त्वों में कोई ऐसा पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है जो उन्हें संघटित करके एक राष्ट्र का स्वरूप दे सके। यदि आज भारतवर्ष से अंगरेज़ी राज्य उठ जाय तो इन तत्त्वों में जो एकता इस समय दिखाई दे रही है, बहुत सम्भव है कि वह विभेद और विरोध का रूप धारण

    कर ले और भिन्न-भिन्न भाषाओं के आधार पर एक ऐसा नया संघटन उत्पन्न हो जाय जिसका एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध ही न हो। और फिर वही खींचातानी शुरू हो जाय जो अंगरेज़ों के यहाँ आने से पहले थी। अतः राष्ट्र के जीवन के लिए यह बात आवश्यक है कि देश में सांस्कृतिक एकता हो। और भाषा की एकता उस सांस्कृतिक एकता का प्रधान स्तम्भ है; इसलिए यह बात भी आवश्यक है कि भारतवर्ष की एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा हो जो देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बोली और समझी जाय। इसी बात का आवश्यक परिणाम यह होगा कि कुछ दिनों में राष्ट्रीय साहित्य की सृष्टि भी आरम्भ हो जायगी और एक ऐसा समय आयेगा, जब कि भिन्न-भिन्न जातियों और राष्ट्रों के साहित्यिक मण्डल में हिन्दुस्तानी भाषा भी बराबरी की हैसियत से शामिल होने के क़ाबिल हो जायगी।

    परन्तु प्रश्न तो यह है कि इस राष्ट्रीय भाषा का स्वरूप क्या हो? आज-कल भिन्न-भिन्न प्रान्तों में जो भाषाएँ प्रचलित हैं उसमें तो राष्ट्रीय-भाषा बनने की योग्यता नहीं, क्योंकि उनके कार्य और प्रचार का क्षेत्र परिमित है। केवल एक ही भाषा ऐसी है जो देश के एक बहुत बड़े भाग में बोली जाती है और उससे भी कहीं बड़े भाग में समझी जाती है। और उसी को राष्ट्रीय भाषा का पद दिया जा सकता है।

    परन्तु इस समय उस भाषा के तीन स्वरूप हैं—उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी। और अभी तक यह बात राष्ट्रीय-रूप से निश्चित नहीं की जा सकी है कि इनमें से कौन-सा स्वरूप ऐसा है जो देश में सबसे अधिक मान्य हो सकता है और जिसका प्रचार भी ज़्यादा आसानी से हो सकता है। तीनों ही स्वरूपों के पक्षपाती और समर्थक मौजूद हैं और उनमें खींचा-तानी हो रही है। यहाँ तक कि इस मत भेद को राजनीतिक स्वरूप दे दिया गया है और हम इस प्रश्न पर शान्त चित्त और शान्त मस्तिष्क से विचार करने के अयोग्य हो गये हैं।

    लेकिन इन सब रुकावटों के होते हुए भी यदि हम भारतीय राष्ट्रीयता के लक्ष्य तक पहुँचना और उसकी सिद्धि करना असम्भव

    समझकर हिम्मत न हार बैठें तो फिर हमारे लिए इस प्रश्न की किसी-न-किसी प्रकार मीमांसा करना आवश्यक हो जाता है।

    देश में ऐसे आदमियों की संख्या कम नहीं है जो उर्दू और हिन्दी की अलग-अलग और स्वतन्त्र उन्नति और विकास के मार्ग में बाधक नहीं होना चाहते। उन्होंने यह मान लिया है कि आरम्भ में इन दोनों के स्वरूपों में चाहे जो कुछ एकता और समानता रही हो, लेकिन फिर भी इस समय दोनों की दोनों जिस रास्ते पर जा रही हैं, उसे देखते हुए इन दोनों में मेल और एकता होना असम्भव ही है। प्रत्येक भाषा की एक प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है। उर्दू का फ़ारसी और अरबी के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध है। और हिन्दी का संस्कृत तथा प्राकृत के साथ उसी प्रकार का सम्बन्ध है। उनकी यह प्रवृत्ति हम किसी शक्ति से रोक नहीं सकते। फिर इन दोनों को आपस में मिलाने का प्रयत्न करके हम क्यों व्यर्थ इन दोनों को हानि पहुँचावें?

    यदि उर्दू और हिन्दी दोनों अपने आपको अपने जन्म-स्थान और प्रचार-क्षेत्र तक ही परिमित रखें तो हमें इनकी प्राकृतिक वृद्धि और विकास के सम्बन्ध में कोई आपत्ति न हो। बँगला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू और कन्नडी आदि प्रान्तीय भाषाओं के सम्बन्ध में हमें किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है। उन्हें अधिकार है कि वे अपने अन्दर चाहें जितनी संस्कृत, अरबी या लैटिन आदि भरती चलें। उन भाषाओं के लेखक आदि स्वयं ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं; परन्तु उर्दू और हिन्दी की बात इन सबसे अलग है। यहाँ तो दोनों ही भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा कहलाने का दावा करती हैं। परन्तु वे अपने व्यक्तिगत रूप में राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकीं और इसी लिए संयुक्त रूप में स्वयं ही उनका संयोग और मेल आरम्भ हो गया। और दोनों का यह सम्मिलित स्वरूप उत्पन्न हो गया जिसे हम बहुत ठीक तौर पर हिन्दुस्तानी ज़बान कहते हैं। वास्तविक बात तो यह है कि भारतवर्ष की राष्ट्रीय-भाषा न तो वह उर्दू ही हो सकती है जो अरबी और फारसी के अप्रचलित तथा अपरिचित शब्दों के भार

    से लदी रहती है और न वह हिन्दी ही हो सकती है जो संस्कृत के कठिन शब्दों से लदी हुई होती है। यदि इन दोनों भाषाओं के पक्षपाती और समर्थक आमने-सामने खड़े होकर अपनी साहित्यिक भाषाओं में बातें करें तो शायद एक दूसरे का कुछ भी मतलब न समझ सकें। हमारी राष्ट्रीय भाषा तो वही हो सकती है जिसका आधार सर्व-सामान्य-बोधगम्यता हो—जिसे सब लोग सहज में समझ सकें। वह इस बात की क्यों परवाह करने लगी कि अमुक शब्द इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिये कि वह फ़ारसी, अरबी अथवा संस्कृत का है? वह तो केवल यह मान-दण्ड अपने सामने रखती है कि जन-साधारण यह शब्द समझ सकते हैं वा नहीं। और जन-साधारण में हिन्दू, मुसलमान, पंजाबी, बंगाली, महाराष्ट्र और गुजराती सभी सम्मिलित हैं। यदि कोई शब्द या मुहाबरा या पारिभाषिक शब्द जन साधारण में प्रचलित है तो फिर वह इस बात की परवाह नहीं करती कि वह कहाँ से निकला है और कहाँ से आया है। और यही हिन्दुस्तानी है। और जिस प्रकार अंगरेज़ों की भाषा अंगरेज़ी, जापान की जापानी, ईरान की ईरानी और चीन की चीनी है, उसी प्रकार हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय भाषा को इसी तौर पर हिंदुस्तानी कहना केवल उचित ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। और अगर इस देश को हिंदुस्तान न कहकर केवल हिंद कहें तो इसकी भाषा को हिंदी कह सकते हैं। लेकिन यहाँ की भाषा को उर्दू तो किसी प्रकार कहा ही नहीं जा सकता, जब तक हम हिंदुस्तान को उर्दूस्तान न कहने लगें, जो अब किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है। प्राचीन काल के लोग यहाँ की भाषा को हिन्दी ही कहते थे। और खुसरो ने ख़ालिकबारी की रचना करके हिन्दुस्तानी की नींव रखी थी। इस ग्रंथ की रचना में कदाचित् उसका यही अभिप्राय होगा कि जन-साधारण की आवश्यकता के शब्द उन्हें दोनों ही रूपों में सिखलाये जायँ, जिसमें उन्हें अपने रोज़मर्रा के कामों में सहूलियत हो जाय। अभी तक इस बात का निर्णय नहीं हो सका है कि उर्दू की सृष्टि कब और कहाँ हुई थी। जो हो; परंतु भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा न तो उर्दू ही है और न हिन्दी;

    बल्कि वह हिन्दुस्तानी है जो सारे हिन्दुस्तान में समझी जाती है और उसके बहुत बड़े भाग में बोली जाती है। लेकिन फिर भी लिखी कहीं नहीं जाती। और यदि कोई लिखने का प्रयत्न करता है तो उर्दू और हिन्दी के साहित्यिज्ञ उसे टाट बाहर कर देते हैं। वास्तव में उर्दू और हिंदी की उन्नति में जो बात बाधक है, वह उनका वैशिष्ट्य प्रेम है। हम चाहे उर्दू लिखें और चाहे हिन्दी, जन-साधारण के लिए नहीं लिखते; बल्कि एक परिमित वर्ग के लिए लिखते हैं। और यही कारण है कि हमारी साहित्यिक रचनाएँ जन-साधारण को प्रिय नहीं होतीं। यह बात बिलकुल ठीक है कि किसी देश में भी लिखने और बोलने की भाषाएँ एक नहीं हुआ करतीं। जो अंग्रेजी हम किताबों और अखबारों में पढ़ते हैं, वह कहीं बोली नहीं जाती। पढ़े-लिखे लोग भी उस भाषा में बातचीत नहीं करते, जिस भाषा में ग्रन्थ और समाचार-पत्र आदि लिखे जाते हैं। और जन-साधारण की भाषा तो बिलकुल अलग ही होती है। इंग्लैंड के हर एक पढ़े-लिखे आदमी से यह आशा अवश्य की जाती है कि वह लिखी जानेवाली भाषा समझे और अवसर पड़ने पर उसका प्रयोग भी कर सके। यही बात हम हिन्दुस्तान में भी चाहते हैं।

    परंतु आज क्या परिस्थिति है? हमारे हिन्दीवाले इस बात पर तुले हुए हैं कि हम हिन्दी से भिन्न भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में किसी तरह घुसने ही न देंगे। उन्हें 'मनुष्य' से तो प्रेम है; परंतु 'आदमी' से पूरी-पूरी घृणा है। यद्यपि 'दरख़्वास्त' जन-साधारण में भली-भाँति प्रचलित है; परंतु फिर भी उनके यहाँ इसका प्रयोग वर्जित है। इसके स्थान पर वे 'प्रार्थना' पत्र ही लिखना चाहते हैं, यद्यपि जन-साधारण इसका मतलब बिलकुल ही नहीं समझता। 'इस्तीफ़ा' को वे किसी तरह मंजूर नहीं कर सकते और इसके स्थान पर वे 'त्याग-पत्र' रखना चाहते हैं। 'हवाई जहाज़' चाहे कितना ही सुबोध क्यों न हो, परंतु उन्हें 'वायु यान' की सैर ही पसन्द है। उर्दूवाले तो इस बात पर और भी अधिक लट्टू हैं। वे 'ख़ुदा' को तो मानते हैं, परंतु 'ईश्वर' को नहीं मानते। 'कुसूर' तो वे बहुत-से कर सकते हैं, परंतु 'अपराध' कभी

    नहीं कर सकते। 'ख़िदमत' तो उन्हें बहुत पसंद है, परंतु 'सेवा' उन्हें एक आँख भी नहीं भाती। इसी तरह हम लोगों ने उर्दू और हिन्दी के दो अलग-अलग कैम्प बना लिए हैं। और मजाल नहीं कि एक कैम्प का आदमी दूसरे कैम्प में पैर भी रख सके। इस दृष्टि से हिन्दी के मुक़ाबले में उर्दू में कहीं अधिक कड़ाई है। हिन्दुस्तानी इस चारदीवारी को तोड़कर दोनों में मेल-जोल पैदा कर देना चाहती है, जिसमें दोनों एक दूसरे के घर बिना किसी प्रकार के संकोच के आ-जा सकें; और वह भी सिर्फ़ मेहमान की हैसियत से नहीं, बल्कि घर के आदमी की तरह। 'गारमन डि टासी' के शब्दों में उर्दू और हिन्दी के बीच में कोई ऐसी विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती जहाँ एक को विशेष रूप से हिन्दी और दूसरी को उर्दू कहा जा सके। अंग्रेज़ी भाषा के भी अनेक रंग हैं। कहीं लैटिन और यूनानी शब्दों की अधिकता होती है, कहीं ऐंग्लो-सैक्सन शब्दों की। परंतु है दोनों ही अंग्रेज़ी। इसी प्रकार हिन्दी या उर्दू शब्दों के विभेद के कारण दो भिन्न-भिन्न भाषाएँ नहीं हो सकतीं। जो लोग भारतीय-राष्ट्रीयता का स्वप्न देखते हैं और जो इस सांस्कृतिक एकता को दृढ़ करना चाहते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे लोग हिन्दुस्तानी का निमन्त्रण ग्रहण करें जो कोई नई भाषा नहीं है; बल्कि उर्दू और हिंदी का राष्ट्रीय स्वरूप है।

    संयुक्त-प्रान्त के अपर प्राइमरी स्कूलों में चौथे दरजे तक इसी मिश्रित भाषा अर्थात् हिन्दुस्तानी की रीडरें पढ़ाई जाती हैं। केवल उनकी लिपि अलग होती है। उनकी भाषा में कोई अन्तर नहीं होता। इसमें शिक्षा-विभाग का उद्देश्य यह होगा कि इस प्रकार विद्यार्थियों में बचपन में ही हिन्दुस्तानी की नींव पड़ जायगी और वे उर्दू तथा हिन्दी के विशेष प्रचलित शब्दों से भली-भाँति परिचित हो जायँगे और उन्हीं का प्रयोग करने लगेंगे। इसमें दूसरा लाभ यह भी है कि एक ही शिक्षक शिक्षा दे सकता है। इस समय भी यही व्यवस्था प्रचलित है। लेकिन हिन्दी और उर्दू के पक्षपातियों की ओर से इसकी शिकायतें शुरू हो गई हैं कि इस मिश्रित भाषा को शिक्षा से विद्यार्थियों को कुछ भी

    साहित्यिक ज्ञान नहीं होने पाता और वे अपर प्राइमरी के बाद भी साधारण पुस्तकें तक नहीं समझते। इसी शिकायत को दूर करने के लिए इन रीडरों के अतिरिक्त अपर प्राइमरी दरजों के लिए एक साहित्यिक रीडर भी नियत हुई है। हमारे मासिक-पत्र, समाचार-पत्र और पुस्तकें आदि विशुद्ध हिन्दी में प्रकाशित होती हैं। इसलिए जब तक उर्दू पढ़नेवाले लड़कों के पास फ़ारसी और अरबी शब्दों का और हिन्दी पढ़नेवाले लड़कों के पास संस्कृत शब्दों का यथेष्ट भंडार न हो, तब तक वे उर्दू या हिन्दी की कोई पुस्तक नहीं समझ सकते। इस प्रकार बाल्यावस्था से ही हमारे यहाँ उर्दू और हिन्दी का विभेद आरम्भ हो जाता है। क्या इस विभेद को मिटाने का कोई उपाय नहीं है?

    जो लोग इस विभेद के पक्षपाती हैं, उनके पास अपने-अपने दावे की दलीलें और तर्क भी मौजूद हैं। उदाहरण के लिए विशुद्ध हिन्दी के पक्षपाती कहते हैं कि संस्कृत की ओर झुकने से हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान की दूसरी भाषाओं के पास पहुँच जाती है। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे बने-बनाये शब्द मिल जाते हैं; लिखावट में साहित्यिक रूप आ जाता है, आदि, आदि। इसी तरह उर्दू का झण्डा लेकर चलनेवाले कहते हैं कि फ़ारसी और अरबी की ओर झुकने से एशिया की दूसरी भाषाएँ, जैसे फ़ारसी और अरबी, उर्दू के पास आ जाती हैं। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे अरबी का विद्या-सम्बन्धी भांडार मिल जाता है, जिससे बढ़कर विद्या की भाषा और कोई नहीं है, और लेखन-शैली में गम्भीरता और शान आ जाती है, आदि, आदि। इसलिए क्यों न इन दोनों को अपने-अपने ढंग पर चलने दिया जाय और उन्हें आपस में मिलाकर क्यों दोनों के रास्तों में रुकावटें पैदा की जायँ? यदि सभी लोग इन तर्कों से सहमत हो जायँ, तो इसका अभिप्राय यही होगा कि हिन्दुस्तान में कभी राष्ट्रीय भाषा की सृष्टि न हो सकेगी। इसलिए हमें आवश्यक है कि जहाँ तक हो सके, हम इस प्रकार की धारणाओं को दूर करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करें जिससे हम दिन पर दिन राष्ट्रीय भाषा के और भी अधिक समीप

    पहुँचते जायँ; और सम्भव है कि दस-बीस वर्षों में हमारा स्वप्न यथार्थता में परिणत हो जाय।

    हिन्दुस्तान के हर एक सूबे में मुसलमानों की थोड़ी-बहुत संख्या मौजूद ही है। संयुक्त प्रान्त के सिवा और-और सूबों में मुसलमानों ने अपने-अपने सूबे की भाषा अपना ली है। बंगाल का मुसलमान बँगला बोलता और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मदरास का तमिल और पंजाब का पंजाबी आदि। यहाँ तक कि उसने अपने अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है। उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक और सांस्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्यप्रति के जीवन में उसे उर्दू की बिल्कुल आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि दूसरे-दूसरे सूबों के मुसलमान अपने-अपने सूबे की भाषा निस्संकोच भाव से सीख सकते हैं और उसे यहाँ तक अपनी भी बना सकते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों की भाषा में नाम को भी कोई भेद नहीं रह जाता, तो फिर संयुक्त प्रांत और पंजाब के मुसलमान क्यों हिन्दी से इतनी घृणा करते हैं? हमारे सूबे के देहातों में रहनेवाले मुसलमान प्रायः देहातियों की भाषा ही बोलते हैं। जो बहुत-से मुसलमान देहातों से आकर शहरों में आबाद हो गये हैं, वे भी अपने घरों में देहाती ज़बान ही बोलते हैं। बोल-चाल की हिन्दी समझने में न तो साधारण मुसलमानों को ही कोई कठिनता होती है और न बोल-चाल की उर्दू समझने में साधारण हिन्दुओं को ही। बोल-चाल की हिन्दी और उर्दू प्रायः एक-सी ही हैं। हिन्दी के जो शब्द साधारण पुस्तकों और समाचार-पत्रों में व्यवहृत होते हैं और कभी-कभी पण्डितों के भाषणों में भी आ जाते हैं, उनकी संख्या दो हज़ार से अधिक न होगी। इसी प्रकार फ़ारसी के साधारण शब्द भी इससे अधिक न होंगे। क्या उर्दू के वर्तमान कोषों में दो हज़ार हिन्दी शब्द और हिन्दी के कोषों में दो हज़ार उर्दू शब्द नहीं बढ़ाये जा सकते? और इस प्रकार हम एक मिश्रित कोष की सृष्टि नहीं कर सकते? क्या हमारी स्मरण-शक्ति पर यह भार असह्य होगा? हम अंगरेज़ी के

    असंख्य शब्द याद कर सकते हैं और वह भी केवल एक अस्थायी आवश्यकता की पूर्त्ति करने के लिए। तो फिर क्या हम एक स्थायी उद्देश्य की सिद्धि के लिए थोड़े-से शब्द भी याद नहीं कर सकते। उर्दू और हिन्दी भाषाओं में न तो अभी विस्तार ही है और न दृढ़ता। उनके शब्दों की संख्या परिमित है। प्रायः साधारण अभिप्राय प्रकट करने के लिए भी उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। शब्दों की इस वृद्धि से यह शिकायत दूर हो सकती है।

    भारतवर्ष की सभी भाषाएँ या तो प्रत्यक्ष रूप से और या अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत से निकली हैं। गुजराती, मराठी और बँगला की तो लिपियाँ भी देव-नागरी से मिलती-जुलती हैं। यद्यपि दक्षिणी भारत की भाषाओं की लिपियाँ बिल्कुल भिन्न हैं; परन्तु फिर भी उनमें संस्कृत शब्दों की बहुत अधिकता है। अरबी और फ़ारसी के शब्द भी सभी प्रांतीय भाषाओं में कुछ न कुछ मिलते हैं। परंतु उनमें संस्कृत शब्दों की उतनी अधिकता नहीं होती जितनी हिन्दी में होती है। इसलिए यह बात बिल्कुल ठीक है कि भारतवर्ष में ऐसी हिन्दी बहुत सहज में स्वीकृत और प्रचलित हो सकती है जिसमें संस्कृत के शब्द अधिक हों। दूसरे प्रांतों के मुसलमान भी ऐसी हिन्दी सहज में समझ सकते हैं; परंतु फ़ारसी और अरबी के शब्दों से लदी हुई उर्दू भाषा के लिए संयुक्त प्रांत और पंजाब के नगरों और क़स्बों तथा हैदराबाद के बड़े-बड़े शहरों के सिवा और कोई क्षेत्र नहीं। मुसलमान संख्या में अवश्य आठ करोड़ हैं; लेकिन उर्दू बोलनेवाले मुसलमान इसके एक चौथाई से अधिक न होंगे। ऐसी अवस्था में क्या उच्चकोटि की राष्ट्रीयता के विचार से इसकी आवश्यकता नहीं है कि उर्दू में कुछ आवश्यक सुधार और वृद्धि करके उसे हिन्दी के साथ मिला लिया जाय? और हिन्दी में भी इसी प्रकार की वृद्धि करके उसे उर्दू से मिला दिया जाय? और इस मिश्रित भाषा को इतना दृढ कर दिया जाय कि वह सारे भारतवर्ष में बोली-समझी जा सके? और हमारे लेखक जो कुछ लिखें, वह एक विशेष क्षेत्र के लिए न हो; बल्कि सारे भारतवर्ष के लिए हो? सिन्धी

  • कर्मभूमि

    कर्मभूमि

    Aproximadamente 214.968 palavras.

    कर्मभूमि
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    १

    हमारे स्कूलों और कालेजों में जिस तत्परता से फ़ीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फ़ीस का दाख़िल होना अनिवार्य है। या तो फ़ीस दीजिए, या नाम कटाइए; या जब तक फ़ीस न दाखिल हो, रोज कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं कहीं ऐसा भी नियम है, कि उस दिन फ़ीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख को दुगुनी फ़ीस न दो, तो नाम कट जाता है। काशी के क्वींस कालेज में यही नियम था। ७वीं तारीख को फ़ीस न दो, तो २१वीं तारीख को दुगुनी फ़ीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जायँ। वह हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रिआयत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ; कर्ज लो, गहने गिरो रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फ़ीस जरूर दो, नहीं दूनी फ़ीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रिआयत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता। वहाँ स्थायी रूप से मार्शल-लॉ का व्यवहार होता है। कचहरियों में पैसे का राज है, उससे कहीं कठोर, कहीं निर्दय यह राज है। देर में आइए तो जुर्माना, न आइए तो जुर्माना, सबक न याद हो तो जुर्माना, किताबें न खरीद सकिये तो जुर्माना, कोई अपराध हो जाए तो जुर्माना, शिक्षालय क्या है जुर्मानालय है। यही हमारी पश्चिमी शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफ़ों के पूल बाँधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों से पैसे पर जान देनेवाले, पैसे के लिए ग़रीबों का गला काटनेवाले, पैसे के लिए अपनी आत्मा को बेच देनेवाले छात्र निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या है?

    आज वही वसूली की तारीख है। अध्यापकों की मेजों पर रुपयों के ढेर लगे हैं। चारों तरफ़ खनाखन की आवाजें आ रही हैं। सराफ़े में भी रुपये की ऐसी झंकार कम सुनाई देती है। हरेक मास्टर तहसील का चपरासी बना बैठा हुआ है। जिस लड़के का नाम पुकारा जाता है, वह अध्यापक के सामने जाता है, फ़ीस देता है और अपनी जगह पर आ बैठता है। मार्च का महीना है। इसी महीने में एप्रिल, मई और जून की फ़ीस वसूल की जा रही है। इम्तहान की फ़ीस भी ली जा रही है। दसवें दर्जे में तो एक-एक लड़के को ४०) देने पड़ रहे हैं।

    अध्यापक ने बीसवें लड़के का नाम पुकारा—अमरकान्त!

    अमरकान्त ग़ैरहाजिर था।

    अध्यापक ने पूछा—क्या आज अमरकान्त नहीं आया?

    एक लड़के ने कहा—आये तो थे, शायद बाहर चले गये हों?

    'क्या फ़ीस नहीं लाया है?'

    किसी लड़के ने जवाब नहीं दिया।

    अध्यापक की मुद्रा पर खेद की रेखा झलक पड़ी। अमरकान्त अच्छे लड़कों में था। बोले—शायद फ़ीस लाने गया होगा। इस घण्टे में न आया, तो दूनी फ़ीस देनी पड़ेगी। मेरा क्या अख्तियार है। दूसरा लड़का चले—गोवर्धनलाल!

    सहसा एक लड़के ने पूछा—अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं बाहर जाकर देखूँ।

    अध्यापक ने मुस्कराकर कहा—घर की याद आई होगी। खैर, जाओ, मगर दस मिनट के अंदर आ जाना। लड़कों को बुला-बुलाकर फ़ीस लेना मेरा काम नहीं है।

    लड़के ने नम्रता से कहा—अभी आता हूँ। क़सम ले लीजिए, जो हाते के बाहर जाऊँ।

    यह इस कक्षा के संपन्न लड़कों में था, बड़ा खिलाड़ी, बड़ा बैठकबाज। हाजिरी देकर गायब हो जाता, तो शाम की खबर लाता। हर महीने फीस की दूनी रकम जुर्माना दिया करता था। गोरे रंग का, लांबा, छरहरा, शौक़ीन युवक था जिसके प्राण खेल में बसते थे। नाम था मोहम्मद सलीम।

    सलीम और अमरकान्त दोनों पास-पास बैठते थे। सलीम को हिसाब लगाने में, तर्जुमा करने में अमरकान्त से विशेष सहायता मिलती थी। उसकी कापी से नक़ल कर लिया करता था। इससे दोनों में दोस्ती हो गई थी। सलीम कवि था। अमरकान्त उसकी ग़ज़लें बड़े चाव से सुना करता था। मैत्री का यह एक और कारण था।

    सलीम ने बाहर जाकर इधर-उधर निगाह दौड़ाई, अमरकान्त का कहीं पता न था। जरा और आगे बढ़े, तो देखा, वह एक वृक्ष की आड़ में खड़ा है। पुकारा—अमरकान्त! ओ बुद्धूलाल! चलो फ़ीस जमा करो, पण्डितजी बिगड़ रहे हैं।

    अमरकान्त ने अचकन के दामन से आँखें पोंछ लीं, और सलीम की तरफ़ आता हुआ बोला——क्या मेरा नम्बर आ गया?

    सलीम ने उसके मुँह की तरफ़ देखा, तो आँखें लाल थीं। वह अपने जीवन में शायद ही कभी रोया हो। चौंककर बोला——अरे, तुम तो रो रहे हो! क्या बात है?

    अमरकान्त साँवले रंग का, छोटा-सा दुबला-पतला कुमार था। अवस्था बीस की हो गई थी; पर अभी मसें भी न भीगी थीं। चौदह-पंद्रह साल का किशोर-सा लगता था। उसके मुख पर एक वेदनामय दृढ़ता, जो निराशा से बहुत कुछ मिलती-जुलती थी, अंकित हो रही थी, मानो संसार में उसका कोई नहीं है। इसके साथ ही उसकी मुद्रा पर कुछ ऐसी प्रतिभा, कुछ ऐसी मनस्विता थी, कि एक बार उसे देखकर फिर भूल जाना कठिन था।

    उसने मुस्कराकर कहा—कुछ नहीं जी, रोता कौन है!

    'आप रोते हैं, और कौन रोता है। सच बताओ क्या हुआ है?'

    अमरकान्त की आँखें फिर भर आयीं। लाख यत्न करने पर भी आँसू न रूक सके। सलीम समझ गया। उसका हाथ पकड़कर बोला—क्या फ़ीस के लिए रो रहे हो? भले आदमी, मुझसे क्यों न कह दिया। तुम मुझे भी ग़ैर समझते हो? क़सम खुदा की, बड़े नालायक आदमी हो तुम। ऐसे आदमी को गोली मार देनी चाहिए! दोस्त से भी ग़ैरियत! चलो क्लास में, मैं फ़ीस दिए देता हूँ; जरा-सी बात के लिए घण्टे भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता!

    अमरकान्त को तसल्ली तो हुई; पर अनुग्रह के बोझ से उसकी गर्दन दब गयी। बोला——पण्डितजी आज मान न जायेंगे?

    सलीम ने खट्टे होकर कहा——पण्डितजी के बस की बात थोड़े ही है, यह सरकारी क़ायदा है, मगर हो तुम बड़े शैतान, वह तो खैरियत हो गयी, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खूब इम्तहान देते! देखो, आज एक ताज़ा ग़ज़ल कही है। पीठ सहला देना——

    आपको मेरी वफ़ा याद आई,

    खै़र है आज यह क्या याद आई।

    अमरकान्त का व्यथित चित्त इस समय ग़ज़ल सुनने को तैयार न था; पर सुने बगैर काम भी तो नहीं चल सकता। बोला——नाज़ुक चीज़ है। खूब कहा है। मैं तुम्हारी ज़बान की सफ़ाई पर जान देता हूँ।

    सलीम यही तो ख़ास बात है भाई साहब! लफ्ज़ों की झंकार का नाम ग़ज़ल नहीं है। दूसरा शेर सुनो——

    फिर मेरे सीने में एक हूक उठी,

    फिर मुझे तेरी अदा याद आई

    अमरकान्त ने फिर तारीफ़ की——लाजवाब चीज़ है। कैसे तुम्हें ऐसे शेर सूझ जाते हैं?

    सलीम हँसा——उसी तरह, जैसे तुम्हें हिसाब और मजमन सूझ जाते हैं। जैसे ऐसोसियेशन में स्पीचें दे लेते हो। आओ पान खाते चलें।

    दोनों दोस्तों ने पान खाये और स्कूल की तरफ़ चले। अमरकान्त ने कहा——पण्डितजी बड़ी डांट बतायेंगे।

    'फीस ही तो लेंगे!'

    'और जो पूछें, अब तक कहाँ थे?'

    'कह देना, फ़ीस लाना भूल गया था।'

    'मुझसे तो न कहते बनेगा। मैं साफ़-साफ़ कह दूँगा।'

    'तो तुम पिटोगे भी मेरे हाथ से!"

    संध्या समय जब छुट्टी हुई और दोनों मित्र घर चले, तो अमरकान्त ने कहा——तुमने आज मुझ पर जो एहसान किया है……

    सलीम ने उसके मुँह पर हाथ रखकर कहा——बस खबरदार, जो मुँह से एक आवाज भी निकाली। कभी भूलकर भी इसका जिक्र न करना।

    'आज जलसे में आओगे?'

    'मजमून क्या है, मुझे तो याद नहीं।'

    'अजी वही पश्चिमी सभ्यता है।'

    'तो मुझे दो चार पाइंट बता दो, नहीं मैं वहां कहूँगा क्या ?"

    'बताना क्या है। पश्चिमी सभ्यता की बुराइयाँ हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।'

    'तुम जानते होगे, मुझे तो एक भी नहीं मालूम।'

    'एक तो यह तालीम ही है। जहाँ देखो वहीं दुकानदारी। अदालत की दुकान, इल्म की दुकान, सेहत की दुकान, इस एक पाइन्ट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है।'

    'अच्छी बात है, आऊँगा।'

    चौथा भाग

    १

    अमरकान्त को ज्यों ही मालूम हुआ कि सलीम यहाँ का अफ़सर होकर आया है, वह उससे मिलने चला। समझा, खूब गप-शप होगी। यह खयाल तो आया, कहीं उसमें अफ़सरी की बू न आ गयी हो; लेकिन पुराने दोस्त से मिलने की उत्कण्ठा को न रोक सका। बीस-पच्चीस मील का पहाड़ी रास्ता था। ठण्ड खूब पड़ने लगी थी। आकाश कुहरे की धुन्ध से मटियाला हो रहा था और उस धुन्ध में सूर्य जैसे टटोल-टटोलकर रास्ता ढूँढता हुआ चला जाता था। कभी सामने आ जाता कभी छिप जाता। अमर दोपहर के बाद चला था। उसे आशा थी, दिन रहते पहुँच जाऊँगा; किन्तु दिन ढलता जाता था और मालूम नहीं, अभी और कितना रास्ता बाकी है। उसके पास केवल एक देशी कम्बल था। कहीं रात हो गई तो किसी वृक्ष के नीचे टिकना पड़ जायगा। देखते ही देखते सूर्यदेव अस्त भी हो गये। अँधेरा जैसे मुँह खोले संसार को निगलने चला आ रहा था। अमर ने कदम और तेज़ किये। शहर में दाखिल हुआ, तो आठ बज गये थे।

    सलीम उसी वक्त क्लब से लौटा था। खबर पाते ही बाहर निकल आया। अमर ने उसकी सज-धज देखी, तो झिझका और गले मिलने के बदले हाथ बढ़ा दिया। अरदली सामने ही खड़ा था। उसके सामने इस देहाती से किसी प्रकार की घनिष्ठता का परिचय देना बड़े साहस का काम था। उसे अपने सजे हुए कमरे में भी न ले जा सका। अहाते में छोटा-सा बाग था। एक वृक्ष के नीचे उसे ले जाकर उसने कहा–यह तुमने क्या धज बना रखी है जी, इतने हूश कबसे हो गये? वाह रे आपका कुर्ता! मालूम होता है, डाक का थैला है, और यह डाबलूश जूता किस दिसावर से मंगवाया है? मुझे डर है, कहीं बेगार में न धर लिये जाओ! अमर वहीं जमीन पर बैठ गया और बोला—कुछ खातिर-तवाज़ा तो की नहीं, उलटे और फटकार सुनाने लगे। देहातियों में रहता हूँ, जेंटलमेन बनूं तो कैसे निबाह हो। तुम खूब आये भाई, कभी-कभी गप-शप हुआ करेगी। उधर की खैरआफ़ियत कहो। यह तमने नौकरी क्या कर ली। डटकर कोई रोजगार करते, सूझी भी तो गुलामी।

    सलीम ने गर्व से कहा—गुलामी नहीं है जनाब, हुकूमत है। दस-पाँच दिन में मोटर आयी जाती है, फिर देखना किस शान से निकलता हूँ। मगर तुम्हारी यह हालत देखकर दिल टूट गया। तुम्हें यह भेस छोड़ना पड़ेगा।

    अमर के आत्म-सम्मान को चोट लगी। बोला—मेरा खयाल था, और है, कि कपड़े महज़ जिस्म की हिफाजत के लिए है, शान दिखाने के लिए नहीं।

    सलीम ने सोचा, कितनी लचर-सी बात है। देहातियों के साथ रहकर अक्ल भी खो बैठा। बोला—खाना भी तो महज़ जिस्म की परवरिश के लिए खाया जाता है, तो सूखे चने क्यों नहीं चबाते? सूखे गेहूँ क्यों नहीं फांकते? क्यों हलवा और मिठाई उड़ाते हो?

    'सूखे चने ही चबाता हूँ!'

    'झूठे हो। सूखे चने पर ही यह सीना निकल आया है। मुझसे डयोढ़े हो गये, मैं तो शायद पहचान भी न सकता।

    'जी हाँ, यह सूखे चनों ही की करामात है। ताकत साफ़ हवा और संयम में है। हलवा-पूरी से ताकत नहीं होती, सीना नहीं निकलता, पेट निकल आता है। २५ मील पैदल चला आ रहा हूँ। है दम? जरा पाँच ही मील चलो मेरे साथ।

    'मुआफ कीजिए। किसी ने कहा है—बड़ी रानी, तो आओ पीसो मेरे साथ। तुम्हें पीसना मुबारक हो। तुम यहाँ कर क्या रहे हो?'

    'अब तो आये हो, खुद ही देख लोगे। मैंने जिन्दगी का जो नकशा दिल में खींचा था, उसी पर अमल कर रहा हूँ। स्वामी आत्मानन्द के आ जाने से काम में और भी सहूलियत हो गयी है।'

    ठण्ड ज्यादा थी। सलीम को मजबूर होकर अमरकान्त को अपने कमरे में लाना पड़ा। अमर ने देखा, कमरे में गद्देदार कोच हैं, पीतल के गमले हैं, जमीन पर कालीन है, मध्य में संगमरमर की गोल मेज है।

    अमर ने दरवाजे पर जूते उतार दिये और बोला—केवाड़ बन्द कर दूं, नहीं कोई देख ले, तो तुम्हें शर्मिन्दा होना पड़े। तुम साहब ठहरे।

    सलीम पते की बात सुनकर झेंप गया। बोला—कुछ-न-कुछ खयाल तो होता ही है भई, हालांकि मैं फैशन का गुलाम नहीं हूँ। मैं भी सादी जिन्दगी बसर करना चाहता था; लेकिन अब्बाजान की फरमाइश कैसे टालता। प्रिंसिपल तक कहते थे, तुम पास नहीं हो सकते, लेकिन रिजल्ट निकला तो सब दंग रह गये। तुम्हारे ही खयाल से मैंने यह जिला पसन्द किया। कल तुम्हें कलक्टर से मिलाऊँगा। अभी मि० गजनवी से तो तुम्हारी मुलाकात न होगी। बड़ा शौकीन आदमी है। मगर दिल का साफ़। पहली ही मुलाकात में उससे मेरी बेतकल्लुफ़ी हो गयी। चालीस के करीब होंगे, मगर कम्पेबाजी नहीं छोड़ी।

    अमर के विचार में अफसरों को सच्चरित्र होना चाहिये था। सलीम सच्चरित्रता का कायल न था। दोनों मित्रों में बहस हो गयी।

    सलीम ने कहा—खुश्क आदमी कभी अच्छा अफ़सर नहीं हो सकता।

    अमर बोला—सच्चरित्र होने के लिए खुश्क होना जरूरी नहीं।

    'मैंने तो मुल्लाओं को हमेशा खुश्क ही देखा। अफसरों के लिए महज कानून की पाबन्दी काफ़ो नहीं। मेरे खयाल में तो थोड़ी-सी कमजोरी इन्सान का जेवर है। मैं जिन्दगी में तुमसे ज्यादा कामयाब रहा। मुझे दावा है कि मुझसे कोई नाराज नहीं है। तुम अपनी बीबी तक को खुश न रख सके। मैं इस मुल्लापन को दूर से सलाम करता हूँ। तुम किसी जिले के अफ़सर बना दिये जाओ तो एक दिन न रह सको। किसी को खुश न रख सकोगे।'

    अमर ने बहस को तूल देना उचित न समझा; क्योंकि बहस में वह बहुत गर्म हो जाया करता था।

    भोजन का समय आ गया था। सलीम ने एक शाल निकाल कर अमर को ओढ़ा दिया। एक रेशमी स्लीपर उसके पहनने को दिया। फिर दोनों ने भोजन किया। एक मुद्दत के बाद अमर को ऐसा स्वादिष्ट भोजन मिला। मांस तो उसने न खाया; लेकिन और सब चीजें मजे से खायीं। सलीम ने पूछा—जो चीज खाने की थी, वह तो आपने निकालकर रख दी।

    अमर ने अपराधी भाव से कहा—मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन भीतर से इच्छा नहीं होती। और कहो, वहाँ की क्या खबरें हैं? कहीं शादी–वादी ठीक हुई? इतनी कसर बाकी है, उसे भी पूरी कर लो।

    सलीम ने चुटकी ली—मेरी शादी की फ़िक्र छोड़ो, पहले यह बताओ कि सकीना से तुम्हारी शादी कब हो रही है। वह बेचारे तुम्हारे इन्तजार में बैठी हुई है।

    अमर का चेहरा फीका पड़ गया। यह ऐसा प्रश्न था, जिसका उत्तर देना उसके लिये संसार में सबसे मुश्किल काम था। मन की जिस दशा में वह सकीना की ओर लपका था, वह दशा अब न रही थी। तब सुखदा उसके जीवन में एक बाधा के रूप में खड़ी थी। दोनों की मनोवृत्तियों में कोई मेल न था: दोनों जीवन को भिन्न-भिन्न कोण से देखते थे। एक में भी यह सामर्थ्य न थी कि बह दूसरे को हमखयाल बना लेता; लेकिन अब वह हालत न थी। किसी देवी विधान ने उनके सामाजिक बन्धन को और कसकर उनकी आत्माओं को मिला दिया था। अमर को पता नहीं, सुखदा ने उसे क्षमा प्रदान की या नहीं; लेकिन वह अब सुखदा का उपासक था। उसे आश्चर्य होता था कि विलासिनी सुखदा ऐसी तपस्विनी क्योंकर हो गयी और यह आश्चर्य उसके अनुराग को दिन-दिन प्रबल करता जाता था। उसे अब अपने उस असन्तोष का कारण अपनी ही अयोग्यता में छिपा हुआ मालूम होता था। अगर वह अब सुखदा को कोई पत्र न लिख सका तो इसके दो कारण थे। एक तो लज्जा और दूसरी अपनी पराजय की कल्पना। शासन का वह पुरुषोचित भाव मानो उसका परिहास कर रहा था। सुखदा स्वच्छन्द रूप से अपने लिए एक नया मार्ग निकाल सकती है, उसकी उस लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं है, यह विचार उसके अनुराग की गर्दन को जैसे दबा देता था। वह अधिक से अधिक उसका अनुगामी हो सकता है, वह उससे पहले समर में कूदी जा रही है, यह भाव उसके आत्मगौरव को चोट पहुँचाता था। उसने सिर झुकाकर कहा—मुझे अब तजर्बा हो रहा है, कि मैं औरतों

    को खुश नहीं रख सकता। मुझमें वह लियाकत ही नहीं है! मैंने तय कर लिया है कि सकीना पर जुल्म न करूंगा।

    'तो कम-से-कम अपना फैसला उसे लिख तो देते।'

    अमर ने हसरत-भरी आवाज में कहा—यह काम इतना आसान नहीं है सलीम जितना तुम समझते हो। उसे याद करके मैं अब भी बेताब हो जाता हूं। उसके साथ मेरी ज़िन्दगी जन्नत बन जाती। उसकी इस वफ़ा पर मर जाने को जी चाहता है कि अभी तक…

    यह कहते-कहते अमर का कण्ठ-स्वर भारी हो गया।

    सलीम ने एक क्षण के बाद कहा—मान लो उसे अपने साथ शादी करने पर राजी कर लूँ, तो तुम्हें नागवार होगा?

    अमर की आँखें-सी मिल गयीं—नहीं भाई जान, बिल्कुल नहीं। अगर तुम उसे राजी कर सको, तो मैं समझंगा, तुमसे ज्यादा खुशनसीब आदमी दुनिया में नहीं है। लेकिन तुम मज़ाक कर रहे हो। तुम किसी नवाबजादी से शादी करने का खयाल कर रहे होगे।

    दोनों खा चुके ओर हाथ धोकर दूसरे कमरे में लेटे।

    सलीम ने हुक्के का कश लगाकर कहा–क्या तुम समझते हो, मैं मज़ाक कर रहा हूँ? उस वक्त, मैंने ज़रूर मजाक किया था। लेकिन इतने दिनों में मैंने उसे खूब परखा। उस वक्त तुम उससे न मिल जाते, तो इसमें जरा भी शक नहीं है कि वह इस वक्त कहीं और होती। तुम्हें पाकर उसे फिर किसी की ख्वाहिश नहीं रही। तुमने उसे कीचड़ से निकालकर मन्दिर की देवी बना दिया। और देवी की जगह बैठकर वह सचमुच देवी हो गयी। अगर तुम उससे शादी कर सकते हो, तो शौक से कर लो। मैं तो मस्त हूँ ही, दिलचस्पी का दूसरा सामान तलाश कर लूंगा; लेकिन तुम न करना चाहो, तो मेरे रास्ते से हट जाओ। फिर अब तो तुम्हारी बीबी भी तुम्हारे ही पंथ में आ गयी। अब तुम्हारे लिए उससे मुंह फेरने का कोई सबब नहीं है।

    अमर ने हुक्का अपनी तरफ़ खींचकर कहा—मैं बड़े शौक से तुम्हारे रास्ते से हट जाता हूँ; लेकिन एक बात बतला दो-तुम सकीना को भी दिलचस्पी की चीज़ समझ रहे हो, या उसे दिल से प्यार करते हो?

    सलीम उठ बैठे—देखो, अमर, मैंने तुमसे कभी परदा नहीं रखा इसलिए

    आज भी परदा न रखूँगा। सकीना प्यार करने की चीज नहीं, पूजने की चीज है। कम-से-कम मुझे बह ऐसी ही मालूम होती है। मैं कसम तो नहीं खाता कि उससे शादी हो जाने पर मैं कण्ठी-माला पहन लूंगा। लेकिन इतना जानता हूँ कि उसे पाकर मैं ज़िन्दगी में कुछ कर सकूँगा। अब तक मेरी ज़िन्दगी सैलानीपन में गुजरी है। वह मेरी बहती हुई नाव का लंगर होगी। इस लंगर के बगैर नहीं जानता मेरो नाव किस भँवर में पड़ जायेगी। मेरे लिए ऐसी औरत की ज़रूरत है, जो मुझ पर हुकमत करे, मेरी लगाम को खींचती रहे।

    अमर को अपना जीवन इसलिए भार था कि वह अपनी स्त्री पर शासन न कर सकता था। सलीम ऐसी स्त्री चाहता था, जो उस पर शासन करे; और मजा यह था कि दोनों एक ही सुन्दरी में मनोनीत लक्षण देख रहे थे।

    अमर ने कुतूहल भाव से कहा—मैं तो समझता हूँ, सकीना में यह बात नहीं है, जो तुम चाहते हो।

    सलीम जैसे गहराई में डूबकर बोला—तुम्हारे लिए नहीं है मगर मेरे लिए है! वह तुम्हारी पूजा करती है, मैं उसकी पूजा करता हूँ।

    इसके बाद कोई दो-ढाई बजे रात तक दोनों में इधर-उधर की बातें होती रहीं। सलीम ने उस नये आन्दोलन की भी चर्चा की, जो उसके सामने शुरू हो चुका था और यह भी कहा कि उसके सफल होने की आशा नहीं है। संभव है, मुआमला तूल खींचे।

    अमर ने विस्मय के साथ कहा—तब तो कहो, सुखदा ने वहाँ नयी जान डाल दी।

    'तुम्हारी सास ने अपनी सारी जायदाद सेवाश्रम के नाम वक्फ़ कर दी।'

    'अच्छा!'

    'और तुम्हारे पिदर बुजुर्गवार भी अब कौमी कामों में शरीक होने लगे हैं।

    'तब तो वहाँ पूरा इनक़लाब हो गया!'

    सलीम तो सो गया, लेकिन अमर दिन-भर का थका होने पर भी नींद को न बुला सका। वह जिन बातों की कल्पना भी न कर सकता था, वह सुखदा के हाथों पूरी हो गयीं। मगर कुछ भी हो, वही अमीरी, जरा बदली

    हुई सूरत में। नाम की परवाह है और कुछ नहीं। मगर फिर उसने अपने को धिक्कारा। तुम किसी के अन्तःकरण की बात क्या जानते हो। आज हजारों आदमी राष्ट्र की सेवा में लगे हुए हैं कौन कह सकता है, कौन स्वार्थी है,कौन सच्चा सेवक?

    न जाने कब उसे भी नींद आ गयी।

    २

    अमरकान्त के जीवन में एक नया उत्साह चमक उठा है। ऐसा जान पड़ता है कि अपनी जीवन-यात्रा में वह अब एक नये घोड़े पर सवार हो गया है। पहले पुराने घोड़े को एक ओर चाबुक लगाने की जरूरत पड़ती थी। यह नया घोड़ा कनौतियाँ खड़ी किये सरपट भागता चला जाता है। स्वामी आत्मानन्द, काशी, प्रयाग, सभी से उसकी तकरार हो जाती। इन लोगों के पास वही पुराने घोड़े हैं। दौड़ में पिछड़ जाते हैं। अमर उनकी मन्द गति पर बिगड़ता है—इस तरह तो काम नहीं चलने का स्वामीजी। आप काम करते हैं कि मजाक करते हैं। इससे तो कहीं अच्छा था कि आप सेवाश्रम में बने रहते!

    आत्मानन्द ने अपने विशाल वक्ष को तानकर कहा—बाबा, मेरे से अब और नहीं दौड़ा जाता। जब लोग स्वास्थ्य के नियमों पर ध्यान न देंगे, तो आप बीमार होंगे, आप मरेंगे। मैं नियम बतला सकता हूँ, पालन करना तो उनके हो अधीन है।

    अमरकान्त ने सोचा—यह आदमी जितना मोटा है, उतनी ही मोटी इसकी अक्ल भी है। खाने को डेढ़ सेर चाहिए, काम करते ज्वर आता है। इन्हें संन्यास लेने से न जाने क्या लाभ हुआ।

    उसने आँखों में तिरस्कार भरकर कहा—आपका काम केवल नियम बताना नहीं है, उनसे नियमों का पालन कराना भी है। उनमें ऐसी शक्ति डालिए कि वे नियमों का पालन किये बिना रह ही न सकें। उनका स्वभाव ही ऐसा हो जाय। मैं आज पिचौरा से निकला; गाँव में जगह-जगह कूड़े के ढेर दिखाई दिये। आप कल उसी गाँव से हो आये हैं क्यों कूड़ा साफ

    नहीं कराया गया? आप खुद फावड़ा लेकर क्यों नहीं पिल पड़े? गेरूए वस्त्र पहन लेने ही से आप समझते हैं, लोग आपकी शिक्षा को देववाणी समझेंगे?

    आत्मानन्द ने सफाई दी—मैं कूड़ा साफ करने लगता, तो सारा दिन पिचौरा ही में लग जाता। मुझे पांँच-छ: गाँवों का दौरा करना था।

    'यह आपका कोरा अनुमान है। मैंने सारा कूड़ा आध घण्टे में साफ कर दिया। मेरे फावड़ा हाथ में लेने ही की देर थी, सारा गाँव जमा हो गया और बात-की-बात में सारा गाँव झक हो गया।'

    फिर वह गूदड़ चौधरी की ओर फिरा—तुम भी दादा, अब काम में ढिलाई कर रहे हो। मैंने कल एक पंचायत में लोगों को शराब पीते पकड़ा। सीताड़े की बात है। किसी को मेरे आने की खबर तो थी नहीं, लोग आनन्द से बैठे थे और बोतलें सरपंच महोदय के सामने रखी हुई थीं। मुझे देखते ही तुरन्त बोतलें उड़ा दी गयीं और लोग गंभीर बनकर बैठ गये। मैं दिखावा नहीं चाहता, ठोस काम चाहता हूँ।

    अमर ने अपनी लगन, उत्साह, आत्म-बल और कर्मशीलता से अपने सभी सहयोगियों में सेवा-भाव उत्पन्न कर दिया था और उन पर शासन भी करने लगा था। सभी उसका रोब मानते थे। उसके गुलाम थे।

    चौधरी ने बिगड़कर कहा—तुमने कौन गाँव बताया, सौताड़ा? मैं आज ही उसके चौधरी को बुलाता हूँ। वही हरखलाल है। जन्म का पियक्कड़। दो दफ़ा सजा काट आया है। मैं आज ही उसे बुलाता हूँ।

    अमर ने जाँघ पर हाथ पटककर कहा—फिर वही डाँट-फटकार की बात? अरे दादा? डाँट-फटकार से कुछ न होगा। दिलों में पैठिये। ऐसी हवा फैला दीजिये कि ताड़ी-शराब से लोगों को घृणा हो जाय। आप दिन-भर अपना काम करेंगे ओर चैन से सोयेंगे, तो यह काम हो चुका। यह समझ लो कि हमारी बिरादरी चेत जायगी, तो बाम्हन ठाकुर आप ही चेत जायेंगे।

    गूदड़ ने हार मानकर कहा—तो भैया, इतना बूता तो अब मुझमें नहीं रहा कि दिन भर काम करूँ और रात भर दौड़ लगाऊँ। काम न करूँ, तो भोजन कहाँ से आये? ⁠ अमरकान्त ने उसे हिम्मत हारते देखकर सहास मुख से कहा–कितना बड़ा पेट है! तो उसे छोटा करना पड़ेगा।

    काशी और प्रयाग ने देखा कि इस वक्त सबके ऊपर फटकार पड़ रही है, तो वहाँ से खिसक गये।

    पाठशाले का समय आ गया था। अमरकान्त अपनी कोठरी में किताब लेने गया, तो देखा, मुन्नी दूध लिये खड़ी है। बोला–मैंने तो कह दिया था, मैं दूध न पिऊँगा, फिर क्यों लायीं?

    आज कई दिनों से मुन्नी अमर के व्यवहार में एक प्रकार की शुष्कता अनुभव कर रही थी। उसे देखकर अब उनके मुख पर उल्लास की झलक नहीं आती। उससे अब बिना विशेष प्रयोजन के बोलते भी कम हैं। उसे ऐसा जान पड़ता है कि यह मुझसे भागते हैं। इसका कारण वह कुछ नहीं समझ सकती। यह काँटा उसके मन में कई दिन से खटक रहा है। आज वह इस काँटे को निकाल डालेगी।

    उसने अविचलित भाव से कहा–क्यों नहीं पियोगे; सुनूँ?

    अमर पुस्तक का एक बण्डल उठाता हुआ बोला–अपनी इच्छा है, नहीं पीता—तुम्हें मैं कष्ट नहीं देना चाहता।

    मुन्नी ने तिरछी आँखों से देखा–यह तुम्हें कब से मालूम हुआ कि तुम्हारे लिए दूध लाने में मुझे बहुत कष्ट होता है। और अगर किसी को कष्ट उठाने ही में सुख मिलता हो तो?

    अमर ने हारकर कहा–अच्छा भाई, झगड़ा न करो, लाओ पी लूँ!

    एक ही साँस में सारा दूध कड़वी दवा की तरह पीकर अमर चलने लगा, तो मुन्नी ने द्वार छोड़कर कहा–बिना अपराध के तो किसी को सजा नहीं दी जाती।

    अमर द्वार पर ठिठककर बोला–तुम तो जाने क्या बक रही हो। मुझे देर हो रही है।

    मुन्नी ने विरक्त भाव धारण किया–तो मैं तुम्हें रोक तो नहीं रही हूँ, जाते क्यों नहीं।

    अमर कोठरी से बाहर पाँव न निकाल सका।

    मुन्नी ने फिर कहा–क्या मैं इतना भी नहीं जानती कि मेरा तुम्हारे

    ऊपर कोई अधिकार नहीं है? तुम आज चाहो, तो कह सकते हो, खबरदार, मेरे पास मत आना। और मुँह से चाहे न कहते हो; पर व्यवहार से रोज ही कह रहे हो। आज कितने दिनों से देख रही हूँ; लेकिन बेहयाई करके आती हूँ, बोलती हूँ, खुशामद करती हूँ। अगर इस तरह आँखें फेरनी थीं, तो पहले ही से उस तरह क्यों न रहे। लेकिन मैं क्या बकने लगी। तुम्हें देर हो रही है,जाओ।

    अमरकान्त ने जैसे रस्सी तुड़ाने का जोर लगाकर कहा—तुम्हारी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ रही है मुन्नी! मैं तो जैसे पहले रहता था, वैसे ही अब भी रहता हूँ। हाँ, इधर काम अधिक होने से ज्यादा बातचीत का अवसर नहीं मिलता।

    मुन्नी ने आँखें नीची करके गूढ़ भाव से कहा—तुम्हारे मन की बात में समझ रही हूँ; लेकिन वह बात नहीं है। तुम्हें भरम हो रहा है।

    अमरकान्त ने आश्चर्य से कहा—तुम तो पहेलियों में बातें करने लगीं।

    मुन्नी ने उसी भाव से जवाब दिया—आदमी का मन फिर जाता है तो सीधी बातें भी पहेली-सी लगती हैं।

    फिर वह दूध का खाली कटोरा उठाकर जल्दी से चली गयी।

    अमरकान्त का हृदय मसोसने लगा। मुन्नी जैसे सम्मोहन-शक्ति से उसे अपनी ओर खींचने लगी। 'तुम्हारे मन की बात समझ रही हूँ; लेकिन तुम्हें भ्रम हो रहा है।' यह वाक्य किसी गहरे खड्ड की भाँति उसके हृदय को भयभीत कर रहा था। उसमें उतरते दिल काँपता' था, पर रास्ता उसी खड्ड में से जाता था।

    वह न जाने कितनी देर अचेत-सा खड़ा रहा। सहसा आत्मानन्द ने पुकारा—क्या आज शाला बन्द रहेगी?

    ३

    इस इलाके के जमींदार एक महन्तजी थे। कारकुन और मुख्तार उन्हीं के चेले-चापड़ थे। इसलिए लगान बराबर वसूल होता जाता था। ठाकुरद्वारे में कोई-न-कोई उत्सव होता ही रहता था। कभी ठाकुरजी का जन्म

    है, कभी ब्याह है, कभी यज्ञोपवीत है, कभी झूला है, कभी जल-विहार है। असामियों को इन अवसरों पर बेगार देनी पड़ती थी, भेंट-न्योछावर, पूजा-चढ़ावा आदि नामों से दस्तूरी चुकानी पड़ती थी; लेकिन धर्म के मुआमले में कौन मुंह खोलता। धर्म-संकट सबसे बड़ा संकट है। फिर इलाके के काश्तकार सभी नीच जातियों के लोग थे। गाँव पीछे दो-चार घर ब्राह्मण-क्षत्रियों के थे भी, तो उनकी सहानुभूति असामियों की ओर न होकर महन्तजी की ओर थी। किसी-न-किसी रूप में वे सभी महन्तजी के सेवक थे। असामियों को उन्हें भी प्रसन्न रखना पड़ता था। बेचारे एक तो ग़रीब, ऋण के बोझ से लदे हुए, दूसरे मूर्ख, न क़ायदा जानें, न क़ानून। महन्तजी जितना चाहें इज़ाफ़ा करें, जब चाहें बेदखल करें, किसी में बोलने का साहस न था। अकसर खेतों का लगान इतना बढ़ जाता था कि सारी उपज लगान के बराबर भी न पहुँचती थी; किन्तु लोग भाग्य को रोकर, भूखे-नंगे रहकर, कुत्तों की मौत मरकर, खेत जोतते जाते थे। करें क्या? कितनों ही ने जाकर शहरों में नौकरी कर ली थी। कितने ही मजदूरी करने लगे थे। फिर भी असामियों की कमी न थी। कृषि-प्रधान देश में खेती केवल जीविका का साधन नहीं है, सम्मान की वस्तु भी है। गृहस्थ कहलाना गर्व की बात है। किसान गृहस्थी में अपना सर्वस्व खोकर विदेश जाता है, वहाँ से धन कमाकर लाता है और फिर गृहस्थी करता है। मान-प्रतिष्ठा का मोह औरों की भाँति उसे भी घेरे रहता है। वह गृहस्थ रहकर जीना और गृहस्थी ही में मरना भी चाहता है। उसका बाल-बाल कर्ज से बँधा हो, लेकिन द्वार पर दो-चार बैल बाँधकर वह अपने को धन्य समझता है। उसे साल में ३६० दिन आधे पेट खाकर रहना पड़े, पुआल में घुसकर रातें काटनी पड़ें, बेबसी से जीना और बेबसी से मरना पड़े, कोई चिन्ता नहीं, वह गृहस्थ तो है। यह गर्व उसकी सारी दुर्गत की पुरौती कर देता है।

    लेकिन इस साल अनायास ही जिन्सों का भाव गिर गया। इतना गिर गया, जितना चालीस साल पहले था। जब भाव तेज़ था, किसान अपनी उपज बेच-बाचकर लगान दे देता था; लेकिन जब दो और तीन की जिन्स एक में बिके, तो किसान क्या करे। कहाँ से लगान दे, कहाँ से दस्तूरियाँ दे, कहाँ से कर्ज चुकाये। विकट समस्या आ खड़ी हुई; और यह दशा

    कुछ इसी इलाके की न थी। सारे प्रान्त, सारे देश, यहाँ तक कि सारे संसार में यही मंदी थी। चार सेर का गुड़ कोई दस सेर में भी नहीं पूछता। आठ सेर का गेहूँ डेढ़ रुपये मन में भी मंहगा है। ३०) मन का कपास १०) रुपये में जाता है, १६) मन का सन ४) में। किसानों ने एक-एक दाना बेच डाला, भूसे का एक तिनका भी न रखा; लेकिन यह सब-कुछ करने पर भी चौथाई लगान से ज्यादा न अदा कर सके। और ठाकद्वारे में वही उत्सव थे, वही जलविहार थे। नतीजा यह हुआ कि हलके में हाहाकार मच गया। इधर कुछ दिनों से स्वामी आत्मानन्द और अमरकान्त के उद्योग से इलाके में विद्या का कुछ प्रचार हो रहा था और कई गाँवों में लोगों ने दस्तूरी देना बन्द कर दिया था। महन्तजी के प्यादे और कारकुन पहले ही से जले बैठे थे। यों तो दाल न गलती थी। बक़ाया लगान ने उन्हें अपने दिल का गुबार निकालने का मौका दे दिया।

    एक दिन गंगा-तट पर इस समस्या पर विचार करने के लिए एक पंचायत हुई। सारे इलाके के स्त्री-पुरुष जमा हए, मानो किसी पर्व का स्नान करने आये हों। स्वामी आत्मानन्द सभापति चुने गये।

    पहले भोला चौधरी खड़े हुए। वह पहले किसी अफ़सर के कोचवान थे। अब नये साल से फिर खेती करने लगे थे। लम्बी नाक, काला रंग, बड़ी-बड़ी मूछे और बड़ी-सी पगड़ी। मुंह पगड़ी में छिप गया था। बोले—पंचो, हमारे ऊपर जो लगान बँधा हुआ है, वह तेजी के समय का है। इस मंदी में वह लगान देना हमारे काबू से बाहर है। अबकी अगर बैल-बधिया बेचकर दे भी दें, तो आगे क्या करेंगे। बस, हमें इस बात का तसफ़िया करना है। मेरी गुजारस तो यही है कि हम सब मिलकर महन्त महाराज के पास चलें और उनसे अरज-मारूज करें। अगर वह न सुनें, तो हाकिम जिला के पास चलना चाहिए। मैं औरों की नहीं कहता। मैं गंगा माता की कसम खाके कहता हूँ कि मेरे घर में छटाँक भर भी अन्न नहीं है, और जब मेरा यह हाल है, तो और सभों का भी यही हाल होगा। उधर महन्तजी के यहाँ वही बहार है। अभी परसों एक हजार साधुओं को आम की पगंत दी गई है। बनारस और लखनऊ से कई डिब्बे आमों के आये हैं। आज सुनते हैं फिर मलाई की पंगत है। हम भूखों मरते हैं, वहाँ मलाई उड़ती

    है। उस पर हमारा रक्त चूसा जा रहा है। बस, यही मुझे पंचों से कहना है।

    गूदड़ ने धँसी हुई आँखें फाड़कर कहा–महन्तजी हमारे मालिक है, आनन्ददाता हैं, महात्मा हैं। हमारा दुख सुनकर ज़रूर उन्हें हमारे ऊपर दया आयेगी; इसलिए हमें भोला चौधरी की सलाह मंजूर करनी चाहिए। अमर भैया हमारी ओर से बातचीत करेंगे। हम और कुछ नहीं चाहते। बस, हमें और हमारे बाल-बच्चों को आध-आध सेर रोजीना के हिसाब से दिया जाय। उपज जो कुछ हो, वह सब महन्तजी ले जायें। हम घी-दूध नहीं माँगते, दूध-मलाई नहीं माँगते। खाली आध सेर मोटा अनाज माँगते हैं। इतना भी न मिलेगा, तो हम खेती न करेंगे। मजूरी और बीज किसके घर से लायँगे। हम खेत छोड़ देंगे, इसके सिवा दूसरा उपाय नहीं है।

    सलोनी ने हाथ चमकाकर कहा–खेत क्यों छोड़ें? बाप-दादों की निसानी है। उसे नहीं छोड़ सकते। खेत पर परान दे दूंगी। एक था, तब दो हुए, तब तक चार हुए, अब क्या धरती सोना उगलेगी?

    अलगू कोरी बिज्जू सी आँखें निकाल कर बोला–भैया, मैं तो बात बेलाग कहता हूँ, महन्त के पास चलने से कुछ न होगा। राजा ठाकुर हैं! कहीं क्रोध आ गया, तो पिटवाने लगेंगे। हाकिम के पास चलना चाहिए। गोरों में फिर भी दया है।

    आत्मानन्द ने सभों का विरोध किया–मैं कहता हूँ, किसी के पास जाने से कुछ नहीं होगा। तुम्हारी थाली की रोटी तुमसे कहे कि मुझे न खाओ, तो तुम मानोगे?

    चारों तरफ से आवाजें आई–कभी नहीं मान सकते।

    'तो तुम जिनकी थाली की रोटियाँ हो, वह कैसे मान सकता है?'

    बहुत-सी आवाज़ों ने समर्थन किया–कभी नहीं मान सकते।

    'महन्त को उत्सव मनाने को रुपये चाहिये। हाकिमों को बड़ी-बड़ी तलब चाहिए। उनकी तलब में कमी नहीं हो सकती। वे अपनी शान नहीं छोड़ सकते। तुम मरो या जियो, उनकी बला से। वह तुम्हें क्यों छोड़ने लगे।

    बहुत सी आवाजों ने हामी भरी–कभी नहीं छोड़ सकते। ⁠ अमरकान्त स्वामी जी के पीछे बैठा हुआ था। स्वामीजी का यह रुख देखकर घबड़ाया, लेकिन सभापति को कैसे रोके? यह तो वह जानता था यह गर्म मिज़ाज का आदमी है, लेकिन इतनी जल्द इतना गर्म हो जायगा इसकी उसे आशा न थी। आख़िर यह महाशय चाहते क्या हैं?

    आत्मानन्द गरजकर बोले–तो अब तुम्हारे लिए कौन-सा मार्ग है? अगर मुझसे पूछते हो, और तुम लोग परन करो कि उसे मानोगे, तो में बता सकता हूँ, नहीं तुम्हारी इच्छा।

    बहत आवाज़ आई–ज़रूर बतलाइए स्वामीजी, बतलाइए।

    जनता चारों ओर से खिसककर और समीप आ गयी। स्वामीजी उनके हृदय को स्पर्श कर रहे हैं, यह उनके चेहरे से झलक रहा था। जनरुचि सदैव उग्र की ओर होती है।

    आत्मानन्द बोले–तो आओ, आज हम सब चलकर महन्तजी का मकान और ठाकुरद्वारा घेर लें और जब तक वह लगान बिलकुल न छोड़ दें, कोई उत्सव न होने दें।

    बहुत-सी आवाजें आई–हम लोग तैयार है!

    'खूब समझ लो कि वहाँ तुम पान-फूल से पूजे न जाओगे।'

    'कुछ परवाह नहीं। मर तो रहे हैं। सिसक-सिसककर क्यों मरें।'

    'तो इसी वक्त चलो। हम दिखा दें कि…'

    सहसा अमर ने खड़े होकर प्रदीप्त नेत्रों से कहा–ठहरो!

    समूह में सन्नाटा छा गया। जो जहाँ था, वहीं रह गया।

    अमर ने छाती ठोंककर कहा–जिस रास्ते पर तुम जा रहे हो, वह उद्धार का रास्ता नहीं है–सर्वनाश का रास्ता है। तुम्हारा बैल अगर बीमार पड़ जाय, तो तुम उसे जोतोगे?

    किसी तरफ़ से आवाज न आई।

    'तुम पहले उसकी दवा करोगे, और जब तक वह अच्छा न हो जायगा, उसे न जोतोगे, क्योंकि तुम बैल को मारना नहीं चाहते। उसके मरने से तुम्हारे खेत परती पड़ जायेंगे।'

    गूदड़ बोले–बहुत ठीक कहते हो भैया।

    'घर में आग लगने पर हमारा क्या धर्म है? क्या हम आग को फैलने दें और घर की बची-बचाई चीजे भी लाकर उसमें डाल दें?'

    गुदड़ ने कहा–कभी नहीं। कभी नहीं।

    क्यों? इसीलिए कि हम घर को जलाना नहीं, बनाना चाहते हैं। हमें उस घर में रहना है। उसी में जीना है। वह विपत्ति कुछ हमारे ही ऊपर नहीं पड़ी है। सारे देश में यही हाहाकार मचा हुआ है। हमारे नेता इस प्रश्न को हल करने की चेष्टा कर रहे हैं। उन्हीं के साथ हमें भी चलना है।'

    उसने एक लम्बा भाषण किया, पर वही जनता जो उसका भाषण सुनकर मस्त हो जाती थी, आज उदासीन बैठी थी। उसका सम्मान सभी करते थे, इसीलिए कोई उधम न हुआ, कोई बमचख न मचा, पर जनता पर कोई असर न हुआ। आत्मानन्द इस समय जनता का नायक बना हुआ था।

    सभा बिना कुछ निश्चय किये उठ गयी, लेकिन बहुमत किस तरफ़ है, यह किसी से छिपा न था।

    ४

    अमर घर लौटा, तो बहुत हताश था। अगर जनता को शान्त करने का उपाय न किया गया तो अवश्य उपद्रव हो जायगा। उसने महन्तजी से मिलने का निश्चय किया। इस समय उसका चित्त इतना उदास था कि एक बार जी में आया, यहाँ सब छोड़-छाड़कर चला जाय। उसे अभी तक अनभव न हुआ था कि जनता सदैव तेज़ मिज़ाजों के पीछे चलती है। वह न्याय और धर्म, हानि-लाभ, अहिंसा और त्याग, सब कुछ समझाकर भी आत्मानन्द के फूंके हुए जादू को उतार न सका। आत्मानन्द इस वक्त यहाँ मिल जाते, तो दोनों मित्रों में ज़रूर लड़ाई हो जाती, लेकिन वह आज गायब थे। उन्हें आज घोड़े का आसन मिल गया था। किसी गाँव में संगठन करने चले गये थे।

    आज अमर का कितना अपमान हुआ। किसी ने उसकी बातों पर कान तक न दिया। उनके चेहरे कह रहे थे, तुम क्या बकते हो, तुमसे हमारा

    उद्धार न होगा। इस घाव पर कोमल शब्दों के मरहम की ज़रूरत थी–कोई उसे लेटाकर उसके घाव को फाहे से धोये, उस पर शीतल लेप करे।

    मुन्नी रस्सी और कलसा लिये हुए निकली और बिना उसकी ओर ताके कुएँ की ओर चली गयी। उसने पुकारा–ज़रा सुनती जाओ मुन्नी! पर मुन्नी ने सुनकर भी न सुना। ज़रा देर बाद वह कलसा लिये हुए लौटी और फिर उसके सामने से सिर झुकाये चली गयी। अमर ने फिर पुकारा–मुन्नी, सुनो एक बात कहनी है। पर अबकी भी वह न रुकी। उसके मन में अब सन्देह न था।

    एक क्षण में मुन्नी फिर निकली और सलोनी के घर जा पहुँची। वह मदरसे के पीछे एक छोटी-सी मड़ैया डालकर रहती थी। चटाई पर लेटी एक भजन गा रही थी। मुन्नी ने जाकर पूछा–आज कुछ पकाया नहीं काकी, यों ही सो रहीं? सलोनी ने उठकर कहा–खा चुकी बेटा, दोपहर की रोटियाँ रखी हुई थीं।

    मुन्नी ने चौके की ओर देखा। चौका साफ़ लिपा-पुता पड़ा था।

    बोली–काकी, तुम बहाना कर रही हो। क्या घर में कुछ है ही नहीं? अभी तो आते देर नहीं हुई, इतनी जल्दी खा कहाँ से लिया?

    'तू तो पतियाती नहीं है बहू! भूख लगी थी, आते ही आते खा लिया। बरतन धो-धाकर रख दिये। भला तुमसे क्या छिपाती। कुछ न होता, तो माँग न लेती?'

    'अच्छा मेरी क़सम खाओ।'

    काकी ने हँसकर कहा–हाँ, अपनी क़सम खाती हूँ, खा चुकी।

    मुन्नी दुःखित होकर बोली–तुम मुझे गैर समझती हो काकी! जैसे मुझे तुम्हारे मरने-जीने से कुछ मतलब ही नहीं। अभी तो तुमने तेलहन बेचा था, रुपये क्या किये?

    सलोनी सिर पर हाथ रखकर बोली–अरे भगवान्! तेलहन था ही कितना। कुल एक रुपया तो मिला। वह कल प्यादा ले गया। घर में आग लगाये देता था। क्या करती, निकालकर फेंक दिया। उस पर अमर भैया कहते हैं–महन्तजी से फ़रियाद करो। कोई नहीं सुनेगा बेटा! मैं कहे देती हूँ। ⁠ मुन्नी बोली–अच्छा, तो चलो मेरे घर खा लो।

    सलोनी ने सजल-नेत्र होकर कहा–तू आज खिला देगी बेटी, अभी तो पूरा चौमासा पड़ा हुआ है। आजकल तो कहीं घास भी नहीं मिलती। भगवान् न-जाने कैसे पार लगायेंगे। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। डाँड़ी अच्छी होती, तो बाकी देके चार महीने निबाह हो जाता। इस डॉंड़ी में आग लगे, आधी वाकी भी न निकली। अमर भैया को तू समझाती नहीं, स्वामीजी को बढ़ने नहीं देते।

    मुन्नी ने मुँह फेरकर कहा–मुझसे तो आजकल रूठे हुए हैं, बोलते ही नहीं। काम-धन्धे से फ़ुरसत ही नहीं मिलती। घर के आदमी से बातचीत करने को भी फ़ुरसत चाहिए। जब फटेहालों आये थे, तब फ़ुरसत थीं। यहाँ जब दुनिया मानने लगी, नाम हुआ, बड़े आदमी बन गये, तो अब फ़ुरसत नहीं है।

    सलोनी ने विस्मय-भरी आँखों से मुन्नी को देखा–क्या कहती है बहू, वह तुझसे रूठे हुए हैं? मुझे तो विश्वास नहीं आता। तुझे धोखा हुआ है। बेचारा रात-दिन तो दौड़ता है, न मिली होगी फ़ुरसत। मैंने तुझे जो असीस दिया है, वह पूरा होके रहेगा, देख लेना।

    मुन्नी अपनी अनुदारता पर सकुचाती हुई बोली–मुझे किसी की परवाह नहीं है काकी! जिसे सौ बार गरज पड़े बोले, नहीं न बोले। वह समझते होंगे–मैं उनके गले पड़ी जा रही हूँ। मैं तुम्हारे चरन छूकर कहती हूँ काकी, जो यह बात कभी मेरे मन में आई हो। मैं तो उनके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हूँ। हाँ, इतना चाहती हूँ कि वह मुझसे मन से बोलें, जो कुछ थोड़ी बहुत सेवा करूँ, उसे मन से लें। मेरे मन में बस इतनी ही साध है, कि मैं जल चढ़ाती जाऊँ और वह चढ़वाते जायें। और कुछ नहीं चाहती।

    सहसा अमर ने पुकारा। सलोनी ने बुलाया–आओ भैया, अभी बहू आ गयी, उसी से बतिया रही हूँ।

    अमर ने मुन्नी की ओर देखकर तीखे स्वर में कहा–मैंने तुम्हें दो बार पुकारा मुन्नी, तुम बोली क्यों नहीं?

    मुन्नी ने मुंँह फेरकर कहा–तुम्हें किसी से बोलने की फ़ुरसत नहीं है, तो कोई क्यों जाय तुम्हारे पास। तुम्हें बड़े-बड़े काम करने पड़ते हैं, तो औरों को भी तो अपने छोटे-छोटे काम करने ही पड़ते हैं।

    अमर पत्नीव्रत की धुन में मुन्नी से कुछ खिंचा रहने लगा था। पहले वह चट्टान पर था, सुखदा उसे नीचे से खींच रही थी। अब सुखदा टीले के शिखर पर पहुँच गयी और उसके पास पहुँचने के लिये उसे आत्मबल और मनोयोग की ज़रूरत थी। उसका जीवन आदर्श होना चाहिये; किन्तु प्रयास करने पर भी वह सरलता और श्रद्धा की इस मूर्ति को दिल से न निकाल सकता था। उसे ज्ञात हो रहा था कि आत्मोन्नति के प्रयास में उसका जीवन शुष्क निरीह हो गया है। उसने मन में सोचा, मैंने तो समझा था, हम दोनों एक-दूसरे के इतने समीप आ गये हैं कि अब बीच में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रही। मैं चाहे यहाँ रहूँ, चाहे काले कोसों चला जाऊँ; लेकिन तुमने मेरे हृदय में जो दीपक जला दिया, उसकी ज्योति ज़रा भी मन्द न पड़ेगी।

    उसने मीठे तिरस्कार से कहा–मैं यह मानता हूँ मुन्नी, इधर काम अधिक रहने से तुमसे कुछ अलग रहा; लेकिन मुझे आशा थी कि अगर चिन्ताओं से झुंझलाकर मैं तुम्हें दो-चार कड़वे शब्द भी सुना दूँ, तो तुम मुझे क्षमा करोगी। अब मालूम हुआ कि वह मेरी भूल थी।

    मुन्नी ने उसे कातर नेत्रों से देखकर कहा–हाँ लाला, वह तुम्हारी भूल थी। दरिद्र को सिंहासन पर भी बैठा दो तब भी उसे अपने राजा होने का विश्वास न आयेगा। वह उसे सपना ही समझेगा। मेरे लिये भी यही सपना जीवन का आधार है। मैं कभी जागना नहीं चाहती। नित्य यही सपना देखती रहना चाहती हूँ। तुम मुझे थपकियाँ देते जाओ, बस, मैं इतना ही चाहती हूँ। क्या इतना भी नहीं कर सकते? क्या हुआ, आज स्वामीजी से तुम्हारा झगड़ा क्यों हो गया?

    सलोनी अभी तो आत्मानन्द की तारीफ़ कर रही थी। अब अमर की मुँह-देखी कहने लगी–

    भैया ने तो लोगों को समझाया था कि महन्त के पास चलो। इसी पर लोग बिगड़ गये। पूछो, और तुम कर ही क्या सकते हो? महन्तजी पिटवाने लगें, तो भागते राह न मिले। ⁠ मुन्नी ने इसका समर्थन किया–महन्तजी धर्मात्मा आदमी हैं। भला लोग भगवान् के मन्दिर को घेरते, तो कितना अपजस होता। संसार भगवान् का भजन करता है, हम चले उनकी पूजा रोकने। न-जाने स्वामी को यह सूझी क्या और लोग उनकी बात मान गये। कैसा अन्धेर है?

    अमर ने चित्त में शान्ति का अनुभव किया। स्वामीजी से तो ज़्यादा समझदार ये अपढ़ स्त्रियाँ हैं। और आप शास्त्रों के ज्ञाता हैं। ऐसे ही मूर्ख आपको भक्त मिल गये!

    उन्होंने प्रसन्न होकर कहा–उस नवक़ारख़ाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता था काकी? लोग मन्दिर को घेरने जाते, तो फौजदारी हो जाती। ज़रा-ज़रा सी बात में तो आजकल गोलियाँ चलती हैं।

    सलोनी ने भयभीत होकर कहा–तुमने बहुत अच्छा किया भैया, जो उनके साथ न हुए। नहीं खून खच्चर हो जाता।

    मुन्नी आद्र होकर बोली–मैं तो तुम्हें उनके साथ कभी न जाने देती लाला! हाकिम संसार पर राज करता है, तो क्या रैयत का दुःख-दर्द न सुनेगा? स्वामीजी आयेंगे, तो पूछूँगी।

    आग की तरह जलता हुआ घाव सहानुभूति और सहृदयता से भरे हुए शब्दों से शीतल होता जान पड़ा। अब अमर कल अवश्य महन्तजी की सेवा में जायगा। उसके मन में अब कोई शंका, कोई दुविधा नहीं है।

    ५

    अमर गूदड़ चौधरी के साथ महन्त आशाराम गिरि के पास पहुँचा। सन्ध्या का समय था। महन्तजी एक सोने की कुरसी पर बैठे हुए थे, जिस पर मखमली गद्दा था। उनके इर्द-गिर्द भक्तों की भीड़ लगी हुई थी, जिसमें महिलाओं की संख्या ही अधिक थी। सभी धुले हुए संगमरमर के फर्श पर बैठी हुई थीं। पुरुष दूसरी ओर बैठे थे। महन्तजी पूरे छ: फीट के विशालकाय सौम्य पुरुष थे। अवस्था कोई पैंतीस वर्ष की थी। गोरा रंग, दुहरी देह, तेजस्वी मूर्ति, वस्त्र काषाय तो थे, किन्तु रेशमी। वह पाँव लटकाये बैठे हुए थे। भक्त लोग जाकर उनके चरणों को आँखों से लगाते थे, पूजा चढ़ाते थे और अपनी जगह पर आ बैठते थे। गूदड़ तो अन्दर जा न सकते थे, अमर अन्दर गया; पर वहाँ उसे कौन पूछता। आख़िर जब खड़े-खड़े आठ बज गये, तो उसने महन्तजी के समीप जाकर कहा–महाराज, मझे आपसे कुछ निवेदन करना है।

    महन्तजी ने इस तरह उसकी ओर देखा, मानो उन्हें आँखें फेरने में कष्ट है।

    उनके समीप एक दूसरा साधु खड़ा था। उसने आश्चर्य से उसकी ओर देखकर पूछा–कहाँ से आते हो?

    अमर ने गाँव का नाम बताया।

    हुकुम हुआ, आरती के बाद आओ।

    आरती में तीन घण्टे की देर थी। अमर यहाँ कभी न आया था। सोचा यहाँ की सैर ही कर लें। इधर-उधर घूमने लगा। वहाँ से पश्चिम तरफ़ तो विशाल मन्दिर था। सामने पूरब की ओर सिंहद्वार, दाहिने-बायें दो दरवाजे और भी थे। अमर दाहिने दरवाजे के अन्दर घुसा, तो देखा चारों तरफ़ चौड़े बरामदे हैं और भण्डार हो रहा है। कहीं बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में पूरियाँ कचोड़ियाँ बन रही हैं, कहीं भाँति-भाँति की शाक-भाजी चढ़ी हुई है, कहीं दूध उबल रहा है, कहीं मलाई निकाली जा रही है। बरामदे के पीछे, कमरों में खाद्य सामग्री भरी हुई थी। ऐसा मालूम होता था कि अनाज, शाक-भाजी, मेवे, फल, मिठाई की मंडियाँ हैं। एक पूरा कमरा तो केवल परवलों से भरा हुआ था। इस मौसम में परवल कितने मँहगे होते है; पर यहाँ वह भूसे की तरह भरे हुए थे। अच्छे-अच्छे घरों की महिलाएँ भक्त-भाव से व्यंजन पकाने में लगी हुई थीं। ठाकुरजी के व्यालू की तैयारी थी। अमर यह भण्डार देखकर दंग रह गया। इस मौसम में यहाँ बीसों झावे अंगूर से भरे थे।

    अमर यहाँ से उत्तर के द्वार में घुसा, तो यहाँ बाज़ार सा लगा देखा। एक लम्बी क़तार दरज़ियों की थी, जो ठाकुरजी के वस्त्र सी रहे थे। कहीं ज़री के काम हो रहे थे, कहीं कारचोबी की मसनदें और गावतकिये बनाये जा रहे थे। एक कतार सोनारों की थी, जो ठाकुरजी के आभूषण बना रहे थे। कहीं जड़ाई का काम हो रहा था, कहीं पालिश किया जाता था, कहीं पटवे गहने गूंथ रहे थे। एक कमरे में दस-बारह मुस्टण्डे जवान बैठे चन्दन रगड़ रहे थे। सबों के मुँह पर ढाटे बँधे हुए थे। एक पूरा कमरा इत्र और तेल और अगर की बत्तियों से भरा हुआ था। ठाकुरजी के नाम पर धन का कितना अपव्यय हो रहा है, यही सोचता हुआ अमर वहाँ से फिर बीचवाले प्रांगण में आया और सदर द्वार से बाहर निकला।

    गूदड़ ने पूछा–बड़ी देर लगाई। कुछ बात-चीत हुई?

    अमर ने हँसकर कहा–अभी तो केवल दर्शन हुए हैं, आरती के बाद भेंट होगी। यह कहकर उसने जो कुछ देखा था, विस्तारपूर्वक बयान किया।

    गूदड़ ने गर्दन हिलाते हुए कहा–भगवान का दरबार है। जो संसार को पालता है, उसे किस बात की कमी। सुना तो हमने भी है, लेकिन कभी भीतर नहीं गये कि कोई पूछने-पाछने लगे, तो निकाले जायँ। हाँ, घुड़साल और गऊशाला देखी है। मन चाहे तुम भी देख लो।

    अभी समय बहुत बाकी था। अमर गऊशाला देखने चला। मन्दिर के दक्खिन पशुशालाएँ थीं। सबसे पहले फ़ीलखाने में घुसे। कोई पच्चीस-तीस हाथी आँगन में जंजीरों में बँधे खड़े थे। कोई इतना बड़ा कि पूरा पहाड़, कोई इतना छोटा जैसे भैंस! कोई झूम रहा था, कोई सूंड़ घुमा रहा था, कोई बरगद के डाल-पात चबा रहा था। उनके हौदे, झूलें, अम्बारियाँ, गहने सब अलग एक गोदाम में रखे हुए थे। हरेक हाथी का अपना नाम, अपने सेवक, अपना मकान अलग था। किसी को मन भर रातिब मिलता था, किसी को चार पसेरी। ठाकुरजी की सवारी में जो हाथी था, वही सबसे बड़ा था। भगत लोग उसकी पूजा करने आते थे। इस वक्त भी मालाओं का ढेर उसके सिर पर पड़ा हुआ था। बहुत से फूल पैरों के नोचे थे।

    यहाँ से घुड़साल में पहुँचे। घोड़ों की कतारें बँधी हुई थीं, मानो सवारों की फ़ौज का पंड़ाव हो। पाँच सौ घाड़ा से कम न थे, हरेक जाति के हरेक देश के। कोई सवारी का, कोई शिकार का, कोई बग्घी का, कोई पोलो का। हरेक घोड़े पर दो-दो आदमी नौकर थे। महन्तजी को घुड़दौड़ का बड़ा शौक़ था। इनमें कई घोड़े घुड़दौड़ के थे। उन्हें रोज़ बादाम और मलाई दी जाती थी। ⁠ गऊशाले में भी चार-पाँच सौ गायें-भैंसें थी। बड़े-बड़े मटके ताजे दूध से भरे रखे थे। ठाकुरजी आरती के पहले स्नान करेंगे। पाँच-पाँच मन दूध उनके स्नान को तीन बार रोज चाहिए, भण्डार के लिए अलग।

    अभी यह लोग इधर-उधर घूम रहे थे कि आरती शुरू हो गई। चारों तरफ़ से लोग आरती करने को दौड़ पड़े।

    गूदड़ ने कहा–तुमसे कोई पूछता कौन भाई हो, तो क्या बताते?

    अमर ने मुसकराकर कहा–वैश्य बताता।

    'तुम्हारी तो चल जाती; क्योंकि यहाँ तुम्हें लोग कम जानते हैं। मुझे तो लोग रोज़ ही हाते में चरसे बेचते देखते हैं, पहचान लें, तो जीता न छोड़ें। अब देखो भगवान की आरती हो रही है और हम भीतर नहीं जा सकते। यहाँ के पण्डों-पुजारियों के चरित्र सुनो तो दाँतों उँगली दबा लो; पर वे यहाँ के मालिक हैं, और हम भीतर कदम नहीं रख सकते। तुम चाहे जाकर आरती ले लो। तुम सूरत से भी तो ब्राह्मण जँचते हो। मेरी तो सूरत ही चमार-चमार पुकार रही है।

    अमर की इच्छा तो हुई कि अन्दर जाकर तमाशा देखे; पर गूदड़ को छोड़कर न जा सका। कोई आध घण्टे में आरती समाप्त हुई और उपासक लौटकर अपने-अपने घर गये, तो अमर महन्तजी से मिलने चला। मालूम हुआ, कोई रानी साहब दर्शन कर रही हैं। वहीं आँगन में टहलता रहा।

    आध घंटे के बाद उसने फिर साधु द्वारपाल से कहा तो पता चला, इस वक्त नहीं दर्शन हो सकते। प्रातःकाल आओ।

    अमर को क्रोध तो ऐसा आया कि इसी वक्त महन्तजी को फटकारे; पर ज़ब्त करना पड़ा। अपना-सा मुँह लेकर बाहर चला आया।

    गूदड़ ने यह समाचार सुनकर कहा–इस दरबार में भला हमारी कौन सुनेगा?

    'महन्तजी के दर्शन तुमने कभी किये हैं?'

    'मैंने! भला मैं कैसे करता? कभी नहीं।'

    नौ बज रहे थे, इस वक्त घर लौटना मुश्किल था। पहाड़ी रास्ते, जङ्गली जानवरों का खटका, नदी-नालों का उतार। कहीं रात काटने की सलाह हुई। दोनों एक धर्मशाला में पहुँचे और कुछ खा-पीकर वहीं पड़

    रहने का विचार किया। इतने में दो साधु भगवान् का ब्यालू बेचते हुए नजर आये। धर्मशाला के सभी यात्री लेने दौड़े। अमर ने भी चार आने की एक पत्तल ली। पूरियाँ, हलवे, तरह-तरह की भाजियाँ, अचार-चटनी, मुरब्बे, मलाई, दही। इतना सामान था कि अच्छे दो खानेवाले तृप्त हो जाते। यहाँ चूल्हा बहुत कम घरों में जलता था। लोग यही पत्तल ले लिया करते थे। दोनों ने खूब पेट-भर खाया और पानी पीकर सोने की तैयारी कर रहे थे कि एक साधु दूध बेचने आया–शयन का दूध ले लो। अमर की इच्छा न थी; पर कुतूहल से उसने दो आने का दूध लिया। पूरा एक सेर था, गाढ़ा, मलाईदार, उसमें से केसर और कस्तूरी की सुगन्ध उड़ रही थी। ऐसा दूध उसने अपने जीवन में कभी न पिया था।

    बेचारे बिस्तर तो लाये न थे, आधी-आधी धोतियाँ बिछाकर लेटे।

    अमर ने विस्मय से कहा–इस खर्च का कुछ ठिकाना है!

    गूदड़ भक्तिभाव से बोला–भगवान् देते हैं और क्या! उन्हीं की महिमा है। हज़ार-दो-हज़ार यात्री नित्य आते हैं। एक-एक सेठिया बीस-बीस हजार की थैली चढ़ाता है। इतना खरचा करने पर भी करोड़ों रुपये बैंक में जमा हैं।

    'देखें कल क्या बातें होती हैं।'

    'मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि कल भी दर्शन न होंगे।'

    दोनों आदमियों ने कुछ रात रहे उठकर स्नान किया और दिन निकलने के पहले ड्योढ़ी पर जा पहुँचे। मालूम हुआ, महन्तजी पूजा पर हैं।

    एक घंटा बाद फिर गये तो, सूचना मिली, महन्तजी कलेऊ पर हैं।

    जब वह तीसरी बार नौ बजे गया तो मालूम हुआ, महन्तजी घोड़ों का मुआइना कर रहे हैं। अमर ने झुंझलाकर द्वारपाल से कहा–तो आखिर हमें कब दर्शन होंगे?

    द्वारपाल ने पूछा–तुम कौन हो?

    ‘मैं उनके इलाक़े का असामी हूँ। उनके इलाक़े के विषय में कुछ कहने आया हूँ।'

    'तो कारकुन के पास जाओ। इलाक़े का काम वही देखते हैं।' ⁠ अमर पूछता हुआ कारकुन के दफ्तर में पहुँचा, तो बीसों मुनीम लंबी-लंबी बही खोले लिख रहे थे। कारकुन महोदय मसनद लगाये हुक्का पी रहे थे।

    अमर ने सलाम किया।

    कारकुन साहब ने दाढ़ी पर हाथ फेरकर पूछा–अर्ज़ी कहाँ है?

    अमर ने बगलें झाँककर कहा–अर्ज़ी तो मैं नहीं लाया।

    'तो फिर यहाँ क्या करने आये?'

    'मैं तो श्रीमान् महन्तजी से कुछ अर्ज़ करने आया था।'

    'अर्ज़ी लिखाकर लाओ।'

    'मैं तो महन्तजी से मिलना चाहता हूँ।'

    'नज़राना लाये हो?'

    'मैं ग़रीब आदमी हूँ, नज़राना कहाँ से लाऊँ।'

    'इसीलिए कहता हूँ, अर्ज़ी लिखकर लाओ। उस पर विचार होगा। जो कुछ हुक्म होगा, वह सुना दिया जायगा।'

    'तो कब हुक्म' सुनाया जायगा?'

    'जब महन्तजी की इच्छा हो।'

    'महन्तजी को कितना नज़राना चाहिए?'

    'जैसी श्रद्धा हो। कम-से-कम एक अशर्फ़ी।'

    'कोई तारीख़ बता दीजिए, तो मैं हुक्म सुनने आऊँ। यहाँ रोज कौन दौड़ेगा?'

    'तुम दौड़ोगे और कौन दौड़ेगा। तारीख़ नहीं बतायी जा सकती।'

    अमर ने बस्ती में जाकर विस्तार के साथ अर्ज़ी लिखी और उसे कारकुन की सेवा में पेश कर दिया। फिर दोनों घर चले गये।

    इनके आने की ख़बर पाते ही गाँव के सैकड़ों आदमी जमा हो गये। अमर बड़े संकट में पड़ा। अगर उनसे सारा वृत्तान्त कहता है, तो लोग उसी को उल्लू बनायेंगे। इसलिए बात बनानी पड़ी–अर्ज़ी पेश कर आया हूँ। उस पर विचार हो रहा है।

    काशी ने अविश्वास के भाव से कहा–वहाँ महीनों में विचार होगा तब तक यहाँ कारिन्दे हमें नोच डालेंगे। ⁠ अमर ने खिसियाकर कहा–महीनों में क्यों विचार होगा? चार दिन तो बहुत हैं।

    पयाग बोला–यह सब टालने की बातें हैं। खुशी से कौन अपने रूपये छोड़ सकता है?

    अमर रोज सबेरे जाता और घड़ी रात गये लौट आता। पर अर्ज़ी पर विचार न होता था। कारकुन, उनके मुहरिरों, यहाँ तक कि चपरासियों को मिन्नत-समाजत करता; पर कोई न सुनता था। रात को वह निराश होकर लौटता तो गाँव के लोग यहाँ उसका परिहास करते।

    पयाग कहता–हमने तो सुना था कि रुपये में ।।) छूट हो गयी।

    काशी कहता–तुम झूठे हो। मैंने तो सुना था, महन्तजी ने इस साल पूरी लगान माफ कर दी।

    उधर आत्मानन्द हलक़े में बराबर जनता को भड़का रहे थे। रोज़ बड़ी-बड़ी किसान-सभाओं की ख़बरें आती थीं। जगह-जगह किसान-सभाएँ बन रही थीं। अमर की पाठशाला भी बन्द पड़ी थी। उसे फ़ुरसत ही न मिलती थी। पढ़ाता कौन। रात को केवल मुन्नी अपनी कोमल सहानुभूति से उसके आँसू पोंछती थी।

    आख़िर सातवें दिन उसकी अर्ज़ी पर हुक्म हुआ कि सायल पेश किया जाय। अमर महन्त के सामने लाया गया। दोपहर का समय था। महन्तजी खसखाने में एक तख्त पर मसनद लगाये लेटे हुए थे। चारों तरफ़ खस की टट्टियाँ थीं जिन पर गुलाब की छिड़काव हो रहा था। बिजली के पंखे चल रहे थे। अन्दर इस जेठ के महीने में भी इतनी ठंडक थी, कि अमर को सर्दी लगने लगी।

    महन्तजी के मुख-मंडल पर दया झलक रही थी। हुक्के का एक क़श खींचकर मधुर स्वर में बोले–तुम इलाके ही में रहते हो न? मुझे यह सुनकर बड़ा दुःख हुआ कि मेरे असामियों को इस समय कष्ट है। क्या सचमुच उनकी दशा यही है, जो तुमने अर्ज़ी में लिखी है?

    अमर ने प्रोत्साहित होकर कहा–महाराज, उनकी दशा इससे कहीं ख़राब है। कितने ही घरों में चूल्हा नहीं जलता।

    महन्त ने आँखें बन्द करके कहा–भगवान्! यह तुम्हारी क्या लीला है–तो तुमने मुझे पहले ही क्यों न ख़बर दी। मैं इस फ़स्ल की वसूली रोक देता। भगवान् के भण्डार में किस चीज़ की कमी है। मैं इस विषय में बहुत जल्द सरकार से पत्र-व्यवहार करूँगा और वहाँ से जो कुछ जवाब आयेगा, वह असामियों को भिजवा दूंगा। तुम उनसे कहो, धैर्य रखें। भगवान् यह तुम्हारी क्या लीला है?

    महन्तजी ने आँखों पर ऐनक लगा ली और दूसरी अर्ज़ियाँ देखने लगे तो अमरकान्त भी उठ खड़ा हुआ। चलते-चलते उसने पूछा–अगर श्रीमान् कारिन्दों को हुक्म दे दें कि इस वक्त असामियों को दिक न करें, तो बड़ी दया हो। किसी के पास कुछ नहीं है; पर मार-गाली के भय से बेचारे घर की चीज़ें बेच-बेचकर लगान चुकाते हैं। कितने ही तो इलाक़ा छोड़-छोड़ भागे जा रहे हैं।

    महन्तजी की मुद्रा कठोर हो गयी–ऐसा नहीं होने पायेगा। मैंने कारिंदों को कड़ी ताकीद कर दी है कि किसी असामी पर सख्ती न की जाय। मैं उन सबों से जवाब तलब करूँगा। मैं असामियों का सताया जाना बिल्कुल पसन्द नहीं करता।

    अमर ने झुककर महन्तजी को दण्डवत किया और वहाँ से बाहर निकला, तो उसकी बाछें खिली जाती थीं। वह जल्द-से-जल्द इलाके में पहुँचकर यह ख़बर सुना देना चाहता था। ऐसा तेज जा रहा था, मानो दौड़ रहा है। बीच-बीच में दौड़ भी लगा लेता था, पर सचेत होकर रुक जाता था। लू तो न थी पर धूप बड़ी तेज़ थी, देह फुंकी जाती थी, फिर भी वह भागा चला जाता था। अब वह स्वामी आत्मानन्द से पूछेगा, कहिए, अब तो आपको विश्वास आया न कि संसार में सभी स्वार्थी नहीं हैं? कुछ धर्मात्मा भी हैं, जो दूसरों का दुःख-दर्द समझते हैं। अब उसके साथ के बेफ़िकों की ख़बर भी लेगा। अगर उसके पर होते तो उड़ जाता।

    सन्ध्या समय वह गाँव में पहुँचा, तो कितने ही उत्सुक, किन्तु अविश्वास से भरे नेत्रों ने उसका स्वागत किया।

    काशी बोला–आज तो बड़े प्रसन्न हो भैया; पाला मार आये क्या?

    अमर ने खाट पर बैठते हए अकड़कर कहा–जो दिल से काम करेगा, वह पाला मारेगा ही। ⁠ बहुत से लोग पूछने लगे–भैया, क्या हुकूम हुआ?

    अमर ने डाक्टर की तरह मरीज़ों को तसल्ली दी–महन्तजी को तुम लोग व्यर्थ बदनाम कर रहे थे। ऐसी सज्जनता से मिले कि मैं क्या कहूँ; कहा हमें तो कुछ मालूम ही नहीं, पहले ही क्यों न सूचना दी, नहीं हमने वसूली बन्द कर दी होती। अब उन्होंने सरकार को लिखा है। यहाँ कारिंदों को भी वसूली की मनाही हो जायगी।

  • कपालकुण्डला

    कपालकुण्डला

    Aproximadamente 45.432 palavras.

    कपालकुण्डला
    https://hi.wikisource.org/wiki/कपालकुण्डला

    चौथा खण्ड

    :१:

    शयनागार में

    “अधिकार बेड़ी भाँगी, एकमम मिनति”

    —ब्रजाङ्गना काव्य

    लुत्फुन्निसाके आगरा जाने और फिर सप्तग्राम लौटकर आनेमें कोई एक साल हुआ है। कपालकुण्डला एक वर्षसे नवकुमारकी गृहिणी है। जिस दिन प्रदोषकालमें लुत्फुन्निसा जंगल आई उस समय कपालकुंडला कुछ अनमनी-सी अपने शयनागारमें बैठी है। पाठकोंने समुद्रतटवासिनी, आलुलायित केशा और भूषणविहीना जिस कपालकुण्डलाको देखा था, अब वह कपालकुंडला नहीं है। श्यामासुन्दरीकी भविष्यवाणी सत्य हुई है। पारसमणिके स्पर्शसे योगिनी गृहिणी हुई है, इस समय वह सारे रेशम जैसे रूखे लम्बे बाल, जो पीठपर अनियन्त्रित फहराया करते थे अब आपसमें गुँथकर वेणी-रूपमें शोभा पा रहे हैं। वेणीरचनामें भी बहुत कुछ शिल्प-परिपाटी है, केशविन्यासमें सूक्ष्म केशीकार्य श्यामासुन्दरीके विन्यास-कौशलका परिचय दे रहा है। फूलोंको भी छोड़ा नहीं गया है, वे भी वेणीमें चारों तरफ खूबसूरतीके साथ गूँथे हुए हैं। सरपरके बाल भी समान ऊँचाईमें नहीं, बल्कि मालूम होता है, कि आकुंचनयुक्त कृष्ण तरंग मालाकी तरह शोभित हैं। मुखमंडल अब केशसमूहसे ढँका नहीं रहता; ज्योतिर्मय होकर शोभा पाता है। केवल कहीं-कहीं पुष्प-गुच्छ लटक रहे हैं और स्वेदविन्दु झलक रहे हैं। वर्ण वही, अर्द्ध-पूर्णशशाङ्क-रश्मिरुचिर। अब दोनों कानोंमें स्वर्ण कुण्डल लहरा रहे हैं; गलेमें नेकलेस हार है। रंगके आगे वह म्लान नहीं है। वल्कि वह इस प्रकार शोभा पा रहे हैं जैसे अर्धचन्द्र-कौमुदी-वसना धारिणीके अङ्गपर वह नैश कुसुमवत शोभित हैं। वह दुग्धश्वेत जैसे शुभ्र वस्त्र पहने हुए है; वह वस्त्र आकाशमण्डलमें खेलनेवाले सफेद बादलोंकी तरह शोभा पा रहे हैं।

    यद्यपि वर्ण वही है लेकिन पूर्वापेक्षा कुछ म्लान, जैसे आकाश में कहीं काले मेघ झलक रहे हों। कपालकुण्डला अकेली बैठी न थी। उसकी सखी श्यामासुन्दरी पासमें बैठी हुई है। उन दोनोंमें आपसमें बातें हो रही थीं। उनकी वार्ताका कुछ अंश पाठकोंको सुनना होगा।

    कपालकुण्डलाने पूछा—“नन्दोईजी, अभी यहाँ कितने दिन रहेंगे?”

    श्यामाने उत्तर दिया—“कल शामको चले जायेंगे। आहा आज रातको भी यही औषधि लाकर रख लेती तो भी उन्हें वश कर मनुष्य जन्म सार्थक कर सकती। कल रातको निकली तो लात-जूता खाया, फिर भला आज रात कैसे निकलूँ?”

    क०—दिनको ले आनेसे काम न चलेगा?

    श्या०—नहीं, दिनमें तोड़नेसे फल न होगा। ठीक आधी रातको खुले बालोंसे तोड़ना होता है, अरे बहन! क्या कहें, मनकी साध मनमें ही रह गयी।

    क०—अच्छा, आज दिनमें तो मैं उस पेड़को पहचान ही आई हैं; और जिस वनमें है, वह भी जान चुकी हूँ। अब आज तुम्हें जाना न होगा, मैं अकेली ही रातमें जाकर औषधि ला दूँगी।

    श्या०—नहीं-नहीं। एक दिन जो हो गया सो हो गया। तुम रातको अकेली न निकलना।

    क०—इसके लिए तुम चिन्ता क्यों करती हो? सुन तो चुकी हो, रातको जंगलमें अकेली घूमना मेरा बचपनका अभ्यास है। मनमें विचार करो, यदि मेरा ऐसा अभ्यास न होता, तो आज कभी तुमसे मुलाकात भी न हुई होती।

    श्याम०—इस ख्यालसे नहीं कहती हूँ। किन्तु यह ख्याल है कि रातको जंगलमें अकेली घूमना क्या भले घरकी बहू-बेटियोंका काम है? दो आदमियोंके रहने पर तो इतना तिरस्कार उठाना पड़ा, तुम यदि अकेली गयीं, तो भला कैसे रक्षा होगी?

    क०—इसमें हर्ज ही क्या है? तुम क्या यह ख्याल करती हो कि मैं रातमें घरके बाहर होते ही कुचरित्रा हो जाऊँगी?

    श्या०—नहीं-नहीं। यह ख्याल नहीं। लेकिन बुरे लोग तो बुराई करते ही हैं।

    क०—कहने दो; मैं उनके कहनेसे बुरी तो हो न जाऊँगी।

    श्या०—यह तो है ही; लेकिन तुम्हें कोई बुरा-भला कहे तो हम लोगोंके मनको चोट पहुँचेगी।

    क०—इस तरहकी व्यर्थकी चोट न पहुँचने दो।

    श्या०—खैर, मैं यह भी कर सकूँगी, लेकिन भैयाको क्यों नाराज-दुखी करती हो?

    कपालकुण्डलाने श्यामासुन्दरीके प्रति एक विमल कटाक्षपात किया। बोली—“इसमें यदि वह नाराज हों, तो मैं क्या करूँ, मेरा क्या दोष? अगर जानती कि स्त्रियोंका विवाह दासी बनना है, तो कभी शादी न करती।

    इसके बाद और जवाब-सवाल करना श्यामासुन्दरीने उचित न समझा; अतः वह अपने कामसे हट गयी।

    कपालकुण्डला आवश्यकीय कार्यादिसे निवृत्त हुई। घरके कामसे खाली हो, वह औषधि लानेके लिये घरसे निकल पड़ी। उस समय एक पहर रात बीत चुकी थी। चाँदनी रात थी। नवकुमार बाहरी कमरमें बैठे हुए थे। उन्होंने खिड़कीमें से देखा कि कपालकुएडला बाहर जा रही है। उन्होंने भी घरके बाहर हो मृण्मयी का हाथ पकड़ लिया। कपालकुण्डलाने पूछा—“क्या?”

    नवकुमारने पूछा—“कहाँ जाती हो?” नवकुमारके स्वरमें तिरस्कारका लेशमात्र भी न था।

    कपालकुण्डला बोली—“श्यामासुन्दरी अपने पतिको वशमें करनेके लिए एक जड़ी चाहती है, वही लेने जाती हूँ।”

    नवकुमारने पूर्ववत् कोमल स्वरमें पूछा—“कल तो एक बार हो आई थी; फिर आज क्यों?”

    क०—कल खोजकर पा न सकी। आज फिर खोजूँगी।

    नवकुमारने कोमल स्वरमें ही कहा—“अच्छा, दिनमें जानेसे क्या काम न होगा?” नवकुमारका स्वर स्नेहपूर्ण था।

    कपालकुएडलाने कहा—“लेकिन दिनकी ली गयी जड़ी फलती नहीं।”

    नव०—तो तुम्हें खोजनेकी क्या जरूरत है? मुझे जड़ीका नाम बता दो, मैं खोजकर ला दूँगा।

    क०—मैं पेड़ देखकर पहचान सकती हूँ, उसका नाम नहीं जानती और तुम्हारे तोड़नेसे भी उसका फल न होगा। औरतोंको बाल खोलकर तोड़ना पड़ता है। तुम परोपकारमें विघ्न न डालो।

    कपालकुण्डलाने यह बात अप्रन्नतापूर्वक कही। नवकुमारने भी फिर आपत्ति न की। बोले—“चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।”

    कपालकुण्डलाने अभिमान भरे स्वरमें कहा—“आओ, मैं अविश्वासिनी हूँ या क्या हूँ, अपनी आँखसे देख लो।”

    नवकुमारने फिर कुछ न कहा। उन्होंने कपालकुण्डलाका हाथ त्याग दिया और घरके अन्दर चले गये। कपालकुण्डला अकेली जङ्गलमें घुसी।

    ⋆

    ↑

    अनुवादक की भ्रान्ति। मूलमें है:

    राधिकार बेड़ी भाङ, ए मम मिनति।

    ⁠ ब्रजाङ्गना काव्य

    :२:

    जंगलमें

    —“Tender is the night.

    and happy the queen moon is on her throne

    Clustered around by all her starry fays.

    But see there is on light.”

    —Keats.

    सप्तग्रामका यह भाग जङ्गलमय है, यह बहुत कुछ पहले लिखा जा चुका है। गाँवसे थोड़ी ही दूर पर घना जङ्गल है। कपालकुण्डला एक संकीर्ण जङ्गली राहसे अकेली औषधिकी खोजमें चली। निस्तब्ध रात्रि थी, शब्दहीन, किन्तु मधुर। मधुर रात्रिमें स्निग्ध और उज्ज्वल किरण फैलाते हुए चन्द्रदेव आकाशमें रुपहले बादलोंको अतिक्रम करते अपनी यात्रा कर रहे थे। नीरव हो वृक्षके पत्ते उन किरणोंसे अठखेलियाँ कर रहे थे। शान्त लतागुल्मोंके बीच फूल खिलकर सफेद चाँदनीमें अपने अस्तित्वसे होड़ लगा रहे थे। पशु-पक्षी सब नीरव थे, प्रकृति नीरव थी, लेकिन कभी-कभी घोसलोंमें बैठे पक्षियोंके डैनोंकी फड़फड़ाहट, सूखे पत्तोंके गिरनेका शब्द, सर्पादि जीवोंके रेंगने और दूर कुत्तोंके भौंकनेका शब्द सुनाई पड़ जाता था। वायु भी निस्तब्ध थी, यह बात नहीं, वह चल रही थी, लेकिन इतनी मृदुगतिसे कि केवल ऊपरी वृक्षपत्रमात्र हिलते थे, लताएँ रस लेती थीं; आकाशमें निरभ्र मेघखण्ड धीरे-धीरे उड़ रहे थे। उस प्रकृतिकी नीरवताका सुख लेनेवाला अनुभव कर सकता था कि मन्द वायु-प्रवाह जारी है। पूर्व-सुखकी स्मृति जाग रही थी।

    कपालकुण्डलाकी पूर्व स्मृति इस समय जागी। उसे याद आया कि सागर तटवर्ती बालियाड़ी ढूहेपर मन्द वायु किस प्रकार उसके केशोंके साथ खिलवाड़ करती थी। आकाशकी तरफ देखा, अनन्त नील मण्डल याद आया, समुद्रका रूप। कपालकुएडला इसी तरहकी पूर्व स्मृतिसे अनमनी चली जा रही है।

    अनमनी होनेके कारण, कपालकुण्डलाको याद न रहा कि वह किस कामके लिए कहाँ जा रही है। जिस राहसे वह जा रही है, वह क्रमशः अगम्य होने लगा। जगल घना हो गया। मस्तकपर लता-वृक्षका वितान घना हो गया। चाँदनी न आनेके कारण अँधेरा हो गया। क्रमशः राह भी गुम हो गयी। राह न मिलनेके कारण कपालकुण्डलाका स्वप्न भंग हुआ। उसने उधर ताक कर देखा, दूर एक रोशनी जल रही थी। लुत्फुन्निसाने भी पहले इसी रोशनीको देखा था। पूर्व अभ्यासके कारण कपालकुण्डला इन सब बातोंसे भयरहित थी; लेकिन कौतूहल तो अवश्य हुआ। वह धीरे-धीरे उस ज्योतिके समीप पहुँची। उसने जाकर देखा कि जहाँ रोशनी जल रही है, वहाँ तो कोई भी नहीं; किन्तु उससे थोड़ी ही दूर पर घना जंगल होनेके कारण एक टूटी मड़ैया-सी अस्पष्ट दिखाई दी। उसकी दीवारें यद्यपि ईटों की थीं, किन्तु टूटी-फूटी-छोटीसी केवल एक कोठरीमात्र थी। उस घरमें से बातचीतकी आवाज आ रही थी। कपालकुण्डला निःशब्द पैर रखती हुई उस मड़ैयाके पास जा पहुँची। पास पहुँचते ही मालूम हो गया कि दो मनुष्य सावधानीके साथ बातें कर रहे हैं। पहले तो वह बात कुछ समझ न सकी; लेकिन बादमें पूरी चेष्टा करने पर निम्नलिखित प्रकार की बातें सुनाई पड़ीं—

    एक कह रहा है—“मेरा अभीष्ट मृत्यु है; इसमें यदि ब्राह्मण सहमत न हों, तो मैं तुम्हारी सहायता न करूँगा; तुम भी मेरी सहायता न करना।”

    दूसरा बोला—“मैं भी मंगलाकांक्षी नहीं हूँ, लेकिन जीवन भरके लिए, उसका निर्वासन हो; इसमें मैं राजी हूँ। लेकिन हत्याकी कोई चेष्टा मेरे द्वारा नहीं हो सकती, वरन् उसके प्रतिकूलाचरण ही करूँगी।

    फिर पहलेने कहा—“बहुत अबोध हो तुम। तुम्हें कुछ ज्ञान सिखाता हूँ। मन लगाकर सुनो। बहुत ही गूढ़ बातें कहूँगा। एक बार चारों तरफ देख तो जाओ, मुझे श्वासकी आवाज लग रही है।”

    वस्तुतः बातें मजेमें सुनने के लिए कपालकुण्डला मड़ैयाके दरवाजेके समीप ही आ गयी थी। अतीव आग्रह होनेके कारण उसकी साँसें जोर-जोरसे चल रही थीं।

    साथीकी बातोंपर एक व्यक्ति घर के दरवाजे पर आया और आते ही उसने कपालकुण्डलाको देख लिया। कपालकुण्डलाने भी चमकीली चाँदनीमें उस आगन्तुकको देखा। वह स्थिर न कर सकी कि उस आगन्तुकको देखकर वह खुश हो, या डरे। उसने देखा कि आगन्तुक ब्रह्मवेशी है। सामान्य धोती पहने हुए है, शरीर एक उत्तरीय द्वारा अच्छी तरह ढँका हुआ है। ब्राह्मणकुमार बहुत ही कोमल और नवयुवक जान पड़ा; कारण, उसके चेहरेसे बहुत ही कमनीयता दिखाई पड़ी थी, चेहरा अतीव सुन्दर है, स्त्रियों के चेहरेके अनुरूप, लेकिन रमणी दुर्लभ तेजविशिष्ट है। उसके बाल मर्दोंकी तरह कटे हुए नहीं, बल्कि स्त्रियोंकी तरह घुँघराले कुछ पीठ और छाती पर लटक रहे थे। ललाट पर चमक, उभरा हुआ और एक शिरा साफ दिखाई पड़ती थी। दोनों आँखोंमें गजबका तेज था। हाथमें एक नङ्गी तलवार थी। किन्तु इस रूपराशिमें एक तरहका भीषण भाव दिखाई पड़ रहा था। हेमन्त वर्णपर मानो कोई कराल छाया पड़ गयी हो उसकी अन्तस्तल तक धँस जानेवाली आँखोंकी चमक देखकर कपालकुण्डला भयभीत हुई।

    दोनों एक दूसरेको एक क्षण तक देखते रहे। पहले कपालकुण्डलाने आँखें झपकायीं। उसकी आँखें झपकते ही आगन्तुकने पूछा—“तुम कौन?”

    यदि एक वर्ष पहले उस जङ्गलमें ऐसा प्रश्न किसीने किया होता तो कपालकुण्डला समुचित उत्तर तुरंत प्रदान करती, लेकिन इस समय इस बदली हुई परिस्थितिमें वह गृहलक्ष्मी-स्वभाव हो गयी थी, अतः सहसा उत्तर दे न सकी। ब्राह्मणवेशी कपालकुण्डलाको निरुत्तर देखकर गम्भीर होकर कहा—“कपालकुण्डलाǃ इस रातमें भयानक जंगलमें तुम किस लिए आई हो?”

    एक अज्ञात रात्रिचर पुरुषके मुखसे अपना नाम सुनकर कपालकुण्डला अवाक् हो रही। फिर उसके मुँहसे कोई जवाब न निकला।

    ब्राह्मणवेशीने फिर पूछा—“तुमने हम लोगोंकी बातें सुनी हैं?”

    सहसा कपालकुएडलाकी वाक्‌शक्ति फिर जागी। उसने उत्तर देनेके बाद पूछा—“मैं भी वही पूछती हूँ। इस जंगलमें रातके समय तुम दोनों कौन-सी कुमन्त्रणा कर रहे थे?”

    ब्राह्मणवेशी कुछ देरतक चिन्तामग्न निरुत्तर रहा। मानो उसके हृदयमें कोई नयी इष्टसिद्धिका प्रकार आ गया हो। उसने कपाल कुण्डलाका हाथ पकड़ लिया और उस मड़ैयासे थोड़ा किनारे हटा कर ले जाने लगा। कपालकुण्डलाने बड़े ही क्रोधसे झटका देकर अपना हाथ छुड़ा लिया। ब्राह्मणवेशीने बड़ी मिठाससे कानोंके पास धीरेसे कहा—“चिन्ता क्यों करती हो? मैं पुरुष नहीं हूँ।”

    कपालकुण्डला और आश्चर्यमें आई। इस बातका उसे कुछ विश्वास भी हुआ और नहीं भी। वह ब्राह्मणवेशधारिणीके साथ गयी। उस टूटे घरसे थोड़ी दूर आड़में पहुँचकर उसने कहा—“हम लोग जो कुपरामर्श कर रहे थे, उसे सुनोगी? वह तुम्हारे ही सम्बन्ध में है।”

    कपालकुण्डलाका भय और आग्रह बढ़ गया। बोली—“सुनूँगी।” छद्मवेशीने कहा—“तो जबतक न लौटूँ, यहीं प्रतीक्षा करो।”

    यह कहकर वह छद्मवेशी उस भग्न घरमें लौट गया। कपालकुण्डला कुछ देर तक यहाँ खड़ी रही। लेकिन उसने जो कुछ सुना और देखा था, उससे उसे बहुत भय जान पड़ने लगा। यह कौन जानता है कि वह छद्मवेशी उसे यहाँ क्यों बैठा गया है? हो सकता है, अपना अवसर पाकर वह अपनी अभिसन्धि पूर्ण किया चाहता हो। यह सब सोचती हुई कपालकुण्डला भयसे विह्वल हो गयी। इधर ब्रह्मवेशीके लौटनेमें देर होने लगी। अब कपालकुण्डला बैठी रह न सकी, तेजीसे घरकी तरफ चली।

    उधर आकाश भी घटासे काला पड़ने लगा। जंगलमें चाँदनी से जो प्रकाश फैल रहा था, वह भी दूर हो गया। कपालकुण्डला को प्रतिपल देर जान पड़ने लगी। अतः वह तेजीसे जंगलसे बाहर होने लगी। आनेके समय उसे साफ पीछेसे दूसरेकी पदध्वनि सुनाई पड़ने लगी। पीछे फिरकर देखनेसे अन्धकारमय कुछ दिखाई न पड़ा। कपालकुण्डलाने सोचा कि ब्रह्मवेशी उसके पीछे आ रहा है। घना जंगल पीछे छोड़ वह उस क्षुद्र जंगली राह पर आ गयी थी। वहाँ उतना अँधेरा न था, देखनेसे कुछ दिखाई पड़ सकता था, लेकिन उसे कुछ भी दिखाई न पड़ा। अतः वह फिर तेजीसे कदम बढ़ाती हुई चली, फिर पदशब्द सुनाई पड़ा। आकाश काली-काली घटाओंसे भयानक हो उठा था। कपालकुण्डला और भी तेजी से आगे बढ़ी। घर बहुत ही करीब था; लेकिन इसी समय हवा के झटकेके साथ बूँदी पड़ने लगी। कपालकुण्डला दौड़ी। उसे ऐसा जान पड़ा कि पीछा करनेवाला भी दौड़ा। घर सामने दिखाई पड़ते-न-पड़ते भयानक वर्षा शुरू हो गयी। भयानक गर्जनके साथ बिजली चमकने लगी। आकाशमें बिजलीका जाल बिछ गया और रह-रहकर वज्र टूटने लगा। कपालकुण्डला किसी तरह आत्मरक्षा कर घर पहुँची। पास का बगीचा पारकर दरवाजेके अन्दर दाखिल हुई। दरवाजा उसके लिए खुला हुआ था। दरवाजा बन्द करनेके लिए वह पलटी। उसे ऐसा जान पड़ा कि सामने दरवाजेके बाहर कोई वृद्धाकार मनुष्यमूर्ति खड़ी थी। इसी समय एक बार बिजली चमक गयी। उस एक ही चमकमें कपालकुण्डला उसे पहचान गयी। वह सागरतीरवासी वही कापालिक है।

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    अनुवादक की भ्रान्ति। मूलमें है:

    —“Tender is the night,

    And haply the Queen moon is on her throne

    Clustered around by all her starry fays;

    But here there is no light.”

    ⁠ Keats.

    :३:

    स्वप्नमें

    “I had a dream; which was

    not at all adream .”

    —Byron

    कपालकुण्डलाने धीरे-धीरे दरवाजा बन्द कर दिया और शयनागारमें आयी। वह धीरेसे अपने पलंगपर सो रही। मनुष्यहृदय अनन्त समुद्र है, जब उससे प्रबल वायु समर करने लगती है तो कितनी तरंगें उठती हैं, यह कौन गिन सकता है। प्रबल वायुसे हिलता और वर्षाजलसे भींगा हुआ जटाजूटधारी कापालिकका चेहरा उसे सामने दिखाई पड़ने लगा; पहलेकी समूची घटनाओंकी कपालकुण्डला याद करने लगी। घने जंगलमें कापालिककी वह भैरवी पूजा, अन्यान्य पैशाचिक कार्य, वह उसके साथ कैसा आचरण कर भागकर आयी है, नवकुमारको बन्धन, यह सब याद आने लगा। कपालकुण्डला काँप उठी। आज रातकी सारी घटनाएँ आँखके सामने नाच उठीं। श्यामाकी औषधिकामना, नवकुमारका निषेध, उनके प्रति कपालकुण्डलाका तिरस्कार, इसके बाद अरण्यकी ज्योत्स्नामयी शोभा, वह भीषण दर्शन सब याद आया।

    पूर्व दिशामें उषाकी मुकुट ज्योति प्रकट हुई, उस समय कपालकुण्डलाको तन्द्रा आ गयी। उस हल्की नींदमें कपालकुण्डला स्वप्न देखने लगी। मानों वह उसी सागरवक्षपर नावपर सवार चली जा रही है, तरणी सजी हुई, उसपर वासन्ती रंगकी ध्वजा फहरा रही है, नाविक फूलोंकी माला पहने हुए, नाव खे रहे हैं। राधेश्यामका अनन्त प्रणयगीत हो रहा है। पश्चिम गगनसे सूर्य तप रहे हैं, स्वर्ण धारामें समुद्र हँस रहा है। आकाशमें खण्ड-खण्ड मेघ भी उस धारामें स्नान कर रहे हैं। एकाएक रात हो गयी। सूर्य कहाँ चले गये! सुनहले बादल कहाँ गए! घने-काले बादल छा गये। समुद्रमें दिक्भ्रम होने लगा। किधर जाया जाय! नाव पलटी। गाना बन्द हुआ, गलेकी माला फेंक दी गयी, पताका गायब हो गयी, आँधी आयी। सागरमें वृक्ष-परिमाण लहरें उठने लगीं। लहरसे कापालिक प्रकट हुआ। बाएँ हाथमें नाव पकड़ डुबानेको तैयार हुआ। इसी समय वह ब्राह्मणवेषधारी प्रकट हुआ। उसने पूछा—“बोलो नाव डुबा दें, या बचा दें?” कपालकुण्डलाने कहा—“डुबा दो।” उसने नावको छोड़ दिया। नाव भी बोल उठी—“अब मैं भार उठा न सकूँगी, पातालमें जाती हूँ?” यह कहती हुई नाव पातालमें प्रवेश कर गयी।

    पसीनेसे नहायी हुई, कपालकुण्डला स्वप्नसे जाग उठी। उसने देखा कि सबेरा हो गया है। उन्मुक्त खिड़कीसे वासन्ती हवा आ रही है। वृक्ष हलकी हवासे फूल सहित झूम रहे हैं। हिलती शाखाओंपर बैठे पक्षी गा रहे हैं। कितनी फूलोंसे लदी शाखाएँ खिड़की के अन्दर घुसी आ रही हैं। कपालकुण्डला नारी-स्वभाववश उन शाखाओंको एकत्र करने लगी। एकाएक उसमेंसे एक लिपि बाहर हुई। कपालकुण्डला पढ़ना जानती थी; उसने पढ़ा—पत्र यों था—

    “आज शामके बाद कल रातकी तरह ब्राह्मणकुमारके साथ मुलाकात करो। तुम अपने बारेमें जो प्रयोजनीय बात सुनना चाहती थीं, उसे सुनोगी।—अहं ब्राह्मणवेशी।”

    ⋆

    :४:

    संकेतानुसार

    उस दिन शामतक कपालकुण्डला केवल यही चिन्ता करती रही कि ब्राह्मणवेशीके साथ मुलाकात करना चाहिए या नहीं। एक पतिव्रता युवतीके लिये निर्जन रातमें परपुरुष सम्भाषण बुरा और निन्दनीय है, केवल यही विचार कर वह मिलनेमें हिचकती थी, कारण, उसका सिद्धान्त था कि असद्उद्देश्यसे न मिलनेसे कोई हानि नहीं है। स्त्रीको स्त्रीसे या पुरुषको पुरुषसे मिलनेका, जैसा अधिकार मुझे है, वैसा ही अधिकार निर्मल चित्त रखनेपर उसे भी प्राप्त है। सन्देह केवल यह है कि ब्राह्मणवेशी पुरुष है या स्त्री। उसे संकोच था तो केवल इसलिए कि मुलाकात मंगलजनक है अथवा नहीं। पहले ब्राह्मणवेशीसे मुलाकात, फिर कापालिक द्वारा पीछा और दर्शन और अन्तमें स्वप्न, इन सब घटनाओंने कपालकुण्डलाको बहुत डरा दिया था। उसका अमङ्गल निकट है उसे ऐसा जान पड़ने लगा और उसे यह भी सन्देह न रहा कि यह अमङ्गल कापालिकके आगमनके कारण है। यह तो स्पष्ट ही उसने कहा कि बातें कपालकुण्डलाके बारेमें ही हो रही थीं। हो सकता है, उसके द्वारा कोई बचावकी भी राह निकल आये। लेकिन बातोंसे तो यही जान पड़ता है कि या तो मृत्यु अथवा निर्वासन दण्ड। तो क्या ये सारी बातें मेरे ही लिए हैं? ब्राह्मणवेशीने तो कहा था कि उसके बारेमें ही बात है। ऐसी कुमंत्रणामें ब्राह्मणवेशी जब सहकारी है, तो उससे मिलना मंगलजनक नहीं, बल्कि आफत स्वयं बुलाना होगा। लेकिन रातमें जो स्वप्न देखा उसमें तो ब्राह्मणवेशीके कथनसे जान पड़ा कि वह रक्षा भी कर सकता है। तो क्या होगा? क्या वह स्वप्नकी तरह डुबायेगा? हो सकता है, माताजीने उसे इसीलिए भेजा हो कि उससे मेरी रक्षा ही हो। अतएव कपालकुण्डलाने मुलाकात करनेका ही निश्चय किया। बुद्धिमान ऐसा सिद्धान्त करता या नहीं, सन्देह है, लेकिन यहाँ बुद्धिमानीसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। कपालकुण्डला कच्ची उम्र की थी, अतः उसने बुद्धिमानीका विचार नहीं किया। उसने कुतूहली रमणी जैसा सिद्धान्त किया; भीमकान्त रूपराशि दर्शन लोलुप जैसा कार्य किया; नैशवनविहारिणी संन्यासीपालिताकी तरह सिद्धान्त किया और सिद्धान्त किया दीपक शिखापर पतित होनेवाले पतंगेकी तरह।

    सन्ध्याके बाद बहुत-कुछ गृह-कार्य समाप्त कर कपालकुण्डलाने पहलेकी तरह वनयात्रा की। यात्राके समय कपालकुण्डलाने अपने कमरेका दीपक तेज कर दिया। लेकिन वह जैसे ही घरके बाहर हुई दीपक बुझ गया।

    यात्राके समय कपालकुण्डला एक बात भूल गयी। ब्राह्मणवेशधारीने किस जगह मुलाकातके लिए लिखा है? अतः पत्र पढ़नेकी फिर आवश्यकता हुई। उसने लौटकर पत्र रखा हुआ स्थान ढूँढा, लेकिन वहाँ पत्र न मिला। याद आया कि उसने पत्रको अपने जूड़ेमें खोंस लिया था। अतः जूड़ेमें देखा, वेणी खोलकर देखा, लेकिन पत्र न मिला। घरके अन्य स्थानोंको खोजा। अतएव पूर्व स्थानपर मिलनेके ख्यालसे निकल पड़ी। जल्दीमें उसने फिर अपने खुले बाल बाँधे नहीं। अतः आज कपालकुण्डला प्रथम अनूढ़ाकी तरह उन्मुक्तकेश होकर चली।

    ⋆

    :५:

    दरवाजेपर

    “Stand you a while apart

    Confine yourself, but in a patient list.

    —Othello

    सन्ध्यासे पहले जब कपालकुण्डला गृहकार्यमें लगी हुई थी, उसी समय वह पत्र जूड़ेसे खसककर गिर पड़ा था। कपालकुण्डलाको पता न रहा। उसे नवकुमारने देख लिया। जूड़ेसे पत्र गिरते देख उन्हें आश्चर्य हुआ। कपालकुण्डलाके वहाँसे हट जानेपर उन्होंने पत्रको पढ़ा, उसके पढ़नेसे एक ही सिद्धान्त सम्भव है। “जो बात कल सुनना चाहती थी, वह आज सुनेंगी?” वह कौनसी बात है? क्या प्रणय वाक्य? क्या ब्राह्मणवेशधारी मृण्मयीका उपपति है? जो व्यक्ति पहली रातकी घटनासे अवगत नहीं है, वह केवल यही सोच सकता है।

    स्वामीके साथ सती होनेके समय अन्य किसी कारणसे जब कोई जीता हुआ चितारोहण करता है और चितामें आग लगा दी जाती है तो पहले धुएँसे उसके चारों ओरका स्थान घिर जाता है, फिर क्रमशः लकड़ियोंके बीचसे एक-दो अग्निशिखा सर्प जिह्वाकी तरह उसके अंगपर आकर आक्रमण करती हैं, फिर अन्तमें ज्वालमाला चारों तरफसे घेर लेती है और शिरपर्यन्त अग्नि पहुँच कर उसे दग्ध कर राख बना देती है।

    पत्र पढ़नेपर नवकुमारका भी यही हाल हुआ। पहले समझे नहीं, फिर संशय, निश्चयता, अन्तमें ज्वाला। मनुष्यका हृदय एकबारगी दुःख या सुख बर्दाश्त कर नहीं सकता; क्रमशः ग्रहण कर सकता है। पहले तो धुएँने नवकुमारको घेर लिया; इसके बाद अग्निशिखा हृदयपर ताप पहुँचाने लगी, अन्तमें हृदय भस्म होने लगा। उन्होंने विचारकर देखा कि अबसे पहले किन बातोंमें कपालकुण्डला अबाध्य रही है। उन्होंने देखा कि यह स्वतन्त्रता ही है। वह सदा स्वतन्त्र रही, जहाँ कहीं घूमने गयी अकेली। दूसरोंके शिकायत करनेपर भी नवकुमारने कभी उसपर सन्देह न किया, लेकिन आज वह सब यादकर उन्हें प्रतीति होने लगी।

    यंत्रणाका प्रथम वेग निकल गया। नवकुमार एकान्तमें चुपचाप बैठ कर रोने लगे, रोनेके बाद कुछ स्थिर हुए। इसके बाद उन्होंने अपना कर्त्तव्य निश्चित किया। आज वह कपालकुण्डलासे न कहेंगे। रातको कपालकुण्डला जब यात्रा करेगी, तो उसका पीछा करेंगे और इसके बाद अपना जीवन-त्याग देंगे। कपालकुण्डलाको कुछ न कहेंगे, बल्कि अपना प्राणनाश करेंगे।

    ऐसा सोचकर वह कपालकुण्डलाके जानेकी राह खिड़की द्वारा देखते रहे। कपालकुण्डलाके निकलकर जानेके बाद नवकुमार भी उठकर चले, लेकिन इसी समय कपालकुण्डला फिर वापस आई। यह देख वह धीरेसे खिसक गये। अन्तमें कपालकुण्डलाके फिर बाहर होनेपर, जब नवकुमार भी बाहर चले, तो उन्हें दरवाजेपर एक दीर्घाकार पुरुष खड़ा दिखाई दिया।

    वह व्यक्ति कौन है; क्यों खड़ा है, जाननेकी कोई इच्छा नवकुमारको न हुई। वह केवल कपालकुण्डलापर निगाह रखे हुए चले, अतएव खड़े मनुष्यकी छातीपर घक्का दे उन्होंने उसे हटाना चाहा, लेकिन वह हटा नहीं।

    नवकुमारने कहा—“कौन हो तुम? हट जाओ, मेरी राह छोड़ो।”

    आगन्तुक बोला—“क्या नहीं पहचानते, मैं कौन हूँ?” यह शब्द समुद्रनादवत् जान पड़ा। नवकुमारने और गौरसे देखा—वही पूर्वपरिचित—कापालिक।

    नवकुमार चौंक उठे। लेकिन डरे नहीं। सहसा उनका चेहरा प्रसन्न हो गया। उन्होंने पूछा—“क्या कपालकुण्डला तुमसे मिलने जा रही है?”

    कापालिकने कहा,—“नहीं?”

    आशा-प्रदीप जलते ही बुझ गया। नवकुमारका चेहरा फिर पहले जैसा हो गया। बोले—“तो तुम राहसे हट जाओ।”

    कापालिकने कहा—“राह छोड़ दूँगा, लेकिन तुमसे कुछ कहना है, पहले सुन लो।”

    नवकुमार बोले,—“तुमसे मेरी कौनसी बात है? क्या तुम फिर मेरा प्राण लेने आये हो? तो ग्रहण करो, इस बार मैं मना न करूँगा। तुम जरा ठहरो, मैं अभी आता हूँ। मैंने क्यों न देवतुष्टिके लिये प्राण दिया! अब उसका फल भुगत रहा हूँ। जिसने मेरी रक्षा की थी, उसीने नष्ट किया। कापालिक! अब अविश्वास न करो। मैं अभी लौटकर, आत्म-समर्पण करता हूँ।

    कापालिकने उत्तर दिया—“मैं तुम्हारे वधके लिए नहीं आया हूँ, भवानी की वैसी इच्छा नहीं। मैं जो करने आया हूँ, उसमें तुम्हारा भी अनुमोदन है। घर के अन्दर चलो, मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो।”

    नवकुमारने कहा—“अभी नहीं, फिर दूसरे समय सुनूँगा। तुम जरा मेरी अपेक्षा करो। मुझे बहुत जरूरी काम है, पूरा कर अभी आता हूँ।”

    कापालिकने कहा—“वत्स! मैं सब जानता हूँ तुम उस पापिनीका पीछा करोगे। मैं जानता हूँ, वह जा रही है। मैं अपने साथ तुम्हें वहाँ ले चलूँगा। जो देखना चाहते हो दिखाऊँगा, लेकिन जरा मेरी बात सुन लो। डरो नहीं।”

    नवकुमारने कहा—“अब मुझे तुम से कोई डर नहीं, आओ।”

    यह कहकर नवकुमार कापालिकको लेकर अन्दर गये और एक आसनपर उसे बिठाकर तथा स्वयं बैठते हुए बोले—“कहो!”

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    ↑

    इधर एक अध्यायको छोड़ दिया गया है।

    :६:

    पुनर्वार्ता

    “तद्गच्छ सिद्धं कुरु देवकार्यम्।”

    —कुमारसंभव

    कापालिक ने आसन ग्रहण कर अपनी दोनों बाहें नवकुमारको दिखाई। नवकुमार ने देखा कि दोनों हाथ टूटे हुए थे।

    पाठकोंकी याद रह सकता है कि जिस रात कपालकुण्डला के साथ नवकुमार कापालिक-आश्रमसे भागे, उसी रात खोजने में व्यस्त बालियाड़ीके शिखरसे गिरा था। गिरनेके समय उसने शरीर-रक्षाके लिए दोनों हाथोंसे सहारा लिया। इससे उसका शरीर तो बचा, लेकिन दोनों हाथ टूट गये। सारा हाल कहकर कृपालिक ने कहा—“इन हाथों द्वारा यद्यपि दैनिक कार्य हो जाते हैं, किन्तु, इनमें अब बल नहीं है, यहाँतक कि मैं लकड़ी भी उठा नहीं सकता।”

    इसके बाद बोला—“गिरते ही मैं जान गया कि मेरे दोनों हाथ टूट गये, लेकिन बादमें मैं बेहोश हो गया। पहले बेहोश और इसके बाद धीरे-धीरे जब मुझे ज्ञान हुआ तो मैं नहीं जानता था कि इस तरह मुझे कितने दिन बीते। शायद दो रातें और एक दिन था। सबेरेके समय मैं फिर पूरी तरह होशमें आया। इससे ठीक पहले मैंने स्वप्न देखा—मानो भवानी—यह कहते-कहते कापालिकको रोमांच हो आया—मेरे सामने प्रत्यक्ष आकर खड़ी हो गयी हैं। भौंहें टेढ़ी कर ताड़ना करती और कहती हैं—‘अरे दुराचारी! तेरी ही चित्तकी अशुद्धिके कारण मेरी इस पूजामें विघ्न हुआ है। इतने दिनोंतक इन्द्रिय-लालसा के वशीभूत होकर उस कुमारीके रक्तसे तूने मेरी पूजा नहीं की। अतएव इसी कुमारी द्वारा तेरे सारे पूर्व कर्मोंका नाश हो रहा है। अब मैं तेरी पूजा ग्रहण न करूँगी।’ इसपर मैं रोकर भगवतीके चरणोंपर लोटने लगा, तो उन्होंने प्रसन्न होकर कहा—‘भद्र! इसका सिर्फ एक प्रायश्चित्त बताती हूँ। उसी कपालकुण्डलाका मेरे सामने बलिदान कर। जितने दिनोंतक तुझसे यह न हो सके, मेरी पूजा न करना।’

    कितने दिनों तक और किस प्रकार मैं आरोग्य हुआ, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। क्रमशः आरोग्यलाभ करनेके बाद देवीकी आज्ञा पूरी करनेकी कोशिशमें लग गया। लेकिन मैंने देखा कि इन हाथोंमें एक बच्चे जैसा बल भी नहीं। बिना बाहुबलके यत्न सफल होनेका नहीं। अतएव इसमें सहायताकी आवश्यकता हुई। विदेशी और विधर्मी राजमें इस बातमें कौन सहायक हो सकता है। बड़ी कोशिशसे पापिनीका आभास मालूम हुआ। लेकिन बाहुबलके अभावसे कार्य पूरा नहीं होता है। केवल मानससिद्धिके लिए होमादि करता हूँ। कल रातको मैंने स्वयं देखा कि कपालकुण्डलाके साथ ब्राह्मणकुमारका मिलन हुआ। आज भी वह उससे मिलने जा रही है। देखना चाहो, तो मेरे साथ आओ।

    वत्स! कपालकुण्डला वधके योग्य है। मैं भवानीके आज्ञानुसार उसका वध करूँगा। वह तुम्हारे प्रति भी विश्वासघातिनी है, अतएव तुम्हें भी उसका वध करना चाहिए। अविश्वासीको पकड़ कर मेरे यज्ञ-स्थान पर ले चलो। वहाँ अपने हाथसे उसका

    बलिदान करो। इससे भगवतीका उसने जो अपकार किया है, उसका दण्ड होगा, पवित्र कर्मसे अक्षय पुण्य होगा; विश्वासघातिनीका दण्ड होगा, चरम प्रतिशोध होगा।”

    कापालिक चुप हुआ। नवकुमार कुछ भी न बोले। कापालिक ने उन्हें चुप देखकर कहा—“अब चलो, वत्स! जो दिखानेको कह चुका हूँ, दिखाऊँगा|”

    नवकुमार पसीनेसे तर कापालिकके साथ चले।

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    :७:

    सपत्नी संभाषण

    “Be at peace: it is your sister that addresses you, Require Lucretia’s love.

    —Lucretia.

    कपालकुंडला घरसे निकलकर जंगलमें घुसी। वह पहले उस टूटे घरमें पहुँची। वहाँ ब्राह्मणसे मुलाकात हुई। दिनका समय होता तो वह देखती कि उसका चेहरा बहुत उतर गया है। ब्राह्मणवेशीने कपालकुंडलासे कहा—“यहाँ कापालिक आ सकता है, आओ अन्यत्र चलें।” जंगलमें एक खुली जगह थी, चारों तरफ वृक्ष, बीचमें चौरस, साफ और समतल था। वहाँ बैठनेपर ब्राह्मणवेशीने कहा—“पहले मैं अपना परिचय दूँ। मेरी बात कहाँ तक विश्वासयोग्य है, स्वयं समझ सकोगी। जब तुम अपने स्वामोके साथ हिजली देश से आ रही थी, तो राहमें एक यवन कन्याके साथ मुलाकात हुई थी। क्या तुम्हें याद है?”

    कपालकुंडला बोली—“जिसने मुझे अलंकार दिये थे?”

    ब्राह्मणवेशधारिणीने कहा—“हाँ, मैं वही हूँ।”

    कपालकुंडला बड़े आश्चर्यमें आई। लुत्फुन्निसाने उसका विस्मय देखकर कहा—“और सबसे बड़ी अचरज की बात है कि मैं तुम्हारी सौत हूँ।”

    कपालकुंडलाने चौंककर कहा—“हैं, यह कैसे?”

    इस पर लुत्फुन्निसाने शुरूसे अपना परिचय दिया। विवाह, जातिनाश, स्वामी द्वारा त्याग, सप्तग्राम आगमन, नवकुमारसे मुलाकात और व्यवहार, गत दिवस जंगल में आना, होमकारीसे मुलाकात आदि बातें वह क्रमशः कह गयी। इस समय कपालकुंडलाने पूछा—“तुमने किस अभिप्रायसे हमारे घर छद्मवेशमें आनेकी इच्छा की?”

    लुत्फुन्निसाने कहा—“तुम्हारे साथ पतिदेवका चिरविच्छेद करानेके लिए।”

    कपालकुंडला सोचमें पड़ गयी बोली—“यह कैसे सिद्ध कर पाती?”

    लु०—तुम्हारे सतीत्वके प्रति तुम्हारे पतिको संशयमें डाल देती। लेकिन उसकी जरूरत नहीं; वह राह मैंने त्याग दी है। अतः अगर तुम मेरे कहे मुताबिक कार्य करो, तो सारी कामना सिद्ध हो; साथ ही तुम्हारा भी मंगल होगा।

    कपा०—होमकारीके मुँहसे तुमने किसका नाम सुना था?

    लु०—“तुम्हारा ही नाम। वह तुम्हारी मंगल या अमंगल कामनासे होम कर रहे हैं, यही जाननेके लिए प्रणाम कर मैं वहाँ बैठी। जब तक उनकी क्रिया समाप्त न हुई, मैं वहीं बैठी रही। होमके अन्तमें छलपूर्वक तुम्हारे नामके साथ होमका अभिप्राय पूछा। थोड़ी ही देरकी बातमें मैं समझ गयी कि होम तुम्हारी अमंगलकामनाके लिए है। मेरा भी वही प्रयोजन था, मैंने यह भी बताया। परस्पर सहायता के लिए वचनबद्ध हुए, विशेष परामर्शके लिए भग्नकुटीमें गये। वहाँ उसने अपना मनोरथ कहा कि तुम्हारी मृत्यु ही उसे अभीष्ट है। इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं। यद्यपि मैंने इस जन्ममें पाप ही किये हैं, लेकिन मैं इतनी पतित नहीं हूँ कि एक निरपराध बालिकाकी हत्याकी कामना करूँ। मैं इसपर राजी नहीं हुई। इसी समय तुम वहाँ पहुँची। शायद तुमने कुछ सुना हो।”

    कपा०—केवल तर्क ही मैंने सुना।

    लु०—उस व्यक्तिने मुझे अबोध जानकर कुछ शिक्षा देना चाहा। अन्तमें क्या निश्चय होता है, यह जाननेके लिए तुम्हें एकान्तमें बैठाकर मैं गयी।

    कपा०—फिर लौटकर क्यों नहीं आयी?

    लु०—ठीक है। कापालिकने तुम्हारी प्राप्ति और पालनसे लेकर तुम्हारे भागने तकका सारा हाल कह सुनाया।

    यह कहकर लुत्फुन्निसाने कापालिकका शिखरसे गिरना, हाथ टूटना, स्वप्न आदि सब कह सुनाया! स्वप्नकी बात सुनकर कपालकुण्डला चमक उठी; चित्तमें चञ्चलता भी हुई। लुत्फुन्निसाने कहा—“कापालिककी प्रतिज्ञा भवानीकी आज्ञाका प्रतिपालन है। बाहुमें बल नहीं है, इसलिये दूसरेकी सहायता चाहता है। मुझे ब्राह्मणकुमार समझकर सहायताकी आशासे उसने सब कहा। मैं अभी तक राजी नहीं हूँ। आगे भी राजी नहीं हो सकती। इस अभिप्रायसे मैं तुमसे मिली हूँ, लेकिन यह कार्य भी मैंने केवल स्वार्थसे ही किया है। तुम्हें प्राणदान देती हूँ। लेकिन तुम क्या मेरे लिए कुछ करोगी?”

    कपालकुण्डलाने पूछा—“क्या करूँ?”

    लु०—मुझे भी प्राणदान दो—स्वामीका त्याग करो।

    कपालकुण्डला बहुत देर तक कुछ न बोली। बहुत देर बाद बोली “स्वामीको त्याग कर कहाँ जाउँगी?”

    लु०—विदेशमें बहुत दूर। तुम्हें अट्टालिका दूँगी, धन दूँगी, दास-दासी दूँगी, रानीकी तरह रहोगी।

    कपालकुण्डला फिर चिन्तामें पड़ गई। पृथ्वीमें उसने सब देखा, लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। अन्तःकरणमें देखा नवकुमार कहीं भी न थे, तो क्यों लुत्फुन्निसाकी राहका काँटा बनूँ? फिर बोली—“तुमने मेरी क्या सहायता की है, यह अभी समझ नहीं पाती हूँ। अट्टालिका, धन, दास, दासी नहीं चाहती। मैं तुम्हारे सुखमें क्यों बाधा दूँ! तुम्हारी इच्छा पूरी हो—कलसे इस विध्नकारिणीकी कोई खबर न पाओगी। मैं वनचरी थी, वनचरी हो जाऊँगी।”

    लुत्फुन्निसा आश्चर्यमें आई। उसे इतनी जल्दी स्वीकार कर लेनेकी आशा न की थी। मोहित होकर उसने कहा—“बहन! तुमने मुझे जीवनदान दिया है। लेकिन मैं तुम्हें अनाथा होकर जाने न दूँगी। कल सबेरे मैं तुम्हारे साथ एक चतुर दासी भेजूँगी। उसके साथ जाना। वर्द्धमानमें एक बहुत बड़ी प्रधान महिला मेरी मित्र हैं, वह तुम्हारी सारी इच्छा पूरी कर देंगी।”

    कपालकुण्डला और लुत्फुन्निसा इस प्रकार निश्चिन्त हो बातें कर रही थीं कि सामने कोई विध्न ही नहीं। उसके स्थानसे जो वन्यपथ आया था, उसपर खड़े होकर कापालिक और नवकुमार उनके प्रति कराल दृष्टिसे देख रहे थे, उसे उन्होंने देखा ही नहीं।

    नवकुमार और कापालिक केवल इन्हें देख रहे थे, दुर्भाग्यवश इनकी बातें सुननेकी परिधि से वे दूर थे। कौन बता सकता है कि यदि मनुष्यकी श्रवणेन्द्रिय और आँखें मनुष्य के अन्दर तकका हाल देख-सुन लेतीं तो मनुष्यका दुःख-वेग कम होता या बढ़ता। लोग कहते हैं, संसारकी रचना अपूर्व और कौशलमय है।

    नवकुमारने देखा, कपालकुण्डला आलुलायित-कुन्तला है। जब वह उनकी हुई न थी, तबतक भी वेणी बाँधती न थी। उसके बाल इतने लम्बे थे और धीमे स्वरमें बातें करनेके लिये वह इतनी पास बैठी थी कि सारे बाल लुत्फुन्निसाकी पीठ तक उड़कर जा रहे थे। उनका इधर ध्यान न था। लेकिन नवकुमार यह देखकर हताश हो जमीनपर बैठ गये, यह देखकर कापालिकने अपनी बगल से लटकते एक नारियल पात्रको निकलकर कहा—“वत्स! बल खोते हो? हताश होते हो? लो यह भवानी का प्रसाद पियो। पियो, बल प्राप्त करोगे।”

    कापालिकने नवकुमारके मुँह के पास पात्र लगा दिया। नवकुमारने अनमने होकर उसे पिया और दारुण प्यास दूर की। नवकुमारको यह मालूम न था कि यह पेय कापालिक की स्वयं तैयार की हुई तेज शराब है। उसे पीते ही बल आ गया।

    उधर लुत्फुन्निसाने पहलेकी तरह मृदुस्वरमें कहा—“बहन! जो काम किया है, उसका बदला दे सकनेकी मेरी शक्ति नहीं है। फिर भी, चिर दिनोंतक मैं तुम्हें याद करती रहूँ, तो यही मेरे लिये सुखकर होगा। मैंने सुना है कि जो अलङ्कार मैंने तुम्हें दिये थे, उन्हें तुमने गरीबोंको दे डाला। इस समय मेरे पास कुछ नहीं है। कल दूसरा प्रयोजन सोचकर अपने साथ अंगूठी भर ले आयी थी। भगवान्‌की कृपासे उस पापसे दूर रही। यह अंगूठी तुम रखो। इसके उपरान्त इस अंगूठी को देखकर तुम अपनी मुफलिस बहनको याद करना। आज यदि स्वामी पूछें कि यह अंगूठी कहाँ पायी, तो कह देना—“लुत्फुन्निसाने दिया है।” यह कहकर लुत्फुन्निसाने बहुत धन देकर खरीदी गयी उस अंगूठीको ऊँगलीसे उतारकर कपालकुण्डलाके हाथमें दे दिया। नवकुमारने यह भी देखा। कापालिकने नवकुमार को पकड़ रखा था, उन्हें फिर काँपते देख फिर शराब पिलायी। मदिरा नवकुमारके माथेपर पहुँचकर उनके प्रकृत स्वभावको बदलने लगी। उसने स्नेहांकुर तकको उखाड़ फेंका।

    कपालकुण्डला लुत्फुन्निसासे बिदा होकर घरकी तरफ चली। नवकुमार और कापालिक ने लुत्फुन्निसासे छिपकर कपालकुण्डलाका अनुसरण किया।

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    :८:

    घर की तरफ

    कपालकुण्डला धीरे-धीरे घर की तरफ चली। बहुत ही धीरे मृदु-पादविक्षेपसे। इसका कारण यह था कि वह बहुत ही गहरी चिन्तामें डूबी हुई थी। लुत्फुन्निसाकी दी हुई खबरसे कपालकुण्डलाका चित्त बिल्कुल परिवर्तित हो गया था। वह अपने आत्म-विसर्जनके लिये तैयार हुई। आत्म-विसर्जन किसलिये? क्या लुत्फुन्निसाके लिये? यह बात नहीं।

    कपालकुण्डला अन्तःकरण से तान्त्रिक की सन्तान है। जिस प्रकार तान्त्रिक भवानीके प्रसादके रूपमें दूसरेकी जान लेनेका आकांक्षी हैं, वैसे ही वह भी उसी आकांक्षासे आत्म-विसर्जनके लिये तैयार है। कापालिककी वजहसे कपालकुंडला केवल शक्तिप्रार्थिनी है, यह बात नहीं, बल्कि असली कारण यह है कि संगति प्रभावके कारण देवीकी श्रद्धाभक्तिमें मनसे अनुरागिनी है। वह मजेमें समझ चुकी है कि सृष्टिशासनकर्त्री और मुक्तिदात्री एकमात्र भैरवी ही हैं। यह सही है कि भैरवीपूजामें नरबलिके रक्तसे प्राङ्गण भर उठता है, यह उसका परदुःखकातर हृदय सहनेमें असमर्थ है, किन्तु और किसी कार्यमें उसकी भक्तिभावना कुंठित नहीं है। उन्हीं जगतशासनकर्त्री, सुख-दुःख-विधायिनी और मोक्षदायिनी भगवतीने स्वप्नमें उसे आत्मविसर्जनका आदेश दिया है। फिर कपालकुण्डला क्यों न उस आज्ञाको माने?

    हम तुम प्राणत्याग करना नहीं चाहते। बड़े प्रेम से जो कहते हैं कि यह संसार सुखमय है, सुखकी ही आशासे बैलकी तरह बराबर घूम रहे हैं—दुःखकी प्रत्याशासे नहीं। कहीं यदि आत्मकर्मदोषसे इस प्रत्याशामें सफलता प्राप्त न की, तो दुःख कहकर हम चिल्लाने लगते हैं किन्तु ऐसा होनेसे ही नियम नहीं बन जा सकता, ऐसा सिद्धान्त होता है। नियमका व्यतिक्रम माना है। हमें तुम्हें हर जगह सुख ही है। उसी सुखसे संसार में हम बँधे हुए हैं, छोड़ना नहीं चाहते। लेकिन इस संसार-बन्धनमें प्रणय ही प्रधान रस्सी है। कपालकुण्डलाके लिए वह बन्धन या नहीं कोई भी बन्धन नहीं। फिर कपालकुण्डलाको कौन रोक सकता है? जिसके लिए बन्धन नहीं है, वही सबसे अधिक बलशाली है। गिरिशिखरसे नदीके उतरने पर कौन उसका गतिरोध कर सकता है? एक बार आँधी आनेपर उसे कौन रोक सकता है? कपालकुण्डलाका चित्त डाँवाडोल हो जाये, तो उसे कौन स्थिर कर सकता है? नये हाथीके मस्त हो जाने पर उसे कौन शान्त करे?

    कपालकुंडलाने अपने हृदयसे पूछा—“अपने इस शरीरको जगदीश्वरीके लिए क्यों न समर्पण करूँ? पंचभूतको रखकर क्या होगा। प्रश्न वह करती थी, लेकिन कोई निश्चित उत्तर न दे सकती थी। संसारमें और कोई भी बन्धन न होनेपर पंचभूतका बन्धन तो है ही।

    कपालकुंडला नीचा सिर किये चलने लगी। जब मनुष्यका हृदय किसी बड़े भावमें डूबा रहता है, तो उस समय चिन्ताकी एकाग्रतामें बाहरी जगतकी तरफ ध्यान नहीं रहता। उस समय अनैसर्गिक वस्तु भी प्रत्यक्षीभूत जान पड़ती है। इस समय कपालकुंडलाकी ऐसी ही अवस्था थी।

    मानों ऊपरसे उसके कानोंमें वह शब्द पहुँचा—“वत्से, मैं राह दिखाती हूँ।” कपालकुंडला चकितकी तरह ऊपर देखने लगी। देखा, मानो आकाशमें नवनीरद-निन्दित मूर्ति है; गलेमें लटकनेवाली नरमुंडमालासे खून टपक रहा है; कमरमें नरकरराजि झूल रही है; बाँये हाथमें नरकपाल; अंगमें रुधिरधारा, ललाटपर विषम उज्जवल ज्वाला विभासित है और लोचन प्रान्तोंमें बालशशि शोभित है; मानों दाहिने हाथसे भैरवी कपालकुंडलाको बुला रही है।

    अब कपालकुंडला ऊर्ध्र्वमुखी होकर चली। वह अद्भुत देवी रूप आकाशमें उसे राह दिखा रहा था, कभी कपालमालिनीका अंग बादलोंमें छिपता, कभी सामने प्रकट होकर चलता। कपालकुंडला उन्हींको देखती हुई चलने लगी।

    नवकुमार या कापालिकने यह सब कुछ न देखा। नवकुमारने सुरा-गरल-प्रज्ज्वलित-हृदयसे—कपालकुंडलाके धीरपदक्षेपसे असहिष्णु होकर साथीसे कहा, “कापालिक!”

    कापालिकने पूछा—“क्या?”

    “पानीयं देहि मे।”

    कापालिकने नवकुमारको फिर शराब पिलायी।

    नवकुमारने पूछा—“अब देर क्यों?”

    कापालिकने भी कहा—“हाँ-हाँ, कैसी देर?”

    नवकुमारने भीमनादसे पुकारा—“कपालकुंडला!”

    कपालकुंडला सुनकर चकित हुई। अभी तक यहाँ कपालकुंडला कह कर किसीने पुकारा न था। वह पलटकर खड़ी हो गयी। नवकुमार और कापालिक उसके सामने आकर खड़े हो गये। कपालकुंडला पहले उन्हें पहचान न सकी, बोली—“तुम लौग कौन हो? यमदूत?”

    लेकिन दूसरे ही क्षण पहचान कर बोली—“नहीं नहीं, पिता! क्या तुम मुझे बलि देनेके लिए आये हो?”

    नवकुमारने मजबूतीके साथ कपालकुंडलाका हाथ पकड़ लिया। कापालिकने करुणार्द्र, मधुर स्वरमें कहा—“वत्से! हम लोगोंके साथ आओ।” यह कह कर कापालिक श्मशानकी राह दिखाता आगे चला।

    कपालकुंडलाने आकाशकी तरफ फिर निगाह उठायी, जिधर उस भैरवीकी विकराल मूर्तिको देखा था, उधर देखा। देखा, रणरंगिणी खिलखिला कर हँस रही है। कपालकुंडला अदृष्टविमूढ़की तरह कापालिकका अनुसरण करती चली। नवकुमार उसी तरह उसे पकड़े हुए साथ ले चले।

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    :९:

    प्रेत भूमिमें

    “वपुषा करणोज्झितेन सा निपतन्ती पतिमप्यपातयत्।

    ननु तैलनिषेकविन्दुना सह दीप्तार्जिरुपैति मेदिनीम्॥”

    —रघुवंश

    चन्द्र अस्त हुए। विश्वमंडलपर अन्धकारका पर्दा पड़ गया। कापालिकने जहाँ अपना पूजास्थान बनाया था, वहीं कपालकुडलाको वह ले गया। गङ्गा तट पर वह एक वृहत् बालूकी भूमि है। उसके सामने ही एक ओर बहुत बड़ी रेतीली भूमि है। वही श्मशान है। दोनों रेतीली भूमियोंके बीच जल बढ़नेके समय पानी रहता है। भाटेके समय नहीं रहता—इस समय भी नहीं है। श्मशानभूमिका जो हिस्सा गङ्गातट पर जाता है, वह किनारेपर जाकर बहुत ऊँचा हो गया है, उसके नीचे अगाध जल है। अविरल वायुप्रवाहके कारण किनारा कभी-कभी खिसक कर गङ्गामें गिरा करता है। पूजाके स्थानमें दीपक न था—केवल जलती लकड़ीसे प्रकाश था—ऐसा प्रकाश जो उसकी भयानकताको बढ़ा रहा था। पासमें ही पूजा, होम, बलिका सारा सामान मौजूद था। विशाल नदीका हृदय अन्धकारसे पूर्ण था। चैत्र मासकी वायु गङ्गाको विक्षुब्ध बनाये हुई थी। इस कारण कलकल नाद दिक्मंडलमें व्याप्त हो रहा था। शमशानके शवभक्षक पशु रह-रहकर चिल्ला पड़ते थे।

    कापालिकने नवकुमार और कपालकुंडलाको उपयुक्त स्थानपर बैठाया और स्वयं पूजामें लग गया। उससमय उसने नवकुमारको आदेश दिया कि कपालकुंडलाको स्नान करा लावें। नवकुमार कपालकुंडलाको हाथ पकड़े रेत पार कर स्नान कराने चले। उनके पदभारसे हड्डियाँ टूटने लगीं। नवकुमारके पदाघातसे श्मशानका एक कलश भी टूट गया, उसके पास ही एक शव पड़ा हुआ था—हतभागेका किसीने संस्कार तक न किया था। दोनोंके ही पदसे उसका स्पर्श हुआ। कपालकुंडला उसे बचाकर निकल गयी, लेकिन नवकुमार उसे पददलित कर गये। शवभक्षक पशु चारों तरफ घूम रहे थे। दोनों जनको वहाँ उपस्थित देख वे सब चिल्ला उठे। कोई आक्रमण करने आया, तो कोई भाग गया। कपालकुंडलाने देखा कि नवकुमारका हाँथ काँप रहा है। कपालकुंडला स्वयं निर्भय निष्कम्प थी।

    कपालकुंडलाने पूछा—“स्वामिन्! क्या डर लगता है?”

    नवकुमारका मदिरामोह क्रमशः क्षीण होता जा रहा था। गम्भीर स्वरसे नवकुमारने कहा—“भयसे, मृण्मयी! नहीं!”

    कपालकुंडलाने फिर पूछा—“तब काँपते क्यों हो?”

    यह प्रश्न कपालकुंडलाने जिस स्वरसे किया, यह केवल रमणी हृदयसे ही सम्भव था। जब रमणी परदुःखकातर होती है, तभी ऐसा स्वर निकलता है। कौन जानता था कि साक्षात् श्मशानमें ऐसी आवाज कपालकुंडलाके मुँह से निकलेगी।

    नवकुमारने कहा—“भयसे नहीं। रो नहीं पाता हूँ, क्रोधसे काँपता हूँ।”

    कृपालकुंडलाने पूछा—“रोओगे क्यों?”

    फिर वही कंठ!

    नवकुमार बोले—“क्यों रोऊँगा? तुम क्या समझोगी, मृण्मयी तुम तो कभी सौन्दर्य देखकर उन्मत हुई नहीं।”—कहते-कहते यातनासे नवकुमारका गला भर गया। “तुम तो कभी अपना कलेजा स्वयं काटनेके लिये श्मशान आई नहीं, मृण्मयी!” यह कहते-कहते सहसा नवकुमार पुक्का फाड़कर रोते हुए कपालकुंडलाके चरणों पर गिर पड़े।

    “मृण्मयी! कपालकुंडले! मेरी रक्षा करो! मैं तुम्हारे पैरपर रोता हूँ, एक बार कह दो, तुम अविश्वासिनी नहीं हो—एक बार कहो मैं तुम्हें हृदयमें उठाकर घर ले चलू।”

    कपालकुंडलाने हाथ पकड़ कर नवकुमारको उठाया और मृदुस्वरसे उसने कहा—“तुमने तो मुझसे पूछा नहीं।”

    जब यह बातें हुई, तो दोनों तट पर आ खड़े हुए। कपालकुंडला आगे थी उसके पीछे जल था। जलका उछ्वास शुरू हो गया था, कपालकुंडला एक ढूहे पर खड़ी थी। उसने जवाब दिया—“तुमने तो मुझसे पूछा नहीं।”

    नवकुमारने पागलोंकी तरह कहा—“अपना चैतन्य खो चुका हूँ—क्या पूछूँ मृण्मयी! बोलो बोलो; मुझे बचालो, घर चलो।”

    कपालकुंडलाने कहा—“जो तुमने पूछा है, तो बताती हूँ। आज जिसे तुमने देखा—वह पद्मावती थी, मैं अविश्वासिनी नहीं हूँ। यह वचनस्वरूप कहती हूँ। लेकिन मैं घर न जाऊँगी। भवानीके चरणोंमें देह विसर्जन करने आई हूँ—निश्चय ही करूँगी। स्वामिन्! तुम घर लौट जाओ। मरूँगी—मेरे लिये रोना नहीं।”

    “नहीं—मृण्मयी! नहीं!”—यह कहकर दोनों हाथ पसारकर नवकुमार कपालकुंडलाको हृदयसे लगा लेनेके लिये आगे बढ़े—लेकिन कपालकुंडलाको वह पा न सके। चैत्र-वायुसे एक जल तरङ्ग ने उस ढूहेसे टक्कर ली और वह ढूहा कपालकुंडलाके साथ बड़े ही शब्दसे नदी जलमें जा गिरा।

    नवकुमारने भीषण शब्द सुना—कपालकुंडलाको अन्तर्हित होते देखा। तुरंत वे भी एक छलाँगमें जलमें जा रहे। नवकुमार तैरना अच्छा जानते थे। बहुत देर तक तैरते-डुबकी लगाते, कपालकुंडलाको खोजते रहे। उन्होंने कपालकुंडलाको न पाया—स्वयं भी जलसे न निकले।

    उस अनन्त गंगाप्रवाहमें वसन्त वायुविक्षुब्ध वीचियोंमें आन्दोलित होते हुए कपालकुंडला और नवकुमार कहाँ गये?

    ॥ समाप्त ॥

    तृतीय खण्ड

    भूतपूर्वमें

    “कष्टोऽयं खलु मृत्यु भावः”

    कपालकुण्डलाको लेकर नवकुमारने जब सरायसे घरकी यात्रा की तो मोती बीबीने वर्द्धमानकी तरफ यात्रा की। जबतक मोती बीबी अपनी राह तय करें, तबतक हम उनका कुछ वृत्तान्त कह डालें। मोतो बीबीका चरित्र जैसा महापातकसे भरा हुआ है, वैसे ही अनेक तरहसे सुशोभित है। ऐसे चरित्रका विस्तृत वृत्तान्त पढ़नेमें पाठकोंको अरुचि न होगी।

    जब इनके पिताने हिन्दू-धर्म बदलकर मुस्लिम धर्म ग्रहण किया, तो उस समय इनका हिन्दू नाम बदलकर लुत्फुन्निसा पड़ा। मोती बीबी इनका नाम कभी नहीं था। फिर भी छिपे वेशमें देश-विदेश भ्रमणके समय यह कभी-कभी नाम पड़ जाता है। इनके पिता ढाकामें आकर राजकार्यमें नियुक्त हुए। लेकिन वहाँ अनेक स्वदेशीय लोगोंका आना-जाना हुआ करता था। अपने देशमें जान-पहचानवालोंके सामने विधर्मी होकर रहना भला जान नहीं पड़ता। अतएव वह कुछ दिनोंमें अच्छी ख्याति लाभ कर अपने मित्र अनेक उमरा लोगोंसे पत्र लेकर सपरिवार आगरे चले गये। अकबर बादशाहके सामने किसीका गुण छिपा नहीं रहता था। शीघ्र ही इन्होंने अपने गुण प्रकट किये। इसके फलसे वह आगरेके उमरा लोगोंमें गिने जाने लगे। इधर लुत्फुन्निसा भी यौवनमें पदार्पण करने लगी। आगरेमें आकर इन्होंने फारसी, संस्कृत, नृत्यगीत, रसवादन आदिमें अच्छी शिक्षा ग्रहण कर ली। राजधानीकी सुन्दरियों और गुणवतियोंमें यह अग्रगण्य बनने लगीं। दुर्भाग्यवश लुत्फुन्निसाके पूर्ण युवती होनेपर जान पड़ा कि उसकी मनोवृत्ति दुर्दमनीय और भयानक है। इन्द्रियदमनकी न तो इच्छा थी और न क्षमता ही थी। सद् और असद् में समान प्रवृत्ति थी। यह कार्य अच्छा है और यह बुरा, ऐसा सोच कभी उसने कार्य नहीं किया। जो अच्छा लगता था, वही काम करती थी। जब सत् कर्मसे अन्तःकरण सुखी होता, तो वह करती और असत्‌कर्मके समय भी वही करती। यौवनकालकी दुर्दमनीय मनोवृत्तिके अनुकूल ही लुत्फुन्निसा भी बन गयी। उसके पूर्वपति वर्त्तमान हैं, उमरा लोगों में किसीने उसके साथ शादी न की। वह भी शादी की लालायित न रही। मन ही मन सोचा, फूल-फूलपर घूमनेवाली भ्रमरीको एक का बनाकर बाँध क्यों दूँ? पहले कानाफूसी हुई, इसके बाद मुँह पर कलंककी कालिमा लग गयी। उसके पिताने विरक्त होकर उसे घरसे निकाल दिया।

    लुत्फुन्निसा गुप्त रूपसे जिन्हें कृपा-वितरण करती रही, उनमें युवराज सलीम भी एक थे। एक उमराके कुलके कलंकका कारण होनेपर पीछे बादशाहका कोपभाजन न बनना पड़े, इस कारण खुलकर सलीमशाहने लुत्फुन्निसाको अपने महलमें नहीं रखा। अब सुयोग मिल गया। राजपूतपति मानसिंहकी बहन सलीमकी प्रधान महिषी हुई। युवराजने लुत्फुन्निसाको अपनी महिषीकी प्रधान अनुचरी बना दिया। लुत्फुन्निसा बेगमकी सखी बन गयी और परोक्ष रूपसे युवराजकी अनुग्रह-भागिनी हुई।

    लुत्फुन्निसा जैसी बुद्धिमती महिला शीघ्र ही युवराजके हृदय पर अधिकार कर लेगी, यह सहज अनुमेय है। सलीमके हृदयपर उसका अधिकार इस तरह प्रतियोगीशून्य हो गया कि लुत्फुन्निसा ने प्रण कर लिया कि वह इनकी पटरानी होकर रहेगी। केवल लुत्फुन्निसाकी ही ऐसी प्रतिज्ञा हुई, यह बात नहीं, बल्कि इसका विशवास महल भरमें हो गया। ऐसी ही आशामय स्वप्नमें लुत्फुन्निसाका जीवन पतिमें लगा। लेकिन इसी समय उसकी नींद टूटी। अकबर बादशाहके कोषाध्यक्ष ख्वाजा अब्बासकी कन्या मेहरुन्निसा यवनकुलकी प्रधान सुन्दरी निकली। एक दिन कोषाध्यक्ष ने युवराज सलीम और अन्य उमराको निमंत्रण देकर घर बुलाया। उसी दिन सलीमकी मुलाकात मेहरके साथ हो गयी। उसी दिन सलीमने भी अपना हृदय मेहरुन्निसा को सौंप दिया। इतिहासप्रेमीमात्र इस घटनाको जानते हैं। इसके बाद मेहरकी शादी शेर अफगनके साथ हो गयी। यह शादी अकबरशाह के षड्यन्त्रका फल थी। यद्यपि सलीमको निरस्त होना पड़ा, लेकिन उन्होंने आशाका त्याग न किया। सलीमकी चित्तवृत्ति लुत्फुन्निसा के नखदर्पणवत् थी। वह समझ गयी कि शेर अफगनके जीवनकी खैरियत नहीं और सलीमकी महिषी मेहर ही होगी। लुत्फुन्निसाने सिंहासनकी आशा त्याग दी।

    विचक्षण मुगल-सम्राट् अकबरकी परमायु पूरी हुई। जिस प्रचण्ड सूर्यकी प्रभा तुर्कीसे लेकर ब्रह्मपुत्र तक प्रदीप्त थी, उस सूर्य का अस्त हुआ। इस समय लुत्फुन्निसाने आत्मप्राधान्यकी रक्षाके लिये एक दुःसाहसिक संकल्प किया।

    राजपूत राजा मानसिंहकी बहन सलीमकी प्रधान महिषी थी। खुसरू उनके पुत्र हैं। एक दिन उनके साथ अकबर बादशाहकी बीमारीकी बात चल रही थी जिस सम्बन्धमें शीघ्र ही बादशाहकी महिषी बननेकी बधाई लुत्फुन्निसा दे रही थी; प्रत्युत्तरमें खुसुरूकी जननी ने कहा—“बादशाहकी प्रधान महिषी होने से मनुष्य जन्म सार्थक अवश्य होता है, लेकिन सर्वश्रेष्ठता उसकी है जिसका पुत्र बादशाह हो और वह बादशाहजननी बने।” यह उत्तर सुनते ही लुत्फुन्निसाके हृदयमें एक चिन्तनीय अभिसन्धिका उदय हुआ। उसने उत्तर दिया—“तो ऐसा ही क्यों न हो! वह भी आपके ही इच्छाधीन है।” बेगमने पूछा—“यह कैसे?” चतुराने उत्तर दिया—“युवराज खुसरूको ही सिंहासनपर बिठाइये।”

    इस बात का बेगमने कोई जवाब न दिया। उस दिन फिर यह प्रसङ्ग न उठा। लेकिन यह बात किसीको भूली नहीं। स्वामीके बदले पुत्र राज्यसिंहासनपर आसीन हो, यह बेगमकी इच्छा अवश्य है, लेकिन मेहरुन्निसाके प्रति सलीम का प्रेम जैसे लुत्फुन्निसा के हृदयमें काँटेकी तरह खटकता है, वैसे ही बेगमके हृदयमें भी खटकता है। मानसिंहकी बहन एक तुर्कमानकी कन्या की आज्ञानुवर्तिनी होकर कैसे रह सकती है? लुत्फुन्निसाका भी इस विषय में गहरा तात्पर्य था। दूसरे दिन फिर यह प्रसङ्ग उत्थापित हुआ। दोनोंका एक अभिमत स्थिर हुआ।

    सलीमको त्यागकर खुसरूको सिंहासनपर बैठाना कोई असम्भव बात न थी। इस बातको लुत्फुन्निसाने बेगमको अच्छी तरह समझा दिया। उसने पूछा,—“मुगल साम्राज्य राजपूतोंके बाहुबलपर स्थापित हुआ है और आज भी निर्भर करता है। वही राजपूत कुल-तिलक मानसिंह खुसरूके मामा हैं और प्रधान राजमंत्री खान आजम खुसरूके श्वसुर हैं, इन दोनों आदमियोंके खड़े होनेपर कौन इनकी आज्ञा न मानेगा? फिर किसके बलपर युवराज सिंहासनपर अधिकार कर सकते हैं? राजा मानसिंहको राजी करना आपके ऊपर है। खान आजम और अन्यान्य उमराको तैयार करना मेरे ऊपर छोड़ दीजिये? आपके आशीर्वादसे अवश्य कृतकार्य हूँगी; लेकिन एक आशंका है कि कहीं सिंहासनासीन होनेके बाद खुसरू मुझे इन दुराचारियों को….निकाल बाहर न कर दें।”

    बेगम सहचरीका अभिप्राय समझ गयी। हँसकर बोली,—“तुम आगरेमें जिस उमराकी गृहिणी होना चाहोगी, वह तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा। तुम्हारे पति पंचहजार मंसबदार होंगे।”

    लुत्फुन्निसा सन्तुष्ट हुई। यही उसका उद्देश्य था। यदि राजपुरीमें सामान्य स्त्री होकर रहना हुआ, तो फूलोंपर घूमकर रस लेनेवाली भ्रमरी बननेसे क्या फायदा हुआ? यदि स्वाधीनता ही त्याग करना होता तो बालसखी मेहरुन्निसाकी दासी होनेमें ही क्या हर्ज था? इससे तो कहीं अधिक गौरवकी बात है कि किसी राजपुरुषके गृहकी गृहस्वामिनी बनकर बैठा जाये?

    केवल इसी लोभसे लुत्फुन्निसा इस कार्यमें लिप्त न हुई। सलीम उसकी उपेक्षा कर जो मेहर के पीछे पागल हो रहे हैं, उसका उसे प्रतिशोध भी लेना है?

    खान आजम आदि आगरे और दिल्लीके उमरा लुत्फुन्निसाके यथेष्ठ साधित थे। खान आजम अपने दामादके लिये उद्योग करेंगे इसकी भी पूरी आशा थी। वह और अन्यान्य उमरा राजी हो गये। खान आजमने लुत्फुन्निसासे कहा—“मान लो यदि हम लोग कृतकार्य न हुए तो हम लोगोंको अपने बचावकी भी कोई राह निकाल लेनी चाहिए।”

    लुत्फुन्निसाने कहा,—“आपकी क्या राय है?” खानने कहा, कहा साँचा:Sic—‘उड़ीसाके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। केवल उसी जगह मुगलोंका शासन प्रखर नहीं है, उड़ीसाकी सेना हमारे हाथ में रहना आवश्यक है। तुम्हारे भाई उड़ीसाके मंसबदार हैं। मैं कल प्रचार करुँगा कि वह युद्धमें आहत हुए हैं। तुम उन्हें देखने के बहानेसे कल ही उड़ीसाको यात्रा करो। वहाँका कार्य समाप्त कर तुरंत वापस जाओ।’

    लुत्फुन्निसा इसपर राजी हो गयी। वह अपना कार्य कर लौटते समय पाठकोंसे मिली है।

    ⋆

    :२:

    दूसरी जगह

    “जे यारी ते पड़े लोके उठे ताइ धरे।

    बारेक निराश होये के कोथाय मरे॥

    तूफाने पतित किन्तु छाड़ि बना हाल।

    आजि के विफल होलो, होते पारे काल॥

    —नवीन तपस्विनी

    जिस दिन नवकुमारको बिदा कर मोती बीबी या लुत्फुन्निसाने बर्द्धमानकी यात्राकी, उस दिन वह एकदम बर्द्धमान तक पहुँच न सकी। दूसरी चट्टीमें रह गयी। संध्याके समय पेशमन्‌के साथ बैठकर बातें होने लगीं। ऐसे समय सहसा मोती बीबीने पेशमन्‌से पुछा,—“पेशमन्! मेरे पतिको देखा, कैसे थे?”

    पेशमन्‌ने कुछ विस्मित होकर कहा,—“इसके क्या माने?” मोती बोली,—“सुन्दर थे या नहीं?”

    नवकुमारके प्रति पेशमन्‌को विशेष विराग हो गया था। जिन अलङ्कारोंको मोती ने कपालकुण्डलाको दे दिया उनके प्रति पेशमन् का विशेष लोभ था। मन-ही मन उसने सोच रखा था, कि एक दिन माँग लूँगी। उस बेचारीकी वह आशा निर्मूल हो गयी। अतः कपालकुण्डला और उसके पति दोनोंके प्रति उसे जलन थी। अतएव स्वामिनीके प्रश्नपर उसने उत्तर दिया—‘दरिद्र ब्राह्मणकी सुन्दरता और कुरूपता क्या है?”

    सहचरीके मनका भाव समझकर मोतीने हँसकर कहा—दरिद्र ब्राह्मण यदि उमरा हो जाये, तो सुन्दर होगा या नहीं?”

    पे॰—इसके क्या मानी?

    मोती—क्यों, क्या तुमने यह नहीं सुना है कि बेगमके कहने के अनुसार यदि खुसरू बादशाह हो गये तो मेरा पति उमरा होगा?

    पे॰—यह तो जानती हूँ, लेकिन तुम्हरा पूर्व पति उमरा कैसे होगा?

    मोती—तो हमारे और पति कौन हैं?

    पे॰—जो नये होंगे।

    मोतीने मुस्कराकर कहा—“मेरी जैसी सतीके दो पति, यह बड़े अन्याय की बात होगी। हाँ, यह कौन जा रहा है?”

    जिसे देखकर मोतीने कहा कि यह कौन जा रहा है, उसे पेशमन् तुरत पहचान गयी। वह आगरेका रहनेवाला खान आजमका आदमी था। दोनों ही न्यस्त हो पड़ीं। पेशमन्‌ने उसे बुलाया। उस व्यक्तिने आकर लुत्फुन्निसाको कोर्निश कर पत्र दिया; बोला—“खत लेकर उड़ीसा जा रहा था। बहुत ही जरूरी खत है।”

    पत्र पढ़ते ही मोती बीबीकी सारी आशालतापर तुषारपात हो गया। पत्रका मर्म इस प्रकार था:—

    “हमलोगोंका यत्न विफल हो गया। मरते दम तक बादशाह अकबर हमलोगोंको बुद्धिबलसे परास्त कर गये। उनका परलोकवास हो गया। उनकी आज्ञाके बलसे युवराज सलीम अब जहाँ गीरशाह हो गये। अब तुम खुसरूके लिए व्यस्त न होना। इस उपलक्ष्यमें कोई तुम्हारी शत्रुता न करे, इस चेष्टाके लिये तुरन्त आगारा आ जाओ।”

    अकबर बादशाहने किस तरह इस षड्यन्त्रकी विफल किया, यह इतिहासमें अच्छी तरह वर्णित है। इस तरह उसके विस्तारकी आवश्यकता नहीं।

    पुरस्कार देकर दूतको बिदा करनेके बाद मोतीने वह पत्र पेशमन् को पढ़कर सुनाया। पेशमन्‌ने सुनकर कहा—“अब उपाय?”

  • आनन्द मठ

    आनन्द मठ

    Aproximadamente 86.278 palavras.

    साहब-"टुम कोन हाय?"

    शान्ति-“देखते तो हो कि मैं संन्यासिनी हूँ, तुम जिनके साथ लड़ाई करने आये हो, उन्हीं में से किसी एककी पत्नी हूं।"

    साहब-"टुम हमारा धारपर चलेगा?"

    शान्ति- क्या तुम्हारी रखेली होकर?"

    साहब-“औरटका माफिक रहना, लेकिन शाडी नहीं होगा।"

    शान्ति-"अच्छा, मैं भी तुमसे एक बात पूछती हूं, हमारे घरपर पहले एक बन्दर था पर हालमें वह मर गया। पींजरा खाली पड़ा है। क्या तुम उसके पीजरेको आबाद करने चलोगे? मैं तुम्हारी कमरमें भी साँकल बांध दूंगी। हमारे बागीचे में खूब मीठे केले फलते हैं, उन्हें भरपेट खाया करना।"

    साहब-"टुम बड़ा बहादुर औरट है। टुमारा साहस देखकर हम बहुट खुशी हुआ। टुम हमारा घारपर चलो टुमारा खाविण्ड टो लड़ाईमें मारा ही जायगा; फिर टुम क्या करेगा?"

    शान्ति-"अच्छा, तो हमलोग अभीसे आपसमें एक बात तै कर रखें। युद्ध तो दो चार दिनोंमें होगा ही। यदि उस लड़ाई में तुम जीतोगे, और मैं जीती बचुंगी, तो तुम्हारी रखेली होकर रहूंगी। पर कहीं हमारी जीत हुई, तो तुम हमारे घर आकर बन्दर बनकर पींजरेमें रहोगे और केले खाया करोगे न?"

    साहब—केला बहुत उमडा चीज होटा है। इस वखट टुमारे पास है।"?

    शान्ति—"ले जा अपनी बन्दूक! ऐसो जङ्गली जातिसे बातें करना भी बेवकूफी है!"

    यह कह, बन्दूक फेंककर शांति हंसती हुई चली गयी।

    तीसरा परिच्छेद।

    शान्ति, साहबको वहीं छोड़कर हरिणीकी भांति उछलती कूदती जङ्गलके अन्दर न जाने कहां गायब हो गयी। थोड़ी देर बाद साहबको किसी स्त्रीके मधुरकण्ठसे निकला हुआ सुनाई दिया,—

    "यह यौवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    फिर न जाने कहांसे सारंगीकी सुरीलो तानमें भी यही गीत बज उठा—

    "यह यौवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    फिर उसी सुरमें सुर मिलाकर किसी पुरुषने भी गाया,—

    "यह पौवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    तीनों सुरो ने एक में मिलकर बनकी सारी लताओंको हिला डाला। शान्ति गाती हुई चली;—

    "तह याैवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!

    नदिया बिच नैया जाती है, अंधड़ पानी सह लेती हैं।

    चतुर खिवैया डांड़ चलावे, नहि क्यों पार उतरि हौं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!

    बांध टूटिगो बालू केरो, पूरन हुए मनोरथ मेरो,

    गङ्गाधार ज्वार जब आयो, कौन रोकि तोहे राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    सारंगीमें भी यही गीत बज रहा था—

    "गंगाधार ज्वार जब आयो, कौन रोकि तोहे राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे।"

    जहां घनघोर जङ्गल था, बाहर से देखने पर कहीं कुछ नहीं दिखाई देता था, शान्ति उसी ओर चली गयी। वहां शाखा-पल्लवों के बीच छिपा हुआ छोटासा झोंपड़ा था। उसके खम्भे वगैरह डालों के थे, छाजन पत्तों की, जमीन काठकी और गच मिट्टी की थी। लताद्वार को हटाकर शांति उसी झोपड़े के अन्दर घुसी। वहीं जीवानन्द बैठे हुए सारङ्गी वजा रहे थे।

    शान्ति को देखकर जीवानन्द ने पूछा,—"इतने दिन बाद गङ्गा में ज्वार आया है क्या?"

    शांति ने हंसकर उत्तर दिया,—"नदी नालों को डुबाकर गंगा में ज्वार आने पर भी कहीं पानी वेग से चलता है?"

    जीवानन्द ने उदास होकर कहा,—"देखो शांति! एक दिन व्रतभङ्ग हो जाने के कारण मेरे प्राण तो न्यौछावर हो ही चुके हैं; क्योंकि पाप का प्रायश्चित्त तो करना ही होगा। अबतक तो मैं कभी का प्रायश्चित्त कर चुका होता; पर तुम्हारे ही अनुरोध से नहीं कर सका। पर अब देखता हूं कि बड़ी भारी लड़ाई शीघ्र ही छिड़ा चाहती है। उसी युद्धक्षेत्र में मुझे उस पापका प्रायश्चित्त करना होगा। इन प्राणों को निश्चय ही त्यागना पड़ेगा। मेरे करने के दिन—"

    शांति ने उन्हें आगे और कुछ नहीं कहने दिया, झटपट बोल उठी,—"मैं तुम्हारी धर्मपत्नी, सहधर्मिणी और धर्मकी संगिनी हूं। तुमने बहुत बड़ा धर्म का काम अपने सिरपर उठाया है

    उसी में तुम्हारी सहायता करनेके लिये मैं घर छोड़कर यहां आयी हूं। दोनों जने एक साथ मिलकर धर्मावरण करेंगे, यही सोचकर मैं घर छोड़ जंगलमें आ बसी हूं। मैं तुम्हारे धर्मको वृद्धि करूंगी। धर्म पत्नी होकर तुम्हारे धर्ममें विघ्न क्यों डालूंगी? विवाह लोक, परलोक, दोनोंके लिये किया जाता है। सोचकर देखो, मेरा तुम्हारा विवाह तो इस लोकके लिये हुआ ही नहीं, केवल परलोकके लिये हुआ हैं। परलोकमें हमें दूना फल मिलेगा। फिर प्रायश्चित्तकी बात कैसी? तुमने कौनसा पाप किया है? तुम्हारी प्रतिज्ञा यही थी, कि किसी स्त्रीके साथ एक आसनपर न बैठोगे। अब बतलाओ, कि तुम कहां और कब मेरे साथ एक आसनपर बैठे थे। फिर प्रायश्चित्त कैसा? हाय प्रभो! तुम मेरे गुरु हो, फिर मैं तुम्हें क्या धर्म सिखलाऊंगी। तुम वीर हो, तुम्हें मैं वीरव्रत क्या सिखलाऊंगी?"

    आनन्दसे गद्गद हो, जीवानन्द ने कहा, "क्यों नहीं? अभी तो तुमने मुझे सिखलाया!"

    शांति प्रफुल्लित चित्तसे कहने लगी,-"और देखो, प्रमो! हमारा विवाह इस लोकके लिये भी निष्फल कैसे हुआ? तुम मुझ प्यार करते हो ही, मैं तुम्हें जी से चाहती ही हूं, फिर इससे बढ़कर इस लोकमें और कौनसा फल चाहिये? बोलो, वन्देमातरम्।"

    दोनों व्यक्ति एक स्वरले 'वन्देमातरम्' गाने लगे।

    चौथा परिच्छेद।

    एक दिन भवानन्द गोस्वामी नगरमें गये और चौड़ी सड़क छोड़कर अंधेरी गलीमें घुसे। गलीके दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे मकान खड़े थे। सूर्य भगवान् दोपहर में भी एकाध बार ही इस

    गलीके भीतर झांक लेते हैं, नहीं तो वहां बराबर अंधकारही अंधकार रहता है। उसी गलीके पासवाले एक दोतल्ले मकानमें भवानद ठाकुर घुस पड़े। नीचेके जिस घरमें एक अधेड़ स्त्री बैठी रसोई बना रही थी, वहीं जाकर भवानंद महाप्रभु उपस्थित हुए। स्त्री अधेड़, मोटी ताजी, काली, सफेद कपड़े पहने, माथेमें चंदन लगाये, सिरपर बालोंका जड़ा बांधे थी। हांडीके कोरमें भात चलानेसे कलछी ठक-ठक बोल रही थी। फर फर करके उसके सिरके बाल हवामें उड़ रहे थे, वह आर ही आप न जाने क्या बड़बड़ा रही थी और उसके चेहरेके चढ़ाव उतारके साथ साथ उसके बालोंका लहराना कुछ और शोभा देरहा था। इसी समय भवानन्द महाप्रभु उस घरमें घुस पड़े और बोले, “पण्डिताइनजी प्रणाम।" पण्डिताइनजी भवानन्दको देख कर जल्दी जल्दी अपने कपड़े सम्हालने लगीं। उनकी इच्छा थी कि सिरका सुहावना जूड़ा खोल डालें, पर जूठा हाथ होने के कारण वैसा न कर सकीं। एक तो उनके वे बाल स्वभावतः ही मुलायम थे, जिसपर पूजाके समयका उनमें मालसिरीका एक फल भटका रह गया था। उन्होंने कितना चाहा कि उसे आँचल से छिपा लें, पर आंचलमें वह छिप न सका, कारण वे सिर्फ पांच हाथकी साड़ी पहने हुई थीं। वह पांच हाथ की साड़ी उनकी मोटी तोंदको ही ढकने में प्रायः ख़तम हो गयी थी, तिसपर दुःसह भार-ग्रस्त हृदय-मण्डलकी भी उसे आबरू बचानी पड़ती थी। अन्ततो गत्वा कन्धेतक पहुंचते न पहुंचते ही साड़ीने जवाब दिया। कानके पास आकर चुपकेसे कहा कि बल, अब इसके आगे मुझसे नहीं जाया जायगा। लाचार लज्जा और संकोचवश गौरी ठकुराइनने आंचलको कानके पास लाकर हाथसे पकड़ रखा और आगेसे आठ हाथकी साड़ी पहननेकी मनही मन प्रतिज्ञा करते हुए कहा,-"कौन? गुसाई जी! आओ, आओ। मुझे प्रणाम क्यों करते हो भाई?" भवा०-"तुम भाभीजी ठहरी ?"

    गौरी–"आदरसे जो चाहो कह लो, नहीं तो तुम ठहरे गुसाई बाबा-लाक्षात् देवता! खैर, जब प्रणाम किया ही तो मैं भी असीस देती है कि जियो जागो। हां, प्रणाम कर भी सकते हो; क्योंकि उमरमें मैं तुमसे बड़ी हूं।"

    इस समय गौरीदेवीकी उमर भवानन्दसे २५ वर्ष अधिक होगी, परन्तु सुचतुर भवानन्दने कहा, "यह क्या भाभी! तुम यह क्या कहती हो? तुम्हे रसीली छबीली देखकर ही भाभी कहकर पुकारता हूं। नहीं तो तुम्हें याद है या नहीं, उस बार हिसाब लगाकर देखा गया था, तो तुम मुझसे छः वर्ष छोटी निकली थी? हम वैष्णवोंमें तो जानती ही हो कि हर तरहके लोग हैं। इसीलिये मेरी इच्छा होती है कि मटके ब्रह्मवारीजीकी आज्ञा लेकर तुम्हारे साथ सगाई कर लूं। यही कहने के लिये मैं तुम्हारे पास आया हूं।"

    गौरी-"छिः! यह भी कोई बात है? मैं ठहरी विधवा-”

    भवा०"–तो क्या विधवाकी सगाई नहीं होती?"

    गौरी-“अरे भाई! जाओ, जो मनमें आवे, करो। तुम लोग पंडित टहरे। हम औरतें यह क्या जाने? खैर, कब सगाई होगी?"

    भवानन्दने बड़ी मुश्किलसे अपनी हंसी रोककर कहा, "बस एक बार उस ब्रह्मचारीसे मिलने भर की देर है। अच्छा, यह तो कहो वह कैसी है?"

    गौरी उदास हो गयी। उसने मनही मन सोचा कि मालूम होता है, सगाईकी बात यह योंही दिल्लगीके तौरपर कह रहा था! बोली,-"कैसी क्या? जैसी थी, वैसी है।"

    भवा०-"तुम एक बार जाकर उसको देखो, कि कैसी है। उससे कहना कि मैं उससे मिलने आया हूं।" यह सुन, गौरी देवी हाथकी कलछी जमीनपर रख; हाथ धो, लम्बो लम्बी डग भरती दोतल्ले पर जानेके लिये सीढ़ियां

    चढ़ने लगीं। ऊपर एक कमरेमें एक फटी चटाईपर एक अपूर्व सुन्दरी बैठी थी पर उसके सौन्दर्यपर भीषण छाया पड़ी थी। मध्याह्न कालमें, कूल परिप्लाविनी, प्रसन्न-सलिला, विपुल-जल-कल्लोलिनी, स्रोतस्वतीके ऊपर जैसी घने बादलों की छाया पड़ जाती है, वैसी ही छाया पड़ी हुई थी। नदीमें तर उठ रही थीं, तीरपर कुसुमित वृक्ष हवाके झोंकेसे हिल रहे थे, कोई कोई फूलोंके भारले झुक रहे थे, अट्टालिकाओंकी श्रेणी भी अपनी शोभा दिखा रही थी, डांडोंकी चोटसे नदीका जल चञ्चल हो रहा था, दोपहरका सुहावना समय था; पर उस काली छायामें सारी शोभा-क्षीण थी। उस सुन्दरीकी भी वही दशा थी। पहलेकेसे सुन्दर चिकने और चञ्चल केश, पहलेके ही तरह प्रशान्त और उन्नत ललाटपर किसीको निराली लेखनीसे अङ्कित भौ है, पहलेकीसी बड़ी साश्रु और काली पुतलियोंवाली आंखें-लभी हैं, पर न तो उनमें पहलेकी भांति कटाक्ष है, न चंञ्चलता है, पर कुछ कुछ नम्रता है। अधरोंपर वही पहलेकीसी ललाई है; हृदय उसी तरह भावपूर्ण है, बांहें वैसी ही वनलताकी कोमलताको भी मात करनेवाली हैं, पर आज न तो वह कान्ति है, न ज्योति, न चंञ्चलता और न रस, अधिक क्या वह यौवन हो अब न रहा, केवल सौन्दर्य और माधुये। उसमें और दो नयी बातें आ गयी है धीरता और गंम्भीरता। पहले इन्हें देखने से मालूम होता था कि यह मनुष्य लोककी अनुपम सुन्दरी हैं; पर आज देखनेसे मालूम होता है कि यह देवलोककी कोई शापग्रस्ता देवी है। चारों ओर भोजपत्रपर लिखी हुई पोथियाँ फैली हुई हैं; दीवारमें खूटीपर सुमिरनी माला लटक रही है और जगह जगहपर जगन्नाथ, बलराम, सुभद्राका पट लगा है, कहीं कालियदमन, नव-नारी कुञ्जर, वस्त्रहरण, गोवर्द्धनधारण आदि ब्रजलीलाओंके चित्र अंकित हैं। चित्रोंके नीचे लिखा है,- “चित्र हैं हा विचित्र?” भवानन्दने उसी घरमें प्रवेश किया।

    भवानन्दने पूछा,-"कल्याणी! कैसी हो? तुम्हारा शरीर तो अच्छा है न?"

    कल्याणी-"आप क्या इस सवालका पूछना बन्द न करेंगे?

    मेरा शरीर अच्छा रहनेसे न आपकी ही कुछ भलाई है, न मेरी।"

    भवा०-"जो वृक्ष रोपता है, वह उसमें नित्य जल छोड़ा करता है। उस वृक्षको पनपते देखकर उसे सुख होता है। तुम्हारे मुर्दे शरीरमें मैंने जान डाली थी, इसीलिये पूछता रहता हूं कि वह जान ज्योंकी त्यों है या नहीं?"

    कल्याणी-“कहीं विषका वृक्ष भी सूखता है?"

    भवानन्द-"तो क्या जीवन विष है?"

    कल्याणी-"नहीं तो मैं क्यों अमृत पीकर उसका नाश करने जाती?"

    भवानन्द–"मैंने कई दफै सोचा, पर साहस न हुआ कि तुमले पूछूं कि किसने तुम्हारा जीवन विषमय कर दिया था।"

    कल्याणी-"किसीने नहीं यह जीवन तो आपही विषमय है। मेरा जीवन विषमय है, आपका जीवन विषमय है, सारे संसारका जीवन विषमय है।"

    भवा०-"ठीक है कल्याणी! मेरा जीवन सचमुच विषमय है। जिस दिनसे……. हाँ, तो तुम्हारा व्याकरण पढ़ना समाप्त हो गया?"

    कल्याणी-"नहीं।"

    भवा०-"और कोष?"

    कल्याणी-“उसे पढ़नेमें तो जी नहीं लगता।"

    भवा०-“पहले तो मैंने पढ़ने लिखने में तुम्हारा बड़ा उत्साह देखा था, अब ऐसी अश्रद्धा क्यों हो गयी?"

    कल्याणी-“जब आपकेसे पण्डित भी महापापी होते हैं तब न लिखना पढ़ना ही अच्छा है। प्रभो! मेरे स्वामीका कुछ हाल ब तलाइये।"

    भवा०-"तुम बारबार यह बात क्यों पूछती हो? वे तो तुम्हारे लिये मरे हुएके बराबर हैं।"

    कल्याणी–“मैं उनके लिये मर गयी हूं सही; पर वे मेरे लिये कभी नहीं मर सकते।"

    भवा०-“वे तुम्हारे लिये मरे तुल्य हो जायंगे, यही सोचकर तो तुमने अपनी जान दी थी। फिर बार बार वही बात तुम क्यों पूछती हो?"

    कल्याणी-"मरनेसे ही क्या सम्बन्ध टूट जाता है? कहिये, वे कैसे हैं?"

    भवा०-"अच्छे हैं।"

    कल्याणी…“कहां हैं; पदचिह्नमें?"

    भवा०-"हाँ वहीं है।"

    कल्याणी-"क्या कर रहे हैं?"

    भवा०-" जो करते थे, वही करते हैं। किला और हथियार तैयार करा रहे हैं। उन्हींके बनाये हुए अस्त्रोंसे आजकल सहस्त्र-सहस्त्र सन्तान सजित हो रहे हैं। उनके प्रतापसे तोप, बन्दूक, गोला, गोली और बारूदका हमलोगोंको अभाव नहीं है। सन्तानोंमें आजकल वेही श्रेष्ठ समझे जाते हैं वे हमलोगोंका बड़ा उपकार कर रहे हैं दाहिने हाथ बन रहे हैं।"

    कल्याणी-“मैं यदि प्राण-त्याग नहीं करती, तो वे इतना थोड़े ही कर सकते थे। जिसकी छातीमें कच्चा घड़ा बंधा होता है, वह थोड़े ही भवसागर पार हो सकता है? जिसके पैरों में जंजीर पड़ी होती है वह थोड़ेही दौड़ सकता है? सन्यासी, तुमने इस क्षुद्र जीवनको क्यों बचाया था?"

    भवा०-"स्त्री सहधर्मिणी, पतिके धर्मों में सहायक होती है।"

    कल्याणी–“छोटे छोटे धर्मोंमें। बड़े बड़े धर्मो तो वह कण्ठक ही प्रमाणित होती है। मैंने विषकण्टक द्वारा उनके

    अधर्मका कांटा निकाल फेंका था। छिः पापी, दुराचारी, ब्रह्मचारी! तुमने मुझे मरनेसे क्यों बचाया?"

    भवा०-"मैंने जो प्राण तुम्हें लौटा दिये, उन्हें मेरी ही थाती समझ लो और बोलो, तुम उन्हें मेरे हवाले कर सकती हो?"

    कल्याणी-"अच्छा, यह तो कहिये, आपको मेरी सुकुमारी का कुछ हाल मालूम है या नहीं?"

    भवा०-"बहुत दिनोंसे कुछ नहीं मालूम। जीवानन्द बहुत दिनोंसे उधर गये ही नहीं।"

    कल्याणी-"तो क्या आप मुझे उसका संवाद नहीं ला दे सकते? स्वामी भलेही छूट जायं; पर जीते जी कन्याको क्यों छोड़ूं? अगर इस समय सुकुमारीको पा जाऊं, तो यह जीवन कुछ सुखमय हो सकता है। पर आप मेरे लिये इतना तरद्दुद क्यों उठाने लगे?"

    भवा०-"क्यों नहीं उठाऊंगा? कल्याणी! मैं तुम्हारी लड़की ला दूंगा, पर इसके बाद?"

    कल्याणी-“इसके बाद क्या?"

    भवा०-"स्वामी?"

    कल्याणी- “उन्हें तो मैंने जान बूझकर छोड़ दिया है।"

    भवा०-“यदि उनका व्रत सम्पूर्ण हो जाय?"

    कल्याणी-"तब उन्हींकी होकर रहूंगी। वे क्या जानते हैं, कि मैं मरी नहीं हूं?"

    भवा०-"नहीं।"

    कल्याणी-“क्या आपसे उनकी देखादेखी नहीं होती?"

    भवा०-"होती है।"

    कल्याणी-“मेरी कुछ बात नहीं चलती?"

    भवा०—“नहीं, जो स्त्री मर गयी, उससे स्वामीका नाता ही क्या रह गया?"

    कल्याणी- आप क्या कह रहे हैं?" भवा०—तुम्हारा नया जन्म हुआ है; अब तुम फिर विवाह कर सकती हो।"

    कल्याणी—“मेरी कन्याको ला दो।"

    भवा०-"ला दूंगा-तुम फिर विवाह कर सकती हो?"

    कल्याणी-"क्या तुम्हारे साथ?"

    भवा०-"विवाह करोगी?"

    कल्याणी-"क्या तुम्हारे हो साथ?"

    भवा०- यदि ऐसा ही हो?"

    कल्याणी-"तो फिर सन्तानधर्म कहां जायगा?"

    भवा०–"अथाह जलमें डूब जायगा।"

    कल्याणी-"और परलोक?"

    भवा०-"वह भी अथाह जल में डूब जायगा।"

    कल्याणी- "और यह महाव्रत?"

    भवा०-"वह भी।"

    कल्याणी-"किसलिये तुम इन सबको अथाह जलमें डुबानेको तैयार हो?"

    भवा०-"तुम्हारे ही लिये। देखो, मनुष्य, ऋषि, सिद्ध, देवता, सबका चित्त अवश रहता है। सन्तानधर्म मेरा प्राण है सही; पर आज पहले पहल मुझे कहना पड़ता है कि तुम मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर हो। जिस दिन मैंने तुम्हें जिलाया, उसी दिनसे तुम्हारे चरणोंका क्रीत दाल हो रहा हूं। मैं नहीं जानता था कि संसार में इतनी रूपराशि हैं। यदि मैं जानता कि किसी दिन ऐसी रूपशि मेरी आँखोंतले आयगी, तो मैं कदापि सन्तानधर्म नहीं ग्रहण करता। यह धर्म इस आगमें पड़कर राख हो जाता है। मेरा धर्म जलकर राख हो चुका, सिर्फ प्राण रह गये हैं। आज चार वर्षांसे ये प्राण भी जल रहे हैं। अब ये भी न बचेंगे। ओह! कैसी जलन है, कल्याणी! कैसी ज्वाला है! पर इसमें जलने योग्य ईन्धन अब नहीं रह

    गया। प्राण निकल रहे हैं। चार सालतक सहता आया, अब नहीं सहा जाता। बोलो, तुम मेरी होगी या नहीं?"

    कल्याणी-“मैंने तुम्हारे ही मुंहसे सुना था कि सन्तानधर्मका यह नियम है कि जो इंद्रियोंपर वश नहीं रखता उसे प्राण देकर इस पापका प्रायश्चित्त करना पड़ता है। क्या यह बात ठीक है?"

    भवा०-"हां, ठीक है।"

    कल्याणी-"तब तो, तुम्हारे इस पापका प्रायश्चित्त मृत्यु ही है।"

    भवा०-"हां, मेरा प्रायश्चित्त मृत्यु ही है।"

    कल्याणी—“यदि मैं तुम्हारी मनोकामना पूर्ण कर दूं, तो तुम प्राण दे डालोगे?

    भवा०-"हां, जरूर दे डालूंगा।"

    कल्याणी—"और यदि नहीं पूर्ण करू तो?"

    भवा०–“यदि नहीं पूर्ण करो तो भी मुझे मरकर इस पापका प्रायश्चित्त करना ही पड़ेगा, पचोंकि मेरा चित्त इद्वियोंका दास हो गया है।"

    कल्याणी–"मैं तुम्हारी मनोकामना पूर्ण नहीं करूंगी।

    बोलो, तुम कब मरोगे?"

    भवाo-"आगामी युद्धमें।"

    कल्याणी-“बस तो अब यहांसे चले जाओ। बोलो, मेरी कन्या भेज दोगे या नहीं?"

    भवानन्दने आंखोंमें आंसू भरकर कहा,-"ला दूंगा। क्या मेरे मर जानेपर मुझ स्मरण रखोगी?"

    कल्याणीने कहा रखूंगी, तुम्हें व्रतच्युत, अधर्मी समझाकर याद किया करूंगी।"

    भवानन्द चले गये। कल्याणी पुस्तक पढ़ने लगी।

    पांचवां परिच्छेद

    भवानंद सोचते विचारते मठकी ओर चले। जाते ही जाते रात हो गयी। वे अकेले थे। अकेले ही जङ्गलमें घुसे। वनमें घुसनेपर उन्होंने देखा कि कोई उनके आगे आगे चला जा रहा है। भवानंदने पूछा,–"कौन जा रहा है?"

    आगे जानेवालेने कहा–"अगर तुम्हें पूछना आता, तो ठीकसे जवाब भी देता। यही समझ लो, कि मैं पथिक हूं भवा०–"बन्दे।"

    आगे जानेवाला बोला-"मातरम्।”

    भवा०-“मैं हूं, भवानंद गोस्वामी।"

    आगे जानेवाला-"मैं भी धीरानन्द है।"

    भवा-“कहां गये थे, धीरानन्द?”

    धीरा-आपहीकी खोज में।"

    भवा०-"क्यों? किसलिये?"

    धीरा-“एक बात कहनी थी।"

    भवा-"कौनसी बात?"

    धीरा-“एकांतमें कहनेकी बात है।"

    भवा०-"यहीं कहो न, यहां तो और कोई नहीं है।"

    धीरा०-"आप नगरमें गये थे?"

    भवा०-"हां"

    धीरा-“गौरी देवीके घरपर?"

    भवा०—“तुम भी गये थे क्या?"

    धीराo-"वहां एक बड़ी ही सुन्दरी युवती रहती है।"

    भवानन्द कुछ आश्चर्य में पड़ गये, साथ ही कुछ डर भी गये बोले,-"यह कैसी बातें कर रहे हो?"

    धीरा०-"आपने उससे मुलाकात की थी न?”

    भवा-"फिर क्या हुआ?"

    धीरा°—"आप उसपर अतिशय अनुरक्त हो रहे हैं।"

    भवा°—(कुछ सोचकर) "धीरानन्द! तुमने इतनी खोज ढूंढ किसलिये की? देखो, धीरानन्द! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सच है। पर यह तो कहो, यह बात तुम्हारे सिवा और भी किसीको मालूम है?"

    धीरा°—"और कोई नहीं जानता।"

    भवा°—"तब यदि मैं तुम्हारी जान ले लूं, तो बदनामीले बच जा सकता हूं।"

    धीरा°—"हां"

    भवा°—"तब आओ, इसी निर्जनमें हम दोनों करें या तो मैं तुम्हें मारकर निष्कण्टक हो जाऊंगा या तुम मुझे मारकर प्रेरी सारी जलन मिटा दोगे। हथियार पास है?"

    धीरा°—"है-खाली हाथ भला कौन तुम्हारे साथ ऐसी बढ़ बढ़कर बातें करता? यदि तुम युद्ध ही करना चाहते हो, तो आओ, मैं अवश्य ही युद्ध करूंगा। एक सन्तानका दूसरे संतानसे विरोध करना अनुचित है, किन्तु आत्मरक्षाके लिये किसीसे विरोध करना बुरा नहीं है। पर मैं जो सब बाते कहनेके लिये तुम्हें ढूंढ रहा था, उन्हें सुनकर लड़ते; तो ठीक था।"

    भवा°—"हर्ज ही क्या है? कह डालो।"

    भवानन्दने तलवार निकालकर धीरानन्दके कन्धेपर रखी। धीरानन्द टससे मस न हुए।

    धीरा°—"मैं यही कह रहा था कि तुम कल्याणीसे विवाह कर लो।"

    भवा—"वह कल्याणी ही है, यह भी जानते हो?"

    धीरा°—"हां, तो तुम विवाह क्यों नहीं कर लेते?"

    भवा—"उसका स्वामी मौजूद है।"

    धीरा°—"वैष्णवों में इस तरहका विवाह होता है।"

    भवा°—"ऐसा मुंड़े हुए सन्यासियों में होता है, सन्तानों में नहीं। सन्तानोंको तो विवाह करना ही नहीं चाहिये।"

    धीरा°—"क्या सनातनधर्म छोड़ नहीं सकते? तुम्हारे तो प्राण निकले जा रहे हैं। छिः! छिः! यह क्या कर डाला? मेरा कन्धा कट गया!"

    सचमुच धीरानन्दके कन्धेसे खून जारी हो रहा था।

    भवा°—"तुम किस मतलबसे मुझे धर्मके विरुद्ध सलाह देने आये हो? इसमें अवश्य ही तुम्हारा कोई स्वार्थ है।"

    धीरा°—"वह भी कहता हूं; पर जरा तलवार हटा लो, सब कुछ कह दूंगा। इस सन्तानधर्मके मारे मैं तो हैरान हो गया। मैं तो अब इसे छोड़कर स्त्री-पुत्रके साथ दिन वितानेके लिये अधीर हो रहा हूं। मैं अब इसे छोड़गा। परन्तु मेरा घर जाकर रहना भी मुश्किल है। सभी मुझे विद्रोही जानते हैं जहां घर जाकर रहने लगा कि झट राजपुरुषगण आकर मेरा सिर उतार ले जायंगे। नहीं तो सन्तानगण ही मुझे विश्वास- घातक समझकर मार डालेंगे। इसलिये मैं चाहता हूं कि तुम्हें भी अपने ही रास्तेपर ले चलूं।"

    भवा°—"क्यों? मुझे ही क्यों?"

    धीरा°—"यही तो असल मतलबकी बात है। सभी सन्तानगण तुम्हारी आज्ञा मानते हैं। इन दिनों सत्यानन्द यहां हैं ही नहीं, तुम्हीं सबके सिरधरू हो। तुम इस सेनाको लेकर युद्ध करोगे, तो तुम्हारी जीत अवश्य होगी। युद्ध जय होनेपर तुम अपने ही नामसे राज्यस्थापन कर लेना। सेना तुम्हारे क्श है हो। तुम राजा बनो, कल्याणी तुम्हारी पटरानी बने, मैं तुम्हारा अनुवर बनकर स्त्री पुत्रका मुंह देखते हुए दिन बिताऊं और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूं, यही मेरी इच्छा है। चाहे सन्तानधर्म अगाध जलमें डूब जाय, इसकी मुझे परवाह नहीं।"

    यह सुन, भवानन्दने धीरानन्दके कन्धेपरसे तलवार हटा ली और बोले,—"धीरानन्द! तुम युद्ध करो। मैं तुम्हें मार डालूंगा। मैं इन्द्रियोंका दास होकर भले ही रहूं; पर विश्वासघातक होकर नहीं रह सकता। तुम मुझे विश्वासघातक बनने की सलाह दे रहे हो और आप भी विश्वासघातक हो रहे हो, इसलिये तुम्हें मार डालनेसे मुझे ब्रह्महत्याका पाप नहीं लगेगा। मैं तुम्हें जरूर मार डालूंगा।"

    बात पूरी होते न होते धीरानन्द बेतहाशा भाग चला। भवानन्दने उसका पीछा नहीं किया। वे कुछ देरतक अनमनेसे रहे, पोछे उसे बहुत ढूँढ़ा; पर कहीं पता न लगा

    छठा परिच्छेद

    मठमें न जाकर भवानन्द घने जङ्गलमें चले गये। उस जंगल में एक पुरानी इमारत भग्नावशेष अवस्थामें पड़ी थी। टूटी फूटी ईटोंके ढेरपर जङ्गली लताएं और पौधे बहुतायतसे उग गये थे। वहां असंख्य सर्प रहते थे। उस खंडहरके अन्दर कुछ साफ सुथरी और साबित एक कोठरी थी। भवानन्द वहीं जाकर बैठ गये और सोचने लगे।

    घोर अंधेरी रात है। उसपर लम्बाचौड़ा और घना जङ्गल, जिसमें आदमीका पूत भी नहीं और वह वृक्ष-लताओंके मारे ऐसा बीहड़ हो रहा है, कि बेचारे जङ्गली पशु भी उसके अन्दर जानेका रास्ता नहीं पाते। वह वन अतिविशाल जनशून्य, अन्धकार, दुर्भेद्य और नीरव है। रह रहकर केवल बाघका गरजना अथवा जंगली पशुओंका भूख या डरसे तड़पना और चीत्कार सुनायी पड़ जाता है। कभी कभी किसी बड़े पक्षोके पंख फड़फड़ानेका शब्द सुनाई देता है और कभी कभी आपसमें

    एक दूसरेको मारनेवाले या खा जानेवाले जानवरोंकी दौड़-धूप-का शब्द सुनाई देता है। उस निर्जन, अन्धकारपूर्ण खंडहरमें अकेले भवानन्द बैठे हैं। उनके लिये पृथ्वी मानों रही नहीं गयी। अथवा केवल उपादानमयी हो रही है। उस निविड़ अन्धकारमें भवानन्द हथेलोपर सिर रखे सोच रहे हैं—वे ऐसी प्रगाढ़ चिंतामें निमग्न हो रहे हैं, कि न तो उनकी देह हिलती है, न जोर जोरसे सांस चलती है, न किसी बातका भय मालूम होता है। वे मन-ही-मन कह रहे हैं,—"जो होनेवाला है, वह तो होकर ही मैं भागीरथीकी जलतरंगके पास आकर भी छोटेसे हाथीके बच्चे की तरह इन्द्रियस्रोतमें डूब मरा, इसी का बड़ा भारी दुःख रहा। एक क्षणमें यह देह मिट्टीमें मिल जा सकती है। देहका ध्वंस होते ही इन्द्रियोंका ध्वंस हो जायेगा। फिर मैं इन्द्रियोंके वशमें क्यों गया? मेरा मरना ही ठीक है। धर्म-त्यागी कहलाकर जीना! राम राम! मैं तो अब मरूंगीही।"

    इसी समय ऊपरसे उल्लू बोल उठा। भवानन्द और जोरसे कह उठे—"ओह! यह कैसा शब्द है! कानोंको ऐसा लगा, मानों यम मुझे पुकार रहा है। मैं नहीं जानता, किसने यह शब्द किया, किसने मुझे पुकारा, किसने मुझे यह उपदेश दिया, किसने मुझे मरनेको कहा। पुण्यमयी अनन्ते! तुम शब्दमयी हो; पर तुम्हारे शब्दका मर्म तो मैं समझ नहीं सकता। मुझे धर्ममें मति दो, पापसे दूर करो। हे गुरुदेव! ऐसा आशीर्वाद करो, जिसमें धर्म में मेरी मति सर्वदा बनी रहे।"

    इसी समय उस भीषण वनमें अत्यन्त मधुर, गम्भीर और मर्मभेदी मनुष्य कण्ठ सुनाई पड़ा। मानों किसीने कहा,—"मैं आशीर्वाद करता हूं, कि तुम्हारी मति धर्म में अविचल भावसे बनी रहे।

    भवानन्दके शरीरके रोंगटे खड़े हो गये। यह क्या? यह तो गुरुदेवका ही कण्ठ-स्वर है! बोले,—"महाराज! हैं? आइये, आकर इस दासको दर्शन दीजिये।"

    पर न तो किसीने दर्शन दिये, न उत्तर दिया। भवानन्दने बार बार पुकारा; पर कोई न बोला। उन्होंने इधर उधर बहुत ढूंढा; पर कहीं किसीको न पाया।

    रात बीती, प्रभात हुआ और प्रातःकालके सूर्य उदित होकर जंगली पेड़-पौधोंकी हरी-हरी पत्तियोंपर अपनी किरणें फैलाने लगे, तब भवानन्द वहांसे चलकर मठमें पहुंचे। उस समय उनके कानोंमें “हरे मुरारे! हरे मुरारे!" की ध्वनि सुनाई पड़ी। सुनते ही वे पहचान गये कि यह सत्यानन्दका कण्ठस्वर है। वे समझ गये, कि प्रभु लौट आये हैं।

    सातवां परिच्छेद

    जीवानन्दके कुटीसे बाहर चले जानेपर शांति फिर सारंगी की सुरीली ध्वनिके साथ अपना मीठा गला मिलाकर गाने लगी—

    "प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं

    विहितवहिवचरित्रमखेदम्।

    केशव धृत मीन शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    गोस्वामी जयदेव विरचित राग, ताल, लययुक्त स्तोत्र; शान्तिदेवीके कण्ठसे निकलकर उस अनन्त काननकी अनन्त नीरवतांको भेदकर वर्षाकालकी उमड़ी हुई नदीकी मलयानिलसे चञ्चल की हुई तरङ्गोंके समान मधुर मालूम होने लगा, तब उसने फिर गाया—

    "निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्,

    सदय हृद्य दर्शित पशुधातम्,

    केशव धृत बुद्ध-शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    उसी समय बाहरसे न जाने किसने मेध-गर्जन की तरह बड़े ही गम्भीर स्वरसे गाया—

    "ग्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम्।

    धूमकेतुमिव किमपि करालम्॥

    केशव धृत कल्कि शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    शान्तिने भक्तिभावसे सिर झुकाकर सत्यानन्दके पैरोंकी धूलि सिर चढ़ायी; बोली—"प्रभो! मेरे बड़े भाग्य जो आज आपके चरणकमल यहांतक आये। आज्ञा कीजिये मुझे क्या करना होगा।"

    यह कह, फिर सारङ्गीका सुर मिलाकर उसने गाया,—"तव चरणप्रणाता वयमिति भावय, कुरु कुशलं प्रणतेषु।"

    सत्यानन्दने कहा,—"देवि! तुम्हारी कुशल ही होगी?"

    शान्ति°-"सो कसे महाराज? आपकी आज्ञा तो मेरे वैधव्यके हेतु है।"

    सत्या°—"पहले मैं तुम्हें पहचानता नहीं था। बेटी! मैं रस्सीका ज़ाेर आजमाये विना ही उसे खींच रहा था। तुम्हारा ज्ञान मुझसे कहीं बढ़ा हुआ है। अब तुम जो उपाय अच्छा समझो, करो। जीवानन्दसे यह मत कहना कि मैं सब कुछ जान गया हूं। तुम्हारे लिये वे अपनी जान बचानेकी चेष्टा कारेगें। अबतक बचाते भी रहे हैं। बस, इसीसे मेरा काम हो जायगा।"

    यह सुनते ही उन नील उत्फुल्ल लोचनोंमें आषाढ़ मासमें चमकनेवाली बिजलीकी तरह क्रोधाग्नि पैदा हो आयो। शान्ति- ने कहा—"यह क्या महाराज! आप यह क्या कह रहे हैं ? मैं

    और मेरे स्वामी एकप्राण दो-शरीर हैं। अभी आपसे मेरी जो जो बातें हुई हैं, वह सब मैं उनसे कह दूंगी। उन्हें मरना होगा तो वे मरेंगे ही, इसमें हर्ज ही कौन-सा है? मैं भी तो उनके साथ-ही-साथ मरूंगी। उनके लिये स्वर्गका द्वार खुला है, तो क्या मेरे लिये बन्द है?"

    ब्रह्मचारीने कहा-“मैं आजतक किसीसे हारा नहीं था। आज पहले पहल तुमसे हारा। मां! मैं तुम्हारा पुत्र हूं। सन्तान-पर दया करो, जीवानन्दको बचाओ, अपनी प्राणरक्षा करो, इसीसे मेरा कार्योद्धार हो जायगा।"

    फिर बिजली चमक उठी। शान्तिने कहा-“मेरे स्वामीका धर्म मेरे हाथमें है। उन्हें दूसरा कौन धर्मसे हटा सकता है? इस लोकमें स्त्रीके लिये पति देवता है; परन्तु परलोकमें धर्म ही सबका देवता है। मेरे लिये मेरे पति बड़े हैं, उनकी अपेक्षा मेरा धर्म बड़ा है, और उससे भी मेरे स्वामीका धर्म बड़ा है। अपना धर्म मैं जिस दिन चाहूं छोड़ सकती हूं, पर अपने स्वामी का धर्म मैं कैसे छोड़ा दूंगी? महाराज! आपकी बात मानकर यदि मेरे स्वामी प्राण देनेको तैयार हों, तो मैं उन्हें नहीं रोकूंगी।"

    यह सुन ब्रह्मचारीने लम्बी सांस लेकर कहा-"मां! इस कठोर व्रतमें बलिदान करना पड़ता है। हम सबको इसपर बलि हो जाना पड़ेगा मैं मरूंगा, जीवानन्द मरेंगे, भवानन्द मरेंगे, सभी मरेंगे। मां! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि तुम भी मरोगी। किन्तु देखो, काम करके मरना अच्छा होता है। विना काम किये मरना क्या अच्छा होगा? मैं तो केवल जन्मभूमिको ही मां समझता हूं, और किसीको मैं मां नहीं कहता। क्योंकि इस सजल-सफल धरणीके सिवा हमारी और कोई माता हो हो नहीं सकती। उसके सिवा मैंने आज केवल तुम्हींको मां कहकर पुकारा है। मां हो तो सन्तानकी भलाई करो। ऐसा काम

    करो जिससे कार्योद्धार हो। जीवानन्दके प्राण बचाओ। अपनी भी प्राणरक्षा करो।"

    यह कह सत्यागन्द "हरे मुरारे मधुकैटभारे” गाते हुए चले गये।

    आठवां परिच्छेद

    धीरे धीरे सन्तान-सम्प्रदायवालोंमें यह संवाद फैल गया, कि सत्यानन्द लौट आये हैं और उन्होंने सन्तानोंको कुछ आदेश देनेके लिये बुलाया है। बस, सन्तानोंके दल-के-दल आकर इकट्ठ होने लगे। चांदनी रातमें, नदीकी रेतीली भूमिके पास घने जंगलमें, जहां आम, कटहल, ताड़, इमली, पीपल, बेल, बड़ और सेमल आदि के हजारों वृक्ष लगे हुए थे, वहीं दस हजार सन्तान आकर जमा हुए। एक दूसरेके मुंहसे सत्यानन्दके आनेकी बात सुनकर ये लोग महा कोलाहल करने लगे। सत्यानन्द किस लिये और कहां गये हुए थे, यह सबको नहीं मालूम था। अफवाह थी कि वे सन्तानोंके मंगलकी कामनासे हिमालयपर तपस्या करने गये हुए हैं। आज सभी आपस में इसको चर्चा कर रहे हैं कि-"मालूम होता है, महाराजकी तपस्या सिद्ध हो गयी। अब राज्य हमारा हो जायगा।"

    उस समय बड़ा शोरगुल मचा। कोई चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा–"मारो, मारो इन मुसलमानोंको।” कोई कहने लगा-“जय, महाराजकी जय!” कोई “वन्देमातरम्" गीत गाने लगा। कोई कहता-“भाई! क्या कोई ऐसा भी दिन आयेगा, जब हम तुच्छ बङ्गाली भी रणक्षेत्रमें प्राणत्याग करेंगे,"

    कोई कहता-"क्या वह दिन देखना भी नसीब होगा, कि हम मसजिदें गिराकर उनपर राधामाधवके मन्दिर उठायेंगे?" कोई कहता-"भाई! कब वह दिन आयेगा, जब हम अपना धन आप ही भोगेंगे?"

    दस हजार मनुष्यों के कण्ठ से निकला हुआ कलरव, मन्दमन्द हवाके वेगसे चलायमान वृक्षके पत्तोंके मरमर शब्द, बालुकामयी तरंगिणीका मृदु कल-कल शब्द, नीले आसमानके चन्द्र-तारे, स्वच्छ मेघोंके समूह, हरी-भरी भूमिपर हरा-भरा कानन, नदीका स्वच्छ जल, उजले रंगकी रेत, विकसित कुसुम-राशि और सबके वित्तको प्रसन्न करनेवाला बीच-बीचमें होनेवाला "वन्देमातरम्' गान क्या ही मनोहर दृश्य था! ऐसे ही समय सत्यानन्द उल सन्तान-मण्डलीके बीच में आ खड़े हुए।

    उस समय उन दस हजार सन्तानों के मस्तक वृक्षोंके बीचसे छन-छनकर आनेवाली चन्द्र-किरणोंके पड़नेसे हरी-हरी घासोंवाली जमीन की तरह मालूम पड़ने लगे। आंखों-में आंसूभरे, दोनों हाथ ऊपर उठाये सत्यानन्दने बड़े ऊचे स्वर-से कहा-"शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी, वनमाली, वैकुण्ठनाथ, केशीसहारक, मधुमुरनरकमदेन, लोकपालक तुम्हारा मंगल करें। वे ही तुम्हारी भुजाओं में बल दें, मनमें भक्ति, धर्ममें मति दें। एक बार सब लोग प्रेमसे उनकी महिमाका गीत गाओ। यह सुनते ही हजारों कण्ठोंसे उच्चस्वरमें यह संगीत निकल पड़ा।

    “जय जगदीश हरे!

    प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदं,

    विहितवहिनचरित्रमखेदम्,

    केशव धृत मीन शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    फिर सबको आशीर्वाद देते हुए सत्यानन्दने कहा-"सन्तान गण! आज मैं तुम लोगोंसे एक जरूरी बात कहना चाहता हूं।

    टामस नामक एक विधर्मी दुष्टने बहुतसे सन्तानोंको मार डाला आज रातको तुम सब उसे सैन्य-समेत मारकर ढेर कर दो। जगदीश्वरकी यही आशा है; बोलो, तुम लोग क्या कहते हो?"

    भीषण हरि-ध्वनिसे सारा जङ्गल गूंज उठा-"अभी मार कर ढेर कर देंगे। चलिये, बतलाइये, वे सब कहां हैं!” "मारो, मारो! अभी दुश्मनोंको मार गिराओ” इत्यादि शब्द दूरके पर्वतोंमें प्रतिध्वनित होने लगे।

    तब सत्यानन्दने कहा- "इसके लिये हमलोगोंको थोड़ा धैर्य रखना होगा। शत्रुओं के पास तोपें हैं। जबतक अपने पास भी तोपें न हों, तबतक उनसे युद्ध नहीं किया जा सकता। विशेषतया वे सब वीर-जातिके हैं। पद चिह्नसे १७ तोपें आ रही हैं। उनके आ जानेपर हमलोग युद्ध-यात्रा करेंगे। यह देखो सवेरा हो रहा है। चार घड़ी दिन चढ़ते-चढ़ते-अरे, यह क्या?-धायं धाय धायं।"

    अकस्मात् उस जंगलमें चारों ओरसे तोप छूटनेकी आवाज़ आने लगीं। तोपें अंगरेजोंकी थीं। जालमें फैली हुई मछलियोंकी तरह कप्तान टामसने सन्तान सम्प्रदायको उस जङ्गलमें घेरकर मार डालनेका विचार किया था।

    नवां परिच्छेद

    अँगरेजोंकी तोपें "धायं धायं” करके गरज उठीं। वह शब्द उस विशाल काननको कंपाता हुआ गूंज उठा, नदीके किनारे-किनारे चलकर वह धायं-धायं शब्द दूरस्थ आकाश-प्रान्तसे टकरा उठा। नदीके उस पार दूरस्थ काननमें प्रवेशकर वही ध्वनि फिर 'धायं धायं' कर उठी

    सत्यानन्दने कहा-"तुम लोग जाकर देखो, कि ये किसकी तोपें छूट रही हैं।" यह सुन; कई व्यक्ति घोड़ेपर सवार हो, अनुसन्धान करने चले; पर वे जंगलसे बाहर निकल कुछ ही दूर गये होंगे, कि उनपर सावनको धाराकी तरह गोले बरसने लगे। बस, सबके सब घोड़े समेत वहीं ढेर हो गये।

    सत्यानन्दने दूर-ही-से यह दृश्य देखा। उन्होंने कहा-“वृक्षकी ऊँची डालपर चढ़ कर देखना चाहिये, कि क्या बात है।"

    उनके कहनेके पहलेसे ही जीवानन्द वृक्षपर चढ़कर सवेरेकी सूर्यकिरणोंका आनन्द ले रहे थे। वे ऊपर-ही-से चिल्लाकर बोले-"तो अगरेजोंकी है।"

    सत्यानन्दने पूछा-"सब पैदल हैं या घुड़सवार?"

    जीवानन्द-"दोनों ही।"

    सत्या० -"कितने हैं?"

    जीवा०-"मैं कुछ अनुमान नहीं कर सकता। अभीतक वे लोग धीरे-धीरे जंगलकी आड़से बाहर निकलते ही जाते हैं।"

    सत्या०-“गोरे भी हैं या सब देशी ही सिपाही हैं?"

    जीवा-"गोरे भी हैं।"

    तब सत्यानन्दने जीवानन्दसे कहा-“अच्छा, तुम नीचे उतरो।” जीवानन्द पेड़से नीचे उतर पड़े। सत्यानन्दने कहा-"इस समय दस हजार सन्तान यहां उपस्थित हैं। अब इनकी सहायतासे तुम जो कुछ कर सको, कर दिखाओ। आजके लिये मैंने तुम्हें ही सेनापति बनाया।"

    जीवानन्द हथियार बाँधे लपककर एक घोड़ेपर सवार हो गये। उन्होंने एक बार आंखोंके इशारेसे नवीनानन्द गोस्वामीसे न जाने कौन-सी बात कही, कोई इस इशारेको न समझ सका। नवीनानन्दने भी इशारेसे ही उसका जवाब दिया, पर इस इशारे को भी कोई न समझ सका। केवल उन्हीं दोनों आदमियोंने

    अपने मन-ही-मन समझ लिया, कि यही देखादेखी शायद अन्तिम है, अब फिर इस जीवनमें देखादेखी न होगी। नवीनानन्दने अपनी दाहिनी भुजा ऊपर उठाये हुए सबसे कहा-भाइयो! बस, अब इस समय केवल 'जय जगदीश हरे' गाओ।" फिर क्या था? एक साथ ही दस हजार सन्तान सुरमें सुर मिलाये, नदी, कानन और आकाशको प्रतिध्वनित करते, तोपोंकी आवाजको डुबाते हुए, हजारों भुजायें ऊपर उठाये गाने लगे:-

    "जय जगदीश हरे!

    म्लेच्छनिबहनिधने कलयसि करवालम्।”

    इसी समय अँगरेजोंकी तोपोंसे छूट-छूटकर गोले उस जंगलमें जमा हुए सन्तानोंपर पड़ने लगे। किसोका सिर उड़ गया, किसीकी बाँह कट गयी, किसीका कलेजा छिद गया लोग धरती चूमने लगे, पर तोभी किसीने गाना बन्द नहीं किया। सभी 'जय जगदीश हरे!' गाते रहे। गीत समाप्त होनेपर सबके सब एक साथ ही चुप हो गये। वह घनघोर जङ्गल, वह नदीकी रेत, वह अनन्त निर्जन स्थान एकबारगी निस्तब्ध हो गया, केवल वही तोपोंकी अत्यन्त भयानक गर्जन और दूरसे सुनायी पड़नेवाली गोरोंके हथियारोंकी झनझनाहट और पैरोंकी आहट सुनायी देती थी।

    तब सत्यानन्दने उस गहरे सन्नाटेको तोड़ते हुए ऊँचे स्वरमें कहा–"जगत के स्वामी हरिने तुम लोगोंपर कृपा की। बोलो, तो कितनी दूरपर हैं?"

    ऊपरसे किसीने कहा-"इस जगलके बहुत ही पास। एक छोटेसे मैदानके उस पार।"

    सत्यानन्दने पूछा,-"तुम कौन हो?"

    उपरसे जवाब मिला-"मैं हूं नवीनानन्दा” तब सत्यानन्दने कहा" तुम लोग दस हजार सन्तान हो। तुम्हारी जय आज अवश्य होगी। बस जाओ, जाकर उनकी तोपें छीन लो।",

    यह सुन, सबसे आगे घोड़ेपर सवार जीवानन्दने कहा "चलो, आओ।"

    बस, वे दसों हजार सन्तान, कोई पैदल और कोई घोड़े पर सवार हो, जीवानन्दके पीछे-पीछे चले। पैदल चलनेवालोंके कन्धे पर बन्दूक, कमरमें तलवार और हाथमें भाला था। जंगलसे बाहर निकलते ही लगातार उनपर गोले बरसने लगे, जिससे वे छिन्न-भिन्न होने लगे। अनेक सन्तान तो बिना लड़े-भिड़े ही मारे गये। एकने जीवानन्दसे कहा-“जीवानन्द! व्यर्थ इतने आदमियोंकी जाने लेनेसे क्या लाभ है?"

    जीवानन्दने धूमकर देखा कि भवानन्द हैं। जीवानन्दने कहा-"तुम्हीं कहो, क्या करूँ?

    भवा०-"जंगलके भीतर, पेड़ोंके झुरमुटमें छिपकर, हम अपनी जान भी बचा सकते हैं और बहुत देरतक युद्ध भी कर सकते हैं। नहीं तो सरपट मैदानमें बिना तोपके ये सन्तान तोपोंके सामने घड़ीभर भी न ठहर सकेंगे।"

    जीवा०-"तुम्हारा कहना बहुत ठीक है, पर प्रभुकी आज्ञा है कि तोपें छीन लो। इसलिये हमलोग तो छीननेके लिये अवश्य ही आगे बढ़ेंगे।"

    भवा०-"भला किसका सामर्थ्य है, जो उनसे तो छीन लेगा? खैर, यदि जाना ही है तो तुम चुपचाप बैठो। मैं ही जाता हूं।"

    जीवा०-"नहीं भवानन्द! यह नहीं होनेका। आज मेरे मरनेका दिन है।"

    भवाo–"नहीं, आज मेरे मरनेका दिन है।"

    जीवा–"मुझे तो प्रायश्चित्त करना है।"

    भवा०-"नहीं, नहीं, तुम्हें तो पाप छू भी नहीं गया, तुम्हारा प्रायश्चित्त कैसा? मेरा चित्त कलुषित है। मुझे ही मरने दो। तुम रहो, मैं जाता हूं।"

    जीवा -"भवानन्द! तुमने क्या पाप किया है, यह तो मैं नहीं जानता; पर हाँ, इतना जानता हूं कि तुम्हारे जीते रहनेसे सन्तानोंका कार्य सिद्ध हो जायगा। मैं चलता हूं।

    भवानन्द कुछ देर चुप रहे। अन्तमें बोले। “यदि मरनेका प्रयोजन होगा तो आज मैं ही मरूंगा, नहीं तो जिस दिन प्रयोजन होगा उसी दिन मरूंगा। मृत्युके लिये समय कुलमयका विचार कैसा?”

    जीवा०-"तब आओ, चले आओ।"

    इसके बाद भवानन्द उसके आगे चले आये। उस समय ढेर-के-ढरे गोले पड़कर सन्तानोंके सैन्यका संहार कर रहे थे। इससे लोग भागने लगे, कहीं औंधे सीधे गिरने लगे, कहीं शत्रुओं के बन्दूकधारी सिपाहियोंने अपने अचूक निशानेसे ढेर-के-ढेर सन्तानोंको मारकर जमीनमें गिरा दिया। इसी समय भवानन्दने कहा–"अब तो सन्तानोंको इस तरङ्गमें कूदना ही पड़ेगा। बोलो, भाइयो! कौन-कौन कूदनेको तैयार हैं? गाओ, वन्देमातरम्।” उस समय ऊचे कण्ठसे मेघमल्लार रागमें सारे सन्तान तोपोंकी आवाजके तालपर "वन्देमातरम्” गान गाने लगे।

    दसवां परिच्छेद

    वे दसों हजार सन्तान वन्देमातरम् गान गाते, भाले ऊपर उठाये हुए बड़ी तेजीके साथ तोपोंके मोहड़ेकी ओर चल पड़े। लगातार गोले बरसनेसे सन्तान-सेना खंडखंड, विदीर्ण, और अत्यन्त विशृङ्खल हो गयी, तोभी लौटी नहीं। उसी समय कप्तान टामसकी आज्ञाके अनुसार सिपाहियोंका एक दल बन्दूकोंपर सङ्गीनें चढ़ाये सन्तानों के दाहिनी ओरसे आकर उनपर टूट पड़ा। दोनों तरफसे हमला हो जानेके कारण सन्तानगण एक

    बारगी निराश हो गये। क्षण क्षणमें सैकड़ों सन्तान नष्ट होने लगे। तब जीवानन्दने कहा-"भवानन्द! तुम्हारी ही बात ठीक थी। अब बेचारे वैष्णवोंका हार करवाना व्यर्थ है। चलो, हम लोग धीरे-धीरे लौट चलें।"

    भवा–"अब कैसे लौट चलोगे? इस समय तो जो पीछे फिरेगा वही जान गवायेगा।"

    जीवा०-"सामने और दाहिनी तरफसे हमला हो रहा है। बायीं तरफ कोई नहीं है। चलो, धोरे-धीरे घूमकर बायीं तरफ हो जायँ और उधर-ही-से निकल भागे।"

    भवा०-"भागकर कहां जाओगे? उधर नदी है। वर्षाके कारण बहुत उमड़ी हुई है। अगरेजोंके गोलेके डरसे भागकर तो सन्तान-लेना नदी में डूब जायगी।"

    जीवा०–"मुझे याद आता है कि उस नदीपर पुल बंधा है।"

    भवा०-“यदि उस पुल-परसे यह दस हजार सन्तान-सेना नदी पार करने लगी, तो बड़ी भीड़ हो जायगी। शायद एकही तोपमें सारी सेना सहजमें ही विध्वंस कर दी जायगी।”

    जीवा०-"एक काम करो। थोड़ीसी सेना तुम अपने साथ रख लो। इस युद्धमें तुमने जैसी हिम्मत और चतुराई दिखलाई है उससे मुझे मालूम हो गया, कि ऐसा कोई काम नहीं, जो तुम न कर सको। तुम उन्हीं थोड़ेसे सन्तानों के साथ सामनेसे हमला रोको। मैं तुम्हारी सेनाकी आड़में बाकी सन्तानोंको पुल पार करा ले आऊंगा। तुम्हारे साथके सैनिक तो जरूर ही मरेंगे पर मेरे साथवाले अगर बच जायं, तो कोई ताजुब नहीं।"

    भवा०-“अच्छा, मैं ऐसा ही करता हूं।"

    बस भवानन्दने दो हजार सन्तानोंके साथ एक बार फिर 'वन्देमातरम्' की गगनभेदी ध्वनि करते हुए बड़े उत्साहके साथ अङ्गरेजोंके तोपखानेपर हमला किया। घोर युद्ध छिड़ गया;

    पर तोपोंके सामने वह छोटीसी सन्तान-सेना कबतक ठहरती? जैसे किसान पके हुए धानके पौधोंको काट-काटकर बिछाता चला जाता है वैसे ही अंग्रेजों की गोलन्दाज सेना उन्हें मारमारकर गिराती चली गयी।

    इसी बीच जीवानन्द बाकी सन्तान सैन्यका मुंह थोड़ा फेरकर बायीं ओरके जंगलकी ओर धीरे-धीरे चले। कप्तान टामसके एक सहकारी लेफ्ट एट वाटसनने दूरसे ही देखा, कि सन्तानोंका एक दल धीरे-धीरे भागा जा रहा है। यह देख, वे कुछ फौजी और कुछमामूली सिपाहियों के साथ जीवानन्दके पीछे दौड़े।

    कप्तान टामसने भी यह देख लिया। यह देखकर कि सन्तानोंका प्रधान भाग भागा जा रहा है, उन्होंने कप्तान 'हे' नामक अपने एक सहकारीसे कहा मैं जबतक दो-चार सौ सिपाहियोंको लेकर इन सामनेके छिन्नभिन्न विद्रोहियोंको नष्ट करने में लगा हूं तबतक तुम तोपों और बाकी सिपाहियोंको साथ लेकर उन भागनेवालोंका पीछा करो। बायीं ओरसे लेफ्टएट वाटसन जाही रहा है, दाहिनी ओरसे तुम भी जा पहुंचो। देखो, आगे बढ़कर तुम्हें पुलका मुँह बन्द कर देना होगा जिससे वे लोग तीन ओरसे घिर जायें और जालमें फंसी हुई चिड़ियोंकी तरह मारे जा सकें। वे सब बड़े तेज चलनेवाले देशी सिपाही हैं, भागने में बड़े होशियार होते हैं, इसलिये तुम उन्हें सहज ही न पकड़ सकोगे। घूमघुमाव रास्तेसे घुड़सवारोंको पुलके मुहानेपर ले जाकर खड़ा कर दो, बस, फ़तह हो जायगो।" कप्तान 'हे' ने ऐसा ही किया।

    “अति दर्पे हता लङ्का।" कप्तान टामसने सन्तानोंको अत्यन्त तुच्छ समझ कर केवल दो सौ पैदल सिपाही भवानन्दसे लड़नेके लिये रखे और बाकी सबको 'हे' के साथ रवाना कर दिया। चतुर भवानन्दने देखा कि अंग्रेजोंकी तोपें हट गयीं और प्रायः सब सैनिक भी चले गये, अब जो थोड़े-बहुत रह गये हैं उन्हें हम

    सहज ही मार डालेंगे। बस, उन्होंने अपने बचे-खुचे सिपाहियोंको पुकारकर कहा, “देखो ये जो थोड़ेसे दुश्मनके सिपाही बचे हैं, उन्हें मारकर ढेर कर दो, तो मैं जीवानन्दकी सहायताको चल पड़। बोलो, एक बार प्रेमसे बोलो-"जय जगदीश, हरे!” यह सुनते ही वह थोड़ीती सन्तान-सेना, 'जय जगदीश' का शोर मचाती दुई कप्तान टामसके ऊपर भूखे बाघकी तरह टूट पड़ी; उस आक्रमणकी उग्रता वे थोड़ेसे सिपाही और तिलङ्गे न सह सके, सबके सब नष्ट हो गये। भवानन्दने स्वयं आगे बढ़कर कप्तान टामस के सिरके बाल पकड़ लिये। कप्तान अन्ततक प्राणपणले लड़ता रहा। भवानन्दने कहा-“कप्तान साहब! मैं तुम्हें नहीं मारूंगा, क्योंकि अंगरेजोंसे हमारी कोई शत्रुता नहीं है। तुम भला इन मुसलमानों की सहायता करनेके लिये क्यों आये हो? जाओ, मैं तुम्हें प्राणदान देता हूं, पर इस समय तो तुम हमारे बन्दी होकर रहोगे। भगवान् अङ्गरेजोंका भला करें, हमलोग तुम्हारे दोस्त ही हैं, दुश्मन नहीं।"

    यह सुन कप्तान टामसने भवानन्दको मारनेके लिये अपनी खुली साङ्गीन उठानी चाही, पर भवानन्दने उसे ऐसा शेरकी तरह अपने पंजे में पकड़ रखा था कि वह सिर भी न हिला सका। भवानन्दने अपने साथियोंसे कहा- इसे बाँध लो।" बस, दो-तीन सन्तानोंने आगे बढ़कर कप्तान टामसको बाँध डाला। भवानन्दने कहा-“इसे एक घोड़ेपर लाद लो और इसको साथ लिये हुए जीवानन्दकी सहायताके लिये चलो।"

    तब उन अल्पसंख्यक सन्तानोंने कप्तान टामसको एक घोड़ेकी पीठपर लाद लिया और “वन्देमातरम्' गीत गाते हुए वाटसनकी खोजमें चल पड़े।

    उधर जीवानन्दकी सेनाके दिल टूट रहे थे और वह भागने का मार्ग ढूँढ़ रही थी। जीवानन्द और धीरानन्दने उन्हें समझा-बुझाकर रोक रखना चाहा, पर सबको भागनेसे न रोक सके

    कितने ही भागकर आमके बगीचोंमें जा छिपे। बाकी लोगोंको जीवानन्द और धोरानन्द पुलकी ओर ले गये। पर वहां पहुंचते ही हे और वाटसनने उन्हें दो तरफसे घेर लिया। अब जान कहां बचती है!

    ग्यारहवां परिच्छेद

    इसी समय टामसकी तोपें दाहिनी ओरसे आ पहंची। तब तो सन्तानोंकी सेना एकबार ही तितर-बितर हो गयी। किसीके बचनेकी कोई आशा न रही। सन्तानोंमेंसे जिसका जिधर सींग समाया, वह उधर ही भाग निकला। जीवानन्द और धीरानन्दने उन्हें रोक रखनेके लिये बड़े-बड़े यत्न किये पर न रोक सके। इसी समय बड़े ऊँचे स्वरसे आवाज आयी-“पुलपर चले जाओ, पुलपर चले जाओ, उस पार पहुंच जाओ, नहीं तो नदीमें डूब मरोगे । अंगरेजी सेनाकी ओर मुंह किये हुए धीरे-धीरे पुलपर पहुंच जाओ।"

    जीवानन्दने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, तो सामने भवानन्द नजर आये। भवानन्दने कहा-"जीवानन्द, सबको पुलपर ले जाओ, नहीं तो रक्षा नहीं है।"

    तब धीरे-धीरे पीछेकी ओर हटती हुई सन्तान-सेना पुल पार करने चली। पर ज्योंही वे पुलपर पहुंचे, अंगरेजोंने मौका पाकर तोपसे पुलको उड़ा देना शुरू किया। सन्तानोंका दल नष्ट होने लगा। भवानन्द जीवानन्द और धीरानन्द तीनों एकत्र हो गये, एक-एक तोपकी मारसे बहुतसे सन्तानोंका संहार हो रहा था। भवानन्दने कहा-“जीवानन्द, धीरानन्द, आओ, तलवारें घुमाते हुए हमलोग उस तोपको चलकर छीन लें।"

    यह कह तीनों व्यक्ति तलवारें चमकाते हुए उस तोपके पास पहुंचे और गोलन्दाज सिपाहियोंको मार मार कर ढेर करने लगे। अन्य सन्तानगण भी उनकी मददको आ पहुंचे। तोप भवानन्दके हाथमें चली आयी। तोप कब्जे में कर, भवानन्द उसके ऊपर चढ़ गये और ताली बजाते हुए बोले-“बोलो वन्देमातरम्।" सब-के-सब 'वन्दे मातरम्' गाने लगे। भवानन्दने कहा-“इस तोपको घुमाकर अब इन सबोंकी खबर लेनी चाहिये।”

    यह सुनते ही सन्तानोंने तोपका मुंह फेर दिया। फिर तो वह तोप उच्च नाद करती हुई वैष्णवोंके कानों में हरिनाम गुंजाने लगी। उसकी बाढ़के सामने सिपाहो ढेर होने लगे। भवानन्द उस तोपको खींच खांचकर पुलके मुंहपर ले आये और बोले" तुम दोनों कतारबन्दी करके सन्तान-सेनाको पुलके उस पार ले जाओ, मैं अकेला ही इस व्यूहद्वारको रक्षा करूंगा। तोप चलानेके लिये मेरे पास थोड़ेसे गोलन्दाज सिपाही छोड़ जाओ।"

    बील चुने हुए जवान भवानन्दके पास रह गये और असंख्य सन्तान-सेना पुल पारकर जीवानन्द और धीरानन्दके आज्ञानुसार कतार बाँधे आगे बढ़ी। अकेले भवानन्द उन बीस जवानों की सहायतासे, एक ही तोपसे बहुत सिपाहियोंको जहन्नुमकी राह दिखलाने लगे। पर यवन-सेना भी ज्वारके समय लगातार उठती हुई तरङ्गोंके समान ही बढ़ती गयी और भवानन्दको चारों ओरसे घेरकर हैरान करने लगी। वे उन तरंगोंमें पड़कर डूबने लगे। पर भवानन्द न तो थकनेवाले थे, न हारनेवालेवे बड़े ही निडर थे। वे भी तोप दाग दाग कर कितने ही सैनिकोंको नष्ट करते चले गये। यवनगण आँधीसे उठती हुई तरङ्गोंकी तरह उनपर हमला करने लगे; पर वे बीसों जवान पुलका मोहड़ा रोके ही रहे। वार-पर-वार होनेपर भी वे न हटे और यवन पुलपर न पहुंच सके। वे वीर मानों अजेय थे। उनका जीवन मानों अमर था। इस अवसरमें दल-के-दल सन्तान

    १०

    उसपर पहुंच गये। थोड़ी देर में सारी सन्तान सेना पुल पार कर जाती; पर इसी समय न जाने किधरसे नयी नयी तो गरज उठीं। अरररर धांयकी आवाज होने लगी। दोनों ही दल थोड़ी देर हाथ रोककर देखने लगे, कि ये तो कहांसे दागी जा रही हैं। उन्होंने देखा, कि जंगलके भीतरसे कितने ही देशी सिपाही तोपें दागते हुए चले आ रहे हैं। जंगलसे निकलकर सत्रह बड़ीबड़ी तो एक साथ ही हे साहबके दलपर आग बरसाने लगीं। घोर शब्दसे जंगल और पहाड़ गूंज उठे। सारा दिन लड़ते-लड़ते थकी हुई यवनसेना प्राणोंके भयसे काँप उठी। उस अग्निवर्षाके आगे तिलङ्ग, मुसलमान और हिन्दुस्तानी सिपाही सभी भागने लगे। केवल दो-चार गोरे खड़े-खड़े जूझ रहे थे।

    भवानन्द तमाशा देख रहे थे। उन्होंने कहा-“भाइयो! देखो, वे वींटीकटे भागे जा रहे हैं। चलो, एकबार ही उनपर टूट पड़ो।” तब चोटियोंके दलको तरह कतार बाँधे हुई सन्तानसेना नये उत्साहसे पुलके इस पार आकर यवनोंपर आक्रमण करने लगी। वह अकस्मात् यवनोंपर टूट पड़ी। उन बेचारोंको युद्ध करनेका मौका ही न मिला। जैसे गङ्गाको तरङ्ग पद्धताकार मतवाले हाथीको बहा ले जाती हैं, वैसे ही सन्तानगण यवनोंको बहा ले चले। मुसलमानोंने देखा कि पीछे तो भवानन्दकी पैदल सेना है और सामने महेन्द्रकी बड़ी-बड़ी तोपे गरज रही हैं।

    अब तो हे साहबने देखा कि सर्वनाश उपस्थित है। उनकी सारी सुध-बुध जाती रही-बल, वीर्य, साहस, कौशल, शिक्षा, अभिमान-सबका दिवाला निकल गया। सारी फौजदारी, बादशाही, अंगरेजी, देशी, विलायती, काली और गोरी सेना गिर गिर कर जमीन चूमने लगी। विधर्मियोंका दल भाग चला। जीवानन्द और धीरानन्द 'मार मार' करते हुए विधर्मी सेनाके पीछे दौड़ पड़े। सन्तानोंने उनकी कुल तोपें छीन लीं। बहुतसे अंगरेज़ और देशी सिपाही मारे गये। सर्वनाश समीप आया देख,

    कप्तान हे और वाटसनने भवानन्दके पास कहला भेजा-"हम सब तुम्हारे कैदी हैं, अब हमारी जानें छोड़ दो।” जीवानन्दने भवानन्दके मुंहकी ओर देखा। भवानन्दने मन-ही-मन कहा-“नहीं, यह तो नहीं होगा। आज तो मैं मरनेके लिये तैयार हूं।" यही सोचकर भवानन्द ऊपरको हाथ उठाये, हरि-हरि कहते हुए बोले-“मारो! मारो इन दुष्टोंको।"

    अब तो एक भी प्राणी जीता न बचा। केवल २०१३० गोरे सिपाही एक जगह इकठ्ठे होकर मन-ही-मन आत्मसमर्पण करनेका निश्चय कर, जानपर खेलकर लड़ रहे थे। जीवानन्दने कहा-"भवानन्द! हमारी तो जय हो चुकी, अब लड़नेका कोई काम नहीं है। इन दो-चार व्यक्तियों को छोड़कर और कोई जीता नहीं रहा। इनको प्राणदान दे दो और घर लौट चलो।"

    भवानन्दने कहा,-"एकको भी जीता छोड़कर भवानन्द नहीं लौट सकता। जीवानन्द! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर कहता हूं, तुम अलग हटकर खड़े हो जाओ और तमाशा देखो। मैं अकेला ही इन बचे अंगरेजोंको मार गिराता हूं।"

    कप्तान टामस घोड़ेकी पीठपर बंधा था। भवानन्दने हुक्म दिया-"उसे मेरे सामने ले आओ। पहले उसीको जान लूंगा; फिर मैं तो मरूंगा ही।"

    कप्तान टामस बंगला अच्छी तरह समझता था। उसने यह बात सुनललकार कर उन अंगरेज़ सिपाहियोंसे कहा-“भाई अगरेजो! मैं तो मरता ही हूं; पर तुम लोग इंग्लैण्डके प्राचीन यशकी रक्षा करना। मैं तुम्हें ईसामसीहकी सौगन्ध देकर कहता हूं कि पहले मुझे मारकर तब इन विद्रोहियोंको मारना।"

    इसी समय दायँ से एक पिस्तौल छूटी। एक आइरिशने कप्तान टामसको लक्ष्यकर यह गोली छोड़ी थी। गोली कप्तान टामसके सिरमें लगी। उसके प्राण निकल गये। भवानन्दने ज़ोर-से चिल्लाकर कहा-"मेरा ब्रह्मास्त्र व्यर्थ चला गया। अब कौन

    ऐसा अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव है, जो इस समय मेरो रक्षा कर सके? यह देखो, चुटीले शेरकी तरह सब गोरे मेरे ऊपर टूट रहे हैं। मैं तो मरनेके लिये आया ही हूं। अब बतलाओ कौन कौन सन्तान मेरे साथ मरना चाहते हैं।"

    सबसे पहले धीरानन्द आगे आये। इसके बाद जीवानन्द। साथ ही दस, फिर पन्द्रह, फिर बीस और अन्तमें ५० सन्तान आकर वहीं इकट्ठे हो गये। भवानन्दने धीरानन्दको देखकर कहा-"तुम भी क्या हमारे ही साथ मरने आये हो?"

    धीरा-"क्यों? मरनेमें भी किसीका इजारा है?” यह कहते हुए धीरानन्दने एक अंगरेजको घायल किया।"

    भवा०-"नहीं, नहीं, मेरे कहनेका मतलब यह है कि तुम तो स्त्री पुत्रका मुंह देखते हुए सुखसे दिन बिताना चाहते थे।"

    धीरा०-"कलवाली बातका इशारा कर रहे हो? क्या अब भी तुम्हारी समझमें कुछ न आया?" यह कहते कहते-धीरानन्द ने उस घायल गोरेको मार गिराया।"

    भवा०-"नहीं"

    बात पूरी भी न होने पायी थी, कि एक गोरेने भवानन्दका दाहिना हाथ काट डाला।

    धीरा०-"मेरी क्या मजाल, जो मैं तुम्हारे जैसे पवित्रात्मासे वैसी बातें कहता? मैं तो उस समय सत्यानन्दका जासूस बनकर गया हुआ था।"

    भवा०-“यह क्या? क्या महाराज मेरे ऊपर सन्देह करते हैं?"

    उस समय भवानन्द एक ही हाथसे लड़ रहे थे। धीरानन्दने उसकी रक्षा करते हुए कहा-"कल्याणीके साथ तुम्हारी जो जो बाते हुई थीं, वे सब महाराजने अपने कानों सुन ली थीं।"

    भवा०-“सो कैसे?

    धीरा०-वे स्वयं वहां गये थे। देखो, सावधान हो जाओ।"

    इसी समय एक गोरेने भवानन्दपर हमला किया, जिसका जवाब उन्होंने हमलेसे दिया।

    धीरानन्द कहते गये-“वे कल्याणीको गीता पढ़ा रहे थे, उसी समय तुम वहाँ पहुंचे। देखो, सावधान!"-"भवानन्दकी बायीं भुजा भी कटकर गिर पड़ी।

    भवा०-“अच्छा, उनको मेरे मरनेका हाल सुनाते हुए कह देना कि मैं अविश्वासी नहीं हूं।"

    आंखोंमें आंसू भरकर धीरानन्द युद्ध करते-करते बोले-“सो तो वे ही समझे। कल उन्होंने जो आशीर्वाद किया था उसे याद करो। उन्होंने मुझसे कह रखा था कि आज भवानन्द मरेगा, तुम उसके पास ही रहना और उससे मरते समय कह देना कि मेरे आशीर्वादसे उसे मरने के बाद वैकुण्ठवास होगा।"

    भवानन्दने कहा-“सन्तानोंकी जय हो।, भाई! मरते समय एक बार 'वन्देमातरम्' गान तो मुझे सुना दो।" उसी समय धीरानन्दके आज्ञानुसार सभी युद्धोन्मत्त सन्तान ललकारके साथ 'वन्देमातरम्' गाने लगे। इससे उनकी भुजाओंमें दुगुना बल आ गया। उस भयङ्कर मुहूर्त में ही बाकी बचे हुए गोरे भी मारे गये। सारी युद्धभूमिपर सन्नाटा छा गया।

    उसी मुहूर्त में भवानन्दने भी मुंहसे 'वन्देमातरम्' गाते और मन-ही-मन विष्णु भगवान्के चरण-कमलोंका ध्यान करते हुए परलोककी यात्रा की।

    हाय रे रमणी रूप लावण्य! इस संसारमें सबसे बढ़कर तुझे ही धिक्कार है!

    बारहवां परिच्छेद

    लड़ाई जीतने के बाद सारे विजयी वीर, अजय नदीके किनारे चारों ओरसे सत्यानन्दको घेरे हुए, तरह तरहको खुशियां मनाने लगे। केवल सत्यानन्दको ही सुख नहीं था। वे भवानन्दके लिये दुःखी हो रहे थे।

    अबतक तो वैष्णवोंके पास लड़ाईके अधिक बाजे नहीं थे, पर इस समय न जाने कहांसे हजारों ढोल, दमामे, शहनाई, भेरी, तुरही, सिंघे आदि बाजे आ पहुंचे। जय-सूचक वाद्योंकी ध्वनिसे सभी जङ्गल, नदियां और पहाड़गूज उठे। इस प्रकार बड़ी देरतक सन्तानोंने तरह तरहसे खुशियां मनायीं। इसके बाद सत्यानन्दने कहा-"आज जगदीश्वरने बड़ी कृपा की जो सनातनधर्मकी जय हुई; परन्तु अभी एक काम बाकी रह गया है। जो हमारे साथ खुशियाँ न मना सके और हमें यह खुशीका दिन दिखलानेके लिये जानोंपर खेल गये, उन्हें भूल जानेसे काम नहीं चलेगा। जिन्होंने रणक्षेत्रमें प्राण गंवाये हैं, चलो, हम उन लोगोंका शव-संस्कार कर। विशेषकर, जिस महात्माने हमें इस लड़ाई में जिताकर अपने प्राण दे दिये हैं, उस भवानंदका संस्कार खूब धूमधामसे करें।"

    यह सुनते ही सन्तानोंका दल 'वन्देमातरम्' कहता हुआ मरे हुए वीरोंका संस्कार करने चला। सब लोग हरिनाम लेते हुए बहुत सी चन्दनकी लकड़ियाँ बटोर लाये और भवानन्दकी चिता रच उसीपर उन्हें सुला, आग लगाकर चारों ओरसे चिताको घेरे हुए 'हरे मुरारे' गाने लगे। ये लोग विष्णु-भक्त थे-वैष्णव- सम्प्रदाय-भक्त न थे, इसीलिये इनमें दाह कम होता था।

    उसके बाद जंगलमें केवल सत्यानन्द, जीवानन्द, महेन्द्र, नवीनानन्द और धीरानन्द ही रह गये। पांचों व्यक्ति एकांतमें बैठे सलाह करने लगे। सत्यानन्दने कहा- "इतने दिनोंतक हम-लोग जिस व्रतके लिये अपना सब कर्म-धर्म और सुख-आराम छोड़ बैठे थे, वह पूरा हो गया। अब यहाँ यवन-सेनाका नाम-निशान भी न रहा, जो बाकी बचे हैं वे एक क्षण भी हमारे सामने न ठहर सकेंगे अब तुम लोगोंकी क्या राय है?"