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  • गल्प समुच्चय

    गल्प समुच्चय

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    गल्प समुच्चय
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    १—पं॰ ज्वालादत्त शर्मा

    आप मुरादाबाद के निवासी हैं। संस्कृत, फ़ारसी और उर्दू के अच्छे ज्ञाता हैं। आपने उर्दू के कई सुविख्यात कवियों पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं। आप की वर्णन-शैली और भाषा सरस है।

    २—महाशय सुदर्शन

    आप पंजाब के निवासी हैं। आप कई समाचार-पत्रों का सम्पादन भी कर चुके हैं। आपका हिन्दी और उर्दू-दोनों ही भाषाओं—पर अधिकार है। आपके गल्प बड़ें मनोरंजक, शिक्षाप्रद और भाव-पूर्ण होते हैं। आपके गल्पों के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आप अच्छे नाट्यकार भी हैं। आपको दो बार "पंजाब टेक्स्ट-बुक कमेटी" से पुरस्कार मिल चुके हैं। आपकी शैली बड़ी मर्म-स्पर्शी तथा लालित्य-पूर्ण है। मनोभावों का चित्रण करने में आप निपुण हैं।

    ३-पं० चतुरसेन शास्त्री

    आप देहली के निवासी हैं। आपकी रचनायें अधिकतर गद्यकाव्य-मयी होती हैं, माधुर्य में डूबी हुई। मनोभावों का विश्लेषण करने में आप सिद्ध-हस्त हैं। आपकी भाषा बहुत परिमार्जित और भाव श्रृङ्गार-मय होते हैं। 'अन्तस्तल' आपका एक गद्य-काव्य है। "हृदय की प्यास" नाम का रोचक उपन्यास भी आपने लिखा है।

    ४—श्रीप्रेमचन्द

    आप काशी के रहने वाले हैं। आपने कानपुर के उर्दू-पत्र "ज़माना" में लेख लिखना शुरू किया। आपकी "प्रेम-पच्चीसी" और “सोज़ेवतन" यह दोनों प्रथम ज़माना ही से प्रकाशित हुई। सन् १९१४ से आप हिन्दी में लिख रहे हैं। आपके कई उपन्यास "सेवा-सदन", "वरदान", "काया- कल्प", "प्रेमाश्रम", "रंगभूमि", "प्रतिज्ञा" तथा "ग़बन" आदि प्रसिद्ध हो चुके हैं। आपकी कहानियों के कई संग्रह निकल चुके हैं-"प्रेम-प्रतिमा", "प्रेम-पूर्णिमा", "प्रेम-पञ्चीसी", "प्रेम-प्रसून", "प्रेमतीर्थ”, “सप्त-सरोज", "नव-निधि", "पाँच फूल", "सप्त सुमन", "प्रेम कुंज" आदि। आपकी दो-चार गल्पों के अनुवाद जापानी तथा अंग्रेजी भाषा में भी निकल चुके हैं। आप 'माधुरी' के संयुक्तसम्पादक तो वर्षों रहे ही हैं, इधर 'हंस' का सम्पादन भी बड़ी ही योग्यता से कर रहे हैं। (रामदासगौड़)

    ५—श्रीपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी बी॰ ए॰

    आप मध्यप्रदेश के निवासी और प्रसिद्ध मासिक-पत्रिका 'सरस्वती' के सम्पादक हैं। आपकी शैली बहुत ही प्रौढ़ विचार-शील और कटाक्ष-पूर्ण है। आपने प्राच्य और पाश्चात्य-साहित्य का गहरा अध्ययन किया है। 'साहित्य-विमर्श' में आपने संसार-साहित्य की मार्मिक विवेचना की है। आप सुकवि भी हैं।

    ६—पं॰ विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

    आप कानपूर के निवासी हैं। आपकी कहानियाँ प्रायः हिन्दी-मासिक-पत्रिकाओं में निकलती रहती हैं। 'गल्प-मन्दिर' और 'चित्रशाला'——ये दो संग्रह आपकी कहानियों के प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आपने 'मनोरंजन' मासिक-पत्र का बड़ी योग्यता से सम्पादन किया। आपकी कहानियों में बहुधा निम्न-श्रेणी के चरित्रों का चित्रण होता है। आपकी कला की विशेषता संभाषण है। संभाषणों-द्वारा ही आपने कई ड्रामे लिखे हैं। आपका एक उपन्यास धारा-वाहिक रूप में 'सुधा' में निकला था, जो अब पुस्तक रूप में भी छप गया।

    ७—श्रीशिवपूजन सहाय

    आप बिहार के निवासी हैं। आपकी भाषा माधुर्य से परिपूर्ण होती है। आप सच्चे कलाविद् की भाँति भापा को खूब अलंकृत करते हैं। आपकी कई पुस्तकें—'महिला-महत्व' 'देहाती दुनिया' आदि—प्रकाशित हो चुकी हैं। पहले आपने 'बालक' का सम्पादन बड़ी योग्यता से किया, अब 'गंगा' का सम्पादन करते हैं।

    ८–श्रीचण्डीप्रसाद, बी० ए० 'हदयेश'

    आप पीलीभीत के निवासी थे। आपके देहावसान को तीन वर्ष हो गये। आप सानुप्रास भाषा लिखते थे। आपकी लेखन-शैली मधुर और चरित्र-चित्रण आकर्षक होता था। यदि आप कुछ काल तक और जीवित रहते, तो हिन्दी-साहित्य में एक विशिष्ट धारा प्रवाहित कर जाते। आपके 'मंगल-प्रभात' और 'मनोरमा' आदि उपन्यास तथा 'नन्दन-निकुञ्ज' आदि गल्प-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आप 'चाँद' के सहकारी संपादक भी रह चुके हैं। कविताएँ भी आप अच्छी लिख लेते थे।

    ९-श्रीराजेश्वरप्रसादसिंह

    आप प्रयाग के रहनेवाले हैं। पहले आप 'लीडर' के कार्यालय में काम करते थे। अब स्वतंत्र रूप से साहित्य-सेवा करते हैं। आपकी कहानियाँ समाज की दुर्बलताओं पर आधारित होती हैं। आपकी शैली में दार्शनिक विचारों का अच्छा सम्मिश्रण होता है। आप अंग्रेजी में भो लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं।

    (१) शतरंज के खिलाड़ी

    ______

    ( १ )

    वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विला-सिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था। शासन-विभाग में, साहित्य- क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला-कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी। राज-कर्मचारी विषय-वासना में, कवि-गण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में, व्यवसायी सुरमे, इत्र, मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में, लिप्त थे। सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे हैं; तीतरों की लड़ाई के लिये पाली बदी जा रही है। कहीं चौसर बिछी हुई है; पौ-बारह का शोर मचा हुआ है। कहीं शतरंज

    का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर रंक तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते, तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते। सतरंज, ताश, गंजीफ़ा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है। ये दलीलें जोरों के साथ पेश की जाती थीं (इस सम्प्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है) इस लिए अगर मिरजा सज्जादअली और मीर रौशनअली अपना अधिकांश समय बुद्धि तीव्र करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशील पुरुष को क्या आपत्ति हो सकती थी? दोनों के पास मौरूसी जागीरें थीं; जविका को कोई चिन्ता न थी; घर में बैठे चखौतियाँ करते थे। आखिर और करते ही क्या? प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके विसात बिछाकर बैठ जाते, मुहरे सज जाते, और लड़ाई के दाव पेंच होने लगते। फिर खबर न होती थी कि कब दोपहर हुई, कब तीसरा पहर, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा आता कि खाना तैयार है। यहाँ से जवाब मिलता-चलो, आते हैं; दस्तरख्वान बिछाओ। यहाँ तक कि बावरची विवश होकर कमरे ही में खाना रख जाता था। और दोनों मित्र दोनों काम साथ-साथ करते थे। मिरजा सज्जादअली के घर में कोई बड़ा-बूढ़ा न था, इसलिए उन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ होती थीं; मगर यह बात न थी कि मिरजा के घर के और लोग उनके इस व्यवहार से खुश हों। घरवालों का तो कहना ही क्या, महल्लेवाले, घर के नौकर

    चाकर तक नित्य द्वेष-चूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे-बड़ा मनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे, किसी को इसकी चाट पड़े, आदमी दीन दुनिया किसी के काम का नहीं रहता। न घर का न घाट का। बुरा रोग है। यहाँ तक कि मिरजा की बेगम साहब को इससे इतना द्वेष था कि अवसर खोज-खोज कर पति को लताड़ती थीं; पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था। वह सोती ही रहती थीं, तब तक उधर बाजी बिछ जाती थी। और रात को जब सो जाती थीं, तब कहीं मिरेजाजी घर में आते थे। हाँ नौकरों पर वह अपना गुस्सा उतारती रहती थीं-क्या पान मांगे हैं? कह दो आकर ले जायें। खाने की फुरसत नहीं है? ले जाकर खाना सिर पर पटक दो, खायें चाहे कुत्ते को खिलावें। पर दूबदू वह भी कुछ न कह सकती थीं। उनको अपने पति से उतना मलाल न था, जितना मीरसाहब से। उन्होंने उनका नाम मीर बिगाड़ू रख छोड़ा था। शायद मिरजाजी अपनी सफाई देने के लिए सारा इलजाम मीरसाहब ही के सिर थोप देते थे।

    एक दिन बेगम साहबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौंडी से कहा-जाकर मिरजासाहब को बुला ला। किसी हकीम के यहाँ से दवा लावें। दौड़ जल्दी कर। लौंडी गई, तो मिरजाजी ने कहा-चल अभी आते हैं। बेगम साहबा का मिज़ाज़ गरम था। इतनी ताब कहाँ कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरंज खेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौंडी से कहा-जाकर

    कह, अभी चलिए, नहीं तो वह आपही हकीम के यहाँ चली जायँगी।

    मिरजाजी बड़ी दिलचस्पी बाजी खेल रहे थे, दो ही किस्तों में मिरसाहब को मात हुई जाती थी। झुँझलाकर बोले- क्या ऐसे दम लबों पर है? जरा सब्र नहीं होता?

    मीर-अरे तो जाकर सुन हो आइए न। औरतें नाजुक मिज़ाज़ होती ही हैं।

    मिरजा-जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ! दो किस्तों में आपकी मात होती है।

    मीर-जनाब इस भरोसे न रहियेगा। वह चाल सोची है कि आपके मुहरे धरे रहें और मात हो जाय; पर जाइये सुन आइए। क्यों खामख्वाह उनका दिल दुखाइएगा?

    मिरजा इसी बात पर मात ही करके जाऊँगा।

    मीर-मैं खोलूगा ही नहीं। आप जाकर सुन आइए।

    मिरजा-अरे यार, जाना पड़ेगा हकीम के यहाँ। सिर-दर्द खाक नहीं है; मुझे परेशान करने का बहाना है।

    मीर-कुछ ही हो, उनकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी।

    मिरजा-अच्छा, एक चाल और चल लूँ।

    मीर-हरगिज़ नहीं, जब तक आप सुन न आवेंगे, मैं मुहरे में हाथ ही न लगाऊँगा।

    मीरजा साहब मजबूर होकर अन्दर गये, तो बेगम साहबा ने त्यौरियाँ बदल कर; लेकिन कराहते हुए कहा-तुम्हें निगोड़ी शत-

    रंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर ही जाय; पर उठने का नाम नहीं लेते! नौज कोई तुम-जैसा आदमी हो!

    मिरजा-क्या कहूँ, मीरसाहब मानते ही न थे। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाकर आया हूँ।

    बेगम-क्या जैसे वह खुद निखट्टू हैं, वैसे ही सबको समझते हैं? उनके भी तो बाल-बच्चे हैं, या सबका सफाया कर डाला?

    मिरजा-बड़ा लती आदमी है। जब आ जाता है, तब मजबूर होकर मुझे भी खेलना ही पड़ता है।

    बेगम-दुत्कार क्यों नहीं देते?

    मिरजा-बराबर के आदमी हैं, उम्र में, दर्जे में मुझसे दो अङ्गुल ऊँचे। मुलाहिजा करना ही पड़ता है।

    बेगम-तो मैं ही दुत्कारे देती हूँ। नाराज़ हो जायेंगे, हो जायें। कौन किसी की रोटियाँ चला देता है। रानी रूठेंगी, अपना सुहाग लेंगी।—-हिरिया, जा, बाहर से शतरंज उठा ला। मीरसाहब से कहना, मियाँ अब न खेलेंगे, आप तशरीफ़ ले जाइये!

    मिरजा– हाँ हाँ, कहीं ऐसा ग़ज़ब भी न करना! जलील कराना चाहती हो क्या!– ठहर हिरिया, कहाँ जाती है।

    बेगम–जाने क्यों नहीं देते! मेरा ही खून पिये, जो उसे रोके। अच्छा, उसे रोका, मुझे रोको तो जानू!

    यह कहकर बेगम साहबा झल्लाई हुई दीवानखाने की तरफ़ चलीं। मिरजा बेचारे का रंग उड़ गया। बीवी की मिन्नतें करने लगे-खुदा के लिए, तुम्हें हज़रत हुसेन की क़सम है। मेरी ही

    मैयत देखे, जो उधर जाय; लेकिन बेगम ने एक दीवानखाने के द्वार तक गई; पर एकाएक पर पुरुष के सामने जाते हुए पाँव बंध-से गये। भीतर झांका। संयोग से कमरा खाली था। मीरसाहब ने दो-एक मुहरे इधर-उधर कर दिए थे, और अपनी सफ़ाई जताने के लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, बेगम ने अन्दर पहुँचकर बाजी उलट दी, मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिए, कुछ बाहर और किवाड़े अन्दर से बन्द करके कुंडी लगा दी। मीरसाहब दरवाजे पर थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की झनक कान में पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गए, बेगम साहबा बिगड़ गई। चुपके से घर की राह ली।

    मिरजा ने कहा——तुमने ग़ज़ब किय !

    बेगम——अब मीरसाहब इधर आये, तो खड़े-खड़े निकलवा दूंगी। इतनी लौ खुदा से लगाते, तो वली हो जाते। आप तो शतरंज खेलें, और मैं यहाँ चूल्हे-चक्की की फ़िक्र में सिर खपाऊँ! ले जाते हो हकीम साहब के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है?

    मिरजा घर से निकले, तो हकीम के घर जाने के बदले मीर साहब के घर पहुँचे, और सारा वृत्तान्त कहा। मीरसाहब बोले——मैने तो जब मुहरे बाहर आते देखे, तभी ताड़ गया। फौरन् भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती है; मगर आपने उन्हें यों सिर चढ़ा रक्खा है, यह मुनासिब नहीं। उन्हें इससे क्या मतलब कि आप बाहर क्या करते हैं। इन्तजाम करना उनका काम है, दूसरी बातों से उन्हें क्या सरोकार? मिरजा––ख़ैर, यह तो बताइए, अब कहाँ जमाव होगा?

    मीर––इसका क्या ग़म है। इतना बड़ा घर पड़ा हुआ है। बस, यहीं जमे।

    मिरजा––लेकिन बेगम साहबा को कैसे मनाऊँगा? जब घर पर बैठा रहता था, तब तो वह इतना बिगड़ती थीं; यहाँ बैठक होगी, तो शायद जिन्दा न छोड़ेंगी।

    मीर––अजी बकने भी दीजिए; दो-चार रोज़ में आप ही ठीक हो जायेंगी। हाँ, आप इतना कीजिए कि आज से ज़रा तन जाइए।

    ( २ )

    मीरसाहब को बेगम किसी अज्ञात कारण से मीरसाहब का घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझती थी; इसलिए वह उनके शतरंज-प्रेम की कभी आलोचना न करती थीं; बल्कि कभी-कभी मीर- साहब को देर हो जाती, तो याद दिला देती थीं। इन कारणों से मीरसाहब को भ्रम हो गया था, कि मेरी स्त्री अत्यंत विनयशील और गम्भीर है; लेकिन जब दीवानखाने में बिसात बिछने लगी, और मीरसाहब दिन-भर घर में रहने लगे, तो बेगम साहबा को बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड़ गई। दिनभर दरवाजे पर झाँकने को तरस जाती।

    उधर नौकरों में भी कानाफूसी होने लगी। अब तक दिन-भर पड़े-पड़े, मक्खियो मारा करते थे। घर में कोई आवे, कोई जाय, उनले कुछ मतलब न था। अब आठों पहर की धौंस हो गई। कभी पान लाने का हुक्म होता। कभी मिठाई का। और, हुक्का तो किसी प्रेमी के हृदय की भाँति जलता ही रहता था। वे बेगम साहबा से जा-जाकर कहते––हुजूर, मियाँ की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गई! दिन-भर दौड़ते-दौड़ते पैरों में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे तो शाम कर दी! घड़ी-आध घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमें तो कोई शिकायत नहीं, हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा, बजा ही लावेंगे; मगर यह खेल मनहूस है। इसका खेलनेवाला कभी पनपता नहीं; घर पर कोई न कोई आफ़त ज़रूर आती है। यहाँ तक कि एक के पीछे महल्ले के महल्ले तबाह होते देखे गये है। सारे महल्ले में यही चरचा होती रहती है। हुजूर का नमक खाते है, अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज हाता है; मगर क्या करें। इस पर बेगम साहबा कहती-मै तो खुद इसको पसन्द नहीं करती; पर वह किसी को सुनते ही नहीं, तो क्या किया जाय।

    महल्ले मे भी जो दो-चार पुराने ज़माने के लोग थे, वे आपस में भाँति-भाँति के अमङ्गल की कल्पनाएं करने लगे-अब खैरियत नहीं है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल्क का खुदा ही हाफ़िज़ है। यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगा। आसार बुरे हैं।

    राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फ़रियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी

    दौलत लखनऊ में खिंची आती थी, और वह वेश्याओं में, भाँड़ों में, ओर विलासिता के अन्य अङ्गों को पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज़-कम्पनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता था। कमली दिन-दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार-बार चेतावनी देता था; पर यहाँ तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे; किसी के कानों पर जूं न रेंगती थी।

    खैर, मीरसाहब के दीवानखाने में शतरंज होते कई महीने गुज़र गये। नये-नये नक्शे हल किये जाते, नये-नये किले बनाये जाते, नित्य नई व्यूह-रचना होती, कभी-कभी खेलते-खेलते झौड़ हो जाती, तू-तू मैं-मैं तक की नौबत आ जाती; पर शीघ्र ही दोनों मित्रों में मेल हो जाता। कभी -कभी ऐसा भी होता, कि बाज़ी उठा दी जाती, मिरजा जी रूठकर अपने घर चले आते। मीर- साहब अपने घर में जा बैठते; पर रात-भर को निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्य शान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनों मित्र दीवानखाने में आ पहुँचते थे।

    एक दिन दोनों मित्र बैठे हुए शतरंज के दल-दल में ग़ोते खा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफ़सर मीरसाहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा! मीरसाहब के होश उड़ गये! यह क्या बला सिर पर आई! यह तलबी किस लिए हुई है! अब खैरियत नहीं नज़र आती ! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकरों से बोले-कह दो, घर में नहीं हैं। सवार––घर में नहीं, तो कहाँ है?

    नौकर––यह मैं नहीं जानता। क्या काम है?

    सवार––काम तुझे क्या बतलाऊँ? हुजूर में तलबी है––शायद फ़ौज के लिए कुछ सिपाही मांगे गये हैं। जागीरदार हैं कि दिल्लगी! मोरचे पर जाना पड़ेगा, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा!

    नौकर––अच्छा, तो जाइए, कह दिया जायगा।

    सवार––कहने की बात नहीं है। मैं कल खुद आऊँगा, साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

    सवार चला गया। मीरसाहब की आत्मा काँप उठी।

    मिरजाजी से बोले––कहिए जनाब अब क्या होगा?

    मिरजा––बड़ी मुसीबत है कहीं मेरी तलबी भी न हो।

    मीर––कम्बख्त कल फिर आने को कह गया है।

    मिरजा––आफत है और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो बे-मौत मरे।

    मीर––बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलो ही नहीं। कल से गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। वहाँ किसे खबर होगी। हज़रत आकर आप लौट जाँयगे।

    मिरजा––वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा और कोई तदबीर ही नहीं है।

    इधर मीरसाहब की बेगम उस सवार से कह रही थीं, तुमने खूब धता बताई। उसने जवाब दिया-ऐसे गावदियों को तो

    चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चर ली। अब भूलकर भी घर पर न रहेंगे।

    ( ३ )

    दूसरे दिन से दोनों मित्र मुँह-अँधेरे घर से निकल खड़े होते। बग़ल में एक छोटी-सी दरी दबाये, डिब्बे में गिलौरियाँ भरे, गोमती-पार की एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफ़उद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम और मदरिया ले लेते और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भरकर शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फ़िक्र न रहती थी। किश्त, शह आदि दो-एक शब्दों के सिवा उनके मुंह से और कोई वाक्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता होगा। दोपहर को जब भूख मालूम होती, तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना खा आते, और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम-क्षेत्र में डट जाते। कभी-कभी तो उन्हें भोजन का भी ख्याल न रहता था।

    इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फौजें लखनऊ की तरफ़ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हल-चल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे; पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी ज़रा भी फ़िक्र न थी। वे घर से आते, तो गलियों में होकर। डर था, कि कहीं किसी बादशाही मुलाज़िम की निगाह न पड़ जाय, जो

    बेगार में पकड़ जायें। हजारों रुपये सालाना की जागीर मुफ्त ही में हज़म करना चाहते थे।

    एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिरजा की बाज़ी कुछ कमजोर थी। मीरसाहब उन्हें किश्त-पर-किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिये। यह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार ज़माने के लिये आ रही थी।

    मीरसाहब बोले––अंगरेजी फ़ौज आ रही है; खुदा खैर करे।

    मिरजा––आने दीजिये, किश्त बचाइये। यह किश्त!

    मीर––ज़रा देखना चाहिए, यहीं आड़ में खड़े हो जायं।

    मिरजा––देख लीजियेगा, जल्दी क्या है, किश्त!

    मीर––तोपखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे-कैसे जवान हैं! लाल बन्दरों के-से मुँह। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

    मिरजा––जनाब, हीले न कीजिये। ये चकमे किसी और को दीजियेगा, यह किश्त!

    मीर––आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत आई हुई है, और आपको किश्त की सूझी है! कुछ इसकी भी खबर है, कि शहर घिर गया, तो घर कैसे चलेंगे?

    मिरजा––जब घर चलने का वक्त आएगा, तो देखी जायगी––यह किश्त! बस, अबकी शह में मात है।

    फौज़ निकल गई। दस बजे का समय था। फिर बाज़ी बिछ गई। मिरजा बोले––आज खाने की कैसे ठहरेगी?

    मीर––अजी, आज तो रोज़ा है। क्या आपको ज्यादा भूख मालूम होती है?

    मिरजा––जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।

    मीर––शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना-खा-कर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।

    दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे, तो तीन बज गये। अबकी मिरजाजी की बाज़ी कमज़ोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज़ का वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली पकड़ लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आजतक किमी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से, इस तरह खून बहे बिना, न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नीद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

    मिरजा ने कहा–– हुजूर नवाबसाहब को जालिमों ने क़ैद कर लिया है।

    मीर––होगा, यह लीजिये शह!

    मिरजा––जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत

    नहीं लगती। बेचारे नवाबसाहब इस वक्त़ खून के आँसू रो रहे होंगे।

    मीर––रोया ही चाहें। यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा–– यह किश्त!

    मिरजा––किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।

    मीर––हाँ सो तो है ही—–यह लो फिर किश्त! बस, अबकी किश्त में मात है, बच नहीं सकते।

    मिरजा––खुदा की कसम, आप बड़े बेदर्द हैं। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दु:ख नहीं होता। हाय, ग़रीब वाजिदअली शाह!

    मीर––पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब-साहब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात! लाना हाथ!

    बादशाह को लिये हुए सेना सामने से निकल गई! उनके जाते ही मिरजा ने फिर बाजी बिछा दी । हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा-आइये, नवाबसाहब के मातम में एक मरसिया कह डालें; लेकिन मिरजा की राज-भक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी। वह हार का बदला चुकाने के लिये अधीर हो रहे थे।

    ( ४ )

    शाम हो गई। खँडहर में चमगादड़ों ने चीखना शुरू किया। अबाबीलें आ आकर अपने-अपने घोसलों में चिमटीं। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे, मानों दो खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। मिरजा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाज़ी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़ निश्चय करके सँभाल कर खेलते थे; लेकिन एक-न-एक चाल ऐसी बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाजी खराब हो जाती थी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और भी उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के ग़ज़लें गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुम धन पा गये हों। मिरजाजी सुन-सुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे; पर ज्यों-ज्यों बाज़ी कमज़ोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकला जाता था! यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुंझलाने लगे—जनाब, आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि एक चाल चले, और फिर उसे बदल दिया। जो कुछ चलना हो, एक बार चल लीजिए। यह आप मुहरे पर हाथ क्यों रखे रहते हैं? मुहरे को छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरे छूइए ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं। जिसे एक चाल चलने में पाँच मिनट से ज्यादा लगे, उसकी मात समझी जाय। फिर आपने चाल बदली! चुपके से मुहरे वहीं रख दीजिए।

    मीर साहब का फ़रजी पिटता था। बोले—मैंने चाल चली ही कब थी? मिरजा––आप चाल चल चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए––उसी घर में!

    मीर––उस घर में क्यों रक्खूँ? मैंने हाथ से मुहरा छोड़ा ही कब था?

    मिरजा––मुहरा आप क़यामत तक न छोड़ें, तो क्या चाल ही न होगी? फ़रजी पिटते देखा, तो धाँधली करने लगे!

    मीर––धाँधली आप करते हैं। हार-जीत तक़दीर से होती है ; धाँधली करने से कोई नहीं जीतता?

    मिरजा––जो इस बाज़ी में आपको मात हो गई।

    मीर––मुझे क्यों मात होने लगी?

    मिरजा––तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रक्खा था।

    मीर––वहां क्यों रक्खूँ? नहीं रखता!

    मिरजा––क्यों न रखिएगा? आपको रखना होगा!

    तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था, न वह! अप्रासंगिक बातें होने लगी। मिरजा बोले-किसी ने खानदान में शतरंज खेली होती, तब तो इसके कायदे जानते। वे तो हमेशा घास छीला किये आप शतरंज क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज़ है। जागीर मिल जाने से ही कोई रईस नहीं हो जाता।

    मीर––क्या! घास आपके अब्बाजान छीलते होंगे। यहाँ तों पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आ रहे हैं। मिरजा––अजी, जाइए भी, गाज़िउद्दीन हैदर के यहाँ बावरची का काम करते-करते उम्र गुज़र गई, आज रईस बनने चले हैं। रईस बनना कुछ दिल्लगी नहीं है।

    मीर—क्यों अपने बुजर्गों के मुँह कालिख लगाते हो-वे ही बाबरची का काम करते होंगे। यहाँ तो हमेशा बादशाह के दस्तरख्वान पर खाना खाते चले आये हैं।

    मिरजा—अरे चल चरकटे, बहुत बढ़-बढ़कर बातें न कर।

    मीर—ज़बान संभालिये, वरना बुरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का आदी नहीं हूँ। यहाँ तो किसी ने आँखें दिखाई कि उसकी आँखें निकाला। है हौसला?

    मिरजा—आप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जाय, इधर या उधर!

    मीर—तो यहाँ तुमसे दबनेवाला कौन है?

    दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल ली। नवाबी ज़माना था; सभी तलवार, पेशक़म्ज, कटार वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे; पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अधःपतन हो गया था-बादशाह के लिए, बादशाहत के लिए क्यों मरें; पर व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनों ने पैतरें बदले, तलवार चमका, छपाछप की आवाज आई। दोनों जख्म खाकर गिरे, और दोनों ने वहां तड़प-तड़प कर जानें दे दी। अपने बादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक बूंद आँसू न निकला, उन्हीं दोनों प्राणियों ने शतरंज के वज़ीर की रक्षा में प्राण दे दिये। अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।

    चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। खंडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवार और धूल धूसरित मीनारें इन लाशों को देखती और सिर धुनती थीं।

    ____०____

    (२) कामना-तरु

    (१)

    राजा इंद्रनाथ का देहान्त हो जाने के बाद, कुँअर राजनाथ को शत्रुओं ने चारों ओर से ऐसा दबाया, कि उन्हें अपने प्राण लेकर एक पुराने सेवक की शरण जाना पड़ा, जो एक छोटे-से गाँव का जागीरदार था। कुँअर स्वभाव ही से शांति-प्रिय, रसिक, हँस-खेलकर समय काटनेवाले युवक थे। रण-क्षेत्र की अपेक्षा कवित्व के क्षेत्र में अपना चमत्कार दिखाना उन्हें अधिक प्रिय था। रसिकजनों के साथ, किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए, काव्य-चरचा करने में उन्हें जो आनन्द मिलता था, वह शिकार या राज-दरबार में नहीं। इस पर्वत-मालाओं से घिरे हुए गाँव में आकर, उन्हें जिस शांति और आनन्द का अनुभव हुआ, उसके बदले में वह ऐसे-ऐसे कई राज त्याग कर सकते थे। यह पर्वत-मालाओं की मनोहर छटा, यह नेत्र-रंजक हरियाली, यह जल-प्रवाह की मधुर वीणा, यह पक्षियों की मीठी बोलियाँ, यह मृग-शावकों की छलाँग, यह बछड़ों की कुलेलें, यह ग्राम-निवा

    सियों की बालोचित सरलता, यह रमणियों की संकोच-मय चपलता, ये सभी बातें उनके लिये नई थीं; पर इन सबों से बढ़कर जो वस्तु उनको आकर्षित करती थी, वह जागीरदार की युवती कन्या चन्दा थी।

    चन्दा घर का सारा काम-काज आप ही करती थी। उसको माता की गोद में खेलना नसीब ही न हुआ था। पिता की सेवा ही में रत रहती थी। उसका विवाह इसी साल होनेवाला था, कि इसी बीच मे कुँअरजी ने आकर उसके जीवन में नवीन भावनाओं और नवीन आशाओं को अंकुरित कर दिया। उसने अपने पति का जो चित्र मन में खींच रक्खा था, वहो मानों रूप धारण करके उमके सम्मुख आ गया। कुँअर की आदर्श रमणी भी चन्दा ही के रूप में अवतरित हो गई; लेकिन कुँअर समझते थे, मेरे ऐसे भाग्य कहाँ? चन्दा भी समझती थी, कहाँ यह और कहाँ मैं!

    (२)

    दोपहर का समय था और जेठ का महीना। खपरैल का घर भट्ठी की भाँति तपने लगा। ख़स की टट्टियों और तहखानों में रहनेवाले राजकुमार का चित्त गरमी से इतना बेचैन हुआ, कि वह बाहर निकल आये और सामने के बाग़ में जाकर एक घने वृक्ष के छाँह में बैठ गये। सहसा उन्होंने देखा-चन्दा नदी से जल की गागर लिये चली आ रही है। नीचे जलती हुई रेत थी, ऊपर जलता हुआ सूर्य। लू से देह झुलसी जाती थी। कदाचित् इस समय प्यास से तड़पते हुए आदमी की भी नदी तक जाने का

    हिम्मत न पड़ती थी। चन्दा क्यों जल लेने गई थी? घर में पानी भरा हुआ है। फिर इस समय वह क्यों पानी लेने निकली?

    कुँअर दौड़कर उसके पास जा पहुँचे और उसके हाथ से गागर छीन लेने की चेष्टा करते हुए बोले––मुझे दे दो और भागकर छाँह में चली जाओ। इस समय पानी का क्या काम था?

    चन्दा ने गागर न छोड़ी। सिर से खिसका हुआ अंचल सँभाल कर बोली––तुम इम समय कैसे आ गये? शायद मारे गरमी के अन्दर न रह सके!

    कुँअर––मुझे दे दो, नहीं मैं छीन लूँगा।

    चन्दा ने मुस्कुराकर कहा––राजकुमारों को गागर लेकर चलना शोभा नहीं देता।

    कुँअर ने गागर का मुँह पकड़कर कहा––इस अपराध का बहुत दण्ड सह चुका हूँ। चन्दा, अब तो अपने को राजकुमार कहने में भी लज्जा आती है।

    चन्दा––देखो धूप में खुद हैरान होते हो और मुझे भी हैरान करते हो। गागर छोड़ दो। सच कहती हूँ, पूजा का जल है।

    कुँअर––क्या मेरे ले जाने से, पूजा का जल अपवित्र हो जायगा?

    चन्दा––अच्छा भाई नहीं जानते, तो तुम्हीं ले चलो। हाँ नहीं तो!

    कुँअर गागर लेकर आगे-आगे चले। चन्दा पीछे हो ली। बग़ीचे में पहुँचे, तो चन्दा एक छोटे-से पौधे के पास रुक कर

    बोली––इसी देवता की पूजा करनी है, गागर रख दो। कुँअर ने आश्चर्य से पूछा––यहाँ कौन देवता है चन्दा? मुझे तो नहीं नज़र आता।

    चन्दा ने पौधे को सींचते हुए कहा––यही तो मेरा देवता है!

    पानी पाकर पौधे की मुरझाई हुई पत्तियाँ हरी हो गई, मानो उनकी आँखें खुल गई हों।

    कुँअर ने पूछा––यह पौधा क्या तुमने लगाया है चन्दा?

    चन्दा ने पौधे को एक सीधी लकड़ी से बाँधते हुए कहा––हाँ, उसी दिन तो, जब तुम यहाँ आए। यहाँ पहले मेरी गुड़ियों का घरौंदा था। मैंने गुड़ियों पर छाँह करने के लिए एक अमोल लगा दिया था। फिर मुझे इसकी याद नहीं रही। घर के काम धन्धे में भूल गई। जिस दिन तुम यहाँ आये, मुझे न-जाने क्यों इस पौधे की याद आ गई। मैंने आकर देखा, तो यह सूख गया था। मैंने तुरन्त पानी लाकर इसे सींचा, तो कुछ-कुछ ताज़ा होने लगा। तब से रोज़ इसे सींचती हूँ। देखो कितना हरा-भरा हो गया है!

    यह कहते-कहते उसने सिर उठाकर कुँअर की ओर ताकते हुए कहा––और सब काम भूल जाऊँ; पर इस पौधे को पानी देना नहीं भूलती। तुम्हीं इसके प्राण-दाता हो। यह तुम्हीं ने आकर इसे जिला दिया, नहीं तो बेचारा सूख गया होता। यह तुम्हारे शुभागमन का स्मृति-चिह्न है। ज़रा इसे देखो। मालूम होता है, हँस रहा है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, कि यह मुझसे बोलता है। सच कहती हूँ, कभी यह रोता है, कभी हँसता है, कभी रूठता है; आज तुम्हारा लाया हुआ पानी पाकर यह फूला नहीं समाता। एक-एक पत्ता तुम्हें धन्यवाद दे रहा है।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों वह पौधा कोई नन्हा-सा क्रीड़ाशील बालक है। जैसे चुम्बन से प्रसन्न होकर बालक गोद में चढ़ने के लिए दोनों हाथ फैला देता है, उसी भाँति यह पौधा भी हाथ फैलाए जान पड़ा। उसके एक-एक अणु में चन्दा का प्रेम झलक रहा था।

    चन्दा के घर में खेती के सभी औज़ार थे। कुँअर एक फावड़ा उठा लाए ओर पौधे का एक थाला बनाकर चारों ओर ऊँची मेंड़ उठा दी। फिर खुरपी लेकर अन्दर की मिट्टी को गोड़ दिया। पौधा और भी लहलहा उठा।

    चन्दा बोली––कुछ सुनते हो, क्या कह रहा है?

    कुँअर ने मुस्कुराकर कहा––हाँ! कहता है अम्माँ की गोद में बैठूँगा।

    चन्दा––नहीं, कह रहा है, इतना प्रेम करके फिर भूल न जाना।

    (३)

    मगर कुँअर को अभी राजपुत्र होने का दण्ड भोगना बाक़ी था। शत्रुओं को न-जाने कैसे उनकी टोह मिल गई इधर तो हित-चिन्तकों के आग्रह से विवश होकर बूढ़ा कुबेरसिंह चन्दा और कुँअर के विवाह की तैयारियाँ कर रहा था, उधर शत्रुओं का एक

    दल सिर पर आ पहुँचा। कुँअर ने उस पौधे के आस-पास फूल-पत्ते लगाकर एक फुलवाड़ी-सी बना दी थी। पौधे को सींचना अब उनका काम था। प्रातःकाल वह कन्धे पर काँवर रक्खे नदी से पानी ला रहे थे कि दस-बारह आदमियों ने उन्हें रास्ते में घेर लिया। कुबेर सिंह तलवार लेकर दौड़ा; लेकिन शत्रुओं ने उसे मार गिराया। अकेला, शस्त्र-हीन कुँअर क्या करता। कन्धे पर काँवर रक्खे हुए बोला––अब क्यों मेरे पीछे पड़े हो भाई? मैंने तो सब कुछ छोड़ दिया।

    सरदार बोला-हमें आपको पकड़ ले जाने का हुक्म है।

    "तुम्हारा स्वामी मुझे इस दशा में भी नहीं देख सकता? खैर, अगर धर्म समझो, तो कुबेरसिंह की तलवार मुझे दे दो। अपनी स्वाधीनता के लिए लड़कर प्राण दूँ।"

    इसका उत्तर यही मिला कि सिपाहियों ने कुँअर को पकड़कर मुश्कें कस दीं और उन्हें एक घोड़े पर बिठाकर घोड़े को भगा दिया काँवर वहीं पड़ी रह गई।

    उसी समय चन्दा घर में से निकली। देखा, काँवर पड़ी हुई है और कुँअर को लोग घोड़े पर बिठाए लिए जा रहे हैं। चोट खाए हुए पक्षी की भाँति वह कई कदम दौड़ी, फिर गिर पड़ी। उसकी आँखों में अँधेरा छा गया।

    सहसा उसकी दृष्टि पिता की लाश पर पड़ी। वह घबड़ाकर उठी और लाश के पास जा पहुँची। कुबेर अभी मरा न था। प्राण आँखों में अटके हुए थे। चन्दा को देखते ही क्षीण स्वर में बोला––बेटी…कुँअर!…इसके आगे वह कुछ न कह सका। प्राण निकल गए; पर इस एक शब्द––"कुँअर"––ने उसका आशय प्रगट कर दिया।

    (४)

    बीस वर्ष बीत गए! कुँअर कैद से न छूट सके।

    यह एक पहाड़ी क़िला था। जहाँ तक निगाह जाती, पहाड़ियाँ ही नजर आतीं। क़िले में उन्हें कोई कष्ट न था। नौकर-चाकर, भोजन-वस्त्र, सैर-शिकार, किसी बात की कमी न थी; पर उस वियोगाग्नि को कौन शान्ति करता, जो नित्य कुँवर के हृदय में जला करती थी। जीवन में अब उनके लिए कोई आशा न थी, कोई प्रकाश न था। अगर कोई इच्छा थी, तो यही कि एक बार उस प्रेम-तीर्थ की यात्रा कर लें, जहाँ उन्हें वह सब कुछ मिला जो मनुष्य को मिल सकता है। हाँ, उनके मन में एक-मात्र यही अभिलाषा थी कि उस पवित्र-स्मृतियों से रंजित भूमि के दर्शन करके जोवन का उसी नदी के तट पर अन्त कर दे। वही नदी का किनारा, वही वृक्षों का कुञ्ज, वही चन्दा का छोटा-सा सुन्दर घर, उसकी आँख में फिरा करता, और वह पोधा, जिसे उन दोनों ने मिलकर सींचा था, उसमें तो मानो उसके प्राण ही बसते थे। क्या वह दिन भी आएगा, जब वह उस पौधे को हरी-हरी पत्तियों से लदा हुआ देखेगा। कौन जाने वह अब है भी या सूख गया। कौन अब उसको सोचता होगा! चन्दा इतने दिनों अविवाहिता थोड़े ही बैठी होगी। ऐसा संभव भी तो नहीं। उसे अब मेरी सुधि भी न

    होगी। हाँ शायद कभी अपने घर की याद खींच लाती हो, तो पौधे को देखकर उसे मेरी याद आ जाती हो। मुझ-जैसे अभागे के लिए इससे अधिक वह और कर ही क्या सकती है। उस भूमि को एक बार देखने के लिए वह अपना जीवन दे सकता था; पर यह अभिलाषा पूरी न होती थी।

    आह! एक युग बीत गया, शोक और नैराश्य ने उठती जवानी को कुचल दिया। न आँखों में ज्योति रही, न पैरों में शक्ति। जीवन क्या था, एक दुःखदायी स्वप्न था। उस सघन अंधकार में उसे कुछ न सूझता था, बस जीवन का आधार एक अभिलाषा थी, एक सुखद स्वप्न जो जीवन में न-जाने कब उसने देखा था, एक बार फिर वही स्वप्न देखना चाहता था। फिर, उसकी अरिलाषाओं का अन्त हो जायगा, उसे कोई इच्छा न रहेगी। सारा अनन्त भविष्य, सारी अनन्त चिन्ताएँ, इसी एक स्वप्न में लीन हो जाती थीं।

    उसके रक्षकों को अब उसकी ओर से काई शंका न थी। उन्हें उस पर दया आती थी। रात को पहरे पर केवल कोई एक आदमी रह जाता था और लोग मीठी नींद सोते थे। कुँअर भाग जा सकता है, इसकी कोई संभावना, कोई शंका न थी। यहाँ तक कि एक दिन यह एक सिपाही भी निश्शंक होकर बन्दूक लिए लेट रहा। निद्रा किसी हिंसक पशु की भाँति ताक लगाए बैठी थी। लेटते ही टूट पड़ी। कुँअर ने सिपाही की नाक की आवाज़ सुनी। उनका हृदय बड़े वेग से उछलने लगा। यह अवसर आज कितने

    दिनों के बाद मिला था। वह उठे; मगर पाँव थरथर कांप रहे थे। बरामदे के नीचे उतरने का साहस न हो सका। कहीं इसकी नींद खुल गई तो? हिंसा उनकी सहायता कर सकती थी। सिपाही की बगल में उसकी तलवार पड़ी थी; पर प्रेम को हिंसा से बैर है। कुँअर ने सिपाही को जगा दिया। वह चौंककर उठ बैठा। रहा सहा संशय भी उसके दिल से निकल गया। दूसरी बार जो सोया तो खर्राटे लेने लगा।

    प्रातःकाल जब उसकी निद्रा टूटी, तो उसने लपककर कुँअर के कमरे में झाँका। कुँअर का पता न था।

    कुँअर इम समय हवा के घोड़ों पर सवार, कल्पना की द्रुतगति से, भागा जा रहा था- उसस्थान को, जहाँ उसने सुख-स्वप्न देखा था।

    किले में चारों ओर तलाश हुई, नायक ने सवार दौड़ाये; पर कहों पता न चला।

    ( ५ )

    पहाड़ी रास्तों का काटना कठिन, उस पर अज्ञातवास की कैद, मृत्यु के दूत पीछे लगे हुए, जिनसे बचना मुश्किल। कुँअर को कामना-तीर्थ में महीनो लग गये। जब यात्रा पूरी हुई, तो कुँअर में एक कामना के सिवा और कुछ शेष न था। दिन-भर की कठिन यात्रा के बाद जब वह उस स्थान पर पहुंचे, तो संध्या हो गई थी। वहाँ बस्ती का नाम भी न था। दो-चार टूटे-फूटे झोंपड़े उस बस्ती के चिह्न-स्वरूप शेष रह गये थे। वह झोंपड़ा, जिसमें कभी प्रेम का

    प्रकाश था, जिसके नीचे उन्होंने जीवन के सुखमय दिन काटे थे, जो उनकी कामनाओं का आगार और उनकी उपासना का मन्दिर था, अब उनकी अभिलाषाओं की भाँति भग्न हो गया था! झोंपड़े की भग्नावस्था मूक-भाषा में अपनी करुण-कथा सुना रही थी। कुँअर उसे देखते ही "चन्दा-चन्दा!" पुकारता हुआ दौड़ा। उसने उस रज को माथे पर मला, मानो किसी देवता की विभूति हो और उसकी टूटी हुई दीवारों से चिमटकर बड़ी देर तक रोता रहा। हाय रे अभिलाषा! यह रोने ही के लिये इतनी दूर से आया था? रोने ही की अभिलाषा इतने दिनों से उसे विकल कर रही थी; पर इस रोदन में कितना स्वर्गीय आनन्द था। क्या समस्त संसार का सुख इन आँसुओं की तुलना कर सकता था?

    तब वह झोंपड़े से निकला। सामने मैदान में एक वृक्ष हरे-हरे नवीन पल्लवों को गोद में लिये, मानो उसका स्वागत करने को खड़ा था। यह वही पौधा है, जिसे आज से बीस वर्ष पहले दोनों ने आरोपित किया था। कुँअर उन्मत्त की भाँति दौड़ा और जाकर उस वृक्ष से लिपट गया, मानो कोई पिता अपने मातृ-हीन पुत्र को छाती से लगाये हुए हो। यह उसी प्रेम की निशानी है, उसी अक्षय प्रेम की, जो इतने दिनों के बाद आज इतना विशाल हो गया है। कुँअर का हृदय ऐसा फूल उठा, मानों इस वृक्ष को अपने अन्दर रख लेगा, जिसमें उसे हवा का झोंका भी न लगे। उसके एक-एक पल्लव पर चन्दा की स्मृति बैठी हुई थी। पक्षियों का इतना रम्य संगीत क्या कभी उसने सुना था! उसके हाथों में

    दम न था, सारी देह भूख-प्यास और थकन से शिथिल हो रही थी। पर, वह उस वृक्ष पर चढ़ गया, इतनी फुर्ती से चढ़ा कि बन्दर भी न चढ़ता। सबसे ऊँची फुनगी पर बैठकर उसने चारों ओर गर्व-पूर्ण दृष्टि डाली। यही उसकी कामनाओं का स्वर्ग था। सारा दृश्य चंदामय हो रहा था। दूर की नीली पर्वत-श्रेणियों पर चन्दा बैठी गा रही थी, आकाश में तैरनेवाली लालिमा-मयी नौकाओं पर चन्दा ही उड़ी जाती थी। सूर्य की श्वेत-पीत प्रकाश की रेखाओं पर चन्दा ही बैठी हँस रही थी। कुँअर के मन में आया, पक्षी होता तो इन्हीं डालियों पर बैठा हुआ जीवन के दिन पूरे करता।

    जब अँधेरा हो गया, तो कुँअर नीचे उतरा और उसी वृक्ष के नीचे थोड़ी-सी भूमि झाड़कर, पतियों को शय्या बनाई और लेटा। यही उसके जीवन का स्वर्ण-स्वप्न था, आह यही वैराग्य! अब वह इस वृक्ष की शरण छोड़कर कहीं न जायगा। दिल्ली के तख्त के लिए भी वह इस आश्रम को न छोड़ेगा।

    ( ६ )

    उसी स्निग्ध अमल चाँदनी में सहसा एक पक्षी आकर उस वृक्ष पर बैठा और दर्द में डूबे हुए स्वरों में गाने लगा। ऐसा जान पड़ा, मानो वह वृक्ष सिर धुन रहा है। वह नीरव रात्रि उस वेदना-मय संगीत से हिल उठी, कुँअर का हृदय इस तरह ऐंठने लगा, मानो वह फट जायगा। उस स्वर में करुणा और वियोग के तीर-से भरे हुए थे। आह! पक्षी, तेरा जोड़ा भी अवश्य बिछुड़

    गया है, नहीं तेरे राग में इतनी व्यथा, इतना विषाद, इतना रुदन कहाँ से आता! कुँअर के हृदय के टुकड़े हुए जाते थे, एक-एक स्वर तीर की भाँति दिल को छेदे डालता था। वहाँ बैठे न रह सके। उठकर एक आत्म-विस्मृत की दशा में दौड़े हुए झोंपड़े में गये, वहाँ से फिर वृक्ष के नीचे आए। उस पक्षी को कैसे पाएँ। कहीं दिखाई नहीं देता।

    पक्षी का गाना बन्द हुआ, तो कुँअर को नींद आ गई। उन्हें स्वप्न में ऐसा जान पड़ा कि वही पक्षी उनके समीप आया। कुँअर ने ध्यान से देखा, तो वह पक्षी न था, चन्दा थी, प्रत्यक्ष चन्दा थी।

    कुँअर ने पूछा—चन्दा यह पक्षी यहाँ कहाँ?

    चन्दा ने कहा—मैं ही तो वह पक्षी हूँ।

    कुँअर—तुम पक्षी हो! क्या तुम्हीं गा रही थीं?

    चन्दा—हाँ प्रियतम, मैं ही गा रही थी। इसी तरह रोते एक युग बीत गया।

    कुँअर—तुम्हारा घोंसला कहाँ है?

    चन्दा—उसी झोंपड़े में, जहाँ तुम्हारी खाट थी। उसी खाट के बान से मैंने अपना घोंसला बनाया है।

    कुँअर—और तुम्हारा जोड़ा कहाँ है?

    चन्दा—मैं अकेली हूँ। चन्दा को अपने प्रियतम के स्मरण करने में, उसके लिए रोने में, जो सुख है वह जोड़े में नहीं, मैं इसी तरह अकेली रहूँगी और अकेली मरूँगी।

    कुँअर—मैं क्या पक्षी नहीं हो सकता? चन्दा चली गई। कुँअर की नींद खुल गई। ऊषा की लालिमा आकाश पर छाई हुई थी और वह चिड़िया, कुँअर की शय्या के समीप एक डाल पर बैठी चहक रही थी। अब उस संगीत में करुणा न थी, विलाप न था, उसमें आनन्द था, चापल्य था, सारस्य था। वह वियोग का करुण-क्रन्दन न हों, मिलन का मधुर संगीत था।

    कुँवर सोचने लगे—इस स्वप्न का क्या रहस्य है?

    ( ७ )

    कुँवर ने शय्या से उठते ही एक झाडू बनाया और उस झोंपड़े को साफ करने लगे। उनके जीते-जी इसकी यह भग्न-दशा नहीं रह सकती। वह इसकी दीवारें उठाएँगे, इस पर छप्पर डालेंगे, इसे लीपेंगे। इनमें उनका चन्द स्मृति वास करती है। झोंपड़े के एक कोने में वह काँवर रक्खी हुई थी, जिस पर पानी ला-लाकर वह इस बृक्ष को सींचते थे। उन्होंने काँवर उठा ली और पानी लाने लगे। दो दिन से कुछ भोजन न किया था। रात को भूख लगी हुई थी; पर इस समय भोजन की बिलकुल इच्छा न थी। देह में एक अद्भुत स्फूर्ति का अनुभव होता था। उन्होंने नदी से पानी ला-ला मिट्टी भिगोना शुरु किया। दौड़े जाते थे और दौड़े आते थे। इतनी शक्ति उनमें कभी न थी।

    एक ही दिन में इतनी दीवार उठ गई, जितनी चार मज़दूर भी न उठा सकते थे। और कितनी सीधी, चिकनी दीवार थी कि कारीगर भी देखकर लज्जित हो जाता। प्रेम की शक्ति अपार है। सन्ध्या हो गई। चिड़ियों ने बसेरा लिया। वृक्षों ने भी आँखें बन्द की; मगर कुँवर को आराम कहाँ। तारों के मलिन प्रकाश में मिट्टी के रद्दे रक्खे जाते थे। हाय रे कामना! क्या तू इस बेचारे के प्राण ही लेकर छोड़ेगी?

    वृक्ष पर पक्षी का मधुर स्वर सुनाई दिया। कुँवर के हाथ से घड़ा छूट पड़ा। हाथ और पैरों में मिट्टी लपेटे वह वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए। उस स्वर में कितना लालित्य था, कितना उल्लास, कितनी ज्योति! मानव-संगीत इसके सामने बेसुरा आलाप था। उसमें यह जागृति, यह अमृत, यह जीवक कहाँ? संगीत के आनन्द में विस्मृति है; पर वह विस्मृति कितनी स्मृति-मय होती है, अतीत को जीवन और प्रकाश से रञ्जित करके प्रत्यक्ष कर देने की शक्ति, संगीत के सिवा और कहां है? कुँवर के हृदय-नेत्रों के सामने वह दृश्य आ खड़ा हुआ, जब चन्दा इसी पौधे को नदी से जल ला-लाकर सींचती थी। हाय, क्या वे दिन फिर आ सकते हैं!

    सहसा एक बटोही आकर खड़ा हो गया ओर कुँअर को देखकर प्रश्न करने लगा, जो साधारणत: दो अपरिचित प्राणियों में हुआ करते हैं-कौन हो, कहाँ से आते हो कहाँ जाओगे? पहले वह भी इसी गाँव में रहता था; पर जब गाँव उजड़ गया, तो समीप के एक दूसरे गाँव में जा बसा था। अब भी उसके खेत यहाँ थे। रात को जङ्गली पशुओं से अपने खेतों की रक्षा करने के लिए वह यहीं आकर सोता था। कुँवर ने पूछा-तुम्हें मालूम है, इस गाँव में एक कुबेरसिंह ठाकुर रहते थे?

    किसान ने बड़ी उत्सुकता से कहा-हाँ-हाँ भाई, जानता क्यों नहीं! बेचारे यहीं तो मारे गये। तुमसे क्या उसकी जान-पहचान थी?

    कुँअर हाँ, उन दिनों कभी-कभी आया करता था। मैं भी राजा की सेना में नौकर था। उनके घर में और कोई न था?

    किसान-अरे भाई कुछ न पूछो, बड़ी करुण-कथा है। उसकी स्त्री तो पहले ही मर चुकी थी। केवल लड़की बच रही थी। आह! कैसी सुशीला, कैसी सुघड़ वह लड़की थी! उसे देखकर आँखों में ज्योति आ जाती थी। बिलकुल स्वर्ग की देवी जान पड़ती थी। जब कुबेरसिंह जोता था, तभी कुँअर इन्द्रनाथ यहाँ भाग कर आये थे और उसके यहाँ रहे थे। उस लड़की की कुँअर से कहीं बात-चीत हो गई। जब कुँवर को शत्रुओं ने पकड़ लिया, तो चन्दा घर में अकेली रह गई। गाँववालों ने बहुत चाहा, कि उसका विवाह हो जाय। उसके लिए वरों का तोड़ा न था भाई, ऐसा कौन था, जो उसे पाकर अपने को धन्य न मानता; पर वह किसी से विवाह करने पर राजी न हुई। यह पेड़ जो तुम देख रहे हो, तब छोटा-सा पौधा था। इसके आस-पास फूलों की कई ओर क्यारियाँ थीं। इन्हीं को गोड़ने, निराने, सींचने में उसका दिन कटता था। बस, यह कहती, कि हमारे कुँअर साहब आते होंगे।

    कुँअर की आँखों से आंसू की वर्षा होने लगी। मुसाफिर ने

    ज़रा दम लेकर कहा-दिन-दिन घुलती जाती थी। तुम्हें विश्वास न आयेगा भाई, उसने दस साल इसी तरह काट दिये। इतनी दुर्बल हो गई थी, कि पहचानी न जाती थी; पर अब भी उसे कुँअर साहब के आने की आशा बनी हुई थी। आखिर एक दिन इसी वृक्ष के नीचे उसकी लाश मिली। ऐसा प्रेम कौन करेगा भाई! कुँअर न जाने मरे कि जिए, कभी उन्हें इस विरहिणी की याद भी आती है, कि नहीं; पर उसने तो प्रेम को ऐसा निभाया जैसा चाहिए।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों हृदय फटा जा रहा है। वह कलेजा थामकर बैठ गए। मुसाफिर के हाथ में एक सुलगता हुआ उपला था। उसने चिलम भरी और दो-चार दम लगाकर बोला- उसके मरने के बाद यह घर गिर गया। गांव पहले ही उजाड़ था। अब तो और भी सुनसान हो गया। दो-चार असामी यहाँ आ बैठते थे। अब तो चिड़िए का पूत भी यहाँ नहीं आता। उसके मरने के कई महीने के बाद, यही चिडिया इस पेड़ पर बोलती हुई सुनाई दी। तब से बराबर इसे यहाँ बोलते सुनता हूँ। रात को सभी चिड़ियाँ सो जाती हैं; पर यह रात भर बोलती रहती है। उसका जोड़ा कभी नहीं दिखाई दिया। बस, बस, फुट्टैल है। दिन-भर उसी झोंपड़े में पड़ी रहती है। रात को इस पेड़ पर आ बैठती है; मगर इस समय इसके गाने में कुछ और ही बात है, नहीं तो सुनकर रोना आता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई कलेजे को मसोस रहा हो। मैं तो कभी-कभी पड़े-पड़े रो दिया करता हूँ। सब लोग कहते हैं कि यह वही चन्दा है। अब भी कुँअर के वियोग में विलाप कर रही है । मुझे भी ऐसा ही जान पड़ता है। आज न-जाने क्यों मगन है।

    किसान तम्बाकू पीकर सो गया। कुँअर कुछ देर तक खोया हुआ-सा खड़ा रहा। फिर धीरे से बोला-चन्दा, क्या सचमुच तुम्ही हो? मेरे पास क्यों नहीं आती?

    एक क्षण में चिड़िया आकर उसके हाथ पर बैठ गई। चन्द्रमा के प्रकाश में कुँअर ने चिड़िया को देखा। ऐसा जान पड़ा, मानो उनकी आँखें खुल गई हों, मानों आँखों के सामने से कोई आवरण हट गया हो। पक्षी के रूप में भी चन्दा की मुखाकृति अंकित थी।

    दूसरे दिन किसान सोकर उठा, तो कुँअर की लाश पड़ी हुई थी।

    ( ८ )

    कुँअर अब नहीं हैं; किन्तु इनके झोंपड़े की दीवारें बन गई हैं, ऊपर फूस का नया छप्पर पड़ गया है और झोंपड़े के द्वार पर फूलों की कई क्यारियाँ लगी हुई हैं। गाँव के किसान इससे अधिक और क्या कर सकते थे।

    उस झोंपड़े में अब पक्षियों के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया है। दोनों साथ-साथ दाने-चारे की खोज में जाते हैं, साथ-साथ आते हैं। रात को दोनों उसी वृक्ष की डाल पर बैठे दिखाई देते हैं। उनका सुरम्य संगीत, रात की नीरवता में दूर तक सुनाई

    देता है। बन के जीव-जन्तु वह स्वर्गीय गान सुनकर मुग्ध हो जाते हैं।

    यह पक्षियों का जोड़ा कुँअर और चन्दा का जोड़ा है, इसमें किसी को सन्देह नहीं है।

    एक बार एक व्याध ने इन पक्षियों को फँसाना चाहा; पर गाँववालों ने उसे मारकर भगा दिया।

    ______

    (३) रानी सारन्धा

    (१)

    अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चकियाँ। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है, जिसको जङ्गली वृक्षों ने घेर रक्खा है। टीले के पूर्व की ओर एक छोटा-सा गाँव है । यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुन्देला सरदार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियाँ व्यतीत हो गई, बुन्देलखण्ड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ, मुसलमान आये और गये, बुन्देला राजा उठे और गिरे, कोई गाँव, कोई इलाका, ऐसा न था, जो इस दुर्व्यवस्थाओं से पीड़ित न हो; मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहराई और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।

    अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था। वह जमाना ही ऐसा था, जब मनुष्य-मात्र को अपने बाहु-बल और पराक्रम ही का भरोसा था। एक ओर मुसलमान सेनाए पैर जमाये खड़ी रहती थीं, दूसरी ओर बलवान् राजा अपने निर्बल भाइयों का गला घोटने पर तत्पर रहते थे। अनिरुद्धसिंह के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा, मगर सजीव, दल था। इससे वह अपने कुल और मर्यादा की रक्षा किया करता था। उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था। तीन वर्ष पहले उसका विवाह शीलता- देवी से हुआ; मगर अनिरुद्ध बिहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में। वह कितनी बार पति से अनुरोध कर चुकी थी, कितनी बार उसके पैरों पर गिरकर रोई थी, कि तुम मेरी आँखों से दूर न हो, मुझे हरिद्वार ले चलो मुझे तुम्हार साथ वन-वास अच्छा है, यह वियोग अब नहीं सहा जाता। उसने प्यार से कहा, जिद से कहा, विनय की; मगर अनिरुद्ध बुन्देला था। शीतला अपने किसी हथियार से उसे परास्त न कर सकी।

    ( २ )

    अँधेरी रात थी। सारी दुनिया सोती थी; मगर तारे आकाश में भागते थे। शीतलादेवी पलङ्ग पर पड़ी करवटें बदल रही थी ओर उसकी ननद सारन्धा फर्श पर बैठी हुई मधुर स्वर से गाती थी-

    बिन रघुबीर कटत नहीं रैन।

    शीतला ने कहा-जी न जलाओ। क्या तुम्हें भी नींद नहीं आती?

    सारन्धा-तुम्हें लोरी सुना रही हूँ।

    शीतला-मेरी आँखों से तो नींद लोप हो गई। सारन्धा—किसी को ढूँढ़ने गई होगी।

    इमने में द्वार खुला और एक गठे हुए बदन के रूपवान् पुरुष ने भीतर प्रवेश किया। यह अनिरुद्ध था। उसके कपड़े भीगे हुए थे, और बदन पर कोई हथियार न था। शीतला चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठ गई।

    सारन्धा ने पूछा—भैया, यह कपड़े भीगे क्यों हैं?

    अनिरुद्ध—नदी पैरकर आया हूँ।

    सारन्धा—हथियार क्या हुए?

    अनिरुद्ध—छिन गये।

    सारन्धा—और साथ के आदमी?

    अनिरुद्ध—सबने वीर गति पाई।

    शीतला ने दबी ज़बान से कहा—"ईश्वर ने ही कुशल किया…" मगर सारन्धा के तीवरों पर बल पड़ गये और मुखमण्डल गर्व से सतेज हो गया। बोली "भैया, तुमने कुल की मर्यादा खो दी। ऐसा कभी न हुआ था।"

    सारन्धा भाई पर जान देती थी। उसके मुंह से वह धिक्कार सुनकर अनिरुद्ध लज्जा और खेद से विकल हो गया। वह वीराग्नि जिसे क्षण भर के लिये अनुराग ने दबा दिया था, फिर ज्वलन्त हो गई। वह उल्टे पांव लौटा और यह कहकर बाहर चला गया कि "सारन्धा, तुमने मुझे सदैव के लिये सचेत कर दिया। यह बात मुझे कभी न भुलेगी।"

    अँधेरी रात थी। आकाश मण्डल में तारों का प्रकाश बहुत

    धुंधला था। अनिरुद्ध किले से बाहर निकला। पलभर में नदी के उस पार जा पहुँचा, और फिर अन्धकार में लुप्त हो गया। शीतला उसके पीछे-पीछे किले की दीवारों तक आई; मगर जब अनिरुद्ध छलाँग मारकर बाहर कूद पड़ा, तो वह विरहिणी एक चट्टान पर बैठकर रोने लगी।

    इतने में सारन्धा भी वहीं आ पहुँची। शीतला ने नागिन की तरह बल खाकर कहा—मर्यादा इतनी प्यारी है?

    सारन्धा—हाँ।

    शीतला—अपना पति होता, तो हृदय में छिपा लेती।

    सारन्धा—न, छाती में छुरी चुभा देती।

    शीतला ने ऐंठकर कहा—डोली में छिपाती फिरोगी, मेरी बात गिरह में बाँध लो।

    सारन्धा—जिस दिन ऐसा होगा, मैं भी अपना वचन पूरा कर दिखाऊँगी।

    इस घटना के तीन महीने पीछे अनिरुद्ध महरौना को जीत करके लौटा और साल-भर पीछे सारन्धा का विवाह ओरछा के राजा चम्पतराय से हो गया। मगर उस दिन की बातें दोनों महिलाओं के हृदय-स्थल में काँटे की तरह खटकती रहीं।

    ( ३ )

    राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुँदेला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उसने मुग़ल बादशाहों को कर देना बन्द कर

    दिया और अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगा। मुसलमानों की सेनायें बार-बार उस पर हमले करती थीं; पर हार कर लौट जाती थीं।

    यही समय था, जब अनिरुद्ध ने सारन्धा का चम्पतराय से विवाह कर दिया। सारन्धा ने मुँहमाँगी मुराद पाई। उसकी यह अभिलाषा कि मेरा पतिदेला जाति का कुल-तिलक हो, पूरी हुई। यद्यपि राजा के रनिवास में पाँच रानियाँ थीं, मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम हो गया कि वह देवी जो हृदय में मेरी पूजा करती है, सारन्धा है।

    परन्तु कुछ ऐसी घटनायें हुई कि चम्पतराय को मुगल-बादशाह का आश्रित होना पड़ा। वह अपना राज्य अपने भाई पहाड़सिंह को सौंपकर आप देहली को चला गया। यह शाहजहाँ के शासनकाल का अन्तिम भाग था। शाहजादा दारा शिकोह राजकीय कार्यों को सँभालते थे। युवराज की आँखों में शील था और चित्त में उदारता। उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथायें सुनी थीं, इसलिए उसका बहुत आदर-सम्मान किया, और कालपी की बहुमूल्य जागीर उसके भेंट की, जिसकी आमदनी नौ लाख थी। यह पहला अवसर था कि चम्मराय की आये-दिन की लड़ाई-झगड़े से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग-विलास का प्राबल्य हुआ। रात-दिन आमोद-प्रमोद की चर्चा रहने लगी। राजा विलास में डूबे, रानियाँ जड़ाऊ गहनों पर रीझी। मगर सारन्धा इन दिनों बहुत उदास और संकुचित रहती। वह इन रहस्यों से दूर-दूर रहती, ये नृत्य और गान की सभायें से सूनी प्रतीत होती। एक दिन चम्पतराय ने सारन्धा से कहा—सारन, तुम उदास क्यों रहती हो? मैं तुम्हें कभी हँसते नहीं देखता। क्या मुझसे नाराज हो?

    सारन्धा की आँखों में जल भर आया। बोली-स्वामी जी! आप क्यों ऐसा विचार करते है? जहाँ आप प्रसन्न हैं, वहाँ मैं भी खुश हूँ।

    चम्पतराय—मैं जब से यहाँ आया हूँ मैंने तुम्हारे मुख-कमल पर कभी मनोहारिणी मुसकिराहट नहीं देखी। तुमने कभी अपने हाथों से मुझे बीड़ा नहीं खिलाया। कभी मेरी पाग नहीं सँवारी कभी मेरे शरीर पर शस्त्र नहीं सजाये। कहीं प्रेमलता मुराझाने तो नहीं लगी?

    सारन्धा—प्राणनाथ! आप मुझसे ऐसी बाते पूछते हैं, जिसका उत्तर मेरे पास नहीं है! यथार्थ में इन दिनों मेरा चित्त कुछ उदास रहता है। मैं बहुत चाहती हूँ कि खुश रहूँ; मगर एक बोझा-सा हृदय पर धरा रहता है।

    चम्पतराय स्वयं आनन्द में मग्न थे। इसलिये उनके विचार में सारन्धा को असन्तुष्ट रहने का कोई उचित कारण नहीं हो सकता था। वे भौंहें सिकोड़कर बोले—मुझे तुम्हें उदास रहने का कोई विशेष कारण नहीं मालूम होता। ओरछे में कौन सा सुख था,जो यहाँ नहीं है? सारन्धा का चेहरा लाल हो गया। बोली—मैं कुछ कहूँ, आप नाराज तो न होंगे?

    चम्पतराय—नहीं, शौक से कहो। सारन्धा—ओरछा में मैं एक राजा की रानी थी। यहाँ मैं एक जागीरदार की चेरी हूँ। ओरछा में मैं वह थी जो अवध में कौशल्या थीं; परन्तु यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से काँपता था । रानी से चेरी होकर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महंगे दामों में मोल ली हैं।

    चम्पतराय के नेत्रों से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारन्धा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे माँ-बाप का बालक माँ को चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह ओरछा की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गई। उन्होंने आदर-युक्त अनुराग के साथ सारन्धा को हृदय से लगा लिया।

    आज से उन्हें फिर उसी उजड़ी बस्ती की फिक्र हुई, जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषायें खींच लाई थीं।

    (४)

    माँ अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जोती है। चम्पतराय के आने से बुन्देलखण्ड निहाल हो गया। ओरछा के भाग जागे। नौबतें झड़ने लगी, और फिर सारन्धा के कमल-नेत्रों में जातीय अभिमान का आभास दिखाई देने लगा।

    यहाँ रहते कई महीने बीत गये। इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा। शाहज़ादाओं में पहले से ईर्षा की अग्नि दहक रही थी। यह ख़बर सुनते ही ज्वाला प्रचण्ड हुई। संग्राम की तैयारियाँ

    होने लगीं। शाहज़ादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने-अपने दल सजाकर दक्खिन से चले। वर्षा के दिन थे। उर्बरा भूमि रंग-बिरंग के रूप भरकर अपने सौन्दर्य को दिखाती थी।

    मुराद और मुहीउद्दीन उमंगों से भरे हुए कदम बढ़ाते चले आते थे। यहाँ तक कि वे धौलपुर के निकट चम्बल के तट पर आ पहुँचे; परन्तु यहाँ उन्होने बादशाही सेना को अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया।

  • कायाकल्प

    कायाकल्प

    Aproximadamente 248.859 palavras.

    यशोदानन्दन-जिसे तुम धर्म का द्रोही समझते हो, वह तुमसे कहीं सञ्चा हिन्दू है।

    एक अावाज-सच्चे हिन्दू वही तो होते हैं, जो मोके पर बगले झॉकने लगे और शहर छोडकर दो चार दिन के लिए खिसक जायें ।

    कई यादमी-~यह कौन मन्त्री पर आक्षेप कर रहा है.? कोई उसकी जमान पकड़ कर क्यों नहीं खींच लेता ?

    यशोदानन्दन-श्राप लोग सुन रहे हैं, मुझपर जैसे-कैसे टोप लगाये जा रहे हैं । मैं सच्चा हिन्दू नही हूँ, मैं मौका पड़ने पर बगले झाँकता हूँ और जान बचाने के लिए शहर से भाग जाता हूँ। ऐसा अादमी अापका मन्त्री बनने के योग्य नहीं है | आप उस श्रादमी को अपना मन्त्री बनायें, जिसे आप सच्चा हिन्दू समझते हों। मैं धर्म से पहले अपने यात्म गौरव की रक्षा करना चाहता हूँ।

    कई प्रादमी-महाशय, श्रापको ऐसे मुँहफट आदमियों की बात का खयाल न करना चाहिए।

    यशोदा०—यह मेरी पचीस बरसों की सेवा का उपहार है । जिस सेवा का फल अपमान हो, उसे दूर हो से मेरा सलाम है ।

    यह कहते हुए मुशी यशोदानन्दन घर की तरफ चले । कई आदमियों ने उन्हें रोकना चाहा, कई श्रादमी उनके पैरो पडने लगे, लेकिन उन्होंने एक न मानी। वह तेजस्वी आदमी थे। अपनी सस्था पर स्वेच्छाचारी राजाओं की भॉति शासन करना चाहते थे ।अालोचनायों को सहन करने की उनमे सामर्थ्य ही न थी।

    उनके जाते ही यहाँ आपस में 'तू तू, मैं-मैं होने लगी। एक दूसरे पर आक्षेप करने लगा। गालियों की नौवत आयी, यहाँ तक कि दो चार श्रादमियों से हाथा-पाई मी हो गयी। चक्रधर ने जब देखा कि इधर से अब कोई शंका नहीं है, तो वह लपककर मुसल मानों के सामने आ पहुंचे और उच्च स्वर से बोले-हजरात, मै कुछ अर्ज करने की इजाजत चाहता हूँ।

    एक आदमी-सुनो, सुनो, यही तो अभी हिन्दुओं के सामने खडा था।

    दूसरा अादमी-दुश्मनों के कदम उखड़ गये । सब भागे जा रहे हैं ।

    तीसरा आदमी-इसी ने शायद उन्हें समझा-बुझाकर हटा दिया है । देखो,-क्या कहता है ?

    चक्रधर-अगर इस गाय की कुरबानी करना श्राप अपना मजहबी फर्ज समझते हों, तो शोक से कीजिए । मैं श्रापके मजहबी मामले में दखल नहीं दे रहा हूँ। लेकिन क्या यह लाजमी है कि इसो जगह कुरबानी की जाय ।

    एक आदमी-हमारी खुशी है; जहाँ चाहेगे, कुरबानी करेंगे, तुमसे मतलब ?

    चक्रधर-वेशक, मुझे बोलने का कोई हक नहीं है, लेकिन इस नाम की जो इजत मेरे दिल में है, वह मुझे बोलने के लिए मजबूर कर रही है। इसलाम ने कमी दूसरे मजहबवाला को दिलजारी नहीं की। उसने हमेशा दूसरो के जजबात का एहत-राम किया है। वगद द और रूम, स्पेन और मित्र की तारीखें उस मजहबी अाजादी को शाहिद हैं, जो इसलाम ने उन्हें अता को थीं। अगर आप हिन्दू जजगत का लिहाज करके किसी दूसरी जगह कुरबानी करें, तो यकीनन इसलाम के वकार मे फर्क न पायेगा!

    एक मौलवी ने जोर देकर कहा-रेमी मीठा-मीठी बातें हमने बहुत सुनी हैं । कुरबानो यहीं होगी। जब दूसरे हमारे कार जन करते हैं, तो हम उनके जजबात का क्यो लिहाज करें?

    ख्वाजा महसूद बड़े गौर से चक्रधर की बाते सुन रहे थे। मोलवी साहब की उद्दण्डता पर चिढ़कर बोले- क्या शरीयत का हुक्म है कि कुरबानी यही हो ? किसी दूसरी जगह नहीं की जा सकती ?

    मौलवी साहब ने ख्वाना महमूद को तरफ अविश्वास की दृष्टि से देखकर कहा-मजहब के मामले में उलमा के सिवा पार किसी को दखल देने का मजाज नही है।

    ख्याजाचुरा न मानिएगा, मोलवी साहब ! अगर दस सिपाही याकर यहाँ खड़े हो जॉय, तो चग ले झॉकने लगिएगा!

    मौलवी-किसीकी मजाल है कि हमारे दीनी उभूर में मजाहमत करे।

    खाजा-आपको तो अपने हलवे मांडे से काम है, जिम्मेदारो तो हमारे ऊपर आयेगो, दुकाने तो हमारी लुटेगी, श्रापके पास फटे बोरिये और फूटे बधने के सिवा ओर क्या रखा है। जब वे लोग मसलहत देखकर किनारा कर गये, ता हमे भी अपनी जिद से बाज अा जाना चाहिए। क्या आप समझते है, वे लोग यारले डर- कर भागे? हमारे दुगुने अादमी थे । अगर चढ़ पाते, तो संभलना मुश्किल हो जाता। मौलवी-जनाव, जिहाद करना कोई खालाजी का घर नहीं । श्राप दुनिया के वन्दे हैं, दीन हकीकत क्या समझे ?

    ख्वाग-बना है, आपकी शहादत तो कही नहीं गयी है । जिल्लत तो हमारी है ।। मौलवी-भाइयो, आप लोग ख्वाजा साहब की ज्यादती देख रहे हैं । श्राप ही फैसला कीजिए कि दीन मामलात मे उलमा का फैसला वाजिब है, या उमरा का एक मोटेताजे दटियल श्रादमी ने कहा- आप विस्मिल्लाह कीजिए । उमरा को.दीन से कोई सरोकार नहीं।

    यह सुनते ही एक श्रादमी बड़ा सा छुरा लेकर निकल पड़ा और कई यादमी गाय की सींगें पकड़ने लगे। गाय अब तक तो चुपचाप खड़ी थी। छुरा देखते ही वह छटपटाने लगी। चक्रघर यह दृश्य देखकर तिलमिला उठे। निराशा और क्रोध से काँपते हुए बोले भाइयो, एक गरीब, वेकस जानवर को मारना बहादुरी नहीं। खुदा वेकसों के खून से नहीं खुश होता। अगर नवॉमर्दी दिखानी है तो क्सिी शेर का शिक्षार करो, किसी चीते को मारो, किसी जगली सुअर का पीछा करो। उसकी कुरबानी से, मुमकिन है, खुदा खुश हो । जब तक हिन्दू सामने खड़े थे, किसी को हिम्मत न पड़ी कि छुरा हाथ में लेता। नव वे चले गये, तो आप लोग शेर हो गये ?

    एक आदमी-तो क्यों चले गये ? मैदान में खड़े क्यो न रहे ? गौ-रक्षा का जोश दिखाते । दुम दबाकर भाग क्यों खड़े हुए ?

    चक्रधर-भाग नही खड़े हुए और न लड़ने मे वे आपसे कम ही है। उनकी समझ में यह बात आ गयी कि जानवर की हिमायत में इन्सान का खून बहाना इन्सान को मुनासिब नहीं।

    मौलवी-शुक्र है, उन्हें इतनी समझ तो अायी !

    चक्रधर-लेकिन आप तो अभी तक उनकी दिलनारी पर कमर बाँधे हुए है। खैर, श्रापको अख्तियार है, जो चाहें, करें। मगर मै यकीन के साथ कहता हूँ कि यह दिलजारी एक दिन रग लायेगी। यह न समझिए कि इस वक्त कोई हिन्दू मैदान में नहीं है । हर एक कुरबानी हिन्दुस्तान के २१ करोड़ हिन्दुओं के दिलों मे जख्म कर देती है, और इतनी बड़ी तादाद के दिलों को दुखाना बड़ी से बड़ी कौम के लिए भी एक दिन पछतावे का वाइस हो सक्ता है। अगर आपकी गिना है, तो शोक से खाइए । लाखों गौएँ रोज करल होती है, हिन्दू सिर नहीं उठाते । फिर यह क्योंकर मुमकिन है कि वह आपके मजहबी मामले में दखल दें ? हिन्दुओ से ज्यादा वेतअस्सुव कौम दुनिया में नहीं है, लेकिन जव श्राप उनकी दिलजारी और महन दिलजारी के लिए कुरबानी करते हैं, तो उनको जरूर सदमा होता है । और उनके दिलों में जो शोला उठता है, उसका श्राप कयास नहीं कर सकते। अगर श्रापको यकीन न आये,तो देख लीनिये कि इस गाय के साथ ही एक हिन्दू कितनी खुशी से अपनी जान दे देता है! यह कहते हुए चक्रधर ने तेजी से लपककर गाय की गरदन पकड़ ली और बोले-आज आपको इस गौ के साथ एक इन्सान की भी कुरबानी करनी पड़ेगी।

    सभी आदमी चकित हो-होकर चक्रधर की ओर ताकने लगे। मौलवी साहब ने क्रोध से उन्मत्त होकर कहा-कलाम-पाक की कसम, हट जाओ, वरना गजब हो जायगा।

    चक्रधर-हो जाने दीजिए। खुदा की यही मरजी है कि आज गाय के साथ मेरी भी कुरबानी हो।

    ख्वाजा महमूद-क्यो भई, तुम्हारा घर कहाँ है?

    चक्रधर-परदेशी मुसाफिर हूँ।

    ख्वाजा-कसम, खुदा की, तुम जैसा दिलेर आदमी नहीं देखा। नाम के लिए तो गाय को माता कहनेवाले बहुत हैं; पर ऐसे बिरले ही देखे, जो गौ के पीछे जान लड़ा दें। तुम कलमा क्यों नही पढ़ लेते?

    चक्रधर-मै एक खुदा का कायल हूँ। वही सारे जहान का खालिक और मालिक है। फिर और किस पर ईमान लाऊँ?

    ख्वाजा-वल्लाह, तब तो तुम सच्चे मुसलमानो हो। हमारे हजरत को अल्लाह ताला का रसूल मानते हो?

    चक्रघर-बेशक मानता हूँ, उनकी इज्जत करता हूँ और उनकी तौहीद का कायल

    ख़्वाजा-हमारे साथ खाने-पीने से परहेज तो नही करते?

    चक्रधर-जरूर करता हूँ, उसी तरह, जैसे किसी ब्राह्मण के साथ खाने से परहेज करता हूँ, अगर वह पाक-साफ न हो।

    ख्वाजा-काश, तुम-जैसे समझदार तुम्हारे और भाई भी होते। मगर यहाँ तो लोग हमे मलिच्छ कहते हैं। यहाँ तक कि हमे कुत्तों से भी नजिस समझते हैं। उनकी थालियों में कुत्ते खाते हैं। पर मुसलमान उनके गिलास में पानी नहीं पी सकता। वल्लाह, आपसे मिलकर दिल खुश हो गया। अब कुछ कुछ उम्मीद हो रही है कि शायद दोनों कौमो में इत्तफाक हो जाय। अब आप जाइए। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि कुरवानी न होगी।

    चक्रधर-और साहबों से तो पूछिए।

    कई आवाजें-होती तो जरूर, लेकिन अब न होगी। आप वाकई दिलेर आदमी हैं।

    ख्वाजा-यहाँ आप कहाँ ठहरे हुए हैं? मै आपसे मिलूँगा।

    चक्रधर-बाप क्यों तकलीफ उठायेंगे, मैं खुद हाजिर हूँगा।

    ख्वाजा महमूद ने चक्रधर को गले लगाकर रुखसत किया। इधर उसी वक्त गाय

    की पगहिया खोल दी गयी। वह जान लेकर भागी। और लोग भी इस 'नौजवान' की 'हिम्मत' और 'जवाँमर्दी' को नारीफ करते हुए चले।

    चक्रधर को आते देखकर यशोदानन्दन अपने कमरे से निकल पाये यार उन्हें छाती से लगाते हुए बोले-भैया, आज तुम्हारा धैर्य और साहस देसकर मैं दंग रह गया। तुम्हें देखकर मुझे अपने ऊपर लज्जा या रही है। तुमने आज हमारी लाज रख ली। अगर यहाँ कुरबानी हो जाती, तो हम मुँह दिखाने लायक भी न रहते।

    एक बूदा–आज तुमने वह काम कर दिखाया, जो सैकड़ो आदमियों के रक्त पात से भी न होता।

    चक्रधर-मैंने कुछ भी नहीं किया। यह उन लोगा की शराफत थी कि उन्होंने मेरी अनुनय-विनय सुन ली।

    यशोदा०–अरे भाई, रोने का भी तो दृग होता है। अनुनय विनय हमने भी सैकड़ा ही बार की, लेकिन हर दफे गुत्थी और उलझतो हो गयी। आइए, आपके घाव को मरहम-पट्टी तो हो जाय!

    चक्रधर को कमरे में बिठाकर यशोदानन्दन ने घर में जाकर अपनी स्त्री वागीश्वरी से कहा – आज मेरे एक दोस्त की दावत करनी होगी। भोजन खूब दिल लगाकर बनाना। अहल्या, आज तुम्हारी पाक परीक्षा होगी।

    अहल्या-वह कौन आदमी था दादा, जिसने मुसलमानो के हाथों से गौ की रक्षा को?

    यशोदा०–वही तो मेरे दोस्त हैं, जिनकी दावत करने को कह रहा हूँ। बेचारे रास्ते में मिल गये। यहाँ सैर करने आये है। मसूरी जायेंगे।

    अहल्या-वागीश्वरी से) अम्माँ, जरा उन्हें अन्दर बुला लेना, तो दर्शन करेंगे। दादा, मैं कोठे पर बैठी सब तमाशा देख रही थी। जब हिन्दुओं ने उनपर पत्थर फेकना शुरू किया, तो ऐसा क्रोध आता था कि वहीं से फटकारूँ। बेचारे के सिर से खून निकलने लगा, लेकिन वह जरा भी न बोले। जब वह मुसलमानों के सामने आकर खड़े हुए, तो मेरा कलेजा धड़कने लगा कि कहीं सब के सब उनपर टूट न पड़े। बड़े ही साहसी आदमी मालूम होते हैं? सिर में चोट आयी है क्या?

    यशोदा०-हाँ, खून जम गया है, लेकिन उन्हें उसकी कुछ परवा ही नहीं। डॉक्टर को बुला रहा हूँ।

    वागीश्वरी-खा पी चुकें, तो जरा देर के लिए यहीं भेज देना। मेरे लडकों की जोड़ी तो हैं?

    यशोदा०-अच्छी बात है। जरा सफाई कर लेना।

    पड़ोस में एक डॉक्टर रहते थे। यशोनन्दन ने उन्हें बुलाकर घाव पर पट्टी वधवा दी। फिर देर तक बातें होती रहीं। धीरे-धीरे सारा मुहल्ला जमा हो गया। कई श्रद्धालु-जनों ने तो चक्रधर के चरण छुए। आखिर भोजन का समय पाया।

    जब लोग खाने बैठे, तो यशोदानन्दन ने कहा- भाई, बाबूजी से जो कुछ कहना हो, कह लो; फिर मुझसे शिकायत न करना कि तुम उन्हें नहीं लाये। बाबूजी, इस घर की तथा मुहल्ले की कई स्त्रियों की इच्छा है कि आपके दर्शन करें। आपको कोई आपत्ति तो नहीं है?

    वागीश्वरी-हाँ बेटा, जरा देर के लिए चले आना; नहीं तो अपने घर जाके कहोगे न कि मैंने जिन लोगों के लिए जान लड़ा दी, उन्होंने बात भी न पूछी।

    चक्रधर ने शरमाते हुए कहा-आप लोगों ने मेरी जो खातिर की है, वह कभी नहीं भूल सकता। उसके लिए मैं सदैव आपका एहसान मानता रहूंगा।

    ज्योही लोग चौके से उठे, अहल्या ने कमरे की सफाई करनी शुरू की। दीवार की तस्वीरे साफ की, फर्श फिर से झाड़कर विछाया, एक छोटी सी मेज पर फूलो का गिलास रख दिया, एक कोने में अगरबत्ती जलाकर रख दी। पान बनाकर तश्तरी में रखे। इन कामों से फुरसत पाकर उसने एकान्त मे बैट कर फूलों को एक माला गॅयनी शुरू की। मन में सोचती थी कि न जाने कौन हैं, स्वभाव कितना सरल है। लजाने मे तो औरतो से भी बढे हुए हैं। खाना खा चुके, पर सिर न उठाया। देखने मे ब्राह्मण मालूम होते हैं। चेहरा देखकर तो कोई नहीं कह सकता कि यह इतने साहसी होंगे।

    सहसा वागीश्वरी ने आकर कहा- बेटी, दोनों आदमी आ रहे हैं। साड़ी तो बदल लो।

    अहल्या 'ऊँह' करके रह गयी। हॉ, उसकी छाती में धड़कन होने लगी। एक क्षण में यशोदानन्दनजी चक्रधर को लिये हुए कमरे में आये। वागीश्वरी और अहल्या दोनो खड़ी हो गयीं। यशोदानन्दन ने चक्रधर को कालीन पर बैठा दिया और खुद बाहर चले गये। वागीश्वरी पखा झलने लगी; लेकिन अहल्या मूर्ति को भॉति खड़ी रही।

    चक्रधर ने उढ़ती हुई निगाहा से अहल्या को देखा। ऐसा मालूम हुआ, माना कोमल, लिग्ध एवं सुगन्धमय प्रकाश की लहर सी आँखों मे समा गयी।

    वागीश्वरी ने मिठाई की तश्तरी सामने रखते हुए कहा-कुछ जलपान कर लो भैया, तुमने कुछ खाना भी तो नहीं खाया। तुम जैसे वीरो को सवा सेर से कम न खाना चाहिए। धन्य है वह माता, जिसने ऐसे बालक को जन्म दिया! अहल्या, जरा गिलास में पानी तो ला। भैा, जब तुम मुसलमानों के सामने अकेले खड़े थे तो यह ईश्वर से तुम्हारी कुशल मना रही थी। जाने कितनी मनौतियाँ कर डालीं। कहाँ है वह माला, जो तूने गयी थी? अब पहनाती क्या नहीं?

    अहल्या ने लजाते हुए कॉपते हाथों से बोला चक्रधर के गले में माला डाल दी, और आहिस्ता से बोली- क्या सिर ज्यादा चोट ती?

    चक्रधर–नहीं तो; बाबूजी ने ख्वाहमख्वाह पट्टी बॅधवा दी। । वागीश्वरी–जब तुम्हें चोट लगी है, तब इसे इतना क्रोध याया था कि उस यादमी को पा जाती, तो मुँह नोच लेती। क्या काम करते हो, बेटा?

    चक्रधर–अभी तो कुछ नहीं करता, पड़े-पड़े खाया करता हूँ, मगर जल्द ही कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। धन से तो मुझे बहुत प्रेम नहीं है और मिल भी जाय, तो मुझे उसको भोगने के लिए दूसरों की मदद लेना पड़े। हॉ, इतना अवश्य चाहता हूँ कि किसी का आश्रित होकर न रहना पड़े।

    वागीश्वरी–कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलती क्या?

    चक्रधर-नौकरी करने को तो मेरी इच्छा ही नहीं है। मैने पक्का निश्चय कर लिया है कि नौकरी न करूँगा। न मुझे खाने का शौक है, न पहनने का, न ठाट बाट का, मेरा निर्वाह बहुत थोड़े मे हो सकता है।

    वागीश्वरी–और जब विवाह हो जायगा, तब क्या करोगे।

    चक्रधर—उस उक्त सिर पर जो आयेगी, देखी जायगी। अभी से क्यों उसको चिन्ता करूँ?

    वागीश्वरी-जल-पान तो कर लो, या मिठाई भी नहीं खाते?

    चक्रधर मिठाइयाँ खाने लगे। इतने में महरी ने पाकर कहा- बड़ी बहूजी, मेरे लाला को रात से खाँसी आ रही है, तिल-भर भी नही रुकनी, कोई दवाई दे दो।

    वागीश्वरी दवा देने चली गयी। अहल्या अकेली रह गयी तो चक्र वर ने उसकी ओर देखकर कहा-आपको मेरे कारण बड़ा कष्ट हुआ। मै तो इस उपहार के योग्य न था।

    अहल्या-वह उपहार नहीं, भक्त की भेंट है।

    चक्रधर–मेरा परम सौभाग्य है कि बैठे बैठाये इस पद को पहुँच गया।

    अहल्या–आपने आज इस शहर के हिन्दू मात्र की लाज रख ली। क्या और पानी हूँ?

    चक्रधर-तृप्त हो गया। आज मालूम हुआ कि जल में कितना स्वाद है। शायद अमृत मे भी यह स्वाद न होगा।

    वागीश्वरी ने आकर मुस्कराते हुए कहा–भैया, तुमने तो आधी भी मिठाइयाँ नहीं खायीं। क्या उसे देखकर भूख-प्यास बन्द हो गयी? यह मोहनी है, जरा इससे सचेत रहना।

    अहल्या–अम्मॉ, तुम छोटे बड़े किसी का लिहाज नहीं करतीं!

    वागीश्वरी-अच्छा, बताओ, तुमने इनकी रक्षा के लिए कौन कौन सी मनौतियाँ की थी?

    अहल्या-मुझे आप दिक करेंगी, तो चली जाऊँगी।

    चक्रघर यहाँ कोई घण्टे भर तक बैठे रहे। वागीश्वरी ने उनके घर का सारा वृत्तात पूछा-कै भाई हैं, कै बहिन हैं, पितानी क्या करते हैं, बहनो का विवाह हुआ है या

    नहीं? चक्रधर को उसके व्यवहार में इतना मातृ-स्नेह भरा मालूम होता था, मानों उससे उनका पुराना परिचय है! चार बजते-बजते ख्वाजा महमूद के आने की खबर पाकर चक्रधर बाहर चले आये। और भी कितने ही आदमी मिलने आये थे। शाम तक उन लोगों से बातें होती रहीं। निश्चय हुआ कि एक पचायत बनायी जाय और आपस के झगड़े उसी के द्वारा तब हुआ करें। चक्रधर को भी लोगों ने उस पंचायत का एक मेम्बर बनाया। रात को जब अहल्या और वागीश्वरी छत पर लेटी, तो वागीश्वरी ने पूछा–अहल्या, सो गयी क्या?

    अहल्या-नहीं अम्मा, जाग तो रही हूँ।

    वागीश्वरी~हाँ, आज तुझे क्यों नींद आयेगी। इनसे व्याह करेगी?

    अहल्या–अम्मा, मुझे गालियाँ दोगी, तो मैं नीचे जाकर लेटुंगी, चाहे मच्छर भले ही नोच खाये।

    वागीश्वरी- अरे, तो मै कौन-सी गाली दे रही हूँ। क्या व्याह न करेगी? ऐसा अच्छा वर तुझे और कहाँ मिलेगा?

    अहल्या–तुम न मानोगी, लो, मैं जाती हूँ।

    वागीश्वरी-मै दिल्लगी नहीं कर रही हूँ, सचमुच पूछती हूँ। तुम्हारी इच्छा हो, तो बातचीत की जाय। अपनी ही बिरादरी के हैं। कौन जाने, राजी हो जायें।

    अहल्या -सब बातें जानकर भी?

    वागीश्वरी-तुम्हारे बाबूजी ने सारी कथा पहले ही सुना दी है।

    अहल्या–तो कही माने न?

    वागीश्वरी–टालो मत, दिल की बात साफ-साफ कह दो।

    अहल्या–तुम मेरे दिल का हाल मुझसे अधिक जानती हो, फिर मुझसे क्यों पूछती हो? वागीश्वरी वह धनी नहीं, याद रखो।

    अहल्या–मै धन की लोडी कभी नहीं रही।

    वागीश्वरी–तो अब तुम्हें सशय में क्यो रखूँ। तुम्हारे बाबूजी तुमसे मिलाने है के लिए इन्हें काशी से लाये हैं। इनके पेस और कुछ हो या न हो, हृदय अवश् है। और ऐसा हृदय, जो बहुत कम लोगो के हिस्सों में आता है। ऐसा स्वामी पाक तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।

    अहल्या ने डबडबायी हुई आँखों से वागीश्वरी को देखा, पर मुंह से कुछ न बोली कृतज्ञता शब्दों में आकर शिष्टाचार का रूप धारण कर लेती है। उसका मौलिक रूप वही है, जो आँखों से बाहर निकलते हुए कॉपता और लजाता है।

    ६

    मुशी वज्रधर उन रेल के मुसाफिरों में थे, जो पहले तो गाड़ी मे खड़े होने व जगह मांगते हैं, फिर बैठने की फिक्र करने लगते हैं और अन्त में सोने की तैयारी क

    देते हैं। चक्रधर एक बड़ी रियासत के दीवान की लड़की को पढायें और वह इस स्वर्ण सयोग से लाभ न उठायें। यह क्योकर हो सकता था। दीवान साहब को सलाम करने आने जाने लगे। बातें करने में तो निगुण थे ही, दो ही चार मुलाकाता में उनका सिफा जम गया। इस परिचय ने शीघ्र ही मित्रता का रूप धारण किया। एक दिन दीवान साहब के साथ वह रानी जगदीशपुर के दरबार में जा पहुँचे और ऐसी लच्छेदार बातें की, अपनी तहसीलदारी की ऐसी जीट उड़ायी कि रानीजी मुग्ध हो गयी। कोई क्या तहसीलदारी करेगा। जिस इलाके मे मै था, वहाँ के यादमी अाज तक मुझे याद करते हैं । डींग नहीं मारता, डींग मारने की मेरी ग्राटत नहो, लेकिन जिम इलाके मे मुश्किल से ५० हजार वसल होता था, उसा इलाके से साल के अन्दर मैने दो लाख वमूल करके दिखा दिया और लुत्फ यह कि किसी को हिरासत में रसने या कुरकी करने की जरूरत नही पड़ी।

    ऐसे कार्य कुशल यादमी की सभी जगह जरूरत रहती है। रानी ने सोचा- इस अादमी को रख लें, तो इलाके की ग्रामदनी बढ जाय । ठार साहब से सलाह की । यहाँ तो पहले ही से सारी बातें सघी बधी थी । ठाकुर साहब ने रग और भी चोखा कर दिया। उनके दोस्तों मे यही ऐसे थे, जिसपर लौगी की असीम कृपा दृष्टि थी। दूसरी ही सलामी में मुशीजी को २५) मासिक की तहसीलदारी मिल गयी। मुँह माँगी मुराद पूरी हुई । सवारी के लिए घोड़ा भी मिल गया। सोने का सुहागा हो गया ।

    अब मुशीजी की पाँचों अगुली घी में थी। जहाँ महीने में एक बार भी महफिल न जमने पाती थी, वहाँ अब तीसों दिन जमघट होने लगा। इतने बडे अहलकार के लिए शराब की क्या कमी | कभी इलाके पर चुपके से दस-बीस बोतले खिचवा लेते कभी शहर के किसी कलवार पर धौस जमाकर दो चार बोतल ऐंठ लेते । बिना हरे फिटकरी रग चोखा हो जाता था। एक कहार भी नोकर रख लिया और ठाकुर साहब के घर से दो चार कुरसियाँ उठवा लाये | उनके हौसले बहुत ऊँचे न थे, केवल एक भले आदमी की भाँति जीवन व्यतीत करना चाहते थे। इस नौकरो ने उनके हौसले को बहुत-कुछ पूरा कर दिया, लेकिन यह जानते थे कि इस नौकरी का कोई ठिकाना नहीं । रईसों का मिजाज एक सा नहीं रहता। मान लिया, रानी साहब के साथ निभ ही गयी, तो कै दिन । राना साहब आते ही पुराने नौकरों को निकाल बाहर करेंगे । जब दीवान साहब ही न रहेंगे, तो मेरी क्या हस्ती। इसलिए उन्होंने पहले ही से नये राजा साहब के यहाँ आना जाना शुरू कर दिया था। इनका नाम ठाकुर विशालसिंह था । रानी साहब के चचेरे देवर होते थे। उनके दादा दो भाई थे । बड़े भाई रियासत के मालिक थे । उन्हीं के वशजों ने दो पीढियो तक राज्य का आनन्द भोगा था । अब रानी के निस्सन्तान होने के कारण विशाल सिंह के भाग्य उदय हुए थे। दो-चार गाँव जो उनके दादा को गुजारे के लिए मिले थे, उन्हीं को रेहन वय करके इन लोगों ने ५० वर्ष काट दिये थे- यहाँ तक कि विशालसिंह के पास अब इतनी भी सम्पत्ति न थी कि गुजर बसर के लिए काफी होती । उसपर कुल-मर्यादा का पालन करना आवश्यक था। वह महारानी के पट्टीदार थे और इस हैसियत का निर्वाह करने के लिए उन्हें नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ो, सभी कुछ रखना पड़ता था | अभी तक परम्परा को नकल होती चली आती थी। दशहरे के दिन उत्सव जरूर मनाया जाता, जन्माष्टमी के दिन जरूर धूमधाम होती।

    प्रातःकाल था, माघ की ठण्ड पड़ रही थी। मुन्शीजी ने गरम पानी से स्नान किया और चौकी से उतरे। मगर खड़ाऊँ उलटे रखे हुए थे । कहार खडा था कि यह जायँ,तो धोती छाट! मुन्शीजी ने उलटे खड़ाऊँ देखे, तो कहार को डॉटा-तुझसे कितनी बार कह चुका कि खड़ाऊँ सीधे रखा कर | तुझे याद क्यों नहीं रहता ? बना, उलटे खड़ाऊँ पर कैसे पैर रखूँ ? आज तो मैं छोड़ देता हूँ, लेकिन कन जो तूने उलटे खड़ाऊँ रखे, तो इतना पीटगा कि तू भी याद करेगा।

    कार ने कॉपते हुए हाथों से खडाऊँ सीधे कर दिये।

    निर्मला ने हलवा बना रखा था । मुन्शीजी पाकर एक कुरसी पर बैठ गये और जलता हुअा हलवा मुंह में डाल लिया बारे किसी तरह उसे निगल गये और आँखों से पानी पोंछते हुए ब'ले-तुम्हारा कोई काम ठीक नहीं होता | जलता हुया हलवा सामने रख दिया । आखिर मेरा मुँह जलाने से तुम्हें कुछ मिल तो नहीं गया ।

    निर्मला-जरा हाथ से देख क्यो न लिया ?

    वज्रधर – वाह, उलटा चोर कोतवालै बाटे | मुझीको उल्लू बनाती हो । तुम्हें खुद सोच लेना चाहिए था कि जलता हुया हलमा खा गये, तो मुंह की क्या दशा होगी। लेकिन तुम्हें क्या परवा | लल्लू कहाँ हैं ?

    निर्मला- लल्लू मुझसे कहके कही जाते हैं ? पहर रात रहे, न जाने किधर चले गये । नाने कहीं किसानों की सभा होनेवाली है। वहीं गये हैं ।

    वनधर-वहाँ दिन-भर भूखा मरेगा ! न जाने इसके सिर से यह भूत कत्र उतरेगा? मुझसे कल दारोगाजी कहते थे, श्राप लड़के को सॅभालिए, नहीं तो धोखा खाइएगा। समझ में नहीं याar, क्या करूँ । मेरे इलाके के ग्रादमी भी इन सभागों मे अब जाने लगे हैं और मुझे खौफ हो रहा है कि कहीं रानी साहब के कानो में भनक पड़ गयी, तो मेरे सिर हो जायेंगी। मैं यह तो मानता है कि अहलकार लोग गरीबों को बहुत सताते हैं, मगर किया क्या जाय, सताये बगैर काम भी तो नहीं चलता। आखिर उनका गुजर बसर कैसे हो ! पिसानो को समझाना बुरा नहीं, लेकिन ग्राग मे कुदना तो बुरी बात है । मेरो तो मुनने को उसने कसम खा ली है, मगर तुम क्यों नहीं समझाती ?

    निर्मला-जो याग में कृदेगा, आप जलेगा, मुझे क्या करना है । उससे बहस कौन करे । आज सवेरे-सवेरे कहाँ जा रहे हो ?

    वनधर-जरा ठाकुर विशालसिंह के यहाँ जाता हूँ।

    निर्मला-टोपहर तक तो लौट अायोगे न ? दूं। हॉ, इसका वादा करता हूँ कि रियासत मिलने के साल भर बाद भर कौड़ी कौड़ी सूद के साथ चुका दूंगा । सच्ची बात तो यह है कि मुझे पहले ही मालुम था कि इस शर्त पर कोई महाजन रुपए देने पर राजी न होगा । ये बला के चघह होते हैं। मुझे तो इनके नाम से चिढ है । मेरा वश चले, तो ग्राज इन सबों को तोप पर उड़ा दूं। जितना डर मुझे इनसे लगता है, उतना साँप मे भी नहीं लगता। इन्हीं के हाथों ग्रान मेरी यह दुर्गति है, नहीं तो इस गयी बीती दशा में भी यादमी होता। इन नर पिशाचों ने सारा रक्त चूस लिया । पिताजी ने केवल पाँच हजार लिये थे, जिनके पचास हजार हो गये । और मेरे तीन गाँव, जो इस वक्त दो लाख को सस्ते ये, नीलाम हो गये। पिताजी का मुझे यह अन्तिम उपदेश था कि कर्ज कभी मत लेना। इसी शोक में उन्होंने देह त्याग दी।

    यहाँ श्रमी यह बातें हो ही रही थी कि जनानखाने में से कलह शब्द आने लगे। मालूम होता था, कई स्त्रियो मे सग्राम छिड़ा हुया है। ठाकुर साहब ये कर्कश पाब्द सुनते ही विकल हो गये, उनके माथे पर बल पड़ गये, मुख तेजहीन हो गया । यही उनके जीवन की सबसे दारुण व्यथा थी । यही काँटा था, जो नित्य उनके हृदय मे खटका करता था । उनकी बड़ी स्त्री का नाम वसुमती था। वह अत्यन्त गर्वशीला थी;नाक पर मक्खी भी न बैठने देती । उनको तलवार सदैव म्यान से बाहर रहती थी। वह अपनी सपत्नियों पर उसी भाँति शासन करना चाहती थी, जैसे कोई सास अपनी बहुश्री पर करती है । वह यह भूल जाती थी कि ये उनकी बहुएँ नहीं, सप नयाँ हैं । जो उनकी हाँ म हाँ मिनाता, उसपर प्राण देती थी, किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध जरा भी कोई बात हो जातो, तो सिंहनी का सा विकराल रूप धारण कर लेती थी।

    दूसरी स्त्री का नाम रामप्रिया था। यह रानी जगदीशपुर की सगी बहन थी । उनके पिता पुगने खिलाड़ी थे, दो दस्ती झाड़ते थे, दो-धारी तलवार से लडते थे । रामप्रिया दया और विनय की मूर्ति थी, बड़ी विचारशील और वाक्य-मधुर, जितना कोमल अग था, उतना ही कोमल हृदय भी था। वह घर में इस तरह रहती थी मानों थी ही नही। उन्हें पुस्तको से विशेष रुचि थी, हरदम कुछ न कुछ पढ़ा लिखा करती थीं। सब से अलग-विलग रहती थी, न किसी के लेने मे, न देने में, न किसी से वैर, न प्रेम।

    तीसरी महिला का नाम रोहिणी या । ठाकुर साहब का उनपर विशेष प्रेम या, और वह भी प्रापण से उनकी सेवा करती थी। इनमे प्रेम की मात्रा अधिक थी या माया को इसका निर्णय करना कठिन था। उन्हें यह असह्य था कि ठाकुर साहन उनकी सौतो से बात चीत भी करें। वसुमनी कर्कशा होने पर भी मलिन हृदयान थी, जो कुछ मन में होता, वही मुख म । एक बार मुँह से बात निकाल डालने पर फिर उसके हृदय पर उसका कोई चित न रहता था। रोहिणी द्वेष को पालती थी, जैसे- चिड़िया अपने अण्डे को सेतो है । वह जितना मुँह से कहती थी, उससे कही अधिक मन मे रखती थी। ठाकुर साहब ने अन्दर जाकर वसुमती से कहा–तुम घर में रहने दोगी या नहीं ? जरा भी शरम-लिहाज नहीं कि बाहर कौन बैठा हुया है। बस, जब देखो, सग्राम मचाbरहता है । इस जिन्दगी से तग पा गया । सुनते-सुनते कलेजे में नासूर पड़ गये ।

    वसुमती-कर्म तो तुमने किये हैं, भोगेगा कौन ?

    ठाकुर-तो जहर दे दो। जला जलाकर मारने से क्या फायदा !

    वसुमती-क्या वह महारानी लडने के लिए कम थी कि तुम उनका पक्ष लेकर श्रा दौड़े ? पूछते क्यों नहीं, क्या हुआ, जो तीरों की बौछार करने लगी ?

    रोहिणी–अाप चाहती हैं कि मैं कान पकड़कर उठाऊ, या बैठाऊँ, तो यहाँ कुछ आपके गॉव मे नहीं बसी हूँ । क्यों कोई अापसे थर-थर कॉपा करे!

    ठाकुर-आखिर कुछ मालुम भी तो हो, क्या बात हुई ?

    रोहिणी–वही हुई, जो रोज होती है । मैंने हिरिया से कहा, नरा मेरे सिर मे तेल डाल दे । मालकिन ने उसे तेल डालते देखा, तो श्राग हो गयीं। तलवार खींचे हुए आ पहुंची और उसका हाथ पकड़कर खींच ले गयी । अाज अाप निश्चित कर लीजिए कि हिरिया उन्हीं की लौडी है या मेरी भी। यह निश्चय किये बिना आप यहाँ से न जाने पायेंगे।

    वसुमती-वह क्या निश्चय करेगे, निश्चय मैं करूँगी। हिरिया मेरे साथ मेरे नैहर से आयी है और मेरो लौडो है । किसी दूसरे का उस पर कोई दावा नहीं है ।

    रोहिणी–सुना आपने ? हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्ही की लौंडी है।

    ठाकुर-हिरिया इस घर में रहेगी, तो उसे सब का काम करना पड़ेगा।

    वसुमती यह सुनकर जल उठी। नागिन की भाँति फुफकारकर बोली- इस वक्त तो अापने चहेती रानी की ऐसी डिग्री कर दी, मानो यहाँ उन्हीं का राज्य है। ऐसे ही न्यायशील होते, तो सन्तान का मुँह देखने को न तरसते ।

    ठाकुर साहब को ये शब्द बाण-से लगे । कुछ जवान न दिया। बाहर आकर कई मिनट तक मर्माहत दशा में बैठे रहे । वसुमती इतनी मुंहफट है, यह उन्हे अाज मालूम हुया । सोचा, मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही थी, जिस पर वह इतना झल्ला जाती। मैने क्या बुरा कहा कि हिरिया को सबका काम करना पड़ेगा। अगर हिरिया केवल उसी का काम करती है, तो दो महरियाँ और रखनी पड़ती हैं । क्या वसुमती इतना भी नहीं समझतो ? ताना ही देना था, तो और कोई लगती हुई बात कह देती। यह तो कठोर से कठोर ग्राघात है, जो वह मुझ पर कर सकती थी। ऐसी स्त्री का तो मुँह न देखना चाहिए।

    सहमा उन्हें एक बात सूझी। मुशीजी से बोले–ज्योतिष की भविष्यवाणी के विषय में आपके क्या विचार है । क्या यह हमेशा सच निकलती है ?

    मुंशोजी असमजस में पड़े कि इसका क्या जवाब दूं। कैसा जवाब रुचिकर होगा– यह उनकी समझ में न पाया । अंधेरे में टटोलते हुए बोले–यह तो उसी विद्या के विषय में कहा ना सकता है, जहाँ अनुम न से काम न लिया जाय । ज्योतिष में बहुत-कुछ पूर्व अनुभव और अनुमान हो से काम लिया जाता है।

    ठाकुर–बस, ठीक यही मेरा विचार है । अगर ज्योतिप मुझे धनी बतलाये, तो यह आवश्यक नहीं कि मैं धनी हो जाऊँ । ज्योतिप के धनी कहने पर भी सम्भव है कि मैं निन्दगी भर कौड़ियों को मुहताज रहूँ । इमी भाँति ज्योतिष का दरिद्र लक्ष्मी का कृपा पात्र भी हो सकता है, क्यों ?

    मुशीजी को अब भी पॉव जमाने को भूमि न मिली । सन्दिग्ध भाव से बोले-हाँ, ज्योतिष की धारणा जब अनुष्ठानों से बदली जा सकती है, तो उसे विधि का लेख क्यों समझा जाय ?

    ठाकुर साहब ने बड़ी उत्सुकता से पूछा- अनुष्ठानों पर श्रापका विश्वास है ?

    मुशीजीको जमीन मिल गयी । बोले-~अवश्य ।

    विशालसिह यह तो जानते थे कि अनुराना से शकायों का निवारण होता है । शनि, राहु ग्रादि का शमन करने के अनुशनों से परिचित थे । बहुत दिनो से मगल का व्रत भी रखते थे, लेकिन इन अनुराना पर अन उन्हें विश्वास न था । वह कोई ऐसा अनुष्ठान करना चाहते थे जो किसी तरद निष्फल ही न हो | बोले- यदि यार यहाँ के किसी विद्वान् ज्योतिषी से परिचित हों, तो कृपा करके उन्हें मेरे यहाँ भेज दोजि एगा । मुझे एक विषय में उनसे कुछ पूछना है ।

    मुशी-अाज ही लीजिए, यहाँ एक से एक बढकर ज्योतिषी पड़े हुए हैं। श्राप.मुझे कोई गैर न समझिए । जब, जिस काम को इच्छा हा, मुझे कहला भेजिए ।.सिर के बल दौड़ा श्राऊँगा। बाजार से काई अच्छी चीज मॅगानी हो, मुझे हुक्म दीजिए, किसी वैद्य या हकीम की जरूरत हो, मुझे सूचना दीजिए। मैं तो जैसे महारानीनी को समझता हूँ, वैसे ही श्रापको भी समझता हूँ।

    ठाकुर-मुझे श्रापसे ऐसी ही श्राशा है। जरा रानी साहबा का कुशल-समाचार जल्द जल्द भेजिएगा। वहाँ अापके सिवा मेग और कोई नहीं है । श्राप ही के ऊपर मेरा भरोसा है । जरा देखिएगा, कोई चीज इधर उधर न होने पाये, यार लोग नोच-खसोट न शुरू कर दें।

    मुशी-आप इससे निश्चिन्त रहें । मैं देख भाल करता रहूँगा।

    ठाकुर-हो सके, तो जर( यह भी पता लगाइएगा कि रानी ने कहाँ-कहाँ से कितने रुपये कर्ज लिये हैं।

    मुशी-समझ गया, यह तो सहज ही में मालूम हो सकता है।

    ठाकुर– जरा इसका भी पता लगाइएगा कि याजकल उनका भोजन कौन बनाता है। पहले तो उनके मैके ही की कोई स्त्री थी। मालूम नहीं, अब भी वही बनाती है, या कोई दूसरा रसोइया रखा गया है । चक्रधर ने ठाकुर साहब के मन का भाव ताडकर दृढ़ता से कहा-महाराज, क्षमा कीजिएगा, मै आपका सेवक हूँ, पर रानी जी का भी सेवक हूँ। उनका शत्रु नही हूँ। और वह दोनों सिह और सिहनी की भाँति लड़ सकते हैं। मै गीदड़ की भॉति स्वार्थ के लिए बीच मे कूदना अपमान-जनक समझता हूँ। मै वहाँ तक तो आपकी सेवा कर सकता हूँ, जहाँ तक रानीजी का अहित न हो । मै तो दोनों का भिक्षुक हूँ।

    ठाकुर साहब दिल मे शरमाये, पर इसके साथ मुंशीजी पर उनका विश्वास और हो गया । बात बनाते हुए बोले-नहीं, नहीं, मेरा मतलब आपने गलत समझा। छी: ! मै इतना नीच नही । मै केवल इसलिए पूछता था कि नया रसोइया है या नहीं । अगर वह सुपात्र है, तो वही मेरा भी भोजन बनाता रहेगा। ठाकुर साहब ने बात तो बनायी, पर उन्हें स्वय ज्ञात हो गया कि बात बनी नहीं ।

    झेप मिटाने को वह एक समाचार पत्र देखने लगे, मानों उन्हें विश्वास हो गया शीजी ने उनकी बात सच मान ली ।

    इतने मे हिरिया ने आकर मुंशीजी से कहा–बाबा, मालकिन ने कहा है कि श्राप लगे, तो मुझसे मिल लीजिएगा।

    ठाकुर साहब ने गरज कर कहा-ऐसी क्या बात है, जिसको कहने की इतनी जल्दी है। इन बेचारे को देर हो रही है, कुछ निठल्ले थोड़े ही है कि बैठे बैठे औरतों का सुना करें । जा, अन्दर बैठ ।

    यह कह कर ठाकुर साहब उठ खड़े हुए, मानो मुशी जी को विदा कर रहे हैं । वह ती को उनसे बातें करने का अवसर न देना चाहते थे । मुशीजी को भी अब विवश विदा माँगनी पड़ी।

    मुंशीजी यहाँ से चले तो उनके दिल मे एक शंका समायी हुई थी कि ठाकुर साहब मुझसे नाराज तो नहीं हो गये। हाँ, इतना सन्तोष था कि मैने कोई बुरा काम नहीं । यदि वह सच्ची बात कहने के लिए नाराज हो जाते हैं, तो हो जायँ। मै क्यों साहब का बुरा चेतू । बहुत होगा, राजा होने पर मुझे जवाब दे देगे । इसकी क्या चिंता। इस विचार से मुंशीजी और अकड़कर घोड़े पर बैठ गये। वह इतने खुश थे, । हवा में उड़े जा रहे हैं। उनकी आत्मा कभी इतनी गौरवोन्मत्त न हुई थी। ताओं को कभी उन्होंने इतना तुच्छ न समझा था।

    ७

    चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुंच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य । उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे । बार बार पाते थे और पूछकर लौट जाते जब वह पाँचवें दिन घर पहुंचे तो लोग मिलने और बधाई देने या पहुँचे । नगर सभ्य समाज मुक्तकंठ से उनकी तारीफ कर रहा था । यबपि चक्रघर गभीर आदमी पर अपनी कीति की प्रशंसा से उन्हें सच्चा अानन्द मिल रहा था । मुसलमानो की सख्या के विषय में किसी को भ्रम होता, तो वह तुरन्त उमे ठोक कर देते थे-एक हजार ? अजी, पूरे पाँच हजार श्रादमी ये पोर सभी को त्योरियाँ चढी हुई। मालूम देता था, मुझे खड़ा निगल जायेगे। नान पर खेल गया और क्या कहूँ। कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें चक्रधर की वह अनुनय-विनय अपमानजनक जान पढ़ती थी। उनका खयाल था कि इससे तो मुसलमान और भी शेर हो गये होंगे । इन लोगों से चक्रधर को घण्टों बहस करनी पडी, पर वे कायल न हुए । मुसलमानों में भी चक्रधर की तारीफ हो रही थी। दोचार श्रादमी मिलने भी अाये, लेकिन हिन्दुओं का जमघट देसकर 'लौट गये।

    और लोग तो तारीफ कर रहे थे, पर मुशी वनधर लड़के की नादानी पर बिगड़ रहे थे। तुम्हीं को क्यों यह भूत सवार हो जाता है ? क्या तुम्हारी ही जान सस्ती है ? तुम्ही को अपनी जान भारी पड़ी है ? क्या वहाँ यार लोग न थे, फिर तुम क्यो अाग म कृदने गये ? मान लो, मुसलमानों ने हाय चला दिया होता, तो क्या करते ? फिर तो कोई साहब पास न फटकते ! ये हजारों यादमी, नो अाज खुशी के मारे फूले नहीं समाते, बात तक न पूछते । निर्मला तो इतनी विगढ़ी कि चक्रधर से बात न करना चाहती थी।

    शाम को चक्रधर मनोरमा के घर गये । वह बगीचे में दौड़-दौड़कर हजारे से पौधों को सींच रही थी। पानी से कपड़े लथपथ हो गये थे। उन्हें देखते ही हजारा फेंककर दौड़ी और पास श्राकर बोली-पाप कर पाये, बाबूजी ? मैं पत्रों मे रोज वहाँ का समाचार देखती थी और मोचती थी कि ग्राप यहाँ पायेंगे, तो यापकी पूजा करूँगी । श्राप न होते तो वहाँ जरूर दगा हो जाता। पापको बिगडे हुए मुसलमाना के सामने अकेले जाते हुए जरा भी शका न हुई ?

    चक्रधर ने कुरसी पर बैठते हुए कहा-जरा भी नहीं ! मुझे तो यही धुन थी कि इस वक्त कुरबानी न होने दूंगा, इसके सिवा दिल में और कोई खयाल न था। अब सोचता हूँ, तो अाश्चर्य होता है कि मुझमे इतना बल और साहस कहाँ से आ गया था। मैं तो यही कहूंगा कि मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं । फिसाद से वे भा उतना ही डरते हैं, जितना हिन्दू । शान्ति की इच्छा भी उनमें हिन्दुओ से कम नहा है । लोगों का यह खयाल कि मुसलमान लोग हिन्दुओं पर राज्य करने का स्वप्न देख रहे हैं बिलकुल गलत है। मुसलमानों को केवल यह शका हो गयी है कि हिन्दू उनस पुराना वैर चुकाना चाहते हैं, और उनकी हस्ती को मिटा देने की फिक्र कर रहे हैं। इसी भय से वे जरा-जरा सी बात पर तिनक उठते हैं और मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं।

    मनोरमा-मैंने तो जब पढा कि ग्राप उन बौखलाये हए आदमियों के सामन निःशक भाव से खड़े थे, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये। आगे पढने की हिम्मत न पड़ती थी कि कहीं कोई बुरी खबर न हो । क्षमा कीजिएगा, मैं उस समय वहाँ होती, तो श्रापको पकडकर खींच लाती । आपको अपनी जान का जरा भो मोह नहीं है।

    चक्रधर-( हँसकर ) जान और हई किस लिए १ पेट पालने ही के लिए तो हम आदमी नही बनाये गये हैं। हमारे जीवन का अादर्श कुछ तो ऊँचा होना चाहिए, विशेषकर उन लोगों का, जो सभ्य कहलाते हैं । ठाट से रहना हो सभ्यता नहीं।

    मनोरमा-(मुस्कराकर ) अच्छा, अगर इस वक्त आपको पाँच लाख रुपए मिल जायँ, तो श्राप लें या न लें।

    चक्रधर-कह नहीं सकता, मनोरमा उस वक्त दिल की क्या हालत हो । दान तो न लूँगा, पड़ा हुआ धन भी न लॅगा; लेकिन अगर किसी ऐसी विधि से मिले कि उसे लेने मे आत्मा की हत्या न होती हो, तो शायद मैं प्रलोभन को रोक न सकूँ पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उसे भोग-विलास मे न उड़ाऊँगा। धन की में निन्दा नहीं करता, उससे मुझे डर लगता है। दूसरों का आश्रित बनना तो लज्जा की बात है, लेकिन जीवन को इतना सरल रखना चाहता हूँ कि सारी शक्ति धन कमाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने ही मे न लगानी पड़े।

    मनोरमा–धन के बिना परोपकार भी तो नही हो सकता ?

    चक्रधर-परोपकार में करना नहीं चाहता, मुझमे इतनी सामर्थ्य ही नहीं। यह तो वे ही लोग कर सकते हैं, जिन पर ईश्वर की कृपा दृष्टि हो । मै परोपकार के लिए अपने जीवन को सरल नहीं बनाना चाहता; बल्कि अपने उपकार के लिए, अपनी आत्मा के सुधार के लिए । मुझे अपने ऊपर इतना भरोसा नहीं है कि धन पाकर भी भाग में न पड़ जाऊँ । इसलिए मैं उससे दूर ही रहना चाहता हूँ।

    मनोरमा–अच्छा, अब यह तो बतलाइए कि आपसे वधूजी ने क्या बातें की ? (मुस्कराकर ) मैं तो जानती हूँ, आपने कई बात-चीत न को होगी, चुपचाप लजाये बैठे रहे होंगे । उसी तरह वह भी आपके सामने आकर खड़ी हो गयी होगी और खड़ी-खड़ी चली गयी होंगी।

    चक्रधर शरम से सिर मुकाकर बोले- हाँ, मनोरमा, हुआ तो ऐसा ही । मेरी समझ ही मे न पाता था कि क्या बातें करूँ। उसने दो एक बार कुछ बोलने का साहस भी किया।

    मनोरमा-ग्रापको देखकर खुश तो बहुत हुई होगी।

    चक्रधर–(शरमाकर ) किसी के मन का हाल मै क्या जानू ?

    मनोरमा ने अत्यन्त सरल भाव से कहा- सब मालूम हो जाता है। पाप मुझसे बता नहीं रहे हैं । कम-से-कम उनकी इच्छा तो मालूम ही हो गयी होगी । मे तो सम-झती हूँ, जो विवाह लड़की की इच्छा के विरुद्ध किया जाता है वह विवाह ही नहीं है । आपका क्या विचार है ?

    चक्रधर बड़े असमञ्जस में पड़े । मनोरमा से ऐसी बातें करते उन्हें सकोच होता था । डरते थे कि कहीं ठाकुर साहब को सबर मिल जाय-~सरला मनोरमा ही कह दे–तो वह समझेगे, मै इसके सामाजिक विचारो मे क्राति पैदा करना चाहता हूँ, श्रत्र तक उन्हें शात न था कि ठाकुर साहब किन विचारों के यादमी है। हाँ, उनके गङ्गा-स्नान से यह अाभास होता था कि वह सनातन धर्म के भक्त हैं। सिर झुकाकर बोले–मनोरमा, हमारे यहाँ विवाह का अाधार प्रेम यार इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है । इच्छा चश्वल है, क्षण-क्षण में बदलती रहती है । कर्तव्य स्थायो है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

    मनोरमा-अगर यह बात है, तो पुराने जमाने में स्वयम्बर क्यों होते थे ?

    चक्रधर–स्वयम्बर मे कन्या की इच्छा ही सर्व प्रधान नहीं है तो थी । वह वीर-युग था, और वीरता ही मनुष्य का सबसे उज्ज्वल गुण समझा जाता था । लोग अाजकन वैवाहिक प्रथा सुधारने का प्रयत्न तो कर रहे है।

    मनोरमा-जानती हूँ, लेकिन कहीं सुधार हो रहा है ? माता पिता धन देखकर लट्ट हो जाते हैं | इच्छा अस्थायी है, मानती हूँ, लेकिन एक बार अनुमति देने के बाद फिर लड़की को पछताने के लिए कोई हीला नही रहता।

    चक्रधर-~अपने मन को समझाने के लिए तों की कभी कमी नहीं रहती, मनोरमा कर्तव्य ही ऐसा श्रादर्श है, जो कभी धोसा नहीं दे सकता ।

    मनोरमा–हाँ, लेकिन प्रादर्श अादर्श ही रहता है, यथार्थ नहीं हो सकता । (मुस्कराकर ) यदि आप ही का विवाह किसी कानी, काली-कलूटी स्त्री से हो जाय, तो क्या श्रापको दु ख न होगा? वोलिए । क्या आप समझते हैं कि लड़की का विवाह किसी खूसट से हो जाता है, तो उसे दु ख नही होता। उसका बम च ते तो वह पति का मुँह तक न देखे । लेकिन इन बातों को जाने दीजिए । वधूजी बहुत सुन्दर हैं ?

    चक्रवर ने बात टालने के लिए कहा-सुन्दरता मनोभावों पर निर्भर होती है। माता अपने कुरूप बालक को भी सुन्दर समझती है ।

    मनोरमा–श्राप तो ऐसी बातें कर रहे हैं, जैसे भागना चाहते हो । क्या माता किसी सुन्दर बालक को देखकर यह नहीं सोचती कि मेरा भी बालक ऐसा ही होता।

    चक्रधर ने लजित होकर कहा- मेरा श्राशय यह न था। मै यही कहना चाहता था कि सुन्दरता के विषय में सब की राय एक-सी नहीं हो सकती

    मनोरमा–श्राप फिर भागने लगे। मै जब आपसे यह प्रश्न करती हूँ, तो उसका साफ मतलब यह है कि आप उन्हें सुन्दर समझते हैं या नहीं?

    चक्रवर लजा से सिर झुकाकर बोले–ऐसी बुरी तो नहीं है।

    मनोरमा–तब तो श्राम उन्हें खूब प्यार करेंगे ?

    चक्रधर-प्रेम केवल रूप का भक्त नहीं होता ।

    सहसा घर के अन्दर से किसी के कर्कश शब्द कान में आये, फिर लौंगो का रोना सुनायी दिया । चक्रधर ने पूछा- यह तो लौंगी रो रही है ? मनोरमा-जी हॉ ! आपसे तो भाई साहब से भेंट नहीं हुई। गुरुसेवकसिह नाम है। कई महीनो से देहात में जमीदारी का काम करते हैं। हैं तो मेरे सगे भाई और पढ़े-लिखे भी खब है। लेकिन भलमनसी छ भी नहीं गयी। जब पाते है. लौंगी अम्मा से झूठ-मूठ तकरार करते हैं । न जाने उसमे इन्हें क्या अदावत है।

    इतने में गुरुसेवकसिह लाल-लाल आँखें किये निकल पाये और मनोरमा से बोले-बाबूजी कहाँ गये हैं ? तुझे मालूम है कब तक पायेंगे ? मैं ग्राज ही फैसला कर लेना चाहता हूँ।

    गुरुसेवेकसिंह की उम्र २५ वर्ष से अधिक न थी। लम्वे, छरहरे एवं रूपवान् थे, आँखों पर ऐनक थी, मुंह में पान का बीड़ा, देह पर तनजेब का कुरता, माँग निकली हुई । बहुत शौकीन आदमी थे ।

    चक्रधर को बैठे देखकर वह कुछ झिझके और अन्दर लौटना ही चाहते थे कि लौंगो रोती हुई याकर चक्रधर के पास खड़ी हो गया और बोली-बाबूजी, इन्हें सम-झाइए कि में अब बुढ़ापे मे कहाँ जाऊँ ? इतनी उम्र तो इस घर में कटी, अब किसके द्वार पर जाऊँ ? जहाँ इतने नौकरों-चाकरो के लिए खाने को रोटियाँ हैं, क्या वहाँ मेरे लिए एक टुकड़ा भी नहीं ? बाबूजी, सच कहती हूँ, मैंने इन्हें अपना दूध पिलाकर पाला है: मालकिन के दूध न होता था, और अब यह मुझे घर से निकालने पर तुले हुए हैं। गुरुसेवकसिंह की इच्छा तो न थी कि चक्रधर से इस कलह के सम्बन्ध में कुछ कहें। लेकिन जब लौगी ने उन्हें पंच बनाने में सकोच न किया, तो वह भी खुल पड़े। बोले-महाशय, इससे यह पूछिए कि पात्र यह बुढ़िया हुई, इसके मरने के दिन आये, क्यों नहीं किसी तीर्थस्थान में जाकर अपने कलुधित जीवन के बचे हुए दिन काटती ? मैंने दादाजी से कहा था कि इसे वृन्दावन पहुँचा दीजिए, और वह तैयार भी हो गये थे, पर इसने सैकड़ों बहाने किये और वहाँ न गयी । आपसे तो अब कोई परदा नहीं है, इसके कारण मैने यहाँ रहना छोड़ दिया। इसके साथ इस घर में रहते हुए मुझे लजायाती है। इसे इसकी जरा भी परवाह नहीं कि जो लोग सुनते होंगे, तो दिल मे क्या कहते होंगे। हमे कही मुँह दिखाने की जगह नहीं रही। मनोरमा अव सयानी हुई। उसका विवाह करना है या नहीं। इसके घर में रहते हुए हम किस भले यादमी के द्वार पर ना सकते हैं। मगर इसे इन बातों की बिलकुल चिन्ता नही । वस मरते दम तक घर को स्वामिनी बनी रहना चाहती है। दादाजी भी सठिया गये हैं, उन्हें मानापमान की जरा भी फिक्र नहीं । इसने उनपर न जाने क्या मोहिनी डाल दी है कि इसके पीछे मुझमे लड़ने पर तैयार रहते हैं। श्राज मैं निश्चय करके पाया हूँ कि इसे घर के बाहर निकारकर ही छोडूंगा । या तो यह किसी दूसरे मकान में रहे, या किसी तीर्थ स्थान को प्रस्थान करे। लौगी-तो बच्चा सुनो, जब तक मालिक जीता है, लोंगी इसी घर में रहेगी भार इसी तरह रहेगी। जब वह न रहेगा, तो जो कुछ सिर पर पड़ेगी, झेल लॅगी । जो तुम चाहो कि लोगी गली गली ठोकरें खाये, तो यह न होगा ! मै लौडी नहीं हूँ कि घर से बाहर जाकर रहूँ। तुम्हें यह कहते लजा नहीं श्राती? चार भाँवरें फिर जाने से ही व्याइ नहीं हो जाता । मैंने अपने मालिक की जितनी सेवा की है और करने को तैयार हूँ, उतनी कौन ब्याहता करेगी ? लाये तो हो बहू, कभी उठकर एक लुटिया पानी भी देती है ? खायी है कभी उसकी बनायो हुई कोई चीन ? नाम से कोई व्याहता नहीं होती, सेवा और प्रेम से होती है।

    गुरुसेवक-यह तो मैं जानता हूँ कि तुझे बातें बहुत करनी अाती हैं, पर अपने मुंह से जो चाहे बने, मैं तुझे लौंडो ही समझता हूँ।

    लौंगी-तुम्हारे समझने से क्या होता है, अभी तो मेरा मालिक जीता है। भगवान्ठ से अमर करें ! जब तक जीती हूँ, इसी तरह रहूँगी, चाहे तुम्हें अच्छा लगे या बुरा । निसने जवानी में बाँह पकड़ी, वह क्या अब छोड़ देगा? भगवान् को कौन मुँह दिखायेगा?

    यह कहती हुई लौंगी घर में चली गयी। मनोरमा चुपचाप सिर मुकाये दोनों को चातें सुन रही थी। उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था । मातृ स्नेह का जो कुछ सुख उसे मिला था, लौंगी ही से मिला था। उसकी माता तो उसे गोद में छोड़कर परलोक सिधारी थी। उस एहसान को वह कभी न भूल सकती थी। अब भी लौंगी उसपर प्राण देती थी। इसलिए गुरुसेवकसिंह की यह निर्दयता उसे बहुत बुरी मालूम होती थी।

    लौंगी के जाते ही गुरुसेवकसिंह बड़े शान्त भाव से एक कुरसी पर बैठ गये और चक्रघर से बोले-महाशय, आपसे मिलने की इच्छा हो रही थी और इस समय मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी था। आपने श्रागरे को समस्या जिस बुद्धिमानी से हल की उसकी जितनी प्रशसा की जाय, कम है।

    चक्रधर-वह तो मेरा कर्तव्य ही था ?

    गुरुसेवक-इसीलिए कि श्रापके कर्तव्य का अादर्श बहुत ऊँचा है। १०० में ६६ श्रादमी तो ऐसे अवसर पर लड़ माना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। मुश्किल से एक आदमी ऐसा निकलता है, जो धैर्य से काम ले । शान्ति के लिए आत्म-समर्पण करनेवाला तो लाख-दो-लाख में एक होता है। श्राप विलक्षण धैर्य और साहस के मनुष्य हैं । मैंने भी अपने इलाके में कुछ लड़कों का खेल-सा कर रखा है, वहाँ पठानों के कई बड़े-बड़े गाँव हैं, उन्हों से मिले हुए ठाकुरों के भी कई गाँव हैं। पहले पठानों और ठाकुरों में इतना मेल था कि शादी-गमी, तील त्योहार में एक दूसरे के साथ शरीक होते थे, लेकिन अब तो यह हाल है कि कोई त्योहार ऐसा नहीं जाता, जिसमें खून-खच्चर या कम से कम मार पीट न हो । श्राप अगर दो-एक दिन के लिए वहाँ चले तो श्रापस में बहुत कुछ सफाई हो जाय ! मुसलमानों ने अपने पत्रों में श्रापका जिक देखा है और शौक से श्रापका स्वागत करेंगे । अापके उपदेशों का बहुत कुछ असर पड़ सकता है।

    चक्रधर-बातों में असर डालना तो ईश्वर की इच्छा के अधीन है। हॉ, मैं श्रापके साथ चलने को तैयार हूँ। मुझसे जो सेवा हो सकेगी, वह उठा न रखूगा | कन चलने का इरादा है ? गुरुसेवक-चलता तो इसी गाडी से, लेकिन मै इस कुलटा को अबकी निकाल बाहर किये वगैर नहीं जाना चाहता। दादाजी ने रोक-टोक की, तो मनोरमा को लेता जाऊँगा और फिर इस घर में कदम न रखेगा। सोचिए तो, कितनी बड़ी बदनामी है।

    चक्रधर बड़े संकट में पड़ गये। विरोध की कटुता को मिटाने के लिए मुस्कराते हुए बोले-मेरे और आपके सामाजिक विचारों में बड़ा अन्तर है। मैं बिल्कुल भ्रष्ट हो गया हूँ।

    गुरुसेवक-क्या आप लौंगी का यहाँ रहना अनुचित नहीं समझते ?

    चक्रधर-जी नहीं, खानदान की बदनामी अवश्य है; लेकिन मैं बदनामी के भय से अन्याय करने की सलाह नहीं दे सकता । क्षमा कीजिएगा, मैं बड़ी निर्भीकता से अपना मत प्रकट कर रहा हूँ।

    गुरुसेवक-नहीं, नहीं: मैं बुरा नहीं मान रहा हूँ। (मुस्कराकर ) इतना उजड्ड नहीं हूँ कि किसी मित्र की सच्ची राय न सुन सकू। अगर श्राप मुझे समझा दें कि उसका यहाँ रहना उचित है, तो मैं श्रापका बहुत अनुगृहीत हूँगा । मैं खुद नहीं चाहता कि मेरे हाथों किसी को अकारण कष्ट पहुँचे ।

    चक्रघर-जब किती पुरुष का एक स्त्री के साथ पति-पत्नी का-सा सम्बन्ध हो जाय, तो पुरुष का धर्म है कि जब तक स्त्री की ओर से कोई विरुद्ध प्राचरण न देखे, उस सम्बन्ध को निबाहे।

    गुरुसेवक-चाहे स्त्री कितनी ही नीच जाति की हो ?

    चक्रधर-हाँ, चाहे किसी भी जाति की हो ।

    मनोरमा यह जवाब सुनकर गर्व से फूल उठी । वह आवेश में उठ खड़ी हुई और पुलकित होकर खिड़की के बाहर झॉकने लगी। गुरुसेवकसिंह वहाँ न होते, तो वह जरूर कह उठती-आप मेरे मुँह से बात ले गये।

    एकाएक फिटन को श्रावाज आयी और ठाकुर साहब उतरकर अन्दर गये । गुरु- सेवकसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले । वह डर रहे थे कि लौंगी अवसर पाकर कहीं उनके कान न भर दे।

    जब वह चले गये, तो मनोरमा बोली-आपने मेरे मन की बात कही। बहुत सी बातों में मेरे विचार आपके विचारों से मिलते हैं।

    चक्रधर-उन्हें बुरा तो जरूर लगा होगा!

    मनोरमा-वह फिर वापसे बहस करने आते होंगे। अगर श्राज मौका न मिलेगा तो कल करेंगे । अबको वह शास्त्रों के प्रमाण पेश करेंगे, देख लीजिएगा!

    चक्रधर-खैर, यह तो बताओ कि तुमने इन चार-पाँच दिनों में क्या काम किया !

    मनोरमा-मैंने तो किताब तक नहीं खोली। वस, समाचार पढ़ती थी और वही चात सोचती थी । आप नहीं रहते, तो मेरा किसी काम में जो नहीं लगता। आप श्रन कमी बाहर न जाइएगा। चक्रधर ने मनोरमा की पोर देखा, तो उसकी श्रॉखें सजल हो गयी थी। सोचने लगे-बालिका का हृदय कितना सरल, कितना उदार, कितना के मल और कितना भावमय है!

    ८

    जगदीशपुर की रानी देवप्रिया का जीवन केवल दो शब्दो में समाप्त हो जाता था-विनोद और विलास । इस वृद्धावस्था में भी उनकी विलास-वृत्ति अणुमात्र भी कम न हुई थी। हमारी कर्मेन्द्रियाँ भले ही जर्जर हो जाये, चेप्टाएँ तो वृद्ध नहीं होती ! कहते हैं, बुढ़ापा मरी हुई अभिलाषायो की समाधि है, या पुराने पापो का पश्चात्ताप, पर रानी देवप्रिया का बुढापा अतृप्त तृष्णा थी और अपूर्ण विलासाराधना । वह दान पुण्य बहुत करती थी; साल मे दो चार यज्ञ भी कर लिया करती थी, साधु-सन्तों पर उनकी असीम श्रद्धा थी और इस धर्मनिष्ठा में उनका ऐहिक स्वार्थ छिपा होता था। परलोक की उन्हें कभी भूलकर भी याद न श्राती थी। वह भूल गई थीं कि इस जीवन के बाद भी कुछ है। उनके दान और स्नान का मुख्य उद्देश्य था-शारीरिक विकारों से निवृत्ति, विलास में रत रहने की परम योग्यता । यदि वह किसी देवता को प्रसन्न कर सकतीं, तो कदाचित् उससे यही वरदान माँगती कि वह कभी बूढ़ी न हो। इस पूजा और व्रत के सिवा वह इस महान् उद्देश्य को पूरा करने के लिए भाँति भाँति के रसों और पुष्टिकारक औषधियों का सेवन करती रहती थी। झुर्रियाँ मिटाने और रग को चमकाने के लिए भी कितने ही प्रकार के पाउडरों, उपटनों और तेलों से काम लिया जाता था । वृद्धावस्था उनके लिए नरक से कम भयङ्कर न थी। चिन्ता को तो वह अपने पास न फटकने देती थी। रियासत उनके भोग विलास का साधन मात्र यी। प्रजा को क्या कष्ट होता है, उनपर कैसे-कैसे अत्याचार होते हैं, सूखे झूरे की विपत्ति क्योकर उनका सर्वनाश कर देती है, इन बातों की ओर कभी उनका ध्यान न जाता था। उन्हें जिस समय जितने धन की जरूरत हो, उतना तुरन्त देना मैनेजर का काम था । वह ऋण लेकर दे, चोरी करे, या प्रजा का गला काटे, इससे उन्हें कोई प्रयोजन न था।

    यों तो रानी साहब को हरएक प्रकार के विनोद से समान प्रेम था। चाहे वह थिएटर हो, या पहलवानों का दगल, या अँगरेजी नाच, पर उनके जीवन की सबसे अानन्दमय घड़ियाँ वे होती थीं, जब वह युवकों और युवतियों के साथ प्रेम-क्रीड़ा करती थीं। इस मण्डली में बैठकर उन्हें श्रात्म प्रवचना का सबसे अच्छा अवसर मिलता था । वह भूल जाती थीं कि मेरा यौवन काल बीत चुका है। अपने बुझे हुए यौवन दीपक को युवा की प्रज्ज्वलित स्फूति से जलाना चाहती थीं, किन्तु इस धुन में वह कितने ही अन्य विलासान्ध प्राणियों की भाँति नीचो को मुंह न लगाती थीं। काशी प्रानेवाले राजकुमारों और रानकुमारियो ही से उनका सहवास रहता था। आनेवालों की कमी न यो । एक न-एक हमेशा ही अाता रहता था । रानी की अतिथि-शाला हमेशा श्राबाद रहती थी। उन्हें युवकों की आँखों में खुब जने की सनक-सी थी। वह चाहती थीं कि मेरे सौन्दर्य-दीपक पर युवक पतंगे की भाँति श्राकर गिरें । उनकी रसमयी कल्पना प्रेम के आघात-प्रत्याघात से एक विशेष स्फूर्ति का अनुभव करती थी।

    एक दिन ठाकुर हरिसेवकसिंह मनोरमा को रानी साहब के पास ले गये । रानी उसे देखकर मोहित हो गयीं। तबसे दिन में एक बार उससे जरूर मिलती। वह किसी कारण से न पाती तो उसे बुला भेजती । उसका मधुर गाना सुनकर वह मुग्ध हो जाती थी। हरिसेवक सिह का उद्देश्य कदाचित् यही था कि वहाँ मनोरमा को रईसो और राज-कुमारों को श्राकर्षित करने का मौका मिलेगा।

    भदों की अँधेरी रात थी । मूसलाधार वर्षा हो रही थी। रानी साहब को ग्रान कुछ ज्वर था, चेष्टा गिरी हुई थी, सिर उठाने को जी न चाहता था, पर पड़े रहने का अव-सर न था । हर्पपुर के राजकुमार को आज उन्होंने निमन्त्रित किया था। उनके आदर- सत्कार का काम करना जरूरी था। उनके सहवास के सुख से वह अग्ने को वचित न कर सकती थीं। उनके आने का समय भी निकट था। रानी ने बड़ी मुश्किल से उठकर पाइने में अपनी सूरत देखी। उनके हृदय पर आघात-सा हुआ । मुख प्रभात-चन्द्र की भॉति मन्द हो रहा था।

    रानी ने सोचा-अभी राजकुमार आते होंगे । क्या मैं उनसे इसी दशा मे मिलूँगी ? ससार में क्या कोई ऐसी सञ्जीवनी नहीं है, जो काल के कुटिल चिह्न को मिटा दे ? ऐसी वस्तु कहीं मिल जाती, तो मे अपना सारा राज्य वेचकर उसे ले लेती। जब भोगने की सामर्थ्य ही न हो, तो राज्य से और सुख ही क्या ! हा निर्दयी काल ! तूने मेरा कोई प्रयत्न सफल न होने दिया।

    राजकुमार अब अाते होंगे, मुझे तैयार हो जाना चाहिए । ज्वर है, कोई परवा नहीं। मालूम नहीं, जीवन में फिर ऐसा अवसर मिले या न मिले।

    सामने मेज पर एक अलबम रखा था। रानी ने राजकुमार का चित्र निकालकर देखा । कितना सहास मुख था, कितना तपस्वी स्वरूप, कितनी सुधामयी छवि !

    रानी एक अारामकुरसी पर लेटकर सोचने लगी-यह चित्र न जाने क्यों मेरे चित्त को इतने जोर से खींच रहा है। मेरा चित्त कभी इतना चंचल न हुआ था । इसी अल-चम में और भी कई चित्र हैं, जो इससे कहीं सुन्दर हैं, लेकिन उन नवयुवकों को मैंने कठपुतलियों की तरह नचाकर छोड़ा। यह एक ऐसा चित्र है, जो मेरे हृदय में भूली हुई बातों को याद दिला रहा है, जिसके सामने ताकते हुए मुझे लज्जा-मी अाती है !

    रानी ने घड़ी की ओर अातुर नेत्रों से देखा । ६ वन रहे थे । अब वह लेटी न रह सको सँभलकर उठी; अालमारी में से एक शीशी निकाली। उसमें से कई वू दे एक प्याली में डाली और आँखें बन्द करके पी गयी । इसका चमत्कारिक अगर हुया, मानो कोई कुम्हलाया हुआ फूल ताजा हो जाय; कोई सूखी पत्ती हरी हो जाय । उनके मुख-मण्डल पर अामा दौड़ गयी। आँखों में चंचल सजीवता का विकास हो गया, शरीर में नये रक्त का प्रवाह-सा होने लगा। उन्होंने फिर आईने की ओर देखा और उनके अधरों पर एक मृदुल हास्य की झलक दिखाई दी। उनके उठने की अाहट पाकर लौंडी कमरे में आकर खड़ी हो गयी । यह उनकी नाइन थी। गुजराती नाम था।

    रानी-समय बहुत थोड़ा है, जल्दी कर ।

    गुजराती-रानियों को कैसी जल्दी | जिसे मिलना होगा, वह स्वय पायेगा और बैठा रहेगा।

    रानी-महीं, आज ऐसा ही अवसर है।

    नाइन बड़ी निपुण थी, तुरन्त शृगारदान खोलकर बैठ गयी और रानी का शृगार करने लगी, मानों कोई चित्रकार तसवीर में रंग भर रहा हो । बाघ घटा भी न गुजरा था कि उसने रानी के केश गुथकर नागिन की सी लटें डाल दी । कपोलों पर एक ऐसा रंग भरा कि झुरियाँ गायब हो गयी और मुख पर मनोहर आभा झलकने लगी। ऐसा मालूम होने लगा, मानो कोई सुन्दरी युवती सोकर उठी है। वही अलसाया हुश्रा अग था, वही मतवाली आँखें । रानी ने आईने को श्रोर देखा और प्रसन्न होकर बोलीं— गुजराती, तेरे हाथ में कोई जादू है। मै तुझे अपने साथ स्वर्ग में ले चलूँगी । वहाँ तो देवता लोग होंगे, तेरी मदद की और भी जरूरत होगी।

    गुजराती-आप कमी इनाम तो देती नहीं। बस, बखान करके रह जाती है !

    रानी-अच्छा, बता क्या लेगी ?

    गुजराती-मै लुंगी, तो वही लूँगी, जो कई बार माँग चुकी हूँ। रुपए-पैसे लेकर मुझे क्या करना है!

    यह एक दीवारगीर पर रखी हुई मदन की छोटो-सी मूर्ति थी। चतुर मूर्तिकार ने इस पर कुछ ऐसी कारीगरी की थी जिससे कि दिन के साथ उसका भी रंग बदलता रहता था।

    गुजराती-अच्छा, तो न दीजिए, लेकिन फिर मुझसे कभी न पूछिएगा कि क्या लेगी?

    रानी-क्या मुझसे नाराज हो गयी ? (चौंककर) वह रोशनी दिखायी दी | कुवर साहब श्रा गये ! मैं झूला-घर में जाती हूँ। वहीं लाना।

    यह कहकर रानी ने फिर वही शीशी निकाली और दुगुनी मात्रा में दवा पीकर झूला घर की ओर चलीं। यह एक विशाल भवन था, बहुत ऊँचा और इतना लम्बा-चौड़ा कि झूले पर बैठकर खूब पैग ली जा सकती थी। रेशम को डोरियों में पड़ा हुआ एक पटरा छत से लटक रहा था पर चित्रकारो ने ऐसी कारीगरी की थी कि मालूम होता था, किसी वृक्ष को डाल में पड़ा हुआ है। पौधों, झाड़ियों और लताओं ने उसे यमुना तट का कुब्ज-सा बना दिया था। कई हिरन और मोर इधर-उधर विचरा करते थे। रात का उस भवन में पहुँचकर सहसा यह ज्ञान न होता था कि यह कोई भवन है। पानी का रिमझिम बरसना, ऊपर से हल्की-हल्की फुहारों का पड़ना, हौल में जल यक्षियों का क्रीड़ा करना~यह सब किसी उपवन की शोभा दरसाता था। रानी झूले की डोरी पकड़कर खड़ी हो गयीं और एक हिरन के बच्चे को बुलाकर उसका मुंह सहलाने लगीं। सहसा कदमों की आहट हुई। रानी मेहमान का स्वागत करने के लिए द्वार पर आयीं पर यह राजकुमार न थे, मनोरमा थी। रानी को कुछ निराशा तो हुई; किन्तु मनोरमा भी आज के अभिनय की पात्री थी। उन्होंने उसे बुलवा भेजा था।

  • कुछ विचार

    कुछ विचार

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    कुछ विचार
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    उपन्यास

    उपन्यास की परिभाषा विद्वानों ने कई प्रकार से की है, लेकिन यह क़ायदा है कि जो चीज़ जितनी ही सरल होती है, उसकी परिभाषा उतनी ही मुश्किल होती है। कविता की परिभाषा आज तक नहीं हो सकी। जितने विद्वान हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं। किन्हीं दो विद्वानों की रायें नहीं मिलतीं। उपन्यास के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। इसकी कोई ऐसो परिभाषा नहीं हैं जिस पर सभी लोग सहमत हों।

    मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र-मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।

    किन्हीं भी दो आदमियों की सूरतें नहीं मिलतीं, उसी भाँति आद- मियों के चरित्र भी नहीं मिलते। जैसे सब आदमियों के हाथ, पाँव, आँखें, कान, नाक, मुँह होते हैं––पर उतनी समानता पर भी जिस तरह उनमें विभिन्नता मौजूद रहती है, उसी भाँति, सब आदमियों के चरित्र में भी बहुत कुछ समानता होते हुए कुछ विभिन्नताएँ होती हैं। यही चरित्र-सम्बन्धी समानता और विभिन्नता––अभिन्नत्व में भिन्नत्व और विभिन्नत्व में अभिन्नत्व, दिखाना उपन्यास का मुख्य कर्तव्य है।

    सन्तान-प्रेम मानव-चरित्र का एक व्यापक गुण है। ऐसा कौन प्राणी होगा जिसे अपनी सन्तान प्यारी न हो। लेकिन इस सन्तान-प्रेम की मात्राएँ हैं––उसके भेद हैं। कोई तो सन्तान के लिए मर मिटता है, उसके लिए कुछ छोड़ जाने के लिए आप नाना प्रकार के कष्ट झेलता है, लेकिन, धर्म-भीरुता के कारण अनुचित रीति से धन-संचय नहीं करता; उसे शंका होती है कि कहीं इसका परिणाम हमारी सन्तान के लिए बुरा न हो। कोई ऐसा होता है कि औचित्य का लेश-मात्र भी

    विचार नहीं करता––जिस तरह भी हो कुछ धन संचय कर जाना अपना ध्येय समझता है, चाहे इसके लिए उसे दूसरों का गला ही क्यों न काटना पड़े––वह सन्तान-प्रेम पर अपनी आत्मा को भी बलिदान कर देता है। एक तीसरा सन्तान-प्रेम वह है जहाँ सन्तान का चरित्र प्रधान कारण होता है––जब कि पिता सन्तान का कुचरित्र देखकर उससे उदासीन हो जाता है––उसके लिये कुछ छोड़ जाना या कर जाना व्यर्थ समझता है। अगर आप विचार करेंगे तो इसी सन्तान-प्रेम के अगणित भेद आपको मिलेंगे। इसी भाँति अन्य मानव-गुणों की भी मात्राएँ और भेद हैं। हमारा चरित्राध्ययन जितना ही सूक्ष्म––जितना ही विस्तृत होगा, उतनी सफलता से हम चरित्रों का चित्रण कर सकेंगे। सन्तान-प्रेम की एक दशा यह भी है जब पुत्र को कुमार्ग पर चलते देख कर पिता उसका घातक शत्रु हो जाता है। वह भी सन्तान-प्रेम ही है जब पिता के लिए पुत्र घी का लड्डू होता है, जिसका टेढ़ापन उसके स्वाद में बाधक नहीं होता। वह सन्तान-प्रेम भी देखने में आता है जहाँ शराबी, जुआरी पिता पुत्र-प्रेम के वशीभूत होकर ये सारी बुरी आदतें छोड़ देता है।

    अब यहाँ प्रश्न होता है उपन्यासकार को इन चरित्रों का अध्ययन करके उनको पाठक के सामने रख देना चाहिए––उसमें अपनी तरफ़ से काट-छाँट, कमी वेशी कुछ न करनी चाहिए, या किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये चरित्रों में कुछ परिवर्तन भी कर देना चाहिए?

    यहीं से उपन्यासों के दो गरोह हो गये हैं। एक आदर्शवादी, दूसरा यथार्थवादी।

    यथार्थवादी चरित्रों को पाठक के सामने उनके यथार्थ नग्न रूप में रख देता है। उसे इससे कुछ मतलब नहीं कि सच्चरित्रता का परिणाम बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा––उसके चरित्र अपनी कमज़ोरियाँ या ख़ुबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन-लीला समाप्त करते हैं। संसार में सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नहीं होता; बल्कि इसके विपरीत हुआ करता है––नेक आदमी धक्के खाते हैं, यातनाएँ सहते हैं, मुसीबतें झेलते हैं, अपमानित होते हैं,––उनको नेकी का फल उलटा मिलता है, बुरे आदमी चैन करते हैं, नामवर होते हैं, यशस्वी बनते हैं––उनको बदी का फल उलटा मिलता है। (प्रकृति का नियम विचित्र है!) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियों में जकड़ा होता है और चूँकि संसार में बुरे चरित्रों की ही प्रधानता है––यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र में भी कुछ न कुछ दाग़-धब्बे रहते हैं, इसलिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नज़र आने लगती है।

    इसमें सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिये यथार्थवाद अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं काला दिखायें जितना वह वास्तव में है। लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है। फिर मानव-स्वभाव की एक विशेषता यह भी है कि वह जिस छल और क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे संसार में उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले––वह भूल जाय कि मैं चिन्ताओं के बंधन में पड़ा हुआ हूँ; जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हों; जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल में ख्याल होता है कि जब हमें क़िस्से-कहानियों में भी उन्हीं लोगों से साबक़ा है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़े ही क्यों?

    अँधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा होती है कि किसी बाग़ में निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का आनंद उठायें।––इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते हैं, जो स्वार्थ और वासना से रहित होते हैं, जो साधु प्रकृति के होते हैं। यद्यपि ऐसे चरित्र व्यवहार-कुशल नहीं होते, उनकी सरलता उन्हें सांसारिक विषयों में धोखा देती है; लेकिन काँइएपन से ऊबे हुए प्राणियों को ऐसे सरल, ऐसे व्यावहारिक ज्ञान-विहीन चरित्रों के दर्शन से एक विशेष आनंद होता है।

    यथार्थवाद यदि हमारी आँखें खोल देता है,तो आदर्शवाद हमें उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुँचा देता है। लेकिन जहाँ आदर्शवाद में यह गुण है, वहाँ इस बात की भी शंका है कि हम ऐसे चरित्रों को न चित्रित कर बैठें जो सिद्धांतों की मूर्तिमात्र हो––जिनमें जीवन न हो। किसी देवता की कामना करना मुश्किल नहीं है, लेकिन उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।

    इसलिए वही उपन्यास उच्च कोटि के समझे जाते हैं, जहाँ यथार्थ और आदर्श का समावेश हो गया हो। उसे आप 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' कह सकते हैं। आदर्श को सजीव बनाने ही के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिये और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है। उपन्यासकार की सबसे बड़ी विभूति ऐसे चरित्रों की सृष्टि है, जो अपने सद्व्यवहार और सद्विचार से पाठक को मोहित कर ले। जिस उपन्यास के चरित्रों में यह गुण नहीं है वह दो कौड़ी का है।

    चरित्र को उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि वह निर्दोष हो––महान् से महान् पुरुषों में भी कुछ न कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं––चरित्र को सजीव बनाने के लिए उसकी कमज़ोरियों का दिग्दर्शन कराने से कोई हानि नहीं होती। बल्कि यही कमज़ोरियाँ उस चरित्र को मनुष्य बना देतो हैं। निर्दोष चरित्र तो देवता हो जायगा और हम उसे समझ ही न सकेंगे। ऐसे चरित्र का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। हमारे प्राचीन साहित्य पर आदर्श की छाप

    लगी हुई है। वह केवल मनोरंजन के लिए न था। उसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ आत्मपरिष्कार भी था। साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसख़रों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है।—कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिये। इस मनोरथ को सिद्ध करने के लिए ज़रूरत है कि उसके चरित्र positive हों, जो, प्रलोभनों के आगे सिर न झुकायें; बल्कि उनको परास्त करें; जो वासनाओं के पंजे में न फँसे; बल्कि उनका दमन करे; जो किसी विजयी सेनापति की भाँति शत्रुओं का संहार करके विजय-नाद करते हुए निकले। ऐसे ही चरित्रों का हमारे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

    साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाय। 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलम्बित हो; ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और विराग, दुःख और लज्जा––ये सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं, इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती।

    जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आज-कल परिस्थितियाँ इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नये-नये विचार पैदा हो रहे हैं, कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख ही नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियों का असर न पड़े—वह उनसे आन्दोलित न हो। यही कारण है कि आजकल भारतवर्ष के ही नहीं, यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान् भी अपनी रचना द्वारा किसी 'वाद' का प्रचार कर रहे हैं। वे इसकी परवा नहीं करते कि इससे हमारी रचना जीवित रहेगी या नहीं; अपने मत की पुष्टि करना ही उनका ध्येय है, इसके सिवाय उन्हें कोई इच्छा नहीं। मगर यह क्योंकर मान लिया जाय कि जो उपन्यास किसी विचार के प्रचार के लिए लिखा जाता है, उसका महत्त्व क्षणिक होता है? विक्टर ह्यगो का 'ला मिज़रेबुल', टालस्टाय के अनेक ग्रन्थ, डिकेन्स की कितनी ही रचनाएँ, विचार-प्रधान होते हुए उच्च कोटि की साहित्यिक हैं और अब तक उनका आकर्षण कम नहीं हुआ। आज भी शॉ, वल्स आदि बड़े-बड़े लेखकों के ग्रन्थ प्रचार ही के उद्देश्य से लिखे जा रहे हैं।

    हमारा ख्याल है कि क्यों न कुशल साहित्यकार कोई विचार-प्रधान रचना भी इतनी सुन्दरता से करे जिसमें मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों का संघर्ष निभता रहे? 'कला के लिए कला' का समय वह होता है जब देश सम्पन्न और सुखी हो। जब हम देखते हैं कि हम भाँति-भाँति के राजनीतिक और सामाजिक बंधनों में जकड़े हुए हैं, जिधर निगाह उठती है दुःख और दरिद्रता के भीषण दृश्य दिखाई देते हैं, विपत्ति का करुण क्रंदन सुनाई देता है, तो कैसे संभव है कि किसी विचारशील प्राणी का हृदय न दहल उठे? हाँ, उपन्यासकार को इसका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये कि उसके विचार परोक्ष रूप से व्यक्त हों, उपन्यास की स्वाभाविकता में उस विचार के समावेश से कोई विघ्न न पड़ने पाये; अन्यथा उपन्यास नीरस हो जायगा।

    डिफेंस इंग्लैंड का बहुत प्रसिद्ध उपन्यासकार हो चुका है। 'पिकविक पेपर्स' उसकी एक अमर हास्य-रस-प्रधान रचना है। 'पिकविक' का नाम एक शिकरम गाड़ी के मुसाफिरों की ज़ुबान से डिकेंस के कान में आया। बस, नाम के अनुरूप ही चरित्र, आकार, वेष—सबकी रचना हो गई। 'साइलस मार्नर' भी अँगरेज़ी का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। जार्ज इलियट ने, जो इसकी लेखिका हैं, लिखा है कि अपने बचपन में उन्होंने एक फेरी लगानेवाले जुलाहे को पीठ पर कपड़े के थान लादे हुए कई बार देखा था। वह तसवीर उनके हृदय-पट पर अङ्कित हो गई थी और समय पर इस उपन्यास के रूप में प्रकट हुई। 'स्कारलेट लेटर' भी हॅथर्न की बहुत ही सुंदर, मर्मस्पर्शिनी रचना है। इस पुस्तक का बीजांकुर उन्हें एक पुराने मुकदमे की मिसिल से मिला। भारतवर्ष में अभी उपन्यासकारों के जीवन-चरित्र लिखे नहीं गये, इसलिए भारतीय उपन्यास-साहित्य से कोई उदाहरण देना कठिन है। 'रङ्गभूमि' का बीजांकुर हमें एक अंधे भिखारी से मिला जो हमारे गाँव में रहता था। एक ज़रा-सा इशारा, एक ज़रा-सा बीज, लेखक के मस्तिष्क में पहुँचकर इतना विशाल वृक्ष बन जाता है कि लोग उस पर आश्चर्य करने लगते हैं। 'एम॰ ऐंड्रूज हिम' रडयार्ड किपलिंग की एक उत्कृष्ट काव्य-रचना है। किपलिंग साहब ने अपने एक नोट में लिखा है कि एक दिन एक इञ्जीनियर साहब ने रात को अपनी जीवन-कथा सुनाई थी। वही उस काव्य का आधार थी। एक और प्रसिद्ध उपन्यासकार का कथन है कि उसे अपने उपन्यासों के चरित्र अपने पड़ोसियों में मिले। वह घण्टों अपनी खिड़की के सामने बैठे लोगों को आते-जाते सूक्ष्म दृष्टि से देखा करते और उनकी बातों को ध्यान से सुना करते थे। 'जेन आयर' भी उपन्यास के प्रेमियों ने अवश्य पढ़ी होगी। दो लेखिकाओं में इस विषय पर बहस हो रही थी कि उपन्यास की नायिका रूपवती होनी चाहिये या नहीं। 'जेन आयर' की लेखिका ने कहा, 'मैं ऐसा उपन्यास लिखूँगी जिसकी नायिका रूपवती न होते हुए भी आकर्षक होगी।' इसका फल था 'जेन आयर।'

    बहुधा लेखकों को पुस्तकों से अपनी रचनाओं के लिए अंकुर मिल जाते हैं। हाल केन का नाम पाठकों ने सुना है। आपकी एक उत्तम रचना का हिन्दी अनुवाद हाल ही में 'अमरपुरी' के नाम से हुआ है। आप लिखते हैं कि मुझे बाइबिल से प्लाट मिलते हैं। 'मेटरलिंक' बेलजियम के जगद्विख्यात नाटककार हैं। उन्हें बेलजियम का शेक्सपियर कहते हैं। उनका 'मोमाबोन' नामक ड्रामा ब्राउनिंग की एक कविता से प्रेरित हुआ था और 'मेरी मैगडालीन' एक जर्मन ड्रामा से! शेक्सपियर के नाटकों का मूल स्थान खोज-खोजकर कितने ही विद्वानों ने 'डाक्टर' की उपाधि प्राप्त कर ली है। कितने वर्तमान औपन्यासिकों और नाटककारों ने शेक्सपियर से सहायता ली है, इसकी खोज करके भी कितने ही लोग 'डाक्टर' बन सकते हैं। 'तिलिस्म होशरुबा' फारसी का एक वृहत् पोथा है जिसके रचयिता अकबर के दरबार वाले फैज़ी कहे जाते हैं, हालाँकि हमें यह मानने में संदेह है। इस पोथे का उर्दू में भी अनुवाद हो गया है। कम से कम २०,००० पृष्ठों की पुस्तक होगी। स्व॰ बाबू देवकीनंदन खत्री ने 'चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता-संतति' का बीजांकुर 'तिलिस्म होशरुबा' से ही लिया होगा, ऐसा अनुमान होता है।

    संसार-साहित्य में कुछ ऐसी कथाएँ हैं जिन पर हज़ारों बरसों से लेखकगण आख्यायिकाएँ लिखते आये हैं और शायद हज़ारों वर्षों तक लिखते जायँगे। हमारी पौराणिक कथाओं पर न जाने कितने नाटक और कितनी कथाएँ रची गई हैं। यूरोप में भी यूनान की पौराणिक गाथा कवि-कल्पना के लिए अशेष आधार है। 'दो भाइयों की कथा', जिसका पता पहले मिश्र देश के तीन हज़ार वर्ष पुराने लेखों से मिला था, फ्रान्स से भारतवर्ष तक की एक दर्जन से अधिक प्रसिद्ध भाषाओं के साहित्य में समाविष्ट हो गई है। यहाँ तक कि बाइबिल में उस कथा की एक घटना ज्यों की त्यों मिलती है।

    किन्तु, यह समझना भूल होगी कि लेखकगण आलस्य या कल्पना-शक्ति के अभाव के कारण प्राचीन कथाओं का उपयोग करते हैं। बात यह है कि नये कथानक में वह रस, वह आकर्षण, नहीं होता जो पुराने कथानकों में पाया जाता है। हाँ, उनका कलेवर नवीन होना चाहिए। 'शकुंतला' पर यदि कोई उपन्यास लिखा जाय, तो वह कितना मर्मस्पर्शी होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं।

    रचना-शक्ति थोड़ी-बहुत सभी प्राणियों में रहती है। जो उसमें अभ्यस्त हो चुके हैं उन्हें तो फिर झिझक नहीं रहती—क़लम उठाया और लिखने लगे; लेकिन नये लेखकों को पहले कुछ लिखते समय ऐसी झिझक होती है मानो वे दरिया में कूदने जा रहे हों। बहुधा एक तुच्छ-सी घटना उनके मस्तिष्क पर प्रेरक का काम कर जाती है। किसीका नाम सुनकर, कोई स्वप्न देखकर, कोई चित्र देखकर, उनकी कल्पना जाग उठती है। किसी व्यक्ति पर किस प्रेरणा का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, यह उस व्यक्ति पर निर्भर है। किसी की कल्पना दृश्य विषयों से उभरती है, किसी की गंध से, किसी की श्रवण से,—किसी की नये, सुरम्य स्थान की सैर से इस विषय में यथेष्ट सहायता मिलती है। नदी के तट पर अकेले भ्रमण करने से बहुधा नई-नई कल्पनाएँ जाग्रत् होती हैं।

    ईश्वरदत्त शक्ति मुख्य वस्तु है। जब तक यह शक्ति न होगी उपदेश, शिक्षा, अभ्यास सभी निष्फल जायगा। मगर यह प्रकट कैसे हो कि किसमें यह शक्ति है, किसमें नहीं? कभी इसका सबूत मिलने में बरसों गुजर जाते हैं और बहुत परिश्रम नष्ट हो जाता है। अमेरिका के एक पत्र-संपादक ने इसकी परीक्षा करने का नया ढंग निकाला है। दल के दल युवकों में से कौन रत्न है और कौन पाषाण? वह एक काग़ज़ के टुकड़े पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम लिख देता है और उम्मेदवार को वह टुकड़ा देकर उस नाम के सम्बंध में ताबड़तोड़ प्रश्न करना शुरू करता है—उसके बालों का रंग क्या है? उसके कपड़े कैसे हैं? कहाँ रहती है? उसका बाप क्या काम करता है? जीवन में उसकी मुख्य अभिलाषा क्या है? आदि। यदि युवक महोदय ने इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर न दिये, तो उन्हें अयोग्य समझकर बिदा कर देता है। जिसकी निरीक्षण-शक्ति इतनी शिथिल हो, वह उसके विचार में उपन्यास-लेखक नहीं बन सकता। इस परीक्षा-विभाग में नवीनता तो अवश्य है; पर भ्रामकता की मात्रा भी कम नहीं है।

    लेखकों इन लिए एक नोटबुक का रहना बहुत आवश्यक है। यद्यपि इन पंक्तियों के लेखक ने कभी नोटबुक नहीं रखी; पर इसकी ज़रूरत को वह स्वीकार करता है। कोई नई चीज़, कोई अनोखी सूरत, कोई सुरम्य दृश्य देखकर नोटबुक में दर्ज कर लेने से बड़ा काम निकलता यूरोप में लेखकों के पास उस वक्त तक नोटबुक अवश्य रहती है

    जब तक उनका मस्तिष्क इस योग्य नहीं बनता कि हर एक प्रकार की चीज़ों को वे अलग-अलग ख़ानों में संगृहीत कर लें। बरसों के अभ्यास के बाद यह योग्यता प्राप्त हो जाती है इसमें सन्देह नहीं; लेकिन आरम्भकाल में तो नोटबुक का रखना परमावश्यक है। यदि लेखक चाहता है कि उसके दृश्य सजीव हों, उसके वर्णन स्वाभाविक हों, तो उसे अनिवार्यतः इससे काम लेना पड़ेगा। देेखिये, एक उपन्यासकार की नोटबुक का नमूना—

    'अगस्त २१, १२ बजे दिन, एक नौका पर एक आदमी, श्याम वर्ण, सुफेद बाल, आँखें तिरछी, पलकें भारी, ओठ ऊपर को उठे हुए और मोटे, मूँछे ऐंठी हुईं।

    'सितम्बर १, समुद्र का दृश्य, बादल श्याम और श्वेत, पानी में सूर्य का प्रतिविम्ब काला, हरा, चमकीला; लहरें फेनदार, उनका ऊपरी भाग उजला। लहरों का शोर, लहरों के छींटे से झाग उड़ती हुई।'

    उन्हीं महाशय से जब पूछा गया कि आपको कहानियों के प्लाट कहाँ मिलते हैं? तो आपने कहा, 'चारों तरफ।—अगर लेखक अपनी आँखें खुली रखे, तो उसे हवा में से भी कहानियाँ मिल सकती हैं। रेलगाड़ी में, नौकाओं पर, समाचार-पत्रों में, मनुष्य के वार्तालाप में और हज़ारों जगहों से सुन्दर कहानियाँ बनाई जा सकती हैं। कई सालों के अभ्यास के बाद देख-भाल स्वाभाविक हो जाती है, निगाह आप ही आप अपने मतलब की बात छाँट लेती है। दो साल हुए, मैं एक मित्र के साथ सैर करने गया। बातों ही बातों में यह चर्चा छिड़ गई कि यदि दो के सिवा संसार के और सब मनुष्य मार डाले जायँ तो क्या हो? इस अंकुर से मैंने कई सुन्दर कहानियाँ सोच निकाली।'

    इस विषय में तो उपन्यास-कला के सभी विशारद सहमत हैं कि उपन्यासों के लिए पुस्तकों से मसाला न लेकर जीवन ही से लेना चाहिये। वालटर बेसेंट अपनी 'उपन्यास-कला' नामक पुस्तक में लिखते हैं—

    'उपन्यासकार को अपनी सामग्री, आले पर रखी हुई पुस्तकों से

    नहीं, उन मनुष्यों के जीवन से लेनी चाहिए जो उसे नित्य ही चारों तरफ मिलते रहते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकांश लोग अपनी आँखों से काम नहीं लेते। कुछ लोगों को यह शंका भी होती है कि मनुष्यों में जितने अच्छे नमूने थे वे तो पूर्वकालीन लेखकों ने लिख डाले, अब हमारे लिए क्या बाक़ी रहा? यह सत्य है; लेकिन अगर पहले किसी ने बूढ़े कंजूस, उड़ाऊ युवक, जुआरी, शराबी, रंगीन युवती आदि का चित्रण किया है, तो क्या अब उसी वर्ग के दूसरे चरित्र नहीं मिल सकते? पुस्तकों में नये चरित्र न मिलें; पर जीवन में नवीनता का अभाव कभी नहीं रहा।'

    हेनरी जेम्स ने इस विषय में जो विचार प्रकट किये हैं, वह भी देखिये—

    'अगर किसी लेखक की बुद्धि कल्पना-कुशल है तो वह सूक्ष्मतम भावों से जीवन को व्यक्त कर देती है, वह वायु के स्पंदन को भी जीवन प्रदान कर सकती है। लेकिन कल्पना के लिए कुछ आधार अवश्य चाहिये। जिस तरुणी लेखिका ने कभी सैनिक छावनियाँ नहीं देखीं उससे यह कहने में कुछ भी अनौचित्य नहीं है कि आप सैनिक जीवन में हाथ न डालें। मैं एक अँग्रेज़ उपन्यासकार को जानता हूँ जिसने अपनी एक कहानी में फ्रान्स के प्रोटेस्टेंट युवकों के जीवन का अच्छा चित्र खींचा था। उस पर साहित्यिक संसार में बड़ी चर्चा रही। उससे लोगों ने पूछा—आपको इन समाज के निरीक्षण करने का ऐसा अवसर कहाँ मिला? (फ्रान्स रोमन कैथोलिक देश है और प्रोटेस्टेंट वहाँ साधारणतः नहीं दिखाई पड़ते।) मालूम हुआ कि उसने एक बार, केवल एक बार, कई प्रोटेस्टेंट युवकों को बैठे और बातें करते देखा था। बस, एक बार का देखना उसके लिए पारस हो गया। उसे वह आधार मिल गया जिस पर कल्पना अपना विशाल भवन निर्माण था ती है। उसमें वह ईश्वरदत्त शक्ति मौजूद थी जो एक इञ्च से एक योजन की ख़बर लाती है और जो शिल्पी के लिए बड़े महत्त्व की वस्तु है।'

    मिस्टर जी॰ के॰ चेस्टरटन जासूसी कहानियाँ लिखने में बड़े प्रवीण

    हैं। आपने ऐसी कहानियाँ लिखने का जो नियम बताया है वह बहुत शिक्षाप्रद है। हम उसका आशय लिखते हैं—

    'कहानी में जो रहस्य हो उसे कई भागों में बाँटना चाहिये। पहले छोटी-सी बात खुले, फिर उससे कुछ बड़ी और अंत में रहस्य खुल जाय। लेकिन हरएक भाग में कुछ न कुछ रहस्योंद्धाटन अवश्य होना चाहिये जिसमें पाठक की इच्छा सब-कुछ जानने के लिए बलवती होती चली जाय। इस प्रकार की कहानियों में इस बात का ध्यान रखना परमावश्यक है कि कहानी के अंत में रहस्य खोलने के लिए कोई नया चरित्र न लाया जाय। जासूसी कहानियों में यही सबसे बड़ा दोष है। रहस्य के खुलने में तभी मज़ा है जब कि वही चरित्र अपराधी सिद्ध हो जिस पर कोई भूलकर भी सन्देह न कर सकता था।'

    उपन्यास-कला में यह बात भी बड़े महत्त्व की है कि लेखक क्या लिखे और क्या छोड़ दे। पाठक कल्पनाशील होता है। इसलिए वह ऐसी बातें पढ़ना पसन्द नहीं करता जिनकी वह आसानी से कल्पना कर सकता है। वह यह नहीं चाहता कि लेखक सब-कुछ ख़ुद कह डाले और पाठक की कल्पना के लिए कुछ भी बाक़ी न छोड़े। वह कहानी का ख़ाका-मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल लेखक वही है जो यह अनुमान कर ले कि कौन-सी बात पाठक स्वयं सोच लेगा और कौन-सी बात उसे लिखकर स्पष्ट कर देनी चाहिये। कहानी या उपन्यास में पाठक की कल्पना के लिए जितनी ही अधिक सामग्री हो उतनी ही वह कहानी रोचक होगी। यदि लेखक आवश्यकता से कम बतलाता है तो कहानी आशयहीन हो जाती है, ज़्यादा बतलाता है तो कहानी में मज़ा नहीं आता। किसी चरित्र की रूपरेखा या किसी दृश्य को चित्रित करते समय हुलिया-नवीसी करने की ज़रूरत नहीं। दो-चार वाक्यों में मुख्य-मुख्य बातें कह देनी चाहियें। किसी दृश्य को तुरत देखकर उसका वर्णन करने से बहुत-सी अनावश्यक बातों के आ जाने की सम्भावना रहती है। कुछ दिनों के बाद अनावश्यक बातें आप ही आप मस्तिष्क से निकल जाती हैं, केवल मुख्य बातें स्मृति पर अंकित रह जाती हैं। तब उस दृश्य के वर्णन करने में अनावश्यक बातें न रहेंगी। आवश्यक और अनावश्यक कथन का एक उदाहरण देकर हम अपना आशय और स्पष्ट करना चाहते हैं—

    दो मित्र संध्या समय मिलते हैं। सुविधा के लिए हम उन्हें 'राम' और 'श्याम' कहेंगे।

    राम—गुड ईवनिंग श्याम, कहो आनन्द तो है?

    श्याम—हलो राम, तुम आज किधर भूल पड़े?

    राम—कहो क्या रङ्ग-ढंग है? तुम तो भले ईद के चाँद हो गये।

    श्याम—मैं तो ईद का चाँद न था, हाँ, आप गूलर के फूल भले ही हो गये।

    राम—चलते हो संगीतालय की तरफ?

    श्याम—हाँ चलो।

    लेखक यदि ऐसे बच्चों के लिए कहानी नहीं लिख रहा है जिन्हें अभिवादन की मोटी-मोटी बातें बताना ही उसका ध्येय है तो वह केवल इतना ही लिख देगा—

    'अभिवादन के पश्चात् दोनों मित्रों ने संगीतालय की राह ली।'

    उपन्यास का विषय

    उपन्यास का क्षेत्र, अपने विषय के लिहाज़ से, दूसरी ललित कलाओं से कही ज़्यादा विस्तृत है। 'वाल्टर बेसेंट' ने इस विषय पर शब्दों में विचार प्रकट किये हैं—

    'उपन्यास के विषय का विस्तार मानव-चरित्र से किसी क़दर कम नहीं है। उसका सम्बन्ध अपने चरित्रों के कर्म और विचार, उनका देवत्व और पशुत्व, उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से है। मनोभाव के विभिन्न रूप और भिन्न-भिन्न दशाओं में उनका विकास उपन्यास के मुख्य विषय हैं।'

    इसी विषय-विस्तार ने उपन्यास को संसार-साहित्य का प्रधान अंग बना दिया है। अगर आपको इतिहास से प्रेम है तो आप अपने उपन्यास में गहरे से गहरे ऐतिहासिक तत्त्वों का निरूपण कर सकते हैं। अगर आपको दर्शन से रुचि है, तो आप उपन्सास में महान दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन कर सकते हैं। अगर आप में कवित्व-शक्ति है तो उपन्यास में उसके लिए भी काफी गुञ्जाइश है। समाज, नीति, विज्ञान, पुरातत्त्व आदि सभी विषयों के लिए उपन्यास में स्थान है। यहाँ लेखक को अपनी क़लम का जौहर दिखाने का जितना अवसर मिल सकता है, उतना साहित्य के और किसी अंग में नहीं मिल सकता; लेकिन इसका यह आशय नहीं कि उपन्यासकार के लिए कोई बन्धन ही नहीं है। उपन्यास का विषय-विस्तार ही उपन्यासकार को बेड़ियों में जकड़ देता है। तंग सड़कों पर चलनेवालों के लिए अपने लक्ष्य पर पहुँचना उतना कठिन नहीं है, जितना एक लम्बे-चौड़े मार्गहीन मैदान में चलनेवालों के लिए।

    उपन्यासकार का प्रधान गुण उसकी सृजन-शक्ति है। अगर उसमें इसका अभाव है, तो वह अपने काम में भी सफल नहीं हो सकता। उसमें और चाहे जितने अभाव हों; पर कल्पना-शक्ति की प्रखरता अनिवार्य है। अगर उसमें यह शक्ति मौजूद है तो वह ऐसे कितने दृश्यों, दशाओं और मनोभावों का चित्रण कर सकता है जिनका उसे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। अगर इस शक्ति की कमी है, तो चाहे उसने कितना ही देशाटन क्यों न किया हो, वह कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसके अनुभव का क्षेत्र कितना ही विस्तृत क्यों न हो, उसकी रचना में सरसता नहीं आ सकती। ऐसे कितने ही लेखक हैं जिनमें मानव-चरित्र के रहस्यों का बहुत मनोरंजक सूक्ष्म और प्रभाव डालनेवाली शैली में बयान करने की शक्ति मौजूद है; लेकिन कल्पना की कमी के कारण वे अपने चरित्रों में जीवन का संचार नहीं कर सकते, जीती-जागती तसवीरें नहीं खींच सकते। उनकी रचनाओं को पढ़कर हमें यह ख्याल नहीं होता कि हम कोई सच्ची घटना देख रहे हैं।

    इसमें सन्देह नहीं कि उपन्यास की रचना-शैली सजीव और प्रभावोत्पादक होनी चाहिये; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम शब्दों का गोरखधन्धा रचकर पाठक को इस भ्रम में डाल दें कि इसमें ज़रूर कोई न कोई गूढ़ आशय है। जिस तरह किसी आदमी का ठाट-बाट देखकर हम उसकी वास्तविक स्थिति के विषय में ग़लत राय क़ायम कर लिया करते हैं, उसी तरह उपन्यासों के शाब्दिक आडम्बर देखकर भी हम ख़्याल करने लगते हैं कि कोई महत्त्व की बात छिपी हुई है। सम्भव है, ऐसे लेखक को थोड़ी देर के लिए यश मिल जाय; किन्तु जनता उन्हीं उपन्यासों को आदर का स्थान देती है जिनकी विशेषता उनकी गूढ़ता नहीं, उनकी सरलता होती है।

    उपन्यासकार को इसका अधिकार है कि वह अपनी कथा को घटना-वैचित्र्य से रोचक बनाये; लेकिन शर्त यह है कि प्रत्येक घटना असली ढाँचे से निकट सम्बन्ध रखती हो; इतना ही नहीं, बल्कि उसमें इस तरह घुल-मिल गई हो कि कथा का आवश्यक अंग बन जाय, अन्यथा उपन्यास की दशा उस घर की-सी हो जायगी जिसके हरएक हिस्से अलग-अलग हों। जब लेखक अपने मुख्य विषय से हटकर किसी दूसरे प्रश्न पर बहस करने लगता है तो वह पाठक के उस आनन्द में बाधक हो जाता है जो उसे कथा में आ रहा था। उपन्यास में वही घटनाएँ, वही विचार, लाना चाहिये जिनसे कथा का माधुर्य बढ़ जाय, जो प्लाट के विकास में सहायक हों अथवा चरित्रों के गुप्त मनोभावों का प्रदर्शन करते हों पुरानी कथाओं में लेखक का उद्देश्य घटना-वैचित्र्य दिखाना होता था; इसलिए वह एक कथा में कई उपकथाएँ मिलाकर अपना उद्देश्य पूरा करता था। साम्प्रतकालीन उपन्यासों में लेखक का उद्देश्य मनोभावों और चरित्र के रहस्यों का खोलना होता है; अतएव यह आवश्यक है कि वह अपने चरित्रों को सूक्ष्म दृष्टि से देखे, उसके चरित्रों का कोई भाग उसकी निगाह से न बचने पाये। ऐसे उपन्यास मै उपकथाओं की गुञ्जाइश नहीं होती।

    यह सच है कि संसार की प्रत्येक वस्तु उपन्यास का उपयुक्त विषय बन सकती है। प्रकृति का प्रत्येक रहस्य, मानव-जीवन का हरएक पहलू, जब किसी सुयोग्य लेखक की कलम से निकलता है तो वह साहित्य का रत्न बन जाता है। लेकिन इसके साथ ही विषय का महत्त्व और उसकी गहराई भी उपन्यास के सफल होने में बहुत सहायक होती है। यह ज़रूरी नहीं कि हमारे चरित्रनायक ऊँची श्रेणी के ही मनुष्य हों। हर्ष और शोक, प्रेम और अनुराग, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य-मात्र में व्यापक हैं। हमें केवल हृदय के उन तारों पर चोट लगानी चाहिये जिनकी झंकार से पाठकों के हृदय पर भी वैसा ही प्रभाव हो। सफल उपन्यासकार का सबसे बड़ा लक्षण है कि वह अपने पाठकों के हृदय में उन्हीं भावों को जागरित कर दे जो उसके पात्रों में हो। पाठक भूल जाय कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा है—उसके और पात्रों के बीच में आत्मीयता का भाव उत्पन्न हो जाय।

    मनुष्य की सहानुभूति साधारण स्थिति में तब तक जागरित नहीं होती जब तक कि उसके लिए उस पर विशेष रूप से आघात किया जाय। हमारे हृदय के अंतरतम भाव साधारण दशाओं में आन्दोलित नहीं होते। इसके लिए ऐसी घटनाओं की कल्पना करनी होती है जो हमारा दिल हिला दे, जो हमारे भावों की गहराई तक पहुँच जायँ। अगर किसी अबला की पराधीन दशा का अनुभव कराना हो तो इस घटना से ज़्यादा प्रभाव डालनेवाली और कौन घटना हो सकती है कि शकुन्तला राजा दुष्यंत के दरबार में आकर खड़ी होती है और राजा उसे न पहचानकर उसकी उपेक्षा करता है? खेद है कि आजकल के उपन्यासों में गहरे भावों को स्पर्श करने का बहुत कम मसाला रहता है। अधिकांश उपन्यास गहरे और प्रचण्ड भावों का प्रदर्शन नहीं करते। हम आये-दिन की साधारण बातों ही में उलझकर रह जाते हैं।

    इस विषय में अभी तक मतभेद है कि उपन्यास में मानवीय दुर्बलताओं और कुवासनाओं का, कमज़ोरियों और अपकीर्तियों का, विशद वर्णन वांछनीय है या नहीं; मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि जो लेखक अपने को इन्हीं विषयों में बाँध लेता है वह कभी उस कलाविद् की महानता को नहीं पा सकता जो जीवन-संग्राम में एक मनुष्य की आंतरिक दशा को, सत् और असत् के संघर्ष और अंत में सत्य की विजय को, मार्मिक ढंग से दर्शाता है। यथार्थवाद का यह आशय नहीं है कि हम अपनी दृष्टि को अंधकार की ओर ही केन्द्रित कर दें। अंधकार में मनुष्य को अंधकार के सिवा और सूझ ही क्या सकता है? बेशक, चुटकियाँ लेना, यहाँ तक कि नश्तर लगाना, भी कभी-कभी आवश्यक होता है; लेकिन दैहिक व्यथा चाहे नश्तर से दूर हो जाय, मानसिक व्यथा सहानुभूति और उदारता से ही शान्त हो सकती है। किसी को नीच समझकर हम उसे ऊँचा नहीं बना सकते; बल्कि उसे और नीचे गिरा देंगे। कायर यह कहने से बहादुर न हो जायगा कि 'तुम कायर हो।' हमें यह दिखाना पड़ेगा कि उसमें साहस, बल और धैर्य—सब कुछ है, केवल उसे जगाने की ज़रूरत है। साहित्य का सम्बन्ध सत्य और सुंदर से है, यह हमें न भूलना चाहिये।

    मगर आजकल कुकर्म, हत्या, चोरी, डाके से भरे हुए उपन्यासों को जैसे बाढ़-सी आ गई है। साहित्य के इतिहास में ऐसा कोई समय न था जब ऐसे कुरुचिपूर्ण उपन्यासों की इतनी भरमार रही हो। जासूसी के उपन्यासों में क्यों इतना आनंद आता है? क्या इसका कारण यह है कि पहले से अब लोग ज़्यादा पापासक्त हो गये हैं? जिस समय लोगों को यह दावा है कि मानव-समाज नैतिक और बौद्धिक उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ है, यह कौन स्वीकार करेगा कि हमारी समाज पतन की ओर जा रहा है? शायद, इसका यह कारण हो कि इस व्यावसायिक शांति के युग में ऐसी घटनाओं का अभाव हो गया है जो मनुष्य के कुतूहल-प्रेम को संतुष्ट कर सकें––जो उसमें सनसनी पैदा कर दें। या इसका यह कारण हो सकता है कि मनुष्य की धन-लिप्सा उपन्यास के चरित्रों को धन के लोभ से कुकर्म करते देखकर प्रसन्न होती है। ऐसे उपन्यासों में यही तो होता है कि कोई आदमी लोभ-वश किसी धनाढ्य पुरुष की हत्या कर डालता है, या उसे किसी संकट में फँसाकर उससे मनमानी रकम ऐंठ लेता है। फिर जासूस आते हैं, वकील आते हैं और मुजरिम गिरफ्तार होता है, उसे सज़ा मिलती है। ऐसी रुचि को प्रेम, अनुराग या उत्सर्ग की कथाओं में आनंद नहीं आ सकता। भारत में वह व्यावसायिक वृद्धि तो नहीं हुई; लेकिन ऐसे उपन्यासों की भरमार शुरू हो गई। अगर मेरा अनुमान ग़लत नहीं है तो ऐसे उपन्यासों की खपत इस देश में भी अधिक होती है। इस कुरुचि का परिणाम रूसी उपन्यास लेखक मैक्सिम गोर्की के शब्दों में ऐसे वातावरण का पैदा होना है जो कुकर्म की प्रवृत्ति को द्दढ़ करता है। इससे यह तो स्पष्ट ही है कि मनुष्य में पशु-वृत्तियाँ इतनी प्रबल होती जा रही हैं कि अब उसके हृदय में कोमल भावों के लिए स्थान ही नहीं रहा।

    उपन्यास के चरित्रों का चित्रण जितना ही स्पष्ट, गहरा और विकासपूर्ण होगा उतना ही पढ़नेवालों पर उसका असर पड़ेगा; और यह लेखक की रचना-शक्ति पर निर्भर है। जिस तरह किसी मनुष्य को देखते ही हम उसके मनोभावों से परिचित नहीं हो जाते, ज्यों-ज्यों हमारी घनिष्ठता उससे बढ़ती है, त्यों-त्यों उसके मनोरहस्य खुलते हैं, उसी तरह उपन्यास के चरित्र भी लेखक की कल्पना में पूर्ण रूप से नहीं आ जाते; बल्कि उनमें क्रमशः विकास होता जाता है। यह विकास इतने गुप्त—अस्पष्ट रूप से होता है कि पढ़नेवाले को किसी तबदीली का ज्ञान भी नहीं होता। अगर चरित्रों में किसी का विकास रुक जाय तो उसे उपन्यास से निकाल देना चाहिये, क्योंकि उपन्यास चरित्रों के विकास का ही विषय है। अगर उसमें विकास-दोष है, तो वह उपन्यास कमज़ोर हो जायगा। कोई चरित्र अंत में भी वैसा ही रहे जैसा वह पहले था—उसके बल-बुद्धि और भावों का विकास न हो, तो वह असफल चरित्र है।

    इस दृष्टि से जब हम हिन्दी के वर्तमान उपन्यासों को देखते हैं तो निराशा होती है। अधिकांश चरित्र ऐसे ही मिलेंगे जो काम तो बहुतेरे करते हैं; 'लेकिन जैसे जो काम वे आदि में करते, उसी तरह वही अंत में भी करते हैं।

    कोई उपन्यास शुरू करने के लिए यदि हम उन चरित्रों का एक मानसिक चित्र बना लिया करें तो फिर उनका विकास दिखाने में हमें सरलता होगी। यह कहने की भी ज़रूरत नहीं है, विकास परिस्थिति के अनुसार स्वाभाविक हो, अर्थात्—पाठक और लेखक दोनों इस विषय में सहमत हों। अगर पाठक का यह भाव हो कि इस दशा में ऐसा नहीं होना चाहिये था तो इसका यह आशय हो सकता है कि लेखक अपने चरित्र के अङ्कित करने में असफल रहा। चरित्रों में कुछ न कुछ विशेषता भी रहनी चाहिये। जिस तरह संसार में कोई दो व्यक्ति समान नहीं होते, उसी भाँति उपन्यास में भी न होना चाहिये। कुछ लोग तो बातचीत या शक्ल-सूरत से विशेषता उत्पन्न कर देते हैं; लेकिन असली अंतर तो वह है, जो चरित्रों में हो।

    उपन्यास में वार्तालाप जितना अधिक हो और लेखक की क़लम से जितना ही कम लिखा जाय, उतना ही उपन्यास सुंदर होगा। वार्तालाप केवल रस्मी नहीं होना चाहिये। प्रत्येक वाक्य को—जो किसी चरित्र के मुँह से निकले—उसके मनोभावों और चरित्र पर कुछ न कुछ प्रकाश डालना चाहिये। बातचीत का स्वाभाविक, परिस्थितियों के अनुकूल, सरल और सूक्ष्म होना ज़रूरी है। हमारे उपन्यासों में अकसर बातचीत भी उसी शैली में कराई जाती है मानो लेखक खुद लिख रहा हो। शिक्षित-समाज की भाषा तो सर्वत्र एक है, हाँ भिन्न-भिन्न जातियों की ज़ुबान पर उसका रूप कुछ न कुछ बदल जाता है। बंगाली, मारवाड़ी और ऐंग्लो इण्डियन भी कभी-कभी बहुत शुद्ध हिन्दी बोलते पाये जाते हैं; लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं; पर ग्रामीण बातचीत कभी-कभी हमें दुबिधा में डाल देती है। बिहार की ग्रामीण भाषा शायद दिल्ली के आसपास का आदमी समझ ही न सकेगा।

    वास्तव में कोई रचना रचयिता के मनोभावों का, उसके चरित्र का, उसके जीवनादर्श का, उसके दर्शन का आईना होती है। जिसके हृदय में देश की लगन है उसके चरित्र, घटनावली और परिस्थितियाँ सभी उसी रंग में रँगी हुई नज़र आयेंगी। लहरी आनंदी लेखकों के चरित्रों में भी अधिकांश चरित्र ऐसे ही होंगे जिन्हें जगत्-गति नहीं व्यापती। वे जासूसी, तिलिस्मी चीज़ें लिखा करते हैं। अगर लेखक आशावादी है तो उसकी रचना में आशावादिता छलकती रहेगी, अगर वह शोकवादी है तो, बहुत प्रयत्न करने पर भी, वह अपने चरित्रों को ज़िन्दादिल न बना सकेगा। 'आज़ाद-कथा' को उठा लीजिये, तुरंत मालूम हो जायगा कि लेखक हँसने-हँसानेवाला जीव है जो जीवन को गम्भीर विचार के योग्य नहीं समझता। जहाँ उसने समाज के प्रश्नों को उठाया है वहाँ शैली शिथिल हो गई है।

    जिस उपन्यास को समाप्त करने के बाद पाठक अपने अंदर उत्कर्ष का अनुभव करे, उसके सद्भाव जाग उठें, वही सफल उपन्यास है। जिसके भाव गहरे हैं, प्रखर हैं,—जो जीवन में बद्दू बनकर नहीं, बल्कि सवार बनकर चलता है, जो उद्योग करता है और विफल होता है, उठने की कोशिश करता है और गिरता है, जो वास्तविक जीवन की गहराइयों में डूबा है, जिसने ज़िन्दगी के ऊँच-नीच देखे हैं, सम्पत्ति और विपत्ति का सामना किया है, जिसकी ज़िन्दगी मखमली गद्दों पर

    ही नहीं गुज़रती, वही लेखक ऐसे उपन्यास रच सकता है जिनमें प्रकाश, जीवन और आनंद-प्रदान की सामर्थ्य होगी।

    उपन्यास के पाठकों की रुचि भी अब बदलती जा रही है। अब उन्हें केवल लेखक की कल्पनाओं से संतोष नहीं होता। कल्पना कुछ भी हो, कल्पना ही है। वह यथार्थ का स्थान नहीं ले सकती। भविष्य उन्हीं उपन्यासों का है जो अनुभूति पर खड़े हों।

    इसका आशय यह है कि भविष्य में उपन्यास में कल्पना कम, सत्य अधिक होगा; हमारे चरित्र कल्पित न होंगे, बल्कि व्यक्तियों के जीवन पर आधारित होंगे। किसी हद तक तो अब भी ऐसा होता है; पर बहुधा हम परिस्थितियों का ऐसा क्रम बाँधते हैं कि अंत स्वाभाविक होने पर भी वह होता है जो हम चाहते हैं। हम स्वाभाविकता का स्वाँग जितनी खूबसूरती से भर सके, उतने ही सफल होते हैं; लेकिन भविष्य में पाठक इस स्वाँग से संतुष्ट न होगा।

    यों कहना चाहिये कि भावी उपन्यास जीवन-चरित होगा, चाहे किसी बड़े आदमी का या छोटे आदमी का। उसकी छुटाई-बड़ाई का फ़ैसला उन कठिनाइयों से किया जायगा कि जिन पर उसने विजय पाई है। हाँ, वह चरित्र इस ढंग से लिखा जायगा कि उपन्यास मालूम हो। अभी हम झूठ को सच बनाकर दिखाना चाहते हैं, भविष्य में सच को झूठ बनाकर दिखाना होगा। किसी किसान का चरित्र हो, या किसी देश-भक्त का, या किसी बड़े आदमी का; पर उसका आधार यथार्थ पर होगा। तब यह काम उससे कठिन होगा जितना अब है; क्योंकि ऐसे बहुत कम लोग हैं, जिन्हें बहुत-से मनुष्यों को भीतर से जानने का गौरव प्राप्त हो।

    उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी

    यह बात सभी लोग मानते हैं कि राष्ट्र को दृढ़ और बलवान बनाने के लिए देश में सांस्कृतिक एकता का होना बहुत आवश्यक है। और किसी राष्ट्र की भाषा तथा लिपि इस सांस्कृतिक एकता का एक विशेष अङ्ग है। श्रीमती ख़लीदा अदीब ख़ानम ने अपने एक भाषण में कहा था कि तुर्की जाति और राष्ट्र की एकता तुर्की भाषा के कारण ही हुई है। और यह निश्चित बात है कि राष्ट्रीय भाषा के बिना किसी राष्ट्र के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं हो सकती। जब तक भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा न हो, तब तक वह राष्ट्रीयता का दावा नहीं कर सकता। सम्भव है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष एक राष्ट्र रहा हो; परन्तु बौद्धों के पतन के उपरान्त उसकी राष्ट्रीयता का भी अन्त हो गया था। यद्यपि देश में सांस्कृतिक एकता वर्तमान थी, तो भी भाषाओं के भेद ने देश को खण्ड-खण्ड करने का काम और भी सुगम कर दिया था। मुसलमानों के शासन काल में भी जो कुछ हुआ था, उसमें भिन्न-भिन्न प्रान्तों का राजनीतिक एकीकरण तो हो गया था, परन्तु उस समय भी देश में राष्ट्रीयता का अस्तित्व नहीं था। और सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता की भावना अपेक्षाकृत बहुत थोड़े दिनों से संसार में उत्पन्न हुई है और इसे उत्पन्न हुए लगभग दो सौ वर्षों से अधिक नहीं हुए। भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का आरम्भ अंगरेज़ी राज्य की स्थापना के साथ-साथ हुआ था। और उसी की दृढ़ता के साथ-साथ इसकी भी वृद्धि हो रही है। लेकिन इस समय राजनीतिक पराधीनता के अतिरिक्त देश के भिन्न-भिन्न अङ्गों और तत्त्वों में कोई ऐसा पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है जो उन्हें संघटित करके एक राष्ट्र का स्वरूप दे सके। यदि आज भारतवर्ष से अंगरेज़ी राज्य उठ जाय तो इन तत्त्वों में जो एकता इस समय दिखाई दे रही है, बहुत सम्भव है कि वह विभेद और विरोध का रूप धारण

    कर ले और भिन्न-भिन्न भाषाओं के आधार पर एक ऐसा नया संघटन उत्पन्न हो जाय जिसका एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध ही न हो। और फिर वही खींचातानी शुरू हो जाय जो अंगरेज़ों के यहाँ आने से पहले थी। अतः राष्ट्र के जीवन के लिए यह बात आवश्यक है कि देश में सांस्कृतिक एकता हो। और भाषा की एकता उस सांस्कृतिक एकता का प्रधान स्तम्भ है; इसलिए यह बात भी आवश्यक है कि भारतवर्ष की एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा हो जो देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बोली और समझी जाय। इसी बात का आवश्यक परिणाम यह होगा कि कुछ दिनों में राष्ट्रीय साहित्य की सृष्टि भी आरम्भ हो जायगी और एक ऐसा समय आयेगा, जब कि भिन्न-भिन्न जातियों और राष्ट्रों के साहित्यिक मण्डल में हिन्दुस्तानी भाषा भी बराबरी की हैसियत से शामिल होने के क़ाबिल हो जायगी।

    परन्तु प्रश्न तो यह है कि इस राष्ट्रीय भाषा का स्वरूप क्या हो? आज-कल भिन्न-भिन्न प्रान्तों में जो भाषाएँ प्रचलित हैं उसमें तो राष्ट्रीय-भाषा बनने की योग्यता नहीं, क्योंकि उनके कार्य और प्रचार का क्षेत्र परिमित है। केवल एक ही भाषा ऐसी है जो देश के एक बहुत बड़े भाग में बोली जाती है और उससे भी कहीं बड़े भाग में समझी जाती है। और उसी को राष्ट्रीय भाषा का पद दिया जा सकता है।

    परन्तु इस समय उस भाषा के तीन स्वरूप हैं—उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी। और अभी तक यह बात राष्ट्रीय-रूप से निश्चित नहीं की जा सकी है कि इनमें से कौन-सा स्वरूप ऐसा है जो देश में सबसे अधिक मान्य हो सकता है और जिसका प्रचार भी ज़्यादा आसानी से हो सकता है। तीनों ही स्वरूपों के पक्षपाती और समर्थक मौजूद हैं और उनमें खींचा-तानी हो रही है। यहाँ तक कि इस मत भेद को राजनीतिक स्वरूप दे दिया गया है और हम इस प्रश्न पर शान्त चित्त और शान्त मस्तिष्क से विचार करने के अयोग्य हो गये हैं।

    लेकिन इन सब रुकावटों के होते हुए भी यदि हम भारतीय राष्ट्रीयता के लक्ष्य तक पहुँचना और उसकी सिद्धि करना असम्भव

    समझकर हिम्मत न हार बैठें तो फिर हमारे लिए इस प्रश्न की किसी-न-किसी प्रकार मीमांसा करना आवश्यक हो जाता है।

    देश में ऐसे आदमियों की संख्या कम नहीं है जो उर्दू और हिन्दी की अलग-अलग और स्वतन्त्र उन्नति और विकास के मार्ग में बाधक नहीं होना चाहते। उन्होंने यह मान लिया है कि आरम्भ में इन दोनों के स्वरूपों में चाहे जो कुछ एकता और समानता रही हो, लेकिन फिर भी इस समय दोनों की दोनों जिस रास्ते पर जा रही हैं, उसे देखते हुए इन दोनों में मेल और एकता होना असम्भव ही है। प्रत्येक भाषा की एक प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है। उर्दू का फ़ारसी और अरबी के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध है। और हिन्दी का संस्कृत तथा प्राकृत के साथ उसी प्रकार का सम्बन्ध है। उनकी यह प्रवृत्ति हम किसी शक्ति से रोक नहीं सकते। फिर इन दोनों को आपस में मिलाने का प्रयत्न करके हम क्यों व्यर्थ इन दोनों को हानि पहुँचावें?

    यदि उर्दू और हिन्दी दोनों अपने आपको अपने जन्म-स्थान और प्रचार-क्षेत्र तक ही परिमित रखें तो हमें इनकी प्राकृतिक वृद्धि और विकास के सम्बन्ध में कोई आपत्ति न हो। बँगला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू और कन्नडी आदि प्रान्तीय भाषाओं के सम्बन्ध में हमें किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है। उन्हें अधिकार है कि वे अपने अन्दर चाहें जितनी संस्कृत, अरबी या लैटिन आदि भरती चलें। उन भाषाओं के लेखक आदि स्वयं ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं; परन्तु उर्दू और हिन्दी की बात इन सबसे अलग है। यहाँ तो दोनों ही भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा कहलाने का दावा करती हैं। परन्तु वे अपने व्यक्तिगत रूप में राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकीं और इसी लिए संयुक्त रूप में स्वयं ही उनका संयोग और मेल आरम्भ हो गया। और दोनों का यह सम्मिलित स्वरूप उत्पन्न हो गया जिसे हम बहुत ठीक तौर पर हिन्दुस्तानी ज़बान कहते हैं। वास्तविक बात तो यह है कि भारतवर्ष की राष्ट्रीय-भाषा न तो वह उर्दू ही हो सकती है जो अरबी और फारसी के अप्रचलित तथा अपरिचित शब्दों के भार

    से लदी रहती है और न वह हिन्दी ही हो सकती है जो संस्कृत के कठिन शब्दों से लदी हुई होती है। यदि इन दोनों भाषाओं के पक्षपाती और समर्थक आमने-सामने खड़े होकर अपनी साहित्यिक भाषाओं में बातें करें तो शायद एक दूसरे का कुछ भी मतलब न समझ सकें। हमारी राष्ट्रीय भाषा तो वही हो सकती है जिसका आधार सर्व-सामान्य-बोधगम्यता हो—जिसे सब लोग सहज में समझ सकें। वह इस बात की क्यों परवाह करने लगी कि अमुक शब्द इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिये कि वह फ़ारसी, अरबी अथवा संस्कृत का है? वह तो केवल यह मान-दण्ड अपने सामने रखती है कि जन-साधारण यह शब्द समझ सकते हैं वा नहीं। और जन-साधारण में हिन्दू, मुसलमान, पंजाबी, बंगाली, महाराष्ट्र और गुजराती सभी सम्मिलित हैं। यदि कोई शब्द या मुहाबरा या पारिभाषिक शब्द जन साधारण में प्रचलित है तो फिर वह इस बात की परवाह नहीं करती कि वह कहाँ से निकला है और कहाँ से आया है। और यही हिन्दुस्तानी है। और जिस प्रकार अंगरेज़ों की भाषा अंगरेज़ी, जापान की जापानी, ईरान की ईरानी और चीन की चीनी है, उसी प्रकार हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय भाषा को इसी तौर पर हिंदुस्तानी कहना केवल उचित ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। और अगर इस देश को हिंदुस्तान न कहकर केवल हिंद कहें तो इसकी भाषा को हिंदी कह सकते हैं। लेकिन यहाँ की भाषा को उर्दू तो किसी प्रकार कहा ही नहीं जा सकता, जब तक हम हिंदुस्तान को उर्दूस्तान न कहने लगें, जो अब किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है। प्राचीन काल के लोग यहाँ की भाषा को हिन्दी ही कहते थे। और खुसरो ने ख़ालिकबारी की रचना करके हिन्दुस्तानी की नींव रखी थी। इस ग्रंथ की रचना में कदाचित् उसका यही अभिप्राय होगा कि जन-साधारण की आवश्यकता के शब्द उन्हें दोनों ही रूपों में सिखलाये जायँ, जिसमें उन्हें अपने रोज़मर्रा के कामों में सहूलियत हो जाय। अभी तक इस बात का निर्णय नहीं हो सका है कि उर्दू की सृष्टि कब और कहाँ हुई थी। जो हो; परंतु भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा न तो उर्दू ही है और न हिन्दी;

    बल्कि वह हिन्दुस्तानी है जो सारे हिन्दुस्तान में समझी जाती है और उसके बहुत बड़े भाग में बोली जाती है। लेकिन फिर भी लिखी कहीं नहीं जाती। और यदि कोई लिखने का प्रयत्न करता है तो उर्दू और हिन्दी के साहित्यिज्ञ उसे टाट बाहर कर देते हैं। वास्तव में उर्दू और हिंदी की उन्नति में जो बात बाधक है, वह उनका वैशिष्ट्य प्रेम है। हम चाहे उर्दू लिखें और चाहे हिन्दी, जन-साधारण के लिए नहीं लिखते; बल्कि एक परिमित वर्ग के लिए लिखते हैं। और यही कारण है कि हमारी साहित्यिक रचनाएँ जन-साधारण को प्रिय नहीं होतीं। यह बात बिलकुल ठीक है कि किसी देश में भी लिखने और बोलने की भाषाएँ एक नहीं हुआ करतीं। जो अंग्रेजी हम किताबों और अखबारों में पढ़ते हैं, वह कहीं बोली नहीं जाती। पढ़े-लिखे लोग भी उस भाषा में बातचीत नहीं करते, जिस भाषा में ग्रन्थ और समाचार-पत्र आदि लिखे जाते हैं। और जन-साधारण की भाषा तो बिलकुल अलग ही होती है। इंग्लैंड के हर एक पढ़े-लिखे आदमी से यह आशा अवश्य की जाती है कि वह लिखी जानेवाली भाषा समझे और अवसर पड़ने पर उसका प्रयोग भी कर सके। यही बात हम हिन्दुस्तान में भी चाहते हैं।

    परंतु आज क्या परिस्थिति है? हमारे हिन्दीवाले इस बात पर तुले हुए हैं कि हम हिन्दी से भिन्न भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में किसी तरह घुसने ही न देंगे। उन्हें 'मनुष्य' से तो प्रेम है; परंतु 'आदमी' से पूरी-पूरी घृणा है। यद्यपि 'दरख़्वास्त' जन-साधारण में भली-भाँति प्रचलित है; परंतु फिर भी उनके यहाँ इसका प्रयोग वर्जित है। इसके स्थान पर वे 'प्रार्थना' पत्र ही लिखना चाहते हैं, यद्यपि जन-साधारण इसका मतलब बिलकुल ही नहीं समझता। 'इस्तीफ़ा' को वे किसी तरह मंजूर नहीं कर सकते और इसके स्थान पर वे 'त्याग-पत्र' रखना चाहते हैं। 'हवाई जहाज़' चाहे कितना ही सुबोध क्यों न हो, परंतु उन्हें 'वायु यान' की सैर ही पसन्द है। उर्दूवाले तो इस बात पर और भी अधिक लट्टू हैं। वे 'ख़ुदा' को तो मानते हैं, परंतु 'ईश्वर' को नहीं मानते। 'कुसूर' तो वे बहुत-से कर सकते हैं, परंतु 'अपराध' कभी

    नहीं कर सकते। 'ख़िदमत' तो उन्हें बहुत पसंद है, परंतु 'सेवा' उन्हें एक आँख भी नहीं भाती। इसी तरह हम लोगों ने उर्दू और हिन्दी के दो अलग-अलग कैम्प बना लिए हैं। और मजाल नहीं कि एक कैम्प का आदमी दूसरे कैम्प में पैर भी रख सके। इस दृष्टि से हिन्दी के मुक़ाबले में उर्दू में कहीं अधिक कड़ाई है। हिन्दुस्तानी इस चारदीवारी को तोड़कर दोनों में मेल-जोल पैदा कर देना चाहती है, जिसमें दोनों एक दूसरे के घर बिना किसी प्रकार के संकोच के आ-जा सकें; और वह भी सिर्फ़ मेहमान की हैसियत से नहीं, बल्कि घर के आदमी की तरह। 'गारमन डि टासी' के शब्दों में उर्दू और हिन्दी के बीच में कोई ऐसी विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती जहाँ एक को विशेष रूप से हिन्दी और दूसरी को उर्दू कहा जा सके। अंग्रेज़ी भाषा के भी अनेक रंग हैं। कहीं लैटिन और यूनानी शब्दों की अधिकता होती है, कहीं ऐंग्लो-सैक्सन शब्दों की। परंतु है दोनों ही अंग्रेज़ी। इसी प्रकार हिन्दी या उर्दू शब्दों के विभेद के कारण दो भिन्न-भिन्न भाषाएँ नहीं हो सकतीं। जो लोग भारतीय-राष्ट्रीयता का स्वप्न देखते हैं और जो इस सांस्कृतिक एकता को दृढ़ करना चाहते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे लोग हिन्दुस्तानी का निमन्त्रण ग्रहण करें जो कोई नई भाषा नहीं है; बल्कि उर्दू और हिंदी का राष्ट्रीय स्वरूप है।

    संयुक्त-प्रान्त के अपर प्राइमरी स्कूलों में चौथे दरजे तक इसी मिश्रित भाषा अर्थात् हिन्दुस्तानी की रीडरें पढ़ाई जाती हैं। केवल उनकी लिपि अलग होती है। उनकी भाषा में कोई अन्तर नहीं होता। इसमें शिक्षा-विभाग का उद्देश्य यह होगा कि इस प्रकार विद्यार्थियों में बचपन में ही हिन्दुस्तानी की नींव पड़ जायगी और वे उर्दू तथा हिन्दी के विशेष प्रचलित शब्दों से भली-भाँति परिचित हो जायँगे और उन्हीं का प्रयोग करने लगेंगे। इसमें दूसरा लाभ यह भी है कि एक ही शिक्षक शिक्षा दे सकता है। इस समय भी यही व्यवस्था प्रचलित है। लेकिन हिन्दी और उर्दू के पक्षपातियों की ओर से इसकी शिकायतें शुरू हो गई हैं कि इस मिश्रित भाषा को शिक्षा से विद्यार्थियों को कुछ भी

    साहित्यिक ज्ञान नहीं होने पाता और वे अपर प्राइमरी के बाद भी साधारण पुस्तकें तक नहीं समझते। इसी शिकायत को दूर करने के लिए इन रीडरों के अतिरिक्त अपर प्राइमरी दरजों के लिए एक साहित्यिक रीडर भी नियत हुई है। हमारे मासिक-पत्र, समाचार-पत्र और पुस्तकें आदि विशुद्ध हिन्दी में प्रकाशित होती हैं। इसलिए जब तक उर्दू पढ़नेवाले लड़कों के पास फ़ारसी और अरबी शब्दों का और हिन्दी पढ़नेवाले लड़कों के पास संस्कृत शब्दों का यथेष्ट भंडार न हो, तब तक वे उर्दू या हिन्दी की कोई पुस्तक नहीं समझ सकते। इस प्रकार बाल्यावस्था से ही हमारे यहाँ उर्दू और हिन्दी का विभेद आरम्भ हो जाता है। क्या इस विभेद को मिटाने का कोई उपाय नहीं है?

    जो लोग इस विभेद के पक्षपाती हैं, उनके पास अपने-अपने दावे की दलीलें और तर्क भी मौजूद हैं। उदाहरण के लिए विशुद्ध हिन्दी के पक्षपाती कहते हैं कि संस्कृत की ओर झुकने से हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान की दूसरी भाषाओं के पास पहुँच जाती है। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे बने-बनाये शब्द मिल जाते हैं; लिखावट में साहित्यिक रूप आ जाता है, आदि, आदि। इसी तरह उर्दू का झण्डा लेकर चलनेवाले कहते हैं कि फ़ारसी और अरबी की ओर झुकने से एशिया की दूसरी भाषाएँ, जैसे फ़ारसी और अरबी, उर्दू के पास आ जाती हैं। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे अरबी का विद्या-सम्बन्धी भांडार मिल जाता है, जिससे बढ़कर विद्या की भाषा और कोई नहीं है, और लेखन-शैली में गम्भीरता और शान आ जाती है, आदि, आदि। इसलिए क्यों न इन दोनों को अपने-अपने ढंग पर चलने दिया जाय और उन्हें आपस में मिलाकर क्यों दोनों के रास्तों में रुकावटें पैदा की जायँ? यदि सभी लोग इन तर्कों से सहमत हो जायँ, तो इसका अभिप्राय यही होगा कि हिन्दुस्तान में कभी राष्ट्रीय भाषा की सृष्टि न हो सकेगी। इसलिए हमें आवश्यक है कि जहाँ तक हो सके, हम इस प्रकार की धारणाओं को दूर करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करें जिससे हम दिन पर दिन राष्ट्रीय भाषा के और भी अधिक समीप

    पहुँचते जायँ; और सम्भव है कि दस-बीस वर्षों में हमारा स्वप्न यथार्थता में परिणत हो जाय।

    हिन्दुस्तान के हर एक सूबे में मुसलमानों की थोड़ी-बहुत संख्या मौजूद ही है। संयुक्त प्रान्त के सिवा और-और सूबों में मुसलमानों ने अपने-अपने सूबे की भाषा अपना ली है। बंगाल का मुसलमान बँगला बोलता और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मदरास का तमिल और पंजाब का पंजाबी आदि। यहाँ तक कि उसने अपने अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है। उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक और सांस्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्यप्रति के जीवन में उसे उर्दू की बिल्कुल आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि दूसरे-दूसरे सूबों के मुसलमान अपने-अपने सूबे की भाषा निस्संकोच भाव से सीख सकते हैं और उसे यहाँ तक अपनी भी बना सकते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों की भाषा में नाम को भी कोई भेद नहीं रह जाता, तो फिर संयुक्त प्रांत और पंजाब के मुसलमान क्यों हिन्दी से इतनी घृणा करते हैं? हमारे सूबे के देहातों में रहनेवाले मुसलमान प्रायः देहातियों की भाषा ही बोलते हैं। जो बहुत-से मुसलमान देहातों से आकर शहरों में आबाद हो गये हैं, वे भी अपने घरों में देहाती ज़बान ही बोलते हैं। बोल-चाल की हिन्दी समझने में न तो साधारण मुसलमानों को ही कोई कठिनता होती है और न बोल-चाल की उर्दू समझने में साधारण हिन्दुओं को ही। बोल-चाल की हिन्दी और उर्दू प्रायः एक-सी ही हैं। हिन्दी के जो शब्द साधारण पुस्तकों और समाचार-पत्रों में व्यवहृत होते हैं और कभी-कभी पण्डितों के भाषणों में भी आ जाते हैं, उनकी संख्या दो हज़ार से अधिक न होगी। इसी प्रकार फ़ारसी के साधारण शब्द भी इससे अधिक न होंगे। क्या उर्दू के वर्तमान कोषों में दो हज़ार हिन्दी शब्द और हिन्दी के कोषों में दो हज़ार उर्दू शब्द नहीं बढ़ाये जा सकते? और इस प्रकार हम एक मिश्रित कोष की सृष्टि नहीं कर सकते? क्या हमारी स्मरण-शक्ति पर यह भार असह्य होगा? हम अंगरेज़ी के

    असंख्य शब्द याद कर सकते हैं और वह भी केवल एक अस्थायी आवश्यकता की पूर्त्ति करने के लिए। तो फिर क्या हम एक स्थायी उद्देश्य की सिद्धि के लिए थोड़े-से शब्द भी याद नहीं कर सकते। उर्दू और हिन्दी भाषाओं में न तो अभी विस्तार ही है और न दृढ़ता। उनके शब्दों की संख्या परिमित है। प्रायः साधारण अभिप्राय प्रकट करने के लिए भी उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। शब्दों की इस वृद्धि से यह शिकायत दूर हो सकती है।

    भारतवर्ष की सभी भाषाएँ या तो प्रत्यक्ष रूप से और या अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत से निकली हैं। गुजराती, मराठी और बँगला की तो लिपियाँ भी देव-नागरी से मिलती-जुलती हैं। यद्यपि दक्षिणी भारत की भाषाओं की लिपियाँ बिल्कुल भिन्न हैं; परन्तु फिर भी उनमें संस्कृत शब्दों की बहुत अधिकता है। अरबी और फ़ारसी के शब्द भी सभी प्रांतीय भाषाओं में कुछ न कुछ मिलते हैं। परंतु उनमें संस्कृत शब्दों की उतनी अधिकता नहीं होती जितनी हिन्दी में होती है। इसलिए यह बात बिल्कुल ठीक है कि भारतवर्ष में ऐसी हिन्दी बहुत सहज में स्वीकृत और प्रचलित हो सकती है जिसमें संस्कृत के शब्द अधिक हों। दूसरे प्रांतों के मुसलमान भी ऐसी हिन्दी सहज में समझ सकते हैं; परंतु फ़ारसी और अरबी के शब्दों से लदी हुई उर्दू भाषा के लिए संयुक्त प्रांत और पंजाब के नगरों और क़स्बों तथा हैदराबाद के बड़े-बड़े शहरों के सिवा और कोई क्षेत्र नहीं। मुसलमान संख्या में अवश्य आठ करोड़ हैं; लेकिन उर्दू बोलनेवाले मुसलमान इसके एक चौथाई से अधिक न होंगे। ऐसी अवस्था में क्या उच्चकोटि की राष्ट्रीयता के विचार से इसकी आवश्यकता नहीं है कि उर्दू में कुछ आवश्यक सुधार और वृद्धि करके उसे हिन्दी के साथ मिला लिया जाय? और हिन्दी में भी इसी प्रकार की वृद्धि करके उसे उर्दू से मिला दिया जाय? और इस मिश्रित भाषा को इतना दृढ कर दिया जाय कि वह सारे भारतवर्ष में बोली-समझी जा सके? और हमारे लेखक जो कुछ लिखें, वह एक विशेष क्षेत्र के लिए न हो; बल्कि सारे भारतवर्ष के लिए हो? सिन्धी

  • कर्मभूमि

    कर्मभूमि

    Aproximadamente 214.968 palavras.

    काशी ने खिसियाकर कहा–देखो, अगर कुछ हो जाय तो जानें।

    अमर ने गर्व से कहा–अगर धैर्य से काम लोगे, तो सब कुछ हो जायगा। हल्लड़ मचाओगे, तो कुछ न होगा, उल्टे और डण्डे पड़ेंगे।

    सलोनी ने कहा–जब मोटे स्वामी माने!

    गूदड़ ने चौधरीपन की ली–मानेंगे कैसे नहीं, उनको मानना पड़ेगा।

    एक काले युवक ने जो स्वामीजी के उग्र भक्तों में था, लज्जित होकर कहा–भैया, जिस लगन से तुम काम करते हो, कोई क्या करेगा।

    दूसरे दिन उसी कड़ाई से प्यादों ने डांट-फटकार की; लेकिन तीसरे दिन से वह कुछ नर्म हो गये। सारे इलाके में ख़बर फैल गयी कि महन्तजी ने आधी छूट के लिए सरकार को लिखा है। स्वामीजी जिस गांव में जाते, वहाँ लोग उन पर आवाजें कसते। स्वामीजी अपनी रट अब भी लगाये जाते थे। यह सब धोखा है कुछ होना-हवाना नहीं है, उन्हें अपनी बात की आ पड़ी थी। असामियों की उन्हें उतनी फ़िक्र न थी, जितनी अपने पक्ष की। अगर आधी छूट का हुक्म आ जाता, तो शायद वह यहाँ से भाग जाते। इस वक्त तो वह इस वादे को धोखा साबित करने की चेष्टा करते थे, और यद्यपि जनता उनके हाथ में न थी, पर कुछ-न-कुछ आदमी उनकी बातें सुन ही लेते थे। हाँ इस कान सुन कर उस कान उड़ा देते।

    दिन गुज़रने लगे, मगर कोई हुक्म नहीं आया। फिर लोगों में सन्देह पैदा होने लगा। जब दो सप्ताह निकल गये, तो अमर सदर गया और वहाँ सलीम के साथ हाकिम जिला मि० ग़ज़नवी से मिला। मि० ग़ज़नवी लम्बे, दुबले, गोरे, शौकीन आदमी थे। उनकी नाक इतनी लम्बी और चिबुक इतना गोल था कि हास्य-मूर्ति-से लगते थे और ये भी बड़े विनोदी। काम उतना ही करते थे, जितना ज़रूरी होता था और जिसके न करने से जवाब तलब हो सकता था; लेकिन दिल के साफ, उदार, परोपकारी आदमी थे। जब अमर ने गाँवों की हालत उनसे बयान की, तो हँसकर बोले–आपके महन्तजी ने फ़रमाया है, सरकार जितनी मालगुजारी छोड़ दे, मैं उतनी ही लगान छोड़ दूंगा। हैं मुन्सिफ़मिज़ाज!

    अमर ने शंका की–तो इसमें बेइन्साफ़ी क्या है?

    'बेइन्साफ़ी यही है कि उनके करोड़ों रुपये बैंक में जमा हैं, सरकार पर अरबों कर्ज है।'

    'तो आपने उनकी तजवीज पर कोई हुक्म दिया?'

    'इतनी जल्द! भला छ: महीने तो गुज़रने दीजिए। अभी हम काश्तकारों की हालत की जाँच करेंगे, उसकी रिपोर्ट भेजी जायगी, रिपोर्ट पर गौर किया जायगा, तब कहीं कोई हुक्म मिलेगा।'

    'तब तक तो असामियों के बारे-न्यारे हो जायँगे। अजब नहीं कि फ़साद शुरू हो जाय।'

    'तो क्या आप चाहते हैं, सरकार अपनी वज़ा छोड़ दे! यह दफ्तरी हुकूमत है जनाब! यहाँ सभी काम ज़ाब्ते के साथ होते हैं। आप हमें गालियाँ दें, हम आपका कुछ नहीं कर सकते। पुलिस में रिपोर्ट होगी, पुलिस आपका चालान करेगी। होगा वही, जो मैं चाहूँगा, मगर ज़ाब्ते के साथ। खैर, यह तो मज़ाक था। आपके दोस्त मि० सलीम बहुत जल्द उस इलाके की तहकीकात करेंगे; मगर देखिए, झूठी शहादतें न पेश कीजिएगा, कि यहाँ से निकाले जायँ। मि० सलीम आपकी बड़ी तारीफ़ करते हैं; मगर भाई, मैं तुम लोगों से डरता हूँ। खासकर तुम्हारे उस स्वामी से। बड़ा ही मुफसिद आदमी है। उसे फँसा क्यों नहीं देते। मैंने सुना है वह तुम्हें बदनाम करता फिरता है।'

    इतना बड़ा अफ़सर अमर से इतनी बेतकल्लुफ़ी से बातें कर रहा था, फिर उसे क्यों न नशा हो जाता? सचमुच आत्मानन्द आग लगा रहा है। अगर वह गिरफ्तार हो जाय, तो इलाके में शान्ति हो जाय। स्वामी साहसी है, यथार्थ वक्ता है, देश का सच्चा सेवक है; लेकिन इस वक्त उसका गिरफ्तार हो जाना ही अच्छा।

    उसने कुछ इस भाव से जवाब दिया कि उसके मनोभाव प्रकट न हों, पर स्वामी पर वार चल जाय–मुझे तो उनसे कोई शिकायत नहीं है, उन्हें अख़तियार है, मुझे जितना चाहें बदनाम करें।

    ग़ज़नवी ने सलीम से कहा–तुम नोट कर लो मि० सलीम। कल हल्के के थानेदार को लिख दो, इस स्वामी की ख़बर ले। बस, अब सरकारी काम ख़त्म। मैंने सुना है मि० अमर, कि आप औरतों को वश में करने का कोई मंत्र जानते हैं।

    अमर ने सलीम की गरदन पकड़ कर कहा–तुमने मुझे बदनाम किया होगा।

    सलीम बोला–तुम्हें तुम्हारी हरकतें बदनाम कर रही हैं, मैं क्यों करने लगा।

    ग़ज़नवी ने बाँकपन के साथ कहा–तुम्हारी बीबी गजब की दिलेर औरत है भई! आजकल म्युनिसिपैलिटी से उनकी ज़ोर-आज़माई है और मझे यकीन है बोर्ड को झुकना पड़ेगा। मगर भई, मेरी बीवी ऐसी होती, तो मैं फ़कीर हो जाता। वल्लाह!

    अमर ने हँसकर कहा–क्यों, आपको तो और खुश होना चाहिए था।

    ग़ज़नवी–जी हाँ! वह तो जनाब का दिल ही जानता होगा।

    सलीम–उन्हीं के खौफ़ से तो यह भागे हुए हैं।

    ग़ज़नवी–यहाँ कोई जलसा करके उन्हें बुलाना चाहिए।

    सलीम–क्यों बैठे-बिठाये ज़हमत मोल लीजिएगा। वह आई और शहर में आग लगी, हमें बंगलो में निकलना पड़ा।

    ग़ज़नवी–अजी, यह तो एक दिन होना ही है। यह अमीरों की हुकूमत अब थोड़े दिनों की मेहमान है। इस मुल्क में अंग्रेजों का राज है; इसलिए, हममें जो अमीर हैं और जो कुदरती तौर पर अमीरों की तरफ खड़े होते, वह भी ग़रीबों की तरफ खड़े होने में खुश है क्योंकि ग़रीबों के साथ इन्हें कम-से-कम इज्जत मिलेगी, उधर तो यह डौल भी नहीं है। मैं अपने को इसी जमाअत में समझता हूँ।

    तीनों मित्रों में बड़ी रात तक बेतकल्लुफी से बातें होती रहीं। सलीम ने अमर को पहले ही खूब तारीफ कर दी थी। इसलिए उसकी गँवारू सूरत होने पर भी ग़ज़नवी बराबरी के भाव से मिला। सलीम के लिए हुकूमत नयी चीज़ थी। अपने नये जूते की तरह उसे कीचड़ और पानी से बचाता था। ग़ज़नवी हुकूमत का आदी हो चुका था और जानता था कि पाँव नये जूते से कहीं ज्यादा कीमती चीज़ है। रमणी-चर्चा उसके कुतूहल, आनन्द और मनोरंजन का मुख्य विषय था। क्वाँरों की रसिकता बहुत धीरे-धीरे सूखने वाली वस्तु है। उनकी अतृप्त लालसा प्रायः रसिकता के रूप में प्रगट होती है।

    अमर ने ग़ज़नवी से पूछा–आपने शादी क्यों नहीं की? मेरे एक मित्र प्रोफेसर डाक्टर शांतिकुमार है, वह भी शादी नहीं करते। आप लोग औरतों से डरते होंगे।

    ग़ज़नवी ने कुछ याद कर के कहा–शांतिकुमार वही तो हैं, खूबसूरत से, गोरे-चिट्टे, गठे हुए बदन के आदमी! अजी, वह तो मेरे साथ पढ़ता था यार। हम दोनों आक्सफोर्ड में थे। मैंने लिटरेचर लिया था, उसने पोलिटिकल फिलासोफी ली थी। मैं उसे खूब बनाया करता था। युनिवर्सिटी में है न? अक्सर उसकी याद आती थी।

    सलीम ने उनके इस्तीफे, ट्रस्ट और नगर-कार्य का ज़िक्र किया।

    ग़ज़नवी ने गर्दन हिलायी, मानो कोई रहस्य पा गया है–तो यह कहिए, आप लोग उनके शागिर्द है। हम दोनों में अक्सर शादी के मसले पर बातें होती थीं। मुझे तो डाक्टरों ने मना किया था; क्योंकि उस वक्त मुझ में टी० बी० की कुछ अलामतें नजर आ रही थीं। जवान बेवा छोड़ जाने के खयाल से मेरी रूह काँपती थी। तबसे मेरी गुज़रान तीर-तुक्के पर ही है। शांतिकुमार को तो कौमी खिदमत और जाने क्या-क्या खब्त था; मगर ताज्जुब यह कि अभी तक उस ख़ब्त ने उसका गला नहीं छोड़ा। मैं समझता हूँ, अब उसकी हिम्मत न पड़ती होगी। मेरे ही हमसिन तो थे। ज़रा उनका पता तो बताना, मैं उन्हें यहाँ आने की दावत दूंगा।

    सलीम ने सिर हिलाया–उन्हें फुरसत कहाँ। मैंने बुलाया था, नहीं आये।

    ग़ज़नवी मुसकराये–तुमने निज के तौर पर बुलाया होगा। किसी इंस्टिट्यूशन की तरफ से बुलाओ और कुछ चन्दा करा देने का वादा लो, फिर देखो, चारों हाथ-पाँव से दौड़े आते हैं या नहीं। इन कौमी खादिमों की जान चन्दा है, ईमान चन्दा है और शायद खुदा भी चन्दा है। जिसे देखो, चन्दे की हाय-हाय। मैंने कई बार इन ख़ादिमों को चरका दिया, उस वक्त इन ख़ादिमों की सूरत देखने ही से ताल्लुक रखती है। गालियाँ देते हैं, पैंतरे बदलते हैं, ज़बान से तोप के गोले छोड़ते हैं, और आप उनके बौखलेपन का मजा उठा रहे हैं। मैंने तो एक बार एक लीडर साहब को पागलखाने में बन्द कर दिया था। कहते हैं अपने को कौम का ख़ादिम और लीडर समझते हैं।

    सबेरे मि० ग़ज़नवी ने अमर को अपने मोटर पर गाँव में पहुँचा दिया। अमर के गर्व और आनन्द का वारापार न था। अफ़सरों की सोहबत ने कुछ अफ़सरी की शान पैदा कर दी थी। हाकिम परगना तुम्हारी हालत जाँच करने आ रहे हैं। ख़बरदार, कोई उनके सामने झूठा बयान न दे। जो कुछ वह पूछें, उनका ठीक-ठीक जवाब दो। न अपनी दशा को छिपाओ, न बढ़ा कर बताओ। तहकीकात सच्ची होनी चाहिए। मि० सलीम बड़े नेक और ग़रीब-दोस्त आदमी हैं। तहक़ीक़ात में देर ज़रूर लगेगी; लेकिन राज्य व्यवस्था में देर लगती ही है। इतना बड़ा इलाका है, महीनों घूमने में लग जायँगे। तब तक तुम लोग खरीफ़ का काम शुरू कर दो। रुपये में आठ आने छूट का मैं जिम्मा लेता हूँ। सब्र का फल मीठा होता है, इतना समझ लो।

    स्वामी आत्मानन्द को भी अब विश्वास आ गया। उन्होंने देखा, अमर अकेला ही सारा यश लिये जाता है और मेरे पल्ले अपयश के सिवा और कुछ नहीं पड़ता, तो उन्होंने पहलू बदला। एक जलसे में दोनों एक ही मंच से बोले। स्वामीजी झुके, अमर ने कुछ हाथ बढ़ाया। फिर दोनों में सहयोग हो गया।

    इधर असाढ़ की वर्षा शुरू हुई, उधर सलीम तहकीकात करने आ पहुँचा। दो-चार गाँवों में असामियों के बयान लिखे भी; लेकिन एक ही सप्ताह में ऊब गया। पहाड़ी डाकबँगले में भूत की तरह अकेले पड़े रहना उसके लिए कठिन तपस्या थी। एक दिन बीमारी का बहाना कर के भाग खड़ा हुआ, और एक महीने तक टाल-मटोल करता रहा। आख़िर जब ऊपर से डाँट पड़ी और ग़ज़नवी ने सख़्त ताकीद की, तो फिर चला। उस वक्त सावन की झड़ी लग गयी थी, नदी-नाले भर गये थे, और कुछ ठण्डक आ गयी थी। पहाड़ियों पर हरियाली छा गयी थी, मोर बोलने लगे थे। इस प्राकृतिक शोभा ने देहातों को चमका दिया था।

    कई दिन के बाद आज बादल खुले थे। महन्तजी ने सरकारी फ़ैसले के आने तक रुपये में चार आने छूट की घोषणा कर दी थी और कारिन्दे बकाया वसूल करने की फिर चेष्टा करने लगे थे। दो-चार असामियों के साथ उन्होंने सख्ती भी की थी। इस नयी समस्या पर विचार करने के लिए आज गंगा-तट पर एक विराट् सभा हो रही थी। भोला चौधरी सभापति बनाये गये थे और स्वामी आत्मानन्द का भाषण हो रहा था–सज्जनो, तुम लोगों में ऐसे बहुत कम हैं, जिन्होंने आधा लगान न दे दिया हो। अभी तक तो आधे की चिन्ता थी। अब केवल आधे-के-आधे की चिन्ता है। तुम लोग खुशी से दो-दो आने और दे दो, सरकार महन्तजी की मालगुजारी में कुछ-न-कुछ छूट अवश्य करेगी। अब की छ: आने छूट पर सन्तुष्ट हो जाना चाहिये। आगे की फ़सल में अगर अनाज का यही भाव रहा, तो हमें आशा है कि आठ आने की छूट मिल जायगी। यह मेरा प्रस्ताव है, आप लोग इस पर विचार करें। मेरे मित्र अमरकान्तजी की भी यही राय है। अगर आप लोग कोई और प्रस्ताव करना चाहते हैं तो हम उस पर विचार करने को भी तैयार हैं।

    इसी वक्त डाकिये ने सभा में आकर अमरकान्त के हाथ में एक लिफ़ाफ़ा रख दिया। पते की लिखावट ने बता दिया कि नैना का पत्र है। पढ़ते ही जैसे उस पर नशा छा गया। मुद्रा पर ऐसा तेज आ गया, जैसे अग्नि में आहुति पड़ गयी हो। गर्व भरी आँखों से इधर-उधर देखा। मन के भाव जैसे छलांगें मारने लगे। सुखदा की गिरफ्तारी और जेल यात्रा का वृत्तान्त था। अहा! वह जेल गयी और वह यहाँ पड़ा हुआ है। उसे बाहर रहने का क्या अधिकार है। वह कोमलांगी जेल में है, जो कड़ी दृष्टि भी न सह सकती थी, जिसे रेशमी वस्त्र भी चुभते थे, मखमली गद्दे भी गड़ते थे, वह आज जेल की यातना सह रही है? वह आदर्श नारी, वह देश की लाज रखनेवाली, वह कुल-लक्ष्मी आज जेल में है। अमर के हृदय का सारा रक्त सुखदा के चरणों पर गिरकर बह जाने के लिये मचल उठा। सुखदा! सुखदा! चारों ओर वही मूर्ति थी। सन्ध्या की लालिमा से रंजित गंगा की लहरों पर बैठी हुई कौन चली जा रही है? सुखदा! सामने की श्याम पर्वतमाला में गोधूलि का हार गले में डाले कौन खड़ी है? सुखदा! अमर विक्षिप्तों की भाँति कई कदम आगे दौड़ा, मानों उसको पद-रज मस्तक पर लगा लेना चाहता हो।

    सभा में कौन क्या बोला इसकी ख़बर नहीं। वह खुद क्या बोला, इसकी भी उसे खबर नहीं। जब लोग अपने-अपने गांवों को लौटे तो चंद्रमा का प्रकाश फैल गया था। अमरकान्त का अन्तःकरण कृतज्ञता से परिपूर्ण था। उसे अपने ऊपर किसी की रक्षा का साया ज्योत्स्ना की भाँति फैला हुआ जान पड़ा। उसे प्रतीत हआ, जैसे उसके जीवन में कोई विधान है, कोई आदेश है कोई आशीर्वाद है, कोई सत्य है, और वह पग-पग पर उसे सँभालता है, बचाता है। एक महान् इच्छा, एक महान् चेतना के संसर्ग का आज उसे पहली बार अनुभव हुआ।

    सहसा मुन्नी ने पुकारा–लाला, आज तो तुमने आग ही लगा दी।

    अमर ने चौंककर कहा–मैंने!

    तब उसे अपने भाषण का एक-एक शब्द याद आ गया। उसने मन्त्री का हाथ पकड़कर कहा–हाँ मुन्नी, अब हमें वही करना पड़ेगा, जो मैंने कहा। जब तक हम लगान देना बन्द न करेंगे, सरकार यों ही टालती रहेगी।

    मुन्नी सशंक होकर बोली–आग में कूद रहे हो, और क्या!

    अमर ने ठट्टा मार कर कहा–आग में कूदने से स्वर्ग मिलेगा। दूसरा मार्ग नहीं है!

    मुन्नी चकित होकर उसका मुख देखने लगी। इस कथन में हँसने का क्या प्रयोजन है, वह समझ न सकी।

    ६

    सलीम यहाँ से कोई सात-आठ मील पर डाक-बँगले में पड़ा हुआ था। हलके के थानेदार ने रात ही को उसे सभा की खबर दी और अमरकान्त का भाषण भी सुनाया। उसे इन सभाओं की रिपोर्ट करते रहने की ताकीद कर दी गयी थी।

    सलीम को बड़ा आश्चर्य हुआ। अभी एक दिन पहले अमर उससे मिला था, और यद्यपि उसने महन्त की इस नयी कार्रवाई का विरोध किया था; पर उसके विरोध में केवल खेद था, क्रोध का नाम भी न था। आज एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया? ⁠ उसने थानेदार से पूछा–महन्तजी की तरफ से कोई खास ज्यादती तो नहीं हुई?

    थानेदार ने जैसे इस शंका को जड़ से काटने के लिये तत्पर हो कर कहा—बिल्कुल नहीं हुजूर। उन्होंने तो सख्त ताकीद कर दी थी कि असामियों पर किसी किस्म का जुल्म न किया जाय। बेचारे ने अपनी तरफ से चार आने की छूट दे दी, गाली-गुफ़्ता तो मामूली बात है!

    'जलसे पर तकरीर का क्या असर हुआ?'

    'हुजूर यही समझ लीजिए, जैसे पुआल में आग लग जाय। महन्तजी के इलाके में बड़ी मुश्किल से लगान वसूल होगा।'

    सलीम ने आकाश की तरफ देखकर पूछा–आप इस वक्त मेरे साथ सदर चलने को तैयार हैं?

    थानेदार को क्या उज्र हो सकता था। सलीम के जी में एक बार आया कि जरा अमर से मिले लेकिन फिर सोचा, अगर अमर उसके समझाने से माननेवाला होता, तो यह आग ही क्यों लगाता।

    सहसा थानेदार ने पूछा–हुजूर से तो इनकी जान-पहचान है?

    सलीम ने चिढ़ कर कहा—यह आपसे किसने कहा? मेरी सैकड़ों से जान-पहचान है, तो फिर? अगर मेरा लड़का भी क़ानून के खिलाफ़ काम करे, तो मुझे उसकी तंबीह करनी पड़ेगी।

    थानेदार ने खुशामद की—मेरा यह मतलब नहीं था हुजूर! हुजूर से जान-पहचान होने पर भी उन्होंने हुजूर को बदनाम करने में ताम्मुल न किया, मेरी यही मंशा थी।

    सलीम ने कुछ जवाब तो न दिया; पर यह उस मुआमले का नया पहलू था। अमर को उसके इलाके में यह तूफान न उठाना चाहिए था। आखिर अफ़सरान यही तो समझेंगे कि यह नया आदमी है, अपने इलाके पर इसका रोब नहीं है।

    बादल फिर घिरा आता था। रास्ता भी ख़राब था। उस पर अँधेरी रात, नदियों का उतार; मगर उसका ग़ज़नवी से मिलना ज़रूरी था। कोई तजर्बेकार अफ़सर इस क़दर बदहवास न होता; पर सलीम था नया आदमी।

    दोनों आदमी रात-भर की हैरानी के बाद सबेरे मदर पहुँचे। आज

    मियाँ सलीम को आँटे दाल का भाव मालूम हुआ। यहाँ केवल हुकूमत नहीं है, हैरानी और जोखिम भी है, इसका अनुभव हुआ। जब पानी का झोंका आता या कोई नाला सामने आ पड़ता, तो वह इस्तीफ़ा देने की ठान लेता—यह नौकरी है या बला है! मजे से जिन्दगी गुजरती थी। यहाँ कूत्ते-खसी में आ फंँसा। लानत है ऐसी नौकरी पर! कहीं मोटर खड्ड में जा पड़े, तो हड्डियों का भी पता न लगे। नयी मोटर चौपट हो गयी।

    बँगले पर पहुँचकर उसने कपड़े बदले, नाश्ता किया और आठ बजे ग़ज़नवी के पास जा पहुँचा। थानेदार कोतवाली में ठहरा था। उसी वक्त बह भी हाज़िर हुआ।

    ग़ज़नवी ने वृत्तान्त सुनकर कहा–अमरकान्त कुछ दीवाना तो नहीं हो गया है? बातचीत से तो बड़ा शरीफ़ मालूम होता था; मगर लीडरी भी मुसीबत है। बेचारा कैसे नाम पैदा करे। शायद हजरत समझे होंगे, यह लोग तो दोस्त हो ही गये, अब क्या फ़िक्र। 'सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का!' और ज़िलों में भी तो शोरिश है। मुमकिन है, वहाँ से ताकीद हुई हो। सूझी है इन सभों को दूर की। हक यह है कि किसानों की हालत नाजुक है। यों भी बेचारों को पेटभर दाना न मिलता था, अब तो जिन्सें और भी सस्ती हो गयीं, पूरा लगान कहां, आधे की भी गुंजाइश नहीं है, मगर सरकार का इन्तजाम तो होना ही चाहिए। हुकूमत में कुछ-न-कुछ खौफ़ और रोब का होना भी जरूरी है, नहीं उसकी सुनेगा कौन। किसानों को आज यक़ीन हो जाय कि आधा लगान देकर उनकी जान बच सकती है, तो कल वह चौथाई पर लड़ेंगे और परसों पूरी मुआफ़ी का मुतालबा करेंगे। मैं तो समझता हूँ, आप जाकर लाला अमरकान्त को गिरफ्तार कर लें। एक बार कुछ हलचल मचेगी, मुमकिन है, दो-चार गाँवों में फ़साद भी हो; मगर खुले हुए फसाद को रोकना उतना मुश्किल नहीं है, जितना इस हवा को। मवाद जब फोड़े की सूरत में आ जाता है, तो उसे चीरकर निकाल दिया जा सकता है। लेकिन वही दिल-दिमाग की तरफ चला जाय, तो ज़िन्दगी का खात्मा हो जायगा। आप अपने साथ सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस को भी ले लें और अमर को दफा १२४ में गिरफ्तार कर लें। उस स्वामी को भी लीजिए। दारोगाजी आप जाकर माहब बहादुर से कहिए, तैयार रहें। ⁠ सलीम ने व्यथित कण्ठ से कहा–मैं जानता कि यहाँ आते-ही-आते इस अजाब में जान फंँसेगी, तो किसी और जिले को कोशिश करता। क्या अब मेरा तबादला नहीं हो सकता?

    थानेदार ने पूछा–हुजूर कोई खत न देंगे?

    ग़ज़नवी ने डाँट बतायी–ख़त की जरूरत नहीं है। क्या तुम इतना भी नहीं कह सकते?

    थानेदार सलाम करके चला गया, तो सलीम ने कहा–आपने इसे बुरी तरह डाँटा, बेचारा रुआँसा हो गया। आदमी अच्छा है।

    ग़ज़नवी ने मुसकराकर कहा–जी हाँ, बहुत अच्छा आदमी है। रसद खूब पहुँचाता होगा; मगर रिआया से उसकी दसगुनी वसूल करता है। जहाँ किसी मातहत ने ज़रूरत से ज्यादा खिदमत और खुशामद की, मैं समझ जाता हूँ कि यह छटा हुआ गुर्गा है। आपकी लियाकत का यह हाल है कि इलाके में सदा वारदातें होती हैं, एक का भी पता नहीं चलता। इसे झुठी शहादतें बनाना भी नहीं आता। बस खुशामद की रोटियाँ खाता है। अगर सरकार पुलिस का सुधार कर सके, तो स्वराज्य की माँग पचास साल के लिए टल सकती है। आज कोई शरीफ़ आदमी पुलिस से सरोकार नहीं रखना चाहता। थाने को बदमाशों का अड्डा समझकर उधर से मुंह फेर लेता है। यह सीगा इस राज का कलंक है। अगर आपको अपने दोस्त को गिरफ्तार करने में तकल्लुफ़ हो, तो मैं डी० एस० पी० को ही भेज दूं। उन्हें गिरफ्तार करना अब हमारा फर्ज हो गया है। अगर आप यह नहीं चाहते कि उनकी जिल्लत हो, तो आप जाइए। अपनी दोस्ती का हक़ अदा करने ही के लिए जाइए। मैं जानता हूँ, आपको सदमा हो रहा है। मुझे खुद रंज है। उस थोड़ी देर की मुलाकात में ही मेरे दिल पर उनका सिक्का जम गया। मैं उनके नेक इरादों की क़द्र करता हूँ; लेकिन हम और वह दो कैम्पों में हैं। स्वराज्य हम भी चाहते हैं; मगर इनक़लाब की सूरत में नहीं। हालाँकि कभी-कभी मुझे भी ऐसा मालूम होता है कि इनक़लाब के सिवा हमारे लिए दूसरा रास्ता नहीं हैं। इतनी फौज रखने की क्या जरूरत है, जो सरकार की आमदनी का आधा हजम कर जाय। फ़ौज का खर्च आधा कर दिया जाय, तो किसानों का लगान बड़ी आसानी से आधा हो सकता है। मुझे अगर

    स्वराज्य से कोई ख़ौफ है तो यह कि मुसलमानों की हालत कहीं और खराब न हो जाय। गलत तवारीखें पढ़-पढ़ कर दोनों फिरके एक दूसरे के दुश्मन हो गये हैं और मुमकिन नहीं कि हिन्दू मौका पाकर मुसलमानों से पुरानी अदावतों का बदला न लें, लेकिन इस ख्याल से तसल्ली होती है कि इस बीसवीं सदी में हिन्दुओं जैसी पढ़ी-लिखी जमाअत मज़हबी गरोहबन्दी की पनाह नहीं ले सकती। मज़हब का दौर तो ख़त्म हो रहा है; बल्कि यों कहो कि ख़त्म हो गया। सिर्फ हिन्दुस्तान में उसमें कुछ-कुछ जान बाकी है। यह तो दौलत का ज़माना है। अब कौम में अमीर और ग़रीब, जायदादवाले और मर-भुखे, अपनी-अपनी जमाअतें बनायेंगे। उनमें कहीं ज्यादा खूंरेजी होगी, कहीं ज्यादा तंगदिली होगी। आखिर एक-दो सदी के बाद दुनिया में एक सल्तनत हो जायगी। सबका एक कानून एक निज़ाम होगा, कौम के खादिम कौम पर हुकूमत करेंगे, मजहब शख्सी चीज़ होगी। न कोई राजा होगा, न कोई परजा।

    फ़ोन की घण्टी बजी, ग़ज़नवी ने चोंगा कान से लगाया–मि० सलीम कब चलेंगे?

    ग़ज़नवी ने पूछा–आप कब तैयार होंगे?

    'मैं तैयार हूँ।'

    'तो एक घण्टे में आ जाइए।'

    सलीम ने लम्बी साँस खींचकर कहा–तो मुझे जाना ही पड़ेगा?

    'बेशक! मैं आपके और अपने दोस्त को पुलिस के हाथ में नहीं देना चाहता।'

    'किसी हीले से अमर को यहीं बुला क्यों न लिया जाय?'

    'वह इस वक्त नहीं आयेंगे।'

    सलीम ने सोचा, अपने शहर में जब यह ख़बर पहुँचेगी कि मैंने अमर को गिरफ्तार किया, तो मुझ पर कितने जूते पड़ेंगे! शांतिकुमार तो नोच ही खायेंगे और सकीना तो शायद मेरा मुँह देखना भी पसन्द न करे। इस ख़्याल से वह काँप उठा। सोने की हँसिया न उगलते बनती थी, न निगलते।

    उसने उठकर कहा–आप डी० एम० पी० को भेज दें। मैं नहीं जाना चाहता। ⁠ ग़ज़नवी ने गंभीर होकर पूछा–आप चाहते हैं कि उन्हें वहीं से हथकड़ियाँ पहनाकर और कमर में रस्सी डालकर चार कांसटेबलों के साथ लाया जाय और जब पुलिस उन्हें लेकर चले तो उसे भीड़ को हटाने के लिए गोलियाँ चलानी पड़ें?

    सलीम ने घबड़ाकर कहा–क्या डी० एस० पी० को इन साख्तियों से रोका नहीं जा सकता?

    'अमरकान्त आपके दोस्त हैं, डी० एस० पी० के दोस्त नहीं।'

    'तो फिर आप डी० एस० पी० को मेरे साथ न भेजें।'

    'आप अमर को यहाँ ला सकते हैं?'

    'दग़ा करनी पड़ेगी।'

    'अच्छी बात है, आप जाइए, मैं डी० एस० पी० को मना किए देता हूँ।'

    'मैं वहाँ कुछ कहूँगा ही नहीं।'

    'इसका आपको अख्तियार है।'

    सलीम अपने डेरे पर लौटा, तो ऐसा रंजीदा था, गोया अपना कोई अज़ीज़ मर गया हो। आते ही आते उसने सकीना, शांतिकुमार, लाला समरकान्त, नैना, सबों को एक-एक खत लिखकर अपनी मजबूरी और दुःख प्रकट किया। सकीना को उसने लिखा–मेरे दिल पर इस वक्त जो गुज़र रही है, वह मैं तुमसे बयान नहीं कर सकता! शायद अपने जिगर पर खंजर चलाते हुए भी मुझे इससे ज्यादा दर्द न होता। जिसकी मुहब्बत मुझे यहाँ खींच लाई, उसी को मैं आज इन ज़ालिम हाथों से गिरफ्तार करने जा रहा हूँ। सकीना, खुदा के लिए मुझे कमीना, बेदर्द और खुदगरज न समझो! मैं खून के आँसू रो रहा हूँ। इसे अपने आँचल से पोंछ दो। मुझ पर अमर के इतने एहसान है कि मुझे उनके पसीने की जगह अपना खून बहाना चाहिए था; पर मैं उनके खून का मजा ले रहा हूँ। मेरे गले में शिकारी का तौक़ है और उसके इशारे पर मैं वह सब कुछ करने पर मजबूर हूँ, जो मुझे न करना लाजिम था। मुझ पर रहम करो, सकीना! मैं बदनसीब हूँ।

    खानसामा ने आकर पूछा–हुजूर, खाना तैयार है।

    सलीम ने सिर झुकाये हुए कहा–मुझे भूख नहीं है।

    खानसामा पूछना चाहता था, हुजूर की तबीयत कैसी है। मेज पर कई लिखे खत देखकर डर रहा था कि घर से कोई बरी खबर तो नहीं आई।

    सलीम ने सिर उठाया और हसरत भरे स्वर में बोला–उस दिन वह मेरे एक दोस्त नहीं आये थे, वहीं देहातियों की-सी सूरत बनाये हुए। वह मेरे बचपन के साथी है। हम दोनों ने एक ही कालेज में पढ़ा। घर के लखपती आदमी हैं। बाप हैं, बाल-बच्चे हैं। इतने लायक हैं कि मुझे उन्होंने पढ़ाया। चाहते, तो किसी अच्छे ओहदे पर होते। फिर उनके घर ही किस बात की कमी है; मगर गरीबों का इतना दर्द है कि घर-बार छोड़कर यहीं एक गाँव में किसानों की खिदमत कर रहे हैं। उन्हीं को गिरफ्तार करने का मुझे हुक्म हुआ है।

    खानसामा और समीप आकर जमीन पर बैठ गया–क्या क़सूर किया था हुजूर उन बाबू साहब ने?

    'क़सूर कोई नहीं, यही कि किसानों की मुसीबत उनसे नहीं देखी जाती।'

    'हुजूर ने बड़े साहब को समझाया नहीं?'

    'मेरे दिल पर इस वक्त जो कुछ गुजर रही है, वह मैं ही जानता हूँ हनीफ़, आदमी नहीं फरिश्ता है। यह है सरकारी नौकरी।'

    'तो हुजूर को जाना पड़ेगा?'

    'हाँ, इसी वक्त! इस तरह दोस्ती का हक़ अदा किया जाता है!'

    'तो उन बाबू साहब को नजरबन्द किया जायगा हुजूर?'

    'खुदा जाने क्या किया जायगा। ड्राइवर से कहो, मोटर लाये। शाम तक लौट आना जरूरी है।'

    ज़रा देर में मोटर आ गयी। सलीम उसमें आकर बैठा तो उसकी आँखें सजल थीं।

    ७

    आज कई दिन के बाद तीसरे पहर सूर्यदेव ने पृथ्वी की पुकार सुनी और जैसे समाधि से निकलकर उसे आशीर्वाद दे रहे थे। पृथ्वी मानो अंचल फैलाये उनका आशीर्वाद बटोर रही थी। इसी वक्त स्वामी आत्मानन्द और अमरकान्त दोनों दो दिशाओं से मदरसे में आये।

    अमरकान्त ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा–हम लोगों ने कितना अच्छा प्रोग्राम बनाया था कि एक साथ लौटे। एक क्षण का भी विलंब न हुआ। कुछ खा-पीकर फिर निकलें और आठ बजते-बजते लौट आयें।

    आत्मानन्द ने भूमि पर लेटकर कहा–भैया, अभी तो मुझसे एक पग न चला जायगा, हाँ प्राण लेना चाहो, तो ले लो। दौड़ते-दौड़ले कचूमर निकल गया। पहले शर्बत बनवाओ, पीकर ठण्डे हों, तो आँखें खुलें।

    'तो फिर आज काम समाप्त हो चुका।'

    'हो या भाड़ में जाय, क्या प्राण दे दें। तुमसे हो सकता है करो, मुझसे तो नहीं हो सकता।'

    अमर ने मुसकराकर कहा—यार! मुझसे दूने तो हो, फिर भी चें बोल गये। मुझे अपना बल और अपना पाचन दे दो, फिर देखो, मैं क्या करता हूँ।

    आत्मानन्द ने सोचा था, उनकी पीठ ठोंकी जायगी, यहाँ उनके पौरुष पर आक्षेप हुआ। बोले—तुम मरना चाहते हो, मैं जीना चाहता हूँ।

    'जीने का उद्देश्य तो कर्म है।'

    'हाँ, मेरे जीवन का उद्देश्य कर्म ही है। तुम्हारे जीवन का उद्देश्य तो अकाल मृत्यु है।'

    'अच्छा शर्बत पिलवाता हूँ, उसमें दही भी डलवा दूँ?'

    'हाँ, दही की मात्रा अधिक हो और दो लोटे से कम न हो। इसके दो घण्टे के बाद भोजन चाहिए।'

    'मार डाला! तब तक तो दिन ही ग़ायब हो जायगा।'

    अमर ने मुन्नी को बुलाकर शर्बत बनाने को कहा—और स्वामीजी के बराबर ही ज़मीन पर लेटकर पूछा—इलाके की क्या हालत है?

    'मुझे तो भय हो रहा है कि लोग धोखा देंगे। बेदखली शुरू हुई, तो बहुतों के आसन डोल जायेंगे।'

    'तुम तो दार्शनिक न थे, यह घी पत्ते पर या पत्ता घी पर की शंका कहाँ से लाये?' ⁠ 'ऐसा काम ही क्यों किया जाय, जिसका अन्त लज्जा और अपमान हो। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे बड़ी निराशा हुई।'

    'इसका अर्थ यह है, कि आप इस आन्दोलन के नायक बनने के योग्य नहीं हैं। नेता में आत्मविश्वास, साहस और धैर्य, ये मुख्य लक्षण हैं।

    मुन्नी शर्बत बनाकर लाई। आत्मानन्द ने कमण्डल भर लिया और एक साँस में चढ़ा गये। अमरकान्त एक कटोरे से ज्यादा न पी सका।

    आत्मानन्द ने मुँह चिढ़ाकर कहा—बस! फिर भी आप अपने को मनुष्य कहते हैं।

    अमर ने जवाब दिया–बहुत खाना पशुओं का काम है।

    'जो खा नहीं सकता वह काम क्या करेगा।'

    'नहीं, जो कम खाता है, वही काम करता है, पेटू के लिए सबसे बड़ा काम भोजन पचाना है।'

    सलोनी कल से बीमार थी। अमर उसे देखने चला था, कि मदरसे के सामने ही मोटर आते देखकर रुक गया। शायद इस गाँव में मोटर पहली बार आई है। वह सोच रहा था, किसका मोटर है, कि सलीम उसमें से उतर पड़ा। अमर ने लपककर हाथ मिलाया–कोई ज़रूरी काम था, मुझे क्यों न बुला लिया?

    दोनों आदमी मदरसे में आये। अमर ने एक खाट लाकर डाल दी और बोला–तुम्हारी क्या खातिर करूँ। यहाँ तो फकीरों की हालत है। शर्बत बनाऊँ?

    सलीम ने सिगार जलाते हुए कहा–नहीं, कोई तकल्लुफ नहीं। मि० गजनवी तुमसे किसी मुआमले में सलाह करना चाहते हैं। मैं आज ही जा रहा हूँ। सोचा तुम्हें भी लेता चलूं। तुमने तो कल आग लगा ही दी। अब तहक़ीक़ात से क्या फायदा होगा। वह तो बेकार हो गयीं।

    अमर ने कुछ झिझकते हुए कहा—महन्तजी ने मजबूर कर दिया। क्या करता।

    सलीम ने दोस्ती की आड़ ली—मगर इतना तो सोचते कि यह मेरा इलाका है और यहाँ की सारी जिम्मेदारी मुझ पर है। मैंने सड़क के किनारे अक्सर गाँवों में लोगों के जमाव देखे। कहीं-कहीं तो मेरी मोटर पर पत्थर भी कर्मभूमि

    फेंके गये। यह अच्छे आसार नहीं हैं। मुझे खौफ़ है, कोई हंगामा न हो जाय। अपने हक के लिए या बेजा जुल्म के खिलाफ़ रिआया में जोश हो, तो मैं इसे बुरा नहीं समझता, लेकिन यह लोग कायदे-कानून के अन्दर रहेंगे, मुझे इसमें शक है। तुमने गूगों को आवाज़ दी, सोतों को जगाया; लेकिन ऐसी तहरीक के लिए जितने जब्त और सब्र की जरूरत है, उसका दसवाँ हिस्सा भी मुझे नजर नहीं आता।

    अमर को इस कथन में शासन-पक्ष की गन्ध आयी। बोला—तुम्हें यकीन है कि तुम भी वही गलती नहीं कर रहे जो हुक्काम किया करते हैं? जिनकी जिन्दगी आराम और फ़रागत से गुजर रही है, उनके लिए सब्र और जब्त की हाँक लगाना आसान है, लेकिन जिनकी जिन्दगी का हरेक दिन एक नयी मुसीबत है, वह नजात के अपनी जनवासी चाल से आने का इन्तजार नहीं कर सकते। वह उसे खींच लाना चाहते हैं, और जल्द-से-जल्द।

    'मगर नजात के पहले कयामत आयेगी, यह भी याद रहे।'

    'हमारे लिए यह अंधेर ही कयामत है। जब पैदावार लागत से भी कम हो, तो लगान की गुंजाइश कहाँ। उस पर भी हम आठ आने पर राजी थे; मगर बारह आने हम किसी तरह नहीं दे सकते। आखिर सरकार किफायत क्यों नहीं करती? पुलिस और फौज और इन्तजाम पर क्यों इतनी बेदर्दी से रुपये उड़ाये जाते हैं? किसान गूंगे हैं, बेबस हैं, कमजोर हैं। क्या इसलिए सारा नजला उन्हीं पर गिरना चाहिए?'

    सलीम ने अधिकार-गर्व से कहा–इसका नतीजा क्या होगा, जानते हो? गांव-के-गाँव बरबाद हो जायेंगे, फौजी कानून जारी हो जायगा, जायद पुलिस बैठा दी जायगी, फ़स्लें नीलाम कर दी जायगी, जमीनें जब्त हो जायँगी। कयामत का सामना होगा।

    अमरकान्त ने अविचलित भाव से कहा–जो कुछ भी हो, मर-मिटना जुल्म के सामने सिर झुकाने से अच्छा है।

    मदरसे के सामने हुजूम बढ़ता जाता था। सलीम ने विवाद का अन्त करने के लिए कहा—चलो इस मुआमले पर रास्ते में बहस करेंगे। देर हो रही है।

    अमर ने चटपट कुरता गले में डाला और आत्मानन्द से दो-चार जरूरी बाते करके आ गया। दोनों आदमी आकर मोटर पर बैठे। मोटर चली तो सलीम की आँखों में आँसू डबडबाये हुए थे।

    अमर ने सशंक होकर पूछा–मेरे साथ दगा तो नहीं कर रहे हो?

    सलीम ने अमर के गले लिपट कर कहा–इसके सिवा और दूसरा रास्ता न था। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें पुलिस के हाथों ज़लील किया जाय।

    'तो ज़रा ठहरो, मैं अपनी कुछ ज़रूरी चीज़ें तो ले लूँ।'

    'हाँ हाँ, ले लो, लेकिन राज़ खुल गया, तो यहाँ मेरी लाश नज़र आयेगी।'

    'तो चलो कोई मुज़ायका नहीं।'

    गाँव के बाहर निकले ही थे कि मुन्नी आती हई दिखाई दी। अमर ने मोटर रुकवाकर पूछा–तुम कहाँ गयी थीं मुन्नी? धोबी से मेरे कपड़े लेकर रख लेना, सलोनी काकी के लिए मेरी कोठरी में ताक पर दवा रखी है। पिला देना।

    मुन्नी ने सहमी हुई आँखों से देखकर पूछा–तुम कहाँ जाते हो?

    'एक दोस्त के यहाँ दावत खाने जा रहा हूँ।'

    मोटर चली। मुन्नी ने पूछा–कब तक आओगे?

    अमर ने सिर निकालकर उसे दोनों हाथ जोड़कर कहा–जब भाग्य लाये।

    साथ पढ़े, साथ के खेले, दो अभिन्न मित्र, जिनमें धौल धप्पा, हँसी-मज़ाक सब कुछ होता रहता था, परिस्थितियों के चक्कर में पड़कर दो अलग रास्तों पर जा रहे थे। लक्ष्य दोनों का एक था, उद्देश्य एक, दोनों ही देशभक्त, दोनों ही किसानों के शुभेच्छु; पर एक अफसर था, दूसरा क़ैदी। दोनों उठे हुए बैठे थे, पर जैसे बीच में कोई दीवार खड़ी हो। अमर प्रसन्न था, मानो शहादत के ज़ीने पर चढ़ रहा हो। सलीम दुःखी था, जैसे भरी सभा में अपनी जगह से उठा दिया गया हो। विकास के सिद्धान्त खुली सभा में समर्थन करके उसकी आत्मा विजयी होती, निरंकुशता की शरण लेकर वह जैसे कोठरी में छिपा बैठा था।

    सहसा सलीम ने मुसकराने की चेष्टा करके कहा–क्यों अमर, मुझसे खफा हो! ⁠ अमर ने प्रसन्न मुख से कहा–बिल्कुल नहीं। मैं तुम्हें अपना वही पुराना दोस्त समझ रहा हूँ। उसूलों की लड़ाई हमेशा होती रही है और होता रहेगी! दोस्ती में इससे फ़र्क नहीं आता।

    सलीम ने अपनी सफ़ाई दी–भाई, इन्सान इन्सान है, दो मुखालिफ गिरोहों में आकर दिल में कीना या मलाल पैदा हो जाय, तो ताज्जुब नहीं। पहले डी० एस० पी० को भेजने की सलाह थी; पर मैंने इसे मुनासिव न समझा।

    'इसके लिए मैं तुम्हारा बड़ा एहसानमन्द हूँ। मेरे ऊपर कोई मुकदमा चलाया जायगा?'

    'हाँ तुम्हारी तकरीरों की रिपोर्ट मौजूद है, और शहादतें भी जमा हो गयी है। तुम्हारा क्या खयाल है, तुम्हारी गिरफ्तारी से यह शोरिश दब जायगी या नहीं?'

    'कुछ कह नहीं सकता। अगर मेरी गिरफ्तारी या सज़ा से दब जाय, तो इसका दब जाना ही अच्छा।'

    उसने एक क्षण के बाद फिर कहा–रिआया को मालूम है कि उनके क्या-क्या हक़ हैं। यह भी मालूम है कि हकों की हिफ़ाज़त के लिए कुरबानियाँ करनी पड़ती हैं। मेरा फ़र्ज़ यहीं तक ख़त्म हो गया। अब वह जानें और उनका काम जाने। मुमकिन है, सख्तियों से दब जायँ, मुमकिन है, न दबें; लेकिन दबें या उठे, उन्हें चोट ज़रूर लगी है। रिआया का दब जाना, किसी सरकार की कामयाबी की दलील नहीं है।

    मोटर के जाते ही सत्य मुन्नी के सामने चमक उठा। वह आवेश में चिल्ला उठी–लाला पकड़ गये! और उसी आवेश में मोटर के पीछे दौड़ी। चिल्लाती जाती थी–लाला पकड़ गये।

    वर्षाकाल में किसानों की हार में बहुत काम नहीं होता। अधिकतर लोग घरों पर होते हैं। मुन्नी की आवाज मानो खतरे का बिगुल थी। दम-के-दम में सारे गाँव में यह आवाज़ गूँज उठी–भैया पकड़ गये!

    स्त्रियाँ घरों में से निकल पड़ी–पकड़ गये!

    क्षण-भर में सारा गाँव जमा हो गया और सड़क की तरफ दौड़ा। मोटर घुमकर सड़क से जा रही थी। पगडंडियों का एक सीधा रास्ता था। लोगों ने अनुमान किया, अभी इस रास्ते मोटर पकड़ी जा सकती है। सब उसी रास्ते दौड़े।

    काशी–मरना तो एक दिन है ही।

    मुन्नी ने कहा–पकड़ना है, तो सबको पकड़ें। ले चलें सबको।

    पयाग बोला—सरकार का काम है चोर बदमाशों को पकड़ना या ऐसो को जो दूसरों के लिए जान लड़ा रहे हैं? वह देखो मोटर आ रही है। बस, सब रास्ते में खड़े हो जाओ। कोई न हटना, चिल्लाने दो।

    सलीम मोटर रोकता हुआ बोला–अब कहो भाई, निकालूँ पिस्तौल?

    अमर ने उसका हाथ पकड़कर कहा–नहीं-नहीं, मैं इन्हें समझाये देता हूँ।

    'मझे पुलिस के दो-चार आदमियों को साथ ले लेना था।'

    "घबड़ाओ मत, पहले मैं मरूँगा, फिर तुम्हारे ऊपर कोई हाथ उठायेगा।'

    अमर ने तुरन्त मोटर से सिर निकालकर कहा–बहनो और भाइयो, अब मझे विदा कीजिए। आप लोगों के सत्संग में मुझे जितना स्नेह और सुख मिला, उसे मैं कभी भूल नहीं सकता। मैं परदेशी मुसाफिर था। आपने मुझे स्थान दिया, आदर दिया, प्रेम दिया। मुझसे भी जो कुछ सेवा हो सकी, वह मैंने की। अगर मुझसे कुछ भूल-चूक हुई हो, तो क्षमा करना। जिस काम का बीड़ा उठाया है, उसे छोड़ना मत, यही मेरी याचना है। सब काम ज्यों-का-त्यों होता रहे, यही सबसे बड़ा उपहार है, जो आप मुझे दे सकते हैं। प्यारे बालको, मैं जा रहा हूँ, लेकिन मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा।

    काशी ने कहा–भैया, हम सब तुम्हारे साथ चलने को तैयार हैं।

    अमर ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—नेवता तो मझे मिला है, तुम लोग कैसे जाओगे?

    किसी के पास इसका जवाब न था। भैया बात ही ऐसी कहते हैं कि किसी से उसका जवाब नहीं बन पड़ता।

    मुन्नी सबसे पीछे खड़ी थी, उसकी आँखें सजल थीं। इस दशा में अमर के सामने कैसे जाय। हृदय में जिस दीपक को जलाये, वह अपने अँधेरे जीवन में प्रकाश का स्वप्न देख रही थी, वह दीपक कोई उसके हदय से निकाले लिये जाता है। वह सूना अन्धकार क्या फिर वह सह सकेगी!

    सहसा उसने उत्तेजित होकर कहा–इतने जने खड़े ताकते क्या हो! उतार लो मोटर से! जन-समूह में एक हलचल मची। एक ने दूसरे की ओर कैदियों की तरह देखा; कोई बोला नहीं।

    मुन्नी ने फिर ललकारा–खड़े ताकते क्या हो, तुम लोगों में कुछ हया है या नहीं! जब पुलिस और फौज इलाके को खून से रंग देती, तभी…

    अमर ने मोटर से निकलकर कहा—मुन्नी, तुम बुद्धिमती होकर ऐसी बातें कर रही हो! मेरे मुँह में कालिख मत लगाओ।

    मुन्नी उन्मत्तों की भाँति बोली—में बुद्धिमान् नहीं, मैं तो मूरख हूँ, गॅवारिन हूँ। आदमी एक-एक पत्ती के लिए सिर कटा देता है, एक-एक बात पर जान दे देता है। क्या हम लोग खड़े ताकते रहें और तुम्हें कोई पकड़ ले जाय? तुमने कोई चोरी की है, डाका मारा है?

    कई आदमी उत्तेजित होकर मोटर की ओर बढ़े; पर अमरकान्त की डाँट सुनकर ठिठक गये–क्या करते हो! पीछे हट जाओ। अगर मेरे इतने दिनों की सेवा और शिक्षा का यही फल है, तो मैं कहूँगा कि मेरा सारा परिश्रम धूल में मिल गया। यह हमारा धर्म-युद्ध है और हमारी जीत हमारे त्याग, हमारे बलिदान और हमारे सत्य पर है।

    जादू का-सा असर हुआ। लोग रास्ते से हट गये। अमर मोटर में बैठ गया और मोटर चली।

    मुन्नी ने आँखों में क्षोभ और क्रोध के आँसू भर अमरकान्त को प्रणाम किया। मोटर के साथ जैसे उसका हृदय भी उड़ा जाता हो।

    तीसरा भाग

    १

    लाला समरकान्त की जिन्दगी के सारे मंसूबे धूल में मिल गये। उन्होंने कल्पना की थी कि जीवन-संध्या में अपना सर्वस्व बेटे को सौंपकर और बेटी का विवाह करके किसी एकान्त में बैठकर भगवत्-भजन में विश्राम लेंगे, लेकिन मन की मन में ही रह गई। यह मानी हुई बात थी, कि वह अन्तिम साँस तक विश्राम लेने वाले प्राणी न थे। लड़के को बढ़ते देखकर उनका हौसला और बढ़ता, लेकिन कहने को हो गया। बीच में अमर कुछ ढरें पर आता हुआ जान पड़ता था, लेकिन जब उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई, तो अब उससे क्या आशा की जा सकती थी। अमर में और चाहे जितनी बुराइयां हों उसके चरित्र के विषय में कोई सन्देह न था, पर कुसंगति में पड़कर उसने धर्म भी खोया, चरित्र भी खोया, और कुल मर्यादा भी खोई। लाला जी कुत्सित सम्बन्ध को बहुत बुरा न समझते थे। रईसों में यह प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। वह रईस ही क्या, जो इस तरह का खेल न खेले, लेकिन धर्म छोड़ने को तैयार हो जाना, खुले खजाने समाज की मर्यादाओ को तोड़ डालना यह तो पागलपन है, बल्कि गधापन।

    समरकान्त का व्यावहारिक जीवन उनके धार्मिक जीवन से बिल्कुल अलग था। व्यवहार और व्यापार में वह धोखा-धड़ी, छल-प्रपंच, सब कुछ क्षम्य समझते थे। व्यापार-नीति में सन या कपास में कचरा भर देना, घी में आलू या घुइयाँ गबड़ देना, औचित्य से बाहर न था, पर बिना स्नान किये वह मुंह में पानी न डालते थे। इन चालीस वर्षों में ऐसा शायद ही कोई दिन हुआ हो, कि उन्होंने सन्ध्या-समय की आरती न ली हो और तुलसी-दल माथे पर न चढ़ाया हो। एकादशी को बराबर निर्जल व्रत रखते थे। सारांश यह कि उनका धर्म आडम्बर-मात्र था, जिसका उनके जीवन से कोई प्रयोजन न था।

    सलीम के घर से लौटकर पहला काम जो लाला ने किया, वह सुखदा को

    फटकारना था। इसके बाद नैना की बारी आयो। दोनों को रुलाकर वह अपने कमरे में गये और खुद रोने लगे।

    रातोरात यह खबर सारे शहर में फैल गयी। तरह-तरह की मिस्कौट होने लगी। समरकान्त दिन भर घर से नहीं निकले। यहाँ तक कि आज गंगा-स्नान करने भी न गये। कई असामी रुपये लेकर आये। मुनीम तिजोरी की कुंजी माँगने गया। लालाजी ने ऐसा डाँटा कि वह चुपके से बाहर निकल आया। असामी रुपये लेकर लौट गये।

    खिदमतगार ने चाँदी का गड़गड़ा लाकर सामने रख दिया। तंबाकू जल गया, लालाजी ने निगाली भी मुँह में न ली।

    दस बजे सुखदा ने आकर कहा–आप क्या भोजन कीजिएगा?

    लालाजी ने उसे कठोर आँखों से देखकर कहा–मुझे भूख नहीं हैं।

    सुखदा चली गयी। दिन भर किसी ने कुछ न खाया।

    नौ बजे रात को नैना ने आकर कहा–दादा, आरती में न जाइएगा?

    लालाजी चौंके–हाँ हाँ, जाऊँगा क्यों नहीं। तुम लोगों ने कुछ खाया कि नहीं?

    नैना बोली–किसी की इच्छा ही न थी। कौन खाता?

    'तो क्या उसके पीछे सारा घर प्राण देगा?'

    सुखदा इसी समय तैयार होकर आ गयी। बोली–जब आप ही प्राण दे रहे हैं, तो दूसरों पर बिगड़ने का आपको क्या अधिकार है?

    लालाजी चादर ओढ़कर जाते हुए बोले–मेरा क्या बिगड़ा है कि में प्राण दूँ। यहाँ था, तो मुझे कौन-सा सुख देता था। मैंने तो बेटे का सुख ही नहीं जाना। तब भी जलाता था, अब भी जला रहा है। चलो भोजन बनाओ मैं आकर खाऊँगा, जो गया उसे जाने दो। जो हैं उन्हीं को उस जानेवाले की कसर पूरी करनी है। मैं क्यो प्राण देने लगा। मैंने पुत्र को जन्म दिया। उसका विवाह भी मैने किया। सारी गृहस्थी मैंने बनायी। इसके चलाने का भार मुझ पर है। मुझे अब बहुत दिन जीना है। मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि इस लौंडे को यह सूझी क्या? पठानिन की पोती अप्सरा नहीं हो सकती। फिर उसके पीछे वह क्यों इतना लट्टू हो गया? उसका तो ऐसा स्वभाव न था। इसी को भगवान् की लीला कहते हैं। ⁠ ठाकुर-द्वारे में लोग जमा हो गये। लाला समरकान्त को देखते ही कई सज्जनों ने पूछा–अमर कहीं चले गये क्या सेठजी! क्या बात हुई?

    लालाजी ने जैसे इस बात को काटते हुए कहा–कुछ नहीं, उसकी बहुत दिनों से घूमने-धामने की इच्छा थी, पूर्वजन्म का तपस्वी है कोई, उसका बस चले, तो मेरी सारी गृहस्थी एक दिन में लुटा दे। मझसे यह नहीं देखा जाता। बस, यही झगड़ा है। मैंने गरीबी का मजा भी चखा है। अमीरी का मजा भी चखा है। उसने अभी गारीबी का मज़ा नहीं चखा। साल छ: महीने उसका मजा चख लेगा, तो आँख खुल जायँगी। तब उसे मालूम होगा कि जनता की सेवा भी वही लोग कर सकते हैं, जिनके पास धन है। घर में भोजन का आधार न होता, तो मेम्बरी भी न मिलती।

    किसी को और कुछ पूछने का साहस न हुआ। मगर मूर्ख पुजारी पूछ ही बैठा–सुना, किसी जुलाहे की लड़की से फंस गये थे?

    यह अक्खड़ प्रश्न सुनकर लोगों ने जीभ काटकर मुँह फेर लिये। लालाजी ने पुजारी को रक्त भरी आँखों से देखा और ऊँचे स्वर में बोले–हाँ, फँस गये थे, तो फिर ? कृष्ण भगवान् ने एक हजार रानियों के साथ नहीं भोग किया था? राजा शान्तनु ने मछुए की कन्या से नहीं भोग किया था? कौन राजा है, जिसके महल में दो सौ रानियाँ न हों? अगर उसने किया, तो कोई नयी बात नहीं की। तुम-जैसों के लिए यही जवाब हैं। समझदारों के लिए यह जवाब है कि जिसके घर में अप्सरा-सी स्त्री हो, वह क्यों जूठी पत्तल चाटने लगा। मोहन-भोग खानेवाले आदमी चबैने पर नहीं गिरते।

    यह कहते हुए लालाजी प्रतिमा के संमुख गये; पर आज उनके मन में वह श्रद्धा न थी। दुःखी आशा से ईश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से। दुःखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढ़ती जाती है। सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है। वह ईश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है। लालाजी का व्यथित हृदय आज सोने और रेशम से जगमगाती हुई प्रतिमा में धैर्य और सन्तोष का सन्देश न पा सका। कल तक यही प्रतिमा उन्हें बल और उत्साह प्रदान करती थी। उसी प्रतिमा से आज उनका विपद्ग्रस्त मन विद्रोह कर रहा था। उनकी भक्ति का यही पुरस्कार है? उनके स्नान, व्रत और निष्ठा का यही फल है?

    वह चलने लगे, तो ब्रह्मचारी जी बोले–लालाजी, अबकी यहाँ श्री वाल्मीकीय कथा का विचार है।

    लालाजी ने पीछे फिरकर कहा–हाँ हाँ, होने दो।

    एक बाबू साहब ने कहा–यहाँ तो किसी में इतना सामर्थ्य नहीं है।

    समरकान्त ने उत्साह से कहा–हाँ हाँ, मैं उसका सारा भार लेने को तैयार हूँ। भगवद् भजन से बढ़कर धन का सदुपयोग और क्या होगा?

    उनका यह उत्साह देखकर लोग चकित हो गये। वह कृपण थे और किसी धर्मकार्य में अग्रसर न होते थे। लोगों ने समझा था, इससे दस-बीस रुपये ही मिल जायँ तो बहुत है ! उन्हें यों बाजी मारते देखकर और लोग भी गरमाये।

    सेठ धनीराम ने कहा–आपसे सारा भार लेने को नहीं कहा जाता लालाजी ! आप लक्ष्मीपात्र हैं सही; पर औरों को भी तो श्रद्धा है। चन्दे से होने दीजिए।

    समरकान्त बोले–तो और लोग आपस में चन्दा कर लें। जितनी कमी रह जायगी, वह मैं पूरी कर दूँगा।

    धनीराम को भय हुआ, कहीं, यह महाशय सस्ते न छूट जायँ। बोले–यह नहीं, आपको जितना लिखना हो लिख दें।

    समरकान्त ने होड़ के भाव से कहा–पहले आप लिखिए।

    काग़ज़, क़लम, दावात लाया गया। धनीराम ने लिखा १०१)

    समरकान्त ने ब्रह्मचारी जी से पूछा–आपके अनुमान से कुल कितना खर्च होगा?

    ब्रह्मचारी जी का तख़मीना एक हजार का था।

    समरकान्त ने ८९९) लिख दिये, और वहाँ से चल दिये। सच्ची श्रद्धा की कमी को वह धन से पूरा करना चाहते थे। धर्म की क्षति जिस अनुपात से होती है, उसी अनुपात से आडम्बर की वृद्धि होती है।

    This work is in the public domain in the United States because it was first published outside the United States (and not published in the U.S. within 30 days), and it was first published before 1989 without complying with U.S. copyright formalities (renewal and/or copyright notice) and it was in the public domain in its home country on the URAA date (January 1, 1996 for most countries).

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    तीसरा भाग

    १

    लाला समरकान्त की जिन्दगी के सारे मंसूबे धूल में मिल गये। उन्होंने कल्पना की थी कि जीवन-संध्या में अपना सर्वस्व बेटे को सौंपकर और बेटी का विवाह करके किसी एकान्त में बैठकर भगवत्-भजन में विश्राम लेंगे, लेकिन मन की मन में ही रह गई। यह मानी हुई बात थी, कि वह अन्तिम साँस तक विश्राम लेने वाले प्राणी न थे। लड़के को बढ़ते देखकर उनका हौसला और बढ़ता, लेकिन कहने को हो गया। बीच में अमर कुछ ढरें पर आता हुआ जान पड़ता था, लेकिन जब उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई, तो अब उससे क्या आशा की जा सकती थी। अमर में और चाहे जितनी बुराइयां हों उसके चरित्र के विषय में कोई सन्देह न था, पर कुसंगति में पड़कर उसने धर्म भी खोया, चरित्र भी खोया, और कुल मर्यादा भी खोई। लाला जी कुत्सित सम्बन्ध को बहुत बुरा न समझते थे। रईसों में यह प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। वह रईस ही क्या, जो इस तरह का खेल न खेले, लेकिन धर्म छोड़ने को तैयार हो जाना, खुले खजाने समाज की मर्यादाओ को तोड़ डालना यह तो पागलपन है, बल्कि गधापन।

    समरकान्त का व्यावहारिक जीवन उनके धार्मिक जीवन से बिल्कुल अलग था। व्यवहार और व्यापार में वह धोखा-धड़ी, छल-प्रपंच, सब कुछ क्षम्य समझते थे। व्यापार-नीति में सन या कपास में कचरा भर देना, घी में आलू या घुइयाँ गबड़ देना, औचित्य से बाहर न था, पर बिना स्नान किये वह मुंह में पानी न डालते थे। इन चालीस वर्षों में ऐसा शायद ही कोई दिन हुआ हो, कि उन्होंने सन्ध्या-समय की आरती न ली हो और तुलसी-दल माथे पर न चढ़ाया हो। एकादशी को बराबर निर्जल व्रत रखते थे। सारांश यह कि उनका धर्म आडम्बर-मात्र था, जिसका उनके जीवन से कोई प्रयोजन न था।

    सलीम के घर से लौटकर पहला काम जो लाला ने किया, वह सुखदा को

    फटकारना था। इसके बाद नैना की बारी आयो। दोनों को रुलाकर वह अपने कमरे में गये और खुद रोने लगे।

    रातोरात यह खबर सारे शहर में फैल गयी। तरह-तरह की मिस्कौट होने लगी। समरकान्त दिन भर घर से नहीं निकले। यहाँ तक कि आज गंगा-स्नान करने भी न गये। कई असामी रुपये लेकर आये। मुनीम तिजोरी की कुंजी माँगने गया। लालाजी ने ऐसा डाँटा कि वह चुपके से बाहर निकल आया। असामी रुपये लेकर लौट गये।

    खिदमतगार ने चाँदी का गड़गड़ा लाकर सामने रख दिया। तंबाकू जल गया, लालाजी ने निगाली भी मुँह में न ली।

    दस बजे सुखदा ने आकर कहा–आप क्या भोजन कीजिएगा?

    लालाजी ने उसे कठोर आँखों से देखकर कहा–मुझे भूख नहीं हैं।

    सुखदा चली गयी। दिन भर किसी ने कुछ न खाया।

    नौ बजे रात को नैना ने आकर कहा–दादा, आरती में न जाइएगा?

    लालाजी चौंके–हाँ हाँ, जाऊँगा क्यों नहीं। तुम लोगों ने कुछ खाया कि नहीं?

    नैना बोली–किसी की इच्छा ही न थी। कौन खाता?

    'तो क्या उसके पीछे सारा घर प्राण देगा?'

    सुखदा इसी समय तैयार होकर आ गयी। बोली–जब आप ही प्राण दे रहे हैं, तो दूसरों पर बिगड़ने का आपको क्या अधिकार है?

    लालाजी चादर ओढ़कर जाते हुए बोले–मेरा क्या बिगड़ा है कि में प्राण दूँ। यहाँ था, तो मुझे कौन-सा सुख देता था। मैंने तो बेटे का सुख ही नहीं जाना। तब भी जलाता था, अब भी जला रहा है। चलो भोजन बनाओ मैं आकर खाऊँगा, जो गया उसे जाने दो। जो हैं उन्हीं को उस जानेवाले की कसर पूरी करनी है। मैं क्यो प्राण देने लगा। मैंने पुत्र को जन्म दिया। उसका विवाह भी मैने किया। सारी गृहस्थी मैंने बनायी। इसके चलाने का भार मुझ पर है। मुझे अब बहुत दिन जीना है। मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि इस लौंडे को यह सूझी क्या? पठानिन की पोती अप्सरा नहीं हो सकती। फिर उसके पीछे वह क्यों इतना लट्टू हो गया? उसका तो ऐसा स्वभाव न था। इसी को भगवान् की लीला कहते हैं। ⁠ ठाकुर-द्वारे में लोग जमा हो गये। लाला समरकान्त को देखते ही कई सज्जनों ने पूछा–अमर कहीं चले गये क्या सेठजी! क्या बात हुई?

    लालाजी ने जैसे इस बात को काटते हुए कहा–कुछ नहीं, उसकी बहुत दिनों से घूमने-धामने की इच्छा थी, पूर्वजन्म का तपस्वी है कोई, उसका बस चले, तो मेरी सारी गृहस्थी एक दिन में लुटा दे। मझसे यह नहीं देखा जाता। बस, यही झगड़ा है। मैंने गरीबी का मजा भी चखा है। अमीरी का मजा भी चखा है। उसने अभी गारीबी का मज़ा नहीं चखा। साल छ: महीने उसका मजा चख लेगा, तो आँख खुल जायँगी। तब उसे मालूम होगा कि जनता की सेवा भी वही लोग कर सकते हैं, जिनके पास धन है। घर में भोजन का आधार न होता, तो मेम्बरी भी न मिलती।

    किसी को और कुछ पूछने का साहस न हुआ। मगर मूर्ख पुजारी पूछ ही बैठा–सुना, किसी जुलाहे की लड़की से फंस गये थे?

    यह अक्खड़ प्रश्न सुनकर लोगों ने जीभ काटकर मुँह फेर लिये। लालाजी ने पुजारी को रक्त भरी आँखों से देखा और ऊँचे स्वर में बोले–हाँ, फँस गये थे, तो फिर ? कृष्ण भगवान् ने एक हजार रानियों के साथ नहीं भोग किया था? राजा शान्तनु ने मछुए की कन्या से नहीं भोग किया था? कौन राजा है, जिसके महल में दो सौ रानियाँ न हों? अगर उसने किया, तो कोई नयी बात नहीं की। तुम-जैसों के लिए यही जवाब हैं। समझदारों के लिए यह जवाब है कि जिसके घर में अप्सरा-सी स्त्री हो, वह क्यों जूठी पत्तल चाटने लगा। मोहन-भोग खानेवाले आदमी चबैने पर नहीं गिरते।

    यह कहते हुए लालाजी प्रतिमा के संमुख गये; पर आज उनके मन में वह श्रद्धा न थी। दुःखी आशा से ईश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से। दुःखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढ़ती जाती है। सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है। वह ईश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है। लालाजी का व्यथित हृदय आज सोने और रेशम से जगमगाती हुई प्रतिमा में धैर्य और सन्तोष का सन्देश न पा सका। कल तक यही प्रतिमा उन्हें बल और उत्साह प्रदान करती थी। उसी प्रतिमा से आज उनका विपद्ग्रस्त मन विद्रोह कर रहा था। उनकी भक्ति का यही पुरस्कार है? उनके स्नान, व्रत और निष्ठा का यही फल है?

    वह चलने लगे, तो ब्रह्मचारी जी बोले–लालाजी, अबकी यहाँ श्री वाल्मीकीय कथा का विचार है।

    लालाजी ने पीछे फिरकर कहा–हाँ हाँ, होने दो।

    एक बाबू साहब ने कहा–यहाँ तो किसी में इतना सामर्थ्य नहीं है।

    समरकान्त ने उत्साह से कहा–हाँ हाँ, मैं उसका सारा भार लेने को तैयार हूँ। भगवद् भजन से बढ़कर धन का सदुपयोग और क्या होगा?

    उनका यह उत्साह देखकर लोग चकित हो गये। वह कृपण थे और किसी धर्मकार्य में अग्रसर न होते थे। लोगों ने समझा था, इससे दस-बीस रुपये ही मिल जायँ तो बहुत है ! उन्हें यों बाजी मारते देखकर और लोग भी गरमाये।

    सेठ धनीराम ने कहा–आपसे सारा भार लेने को नहीं कहा जाता लालाजी ! आप लक्ष्मीपात्र हैं सही; पर औरों को भी तो श्रद्धा है। चन्दे से होने दीजिए।

    समरकान्त बोले–तो और लोग आपस में चन्दा कर लें। जितनी कमी रह जायगी, वह मैं पूरी कर दूँगा।

    धनीराम को भय हुआ, कहीं, यह महाशय सस्ते न छूट जायँ। बोले–यह नहीं, आपको जितना लिखना हो लिख दें।

    समरकान्त ने होड़ के भाव से कहा–पहले आप लिखिए।

    काग़ज़, क़लम, दावात लाया गया। धनीराम ने लिखा १०१)

    समरकान्त ने ब्रह्मचारी जी से पूछा–आपके अनुमान से कुल कितना खर्च होगा?

    ब्रह्मचारी जी का तख़मीना एक हजार का था।

    समरकान्त ने ८९९) लिख दिये, और वहाँ से चल दिये। सच्ची श्रद्धा की कमी को वह धन से पूरा करना चाहते थे। धर्म की क्षति जिस अनुपात से होती है, उसी अनुपात से आडम्बर की वृद्धि होती है।

    २

    अमरकान्त का पत्र लिये हुए नैना अन्दर आयी, तो सुखदा ने पूछा–किसका पत्र है? ⁠ नैना ने खत पाते ही पढ़ डाला था। बोली–भैया का।

    सुखदा ने पूछा–अच्छा! उनका खत है ? कहाँ हैं ?

    'हरिद्वार के पास किसी गाँव में हैं।'

    आज पाँच महीनों से दोनों में अमरकान्त की चर्चा न हई थी। मानों वह कोई घाव था, जिसको छूते दोनों ही के दिल काँपते थे। सुखदा ने फिर कुछ न पूछा। बच्चे के लिए फ्राक सी रही थी। फिर सीने लगी।

    नैना पत्र का जवाब लिखने लगी। इसी वक्त वह जवाब भेज देगी। आज पाँच महीने में आपको मेरी सुधि आई है। जाने क्या-क्या लिखना चाहती थी। कई घंटों के बाद वह खत तैयार हुआ, जो हम पहले ही देख चुके हैं। खत लेकर वह भाभी को दिखाने गयी। सूखदा ने देखने की ज़रूरत न समझी।

    नैना ने हताश होकर पूछा–तुम्हारी तरफ़ से भी कुछ लिख दूँ ?

    'नहीं कुछ नहीं।'

    'तुम्हीं अपने हाथ से लिख दो !'

    'मुझे कुछ नहीं लिखना है।'

    नैना रुआँसी होकर चली गयी। खत डाक में भेज दिया गया।

    सुखदा को अमर के नाम से भी चिढ़ है। उसके कमरे में अमर की एक तसवीर थी, उसे उसने तोड़कर फेंक दिया था। अब उसके पास अमर की याद दिलानेवाली कोई चीज न थी। यहाँ तक कि बालक से भी उसका जी हट गया था। वह अब अधिकतर नैना के पास रहता था। स्नेह के बदले वह अब उस पर दया करती थी; पर इस पराजय ने उसे हताश नहीं किया, उसका आत्माभिमान कई गुना बढ़ गया है। आत्मनिर्भर भी अब कहीं ज्यादा हो गयी है। वह अब किसी की अपेक्षा नहीं करना चाहती। स्नेह के दबाव के सिवा और किसी दबाव से उसका मन विद्रोह करने लगता है। उसकी विलासिता मानो मान के वन में खो गयी है !

    लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सकीना से उसे लेशमात्र भी द्वेष नहीं है। वह उसे भी अपनी ही तरह, बल्कि अपने से अधिक दुःखी समझती है। उसकी कितनी बदनामी हुई, और अब बेचारी उस निर्दयी के नाम को रो रही है। वह सारा उन्माद जाता रहा। ऐसे छिछोरों का एतबार ही क्या !

    वहाँ कोई दूसरा शिकार फाँस लिया होगा। उससे मिलने की उसे बड़ी इच्छा थी, पर सोच कर रह जाती थी।

    एक दिन पठानिन से मालूम हुआ कि सकीना बहुत बीमार है। उस दिन सुखदा ने उससे मिलने का निश्चय कर लिया। नैना को भी साथ ले लिया। पठानिन ने रास्ते में कहा–मेरे सामने तो उसका मुँह ही बन्द हो जायगा। मुझसे तो तभी से बोल-चाल नहीं है। मैं तुम्हें घर दिखाकर कहीं चली जाऊँगी। ऐसी अच्छी शादी हो रही थी, इसने मंजूर ही न किया। मैं भी चुप हूँ, देखूँ कब तक उसके नाम को बैठी रहती है। मेरे जीते-जी तो लाला घर में क़दम रखने न पायेंगे। हाँ, पीछे की नहीं कह सकती।

    सुखदा ने छेड़ा–किसी दिन उनका खत आ जाय और सकीना चली जाय, तो क्या करोगी?

    बुढिया आँखें निकालकर बोली–मजाल है कि इस तरह चली जाय। खून पी जाऊँ।

    सुखदा ने फिर छेड़ा–जब वह मुसलमान होने को कहते हैं, तब तुम्हें क्या इन्कार है?

    पठानिन ने कानों पर हाथ रखकर कहा–अरे बेटा! जिसका जिन्दगी भर नमक खाया, उसका घर उजाड़कर अपना घर बसाऊँ! यह शरीफ़ों का काम नहीं है। मेरी तो समझ ही में नहीं आता, इस छोकरी में क्या देखकर भैया रीझ पड़े।

    अपना घर दिखाकर पठानिन तो पड़ोस के एक घर में चली गयी, दोनों युवतियों ने सकीना के द्वार की कुंडी खटखटाई। सकीना ने उठकर द्वार खोल दिया। दोनों को देखकर वह घबड़ा-सी गयी। जैसे कहीं भागना चाहती है। कहाँ बैठाये, क्या सत्कार करे !

    सुखदा ने कहा–तुम परेशान न हो बहन, हम इस खाट पर बैठ जाते हैं। तुम तो जैसे घुलती जाती हो। एक वेवफ़ा मर्द के चकमे में पड़कर क्या जान दे दोगी?

    सकीना का पीला चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसे ऐसा जान पड़ा कि सुखदा मुझसे जवाब तलब कर रही है–तुमने मेरा बना-बनाया घर क्यों उजाड़ दिया ? इसका सकीना के पास कोई जवाब न था। वह कांड कुछ इस

    आकस्मिक रूप से हुआ कि वह स्वयं कुछ न समझ सकी। पहले बादल का एक टुकड़ा आकाश के एक कोने में दिखाई दिया। देखते-देखते सारा आकाश मेघाच्छन्न हो गया और ऐसे ज़ोर की आँधी चली कि वह खुद उसमें उड़ गयी। वह क्या बताये, कैसे क्या हुआ। बादल के उस टुकड़े को देखकर कौन कह सकता था, आँधी आ रही है।

    उसने सिर झुकाकर कहा–औरत की ज़िन्दगी और है ही किसलिए बहनजी? वह अपने दिल से लाचार है, जिससे वफ़ा की उम्मीद करती है, वही दग़ा करता है। उसका क्या अख्तियार, लेकिन बेवफ़ाओं से मुहब्बत न हो, तो मुहब्बत में मज़ा ही क्या रहे। शिकवा-शिकायत, रोना-धोना, बेताबी और बेकारी यही तो मुहब्बत के मजे हैं, फिर मैं तो वफ़ा की उम्मीद भी नहीं करती थी। मैं उस वक्त भी इतना जानती थी कि यह आँधी दो-चार घड़ी की मेहमान है, लेकिन मेरी तस्कीन के लिए तो इतना ही काफी था कि जिस आदमी की मैं दिल में सबसे ज्यादा इज्जत करने लगी थी, उसने मुझे इस लायक तो समझा। मैं इस काग़ज़ की नाव पर बैठकर भी सागर को पार कर दूँगी।

  • कपालकुण्डला

    कपालकुण्डला

    Aproximadamente 45.432 palavras.

    कपालकुण्डला
    https://hi.wikisource.org/wiki/कपालकुण्डला

    चौथा खण्ड

    :१:

    शयनागार में

    “अधिकार बेड़ी भाँगी, एकमम मिनति”

    —ब्रजाङ्गना काव्य

    लुत्फुन्निसाके आगरा जाने और फिर सप्तग्राम लौटकर आनेमें कोई एक साल हुआ है। कपालकुण्डला एक वर्षसे नवकुमारकी गृहिणी है। जिस दिन प्रदोषकालमें लुत्फुन्निसा जंगल आई उस समय कपालकुंडला कुछ अनमनी-सी अपने शयनागारमें बैठी है। पाठकोंने समुद्रतटवासिनी, आलुलायित केशा और भूषणविहीना जिस कपालकुण्डलाको देखा था, अब वह कपालकुंडला नहीं है। श्यामासुन्दरीकी भविष्यवाणी सत्य हुई है। पारसमणिके स्पर्शसे योगिनी गृहिणी हुई है, इस समय वह सारे रेशम जैसे रूखे लम्बे बाल, जो पीठपर अनियन्त्रित फहराया करते थे अब आपसमें गुँथकर वेणी-रूपमें शोभा पा रहे हैं। वेणीरचनामें भी बहुत कुछ शिल्प-परिपाटी है, केशविन्यासमें सूक्ष्म केशीकार्य श्यामासुन्दरीके विन्यास-कौशलका परिचय दे रहा है। फूलोंको भी छोड़ा नहीं गया है, वे भी वेणीमें चारों तरफ खूबसूरतीके साथ गूँथे हुए हैं। सरपरके बाल भी समान ऊँचाईमें नहीं, बल्कि मालूम होता है, कि आकुंचनयुक्त कृष्ण तरंग मालाकी तरह शोभित हैं। मुखमंडल अब केशसमूहसे ढँका नहीं रहता; ज्योतिर्मय होकर शोभा पाता है। केवल कहीं-कहीं पुष्प-गुच्छ लटक रहे हैं और स्वेदविन्दु झलक रहे हैं। वर्ण वही, अर्द्ध-पूर्णशशाङ्क-रश्मिरुचिर। अब दोनों कानोंमें स्वर्ण कुण्डल लहरा रहे हैं; गलेमें नेकलेस हार है। रंगके आगे वह म्लान नहीं है। वल्कि वह इस प्रकार शोभा पा रहे हैं जैसे अर्धचन्द्र-कौमुदी-वसना धारिणीके अङ्गपर वह नैश कुसुमवत शोभित हैं। वह दुग्धश्वेत जैसे शुभ्र वस्त्र पहने हुए है; वह वस्त्र आकाशमण्डलमें खेलनेवाले सफेद बादलोंकी तरह शोभा पा रहे हैं।

    यद्यपि वर्ण वही है लेकिन पूर्वापेक्षा कुछ म्लान, जैसे आकाश में कहीं काले मेघ झलक रहे हों। कपालकुण्डला अकेली बैठी न थी। उसकी सखी श्यामासुन्दरी पासमें बैठी हुई है। उन दोनोंमें आपसमें बातें हो रही थीं। उनकी वार्ताका कुछ अंश पाठकोंको सुनना होगा।

    कपालकुण्डलाने पूछा—“नन्दोईजी, अभी यहाँ कितने दिन रहेंगे?”

    श्यामाने उत्तर दिया—“कल शामको चले जायेंगे। आहा आज रातको भी यही औषधि लाकर रख लेती तो भी उन्हें वश कर मनुष्य जन्म सार्थक कर सकती। कल रातको निकली तो लात-जूता खाया, फिर भला आज रात कैसे निकलूँ?”

    क०—दिनको ले आनेसे काम न चलेगा?

    श्या०—नहीं, दिनमें तोड़नेसे फल न होगा। ठीक आधी रातको खुले बालोंसे तोड़ना होता है, अरे बहन! क्या कहें, मनकी साध मनमें ही रह गयी।

    क०—अच्छा, आज दिनमें तो मैं उस पेड़को पहचान ही आई हैं; और जिस वनमें है, वह भी जान चुकी हूँ। अब आज तुम्हें जाना न होगा, मैं अकेली ही रातमें जाकर औषधि ला दूँगी।

    श्या०—नहीं-नहीं। एक दिन जो हो गया सो हो गया। तुम रातको अकेली न निकलना।

    क०—इसके लिए तुम चिन्ता क्यों करती हो? सुन तो चुकी हो, रातको जंगलमें अकेली घूमना मेरा बचपनका अभ्यास है। मनमें विचार करो, यदि मेरा ऐसा अभ्यास न होता, तो आज कभी तुमसे मुलाकात भी न हुई होती।

    श्याम०—इस ख्यालसे नहीं कहती हूँ। किन्तु यह ख्याल है कि रातको जंगलमें अकेली घूमना क्या भले घरकी बहू-बेटियोंका काम है? दो आदमियोंके रहने पर तो इतना तिरस्कार उठाना पड़ा, तुम यदि अकेली गयीं, तो भला कैसे रक्षा होगी?

    क०—इसमें हर्ज ही क्या है? तुम क्या यह ख्याल करती हो कि मैं रातमें घरके बाहर होते ही कुचरित्रा हो जाऊँगी?

    श्या०—नहीं-नहीं। यह ख्याल नहीं। लेकिन बुरे लोग तो बुराई करते ही हैं।

    क०—कहने दो; मैं उनके कहनेसे बुरी तो हो न जाऊँगी।

    श्या०—यह तो है ही; लेकिन तुम्हें कोई बुरा-भला कहे तो हम लोगोंके मनको चोट पहुँचेगी।

    क०—इस तरहकी व्यर्थकी चोट न पहुँचने दो।

    श्या०—खैर, मैं यह भी कर सकूँगी, लेकिन भैयाको क्यों नाराज-दुखी करती हो?

    कपालकुण्डलाने श्यामासुन्दरीके प्रति एक विमल कटाक्षपात किया। बोली—“इसमें यदि वह नाराज हों, तो मैं क्या करूँ, मेरा क्या दोष? अगर जानती कि स्त्रियोंका विवाह दासी बनना है, तो कभी शादी न करती।

    इसके बाद और जवाब-सवाल करना श्यामासुन्दरीने उचित न समझा; अतः वह अपने कामसे हट गयी।

    कपालकुण्डला आवश्यकीय कार्यादिसे निवृत्त हुई। घरके कामसे खाली हो, वह औषधि लानेके लिये घरसे निकल पड़ी। उस समय एक पहर रात बीत चुकी थी। चाँदनी रात थी। नवकुमार बाहरी कमरमें बैठे हुए थे। उन्होंने खिड़कीमें से देखा कि कपालकुएडला बाहर जा रही है। उन्होंने भी घरके बाहर हो मृण्मयी का हाथ पकड़ लिया। कपालकुण्डलाने पूछा—“क्या?”

    नवकुमारने पूछा—“कहाँ जाती हो?” नवकुमारके स्वरमें तिरस्कारका लेशमात्र भी न था।

    कपालकुण्डला बोली—“श्यामासुन्दरी अपने पतिको वशमें करनेके लिए एक जड़ी चाहती है, वही लेने जाती हूँ।”

    नवकुमारने पूर्ववत् कोमल स्वरमें पूछा—“कल तो एक बार हो आई थी; फिर आज क्यों?”

    क०—कल खोजकर पा न सकी। आज फिर खोजूँगी।

    नवकुमारने कोमल स्वरमें ही कहा—“अच्छा, दिनमें जानेसे क्या काम न होगा?” नवकुमारका स्वर स्नेहपूर्ण था।

    कपालकुएडलाने कहा—“लेकिन दिनकी ली गयी जड़ी फलती नहीं।”

    नव०—तो तुम्हें खोजनेकी क्या जरूरत है? मुझे जड़ीका नाम बता दो, मैं खोजकर ला दूँगा।

    क०—मैं पेड़ देखकर पहचान सकती हूँ, उसका नाम नहीं जानती और तुम्हारे तोड़नेसे भी उसका फल न होगा। औरतोंको बाल खोलकर तोड़ना पड़ता है। तुम परोपकारमें विघ्न न डालो।

    कपालकुण्डलाने यह बात अप्रन्नतापूर्वक कही। नवकुमारने भी फिर आपत्ति न की। बोले—“चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।”

    कपालकुण्डलाने अभिमान भरे स्वरमें कहा—“आओ, मैं अविश्वासिनी हूँ या क्या हूँ, अपनी आँखसे देख लो।”

    नवकुमारने फिर कुछ न कहा। उन्होंने कपालकुण्डलाका हाथ त्याग दिया और घरके अन्दर चले गये। कपालकुण्डला अकेली जङ्गलमें घुसी।

    ⋆

    ↑

    अनुवादक की भ्रान्ति। मूलमें है:

    राधिकार बेड़ी भाङ, ए मम मिनति।

    ⁠ ब्रजाङ्गना काव्य

    :२:

    जंगलमें

    —“Tender is the night.

    and happy the queen moon is on her throne

    Clustered around by all her starry fays.

    But see there is on light.”

    —Keats.

    सप्तग्रामका यह भाग जङ्गलमय है, यह बहुत कुछ पहले लिखा जा चुका है। गाँवसे थोड़ी ही दूर पर घना जङ्गल है। कपालकुण्डला एक संकीर्ण जङ्गली राहसे अकेली औषधिकी खोजमें चली। निस्तब्ध रात्रि थी, शब्दहीन, किन्तु मधुर। मधुर रात्रिमें स्निग्ध और उज्ज्वल किरण फैलाते हुए चन्द्रदेव आकाशमें रुपहले बादलोंको अतिक्रम करते अपनी यात्रा कर रहे थे। नीरव हो वृक्षके पत्ते उन किरणोंसे अठखेलियाँ कर रहे थे। शान्त लतागुल्मोंके बीच फूल खिलकर सफेद चाँदनीमें अपने अस्तित्वसे होड़ लगा रहे थे। पशु-पक्षी सब नीरव थे, प्रकृति नीरव थी, लेकिन कभी-कभी घोसलोंमें बैठे पक्षियोंके डैनोंकी फड़फड़ाहट, सूखे पत्तोंके गिरनेका शब्द, सर्पादि जीवोंके रेंगने और दूर कुत्तोंके भौंकनेका शब्द सुनाई पड़ जाता था। वायु भी निस्तब्ध थी, यह बात नहीं, वह चल रही थी, लेकिन इतनी मृदुगतिसे कि केवल ऊपरी वृक्षपत्रमात्र हिलते थे, लताएँ रस लेती थीं; आकाशमें निरभ्र मेघखण्ड धीरे-धीरे उड़ रहे थे। उस प्रकृतिकी नीरवताका सुख लेनेवाला अनुभव कर सकता था कि मन्द वायु-प्रवाह जारी है। पूर्व-सुखकी स्मृति जाग रही थी।

    कपालकुण्डलाकी पूर्व स्मृति इस समय जागी। उसे याद आया कि सागर तटवर्ती बालियाड़ी ढूहेपर मन्द वायु किस प्रकार उसके केशोंके साथ खिलवाड़ करती थी। आकाशकी तरफ देखा, अनन्त नील मण्डल याद आया, समुद्रका रूप। कपालकुएडला इसी तरहकी पूर्व स्मृतिसे अनमनी चली जा रही है।

    अनमनी होनेके कारण, कपालकुण्डलाको याद न रहा कि वह किस कामके लिए कहाँ जा रही है। जिस राहसे वह जा रही है, वह क्रमशः अगम्य होने लगा। जगल घना हो गया। मस्तकपर लता-वृक्षका वितान घना हो गया। चाँदनी न आनेके कारण अँधेरा हो गया। क्रमशः राह भी गुम हो गयी। राह न मिलनेके कारण कपालकुण्डलाका स्वप्न भंग हुआ। उसने उधर ताक कर देखा, दूर एक रोशनी जल रही थी। लुत्फुन्निसाने भी पहले इसी रोशनीको देखा था। पूर्व अभ्यासके कारण कपालकुण्डला इन सब बातोंसे भयरहित थी; लेकिन कौतूहल तो अवश्य हुआ। वह धीरे-धीरे उस ज्योतिके समीप पहुँची। उसने जाकर देखा कि जहाँ रोशनी जल रही है, वहाँ तो कोई भी नहीं; किन्तु उससे थोड़ी ही दूर पर घना जंगल होनेके कारण एक टूटी मड़ैया-सी अस्पष्ट दिखाई दी। उसकी दीवारें यद्यपि ईटों की थीं, किन्तु टूटी-फूटी-छोटीसी केवल एक कोठरीमात्र थी। उस घरमें से बातचीतकी आवाज आ रही थी। कपालकुण्डला निःशब्द पैर रखती हुई उस मड़ैयाके पास जा पहुँची। पास पहुँचते ही मालूम हो गया कि दो मनुष्य सावधानीके साथ बातें कर रहे हैं। पहले तो वह बात कुछ समझ न सकी; लेकिन बादमें पूरी चेष्टा करने पर निम्नलिखित प्रकार की बातें सुनाई पड़ीं—

    एक कह रहा है—“मेरा अभीष्ट मृत्यु है; इसमें यदि ब्राह्मण सहमत न हों, तो मैं तुम्हारी सहायता न करूँगा; तुम भी मेरी सहायता न करना।”

    दूसरा बोला—“मैं भी मंगलाकांक्षी नहीं हूँ, लेकिन जीवन भरके लिए, उसका निर्वासन हो; इसमें मैं राजी हूँ। लेकिन हत्याकी कोई चेष्टा मेरे द्वारा नहीं हो सकती, वरन् उसके प्रतिकूलाचरण ही करूँगी।

    फिर पहलेने कहा—“बहुत अबोध हो तुम। तुम्हें कुछ ज्ञान सिखाता हूँ। मन लगाकर सुनो। बहुत ही गूढ़ बातें कहूँगा। एक बार चारों तरफ देख तो जाओ, मुझे श्वासकी आवाज लग रही है।”

    वस्तुतः बातें मजेमें सुनने के लिए कपालकुण्डला मड़ैयाके दरवाजेके समीप ही आ गयी थी। अतीव आग्रह होनेके कारण उसकी साँसें जोर-जोरसे चल रही थीं।

    साथीकी बातोंपर एक व्यक्ति घर के दरवाजे पर आया और आते ही उसने कपालकुण्डलाको देख लिया। कपालकुण्डलाने भी चमकीली चाँदनीमें उस आगन्तुकको देखा। वह स्थिर न कर सकी कि उस आगन्तुकको देखकर वह खुश हो, या डरे। उसने देखा कि आगन्तुक ब्रह्मवेशी है। सामान्य धोती पहने हुए है, शरीर एक उत्तरीय द्वारा अच्छी तरह ढँका हुआ है। ब्राह्मणकुमार बहुत ही कोमल और नवयुवक जान पड़ा; कारण, उसके चेहरेसे बहुत ही कमनीयता दिखाई पड़ी थी, चेहरा अतीव सुन्दर है, स्त्रियों के चेहरेके अनुरूप, लेकिन रमणी दुर्लभ तेजविशिष्ट है। उसके बाल मर्दोंकी तरह कटे हुए नहीं, बल्कि स्त्रियोंकी तरह घुँघराले कुछ पीठ और छाती पर लटक रहे थे। ललाट पर चमक, उभरा हुआ और एक शिरा साफ दिखाई पड़ती थी। दोनों आँखोंमें गजबका तेज था। हाथमें एक नङ्गी तलवार थी। किन्तु इस रूपराशिमें एक तरहका भीषण भाव दिखाई पड़ रहा था। हेमन्त वर्णपर मानो कोई कराल छाया पड़ गयी हो उसकी अन्तस्तल तक धँस जानेवाली आँखोंकी चमक देखकर कपालकुण्डला भयभीत हुई।

    दोनों एक दूसरेको एक क्षण तक देखते रहे। पहले कपालकुण्डलाने आँखें झपकायीं। उसकी आँखें झपकते ही आगन्तुकने पूछा—“तुम कौन?”

    यदि एक वर्ष पहले उस जङ्गलमें ऐसा प्रश्न किसीने किया होता तो कपालकुण्डला समुचित उत्तर तुरंत प्रदान करती, लेकिन इस समय इस बदली हुई परिस्थितिमें वह गृहलक्ष्मी-स्वभाव हो गयी थी, अतः सहसा उत्तर दे न सकी। ब्राह्मणवेशी कपालकुण्डलाको निरुत्तर देखकर गम्भीर होकर कहा—“कपालकुण्डलाǃ इस रातमें भयानक जंगलमें तुम किस लिए आई हो?”

    एक अज्ञात रात्रिचर पुरुषके मुखसे अपना नाम सुनकर कपालकुण्डला अवाक् हो रही। फिर उसके मुँहसे कोई जवाब न निकला।

    ब्राह्मणवेशीने फिर पूछा—“तुमने हम लोगोंकी बातें सुनी हैं?”

    सहसा कपालकुएडलाकी वाक्‌शक्ति फिर जागी। उसने उत्तर देनेके बाद पूछा—“मैं भी वही पूछती हूँ। इस जंगलमें रातके समय तुम दोनों कौन-सी कुमन्त्रणा कर रहे थे?”

    ब्राह्मणवेशी कुछ देरतक चिन्तामग्न निरुत्तर रहा। मानो उसके हृदयमें कोई नयी इष्टसिद्धिका प्रकार आ गया हो। उसने कपाल कुण्डलाका हाथ पकड़ लिया और उस मड़ैयासे थोड़ा किनारे हटा कर ले जाने लगा। कपालकुण्डलाने बड़े ही क्रोधसे झटका देकर अपना हाथ छुड़ा लिया। ब्राह्मणवेशीने बड़ी मिठाससे कानोंके पास धीरेसे कहा—“चिन्ता क्यों करती हो? मैं पुरुष नहीं हूँ।”

    कपालकुण्डला और आश्चर्यमें आई। इस बातका उसे कुछ विश्वास भी हुआ और नहीं भी। वह ब्राह्मणवेशधारिणीके साथ गयी। उस टूटे घरसे थोड़ी दूर आड़में पहुँचकर उसने कहा—“हम लोग जो कुपरामर्श कर रहे थे, उसे सुनोगी? वह तुम्हारे ही सम्बन्ध में है।”

    कपालकुण्डलाका भय और आग्रह बढ़ गया। बोली—“सुनूँगी।” छद्मवेशीने कहा—“तो जबतक न लौटूँ, यहीं प्रतीक्षा करो।”

    यह कहकर वह छद्मवेशी उस भग्न घरमें लौट गया। कपालकुण्डला कुछ देर तक यहाँ खड़ी रही। लेकिन उसने जो कुछ सुना और देखा था, उससे उसे बहुत भय जान पड़ने लगा। यह कौन जानता है कि वह छद्मवेशी उसे यहाँ क्यों बैठा गया है? हो सकता है, अपना अवसर पाकर वह अपनी अभिसन्धि पूर्ण किया चाहता हो। यह सब सोचती हुई कपालकुण्डला भयसे विह्वल हो गयी। इधर ब्रह्मवेशीके लौटनेमें देर होने लगी। अब कपालकुण्डला बैठी रह न सकी, तेजीसे घरकी तरफ चली।

    उधर आकाश भी घटासे काला पड़ने लगा। जंगलमें चाँदनी से जो प्रकाश फैल रहा था, वह भी दूर हो गया। कपालकुण्डला को प्रतिपल देर जान पड़ने लगी। अतः वह तेजीसे जंगलसे बाहर होने लगी। आनेके समय उसे साफ पीछेसे दूसरेकी पदध्वनि सुनाई पड़ने लगी। पीछे फिरकर देखनेसे अन्धकारमय कुछ दिखाई न पड़ा। कपालकुण्डलाने सोचा कि ब्रह्मवेशी उसके पीछे आ रहा है। घना जंगल पीछे छोड़ वह उस क्षुद्र जंगली राह पर आ गयी थी। वहाँ उतना अँधेरा न था, देखनेसे कुछ दिखाई पड़ सकता था, लेकिन उसे कुछ भी दिखाई न पड़ा। अतः वह फिर तेजीसे कदम बढ़ाती हुई चली, फिर पदशब्द सुनाई पड़ा। आकाश काली-काली घटाओंसे भयानक हो उठा था। कपालकुण्डला और भी तेजी से आगे बढ़ी। घर बहुत ही करीब था; लेकिन इसी समय हवा के झटकेके साथ बूँदी पड़ने लगी। कपालकुण्डला दौड़ी। उसे ऐसा जान पड़ा कि पीछा करनेवाला भी दौड़ा। घर सामने दिखाई पड़ते-न-पड़ते भयानक वर्षा शुरू हो गयी। भयानक गर्जनके साथ बिजली चमकने लगी। आकाशमें बिजलीका जाल बिछ गया और रह-रहकर वज्र टूटने लगा। कपालकुण्डला किसी तरह आत्मरक्षा कर घर पहुँची। पास का बगीचा पारकर दरवाजेके अन्दर दाखिल हुई। दरवाजा उसके लिए खुला हुआ था। दरवाजा बन्द करनेके लिए वह पलटी। उसे ऐसा जान पड़ा कि सामने दरवाजेके बाहर कोई वृद्धाकार मनुष्यमूर्ति खड़ी थी। इसी समय एक बार बिजली चमक गयी। उस एक ही चमकमें कपालकुण्डला उसे पहचान गयी। वह सागरतीरवासी वही कापालिक है।

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    अनुवादक की भ्रान्ति। मूलमें है:

    —“Tender is the night,

    And haply the Queen moon is on her throne

    Clustered around by all her starry fays;

    But here there is no light.”

    ⁠ Keats.

    :३:

    स्वप्नमें

    “I had a dream; which was

    not at all adream .”

    —Byron

    कपालकुण्डलाने धीरे-धीरे दरवाजा बन्द कर दिया और शयनागारमें आयी। वह धीरेसे अपने पलंगपर सो रही। मनुष्यहृदय अनन्त समुद्र है, जब उससे प्रबल वायु समर करने लगती है तो कितनी तरंगें उठती हैं, यह कौन गिन सकता है। प्रबल वायुसे हिलता और वर्षाजलसे भींगा हुआ जटाजूटधारी कापालिकका चेहरा उसे सामने दिखाई पड़ने लगा; पहलेकी समूची घटनाओंकी कपालकुण्डला याद करने लगी। घने जंगलमें कापालिककी वह भैरवी पूजा, अन्यान्य पैशाचिक कार्य, वह उसके साथ कैसा आचरण कर भागकर आयी है, नवकुमारको बन्धन, यह सब याद आने लगा। कपालकुण्डला काँप उठी। आज रातकी सारी घटनाएँ आँखके सामने नाच उठीं। श्यामाकी औषधिकामना, नवकुमारका निषेध, उनके प्रति कपालकुण्डलाका तिरस्कार, इसके बाद अरण्यकी ज्योत्स्नामयी शोभा, वह भीषण दर्शन सब याद आया।

    पूर्व दिशामें उषाकी मुकुट ज्योति प्रकट हुई, उस समय कपालकुण्डलाको तन्द्रा आ गयी। उस हल्की नींदमें कपालकुण्डला स्वप्न देखने लगी। मानों वह उसी सागरवक्षपर नावपर सवार चली जा रही है, तरणी सजी हुई, उसपर वासन्ती रंगकी ध्वजा फहरा रही है, नाविक फूलोंकी माला पहने हुए, नाव खे रहे हैं। राधेश्यामका अनन्त प्रणयगीत हो रहा है। पश्चिम गगनसे सूर्य तप रहे हैं, स्वर्ण धारामें समुद्र हँस रहा है। आकाशमें खण्ड-खण्ड मेघ भी उस धारामें स्नान कर रहे हैं। एकाएक रात हो गयी। सूर्य कहाँ चले गये! सुनहले बादल कहाँ गए! घने-काले बादल छा गये। समुद्रमें दिक्भ्रम होने लगा। किधर जाया जाय! नाव पलटी। गाना बन्द हुआ, गलेकी माला फेंक दी गयी, पताका गायब हो गयी, आँधी आयी। सागरमें वृक्ष-परिमाण लहरें उठने लगीं। लहरसे कापालिक प्रकट हुआ। बाएँ हाथमें नाव पकड़ डुबानेको तैयार हुआ। इसी समय वह ब्राह्मणवेषधारी प्रकट हुआ। उसने पूछा—“बोलो नाव डुबा दें, या बचा दें?” कपालकुण्डलाने कहा—“डुबा दो।” उसने नावको छोड़ दिया। नाव भी बोल उठी—“अब मैं भार उठा न सकूँगी, पातालमें जाती हूँ?” यह कहती हुई नाव पातालमें प्रवेश कर गयी।

    पसीनेसे नहायी हुई, कपालकुण्डला स्वप्नसे जाग उठी। उसने देखा कि सबेरा हो गया है। उन्मुक्त खिड़कीसे वासन्ती हवा आ रही है। वृक्ष हलकी हवासे फूल सहित झूम रहे हैं। हिलती शाखाओंपर बैठे पक्षी गा रहे हैं। कितनी फूलोंसे लदी शाखाएँ खिड़की के अन्दर घुसी आ रही हैं। कपालकुण्डला नारी-स्वभाववश उन शाखाओंको एकत्र करने लगी। एकाएक उसमेंसे एक लिपि बाहर हुई। कपालकुण्डला पढ़ना जानती थी; उसने पढ़ा—पत्र यों था—

    “आज शामके बाद कल रातकी तरह ब्राह्मणकुमारके साथ मुलाकात करो। तुम अपने बारेमें जो प्रयोजनीय बात सुनना चाहती थीं, उसे सुनोगी।—अहं ब्राह्मणवेशी।”

    ⋆

    :४:

    संकेतानुसार

    उस दिन शामतक कपालकुण्डला केवल यही चिन्ता करती रही कि ब्राह्मणवेशीके साथ मुलाकात करना चाहिए या नहीं। एक पतिव्रता युवतीके लिये निर्जन रातमें परपुरुष सम्भाषण बुरा और निन्दनीय है, केवल यही विचार कर वह मिलनेमें हिचकती थी, कारण, उसका सिद्धान्त था कि असद्उद्देश्यसे न मिलनेसे कोई हानि नहीं है। स्त्रीको स्त्रीसे या पुरुषको पुरुषसे मिलनेका, जैसा अधिकार मुझे है, वैसा ही अधिकार निर्मल चित्त रखनेपर उसे भी प्राप्त है। सन्देह केवल यह है कि ब्राह्मणवेशी पुरुष है या स्त्री। उसे संकोच था तो केवल इसलिए कि मुलाकात मंगलजनक है अथवा नहीं। पहले ब्राह्मणवेशीसे मुलाकात, फिर कापालिक द्वारा पीछा और दर्शन और अन्तमें स्वप्न, इन सब घटनाओंने कपालकुण्डलाको बहुत डरा दिया था। उसका अमङ्गल निकट है उसे ऐसा जान पड़ने लगा और उसे यह भी सन्देह न रहा कि यह अमङ्गल कापालिकके आगमनके कारण है। यह तो स्पष्ट ही उसने कहा कि बातें कपालकुण्डलाके बारेमें ही हो रही थीं। हो सकता है, उसके द्वारा कोई बचावकी भी राह निकल आये। लेकिन बातोंसे तो यही जान पड़ता है कि या तो मृत्यु अथवा निर्वासन दण्ड। तो क्या ये सारी बातें मेरे ही लिए हैं? ब्राह्मणवेशीने तो कहा था कि उसके बारेमें ही बात है। ऐसी कुमंत्रणामें ब्राह्मणवेशी जब सहकारी है, तो उससे मिलना मंगलजनक नहीं, बल्कि आफत स्वयं बुलाना होगा। लेकिन रातमें जो स्वप्न देखा उसमें तो ब्राह्मणवेशीके कथनसे जान पड़ा कि वह रक्षा भी कर सकता है। तो क्या होगा? क्या वह स्वप्नकी तरह डुबायेगा? हो सकता है, माताजीने उसे इसीलिए भेजा हो कि उससे मेरी रक्षा ही हो। अतएव कपालकुण्डलाने मुलाकात करनेका ही निश्चय किया। बुद्धिमान ऐसा सिद्धान्त करता या नहीं, सन्देह है, लेकिन यहाँ बुद्धिमानीसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। कपालकुण्डला कच्ची उम्र की थी, अतः उसने बुद्धिमानीका विचार नहीं किया। उसने कुतूहली रमणी जैसा सिद्धान्त किया; भीमकान्त रूपराशि दर्शन लोलुप जैसा कार्य किया; नैशवनविहारिणी संन्यासीपालिताकी तरह सिद्धान्त किया और सिद्धान्त किया दीपक शिखापर पतित होनेवाले पतंगेकी तरह।

    सन्ध्याके बाद बहुत-कुछ गृह-कार्य समाप्त कर कपालकुण्डलाने पहलेकी तरह वनयात्रा की। यात्राके समय कपालकुण्डलाने अपने कमरेका दीपक तेज कर दिया। लेकिन वह जैसे ही घरके बाहर हुई दीपक बुझ गया।

    यात्राके समय कपालकुण्डला एक बात भूल गयी। ब्राह्मणवेशधारीने किस जगह मुलाकातके लिए लिखा है? अतः पत्र पढ़नेकी फिर आवश्यकता हुई। उसने लौटकर पत्र रखा हुआ स्थान ढूँढा, लेकिन वहाँ पत्र न मिला। याद आया कि उसने पत्रको अपने जूड़ेमें खोंस लिया था। अतः जूड़ेमें देखा, वेणी खोलकर देखा, लेकिन पत्र न मिला। घरके अन्य स्थानोंको खोजा। अतएव पूर्व स्थानपर मिलनेके ख्यालसे निकल पड़ी। जल्दीमें उसने फिर अपने खुले बाल बाँधे नहीं। अतः आज कपालकुण्डला प्रथम अनूढ़ाकी तरह उन्मुक्तकेश होकर चली।

    ⋆

    :५:

    दरवाजेपर

    “Stand you a while apart

    Confine yourself, but in a patient list.

    —Othello

    सन्ध्यासे पहले जब कपालकुण्डला गृहकार्यमें लगी हुई थी, उसी समय वह पत्र जूड़ेसे खसककर गिर पड़ा था। कपालकुण्डलाको पता न रहा। उसे नवकुमारने देख लिया। जूड़ेसे पत्र गिरते देख उन्हें आश्चर्य हुआ। कपालकुण्डलाके वहाँसे हट जानेपर उन्होंने पत्रको पढ़ा, उसके पढ़नेसे एक ही सिद्धान्त सम्भव है। “जो बात कल सुनना चाहती थी, वह आज सुनेंगी?” वह कौनसी बात है? क्या प्रणय वाक्य? क्या ब्राह्मणवेशधारी मृण्मयीका उपपति है? जो व्यक्ति पहली रातकी घटनासे अवगत नहीं है, वह केवल यही सोच सकता है।

    स्वामीके साथ सती होनेके समय अन्य किसी कारणसे जब कोई जीता हुआ चितारोहण करता है और चितामें आग लगा दी जाती है तो पहले धुएँसे उसके चारों ओरका स्थान घिर जाता है, फिर क्रमशः लकड़ियोंके बीचसे एक-दो अग्निशिखा सर्प जिह्वाकी तरह उसके अंगपर आकर आक्रमण करती हैं, फिर अन्तमें ज्वालमाला चारों तरफसे घेर लेती है और शिरपर्यन्त अग्नि पहुँच कर उसे दग्ध कर राख बना देती है।

    पत्र पढ़नेपर नवकुमारका भी यही हाल हुआ। पहले समझे नहीं, फिर संशय, निश्चयता, अन्तमें ज्वाला। मनुष्यका हृदय एकबारगी दुःख या सुख बर्दाश्त कर नहीं सकता; क्रमशः ग्रहण कर सकता है। पहले तो धुएँने नवकुमारको घेर लिया; इसके बाद अग्निशिखा हृदयपर ताप पहुँचाने लगी, अन्तमें हृदय भस्म होने लगा। उन्होंने विचारकर देखा कि अबसे पहले किन बातोंमें कपालकुण्डला अबाध्य रही है। उन्होंने देखा कि यह स्वतन्त्रता ही है। वह सदा स्वतन्त्र रही, जहाँ कहीं घूमने गयी अकेली। दूसरोंके शिकायत करनेपर भी नवकुमारने कभी उसपर सन्देह न किया, लेकिन आज वह सब यादकर उन्हें प्रतीति होने लगी।

    यंत्रणाका प्रथम वेग निकल गया। नवकुमार एकान्तमें चुपचाप बैठ कर रोने लगे, रोनेके बाद कुछ स्थिर हुए। इसके बाद उन्होंने अपना कर्त्तव्य निश्चित किया। आज वह कपालकुण्डलासे न कहेंगे। रातको कपालकुण्डला जब यात्रा करेगी, तो उसका पीछा करेंगे और इसके बाद अपना जीवन-त्याग देंगे। कपालकुण्डलाको कुछ न कहेंगे, बल्कि अपना प्राणनाश करेंगे।

    ऐसा सोचकर वह कपालकुण्डलाके जानेकी राह खिड़की द्वारा देखते रहे। कपालकुण्डलाके निकलकर जानेके बाद नवकुमार भी उठकर चले, लेकिन इसी समय कपालकुण्डला फिर वापस आई। यह देख वह धीरेसे खिसक गये। अन्तमें कपालकुण्डलाके फिर बाहर होनेपर, जब नवकुमार भी बाहर चले, तो उन्हें दरवाजेपर एक दीर्घाकार पुरुष खड़ा दिखाई दिया।

    वह व्यक्ति कौन है; क्यों खड़ा है, जाननेकी कोई इच्छा नवकुमारको न हुई। वह केवल कपालकुण्डलापर निगाह रखे हुए चले, अतएव खड़े मनुष्यकी छातीपर घक्का दे उन्होंने उसे हटाना चाहा, लेकिन वह हटा नहीं।

    नवकुमारने कहा—“कौन हो तुम? हट जाओ, मेरी राह छोड़ो।”

    आगन्तुक बोला—“क्या नहीं पहचानते, मैं कौन हूँ?” यह शब्द समुद्रनादवत् जान पड़ा। नवकुमारने और गौरसे देखा—वही पूर्वपरिचित—कापालिक।

    नवकुमार चौंक उठे। लेकिन डरे नहीं। सहसा उनका चेहरा प्रसन्न हो गया। उन्होंने पूछा—“क्या कपालकुण्डला तुमसे मिलने जा रही है?”

    कापालिकने कहा,—“नहीं?”

    आशा-प्रदीप जलते ही बुझ गया। नवकुमारका चेहरा फिर पहले जैसा हो गया। बोले—“तो तुम राहसे हट जाओ।”

    कापालिकने कहा—“राह छोड़ दूँगा, लेकिन तुमसे कुछ कहना है, पहले सुन लो।”

    नवकुमार बोले,—“तुमसे मेरी कौनसी बात है? क्या तुम फिर मेरा प्राण लेने आये हो? तो ग्रहण करो, इस बार मैं मना न करूँगा। तुम जरा ठहरो, मैं अभी आता हूँ। मैंने क्यों न देवतुष्टिके लिये प्राण दिया! अब उसका फल भुगत रहा हूँ। जिसने मेरी रक्षा की थी, उसीने नष्ट किया। कापालिक! अब अविश्वास न करो। मैं अभी लौटकर, आत्म-समर्पण करता हूँ।

    कापालिकने उत्तर दिया—“मैं तुम्हारे वधके लिए नहीं आया हूँ, भवानी की वैसी इच्छा नहीं। मैं जो करने आया हूँ, उसमें तुम्हारा भी अनुमोदन है। घर के अन्दर चलो, मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो।”

    नवकुमारने कहा—“अभी नहीं, फिर दूसरे समय सुनूँगा। तुम जरा मेरी अपेक्षा करो। मुझे बहुत जरूरी काम है, पूरा कर अभी आता हूँ।”

    कापालिकने कहा—“वत्स! मैं सब जानता हूँ तुम उस पापिनीका पीछा करोगे। मैं जानता हूँ, वह जा रही है। मैं अपने साथ तुम्हें वहाँ ले चलूँगा। जो देखना चाहते हो दिखाऊँगा, लेकिन जरा मेरी बात सुन लो। डरो नहीं।”

    नवकुमारने कहा—“अब मुझे तुम से कोई डर नहीं, आओ।”

    यह कहकर नवकुमार कापालिकको लेकर अन्दर गये और एक आसनपर उसे बिठाकर तथा स्वयं बैठते हुए बोले—“कहो!”

    ⋆

    ↑

    इधर एक अध्यायको छोड़ दिया गया है।

    :६:

    पुनर्वार्ता

    “तद्गच्छ सिद्धं कुरु देवकार्यम्।”

    —कुमारसंभव

    कापालिक ने आसन ग्रहण कर अपनी दोनों बाहें नवकुमारको दिखाई। नवकुमार ने देखा कि दोनों हाथ टूटे हुए थे।

    पाठकोंकी याद रह सकता है कि जिस रात कपालकुण्डला के साथ नवकुमार कापालिक-आश्रमसे भागे, उसी रात खोजने में व्यस्त बालियाड़ीके शिखरसे गिरा था। गिरनेके समय उसने शरीर-रक्षाके लिए दोनों हाथोंसे सहारा लिया। इससे उसका शरीर तो बचा, लेकिन दोनों हाथ टूट गये। सारा हाल कहकर कृपालिक ने कहा—“इन हाथों द्वारा यद्यपि दैनिक कार्य हो जाते हैं, किन्तु, इनमें अब बल नहीं है, यहाँतक कि मैं लकड़ी भी उठा नहीं सकता।”

    इसके बाद बोला—“गिरते ही मैं जान गया कि मेरे दोनों हाथ टूट गये, लेकिन बादमें मैं बेहोश हो गया। पहले बेहोश और इसके बाद धीरे-धीरे जब मुझे ज्ञान हुआ तो मैं नहीं जानता था कि इस तरह मुझे कितने दिन बीते। शायद दो रातें और एक दिन था। सबेरेके समय मैं फिर पूरी तरह होशमें आया। इससे ठीक पहले मैंने स्वप्न देखा—मानो भवानी—यह कहते-कहते कापालिकको रोमांच हो आया—मेरे सामने प्रत्यक्ष आकर खड़ी हो गयी हैं। भौंहें टेढ़ी कर ताड़ना करती और कहती हैं—‘अरे दुराचारी! तेरी ही चित्तकी अशुद्धिके कारण मेरी इस पूजामें विघ्न हुआ है। इतने दिनोंतक इन्द्रिय-लालसा के वशीभूत होकर उस कुमारीके रक्तसे तूने मेरी पूजा नहीं की। अतएव इसी कुमारी द्वारा तेरे सारे पूर्व कर्मोंका नाश हो रहा है। अब मैं तेरी पूजा ग्रहण न करूँगी।’ इसपर मैं रोकर भगवतीके चरणोंपर लोटने लगा, तो उन्होंने प्रसन्न होकर कहा—‘भद्र! इसका सिर्फ एक प्रायश्चित्त बताती हूँ। उसी कपालकुण्डलाका मेरे सामने बलिदान कर। जितने दिनोंतक तुझसे यह न हो सके, मेरी पूजा न करना।’

    कितने दिनों तक और किस प्रकार मैं आरोग्य हुआ, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। क्रमशः आरोग्यलाभ करनेके बाद देवीकी आज्ञा पूरी करनेकी कोशिशमें लग गया। लेकिन मैंने देखा कि इन हाथोंमें एक बच्चे जैसा बल भी नहीं। बिना बाहुबलके यत्न सफल होनेका नहीं। अतएव इसमें सहायताकी आवश्यकता हुई। विदेशी और विधर्मी राजमें इस बातमें कौन सहायक हो सकता है। बड़ी कोशिशसे पापिनीका आभास मालूम हुआ। लेकिन बाहुबलके अभावसे कार्य पूरा नहीं होता है। केवल मानससिद्धिके लिए होमादि करता हूँ। कल रातको मैंने स्वयं देखा कि कपालकुण्डलाके साथ ब्राह्मणकुमारका मिलन हुआ। आज भी वह उससे मिलने जा रही है। देखना चाहो, तो मेरे साथ आओ।

    वत्स! कपालकुण्डला वधके योग्य है। मैं भवानीके आज्ञानुसार उसका वध करूँगा। वह तुम्हारे प्रति भी विश्वासघातिनी है, अतएव तुम्हें भी उसका वध करना चाहिए। अविश्वासीको पकड़ कर मेरे यज्ञ-स्थान पर ले चलो। वहाँ अपने हाथसे उसका

    बलिदान करो। इससे भगवतीका उसने जो अपकार किया है, उसका दण्ड होगा, पवित्र कर्मसे अक्षय पुण्य होगा; विश्वासघातिनीका दण्ड होगा, चरम प्रतिशोध होगा।”

    कापालिक चुप हुआ। नवकुमार कुछ भी न बोले। कापालिक ने उन्हें चुप देखकर कहा—“अब चलो, वत्स! जो दिखानेको कह चुका हूँ, दिखाऊँगा|”

    नवकुमार पसीनेसे तर कापालिकके साथ चले।

    ⋆

    :७:

    सपत्नी संभाषण

    “Be at peace: it is your sister that addresses you, Require Lucretia’s love.

    —Lucretia.

    कपालकुंडला घरसे निकलकर जंगलमें घुसी। वह पहले उस टूटे घरमें पहुँची। वहाँ ब्राह्मणसे मुलाकात हुई। दिनका समय होता तो वह देखती कि उसका चेहरा बहुत उतर गया है। ब्राह्मणवेशीने कपालकुंडलासे कहा—“यहाँ कापालिक आ सकता है, आओ अन्यत्र चलें।” जंगलमें एक खुली जगह थी, चारों तरफ वृक्ष, बीचमें चौरस, साफ और समतल था। वहाँ बैठनेपर ब्राह्मणवेशीने कहा—“पहले मैं अपना परिचय दूँ। मेरी बात कहाँ तक विश्वासयोग्य है, स्वयं समझ सकोगी। जब तुम अपने स्वामोके साथ हिजली देश से आ रही थी, तो राहमें एक यवन कन्याके साथ मुलाकात हुई थी। क्या तुम्हें याद है?”

    कपालकुंडला बोली—“जिसने मुझे अलंकार दिये थे?”

    ब्राह्मणवेशधारिणीने कहा—“हाँ, मैं वही हूँ।”

    कपालकुंडला बड़े आश्चर्यमें आई। लुत्फुन्निसाने उसका विस्मय देखकर कहा—“और सबसे बड़ी अचरज की बात है कि मैं तुम्हारी सौत हूँ।”

    कपालकुंडलाने चौंककर कहा—“हैं, यह कैसे?”

    इस पर लुत्फुन्निसाने शुरूसे अपना परिचय दिया। विवाह, जातिनाश, स्वामी द्वारा त्याग, सप्तग्राम आगमन, नवकुमारसे मुलाकात और व्यवहार, गत दिवस जंगल में आना, होमकारीसे मुलाकात आदि बातें वह क्रमशः कह गयी। इस समय कपालकुंडलाने पूछा—“तुमने किस अभिप्रायसे हमारे घर छद्मवेशमें आनेकी इच्छा की?”

    लुत्फुन्निसाने कहा—“तुम्हारे साथ पतिदेवका चिरविच्छेद करानेके लिए।”

    कपालकुंडला सोचमें पड़ गयी बोली—“यह कैसे सिद्ध कर पाती?”

    लु०—तुम्हारे सतीत्वके प्रति तुम्हारे पतिको संशयमें डाल देती। लेकिन उसकी जरूरत नहीं; वह राह मैंने त्याग दी है। अतः अगर तुम मेरे कहे मुताबिक कार्य करो, तो सारी कामना सिद्ध हो; साथ ही तुम्हारा भी मंगल होगा।

    कपा०—होमकारीके मुँहसे तुमने किसका नाम सुना था?

    लु०—“तुम्हारा ही नाम। वह तुम्हारी मंगल या अमंगल कामनासे होम कर रहे हैं, यही जाननेके लिए प्रणाम कर मैं वहाँ बैठी। जब तक उनकी क्रिया समाप्त न हुई, मैं वहीं बैठी रही। होमके अन्तमें छलपूर्वक तुम्हारे नामके साथ होमका अभिप्राय पूछा। थोड़ी ही देरकी बातमें मैं समझ गयी कि होम तुम्हारी अमंगलकामनाके लिए है। मेरा भी वही प्रयोजन था, मैंने यह भी बताया। परस्पर सहायता के लिए वचनबद्ध हुए, विशेष परामर्शके लिए भग्नकुटीमें गये। वहाँ उसने अपना मनोरथ कहा कि तुम्हारी मृत्यु ही उसे अभीष्ट है। इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं। यद्यपि मैंने इस जन्ममें पाप ही किये हैं, लेकिन मैं इतनी पतित नहीं हूँ कि एक निरपराध बालिकाकी हत्याकी कामना करूँ। मैं इसपर राजी नहीं हुई। इसी समय तुम वहाँ पहुँची। शायद तुमने कुछ सुना हो।”

    कपा०—केवल तर्क ही मैंने सुना।

    लु०—उस व्यक्तिने मुझे अबोध जानकर कुछ शिक्षा देना चाहा। अन्तमें क्या निश्चय होता है, यह जाननेके लिए तुम्हें एकान्तमें बैठाकर मैं गयी।

    कपा०—फिर लौटकर क्यों नहीं आयी?

    लु०—ठीक है। कापालिकने तुम्हारी प्राप्ति और पालनसे लेकर तुम्हारे भागने तकका सारा हाल कह सुनाया।

    यह कहकर लुत्फुन्निसाने कापालिकका शिखरसे गिरना, हाथ टूटना, स्वप्न आदि सब कह सुनाया! स्वप्नकी बात सुनकर कपालकुण्डला चमक उठी; चित्तमें चञ्चलता भी हुई। लुत्फुन्निसाने कहा—“कापालिककी प्रतिज्ञा भवानीकी आज्ञाका प्रतिपालन है। बाहुमें बल नहीं है, इसलिये दूसरेकी सहायता चाहता है। मुझे ब्राह्मणकुमार समझकर सहायताकी आशासे उसने सब कहा। मैं अभी तक राजी नहीं हूँ। आगे भी राजी नहीं हो सकती। इस अभिप्रायसे मैं तुमसे मिली हूँ, लेकिन यह कार्य भी मैंने केवल स्वार्थसे ही किया है। तुम्हें प्राणदान देती हूँ। लेकिन तुम क्या मेरे लिए कुछ करोगी?”

    कपालकुण्डलाने पूछा—“क्या करूँ?”

    लु०—मुझे भी प्राणदान दो—स्वामीका त्याग करो।

    कपालकुण्डला बहुत देर तक कुछ न बोली। बहुत देर बाद बोली “स्वामीको त्याग कर कहाँ जाउँगी?”

    लु०—विदेशमें बहुत दूर। तुम्हें अट्टालिका दूँगी, धन दूँगी, दास-दासी दूँगी, रानीकी तरह रहोगी।

    कपालकुण्डला फिर चिन्तामें पड़ गई। पृथ्वीमें उसने सब देखा, लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। अन्तःकरणमें देखा नवकुमार कहीं भी न थे, तो क्यों लुत्फुन्निसाकी राहका काँटा बनूँ? फिर बोली—“तुमने मेरी क्या सहायता की है, यह अभी समझ नहीं पाती हूँ। अट्टालिका, धन, दास, दासी नहीं चाहती। मैं तुम्हारे सुखमें क्यों बाधा दूँ! तुम्हारी इच्छा पूरी हो—कलसे इस विध्नकारिणीकी कोई खबर न पाओगी। मैं वनचरी थी, वनचरी हो जाऊँगी।”

    लुत्फुन्निसा आश्चर्यमें आई। उसे इतनी जल्दी स्वीकार कर लेनेकी आशा न की थी। मोहित होकर उसने कहा—“बहन! तुमने मुझे जीवनदान दिया है। लेकिन मैं तुम्हें अनाथा होकर जाने न दूँगी। कल सबेरे मैं तुम्हारे साथ एक चतुर दासी भेजूँगी। उसके साथ जाना। वर्द्धमानमें एक बहुत बड़ी प्रधान महिला मेरी मित्र हैं, वह तुम्हारी सारी इच्छा पूरी कर देंगी।”

    कपालकुण्डला और लुत्फुन्निसा इस प्रकार निश्चिन्त हो बातें कर रही थीं कि सामने कोई विध्न ही नहीं। उसके स्थानसे जो वन्यपथ आया था, उसपर खड़े होकर कापालिक और नवकुमार उनके प्रति कराल दृष्टिसे देख रहे थे, उसे उन्होंने देखा ही नहीं।

    नवकुमार और कापालिक केवल इन्हें देख रहे थे, दुर्भाग्यवश इनकी बातें सुननेकी परिधि से वे दूर थे। कौन बता सकता है कि यदि मनुष्यकी श्रवणेन्द्रिय और आँखें मनुष्य के अन्दर तकका हाल देख-सुन लेतीं तो मनुष्यका दुःख-वेग कम होता या बढ़ता। लोग कहते हैं, संसारकी रचना अपूर्व और कौशलमय है।

    नवकुमारने देखा, कपालकुण्डला आलुलायित-कुन्तला है। जब वह उनकी हुई न थी, तबतक भी वेणी बाँधती न थी। उसके बाल इतने लम्बे थे और धीमे स्वरमें बातें करनेके लिये वह इतनी पास बैठी थी कि सारे बाल लुत्फुन्निसाकी पीठ तक उड़कर जा रहे थे। उनका इधर ध्यान न था। लेकिन नवकुमार यह देखकर हताश हो जमीनपर बैठ गये, यह देखकर कापालिकने अपनी बगल से लटकते एक नारियल पात्रको निकलकर कहा—“वत्स! बल खोते हो? हताश होते हो? लो यह भवानी का प्रसाद पियो। पियो, बल प्राप्त करोगे।”

    कापालिकने नवकुमारके मुँह के पास पात्र लगा दिया। नवकुमारने अनमने होकर उसे पिया और दारुण प्यास दूर की। नवकुमारको यह मालूम न था कि यह पेय कापालिक की स्वयं तैयार की हुई तेज शराब है। उसे पीते ही बल आ गया।

    उधर लुत्फुन्निसाने पहलेकी तरह मृदुस्वरमें कहा—“बहन! जो काम किया है, उसका बदला दे सकनेकी मेरी शक्ति नहीं है। फिर भी, चिर दिनोंतक मैं तुम्हें याद करती रहूँ, तो यही मेरे लिये सुखकर होगा। मैंने सुना है कि जो अलङ्कार मैंने तुम्हें दिये थे, उन्हें तुमने गरीबोंको दे डाला। इस समय मेरे पास कुछ नहीं है। कल दूसरा प्रयोजन सोचकर अपने साथ अंगूठी भर ले आयी थी। भगवान्‌की कृपासे उस पापसे दूर रही। यह अंगूठी तुम रखो। इसके उपरान्त इस अंगूठी को देखकर तुम अपनी मुफलिस बहनको याद करना। आज यदि स्वामी पूछें कि यह अंगूठी कहाँ पायी, तो कह देना—“लुत्फुन्निसाने दिया है।” यह कहकर लुत्फुन्निसाने बहुत धन देकर खरीदी गयी उस अंगूठीको ऊँगलीसे उतारकर कपालकुण्डलाके हाथमें दे दिया। नवकुमारने यह भी देखा। कापालिकने नवकुमार को पकड़ रखा था, उन्हें फिर काँपते देख फिर शराब पिलायी। मदिरा नवकुमारके माथेपर पहुँचकर उनके प्रकृत स्वभावको बदलने लगी। उसने स्नेहांकुर तकको उखाड़ फेंका।

    कपालकुण्डला लुत्फुन्निसासे बिदा होकर घरकी तरफ चली। नवकुमार और कापालिक ने लुत्फुन्निसासे छिपकर कपालकुण्डलाका अनुसरण किया।

    ⋆

    :८:

    घर की तरफ

    कपालकुण्डला धीरे-धीरे घर की तरफ चली। बहुत ही धीरे मृदु-पादविक्षेपसे। इसका कारण यह था कि वह बहुत ही गहरी चिन्तामें डूबी हुई थी। लुत्फुन्निसाकी दी हुई खबरसे कपालकुण्डलाका चित्त बिल्कुल परिवर्तित हो गया था। वह अपने आत्म-विसर्जनके लिये तैयार हुई। आत्म-विसर्जन किसलिये? क्या लुत्फुन्निसाके लिये? यह बात नहीं।

    कपालकुण्डला अन्तःकरण से तान्त्रिक की सन्तान है। जिस प्रकार तान्त्रिक भवानीके प्रसादके रूपमें दूसरेकी जान लेनेका आकांक्षी हैं, वैसे ही वह भी उसी आकांक्षासे आत्म-विसर्जनके लिये तैयार है। कापालिककी वजहसे कपालकुंडला केवल शक्तिप्रार्थिनी है, यह बात नहीं, बल्कि असली कारण यह है कि संगति प्रभावके कारण देवीकी श्रद्धाभक्तिमें मनसे अनुरागिनी है। वह मजेमें समझ चुकी है कि सृष्टिशासनकर्त्री और मुक्तिदात्री एकमात्र भैरवी ही हैं। यह सही है कि भैरवीपूजामें नरबलिके रक्तसे प्राङ्गण भर उठता है, यह उसका परदुःखकातर हृदय सहनेमें असमर्थ है, किन्तु और किसी कार्यमें उसकी भक्तिभावना कुंठित नहीं है। उन्हीं जगतशासनकर्त्री, सुख-दुःख-विधायिनी और मोक्षदायिनी भगवतीने स्वप्नमें उसे आत्मविसर्जनका आदेश दिया है। फिर कपालकुण्डला क्यों न उस आज्ञाको माने?

    हम तुम प्राणत्याग करना नहीं चाहते। बड़े प्रेम से जो कहते हैं कि यह संसार सुखमय है, सुखकी ही आशासे बैलकी तरह बराबर घूम रहे हैं—दुःखकी प्रत्याशासे नहीं। कहीं यदि आत्मकर्मदोषसे इस प्रत्याशामें सफलता प्राप्त न की, तो दुःख कहकर हम चिल्लाने लगते हैं किन्तु ऐसा होनेसे ही नियम नहीं बन जा सकता, ऐसा सिद्धान्त होता है। नियमका व्यतिक्रम माना है। हमें तुम्हें हर जगह सुख ही है। उसी सुखसे संसार में हम बँधे हुए हैं, छोड़ना नहीं चाहते। लेकिन इस संसार-बन्धनमें प्रणय ही प्रधान रस्सी है। कपालकुण्डलाके लिए वह बन्धन या नहीं कोई भी बन्धन नहीं। फिर कपालकुण्डलाको कौन रोक सकता है? जिसके लिए बन्धन नहीं है, वही सबसे अधिक बलशाली है। गिरिशिखरसे नदीके उतरने पर कौन उसका गतिरोध कर सकता है? एक बार आँधी आनेपर उसे कौन रोक सकता है? कपालकुण्डलाका चित्त डाँवाडोल हो जाये, तो उसे कौन स्थिर कर सकता है? नये हाथीके मस्त हो जाने पर उसे कौन शान्त करे?

    कपालकुंडलाने अपने हृदयसे पूछा—“अपने इस शरीरको जगदीश्वरीके लिए क्यों न समर्पण करूँ? पंचभूतको रखकर क्या होगा। प्रश्न वह करती थी, लेकिन कोई निश्चित उत्तर न दे सकती थी। संसारमें और कोई भी बन्धन न होनेपर पंचभूतका बन्धन तो है ही।

    कपालकुंडला नीचा सिर किये चलने लगी। जब मनुष्यका हृदय किसी बड़े भावमें डूबा रहता है, तो उस समय चिन्ताकी एकाग्रतामें बाहरी जगतकी तरफ ध्यान नहीं रहता। उस समय अनैसर्गिक वस्तु भी प्रत्यक्षीभूत जान पड़ती है। इस समय कपालकुंडलाकी ऐसी ही अवस्था थी।

    मानों ऊपरसे उसके कानोंमें वह शब्द पहुँचा—“वत्से, मैं राह दिखाती हूँ।” कपालकुंडला चकितकी तरह ऊपर देखने लगी। देखा, मानो आकाशमें नवनीरद-निन्दित मूर्ति है; गलेमें लटकनेवाली नरमुंडमालासे खून टपक रहा है; कमरमें नरकरराजि झूल रही है; बाँये हाथमें नरकपाल; अंगमें रुधिरधारा, ललाटपर विषम उज्जवल ज्वाला विभासित है और लोचन प्रान्तोंमें बालशशि शोभित है; मानों दाहिने हाथसे भैरवी कपालकुंडलाको बुला रही है।

    अब कपालकुंडला ऊर्ध्र्वमुखी होकर चली। वह अद्भुत देवी रूप आकाशमें उसे राह दिखा रहा था, कभी कपालमालिनीका अंग बादलोंमें छिपता, कभी सामने प्रकट होकर चलता। कपालकुंडला उन्हींको देखती हुई चलने लगी।

    नवकुमार या कापालिकने यह सब कुछ न देखा। नवकुमारने सुरा-गरल-प्रज्ज्वलित-हृदयसे—कपालकुंडलाके धीरपदक्षेपसे असहिष्णु होकर साथीसे कहा, “कापालिक!”

    कापालिकने पूछा—“क्या?”

    “पानीयं देहि मे।”

    कापालिकने नवकुमारको फिर शराब पिलायी।

    नवकुमारने पूछा—“अब देर क्यों?”

    कापालिकने भी कहा—“हाँ-हाँ, कैसी देर?”

    नवकुमारने भीमनादसे पुकारा—“कपालकुंडला!”

    कपालकुंडला सुनकर चकित हुई। अभी तक यहाँ कपालकुंडला कह कर किसीने पुकारा न था। वह पलटकर खड़ी हो गयी। नवकुमार और कापालिक उसके सामने आकर खड़े हो गये। कपालकुंडला पहले उन्हें पहचान न सकी, बोली—“तुम लौग कौन हो? यमदूत?”

    लेकिन दूसरे ही क्षण पहचान कर बोली—“नहीं नहीं, पिता! क्या तुम मुझे बलि देनेके लिए आये हो?”

    नवकुमारने मजबूतीके साथ कपालकुंडलाका हाथ पकड़ लिया। कापालिकने करुणार्द्र, मधुर स्वरमें कहा—“वत्से! हम लोगोंके साथ आओ।” यह कह कर कापालिक श्मशानकी राह दिखाता आगे चला।

    कपालकुंडलाने आकाशकी तरफ फिर निगाह उठायी, जिधर उस भैरवीकी विकराल मूर्तिको देखा था, उधर देखा। देखा, रणरंगिणी खिलखिला कर हँस रही है। कपालकुंडला अदृष्टविमूढ़की तरह कापालिकका अनुसरण करती चली। नवकुमार उसी तरह उसे पकड़े हुए साथ ले चले।

    ⋆

    :९:

    प्रेत भूमिमें

    “वपुषा करणोज्झितेन सा निपतन्ती पतिमप्यपातयत्।

    ननु तैलनिषेकविन्दुना सह दीप्तार्जिरुपैति मेदिनीम्॥”

    —रघुवंश

    चन्द्र अस्त हुए। विश्वमंडलपर अन्धकारका पर्दा पड़ गया। कापालिकने जहाँ अपना पूजास्थान बनाया था, वहीं कपालकुडलाको वह ले गया। गङ्गा तट पर वह एक वृहत् बालूकी भूमि है। उसके सामने ही एक ओर बहुत बड़ी रेतीली भूमि है। वही श्मशान है। दोनों रेतीली भूमियोंके बीच जल बढ़नेके समय पानी रहता है। भाटेके समय नहीं रहता—इस समय भी नहीं है। श्मशानभूमिका जो हिस्सा गङ्गातट पर जाता है, वह किनारेपर जाकर बहुत ऊँचा हो गया है, उसके नीचे अगाध जल है। अविरल वायुप्रवाहके कारण किनारा कभी-कभी खिसक कर गङ्गामें गिरा करता है। पूजाके स्थानमें दीपक न था—केवल जलती लकड़ीसे प्रकाश था—ऐसा प्रकाश जो उसकी भयानकताको बढ़ा रहा था। पासमें ही पूजा, होम, बलिका सारा सामान मौजूद था। विशाल नदीका हृदय अन्धकारसे पूर्ण था। चैत्र मासकी वायु गङ्गाको विक्षुब्ध बनाये हुई थी। इस कारण कलकल नाद दिक्मंडलमें व्याप्त हो रहा था। शमशानके शवभक्षक पशु रह-रहकर चिल्ला पड़ते थे।

    कापालिकने नवकुमार और कपालकुंडलाको उपयुक्त स्थानपर बैठाया और स्वयं पूजामें लग गया। उससमय उसने नवकुमारको आदेश दिया कि कपालकुंडलाको स्नान करा लावें। नवकुमार कपालकुंडलाको हाथ पकड़े रेत पार कर स्नान कराने चले। उनके पदभारसे हड्डियाँ टूटने लगीं। नवकुमारके पदाघातसे श्मशानका एक कलश भी टूट गया, उसके पास ही एक शव पड़ा हुआ था—हतभागेका किसीने संस्कार तक न किया था। दोनोंके ही पदसे उसका स्पर्श हुआ। कपालकुंडला उसे बचाकर निकल गयी, लेकिन नवकुमार उसे पददलित कर गये। शवभक्षक पशु चारों तरफ घूम रहे थे। दोनों जनको वहाँ उपस्थित देख वे सब चिल्ला उठे। कोई आक्रमण करने आया, तो कोई भाग गया। कपालकुंडलाने देखा कि नवकुमारका हाँथ काँप रहा है। कपालकुंडला स्वयं निर्भय निष्कम्प थी।

    कपालकुंडलाने पूछा—“स्वामिन्! क्या डर लगता है?”

    नवकुमारका मदिरामोह क्रमशः क्षीण होता जा रहा था। गम्भीर स्वरसे नवकुमारने कहा—“भयसे, मृण्मयी! नहीं!”

    कपालकुंडलाने फिर पूछा—“तब काँपते क्यों हो?”

    यह प्रश्न कपालकुंडलाने जिस स्वरसे किया, यह केवल रमणी हृदयसे ही सम्भव था। जब रमणी परदुःखकातर होती है, तभी ऐसा स्वर निकलता है। कौन जानता था कि साक्षात् श्मशानमें ऐसी आवाज कपालकुंडलाके मुँह से निकलेगी।

    नवकुमारने कहा—“भयसे नहीं। रो नहीं पाता हूँ, क्रोधसे काँपता हूँ।”

    कृपालकुंडलाने पूछा—“रोओगे क्यों?”

    फिर वही कंठ!

    नवकुमार बोले—“क्यों रोऊँगा? तुम क्या समझोगी, मृण्मयी तुम तो कभी सौन्दर्य देखकर उन्मत हुई नहीं।”—कहते-कहते यातनासे नवकुमारका गला भर गया। “तुम तो कभी अपना कलेजा स्वयं काटनेके लिये श्मशान आई नहीं, मृण्मयी!” यह कहते-कहते सहसा नवकुमार पुक्का फाड़कर रोते हुए कपालकुंडलाके चरणों पर गिर पड़े।

    “मृण्मयी! कपालकुंडले! मेरी रक्षा करो! मैं तुम्हारे पैरपर रोता हूँ, एक बार कह दो, तुम अविश्वासिनी नहीं हो—एक बार कहो मैं तुम्हें हृदयमें उठाकर घर ले चलू।”

    कपालकुंडलाने हाथ पकड़ कर नवकुमारको उठाया और मृदुस्वरसे उसने कहा—“तुमने तो मुझसे पूछा नहीं।”

    जब यह बातें हुई, तो दोनों तट पर आ खड़े हुए। कपालकुंडला आगे थी उसके पीछे जल था। जलका उछ्वास शुरू हो गया था, कपालकुंडला एक ढूहे पर खड़ी थी। उसने जवाब दिया—“तुमने तो मुझसे पूछा नहीं।”

    नवकुमारने पागलोंकी तरह कहा—“अपना चैतन्य खो चुका हूँ—क्या पूछूँ मृण्मयी! बोलो बोलो; मुझे बचालो, घर चलो।”

    कपालकुंडलाने कहा—“जो तुमने पूछा है, तो बताती हूँ। आज जिसे तुमने देखा—वह पद्मावती थी, मैं अविश्वासिनी नहीं हूँ। यह वचनस्वरूप कहती हूँ। लेकिन मैं घर न जाऊँगी। भवानीके चरणोंमें देह विसर्जन करने आई हूँ—निश्चय ही करूँगी। स्वामिन्! तुम घर लौट जाओ। मरूँगी—मेरे लिये रोना नहीं।”

    “नहीं—मृण्मयी! नहीं!”—यह कहकर दोनों हाथ पसारकर नवकुमार कपालकुंडलाको हृदयसे लगा लेनेके लिये आगे बढ़े—लेकिन कपालकुंडलाको वह पा न सके। चैत्र-वायुसे एक जल तरङ्ग ने उस ढूहेसे टक्कर ली और वह ढूहा कपालकुंडलाके साथ बड़े ही शब्दसे नदी जलमें जा गिरा।

    नवकुमारने भीषण शब्द सुना—कपालकुंडलाको अन्तर्हित होते देखा। तुरंत वे भी एक छलाँगमें जलमें जा रहे। नवकुमार तैरना अच्छा जानते थे। बहुत देर तक तैरते-डुबकी लगाते, कपालकुंडलाको खोजते रहे। उन्होंने कपालकुंडलाको न पाया—स्वयं भी जलसे न निकले।

    उस अनन्त गंगाप्रवाहमें वसन्त वायुविक्षुब्ध वीचियोंमें आन्दोलित होते हुए कपालकुंडला और नवकुमार कहाँ गये?

    ॥ समाप्त ॥

    तृतीय खण्ड

    भूतपूर्वमें

    “कष्टोऽयं खलु मृत्यु भावः”

    कपालकुण्डलाको लेकर नवकुमारने जब सरायसे घरकी यात्रा की तो मोती बीबीने वर्द्धमानकी तरफ यात्रा की। जबतक मोती बीबी अपनी राह तय करें, तबतक हम उनका कुछ वृत्तान्त कह डालें। मोतो बीबीका चरित्र जैसा महापातकसे भरा हुआ है, वैसे ही अनेक तरहसे सुशोभित है। ऐसे चरित्रका विस्तृत वृत्तान्त पढ़नेमें पाठकोंको अरुचि न होगी।

    जब इनके पिताने हिन्दू-धर्म बदलकर मुस्लिम धर्म ग्रहण किया, तो उस समय इनका हिन्दू नाम बदलकर लुत्फुन्निसा पड़ा। मोती बीबी इनका नाम कभी नहीं था। फिर भी छिपे वेशमें देश-विदेश भ्रमणके समय यह कभी-कभी नाम पड़ जाता है। इनके पिता ढाकामें आकर राजकार्यमें नियुक्त हुए। लेकिन वहाँ अनेक स्वदेशीय लोगोंका आना-जाना हुआ करता था। अपने देशमें जान-पहचानवालोंके सामने विधर्मी होकर रहना भला जान नहीं पड़ता। अतएव वह कुछ दिनोंमें अच्छी ख्याति लाभ कर अपने मित्र अनेक उमरा लोगोंसे पत्र लेकर सपरिवार आगरे चले गये। अकबर बादशाहके सामने किसीका गुण छिपा नहीं रहता था। शीघ्र ही इन्होंने अपने गुण प्रकट किये। इसके फलसे वह आगरेके उमरा लोगोंमें गिने जाने लगे। इधर लुत्फुन्निसा भी यौवनमें पदार्पण करने लगी। आगरेमें आकर इन्होंने फारसी, संस्कृत, नृत्यगीत, रसवादन आदिमें अच्छी शिक्षा ग्रहण कर ली। राजधानीकी सुन्दरियों और गुणवतियोंमें यह अग्रगण्य बनने लगीं। दुर्भाग्यवश लुत्फुन्निसाके पूर्ण युवती होनेपर जान पड़ा कि उसकी मनोवृत्ति दुर्दमनीय और भयानक है। इन्द्रियदमनकी न तो इच्छा थी और न क्षमता ही थी। सद् और असद् में समान प्रवृत्ति थी। यह कार्य अच्छा है और यह बुरा, ऐसा सोच कभी उसने कार्य नहीं किया। जो अच्छा लगता था, वही काम करती थी। जब सत् कर्मसे अन्तःकरण सुखी होता, तो वह करती और असत्‌कर्मके समय भी वही करती। यौवनकालकी दुर्दमनीय मनोवृत्तिके अनुकूल ही लुत्फुन्निसा भी बन गयी। उसके पूर्वपति वर्त्तमान हैं, उमरा लोगों में किसीने उसके साथ शादी न की। वह भी शादी की लालायित न रही। मन ही मन सोचा, फूल-फूलपर घूमनेवाली भ्रमरीको एक का बनाकर बाँध क्यों दूँ? पहले कानाफूसी हुई, इसके बाद मुँह पर कलंककी कालिमा लग गयी। उसके पिताने विरक्त होकर उसे घरसे निकाल दिया।

    लुत्फुन्निसा गुप्त रूपसे जिन्हें कृपा-वितरण करती रही, उनमें युवराज सलीम भी एक थे। एक उमराके कुलके कलंकका कारण होनेपर पीछे बादशाहका कोपभाजन न बनना पड़े, इस कारण खुलकर सलीमशाहने लुत्फुन्निसाको अपने महलमें नहीं रखा। अब सुयोग मिल गया। राजपूतपति मानसिंहकी बहन सलीमकी प्रधान महिषी हुई। युवराजने लुत्फुन्निसाको अपनी महिषीकी प्रधान अनुचरी बना दिया। लुत्फुन्निसा बेगमकी सखी बन गयी और परोक्ष रूपसे युवराजकी अनुग्रह-भागिनी हुई।

    लुत्फुन्निसा जैसी बुद्धिमती महिला शीघ्र ही युवराजके हृदय पर अधिकार कर लेगी, यह सहज अनुमेय है। सलीमके हृदयपर उसका अधिकार इस तरह प्रतियोगीशून्य हो गया कि लुत्फुन्निसा ने प्रण कर लिया कि वह इनकी पटरानी होकर रहेगी। केवल लुत्फुन्निसाकी ही ऐसी प्रतिज्ञा हुई, यह बात नहीं, बल्कि इसका विशवास महल भरमें हो गया। ऐसी ही आशामय स्वप्नमें लुत्फुन्निसाका जीवन पतिमें लगा। लेकिन इसी समय उसकी नींद टूटी। अकबर बादशाहके कोषाध्यक्ष ख्वाजा अब्बासकी कन्या मेहरुन्निसा यवनकुलकी प्रधान सुन्दरी निकली। एक दिन कोषाध्यक्ष ने युवराज सलीम और अन्य उमराको निमंत्रण देकर घर बुलाया। उसी दिन सलीमकी मुलाकात मेहरके साथ हो गयी। उसी दिन सलीमने भी अपना हृदय मेहरुन्निसा को सौंप दिया। इतिहासप्रेमीमात्र इस घटनाको जानते हैं। इसके बाद मेहरकी शादी शेर अफगनके साथ हो गयी। यह शादी अकबरशाह के षड्यन्त्रका फल थी। यद्यपि सलीमको निरस्त होना पड़ा, लेकिन उन्होंने आशाका त्याग न किया। सलीमकी चित्तवृत्ति लुत्फुन्निसा के नखदर्पणवत् थी। वह समझ गयी कि शेर अफगनके जीवनकी खैरियत नहीं और सलीमकी महिषी मेहर ही होगी। लुत्फुन्निसाने सिंहासनकी आशा त्याग दी।

    विचक्षण मुगल-सम्राट् अकबरकी परमायु पूरी हुई। जिस प्रचण्ड सूर्यकी प्रभा तुर्कीसे लेकर ब्रह्मपुत्र तक प्रदीप्त थी, उस सूर्य का अस्त हुआ। इस समय लुत्फुन्निसाने आत्मप्राधान्यकी रक्षाके लिये एक दुःसाहसिक संकल्प किया।

    राजपूत राजा मानसिंहकी बहन सलीमकी प्रधान महिषी थी। खुसरू उनके पुत्र हैं। एक दिन उनके साथ अकबर बादशाहकी बीमारीकी बात चल रही थी जिस सम्बन्धमें शीघ्र ही बादशाहकी महिषी बननेकी बधाई लुत्फुन्निसा दे रही थी; प्रत्युत्तरमें खुसुरूकी जननी ने कहा—“बादशाहकी प्रधान महिषी होने से मनुष्य जन्म सार्थक अवश्य होता है, लेकिन सर्वश्रेष्ठता उसकी है जिसका पुत्र बादशाह हो और वह बादशाहजननी बने।” यह उत्तर सुनते ही लुत्फुन्निसाके हृदयमें एक चिन्तनीय अभिसन्धिका उदय हुआ। उसने उत्तर दिया—“तो ऐसा ही क्यों न हो! वह भी आपके ही इच्छाधीन है।” बेगमने पूछा—“यह कैसे?” चतुराने उत्तर दिया—“युवराज खुसरूको ही सिंहासनपर बिठाइये।”

    इस बात का बेगमने कोई जवाब न दिया। उस दिन फिर यह प्रसङ्ग न उठा। लेकिन यह बात किसीको भूली नहीं। स्वामीके बदले पुत्र राज्यसिंहासनपर आसीन हो, यह बेगमकी इच्छा अवश्य है, लेकिन मेहरुन्निसाके प्रति सलीम का प्रेम जैसे लुत्फुन्निसा के हृदयमें काँटेकी तरह खटकता है, वैसे ही बेगमके हृदयमें भी खटकता है। मानसिंहकी बहन एक तुर्कमानकी कन्या की आज्ञानुवर्तिनी होकर कैसे रह सकती है? लुत्फुन्निसाका भी इस विषय में गहरा तात्पर्य था। दूसरे दिन फिर यह प्रसङ्ग उत्थापित हुआ। दोनोंका एक अभिमत स्थिर हुआ।

    सलीमको त्यागकर खुसरूको सिंहासनपर बैठाना कोई असम्भव बात न थी। इस बातको लुत्फुन्निसाने बेगमको अच्छी तरह समझा दिया। उसने पूछा,—“मुगल साम्राज्य राजपूतोंके बाहुबलपर स्थापित हुआ है और आज भी निर्भर करता है। वही राजपूत कुल-तिलक मानसिंह खुसरूके मामा हैं और प्रधान राजमंत्री खान आजम खुसरूके श्वसुर हैं, इन दोनों आदमियोंके खड़े होनेपर कौन इनकी आज्ञा न मानेगा? फिर किसके बलपर युवराज सिंहासनपर अधिकार कर सकते हैं? राजा मानसिंहको राजी करना आपके ऊपर है। खान आजम और अन्यान्य उमराको तैयार करना मेरे ऊपर छोड़ दीजिये? आपके आशीर्वादसे अवश्य कृतकार्य हूँगी; लेकिन एक आशंका है कि कहीं सिंहासनासीन होनेके बाद खुसरू मुझे इन दुराचारियों को….निकाल बाहर न कर दें।”

    बेगम सहचरीका अभिप्राय समझ गयी। हँसकर बोली,—“तुम आगरेमें जिस उमराकी गृहिणी होना चाहोगी, वह तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा। तुम्हारे पति पंचहजार मंसबदार होंगे।”

    लुत्फुन्निसा सन्तुष्ट हुई। यही उसका उद्देश्य था। यदि राजपुरीमें सामान्य स्त्री होकर रहना हुआ, तो फूलोंपर घूमकर रस लेनेवाली भ्रमरी बननेसे क्या फायदा हुआ? यदि स्वाधीनता ही त्याग करना होता तो बालसखी मेहरुन्निसाकी दासी होनेमें ही क्या हर्ज था? इससे तो कहीं अधिक गौरवकी बात है कि किसी राजपुरुषके गृहकी गृहस्वामिनी बनकर बैठा जाये?

    केवल इसी लोभसे लुत्फुन्निसा इस कार्यमें लिप्त न हुई। सलीम उसकी उपेक्षा कर जो मेहर के पीछे पागल हो रहे हैं, उसका उसे प्रतिशोध भी लेना है?

    खान आजम आदि आगरे और दिल्लीके उमरा लुत्फुन्निसाके यथेष्ठ साधित थे। खान आजम अपने दामादके लिये उद्योग करेंगे इसकी भी पूरी आशा थी। वह और अन्यान्य उमरा राजी हो गये। खान आजमने लुत्फुन्निसासे कहा—“मान लो यदि हम लोग कृतकार्य न हुए तो हम लोगोंको अपने बचावकी भी कोई राह निकाल लेनी चाहिए।”

    लुत्फुन्निसाने कहा,—“आपकी क्या राय है?” खानने कहा, कहा साँचा:Sic—‘उड़ीसाके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। केवल उसी जगह मुगलोंका शासन प्रखर नहीं है, उड़ीसाकी सेना हमारे हाथ में रहना आवश्यक है। तुम्हारे भाई उड़ीसाके मंसबदार हैं। मैं कल प्रचार करुँगा कि वह युद्धमें आहत हुए हैं। तुम उन्हें देखने के बहानेसे कल ही उड़ीसाको यात्रा करो। वहाँका कार्य समाप्त कर तुरंत वापस जाओ।’

    लुत्फुन्निसा इसपर राजी हो गयी। वह अपना कार्य कर लौटते समय पाठकोंसे मिली है।

    ⋆

    :२:

    दूसरी जगह

    “जे यारी ते पड़े लोके उठे ताइ धरे।

    बारेक निराश होये के कोथाय मरे॥

    तूफाने पतित किन्तु छाड़ि बना हाल।

    आजि के विफल होलो, होते पारे काल॥

    —नवीन तपस्विनी

    जिस दिन नवकुमारको बिदा कर मोती बीबी या लुत्फुन्निसाने बर्द्धमानकी यात्राकी, उस दिन वह एकदम बर्द्धमान तक पहुँच न सकी। दूसरी चट्टीमें रह गयी। संध्याके समय पेशमन्‌के साथ बैठकर बातें होने लगीं। ऐसे समय सहसा मोती बीबीने पेशमन्‌से पुछा,—“पेशमन्! मेरे पतिको देखा, कैसे थे?”

    पेशमन्‌ने कुछ विस्मित होकर कहा,—“इसके क्या माने?” मोती बोली,—“सुन्दर थे या नहीं?”

    नवकुमारके प्रति पेशमन्‌को विशेष विराग हो गया था। जिन अलङ्कारोंको मोती ने कपालकुण्डलाको दे दिया उनके प्रति पेशमन् का विशेष लोभ था। मन-ही मन उसने सोच रखा था, कि एक दिन माँग लूँगी। उस बेचारीकी वह आशा निर्मूल हो गयी। अतः कपालकुण्डला और उसके पति दोनोंके प्रति उसे जलन थी। अतएव स्वामिनीके प्रश्नपर उसने उत्तर दिया—‘दरिद्र ब्राह्मणकी सुन्दरता और कुरूपता क्या है?”

    सहचरीके मनका भाव समझकर मोतीने हँसकर कहा—दरिद्र ब्राह्मण यदि उमरा हो जाये, तो सुन्दर होगा या नहीं?”

    पे॰—इसके क्या मानी?

    मोती—क्यों, क्या तुमने यह नहीं सुना है कि बेगमके कहने के अनुसार यदि खुसरू बादशाह हो गये तो मेरा पति उमरा होगा?

    पे॰—यह तो जानती हूँ, लेकिन तुम्हरा पूर्व पति उमरा कैसे होगा?

    मोती—तो हमारे और पति कौन हैं?

    पे॰—जो नये होंगे।

    मोतीने मुस्कराकर कहा—“मेरी जैसी सतीके दो पति, यह बड़े अन्याय की बात होगी। हाँ, यह कौन जा रहा है?”

    जिसे देखकर मोतीने कहा कि यह कौन जा रहा है, उसे पेशमन् तुरत पहचान गयी। वह आगरेका रहनेवाला खान आजमका आदमी था। दोनों ही न्यस्त हो पड़ीं। पेशमन्‌ने उसे बुलाया। उस व्यक्तिने आकर लुत्फुन्निसाको कोर्निश कर पत्र दिया; बोला—“खत लेकर उड़ीसा जा रहा था। बहुत ही जरूरी खत है।”

    पत्र पढ़ते ही मोती बीबीकी सारी आशालतापर तुषारपात हो गया। पत्रका मर्म इस प्रकार था:—

    “हमलोगोंका यत्न विफल हो गया। मरते दम तक बादशाह अकबर हमलोगोंको बुद्धिबलसे परास्त कर गये। उनका परलोकवास हो गया। उनकी आज्ञाके बलसे युवराज सलीम अब जहाँ गीरशाह हो गये। अब तुम खुसरूके लिए व्यस्त न होना। इस उपलक्ष्यमें कोई तुम्हारी शत्रुता न करे, इस चेष्टाके लिये तुरन्त आगारा आ जाओ।”

    अकबर बादशाहने किस तरह इस षड्यन्त्रकी विफल किया, यह इतिहासमें अच्छी तरह वर्णित है। इस तरह उसके विस्तारकी आवश्यकता नहीं।

    पुरस्कार देकर दूतको बिदा करनेके बाद मोतीने वह पत्र पेशमन् को पढ़कर सुनाया। पेशमन्‌ने सुनकर कहा—“अब उपाय?”

  • आनन्द मठ

    आनन्द मठ

    Aproximadamente 86.278 palavras.

    साहब-"टुम कोन हाय?"

    शान्ति-“देखते तो हो कि मैं संन्यासिनी हूँ, तुम जिनके साथ लड़ाई करने आये हो, उन्हीं में से किसी एककी पत्नी हूं।"

    साहब-"टुम हमारा धारपर चलेगा?"

    शान्ति- क्या तुम्हारी रखेली होकर?"

    साहब-“औरटका माफिक रहना, लेकिन शाडी नहीं होगा।"

    शान्ति-"अच्छा, मैं भी तुमसे एक बात पूछती हूं, हमारे घरपर पहले एक बन्दर था पर हालमें वह मर गया। पींजरा खाली पड़ा है। क्या तुम उसके पीजरेको आबाद करने चलोगे? मैं तुम्हारी कमरमें भी साँकल बांध दूंगी। हमारे बागीचे में खूब मीठे केले फलते हैं, उन्हें भरपेट खाया करना।"

    साहब-"टुम बड़ा बहादुर औरट है। टुमारा साहस देखकर हम बहुट खुशी हुआ। टुम हमारा घारपर चलो टुमारा खाविण्ड टो लड़ाईमें मारा ही जायगा; फिर टुम क्या करेगा?"

    शान्ति-"अच्छा, तो हमलोग अभीसे आपसमें एक बात तै कर रखें। युद्ध तो दो चार दिनोंमें होगा ही। यदि उस लड़ाई में तुम जीतोगे, और मैं जीती बचुंगी, तो तुम्हारी रखेली होकर रहूंगी। पर कहीं हमारी जीत हुई, तो तुम हमारे घर आकर बन्दर बनकर पींजरेमें रहोगे और केले खाया करोगे न?"

    साहब—केला बहुत उमडा चीज होटा है। इस वखट टुमारे पास है।"?

    शान्ति—"ले जा अपनी बन्दूक! ऐसो जङ्गली जातिसे बातें करना भी बेवकूफी है!"

    यह कह, बन्दूक फेंककर शांति हंसती हुई चली गयी।

    तीसरा परिच्छेद।

    शान्ति, साहबको वहीं छोड़कर हरिणीकी भांति उछलती कूदती जङ्गलके अन्दर न जाने कहां गायब हो गयी। थोड़ी देर बाद साहबको किसी स्त्रीके मधुरकण्ठसे निकला हुआ सुनाई दिया,—

    "यह यौवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    फिर न जाने कहांसे सारंगीकी सुरीलो तानमें भी यही गीत बज उठा—

    "यह यौवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    फिर उसी सुरमें सुर मिलाकर किसी पुरुषने भी गाया,—

    "यह पौवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    तीनों सुरो ने एक में मिलकर बनकी सारी लताओंको हिला डाला। शान्ति गाती हुई चली;—

    "तह याैवन जल तरङ्ग कौन रोकि राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!

    नदिया बिच नैया जाती है, अंधड़ पानी सह लेती हैं।

    चतुर खिवैया डांड़ चलावे, नहि क्यों पार उतरि हौं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!

    बांध टूटिगो बालू केरो, पूरन हुए मनोरथ मेरो,

    गङ्गाधार ज्वार जब आयो, कौन रोकि तोहे राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे!"

    सारंगीमें भी यही गीत बज रहा था—

    "गंगाधार ज्वार जब आयो, कौन रोकि तोहे राखि हैं?

    हरे मुरारे! हरे मुरारे।"

    जहां घनघोर जङ्गल था, बाहर से देखने पर कहीं कुछ नहीं दिखाई देता था, शान्ति उसी ओर चली गयी। वहां शाखा-पल्लवों के बीच छिपा हुआ छोटासा झोंपड़ा था। उसके खम्भे वगैरह डालों के थे, छाजन पत्तों की, जमीन काठकी और गच मिट्टी की थी। लताद्वार को हटाकर शांति उसी झोपड़े के अन्दर घुसी। वहीं जीवानन्द बैठे हुए सारङ्गी वजा रहे थे।

    शान्ति को देखकर जीवानन्द ने पूछा,—"इतने दिन बाद गङ्गा में ज्वार आया है क्या?"

    शांति ने हंसकर उत्तर दिया,—"नदी नालों को डुबाकर गंगा में ज्वार आने पर भी कहीं पानी वेग से चलता है?"

    जीवानन्द ने उदास होकर कहा,—"देखो शांति! एक दिन व्रतभङ्ग हो जाने के कारण मेरे प्राण तो न्यौछावर हो ही चुके हैं; क्योंकि पाप का प्रायश्चित्त तो करना ही होगा। अबतक तो मैं कभी का प्रायश्चित्त कर चुका होता; पर तुम्हारे ही अनुरोध से नहीं कर सका। पर अब देखता हूं कि बड़ी भारी लड़ाई शीघ्र ही छिड़ा चाहती है। उसी युद्धक्षेत्र में मुझे उस पापका प्रायश्चित्त करना होगा। इन प्राणों को निश्चय ही त्यागना पड़ेगा। मेरे करने के दिन—"

    शांति ने उन्हें आगे और कुछ नहीं कहने दिया, झटपट बोल उठी,—"मैं तुम्हारी धर्मपत्नी, सहधर्मिणी और धर्मकी संगिनी हूं। तुमने बहुत बड़ा धर्म का काम अपने सिरपर उठाया है

    उसी में तुम्हारी सहायता करनेके लिये मैं घर छोड़कर यहां आयी हूं। दोनों जने एक साथ मिलकर धर्मावरण करेंगे, यही सोचकर मैं घर छोड़ जंगलमें आ बसी हूं। मैं तुम्हारे धर्मको वृद्धि करूंगी। धर्म पत्नी होकर तुम्हारे धर्ममें विघ्न क्यों डालूंगी? विवाह लोक, परलोक, दोनोंके लिये किया जाता है। सोचकर देखो, मेरा तुम्हारा विवाह तो इस लोकके लिये हुआ ही नहीं, केवल परलोकके लिये हुआ हैं। परलोकमें हमें दूना फल मिलेगा। फिर प्रायश्चित्तकी बात कैसी? तुमने कौनसा पाप किया है? तुम्हारी प्रतिज्ञा यही थी, कि किसी स्त्रीके साथ एक आसनपर न बैठोगे। अब बतलाओ, कि तुम कहां और कब मेरे साथ एक आसनपर बैठे थे। फिर प्रायश्चित्त कैसा? हाय प्रभो! तुम मेरे गुरु हो, फिर मैं तुम्हें क्या धर्म सिखलाऊंगी। तुम वीर हो, तुम्हें मैं वीरव्रत क्या सिखलाऊंगी?"

    आनन्दसे गद्गद हो, जीवानन्द ने कहा, "क्यों नहीं? अभी तो तुमने मुझे सिखलाया!"

    शांति प्रफुल्लित चित्तसे कहने लगी,-"और देखो, प्रमो! हमारा विवाह इस लोकके लिये भी निष्फल कैसे हुआ? तुम मुझ प्यार करते हो ही, मैं तुम्हें जी से चाहती ही हूं, फिर इससे बढ़कर इस लोकमें और कौनसा फल चाहिये? बोलो, वन्देमातरम्।"

    दोनों व्यक्ति एक स्वरले 'वन्देमातरम्' गाने लगे।

    चौथा परिच्छेद।

    एक दिन भवानन्द गोस्वामी नगरमें गये और चौड़ी सड़क छोड़कर अंधेरी गलीमें घुसे। गलीके दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे मकान खड़े थे। सूर्य भगवान् दोपहर में भी एकाध बार ही इस

    गलीके भीतर झांक लेते हैं, नहीं तो वहां बराबर अंधकारही अंधकार रहता है। उसी गलीके पासवाले एक दोतल्ले मकानमें भवानद ठाकुर घुस पड़े। नीचेके जिस घरमें एक अधेड़ स्त्री बैठी रसोई बना रही थी, वहीं जाकर भवानंद महाप्रभु उपस्थित हुए। स्त्री अधेड़, मोटी ताजी, काली, सफेद कपड़े पहने, माथेमें चंदन लगाये, सिरपर बालोंका जड़ा बांधे थी। हांडीके कोरमें भात चलानेसे कलछी ठक-ठक बोल रही थी। फर फर करके उसके सिरके बाल हवामें उड़ रहे थे, वह आर ही आप न जाने क्या बड़बड़ा रही थी और उसके चेहरेके चढ़ाव उतारके साथ साथ उसके बालोंका लहराना कुछ और शोभा देरहा था। इसी समय भवानन्द महाप्रभु उस घरमें घुस पड़े और बोले, “पण्डिताइनजी प्रणाम।" पण्डिताइनजी भवानन्दको देख कर जल्दी जल्दी अपने कपड़े सम्हालने लगीं। उनकी इच्छा थी कि सिरका सुहावना जूड़ा खोल डालें, पर जूठा हाथ होने के कारण वैसा न कर सकीं। एक तो उनके वे बाल स्वभावतः ही मुलायम थे, जिसपर पूजाके समयका उनमें मालसिरीका एक फल भटका रह गया था। उन्होंने कितना चाहा कि उसे आँचल से छिपा लें, पर आंचलमें वह छिप न सका, कारण वे सिर्फ पांच हाथकी साड़ी पहने हुई थीं। वह पांच हाथ की साड़ी उनकी मोटी तोंदको ही ढकने में प्रायः ख़तम हो गयी थी, तिसपर दुःसह भार-ग्रस्त हृदय-मण्डलकी भी उसे आबरू बचानी पड़ती थी। अन्ततो गत्वा कन्धेतक पहुंचते न पहुंचते ही साड़ीने जवाब दिया। कानके पास आकर चुपकेसे कहा कि बल, अब इसके आगे मुझसे नहीं जाया जायगा। लाचार लज्जा और संकोचवश गौरी ठकुराइनने आंचलको कानके पास लाकर हाथसे पकड़ रखा और आगेसे आठ हाथकी साड़ी पहननेकी मनही मन प्रतिज्ञा करते हुए कहा,-"कौन? गुसाई जी! आओ, आओ। मुझे प्रणाम क्यों करते हो भाई?" भवा०-"तुम भाभीजी ठहरी ?"

    गौरी–"आदरसे जो चाहो कह लो, नहीं तो तुम ठहरे गुसाई बाबा-लाक्षात् देवता! खैर, जब प्रणाम किया ही तो मैं भी असीस देती है कि जियो जागो। हां, प्रणाम कर भी सकते हो; क्योंकि उमरमें मैं तुमसे बड़ी हूं।"

    इस समय गौरीदेवीकी उमर भवानन्दसे २५ वर्ष अधिक होगी, परन्तु सुचतुर भवानन्दने कहा, "यह क्या भाभी! तुम यह क्या कहती हो? तुम्हे रसीली छबीली देखकर ही भाभी कहकर पुकारता हूं। नहीं तो तुम्हें याद है या नहीं, उस बार हिसाब लगाकर देखा गया था, तो तुम मुझसे छः वर्ष छोटी निकली थी? हम वैष्णवोंमें तो जानती ही हो कि हर तरहके लोग हैं। इसीलिये मेरी इच्छा होती है कि मटके ब्रह्मवारीजीकी आज्ञा लेकर तुम्हारे साथ सगाई कर लूं। यही कहने के लिये मैं तुम्हारे पास आया हूं।"

    गौरी-"छिः! यह भी कोई बात है? मैं ठहरी विधवा-”

    भवा०"–तो क्या विधवाकी सगाई नहीं होती?"

    गौरी-“अरे भाई! जाओ, जो मनमें आवे, करो। तुम लोग पंडित टहरे। हम औरतें यह क्या जाने? खैर, कब सगाई होगी?"

    भवानन्दने बड़ी मुश्किलसे अपनी हंसी रोककर कहा, "बस एक बार उस ब्रह्मचारीसे मिलने भर की देर है। अच्छा, यह तो कहो वह कैसी है?"

    गौरी उदास हो गयी। उसने मनही मन सोचा कि मालूम होता है, सगाईकी बात यह योंही दिल्लगीके तौरपर कह रहा था! बोली,-"कैसी क्या? जैसी थी, वैसी है।"

    भवा०-"तुम एक बार जाकर उसको देखो, कि कैसी है। उससे कहना कि मैं उससे मिलने आया हूं।" यह सुन, गौरी देवी हाथकी कलछी जमीनपर रख; हाथ धो, लम्बो लम्बी डग भरती दोतल्ले पर जानेके लिये सीढ़ियां

    चढ़ने लगीं। ऊपर एक कमरेमें एक फटी चटाईपर एक अपूर्व सुन्दरी बैठी थी पर उसके सौन्दर्यपर भीषण छाया पड़ी थी। मध्याह्न कालमें, कूल परिप्लाविनी, प्रसन्न-सलिला, विपुल-जल-कल्लोलिनी, स्रोतस्वतीके ऊपर जैसी घने बादलों की छाया पड़ जाती है, वैसी ही छाया पड़ी हुई थी। नदीमें तर उठ रही थीं, तीरपर कुसुमित वृक्ष हवाके झोंकेसे हिल रहे थे, कोई कोई फूलोंके भारले झुक रहे थे, अट्टालिकाओंकी श्रेणी भी अपनी शोभा दिखा रही थी, डांडोंकी चोटसे नदीका जल चञ्चल हो रहा था, दोपहरका सुहावना समय था; पर उस काली छायामें सारी शोभा-क्षीण थी। उस सुन्दरीकी भी वही दशा थी। पहलेकेसे सुन्दर चिकने और चञ्चल केश, पहलेके ही तरह प्रशान्त और उन्नत ललाटपर किसीको निराली लेखनीसे अङ्कित भौ है, पहलेकीसी बड़ी साश्रु और काली पुतलियोंवाली आंखें-लभी हैं, पर न तो उनमें पहलेकी भांति कटाक्ष है, न चंञ्चलता है, पर कुछ कुछ नम्रता है। अधरोंपर वही पहलेकीसी ललाई है; हृदय उसी तरह भावपूर्ण है, बांहें वैसी ही वनलताकी कोमलताको भी मात करनेवाली हैं, पर आज न तो वह कान्ति है, न ज्योति, न चंञ्चलता और न रस, अधिक क्या वह यौवन हो अब न रहा, केवल सौन्दर्य और माधुये। उसमें और दो नयी बातें आ गयी है धीरता और गंम्भीरता। पहले इन्हें देखने से मालूम होता था कि यह मनुष्य लोककी अनुपम सुन्दरी हैं; पर आज देखनेसे मालूम होता है कि यह देवलोककी कोई शापग्रस्ता देवी है। चारों ओर भोजपत्रपर लिखी हुई पोथियाँ फैली हुई हैं; दीवारमें खूटीपर सुमिरनी माला लटक रही है और जगह जगहपर जगन्नाथ, बलराम, सुभद्राका पट लगा है, कहीं कालियदमन, नव-नारी कुञ्जर, वस्त्रहरण, गोवर्द्धनधारण आदि ब्रजलीलाओंके चित्र अंकित हैं। चित्रोंके नीचे लिखा है,- “चित्र हैं हा विचित्र?” भवानन्दने उसी घरमें प्रवेश किया।

    भवानन्दने पूछा,-"कल्याणी! कैसी हो? तुम्हारा शरीर तो अच्छा है न?"

    कल्याणी-"आप क्या इस सवालका पूछना बन्द न करेंगे?

    मेरा शरीर अच्छा रहनेसे न आपकी ही कुछ भलाई है, न मेरी।"

    भवा०-"जो वृक्ष रोपता है, वह उसमें नित्य जल छोड़ा करता है। उस वृक्षको पनपते देखकर उसे सुख होता है। तुम्हारे मुर्दे शरीरमें मैंने जान डाली थी, इसीलिये पूछता रहता हूं कि वह जान ज्योंकी त्यों है या नहीं?"

    कल्याणी-“कहीं विषका वृक्ष भी सूखता है?"

    भवानन्द-"तो क्या जीवन विष है?"

    कल्याणी-"नहीं तो मैं क्यों अमृत पीकर उसका नाश करने जाती?"

    भवानन्द–"मैंने कई दफै सोचा, पर साहस न हुआ कि तुमले पूछूं कि किसने तुम्हारा जीवन विषमय कर दिया था।"

    कल्याणी-"किसीने नहीं यह जीवन तो आपही विषमय है। मेरा जीवन विषमय है, आपका जीवन विषमय है, सारे संसारका जीवन विषमय है।"

    भवा०-"ठीक है कल्याणी! मेरा जीवन सचमुच विषमय है। जिस दिनसे……. हाँ, तो तुम्हारा व्याकरण पढ़ना समाप्त हो गया?"

    कल्याणी-"नहीं।"

    भवा०-"और कोष?"

    कल्याणी-“उसे पढ़नेमें तो जी नहीं लगता।"

    भवा०-“पहले तो मैंने पढ़ने लिखने में तुम्हारा बड़ा उत्साह देखा था, अब ऐसी अश्रद्धा क्यों हो गयी?"

    कल्याणी-“जब आपकेसे पण्डित भी महापापी होते हैं तब न लिखना पढ़ना ही अच्छा है। प्रभो! मेरे स्वामीका कुछ हाल ब तलाइये।"

    भवा०-"तुम बारबार यह बात क्यों पूछती हो? वे तो तुम्हारे लिये मरे हुएके बराबर हैं।"

    कल्याणी–“मैं उनके लिये मर गयी हूं सही; पर वे मेरे लिये कभी नहीं मर सकते।"

    भवा०-“वे तुम्हारे लिये मरे तुल्य हो जायंगे, यही सोचकर तो तुमने अपनी जान दी थी। फिर बार बार वही बात तुम क्यों पूछती हो?"

    कल्याणी-"मरनेसे ही क्या सम्बन्ध टूट जाता है? कहिये, वे कैसे हैं?"

    भवा०-"अच्छे हैं।"

    कल्याणी…“कहां हैं; पदचिह्नमें?"

    भवा०-"हाँ वहीं है।"

    कल्याणी-"क्या कर रहे हैं?"

    भवा०-" जो करते थे, वही करते हैं। किला और हथियार तैयार करा रहे हैं। उन्हींके बनाये हुए अस्त्रोंसे आजकल सहस्त्र-सहस्त्र सन्तान सजित हो रहे हैं। उनके प्रतापसे तोप, बन्दूक, गोला, गोली और बारूदका हमलोगोंको अभाव नहीं है। सन्तानोंमें आजकल वेही श्रेष्ठ समझे जाते हैं वे हमलोगोंका बड़ा उपकार कर रहे हैं दाहिने हाथ बन रहे हैं।"

    कल्याणी-“मैं यदि प्राण-त्याग नहीं करती, तो वे इतना थोड़े ही कर सकते थे। जिसकी छातीमें कच्चा घड़ा बंधा होता है, वह थोड़े ही भवसागर पार हो सकता है? जिसके पैरों में जंजीर पड़ी होती है वह थोड़ेही दौड़ सकता है? सन्यासी, तुमने इस क्षुद्र जीवनको क्यों बचाया था?"

    भवा०-"स्त्री सहधर्मिणी, पतिके धर्मों में सहायक होती है।"

    कल्याणी–“छोटे छोटे धर्मोंमें। बड़े बड़े धर्मो तो वह कण्ठक ही प्रमाणित होती है। मैंने विषकण्टक द्वारा उनके

    अधर्मका कांटा निकाल फेंका था। छिः पापी, दुराचारी, ब्रह्मचारी! तुमने मुझे मरनेसे क्यों बचाया?"

    भवा०-"मैंने जो प्राण तुम्हें लौटा दिये, उन्हें मेरी ही थाती समझ लो और बोलो, तुम उन्हें मेरे हवाले कर सकती हो?"

    कल्याणी-"अच्छा, यह तो कहिये, आपको मेरी सुकुमारी का कुछ हाल मालूम है या नहीं?"

    भवा०-"बहुत दिनोंसे कुछ नहीं मालूम। जीवानन्द बहुत दिनोंसे उधर गये ही नहीं।"

    कल्याणी-"तो क्या आप मुझे उसका संवाद नहीं ला दे सकते? स्वामी भलेही छूट जायं; पर जीते जी कन्याको क्यों छोड़ूं? अगर इस समय सुकुमारीको पा जाऊं, तो यह जीवन कुछ सुखमय हो सकता है। पर आप मेरे लिये इतना तरद्दुद क्यों उठाने लगे?"

    भवा०-"क्यों नहीं उठाऊंगा? कल्याणी! मैं तुम्हारी लड़की ला दूंगा, पर इसके बाद?"

    कल्याणी-“इसके बाद क्या?"

    भवा०-"स्वामी?"

    कल्याणी- “उन्हें तो मैंने जान बूझकर छोड़ दिया है।"

    भवा०-“यदि उनका व्रत सम्पूर्ण हो जाय?"

    कल्याणी-"तब उन्हींकी होकर रहूंगी। वे क्या जानते हैं, कि मैं मरी नहीं हूं?"

    भवा०-"नहीं।"

    कल्याणी-“क्या आपसे उनकी देखादेखी नहीं होती?"

    भवा०-"होती है।"

    कल्याणी-“मेरी कुछ बात नहीं चलती?"

    भवा०—“नहीं, जो स्त्री मर गयी, उससे स्वामीका नाता ही क्या रह गया?"

    कल्याणी- आप क्या कह रहे हैं?" भवा०—तुम्हारा नया जन्म हुआ है; अब तुम फिर विवाह कर सकती हो।"

    कल्याणी—“मेरी कन्याको ला दो।"

    भवा०-"ला दूंगा-तुम फिर विवाह कर सकती हो?"

    कल्याणी-"क्या तुम्हारे साथ?"

    भवा०-"विवाह करोगी?"

    कल्याणी-"क्या तुम्हारे हो साथ?"

    भवा०- यदि ऐसा ही हो?"

    कल्याणी-"तो फिर सन्तानधर्म कहां जायगा?"

    भवा०–"अथाह जलमें डूब जायगा।"

    कल्याणी-"और परलोक?"

    भवा०-"वह भी अथाह जल में डूब जायगा।"

    कल्याणी- "और यह महाव्रत?"

    भवा०-"वह भी।"

    कल्याणी-"किसलिये तुम इन सबको अथाह जलमें डुबानेको तैयार हो?"

    भवा०-"तुम्हारे ही लिये। देखो, मनुष्य, ऋषि, सिद्ध, देवता, सबका चित्त अवश रहता है। सन्तानधर्म मेरा प्राण है सही; पर आज पहले पहल मुझे कहना पड़ता है कि तुम मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर हो। जिस दिन मैंने तुम्हें जिलाया, उसी दिनसे तुम्हारे चरणोंका क्रीत दाल हो रहा हूं। मैं नहीं जानता था कि संसार में इतनी रूपराशि हैं। यदि मैं जानता कि किसी दिन ऐसी रूपशि मेरी आँखोंतले आयगी, तो मैं कदापि सन्तानधर्म नहीं ग्रहण करता। यह धर्म इस आगमें पड़कर राख हो जाता है। मेरा धर्म जलकर राख हो चुका, सिर्फ प्राण रह गये हैं। आज चार वर्षांसे ये प्राण भी जल रहे हैं। अब ये भी न बचेंगे। ओह! कैसी जलन है, कल्याणी! कैसी ज्वाला है! पर इसमें जलने योग्य ईन्धन अब नहीं रह

    गया। प्राण निकल रहे हैं। चार सालतक सहता आया, अब नहीं सहा जाता। बोलो, तुम मेरी होगी या नहीं?"

    कल्याणी-“मैंने तुम्हारे ही मुंहसे सुना था कि सन्तानधर्मका यह नियम है कि जो इंद्रियोंपर वश नहीं रखता उसे प्राण देकर इस पापका प्रायश्चित्त करना पड़ता है। क्या यह बात ठीक है?"

    भवा०-"हां, ठीक है।"

    कल्याणी-"तब तो, तुम्हारे इस पापका प्रायश्चित्त मृत्यु ही है।"

    भवा०-"हां, मेरा प्रायश्चित्त मृत्यु ही है।"

    कल्याणी—“यदि मैं तुम्हारी मनोकामना पूर्ण कर दूं, तो तुम प्राण दे डालोगे?

    भवा०-"हां, जरूर दे डालूंगा।"

    कल्याणी—"और यदि नहीं पूर्ण करू तो?"

    भवा०–“यदि नहीं पूर्ण करो तो भी मुझे मरकर इस पापका प्रायश्चित्त करना ही पड़ेगा, पचोंकि मेरा चित्त इद्वियोंका दास हो गया है।"

    कल्याणी–"मैं तुम्हारी मनोकामना पूर्ण नहीं करूंगी।

    बोलो, तुम कब मरोगे?"

    भवाo-"आगामी युद्धमें।"

    कल्याणी-“बस तो अब यहांसे चले जाओ। बोलो, मेरी कन्या भेज दोगे या नहीं?"

    भवानन्दने आंखोंमें आंसू भरकर कहा,-"ला दूंगा। क्या मेरे मर जानेपर मुझ स्मरण रखोगी?"

    कल्याणीने कहा रखूंगी, तुम्हें व्रतच्युत, अधर्मी समझाकर याद किया करूंगी।"

    भवानन्द चले गये। कल्याणी पुस्तक पढ़ने लगी।

    पांचवां परिच्छेद

    भवानंद सोचते विचारते मठकी ओर चले। जाते ही जाते रात हो गयी। वे अकेले थे। अकेले ही जङ्गलमें घुसे। वनमें घुसनेपर उन्होंने देखा कि कोई उनके आगे आगे चला जा रहा है। भवानंदने पूछा,–"कौन जा रहा है?"

    आगे जानेवालेने कहा–"अगर तुम्हें पूछना आता, तो ठीकसे जवाब भी देता। यही समझ लो, कि मैं पथिक हूं भवा०–"बन्दे।"

    आगे जानेवाला बोला-"मातरम्।”

    भवा०-“मैं हूं, भवानंद गोस्वामी।"

    आगे जानेवाला-"मैं भी धीरानन्द है।"

    भवा-“कहां गये थे, धीरानन्द?”

    धीरा-आपहीकी खोज में।"

    भवा०-"क्यों? किसलिये?"

    धीरा-“एक बात कहनी थी।"

    भवा-"कौनसी बात?"

    धीरा-“एकांतमें कहनेकी बात है।"

    भवा०-"यहीं कहो न, यहां तो और कोई नहीं है।"

    धीरा०-"आप नगरमें गये थे?"

    भवा०-"हां"

    धीरा-“गौरी देवीके घरपर?"

    भवा०—“तुम भी गये थे क्या?"

    धीराo-"वहां एक बड़ी ही सुन्दरी युवती रहती है।"

    भवानन्द कुछ आश्चर्य में पड़ गये, साथ ही कुछ डर भी गये बोले,-"यह कैसी बातें कर रहे हो?"

    धीरा०-"आपने उससे मुलाकात की थी न?”

    भवा-"फिर क्या हुआ?"

    धीरा°—"आप उसपर अतिशय अनुरक्त हो रहे हैं।"

    भवा°—(कुछ सोचकर) "धीरानन्द! तुमने इतनी खोज ढूंढ किसलिये की? देखो, धीरानन्द! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सच है। पर यह तो कहो, यह बात तुम्हारे सिवा और भी किसीको मालूम है?"

    धीरा°—"और कोई नहीं जानता।"

    भवा°—"तब यदि मैं तुम्हारी जान ले लूं, तो बदनामीले बच जा सकता हूं।"

    धीरा°—"हां"

    भवा°—"तब आओ, इसी निर्जनमें हम दोनों करें या तो मैं तुम्हें मारकर निष्कण्टक हो जाऊंगा या तुम मुझे मारकर प्रेरी सारी जलन मिटा दोगे। हथियार पास है?"

    धीरा°—"है-खाली हाथ भला कौन तुम्हारे साथ ऐसी बढ़ बढ़कर बातें करता? यदि तुम युद्ध ही करना चाहते हो, तो आओ, मैं अवश्य ही युद्ध करूंगा। एक सन्तानका दूसरे संतानसे विरोध करना अनुचित है, किन्तु आत्मरक्षाके लिये किसीसे विरोध करना बुरा नहीं है। पर मैं जो सब बाते कहनेके लिये तुम्हें ढूंढ रहा था, उन्हें सुनकर लड़ते; तो ठीक था।"

    भवा°—"हर्ज ही क्या है? कह डालो।"

    भवानन्दने तलवार निकालकर धीरानन्दके कन्धेपर रखी। धीरानन्द टससे मस न हुए।

    धीरा°—"मैं यही कह रहा था कि तुम कल्याणीसे विवाह कर लो।"

    भवा—"वह कल्याणी ही है, यह भी जानते हो?"

    धीरा°—"हां, तो तुम विवाह क्यों नहीं कर लेते?"

    भवा—"उसका स्वामी मौजूद है।"

    धीरा°—"वैष्णवों में इस तरहका विवाह होता है।"

    भवा°—"ऐसा मुंड़े हुए सन्यासियों में होता है, सन्तानों में नहीं। सन्तानोंको तो विवाह करना ही नहीं चाहिये।"

    धीरा°—"क्या सनातनधर्म छोड़ नहीं सकते? तुम्हारे तो प्राण निकले जा रहे हैं। छिः! छिः! यह क्या कर डाला? मेरा कन्धा कट गया!"

    सचमुच धीरानन्दके कन्धेसे खून जारी हो रहा था।

    भवा°—"तुम किस मतलबसे मुझे धर्मके विरुद्ध सलाह देने आये हो? इसमें अवश्य ही तुम्हारा कोई स्वार्थ है।"

    धीरा°—"वह भी कहता हूं; पर जरा तलवार हटा लो, सब कुछ कह दूंगा। इस सन्तानधर्मके मारे मैं तो हैरान हो गया। मैं तो अब इसे छोड़कर स्त्री-पुत्रके साथ दिन वितानेके लिये अधीर हो रहा हूं। मैं अब इसे छोड़गा। परन्तु मेरा घर जाकर रहना भी मुश्किल है। सभी मुझे विद्रोही जानते हैं जहां घर जाकर रहने लगा कि झट राजपुरुषगण आकर मेरा सिर उतार ले जायंगे। नहीं तो सन्तानगण ही मुझे विश्वास- घातक समझकर मार डालेंगे। इसलिये मैं चाहता हूं कि तुम्हें भी अपने ही रास्तेपर ले चलूं।"

    भवा°—"क्यों? मुझे ही क्यों?"

    धीरा°—"यही तो असल मतलबकी बात है। सभी सन्तानगण तुम्हारी आज्ञा मानते हैं। इन दिनों सत्यानन्द यहां हैं ही नहीं, तुम्हीं सबके सिरधरू हो। तुम इस सेनाको लेकर युद्ध करोगे, तो तुम्हारी जीत अवश्य होगी। युद्ध जय होनेपर तुम अपने ही नामसे राज्यस्थापन कर लेना। सेना तुम्हारे क्श है हो। तुम राजा बनो, कल्याणी तुम्हारी पटरानी बने, मैं तुम्हारा अनुवर बनकर स्त्री पुत्रका मुंह देखते हुए दिन बिताऊं और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूं, यही मेरी इच्छा है। चाहे सन्तानधर्म अगाध जलमें डूब जाय, इसकी मुझे परवाह नहीं।"

    यह सुन, भवानन्दने धीरानन्दके कन्धेपरसे तलवार हटा ली और बोले,—"धीरानन्द! तुम युद्ध करो। मैं तुम्हें मार डालूंगा। मैं इन्द्रियोंका दास होकर भले ही रहूं; पर विश्वासघातक होकर नहीं रह सकता। तुम मुझे विश्वासघातक बनने की सलाह दे रहे हो और आप भी विश्वासघातक हो रहे हो, इसलिये तुम्हें मार डालनेसे मुझे ब्रह्महत्याका पाप नहीं लगेगा। मैं तुम्हें जरूर मार डालूंगा।"

    बात पूरी होते न होते धीरानन्द बेतहाशा भाग चला। भवानन्दने उसका पीछा नहीं किया। वे कुछ देरतक अनमनेसे रहे, पोछे उसे बहुत ढूँढ़ा; पर कहीं पता न लगा

    छठा परिच्छेद

    मठमें न जाकर भवानन्द घने जङ्गलमें चले गये। उस जंगल में एक पुरानी इमारत भग्नावशेष अवस्थामें पड़ी थी। टूटी फूटी ईटोंके ढेरपर जङ्गली लताएं और पौधे बहुतायतसे उग गये थे। वहां असंख्य सर्प रहते थे। उस खंडहरके अन्दर कुछ साफ सुथरी और साबित एक कोठरी थी। भवानन्द वहीं जाकर बैठ गये और सोचने लगे।

    घोर अंधेरी रात है। उसपर लम्बाचौड़ा और घना जङ्गल, जिसमें आदमीका पूत भी नहीं और वह वृक्ष-लताओंके मारे ऐसा बीहड़ हो रहा है, कि बेचारे जङ्गली पशु भी उसके अन्दर जानेका रास्ता नहीं पाते। वह वन अतिविशाल जनशून्य, अन्धकार, दुर्भेद्य और नीरव है। रह रहकर केवल बाघका गरजना अथवा जंगली पशुओंका भूख या डरसे तड़पना और चीत्कार सुनायी पड़ जाता है। कभी कभी किसी बड़े पक्षोके पंख फड़फड़ानेका शब्द सुनाई देता है और कभी कभी आपसमें

    एक दूसरेको मारनेवाले या खा जानेवाले जानवरोंकी दौड़-धूप-का शब्द सुनाई देता है। उस निर्जन, अन्धकारपूर्ण खंडहरमें अकेले भवानन्द बैठे हैं। उनके लिये पृथ्वी मानों रही नहीं गयी। अथवा केवल उपादानमयी हो रही है। उस निविड़ अन्धकारमें भवानन्द हथेलोपर सिर रखे सोच रहे हैं—वे ऐसी प्रगाढ़ चिंतामें निमग्न हो रहे हैं, कि न तो उनकी देह हिलती है, न जोर जोरसे सांस चलती है, न किसी बातका भय मालूम होता है। वे मन-ही-मन कह रहे हैं,—"जो होनेवाला है, वह तो होकर ही मैं भागीरथीकी जलतरंगके पास आकर भी छोटेसे हाथीके बच्चे की तरह इन्द्रियस्रोतमें डूब मरा, इसी का बड़ा भारी दुःख रहा। एक क्षणमें यह देह मिट्टीमें मिल जा सकती है। देहका ध्वंस होते ही इन्द्रियोंका ध्वंस हो जायेगा। फिर मैं इन्द्रियोंके वशमें क्यों गया? मेरा मरना ही ठीक है। धर्म-त्यागी कहलाकर जीना! राम राम! मैं तो अब मरूंगीही।"

    इसी समय ऊपरसे उल्लू बोल उठा। भवानन्द और जोरसे कह उठे—"ओह! यह कैसा शब्द है! कानोंको ऐसा लगा, मानों यम मुझे पुकार रहा है। मैं नहीं जानता, किसने यह शब्द किया, किसने मुझे पुकारा, किसने मुझे यह उपदेश दिया, किसने मुझे मरनेको कहा। पुण्यमयी अनन्ते! तुम शब्दमयी हो; पर तुम्हारे शब्दका मर्म तो मैं समझ नहीं सकता। मुझे धर्ममें मति दो, पापसे दूर करो। हे गुरुदेव! ऐसा आशीर्वाद करो, जिसमें धर्म में मेरी मति सर्वदा बनी रहे।"

    इसी समय उस भीषण वनमें अत्यन्त मधुर, गम्भीर और मर्मभेदी मनुष्य कण्ठ सुनाई पड़ा। मानों किसीने कहा,—"मैं आशीर्वाद करता हूं, कि तुम्हारी मति धर्म में अविचल भावसे बनी रहे।

    भवानन्दके शरीरके रोंगटे खड़े हो गये। यह क्या? यह तो गुरुदेवका ही कण्ठ-स्वर है! बोले,—"महाराज! हैं? आइये, आकर इस दासको दर्शन दीजिये।"

    पर न तो किसीने दर्शन दिये, न उत्तर दिया। भवानन्दने बार बार पुकारा; पर कोई न बोला। उन्होंने इधर उधर बहुत ढूंढा; पर कहीं किसीको न पाया।

    रात बीती, प्रभात हुआ और प्रातःकालके सूर्य उदित होकर जंगली पेड़-पौधोंकी हरी-हरी पत्तियोंपर अपनी किरणें फैलाने लगे, तब भवानन्द वहांसे चलकर मठमें पहुंचे। उस समय उनके कानोंमें “हरे मुरारे! हरे मुरारे!" की ध्वनि सुनाई पड़ी। सुनते ही वे पहचान गये कि यह सत्यानन्दका कण्ठस्वर है। वे समझ गये, कि प्रभु लौट आये हैं।

    सातवां परिच्छेद

    जीवानन्दके कुटीसे बाहर चले जानेपर शांति फिर सारंगी की सुरीली ध्वनिके साथ अपना मीठा गला मिलाकर गाने लगी—

    "प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं

    विहितवहिवचरित्रमखेदम्।

    केशव धृत मीन शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    गोस्वामी जयदेव विरचित राग, ताल, लययुक्त स्तोत्र; शान्तिदेवीके कण्ठसे निकलकर उस अनन्त काननकी अनन्त नीरवतांको भेदकर वर्षाकालकी उमड़ी हुई नदीकी मलयानिलसे चञ्चल की हुई तरङ्गोंके समान मधुर मालूम होने लगा, तब उसने फिर गाया—

    "निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्,

    सदय हृद्य दर्शित पशुधातम्,

    केशव धृत बुद्ध-शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    उसी समय बाहरसे न जाने किसने मेध-गर्जन की तरह बड़े ही गम्भीर स्वरसे गाया—

    "ग्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम्।

    धूमकेतुमिव किमपि करालम्॥

    केशव धृत कल्कि शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    शान्तिने भक्तिभावसे सिर झुकाकर सत्यानन्दके पैरोंकी धूलि सिर चढ़ायी; बोली—"प्रभो! मेरे बड़े भाग्य जो आज आपके चरणकमल यहांतक आये। आज्ञा कीजिये मुझे क्या करना होगा।"

    यह कह, फिर सारङ्गीका सुर मिलाकर उसने गाया,—"तव चरणप्रणाता वयमिति भावय, कुरु कुशलं प्रणतेषु।"

    सत्यानन्दने कहा,—"देवि! तुम्हारी कुशल ही होगी?"

    शान्ति°-"सो कसे महाराज? आपकी आज्ञा तो मेरे वैधव्यके हेतु है।"

    सत्या°—"पहले मैं तुम्हें पहचानता नहीं था। बेटी! मैं रस्सीका ज़ाेर आजमाये विना ही उसे खींच रहा था। तुम्हारा ज्ञान मुझसे कहीं बढ़ा हुआ है। अब तुम जो उपाय अच्छा समझो, करो। जीवानन्दसे यह मत कहना कि मैं सब कुछ जान गया हूं। तुम्हारे लिये वे अपनी जान बचानेकी चेष्टा कारेगें। अबतक बचाते भी रहे हैं। बस, इसीसे मेरा काम हो जायगा।"

    यह सुनते ही उन नील उत्फुल्ल लोचनोंमें आषाढ़ मासमें चमकनेवाली बिजलीकी तरह क्रोधाग्नि पैदा हो आयो। शान्ति- ने कहा—"यह क्या महाराज! आप यह क्या कह रहे हैं ? मैं

    और मेरे स्वामी एकप्राण दो-शरीर हैं। अभी आपसे मेरी जो जो बातें हुई हैं, वह सब मैं उनसे कह दूंगी। उन्हें मरना होगा तो वे मरेंगे ही, इसमें हर्ज ही कौन-सा है? मैं भी तो उनके साथ-ही-साथ मरूंगी। उनके लिये स्वर्गका द्वार खुला है, तो क्या मेरे लिये बन्द है?"

    ब्रह्मचारीने कहा-“मैं आजतक किसीसे हारा नहीं था। आज पहले पहल तुमसे हारा। मां! मैं तुम्हारा पुत्र हूं। सन्तान-पर दया करो, जीवानन्दको बचाओ, अपनी प्राणरक्षा करो, इसीसे मेरा कार्योद्धार हो जायगा।"

    फिर बिजली चमक उठी। शान्तिने कहा-“मेरे स्वामीका धर्म मेरे हाथमें है। उन्हें दूसरा कौन धर्मसे हटा सकता है? इस लोकमें स्त्रीके लिये पति देवता है; परन्तु परलोकमें धर्म ही सबका देवता है। मेरे लिये मेरे पति बड़े हैं, उनकी अपेक्षा मेरा धर्म बड़ा है, और उससे भी मेरे स्वामीका धर्म बड़ा है। अपना धर्म मैं जिस दिन चाहूं छोड़ सकती हूं, पर अपने स्वामी का धर्म मैं कैसे छोड़ा दूंगी? महाराज! आपकी बात मानकर यदि मेरे स्वामी प्राण देनेको तैयार हों, तो मैं उन्हें नहीं रोकूंगी।"

    यह सुन ब्रह्मचारीने लम्बी सांस लेकर कहा-"मां! इस कठोर व्रतमें बलिदान करना पड़ता है। हम सबको इसपर बलि हो जाना पड़ेगा मैं मरूंगा, जीवानन्द मरेंगे, भवानन्द मरेंगे, सभी मरेंगे। मां! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि तुम भी मरोगी। किन्तु देखो, काम करके मरना अच्छा होता है। विना काम किये मरना क्या अच्छा होगा? मैं तो केवल जन्मभूमिको ही मां समझता हूं, और किसीको मैं मां नहीं कहता। क्योंकि इस सजल-सफल धरणीके सिवा हमारी और कोई माता हो हो नहीं सकती। उसके सिवा मैंने आज केवल तुम्हींको मां कहकर पुकारा है। मां हो तो सन्तानकी भलाई करो। ऐसा काम

    करो जिससे कार्योद्धार हो। जीवानन्दके प्राण बचाओ। अपनी भी प्राणरक्षा करो।"

    यह कह सत्यागन्द "हरे मुरारे मधुकैटभारे” गाते हुए चले गये।

    आठवां परिच्छेद

    धीरे धीरे सन्तान-सम्प्रदायवालोंमें यह संवाद फैल गया, कि सत्यानन्द लौट आये हैं और उन्होंने सन्तानोंको कुछ आदेश देनेके लिये बुलाया है। बस, सन्तानोंके दल-के-दल आकर इकट्ठ होने लगे। चांदनी रातमें, नदीकी रेतीली भूमिके पास घने जंगलमें, जहां आम, कटहल, ताड़, इमली, पीपल, बेल, बड़ और सेमल आदि के हजारों वृक्ष लगे हुए थे, वहीं दस हजार सन्तान आकर जमा हुए। एक दूसरेके मुंहसे सत्यानन्दके आनेकी बात सुनकर ये लोग महा कोलाहल करने लगे। सत्यानन्द किस लिये और कहां गये हुए थे, यह सबको नहीं मालूम था। अफवाह थी कि वे सन्तानोंके मंगलकी कामनासे हिमालयपर तपस्या करने गये हुए हैं। आज सभी आपस में इसको चर्चा कर रहे हैं कि-"मालूम होता है, महाराजकी तपस्या सिद्ध हो गयी। अब राज्य हमारा हो जायगा।"

    उस समय बड़ा शोरगुल मचा। कोई चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा–"मारो, मारो इन मुसलमानोंको।” कोई कहने लगा-“जय, महाराजकी जय!” कोई “वन्देमातरम्" गीत गाने लगा। कोई कहता-“भाई! क्या कोई ऐसा भी दिन आयेगा, जब हम तुच्छ बङ्गाली भी रणक्षेत्रमें प्राणत्याग करेंगे,"

    कोई कहता-"क्या वह दिन देखना भी नसीब होगा, कि हम मसजिदें गिराकर उनपर राधामाधवके मन्दिर उठायेंगे?" कोई कहता-"भाई! कब वह दिन आयेगा, जब हम अपना धन आप ही भोगेंगे?"

    दस हजार मनुष्यों के कण्ठ से निकला हुआ कलरव, मन्दमन्द हवाके वेगसे चलायमान वृक्षके पत्तोंके मरमर शब्द, बालुकामयी तरंगिणीका मृदु कल-कल शब्द, नीले आसमानके चन्द्र-तारे, स्वच्छ मेघोंके समूह, हरी-भरी भूमिपर हरा-भरा कानन, नदीका स्वच्छ जल, उजले रंगकी रेत, विकसित कुसुम-राशि और सबके वित्तको प्रसन्न करनेवाला बीच-बीचमें होनेवाला "वन्देमातरम्' गान क्या ही मनोहर दृश्य था! ऐसे ही समय सत्यानन्द उल सन्तान-मण्डलीके बीच में आ खड़े हुए।

    उस समय उन दस हजार सन्तानों के मस्तक वृक्षोंके बीचसे छन-छनकर आनेवाली चन्द्र-किरणोंके पड़नेसे हरी-हरी घासोंवाली जमीन की तरह मालूम पड़ने लगे। आंखों-में आंसूभरे, दोनों हाथ ऊपर उठाये सत्यानन्दने बड़े ऊचे स्वर-से कहा-"शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी, वनमाली, वैकुण्ठनाथ, केशीसहारक, मधुमुरनरकमदेन, लोकपालक तुम्हारा मंगल करें। वे ही तुम्हारी भुजाओं में बल दें, मनमें भक्ति, धर्ममें मति दें। एक बार सब लोग प्रेमसे उनकी महिमाका गीत गाओ। यह सुनते ही हजारों कण्ठोंसे उच्चस्वरमें यह संगीत निकल पड़ा।

    “जय जगदीश हरे!

    प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदं,

    विहितवहिनचरित्रमखेदम्,

    केशव धृत मीन शरीर,

    जय जगदीश हरे!"

    फिर सबको आशीर्वाद देते हुए सत्यानन्दने कहा-"सन्तान गण! आज मैं तुम लोगोंसे एक जरूरी बात कहना चाहता हूं।

    टामस नामक एक विधर्मी दुष्टने बहुतसे सन्तानोंको मार डाला आज रातको तुम सब उसे सैन्य-समेत मारकर ढेर कर दो। जगदीश्वरकी यही आशा है; बोलो, तुम लोग क्या कहते हो?"

    भीषण हरि-ध्वनिसे सारा जङ्गल गूंज उठा-"अभी मार कर ढेर कर देंगे। चलिये, बतलाइये, वे सब कहां हैं!” "मारो, मारो! अभी दुश्मनोंको मार गिराओ” इत्यादि शब्द दूरके पर्वतोंमें प्रतिध्वनित होने लगे।

    तब सत्यानन्दने कहा- "इसके लिये हमलोगोंको थोड़ा धैर्य रखना होगा। शत्रुओं के पास तोपें हैं। जबतक अपने पास भी तोपें न हों, तबतक उनसे युद्ध नहीं किया जा सकता। विशेषतया वे सब वीर-जातिके हैं। पद चिह्नसे १७ तोपें आ रही हैं। उनके आ जानेपर हमलोग युद्ध-यात्रा करेंगे। यह देखो सवेरा हो रहा है। चार घड़ी दिन चढ़ते-चढ़ते-अरे, यह क्या?-धायं धाय धायं।"

    अकस्मात् उस जंगलमें चारों ओरसे तोप छूटनेकी आवाज़ आने लगीं। तोपें अंगरेजोंकी थीं। जालमें फैली हुई मछलियोंकी तरह कप्तान टामसने सन्तान सम्प्रदायको उस जङ्गलमें घेरकर मार डालनेका विचार किया था।

    नवां परिच्छेद

    अँगरेजोंकी तोपें "धायं धायं” करके गरज उठीं। वह शब्द उस विशाल काननको कंपाता हुआ गूंज उठा, नदीके किनारे-किनारे चलकर वह धायं-धायं शब्द दूरस्थ आकाश-प्रान्तसे टकरा उठा। नदीके उस पार दूरस्थ काननमें प्रवेशकर वही ध्वनि फिर 'धायं धायं' कर उठी

    सत्यानन्दने कहा-"तुम लोग जाकर देखो, कि ये किसकी तोपें छूट रही हैं।" यह सुन; कई व्यक्ति घोड़ेपर सवार हो, अनुसन्धान करने चले; पर वे जंगलसे बाहर निकल कुछ ही दूर गये होंगे, कि उनपर सावनको धाराकी तरह गोले बरसने लगे। बस, सबके सब घोड़े समेत वहीं ढेर हो गये।

    सत्यानन्दने दूर-ही-से यह दृश्य देखा। उन्होंने कहा-“वृक्षकी ऊँची डालपर चढ़ कर देखना चाहिये, कि क्या बात है।"

    उनके कहनेके पहलेसे ही जीवानन्द वृक्षपर चढ़कर सवेरेकी सूर्यकिरणोंका आनन्द ले रहे थे। वे ऊपर-ही-से चिल्लाकर बोले-"तो अगरेजोंकी है।"

    सत्यानन्दने पूछा-"सब पैदल हैं या घुड़सवार?"

    जीवानन्द-"दोनों ही।"

    सत्या० -"कितने हैं?"

    जीवा०-"मैं कुछ अनुमान नहीं कर सकता। अभीतक वे लोग धीरे-धीरे जंगलकी आड़से बाहर निकलते ही जाते हैं।"

    सत्या०-“गोरे भी हैं या सब देशी ही सिपाही हैं?"

    जीवा-"गोरे भी हैं।"

    तब सत्यानन्दने जीवानन्दसे कहा-“अच्छा, तुम नीचे उतरो।” जीवानन्द पेड़से नीचे उतर पड़े। सत्यानन्दने कहा-"इस समय दस हजार सन्तान यहां उपस्थित हैं। अब इनकी सहायतासे तुम जो कुछ कर सको, कर दिखाओ। आजके लिये मैंने तुम्हें ही सेनापति बनाया।"

    जीवानन्द हथियार बाँधे लपककर एक घोड़ेपर सवार हो गये। उन्होंने एक बार आंखोंके इशारेसे नवीनानन्द गोस्वामीसे न जाने कौन-सी बात कही, कोई इस इशारेको न समझ सका। नवीनानन्दने भी इशारेसे ही उसका जवाब दिया, पर इस इशारे को भी कोई न समझ सका। केवल उन्हीं दोनों आदमियोंने

    अपने मन-ही-मन समझ लिया, कि यही देखादेखी शायद अन्तिम है, अब फिर इस जीवनमें देखादेखी न होगी। नवीनानन्दने अपनी दाहिनी भुजा ऊपर उठाये हुए सबसे कहा-भाइयो! बस, अब इस समय केवल 'जय जगदीश हरे' गाओ।" फिर क्या था? एक साथ ही दस हजार सन्तान सुरमें सुर मिलाये, नदी, कानन और आकाशको प्रतिध्वनित करते, तोपोंकी आवाजको डुबाते हुए, हजारों भुजायें ऊपर उठाये गाने लगे:-

    "जय जगदीश हरे!

    म्लेच्छनिबहनिधने कलयसि करवालम्।”

    इसी समय अँगरेजोंकी तोपोंसे छूट-छूटकर गोले उस जंगलमें जमा हुए सन्तानोंपर पड़ने लगे। किसोका सिर उड़ गया, किसीकी बाँह कट गयी, किसीका कलेजा छिद गया लोग धरती चूमने लगे, पर तोभी किसीने गाना बन्द नहीं किया। सभी 'जय जगदीश हरे!' गाते रहे। गीत समाप्त होनेपर सबके सब एक साथ ही चुप हो गये। वह घनघोर जङ्गल, वह नदीकी रेत, वह अनन्त निर्जन स्थान एकबारगी निस्तब्ध हो गया, केवल वही तोपोंकी अत्यन्त भयानक गर्जन और दूरसे सुनायी पड़नेवाली गोरोंके हथियारोंकी झनझनाहट और पैरोंकी आहट सुनायी देती थी।

    तब सत्यानन्दने उस गहरे सन्नाटेको तोड़ते हुए ऊँचे स्वरमें कहा–"जगत के स्वामी हरिने तुम लोगोंपर कृपा की। बोलो, तो कितनी दूरपर हैं?"

    ऊपरसे किसीने कहा-"इस जगलके बहुत ही पास। एक छोटेसे मैदानके उस पार।"

    सत्यानन्दने पूछा,-"तुम कौन हो?"

    उपरसे जवाब मिला-"मैं हूं नवीनानन्दा” तब सत्यानन्दने कहा" तुम लोग दस हजार सन्तान हो। तुम्हारी जय आज अवश्य होगी। बस जाओ, जाकर उनकी तोपें छीन लो।",

    यह सुन, सबसे आगे घोड़ेपर सवार जीवानन्दने कहा "चलो, आओ।"

    बस, वे दसों हजार सन्तान, कोई पैदल और कोई घोड़े पर सवार हो, जीवानन्दके पीछे-पीछे चले। पैदल चलनेवालोंके कन्धे पर बन्दूक, कमरमें तलवार और हाथमें भाला था। जंगलसे बाहर निकलते ही लगातार उनपर गोले बरसने लगे, जिससे वे छिन्न-भिन्न होने लगे। अनेक सन्तान तो बिना लड़े-भिड़े ही मारे गये। एकने जीवानन्दसे कहा-“जीवानन्द! व्यर्थ इतने आदमियोंकी जाने लेनेसे क्या लाभ है?"

    जीवानन्दने धूमकर देखा कि भवानन्द हैं। जीवानन्दने कहा-"तुम्हीं कहो, क्या करूँ?

    भवा०-"जंगलके भीतर, पेड़ोंके झुरमुटमें छिपकर, हम अपनी जान भी बचा सकते हैं और बहुत देरतक युद्ध भी कर सकते हैं। नहीं तो सरपट मैदानमें बिना तोपके ये सन्तान तोपोंके सामने घड़ीभर भी न ठहर सकेंगे।"

    जीवा०-"तुम्हारा कहना बहुत ठीक है, पर प्रभुकी आज्ञा है कि तोपें छीन लो। इसलिये हमलोग तो छीननेके लिये अवश्य ही आगे बढ़ेंगे।"

    भवा०-"भला किसका सामर्थ्य है, जो उनसे तो छीन लेगा? खैर, यदि जाना ही है तो तुम चुपचाप बैठो। मैं ही जाता हूं।"

    जीवा०-"नहीं भवानन्द! यह नहीं होनेका। आज मेरे मरनेका दिन है।"

    भवाo–"नहीं, आज मेरे मरनेका दिन है।"

    जीवा–"मुझे तो प्रायश्चित्त करना है।"

    भवा०-"नहीं, नहीं, तुम्हें तो पाप छू भी नहीं गया, तुम्हारा प्रायश्चित्त कैसा? मेरा चित्त कलुषित है। मुझे ही मरने दो। तुम रहो, मैं जाता हूं।"

    जीवा -"भवानन्द! तुमने क्या पाप किया है, यह तो मैं नहीं जानता; पर हाँ, इतना जानता हूं कि तुम्हारे जीते रहनेसे सन्तानोंका कार्य सिद्ध हो जायगा। मैं चलता हूं।

    भवानन्द कुछ देर चुप रहे। अन्तमें बोले। “यदि मरनेका प्रयोजन होगा तो आज मैं ही मरूंगा, नहीं तो जिस दिन प्रयोजन होगा उसी दिन मरूंगा। मृत्युके लिये समय कुलमयका विचार कैसा?”

    जीवा०-"तब आओ, चले आओ।"

    इसके बाद भवानन्द उसके आगे चले आये। उस समय ढेर-के-ढरे गोले पड़कर सन्तानोंके सैन्यका संहार कर रहे थे। इससे लोग भागने लगे, कहीं औंधे सीधे गिरने लगे, कहीं शत्रुओं के बन्दूकधारी सिपाहियोंने अपने अचूक निशानेसे ढेर-के-ढेर सन्तानोंको मारकर जमीनमें गिरा दिया। इसी समय भवानन्दने कहा–"अब तो सन्तानोंको इस तरङ्गमें कूदना ही पड़ेगा। बोलो, भाइयो! कौन-कौन कूदनेको तैयार हैं? गाओ, वन्देमातरम्।” उस समय ऊचे कण्ठसे मेघमल्लार रागमें सारे सन्तान तोपोंकी आवाजके तालपर "वन्देमातरम्” गान गाने लगे।

    दसवां परिच्छेद

    वे दसों हजार सन्तान वन्देमातरम् गान गाते, भाले ऊपर उठाये हुए बड़ी तेजीके साथ तोपोंके मोहड़ेकी ओर चल पड़े। लगातार गोले बरसनेसे सन्तान-सेना खंडखंड, विदीर्ण, और अत्यन्त विशृङ्खल हो गयी, तोभी लौटी नहीं। उसी समय कप्तान टामसकी आज्ञाके अनुसार सिपाहियोंका एक दल बन्दूकोंपर सङ्गीनें चढ़ाये सन्तानों के दाहिनी ओरसे आकर उनपर टूट पड़ा। दोनों तरफसे हमला हो जानेके कारण सन्तानगण एक

    बारगी निराश हो गये। क्षण क्षणमें सैकड़ों सन्तान नष्ट होने लगे। तब जीवानन्दने कहा-"भवानन्द! तुम्हारी ही बात ठीक थी। अब बेचारे वैष्णवोंका हार करवाना व्यर्थ है। चलो, हम लोग धीरे-धीरे लौट चलें।"

    भवा–"अब कैसे लौट चलोगे? इस समय तो जो पीछे फिरेगा वही जान गवायेगा।"

    जीवा०-"सामने और दाहिनी तरफसे हमला हो रहा है। बायीं तरफ कोई नहीं है। चलो, धोरे-धीरे घूमकर बायीं तरफ हो जायँ और उधर-ही-से निकल भागे।"

    भवा०-"भागकर कहां जाओगे? उधर नदी है। वर्षाके कारण बहुत उमड़ी हुई है। अगरेजोंके गोलेके डरसे भागकर तो सन्तान-लेना नदी में डूब जायगी।"

    जीवा०–"मुझे याद आता है कि उस नदीपर पुल बंधा है।"

    भवा०-“यदि उस पुल-परसे यह दस हजार सन्तान-सेना नदी पार करने लगी, तो बड़ी भीड़ हो जायगी। शायद एकही तोपमें सारी सेना सहजमें ही विध्वंस कर दी जायगी।”

    जीवा०-"एक काम करो। थोड़ीसी सेना तुम अपने साथ रख लो। इस युद्धमें तुमने जैसी हिम्मत और चतुराई दिखलाई है उससे मुझे मालूम हो गया, कि ऐसा कोई काम नहीं, जो तुम न कर सको। तुम उन्हीं थोड़ेसे सन्तानों के साथ सामनेसे हमला रोको। मैं तुम्हारी सेनाकी आड़में बाकी सन्तानोंको पुल पार करा ले आऊंगा। तुम्हारे साथके सैनिक तो जरूर ही मरेंगे पर मेरे साथवाले अगर बच जायं, तो कोई ताजुब नहीं।"

    भवा०-“अच्छा, मैं ऐसा ही करता हूं।"

    बस भवानन्दने दो हजार सन्तानोंके साथ एक बार फिर 'वन्देमातरम्' की गगनभेदी ध्वनि करते हुए बड़े उत्साहके साथ अङ्गरेजोंके तोपखानेपर हमला किया। घोर युद्ध छिड़ गया;

    पर तोपोंके सामने वह छोटीसी सन्तान-सेना कबतक ठहरती? जैसे किसान पके हुए धानके पौधोंको काट-काटकर बिछाता चला जाता है वैसे ही अंग्रेजों की गोलन्दाज सेना उन्हें मारमारकर गिराती चली गयी।

    इसी बीच जीवानन्द बाकी सन्तान सैन्यका मुंह थोड़ा फेरकर बायीं ओरके जंगलकी ओर धीरे-धीरे चले। कप्तान टामसके एक सहकारी लेफ्ट एट वाटसनने दूरसे ही देखा, कि सन्तानोंका एक दल धीरे-धीरे भागा जा रहा है। यह देख, वे कुछ फौजी और कुछमामूली सिपाहियों के साथ जीवानन्दके पीछे दौड़े।

    कप्तान टामसने भी यह देख लिया। यह देखकर कि सन्तानोंका प्रधान भाग भागा जा रहा है, उन्होंने कप्तान 'हे' नामक अपने एक सहकारीसे कहा मैं जबतक दो-चार सौ सिपाहियोंको लेकर इन सामनेके छिन्नभिन्न विद्रोहियोंको नष्ट करने में लगा हूं तबतक तुम तोपों और बाकी सिपाहियोंको साथ लेकर उन भागनेवालोंका पीछा करो। बायीं ओरसे लेफ्टएट वाटसन जाही रहा है, दाहिनी ओरसे तुम भी जा पहुंचो। देखो, आगे बढ़कर तुम्हें पुलका मुँह बन्द कर देना होगा जिससे वे लोग तीन ओरसे घिर जायें और जालमें फंसी हुई चिड़ियोंकी तरह मारे जा सकें। वे सब बड़े तेज चलनेवाले देशी सिपाही हैं, भागने में बड़े होशियार होते हैं, इसलिये तुम उन्हें सहज ही न पकड़ सकोगे। घूमघुमाव रास्तेसे घुड़सवारोंको पुलके मुहानेपर ले जाकर खड़ा कर दो, बस, फ़तह हो जायगो।" कप्तान 'हे' ने ऐसा ही किया।

    “अति दर्पे हता लङ्का।" कप्तान टामसने सन्तानोंको अत्यन्त तुच्छ समझ कर केवल दो सौ पैदल सिपाही भवानन्दसे लड़नेके लिये रखे और बाकी सबको 'हे' के साथ रवाना कर दिया। चतुर भवानन्दने देखा कि अंग्रेजोंकी तोपें हट गयीं और प्रायः सब सैनिक भी चले गये, अब जो थोड़े-बहुत रह गये हैं उन्हें हम

    सहज ही मार डालेंगे। बस, उन्होंने अपने बचे-खुचे सिपाहियोंको पुकारकर कहा, “देखो ये जो थोड़ेसे दुश्मनके सिपाही बचे हैं, उन्हें मारकर ढेर कर दो, तो मैं जीवानन्दकी सहायताको चल पड़। बोलो, एक बार प्रेमसे बोलो-"जय जगदीश, हरे!” यह सुनते ही वह थोड़ीती सन्तान-सेना, 'जय जगदीश' का शोर मचाती दुई कप्तान टामसके ऊपर भूखे बाघकी तरह टूट पड़ी; उस आक्रमणकी उग्रता वे थोड़ेसे सिपाही और तिलङ्गे न सह सके, सबके सब नष्ट हो गये। भवानन्दने स्वयं आगे बढ़कर कप्तान टामस के सिरके बाल पकड़ लिये। कप्तान अन्ततक प्राणपणले लड़ता रहा। भवानन्दने कहा-“कप्तान साहब! मैं तुम्हें नहीं मारूंगा, क्योंकि अंगरेजोंसे हमारी कोई शत्रुता नहीं है। तुम भला इन मुसलमानों की सहायता करनेके लिये क्यों आये हो? जाओ, मैं तुम्हें प्राणदान देता हूं, पर इस समय तो तुम हमारे बन्दी होकर रहोगे। भगवान् अङ्गरेजोंका भला करें, हमलोग तुम्हारे दोस्त ही हैं, दुश्मन नहीं।"

    यह सुन कप्तान टामसने भवानन्दको मारनेके लिये अपनी खुली साङ्गीन उठानी चाही, पर भवानन्दने उसे ऐसा शेरकी तरह अपने पंजे में पकड़ रखा था कि वह सिर भी न हिला सका। भवानन्दने अपने साथियोंसे कहा- इसे बाँध लो।" बस, दो-तीन सन्तानोंने आगे बढ़कर कप्तान टामसको बाँध डाला। भवानन्दने कहा-“इसे एक घोड़ेपर लाद लो और इसको साथ लिये हुए जीवानन्दकी सहायताके लिये चलो।"

    तब उन अल्पसंख्यक सन्तानोंने कप्तान टामसको एक घोड़ेकी पीठपर लाद लिया और “वन्देमातरम्' गीत गाते हुए वाटसनकी खोजमें चल पड़े।

    उधर जीवानन्दकी सेनाके दिल टूट रहे थे और वह भागने का मार्ग ढूँढ़ रही थी। जीवानन्द और धीरानन्दने उन्हें समझा-बुझाकर रोक रखना चाहा, पर सबको भागनेसे न रोक सके

    कितने ही भागकर आमके बगीचोंमें जा छिपे। बाकी लोगोंको जीवानन्द और धोरानन्द पुलकी ओर ले गये। पर वहां पहुंचते ही हे और वाटसनने उन्हें दो तरफसे घेर लिया। अब जान कहां बचती है!

    ग्यारहवां परिच्छेद

    इसी समय टामसकी तोपें दाहिनी ओरसे आ पहंची। तब तो सन्तानोंकी सेना एकबार ही तितर-बितर हो गयी। किसीके बचनेकी कोई आशा न रही। सन्तानोंमेंसे जिसका जिधर सींग समाया, वह उधर ही भाग निकला। जीवानन्द और धीरानन्दने उन्हें रोक रखनेके लिये बड़े-बड़े यत्न किये पर न रोक सके। इसी समय बड़े ऊँचे स्वरसे आवाज आयी-“पुलपर चले जाओ, पुलपर चले जाओ, उस पार पहुंच जाओ, नहीं तो नदीमें डूब मरोगे । अंगरेजी सेनाकी ओर मुंह किये हुए धीरे-धीरे पुलपर पहुंच जाओ।"

    जीवानन्दने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, तो सामने भवानन्द नजर आये। भवानन्दने कहा-"जीवानन्द, सबको पुलपर ले जाओ, नहीं तो रक्षा नहीं है।"

    तब धीरे-धीरे पीछेकी ओर हटती हुई सन्तान-सेना पुल पार करने चली। पर ज्योंही वे पुलपर पहुंचे, अंगरेजोंने मौका पाकर तोपसे पुलको उड़ा देना शुरू किया। सन्तानोंका दल नष्ट होने लगा। भवानन्द जीवानन्द और धीरानन्द तीनों एकत्र हो गये, एक-एक तोपकी मारसे बहुतसे सन्तानोंका संहार हो रहा था। भवानन्दने कहा-“जीवानन्द, धीरानन्द, आओ, तलवारें घुमाते हुए हमलोग उस तोपको चलकर छीन लें।"

    यह कह तीनों व्यक्ति तलवारें चमकाते हुए उस तोपके पास पहुंचे और गोलन्दाज सिपाहियोंको मार मार कर ढेर करने लगे। अन्य सन्तानगण भी उनकी मददको आ पहुंचे। तोप भवानन्दके हाथमें चली आयी। तोप कब्जे में कर, भवानन्द उसके ऊपर चढ़ गये और ताली बजाते हुए बोले-“बोलो वन्देमातरम्।" सब-के-सब 'वन्दे मातरम्' गाने लगे। भवानन्दने कहा-“इस तोपको घुमाकर अब इन सबोंकी खबर लेनी चाहिये।”

    यह सुनते ही सन्तानोंने तोपका मुंह फेर दिया। फिर तो वह तोप उच्च नाद करती हुई वैष्णवोंके कानों में हरिनाम गुंजाने लगी। उसकी बाढ़के सामने सिपाहो ढेर होने लगे। भवानन्द उस तोपको खींच खांचकर पुलके मुंहपर ले आये और बोले" तुम दोनों कतारबन्दी करके सन्तान-सेनाको पुलके उस पार ले जाओ, मैं अकेला ही इस व्यूहद्वारको रक्षा करूंगा। तोप चलानेके लिये मेरे पास थोड़ेसे गोलन्दाज सिपाही छोड़ जाओ।"

    बील चुने हुए जवान भवानन्दके पास रह गये और असंख्य सन्तान-सेना पुल पारकर जीवानन्द और धीरानन्दके आज्ञानुसार कतार बाँधे आगे बढ़ी। अकेले भवानन्द उन बीस जवानों की सहायतासे, एक ही तोपसे बहुत सिपाहियोंको जहन्नुमकी राह दिखलाने लगे। पर यवन-सेना भी ज्वारके समय लगातार उठती हुई तरङ्गोंके समान ही बढ़ती गयी और भवानन्दको चारों ओरसे घेरकर हैरान करने लगी। वे उन तरंगोंमें पड़कर डूबने लगे। पर भवानन्द न तो थकनेवाले थे, न हारनेवालेवे बड़े ही निडर थे। वे भी तोप दाग दाग कर कितने ही सैनिकोंको नष्ट करते चले गये। यवनगण आँधीसे उठती हुई तरङ्गोंकी तरह उनपर हमला करने लगे; पर वे बीसों जवान पुलका मोहड़ा रोके ही रहे। वार-पर-वार होनेपर भी वे न हटे और यवन पुलपर न पहुंच सके। वे वीर मानों अजेय थे। उनका जीवन मानों अमर था। इस अवसरमें दल-के-दल सन्तान

    १०

    उसपर पहुंच गये। थोड़ी देर में सारी सन्तान सेना पुल पार कर जाती; पर इसी समय न जाने किधरसे नयी नयी तो गरज उठीं। अरररर धांयकी आवाज होने लगी। दोनों ही दल थोड़ी देर हाथ रोककर देखने लगे, कि ये तो कहांसे दागी जा रही हैं। उन्होंने देखा, कि जंगलके भीतरसे कितने ही देशी सिपाही तोपें दागते हुए चले आ रहे हैं। जंगलसे निकलकर सत्रह बड़ीबड़ी तो एक साथ ही हे साहबके दलपर आग बरसाने लगीं। घोर शब्दसे जंगल और पहाड़ गूंज उठे। सारा दिन लड़ते-लड़ते थकी हुई यवनसेना प्राणोंके भयसे काँप उठी। उस अग्निवर्षाके आगे तिलङ्ग, मुसलमान और हिन्दुस्तानी सिपाही सभी भागने लगे। केवल दो-चार गोरे खड़े-खड़े जूझ रहे थे।

    भवानन्द तमाशा देख रहे थे। उन्होंने कहा-“भाइयो! देखो, वे वींटीकटे भागे जा रहे हैं। चलो, एकबार ही उनपर टूट पड़ो।” तब चोटियोंके दलको तरह कतार बाँधे हुई सन्तानसेना नये उत्साहसे पुलके इस पार आकर यवनोंपर आक्रमण करने लगी। वह अकस्मात् यवनोंपर टूट पड़ी। उन बेचारोंको युद्ध करनेका मौका ही न मिला। जैसे गङ्गाको तरङ्ग पद्धताकार मतवाले हाथीको बहा ले जाती हैं, वैसे ही सन्तानगण यवनोंको बहा ले चले। मुसलमानोंने देखा कि पीछे तो भवानन्दकी पैदल सेना है और सामने महेन्द्रकी बड़ी-बड़ी तोपे गरज रही हैं।

    अब तो हे साहबने देखा कि सर्वनाश उपस्थित है। उनकी सारी सुध-बुध जाती रही-बल, वीर्य, साहस, कौशल, शिक्षा, अभिमान-सबका दिवाला निकल गया। सारी फौजदारी, बादशाही, अंगरेजी, देशी, विलायती, काली और गोरी सेना गिर गिर कर जमीन चूमने लगी। विधर्मियोंका दल भाग चला। जीवानन्द और धीरानन्द 'मार मार' करते हुए विधर्मी सेनाके पीछे दौड़ पड़े। सन्तानोंने उनकी कुल तोपें छीन लीं। बहुतसे अंगरेज़ और देशी सिपाही मारे गये। सर्वनाश समीप आया देख,

    कप्तान हे और वाटसनने भवानन्दके पास कहला भेजा-"हम सब तुम्हारे कैदी हैं, अब हमारी जानें छोड़ दो।” जीवानन्दने भवानन्दके मुंहकी ओर देखा। भवानन्दने मन-ही-मन कहा-“नहीं, यह तो नहीं होगा। आज तो मैं मरनेके लिये तैयार हूं।" यही सोचकर भवानन्द ऊपरको हाथ उठाये, हरि-हरि कहते हुए बोले-“मारो! मारो इन दुष्टोंको।"

    अब तो एक भी प्राणी जीता न बचा। केवल २०१३० गोरे सिपाही एक जगह इकठ्ठे होकर मन-ही-मन आत्मसमर्पण करनेका निश्चय कर, जानपर खेलकर लड़ रहे थे। जीवानन्दने कहा-"भवानन्द! हमारी तो जय हो चुकी, अब लड़नेका कोई काम नहीं है। इन दो-चार व्यक्तियों को छोड़कर और कोई जीता नहीं रहा। इनको प्राणदान दे दो और घर लौट चलो।"

    भवानन्दने कहा,-"एकको भी जीता छोड़कर भवानन्द नहीं लौट सकता। जीवानन्द! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर कहता हूं, तुम अलग हटकर खड़े हो जाओ और तमाशा देखो। मैं अकेला ही इन बचे अंगरेजोंको मार गिराता हूं।"

    कप्तान टामस घोड़ेकी पीठपर बंधा था। भवानन्दने हुक्म दिया-"उसे मेरे सामने ले आओ। पहले उसीको जान लूंगा; फिर मैं तो मरूंगा ही।"

    कप्तान टामस बंगला अच्छी तरह समझता था। उसने यह बात सुनललकार कर उन अंगरेज़ सिपाहियोंसे कहा-“भाई अगरेजो! मैं तो मरता ही हूं; पर तुम लोग इंग्लैण्डके प्राचीन यशकी रक्षा करना। मैं तुम्हें ईसामसीहकी सौगन्ध देकर कहता हूं कि पहले मुझे मारकर तब इन विद्रोहियोंको मारना।"

    इसी समय दायँ से एक पिस्तौल छूटी। एक आइरिशने कप्तान टामसको लक्ष्यकर यह गोली छोड़ी थी। गोली कप्तान टामसके सिरमें लगी। उसके प्राण निकल गये। भवानन्दने ज़ोर-से चिल्लाकर कहा-"मेरा ब्रह्मास्त्र व्यर्थ चला गया। अब कौन

    ऐसा अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव है, जो इस समय मेरो रक्षा कर सके? यह देखो, चुटीले शेरकी तरह सब गोरे मेरे ऊपर टूट रहे हैं। मैं तो मरनेके लिये आया ही हूं। अब बतलाओ कौन कौन सन्तान मेरे साथ मरना चाहते हैं।"

    सबसे पहले धीरानन्द आगे आये। इसके बाद जीवानन्द। साथ ही दस, फिर पन्द्रह, फिर बीस और अन्तमें ५० सन्तान आकर वहीं इकट्ठे हो गये। भवानन्दने धीरानन्दको देखकर कहा-"तुम भी क्या हमारे ही साथ मरने आये हो?"

    धीरा-"क्यों? मरनेमें भी किसीका इजारा है?” यह कहते हुए धीरानन्दने एक अंगरेजको घायल किया।"

    भवा०-"नहीं, नहीं, मेरे कहनेका मतलब यह है कि तुम तो स्त्री पुत्रका मुंह देखते हुए सुखसे दिन बिताना चाहते थे।"

    धीरा०-"कलवाली बातका इशारा कर रहे हो? क्या अब भी तुम्हारी समझमें कुछ न आया?" यह कहते कहते-धीरानन्द ने उस घायल गोरेको मार गिराया।"

    भवा०-"नहीं"

    बात पूरी भी न होने पायी थी, कि एक गोरेने भवानन्दका दाहिना हाथ काट डाला।

    धीरा०-"मेरी क्या मजाल, जो मैं तुम्हारे जैसे पवित्रात्मासे वैसी बातें कहता? मैं तो उस समय सत्यानन्दका जासूस बनकर गया हुआ था।"

    भवा०-“यह क्या? क्या महाराज मेरे ऊपर सन्देह करते हैं?"

    उस समय भवानन्द एक ही हाथसे लड़ रहे थे। धीरानन्दने उसकी रक्षा करते हुए कहा-"कल्याणीके साथ तुम्हारी जो जो बाते हुई थीं, वे सब महाराजने अपने कानों सुन ली थीं।"

    भवा०-“सो कैसे?

    धीरा०-वे स्वयं वहां गये थे। देखो, सावधान हो जाओ।"

    इसी समय एक गोरेने भवानन्दपर हमला किया, जिसका जवाब उन्होंने हमलेसे दिया।

    धीरानन्द कहते गये-“वे कल्याणीको गीता पढ़ा रहे थे, उसी समय तुम वहाँ पहुंचे। देखो, सावधान!"-"भवानन्दकी बायीं भुजा भी कटकर गिर पड़ी।

    भवा०-“अच्छा, उनको मेरे मरनेका हाल सुनाते हुए कह देना कि मैं अविश्वासी नहीं हूं।"

    आंखोंमें आंसू भरकर धीरानन्द युद्ध करते-करते बोले-“सो तो वे ही समझे। कल उन्होंने जो आशीर्वाद किया था उसे याद करो। उन्होंने मुझसे कह रखा था कि आज भवानन्द मरेगा, तुम उसके पास ही रहना और उससे मरते समय कह देना कि मेरे आशीर्वादसे उसे मरने के बाद वैकुण्ठवास होगा।"

    भवानन्दने कहा-“सन्तानोंकी जय हो।, भाई! मरते समय एक बार 'वन्देमातरम्' गान तो मुझे सुना दो।" उसी समय धीरानन्दके आज्ञानुसार सभी युद्धोन्मत्त सन्तान ललकारके साथ 'वन्देमातरम्' गाने लगे। इससे उनकी भुजाओंमें दुगुना बल आ गया। उस भयङ्कर मुहूर्त में ही बाकी बचे हुए गोरे भी मारे गये। सारी युद्धभूमिपर सन्नाटा छा गया।

    उसी मुहूर्त में भवानन्दने भी मुंहसे 'वन्देमातरम्' गाते और मन-ही-मन विष्णु भगवान्के चरण-कमलोंका ध्यान करते हुए परलोककी यात्रा की।

    हाय रे रमणी रूप लावण्य! इस संसारमें सबसे बढ़कर तुझे ही धिक्कार है!

    बारहवां परिच्छेद

    लड़ाई जीतने के बाद सारे विजयी वीर, अजय नदीके किनारे चारों ओरसे सत्यानन्दको घेरे हुए, तरह तरहको खुशियां मनाने लगे। केवल सत्यानन्दको ही सुख नहीं था। वे भवानन्दके लिये दुःखी हो रहे थे।

    अबतक तो वैष्णवोंके पास लड़ाईके अधिक बाजे नहीं थे, पर इस समय न जाने कहांसे हजारों ढोल, दमामे, शहनाई, भेरी, तुरही, सिंघे आदि बाजे आ पहुंचे। जय-सूचक वाद्योंकी ध्वनिसे सभी जङ्गल, नदियां और पहाड़गूज उठे। इस प्रकार बड़ी देरतक सन्तानोंने तरह तरहसे खुशियां मनायीं। इसके बाद सत्यानन्दने कहा-"आज जगदीश्वरने बड़ी कृपा की जो सनातनधर्मकी जय हुई; परन्तु अभी एक काम बाकी रह गया है। जो हमारे साथ खुशियाँ न मना सके और हमें यह खुशीका दिन दिखलानेके लिये जानोंपर खेल गये, उन्हें भूल जानेसे काम नहीं चलेगा। जिन्होंने रणक्षेत्रमें प्राण गंवाये हैं, चलो, हम उन लोगोंका शव-संस्कार कर। विशेषकर, जिस महात्माने हमें इस लड़ाई में जिताकर अपने प्राण दे दिये हैं, उस भवानंदका संस्कार खूब धूमधामसे करें।"

    यह सुनते ही सन्तानोंका दल 'वन्देमातरम्' कहता हुआ मरे हुए वीरोंका संस्कार करने चला। सब लोग हरिनाम लेते हुए बहुत सी चन्दनकी लकड़ियाँ बटोर लाये और भवानन्दकी चिता रच उसीपर उन्हें सुला, आग लगाकर चारों ओरसे चिताको घेरे हुए 'हरे मुरारे' गाने लगे। ये लोग विष्णु-भक्त थे-वैष्णव- सम्प्रदाय-भक्त न थे, इसीलिये इनमें दाह कम होता था।

    उसके बाद जंगलमें केवल सत्यानन्द, जीवानन्द, महेन्द्र, नवीनानन्द और धीरानन्द ही रह गये। पांचों व्यक्ति एकांतमें बैठे सलाह करने लगे। सत्यानन्दने कहा- "इतने दिनोंतक हम-लोग जिस व्रतके लिये अपना सब कर्म-धर्म और सुख-आराम छोड़ बैठे थे, वह पूरा हो गया। अब यहाँ यवन-सेनाका नाम-निशान भी न रहा, जो बाकी बचे हैं वे एक क्षण भी हमारे सामने न ठहर सकेंगे अब तुम लोगोंकी क्या राय है?"