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  • तिलिस्माती मुँदरी

    तिलिस्माती मुँदरी

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    तिलिस्माती मुँदरी
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    तिलिस्माती मुँदरी

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    अध्याय १

    हरिद्वार से आगे उत्तर की तरफ़ पहाड़ों में दूर तक चले जाइये तो एक ऐसे मुक़ाम पर पहुंचियेगा जहां पानी की एक मोटी धारा, गाय के मुंँह के मानिंद एक मुहरे की राह, बरफ़ के पहाड़ों से निकल कर बड़े ज़ोर और शोर के साथ एक नीची जगह में गिरती है। यह धारा हमारी गंगामाई है, उसके निकलने के मुहरे को गौमुखी कहते हैं और उस सारी जगह का नाम गंगोत्री है।

    गंगोत्री बड़ी सुहावनी जगह है। बर्फ़िस्तान से आती हुई गंगाजी की सफ़ेद धारा देखने में बहुत खूबसूरत मालूम होती है और उसके उतरने की आवाज़, पहाड़ों में गूंजती हुई, कानों को बहुत प्यारी लगती है। गंगोत्री हिन्दुओं का बड़ा तीर्थ है। देस यानी मैदान के रहने वालों के लिये वहां जाने का पहाड़ी रास्ता बड़ा मुशकिल है और जिस ज़माने का किस्सा इस किताब में लिखा जाता है उस ज़माने में और भी मुशकिल था, क्योंकि अब तो कहीं कहीं सड़कें और पुल भी बन गये हैं, पहले सिर्फ तंग पगडंडियां थीं जिन पर से रास्तागीरों को पैर फिसल कर पहाड़ के नीचे खड्ड में गिर जाने का डर रहता था; और गहरी नदियों को उतरने के लिये उनके ऊपर एक किनारे से दूसरे किनारे तक मोटे रस्से लगे रहते थे जिन्हें झूला कहते थे, उनपर चलने से वह

    बहुत हिलते डुलते थे और उतरने वाले अक्सर पैर चूकने से उनपर से गिर कर मर जाते थे।

    सैकड़ों बरस की बात है इस गंगोत्री के नज़दीक एक छोटी झोंपड़ी में एक योगी रहता था। उम्र उसकी ५० से ज़ियादा और ४५ से कम न थी, पर देखने में वह बहुत ही बूढ़ा जान पड़ता था। डील उसका लम्बा, रंग गोरा, चिहरा आर्यों का सा, माथा ऊँचा था, और एक बड़ी भूरी डाढ़ी उसकी चौड़ी छाती को ढकती हुई नाफ़ तक लटकती थी। उसके सारे बदन पर ग़ौर करने से ऐसा मालूम होता था कि वह जवानी में बड़े आराम से रहा होगा, मगर माथे पर की सिकड़ी हुई लकीरों से और भवों के भीतर गड़ी हुई आंखों से ऐसा ख़याल होता था कि कोई बड़ा भारी दुख इस आदमी के योगी हो जाने का सबब हुआ है।

    यह योगी चिड़ियों और जानवरों पर बहुत मुहब्बत रखता था, उन्हें आदमी की तरह चाहता था और वह इसके मिज़ाज को यहां तक जान गये थे कि हत्यारे जानवर भी दूसरे जानवरों की तरह इसके पास आने में डर नहीं खाते थे और न इस को किसी तरह का नुकसान पहुंचाते थे।

    एक दिन शाम को यह योगी आसन पर बैठा हुआ अस्ताचल के पीछे डूबते हुए सूरज की सजावट को देख रहा था कि उसकी नज़र दो कौओं पर पड़ी जो कि उड़ते उड़ते खिलवाड़ कर रहे थे। लड़ते लड़ते एक उनमें से गंगा जी की धारा में गिर पड़ा। वहां पर बहाव ज़ोर का था और उसके पंख भीग कर इतने भारी हो गये थे कि उड़ने की ताकत न रख कर वह बह चला और ज़रूर डूब जाता, लेकिन योगी ने पानी में धस झट अपनी कुबड़ी की चोंच से उसे बाहर

    निकाल लिया और किनारे पर रख दिया। जब उसके पंख सूख गये दोनों कौए एक ऊंची चट्टान की तरफ़ जो कि गौमुखी के ठीक ऊपर थी कांव कांव करते हुए उड़ गये। योगी ने उन्हें उस चट्टान के बीचों बीच एक छोटी सी खोह में घुसते हुए देखा और थोड़ी ही देर पीछे देखता क्या है कि दोनों कौए फिर उसकी तरफ़ आ रहे है और आकर उसके पैरों के पास बैठ जाते हैं। एक कौआ एक अंगूठी योगी के पैरों पर रख देता है और योगी उसको उठा कर अपनी उंगली में पहन लेता है। मगर उसे बड़ा तअज्जुब होता है जब कि वह अंगूठी को पहनते ही कौए को यों कहते सुनता है-“ऐ मिहर्बान बड़े योगी! आज आप ने मेरी जान बचाई है। और सब चिड़ियों और जानवरों पर आप हमेशा बड़ी मिहर्बानी रखते हैं। इस लिये यह अंगूठी मैं आप को भेट करता हूं, इसे कबूल कीजिये। यह मुँदरी जादू की है और इस में यह तासीर है कि जो कोई इस को पहनता है सब चिड़ियों की बोली समझ सकता है और उन्हें जिस काम का हुक्म देता है उसे वह इसके दिखाने से उसी वक्त करने को तैयार हो जाते हैं। अगर इस वक्त हमारे लायक कोई काम हो तो हुक्म दीजिये"।

    यह सुन कर योगी ने कहा-"हां, मेरा एक काम है। मैं पहले कश्मीर का राजा था, पर मेरे दामाद ने मुझे गद्दी से उतार कर राज छीन लिया और मैं यहां योगी के भेस में छुपा हुआ हूं। मैं चाहता हूं कि मरने के पहले अपनी लड़की की जो कि वहां रानी है कुछ ख़बर सुन लू और राज की हालत भी जान लूं। अगर तुम पहाड़ों के पार कश्मीर जाकर ख़बर ले आओ तो बड़ा एहसान मानूं"।

    "बहुत अच्छा" कह के दोनों कौए वहां से उड़ चले और

    पल भर में योगी की नज़र से गायब हो गये। कई दिन तक योगी ने उनको न देखा। एक दिन वह शाम को अपनी मढ़ी के दरवाज़े पर बैठा था, उसे दो काले दाग़ से दूर आसमान में दिखाई दिये, वह उसकी तरफ़ आ रहे थे और जब नज़दीक आ गये वही दोनों कोए निकले। आकर वह उसके पास एक तिपाई पर जो वहां पड़ी थी बैठ गये और उनमें से एक अपने कश्मीर जाने का नतीजा यों सुनाने लगा-

    "ऐ महाराज, हम आप के लिये बुरी ख़बर लाये हैं। रानी यानी आप की बेटी तो इस दुनिया से कूच कर गई है और एक लड़की छोड़ गई है। राजा ने दूसरा ब्याह कर लिया है। पर पहली रानी के तोते से जो कुछ हमने सुना उस से जाना कि नई रानी आप की दोहती को विलकुल नहीं चाहती, बल्कि उसे दुश्मनी की नज़र से देखती है और यह भी डर है कि जब राजा अब की बार शहर से दूर शिकार हो जायगा यह बेरहम सनी उस बग़ैर मां की बेगुनाह बच्ची को मरवा डालेगी या किसी दूसरी तदबीर से अलहदा कर देगी"।

    उस बूढ़े बैरागी को यह बात सुन कर बड़ा दुख हुआ और फ़िक से रात को नींद न आई। सवेरा होने पर राज़ की तरह वह कौए नदी किनारे जब फिर उड़ने आये, योगी ने उन्हें फौरन अपने पास बुलाया और कहा-“ऐ नेक चिड़ियो, यह अंगूठी मेरी दोहती को जाकर दो और कहो कि जब उसे किसी तरह की मदद या सलाह की ज़रूरत पड़े वह इसके ज़ोर से चाहे जिस चिड़िया को बुला लिया करे हर एक चिड़िया उसे अपनी ताक़त भर मदद देगी-बस मैं अपनी प्यारी दोहती को सिर्फ़ इतनी ही मदद पहुंचा सकता हूं"-और आंखों में आंसू भर अंगूठी कौओं को देदी-कौए यह कह कर कि- "बहुत अच्छा महाराज़, हम आपके हुक्म के

    बमूजिब अंगूठी लड़की को दे देंगे और उसके पास रह कर मक़दूर भर उसकी मदद करेंगे और हो सका तो आप के पास उसे ले भी आवेगे," वहां से उड़ दिये और पहाड़ और बन और पटपरों को तै करते हुएं थोड़े ही दिनों में कश्मीर के राजा के महलों में दाखिल हुए-और सीधे उसी जगह पर पहुंचे जहां राजा की बेटी बैठी हुई अपने तोते को चुगा रही थी और मुंँदरी को लड़की के आगे रख दिया। लड़की उसे छूते ही चिड़ियों की बोली समझने लगी।

    कौओ ने उसे उसके नाना मे जो कहला भेजा था सब सुना दिया और तोते ने जिस तरह उसका राज छिन गया था सब बयान किया। राजा की लड़की सुन कर बहुत रोई और बोली-“ऐ परिन्दो, मुझे जैसे बने मेरे नाना के पास ले चलो, क्योंकि रानी मुझ पर इतना कड़ापन रखती है कि बाप के साथ सिवा अपने सामने के मुझे बात तक नहीं करने देती, इस से मैं उसकी बातें बाप से नहीं कह सकती-अलावा इस के वह हर एक को मेरे ख़िलाफ़ बनाये रहती है और सिवा इस प्यारे तोते के कोई मुझे नहीं चाहता और न मेरी ख़बर लेता है।

    इस पर तोता अपनी बैठक से झुक, चेांच से लड़की के हाथ को चूम, कहने लगा-"मेरी प्यारी बच्ची, तू पूरा यक़ीन रख कि जो कुछ मैं तेरे लिये कर सकूंगा उससे कभी बाहर न हूंगा, क्योंकि मैं तुझे अपने बच्चे के बराबर मानता हूं-मैंने तेरा और तेरी मां दोनों का पैदा होना अपनी आंखों से देखा है। रही तेरे नाना के पास तेरे जाने की बात, मेरी समझ में यह काम मुशकिल और ख़तरे का है, पर साथ ही यह भी अंदेशा है कि राजा के शिकार को चले जाने के बाद, इस

    सखदिल रानी के पास रहने में हमारे राजा की प्यारी लड़की का किसी तरह बचाव नहीं"।

    इसके बाद यह तै हुआ कि दोनों कौए तो महल के बाग़ में बसेरा करें और हमेशा ऐसी जगह रहे कि काम पड़ने पर झट बुला लिये जा सके और तोते ने महलों के भीतर ख़बरदारी रखने का काम लिया और यह मालूम करने की कोशिश में रहा कि रानी लड़की को तकलीफ़ पहुंचाने की कोई तदबीर तो नहीं करती।

    अध्याय २

    इसके थोड़े ही दिनों बाद राजा शिकार खेलने को पहाड़ों में चला गया और उसके जाने के दूसरे ही दिन कौओं ने तोते को ख़बर दी कि उन्होंने रानी के ख़ास गुलाम बब्बू को बाग़ में कुछ जड़ी बूटी उखाड़ कर इकट्ठा करते देखा था जिनमें कई ज़हरीली बूटियां थीं। यह ख़बर सुनते ही तोता खिड़की की राह बाहर आ, बब्बू के करतब को देख, सीधा रानी के कमरे में चला गया और वहाँ छिप कर देखने लगा कि रानी क्या करती है। थोड़ी देर बाद वह देखता है कि बब्बू उन ज़हरदार पत्तियों को लाकर रानी के हाथ में दे देता है और रानी उनको काट कर एक देग़ची में रख अंगीठी पर उबालने को चढ़ा देती है; बाद इसके उसने देखा कि रानी ने एक बरतन में से थोड़ा सा आटा और कुछ मिठाई निकाल उबली हुई पत्तियों के अर्क में गूंध कर एक रोटी पोई और उसे आग पर सेक डाला। तोता यह देख कर वहां से चुपके से उड़ फ़ौरन राजा की लड़की के कमरे में पहुंचा जहां उसने दोनों कौओ को भी पाया और उनसे कहने लगा-“ऐ कौओ, अब देर करने का वक्त नहीं है, अगर राजा की लड़की अब यहां रहेगी तो उसे ज़रूर ज़हर

    दे दिया जायगा-रानी इस वक्त उसके लिये एक ज़हर की रोटी बना रही है। प्यारी बेटी!चलो यहां से अभी भाग चले" राजा की लड़की इस बात को सुनते ही बड़ी दहशत के साथ वहां से उठ कर दरवाज़े की तरफ दौड़ी, पर किवाड़ों में ताला लगा, था। खिड़की को देखा तो वह इतने ऊंचे पर थी कि लड़की का उसकी राह से निकलना नहीं हो सकता था। सिवा इसके खिड़की के सामने ही एक संतरी पहरा दे रहा था, लेकिन जब कि वह सब सोच विचार कर रहे थे कि क्या किया जाय, दरवाज़ा खुल गया और रानी रिकाबी में एक उमदा सी रोटी लिये हुए आ पहुंची। इस लिये कि रानी उनको न देख सके कौए उसके अन्दर आते ही खिड़की की राह से उड़ गये। रानी लड़की से बोली-“ऐ प्यारी, मैं तेरे खाने के लिए यह रोटी अपने हाथ से बना के लाई हूं" और इतना कह रोटी उसके आगे रख, दरवाजे का ताला बंद करके चली गई। रानी के चले जाने के बाद तोते ने झट कौओं को बुलाया और कहा कि "इस रोटी को दीवार के बाहर झील में गिरा दो"; कौओं ने वैसा ही किया। राजा की लड़की उस रोज़ दिन भर और रात भर उसी कमरे में बंद रही और उसके लिये खाना भी और कुछ न आया; लेकिन कौए उसके वास्ते कई तरह के फल और बहुत सी मेवा महल के बाग़ीचे से ले आये और लड़की और सब चिड़ियों ने मिल कर खूब अच्छी तरह ब्यालू की। सुबह होते ही रानी यह देखने को आई कि लड़की मर गई या नहीं और जब उसे जीता पाया निहायत गुस्से में आ उसके बाल खींच कर उसे मारने लगी और दोनों हाथों से गर्दन दबा कर गला घोटने का इरादा किया। इस हरकत को देख कर तोते ने क्या किया कि खिड़की की राह उड़कर सीधा उस जगह पहुंचा जहां पर

    रानी का छोटा बच्चा पालने में लेटा हुआ था और अंगीठी में से जो कि वहां जल रही थी एक जलती लकड़ी लेकर उस कमरे की खिड़की के परदे में आग लगा दी, और "आग लगी, आग लगी; पालने वाले घर में आग लग गई,” यों पुकारता हुआ राजा की लड़की के कमरे तक जा पहुंचा और महल के सब नौकर "आग, आग" चिल्लाने लगे। यह सब होने में इतनी थोड़ी देर लगी कि रानी राजा की लड़की का गला घोटने न पाई और उसे वहीं ज़मीन पर पड़ी हुई छोड़ अपने बच्चे को बचाने के लिये दौड़ी।

    राजा की लड़की किसी तरह मुशकिल से ज़मीन से उठी और तोते के कहने पर कि इस मौके पर ज़रूर भाग चलना चाहिये उसके साथ दरवाजे की राह जो कि अब खुला हुआ था, बाहर निकल गई और सीढ़ियां उतर कर बाग़ में दाख़िल हुई, जहां दोनों कौए भी मिल गये। तोता आगे हुआ और कौए पीछे और वह सब दीवार के एक छोटे दरवाजे पर पहुंचे। लड़की ने कुछ मुशकिल के साथ किवाड़ों की कुन्दी खोल ली और जब सब बाहर हुए अपने तई ऐन झील के किनारे पर पाया। उस वक्त झील के दूसरे किनारे के पास दो हंस तैर रहे थे; तोते ने राजा की लड़की से कहा कि “इन को अंगूठी दिखा कर हुक्म दे कि तुझे झील के पार पहुंचा दें"। ज्यों ही लड़की ने हंसों को अंगूठी दिखाई वह उसके पास आकर सिर झुका कर पूछने लगे-"क्या हुक्म है?" वह बोली-"मुझे झील के उस पार ले चलो"-हंसे ने उसी दम अपनी जोड़ी बना ली और राजा की लड़की ने पानी में धस अपने दोनों बाजुओं को दोनों हंसों की पीठ पर लगा लिया। धड़ उसका कंधों के नीचे तक पानी में हो गया, सिर्फ़ सिर ऊपर रहा और दोनों हंस उसे ले चले। तोता बड़े आराम से

    राजा की लड़की के कंधे पर बैठा था और कौए सभी के ऊपर उड़ते चलते थे।

    जब वह सब झील के पार हुए, राजा की लड़की उतर पड़ी और हंस उसका हुक्म पाकर लौट गये। राजा की लड़की ने वहां चट्टानों में एक अलहदा जगह पाकर अपने भीगे कपड़े धूप में सूखने को डाल दिये और तोते ने एक कौए को चट्टान की चोटी पर खबरदारी के लिये बैठा दिया और दूसरे को राजा की लड़की के कहने से यह मालूम करने के लिए महलों को रवाना किया कि आग लगने से रानी के बच्चे को किसी तरह की तकलीफ़ तो नहीं पहुंची।

    जब तक कपड़े सूखे, यह कौआ महलों से लौट आया और यह ख़बर लाया कि बच्चे को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा, और आग भी सब बुझ गई है। लेकिन राजा की लड़की के बाबत महल में बड़ा शोर मच रहा है। बब्बू वगैरह सब नौकर उसकी खोज कर रहे हैं और जो कोई राजा की लड़की को रानी के पास ले आवे, उसके लिये ५० अशर्फ़ी का इनाम मुकर्रर हुआ है।

    तोते ने राजा की लड़की से कहा कि कपड़े पहन कर अब जल्दी उसके पीछे २ चल दे क्योंकि अभी ऐसी जगह बहुत दूर थी जहां उसके खोजने वालों की पहुंच न हो। पस उन्होंने कूच कर दिया। कौए आसमान की राह चारों तरफ निगाह रखते चलते थे और तोता राजा की लड़की के आगे २ रास्ता बताता जाता था। थोड़े ही अर्से में वह एक बड़े बन में पहुंचे। यहां एक कौआ तो ऊंचा आसमान में दरखों की चोटियों से ऊपर २ उड़ता हुआ चला, और दूसरा कौआ नीचे उतर कर राजा की बेटी के आगे हो लिया। उन्हें बहुत

    से आदमी उस बन में मिले, लेकिन जब कोई आता दिखाई देता नीचे वाला कौआ अपनी बोली में कह कर लड़की को ख़बरदार कर देता और जब तक वह आदमी निकल नहीं जाता लड़की किसी झाड़ो या पेड़ या पत्तों की आड़ में छिप रहती; और उन चिड़ियों पर कोई ध्यान नहीं देता था।

    इस तरह वह बराबर चले गये जब तक कि राजा की लड़की थकी नहीं। पर अब वह थक भी गई और उसे भूख भी लगी; तोते ने तब ऊपर वाले कौए को बुला कर पूछा कि कहीं उसे पानी का निशान भी दिखाई दिया कि नहीं। कौए ने कहा कि एक छोटा सा झरना दाहिनी तरफ़ को थोड़ी दूर पर एक चट्टान से गिर रहा है। फिर तोते ने कौओं को हुक्म दिया कि राजा की लड़की के वास्ते बन में से अच्छे २ फल चुन कर झरने पर लावे और राजा की लड़की का, हालांकि वह थकी हुई थी, अपने साथ झरने की तरफ़ ले चला। उन्हें थोड़े ही देर में पानी के गिरने की आवाज़ सुनाई दी वह, उसी तरफ को चले जिधर से वह आवाज़ आती थी और एक पत्थर की चट्टान के पास पहुंचे जिसमें से पानी की एक छोटी सी धारा एक बड़े गहरे और पथरीले खडु में गिर रही थी। राजा की लड़की ने खूब जी भर के पानी पिया और तोते ने भी पिया। तोता पानी पीकर घास पर, बैठ कौओं की राह देखने लगा। कौए भी जल्द आ पहुंचे। जितने उनसे चल सके, अंजीर और अंगूर साथ लाये। यह फल जब राजा की लड़की और तोते ने सब खा लिये, कौए बड़ी आसानी से पास ही से और ले आये। यों उन सभी ने मिलकर खूब अच्छी तरह खाना खाया। यह जगह ऐसी सुंदर और अलहदा थी कि उन्होंने वहां दूसरे रोज़ तक ठहरने का इरादा कर लिया। चिड़ियां राजा की लड़की के

    बिस्तर के लिये नर्म २ पत्ते चुन कर ले आई और राजा की लड़की ने भी इस काम में मशक्कत की और रात होने के पहले ही एक उमदा पलंग एक छप्परनुमा चट्टान के नीचे तैयार हो गया, जहां ओस और सर्दी से बचकर वह रात भर खूब आराम से सोई। तीनों पखेरू पास के एक पेड़ पर बसे, और बारी २ से रात भर पहरा देते रहे।

    सुबह को उन सभों ने वहां अंजीरों और अंगूरों का कलेवा करके मामूली तौर से कूच फिर शुरू कर दिया। अब दोपहर के क़रीब जब कि वह कुछ देर तक चल चुके थे, आगे वाले कौए को एक आदमी उनकी तरफ़ आता नज़र आया, और कौआ राजा की लड़की को आगाह करने के लिये फ़ौरन चिल्लाने लगा। लड़की ने कौए की आवाज़ को सुना, पर उसका मतलब न समझा। लेकिन जब उसको अपनी तरफ़ ज़ोर से कांव कांव करते हुए आता देखा, लड़की ने जाना कि कुछ अंदेशा है और भट एक झाड़ी के पीछे छिप गई। आदमी के चले जाने पर वह फिर चिड़ियों से मिल गई, लेकिन उनके कहने का एक लफ्ज़ भी नहीं समझ सकती थी। आख़िर को उसे मालूम हुआ कि जादू की अंगूठी उसके पास नहीं है। अंगूठी उसकी पतली उंगली के लिये बहुत बड़ी होने से सुबह के चलने में कहीं रास्ते में बेमालूम गिर गई थी। उसने हाथ उठा कर तोते को जताया कि मुंँदरी नहीं है, इस बात से उन सब को बहुत अफ़सोस हुआ, और लड़की के रोने, तोते के चीखने और कौओं की कांव कांव से एक ग़मगीन राग उस जंगली जगह में सुनाई देने लगा। आख़िरश तोते ने राजा को लड़की को अपने पीछे २ आने का इशारा किया और तमाम काफ़िला वहां से लौट चला। रास्ते में बड़ी होशियारी से खोई हुई अंगूठी ढूंढ़ते

    जाते थे, मगर ढूंढ़ना बेफ़ायदा हुआ और वह उसी चश्मे पर पहुंच गये जहां से कि सुबह को कूच किया था।

    इस वक्त शाम हो गई थी। कौए खाने को कुछ अंजीर और अंगूर ले आये और राजा की लड़की अपने पुराने बिस्तर पर लेट रही। वह बहुत रोई कि अब अपनी प्यारी चिड़ियों से बात नहीं कर सकती थी, लेकिन रोते २ जल्द ही नींद आ गई। सुबह होते ही वह फिर अंगूठी की तलाश में निकले, और जब कि उसकी खोज में लगे हुए थे कौओं ने देखा कि एक सिपाही एक पेड़ के नीचे पड़ा सो रहा है। एक कौआ दूसरे से कहने लगा “देख यहां एक आदमी लेटा हुआ है। जा, राजा की लड़की को ख़बरदार कर दे"। लेकिन इतने में “कौन जाता है" यों कहता हुआ सिपाही उठ खड़ा होता है और जैसे वह उठता है कौए उसकी उंगली पर जादू की मुँदरी चमकती हुई देखते हैं। जादू उसी दम अपना असर करता है और कौओं को सिपाही के सवाल का जवाब देना पड़ता है-"हम दो कमनसीब कौए हैं और आप के ताबेदार हैं"। सिपाही को उन चिड़ियों की बोली समझने से बड़ा तअज्जुब हुआ और उनसे पूछने लगा "तुम चिड़ियां होकर इस तरह बात क्योंकर कर सकते हो?" एक कौए ने जवाब दिया "साहब, आप की उंगली में एक जादू की अंगूठी है जिसके ज़ोर से आप हमारी बोली समझ सकते हैं और हम को मजबूरन आप के हर सवाल का जवाब देना पड़ता है"। “हां! यह बात है? अच्छा तो बतला किस राजा की लड़की का तू अभी जिक्र कर रहा था"। कौआ बोला “कश्मीर के राजा की लड़की का"। इस पर सिपाही कहने लगा “क्या खुब, उस लड़की के पकड़ने वाले को तो ५० अशर्फ़ी का इनाम है। क्या वह लड़की इस वक्त कहीं यहीं पर है?" बेचारे कौए राजा की लड़की को दुश्मन के कब्जे में लाना नहीं चाहते थे, मगर मुंँदरी के जादू के आगे बेकाबू थे। इसलिये उन्हें कबूल करना पड़ा कि लड़की पास ही है। सिपाही ने लड़की को झट ढूंढ कर पकड़ लिया, और उसके रोने और चिल्लाने पर कुछ भी ध्यान न दे, रास्ते में घसीटता हुआ ले चला। तीनों चिड़ियां बेचारी ग़मगीन आवाज़ करती हुई पीछे २ साथ हुई। थोड़े अर्से में वह झील केमकिनारे पहुंचे। उसमें इस वक्त एक कश्ती पड़ी थी। सिपाही ने राजा की लड़की को उसमें जबरदस्ती बैठा दिया और आप भी चढ़ लिया। तोता भी किसी तौर से नाव में घुस गया और एक तख्ते के नीचे छिप रहा। सिपाही ने लाव का खेना शुरू किया, कौए ऊपर उड़ते चले। वह सब महल के पीछे की खिड़की पर जा उतरे जिसका दर्वाज़ा सिपाही के खटखटाने पर बब्बू गुलाम ने फ़ौरन खोल दिया। गुलाम राजा की लड़की को दांत निकाल कर बुरी तरह देखने लगा और रानी के कमरे में ले गया। चिड़ियाँ महल के बाग़चे में छिप रहीं।

    रानी ने सिपाही को वादा किया हुआ इनाम दिया और बब्बू से कहा कि लड़की को उसके कमरे में बन्द करके दुरवाज़ो और खिड़कियों के सामने पहरा बैठा दे ताकि लड़की फिर न भाग जावे। फिर वह सिपाही से पूछने लगी कि उसने लड़की को कैसे पाया, सिपाही ने, जिस तरह उसे जंगल में जादू की अंगूठी मिली थी जिसके जरिये से वह चिड़ियों की बोली समझने लगा था और जिस तरह उन्हीं चिड़ियों से लड़की का पता लगा था, सब सुना दिया।

    अध्याय ३

    जादू की अंगूठी हाथ आने से रानी बहुत खुश हुई। उसने छुटपन में इसका बहुत कुछ हाल सुना था। उसे मालूम था कि यह अंगूठी पेश्तर के ज़माने में गुरु गोरखनाथ के पास थी जिन्होंने कि इसकी ताक़त से तमाम चिड़ियों को ताबे कर उन पर अपनी हुकूमत कायम कर ली थी। गोरखनाथ जी के मरने पर चिड़ियों ने अंगूठी को कहीं छिपा दिया था ताकि कोई दूसरा शख़्स उसके ज़रिये से उन पर अमल- दारी न कर सके। रानी ने अपने कमरे की खिड़की से देखा कि दो कौए बाग़चे में एक दरख़ की टहनी पर ग़मगीन बैठे हुए है (यह कौए वही थे जिनका ज़िक्र इस कहानी में शुरू से है) रानी ने उन्हें अंगूठी दिखा कर पास बुला लिया और हुक्म दिया कि वह झील के पार जो जंगल है वहां जांय, उसके भीतर एक बड़ी भारी पत्थर की चट्टान मिलेगी जिसकी कि चारों बग़लें बिलकुल सीधी हैं। इस चट्टान की जड़ पर एक अनार का दरख़ उगा हुआ है जिसकी पीड़ में एक मैंडक बन्द है। रानी ने कौओं से कहा कि वह इस पेड़ का एक अनार उसके वास्ते लावें और वह भी एक एक दाना उस फल का निगल जावें क्योंकि उसके दाने ज़हर मुहरे की खासियत रखते हैं, यानी उनके खाने से किसी किस्म का ज़हर असर नहीं करता, और अगर कौए उसके दाने न खायेंगे तो इसके बाद जो काम उनसे लिया जायेगा उसमें वह मर जायेंगे। वह काम यह है कि वह दोनों उस चट्टान की चोटी पर जायें, वहां एक ज़हर का दरख़ है, उसका गोंद लावें। कौए हुक्म के मुताबिक़ वहां से जंगल को उड़े और थोड़े ही अर्से में उस अनार के पेड़ पर पहुंचे जो कि चट्टान की जड़ में

    उगा हुआ था, उन्होंने अपनी चोंच से पेड़ की पीड़ में खोंटें मार कर उस पर कान लगाया तो उसके अन्दर मैंडक के बोलने की आवज़ सुनाई दी। तब उन्होंने उस अनार के चन्द दाने जो कि नीचे बिखरे हुए थे निगल लिये और एक २ फल साथ लेकर चट्टान की चोटी पर पहुंचे, जिसे उन्होंने सब्जी या जानवरों से बिलकुल खाली पाया और जिस पर कि उन चिड़ियों की ठटरियां और हड्डियां तमाम फैली हुई थीं जो कि चट्टान के ऊपर उड़ने में उस ज़हर के पेड़ की बू से मर गई थीं। चट्टान के सब से ऊंचे हिस्से पर कौओं ने देखा कि एक छोटा सा अधूरा उगा हुआ पेड़ है जिसकी छाल से एक स्याह रंग का गोंद टपक रहा है। एक कौए ने उसमें से थोड़ा सा गोंद ले लिया और मय अनारों के दोनों कौए महल की तरफ़ रवाना हुए। एक अनार उन्होंने महल के बाग़चे में एक झाड़ी के अन्दर गिरा दिया और दूसरा मय गोंद के जाकर रानी को दिया। रानी ने उसी दम अनार का एक दाना निगल लिया और एक दाना बब्बू को जो कि उसके पास था दिया, ताकि गोंद की बू से उसे ज़हर न चढ़ जाय। गोंद को रानी ने एक सोने की डिब्बी में बन्द करके रख लिया।

    रानी से जब छुट्टी पाई, कौए सीधे राजा की लड़की के कमरे की खिड़की का दौड़े, वहां उन्होंने तोते को पाया और उसे ज़हरीले, गोंद और अनारों का सब हाल सुना दिया। उन सभी को यकीन हो गया कि अब राजा की लड़की को दुबारा ज़हर देने की तदबीर की जावेगी और उस तदबीर को बेकाम करने के लिये उन्होंने भी तजवीज़ की। कौए उस अनार को जो कि वह जंगल से लौटती दफ़ा बाग़चे में एक झाड़ी में गिरा पाये थे, उठा लाये, तोते ने उस में एक छेद करके एक दाना आप खा लिया और फिर उस अनार को

    राजा की लड़की के पास ले गया। लड़की एक कोने में बैठी हुई रो रही थी। तोते ने इशारे से ज़ाहिर किया कि वह एक दाना अनार का खा ले। राजा की लड़की का जी उसके खाने को न चाहा क्योंकि अनार का रंग ठीक मैंडक के चमड़े का सा था और देखने में बिलकुल अच्छा न था। लेकिन तोते ने इतने इशारे और इतनी खुशामद की कि अख़ीर को लड़की ने एक दाना निगल लिया। बाद इस के अनार को तोते ने लड़की के बिस्तर के तले छिपा दिया। लेकिन वह उसे मुशकिल से छिपाने पाया था कि दरवाज़े की कुन्दी खुलने की आवाज़ आने से उसे अपने तई भी छिपाना पड़ा। और बब्बू गुलाम एक रोटी और एक लोटे में पानी लिये हुए अन्दर आ पहुंचा। वह इन चीज़ों को लड़की के आगे रख कर चला गया। उसके जाते ही तोता चरपाई के नीचे से झट निकल आया। राजा की लड़की को इस वक्त बहुत ही भूख और पियास लग रही थी, पर वह खाने और पीने से डरती थी, हालां कि तोता यह जान कर कि अनार का दाना खाने के सबब से ज़हर कुछ असर नहीं कर सकेगा, इशारों से बहुत कुछ ज़ाहिर कर रहा था कि वह उस रोटी को शौक़ से खाले लेकिन जिस वक्त कि वह यह इशारे कर रहा था, यानी कभी रोटी में चोंच मारता था, कभी पानी आप चोंच से पीता था, कभी ज़ोर से चीख़ता था, और इसी किस्म के बीसों दूसरे इशारे कर रहा था, दोनों कौए जादू की अंगूठी चोंच में लिये हुए आ पहुंचे।

    राजा की लड़की ने जो अंगूठी को छूआ, चिड़ियों की बोली फिर समझने लगी। उन्होंने अंगूठी फिर हाथ लगने का हाल बयान किया, कहा कि जिस वक्त बब्बू को उन्होंने रोटी लेकर कमरे के अन्दर आते देखा था खिड़की की राह

    से बाहर उड़ गये थे और रानी की खिड़की के ऐन सामने एक पेड़ पर जा बैठे थे। रानी उस वक्त खिड़की के पास बैठी हुई अपने बच्चे से खेल रही थी कि बच्चे ने अंगूठी को उसकी उंगली से खींच लिया और खिड़की के दरवाज़े की तरफ़ लुढ़का दिया और वह बाहर की तरफ़ ज़मीन पर जा पड़ी। रानी यह देख वहां से फ़ौरन उठकर किसी गुलाम को उसके उठा लाने का हुक्म देने के लिए चली गई। इतने में कौओं ने झट अंगूठी को बगैर किसी को मालूम हुए ले लिया और राजा की लड़की के पास दाखिल किया। राजा की लड़की को बड़ी खुशी हुई कि अब वह फिर अपनी प्यारी चिड़ियों से बखूबी बात चीत कर सकती थी और जब उसने ज़हरीले गोंद और उसका असर रफ़ा करने वाले ज़हरमोहरे का हाल सुना, उस चपाती के खाने में कुछ भी खौफ़ न किया और खूब अच्छी तरह खा कर अपने विस्तर पर सो रही।

    सुबह को बब्बू देखने आया कि लड़की मरी या नहीं और उसे बड़ा तअज्जुब हुआ जब कि उसको ज़हर देने के बाद भी जीता पाया। वह वहां से चुपका ही लौट गया और रानी से जो कि उस वक्त बाग़ में अपनी खिड़की के नीचे अंगूठी की तलाश में लगी हुई थी हाल बयान किया। इधर तोते ने एक कौए को रानी और बब्बू की बात चीत सुनने को रवाना किया और कौआ चालाकी से रानी के पास एक झाड़ी में छुपकर उनकी गुत्फगू सुनने लगा। रानी को लड़की के ज़हर के असर से बच जाने पर बहुत ही तअज्जुब हुआ और बोली कि लड़की के पास ज़रूर कोई तिलिस्म या जादू होगा और बब्बू को हुक्म दिया कि “कुछ हो, तू आज रात को उसे महल के उत्त छज्जे पर ले जाकर जो कि ऐन झील के ऊपर है वहां से नीचे झील में ढकेल दे और गर्दन में एक पत्थर बांध

    २ दीजो जिससे जल्द डूब जाय।। सुबह को मशहूर कर देंगे कि लड़की रात में मर गई और झूठ मूठ की लाश बना कर नदी में बहा देंगे।

    कौए ने रानी का यह बुरा इरादा अपनी साथिन चिड़ियों को फ़ौरन सुना दिया और वह सब राजा की लड़की से कहने के पेश्तर ही ताकि वह ख़ौफ़ न खा जाय, आपस में सलाह करने लगीं। जब उन्होंने अपनी तजवीज़ों को पक्का कर लिया, तब उसको भी रानी का इरादा जाहिर किया। पर उसको पूरा इतमीनान करा दिया कि कुछ दहशत की बात नहीं है, वह उसकी जान बचाने की पूरी कोशिश करेगी।

    महल की दीवार के बाहरी तरफ़ ठीक झील के किनारे पर एक झोपड़ी में एक गरीब माहीगीर यानी धींवर रहता था जो अपना जाल महल की दीवार के ऐन नीचे डाला करता था। राजा की लड़की जब कभी अपने साथियों के साथ महल के छज्जे पर बैठती थी उसके मछली पकड़ने का तमाशा देखा करती थी और अकसर उसकी मछलियां ख़रीद कर एक रस्सी से ऊपर खींच लेती थी और उसी तरकीब से उनकी कीमत भी पहुंचा देती थी। इस वजह से उस बूढ़े के साथ उसका गोया एक पूरा दोस्ती का रिश्ता हो गया था। तोता भी इस काम में राजा की लड़की के साथियों में शरीक हुआ करता था क्योंकि उसे मछली का बड़ा शौक था और उसकी और मछुए की खूब अच्छी तरह मुलाक़ात थी। पस इस बुड्ढे के पास तोता और दोनों कौए अंगूठी को लेकर पहुंचे और अंगूठी उसकी उंगली में पहना कर जिससे कि वह उनकी बोली समझ सके उससे बोले कि “ऐ नेक बुड्ढे, राजा की लड़की की जो कि तेरी इतनी बड़ी मुरब्बी है आज जान ख़तरे में है और उसके बचाने के लिये तेरी मदद

    दरकार है"। उस नेक आदमी ने फ़ौरन वादा किया कि वह राजा की लड़की के बचाने के लिये जो काम होगा बड़ी खुशी से करेगा, बल्कि अपनी जान का भी कुछ ख़याल न करेगा। तब उसको सब हाल सुना दिया गया और उसने तोते के सब हुक्मों को बजा लाने का इकरार किया।

    तोते और माहीगीर ने अब इस बात का मंसूबा किया कि राजा को लड़की को बचाने की सब से अच्छी क्या तरकीब होगी। बुड्ढे ने कहा कि "मैं अपना जाल ठीक छज्जे के नीचे डाल दूंगा ताकि जिस वक्त लड़की गिराई जाय, उसी में आ जाय" और उसे डूबने से बचाने के लिये जो तजवीज़ सोची गई वह यह थी कि माहीगीर ने एक पुराने जाल से बहुत से काग (यानी एक निहायत हल्की लकड़ी के छोटे २ टुकड़े जो कि अकसर जालों में लगाये जाते हैं) निकाले और तोते और कौओं से कहा कि "इन को एक एक करके राजा की लड़की के पास ले जाओ और उससे कहो कि इनके छोटे २ हिस्से कर के एक डोरी में पिरो लेवे और फिर उस डोरी को अपने बदन पर चारो तरफ़ इस तौर से लपेट ले कि उसकी एक जाकट बन जाय। इस जाकट के बाइस राजा की लड़की का बदन पानी के ऊपर तैरता रहेगा, बावजूद उस पत्थर के जो कि रानी और बब्बू को उसकी गर्दन से बांधने का मंसूबा करते हुए तुमने सुना है"। सिवा इसके माहीगीर ने एक और भी हिफाज़त का काम किया कि एक तेज़ चाकू तोते के ज़रिये से राजा की लड़की के पास पहुंचा दिया और कहला भेजा कि वह उसे अपनी आस्तीन के अन्दर छिपा रखे और अपनी गर्दन से पत्थर काटने के काम में लावे।

    जब यह तजवीज़ तै हो गई, तोता मय जादू की अंगूठी और काग के टुकड़े के राजा की लड़की के पास पहुँचा और

    कौए भी जितने काग उनसे चल सके लेकर उसके पीछे हुए और वह तीनों वफ़ादार चिड़ियां लड़की के पास कागों के पहुंचाने में बराबर लगी रहीं जब तक कि उसके पास उतने काग हो गये जितने दरकार थे। राजा की लड़की ने कागों को काट २ कर एक मज़बूत डोरी में पिरो लिया और फिर माहीगीर ने जैसा कहला भेजा था वैसा ही किया, यानी उनको अपने बदन से खूब लपेट लिया और ऊपर से कुर्ती पहन ली। जब यह सब हो चुका शाम का अंधेरा चारों तरफ़ छा गया था और बब्बू ने आकर राजा की लड़की से कहा "मेरे साथ आओ"।

    बब्बू राजा की लड़की को हाथ पकड़ कर बाग़ के रास्ते झील के ऊपर वाले छज्जे पर ले गया। बाग़ में होकर जब वह दोनों जा रहे थे उसने एक बड़ा पत्थर उठा कर एक रूमाल में लपेट लिया और जब वह छज्जे पर पहुंचे झट वह रूमाल राजा की लडकी की गर्दन में बांध दिया और साथ ही मुंह पर हाथ रख दिया ताकि लड़की चिल्ला न सके और बस उसे उठा कर झील में गिरा दिया। लेकिन वह इसके लिये पेश्तर ही से तैयार थी। जिस वक्त कि बब्बू ने उसे नीचे गिराने को उठाया उसने एक लमहे में चाकु से रूमाल को काट डाला और पत्थर और वह दोनों पानी में एक साथ ही गिरे। पत्थर तो झील की थाह में चला गया मगर राजा की लड़की अपनी ज़ाकट की बदौलत पानी की सतह पर तैरती रही। इस वक्त बिलकुल अंधेरा था। बब्बू ने जो उसके गिरने की आवाज़ सुनी और उसके बाद पूरी ख़ामोशी देखी समझा कि लड़की झील की तह में दाख़िल हुई और रानी को अपनी बदकारी का हाल सुनाने चला गया। उधर ऐन छज्जे के नीचे माहीगीर अपनी कश्ती लिये छुपा हुआ था और उसका जाल ऐसे तौर से फैला हुआ था कि जो चीज़ छज्जे से गिरे उसी के अन्दर आ जावे। पर जो उसने पानी में आवाज़ सुनी आहिस्ता से जाल खींचना शुरू किया और थोड़े ही अर्से में तैरती हुई राजा की लड़की को कश्ती पर लाकर उसमें बैठा लिया और वहां से चुपके ही नाव को अपनी झोपड़ी तक ले जाकर लड़की को उसके अन्दर पहुंचा दिया। उसे वह एक छोटे से कोठे में ले गया जहाँ कि एक आराम का बिस्तर उसके लिए सजा हुआ था और जहाँ कि तोता और दोनों कौए पहले ही से पहुंच गये थे। यह वफ़ादार चिड़ियां अंधेरे में राजा की लड़की के साथ छज्जे तक आई थीं और जब उन्होंने देख लिया कि लड़की कश्ती में साफ़ पहुंच गई वह वहां से उड़ कर माहीगीर की झोपड़ी में आ गई थीं। राजा की लड़की फ़ौरन बिस्तर पर चली गई क्योंकि उसके कपड़े सब भीग गये थे और ज्यों ही वह विस्तर पर पहुंची माहीगीर उसके वास्ते एक रिकाबी में कुछ रोटी और मछली खाने को ले आया जिसमें से थोड़ी आप खा कर और थोड़ी सी अपनी तीनों चिड़ियों को दे कर राजा की लड़की सो रही।

    अध्याय ४

    सुबह को माहीगीर राजा की लड़की को झोपड़ी में बन्द छोड़ मछली पकड़ने चला गया और कौए महल की तरफ़ को यह देखने कि वहां क्या हो रहा है, उड़ दिये। वहां उन्होंने देखा कि बड़ी दौड़ धूप मच रही है। राजा की लड़की के मरने की खबर फैल गई है, बड़ा मातम हो रहा है और लाश को नदी में प्रवाह देने के लिये तैयारियां हो रही हैं। वह वहां से उड़ कर फिर झोंपड़ी पर आये और तोता लड़की से कहने लगा “ऐ मेरी प्यारी, अब तू यहां बेखटके रह सकती है जब तक कि हमको कोई मौक़ा तेरे नाना के पास भाग चलने का न मिले, क्योंकि रानी ने यही समझा है कि तू पानी में डूब गई, और माहीगीर का हम पूरा ऐतिबार कर सकते हैं"। जब कि तोता यह कह रहा था माहीगीर मय एक टोकरी मछलियों के आ पहुंचा। उनमें से उसने अच्छी २ राजा की लड़की के लिये छांट ली और बाकी लेकर शहर में बेचने को चला गया। मछलियों के बेचने से जो दाम उसे मिले उनसे उसने खाने की दूसरी चीजें खरीदी और राजा की लड़की के वास्ते सादा लिबास बनाने के लिये कुछ कपड़ा मोल लिया।

    पहली रानी ने लड़की को सीना पिरोना सिखा दिया था, इससे उसने थोड़े ही अर्से में एक साफ़ पोशाक अपने लिए तैयार कर ली जैसी कि ग़रीबों के बालक पहना करते हैं, क्योंकि बुड्ढे माहीगीर और तोते ने सोचा कि ग़रीबी लिबास में वह ज़ियादा बचाव से रहेगी। उन्होंने उससे यह भी कह दिया कि तू घर के भीतर ही रह जिससे कोई तुझे देख और पहचान न सके। लेकिन माहीगीर के झोपड़े के पिछवाड़े एक छोटा सा बाग़चा था जिसमें उसे जाने की इजाज़त थी। वह अपना वक्त घर का काम काज करने, जालों की मरम्मत करने (जो कि उसे माहीगीर ने सिखा दिया था) और चिड़ियों के साथ खेलने में बिताने लगी। हर रोज़ माहीगीर मछली पकड़ने जाता था और जो दाम उसे उनके बेचने से मिलता था उससे घर के लिए ज़रूरत की चीजे मोल ले आता था। यों हर बात में उनका गुज़र कुछ दिनों तक अच्छी तरह चला। लेकिन जब उमदा मछलियों का

    मौसिम गुज़र गया और उसे अपने पेशे में कम कामयाबी होने लगी तो ख़र्च की तकलीफ़ पेश आई। फलों का मौसिम भी ख़तम हो गया था, इससे कौए कोई फल नहीं ला सकते थे। एक रोज़ माहीगीर को एक भी मछली न मिली और घर यों ही लौट आया। उस वक्त घर में सिर्फ़ एक मोटी रोटी का टुकड़ा था। राजा की लड़की और वह उसे खाने को बैठने जाते थे कि दोनों कौए खिड़की की राह उनके पास आ पहुंचे। हर एक की चोंच में एक एक अशर्फी थी जो कि उन्होंने ज़मीन पर रख दी, और फिर राजा की लड़की से उनके पाने का हाल कहने लगे कि “हम दोनों महल के बाग़ में सब तरफ़ चक्कर लगाते फिरे कि कहीं कोई फल बचा हुआ हो तो ले चले और जब थक गये तो सुस्ताने के लिए एक पुरानी चिमनी की चोटी पर जा बैठे। चिमनी की नली चौड़ी और कम नीची थी। उसमें जो झांका तोतले कोई चीज़ चमकती सी नज़र आई। हममें से एक नीचे उतर गया। देखा कि वहां सरकारी खज़ाना है और रुपयों अशर्फीयां और जवाहिरात के चारों तरफ़ गंज लगे हुए हैं। उसने वहां दूसरे को भी बुला लिया और दोनों अपनी चोंच में एक एक अशर्फ़ी लेकर ऊपर उड़ आये और वहां से सीधे यहां आये। बुड्ढा सोने को देख कर बहुत खुश हुआ और कहनेलगा कि यह ज़र असल में राजा की लड़की ही का है क्योंकि अगर राजा को मालूम होता कि मेरी लड़की को ख़र्च की ज़रूरत है तो वह इसका हज़ार गुना ख़ुशी से भेज देता। पस वह अशर्फीयां लेकर फ़ौरन बाहर गया और खाने का सामान और जिन चीज़ों की ज़रूरत थी ख़रीद लाया। जब तक ख़र्च उनके पास रहता वह बड़े आराम से रहते और जब चुक जाता कौए राजा के ख़ज़ाने से और ले आते। एक दिन राजा की लड़की फुलवाड़ी में अकेली खेल रही थी, उसने ऊपर को जो निगाह की तो देखा कि एक कंजरी बागीचे की नीची दीवार पर झांक रही है। जैसे ही उस औरत को मालूम हुआ कि मुझे लड़की ने देख लिया है उसने सिर झुका कर सलाम किया और बड़े अदब और आजिज़ी से अपना हाथ लड़की की तरफ़ चूमने लगी-फिर उसने यों अर्ज़ की कि “ऐ प्यारी बेटी, मुझे थोड़ा सा कुछ खाने को दे, मैं भूख के मारे मरी जाती हूं"-लड़की फ़ौरन घर के भीतर दौड़ गई और एक टुकड़ा रोटी का लाकर उसे दीवार के पास से देने लगी कि कंजरी ने झट एक कपड़ा उसके सिर पर डाल दिया और उसके चेहरे के चारों तरफ लपेट कर कि वह देख या बोल न सके उसकी बांड पकड़ कर दीवार के ऊपर होकर खींच लिया। फिर उसे लबादे में लपेट कर गठरी की तरह अपनी पीठ पर डाल लिया और कह दिया कि अगर तू शोर करेगी तो तेरा गला काट डालूंगी। लड़की को इस हालत में वह औरत बहुत दूर ले गई और लड़की बेचारी का लबादे के अन्दर दम घुटने लगा। अख़ीर को जब उसे उतारा और लबादे खोल डाला उसने अपने तई एक जंगल में पाया जहां कि कंजरों का एक बड़ा कुनबा पड़ा हुआ था। वह लोग ज़मीन पर लकड़ियों से आग जला रहे थे। दो तीन छोटे से ख़ेमे गड़े हुए थे और कई एक गधे पास ही चर रहे थे। जो औरत राजा की लड़की को वहां ले गई थी उससे बोली कि "तू रो मत, तुझको कोई तकलीफ़ न दी जायगी। तुझे किसी बड़े शहर में ले जायंगे और वहां किसी अमीर के हाथ बेच देंगे जिसके यहां तू ज़िंदगी भर सुख और चैन से रहेगी। लेकिन अगर तू यहां से भागने की कोशिश करेगी या अपनी मदद

    के लिये किसी को पुकारेगी तो मार डाली जोयगी। जब वह बुढ़िया लड़की से यों कह चुकी कंजरों ने अपने देरे उखाड़ डाले और गधों पर सब असबाब लाद कर फ़ौरन वहां से चल दिये। राजा की लड़की को उन्होंने एक गधे की पीठ पर कि जिस पर उनका बिस्तर लदा हुआ था बैठा दिया। उस पर वह बड़े आराम से बैंठी चली गई, पर बहुत डरी हुई और रंजीदा थी।

    वह चारों ओर निगाह करती जाती थी कि उसके कौए कहीं दिखाई दे पर वे कहीं नज़र नहीं आये। उसे यह भी डर था कि कंजर कहीं उसकी अंगूठी न चुरा लें, इस लिए उसने मौका पाकर उसे अपने सिर के बालों की तह में छिपा लिया। वह लोग सूरज छिपने के कुछ देर बाद तक चलते रहे और फिर एक अलहदा जंगल में ठहर गये, जहां कि उन्होंने आग जलाई और देरे गाड़ दिये। वहां उन्होंने खूब अच्छी तरह ब्यालू की और राजा की लड़की ने भी की और फिर वह एक तम्बू में सो रही।

    राजा की लड़की बड़े सवेरे ही जाग गई और जब देखा कि कंजरी और उसके बालक जो उसके देरे में सोये थे अभी नहीं उठे हैं और देरे का दरवाज़ा भी खुला है तो आहिस्ता पैर रखती हुई बाहर निकल आई और चाहा को भाग जाऊं पर एक बड़े कुत्ते के गुर्राने की आवाज़ ने जो कि देरे के दरवाजे से कुछ दूर पर बैठा हुआ था उसे आगे बढ़ने से रोक दिया। उसने देखा कि अगर मैं भागने की कोशिश करूँगी तो कुत्ता मेरी तरफ़ ज़रूर दौड़ेगा या भूकं कर सब कंजरों को जगा देगा, इस लिए वह चुपकी उसी जगह खड़ी रही और कुत्ता भी चुपका बैठा रहा, सिर्फ़ उस पर अपनी

    निगाह जमाये रहा। उस वक्त एक जंगली कबूतर की आवाज़ उसके कान में पड़ी। यह आवाज़ उसी पेड़ पर से कि जिसके नीचे वह खड़ी हुई थी आ रही थी उसने ऊपर जो निगाह की तो उस चिड़िया को ठीक अपने सिर के ऊपर एक शाख पर बैठा देखा और फ़ौरन अंगूठी अपने जूड़े में से निकाल कर उसकी तरफ़ दिखलाई और उतर आने का इशारा किया। उसका हुक्म पाते ही कबूतर तुरन्त उसकी बांह पर आ बैठा। उससे आहिस्ता से ताकि कंजर न सुन ले लड़की ने कहा कि “तू बुडढे माहीगीर के घर जाकर तोते और कौओं से मेरा सब हाल कह दे" और अपने सिर में से एक लट बालों की काट कर अपनी निशानी दे दी कि जिससे माहीगीर समझ जाय कि यह मुखबिर सचमुच राजा को लड़की ही ने भेजा है। कबूतर उसी दम उड़ दिया और लड़की ख़ेमे में जाकर फिर लेट रही और अंगूठी को बड़ी खबरदारी के साथ सिर के बालों के अन्दर छिपा लिया। धीरे धीरे कंजर उठे और खाना बनाया; बाद उसके सब चीज़ों को लाद कर फिर कूच शुरू किया। राजा की लड़की कभी कभी कंजरों के बालकों के साथ पैदल चलती थी और जब थक जाती थी गधे पर सवार हो लेती थी। जो कंजरी उसे चुरा लाई थी उससे अक्सर बातें करती चलती थी और कहती थी कि “अगर किसी बड़े शाहज़ादे ने लाहौर में जहां को कि हम चल रहे हैं तुझे ख़रीद लिया तो तू उसके यहां कितने आराम से रहेगी"। यों वह दिन भर चले, सिर्फ़ खाने और सुस्ताने के लिये, जब कि धूप निहायत तेज़ हो, कहीं पेड़ों की छांह में ठहर लें। सूरज छिपने के थोड़ी देर पहले वह एक जंगल में पहुंचे जहां कि एक पानी का झरना था-उन्होंने इस जगह गधों से असबाब उतार कर रख दिया और रात को बसने का सामान किया। राजा की

    लड़की को यहां पर इधर उधर अकेली घूमने की इजाज़त दे दी गई, पर जो कुत्ता कि सवेरे उसके पहरे पर था इशारे से सिखा दिया गया था कि लड़की के साथ रहे। वह अच्छी तरह समझता था कि मेरा यह काम है कि लड़की भाग न जावे, क्योंकि जभी वह जल्दी जल्दी चलने लगती या बहुत दूर चली जाती वह गुर्राने लगता था।

    अख़ीर को वह जंगल की हद के पास एक पेड़ के नीचे बैठ गई और वहां बैठी हुई जिस तरफ़ से आई थी उस तरफ़ को देख रही थी कि उसे ऐसा मालूम हुआ कि एक अजीब सूरत की चिड़िया उसकी तरफ़ उड़ती हुई आ रही है। ज्योंही वह नज़दीक आई उसने देखा कि वह एक चिड़िया नहीं है, बल्कि तीन चिड़ियों का झुंड है और जब वह और भी पास आ गई तो मालूम हुआ कि उसका प्यारा बुड्ढा तोता और दोनों कौए हैं। कौए एक लकड़ी के दोनों सिरों को अपने पंजों से पकड़े हुए थे और तोता उसे बीच में अपनो चोंच में थामे हुए था, यों कुछ उस लकड़ी के सहारे और कुछ अपने परों की मदद से वह बुड्ढा पखेरू अच्छी तरह उड़ा चला आ रहा था। ज्योंही ये चिड़ियां लड़की के इतनी पास आ गई कि उसकी आवाज़ सुन सके वह उन्हें पुकारने लगी और जब तोते ने उसका बोल सुना लकड़ी को छोड़ दिया और लड़की की तरफ ज़ोर से उड़ा और उसके कंधे पर बैठ गया और बार बार बोसा लेने लगा-कौओं ने भी लकड़ी गिरा दी और नीचे आकर एक झाड़ी पर जा बैठे जहां कि कुत्ता न पहुंच सके और राजा की लड़की से फिर मिलने की खुशी जाहिर की। उन्होंने सब कह सुनाया कि किस तरह जंगल के कबूतर ने माहीगीर के घर पर जाकर लड़की का संदेशा दिया और फिर किस तरह वह फ़ौरन वहां से उड़ कर रास्ते में जो

    चिड़ियां मिलीं उनसे पूछते हुए कि कहीं राजा की लड़की को तो नहीं देखा बग़ैर बहुत दिक्कत के उसके पास आ पहुंचे। और कहा कि जब हम चलने लगे बुड्ढा माहीगीर समझ गया कि लड़की की तलाश में जाते हैं और बालों की लट जो तूने भेजी थी उसने ले ली और उससे समझा कि तू जीती है और हिफ़ाज़त से है।

    जब वह इस तरह प्यार के साथ अपनी चिड़ियों से बातें। कर रही थी, उसने देखा कि कंजरों के दो बालक जो कि उससे उम्र में कुछ बड़े थे और चुपके से उसके पीछे पीछे पाकर झाड़ियों की आड़ में छिप रहे थे यकायक झपट कर निकल आये और उन्होंने झट तोते को पकड़ लिया और उसे लेकर अपने देरों की तरफ़ दौड़ चले और चिल्लाते जांय कि एक तोता पकड़ा है। राजा की लड़की उनके पीछे पीछे रोती हुई और तोते को मांगती हुई दौड़ी पर उन्होंने कुछ ध्यान न दिया। लेकिन जैसे ही वह देरों के पास पहुंचे और कंजर लोग देखने को दौड़े कि क्या बात है तोते ने उनकी उंगलियों को अपनी चोंच से काटना शुरू किया, यहां तक कि उन्हों ने उसे छोड़ दिया और वह उड़ कर एक पेड़ पर जहां कि वह पहुंच न सकें जा बैठा। कंजरी ने पूछा क्या है? राजा की लड़की ने कहा कि "वह तोता मेरा है और मेरा पता लगाता हुआ मेरे पास आया है-इन लड़कों ने वह मुझसे छीन लिया है," और इतना कह कर खूब रोने लगी-और कहा कि “सिर्फ़ यह तोता ही मेरा दुनियां में एक दोस्त है" और मिन्नत की कि वह उसे मिल जाय। इस पर बढ़िया बोली-"अच्छा, अगर तू अच्छी तरह रहेगी और रंज न करेगी कि जिस्से उमदा और मोटी ताज़ी मालूम पड़े जब कि हम तुझे लाहौर में बेचने के लिये ले जायं तो तेरा तोता तुझको मिल जायगा"-

    फिर उसने उन बालकों से कह दिया कि वह तोते से न बोलें तब तोता पेड़ से उतर आया और लड़की के साथ रहने लगा। दोनों कौए हमेशा क़रीब ही कहीं बने रहते थे कि ज़रूरत पड़ने पर काम आवें।

    उस रात को सोने के पेश्तर वह कंजरी जंगल में से कुछ पत्ते तोड़ लाई और उन्हें एक बरतन में उबाल डाला और उनके अर्क़ से राजा को लड़की का चिहरा और बाहे और टांगे धो दी जिससे कि उसका रंग ठीक कंजरों का सा गंदुसी यानी गेहुआं हो गया और कहने लगी-"बस मेरी प्यारी, अब तू कंजरी समझी जायगी-अगर लोग तेरा खूबसूरत गोरा चिहरा देखते तो वह शायद ख़याल करते कि तू हम में से नहीं है और हमें तुझको अपने साथ न रखने देते"-जब राजा को लड़की बिस्तर पर गई तोता उसके पास सोया और सोने के पेश्तर उसने उसे दिलासा दी और समझाया कि कंजरों से उसे डरना न चाहिये क्योंकि वह जरूर उसके साथ ख़ातिर से पेश आवेंगे ताकि वह बिकने के वक्त अच्छी मालूम हो और उन्हें उसकी अच्छी क़ीमत मिले।

    और ऐसा ही हुआ। कंजर उससे बड़ी मिहर्बानी से पेश आये और उसे बड़ी ख़ातिर से रक्खा। वह कई रोज़ तक सफर करते रहे- रात को अपना देरा किसी अलहदा जगह में कर लिया करें कि जहां आम लोगों का आना जाना बहुत न होता हो। राजा की लड़की अक्सर दोनों कौओं को ऊपर उड़ते देखती थी पर कुछ ध्यान नहीं देती थी, क्येंकि डर था कि कंजर लोग ताड़ न जायं। एक दिन दोपहर के बाद जब कि वह सब छांह में सो रहे थे राजा की लड़की को तोते ने कान में अपनी चोंच से नोच कर जगा दिया। जैसे ही उसने आंखे खोली देखा कि दोनों कौए पास ही झाड़ी में

    ज़ोर से कांव कांव कर गुल मचा रहे हैं कि “शेर शेर, जागो जागो!" तोते ने कहा-"कंजरों को जगा दे, नहीं तो शेर अभी हम सब के ऊपर आ जायगा"। राजा की लड़की झट उठ खड़ी हुई और जितने ज़ोर से उससे हो सका चिल्लाने लगी-"शेर शेर, जागो जागो!" और कंजर जल्द जाग गये।

    इस वक्त राजा की लड़की ने शेर की आंखों को एक झाड़ी के नीचे से चमकते हुए देखा, मगर जैसे ही वह उसके ऊपर झपटने को हुआ, एक कंजर ने एक झूठा सूखे सरकंडों का चूल्हे से जला कर शेर के मुंह पर फेंक दिया जिससे कि वह ऐसा डर गया कि बड़ी आवाज़ से गरजता हुआ उलटा भाग गया और मैदान में कुलांच मारता हुआ थोड़ी ही देर में नज़रों से गायब हो गया।

    दूसरे दिन उन्होंने उस बन को छोड़ एक बयाबान में पैर रक्खा और उसी रास्ते दिन भर चले। वहां कोई जानवर या पेड़ न मिला, क्योंकि वह बड़ा भारी रेत का मैदान था जिसे रेगिस्तान कहते हैं और जाबजा ऊंट और घोड़ों की और एक मुक़ामा पर आदमी की ठटरियां रेत में आधी गड़ी हुई देखने में आई! वह जहां तक उनसे हो सका तेज़ी से चले क्योंकि जानते थे कि करीब से करीब कुआ भी उनसे बहुत दूर है और उस पर न पहुँचे तो ज़रूर प्यास से मर जायंगे। उन्हें पहले ही बहुत प्यास लगी हुई थी और बेचारे गधे भी मारे प्यास के घबरा रहे थे कि एक ताड़ के पेड़ों का झुंड दूर नज़र आया और बुढ़िया कंजरी ने राजा की बेटी से कहा कि खुश होवे क्योंकि कुआ उन्हीं पेड़ों के नीचे है। गधे भी समझ गये मालूम होते थे कि कुआ पास है, क्योंकि उन्हों ने अपने कान ऊंचे कर लिये और रेंकने और तेज़ कदम चलने लगे। लेकिन वहां तक पहुँचने में देर लगी और पहुँचने

    तक सब इतने थक गये कि बड़ी मुशकिल से कुआ पकड़ा। जो कंजर सब ने पहले कुए पर पहुंचा उसने भीतर झांख के देखा तो उसमें ज़रा भी पानी नज़र न आया। कूआ सूखा था! अब ये लोग निहायत ना-उम्मेद हुए, क्योंकि जानते थे कि कई कोसों तक उसके बाद कोई कुआ नहीं है। प्यास के मारे जान निकली जाती थी और एक कदम चल नहीं सकते थे। तोते को इस वक्त बहुत फ़िक्र और अंदेशा हुआ, लेकिन उसने देखा कि दोनों कौए एक ताड़ के पेड़ पर बैठे हुए हैं, वह उनके पास उड़ गया और उनसे बोला कि "तुम चारों तरफ़ उड़ कर देखो कि कहीं पानी का ठिकाना है या नहीं, नहीं तो राजा की लड़की ज़रूर प्यास से मर जावेगी"। कौए सब तरफ़ देख आये पर पानी कहीं नज़र न पड़ा, लेकिन उन्होंने कहा कि "एक जगह पर जो यहां से दूर नहीं है कई तरबूज़ पड़े हुए हमने देखे हैं"। तोते ने राजा की लड़की से जो एक पेड़ के नीचे अकेली लेटी हुई थी कहा कि उठ के कौओं के पीछे पीछे जावे। कौए उसे जहां तरबूज थे वहां ले गये। कंजर उस वक्त निहायत थक गये थे और अपनी मुसीबत में ऐसे मर रहे थे कि किसी ने ध्यान न दिया कि लड़की कहां जाती है और न किसी ने उसे जाने से रोका। वह बड़ी मुशकिलों से उस गरम रेत में पैदल तरबूजों तक पहुंची, और पहुंचते ही पहला ही तरबूज़ जो उसके हाथ लगा फाड़ डाला और उसका ठंडा और मीठा रस पीकर प्यास बुझाई और कुछ अपनी तीनों चिड़ियाओं को भी पिलाया। बाद इसके जब उसे ताज़गी और ताक़त आ गई, दो तरबूज़ और तोड़े और उन्हें लेकर फुर्ती के साथ कुए पर लौट आई। बुढ़िया कंजरी तरबूज़ों की सूरत देख कर ऐसी खुश हुई कि राजा की लड़की को उसने ज़ोर से छाती से

    लगा लिया और मारे बोसों के हैरान कर दिया-वह दोनों तरबूज़ कंजरों के बालकों को बांट दिये गये, फिर राजा की लड़की ने उन सब को तरबूज़ों का रास्ता बता दिया और सभी ने खूब ही उन फलों की दावत उड़ाई, यहां तक कि उस जगह ज़मीन पर सब तरफ़ तरबूज़ों के टुकड़े पड़े नज़र आते थे। बेचारे कुत्ते बहुत प्यासे मरे थे, जब उनको तरबूज़ दिये गये और वह उनके पानी को जीभ से चाटने लगे तो एक अजब कैफ़ियत मालूम होती थी। देरा तरबूजों के पास ही डाला गया और दूसरे रोज़ सुबह को, बाद तरबूज़ों को दूसरी ज़ियाफ़त के, वहां से कूच हुआ और गधों पर जितने आ सके तरबूज़ लाद लिये गये, क्योंकि डर था कि शायद दूसरे पड़ाव का कुआ भी सूखा निकले, लेकिन वह सूखा न था। वह लोग बाकी रेगिस्तान को बग़ैर किसी मुसीबत के तै कर गये। अब वह कंजर राजा की लड़की पर दुचंद मिहर्ब्बन थे, क्योंकि उसने उनकी जान बचाई थी; और कंजरी ने उस से कहा कि “मैं तो तुझे छोड़ दूं लेकिन मेरा खाविंद मना करता है, मगर तू अंदेशा मत कर, मैं ऐसा करूंगी कि तू सिर्फ़ किसी नेक बीबी के हाथ बेची जायगी जो तेरी खूब परवरिश करेगी और तुझे खुश रक्खेगी"।

    थोड़े दिनों बाद यह लोग लाहौर के क़रीब आन पहुंचे और उन्हें उस शहर की मीनारें और बुर्ज और आलीशान मकान दिखाई देने लगे। शहर के दरवाजे से कुछ हट कर दरखों के नीचे इन्होंने अपना डेरा किया। कंजरी ने एक सफ़ेद बुकनी अपने सन्दूक में से निकाल कर थोड़े पानी में मिला लड़की को उससे नहला दिया तो लड़की फिर वैसी ही गोरी हो गई जैसी कि बूटी का रंग लगने से पहले थी।

    अध्याय ५

    दूसरे रोज़ सुबह को कंजरी उसे शहर के अंदर ले गई। तोता बदस्तूर उसके बाजू पर बैठा हुआ साथ गया। बहुत सी गलियों में गुज़रते हुए वह वहां पहुंचे जहां कि लौंडी-गुलामों का बाज़ार था। उस जगह बहुत से गुलाम एक बड़े बरामदे में ज़मीन पर बैठे हुए थे, और बीच में एक सफेद डाढ़ी वाला बुड्ढा एक कालीन पर बैठा हुआ हुक्का पी रहा था। सामने उसके हिसाब की किताबे यानी बही खाते और कलम दावात रक्खी हुई थीं। राजा की लड़की को कंजरी उसके पास ले गई और कान में उससे कुछ कहा। फिर लड़की को वह दालान के एक किनारे ले गई जहां कि बहुत सी लड़कियां, कोई गोरी और कोई काली, बैठी हुई थीं। उनके ऊपर एक तुंद-मिज़ाज बुढ़िया तैनात थी; वह राजा की लड़की के साथ एक तोता देख कर बहुत बड़बड़ाई, लेकिन कंजरी ने उससे कह दिया कि तोता और लड़की दोनों साथ बिकेंगे और कहा कि अगर लड़की न बिकी तो मैं शाम को आके उसको ले जाऊंगी और उसे बुढ़िया को सपुर्द कर आप चली गई।

    उस बेचारी बच्ची को जब वह इस तरह पर गैरों के हाथ में छोड़ दी गई बहुत डर और रंज हुआ और ज़मीन के ऊपर दूसरे गुलाम बालकों के साथ ऐसी जगह बैठ गई जहां उसपर हर एक की नज़र न पड़े। तोते को उसने गोदी में बैठा के अपने कपड़े के अन्दर छिपा लिया इस डर से कि कोई उसे उससे ले न ले। कई शख्सों ने जो कि लौंडी ख़रीदने आये उसकी तरफ़ देखा और क़ीमत पूछी, लेकिन बुड्ढे ने जो दाम मांगा वह न दे सके। अख़ीर को एक बीबी जो

    ३ चिहरे से गुस्से वाली मालूम होती थी वहां होकर गुज़री" और राजा की लड़की को देख कर उस बुड्ढे के पास क़ीमत दरयात्फृ करने गई। जब यह उस निगहबान बुढ़िया ने देखा तो कहने लगी कि "मैं चाहती हूं कि यह बीबी तुझे न खरीदे क्योंकि यह शहर में सब से बदमिज़ाज औरत है। सिर्फ़ गये हत्फे की बात है कि इसने एक ग़रीब छोटी उम्र की हबशी लौंडी की अपने बुरे बरताव से ऐसी हालत कर दी कि वह उसके घर की चहार दीवारी डांक कर भाग जाने की कोशिश में ज़मीन पर गिर पड़ी और मर गई"। यह सुन कर राजा की लड़की बोली-"अजी, मिहर्बानी करके मुझे उसके हाथ मत बिकने देना"-बुढ़िया ने कहा कि “जहां तक मेरा बस चलेगा मैं ऐसा नहीं होने दूंगी, मगर वह बुड्ढा अगर चाहेगा तो बेच डालेगा" तब लड़की ने कहा-"ख़ैर, लेकिन इतना तो तुम मेरे लिए करना कि बग़ैर उस कंजरी के जाने हुए मैं इस औरत के हाथ न बिकने पाऊं, क्यों कि मैं ने एक दफ़ा उसकी और उसके सारे घर वालों की जान बचाई थी, इससे मुझे यकीन है कि वह मुझे उस बेदर्द औरत के पास न जाने देगी"-यह सब बात चीत तोते ने सुन ली और लड़की के लबादे के अन्दर से सिर निकाल के उसके कान में कहा कि “मैं अभी उड़ के जाता हूं और कंजरी को लाता हूं" और यों कह कर सीधा बाज़ार के दरवाज़े की तरफ़ उड़ा और वहां से मकानों के ऊपर होता हुआ शहर के उस फाटक पर पहुंचा कि जिसमें होकर वह सब आये थे। वहां से थोड़ी ही दूर पर उसने कंजरों का डेरा पाया। वह सीधा बुढ़िया कंजरी के पैरों के पास उतर के चोंच से उसके घांघरे का दामन खींचने लगा और फिर ज़मीन पर परों को फट-फटाता हुआ शहर के फाटक की तरफ़ चलने लगा और चुह-

    चुहाअट मचाने और अपने सिर से हर तरह के इशारे करने लगा कि कंजरी उसके साथ चले। कंजरी समझ गई और उसके पीछे पीछे फाटक तक चली गई। तोता उसके आगे आगे उड़ता जाता था और कभी किसी जगह बैठ जाता था। यों वह बाज़ार तक पहुंचे और वहां क़दम ही रक्खा था कि उन्होंने उस बद मिज़ाज बीबी का राजा की लड़की का हाथ पकड़े हुए नाते देखा। लड़की बेचारी रोती आती थी और बाज़ार के फाटक के पास लोगों की भीड़ लग गई थी जो कि उस औरत को लानत देते थे और हल्यारी कहके तरह तरह के नाम रखते थे, और कहते थे कि अफ़सोस है यह लड़की इसके हाथ आ गई क्योंकि यह इसे ज़रूर मार डालेगी जिस तरह कि इतने और लौंडी गुलाम मार डाले हैं। जैसे ही राजा की लड़की ने, कंजरी को देखा एक बारगी अपने तई उस बद बीबी से छुड़ा कर कंजरी की गोदी में चली आई और उससे मिन्नत करने लगी कि उसे उस ख़ौफ़नाक औरत के हाथ न बिकने दे। कंजरी को रहम आया और उसने लड़की को दिलासा दी कि ऐसा नहीं होने पावेगा, लेकिन बीबी बोली-"मैं तो इसे ख़रीद भी चुकी हूं और क़ीमत भी दे चुकी हूं, देख यह रसीद है" और अपनी कुर्ती से एक टुकड़ा काग़ज़ को निकाल कर दिखलाने लगी कि तोता यकायक सारी भीड़ के ऊपर से उड़ता हुआ आकर झट उसके हाथ से कागज को छीन ले गया और सब की नज़रों से गायब हो क़रीब की एक मीनार में जा घुसा जहां उसने रसीद को छुपा दिया और फिर वहाँ से आकर बाज़ार के दरवाज़े के ऊपर बैठ गया जहां से कि वहां जो कुछ हो रहा था देख सके। इस वक्त शोरो गुल इतना बढ़ मया था कि कोतवाल जिसका मकान पास ही था सुन कर साथ अपने सिपाहियों के

    वहां पर आन पहुंचा और दर्याफ करने लगा कि इस सब" झगड़े का क्या बाइस है। किसी ने कुछ कहा, किसी ने कुछ। उस बोबी ने कहा कि यह लड़की मैंने मोल ले ली है और कंजरी ने कहा-"नहीं, मैंने इसे नहीं बेचा," लोग जो वहां जमा थे कहते थे कि अफ़सोस है अगर इस बदज़ात हत्यारी ने लड़की को खरीद लिया है। कोतवाल ने सब को अपने सामने बुलवाया और उस बीबी से कहा-"अगर तुमने इस लड़कों को खरीद लिया है तो रुपयों की रसीद दिखलाओ"-वह बोली कि "रसीद मेरे हाथ से एक तोता छीन ले गया है और न जाने वह कहां उड़ गया है। कोतवाल ने कहा- मैं इस बात का यकीन नहीं कर सकता, और अगर तुम रसीद नहीं दिखला सकोगी तो मैं लड़की को कंजरी ही के हवाले कर दूंगा"। बीबी ने फिर वही कहा जो पहले कहा था, मगर सब बेफ़ायदा हुआ। जिन लोगों ने तोते को नहीं देखा था उन्होंने कुछ न कहा। बस लड़की कंजरी को मिल गई और वह बीबी बुरा मुंह बनाये अपने घर गई। उस वक्त उसका चिहरा और भी बुरा हो गया था क्योंकि लौंडी उसके हाथ से निकल गई और रुपया भी गया।

    कोतवाल ने झगड़े का फ़ैसला ऐन अपने मकान के नीचे गली में किया था। जैसे ही कि लड़की कंजरी को दी गई कोतवाल के घर से एक काली लौंडी ने आकर कंजरी से कहा कि कोतवाल की बीबी साहिबा उससे कुछ कहना चाहती हैं। कंजरी लड़की को लिये हुए लौंडी के साथ भीतर गई और कोतवाल की बीबी के सामने पेश हुई। बीबी छज्जे पर अपनी लड़की के साथ जो उमर में राजा की लड़की के बराबर थी बैठी हुई थी। उसकी लड़की ने राजा की लड़की को देख लिया था और उसकी सूरत पर लुभा कर अपनी मां

    से कहा था कि उसे ख़रीद ले। सौदा फ़ौरन हुआ। बीबी ने बहुत अच्छी क़ीमत लगाई और राजा की लड़की ने कोतवाल की बेटी और उसकी मां को सूरत शकल से इतना पसन्द किया कि कंजरी से कहा कि उसे उन्हीं के यहां बेच दे। कंजरी ने ऐसा ही किया और अपना रुपया लेकर रवाना हुई। और राजा की लड़की से कह गई कि "तू अच्छे लोगों के हाथों बिकी है और उनके यहां सुख से रहेगी"। उसके चले जाने के बाद दोनों लड़कियां छज्जे पर आके लोगों की भीड़ को जाते हुए देखने लगी कि तोता जो बाज़ार के दरवाज़े पर बैठा हुआ सब हाल देखता रहा था राजा की लड़की को छज्जे में देख उसके कंधे पर आ बैठा-कोतवाल की बेटी को यह देख कर बड़ा तअज्जुब हुआ, लेकिन राजा की लड़की ने जल्द तोते का सारा हाल सुना दिया और उसे अपने पास रखने की इजाज़त मांगी जो कि फ़ौरन मिल गई। दोनों लड़कियों में आपस में बहुत मुहबत हो गई और दोनों साथ, साथ बड़े सुख से रहने लगीं। एक ही साथ खेलती और खाती, एक ही सबक़ पढ़तीं, एक ही कमरे में सोती और हालांकि राजा की लड़की हक़ीक़त में कोतवाल की बेटी की लौंडी थी, उसके साथ बहन का सा बर्ताव किया जाता था। थोड़े दिनों के बाद राजा की लड़की ने अपना सारा असली किस्सा उसे सुना दिया, बल्कि तिलिस्माती मुँदरी का भेद भी बता दिया। एक मर्तबा रात के वक्त बाद खाने के तोते ने राजा की लड़की से कहा-“ऐ प्यारी, मैं समझता हूं कि बिहतर हो कि तेरे नाना को ख़बर कर दी जाय कि तू कहां है, वह तेरे लिए बहुत फ़िक्र करता होगा। कल सुबह मैं दोनों कौओं को जो रोज़ रात के वक्त पड़ौस के मंदिर के बुर्ज में आकर रहते हैं तेरे नाना के पास तेरी ख़बर देने को

    भेजूंगा और यह भी पुछवाऊंगा कि तेरा नाना तेरे लिये क्या चाहता है"। राजा की लड़की ने कहा “अच्छा" और दूसरे रोज़ सवेरे ही एक ख़त लिख कर तोते के हाथ दिया। तोते ने उसे कौओं के हवाले किया और ताकीद कर दी कि बहुत जल्द उसे गंगोत्री पर जाके बुड्ढ़े योगी को दें और उसका जवाब लावें। बुड्ढ़ा योगी अपनी दोहती के बाबत सचमुच, बहुत फ़िक्रमन्द हो रहा था और चाहता था कि किसी तरह उसकी खबर मिले कि एक रोज़ शाम को दोनों कौए उसे नज़र आये और उन्होंने उसे लड़की की चिट्ठी दी। योगी ने पढ़ कर उसका जवाब लिख दिया। और कौए अपनी थकावट दूर करने को वहां एक दिन ठहर कर लाहौर की जानिब को फिर उड़ दिये और सीधे उन दोनों लड़कियों के रहने के कमरे के अंदर दाख़िल हुए। योगी की चिट्ठी यह थी-

    "मेरी प्यारी दोहती, तुझे मैं ने कभी नहीं देखा लेकिन तेरी मां के इस दुनिया से चले जाने से मैं तुझे दुचंद प्यार करता हूं। मुझे बड़ी खुशी हुई कि तू इतनी तकलीफ़ो और ख़तरों के बाद खुशहाल है और नेक शख्सों के साथ है। तेरे लिये शायद यही बिहतर होगा कि तू अपनी नौ-उम्र सहेली के साथ जहां अब है वहीं रहे। लेकिन अगर कभी कोई बात ऐसी हो जावे कि जिससे तू वहां न रह सके और जिसमें तुझे तेरा वफ़ादार तोता सलाह और मदद न दे सके तो मेरे पास फ़ौरन फिर ख़बर भेजना"।

    दोनों लड़कियां बड़ी खुशी से एक साथ रहने लगी और दोनों में बहुत मुहब्बत हो गई। कोतवाल और उसकी बीबी को भी लड़की का असली हाल मालूम हो गया कि वह एक राजा की बेटी है और वह उसके साथ निहायत मिहर्बानी और इज्ज़त से पेश आने लगे। लेकिन उन्होंने दोनों लड़कियों

    से कह दिया कि यह सारा हाल बिलकुल पोशीदा रक्खें ताकि कश्मीर की रानी को लड़की की ख़बर न हो जावे कि वह इस बेचारी के पीछे फिर पड़े। और यह मस्लहत समझी गई कि राजा की बेटी चांदनी के नाम से पुकारी जावे जिस नाम से कि वह लौंडी के तौर पर ख़रीदी गई थी। कोतवाल की बेटी का नाम दयादेई था।

    अध्याय ६

    एक रोज़ जब कि दोनों लड़कियां दयादेई की मां के कमरे में बैठी हुई अपने सीने पिरोने के काम में लगी हुई थीं कोतवाल, जो राजा का दरबार करके लौटा था, वहां चला आया। उसके चिहरे पर उदासी और ग़म सा छाया हुआ था। उसकी बीबी ने दर्याप्फृ किया कि क्या माजरा है तो कहने लगा कि कश्मीर से एक बहुत बुरी ख़बर आई है-वह यह है कि अफ़वाह उड़ रहा है कि वहां के राजा की यकायक मौत हो गई है और रानी ने अपने छोटे बेटे को गद्दी पर बैठा के राज का इंन्तिज़ाम अपने हाथ में ले लिया है। बेचारी राजा की लड़की अपने बाप के मरने की ख़बर सुन कर बहुत रंजीदा और दुखी हुई और अपना ग़म छिपाने को कमरे के बाहर चली गई और उसे दिलासा देने के लिए दयादेई भी उसके पास उठ गई। थोड़े दिनों बाद जब कि कोतवाल की बीबी और यह दोनों लड़कियांँ कमरे की खिड़की के पास बैठी हुई थीं एक बड़ी भीड़ लोगों की गली में आती हुई नज़र आई और जब वह क़रीब आ पहुंची तो उन्होंने देखा कि ज़र्क बर्क कपड़े पहने हुए आदमियों का एक बड़ा गिरोह है, कुछ घोड़ों और ऊंटों पर सवार हैं और कुछ पैदल हैं। उनके दर्मियान एक सांडनी पर

    कि जिस पर ज़री की झूल पड़ी हुई थी वह बदसूरत बब्बू था जो कि इस वक्त ज़ेवर से सब तरफ़ लदा हुआ था। हाथ में उसके सुनहली लिफ़ाफ़े में बन्द एक ख़त था। राजा की लड़की को उसे देख कर बहुत दहशत हुई और वह छिप गई जब तक कि वह काफ़िला वहां से निकल न गया। उस रोज़ जब कोतवाल घर आया पहले दिन से ज़ियादा सुस्त और, रंजीदा मालूम होता था और जब उसकी बीबी ने पूछा कि यह काफ़िला क्या था तो कहाकि कश्मीर की रानी का एलची आया हुआ है, यह उसी की सवारी थी। रानी ने एक बहुत सख्त़ ख़त लाहौर के राजा को लिखा है कि वह खिराज यानी कर दे, वरना लाहौर पर चढ़ाई की जावेगी; और कहा कि राजा ने गुस्से से उस ख़त को फाड़ कर ज़मीन पर फेंक दिया और एलची को हुक्म दिया कि लाहौर से चला जावे। अब दोनों तरफ़ से लड़ाई की तैयारी हो रही है।

    कोतवाल की बीबी और दोनों लड़कियांँ अक्सर खिड़की से, फ़ौज में शामिल होने के वास्ते जाती हुई पलटनों को देखा करती थीं। उस वक्त कभी कभी तोता भी उनके साथ रहा करता था, क्योंकि हालांकि वह बुड्ढ़ा हो गया था उसे सिपाहियों की पलटन देखने का बड़ा शौक था और जब वह पलटन के ढोल और झांझ की आवाज़ सुनता अपने परों को फुला लेता और खुशी के मारे चीख़ उठता। एक रोज़ सब से आख़िरी पलटन के निकल जाने के बहुत देर बाद जब कि वह सूनी गली को देख रहे थे तोता एक सुस्त आवाज़ से कहने लगा-“मैं चाहता हूं कि इन सबजंगी जवानों की जो कि हमारे वास्ते लड़ने को गये हैं कुछ ख़बर मालूम हो,” और फिर यकायक खुश होकर बोला-"आह, मैं कैसा बेवकूफ़ हूं कि कौओं को बिलकुल भूल गया, कौए आसानी से सब ख़बर

    ला सकेंगे" यों कह के फ़ौरन वहां से उड़ दिया और कौओं को ढूंढ कर उन्हें फ़ौज के पीछे, लड़ाई की ख़बर लाने को, रवाना किया।

    इस के तीसरे दिन शाम को दोनों कौए खिड़की की राह भीतर आ दाख़िल हुए। थके हुए और डरे हुए से थे। राजा की बेटी ने उन्हें कुछ खाने को और पानी पीने को दिया। खा कर और सुस्ता कर, जो कुछ उन्होंने देखा था उसका बयान करने लगे। कहा कि "दोनों तरफ़ की फ़ौजों में बड़ी भारी लड़ाई हुई जिसमें कि लाहौर के राजा की हार हुई और उसकी फ़ौज भी तीन तेरह हो गई। अब रानी की फ़ौज लाहौर की तरफ़ आ रही है और कल यहां पहुंच जायगी"। राजा की बेटी ने यह हाल कोतवाल की बीबी से जब कहा तो वह बहुत रंजीदा हुई और घबराई और अपने खाविंद को जो कि उस वक्त कचहरी में था बुलवा कर सब हाल सुना दिया। जब कोतवाल ने पूछा कि उसे कैसे मालूम हुआ तो कह दिया कि "जादू के ज़ोर से दर्याफृ कर लिया, मगर मैं जियादा नहीं बतला सकती"। पहले तो कोतवाल ने उसका यकीन नहीं किया और समझा कि उसे सपना हुआ होगा; लेकिन जब देखा कि वह बहुत ख़ौफ़ कर रही है, उसकी बात को सच समझा। वह यह भी जानता था कि उसकी बीबी दाना और नेक है। वह फ़ौरन राजा की सभा में मशवरा करने को गया कि अब क्या करना मुनासिब है। वहां से वह बहुत देर बाद रात को वापस आया और यह ख़बर लाया कि यह सलाह तै पाई है कि अगर शिकस्त की अफ़वाह सच्ची है तो रानी की अताअत कबूल कर लेनी चाहिये ताकि शहर लुटने से बच जाय। कोतवाल ने यह ख़बर राजा की लड़की को फ़ौरन सुनाई और कहा कि “रानी की फ़ौज कल इस शहर पर कब्ज़ा कर

    लेगी इस लिये तुम्हारा यहां रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं। हम तुम्हें किसी हिफ़ाज़त की जगह भेजे देते हैं"।

    जब कि कोतवाल की बीबी राजा की लड़की से बातें कर रही थी और राजा की लड़की अपने मिहर्बानों से जुदा होने के ग़म और खौफ से रो रही थी कोतवाल को राजा का बुलावा आया। राजा उस वक्त लड़ाई के मैदान से भाग कर अपने महलों में आ सभा के दर्मियान सुलह की शर्तों का बिचार कर रहा था। सभा बहुत थोड़ी देर तक रही और कोतवाल जल्द वापस आया और यह ख़बर लाया कि दुश्मन ने यह शर्त की है कि अगर इस वक्त उसे बहुत सा रुपया दिया जाय और आगे को खिराज देने का क़रार किया जाय तो शहर पर चढ़ाई न की जायगी। लेकिन रुपया जो मांगा था इतना ज़ियादा था कि वह तमाम शहर का ज़र, ज़ेवर और दूसरा असबाब देने से पूरा हो सकता था। कोतवाल कहने लगा कि "अपना सारा माल दे डालने से हम सब बिल-कुल ग़रीब हो जायंगे लेकिन हमारी जान और शहर बच जायगा"। इस बात को सुन कर दयादेई बोली–"तो ऐ पिता, चांदनी को अब दूसरी जगह भेजने की ज़रूरत नहीं है, यहां अब उसको कुछ खौफ़ न रहेगा"-यह सुन कर कोतवाल बहुत उदास हुआ और कहने लगा कि "हमारे सारे पड़ोसी जानते हैं कि हमने बहुत रुपया देकर एक लौंडी ख़रीदी है, इस लिये हमारे असबाब के साथ वह भी ले ली जायगी, क्योंकि माल के वास्ते शहर में हर एक घर की जब तलाशी होगी हम उसे घर के भीतर कहां छिपा सकेंगे और शहर के बाहर भी कहीं नहीं भेज सकते क्योंकि शहर को फ़ौज के सिपाही सब तरफ़ घेरे पड़े हैं"। इतना कह कर कोतवाल बाहर चला गया और उनका सोच उसकी बात को सुनकर

    और भी बढ़ा। मगर तोता जो उनकी बात चीत सुनता रहा था अपनी बैठक से उतर कर राजा की लड़की के कंधे पर आ बैठा और उसका बोसा लेकर बोला "प्यारी रो मत, मुझे एक ऐसी जगह मालूम है जहां तू छिप सकती है। हमारे दोनों कौए बाग़ के पिछवाड़े वाले पुराने खंडहर में रहते हैं। इस खंडहर की एक मीनार साबित है उसकी चोटी पर जो एक छोटी कोठरी सी है उसमें तू छिप सकती है। लेकिन उसके जीने का निचला हिस्सा गिर गया है, इस लिए सिर्फ सिड्ढी के ज़रिये तू वहां पहुंच सकती है। मैं देखता हूं कि इस कमरे के सामान में कई एक रेशम की रस्सियां लगी हुई हैं, अगर यह हमारे मिहर्बान दोस्त इन में से कुछ रस्सियों की एक सिड्ढी बना दें तो दोनों कौए उसे लेकर मीनार की चोटी तक उड़ जायँगे- मैं तब उसका एक सिरा लटकती हुई सिड्ढी में लपेट के अटका दूंगा और दूसरा सिरा तेरी तरफ़ गिरा दूंगा लेकिन सिड्ढी इतनी हलकी बननी चाहिये कि कौए उसे उड़ा ले जा सकें"-राजा की लड़की ने यह सारी बात कोतवाल की बीबी से कह दी और वह तीनों जनी रस्सी की सिड्ढी बनाने लगी। तोता एक धागे का छोटा गोला अपने पंजे में लेकर मीनार के जीने की बची हुई सिढ्डियों में सब से निचली सिड्ढी तक उड गया और धागे के ऊपर के सिरे को थाम कर गोला उसने नीचे को छोड़ दिया और साथ ही आप भी उसके पीछे उड़ता हुआ नीचे उतर गया और उसे पंजों से उठा कर राजा की लड़की के पास ले गया और उसे बता दिया कि उसमें से कितना खुल गया था जिससे मालूम हो गया कि सिड्ढी में कितनी लम्बी रस्सी लगेगी। दयादेई छज्जे में बैठ कर गली की तरफ़ देखने लगी कि जब राजा के अफ़सर उस घर की तलाशो के वास्ते आवे उसे मालूम हो

    जाय। लेकिन उन्हें बहुत से मकानों को पहले तलाशी लेनी थी और शाम का अंधेरा होने के पहले ही कोतवाल की बीबीं और राजा की लड़की ने रेशम की रस्सी से एक खासी काफ़ी लम्बी सिड्ढी बना ली जो इतनी मज़बूत थी कि लड़की का बोझा बरदाश्त कर सके। जैसे ही अंधेरा हुआ कोतवाल की बीबी और वह दोनों लड़कियांँ तोते के साथ पोशीदा तौर से बाग़ में गईं और वहां एक ऊंची जगह पर चढ़ गई जहां से कि मंदिर के खंडहर में पहुंच सकती थीं। जो कि बाग़ की चहारदीवार से बिलकुल मिला हुआ था। बाग़ में उन्हें एक लकड़ी की सिड्ढी मिल गई जिसके ज़रिये से वह बाग़ के बाहर उतर गई। तोते ने कौओं से पहले ही दिखवा लिया था कि बाग़ में कोई नहीं है और वह जगह सब तरह महफूज़ है। जब वह मीनार के नीचे पहुंचे राजा की लड़की ने रेशम की सिड्ढी जो कि उसने एक छोटी लकड़ी पर लपेट ली थी कौओं को दे दी और उन्हें उसे लेकर ऊपर उड़ जाने को कहा। दोनों कौओं ने दोनों सिरे लकड़ी के अपने पंजों में पकड़ लिये और ऊपर ले जाने की कोशिश की लेकिन हालां कि रेशम की रस्सी इतनी पतली थी सिड्ढी का एक बहुत छोटा बंडल बन गया था, तो भी उन बेचारी चिड़ियों के लिये वह बहुत भारी था इस से वह फटफटाती हुई नीचे आ पड़ीं। तोता उनको मदद देने चला, लेकिन वह ऐसा भद्दा उड़ने वाला था कि उन के बीच में आ गया और मुआमिला और भी बिगाड़ दिया। तब वह बड़े नाउम्मेद हो गये और बाग़ को लौटने ही को थे कि उन्हों ने एक बड़ी चीख़ ठीक अपने सिर के ऊपर सुनो और जो ऊपर को नज़र की तो देखा कि एक बड़ा परन्द बुर्ज की तरफ़ उड़ा जा रहा है और जाकर उसकी

    चोटी पर बैठ जाता है। वह परन्द एक डरावनी शकल का उल्लू था। उसे देख कर तोता बोला "तिलिस्माती अंगूठी कहां है, मुझे दो" और राजा की लड़की से अंगूठी को छीन कर झट उल्लू के पास पहुंचा और अंगूठी उसे छुला दी जिस से उल्लू बड़ी हैरत में आया। तोते ने तब उसे तेज़ी के साथ हाकि माना आवाज़ से रेशम की सिड्ढी को मीनार की चोटी के ऊपर ले जाने का हुक्म दिया। उल्लू हुक्म को फ़ौरन बजा लाया और फिर बड़े अदब से सिर झुका कर कहने लगा- "कुछ और हुक्म?" "कुछ नहीं, सिवा इसके कि तुम रात भर मीनार पर पहरा दो और अगर कोई ख़तरे की बात नज़र नावे तो फ़ौरन हम को आगाह कर दो" तोते ने इतना कह कर उसे वहां से बरखास्त कर दिया-तोता तब उस रस्सी की सिड्ढी को टूटे जी़ने के नीचे के हिस्से तक ले गया और वहां उसने उसका एक सिरा एक कील से जो वहां गड़ी हुई थी लपेट दिया और दूसरा सिस नीचे ज़मीन पर गिरा दिया। राजा की लड़की और उसकी साथिनें वहां खड़ी थीं, उनसे अब उसने बिदा लो और उस रेशमी सिड्ढी पर आहिस्ता २ चढ़ कर ऊपर पहुंच गई-और फिर सिड्ढी को ऊपर खींच लिया। उसकी दोस्त साथिनें उसे उसकी तीनों चिड़ियाओं के साथ वहां छोड़ कर अपने मकान को वापस गईं। राजा की लड़की यह न देख सकी कि वह जगह कैसी है, अपने लबादे से जो कि साथ लाई थी बदन लपेट कर पड़ रही और जल्द ही उसे नींद आ गई-

    सुबह के वक्त जब सूरज की किरनें दीवार के एक दरवाजे से उस कोठड़ी में पहुंची तब वह लड़की जागी और उसने देखा कि वह कोठड़ी छोटो और गोल है और उसके चारों ओर छज्जा है और एक तरफ़ उसके पत्थर के फर्श में

    ज़ीने में उतरने को रास्ता है जिससे कि वह वहां चढ़ी थी-वह छज्जे पर जाने से डरती थी क्योंकि वहां से दिखलाई दे सकती थी और कोतवाल की बीबी और तोते ने उससे कह दिया था कि अगर उसे वहां कोई देख लेगा तो अच्छा न होगा इस लिये उसे वहां पर लोगों की नज़र से बचना चाहिये। कौए खाने की तलाश में गये हुए थे और तोता राजा की लड़की के साथ कुछ कलेवा कर के कि जिसके वास्ते पहले दिन वह कुछ चीज़ें लेता आया था, बाग़ में यह देखने को उड़ गया कि वहां क्या हो रहा है। वहां उस वक्त बड़ा हंगामा हो रहा था-राजा के अफ़सर कोतवाल के घर में क़ीमती चीज़ों की तलाश कर रहे थे। कोतवाल ने अपने तमाम सोने चांदी के ज़ेवर, जवाहिरात, नक़दी और जो कुछ उसके घर में क़ीमती माल था सब उनके सामने रख दिया था, उसके घोड़े घुड़साल से मंगाये जाकर सामने खड़े किये गये थे और सारे गुलाम और लौंडियां आंगन में एक पंगत में खड़ी की गई थीं कि अफ़सर जिनको पसन्द करें ले जायं। जो कुछ उन्होंने ले जाने लायक समझा उसे इकट्ठा कर के वह जा रहे थे कि एक लौंडी उनमें से कि जिन्हें वह ले जा रहे थे अफ़सरों से कहने लगी-"अजी, एक और लौंडी इस घर में कहीं छुपी हुई है वह हम सब से ज़ियादा क़ीमती है लेकिन इनको वह बहुत पसन्द है इस लिये इन्होंने उसे छुपा दिया है"-अफसरों ने पूछा “उसका नाम क्या है?"-लौंडी ने जवाब दिया "उसे हम तोते वाली कहते हैं, क्योंकि उस के पास हमेशा एक वाहियात बुड्ढा तोता रहता हैं" और तोते की तरफ़ हाथ कर के कहा- देखो तोता वह है और तोते वाली भी ज़रूर कहीं नज़दीक ही होगी”–उस लौंडी ने यह सब जलन के मारे बता दिया था-कोतवाल अफ़सरों से

    कहने लगा-"मेरे यहां एक ऐसी लौंडी है तो सही, लेकिन मुझे मालूम नहीं वह कहां है, मेरा घर सारा खुला हुआ है तलाश कर लो"-यह बात सच थी कि उसे नहीं मालूम था कि राजा की लड़की उस वक्त़ कहां थी, उसकी बीबी ने उससे सिर्फ इतना ही कहा था कि वह एक महफूज़ जगह को चली गई हैं और ज़ियादा उसने सुनना नहीं चाहा था। अफ़सरों ने घर में उसे हर जगह तलाश किया लेकिन तलाशी फुजूल हुई। अख़ीर को उन्होंने कहा कि “वह भाग गई होगी और शायद जल्द ही पकड़ ली जायगी"-यों कहते हुए वह अपनी लूट का माल लेकर चले गये, सिवा चंद बुड्ढ़े गुलामों और लौंडियों के सारा असबाव और माल ले गये। जैसे ही वह चले गये दयादेई अपनी मां के पास दौड़ के बोली “ऐ मा, चांदनी अब तो आ सकती है?” उसकी मां ने जवाब दिया-"नहीं अभी वह जहांँ है वहांँ यहांँ से ज़ियादा बचाव से है-उसका यहांँ लाना तब तक मुनासिब नहीं जब तक कि दुश्मन की फ़ौज यहाँ से न चली जाय"-दयादेई यह सुन कर बड़ी उदास हुई, मगर कहने लगी-"अच्छा मुझे रोज़ रात को उसके पास हो आने दिया करो"-मां ने यह मंजूर कर लिया, लेकिन कहा कि जब कोई ख़तरा नज़र न आता हो तब तू ऐसा कर सक्ती है"। इसपर उसने जवाब दिया "अजी, वह प्यारी चिड़ियां निगहबानी रखेंगी, और हम पर यकायक हमला न हो सकेगा"-उसने तब राजा की लड़की को तोते के ज़रिये से एक रुक़्का भेजा कि "मैं अंधेरा होने पर तुझ से मिलने आऊंगी और साथ कुछ खाने की चीजें लाऊंगी"।

    अध्याय ७

    क़रीब २ सारे दिन राजा की लड़की अपनी कोठड़ी ही मैं रही, कभी तोते से बात चीत कर लेती थी, कभी सीने लगती थी, और कभी एक किताब जो अपने साथ ले गई थी पढ़ने लगती थी। अख़ीर को उसने एक उकसा हुआ सा पत्थर कोठड़ी की दीवार में देखा, और उसको जो अपनी तरफ़ खींचा तो वह गिर पड़ा और उसकी जगह एक चौकोर छेद हो गया जिसमें से वह कोतवाल के मकान का बाग़ देख सकती थी, इससे वह निहायत खुश हुई और इस बात को जान कर उसे और भी ज़ियादा खुशी हुई कि वह उस सूराख़ से उस कमरे की खिड़की को देख सकती थी जिसमें दयादेई और वह सोया करती थीं-रात आने तक वक्त बहुत बड़ा मालूम पड़ा, लेकिन अख़ीर को शाम का अंधेरा शुरू हुआ और तोता, बड़े मियां उल्लू और दोनों कौओं को खंडहर के चारों तरफ़ ख़बर्दारी रखने का हुक्म देकर, दयादेई के लेने को जो कि अपनी मां के साथ बाग़ में टीले पर खड़ी हुई थी उड़ कर उनके पास पहुंचा। तब दयादेई से उसकी मां ने कहा-"मैं तेरे लिए यहीं ठहरी रहूंगी-तोते को अभी मेरे पास भेज दीजो, जब तेरे लौटने का वक्त होगा मैं उसे तेरे बुलाने को भेज दूंगी"-दयादेई अब उस सिड्ढी से बाग़ के पार उतर गई और मीनार के नीचे जा पहुंची। तोते के इशारे पर रेशमी सिड्ढी तले गिरा दी गई और दयादेई उस पर चढ़ के ऊपर पहुंच गई; सब तरह की खाने की चीजें एक टोकरी में लिये हुए थी। दोनों लड़कियां एक दूसरे से गले लिपट के खूब मिलीं-बाद थोड़ी देर के टोकरी खोली गई और दोनों ने खूब खाने को खाया, उन्हें भूख भी

    खूब लग रही थी क्योंकि एक दूसरे से मिलने की खुशी में एक ने भी शाम का खाना नहीं खाया था-तोता कोतवाल की बीबी के पास उड़ गया और राजा की लड़की ने दयादेई को दीवार का सूराख़ दिखाया और उससे अपने सोने के कमरे की खिड़की पर अक्सर पाने के लिये कहा ताकि वह उसे देख सके और उसकी तरफ इशारे कर सके। इतने में तोता वापस आया और बोला कि "अब चलने का वक्त है”। दयादेई राजा की लड़की के बहुत से बोसे लेकर अपनी मां के पास लौट आई।

    ख़िराज जो उस शहर से मांगा गया था इतना ज़ियादा था कि उस के वसूल होने में बहुत रोज़ लग गये, क्योंकि बहुत लोगों ने अपनी क़ीमती चीज़े छिपाने की कोशिश की और राजा के अफ़सरों को तमाम मकानों की तलाशी में बहुत वक्त लगा।

    यह सब वक्त राजा की लड़की ने मीनार के ऊपर उस छोटी कोठड़ी ही में अपनी तीनों चिडियाओं के साथ गुज़ारा। वह अक्सर कौओं के ज़रिये से बातों और संदेशे के रुक्के दयादेई के पास भेजा करती थी और दयादेई अपने सोने के कमरे की खिड़की में आ बैठा करती थी जहां कि राजा की लड़की उसे अपनी कोठड़ी की दीवार के छेद से देख सके। और उसमे से अपने हाथ बाहर निकाल कर उंगलियों के इशारे से बात कर सके। वह हाथों को इतना बाहर नहीं निकालती थी कि कोई गैर शख्स़ देख सके, और मीनार पर एक घनी बेल छाई हुई थी जिसके सबब से दयादेई की खिड़की के सिवा और कहीं से वह सूराख नहीं दीख सकता था। तीनों चिड़ियां उसके लिये के दयादेई पास से खाने की चीज़ लाने में भी बहुत कुछ लगी रहती थीं, क्यों दयादेई दो तीन दिन

    तक उसके पास फिर नहीं जाने पाई थी, क्योंकि जल्दी जल्दी। जाने से डर था कि कोई जान जायगा। अब की बार वह वहां कुछ रात गुज़र जाने पर गई, क्योंकि चांद रोशन हो रहा था, उसके छिप जाने तक उसे रुका रहना पड़ा। और वहां उनको बातें करते करते करीब करीब सवेरा हो गया, तब दयादेई गई। उस वक्त राजा की लड़की को इतनी नींद आ रही थी कि वह दयादेई के उतर जाने के बाद रेशम की सिड्ढी को ऊपर खींच लेना भूल गई। सुबह को तोता उससे पहले जाग गया और कौओं को कश्मीर की फ़ौज की ख़बरें लाने के लिये भेज कर आप कोतवाल के घर को, लड़की के वास्ते खाना लाने के लिये, उड़ गया। तोते को गये बहुत देर नहीं हुई थी कि राजा की लड़की को आंख किसी के हंसने की आवाज़ से खुल गई। यह आवाज़ उसके नज़दीक ही सुनाई दी और बेचारी के होश उड़ गये जब उसने एक काली सूरत को ज़ीने से निकल कर अपनी तरफ़ आते हुए देखा। लेकिन वह उस सूरत से खूब वाकिफ़ थी, क्योंकि वह उसी लौंडी की थी जिसने उसका ज़िक्र कोतवाल के मकान की तलाशी के वक्त उसे पकड़वाने की ग़रज़ से राजा के अफ़सरों से किया था। वह लौंडी उसकी हमेशा दुश्मन रही थी।

    वह उससे तनूज़ के साथ कहने लगी-“हये, हये, तोते- वाली, मैं ने आज तुझे पकड़ लिया! मैं अब तुझे जल्द उन लोगों को सपुर्द कर दूंगी जो तुझे पाकर खुश होंगे और मुझे इनाम देंगे"-और फुरती से अंदर आकर राजा की लड़की को पकड़ लिया और उसकी चद्दर फाड़ के उसके दो टुकड़े कर उनसे उसके हाथ पैर बांध दिये-और यह कहती हुई कि "मुझे यक़ीन है तू मेरे लौट आने तक यहां से भाग न सकेगी" डोरी की सिड्ढी के रास्ते नीचे उतर गई और ज़ोर से उसे

    झटका दिया कि वह कील समेत नीचे जा पड़ी। उसको झट पट समेट कर और साथ लेकर वह बदज़ात लौंडी वहां से बड़ी फुरती के साथ दौड़ती हुई चली गई; राजा की लड़की को उसी तरह बंधी हुई पड़ी छोड़ गई। अगर उसके हाथ बंधे हुए न भी होते तो भी अब वह वहां से कहीं नहीं जा सकती थी।

    लौंडी ने राजा की लड़की को वहाँ इस तरह पाया था- वह उस मकान से कि जिसमें पकड़े हुए लौंडी गुलाम रक्खे गये थे किसी तरकीब से उसी रात को भाग आई थी। और मंदिर के खंडहरों में छुपने को जगह ढूंढ रही थी। ढूंढते में उसे मीनार से लटकती हुई वह रेशमी रस्सी की, सिड्डी दिखाई दी; उस पर वह चढ़ गई यह देखने को कि वह ऊपर कहां लगी हुई है, और जब उसने राजा की लड़की को वहां सोता देखा तो फ़ौरन उसके जी में आया कि उसे राजा के अफ़सरों के हवाले कर दे, क्योंकि अलावा इसके कि वह उसले जलती थी वह यह भी जानती थी कि भागे हुए लौंडी गुलामों के पकड़ लाने वालों और पता बताने वालों को इनाम मिलता है और उसे यकीन था कि राजा को लड़की के मानिन्द उमदा लौंडी को पकड़वाने के इनाम में वह सिर्फ़ भाग आने के लिये मुआफ़ ही नहीं कर दी जायगी बल्कि क़ैद से छोड़ भी दी जायगी।

    वह लौंडिया बराबर दौड़ती ही गई जब तक कि उस मकान में न पहुंची जहां कि उसके साथ के लौंडी गुलाम बन्द थे और वहां पहुंच कर दरबान से कहा कि उसे गुलामों के दारोग़ा के पास ले चले; जब वह दारोग़ा के पास पहुंची दारोग़ा उससे बहुत नाराज़ हुआ और भाग जाने के कुसूर पर सज़ा देने को धमकाने लगा, लेकिन वह बीच ही में बोल उठी कि

    "आप मुझे क्या इनाम देंगे अगर मैं आप को एक हज़ार अशर्फी की कीमत की छिपी हुई लौंडी का पता बता दूं"? उसने कहा “अगर तू ऐसा कर सकती है तो तू छोड़ दी जायगी और १० अशर्फी इनाम पाएगी लेकिन अगर तू ने मुझे धोखा दिया तो तेरे पैर के तलुओं पर इतने चाबुक पड़ेंगे कि तू चलने और खड़ी होने के काम की न रहेगी"-वह बोली, "मंजूर, लेकिन देर न कीजिये, मेरे साथ चलिये और अपने साथ एक सिड्ढी, इतनी लम्बी जितनी कि यह रस्सी की सिड्ढी है, लेते चलिये; मैं आप के हवाले उस लौंडी को कर दूंगी जिसे कोतवाल इतना चाहता है और जो हज़ार अशर्फी से कम दाम की नहीं है"-दारोग़ा ने फ़ौरन दो तीन सिपाही मय एक सिड्ढी के लौंडी के साथ किये, और वह उन्हें मीनार की जड़ पर ले गई। उस पर सिड्ढी लगाई गई और एक सिपाही ऊपर चढ़ गया, लेकिन कोठड़ी को उसने खाली पाया, राजा की लड़की का वहां नामोनिशान भी न था, सिर्फ कुछ असबाब था जो कि दयादेई ने उसके आराम के लिये पहुंचा दिया था और कुछ कपड़े की धज्जियां पड़ी हुई थीं जो कई जगह खून से सनी थीं। ये चीज़ वह आदमी नीचे ले आया और खंडहरों में लड़की को हर जगह तलाश कर नाकामयाब हो, वह लोग दारोग़ा के पास वापस गये। दारोग़ा निहायत गुस्सा हुआ और लौंडी को उसे धोखा देने के वास्ते उसके पैर के तलुओं पर कोड़ों की मार लगाने का हुक्म दिया। लेकिन वह ज़ोर से कहने लगो कि-"मैंने धेाखा नहीं दिया है, अगर कोतवाल के घर की तलाशी फिर ली जायगी तो तोते वाली लौंडी वहां ज़रूर मिलेगी, क्योंकि इतने थोड़े वक्त में वह दूर नहीं भाग सकती, ज़रूर उसी के यहां फ़िर आ गई होगी, चाहे जिस तरह से वह खंडहर से निकल गई हो”। जिस वक्त कि यह सब हो रहा था, राजा

    खुद वहां आ पहुंचा, वह अपनी आंखों से देखना चाहता था कि कितने लौंडी गुलाम इकट्ठे किये जा चुके हैं। जब उसने पूछा कि क्या माजरा है तो दारोग़ा ने सब किस्सा सुना दिया। राजा ने जब यह सुना कि कोतवाल की लौंडी छुपा दी गई थी तो बहुत नाराज़ हुआ, और सख़ हुक्म दिया कि जब तक वह लौंडी न मिले कोतवाल की लड़की दयादेई उसके बजाय पकड़ ली जाय और कई सिपाहियों के साथ एक अफ़सर को फौरन राजा की लड़की को तलाश करने के लिये रवाना किया और ताकीद कर दी कि अगर वह न मिले तो दयादेई को पकड़ लावें। हुक्म के मुताबिक़ वह उसी वक्त कोतवाल के मकान पर गये और उसकी और बाग़ की खूब अच्छी तरह तलाशी ली लेकिन राजा की लड़की वहां न मिली। दयादेई और उसकी मां को बड़ा ख़ौफ़ पैदा हुआ कि कहीं राजा की लड़की का मीनार के अन्दर छिपा हुआ होना उन्हें मालूम न हो जावे, लेकिन उनको जल्द मालूम हो गया कि मीनार की तलाशी तो पहले ही हो चुकी थी और वहां वह नहीं मिली थी। इस बात को जान कर उनका ख़ौफ़ कुछ कम हुआ लेकिन जब उन्हों ने लोहू में सने उसकी चादर के टुकड़े सिपाही के पास देखे उन की फ़िक्र कि उस बेचारी पर न जाने क्या नई आफ़त पड़ी होगी, और ज़ियादा बढ़ गई। लेकिन जब उन से अफ़सर ने कहा कि राजा ने दयादेई को पकड़ ले जाने का हुक्म दिया है उनके दिल की हालत क्या हुई होगी कहा नहीं जा सकता और बावजूद दोनों मां बेटियों के रोने चिल्लाने और मिन्नत करने के दयादेई को वह लौंडी बना कर ले गये। जब वह लौंडीख़ाने के आंगन में हो कर अपनी कोठड़ी में पहुंचाई जा रही थी उस ने वहां उस काली लौंडी को देखा जो

    उससे कीना रखती थी-दो सिपाही उसे उसकी बदज़ाती की सज़ा देने के लिए लिये जाते थे, हालांकि दारोग़ा ने वह सज़ा बेइंसाफ़ी से दी थी।

    अध्याय ८

    राजा की लड़की मीनार में जहां कि काली लौंडी उस के हाथ पैर बांध कर उसे पड़ा छोड़ गई थी सिपाही का जो न मिली उसका किस्सा यों है-जिस वक्त वह बेबसी की हालत में कोठड़ी के अन्दर पड़ी हुई थी उसे उस सूराख़ में जिसमें से कि वह दयादेई की खिड़की को देखा करती थी दो बड़ी २ आंखें चमकती हुई दिखाई दीं। पहले तो वह डर गई लेकिन पीछे से वह फ़ौरन समझ गई कि दीवार पर बाहर जो बेल लिपटी हुई थी उसकी एक शाख पर बैठा हुआ, वह उल्लू जो कि मीनार की चोटी पर निगहबानी के लिये मुक़र्रिर था, सूराख़ से भीतर को देख रहा है। उसे उस वक्त अपनी तिलिस्माती अंगूठी की याद आई और जिस हाथ की उंगली में वह उस्को पहने हुए थी वह हाथ किसी तरह उल्लू की तरफ़ करके अंगूठी को उसकी नज़र के सामने कर दिया और उससे कहने लगी-“ऐ उल्लू, इस अंगूठी के लिहाज़ से इस वक्त मेरो मदद कर"-उल्लू ने जैसे ही अंगूठी को देखा और उसकी बात को सुना वह लड़की की खिदमत में अन्दर हाज़िर हुआ और बोला "क्या हुक्म है?" लड़की ने कहा- "मेरे हाथों और पैरों को खोल दे, अगर खोल सके तो"-उल्लू कपड़े के बन्धनों को जिनसे कि वह जकड़ी हुई थी खोल नहीं सकता था लेकिन उसने अपनी नुकीली चोंच और पैने पंजों से उन्हें फाड़ डाला, उसके ऐसा करने से मजबूरन लड़की को कुछ ज़ख़्म आ गई जिस से उसकी चादर के

    टुकड़ों पर खून के दाग़ पड़ गये जिनको कि उस सिपाही ने देखा था जो मीनार पर लड़की को पकड़ने के लिये चढ़ा था। जैसे ही उसके बन्धन अलग हुए वह मीनार से उतर जाने का कोई वसीला ढूढ़ने लगी, लेकिन कुछ नज़र न आया सिड्ढी को तो लौंडी ले ही गई थी-क्या वह वहां से नीचे ज़मीन पर कूद सकती थी? नहीं, नहीं मीनार बहुत ऊंची थी, कूदना अपनी जान को मौत के हवाले करना था-वह यकायक उल्लू की तरफ़ मुखातिब होकर पुकारने लगी “ऐ उल्लू , ऐ उल्लू , क्या तू मुझे किसी तरकीब से यहां से नीचे पहुंचा सकता है, पेश्तर इसके कि मेरे दुश्मन फिर यहां आ सके?” वह उल्लू बड़ी ज़ात का था जो क़रीब क़रीब उक़ाब या गीध के क़द की होती है, मगर वह इतना मज़बूत न था कि उस लड़की के बोझ को अधर में सम्हाल सके, वरना वह उसे अपनी पीठ पर सवार करा के अकेला ही नीचे उतार देता, इस लिये वह बोला-"ऐ प्यारी लड़की ज़रा ठहर जा, मैं अपनी बीबी को बुला लाऊं जो कि इसी खंडहर में रात के जागने की थकावट दूर करने को इस वक्त सो रही है मैं उम्मेद करता हूं कि मैं और वह दोनों मिल कर तुझ को अपने डैनों के सहारे आसानी से नीचे पहुंचा देंगे"-यों कह कर वह छज्जे पर जा बैठा और वहां से ऐसे ज़ोर से चीखा कि तमाम खंडहर गूंज उठा और थोड़ी ही देर में एक मोटी ताज़ी उल्लन परों को फटफटाती हुई छज्जे पर आन पहुंची और कहने लगी-"क्या मामला है, ऐ शौहर, जो आप ने मुझ को इस वक्त दिन में जगाया है?" उल्लू ने जवाब में अपनी चोंच से उस अंगूठी की तरफ़ इशारा किया जो राजा की बेटी अपनी उंगली में पहने हुए थी, लड़की भी उस वक्त छज्जे पर आ गई थी। वह उससे बोला-"अब वक्त खाना

    न चाहिये-एक हाथ से मेरी और दूसरे हाथ से मेरी बीबी की टांगें पकड़ ले, फिर फुरती से उस घने पत्तों वाली झाड़ी पर जो मीनार की जड़ के नज़दीक दिखाई देती है कूद पड़, हमारे डैनों के सबब से तू ज़ोर से गिरने न पावेगी" राजा की लड़की ने फ़ौरन वैसा ही किया-उल्लू और उल्लन की टांगों को ज़ोर से थाम कर छज्जे से झट कूद पड़ी और परों की बड़ी फटफटाहट के साथ झाड़ी की मुलायम शाखो पर बगैर ज़रा भी चोट लगे जा पड़ी, वहां पर उसने उनकी टांगे छोड़ दी और झाड़ी की टहनियों और शाखो को पकड़ती हुई नीचे ज़मीन पर उतर गई, और वहां चारों तरफ़ देखने लगी कि किस तरफ़ को जाना बिहतर होगा कि दुश्मन उसका पीछा न कर सकें। उसी वक्त उसे वह सिपाही जो उसे पकड़ने को खंडहर की तरफ़ आ रहे थे दिखाई दिये। लेकिन उसकी खुशनसीबी थी कि वह उसे देख न पाये; और जिधर से वह आ रहे थे उसकी दूसरी तरफ़ वह फ़ौरन निकल गई और उनकी नज़रों से बचती हुई बड़े ज़ोर से एक छोटी सी गली की मोड की तरफ जो उसे वहां से दिखाई दे रही थी बेतहाशा दौड़ी। उस गली के दोनों तरफ़ बाग़ो की चहारदीवारियां थीं; उस तंग गली में वह थोड़ी ही दूर आई थी कि बांई तरफ़ की दीवार में एक दरवाजे के पास जब पहुंची दरवाज़ा किसी ने आहिस्ता और होशियारी से खोला। उस वक्त वह एक अंजीर के पेड़ की आड़ में छिप गई, जो कि दीवार में उगा हुआ था। उसने देखा कि एक लौंडी उस दरवाजे से निकल कर और चारों तरफ़ ऊपर नीचे देख कर फुरती से गली के सिरे की तरफ़ चली गई-जैसे ही वह नज़र से ग़ायब हुई राजा की लड़की पेड़ की आड़ से बाहर निकल आई और दरवाज़े के पास पहुंच कर उसने देखा

    कि वह पूरी तरह बंद नहीं है; उसने किवाड़ आहिस्ता से खोल लिये और भीतर को झांका तो देखा कि वहां एक बड़ा साबाग़ है जिसमें घने पेड़ लगे हुए हैं और वहां कोई शख़्स नहीं है। उसने सोचा कि इस वक्त यहां छिप जाना बनिस्बत उस गली में जाने के बिहतर होगा, क्योंकि क्या मालूम गली कहां को गई है। बस वह बाग़ के भीतर घुस गई और दरवाज़े को वैसा ही अधखुला छोड़ कर सब से नज़दीक के पेड़ों की कुंज में छिपने को लपकी। वहां पहुंची ही थी कि उसको उस दरवाजे के बंद होने की आवाज़ सुनाई दी और उस तरफ़ को झांकने से मालूम हुआ कि वही लौंडी बाहर से वापस आ कर उसको बंद कर रही है और फिर मकान की तरफ कि जिसकी छत बाग़ के दूसरे सिरे पर दिखाई दे रही थी जा रही है। उसने देखा कि यहां कोई खतरा नहीं है, लेकिन तो भी वह एक सर्व के पेड़ पर चढ़ गई जिसकी घनी डालियों में उसे कोई नहीं देख सकता था। और रात होने तक वहीं छिपी रहने का इरादा कर लिया और मन में कहने लगी कि “रात होने पर मैं कोतवाल के घर चली जाऊंगी, उसकी मिहर्बान बीबी और दयादेई मुझको ज़रूर अपनी पनाह में ले लेंगी, अगर ले सकेंगी तो। सिवा उनके यहां के मैं और कहां जा सकती हूं?"

    दिन बहुत बड़ा मालूम पड़ा और मुशकिल से कटा, अख़ीर को रात आई; मगर राजा की लड़की का आधी रात से पेश्तर वहां से जाने का हियाव नहीं पड़ा, उसने ख़याल किया कि रात ज़ियादा गुज़र जाने पर कोतवाल के घर के रास्ते में किसी से भेट होने का कम डर होगा। इस लिये आधी रात के बाद वह दरख़ से उतरी और बाग़ का दरवाज़ा खोल कर जिस रास्ते आई थी उसी रास्ते खंडहर के पास

    की खुली जगह में पहुंच गई। वहां से अंधेरे में टटोलती हुई कोतवाल के बाग़ की चहार दीवारी की तरफ़ चली और चाहती थी कि किसी तरकीब के दीवार को लांघ जावे और बग़ैर आहट के कोतवाल के मकान के अन्दर पहुंच जावे कि उसे उसके पुराने दोस्त उल्लू उल्लन पंख फटफटाते उस के सिर के ऊपर सितारों को कमजोर रोशनी में दिखाई दिये। उसने उनको पुकारा और पूछा कि कहीं उन्होंने उसका तोता या दोनों कौए तो नहीं देखे हैं-उल्लू दीवार पर बैठ कर बोला-"हां हां, वह तीनों इसी खंडहर में बसेरा कर रहे हैं, और दिन भर चारों तरफ़ तेरी तलाश में उड़ते फिरे थे" लड़की ने मिन्नत की-"ओह, मझे उन के पास ले चलो" उल्लू तुरन्त खंहडर के अन्दर उड़ गया और तोते को अपने पीछे पंख फटफटाते हुए साथ लेकर फ़ौरन फिर हाज़िर हुआ। तोता बड़े जोश के साथ चीख मार कर राजा की लड़की की गोद में उड़ कर जा बैठा और बोला-"ऐ मेरी प्यारी बच्ची, क्या सचमुच तू मुझ को फिर मिल गई, मैं ने तो समझ लिया था कि तू किसी बड़ी मुसीबत में फंस गई है और अब न मिलेगी!” लड़की ने उसको सारा किस्सा सुना दिया कि वह खंडहर से किस तरह भाग गई थी और कहा कि “अब मैं कोतवाल के बाग़ के अन्दर पहुंचने की कोशिश कर रही हूं, मगर तोते ने उसे रोक दिया और बतला दिया कि बजाय उसके वह लोग दयादेई को पकड़ ले गये हैं। यह सुन कर राजा की लड़की को बहुत अफ़सोस और फ़िक्र हुआ और कहने लगी कि "मैं दयादेई के बचाने के लिये अभी अपने तई अफ़सरों के हवाले कर दूंगी," और अपना इरादा पूरा करने को फ़ौरन वहां से चल दी, क्योंकि वह इस बात का खयाल बरदाश्त नहीं कर सकती थी कि

    दयादेई और दयादेई की मां की इस मुसीबत का बाइस वही थी। मगर तोते ने उससे कहा-"अच्छा, मेरी प्यारी, अगर तू इस तरह अपने को ज़ाया करने पर आमादा है, तो मैं भी तेरे साथ चलता हूं, मगर मुझे कौओं से कह आने दे कि वह दोनों इसी खंडहर के आस पास रहें ताकि अगर जरूरत पड़े तो मिल सके। कौओं को इस तरह हिदायत करके तोता लड़की के लबादे के अन्दर आ दबका और वह उसी वक्त वहां से चल दी और नज़दीक की गली के रास्ते सीधी कोतवाल के मकान के दरवाजे पर पहुंची और जोर से उले खटखटाने लगी-कुछ देर बाद एक बुढ़िया लौंडी ने खिड़की से अपना सिर निकाल कर पूछा-"कौन है?"-"मैं हूं चांदनी, मुझे भीतर आने दो"-यह जवाब पाकर लौंडी ने दरवाज़ा खोल दिया और राजा की लड़की के कहने से उसे ज़नाने कमरे में ले गई। वह लौंडी दयादेई की दाई थी, राजा की लड़की को देखते ही वह फूट फूट कर रोने लगी और दयादेई पर जो मुसीबत गुज़री थी सुनाने लगी, लेकिन राजा की लड़की ने कहा कि "मुझको सब मालूम है, लेकिन मेरे सबब से वह इस बिपत को न भोगने पावेगी, मैं अपने को पकड़वाने के लिये आई हूं"-और कहा कि "मुझे दयादेई की मां के पास ले चल"-जब उसके पास पहुंची उस के सीने से लिपट गई और बोली कि "मैं अपने को पकड़वाने और दयादेई को छुड़वाने के लिए आई हूं"। कोतवाल की बीबी उसके बोसे लेने लगी और उसे गले से लगा के रोने लगी, लेकिन उसने राजा की लड़की को अपने इरादे से रोका नहीं, क्योंकि दूसरी कोई सूरत उसकी लड़की के रिहाई पाने की न थी, लेकिन उस वक्त राजा की लड़की कि जिसे दिन भर कुछ खाने को नहीं मिला था और जो कि मिहनत और तक-

    लीफ़ उठाने के बाइस निहायत थक गई थी, फ़र्श पर ग़श में आकर गिर पड़ी। कोतवाल की बीबी ने उसे चारपाई पर लिटा दिया और जब वह होश में आई उसने थोड़ा खाने को मांगा जो कि उसको दिया गया, उस के बाद वह सो गई और सुबह को खूब दिन निकल आने पर उठी। खाने के बाद कोतवाल की बीबी उसे अपने शौहर के पास ले गई और उससे उसके ऊंचे इरादे का बयान किया जिसकी कि कोतवाल ने बड़ी तारीफ़ की। तब उसकी बीबी से बहुत रंज और अफ़सोस के साथ रुख़सत होकर राजा की लड़की कोतवाल के हमराह गुलामों के कैदखाने को रवाना हुई। वहां वह दोनों फ़ौरन गुलामों के दारोगा के पास पहुंचाये गये और कोतवाल उस से अपने आने की ग़रज़ बयान करने लगा। लेकिन उसी वक्त राजा का वज़ीर जो गुलामों का मुआइना करने को आया था वहां आ पहुंचा और दारोगा ने कोतवाल से कहा कि "जो कुछ अर्ज़ करना हो, वज़ीर से करो"। वज़ीर उसका काई दोस्त न था, उसने जब सब हाल सुन लिया, कहा कि दयादेई को छोड़ देना बिलकुल नामुकिन है, क्योंकि ख़िराज इकट्ठा करने में इतनी मुशकिल पड़ रही है कि राजा ने हुक्म दिया है कि लौंडी और गुलाम बनाने लायक जो कोई लड़कियां और लड़के मिलें सब को पकड़ लेना चाहिये, इस लिए दयादेई और यह लड़की दोनों को लौंडियों में शामिल होना पड़ेगा। कोतवाल ने बहुत मिन्नत की और धमकियां भी दी और ग़म और गुस्से में अपनी डाढ़ी नोच डाली लेकिन वजीर पर कुछ असर न हुआ। तब कोतवाल वहां से सीधा राजा के महलों को गया और फ़ार्यद की कि उसकी बेटी को वज़ीर ने लौंडियों में दाख़िल कर दिया है, लेकिन राजा ने जवाब दिया कि क्या

    किया जाय कुछ बस नहीं है, ख़िराज के वास्ते काफ़ी रुपया इकट्ठा करना ज़रूरी है और वह लौंडी और गुलामों के ज़रिये ही से हो सकता है।

    दोनों लड़कियों को इस मुसीबत में सिर्फ़ यह एक तसल्ली का बाइस था कि दोनों एक ही कोठड़ी में रक्खी गई थीं। कोठड़ी बहुत छोटी थी और उसमें सिर्फ़ एक खिड़की थी जिसमें होकर तोता आ जा सकता था। इस खिड़की से तोता शहर की ख़बरें दर्याफ़्त करने को गया और दयादेई की एक चिट्ठी उसको मां के पास ले गया। जब वह शहर से लौटा तो राजा की लड़की से उसने कहा कि दयादेई के छुड़ाने के वास्ते कोतवाल काफ़ी रुपया इकट्ठा न कर सका और एक दो दिन में सारे लौंडी गुलाम कश्मीरी लशकर में भेज दिये जायेंगे और वहां से उन्हें दुशमन की फ़ौज के साथ फ़ौरन कश्मीर को रवाना होना होगा। इस लिये राजा की लड़की को कश्मीर की खुंखार रानी के पंजे में फिर फसने का ख़ौफ़ है। "मगर,” तोता बोला "मुसीबत से छुटकारा पाने की एक सूरत है, या उमेद है-मुझे अपनी अंगूठी दे दे मैं उसे लेकर कौओं को तेरे नाना के पास भेजता हूं वह उससे सब हाल कह देंगे और वह बड़ा अक्लमन्द है, अगर कुछ हो सकेगा तो ज़रूर करेगा। लेकिन बग़ैर तिलिस्माती अंगूठी के वह कुछ नहीं कर सकेगा। क्योंकि उसके ज़रिये से वह आस्मान के तमाम परिन्दों पर हुक्म चला सकता है। राजा की लड़की ने अंगूठी तोते को दें दी-उसे लेकर वह खंडहर में पहुंचा और वहां दोनों कोओं को बुला कर अंगूठी एक के सपुर्द की और हुक्म दिया कि वह उसे लेकर जितनी जल्दी हो सके गंगोत्री के नज़दीक उस बुड्ढे योगी के पास जावे और उसको देकर उससे सारा हाल बयान करे। दूसरे

    कौए से उसने कहा कि वह अभी खंडहर ही में रहे और जब फ़ौज लाहौर से रवाना हो उसके साथ साथ उड़े। दोनों कौओं को हुक्म देने के बाद तोता राजा की लड़की के पास वापस आया।

    दूसरे रोज़ सुबह को सब लौंडी गुलाम कश्मीरी लशकर को भेज दिये गये और वहां पर सिपहसालार के सपुर्द कर दिये गये और फ़ौज का फ़ौरन कूच हो गया। वह दोनों लड़कियां एक बांसों की खुली डोली में साथ बैठाई गई। तोता उनके साथ रहा, लेकिन अंगूठी के न होने से राजा की लड़की से अब वह बात नहीं कर सकता था, और इसका दोनों का बड़ा अफ़सोस था।

    अध्याय ९

    इस तरह वह कई दिनों तक सफ़र करते रहे ओर अख़ीर को कश्मीर से एक रोज़ के रास्ते पर पहुंचे। यहां फ़ौज ठहर गई और रानी मय अपने तमाम दरबारियों के, अपनी फ़तहयाब फ़ौज को लेने के लिये और यह देखने के लिये कि लूट में क्या क्या माल आया है, आई। फ़ौज बड़ी सज धज के साथ खड़ी की गई और रुपये, अशर्फियां, सोने चांदी के जेवर, जवाहिरात, कीमती रेशमी कपड़े, शाल दुशाले, खूबसूरत घोड़े और लौंडी गुलाम जो लूट में आये थे सिपह-सालार के ख़ेमे के सामने नुमाइश के वास्ते बड़े ठाट बाट से सजाये गये। यह नुमाइश बड़ी शानदार थी। रानी एक हाथी पर जिस पर बेशकीमती सुनहली झूल पड़ी हुई थी एक सोने के हौदे में बैठी हुई थी, उसके दरबारी और मुसाहिब उसके पीछे घोड़ों पर सवार थे, उनके पोछे पलटनों की कतारें थीं। जब वह उस जगह के सामने पहुंची जहां लौंडी और गुलाम लाइन में खड़े किये गये थे, उसकी नज़र राजा की लड़की पर पड़ी; उसे देखते ही वह चौंक पड़ी, और उसका चिहरा पीला पड़ गया। बब्बू हौदे में उसके पीछे बैठा हुआ था; उसकी तरफ मुड़ कर रानी ने उसके कान में कुछ कहा और राजा की लड़की की तरफ़ इशारा किया। पहले तो वह हैरत में आ गया, लेकिन चंद लमहों के बाद हाथी से उतर कर सिपहसालार के पास गया, और उससे बोला कि "लौंडियों में एक को रानी साहिबा ने बहुत पसंद किया है और उसे वह अपनी ख़िदमत में रखना चाहती हैं-उसे वह साथ ले जायेंगी। बाकी को लूट के असबाब के साथ बेच देना चाहिये ताकि लड़ाई का खर्च पूरा हो सके”। बब्बू तब सीधा राजा को लड़की के पास गया-लड़की ख़ौफ़ से कांप रही थी क्योंकि वह जान गई थी कि रानी ने उसे पहचान लिया है। बब्बू ने उस की बांह पकड़ कर उसे अपने साथियों के हवाले किया और हुक्म दिया कि उसे अपने साथ रक्खें। लेकिन उस वक्त एक अजब नज़ारा नज़र आया।

    बहुत ऊपर आस्मान में एक झुंड पहाड़ी उक़ाबों का जो चोल की शकल के होते हैं उड़ता हुआ पा रहा था। उस झुंड के बीच में एक काली सी कोई बड़ो चीज़ थी। वह तेजी से उस मैदान के ऊपर आ पहुंचा जहां कि फ़ौज और रानी वगैरह थीं। नज़दीक आने पर देखा गया कि उन चिड़ियों के चक्कर के दर्मियान एक आदमी एक किस्म की पीढ़ी पर बैठा हुआ है, पीढ़ी लम्बे पतले बांसों और रस्सियों से जिनको कि उकाब अपने पंजों में पकड़े हुए हैं लटक रही है। जो आदमी कि पीढ़ी पर बैठा था बुड्ढा था और फ़क़ीर का लिबास पहने हुए था। चिड़ियों को जो हुक्म वह देता था वह उसे बिला तअम्मुल बजा लाने को मुस्तइद नज़र आती

    थीं। वह योगी अपनी जगह पर उकाबों के साथ अधर में कुछ देर तक मंडलाता रहा-लोग तअज्जुब में डूबे हुए उसकी तरफ़ एक टक चुपचाप देख रहे थे कि यकायक बुलन्द आवाज़ से वह बोल उठा-"ऐ सिपहसालार, मेरे मुलाज़िम वफ़ादार, मुरार सिंह-ऊपर नज़र कर और देख अपने पुराने आक़ा को। मैं जानता हूं कि जिस वक्त और सब मुझ से सरकश और बेवफ़ा हो गये थे और मैं अपने राज से निकाल दिया गया था, तू उस वक्त भी मेरा सच्चा वफ़ादार था और मेरी शिकस्त उस वक्त सिर्फ़ तेरी गैरमौजूदगी से हुई थी। मुझ को यह भी मालूम है कि मेरा राज दबा लेने वाले की मुलाज़िमत तैने तब तक इख़ियार नहीं की थी जब तक कि मैं कश्मीर छोड़ कर योग साधन करने के लिये गंगोत्री की तरफ़ नहीं चला गया था। मैं चाहता हूं कि तू अपने पुराने मालिक का हुक्म मान और उसे इस बद औरत का जो कि मेरी गद्दी को बेइज्ज़त कर रही है मुक़ाबिला करने में मदद दे"। पहले तो सिपहसालार ने उसे सिर्फ़ ख़याली सूरत या ख़्वाबी शकल समझा, मगर जब उसने अपने पुराने महाराज को आवाज़ और सूरत से पहचान लिया, फ़ौरन अपनी तलवार मियान से खींच ली और ऊंची आवाज़ से कहने लगा-"सिपाहियो, हमारे पुराने महाराज आज बैकुंठ से हमारे पास वापस आये हैं। वह सिपाही जो मेरी और उनकी तरफ़ हों अपने अपने हाथ उठावें"। सारी सिपाह एक आवाज़ से ज़ोर से कहने लगी-"महाराज की जय!" और हर एक सिपाही जोश में आकर अपने हथियारों को घुमाने लगा। बब्बू उस वक्त रानी के पास को दौड़ा और झट-पट हाथी पर अपनी जगह में पहुंच फ़ीलवान को हुक्म दिया कि "जितना तेज़ हो सके शहर को चलो"। फ़ीलवान ने हाथी

    दौड़ाया और रानी और बब्बू भाग गये होते लेकिन सिपह-सालार ने कुछ सवारों को उनका पीछा करने का हुक्म दिया। सवार बहुत जल्द उनके पास पहुंच गये और तीरन्दाज़ों ने फ़ीलवान की तरफ़ तीर खींच कर उससे कहा कि "रुक जाओ, वरना तीर तुम पर छोड़ दिये जायंगे"। फ़ीलवान ने देखा कि भागना फुजूल होगा इस लिये हाथी को रोक दिया। उसके बाद रिसाला वहां पर आ पहुंचा और बब्बू और रानी दोनों कैद कर लिये गये।

    महाराज तब लौंडी गुलामों की तरफ़ मुखातिब हो कर पूछने लगे “मेरी प्यारी दोहती कहां है?" उसी वक्त राजा की लड़की उनके पैरों पर आकर गिर पड़ी। उन्होंने उसे उठा कर छाती से लगा लिया और बोसे लिये, फिर उसे अपने साथ हाथी पर सवार करा कर ले जाने की तैयारी की, लेकिन लड़की ने अर्ज़ की कि "मेरी मुसीबत की साथन और दोस्त दयादेई को भी ले चलिये" पस वह भी बैठा ली गई और कश्मीर के बुड्ढे महाराज अपनी फ़ौज के साथ अपनी पुरानी राजधानी पर क़ाबिज होने के लिए आगे बढ़े। तोता राजा की लड़की के बाजू पर बैठा हुआ शहर के लोगों की जयकार पर बड़ी खूबी के साथ सिर झुकाता जाता था, कौए दोनों खुशी से भरे हुए ऊपर उड़ते चलते थे। वह राज-महल के बाग़ में अपने पुराने बसेरे को चले गये। और उकाबों का गिरोह, अपनो ड्यूटी अदा करके अपने पहाड़ी मुक़ामो को रवाना हुआ।

    राजा की लड़की ने महलों में पहुंचते ही पहला काम जो किया यह था कि अपने नाना से अर्ज़ की कि दयादेई की मां और बाप को कि जिन्हों ने उस के साथ ऐसा नेकी का सलूक किया था लाहौर से बुलवा लिया जाय। पस यह बुलवा

    लिये गये और उन्हें महलों के पास एक उमदा मकान रहने। के लिये दे दिया गया ताकि राजा की लड़की दयादेई से रोज़ मिल सके और दोनों अपना बहुत सा वक्त एक दूसरी की लुहबत में बिता सकें। अपने पुराने मददगार मिहर्बान बुड्ढे माहीगीर को-भी वह नहीं भूली-उसे उसने महाराज से सिफ़ारिश करके राजघराने की कश्तियों का दारोग़ा बनवा दिया।

    लेकिन सब से ज़ियादा तारीफ़ का काम जो राजा की लड़की ने किया यह था कि अपने नाना से कह कर उन सब लड़कियों और लड़कों को जो लौंडी और गुलाम के तौर पर लाहौर से लाये गये थे फिर लाहौर को वापस भिजवा दिया। कश्मीर की रानी को कि जिसकी शरारत से उस लड़की को इतनी मुसीबतें उठानी पड़ी थीं राज के कानून से उसकी बुरी हरकतों के वास्ते फांसी की सजा मिलनी चाहिये थी लेकिन राजकुमारी ने इतनी सख्त सज़ा उसको न होने दी, उसे सिर्फ़ जनम कैद दी गयी और राजधानी से बहुत दूर एक पुराने किले में आराम के साथ उसके रहने का बन्दोबस्त करा दिया गया, और उसका लड़का संस्कृत का इल्म हासिला करने के लिये बनारस भेज दिया गया। बब्बू की भी जान बख़्श दी गयी-लेकिन वह कश्मीर से निकाल दिया गया।

    महाराज अपनी दीहती के शादी के लायक होने तक कश्मीर में राज करते रहे। जब वह १८ बरस की हुई उसकी शादी लाहौर के राजा के बड़े लड़के से कर दी गयी। जब से राजकुमारी की सिफ़ारिश से वह लौंडी गुलाम जिन्हें लाहौर से कश्मीर की रानी की फ़ौज पकड़ लाई थी फिर लाहौर को भेज दिये गये थे तब से लाहौर के राजा और कश्मीर के महाराज में बड़ी दोस्ती पैदा हो गयी थी, और लाहौर का

    बड़ा राजकुमार जो कभी २ कश्मीर आकर महाराज के यहां रहा करता था महाराज को बहुत पसन्द। आ गया था-वह हर बात में लायक था। महाराज ने उसको अपनी दोहती से शादी के काबिल हर सूरत से समझा। इस लिये उसी के साथ उस राजकुमारी को ब्याह दिया और दूसरा कोई वारिस न होने से उसी को अपना सारा राज दे दिया।

    बाद इसके महाराज फिर योग-साधन करने के लिये गंगोत्री को चले गये।

    इति

  • तितली

    तितली

    Aproximadamente 116.262 palavras.

    तितली
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    प्रथम खंड

    1.

    क्यों बेटी! मधुवा आज कितने पैसे ले आया?

    नौ आने, बापू!

    कुल नौ आने! और कुछ नहीं?

    पांच सेर आटा भी दे गया है। कहता था, एक रुपए का इतना ही मिला।

    वाह रे समय—कहकर बुड्ढा एक बार चित होकर सांस लेने लगा।

    कुतूहल से लड़की ने पूछा कैसा समय बापू?

    बुड्ढा चुप रहा।

    यौवन के व्यंजन दिखाई देने से क्या हुआ, अब भी उसका मन दूध का धोया है। उसे लड़की कहना ही अधिक संगत होगा।

    उसने फिर पूछा—कैसा समय बापू?

    चिथड़ों से लिपटा हुआ लंबा-चौड़ा, अस्थि-पंजर झनझना उठा खांसकर उसने कहा —जिस भयानक अकाल का स्मरण करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिस पिशाच की अग्नि-क्रीड़ा में खेलती हुई तुझको मैंने पाया था, वही संवत 55 का अकाल आज के सुकाल से भी सदय था—कोमल था। तब भी आठ सेर का अन्न बिकता था। आज पांच सेर की बिक्री में भी कहीं जूं नहीं रेंगती, जैसे—सब धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं। कोई अकाल कहकर चिल्लाता नहीं। ओह! मैं भल रहा हं। कितने ही मनष्य तभी से एक बार भोजन करने के अभ्यासी हो गए हैं। जाने दे, होगा कुछ बंजो! जो सामने आवे, उसे झेलना चाहिए।

    बंजो, मटकी में डेढ़ पाव दूध, चार कंडों पर गरम कर रही थी। उफनाते हुए दूध को उतारकर उसने कुतूहल से पूछा—बापू! उस अकाल में तुमने मुझे पाया था! लो, दूध पीकर मुझे वह पूरी कथा सुनाओ।

    बुड्ढे ने करवट बदलकर, दूध लेते हुए, बंजो की आंखों में खेलते हुए आश्चर्य को देखा। वह कुछ सोचता हुआ दूध पीने लगा।

    थोड़ा-सा पीकर उसने पूछा-अरे तूने दूध अपने लिए रख लिया है?

    बंजो चुप रही। बुड्ढा खड़खड़ा उठा—तू बड़ी पाजी है, रोटी किससे खाएगी रे?

    सिर झुकाए हुए, बंजो ने कहा—नमक और तेल से मुझे रोटी अच्छी लगती है बापू!

    बचा हुआ दूध पीकर बुड्ढा फिर कहने लगा यही समय है, देखती है न! गाएं डेढ पाव दूध देती हैं! मुझे तो आश्चर्य होता है कि उन सूखी ठठरियों में से इतना दूध भी कैसे निकलता है!

    मधुवा दबे पांव आकर उसी झोपड़ी के एक कोने में खड़ा हो गया। बुड्ढे ने उसकी ओर देखकर पूछा–मधुवा, आज तू क्या-क्या ले गया था?

    डेढ़ सेर घुमची, एक बोझा महुआ का पत्ता और एक खांचा कंडा बाबाजी!–मधुवा ने हाथ जोड़कर कहा।

    इन सबका दाम एक रुपया नौ आना ही मिला?

    चार पैसे बंधू को मजूरी में दिए थे।

    अभी दो सेर घुमची और होगी बापू! बहुत-सी फलियां वनबेरी के झुरमुट में हैं, झड़ जाने पर उन्हें बटोर लूंगी। बंजो ने कहा। बुड्ढा मुस्कुराया। फिर उसने कहा मधुवा! तू गायों को अच्छी तरह चराता नहीं बेटा! देख तो, धवली कितनी दुबली हो गई है!

    कहां चरावें, कुछ ऊसर-परती कहीं चरने के लिए बची भी है?—मधुवा ने कहा।

    बंजो अपनी भूरी लटों को हटाते हुए बोली—मधुवा गंगा में घंटों नहाता है बापू! गाएं अपने मन से चरा करती हैं! यह जब बुलाता है,तभी सब चली आती हैं।

    बंजो की बात न सुनते हुए बाबाजी ने कहा-तू ठीक कहता है मधुवा! पशुओं को खाते-खाते मनुष्य, पशुओं के भोजन की जगह भी खाने लगे। ओह! कितना इनका पेट बढ़ गया है! वाह रे समय!!

    मधुवा बीच ही में बोल उठा—बंजो, बनिया ने कहा है कि सरफोंका की पत्ती दे जाना,अब मैं जाता हूं।

    कहकर वह झोपड़ी के बाहर चला गया।

    संध्या गांव की सीमा में धीरे-धीरे आने लगी। अंधकार के साथ ही ठंड बढ़ चली। गंगा की कछार की झाड़ियों में सन्नाटा भरने लगा। नालों के करारों में चरवाहों के गति गूंज रहे थे।

    बंजो दीप जलाने लगी। उस दरिद्र कुटीर के निर्मम अंधकार में दीपक की ज्योति तारा-सी चमकने लगी। बुड्ढे ने पुकारा-बंजो

    आयी—कहती हुई वह बुड्ढे की खाट के पास आ बैठी और उसका सिर सहलाने लगी। कुछ ठहरकर बोली—बापू! उस अकाल का हाल न सुनाओगे?

    तू सुनेगी बंजो क्या करेगी सुनकर बेटी? तू मेरी बेटी है और मैं तेरा बूढ़ा बाप! तेरे लिए इतना जान लेना बहुत है।

    नहीं बापू! सुना दो मुझे वह अकाल की कहानी—बंजो ने मचलते हुए कहा।

    धांय-धांय-धांय…!!!

    गंगा-तट बंदूक के धड़ाके से मुखरित हो गया। बंजो कुतूहल से झोपड़ी के बाहर चली आई।

    वहां एक घिरा हुआ मैदान था। कई बीघा की समतल भूमि—जिसके चारों ओर, दस लढे की चौड़ी, झाड़ियों की दीवार थी जिसमें कितने ही सिरिस, महुआ, नीम और जामुन के वृक्ष थे—जिन पर घुमची, सतावर और करंज, इत्यादि की लतरें झूल रही थीं। नीचे की भूमि में मटेस के चौड़े-चौड़े पत्तों की हरियाली थी। बीच-बीच में वनबेर ने भी अपनी कंटीली डालों को इन्हीं सबों से उलझा लिया था।

    वह एक सघन झुरमुट था—जिसे बाहर से देखकर यह अनुमान करना कठिन था कि इसके भीतर इतना लंबा-चौड़ा मैदान हो सकता है।

    देहात के मुक्त आकाश में अंधकार धीरे-धीरे फैल रहा था। अभी सूर्य की अस्तकालीन लालिमा आकाश के उच्च प्रदेश में स्थित पतले बादलों में गुलाबी आभा दे रही थी।

    बंजो, बंदूक का शब्द सुनकर, बाहर तो आई; परंतु वह एकटक उसी गुलाबी आकाश को देखने लगी। काली रेखाओं-सी भयभीत कराकुल पक्षियों की पंक्तियां 'करररर-करी' करती हुई संध्या की उस शांत चित्रपटी के अनुराग पर कालिमा फेरने लगी थीं।

    हाय राम! इन कांटों में-कहां आ फंसा!

    बंजो कान लगाकर सुनने लगी।

    फिर किसी ने कहा-नीचे करार की ओर उतरने में तो गिर जाने का डर है, इधर ये कांटेदार झाड़ियां! अब किधर जाऊं?

    बंजो समझ गई कि शिकार खेलने वालों में से कोई इधर आ गया है। उसके हृदय में विरक्ति हुई— उंह, शिकारी पर दया दिखाने की क्या आवश्यकता? भटकने दो।

    वह घूमकर उसी मैदान में बैठी हुई एक श्यामा गौ को देखने लगी। बड़ा मधुर शब्द सुन पड़ा-चौबेजी! आप कहां हैं?

    अब बंजो को बाध्य होकर उधर जाना पड़ा। पहले कांटों में फंसने वाले व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा—खड़ी रहिए; इधर नहीं ऊहूं- ऊं! उसी नीम के नीचे ठहरिए, मैं आता हूं! इधर बड़ा ऊंचा-नीचा है।

    चौबेजी, यहां तो मिट्टी काटकर बड़ी अच्छी सीढ़ियां बनी हैं;मैं तो उन्हीं से ऊपर आई हूं।—रमणी के कोमल कंठ से यह सुन पड़ा।

    बंजो को उसकी मिठास ने अपनी ओर आकृष्ट किया। जंगली हिरन के समान कान उठाकर वह सुनने लगी।

    झाड़ियों के रौंदे जाने का शब्द हुआ फिर वही पहिला व्यक्ति बोल उठा लीजिए, मैं तो किसी तरह आ पहुंचा, अब गिरा तब गिरा, राम-राम! कैसी सांसत! सरकार से मैं कह रहा था कि मुझे न ले चलिए। मैं यहीं चूड़ा-मटर की खिचड़ी बनाऊंगा। पर आपने भी जब कहा, तब तो मुझे आना ही पड़ा। भला आप क्यों चली आईं?

    इन्द्रदेव ने कहा कि सुर्खाब इधर बहुत हैं, मैं उनके मुलायम पैरों के लिए आई। सच चौबेजी, लालच में मैं चली आई। किंतु छरों से उनका मरना देखने में मुझे सुख तो न मिला। आह! कितना बेधड़क वे गंगा के किनारे टहलते थे! उन पर विनचेस्टर-रिपीटर के छरों की चोट! बिल्कुल ठीक नहीं। मैं आज ही इन्द्रदेव को शिकार खेलने से रोकूगी—आज ही।

    अब किधर चला जाए?—उत्तर में किसी ने कहा।

    चौबेजी ने डग बढ़ाकर कहा—मेरे पीछे-पीछे चली आइए।

    किंतु मिट्टी बह जाने से मोटी जड़ नीम की उभर आई थी, उसने ऐसी करारी ठोकर लगाई कि चौबेजी मुंह के बल गिरे।

    रमणी चिल्ला उठी। उस धमाके और चिल्लाहट ने बंजो को विचलित कर दिया।वह कंटीली झाड़ी को खींचकर अंधेरे में भी ठीक-ठीक उसी सीढ़ी के पास जाकर खड़ी हो गई, जिसके पास नीम का वृक्ष था।

    उसने देखा कि चौबेजी बुरी तरह गिरे हैं। उनके घुटने में चोट आ गई है। वह स्वयं

    नहीं उठ सकते।

    सुकुमारी सुंदरी के बूते के बाहर की यह बात थी। बंजो ने हाथ लगा दिया। चौबेजी किसी तरह कांखते हुए उठे।

    अंधकार के साथ-साथ सर्दी बढ़ने लगी थी। बंजो की सहायता से सुंदरी, चौबेजी को लिवा ले चली; पर कहां? यह तो बंजो ही जानती थी।

    झोपड़ी में बुड्ढा पुकार रहा था-बंजो! बंजो!! बड़ी पगली है। कहां घूम रही है? बंजो, चली आ! झुरमुट में घुसते हुए चौबेजी तो कराहते थे, पर सुंदरी उस वन-विहंगिनी की ओर आंखें गड़ाकर देख रही थी और अभ्यास के अनुसार धन्यवाद भी दे रही थी।

    दूर से किसी की पुकार सुन पड़ी शैला! शैला!! . ये तीनों, झाड़ियों की दीवार पार करके, मैदान में आ गए थे।

    बंजो के सहारे चौबेजी को छोड़कर शैला फिरहरी की तरह घूम पड़ी। वह नीम के नीचे खड़ी होकर कहने लगी—इसी सीढ़ी से इन्द्रदेव—बहुत ठीक सीढ़ी है। हां, संभालकर चले आओ। चौबेजी का तो घुटना ही टूट गया है! हां, ठीक है, चले आओ! कहीं-कहीं जड़ें बुरी तरह से निकल आई हैं उन्हें बचाकर आना।

    नीचे से इन्द्रदेव ने कहा—सच कहना शैला क्या चौबे का घुटना टूट गया? ओहो, तो कैसे वह इतनी दूर चलेगा! नहीं-नहीं, तुम हंसी करती हो।

    ऊपर आकर देख लो, नहीं भी टूट सकता है! नहीं भी टूट सकता है? वाह! यह एक ही रही। अच्छा, लो, मैं आ ही पहुंचा।

    एक लंबा-सा युवक, कंधे पर बंदूक रखे, ऊपर चढ़ रहा था। शैला, नीम के नीचे खड़ी, गंगा के करारे की ओर झांक रही थी यह इन्द्रदेव को सावधान करती थी ठोकरों ठीक मार्ग से। ___ तब तक उस युवक ने हाथ बढ़ाया—दो हाथ मिले!

    नीम के नीचे खड़े होकर, इन्द्रदेव ने शैला के कोमल हाथों को दबाकर कहा—करारे की मिट्टी काटकर देहातियों ने कामचलाऊ सीढ़ियां अच्छी बना ली हैं। शैला कितना सुंदर दश्य है! नीचे धीरे-धीरे गंगा बह रही है. अंधकार से मिली हई उस पार के वक्षों की श्रेणी शितिज की कोर में गाढ़ी कालिमा की बेल बना रही है, और ऊपर…

    पहले चलकर चौबेजी को देख लो, फिर दृश्य देखना।—बीच ही में रोककर शैला ने कहा।

    अरे हां, यह तो मैं भूल ही गया था? चलो किधर चलूं? यहां तो तुम ही पथ-प्रदर्शक हो।—कहकर इन्द्रदेव हंस पड़े।

    दोनों, झोपड़ियों के भीतर घुसे। एक अपरिचित बालिका के सहारे चौबेजी को कराहते देखकर इन्द्रदेव ने कहा तो क्या सचमुच में यह मान लूं कि तुम्हारा घुटना टूट गया? मैं इस पर कभी विश्वास नहीं कर सकता। चौबे तुम्हारे घुटने 'टूटने वाली हड्डी' के बने ही नहीं!

    सरकार यही तो मैं भी सोचता हुआ चलने का प्रयत्न कर रहा हूँ। परंत..आह! बड़ी पीड़ा है, मोच आ गई होगी। तो भी इस छोकरी के सहारे थोड़ी दूर चल सकूँगा। चलिए ।

    चौबेजी ने कहा।

    अभी तक बंजो से किसी ने न पूछा था कि तू कौन है,कहां रहती है,या हम लोगों को कहां लिए जा रही है।

    बंजो ने स्वयं ही कहा—पास ही झोपड़ी है। आप लोग वहीं तक चलिए; फिर जैसी इच्छा।

    सब बंजो के साथ मैदान के उस छोर पर जलने वाले दीपक के सम्मुख चले, जहां से "बंजो! बंजो!” कहकर कोई पुकार रहा था। बंजो ने कहा—आती हूं!

    झोपड़ी के दूसरे भाग के पास पहुंचकर बंजो क्षण-भर के लिए रुकी। चौबेजी को छप्पर के नीचे पड़ी हुई एक खाट पर बैठने का संकेत करके वह घूमी ही थी कि बुड्ढे ने कहा—बंजो! कहां है रे? अकाल की कहानी और अपनी कथा न सुनेगी? मुझे नींद आ रही हैं।

    आ गई—कहती हुई बंजो भीतर चली गई। बगल के छप्पर के नीचे इन्द्रदेव और शैला खड़े रहे! चौबेजी खाट पर बैठे थे, किंतु कराहने की व्याकुलता दबाकर। एक लड़की के । आश्रय में आकर इन्द्रदेव भी चकित सोच रहे थे—कहीं यह बुड्ढा हम लोगों के यहां आने से चिढेगा तो नहीं।

    सब चुपचाप थे। बुड्ढे ने कहा—कहां रही तू बंजो! एक आदमी को चोट लगी थी, उसी…। तो-तू क्या कर रही थी? वह चल नहीं सकता था, उसी को सहारा देकर

    मरा नहीं, बच गया। गोली चलने का शिकार खेलने का आनंद नहीं मिला! अच्छा, तो तू उनका उपकार करने गई थी। पगली! यह मैं मानता हूं कि मनुष्य को कभीकभी अनिच्छा से भी कोई काम कर लेना पड़ता है; पर…नहीं…जान-बूझकर किसी उपकार-अपकार के चक्र में न पड़ना ही अच्छा है। बंजो पल-भर की भावुकता मनुष्य के जीवन को कहां-से-कहां खींच ले जाती है, तू अभी नहीं जानती। बैठ, ऐसी ही भावुकता को लेकर मुझे जो कुछ भोगना पड़ा है, वही सुनाने के लिए तो मैं तुझे खोज रहा था।

    बापू… क्या है रे! बैठती क्यों नहीं? वे लोग यहां आ गए हैं…

    ओहो तू बड़ी पुण्यात्मा है…तो फिर लिवा ही आई है, तो उन्हें बिठा दे छप्पर में और दसरी जगह ही कौन है? और बंजो! अतिथि को बिठा देने से ही नहीं काम चल जाता। दो-चार टिक्कर सेंकने की भी…समझी? नहीं-नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं कहते हुए इन्द्रदेव बुड्ढे के सामने आ गए। बुड्ढे ने धुंधले प्रकाश में देखा-पूरा साहबी ठाट! उसने कहा—आप साहब यहां…

    तुम घबराओ मत, हम लोगों को छावनी तक पहुंच जाने पर किसी बात की असुविधा न रहेगी। चौबेजी को चोट आ गई है वह सवारी न मिलने पर रात-भर यहां पड़े रहेंगे। सवेरे देखा जाएगा। छावनी की पगडंडी पा जाने पर हम लोग स्वयं चले जाएंगे। कोई… इन्द्रदेव को रोककर बूड्ढे ने कहा–आप धामपुर की छावनी पर जाना चाहते हैं? जमींदार के मेहमान हैं न? बंजो! मधुवा को बुला दे, नहीं तू ही इन लोगों को बनजरिया के बाहर उत्तर वाली पगडंडी पर पहुंचा दे। मधुवा!! ओ रे मधुवा!–चौबेजी को रहने दीजिए, कोई चिंता नहीं।

    बंजो ने कहा-रहने दो बापू। मैं ही जाती हूं।

    शैला ने चौबेजी से कहा-तो आप यहीं रहिए, मैं जाकर सवारी भेजती हूं।

    रात को झंझट बढ़ाने की आवश्यकता नहीं, बटुए में जलपान का सामान है। कंबल भी है। मैं इसी जगह रात-भर में इसे सेंक-सांक कर ठीक कर लूगा। आप लोग जाइए।—चौबे ने कहा।

    इन्द्रदेव ने पुकारा-शैला! आओ, हम लोग चलें।

    शैला उसी झोपड़ी में आई। वहीं से बाहर निकलने का पथ। बंजो के पीछे दोनों झोपड़ी से निकले।

    लेटे हुए बुड्ढे ने देखा—इतनी गोरी, इतनी सुंदर, लक्ष्मी-सी स्त्री इस जंगल-उजाड़ में कहां! फिर सोचने लगा—चलो, दो तो गए। यदि वे भी यहीं रहते, तो खाट-कंबल और सब सामान कहां से जुटता। अच्छा चौबेजी हैं तो ब्राह्मण उनको कुछ अड़चन न होगी; पर इन साहबी ठाट के लोगों के लिए मेरी झोपड़ी में कहां…ऊंह! गए, चलो, अच्छा हुआ। बंजो आ जाए, तो उसकी चोट तेल लगाकर सेंक दे।

    बुड्ढे को फिर खांसी आने लगी। वह खांसता हुआ इधर के विचारों से छुट्टी पाने की चेष्टा करने लगा।

    उधर चौबेजी गोरसी में सुलगते हुए कंडों पर हाथ गरम करके घुटना सेंक रहे थे। इतने में बंजो मधुवा के साथ लौट आई।

    बापू! जो आए थे,जिन्हें मैं पहुंचाने गई थी, वही तो धामपुर के जमींदार हैं। लालटेन लेकर कई नौकर-चाकर उन्हें खोज रहे थे। पगडंडी पर ही उन लोगों से भेंट हुई। मधुवा के साथ मैं लौट आई।

    एक सांस में बंजो कहने को तो कह गई, पर बुड्ढे की समझ में कुछ न आया। उसने कहा—मधुवा! उस शीशी में जो जड़ी का तेल है, उसे लगाकर ब्राह्मण का घुटना सेंक दे, उसे चोट आ गई है।

    मधुवा तेल लेकर घुटना सेंकने चला।

    बंजो पुआल में कंबल लेकर घुसी। कुछ पुआल और कुछ कंबल से गले तक शरीर ढक कर वह सोने का अभिनय करने लगी। पलकों पर ठंड लगने से बीच-बीच में वह आंख खोलने-मुंदने का खिलवाड़ कर रही थी। जब आंखें बंद रहतीं, तब एक गोरा-गोरा मुंहकरुणा की मिठास से भरा हुआ गोल-मटोल नन्हा-सा मुंह-उसके सामने हंसने लगता। उसमें ममता का आकर्षण था। आख खुलने पर वही पुरानी झोपड़ी की छाजन! अत्यंत विरोधी दृश्य!! दोनों ने उसके कुतूहल-पूर्ण हृदय के साथ छेड़छाड़ की, किंतु विजय हुई आंख बंद करने की। शैला के संगीत के समान सुंदर शब्द उसकी हत्तंत्री में झनझना उठे! शैला के समीप होने की—उसके हृदय में स्थान पाने की—बलवती वासना बंजो के मन में जगी। वह सोते-सोते स्वप्न देखने लगी। स्वप्न देखते-देखते शैला के साथ खेलने लगी। मधुवा से तेल मलवाते हुए चौबेजी ने पूछा-क्यों जी! तुम यहां कहां रहते हो? क्या काम करते हो? क्या तुम इस बुड्ढे के यहां नौकर हो? उसके लड़के तो नहीं मालूम पड़ते?

    परंतु मधुवा चुप था।

    चौबेजी ने घबराकर कहा—बस करो, अब दर्द नहीं रहा। वाह-वाह!

    यह तेल है या जादू! जाओ भाई, तुम भी सो रहो। नहीं-नहीं ठहरो तो, मुझे थोड़ा पानी पिला दो।

    मधुवा चुपचाप उठा और पानी के लिए चला। तब चौबेजी ने धीरे-से बटुआ खोलकर मिठाई निकाली, और खाने लगे। मधुवा इतने में न जाने कब लोटे में जल रखकर चला गया था।

    और बंजो सो गई थी। आज उसने नमक और तेल से अपनी रोटी भी नहीं खाई। आज पेट के बदले उसके हृदय में भूख लगी थी। शैला से मित्रता शैला से मधुर परिचय के लिए न-जाने कहां की साध उमड़ पड़ी थी। सपने-पर-सपने देख रही थी। उस स्वप्न की मिठास में उसके मुख पर प्रसन्नता की रेखा उस दरिद्र-कुटीर में नाच रही थी।

    2.

    धामपुर एक बड़ा ताल्लुका है। उसमें चौदह गांव हैं। गंगा के किनारे-किनारे उसका विस्तार दूर तक चला गया है। इन्द्रदेव यहीं के युवक जमींदार थे। पिता को राजा की उपाधि मिली थी।

    बी.ए. पास करके जब इन्द्रदेव ने बैरिस्टरी के लिए विलायत-यात्रा की, तब पिता के मन में बड़ा उत्साह था।

    किंतु इन्द्रदेव धनी के लड़के थे। उन्हें पढ़ने-लिखने की उतनी आवश्यकता न थी, जितनी लंदन का सामाजिक बनने की!

    लंदन नगर में भी उन्हें पूर्व और पश्चिम का प्रत्यक्ष परिचय मिला। पूर्वी भाग में। पश्चिमी जनता का जो साधारण समुदाय है, उतना ही विरोधपूर्ण है, जितना कि विस्तृत पूर्व और पश्चिम का। एक ओर सुगंध जल के फव्वारे छूटते हैं, बिजली से गरम कमरों में जाते ही कपड़े उतार देने की आवश्यकता होती है;दूसरी ओर बरफ और पाले में दूकानों के चबूतरों के नीचे अर्ध-नग्न दरिद्रों का रात्रि-निवास।

    इन्द्रदेव कभी-कभी उस पूर्वी भाग में सैर के लिए चले जाते थे।

    एक शिशिर रजनी थी। इन्द्रदेव मित्रों के निमंत्रण से लौटकर सड़क के किनारे, मुंह पर अत्यंत शीतल पवन का तीखा अनुभव करते हुए, बिजली के प्रकाश में धीरे-धीरे अपने मेस' की ओर लौट रहे थे। पल के नीचे पहंचकर वह रुक गए। उन्होंने देखा-कितने ही अभागे, पुल की कमानी के नीचे अपना रात्रि-निवास बनाए हुए, आपस में लड़-झगडु रहे हैं। एक रोटी पूरी ही खा जाएगा!–इतना बड़ा अत्याचार न सह सकने के कारण जब तक स्त्री उसके हाथ से छीन लेने के लिए अपनी शराब की खुमारी से भरी आखों को चढ़ाती ही रहती है, तब तक लड़का उचककर छीन लेता है। चटपट तमाचों का शब्द होना तुमुल युद्ध के आरंभ होने की सूचना देता है। धौल-धप्पड़, गाली-गलौज, बीच-बीच में फूहड़ हंसी भी सुनाई पड़ जाती है।

    इन्द्रदेव चुपचाप वह दृश्य देख रहे थे सोच रहे थे—इतना अकूत धन विदेशों से ले आकर भी क्या इन साहसी उद्योगियों ने अपने देश की दरिद्रता का नाश किया? अन्य देशों की प्रकृति का रक्त इन लोगों की कितनी प्यास बुझा सका है?

    सहसा एक लंबी-सी पतली-दुबली लड़की ने पास आकर कुछ याचना की। इन्द्रदेव ने गहरी दृष्टि से उस विवर्ण मुख को देखकर पूछा–क्यों, तुम्हारे पिता-माता नहीं हैं?

    पिता जेल में हैं, माता मर गई है।

    और इतने अनाथालय?

    उनमें जगह नहीं!

    तुम्हारे कपड़े से शराब की दुर्गंध आ रही है। क्या तुम…

    'जैक' बहुत ज्यादा पी गया था, उसी ने कै कर दिया है। दूसरा कपड़ा नहीं जो बदलूं; बड़ी सर्दी है। कहकर लड़की ने अपनी छाती के पास का कपड़ा मुट्ठियों में समेट लिया।

    तुम नौकरी क्यों नहीं कर लेती?

    रखता कौन है? हम लोगों को तो वे बदमाश, गिरह-कट, आवारा समझते हैं। पास खड़े होने तो…

    आगे उस लड़की के दांत आपस में लड़कर बजने लगे। वह स्पष्ट कुछ न कह सकी।

    इन्द्रदेव होंठ काटते हुए क्षण-भर विचार करने लगे। एक छोकरे ने आकर लड़की को धक्का देकर कहा—जो पाती, सब शराब पी जाती है। इसको देना–न देना सब बराबर है।

    लड़की ने क्रोध से कहा—जैक! अपनी करनी मुझ पर क्यों लादता है? तू ही मांग ले; मैं जाती हूं।

    वह घूमकर जाने के लिए तैयार थी कि इन्द्रदेव ने कहा—अच्छा सुनो तो, तुम पास के भोजनालय तक चलो, तुमको खाने के लिए, और मिल सका तो कोई भी दिलवादूंगा।

    छोकरा 'हो-हो-हो!' करके हंस पड़ा। बोला—जा न शैला। आज की रात तो गर्मी से बिता ले. फिर कल देखा जाएगा।

    उसका अश्लील व्यंग्य इन्द्रदेव को व्यथित कर रहा था; किंतु शैला ने कहा—चलिए।

    दोनों चल पड़े। इन्द्रदेव आगे थे, पीछे शैला। लंदन का विद्युत-प्रकाश निस्तब्ध होकर उन दोनों का निर्विकार पद-विशेप देख रहा था। सहसा घूमकर इन्द्रदेव ने पूछा-तुम्हारा नाम 'शैला' है न?

    'हां' कहकर फिर वह चुपचाप सिर नीचा किए अनुसरण करने लगी।

    इन्द्रदेव ने फिर ठहरकर पूछा—कहां चलोगी? भोजनालय में या हम लोगों के मेस में?

    'जहां कहिए' कहकर वह चुपचाप चल रही थी। उसकी अविचल धीरता से मन-ही-मन कुढ़ते हुए इन्द्रदेव मेस की ओर ही चले।

    उस मेस में तीन भारतीय छात्र थे। मकान वाली एक बुढ़िया थी। उसके किए सब काम होता न था। इन्द्रदेव ही उन छात्रों के प्रमुख थे। उनकी सम्मत से सब लोगों ने शैला' ________________

    को परिचारिका-रूप में स्वीकार किया। और, जब शैला से पूछा गया, तोउसने अपनी स्वाभाविक उदार दृष्टि इन्द्रदेव के मुंह पर जमाकर कहा यदि आप कहते हैं तो मुझे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। भिखमंगिन होने से यह बुरा तो न होगा। इन्द्रदेव अपने मित्रों के मुस्कुराने पर भी मन-ही-मन सिहर उठे। बालिका के विश्वास पर उन्हें भय मालूम होने लगा। तब भी उन्होंने समस्त साहस बटोरकर कहा-शैला, कोई भय नहीं, तुम यहां स्वयं सुखी रहोगी और हम लोगों की भी सहायता करोगी। मकान वाली बुढिया ने जब यह सुना, तो एक बार झल्लाई। उसने शैला के पास जाकर, उसकी ठोढ़ी पकड़कर, आंखें गड़ाकर, उसके मुंह को और फिर सारे अंग को इस तीखी चितवन से देखा, जैसे कोई सौदागर किसी जानवर को खरीदने से पहले उसे देखता हो। किंतु शैला के मुंह पर तो एक उदासीन धैर्य आसन जमाए था, जिसको कितनी ही कुटिल दृष्टि क्यों न हो, विचलित नहीं कर सकती। बुढिया ने कहा—रह जा बेटी, ये लोग भी अच्छे आदमी हैं। शैला उसी दिन से मेस में रहने लगी। भारतीयों के साथ बैठकर वह प्राय: भारत के देहातों, पहाड़ी तथा प्राकृतिक दृश्यों के संबंध में इन्द्रदेव से कतहलपर्ण प्रश्र किया करती। बैरिस्टरी का डिप्लोमा मिलने के साथ ही इन्द्रदेव को पिता के मरने का शोकसमाचार मिला। उस समय शैला की सांत्वना और स्नेहपूर्ण व्यवहार ने इन्द्रदेव के मन को बहुत-कुछ बहलाया। मकान वाली बुढिया उसे बहुत प्यार करती, इन्द्रदेव के सद्व्यवहार और चारित्र्य पर वह बहुत प्रसन्न थी। इन्द्रदेव ने जब शैला को भारत चलने के लिए व शैला भी भारत चली आई। इन्द्रदेव ने शहर के महल में न रहकर धामपुर के बंगले में ही अभी रहने का प्रबंध किया। अभी धामपुर आए इन्द्रदेव और शैला को दो सप्ताह से अधिक न हुए थे। इंग्लैंड से ही इन्द्रदेव ने शैला को हिंदी से खूब परिचित कराया। वह अच्छी हिंदी बोलने लगी थी। देहाती किसानों के घर जाकर उनके साथ घरेल बातें करने का चसका लग गया था खाट पर बैठकर वह बड़े मजे से उनसे बातें करती, साड़ी पहनने का उसने अभ्यास कर लिया था और उसे फबती भी अच्छी। शैला और इन्द्रदेव दोनों इस मनोविनोद से प्रसन्न थे। वे गंगा के किनारे-किनारे धीरेधीरे बात करते चले जा रहे थे। कृषक-बालिकाएं बरतन मांज रही थीं। मल्लाहों के लड़के अपने डोंगी पर बैठे हुए मछली फंसाने की कटिया तोल रहे थे। दो-एकबड़ी-बड़ी नावें, माल से लदी हुईं, गंगा के प्रशांत जल पर धीरे-धीरे संतरण कर रही थीं। वह प्रभात था! शैला बड़े कुतूहल से भारतीय वातावरण में नीले आकाश, उजली धूप और सहज ग्रामीण शांति का निरीक्षण कर रही थी। वह बातें भी करती जाती थी। गंगा की लहर से सुंदर कटे हुए बालू के नीचे करारों में पक्षियों के एक सुंदर छोटे-से झुंड को विचरते देखकर उसने उनका नाम पूछा! इन्द्रदेव ने कहा ये सुर्खाब हैं, इनके परों का तो तुम लोगों के यहां भी उपयोग होता समर्थन किया। इन्द ________________

    है। देखो, ये कितने कोमल हैं। यह कहकर इन्द्रदेव ने दो-तीन गिरे हुए परों को उठाकर शैला के हाथ में दे दिया। ‘फाइन'!-नहीं-नहीं, माफ करो इन्द्रदेव! अच्छा, इन्हें कहूं कोमल। सुंदर!—कहती हुई, शैला ने हंस दिया। शैला! इनके लिए मेरे देश में एक कहावत है। यहां के कवियों ने अपनी कविता में इनका बड़ा करुण वर्णन किया है। गंभीरता से इन्द्रदेव ने कहा। क्या . इन्हें चक्रवाक कहते हैं। इनके जोड़े दिन-भर तो साथ-साथ घूमते रहते हैं, किंतु संध्या जब होती है, तभी ये अलग हो जाते हैं। फिर ये रात-भर नहीं मिलने पाते। कोई रोक देता है क्या? प्रकृति; कहा जाता है कि इनके लिए यही विधाता का विधान है। ओह। बड़ी कठोरता है।—कहती हुई शैला एक क्षण के लिए अन्यमनस्क हो गई। कुछ दूर चुपचाप चलने पर इन्द्रदेव ने कहा-शैला। हम लोग नीम के पास आ गए। देखो, यही सीढ़ी है; चलो देखें, चौबे क्या कर रहा है। पालना नहीं-नहीं-पालकी तो पहुंच गई होगी इन्द्रदेव। यह भी कोई सवारी है? तुम्हारे यहां रईस लोग इसी पर चढ़ते हैं— आदमियों पर। क्यों? बिना किसी बीमारी के! यह तो अच्छा तमाशा है! —कहकर शैला ने हंस दिया। अब तो बीमारों के बदले डॉक्टर ही यहां पालकी पर चढ़ते हैं शैला! लो, पहले तुम्हीं सीढ़ी पर चढ़ो। ___दोनों सीढ़ी पर चढ़कर बातें करते हुए बनजरिया में पहुंचे। देखते हैं, तो चौबेजी अपने सामान से लैस खड़े हैं। शैला ने हंसकर पूछा-चौबेजी! आप तो पालकी पर जाएंगे? मुझे हुआ क्या है। रामदीन को आज बिना मारे मैं न छोडूंगा। सरकार! उसने बड़ा तंग किया। मुझे गोद में उठाकर पालकी पर बिठाता था। छावनी पर चलकर उस बदमाश छोकरे की खबर लूंगा। बरा क्या करता था? मेरे कहने से वह बेचारा तो तम्हारी सेवा करना चाहता था और तुम चिढ़ते थे। अच्छा, चलो तुम पालकी में बैठो।— इन्द्रदेव ने कहा। फिर वही—पालकी में बैठो! क्या मेरा ब्याह होगा? ठहरो भी, तुम्हारा घुटना तो टूट गया है न। तुम चलोगे कैसे? तेल क्या था, बिल्कुल जादू! मेम साहब ने जो दवा का बॉक्स मेरे बटुए में रख दिया था-वही, जिसमें सागूदाना की-सी गोलियां रहती हैं—मैं खोल डाला। एक शीशी गोली खा डाली। न गुड तीता न मीठा–सच मानिए मेम साहब। आपकी दवा मेरे-जैसे उजड्डों के लिए नहीं। मेरा तो विश्वास है कि उस तेल ने मुझे रातभर में चंगा कर दिया। मैं अब पालकी पर न चढूंगा। गांव-भर में मेरी दिल्लगी राम-राम!! शैला हँस रही थी। इन्द्रदेव ने कहा-चौबे! होमियोपैथी में बीमारी की दवा नहीं होती, दवा की बीमारी होती है। क्यों शैला! इन्द्रदेव! तुमने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। नहीं तो इसकी हंसी न उड़ाते।

    अच्छा, चलो उस लड़की को तो बुलावें। वह कहां है? उसे कल कुछ इनाम नहीं दिया। बड़ी अच्छी लड़की है। झोपड़ी में से लठिया टेकते हुए बुड्ढा निकल आया। उसके पीछे बंजो थी। शैला ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया, और कहने लगी-ओह! तुम रात को चली आईं, मैं तो खोज रही थी। तुम बड़ी नेक,…!

    बंजो आश्चर्य से उसका मुंह देख रही थी। इन्द्रदेव ने कहा-बुड्ढे। तुम बहुत बीमार हो न? हां सरकार! मुझे नहीं मालूम था, रात को आप…

    उसका सोच मत करो। तुम कौन कहानी कह रहे थे—रात को बंजो को क्या सुना रहे थे? मुझको सुनाओगे, चलो छावनी पर।

    सरकार; मैं बीमार हूं। बुड्ढा हूं। बीमार हूं।

    शैला ने कहा ठीक इन्द्रदेव, अच्छा सोची। इस बुड्ढे की कहानी बड़ी अच्छी होगी। लिवा चलो इसे। बंजो तुम्हारी कहानी हम लोग भी सुनेंगे। चलो।

    इन्द्रदेव ने कहा—अच्छा तो होगा।

    चौबेजी ने कहा—अच्छा तो होगा सरकार! मैं भी मधुवा को साथ लिवा चलूंगा। शायद फिर घुटना टूटे, तेल मलवाना पड़े और इन गायों को भी हांक ले चलूं, दूध भी—

    सब हँस पड़े; परंतु बुड्ढा बड़े संकट में पड़ा। कुछ बोला नहीं; वह एकटक शैला का मुंह देख रहा था। एक अपरिचित! किंतु जिससे परिचय बढ़ाने के लिए मन चंचल हो उठे। माया-ममता से भरा-पूरा मुख!

    बुड्ढा डरा नहीं, वह समीप होने की मानसिक चेष्टा करने लगा। साहस बटोरकर उसने कहा—सरकार! जहां कहिए, वहीं चलूं।

    3.

    चारों ओर ऊंचे-ऊंचे खंभों पर लंबे-चौड़े दालान, जिनसे सटे हुए सुंदर कमरों में सुखासन, उजली सेज, सुंदर लैंप, बड़े-बड़े शीशे, टेबिल पर फूलदान, अलमारियों में सुनहरी जिल्दों से मढ़ी हुई पुस्तकें—सभी कुछ उस छावनी में पर्याप्त है। आस-पास, दफ्तर के लिए, नौकरों के लिए तथा और भी कितने ही आवश्यक कामों के लिए छोटे-मोटे घर बने हैं। शहर के मकान में न जाकर, इन्द्रदेव ने विलायत से लौटकर यहीं रहना जो पसंद किया है, उसके कई कारणों में इस कोठी की सुंदर भूमिका और आसपास का रमणीय वातावरण भी है। शैला के लिए तो दूसरी जगह कदापि उपयुक्त न होती। छावनी के उत्तर नाले के किनारे ऊंचे चौतरे की हरी-हरी दूबों से भरी हुई भूमि पर कुर्सी का सिरा पकड़े तन्मयता से वह नाले का गंगा में मिलना देख रही थी। उसका लंबा और ढीला गाउन मधुर पवन से आंदोलित हो रहा था। कुशल शिल्पी के हाथों से बनी हुई संगमरमर की सौंदर्य-प्रतिमा-सी वह बड़ी भली मालूम हो रही थी। दालान में चौबेजी उसके लिए चाय बना रहे थे। सांयकाल का सूर्य अब लाल बिंब ________________

    मात्र रह गया था, सो भी दूर की ऊंची हरियाली के नीचे जाना ही चाहता था। इन्द्रदेव अभी तक नहीं आए थे। चाय ले जाने में चौबेजी और सुस्ती कर रहे थे। उनकी चाय शैला को बड़ी अच्छी लगी। वह चौबेजी के मसाले पर लटू थी। रामदीन ने चाय की टेबिल लाकर रख दी। शैला की तन्मयता भंग हुई। उसने मुस्कुराते हुए, इन्द्रदेव से कुछ मधुर सम्भाषण करने के लिए, मुंह फिराया; किंतु इन्द्रदेव को न देखकर वह रामदीन से बोली—क्या अभी इन्द्रदेव नहीं आए हैं? नटखट रामदीन हँसी छिपाते हुए एक आंख का कोना दबाकर होंठ के कोने को ऊपर चढ़ा देता था। शैला उसे देखकर खूब हँसती, क्योंकि रामदीन का कोई उत्तर बिना इस कुटिल हंसी के मिलना असंभव था! उसने अभ्यास के अनुसार आधा हंसकर कहा—जी, आ रहे हैं सरकार! बड़ी सरकार के आने की… बड़ी सरकार? हां, बड़ी सरकार! वह भी आ रही हैं। कौन है वह? बड़ी सरकारदेखो रामदीन, समझाकर कहो। हंसना पीछे। बड़ी सरकार का अनुवाद करने में उसके सामने बड़ी बाधाएं उपस्थित हुईं; किंतु उन सबको हटाकर उसने कह दिया—सरकार की मां आई हैं। उनके लिए गंगा-किनारे वाली छोटी कोठी साफ़ कराने का प्रबंध देखने गए हैं। वहां से आते ही होंगे। आते ही होंगे? क्या अभी देर है? रामदीन कुछ उत्तर देना चाहता था कि बनारसी साड़ी का आंचल कंधे पर से पीठ की ओर लटकाए: हाथ में छोटा-सा बेग लिये एक संदरी वहां आकर खड़ी हो गई। शैला ने उसकी ओर गंभीरता से देखा। उसने भी अधिक खोजने वाली आंखों से शैला को देखा। दृष्टि-विनियम में एक-दूसरे को पहचानने की चेष्टा होने लगी; किंतु कोई बोलता न था। शैला बड़ी असुविधा में पड़ी। वह अपरिचित से क्या बातचीत करे? उसने पूछाआप क्या चाहती हैं? आने वाली ने नम्र मुस्कान से कहा—मेरा नाम मिस अनवरी है। क्या किया जाए, जब कोई परिचय कराने वाला नहीं तो ऐसा करना ही पड़ता है। मैं कुंवर साहब की मां को देखने के लिए आया करती हूं। आपको मिस शैला समझ लूं? ___जी—कहकर शैला ने कुर्सी बढ़ा दी और शीतल दृष्टि से उसे बैठने का संकेत किया। उधर चौबेजी चाय ले आ रहे थे। शैला ने भी एक कुर्सी पर बैठते हुए कहा-आपके लिए भी… अनवरी और शैला आमने-सामने बैठी हुई एक-दूसरे को परखने लगी। अनवरी की सारी प्रगल्भता धीरे-धीरे लुप्त हो चली। जिस गर्मी से उसने अपना परिचय अपने-आप दे दिया था, वह चाय के गर्म प्याले के सामने ठंडी हो चली थी। शैला ने चाय के छोटे-से पात्र से उठते हुए धुएं को देखते हुए कहा—कुंवर साहब की मां भी सुना, आ गई हैं? ________________

    मुझे तो नहीं मालूम, मैं अपनी मोटर से यहीं उतर पड़ी थी। उनके साथ ही आती; पर क्या करूं, देर हो गई। किसी को पूछ आने के लिए भेजिएगा? मुझे तो आपसे सहायता मिलनी चाहिए मिस अनवरी शैला ने हंसकर कहाआपके कुंवर साहब आ जाएं, तो प्रबंध… अरे शैला! यह कौन… ___ इन्द्रदेव! तुम अब तक क्या कर रहे थे-कहकर शैला ने मिस अनवरी की ओर संकेत करते हुए कहा—आप मिस अनवरी… फिर अपने होठ को गर्म चाय में डुबो दिया, जैसे उन्हें हंसने का दंड मिला हो। इन्द्रदेव ने अभिनंदन करते हुए कहा-मां जब से आईं, तभी से पूछ रही हैं, उनकी रीढ़ में दर्द हो रहा है। आपकी उनसे भेंट नहीं हुई क्या? जी नहीं; मैंने समझा, यहीं होगी। फिर जब यहां चाय मिलने का भरोसा था, तो थोड़ा यहीं ठहरना अच्छा हुआ—कहकर अनवरी मुस्कराने लगी। इन्द्रदेव ने साधारण हंसी हंसते हुए कहा—अच्छी बात है, चाय पी लीजिए। चौबेजी आपको वहां पहुंचा देंगे। ____तीनों चुपचाप चाय पीने लगे। इन्द्रदेव ने कहा—चौबे! आज तुम्हारी गुजराती चाय बड़ी अच्छी रही। एक प्याला ले आओ, और उसके साथ और भी कछ… चौबे सोहन-पापड़ी के टुकड़े और चायदानी लेकर जब आए, तो मिस अनवरी उठकर खड़ी हो गई। इन्द्रदेव ने कहा—वाह, आप तो चली जा रही हैं। इसे भी तो चखिए। शैला ने मुस्कुराते हुए कहा—बैठिए भी, आप तो यहां पर मेरी ही मेहमान होकर रह सकेंगी। हां, इसको तो मैं भूल गई थी—कहकर अनवरी बैठ गई। चौबेजी ने सबको चाय दे दी, और अब वह प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब अनवरी चलेगी। पर अनवरी तो वहां से उठने का नाम ही न लेती थी। वह कभी इन्द्रदेव और कभी शैला को देखती, फिर संध्या की आने वाली कालिमा की प्रतीक्षा करती हुई नीले आकाश में आंख लड़ाने लगती। उधर इन्द्रदेव इस बनावटी सन्नाटे से ऊब चले थे। सहसा चौबेजी ने कहा—सरकार! वह बुड्ढा आया है, उसकी कहानी कब सुनिएगा? मैं लालटेन लेता आऊं? . फिर अनवरी की ओर देखते हुए कहने लगे अभी आपको भी छोटी कोठी में पहुंचाना होगा। अनवरी को जैसे धक्का लगा। वह झटपट उठकर खड़ी हो गई। चौबेजी उसे साथ लेकर चले। इन्द्रदेव ने गहरी सांस लेकर कहा—शैला! क्या इन्द्रदेव? मां से भेंट करोगी? चलूं? अच्छा, कल सवेरे!

    इन्द्रदेव की माता श्यामदुलारी पुराने अभिजात – कुल की विधवा हैं । प्राय : बीमार रहा करती हैं । किंतु मुख -मंडल पर गर्व की दीप्ति , आज्ञा देने की तत्परता और छिपी हुई सरल दया भी अंकित है ? वह सरकार हैं । उनके आस -पास अनावश्यक गृहस्थी के नाम पर जुटाई गई अगणित सामग्री का बिखरा रहना आवश्यक है। आठ से कम दासियों से उनका काम चल ही नहीं सकता । दो पुजारी और ठाकुरजी का संभार अलग । इन सबके आज्ञा- पालन के लिए कहारों का पूरा दल । बहंगी पर गंगाजल और भोजन का सामान ढोते हुए कहारों का आना -जाना श्यामदुलारी की आंखें सदैव देखना चाहती थीं । बेटा विलायत से लौट आया है । एक दिन उनसे मिलकर उनकी चरण – रज लेकर वह छावनी में चला आया और यहीं रहने लगा । लोग कहते हैं कि इन्द्रदेव के कानों में जब यह समाचार किसी मतलब से पहुंचा दिया गया कि चरण छूकर आपके चले आने पर माताजी ने फिर से स्नान किया , तो फिर वह मकान पर न ठहर सके । किंतु श्यामदुलारी की प्रकृति ही ऐसी है। उसने ऐसा किया हो , तो कोई आश्चर्य नहीं । तब भी श्यामदुलारी को तो यही विश्वास दिलाया गया कि — साथ में मेम नहीं आई है! श्यामदुलारी अपने बेटे को संभालना चाहती थीं । बेटी माधुरी से पूछकर यही निश्चित हुआ कि सब लोग छावनी पर ही कुछ दिन चलकर रहें । वहीं इन्द्रदेव को सुधार लिया जाएगा । माधुरी घर की प्रबंधकी है। वह दक्ष, चिड़चिड़े स्वभाव की सुंदरी युवती है। माता श्यामदुलारी भी उसके अनुशासन को मानती हैं और भीतर – ही – भीतर दबती भी हैं । माधुरी का पति उसकी खोज – खबर नहीं लेता । उसे लेने की आवश्यकता ही क्या ? माधुरी धनी घर की लाड़ली बेटी है। इसलिए बाबू श्यामलाल को इस अवसर से लाभ उठाने की पूरी सुविधा है। श्यामदुलारी, बेटी और दामाद दोनों को प्रसन्न रखने की चेष्टा में लगी रहती हैं । बहत बुलाने पर कभी साल- भर में बाबू श्यामलाल कलकत्ता से दो -तीन दिन के लिए चले आते हैं । उनका व्यवसाय न नष्ट हो जाए, इसलिए जल्द चले जाते हैं — अर्थात् रेस की टीप , बगीचों के जुए, स्टीमरों की पार्टियां और भी कितने ही ऐसे काम हैं , जिनमें चूक जाने से बड़ी हानि उठाने की संभावना है । माधुरी शासन करने की क्षमता रखती है । भाई इन्द्रदेव पढ़ते थे; इसलिए माता की रुग्णावस्था में घर – गृहस्थी का बोझ दूसरा कौन संभालता ? ___ माधुरी की अभिभावकता में माता श्यामदुलारी सोती हैं सपना देखती हैं । इसलिए माधुरी भी साथ ही आई हैं । चौकी पर मोटे – से गद्दे पर तकिया सहारे बैठी वह कुछ हिसाब देख रही थी । पेट्रोल -लैंप के तीव्र प्रकाश में उसकी उठी हुई नाक की छाया दीवार पर बहुत लंबी- सी दिखाई पड़ती है। मलिया बड़ी नटखट छोकरी है। वह पान का डिब्बा लिये हुए, उस छाया को देखकर, जोर से हंसना चाहती है; पर माधुरी के डर से अपने होठों को दांत से दबाए चुपचाप खड़ी है । मिस अनवरी की छाया से वह चौंक उठी । उसने चुलबुलेपन से कहा — मेम साहब , सलाम ! माधुरी ने सिर उठाकर देखा और कहा—आइए, हम लोग बड़ी देर से आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मां का दर्द तो बहुत बढ़ गया है। ___ माधुरी के पास ही बैठते हुए अनवरी ने—बीबी, तुमको देखने के लिए जी ललचाया रहता है, मां को तो देगी ही कहकर उसके हाथों को दबा दिया। माधुरी ने झेंपकर कहा-आहा तुम तो मेम और साहब दोनों ही हो न? अच्छा, यह तो बताओ, तुम्हारे ठहरने का क्या प्रबंध करूं? आज रात को तो मोटर से शहर लौट जाने न दूंगी। अभी मां पूजा कर रही हैं, एक घंटे में खाली होगी, फिर घंटों उनको देखने में लग जाएगा। बजेगा दो और जाना है तीस मील! आज रात को तुमको रहना ही होगा। . अनवरी ने मुस्कुराते हुए कहा—सो तो बीबी, तुम्हारी भाभी ने मुझे न्योता ही दिया माधुरी क्षण-भर के लिए चुप हो गई। फिर बोली—अनवरी, ऐसी दिल्लगी न करो, यह बात मुझे ही नहीं, घर भर को खटक रही है। लेकिन भाई साहब तो कहते हैं कि वह हमारी दोस्त है! हां—बीबी, दोस्ती नहीं तो क्या दुश्मनी से कोई इतना बड़ा… माधुरी ने भीतर के कमरे की ओर देखते हुए उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और धीरेधीरे कहने लगी—प्यारी अनवरी! क्या इस चुडैल से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं? हम लोग क्या करें? कोई बस नहीं चलता। धीरे-धीरे सब हो जाएगा। लेकिन तुम्हें बुरा न लगे, तो मैं एक बात पूछ लूं। क्या? कुंवर साहब इससे ब्याह कर लें, तो तुम्हारा क्या? ऐसा न कहो अनवरी! तुम्हारी मां तो फिर तुमको ही… उंह तुम क्या बक रही हो! अच्छा तो मैं कुछ दिन यहां रहूं तो… तो रहो न मेरी रानी।

    हाथ-मुंह धोकर मुलायम तौलिए से हाथ पोंछती हुई अनवरी बड़े-से दर्पण के सामने खड़ी थी। शैला अपने सोफा पर बैठी हुई रेशमी रूमाल पर कोई नाम कसीदे से काढ़ रही थी। अनवरी सहसा चंचलता से पास जाकर उन अक्षरों को पढ़ने लगी। शैला ने अपनी भोली आंखों को एक बार ऊपर उठाया, सामने से सूर्योदय की पीली किरणों ने उन्हें धक्का दिया, वे फिर नीचे झुक गईं। अनवरी ने कहा—मिस शैला! क्या कुंवर साहब का नाम है? जी—नीचा सिर किए हुए शैला ने कहा। क्या आप रोज सवेरे एक रूमाल उनको देती हैं? यह तो अच्छी बोहनी है!—कहकर ________________

    अनवरी खिलखिला उठी। शैला को उसकी यह हंसी अच्छी न लगी। रात-भर उसे अच्छी नींद भी न आई थी। इन्द्रदेव ने अपनी माता से उसे मिलाने की जो उत्सुकता नहीं दिखलाई, उल्टे एक ढिलाई का आभास दिया, वही उसे खटक रहा था। अनवरी ने हंसी करके उसको चौंकाना चाहा; किंतु उसके हृदय में जैसे हंसने की सामग्री न थी? इन्द्रदेव ने कमरे के भीतर प्रवेश करते हुए कहा—शैला! आज तुम टहलने नहीं जा सकी? मुझे तो आज किसानों की बातों से छुट्टी न मिलेगी। दिन भी चढ़ रहा है। क्यों न मिस अनवरी को साथ लेकर घूम आओ! अनवरी ने ठाट से उठकर कहा—आदाबअर्ज है कुंवर साहब! बड़ी खुशी से! चलिए न! आज कुंवर साहब का काम मैं ही करूंगी शैला इस प्रगल्भता से ऊपर न उठ सकी। इन्द्रदेव और अनवरी को आत्म-समर्पण करते हुए उसने कहा—अच्छी बात है, चलिए। इन्द्रदेव बाहर चले गए। खेतों में अंकुरों की हरियाली फैली पड़ी थी। चौखूटे, तिकोने, और भी कितने आकारों के टुकड़े, मिट्टी की पेड़ों से अलगाए हुए, चारों ओर समतल में फैले थे। बीच-बीच में आम, नीम और महुए के दो-एक पेड़ जैसे उनकी रखवाली के लिए खड़े थे। मिट्टी की संकरी पगडंडी पर आगे शैला और पीछे-पीछे अनवरी चल रही थीं। दोनों चुपचाप पैर रखती हुई चली जा रही थीं। पगडंडी से थोड़ी दूर पर एक झोपड़ी थी, जिस पर लौकी और कुंभडे की लतर चढ़ी थी। उसमें से कुछ बात करने का शब्द सुनाई पड़ रहा था। शैला उसी ओर मुड़ी। वह झोंपड़ी के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने देखा, देखा, मधुवा अपनी टूटी खाट पर बैठा हुआ बंजो से कुछ कह रहा है। बंजो ने उत्तर में कहा—तब क्या करोगे मधुबन! अभी एक पानी चाहिए। तुम्हारा आलू सोराकर ऐसा ही रह जाएगा? ढाई रुपए के बिना! महंगू महतो उधार हल नहीं देंगे? मटर भी सूख जाएगी। ___अरे आज मैं मधुबन कहां से बन गया रे बंजो पीट दूंगा जो मुझे मधुवा न कहेगी। मैं तुझे तितली कहकर न पुकारूंगा। सुना न? हल उधार नहीं मिलेगा, महतो ने साफ-साफ कह दिया है। दस विस्से मटर और दस बिस्से आलू के लिए खेत मैंने अपनी जोत में रखकर बाकी दो बीघे जौ-गेहं बोने के लिए उसे साझे में दे दिया है। यह भी खेत नहीं मिला, इसी की उसे चिढ़ है। कहता है कि अभी मेरा हल खाली नहीं है। __ तब तुमने इस एक बीघे को भी क्यों नहीं दे दिया! __मैंने सोचा कि शहर तो मैं जाया की करता हूं। नया आलू और मटर वहां अच्छे दामों पर बेचकर कुछ पैसे भी लूंगा; और बंजो जाड़े में इस झोपड़ी में बैठे-बैठे रात को उन्हें भूनकर खाने में कम सुख तो नहीं! अभी एक कंबल लेना जरूरी है। तो बापू से कहते क्यों नहीं? वह तुम्हें ढाई रुपया दे देंगे। उनसे कुछ मांगा, तो यही समझेंगे कि मधुवा मेरा कुछ काम कर देता है, उसी की मजूरी चाहता है। मुझे जो पढ़ाते हैं, उसकी गुरु-दक्षिणा मैं उन्हें क्या देता हूं? तितली! जो भगवान करेंगे, वही अच्छा होगा। अच्छा तो मधुबन! जाती हूं। अभी बापू छावनी से लौटकर नहीं आए। जी घबराता ________________

    यह कहकर जब वह लौटने लगी, तो मधुबन ने कहा-अच्छा, फिर आज से मैं रहा मधुबन और तुम तितली। यही न? दोनों की आंखें आंखें एक क्षण के लिए मिली—स्नेहपूर्ण आदान-प्रदान करने के लिए। मधुबन उठ खड़ा हुआ, तितली बाहर चली आई। उसने देखा, शैला और अनवरी चुपचाप खड़ी हैं! वह सकुचा गई। शैला ने सहज मुस्कुराहट से कहा—तब तुम्हारा नाम तितली हे क्यों? हां-कहकर तितली ने सिर झुका लिया। आज जैसे उसे अकेले में मधुबन से बातें करते हुए समग्र संसार ने देखकर व्यंग्य से हंस दिया हो। वह संकोच में गड़ी जा रही थी। शैला ने उसकी ठोढ़ी उठाकर कहा—लो, यह पांच रुपए तुम्हारे उस दिन की मजूरी के हैं। मैं, में न लगी। बाप बिगड़ेंगे। वह चंचल हो उठी। किंतु शैला कब मानने वाली थी। उसने कहा—देखो, इसमें ढाई रुपए तो मधुबन को दे दो, वह अपना खेत सींच ले और बाकी अपने पास रख लो। फिर कभी काम देगा। अब मधुबन भी निकल आया था। वह विचार-विमूढ था, क्या कहे! तब तक तितली को रुपया न लेते देखकर शैला ने मधुबन के हाथ में रुपया रख दिया, और कहा—बाकी रुपया जब तितली मांगे तो दे देना। समझा न? मैं तुम लोगों को छावनी पर बुलाऊं, तो चले आना। ___ दोनों चुप थे। अनवरी अब तक चुप थी; किंतु उसके हृदय ने इस सौहार्द को अधिक सहने से अस्वीकार कर दिया। उसने कहा—हो चुका, चलिए भी। धूप निकल आई है। शैला अनवरी के साथ घूम पड़ी। उसके हृदय में एक उल्लास था। जैसे कोई धार्मिक मनुष्य अपना प्रातः-कृत्य समाप्त कर चुका हो। दोनों धीरे-धीरे ग्राम-पथ पर चलने लगीं। अनवरी ने धीरे-से प्रसगं छेड़ दिया मिस शैला! आपको इन देहाती लोगों से बातचीत करने में बड़ा सुख मिलता है। मिस अनवरी! सुख! अरे मुझे तो इनके पास जीवन का सच्चा स्वरूप मिलता है, जिसमें ठोस मेहनत, अटूट विश्वास और संतोष से भरी शांति हंसती-खेलती है। लंदन की भीड़ से दबी हुई मनुष्यता में मैं ऊब उठी थी, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं दुख भी उठा चुकी हूं। दुखी के साथ दुखी की सहानुभूति होना स्वाभाविक है। आपको यदि इस जीवन में सुख-ही-सुख मिला है तो… नहीं-नहीं, हम लोगों को सुख-दुख जीवन से अलग होकर कभी दिखाई नहीं पड़ा। रुपयों की कमी ने मुझे पढ़ाया और मैं नर्स का काम करने लगी। जब अस्पताल का काम छोड़कर अपनी डॉक्टरी का धंधा मैंने फैलाया, तो मुझे रुपयों की कमी न रही। पर मुझे तो यही समझ पड़ता है कि मेहनत-मजूरी करते हुए अपने दिन बिता लेना, किसी के गले पड़ने से अच्छा है। ___ अनवरी यह कहते हुए शैला की ओर गहरी दृष्टि से देखने लगी। वह उसकी बगल में आ गई थी। सीधा व्यंग्य न खल जाए इसलिए उसने और भी कहा हम मसलमानों को तो मालिक की मर्जी पर अपने को छोड़ देना पड़ता है, फिर सुख-दुख की अलग-अलग परख ________________

    करने की किसको पड़ी है। शैला ने जैसे चौंककर कहा तो क्या स्त्रियां अपने लिए कुछ भी नहीं कर सकतीं? उन्हें अपने लिए सोचने का अधिकार भी नहीं है? बहुत करोगी मिस शैला, तो यही कि किसी को अपने काम का बना लोगी। जैसा सब जगह हम लोगों की जाति किया करती है। पर उसमें दुख होगा कि सुख, इसका निपटारा तो वही मालिक कर सकता है। शैला न जाने कितनी बातें सोचती हुई चुप हो गई। वह केवल इस व्यंग्य पर विचार करती हुई चलने लगी। उत्तर देने के लिए उसका मन बेचैन था; पर अनवरी को उत्तर देने में उसे बहुत-सी बातें कहनी पड़ेंगी। वह क्या सब कहने लायक हैं? और यह प्रश्न भी उसके मन में आने लगा कि अनवरी कुछ अभिप्राय रखकर तो बात नहीं कर रही है। उसको भारतीय वायुमंडल का पूरा ज्ञान नहीं था। उसने देखा था केवल इन्द्रदेव को, जिसमें श्रद्धा और स्नेह का ही आभास मिला था। संदेह का विकृत चित्र उसके सामने उपस्थित करके अपने मन में अनवरी क्या सोच रही है, यही धीरे-धीरे विचारती हुई वह छावनी की ओर लौटने लगी। ___ अनवरी ने सौहार्द बढ़ाने के लिए कुछ दूसरा प्रसंग छेड़ना चाहा; किंतु वह सौजन्य के अनुरोध से संक्षिप्त उत्तर मात्र देती हुई छावनी पर पहुंची। अभी इन्द्रदेव का दरबार लगा हआ था। आरामकी पर लेटे हए वह कोई कागज देख रहे थे। एक बड़ी-सी दरी बिछी थी। उस पर कुछ किसान बैठे थे। इन लोगों के जाते ही दो कुर्सियां और आ गईं। पर इन्द्रदेव ने अपने तहसीलदार से कहा—इस पोखरी का झगड़ा बिना पहले का कागज देखे समझ में नहीं आएगा। इसे दूसरे दिन के लिए रखिए। तहसीलदार इन्द्रदेव के बाप के साथ काम कर चुका था। वह इन्द्रदेव से काम लेना चाहता था। उसने कहा—लेकिन दो-एक कागज तो आज ही देख लीजिए, उनकी बेदखली जल्दी होनी चाहिए। __अच्छा, मैं चाय पीकर अभी आता हूं।—कहकर इन्द्रदेव शैला और अनवरी के साथ कमरे में चले गए। बुड्ढे से अब न रहा गया। उसने कहा, तहसीलदार साहब, मैं कल से यहां बैठा हूं। मुझे क्यों तंग किया जा रहा है! तहसीलदार ने चश्मे के भीतर से आंखें तरेरते हुए कहा—रामनाथ हो न? तंग किया जा रहा है! हूं! बैठो अभी। दस बीघे की जोत बिना लगान दिए हड़प किए बैठे हो और कहते हो, मुझे तंग किया जा रहा है। क्या कहा? दस बीघे! अरे तहसीलदार साहब, क्या अब जंगल-परती में भी बैठने न दोगे? और वह तो न जाने कब से कृष्णार्पण लगी हुई बनजरिया है! वही तो बची है, और तो सब आप लोगों के पेट में चला गया। क्या उसे भी छीनना चाहते हो? तहसीलदार चुपचाप उसे घूरने लगा। ___ इन्द्रदेव शैला के साथ बाहर चले आए। अनवरी के लिए देर से माधुरी की भेजी हुई लौंडी खड़ी थी। वह उसके साथ छोटी कोठी में चली गई। इन्द्रदेव ने बुड्ढे को देखकर तहसीलदार को संकेत किया। तहसीलदार अभी बुड्ढे रामनाथ की बात नहीं छेड़ना चाहता था। किंतु इन्द्रदेव के संकेत से उसे कहना ही पड़ा—इसका नाम रामनाथ है। यह ________________

    बनजरिया पर कुछ लगान नहीं देता। एकरेज जो लगा है, वह भी नहीं देना चाहता। कहता है—कृष्णार्पण माफी पर लगान कैसा? इन्द्रदेव ने रामनाथ को देखकर पूछा—क्यों, उस दिन हम लोग तुम्हारी ही झोंपड़ी पर गए थे? हां सरकार! तो एकरेज तो तुमको देना ही चाहिए। सरकारी मालगुजारी तो तुम्हारे लिए हम अपने आप से नहीं दे सकते। तहसीलदार से न रहा गया, बीच ही में बोल उठा—अभी तो यह भी नहीं मालूम कि यह बनजरिया का होता कौन है। पुराने कागजों में वह थी देवनन्दन के नाम। उसके मर जाने पर बनजरिया पड़ी रही। फिर इसने आकर उसमें आसन जमा लिया। बुड्ढा झनझना उठा। उसने कहा हम कौन हैं, इसको बताने के लिए थोड़ा समय चाहिए सरकार! क्या आप सुनेंगे? शैला ने अपने संकेत से उत्सुकता प्रकट की। किंतु इन्द्रदेव ने कहा—चलो, अभी माताजी के पास चलना है। फिर किसी दिन सुनूंगा। रामनाथ आज तुम जाओ; फिर मैं बुलाऊंगा, तब आना। रामनाथ ने उठकर कहा—अच्छा सरकार! चौबेजी बटुआ लिये पान मुंह में दाबे आकर खड़े हो गए। उनके मुख पर एक विचित्र कुतूहल था। वह मन-ही-मन सोच रहे थे—आज शैला बड़ी सरकार के सामने जाएगी। अनवरी भी वहीं है, और वहीं है बीबीरानी माधुरी! हे भगवान्! शैला, इन्द्रदेव और चौबेजी छोटी कोठी की ओर चले। मधबन के हाथ में था रुपया और पैरों में फरती, वह महंग महतो के खेत पर जा रहा था। बीच में छावनी पर से लौटते हुए रामनाथ से भेंट हो गई। मधुबन के प्रणाम करने पर रामनाथ ने अश्विर्वाद देकर पूछा कहां जा रहे हो मधुबन? आज पहला दिन है, बाबाजी ने उसे मधुवा न कहकर मधुबन नाम से पुकारा। वह भीतर-ही-भीतर जैसे प्रसन्न हो उठा। अभी-अभी तितली से उसके हृदय की बातें हो चुकी थीं। उसकी तरी छाती में भरी थी। उसने कहा बाबाजी. रुपया देने जा रहा है। महंग से पुरवट के लिए कहा था—आलू और मटर सींचने के लिए। वह बहाना करता था, और हल भी उधार देने से मुकर गया। मेरा खेत भी जोतता है और मुझी से बढ़-बढ़कर बातें करता रामनाथ ने कहा—भला रे, तू पुरवट के लिए तो रुपया देने जाता है—सिंचाई होगी; पर हल क्या करेगा? आज-कल कौन-सा नया खेत जोतेगा? मधुबन ने क्षण-भर सोचकर कहा-बाबाजी, तितली ने मुझसे चार पहर के लिए कहीं से हल उधार मांगा था। सिरिस के पेड़ के पास बनजरिया में बहुत दिनों से थोड़ा खेत बनाने का वह विचार कर रही है, जहां बरसात में बहुत-सी खाद भी हम लोगों ने डाल रखी थी। पिछाड़ होगी तो क्या, गोभी बोने का… ___ दुत पागल! तो इसके लिए इतने दिनों तक कानाफूसी करने की कौन-सी बात थी? मुझसे कहती! अच्छा, तो रुपया तुझे मिला? हां बाबाजी, मेम साहब ने तितली को पांच रुपया दिया था, वही तो मेरे पास है। मेम साहब ने रुपया दिया था! बंजो को? तू कहता क्या है?

    हां, मेरे ही हाथ में तो दिया। वह तो लेती न थी। कहती थी, बापू बिगड़ेंगे! किसी दिन मेम साहब का उसने कोई काम कर दिया था, उसी की मजूरी बाबाजी! मेम साहब बड़ी अच्छी हैं।

    रामनाथ चुप होकर सोचने लगा। उधर मधुबन चाहता था, बुड्ढा उसे छुट्टी दे। वह खड़ा-खड़ा ऊबने लगा। उत्साह उसे उकसाता था कि महंगू के पास पहुंचकर उसके आगे रुपए फेंक दे और अभी हल लाकर बंजो का छोटा-सा गोभी का खेत बना दे। बुड्ढा न जाने कहां से छींक की तरह उसके मार्ग में बाधा-सा आ पहुंचा।

    रामनाथ सोच रहा था छावनी की बात! अभी-अभी तहसीलदार ने जो रूप दिखलाया था. वही उसके सामने नाचने लगा था। उसे जैसे बनजरिया की काया-पलट होने के साथ ही अपना भविष्य उत्पातपूर्ण दिखाई देने लगा। तितली उसमें नया खेत बनाने जा रही है। तब भी न जाने क्या सोचकर उसने कहा-जाओ मधुबन, हल ले जाओ।

    मधुबन तो उछलता हुआ चला जा रहा था। किंतु रामनाथ धीरे-धीरे बनजरिया की ओर चला।

    तितली गायों को चराकर लौटा ले जा रही थी। मधुबन तो हल ले जाने गया था। वह उनको अकेली कैसे छोड़ देती। धूप कड़ी हो चली थी। रामनाथ ने उसे दूर से देखा। तितली अब दूर से पूरी स्त्री-सी दिखाई पड़ती थी।

    रामनाथ एक दूसरी बात सोचने लगा। बनजरिया के पास पहुंचकर उसने पुकारातितली!

    उसने लौटकर प्रफुल्ल बदन से उत्तर दिया- 'बापू!'

    श्यामदुलारी आज न जाने कितनी बातें सोचकर बैठी थीं-लड़का ही तो है, उसे दो बात खरी-खोटी सुनाकर डांट-डपटकर न रखने से काम नहीं चलेगा-पर विलायत हो आया है। बैरिस्टरी पास कर चुका है। कहीं जवाब दे बैठा तो! अच्छा…आज वह मेम की छोकरी भी साथ आएगी। इस निर्लज्जता का कोई ठिकाना है! कहीं ऐसा न हो कि साहब की वह कोई निकल आवे! तब उसे कुछ कहना तो ठीक न होगा। अभी दो महीने पहले कलेक्टर साहब जब मिलने आए थे, तो उन्होंने कहा था- ‘रानी साहब, आपके ताल्लुके में नमूने के गांव बसाने का बंदोबस्त किया जाएगा। इसमें बड़ी-बड़ी खेतियां, किसानों के बैंक और सहकार की संस्थाएं खुलेंगी। सरकार भी मदद देगी।' तब उसको कुछ कहना ठीक न होगा। माधुरी की क्या राय है? वह तो कहती है- 'मां, जाने दो, भाई साहब को कुछ मत कहो?' तो क्या वह अपने मन से बिगड़ता चला जाएगा। सो नहीं हो सकता। अच्छा, जाने दो। माधुरी के मन में अनवरी की बात रह-रहकर मरोर उठती थी। इन्द्रदेव क्या यह घर ________________

    संभाल सकेंगे? यदि नहीं, तो मैं क्यों बनाने की चेष्टा करूं। उसके मन में तेरह बरस के कृष्णमोहन का ध्यान आ गया। थियासोफिकल स्कूल में वह पढ़ता है। पिता बाबू श्यामलाल उसकी ओर से निश्चित थे। हां, उसके भविष्य की चिंता तो उसकी माता माधुरी को ही थी। तब भी वह जैसे अपने को धोखे में डालने के लिए कह बैठती-जैसा जिसके भाग्य में होगा, वही होकर रहेगा। अनवरी इस कुटुंब की मानसिक हलचल में दत्तचित्त होकर उसका अध्ययन कर रही थी। न जाने क्यों, तीनों चुप होकर मन-ही-मन सोच रही थीं। पलंग पर श्यामदुलारी मोटी-सी तकिया के सहारे बैठी थीं। चौकी पर चांदनी बिछी थी। माधुरी और अनवरी वहीं बैठी हुई एक-दूसरे का मुंह देख रही थीं। तीन-चार कुर्सियां पड़ी थीं। छोटी कोठी का यह बाहरी कमरा था। श्यामदुलारी यहीं पर सबसे बात करती, मिलती-जुलती थीं; क्योंकि उनका निज का प्रकोष्ठ तो देव-मंदिर के समान पवित्र, अस्पृश्य और दुर्गम्य था? बिना स्नान किए-कपड़ा बदले, वहां कौन जा सकता था! बाहर पैरों का शब्द सुनाई पड़ा। तीनों स्त्रियां सजग हो गईं, माधुरी अपनी साड़ी का किनारा संवारने लगी। अनवरी एक उंगली से कान के पास के बालों को ऊपर उठाने लगी और, श्यामदुलारी थोड़ा खांसने लगी। इन्द्रदेव शैला और चौबेजी के साथ, भीतर आए। माता को प्रणाम किया। श्यामदुलराि ने 'सुखी रहो' कहते हुए देखा कि वह गोरी मेम भी दोनों हाथों की पतली उंगलियों में बनारसी साड़ी का सुनहला अंचल दबाए नमस्कार कर रही है। अनवरी उठकर खड़ी हो गई। माधुरी चौकी पर ही थोड़ा खिसक गई। माता ने बैठने का संकेत किया। पर वह भीतर से शैला से बोलने के लिए उत्सुक थी। इन्द्रदेव ने कहा-मिस अनवरी! मां का दर्द अभी अच्छा नहीं हुआ। इसके लिए आप क्या कर रही हैं। क्यों मां, अभी दर्द में कमी तो नहीं है? है क्यों नहीं बेटा! तुमको देखकर दर्द दूर भाग जाता है। श्यामदुलारी ने मधुरता से कहा। – तब तो भाई साहब, आप यहीं मां के पास रहिए। दर्द पास न आवेगा। -माधुरी ने कहा। लेकिन बबिरिनिा! और लोग क्या करेंगे? कुंवर साहब यहीं घर में बैठे रहेंगे, तो जो लोग मिलने-जुलने वाले हैं, वे कहां जाएंगे! ____ -अनवरी ने व्यंग्य से कहा। यह बात श्यामदलारी को अच्छी न लगी। उन्होंने कहा-मैं तो चाहती हैं कि इन्द्र मेरी आखों से ओझल न हो। वह करता ही क्या है मिस अनवरी! शिकार खेलने में ज्यादा मन लगाता है। क्यों, विलायत में इसकी बड़ी चाल है न! अच्छा बेटा! यह मेम साहब कौन है? इनका तो तुमने परिचय ही नहीं दिया। मां, इंग्लैंड में यही मेरा सब प्रबंध करती थी। मेरे खाने-पीने का, पढ़ने-लिखने का, कभी जब अस्वस्थ हो जाता तो डॉक्टरों का, और रात-रात-भर जागकर नियमपूर्वक दवा देने का काम यही करती थी। इनका मैं चिर-ऋणी हूं। इनकी इच्छा हुई कि मैं भारतवर्ष ________________

    देलूंगी।

    इसी से चली आई हैं न! अच्छा बेटा! इनको कोई कष्ट तो नहीं? हम लोग इनके शिष्टाचार से अपरिचित हैं। चौबेजी! आप ही न मेम साहब के लिए…ओ इनका नाम क्या है, यह पूछना तो मैं भूल ही गई।

    मेरा नाम 'शैला' है मां जी! शैला की बोली घंटी की तरह गूंज उठी! श्यामदुलारी के मन में ममता उमड़ आई। उन्होंने कहा-चौबेजी! देखिए, इनको कोई कष्ट न होने पावे। इन्द्रदेव तो लड़का है, वह कभी काहे को इनकी सुविधा की खोज-खबर लेता होगा। जी सरकार! मेम साहब बड़ी चतुर हैं। वह तो कुंवर साहब का प्रबंध स्वयं आदेश देकर कराती रहती हैं। हम लोग तो अभी सीख रहे हैं। बड़े सरकार के समय में जो व्यवस्था थी, उसी से तो अब काम नहीं चल सकता! इन्द्रदेव घबरा गए थे। उन्हें कभी चौबे, कभी अनवरी पर क्रोध आता; पर वह बहाली देते रहे। __ माधुरी ने कहा-अच्छा तो भाई साहब! अभी शहर चलने की इच्छा नहीं है क्या? अब तो यहां कड़ी देहाती सर्दी पड़ेगी। नहीं, अभी तो यहीं रहूंगा। क्यों मां, यहां कोई कष्ट तो नहीं है?—इन्द्रदेव ने पूछा। अनवरी ने कहा-इस छोटी कोठी में साफ हवा कम आती है। और तो कोई…हां, बीबीरानी, मैं यह तो कहना भूल ही गई थी कि मुझे आज शहर चले जाना चाहिए। कई रोगियों को आज ही तक के लिए दवा दे आई हूं। मोटर तो मिल जाएगी न? ठहरिए, आप तो न जाने क्यों घबराई हैं। अभी तो मां की दवा…माधुरी की बात पूरी न होने पाई कि अनवरी ने कहा-दवा खाएगी तो नहीं, यही लगाने की दवा है। लगाते रहिए, मुझे रोक कर क्या कीजिएगा। हां, यहां साफ हवा मिलनी चाहिए, इसके लिए आप सोचिए। __चौबेजी बीच में बोल उठे-तो बड़ी सरकार उस कोठी में रहें, खुले हुए कमरे और दालान उसमें तो हैं ही। बोलने के लिए तो बोल गए; पर चौबेजी कई बातें सोचकर दांत से अपनी जीभ दबाने लगे। उनकी इच्छा तो हुई कि अपने कान भी पकड़ लें; पर साहस न हुआ। इन्द्रदेव चुप रहे। शैला ने कहा-मां जी! बड़ी कोठी में चलिए। यहां न रहिए। -वह बेचारी मूल गई कि श्यामदुलारी उसके साथ कैसे रहेंगी! श्यामदुलारी ने इन्द्रदेव का चेहरा देखा। वह उतरा हुआ तो नहीं था; किंतु उस पर उत्साह भी न था। माधुरी ने शैला को स्वयं कहते हुए जब सुना, तो वह बोली-अच्छा तो है मां! मेम साहब और अनवरी बीबी इसमें आ जाएंगी। हम लोग वहीं चलकर रहें। अनवरी ने कहा-मुझे एक दिन में लौट आने दीजिए। श्यामदुलारी ने देखा कि काम तो हो चला है, अब इस बात को यहीं रोक देना चाहिए। वह बोली-बेटा! कलेक्टर साहब ने नमूने का गांव बसाने का जो नक्शा भेजा था, उसे तुमने देखा? नहीं मां, अभी तो नहीं-शैला के पास वह है। इन्हें गांवों से बड़ा प्रेम है। मैंने इन्हीं के ऊपर यह भार छोड़ दिया है। इसके लिए यही एक योजना तैयार करने में लगी हैं। श्यामदुलरि सावधान हो गईं। शैला ने कहा-मां जी, अभी तो मैं गांवों में जाकर यहां की बातें समझने लगी हूं। फिर भी बहुत-सी बातें अभी नहीं समझ सकी हूं। किसी दिन आपको अवकाश रहे, तो मैं नक्शा ले आऊं?

  • चाँदी की डिबिया

    चाँदी की डिबिया

    Aproximadamente 33.905 palavras.

    चाँदी की डिबिया
    https://hi.wikisource.org/wiki/चाँदी_की_डिबिया

    अंक १

    दृश्य १

    परदा उठता है, और वार्थिविक का नए ढंग से सजा हुआ बड़ा खाने का कमरा दिखाई देता है। खिड़की के परदे खिचे हुए हैं। बिजली की रौशनी हो रही है। एक बड़ी गोल खाने की मेज़ पर एक तश्तरी रक्खी हुई है, जिसमें व्हिस्की, एक नलकी और एक चाँदी की सिगरेट की डिबिया है। आधी रात गुज़र चुकी है।

    वज़ार दकेबाहर कुछ हल चल सुनाई देती है। दरवाज़ा झोंके से खुलता है; जैक वार्थिविक कमरे में इस तरह आता है, मानो गिर पड़ा है।। वह दरवाज़े का कुण्डा पकड़कर खड़ा सामने देख रहा है और आनन्द से मुसकुरा रहा है। वह शाम के कपड़े पहिने हुए है, और वह हैट लगाए हुए है जो तमाशा देखते वक्त लगाई जाती है। उसके हाथ में एक नीले रंग का मख़मल का ज़नाना बटुआ है। उसके लड़कोंधे चेहरे पर ताज़गी झलक रही है। डाढ़ी और मूँछ मुड़ी हुई है। उसके वाजू पर एक ओवरकोट लटक रहा है।

    जैक

    अहा! मैं मज़े से घर पहुँच गया–

    [विवाद के भाव से]

    कौन कहता है, कि मैं बिना मदद के दरवाजा नहीं खोल सकता था?

    [वह लड़खड़ाता है, बटुए को झुलाता हुआ अन्दर आता है। एक ज़नाना रूमाल और लाल रेशम की थैली गिर पड़ती है।]

    खूब झाँसा दिया–सभी चीज़ गिरी पड़ती हैं। कैसा चकमा दिया है चुड़ैल को, उसका बेग साफ़ उड़ा लाया,

    [बटुए को झुलाता है।]

    खूब झाँसा दिया,

    [चाँदी की डिबिया से एक सिगरेट निकाल कर मुँह में रख लेता है।]

    उस गधे को कभी कुछ नहीं दिया!

    [अपनी जेब टटोलता है और एक शिलिङ्ग बाहर निकालता है। वह उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है, और लुढ़क जाती है। वह उसे खोजता है।]

    इस शिलिंग का बुरा हो!

    [फिर खोजता है।]

    एहसान को भूलना नीचता है ! मगर कुछ भी नहीं,

    [वह हँसता है।]

    मैं उससे कह दूँगा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है।

    [वह दरवाज़े से रगड़ता हुआ निकलता है, और दालान से होता दुआ , ज़रा देर लौट आता है। उसके पीछे-पीछे जोन्स आता है, जो नशे में चूर है। जोन्स की उम्र लगभग तीस साल है। गाल पिचके हुए, आँखों के गिर्द गड्ढे पड़े हुए, कपड़े फटे हुए हैं, वह इस तरह ताकता है जैसे बेकार हो और पिछलगुए की भाँति कमरे में आता है।]

    जैक

    शिः और चाहे जो कुछ करो मगर शोर मत करना। दरवाज़ा बन्द कर दो और थोड़ी-सी पियो।

    [बड़ी गंभीरता से।]

    तुमने मुझे दरवाज़ा खोलने मैं मदद दी–मगर मेरे पास कुछ है नहीं। यह मेरा घर है, मेरे बाप का नाम वार्थिविक है–वह पार्लिमेंट का मेम्बर हैं उदार–मेम्बर है। यह मैं तुमसे पहिले ही बता चुका। थोड़ी–सी पियो

    [वह शराब ढालता है, और पी जाता है।]

    मुझे नशा नहीं है,

    [सोफा पर लेटकर।]

    कोई हर्ज नहीं। तुम्हारा क्या नाम है? मेरा नाम वार्थिविक है, मेरे बाप का भी यही नाम है; मैं भी लिबरल हूँ।–तुम क्या हो?

    जोन्स

    [भारी तेज़ आवाज़ में।]

    मैं तो पक्का 'अनुदार' हूँ। मेरा नाम है जोन्स। मेरी बीबी यहाँ काम करती है; वह मज़दूरनी है, यहाँ काम करती है।

    जैक

    जोन्स?

    [हँसता है।]

    एक दूसरा जोन्स मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता है। मैं खुद साम्यवादी नहीं हूँ। मैं लिबरल हूँ।–दोनों में बहुत कम अन्तर है। क्योंकि लिबरल दल के सिद्धान्त ही ये हैं। हम सब क़ानून के सामने बराबर हैं–बेहूदी बात है, बिलकुल वाहियात,

    [हँसता है।]

    मैं क्या कहने जा रहा था। मुझे थोड़ी सी व्हिस्की दो।

    [जोन्स उसे व्हिस्की देता है, और नलकी से पानी का छींटा मारता है।]

    मैं तुमसे यह कहने जा रहा था, कि मेरी उससे तकरार हो गई।

    [बटुए को झुलाता है।]

    थोड़ी सी पीलो जोन्स–तुम्हारे बग़ैर यह काम ही न हो सकता–इसी से मैं तुम्हें पिला रहा हूँ। अगर कोई जान भी जाय, कि मैंने उसके रुपये उड़ा दिए, तो क्या परवा। चुडैल!

    [सोफ़ा पर पैर रख लेता है। ]

    शोर मत करो और जो चाहे सो करो। शराब उंडेलो और ख़ूब डटकर पियो। सिगरेट लो, जो चाहे सो लो। तुम्हारे बग़ैर वह हरगिज़ न फँसती।

    [ आँखे बन्द करके। ]

    तुम टोरी हो, मैं ख़ुद लिबरल हूं, थोड़ी-सी पियो।-मैं बड़ा बाँका आदमी हूँ।

    [उसका सिर पीछे की तरफ़ लटक जाता है, वह मुसकुराता हुआ सो जाता है, और जोन्स खड़ा होकर उसकी तरफ़ ताकता है; तब जैक के हाथ से गिलास छीनकर पी जाता है। वह बटुए को जैक की कमीज़ के सामने से उठा लेता है। उसे रोशनी में देखता है और सूँघता है।]

    जोन्स

    जआ किसी अच्छे आदमी का मुँह देखकर उठा था। [ जैक के सामने की जेब में उसे ठूस देता है ]

    जैक

    [ बड़बड़ाता हुआ। ]

    चुडैल! कैसा चकमा दिया।

    [ जैक चारों तरफ़ कनखियों से देखता है, वह व्हिस्की उँडेलकर पी जाता है तब चाँदी की डिबिया से एक सिगरेट निकाल कर दो एक दम लगाता है, और व्हिस्की पीता है फिर उसे बिलकुल होश नहीं रहता।]

    जोन्स

    बड़ी अच्छी-अच्छी चीज़ें जमा की हैं,

    [ वह ज़मीन पर पड़ी हुई लाल थैली को देखता है। ]

    है माल बढ़िया।

    [ वह उसे ऊँगली से छूता है, किश्ती में रख देता है और जैक की तरफ ताकता है। ]

    है मोटा आसामी।

    [ वह आईने में अपनी सूरत देखता है। अपने हाथ उठाकर और उंगलियों को फैलाकर वह उसकी तरफ़ झुकता है; तब फिर मुट्ठी बांँधकर जैक की तरफ ताकता है, मानो नींद में उसके मुसकुराते हुए चेहरे पर घूंसा मारना चाहता है। एकाएक वह बाक़ी बची हुई ह्विस्की ग्लास में उँडेलता है और पी जाता है। तब कपटमय हर्ष के साथ वह चाँदी की डिबिया और थैली उठाकर जेब में रख लेता है। ]

    बचा मैं तुम्हें चरका दूंँगा। इस फेर में न रहना।

    [ गुरगुराती हुई हँसी के साथ वह दरवाज़े की ओर लड़खाता हुआ जाता है। उसका कंधा स्विच से टकरा जाता है, रोशनी बुझ जाती है। किसी बन्द होते हुए दरवाज़े की आवाज़ सुनाई देती है। ]

    परदा गिरता है।

    परदा फिर तुरन्त उठता है।

    दृश्य २

    [ वार्थिविक का खाने का कमरा। जैक अभी तक सोया हुआ है। सुबह की रौशनी परदों से होकर आ रही हैं। सुबह की रोशनी परदों से होकर आ रही है। समय साढ़े आठ बजे का है। ह्वीलर जो एक फुर्तीली औरत है, कूड़े की टोकरी लिये आती है। और मिसेज़ जोन्स आहिस्ता-आहिस्ता कोयले की टोकरी लिए दाख़िल होती है। ]

    ह्वीलर

    [ परदा उठाकर ]

    जब तुम कल चली गईं, तो वह तुम्हारा निखट्ट शौहर तुम्हारी टोह में चक्कर लगा रहा था। मैं समझती हूँ, शराब के लिए तुमसे रुपया मांँग रहा था। वह आध घंटे तक यहाँ कोने में पड़ा रहा। जब मैं कल रात को डाक लेने गई तो मैंने उसे होटल के बाहर खड़े देखा। अगर तुम्हारी जगह में होती, तो कभी उसके साथ ने रहती। मैं कभी ऐसे आदमी के साथ न रहती, जो मुझ पर हाथ साफ़ करता। मुझसे यह बरदाश्त ही न होता। तुम लड़कों को लेकर क्यों नहीं उसे छोड़ देती हो? अगर तुम यह बरदाश्त करती रहोगी, तो वह और भी सिर चढ़ जायगा। मेरी समझ में नहीं अाता, कि महज़ शादी कर लेने से कोई आदमी क्यों तुम्हें दिक़ करे।

    मिसेज़ जोन्स

    [ काली आँखें और काले बाल, चेहरा अण्डाकार, आवाज़ चिकनी, नर्म और मीठी। सूरत से सहनशील मालूम होती है। उदासी से बातें करती है। वह नीले रंग का कपड़ा पहिने हुए है और उसके जूते में सूराख़ हैं। ]

    वह आधी रात को घर आया और अपने होश में न था। उसने मुझे जगाया और पीटने लगा। उसे सिर पैर की कुछ ख़बर ही नहीं मालूम होती थी। मैं उसे छोड़ना तो चाहती हूँ, मगर डरती हूँ, न मालूम मेरे साथ क्या करे। जब वह नशे में होता है, तो उसके क्रोध का वारापार नहीं रहता।

    ह्वीलर

    तुम उसे क़ैद क्यों नहीं करा देतीं? जब तक तुम उसे बड़े घर न पहुँचा दोगी, तुम्हें चैन न मिलेगा। अगर मैं तुम्हारी जगह होती, तो कल ही पुलीस में इत्तला कर देती। वह भी समझता कि किसी से पाला पड़ा था।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ मुझे जाना तो चाहिए, क्योंकि जब वह नशे में होता है तो मेरे साथ बुरी तरह पेश आता है। लेकिन बहिन! बात यह है कि उन्हें आजकल बड़ा कष्ट है।—दो महीने से घर बैठे हुए हैं। और यही फ़िक्र उन्हें सता रही है। जब कहीं मजूरी लग जाती है, तब वह इतना उजडुपन नहीं करते। जब ठाले बैठते हैं तभी उनके सिर भूत सवार होता है।

    ह्वीलर

    अगर तुम हाथ पैर न हिलाओगी, तो उससे गला न छूटेगा।

    मिसेज़ जोन्स

    अब यह दुर्गति नहीं सही जाती; मुझे रात-रात भर जागते गुज़र जाती है। और यह भी नहीं है कि कुछ कमाकर लाता हो क्योंकि घर का सारा बोझ मेरे सिर है। ऐसी-ऐसी गालियाँ देता है, क्या कहूँ। कहता है कि तू शुहदों को साथ लिये फिरती है। बिलकुल झूठी बात है, मुझसे कोई आदमी नहीं बोलता, हाँ, वह ख़ुद औरतो के पीछे पड़ा रहता है। उसकी इन्हीं सब बातों से मेरा जी जला करता है। मुझे धमकाता है, कि अगर तुमने मुझे छोड़ा तो सिर काट लूँगा। यह सब शराब और चिंता का फल है। हाँ, यों आदमी वह बुरा नहीं है। कभी-कभी वह मुझसे मीठी-मीठी बातें करता है, लेकिन मैंने उसके हाथों इतने दुःख भोगे हैं कि उसकी मीठी बातें भी बुरी लगती हैं। मैं तो उसकी बातों का जबाब तक नहीं देती। जब नशे में नहीं होता, तो लड़कों से भी प्रेम करता है।

    ह्वीलर

    तुम्हारा मतलब है, जब वह नशे में होता है?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ

    [उसी स्वर में।]

    वह छोटे साहब सोफ़ा पर सोए हुए हैं।

    [ दोनों चुपचाप जैक की तरफ़ ताकती हैं।]

    मिसेज जोन्स

    [ नर्म आवाज़ में। ]

    मालूम होता है, नशे में हैं।

    ह्वीलर

    शुहदा है, शुहदा, मुझे विश्वास है, कि तुम्हारे शौहर की तरह इसने भी रात को पी थी। इसकी बेकारी एक दूसरी ही तरह की है, जिसमें पीने ही की सूझती है। जाकर मारलो से कह आऊँ, यह उसका काम है।

    [ वह चली जाती है ]

    [ मिसेज़ जोन्स झुककर धीरे-धीरे झाड़ू देने लगती है।]

    जैक

    [ जाग कर। ]

    कौन है? क्या बात है?

    मिसेज़ जोन्स

    मैं हूँ सरकार, मिसेज़ जोन्स।

    जैक

    [ ठउ बैठता है, और चारों तरफ़ ताकता है। ]

    मै कहाँ हूं? क्या वक्त है?

    मिसेज़ जोन्स

    नौ का अमल होगा हुज़ूर। नौ

    जैक

    नौ! क्यों? क्या?

    [ उठकर ज़बान चलाता है और सिर पर हाथ फेरकर मिसेज़ जोन्स की तरफ़ घूरकर देखता है। ]

    देखो तुम मिसेज़ जोन्स, यह न कहना कि तुमने मुझे यहाँ सोते पाया।

    मिसेज़ जोन्स

    न कहूँगी, न कहूँगी सरकार।

    जैक

    इत्तफ़ाक की बात है! मुझे याद नहीं आता कि मैं यहाँ कैसे सो गया। शायद मैं चारपाई पर जाना भूल गया। अजीब बात है। मारे दर्द के सिर फटा जाता है। देखो मिसेज़ जोन्स, किसी से कुछ कहना मत।

    [ बाहर जाता है ड्योढ़ी में मारलो से मुठभेड़ होती है। मारलो जवान और गंभीर है। उसकी डाढ़ी मूँछ साफ़ है, और बाल माथे की तरफ़ से कंघी करके मुरगे की कलगी की तरह ऊपर उठा दिए गए हैं। है तो वह ख़ानसामा, लेकिन अच्छे चाल चलन का आदमी है। वह मिसेज़ जोन्स को देखता है, और ओंठ दबाकर मुसकुराता है। ]

    मारलो

    पहिली बार नहीं पी है, और न अंतिम बार ही है। ज़रा कुछ बौखलाया हुआ मालूम होता था क्यों मिसेज़ जोन्स?

    मिसेज़ जोन्स

    अपने होश में न थे, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया।

    मारलो

    तुम्हारी तो आदत पड़ी हुई है। तुम्हारे शौहर का क्या हाल है?

    मिसेज़ जोन्स

    [ नर्म आवाज़ से ]

    कल रात को तो उन की हालत अच्छी न थी। कुछ सिर पैर की ख़बर ही न थी। बहुत रात गए आए, और गालियाँ बकते रहे। लेकिन इस वक़्त सो रहे हैं।

    मारलो

    इसी तरह मज़दूरी ढूॅंढ़ी जाती है, क्यों?

    मिसेज जोन्स

    उनकी आदत तो यह है, कि रोज़ सवेरे काम की तलाश में निकल जाते हैं। और कभी-कभी इतने थक जाते हैं कि घर आते ही गिर पड़ते हैं। भला यह कैसे कहूँ कि वह काम नहीं खोजते। ज़रूर खोजते हैं। रोजगार मंदा है।

    [ वह टोकरी और झाड़ू सामने रक्खे चुप चाप खड़ी हो जाती है। ज़िन्दगी की अगली पिछली बातें किसी वन्य दृश्य की भाँति उसकी आखों के सामने आने लगती है, और वह उन्हें स्थिर, उदासीन नेत्रों से देखती है। ]

    लेकिन मेरे साथ वह बुरी तरह पेश आते हैं। कल रात उन्हों ने मुझे पीटा और ऐसी ऐसी गालियां दीं कि रोंगटे खड़े होते हैं।

    मारलो

    बैंक की छुट्टी थी, क्यों? उसे होटल का चस्का पड़ गया है। यही बात है। मैं उसे रोज़ बड़ी रात तक कोने में बैठे देखता हूँ। वहीं

    फिरा करता है।

    मिसेज़ जोन्स

    काम की खोज में दिन भर दौड़ते-दौड़ते बहुत थक जाते हैं। और कहीं कोई दूसरा रोज़गार भी नहीं मिलता, इसलिए अगर एक घूँट भी पी लेते हैं, तो सीधे दिमाग़ पर चढ़ जाती है। लेकिन जिस तरह वह मेरे साथ पेश आते हैं, उस तरह अपनी बीबी के साथ न पेश आना चाहिए। कभी-कभी तो वह मुझे घर से निकाल देते हैं। और मैं सारी रात मारी-मारी फिरती हूँ। वह मुझे घर में घुसने भी नहीं देते। पीछे से पछताते हैं। और वह मेरे पीछे-पीछे लगे रहते हैं, गलियों में मुझ पर ताक लगाए रहते हैं, उन्हें ऐसा न चाहिए, क्योंकि मैंने कभी उनके साथ दगा नहीं की। और मैं उन से कहती हूँ, कि मिसेज़ बार्थिविक को तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता। लेकिन इस पर उन्हें क्रोध आ जाता है, और वह अमीरों को गालियाँ देने लगते हैं। उनकी नौकरी भी इसी वजह से छूटी, कि वह मुझे बुरी तरह सताते थे। तबसे वह अमीरों के जानी दुशमन हो गये हैं। उन्हें देहात में सईसी की अच्छी जगह मिल गई थी। लेकिन जब मुझे मारने-पीटने लगे, तो बदनाम हो गए।

    मारलो

    सज़ा हो गई?

    मिसेज़ जोन्स

    हां; मालिक ने कहा, मैं ऐसे आदमी को नहीं रक्खूँगा, जिसकी लोग इतनी निन्दा करते हैं। उसने यह भी कहा कि इसकी देखादेखी और लोग भी ऐसा ही करेंगे। लेकिन यहाँ का काम

    छोड़ दूँ तो मेरा निबाह न हो। मेरे तीन बच्चे हैं। और मैं नहीं चाहती कि वह मेरे पीछे-पीछे गलियों में घूमें और शोर ग़ुल मचाएँ।

    मारलो

    [ खाली बोतल को ऊपर उठाकर ]

    एक बूंद भी नहीं! अगर अबको तुम्हें मारे, तो एक गवाह लेकर सीधे कचहरी चली जाना।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ मैंने ठान लिया है। ज़रूर जाऊँगी।

    मारलो

    हूँ! सिगरेट की डिबिया कहाँ है ?

    [ वह चांदी की डिबिया ढूंढता है । मिसेज़ जोन्स की तरफ देखता है, जो हाथों और घुटनों के बल झाडू दे रही है, वह रुक जाता है, और खड़ा-खड़ा कुछ सोचने लगता है। वह तश्तरी में से दो अधजले सिगरेट उठा लेता है, और उनके नाम पढ़ता है। ]

    नेस्टर—डिबिया कहाँ चली गई?

    [ वह विचारपूर्ण भाव से फिर मिसेज़ जोन्स को देखता है, और जैक का ओवरकोट लेकर जेबें टटोलता है। ह्वीलर नाश्ते की तश्तरी लिए आती है। ]

    मारलो

    [ ह्वीलर से अलग ]

    तुमने सिगरेट की डिबिया देखी है?

    हीलर

    नहीं।

    मारलो

    तो वह गा़यब हो गई। मैंने रात उसे तश्तरी में रख दिया था, और उन्होंने सिगरेट पिया भी।

    [ सिगरेट के जले हुए टुकड़े दिखाकर ]

    इन जेबों में नहीं है। आज ऊपर कब ले गए? जब वह नीचे आयें तो उनके कमरे में खूब तलाश करना। यहाँ कौन-कौन आया था?

    हीलर

    अकेली मैं और मिसेज़ जोन्स।

    मिसेज जोन्स

    यह कमरा तो हो गया, क्या बैठक भी साफ़ कर लूँ?

    ह्वीलर

    [ उसे सन्देह से देखकर ]

    तुमने देखा है? पहिले इस छोटी कोठरी को साफ़ कर दो।

    [ मिसेज़ जोन्स टोकरी और ब्रुश लिए बाहर चली जाती है, मारलो और ह्वीलर एक दूसरे के मुँह की ओर ताकते हैं ]

    मारलो

    पता तो चल ही जायगा।

    ह्वीलर

    [ हिचकिचाकर ]

    ऐसा तो नहीं हुआ है कि उसने—

    [ द्वार की ओर देखकर सिर हिलाती है। ]

    मारलो

    [ दृढ़ता से ]

    नहीं, मैं किसी पर संदेह नहीं करता।

    हीलर

    लेकिन मालिक से तो कहना ही पड़ेगा।

    मारलो

    जरा ठहरो, शायद मिल ही जाय, हमें किसी पर संदेह न करना चाहिए। यह बात मुझे पसन्द नहीं।

    परदा गिरता है।

    तुरन्त ही फिर परदा उठता है।

    दृश्य ३

    [ बार्थिविक और मिसेज़ बार्थिविक मेज़ पर बैठे नाश्ता कर रहे हैं, पति की उम्र ५० और ६० के बीच में है। चेहरे से ऐसा मालूम होता है, कि अपने को कुछ समझता है। सिर गंजा है, आँखों पर ऐनक है, और हाथ में टाइम्स पत्र है। स्त्री की उम्र ५० के लगभग होगी। अच्छे कपड़े पहिने हुए हैं। बाल खिचड़ी हो गए हैं। चेहरा सुन्दर है, मुद्रा दृढ़ है। दोनों आमने-सामने बैठे हैं। ]

    बार्थिविक

    [ पत्र के पीछे से ]

    बार्नसाइड के बाई इलेक्शन में मजूर दल का आदमी आ गया प्रिये।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मजूर दल का दूसरा आदमी आ गया! समझ में नहीं आता लोग क्या करने पर तुले हुए हैं।

    बार्थिविक

    मैंने तो पहिले ही कहा था। मगर इससे होता क्या है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    वाह! तुम इन बातों को इतनी तुच्छ क्यों समझते हो। मेरे लिए तो यह आफ़त से कम नहीं। और तुम और तुम्हारे लिबरल भाई इन आदमियों को और शह देते हैं।

    बार्थिविक

    [ भौहें चढ़ाकर ]

    सब दलों के प्रतिनिधियों का होना उचित सुधार के लिए ज़रूरी है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम्हारे सुधार की बात सुनकर मेरा जी जल उठता है। समाज सुधार की सारी बातें पागलों का सी हैं। हम खूब जानते हैं कि उनका क्या मंशा है। वे सब कुछ अपने लिए चाहते हैं। ये साम्यवादी और मजूर दल के लोग परले सिरे के मतलबी हैं; न उनमें देशभक्ति है। ये सब ऊँचे दरजे के लोग हैं। वे भी वही चाहते हैं, जो हमारे पास मौजूद है।

    बार्थिविक

    जो हमारे पास है वह चाहते हैं!

    [ आकाश की ओर देखता है ]

    तुम क्या कहती हो प्रिये?

    [ मुँह बनाकर ]

    मैं कान के लिये कौवे के पीछे दौड़नेवालों में नहीं हूं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मलाई दूँ? सबके सब बौखल हैं। देखते जाव थोड़े दिनों में हमारी पूंजी पर टैक्स लगेगा। मुझे तो विश्वास है, कि वह हर एक चीज पर कर लगा देंगे। उन्हें देश का तो कोई ख़याल ही नहीं। तुम लिबरल और कंज़रवेटिव सब एक से हो। तुम्हें नाक के आगे तो कुछ दिखाई ही नहीं देता। तुममें ज़रा भी विचार नहीं है। तुम्हें चाहिए कि आपस में मिल जाव, और इस अँखुए को ही उखाड़ दो।

    बार्थिविक

    बिलकुल वाहियात बक रही हो। यह कैसे हो सकता है कि लिबरल और कंजरवेटिव मिल जाँय। इससे मालूम होता है कि औरतों के लिए यह कितनी—लिबरलों का सिद्धांत ही यह है, कि जनता पर विश्वास किया जाय।

    मिसेज़ बार्थिविक

    चुपके से नाश्ता करो जॉन, मानो तुममें और कंज़रवेटिवों में बड़ा भारी फर्क है। सभी बड़े आदमियों के एक ही सिद्धांत और एकही स्वार्थ होते हैं।

    शांत होकर

    उफ़! तुम ज्वालामुखी पर बैठे हो जोन ।

    बार्थिविक

    क्या!

    मिसेज़ बार्थिविक

    मैं ने कल पत्र में एक चिट्ठी पढ़ी थी, उस आदमी का नाम भूलती हूँ, लेकिन उसने सारी बातें खोलकर रख दी थीं। तुम लोग किसी बात की असलियत नहीं समझते।

    बार्थिविक

    हूँ! ठीक।

    [ भारी स्वर से ]

    मैं लिबरल हूँ, इस विषय को छोड़ो।

    ' मिसेज़ बार्थिविक

    टोस्ट दूँ? मैं इस आदमी के विचारों से सहमत हूँ! शिक्षा, नीची श्रेणी के आदमियों को चौपट कर रही है। इस से उनका सिर फिर जाता है, और यह सभी के लिये हानिकर है। मैं नौकरों के रंग ढंग में अब वह बात ही नहीं पाती।

    बार्थिविक

    [ कुछ संदेह के साथ ]

    अगर तबदीली से कोई अच्छी बात पैदा हो जाय, तो मैं उसका स्वागत करने को तैयार हूँ।

    [ एक ख़त खोलता है ]

    अच्छा, मास्टर जैक का कोई नया मामला है, "हाई स्ट्रीट आक्सफ़ोर्ड। महाशय, हमारे पास मि०। जान बार्थिविक की ४० पौंड की हुन्डी आयी है।" अच्छा यह ख़त उसके नाम है! "हम अब इस चेक को भेजते हैं, जो आपने हमारे यहां भुनाया था, पर जैसा मैं अपने पहले पत्र में लिख चुका हूँ, जब वह आपके बैंक में भेजा गया तो उन लोगों ने उसे नहीं सकारा। भवदीय मास एंड सन्स, टेलर्स।" ख़ूब!

    [ चेक को ध्यान से देखकर ]

    है मज़ेदार बात! इस लौंडे पर तो मुक़दमा चल सकता है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    जाने भी दो जान, जैक की नीयत बुरी न थी। उसने यही समझा होगा कि मैं कुछ रुपए ऊपर ले रहा हूँ। मेरा अब भी यही ख़याल है कि बैंक को वह चेक भुना देना चाहिए था। उन लोगों को मालूम होगा कि तुम्हारी कितनी साख है।

    बार्थिविक

    [ पत्र और चेक को फिर लिफ़ाफ़े में रखकर ]

    अदालत में लाला की आँखें खुल जातीं।

    [ जैक आ जाता है। उसे देखते ही वह चुप हो जाता है, वास्केट के बटन बंद कर लेता है। ठुड्डी पर अस्तुरा लग गया है। उसे दबा लेता है।]

    जैक

    [ उन दोनों के बीच में बैठकर और प्रसन्न मुख बनने की इच्छा करके ] खेद है मुझे देर हो गई

    [ प्यालों को अरुचि से देखकर ]

    अम्मा, मुझे तो चाय दीजिए। मेरे नाम का कोई ख़त है?

    [ बार्थिविक उसे ख़त दे देता है ]

    यह क्या बात है, इसे खोल किसने डाला? मैं आप से कह चुका मेरे ख़तो

    बार्थिविक

    [ लिफ़ाफ़े को छूकर ]

    मेरा ख़याल है कि यह मेरा ही नाम है।

    जैक

    [ खिन्न होकर ]

    आप ही का नाम तो मेरा भी नाम है। इसे मैं क्या करूँ।

    [‌ ख़त पढ़ता है और बड़बड़ाता है ]

    बदमाश!

    वार्थिविक

    [ उसे देखकर ]

    तुम इतने सस्ते छूटने के लायक़ नहीं हो।

    जैक

    क्या अभी आप मुझे काफ़ी नहीं कोस चुके!

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्यों उसे दिक़ करते हो जॉन? कुछ नाश्ता कर लेने दो।

    बार्थिविक

    अगर मैं न होता तो जानते हो तुम्हारी क्या दशा होती? यह संयोग की बात है—-मान लो तुम किसी ग़रीब आदमी या क्लर्क के बेटे होते। ऐसा चेक भुनाना जिसे तुम जानते हो कि चल न सकेगा, क्या कोई मामूली बात है! तुम्हारी सारी ज़िंदगी बिगड़

    ३

    जाती। अगर तुम्हारे यही ढंग हैं, तो ईश्वर ही

    मालिक है। मैं तो ऐसी बातों से हमेशा दूर रहा।

    जैक

    आपके हाथ में हमेशा रुपए रहते होंगे। अगर आपके पास रुपए का ढेर हो तो फिर इसकी ज़रूरत —

    जॉन

    मेरी हालत ठीक इसकी उलटी थी। मेरा बाप कभी मुझे काफ़ी रुपए न देता था।

    जैक

    आपको कितना मिलता था?

    जॉन

    इसमें कोई सार नहीं। सवाल है, क्या तुम अनुभव करते हो कि तुमने कितना बड़ा अपराध किया है।

    जैक

    यह सब मैं कुछ नहीं जानता। हाँ अगर आपका

    खयाल है कि मैंने बेजा किया तो मुझे दुःख है। मैं तो यह पहले ही कह चुका। अगर मैं पैसे पैसे को मुहताज न होता तो कभी ऐसा काम न करता।

    बार्थिविक

    चालीस पौंड में से अब कितने बच रहे?

    जैक

    १ ॥ [हिचकता हुआ]

    ठीक याद नहीं, मगर ज़्यादा नहीं है।

    बार्थिविक

    आख़िर कितना?

    जैक

    [उद्दंडता से]

    एक पैसा भी नहीं बचा।

    बार्थिविक

    क्या?

    जैक

    मारे दर्द के सिर फटा जाता है

    [अपने हाथ पर सिर झुका लेता है]

    मिसेज बार्थिविक

    सिर में दर्द कब से होने लगा बेटा? कुछ नाश्ता तो कर लो।

    जैक

    [सांस खींचकर]

    बड़ा दर्द हो रहा है!

    मिसेज बार्थिविक

    क्या उपाय करूँ? मेरे साथ आओ बेटा! मैं तुम्हें ऐसी चीज़ खिला दूंगी कि सारा दर्द तुरन्त जाता रहेगा।

    [दोनों कमरे से चले जाते हैं; और बार्थिविक ख़त को फाड़कर अँगेठी में डाल देता है। इतने में मारलो आ जाता है और चारों ओर आँखें दौड़ा कर जाना चाहता है।]

    बार्थिविक

    क्या है मारलो? क्या खोज रहे हो?

    मारलो

    मि० जॉन को देख रहा था।

    बार्थिविक

    मि० जॉन से क्या काम है?

    मारलो

    मैंने समझा शायद यहां हों।

    बार्थिविक

    [सन्देह के भाव से ]

    हाँ, लेकिन उनसे तुम्हें काम क्या है?

    मारलो

    [ लापरवाई से ]

    एक औरत आई है। कहती है उनसे कुछ कहना चाहती हूँ।

    बार्थिविक

    औरत! इतने सवेरे! कैसी औरत है?

    मारलो

    [ स्वर से बिना कोई भाव प्रकट किए हुए ]

    कह नहीं सकता हज़ूर। कोई खास बात नहीं। मुमकिन है कुछ मांगने आई हो। मेरा ख़याल है कोई ख़ैरात मांगनेवाली है।

    बार्थिविक

    क्या उन औरतों के से कपड़े पहने है?

    मारलो

    जी नहीं, मामूली कपड़े पहने है।

    बार्थिविक

    कुछ मांगना चाहती है?

    मारलो

    जी नहीं।

    वार्थिविक

    तुम उसे कहाँ छोड़ आए हो?

    मारलो

    बड़े कमरे में हुजूर!

    बार्थिविक

    बड़े कमरे में! तुम कैसे जानते हो कि वह चोरनी नहीं है? घर की कुछ टोह लेने आई हो?

    मारलो

    मुझे ऐसी तो नहीं मालूम होती।

    वार्थिविक

    ख़ैर, यहां लाओ। मैं खुद उससे मिलूँगा। मारलो चुपके से सिर हिलाकर भय प्रकट करता चला जाता है। ज़रा देर में एक पीले मुख की युवती को साथ लिए लौटता है। उसकी आँखें काली हैं, चेहरा सुन्दर, कपड़े तरहदार हैं, और काले रंग के। लेकिन कुछ फूहड़ है। सिर पर एक काली टोपी है जिस पर सुफेद किनारी है। उस पर परमा के बैंजनी फूलों का एक गुच्छा बेढंगेपन से लगा हुआ है। मि० बार्थिविक को देखकर वह हक्काबक्का हो जाती है। मारलो चला जाता है। ]

    अपरिचित स्त्री

    अरे! क्षमा कीजिएगा। कुछ भूल हो गई है।

    [ वह जाने के लिए घूमती है ]

    बार्थिविक

    आप किससे मिलना चाहती हैं श्री मती जी?

    अपरिचित

    [ रुककर और पीछे की ओर देखकर ]

    मैं मि० जान बार्थिविक से मिलना चाहती थी।

    बार्थिविक

    जान बार्थिविक तो मेरा ही नाम है श्रीमती जी। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?

    अपरिचित

    जी—मैं यह नहीं—

    [ आँखें झुका लेती है बार्थिविक उसे ध्यान से देखता है और ओठों को सिकोड़ता है। ]

    बार्थिविक

    शायद आप मेरे बेटे से मिलना चाहती हैं?

    अपरिचित

    [ जल्दी से]

    हाँ हाँ, यही बात है।

    बार्थिविक

    पूछ सकता हूँ कि मुझे किससे बातें करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है?

    अपरिचित

    [ उसके मुख पर विनय और आग्रह का भाव दिखाई देता है ]

    मेरा नाम है—मगर ज़रूरत ही क्या है। मैं झमेला नहीं करना चाहती। मैं ज़रा एक मिनट के लिये आपके बेटे से मिलना चाहती हूँ।

    [ साहस से ]

    सच तो यह है कि मेरा उनसे मिलना बहुत ज़रूरी है।

    बार्थिविक

    [ अपनी बेचैनी को दबाकर ]

    मेरे बेटे की तो आज तबीयत कुछ ख़राब है। अगर ज़रूरत हो तो मैं आपका काम कर सकता हूँ। आप अपनी ज़रूरत बयान करें।

    अपरिचित

    जी—लेकिन मेरा उनसे मिलना ज़रूरी है। मैं इसी इरादे से आई हूँ। मैं कोई झमेला नहीं करना चाहती, लेकिन बात यह है—रात को—आपके बेटे ने उड़ादी—उन्होंने मेरी—

    [ रुक जाती है ]

    बार्थिविक

    [ कठोर स्वर में ]

    हाँ हाँ कहिए, क्या?

    अपरिचित

    वह मेरा—बटुआ उठा ले गए।

    बार्थिविक

    आपका बटु…..

    अपरिचित

    मुझे बटुए की चिन्ता नहीं है। उसकी मुझे ज़रूरत नहीं। मैं सच कहती हूँ मेरा इरादा बिलकुल नहीं है कि कोई झमेला हो।

    [ उसका चेहरा काँपने लगता है ]

    लेकिन—लेकिन—मेरे सब रुपए उसी बटुए में थे।

    बार्थिविक

    किस चीज़ में—किस चीज़ में?

    अपरिचित

    मेरे बटुए में एक छोटी सी थैली में रखे हुए थे। लाल रंग की रेशमी थैली थी। सच कहती हूँ, मैं न आती—मैं कोई झमेला नहीं करना चाहती। लेकिन मुझे रुपए मिलने चाहिए, कि नहीं?

    बार्थिविक

    क्या आपका यह मतलब है कि मेरे बेटे ने—?

    अपरिचित

    जी समझ लीजिए, वह अपने……..मेरा यह मतलब कि वह–

    बार्थिविक

    मैं आपका मतलब नहीं समझा।

    अपरिचित

    [ अपने पैर पटककर मोहक भाव से मुसकुराती है ]

    ओह! आप समझते नहीं—वह पिए हुए थे। मुझसे तकरार हो गई।

    बार्थिविक

    [ इसे बेशर्मी की बात समझकर ]

    कैसे? कहाँ?

    अपरिचित

    [ निःशंक भाव से ]

    मेरे घर पर। वहां एक दावत थी, और आपके सुपुत्र—

    बार्थिविक

    [ घंटी बजाकर ]

    मैं पूछ सकता हूँ कि आपको यह घर कैसे मालूम हुआ? क्या उसने अपना नाम और पता बतला दिया था?

    अपरिचित

    [ नज़र फेरकर ]

    मैंने उनके ओवर कोट से निकाल लिया।

    बार्थिविक

    [ ताने की मुसकुराहट के साथ ]

    अच्छा! आपने उसके ओवरकोट से निकाल लिया। वह इस वक्त इस प्रकाश में आपको पहचान जायगा?

    अपरिचित

    पहचान जायगा? क्या इसमें भी कोई शक है।

    [ मारलो आता है। ]

    बार्थिविक

    मि० जॉन से कहो नीचे आवें।

    [ मारलो चला जाता है और बार्थिविक बेचैन होकर कमरे में टहलने लगता है ]

    आपकी और उसकी जान पहचान कितने दिन से है?

    अपरिचित

    केवल—केवल गुडफ्रा़इडे से।

    बार्थिविक

    मेरी समझ में नहीं आता, मैं फिर कहता हूँ, मेरी समझ में नहीं आता—-

    [ वह अपरिचित स्त्री को कनखियों से देखता है, जो आँखें नीची किए खड़ी हाथ मल रही है। इतने में जैक आ जाता है। उसे देखकर वह ठिठक जाता है और अपरिचित स्त्री सनकियों की भांति खिलखिला पड़ती है। सन्नाटा छा जाता है ]

    बार्थिविक

    [ गंभीरता से ]

    यह युवती––महिला कहती हैं कि गई रात को—क्यों श्रीमती जी, गई रात को ही न—तुमने इनकी कोई चीज़ उठाली—

    अपरिचित

    [ आतुरता से ]

    मेरा बटुआ ओर मेरे सब रुपए उसी लाल रेशमी थैली में थे।

    जैक

    बटुआ?

    [ इधर उधर ताकता है कि निकल भागने का मौक़ा कहीं है ]

    मैं बटुआ क्या जानूँ।

    बार्थिविक

    [ तेज़ आवाज़ में ]

    घबड़ाओ मत। तुम्हें गई रात को इन श्रीमती जी से मिलने से इनकार है?

    जैक

    इनकार! इनकार क्यों होने लगा?

    [ स्त्री से धीमे स्वर में ]

    तुमने मेरा नाम क्यों बतला दिया? तुम्हारे यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी?

    अपरिचित

    [ आँखों में आँसू भर लाकर ]

    मैं सच कहती हूँ मैं नहीं चाहती थी—तुमने उसे मेरे हाथ से छीन लिया था। तुम्हें ख़ूब याद होगा—और उस थैली में मेरे सब रुपए थे। मैं रात ही

    ४

    तुम्हारे पीछे पाती, लेकिन मैं भम्भड़ नहीं मचाना चाहती थी, और देर भी बहुत हो गई थी—फिर तुम बिलकुल—

    बार्थिविक

    जाते कहाँ हो, बतलाओ क्या माजरा है?

    जैक

    [ चिढ़कर ]

    मुझे कुछ याद नहीं।

    [ स्त्री से धीमी आवाज़ में ]

    तुमने ख़त क्यों न लिख दिया?

    अपरिचित

    [ नाराज़ होकर ]

    मुझे रुपयों की अभी इस वक्त ज़रूरत है—मुझे आज मकान का किराया देना है।

    [ बार्थिविक की तरफ़ देखती है ]

    ग़रीबों पर सभी दाँत लगाए रहते हैं।

    जैक

    सचमुच मुझे तो कुछ याद नहीं। रात की कोई बात मुझे याद नहीं है।

    [ सिर पर हाथ रखता है ]

    बादल-सा छा गया है। और सिर में दर्द भी ज़ोर का हो रहा है।

    अपरिचित

    लेकिन आपने रुपये तो लिये थे। यह आप नहीं भूल सकते। आपने कहा भी था कि कैसा चरका दिया।

    जैक

    खै़र तो यहाँ होगा। हाँ अब मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है। मगर मैंने उसे लिया ही क्यों था?

    बार्थिविक

    हाँ तुमने लिया ही क्यों, यही तो मैं पूछता हूँ?

    [ वह तेज़ी से खिड़की की तरफ घूम जाता है ]

    अपरिचित

    [ मुसकुरा कर ]

    तुम अपने होश में न थे, ठीक है न?

    जैक

    [ शर्म से मुसकुराकर ]

    मुझे बहुत खेद है। लेकिन अब मैं क्या कर सकता हूँ?

    बार्थिविक

    हाँ कर सकते हो, तुम उसका रुपया लौटा सकते हो।

    जैक

    मैं जाकर तलाश करता हूँ, लेकिन सचमुच मेरे पास रुपए हैं नहीं।

    [ वह जल्दी से चला जाता है, और बार्थिविक एक कुर्सी रखकर उस स्त्री को बैठने का इशारा करता है। तब ओठ सिकोड़े हुए वह खड़ा हो जाता है और उसे ध्यान से देखता है। वह बैठ जाती है और उसकी तरफ़ दबी हुई आँख से देखती है। तब वह घूम जाती है और नक़ाब खींचकर चोरी से अपनी आँखें पोंछती है। इतने में जैक आ जाता है। ]

    जैक

    [ ख़ाली बटुए को दिखाता हुश्रा खिन्न भाव से ]

    यही है न? मैंने चारों तरफ़ छान डाला थैली कहीं नहीं मिलती। तुम्हें ठीक याद है, वह इस बटुए में थी?

    अपरिचित

    [ आँखों में आँसू भर कर ]

    याद? हाँ ख़ूब याद है। लाल रंग की रेशमी थैली थी। मेरे पास जो कुछ था सब उसी में था।

    जैक

    मुझ सच मुच बड़ा दुःख है। सिर में बड़ा दर्द हो रहा है। मैंने ख़िदमतगार से पूछा, लेकिन वह कहता है मैंने नहीं पाया।

    अपरिचित

    मेरे रुपए आपको देने पड़ेंगे।

    जैक

    ओह! सब तय हो जायगा, मैं सब ठीक कर दूंँगा। कितने रुपए थे?

    अपरिचित

    [ खिन्न होकर ]

    सात पौंड थे और १२ शिलिंग। वही मेरी कुल संपत्ति थी।

    जैक

    सब ठीक हो जायगा। मैं तुम्हें एक चेक भेज दूँगा।

    अपरिचित

    [ उत्सुकता से ]

    नहीं साहब, मुझे अभी दे दीजिए, जो कुछ मेरी थैली में था, वह सब दे दीजिए। मुझे आज किराया देना है, वे सब एक दिन के लिए भी न मानेंगे। मैं पहिले ही पन्द्रह दिन पिछड़ गई हूँ।

    जैक

    मुझे बहुत दुःख है, मैं सच कहता हूँ मेरे जेब में एक कौड़ी भी नहीं है।

    [ वह दबी आँखों से बार्थिविक को देखता है ]

    अपरिचित

    [ उत्तेजित होकर ]

    चलिए चलिए, मैं न मानूँगी ये मेरे रुपये हैं और आपने ले लिए हैं। मैं बगैर रुपया लिए घर न जाऊँगी। सब मुझे निकाल दगे ।

    जैक

    [ सिर पकड़कर ]

    लेकिन जब मेरे पास कुछ है ही नहीं तो दूँ क्या? मैं कह नहीं रहा हूँ कि मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है?

    अपरिचित

    [ अपना रूमाल नोचकर ]

    देखिए मुझे टालिए नहीं।

    [ विनय से दोनों हाथ जोड़ लेती है, तब एकाएक सरोष होकर कहती है ]

    अगर तुम न दोगे, तो मैं दावा कर दूंँगी, यह साफ़ चोरी है—-चोरी।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से]

    ज़रा ठहर जाइए। न्याय तो यही है कि आपके रुपए दिए जाँय और मैं इस मामले को तय किए देता हूँ।

    [ रुपए निकालकर ]

    यह आठ पौंड हैं, फ़ाज़िल पैसे थैली की क़ीमत और गाड़ी का किराया समझ लीजिए। मुझे और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। धन्यवाद देने की भी कोई ज़रूरत नहीं।

    [ घंटी बजाकर वह चुपचाप दरवाज़ा खोल देता है, अपरिचित स्त्री रुपए को बटुए में रख लेती है और जैक की तरफ़ से बार्थिविक को देखती है। उसका मुख पुलकित हो उठता है, वह मुंह अपने हाथ से छिपा लेती है और चुपके से चली जाती है। बार्थिविक दरवाज़ा बन्द कर देता है ]

    बार्थिविक

    [ गम्भीर भाव से ]

    क्यो, कैसी दिल्लगी रही!

    जैक

    [ विरक्त भाव से ]

    संयोग की बात।

    बार्थिविक

    इस तरह वह चालीस पौंड उड़ गए! पहिले एक बात फिर दूसरी बात। मैं एक बार फिर पूछता हूँ कि अगर मैं न होता, तो तुम्हारी क्या दशा होती? मालूम होता है, तुमने ईमान को ताक़ पर रख दिया। तुम उन लोगों में हो जो समाज के लिए कलंक हैं। तुम जो कुछ न कर गुज़रो वह थोड़ा है। नहीं मालूम तुम्हारी माँ क्या कहेंगी। जहाँ तक—मैं समझता हूँ तुम्हारे इस चलन के लिए कोई उज्र नहीं हो सकता। यह चित्त की दुर्बलता है। अगर किसी ग़रीब आदमी ने यह काम किया होता तो क्या तुम समझते हो, उसके साथ लेशमात्र भी दया की जाती? तुम्हें इसका सबक़ मिलना चाहिए। तुम और तुम्हारी तरह के और आदमी समाज के लिए विष फैलानेवाले हैं।

    [ क्रोध से ]

    अब फिर कभी मेरे पास मदद के लिए मत आना। तुम इस योग्य नहीं हो कि तुम्हारी मदद की जाय।

    जैक

    [ अपने पिता की ओर क्रोध से देखता है, उसके मुंह पर लज्जा या पश्चात्ताप का कोई भाव नहीं है। ] अच्छी बात है, न आऊँगा। देखूँ आप इसे कहाँ तक पसन्द करते हैं। इस वक्त भी आप ने मेरी मदद न की होती, अगर आपके प्राण इस भय से न सूख जाते कि यह बात पत्रों में छप जायगी। सिगरेट कहाँ है।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से उसे देखकर ]

    ख़ैर, अब मैं इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता।

    [ घंटी बजाता है ]

    इस बार मैं और छोड़े देता हूँ।

    [ मारलो आता है ]

    जाओ।

    [ टाइम्स के पीछे अपना मुंह छिपा लेता है। ]

    जैक

    [ प्रसन्न होकर ]

    सिगरेट कहाँ है, मारलो?

    मारलो

    मैंने रात ह्विस्की के साथ सिगरेट का बक्स भी रख दिया था। फिर इस वक्त उसका कहीं पता नहीं।

    जैक

    मेरे कमरे में देखा?

    मारलो

    जी हाँ मैं ने सारा घर छान डाला, मैंने नेस्टर सिगरेट के दो टुकड़े तश्तरी में पाए। इससे मालूम होता है, कि आपने रात को पिया होगा।

    [ हिचकता हुआ ]

    मेरा तो ख़याल है, कि कोई डिबिया को उड़ा ले गया।

    जैक

    [ बैचैनी से ]

    चुरा ले गया?

    बार्थिविक

    क्या चीज़ है। सिगरेट की डिबिया? और तो कोई चीज़ नहीं ग़ायब हुई?

    मारलो

    जी नहीं, मैंने प्लेट देख लिया।

    बार्थिविक

    आज सवेरे घर में तो कुछ गड़बड़ न थी, कोई खिड़की खुली तो न थी।

    मारलो

    जी नहीं—-

    [ जैक से आहिस्ता ]

    रात आप अपनी कुंजी दरवाज़े में छोड़ गए थे।

    [ बार्थिविक की नज़र बचाकर कुंजी दे देता है ]

    जैक

    ठीक है।

    बार्थिविक

    आज सुबह कौन कौन कमरे में आया था?

    मारलो

    मैं, ह्वीलर और मिसेज़ जोन्स, बस। और तो कोई नहीं आया।

    बार्थिविक

    तुम ने मिसेज़ बार्थिविक से पूछा?

    [ जैक से ]

    जाकर अपनी माँ से पूछो उनके पास तो नहीं है। यह भी कह दो कि ख़ूब देख लें, कोई और चीज़ तो गुम नहीं हुई।

    [ जैक अपनी मां के पास जाता है ]

    ऐसी बातों से ख़ाहम ख़ाह चिन्ता हो जाती है।

    मारलो

    जी हाँ हुज़ूर।

    बार्थिविक

    तुम्हारा किसी पर संदेह है?

    मारलो

    जी नहीं।

    बार्थिविक

    यह मिसेज़ जोन्स? वह यहाँ कितने दिनों से काम कर रही है?

    मारलो

    इसी महीने से तो आई है।

    बार्थिविक

    कैसी औरत है?

    मारलो

    मुझे उस से अधिक परिचय नहीं। देखने में तो सीधी सादी शरीफ़ औरत मालूम होती है।

    बार्थिविक

    कमरे में आज झाड़ू किसने लगाई?

    मारलो

    ह्वीलर और मिसेज़ जोन्स ने।

    बार्थिविक

    [ अपनी पहली उँगली उठाकर ]

    अच्छा मिसेज़ जोन्स किसी वक्त कमरे में अकेली भी आई थी?

    मारलो

    [ उसका चेहरा मद्धिम पड़ जाता है ]

    जी हाँ।

    बार्थिविक

    तुम्हें कैसे मालूम?

    मारलो

    [ अनिच्छा के भाव से ]

    मैंने उसे यहाँ देखा।

    बार्थिविक

    ह्वीलर भी अकेली इस कमरे में आई थी?

    मारलो

    जी नहीं। लेकिन जहाँ तक मैं समझता हूँ मिसेज़ जोन्स बहुत ईमानदार—

    बार्थिविक

    [ हाथ उठाकर ]

    मैं यह जानना चाहता हूँ कि मिसेज़ जोन्स दोपहर तक यहाँ रही?

    मारलो

    जी हाँ—नहीं नहीं,वह बावर्ची को तलाश करने तरकारी-

    ५

    वाले की दुकान पर गई थी।

    बार्थिविक

    ठीक! वह इस समय घर में है?

    मारलो

    जी हाँ है।

    बार्थिविक

    बहुत अच्छा। मैं इस मामले को साफ़ करके ही दम लूँगा। सिद्धान्त के विचार से यह ज़रूरी है कि असली चोर का पता लगाया जाय। यह तो समाज सङ्गठन की जड़ को हिलानेवाली बात है?

    मारलो

    जी हाँ।

    बार्थिविक

    इस मिसेज़ जोन्स की दशा कैसी है? इसका शौहर कहीं काम करता है?

    मारलो

    काम तो शायद कहीं नहीं करता।

    बार्थिविक

    बहुत अच्छी बात है। इस विषय में किसी से कुछ मत कहना ह्वीलर से कहो ज़बान न खोले और मिसेज़ जोन्स को यहाँ भेजो।

    मारलो

    बहुत अच्छा।

    [ मारलो चला जाता है। उसका चेहरा बहुत चिंतित है। बार्थिविक वहीं रहता है। उसका चेहरा न्यायगंभीर और कुछ प्रसन्न है, जैसा जाँच करने वाले मनुष्यों का हो जाता है। मिसेज़ बार्थिविक और जैक आते हैं ]

    बार्थिविक

    क्यों प्रिये, तुमने तो डिबिया नहीं देखी?

    मिसेज़ बार्थिविक

    ना! लेकिन कैसी विचित्र बात है जान! मारलो की तो कोई बात ही नहीं। ख़िदमतगारिनों में भी मुझे विश्वास है कोई नहीं—हाँ बावर्ची।

    बार्थिविक

    अच्छा बावर्ची?

    मिसेज़ बार्थिविक

    हाँ! मुझे किसी पर संदेह करने से घृणा है।

    बार्थिविक

    इस समय मनोभावों का प्रश्न नहीं, न्याय का प्रश्न है। नीति की रक्षा……

    मिसेज़ बार्थिविक

    अगर मज़दूरिनी इसके विषय में कुछ जानती हो,तो मुझे आश्चर्य न होगा। लोरा ने उसकी सिफ़ारिश की थी।

    बार्थिविक

    [ न्याय के भाव से ]

    मैंने मिसेज़ जोन्स को बुलाया है। यह मुझ पर छोड़ दो, और याद रक्खो जब तक अपराध साबित न हो जाय कोई अपराधी नहीं है। मैं इसका ख़याल रक्खूँगा। मैं उसे डराना नहीं चाहता, मैं उसके साथ हर तरह की रिआयत करूँगा। मैंने सुना है बहुत बहुत फ़टेहालों रहती हैं। अगर हम गरीबों के साथ और कुछ न कर सकें तो उनके साथ जहाँ तक हो सके हमदर्दी तो करनी ही चाहिए।

    [ मिसेज़ जोन्स आती है प्रसन्न मुख होकर ]

    ओ, गुडमार्निग मिसेज़ जोन्स।

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमी और रूखी आवाज में ]

    गुडमार्निंग सर, गुडमार्निङ्ग मैडेम।

    बार्थिविक

    मैंने सुना है तुम्हारे पति आजकल खाली बैठे हुए हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, आजकल उनके पास कोई काम नहीं है।

    बार्थिविक

    तब तो मेरे ख़याल में वह कुछ कमाते ही न होंगे।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुजूर, आजकल वह कुछ नहीं कमाते

    बार्थिविक

    और तुम्हारे कितने बच्चे हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    तीन बच्चे हैं हुज़ूर, लेकिन बच्चे बहुत नहीं खाते।

    बार्थिविक

    सबसे बड़े की क्या उम्र?

    मिसेज़ जोन्स

    नौ साल की हुज़ूर।

    बार्थिविक

    स्कूल जाते हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, तीनों बिला नागा मदरसे जाते हैं।

    बार्थिविक

    [ कठोरता से ]

    तो जब तुम दोनों मिया बीवी काम पर चले जाते हो तो बच्चे खाते क्या हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    हुज़ूर, मैं उन्हें खाना देकर भेजती हूँ। लेकिन रोज़ कहाँ खाना मयस्सर होता है हुज़ूर, कभी-कभी बेचारों को बिना कुछ भोजन दिए ही भेज देती हूँ। हाँ जब मेरा मियाँ कहीं काम से लगा रहता है, तो बच्चों पर बड़ा प्रेम करता है। लेकिन जब ख़ाली होता है तो उसकी मति ही बदल जाती है।

    बार्थिविक

    शायद पीता भी है?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ हुजूर। जब पीता है तो कैसे कहदूँ कि नहीं पीता।

    बार्थिविक

    तब तो शायद तुम्हारे सब रुपए पीने ही में उड़ा देता होगा?

    मिसेज़ जोन्स

    जी नहीं, वह मेरे रुपए पैसे नहीं छूते। हाँ जब अपने होश म नहीं रहते तब उनका मन बदल जाता है। तब वह मुझे बुरी तरह पीटते हैं।

    बार्थिविक

    वह है क्या? कौन पेशा करता है?

    मिसेज़ जोन्स

    पेशा! साईस है हुज़ूर।

    बार्थिविक

    साईस! उनकी नौकरी छूट कब से गई?

    मिसेज़ जोन्स

    उनकी नौकरी छूटे कई महीने होगए हुज़ूर! तब से कोई टिकाऊ काम नहीं मिला हुज़ूर अब तो मोटरों का ज़माना है। उन्हें कौन पूछता है।

    बार्थिविक

    तुम्हारी शादी उनसे कब हुई थी मिसेज़ जोन्स?

    मिसेज़ जोन्स

    आठ साल हुए हुज़ूर—वही साल–

    मिसेज बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर से ]

    आठ! तुमने तो बड़े लड़के की उम्र नौ साल बतलाई थी।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, इसीलिये तो उनकी नौकरी छूटी। मेरे साथ हरमजदगी की और मालिक ने कहा ऐसे आदमी को रखने से दूसरे आदमी भी बिगड़ेंगे। निकाल दिया।

    बार्थिविक

    तुम्हारा मतलब………..कुछ ठीक………

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, जब नौकरी छूट गई तो मुझसे शादी करली।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तो शादी के पहिले ही तुम—'

    बार्थिविक

    जाने भी दो प्रिये।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ क्रोध से ]

    कितनी बेहयाई की बात है!

    बार्थिविक

    [ जल्दी से ]

    तुम आज कल कहां रहती हो मिसेज़ जोन्स?

    मिसेज़ जोन्स

    हमारे घर नहीं है हुज़ूर। हमें अपनी बहुत सी चीज़ अलग कर देनी पड़ीं हुज़ूर।

    बार्थिविक

    अलग कर देनी पड़ीं! क्या मतलब? क्या गिरवी रखदीं?

    मिसेज जोन्स

    हां हुज़ूर, अलग कर दीं। आजकल मरथर स्ट्रीट में रहते हैं हुज़ूर, यहां से बिलकुल पास है। नं० ३४, बस एक कोठरी है।

    बार्थिविक

    किराया क्या है ?

    मिसेज जोन्स

    सजे हुए कमरे के ६ शिलिङ्ग हफ़ते के पड़ते हैं हुजूर।

    बार्थिविक

    तो तुम्हारे ज़िम्मे केराया बाक़ी भी पड़ा होगा?

    मिसेज, जोन्स

    जी हाँ, कुछ बाक़ी है हुज़ूर।

    बार्थिविक

    लेकिन तुम्हें तो अच्छी मज़दूरी मिलती है। क्यों?

    मिसेज जोन्स

    बीफे को एक दिन स्टैमफोर्ड प्लेस में काम करती हूँ। सोम, बुद्ध, और सुक्कर को यहाँ आती हूँ। आज तो आधी छुट्टी है हुज़ूर, कल बैकं बन्द न था।

    बार्थिविक

    समझ गया। हफ्त़े में चार दिन। आधा क्राउन रोज़ पाती हो न? क्यों?

    मिसेज जोन्स

    हाँ हुज़ूर और मेरा खाना भी मिलता है। लेकिन जिस दिन आधी छुट्टी होती है उस दिन अठारह पेंस ही मिलते हैं।

    बार्थिविक

    और तुम्हारा शौहर तो जो कुछ पाता होगा, पीने में उड़ा देता होगा।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ साहब, कभी कभी उड़ा देते हैं, कभी कभी मुझे दे देते हैं। अगर उन्हें काम मिले तो करने को तैयार हैं हुज़ूर, लेकिन मालूम होता है बहुत से आदमी खाली बैठे हुए हैं।

    बार्थिविक

    उँह! इन बातों में पड़ने से क्या फ़ायदा

    [ सहानुभूति दिखाकर ]

    यहाँ तुम्हारा काम बहुत कड़ा तो नहीं है? क्यों?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हुज़ूर, ऐसा कुछ कड़ा तो नहीं है, हां जब रात को सोने नहीं पाती तब कुछ अखरता है।

    बार्थिविक

    हूँ! और तुम सब कमरों में झाड़ू लगवाती हो! कभी कभी बार्वची को बुलाने भी जाना पड़ता है? क्यों न?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर!

    बार्थिविक

    आज भी तुम्हें जाना पड़ा था?

    मिसेज़ जोन्स

    हां हुज़ूर भाजी वाले की दूकान तक गई थी।

    बार्थिविक

    ठीक! तो तुम्हारा शौहर कुछ कमाता नहीं और बदमाश है?

    मिसेज़ जोन्स

    जी नहीं, बदमाश नहीं है। मैं समझती हूँ वह बहुत अच्छा आदमी है, हां कभी कभी मुझे पीटता है। मैं उसे छोड़ना नहीं चाहती हालांकि मेरे मन में आता है कि उसके पास से चली जाऊं क्योंकि मेरी समझ में ही नहीं आता उसके साथ रहूँ कैसे। वह आए दिन मुझे मारा करता है। थोड़े दिन हुए, उसने मुझे यहाँ एक घूसा मारा था

    [ अपनी छाती को छूती है ]

    अभी तक दर्द हो रहा है। मैं तो समझती हूं उसे छोड़ दूं, आप क्या कहते हैं हुज़ूर?

    बार्थिविक

    वाह! मैं इस बारे में क्या कह सकता हूँ? अपने शौहर को छोड़ देना बुरी बात है, बहुत बुरी बात।

    मिसेज़ जोन्स

    जी हां! मुझे यही डर लगता है कि उसे छोड़ दूँ तो न जाने मेरी क्या गति करे। बड़ा गुस्सैल है, हुजूर।

    बार्थिविक

    इस मामले में मैं कुछ नहीं कह सकता। मैं तो नीति की बात कहता हूँ।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुजूर; मैं जानती हूँ इन मामलों में कोई मेरी मदद न करेगा। मुझे आपही कोई सह निकालनी पड़ेगी। उन्हें भी तो ठोकरें खानी पड़ती हैं। लड़कों को बहुत चाहते हैं हुजूर, और उन्हें भूखे मदरसे जाते देखकर उनके दिल पर चोट लगती है।

    बार्थिविक

    [ जल्दी से

    ⁠ ⁠ ६

    खैर-धन्यवाद। मेरे जी में पाया कुछ तुम्हारा हाल चाल पूँछू। अब मैं तुम्हें और न रोकूंगा।

    मिसेज़ जोन्स

    आप को धन्यवाद देती हूं, हुजूर।

    बार्थिविक

    अच्छा गुडमार्निङ्ग!

    मिसेज़ जोन्स

    गुडमार्निङ्ग हुजूर, गुडमार्निङ्ग बीबी।

    बार्थिविक

    [ अपनी पत्नी से आंखें मिलाकर ]

    जरा सुन लो मिसेज़ जोन्स, मैं समझता हूँ तुमको बतला देना

    उचित है, एक चाँदी की सिगरेट की डिबिया ग़ायब हो गई है।

    मिसेज़ जोन्स

    [ कभी इसका मुंह देखती है, कभी उसका ]

    मुझे यह सुनकर बहुत दुख हुआ, हुजूर।

    बार्थिविक

    तुमने तो शायद उसे नहीं देखा। क्यों?

    मिसेज़ जोन्स

    [ समझ जाती है कि मेरे ऊपर संदेह किया जा रहा है; घबड़ा कर ]

    कहाँ थी हुज़ूर? बतला दीजिए।

    बार्थिविक

    [ बात बनाकर ]

    मारलो कहां कहता था? इस कमरे में? हाँ इसी कमरे में!

    मिसेज जोन्स

    जी नहीं, मैंने नहीं देखी। अगर मैं देखती तो कह देती।

    बार्थिविक

    [ उसे उड़ती हुई निगाह से देखकर ]

    भूल तो नहीं रही हो? खूब याद कर लो।

    मिसेज़ जोन्स

    [अविचलित होकर ]

    खूब याद कर लिया।

    [ धीरे से सिर हिलाकर ]

    मैंने नहीं देखा और न जानती हूँ कि कहां है।

    [ चुप चाप चली जाती है ]

    [ बार्थिविक, उसका बेटा, और पत्नी एक दूसरे की ओर कनखियों से देखते हैं ]

    परदा गिरता है

    अंक २

    दृश्य १

    [ जोन्स का घर ]

    मरथर स्ट्रीट। समय २॥ ०बजे। कमरे में कोई सामान नहीं है, फटे हुए चिकट कपड़े हैं, और रंगी हुई दीवारें। साफ़ सुथरी दरिद्रता झलक रही है। जोन्स आधे कपड़े पहिने चारपाई पर लेटा हुआ है। उसका कोट उसके पैरों पर पड़ा हुआ है और कीचड़ से भरे हुए बूट पास ही ज़मीन पर रक्खे हैं। वह सो रहा है। दरवाज़ा खुलता है, और मिसेज़ जोन्स आती है। वह फटा हुआ काला जाकिट पहिने हुए है। सिर पर काली मल्लाहों की सी टोपी है। वह टाइम्स पत्र में लिपटा हुआ एक पारसल लिए हुए हैं। पारसल नीचे रख देती है, और उसमें से एक एपरन (वह कपड़ा जो काम करने वाली स्त्रियां गाउन के ऊपर लपेट लेती हैं), आधी रोटी, दो प्याज़, तीन आलू, और मांस का एक छोटा सा टुकड़ा निकालती है। ताक पर से एक चायदान उतार कर उसको धोती है, और एक चाय की पुड़िया में से थोड़ी सी बारीक चाय डालती है। उसे अंगीठी पर रखती है, और पास ही एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठ कर रोने लगती है।

    जोन्स

    [ जागकर जमुहाई लेता हुआ ]

    ओह तुम हो! क्या वक्त है?

    मिसेज़ जोन्स

    [ आँखें पोछकर और मामूली आवाज में ]

    ढाई बजे हैं।

    जोन्स

    तुम इतनी जल्द क्यों लौट आई?

    मिसेज़ जोन्स

    आज आधे दिन काम था, जेम।

    जोन्स

    [ चित्त लेटा हुआ और नींद भरी आवाज़ में ]

    कुछ खाने के लिये है?

    मिसेज़ जोन्स

    मिसेज बार्थिविक के वावर्ची ने मुझे थोड़ा सा मांस दिया है। मैं उसको उबालने जा रही हूँ।

    [ पकाने की तैयारी करती है ]

    किराये के १४ शिलिंग बाकी हैं जेम, और मेरे पास कुल २ शिलिंग और चार पेन्स रह गए हैं। आजही मांगने आते होंगे।

    जोन्स

    [ उसकी तरफ़ फिर कर, कुहनियों के बल लेटा हुआ ]

    आएँ और थैली उठा ले जायें! काम खोजते खोजते तो मैं तंग आ गया हूँ। मैं क्यों काम के लिए चक्कर लगाता हूँ? जैसे गिलहरी पिंजरे में नाचती है! "हुज़ूर मुझे काम दीजिये"— हुज़ूर एक आदमी रखलें"—"मेरी बीबी और तीन बच्चे हैं," इन बातों से मेरा जी ऊब गया। इससे तो अच्छा यही है, कि यहीं पड़े पड़े मर जाऊँ। लोग मुझसे कहते हैं "जोन्स, कल जुलूस में शरीक हो जाव, एक झंडा उठा लो, और लालमुंह वाले नेताओं की बातें सुनो। फिर अपना सा मुंह लिए घर लौट जाव"। कुछ लोगों को यह पसंद होगा। जब मैं काम की टोह में जाता हूँ और उन बदमाशों को अपनी ओर सिर से पैर तक ताकते देखता हूँ, तो जान पड़ता है मेरे हजारों साँप काट रहे हैं। मैं किसी से कोई रियायत नहीं चाहता। एक आदमी पसीने की कमाई खाना चाहता है, पर उसे काम नहीं मिलता। कैसी दिल्लगी है! एक आदमी छाती फाड़ कर काम करना चाहता है, कि किसी तरह प्राण बचें ओर उसे कोई नहीं पूछता! यह न्याय है!—यह स्वाधीनता है! और न जाने क्या-क्या है।

    [ दीवार की तरफ़ मुँह फेर लेता है। ]

    तुम इतनी सीधी सादी हो, तुम नहीं जानतीं कि मेरे भीतर कितनी हलचल मची हुई है। मैं इन बच्चों के खेल से तंग आ गया हूँ। अगर कोई उन्हें चाहता है, तो मेरे पास आए,

    [ मिसेज़ जोन्स पकाना बद कर देती है, और मेज़ के पास चुपचाप खड़ी हो जाती है। ]

    मैं सब कुछ करके हार गया। जो कुछ होनेवाला है, उससे नहीं डरता। मेरी बातों को गिरह बांध लो। अगर तुम समझती हो, कि मैं उनके पैरों पर गिरूंगा, तो तुम्हारी भूल है। मैं किसी से काम न मागूंगा चाहे जान ही क्यों न जाती रहे। तुम इस तरह क्यों खड़ी हो जैसी कोई दुखियारी, असहाय मूरत हो? इसी से मैं तुम्हें छोड़ता नहीं। अब तुम्हें काम करने का ढंग आ गया। लेकिन इतना सीधापन भी किस काम का। तुम्हारे मुंह में तो जैसे जीभ ही नहीं है।

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीरे से ]

    जब तुम अपने होश में रहते हो, तो ऐसी पटाँग बातें करते हो, जैसी नशे में नहीं करते। अगर तुन्हें काम न मिला हमारी गुजर कैसे होगी? मालिक मकान यहां रहने न देगा। वह तो आज रुपए के लिए आता होगा।

    जोन्स

    तुम्हारे इस बार्थिविक को देखता हूँ, रोज़ की बंसी बजाता हुआ पार्लिमेंट में जात और वहां गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाता

    और उसके छोकरे को भी देखता हूं, जो से इधर-उधर ऐंठता फिरता है। उन्होंने कौन सा काम किया है, कि वे यों गुत उड़ायें। अपनी ज़िन्दगी में कभी एक दिन भी उ काम नहीं किया। मैं उन्हें हर रोज देखता ।

    मिसेज़ जोन्स

    मैं यह चाहती हूँ, कि तुम इस तरह मेरे पीछे पीछे न लगे रहा करो। न जाने तुम क्यों मेरे पीछे लगे रहते हो। तुम्हारा वहां घूमना उन्हें अच्छा नहीं लगता। उन लोगों को भी शक होता है।

    जोन्स

    मेरा जहां जी चाहेगा, वहां जाऊँगा। आखिर कहां जाऊँ। उस दिन एजुवेयर रोड पर एक जगह गया। मैनेजर से बोला—-"हुजूर मुझे रख लीजिये; मुझे दो महीने से कोई काम नहीं मिला; बिना काम किए अब रहा नहीं जाता। मैं काम करनेवाला आदमी हूं। आप जो काम चाहें मुझे दें। मैं किसी काम से नहीं डरता।" उसने कहा,‌ "भले आदमी, सुबह से इस वक्त तक ३० आदमी आ चुके हैं। मैंने पहले दो आदमी ले लिये। इससे ज़्यादा की मुझे ज़रूरत नहीं।" मैं बोला—"आपको धन्यवाद देता हूँ साहब, संसार में आग ही लग जाय तो अच्छा।" उसने कहा— "यों गाली बकने से काम नहीं मिलेगा, अब चल दो।"

    [ हँसता है ]

    चाहे तुम भूखों मर रहे हो, पर तुम्हें मुँह खोलने का हुक्म नहीं। इसका ख़याल भी मत करो। चुप चाप सहते जाव। यही समझदार आदमियों का दस्तूर है। ज़रा दूर और आगे चला, तो एक लेडी ने मुझसे कहा—

    [ आवाज़ नीची करके ]

    क्यों जी कुछ काम करके दो चार पैसे कमाना चाहते हो?" और मुझे कुत्ता दिया कि उसे दुकान के बाहर पकड़े खड़ा रहूं। खानसामे की तरह मोटा था। — मनों मांस खा गया होगा। उसको पालने में ढ़ेरों मांस लग गया होगा। वह यह समझ कर दिल में खुश हो रही थी, कि मैंने एक ग़रीब आदमी का उपकार किया। लेकिन मैं देख रहा था कि यह तांबे के ज़ीने पर खड़ी मुझे ताक रही थी, कि मैं उसका मोटा ताज़ा कुत्ता लेकर कहीं रफू चक्कर न हो जाऊँ।

    [ वह चार पाई की पट्टी पर बैठ जाता है, और बूट पहिनता है। तब ऊपर ताक कर ]

    तुम सोच क्या रही हो?

    [ मिन्नत करके ]

    क्या तुम्हारे मुंह में ज़बान नहीं है?

    [ कुण्डी खटकती है, और घर की मालकिन मिसेज़ सेडन आती है। वह एक चिंतित, फूहड़ और जल्दबाज औरत है। मज़दूरों के से कपड़े पहिने हुए। ]

    मिसेज़ जोन्स, जब तुम आई तब हमें तुम्हारी आहट मिल गई थी। मैंने अपने शौहर से कहा लेकिन वह कहते हैं कि मैं एक दिन के लिए भी नहीं मान सकता।

    जोन्स

    [ त्योरियां चढ़ाकर मसख़रेपन से ]

    शौहर को बकने दो, तुम स्वाधीन स्त्रियों की तरह अपनी मरज़ी पर चलो। यह लो जेनी, यह उन्हें दे दो।

    [ अपने पाजामे की जेब से एक सावरेन निकाल कर वह अपनी स्त्री की ओर फेंकता है। स्त्री हाँपकर उसे अपने एपरन में ले लेती है। जोन्स फिर जूते का फीता बांधने लगता है। ]

    मिसेज़ जोन्स

    [ सावरेन को छिपाकर मलती हुई ]

    मुझे खेद है कि अबकी इतनी देर हो गई। तुम्हारे चौदह शिलिग आते हैं। यह सावरेन लो। मुझे ६ शिलिंग लौटा दो। [ मिसेज़ सेडन सावरेन ले लेती है और इधर उधर घुमाती है। ]

    जोन्स

    [ जूते की तरफ़ आँखे किये हुए ]

    तुम्हें अचरज हो रहा होगा, क्यों?

    मिसेज़ सेडन

    तुमको बहुत बहुत धन्यवाद! तुमने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की।

    [ वह सचमुच विस्मित हो जाती है ]

    मैं रेज़गी लाए देती हूँ।

    जोन्स

    [ मुंह बनाकर ]

    इसकी क्या जरूरत है?

    मिसेज़ सेडन

    तुमको बहुत बहुत धन्यवाद! तुमने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की।

    [चली जाती है]

    [मिसेज़ जोन्स जोन्स की ओर ताकती है जो अभी तक फीते बाँध रहा है]

    जोन्स

    आज ज़रा तकदीर खुल गई।

    [लाल थैली और कुछ फुटकल रेज़गियाँ निकाल कर]

    एक थैली पड़ी मिल गई। सात पौंड से कुछ ज्यादा हैं।

    मिसेज़ जोन्स

    यह क्या किया, जेम्स?

    जोन्स

    यह क्या किया, जेम्स? किया क्या। पड़ी मिली उठा ली। खोई हुई चीज़ है। और क्या!

    मिसेज़ जोन्स

    लेकिन उस पर किसी का नाम तो होगा! या कुछ और!

    जोन्स

    नाम? नहीं किसी का नाम नहीं है। यह उन लोगों की नहीं है जो मुलाकाती कार्ड लेकर चलते हैं। यह किसी पक्की लेडी का है। ज़रा सूंघो तो।

    [वह थैली को उसकी तरफ फेंकता है। वह उसे धीरे से नाक के पास ले जाती है।]

    अब तुम्हीं बतलाओ मुझे क्या करना चाहिये था। तुम्हीं बतलाओ।

    मिसेज़ जोन्स

    [थैली को रखकर]

    यह तो मैं नहीं बता सकती, जेम्स, कि तुम्हें क्या

    करना चाहिये था। लेकिन रुपए तुम्हारे न थे। तुमने किसी दूसरे के रुपए ले लिए।

    जोन्स

    जिसने पाया उसका हो गया। मैं इसे उन दिनों की मजूरी समझूंगा जब मैं गलियों में उस चीज के लिये ठोकर खाता फिरा जो मेरा हक़ है। मैं इसे पिछली मजूरी समझ कर ले रहा हूँ।

    [विचित्र गर्व से]

    रुपए मेरी जेब में हैं, जानी।

    [मिसेज जोन्स फिर भोजन बनाने की तैयारी करने लगती है। जोन्स उसकी ओर कनखियों से देख रहा हैं]

    हाँ, मेरी जेब में रुपए हैं। और अबकी मैं इसे उड़ाऊँगा नहीं, इसीसे कैनाडा चला जाऊँगा। तुम्हें भी एक पौंड दे दूँगा।

    [चुप]

    तुम मुझे छोड़ने की कई बार धमकी दे चुकी हो, तुमने बारहा मुझसे कहा है कि मैं तुम्हारे ऊपर बड़ी सख्ती करता हूं। मैं यहाँ से चला जाऊंगा तब तो तुम चैन से रहोगी।

    मिसेज़ जोन्स

    [ शिथिलतासे ]

    सख़्ती तो तुमने मेरे साथ की है, जोन्स, और मैं तुम्हें जाने से रोक भी नहीं सकती। लेकिन तुम्हारे जाने की मुझे खुशी होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानती।

    जोन्स

    इससे मेरी तकदीर पलट जायगी। जब से तुम्हारे साथ ब्याह हुआ तब से कभी भले दिन न देखे।

    [ कुछ नर्मी से ]

    और न तुम्हें कभी पिकनिक ही मिला।

    मिसेज़ जोन्स

    अगर हमारी तुम्हारी मुलाकात न हुई होती तो बहुत अच्छा होता। हम लोग एक दूसरे के लिये बनाए ही नहीं गए। लेकिन तुम हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए, और अब तक पड़े हुए हो। और तुम मेरे साथ कितनी बुरी तरह पेश आते हो। जेम्स—उस छोकरी रायस के फेरे में पड़े रहते हो? तुम्हें शायद इन लड़कों का कभी ख़याल भी नहीं आता जिन्हें हमने पैदा किया है। तुम नहीं समझते कि उनके पालने में मुझे कितनी कठिनाई पड़ती है, और तुम्हारे चले जाने पर उन पर क्या पड़ेगी।

    जोन्स

    [ खिन्न मन से कमरे में टहलता हुआ ]

    अगर तुम समझ रही हो कि मैं लड़कों को छोड़ दूंगा तो तुम भूल कर रही हो।

    मिसेज़ जोन्स

    यह तो मैं जानती है कि तुम उन्हें प्यार करते हो।

    जोन्स

    [ थैली को उंगलियों पर फिराता हुआ, कुछ क्रोध से ]

    अभी तो यों ही चलने दो। में न रहूंगा तो छोकरे तुम्हारे साथ बड़े मज़े में रहेंगे। अगर मैं जानता कि यह हाल होगा तो मैं एक को भी न पैदा करता। क्या फायदा है इससे कि लड़कों को पैदा करके इस विपत्ति में डाल दिया जाय?यह पाप है, और कुछ नहीं। लेकिन हमारी आखं बहुत देर में खुलती हैं। संसार का यही ढंग है।

    [ थैली को फिर जेब में रख लेता है।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ, यह इन बेचारों के हक़ में बहुत अच्छा होता। लेकिन हैं तो यह तुम्हारे ही लड़के, और मुझे तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें सुनकर अचरज होता है। अगर मेरे पास यह न रहें तो मेरा तो ज़रा भी जी न लगे।

    जोन्स

    [ घुन्नाया हुआ ]

    यही सब का हाल है। अगर मैं वहाँ कुछ कमा सका—

    [ उसे अपना कोट हिलाते देखकर, कठोर स्वर में ]

    कोट मत छुओ।

    [ चांदी की डिबिया जेब से गिर पड़ती है और सिगरेट चारपाई पर बिखर जाते हैं। डिबिया को वह उड़ा लेती है और उसे ध्यान से देखती है। वह झपटकर उसके हाथ से डिबिया छीन लेता है। ]

    मिसेज़ जोन्स

    [ चारपाई को टेककर झुकी हुई ]

    ओ जेम! ओ जेम!

    जोन्स

    [ डिबिया को मेज़ पर पटक कर ]

    फिजूल बक मत करो। जब मैं यहाँ से चलूंगा तो इस डिबिया को उसी थैली के साथ पानी में डाल दूंगा। मैंने इसे उस वक्त उठा लिया जब मैं नशे में था; और नशे में जो काम किए जाते हैं उनका ज़िम्मेदार कोई नहीं होता, ब्रह्मवाक्य है। मुझे इसकी क्या ज़रूरत है, मैं इसे लेकर करूंगा क्या? मैंने जलकर दम्भ इसे निकाल लिया था। मैं तुमसे कह चुका मैं चोर नहीं हूँ, और अगर तुमने मुझे चोर कहा तो बुरा होगा।

    मिसेज़ जोन्स

    [ एपरन की डोरी को ऐंठती हुई ]

    यह मिसेज बार्थिविक की है। तुमने मेरे नाम में बट्टा लगा दिया। अरे जेम, तुम्हें यह सूझी क्या?

    जोन्स

    क्या मतलब?

    मिसेज़ जोन्स

    वहाँ इसकी तलाश हो रही है लोगों का मुझ पर शुभा है। तुम्हें यह सूझी क्या, जेम?

    जोन्स

    मैं तुमसे कह चुका मैं नशे में था। मुझे इसकी चाह नहीं है। यह मेरे किस काम की है। अगर मैं इसे गिरो रखने जाऊ तो पकड़ जाऊं मैं चोर नहीं हूं। अगर मैं चोर हूँ तो लौंडा बार्थिविक मुझसे कहीं बड़ा चोर है। यह थैली जो मैंने पड़ी पाई, वही एक लेडी के घर से उठा लाया था। लेडी से कुछ झगड़ा हो गया बस उसने उस बेचारी की थैली उड़ा ली। बराबर कहता रहा कैसा चरका दिया। उसने लेडी को चरका दिया। मैंने लौंडे को चरका दिया। पल्ले सिरे का मक्खीचूस है। और देख लेना उसका बाल भी बांका न होगा।

    मिसेज़ जोन्स

    [ मानो आपही आप बातें कर रही हो ]

    ओ जेम! हमारी लगी लगाई रोजी चली जायगी!

    जोन्स

    अगर ऐसा हुआ तो मैं भी उनकी ख़बर लूंगा।

    न थैली कहीं गई है, न लौडा बार्थिविक कहीं गया है।

    [ मिसेज़ जोन्स मेज़ के पास आती है और डिबिया को उठा लेना चाहती है, जोन्स उसका हाथ पकड़ लेता है। ]

    तुम्हें उससे क्या मतलब है? मैं कहता हूं सीधे से रखदो।

    मिसेज़ जोन्स

    मैं इसे लौटा दूंगी और जो जो हुअा है सब साफ़ साफ़ कह दू़ंगी।

    [ वह उसके हाथ से डिबिया छीन लेना चाहती है ]

    जोन्स

    न मानोगी तुम?

    [ वह डिबिया को छोड़ देता है और गुर्राकर उस पर झपटता है वह चारपाई के उस पार चली जाती हैं। वह उसके पीछे लपकता है। एक कुरसी उलट जाती है। दरवाजा खुलता है और स्नो अन्दर आता है। वह खुफ़िया पुलीस का आदमी है इस वक्त सादे कपड़े पहने हुए है। उसकी मूछें कतरी हुई हैं। जोन्स हाथ गिरा देता है मिसेज़ जोन्स हाँकती हुई खिड़की के पास खड़ी हो जाती है। स्नो तेजी से मेज़ की तरफ जाता है और डिबिया उठा लेता है। ]

    स्नो

    अच्छा यहाँ तो चुहल हो रही है। जिस चीज़ को तलाश में था वही मिल गई । जे० बी० ठीक वही है।

    [ वह दरवाजे के पास जाता है और डिबिया के अक्षरों को गौर से देखता है मिसेज़ जोन्स से] मैं पुलीस का अफसर हूँ। तुम्हीं मिसेज़ जोन्स हो?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हां।

    स्नो

    मुझे हुक्म है कि तुम्हें जे० बार्थिविक, मेम्बर पार्लेमेण्ट नं० ६ राकिंघम गेट की यह डिबिया चुरा लेने के अपराध में पकड़ लूं। तुम्हारा बयान ठीक न हुआ तो तुम फंस जावगी क्या कहती हो?

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमे स्वर में। वह अभी तक हांफ रही है और छाती पर हाथ रखे हुये है ]

    मैं सच कहती हूँ, साहब, मैंने इसे नहीं लिया।

    मैं पराई चीज कभी छूती ही नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती।

    स्नो

    'तुम आज सवेरे वहाँ गई थीं, जिस कमरे में यह डिबिया थी उसमें तुमने झाड़ू लगाई, तुम कमरे में अकेली थीं। डिबिया यहां तुम्हारे घर में रखी हुई है। फिर भी तुम कहती हो मैंने नहीं लिया?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ। जो चीज़ नहीं ली, उसे कैसे कह दूँ कि ली है।

    स्नो

    तब वह डिबिया यहाँ कैसे आ गई?

    मिसेज़ जोन्स

    मैं इस विषय में कुछ न कहना ही उचित समझती हूँ।

    स्नो

    यह तुम्हारे पति हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ, यह मेरे पति हैं।

    स्नो

    मैं इन्हें गिरफ़तार करने जा रहा हूँ। तुम्हें कुछ कहना तो नहीं है?

    [ जोन्स सिर झुकाए मौन बैठा रहता है ]

    तो ठीक है। चलो मिसेज़ जोन्स। मैं तुमको इतना ही कष्ट दूँगा कि चुप चाप मेरे साथ चली आओ।

    मिसेज़ जोन्स

    [ हाथ मलते हुए ]

    अगर मैंने लिया होता तो मैं यह कभी न कहती कि मैंने नहीं लिया—मैंने नहीं लिया, आप से सच कहती हूँ। यह मैं जानती है कि देखने में मैं ही अपराधिन है, लेकिन असली तबा मैं नहीं बता सकती। मेरे बच्चे मदरसे गए हैं, थोड़ी देर में आते होंगे। मुझ न पावेंगे तो उन बेचारों का न जाने क्या हाल होगा।

    स्नो

    तुम्हारा पति उनकी देख भाल कर लेगा, घबराने की कोई बात नहीं।

    [ वह उसका हाथ आहिस्ता से पकड़ता है ]

    जोन्स

    तुम उसका हाथ छोड़ दो वह ठीक कहती हैं। डिबिया मैंने ली।

    स्नो

    [ उसकी तरफ आँखें उठाकर ]

    शाबाश! शाबाश! बहादुर आदमी हो। चलो मिसेज जोन्स।

    जोन्स

    [ क्रोध से ]

    उसे छोड़ दे, सुअर। वह मेरी बीबी है। वह शरीफ़ औरत है। अगर उसे पकड़ा तो तुम जानोगे।

    स्नो

    ज़रा होश में आओ। इन बातों से क्या फ़ायदा ज़बान सँभाल कर बात करो—-खैरियत इसी में है।

    [ वह मुंह में सीटी लगाता है और स्त्री को द्वार की ओर खींचता है ]

    जोन्स

    [ झपट कर ]

    उसे छोड़ दो और हाथ हटालो, नहीं हड्डी तोड़ दूंगा उसे क्यों नहीं छोड़ता। मैं तो कह रहा हूँ कि मैंने ली है।

    स्नो

    [ सीटी बजाकर ]

    हाथ हटालो, नहीं मैं तुम्हें भी पकड़ लूँगा। अच्छा न मानोगे? [ जोन्स उससे लिपट जाता है और उसे एक घूंसा मारता है। एक पुलिसमैन वर्दी पहने हुए आता है। ज़रा देर हाथापाई होती है, और जोन्स पकड़ लिया जाता है। मिसेज़ जोन्स अपने हाथ उठाती है और उनके ऊपर सिर झुका देती है। ]

    पर्दा गिरता है।

    दृश्य २

    [ बार्थिविक का भोजनालय, वही शाम है। बार्थिविक-परिवार फल और मिठाइयाँ खा रहा है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    जाँन।

    [ अख़रोटों के छिलकों के टूटने की आवाज़ आती है ]

    बार्थिविक

    तुम इन अखरोटों का हाल उनसे क्यों नहीं कहती खाए नहीं जाते।

    [ एक गरी मुंह में रख लेता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    यह इस चीज़ का मौसिम नहीं है। मैंने होली-रूड से कहा था।

    [ बार्थिविक अपना गिलास पोर्ट से भरता है ]

    जैक

    दादा, ज़रा सरौता बढ़ाइएगा।

    [ बार्थिविक सरौता बढ़ा देता है। वह किसी विचार में डूबा हुआ मालूम होता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    लेडी होलीरूड बहुत मोटी हो गई हैं। मैं यह बहुत दिनों से देख रही हूँ।

    बार्थिविक

    [ अनमने भाव से ]

    मोटी?

    [ वह सरौता उठा लेता है—चेहरे पर लापर्वाही झलकने लगती है ]

    होलीरूड परिवार का नौकरों से कुछ झगड़ा हो गया था, क्यों?

    जैक

    दादा, ज़रा सरौता।

    ८

    बार्थिविक

    [ सरौता बढ़ाते हुए ]

    समाचार पत्रों में निकला था। रसोइयादारिन थी न?

    मिसेज़ बार्थिविक

    नहीं, खिदमतगारिन थी। मैंने लेडी होलीरूड से बातचीत की थी। वह लड़की अपने प्रेमी को मिलने के लिए बुलाया करती थी।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से ]

    मेरी समझ में उन्हें—

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम क्या कहते हो जॉन, और दूसरा रास्ता ही क्या था? सोचो, दूसरे नौकरों पर क्या असर पड़ता।

    बार्थिविक

    हाँ बात तो ठीक थी—लेकिन मैं यह नहीं सोच रहा था।

    जैक

    [ छेड़ने के लिए ]

    दादा, सरौता।

    [ बार्थिविक सरौता बढ़ा देता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    लेडी होलीरूड ने मुझसे कहा—"मैंने उसे बुलाया और उससे कहा, फ़ौरन मेरे घर से निकल जा। मैं तुम्हारे चालचलन को निंदनीय समझती हूँ। मैं कह नहीं सकती। मैं नहीं जानती, और न में जानना चाहती है कि तुम क्या कर रही थीं। मैं सिद्धांत की रक्षा के लिए तुम्हें अलग कर रही हूं। मेरे पास सिफ़ारिश के लिए मत आना।" इस पर उस लड़की ने कहा– "अगर आप मुझे नोटिस नहीं देंगी तो मुझे एक महीने की तनख़्वाह दे दीजिए। मैंने अपनी इज्ज़त में दाग़ नहीं लगाया। मैंने कुछ नहीं किया।"—कुछ नहीं किया!

    बार्थिविक

    अच्छा।

    मिसेज़ बार्थिविक

    नौकर अब बहुत सिर चढ़ गए हैं, वह सब इस बुरी तरह मिले रहते हैं, कि कुछ मालूम ही नहीं होता कि उनके मन में क्या है। ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हें न मालूम हो इस लिए सबों ने गुट कर लिया हो। यहां तक कि मार्लो का भी यही हाल है। ऐसा मालूम होता है, कि वह अपने मन की असली बात किसी पर खुलने ही नहीं देता। मुझे इस छिपा चोरी से चिढ़ है। इससे फिर किसी पर भरोसा नहीं रहता। कभी कभी मेरा ऐसा जी चाहता है, कि उसका कान पकड़ कर हिलाऊं।

    ' जेक

    मार्लो बहुत भलामानुस है। यह कोई अच्छी बात नहीं है, कि हमारी बातें हर एक आदमी जान ले।

    बार्थिविक

    इसकी तो चरचा न करना ही अच्छा है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    सब नीच जातों का यही हाल है, तुम यह नहीं बतला सकते कि वह कब सच बोल रहे हैं। आज जब मैं होलीरूड के घर से चलने के बाद बाज़ार गई, तो इन बेकार आदमियों में से एक आकर मुझसे बात करने लगा। मैं समझती हूँ मुझमें और गाड़ी में केवल बीस गज़ का अंतर था। लेकिन ऐसा मालूम हुआ कि वह

    सड़क फाड़कर निकल आया।

    बार्थिविक

    अच्छा! आज कल किसी से बातचीत करने में बहुत होशियार रहना चाहिए। न जाने कैसा आदमी हो।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मैंने उसे कुछ जवाब थोड़े ही दिया, लेकिन मुझे तुरंत मालूम हो गया, कि वह झूठ बोल रहा है।

    बार्थिविक

    [ एक अख़रोट तोड़कर ]

    यह बड़ा अच्छा नियम है। उनकी आंखों को देखना चाहिए।

    जेक

    दादा, ज़रा सरौता।

    ' बार्थिविक

    [ सरौता बढाकर ]

    अगर उनकी निगाह सीधी होती हैं तो कभी कभी मैं छः पैंस दे देता है। यह मेरे नियम के विरुद्ध है, लेकिन इनकार करते तो नहीं बनता। अगर तुम्हें यह दिखाई दे कि वे सुस्त, काहिल, और कामचोर हैं; तो समझ लो कि शराबी या कुछ ऐसे ही हैं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    इस आदमी की आंखें बड़ी डरावनी थीं वह ऐसे ताकता था, मानो किसी की ख़ून कर डालेगा। उसने कहा—मेरे पास आज खाने को कुछ नहीं है। ठीक इसी तरह।

    बार्थिविक

    विलियम क्या कर रहा था? उसे वहां खड़ा रहना चाहिए था।

    जेक

    [ अपनी गिलास नाक के पास लेजाकर ]

    क्यों दादा! क्या यही सन् ६३ की है?

    [ बार्थिविक गिलास को आंखों के पास किए हुए है। वह उसे नीचे करके नाक के पास ले जाता है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    मुझे उन लोगों से घृणा है जो सच नहीं बोलते।

    [ बाप और बेटे ग्लास के पीछे से आंखें मिलाते हैं ]

    सच बोलने में लगता ही क्या है, मुझे तो यह बड़ा अासान मालूम पड़ता है। असली बात क्या है, इसका पता ही नहीं चलता। ऐसा मालूम होता है, जैसे कोई हमें बना रहा हो।

    बार्थिविक

    [ मानो फ़ैसला सुना रहा हो ]

    नीची ज़ातें अपने पैरों में आप कुल्हाड़ी मारती हैं, अगर हमारे ऊपर भरोसा रक्खें तो उनकी दशा इतनी बुरी न हो।

    मिसेज़ बार्थिविक

    लेकिन उस पर भी उन्हें संभालना मुश्किल है। अाज मिसेज़ जोन्स ही को देखो।

    बार्थिविक

    इस विषय में मैं वही करूंगा जो न्याय संगत है। अभी तीसरे पहर मैं रोपर से मिला था। मैंने यह माजरा उससे कहा, वह आ रहा होगा, यह सब खुफ़िया पुलीस के बयान पर है। मुझे तो बहुत संदेह है। मैंने इस पर बहुत विचार किया है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    वह औरत मेरी आंखों में ज़रा भी नहीं जँची उसे किसी बात की शर्म ही नहीं मालूम होती थी। देखो वही मामला जिस की वह चर्चा कर रही थी। जब वह और उसका मर्द जवान थे। कैसी बेहयाई की बात थी और वह भी तुम्हारे और जैक के सामने। मेरा जी चाहता था कि उसे कमरे से निकाल दूं।

    बार्थिविक

    ओह! वह तो जैसे हैं—-सब जानते हैं पर ऐसी बातों पर

    ग़ौर करते समय हमें तो सोच लेना चाहिये–

    मिसेज़ बार्थिविक

    शायद तुम कहोगे कि उस आदमी के मालिक ने उसे निकाल देने में ग़लती की?

    बार्थिविक

    बिलकुल नहीं। इस विषय में मुझे कोई संदेह नहीं है। मैं अपने दिल से यह पूछता हूं—-

    जैक

    दादा, थोड़ी सी पोर्ट!

    बार्थिविक

    [ सूर्य के उदय और अस्त की ठीक ठीक नक़ल में बोतल को घुमाते हुए ]

    मैं अपने दिल से यह पूछता हूं कि हम किसी को नौकर रखने के पहिले उसके बारे में काफ़ी तौर से जाँच भी कर लिया करते हैं करते हैं या नहीं, ख़ासकर उसके चालचलन के बारे में।

    जैक

    अम्मा, शराब को ज़रा इधर दे दो।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ बोतल बढ़ाकर ]

    क्यों बेटे, तुम बहुत ज़्यादा तो नहीं पी रहे हो?

    [ जैक अपना गिलास भरता है ]

    मार्लो

    [ कमरे में आकर ]

    जासूस स्नो आपसे मिलना चाहता है।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से ]

    अच्छा, कहो अभी एक मिनट में आता हूँ।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ बग़ैर सिर घुमाए हुए ]

    उसे यहीं बुला लो, मर्लो।

    [ स्नो ओवर कोट पहिने अपनी बोलर हैट हाथ में लिए आता है ]

    बार्थिविक

    [ कुछ उठकर ]

    आइये, बन्दगी।

    स्नो

    बन्दगी साहब! बन्दगी मेम साहब! मैं यह बतलाने आया हूं कि उस मामले में मैंने क्या किया। मुझे डर है, कि मुझे कुछ देर हो गई है मैं एक दूसरे मुक़दमे में चला गया था।

    [ चाँदी की डिबिया जेब से निकालता है। बार्थिविक परिवार में सनसनी फैल जाती है ]

    मैं समझता हूं यह ठीक वही चीज़ है।

    बार्थिविक

    ठीक वही, ठीक वही।

    स्नो

    निशान और अंक वैसे ही हैं, जैसे आपने बतलाए थे। मुझे तो इस मामले में ज़रा भी हिचिक नहीं हुई।

    बार्थिविक

    शाबाश। आप भी एक गिलास पीजिये—

    [ पोर्ट की बोतल को देखकर ]

    शेरी की।

    [ शेरी उंडेलता है,]

    जैक, यह मिस्टर स्नो को दे दो।

    [ जैक उठकर गिलास स्नो को दे देता है, तब अपनी कुर्सी पर पड़कर उसे आलस्य से देखता है। ]

    स्नो

    [ शराब पीकर और गिलास को नीचे रखकर ]

    आपसे मिलने के बाद मैं उस औरत के डेरे पर गया। नीचों की बस्ती है। और मैंने सोचा कि ड्यौढ़ी के नीचे ही कानिस्टेबुल खड़ा

    कर दूं। शायद ज़रूरत पड़े और मेरा विचार बिलकुल ठीक निकला।

    बार्थिविक

    सच?

    स्नो

    जी हां। कुछ झमेला करना पड़ा। मैंने उससे पूछा कि तुम्हारे घर में यह चीज़ कैसे आई। वह मुझे कुछ जवाब न दे सकी। हां बराबर चोरी से इनकार करती रही। इस लिये मैंने उसे गिरफ़्तार कर लिया। तब उसका शौहर मुझसे उलझ पड़ा। आख़िर मैंने हमला करने के अपराध में उसे भी गिरफ़्तार कर लिया। घर से पुलीस स्टेशन तक जाने में वह बहुत गर्म होता रहा—बिल्कुल जामे से बाहर—बार बार आप को और आपके लड़के को धमकी देता था कि समझ लूँगा। सच पूछिये तो बड़ा फ़ितना निकला।

    मिसेज़ बार्थिविक

    बड़ा भारी बदमाश है।

    स्नो

    हां, मेम साहब, बड़ा ही उजड्ड असामी!

    जैक

    [ शराब की चुस्की लेता हुआ, मज़े में आकर ]

    पाजी का सिर तोड़ दे।

    स्नो

    मैंने पता लगाया, पक्का शराबी है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मैं तो चाहती हूँ, बचा को कड़ी सज़ा मिले।

    स्नो

    दिल्लगी तो यह कि वह अभी तक यही कहे जाता है कि डिबिया मैंने ख़ुद चुराई।

    बार्थिविक

    डिबिया उसने चुराई।

    [ मुसकिराता है ]

    इसमें उसने क्या फ़ायदा सोचा है?

    स्नो

    वह कहता है कि छोटे साहब पिछली रात को नशे में थे।

    [ जैक अखरोट तोड़ना बन्द करदेता है और स्नो की ओर ताकने लगता है। बार्थिविक की मुसकिराहट ग़ायब हो जाती है, गिलास रख देता है। सन्नाटा छा जाता है—स्नो बारी बारी से हरेक का चेहरा देखता है, और कहता है ]

    वह मुझे अपने घर लाए और ख़ूब ह्विस्की पिलाई, मैंने कुछ खाया न था, नशा ज़ोर कर गया और उसी नशे में मैंने डिबिया उठा ली।

    मिसेज़ बार्थिविक

    गुस्ताख़, पाजी कहीं का!

    बार्थिविक

    आप का ख़्याल है कि वह कल अपने बयान में भी यही कहेगा।

    स्नो

    यही उसको सफ़ाई होगी। कह नहीं सकता बीबी को बचाने के लिए ऐसा कह रहा है, या

    [ जैक की तरफ़ देखकर ]

    इसमें कुछ तत्व भी है। इसका फ़ैसला तो मैजिस्ट्रेट के हाथ में है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ गर्व से ]

    तत्व भी है? किसमें क्या? आपका मतलब समझ में नहीं आता। आप समझते हैं मेरा लड़का ऐसे आदमी को कभी अपने घर नहीं लायेगा!

    बार्थिविक

    [ अंगीठी के पास से, शांत रहने की चेष्टा करके ]

    मेरा लड़का अपनी सफ़ाई कर लेगा। अच्छा जैक, तुम क्या कहते हो?

    ९

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में ]

    वह क्या कहेगा? यही और क्या है कि सब मनगढ़ंत है।

    जैक

    [ दबसट में पड़ कर ]

    बात यह है, बात यह है, कि मुझे इसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं

    मिसेज़ बार्थिविक

    वह तो मैं पहिले ही कहती थी।

    [ स्नो से ]

    वह आदमी दीदा दिलेर बदमाश है।

    बार्थिविक

    [ अपने मन को दबाते हुए ]

    लेकिन जब मेरा लड़का कह रहा है कि इस मामले में कोई तत्त्व नहीं है तो क्या ऐसी दशा में उस आदमी पर मुकदमा चलाना ज़रूरी है।

    स्नो

    पर तो हमले का जुर्म लगाना होगा। मिस्टर जैक बार्थिविक भी पुलीस कचहरी चले आयें तो बड़ा अच्छा हो। बचा जेल जायँगे, यह तो मानी हुई बात है। विचित्र बात यह है कि उसके पास कुछ रुपये भी निकले और एक लाल रेशमी थैली भी थी।

    [ बार्थिविक चौंक पड़ता है; जैक उठता है, फिर बैठ जाता है। ]

    मेम साहब की थैली तो नहीं ग़ायब हो गई?

    बार्थिविक

    [ जल्दी से ]

    नहीं, नहीं, उनकी थैली नहीं खोई।

    जैक

    नहीं, थैली तो नहीं गई।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ मानो स्वप्न देखते हुए ]

    नहीं!

    [ स्नो से ]

    मैं नौकरों से पता लगा रही थी। यह आदमी घर के आस पास चक्कर लगाया करता है। अगर लंबी सज़ा मिल जाय तो खटका निकल जाय। ऐसे बदमाशों से हमारी रक्षा तो होनी ही चाहिये।

    बार्थिविक

    हां, हां, ज़रूर। यह तो सिद्धान्त की बात है। लेकिन इस मामले में हमें कई बातों पर विचार करना है।

    [ स्नो से ]

    इस आदमी पर तो मुक़दमा चलाना ही चाहिये, क्यों, आप भी तो यही कहते हैं?

    स्नो

    अवश्य, इसमें क्या सोचना है।

    बार्थिविक

    [ जैक की ओर उदास भाव से ताकते हुए ]

    मेरी इच्छा नहीं होती कि यह मुक़दमा चलाया जाय। ग़रीबों पर मुझे बड़ी दया आती है। अपने पद का विचार करते हुए यह मानना मेरा कर्तव्य है कि ग़रीबों की हालत बहुत ख़राब है। इनकी दशा में बहुत कुछ सुधार की ज़रूरत है। आप मेरा मतलब समझ रहे होंगे। अगर कोई ऐसी राह निकल आती कि मुक़दमा न चलाना पड़ता तो बड़ी अच्छी बात होती।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में]

    यह क्या कहते हो जाँन? तुम दूसरों के साथ अन्याय कर रहे हो। इसका आशय तो यह है कि हम जायदाद को लोगों की दया पर

    छोड़ दें। जिसका जी चाहे ले ले।

    बार्थिविक

    [ उसे इशारा करने की चेष्टा करके ]

    मैं यह नहीं कहता कि उसने अपराध नहीं किया। मैं इसके सब पहलुओं पर सोच रहा हूँ।

    मिसेज़ बार्थिविक

    यह सब फजूल, हर काम का वक्त होता है।

    स्नो

    [ छकु बनावटी आवाज़ में ]

    मैं यह बता देना चाहता हूँ जनाब, कि चोरी का इलज़ाम उठा लेने से कोई फ़ायदा न होगा, क्योंकि हमले के मुक़दमें में सभी बातें खुल ही जायँगी।

    [ जैक की ओर मार्मिक दृष्टि से देखता है ]

    और जैक, मैं पहले अर्ज़ कर चुका हूं, वह मुक़दमा ज़रूर चलाया जायगा।

    बार्थिविक

    [ जल्दी से ]

    हाँ, हाँ, यह तो होगा ही। उस स्त्री के विचार से मैं कह रहा हूं, यह तो मेरा अपना ख्याल है।

    स्नो

    अगर मैं आप की जगह होता तो इस मामले में ज़रा भी दखल न देता। इस में कोई बाधा पड़ने का भय नहीं है। ऐसे मामले में चट पट तय हो जाते हैं।

    बार्थिविक

    [ संदेह के भाव से ]

    अच्छा, यह बात? अच्छा, यह बात है?

    जैक

    [ सचेत होकर ]

    अच्छा! मुझे अपने बयान में क्या कहना पड़ेगा?

    स्नो

    यह तो आप ख़ुद जान सकते हैं।

    [ दरवाजे तक जाकर ]

    शायद कोई नई बात खड़ी हो जाय। अच्छा यह है कि आप एक वकील कर लीजिये। हम ख़ानसामा को यह साबित करने के लिए तलब करेंगे कि चीज़ वास्तव में चोरी गई। अब मुझे आज्ञा दीजिये, मुझे आज बहुत काम है। ग्यारह बजे के बाद किसी समय मुक़दमा पेश होगा। बंदगी हुजूर, बंदगी मेम साहब! मुझे कल यह डिबिया अदालत में पेश करनी पड़ेगी, इस लिए यदि आपको कोई आपत्ति न हो तो मैं इसे अपने साथ लेता जाऊं।

    [ वह डिबिया उठा लेता और सलाम करले चला जाता। बार्थिविक उसके साथ जाने के लिए उठता है, और अपने हाथों को कोट के पीछे रखकर निराश होकर बोलता है ]

    मैं चाहता हूँ कि तुम इन बातों में दखल न दिया करो। मगर तुम्हारी ऐसी आदत है कि समझो या न समझो दख़ल हरेक बात

    में दोगी। मारा–सब मामला चौपट कर दिया।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ रुखाई से ]

    मेरी समझ में नहीं आता तुमहारा मतलब क्या है। अगर तुम अपने हक़ के लिए नहीं खड़े हो सकते, तो मैं तो खड़ी हो सकती हूँ। मुझे तुम्हारे सिद्धान्त ज़रा भी नहीं भाते। उन्हें लेकर तुम चाटा करो।

    बार्थिविक

    सिद्धान्त! तुम हो किस फेर में। सिद्धान्तों की यहाँ चर्चा ही क्या? क्या तुम्हें मालूम नहीं कि पिछली रात को जैक नशे में चूर था?

    जैक

    अब्बा जान!

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ भयभीत होकर खड़ी हो जाती है ]

    जैक, यह क्या बात है?

    जैक

    कोई बात नहीं है, अम्मा। मैंने केवल भोजन किया था। सभी खाते हैं। मेरा मतलब है, यानी मेरा मतलब है—आप मेरा मतलब समझ गई होंगी। इसे नशे में चूर होना नहीं कहते। आक्सफ़ोर्ड में तो सभी मुँह का मज़ा बदल लिया करते हैं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    यह बड़ी बेहूदा बात है। अगर तुम लोग आक्सफ़ोर्ड में यही सब किया करते हो—

    जैक

    [ क्रोध से ]

    तो फिर आप लोगों ने मुझे वहाँ भेजा क्यों? जैसे और सब रहते हैं वैसेही तो मुझे भी रहना पड़ेगा। इतनी सी बात को नशे में चूर कहना हिमाकत। हाँ, मुझे खेद अवश्य है। आज दिन भर सिर में बड़ा दर्द रहा।

    बार्थिविक

    छी! अगर तुम्हें मामूली सी तमीज़ भी होती और तुम्हें इतना सा भी याद होता कि जब तुम यहाँ आए तो क्या क्या बातें हुईं तो हमें मालूम हो जाता कि इस बदमाश की बातों में कितना सच है। मगर अब तो कुछ समझ में ही नहीं आता। गोरख धंधा सा होकर रह गया!

    जैक

    [ घूरता हुआ मानो अधूरी बातें याद आ रही हैं ]

    कुछ कुछ याद आता है—फिर सब भूल जाता हूँ।

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्या कहते हो जैक? क्या तुम्हें इतना नशा था कि तुम्हें इतना भी याद नहीं?–

    जैक

    यह बात नहीं है, अम्मा। मुझे यहा आने की ख़ूब याद है—मैं ज़रूर आया हूंगा—

    बार्थिविक

    [ गुरसे से बेक़ाबू होकर, इधर से उधर तक टहलता हुआ ]

    ख़ूब!और वह मनहूस थैली कहां से आगई! खुदा खैर करे! ज़रा सोचो तो जैक! यह सारी बातें पत्रों में निकल जायँगी। किसी को मालूम था कि मामला यहां तक पहुँचेगा। इससे तो यह कहीं अच्छा होता कि एक दर्जन डिबिये खो जातीं और हम लोग ज़बान न खोलते!

    [ पत्नी से ]

    यह सब तुम्हारी करतूत है। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था। अच्छा हो कहीं रोपर आ जाता।

    मिसेज़ बार्थिविक

    ( तीव्र स्वर से )

    मेरी समझ में नहीं आता तुम क्या बक रहे हो, जाँन।

    बार्थिविक

    [ उसकी तरफ़ मुड़ कर ]

    नहीं तुम! अजी—तुम—तुम कुछ जानती नहीं।

    [ तेज़ आवाज़ से ]

    आखिर! वह रोपर कहां मर गया! अगर वह इस दलदल से निकलने की कोई राह निकाल दे, तो मैं जानूँ कि वह किसी काम का आदमी है! मैं बदकर कहता हूँ कि इससे निकलने का अब कोई रास्ता नहीं है। मुझे तो कुछ सूझता नहीं।

    जैक

    इधर सुनिये, अब्बाजान को क्यों दिक करती हो? मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि मैं थक कर बेदम हो गया था, और मुझे इसके सिवा कुछ याद नहीं है कि मैं घर आया।

    [ बहुत मंद स्वर में ]

    और रोज़ की तरह पलंग पर जाकर सो रहा।

    बार्थिविक

    पलंग पर चले गये? कौन जानता है तुम कहां चले गये मुझे तुम्हारे ऊपर अब विश्वास नहीं रहा। मुझे क्या पता कि तुम ज़मीन पर पड़ रहे होगे।

    जैक

    [ बिगड़ कर ]

    ज़मीन पर नहीं, मैं—-

    बार्थिविक

    [ सोफ़ा पर बैठ कर ]

    इसकी किसे परवाह है कि तुम कहां सोये थे? उस वक्त क्या होगा जब वह कह देगा……डूब मरने की बात होगी!

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्या?

    [ सन्नाटा ]

    बात क्या हुई, बोलते क्यों नहीं?

    जैक

    कुछ नहीं—-

    मिसेज़ बार्थिविक

    कुछ नहीं। कुछ नहीं इससे तुम्हारा क्या मतलब है, जैक? तुम्हारे दादा इसके लिए आसमान सिर पर उठा रहे हैं—

    जैक

    वह थैली मेरी है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम्हारी थैली? तुम्हारे पास थैली कब थी? तुम ख़ूब जानते हो तुम्हारे पास थैली न थी।

    जैक

    ख़ैर, दूसरे ही की सही—मगर यह केवल दिल्लगी थी। मुझे उस सड़ी सी थैली को लेकर क्या करना था?

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम्हारा मतलब है कि क्या किसी दूसरे की थेली थी और उसे इस बदमाश ने उड़ा ली?

    बार्थिविक

    जी हां! थैली उसने उड़ा ली। जोन्स वह आदमी नहीं है कि इस बात पर परदा डाल दे। वह इसे ख़ूब नमक मिर्च लगाकर बयान करेगा। समाचारपत्रों में इसकी चर्चा होगी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। किस बात का यह सब क़िस्सा है?

    [ जैक के ऊपर झुककर प्यार से ]

    जैक, बेटा, बताओ तो क्या बात है। डरो मत। साफ़ साफ़ बतादो, बात क्या है?

    जैक

    अम्मा, ऐसी बातें न करो!

    मिसेज़ बार्थिविक

    कैसी बात, बेटा?

    जैक

    कुछ नहीं, यों ही। मुझे कुछ याद नहीं कि वह चीज़ मेरे पास कैसे आगई। मुझसे और उससे एक पकड़ हो गई—मुझे कुछ ख़बर न थी कि मैं क्या कर रहा हूँ—मैंने-मैंने—शायद मैंने—तुम समझ गई होगी—शायद मैंने थैली उसके हाथ से छीन ली।

    मिसेज़ बार्थिविक

    उसके हाथ से? किसके हाथ से? कैसी थैली? किसकी थैली?

    जैक

    अजी, मुझे कुछ याद नहीं—-

    [ निराश और ऊंची आवाज़ में ]

    किसी औरत की थैली थी।

    १७

    मिसेज़ बार्थिविक

    किसी औरत की? नहीं! नहीं! जैक! ऐसा न कहो।

    जैक

    [ उछल कर ]

    तुम मानती ही नहीं थी तो मैं क्या करता। मैं तो नहीं बताना चाहता था। मेरा क्या क़सूर है?

    [ द्वार खुलता है और मारलो एक आदमी को अंदर लाता है अधेड़, कुछ मोटा आदमी है। शाम के कपड़े पहने हुए है। मूछें लाल और पतली हैं, आंखें काली और तेज़। उसकी भवें चीनियों की सी हैं। ]

    मारलो

    रोपर साहब आये हैं हुज़ूर!

    [ वह कमरे से चला जाता है ]

    रोपर

    [ तेज़ आँखों से चारों ओर देख कर ]

    कैसे मिज़ाज हैं?

    [ जैक और मिसेज़ बार्थिविक दोनों चुप बैठे रहते हैं ]

    बार्थिविक

    [ जल्दी से आकर ]

    शुक्र है आप आ तो गए! आप को याद है मैंने आज शाम को आप से क्या कहा था; जासूस अभी यहां आया था।

    रोपर

    डिबिया मिल गई?

    बार्थिविक

    हाँ, डिबिया तो मिल गई, पर एक बात है। यह मज़दूरनी का काम न था। उसके शराबी और ठलुये शौहर ने वे चीज़ें चुराई थीं। वह कहता है कि यही रात को उसे घर में लाया था

    [ वह जैक की तरफ़ हाथ उठाता है, जो ऐसा दबक जाता है मानों वार बचाता हो ]

    आप को कभी इसका विश्वास होगा।

    [ रोपर हंसता है और उत्तेजित हो कर शब्दों पर ज़ोर देता हुआ ]

    यह हँसी की बात नहीं है मैंने जैक का क़िस्सा भी आप से कहा था। आप समझ गए होंगे—बदमाश दोनों चीजें उठा ले गया—वह सत्यानासी थैली भी लेगया। अखबारों में इसकी चर्चा होगी।

    रोपर

    [ भवें चढ़ाकर ]

    हूँ! थैली! बड़े लोगों की दशा? आपके साहबज़ादे क्या कहते हैं?

    बार्थिविक

    उसे कुछ याद नहीं। ऐसा अंधेर कभी देखा था? पत्रों तक यह बात पहुँचेंगी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ हाथों से आंखों को छिपाकर ]

    नहीं! नहीं! यह बात तो नहीं हैं—

    [ बार्थिविक और रोपर घूम कर उसकी ओर देखने हैं ]

    बार्थिविक

    उस औरत पर कह रही हैं। वह बात अभी अभी इनके कानों में पड़ी है।

    [ रोपर सिर हिलाता है और मिसेज़ बार्थिविक अपने होंठों को दबाकर मन्द दृष्टि से जैक को देखती है और मेज़ के सामने बैठ जाती है ]

    आखिर, क्या करना चाहिए रोपर? वह लुच्चा जोन्स इस थैली वाले मामले को खूब बढ़ावेगा, बात का बतंगड़ बनादेगा।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मुझे विश्वास नहीं आता कि जैक ने थेली ली।

    बार्थिविक

    क्या अब भी कोई संदेह है? वह औरत अाज सवेरे अपनी थैली माँगने आई थी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    यहां? इतनी बेहया है। मुझे क्यों नहीं बताया?

    [ वह एक दूसरे के चेहरे की तरफ़ ताकती है, कोई उसे जवाब नहीं देता। सन्नाटा हो जाता है। ]

    बार्थिविक

    [ चौंककर ]

    क्या करना होगा, रोपर?

    रोपर

    [ धीरे से जैक से ]

    तुमने कुंजी तो दरवाज़े में नहीं छोड़ दी थी?

    जैक

    [ रुखाई से ]

    हां, छोड़ तो दी थी।

    बार्थिविक

    या ईश्वर! अभी और आगे न जाने क्या क्या होगा?

    मिसेज़ बार्थिविक

    मुझे विश्वास है कि तुम उसे घर में नहीं लाए,थे। जैक। यह सरासर झूठी बात है मैं जानती हूँ इसमें सचाई की गंध तक नहीं है, मिस्टर रोपर।

    रोपर

    ( यकायक )

    तुम रात कहां सोए थे?

    जैक

    ( तुरन्त )

    सोफ़ा पर—वहां–

    ( कुछ हिचिक कर )

    यानी—मैं—

    बार्थिविक

    सोफ़ा पर! क्या तुम्हारा मतलब यह है कि चारपाई पर गए ही नहीं।

    जैक

    ( मुँह लटका कर )

    नहीं।

    बार्थिविक

    अगर तुम्हें कुछ भी याद नहीं है तो यह इतना कैसे याद रहा?

    जैक

    क्यों कि आज सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने अपने को वहीं पाया।

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्या कहा?

    बार्थिविक

    या खुदा!

    जैक

    और मिसेज़ जोन्स ने मुझे देखा! मैं चाहता हूँ कि आप लोग मुझे यों दिक़ न करें।

    रोपर

    आपको याद है कि आपने किसी को शराब पिलाई थी?

    जैक

    हाँ, मैं क़सम खाकर कहता हूँ कि मुझे एक आदमी की याद आ रही है—उस आदमी के—

    [ रोपर की तरफ़ देखता है ]

    क्या आप मुझसे चाहते हैं कि—

    रोपर

    [ बिजली की तेज़ी से ]

    जिसका चेहरा गंदा है!

    जैक

    [ प्रसन्न होकर ]

    हाँ, वही वही! मुझे साफ़ याद आ रहा है—

    [ बार्थिविक अचानक खिसक जाता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक क्रोध से रोपर की तरफ़ देखती है और अपने बेटे की बाँह छूती है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुमको बिलकुल याद नहीं ह! यह कितनी हँसी की बात है। मुझे उस आदमी के यहाँ आने का बिलकुल विश्वास नहीं है।

    बार्थिविक

    तुम्हें सच बोलना चाहिए। चाहे यही सच क्यों न हो? लेकिन अगर तुम्हें याद आता है कि तुमने ऐसी बेहूदगी की तो तुम फिर मुझसे कोई अाशा न रक्खो।

    जैक

    [ उनकी तरफ़ घूर कर ]

    आख़िर आप लोग मुझसे चाहते क्या हैं?

    मिसेज़ बार्थिविक

    जैक!

    जैक

    जी हाँ, मेरी समझ में बिलकुल नहीं आता कि आप लोगों की इच्छा क्या है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    हम लोग यही चाहते हैं कि तुम सच बोलो और कह दो कि तुमने उस नीच को घर में नहीं बुलाया।

    बार्थिविक

    बेशक, अगर तुम ख़याल करते हो, कि तुमने इस बेशरमी से उसे ह्विस्की मिलाई और अपनी कर तूत उसे दिखाई और तुम्हारी दशा इतनी ख़राब थी कि तुम्हें वें बातें बिलकुल याद नहीं, तो—

    रोपर

    [ जल्दी से ]

    मुझे ख़ुद कोई बात याद नहीं रहती। याददाश्त इतनी कमज़ोर है।

    बार्थिविक

    [ निराशा भाव से ]

    तो मैं नहीं जानता कि तुम्हें क्या कहना पड़ेगा!

    रोपर

    [ जैक से ]

    तुम्हें कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। अपने को इस झमेले में मत डालो। औरत ने चीज़ें चुराई या मर्द ने चीज़ें चुराईं आपको इससे कुछ मतलब नहीं। आप तो सोफ़ा पर सो रहे थे।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुमने दरवाज़े में कुंजी लगी हुई छोड़ दो, यही क्या कम है? अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।

    [ उसके माथे को प्यार से छुकर ]

    तुम्हारा सिर आज कितना गर्म है?

    जैक

    लेकिन मुझे यह तो बतलाइए कि मुझे करना क्या होगा?

    [ क्रोध से ]

    मैं नहीं चाहता, कि इस तरह चारों ओर से मुझे दिक़ करें।

    [ मिसेज़ बार्थिविक उसके पास से हट जाती है। ]

    रोपर

    [ जल्दी से ]

    आप यह सब कुछ भूल जायँ। आप तो सोये थे।

    जैक

    क्या कल मेरा कचहरी जाना जरूरी है?

    रोपर

    [ सिर हिला कर ]

    नहीं।

    बार्थिविक

    [ ज़रा शान्तचित्त होकर ]

    सचमुच!

    रोपर

    जी हाँ!

    बार्थिविक

    लेकिन आप तो जायँगे?

    रोपर

    जी हाँ!

    जैक

    [ बनावटी प्रसन्नता से ]

    बड़ी इनायत है! में यही चाहता हूँ कि मुझे वहाँ जाना न पड़े।

    [ सिर पर हाथ रखकर ]

    मुझे क्षमा कीजिएगा। अाज सिर में ज़ोरों का दर्द है।

    [ बाप की तरफ़ से माँ की तरफ़ देखता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ जल्दी से घूम कर ]

    अच्छा, जाओ बेटा!

    जैक

    अच्छा, अम्माँ!

    [ वह चला जाता है। मिसेज़ बार्थिविक लम्बी सांस खींचती है। सन्नाटा हो जाता है। ]

    बार्थिविक

    यह बहुत सस्ते छूट गए! अगर मैंने उस औरत को रुपए न दिए होते, तो उसने ज़रूर दावा किया होता।

    रोपर

    अब आपको मालूम हुआ कि धन कितना उपयोगी है।

    बार्थिविक

    मुझे अब भी सन्देह है कि हमें सच को छिपा देना चाहिए या नहीं।

    रोपर

    चालान होगा।

    बार्थिविक

    क्या? आपका मनशा है कि इन्हें अदालत में जाना पड़ेगा?

    रोपर

    हाँ?

    बार्थिविक

    अच्छा! मैंने समझा था कि आप—देखिए मिस्टर रोपर! उस थैली का ज़िक्र मिस्टर काग़ज़ों में न आने दीजिएगा।

    [ रोपर अपनी छोटी आँखें उसके चेहरे पर जमा देता है और सिर हिलाता है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    मिस्टर रोपर, क्या आपके ख़याल में यह मुनासिब नहीं है कि जोन्स परिवार का हाल मैजिस्ट्रेट से कह दिया जाय। मेरा मतलब यह है कि शादी के पहले उनका आपस में कितना अनुचित सम्बन्ध था। शायद जॉन ने आप से नहीं कहा।

    रोपर

    यह तो कोई मार्के की बात नहीं।

    ११

    मिसेज़ बार्थिविक

    मार्के की बात नहीं।

    रोपर

    निजी बात है। शायद मैजिस्ट्रेट पर भी यही बीत चुकी हो।

    बार्थिविक

    [ पहलू बदल कर, मानो बोझ खिसका रहा है ]

    तो अब आप इस मामले को अपने हाथ में रखेंगे?

    रोपर

    अगर ईश्वर की कृपा हुई!

    [ हाथ बढ़ाता है ]

    बार्थिविक

    [ विरक्त भाव से हाथ हिलाकर ]

    ईश्वर की इच्छा? क्या? आप चले?

    रोपर

    जी हाँ! ऐसा ही मेरे पास एक दूसरा मुक़दमा भी है।

    [ मिसेज़ बार्थिविक का झुककर सलाम करता है और चला जाता है। बार्थिविक उसके पीछे-पीछे अन्त तक बातें करता जाता है। मिसेज़ बार्थिविक मेज़ पर बैठी हुई सिसक-सिसक कर रोने लगती है; बार्थिविक लौटता है। ]

    बार्थिविक

    [ आप ही आप ]

    बदनामी होगी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तुरत अपने रंज को छिपाकर ]

    मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि रोपर ने ऐसी बात को हँसी में क्यों उड़ा दिया?

    बार्थिविक

    [ विचित्रभाव से ताक कर ]

    तुम—तुम्हारी समझ में कोई बात नहीं आती। तुम्हें रत्ती भर भी समझ नहीं है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ क्रोध से ]

    तुम मुझसे कहते हो कि मुझ में समझ नहीं है?

    बार्थिविक

    [ घबड़ा कर ]

    मैं—बहुत परेशान हूं। सारी बात आदि से अन्त तक मेरे सिद्धान्त के विरुद्ध हैं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मत बको। तुम्हारा कोई सिद्धान्त भी है। तुम्हारे लिए दुनिया में डरने के सिवा और कोई सिद्धान्त नहीं है।

    बार्थिविक

    [ खिड़की के पास जाकर ]

    मैं अपनी ज़िन्दगी में कभी न डरा। तुमने सुना है, रोपर क्या कहता था? जिस आदमी के घर में ऐसी वारदात हो गई हो, उसके होश उड़ा देने को इतनी बात काफ़ी है। हम जो कुछ कहते या करते हैं, वह हमारे मुँह से निकल ही पड़ता है। भूत-सा सिर पर सवार रहता है। मैं इन बातों का आदी नहीं हूँ।

    [ वह खिड़की को खोल देता है मानो उसका दम घुट रहा हो। किसी लड़के के सिसकने की धीमी आवाज़ सुनाई देती है। ]

    यह कैसी आवाज़ है?

    [ वे सब कान लगा कर सुनते हैं। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में ]

    मुझसे रोना नहीं सुना जाता। मैं मार्लो को भेजती हूँ कि इसे रोक दे। मेरे सारे रोएँ खड़े हो गए।

    [ घंटी बजाती है ]

    बार्थिविक

    मैं खिड़की बन्द किए देता हूँ, फिर तुम्हें कुछ न सुनाई देगा।

    [ वह खिड़की बन्द कर देता है और सन्नाटा हो जाता है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में ]

    इससे कोई फ़ायदा नहीं। मेरा दिल धड़क रहा है। मुझे किसी बात से इतनी घबड़ाहट नहीं होती, जितनी किसी बालक के रोने से।

    [ मार्लो आता है ]

    यह कैसा रोने का शोर है मार्लो? किसी बच्चे की अावाज़ मालूम होती है।

    बार्थिविक

    बच्चा है। उस मुँडेर से चिपटा हुआ दिखाई तो पड़ता है।

    मार्लो

    [ खिड़की खोलकर और बाहर देखकर ]

    यह मिसेज़ जोन्स का छोटा लड़का है, हज़ूर! अपनी माँ को खोजता हुअा यहाँ आया है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ जल्दी से खिड़की के पास जाकर ]

    कैसा गरीब लड़का है! जॉन, हमें यह मुकदमा न चलाना चाहिए।

    बार्थिविक

    [ एक कुर्सी पर धम से बैठकर ]

    लेकिन अब तो बात हमारे हाथ से निकल गई!

    [ मिसेज़ बार्थिविक खिड़की की तरफ़ पीठ कर लेती है, उसके चेहरे पर बेचैनी का भाव दिखाई देता है, वह अपने ओंठ दबाए खड़ी होती है। रोना फिर शुरू हो जाता है। बार्थिविक हाथों से अपने कान बन्द कर लेता है। और मार्लो खिड़की बन्द कर देता है। रोना बन्द हो जाता है। ]

    पर्दा गिरता है।

    अंक ३

    दृश्य १

    आठ दिन गुज़र गए हैं। लन्दन के पुलिसकोर्ट का दृश्य है। एक

    बजा है। एक चँदवे के नीचे न्याय का आसन है। इस चँदवे के ऊपर शेर और गैंडे की प्रतिमा बनी हुई है। आँख के सामने एक मुरझाई हुई सूरत का न्यायाधीश अपने कोट के पिछले भाग को गर्म कर रहा है। और दो छोटी छोटी लड़कियों को घूर रहा है। जो नीले और नारंगी चीथड़े पहने हुए हैं। कपड़ों का रंग बिलकुल उड़ गया है। ये लड़कियां कठघरे में लाई जाती हैं। गवाहों के कठघरे के पास एक अफ़सर अोवर कोट पहने खड़ा है। उसकी दाढ़ी छोटी और भूरी है। छोटी लड़कियों के बग़ल में एक गंजा पुलिस कांस्टेबिल खड़ा है। अगली बेंच पर बार्थिविक और रोपर बैठे हुए हैं। जैक उनके पीछे बैठा है। जंगलेदार कटघरे में कुछ फटेहाल मर्द और औरतें पीछे खड़ी हैं। कई मोटे ताज़े कांस्टेबिल इधर उधर खड़े या बैठे हैं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ पिता-भाव दिखाता हुअा कठोर स्वर में ]

    अब हमें इन लड़कियों का झगड़ा तय कर देना चाहिए।

    अहलमद

    थेरसा लिवेंस! माड लिवेंस!

    [ गंजा कांस्टेबिल छोटी लड़कियों को दिखाता है जो चुप-चाप, स्थिति को समझती हुई विरक्त भाव से खड़ी हैं। ]

    दारोग़ा!

    [ दारोग़ा गवाहों के कठघरे में आता है। ]

    तुम अदालत के सामने जो बयान दोगे, वह बिलकुल सच, पूरा पूरा सच और सच के सिवा और कुछ न होगा। ईश्वर तुम्हारी मदद करे! इस किताब को चूमो।

    [ दारोग़ा किताब चूमता है ]

    दारोग़ा

    [ एक ही आवाज़ में, हर एक अवाज़ के अन्त में रुकता हुआ ताकि उसका बयान लिखा जा सके। ]

    आज सबेरे क़रीब दस बजे मैंने इन दोनों लड़कियों को ब्ल्यूस्ष्ट्रीट में एक सराय के बाहर रोते हुए पाया। जब मैंने पूछा कि तुम्हारा घर कहां है तो उन्होंने कहा कि हमारा घर नहीं है। माँ कहीं चली गई है। बाप के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उसके पास कोई काम नहीं है। जब पूछा कि तुम लोग रात कहां साईं थीं, तो उन्होंने अपनी फूफू का नाम लिया। हज़ूर, मैंने तहक़ीक़ात की है। औरत घर से निकल गई है और मारी मारी फिरती है। बाप बेकार है और मामूली सराय में रहता है। उसकी बहन के अपने ही आठ लड़के हैं वह कहती है कि मैं इन लड़कियों का अब पालन नहीं कर सकती।

    मैजिस्ट्रेट

    [ चंदवे के नीचे अपनी जगह पर आकर ]

    तुम कहते हो कि माँ मारी मारी फिरती है। तुम्हारे पास क्या सबूत है?

    दारोग़ा

    हज़ूर, उसका शौहर यहां मौजूद है।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। उसे पेश करो।

    [ लिवेंस का नाम पुकारा जाता है। मैजिस्ट्रेट आगे झुक जाता है और कठोर दया से लड़कियों की ओर देखता है। लिवेंस अंदर आता है। उसके बाल खिचड़ी हो गए हैं। कालर की जगह गुलूबन्द लगाए हुए है। वह गवाहों के कठघरे के पास खड़ा होजाता है। ]

    अच्छा, तुम इनके बाप हो? तो तुम इन लड़कियों को घर में क्यों नहीं रखते? यह क्या बात है कि तुम इनको इस तरह सड़कों पर फिरने के लिए छोड़ देते हो?

    लिवेंस

    हज़ूर, मेरे कोई घर नहीं है। मेरे खाने का तो ठिकाना नहीं है। मैं बिलकुल बेकार हूं और न मेरे पास कुछ है जिससे इनका पालन कर सकूँ।

    मैजिस्ट्रेट

    यह कैसे?

    लिवेंस

    [ शर्मा कर ]

    मेरी बीबी निकल गई और सारी चीज़ें गिरों रखदीं।

    मैजिस्ट्रेट

    लेकिन तुमने उसे ऐसा करने क्यों दिया?

    लिवेंस

    मैं उसे रोक नहीं सका। उधर में काम की तलाश में गया, इधर यह निकल भागी।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तुम उसे मारते पीटते थे?

    लिवेंस

    [ ज़ोर देकर ]

    हज़ूर, मैंने कभी उसे तिनके से भी न मारा?

    मैजिस्ट्रेट

    तब क्या बात थी, क्या वह शराब पीती थी?

    लिवेंस

    [ धीमी अवाज़ में ]

    हाँ, हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    उसका चाल चलन अच्छा न था?

    लिवेंस

    [ धीमी आवाज़ में ]

    हाँ, हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    अब कहां है?

    लिवेंस

    नहीं मालूम, हज़ूर! वह एक आदमी के साथ निकल गई और तब मैं—

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां, ठीक है! यहां कोई उसे जानता थोड़े ही है?

    [ गंजे कांस्टेबिल से]

    क्या यहां कोई जानता है उसे?

    दारोग़ा

    इस इलाके में तो कोई नहीं जानता, हज़ूर! लेकिन मैंने पता लगाया है कि—-

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां, ठीक है! इतना ही काफ़ी है।

    [ बाप से ]

    तुम कहते हो कि वह घर से निकल गई और इन लड़कियों को छोड़ गई। तुम इनके लिए क्या इन्तजाम कर सकते हो? तुम देखने में तो हट्टे-कट्टे आदमी हो!

    लिवेंस

    हाँ, हज़ूर, हट्टा-कट्टा तो हूं, और काम भी करना चाहता हूँ, लेकिन अपना कोई बस नहीं। कहीं मज़दूरी मिले तब तो?

    मैजिस्ट्रेट

    लेकिन तुमने कोशिश की थी?

    लिवेंस

    हज़ूर, सब कुछ करके हार गया! कोशिश करने में कोई कसर नहीं उठा रखी।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा–

    दारोग़ा

    [ सन्नाटा हो जाता है ]

    अगर हज़ूर का ख़याल हो कि ये बच्चे अनाथ हैं तो हम उनको लेने को तैयार हैं।

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां, मैं जानता हूँ! लेकिन मेरे पास कोई ऐसी शहादत नहीं है कि यह आदमी अपने बच्चों की ठीक तौर से देख रेख नहीं कर सकता।

    [ वह उठता है और आग के आग चला जाता है। ]

    दारोग़ा

    हज़ूर, इनकी माँ इनके पास आती जाती है।

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां! माँ इस योग्य नहीं है कि बच्चे उसे दिए जायँ।

    [ बाप से ]

    तुम क्या कहते हो?

    लिवेंस

    हज़ूर, मैं इतना ही कहता हूँ कि अगर मुझे काम मिल जाय तो मैं बड़ी ख़ुशी से उनकी परवरिश करूँगा। लेकिन मैं क्या करूँ हज़ूर, मेरे तो भोजन का ठिकाना नहीं। सराय में पड़ा रहता हूँ। मैं मज़बूत आदमी हूँ, काम करना चाहता हूँ। दूसरों से दूनी हिम्मत रखता हूं लेकिन हज़ूर देखते हैं कि मेरे बाल पक गए हैं ब़ुखार के सबब से।

    [ अपने बाल छूता है ]

    इस लिए मैं जँचता नहीं। शायद इसी लिए मुझे कोई नौकर नहीं रखता।

    मैजिस्ट्रेट

    [ आहिस्ता से ]

    हाँ, हाँ! मैं समझता हूँ कि यह एक मामला है।

    [ लड़कियों की तरफ़ कड़ी आँखों से देख कर ]

    १२

    तुम चाहते हो कि ये लड़कियाँ अनाथालय में भेज दी जायँ!

    लिवेंस

    हाँ हज़ूर, मेरी तो यही इच्छा है।

    मैजिस्ट्रेट

    मैं एक हफ़्ते की मुहलत देता हूँ। आज ही के दिन फिर लाना। अगर उसवक्त उचित हुआ तो मैं हुक्म दे दूँगा।

    दारोग़ा

    आज के दिन हज़ूर!

    [ गंजा कांस्टेबिल लड़कियों का कंधा पकड़े ले जाता है। बाप उनके पीछे पीछे जाता है। मैजिस्ट्रेट अपनी जगह पर लौट आता है और झुक कर क्लर्क से सायँ सायँ बातें करता हैं। ]

    बार्थिविक

    [ हाथ की आड़ से ]

    बड़ा करुण दृश्य है रोपर मुझे तो उनपर बड़ी दया आ रही है।

    रोपर

    पुलिस कोर्ट में ऐसे सैकड़ों आया करते हैं।

    बार्थिविक

    बड़ी दिल दुखानेवाली बात है। लोगों की दशा जितना ही देखता हूं, उतना ही मेरे दिल पर असर होता है। मैं पार्लमेंट में उनका पक्ष लेकर अवश्य खड़ा होऊँगा। मैं एक प्रस्ताव—-

    [ मैजिस्ट्रेट क्लार्क से बोलना बन्द कर देता है। ]

    क्लार्क

    हिरासतवालो!

    [ बार्थिविक एकाएक रुक जाता है। कुछ हलचल होती है और मिसेज़ जोन्स सदर दरवाज़े से अन्दर आती है। जोन्स पुलिस वालों के साथ कैदियों के दरवाज़े से आता है। वे कठघरे के अन्दर एक कतार में खड़े होते हैं। ]

    क्लार्क

    जेम्स जोन्स! जेन जोन्स!

    अर्दली

    जेन जोन्स?

    बार्थिविक

    [ धीरे से ]

    देखो रोपर, उस थैली का ज़िक्र न आने पाए। चाहे जो कुछ हो तुम उसे समाचार पत्रों में न आने देना।

    [ रोपर सिर हिलाता है। ]

    गंजा कांस्टेबिल

    चुप रहो।

    [ मिसेज़ जोन्स काले पतले फटे हुए कपड़े पहने हुए है। उसकी टोपी काली है। वह कठघरे के सामने की दीवार पर हाथ रक्खे चुप चाप खड़ी हो जाती है। जोन्स कठघरे की पिछली दीवार टेक कर खड़ा हो जाता है। और इधर उधर साहस भरी दृष्टि से ताकता है। उसका चेहरा उतरा हुआ है और बाल बढ़े हुए हैं। ]

    क्लार्क

    [ अपने काग़ज़ देखकर ]

    हज़ूर, यह वही मुक़दमा है जो पिछले बुधवार को ज़ेर तजवीज़ था। एक चाँदी की सिगरेट की डिबिया की चोरी और पुलिस पर हमला—दोनों मुलज़िमों का साथ साथ विचार हो रहा था। जेम्स जोन्स जेन जोन्स।

    मैजिस्ट्रेट

    [ घूरकर ]

    हाँ, हाँ, मुझे याद है।

    क्लार्क

    जेन जोन्स!

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ, हज़ूर।

    क्लार्क

    क्या तुम स्वीकार करती हो कि तुमने एक चांदी की सिग्रेट की डिबिया जिसकी क़ीमत ५ पौं० १० शिलिंग है, जान बार्थिविक मेंबर पार्लमेंट के मकान से, इस्टर मंडे के दिन ग्यारह बजे रात और ईस्टर ट्यूसडे आठ बजे दिन के बीच में चुराई थी। बोलो हाँ या नहीं?

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमे स्वर में ]

    नहीं हज़ूर, मैने नहीं—

    क्लार्क

    जेम्स जोन्स, क्या तुम स्वीकार करते हो, कि तुमने एक चाँदी की सिग्रेट की डिबिया जिसकी क़ीमत ५ पौं० १० शिलिंग है, जान बार्थिविक मेंबर पार्लमेंट के मकान से इस्टर मंडे को ११ बजे रात और ईस्टर ट्यूसडे के ८ बजे दिन के बीच में चुराई? और जब पुलीस ईस्टर टयूसडे को तीन बजे शाम के वक्त अपना काम करना चाहती थी, तो तुमने उसपर हमला किया? बोलो हाँ या नहीं।

    जोन्स

    [ रुखाई से ]

    हाँ, लेकिन इसके बारे में मुझे बहुत सी बातें कहनी हैं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ क्लार्क से ]

    हाँ, हाँ! लेकिन यह क्या बात है कि इन दोनों पर एक ही जुर्म लगाया गया है? क्या वे मियां बीबी हैं?

    क्लार्क

    हाँ हज़ूर! आपको याद है; कि आपने मुजरिम को हिरासत में रक्खा था कि शौहर के बयान पर और भी शहादत ली जा सके।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तभी से ये दोनों हवालात में हैं?

    क्लार्क

    आपने औरत को उसीकी ज़मानत पर छोड़ दिया था।

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ, हाँ! यह चाँदी की डिबियावाला मामला है। मुझे अब याद आया। अच्छा।

    क्लार्क

    टामस मार्लो?

    {{c|[ टामस मार्लो की पुकार होती है। मार्लो अन्दर आता है और गवाहों के कठघरे में जाता है। वहां उसे हलफ़ दी जाती है। चाँदी की डिबिया पेश की जाती है और कठघरे की दीवार पर रखी जाती है। ]

    क्लार्क

    [ मिसिल पढ़ता हआ ]

    तुम्हारा नाम टामस मार्लो है? तुम जान बार्थिविक न० ६ राकिंघम गेट के यहां खानसामा हो?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    क्या तुमने पिछले ईस्टरडे को रात को चांदी की एक डिबिया नं० ६ राकिंघम गेट के खाने के कमरे में एक तश्तरी में रक्खी! क्या यही वह डिबिया है?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    और जब तुम सुबह को पौने नौ बजे तश्तरी को उठाने गए तो तुम्हें डिबिया नहीं मिली?

    मार्लो

    हाँ, हज़ूर!

    क्लार्क

    तुम इस मुजरिम औरत को जानते हो?

    [ मार्लो सिर हिलाता है ]

    क्या वह नं० ६ राकिंघम गेट में मज़दूरी का कार्य करती है?

    [ मार्लो फिर सिर हिलाता है ]

    जब तुमने डिबिया पाई तो उस वक्त मिसेज़ जोन्स उस कमरे में थी?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    फिर तुमने इस चोरी का हाल जाकर अपने मालिक से कहा और उसने तुम्हें थाने भेजा?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    [ मिसेज़ जोन्स से ]

    तुम्हें इनसे कुछ पूछना है?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर! कुछ नहीं।

    क्लार्क

    [ जोन्स से ]

    जेम्स जोन्स क्या तुम्हें इस गवाह से कुछ पूछना है?

    जोन्स

    मैं तो उसे जानता भी नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तुमको ठीक याद है कि तुमने उसी वक्त डिबिया रक्खी थी जिस वक्त की तुम कह रहे हो?

    मार्लो

    हां, हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। अब अफसर ( ख़ुफ़िया पुलीस) को बुलाओ।

    [ मार्लो चला जाता है और स्नो कठघरे में आता है ]

    अर्दली

    तुम अदालत के सामने जो बयान दोगे वह सच होगा, बिलकुल सच होगा। और सच के सिवा कुछ न होगा, ईश्वर तुम्हारी मदद करे।

    [ स्नो किताब चूमता है ]

    क्लार्क

    [ मिसिल चूमते हुये ]

    तुम्हारा नाम राबर्ट स्नो है? तुम मिट्रा पुलीटन पुलीस दल के नं० १० बी० विभाग के जासूस हो? आज्ञानुसार ईस्टर ट्यूसडे को तुम क़ैदी के मकान नं० ३४ मरथर स्ट्रीट में गए थे? और क्या तुमने अंदर, जाने पर इस डिबिया को मेज़ पर पड़ी पाया?

    स्नो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    क्या यही डिबिया है?

    स्नो

    [ डिबिया को उँगली से छूकर ]

    जी हाँ!

    क्लार्क

    तब क्या तुमने डिबिया को अपने क़ब्जे में कर लिया और इस क़ैदी औरत पर उस डिबिया के चोरी का इलज़ाम लगाया? और क्या उसने चोरी से इनकार किया?

    स्नो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    क्या तुमने उसे हिरासत में ले लिया?

    स्नो

    जी हाँ!

    मैजिस्ट्रेट

    उसका बर्ताव कैसा था?

    स्नो

    उसने ज़रा भी हुज्जत न की। हाँ, बराबर इनकार करती रही।

    मैजिस्ट्रेट

    तुम उसे जानते हो?

    स्नो

    नहीं हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    यहां और कोई उसे जानता है?

    गंजा कांस्टेबिल

    नहीं हज़ूर! दो में से एक को भी कोई नहीं जानता? हमारे पास उनके ख़िलाफ़ कोई शिकायत नहीं है।

    क्लार्क

    [ मिसेज़ जोन्स से ]

    तुम्हें इस अफ़सर से कुछ पूछना है?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर, मुझे कुछ नहीं पूछना है।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है, आगे चलो।

    क्लार्क

    [ मिसिल पढ़ता हुआ ]

    और जब तुम इस औरत को गिरफ़्तार कर रहे थे, क्या मर्द क़ैदी ने मुदाख़लत की और तुम्हें अपना काम करने से रोका? और क्या तुमको एक घूँसा मारा?

    स्नो

    जी हाँ।

    क्लार्क

    क्या उसने कहा इसे छोड़ दो, डिबिया मैंने ली है।

    स्नो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    और तब तुमने सीटी बजाई और दूसरे कांस्टेबिल की मदद से उसे हिरासत में ले लिया?

    स्नो

    जी हाँ।

    क्लार्क

    क्या थाने पर जाते हुए वह बहुत ग़ुस्से में था और तुम्हें गालियाँ दीं? और बार बार कहता रहा कि डिबिया मैंने ली है?

    [ स्नो सिर हिलाता है ]

    क्या इसपर तुमने उससे पूछा कि डिबिया तुमने कैसे चुराई? और क्या उसने कहा कि मैं छोटे मिस्टर बार्थिविक के बुलाने पर मकान में गया?

    [ बार्थिविक अपनी जगह पर घूमकर रोपर की तरफ़ कड़ी दृष्टि से देखता है ]

    क्या उस दिन इस्टर मंडे की आधी रात थी? और मैंने ह्विस्की पी और उसीके नशे में डिबिया उठाली?

    स्नो

    जी हाँ।

    क्लार्क

    क्या वह बराबर इसी तरह झल्लाता रहा?

    १३

    स्नो

    जी हाँ!

    जोन्स

    [ बीच में बोलकर ]

    ज़रूर झल्लाता रहा। जब मैं तुमसे कह रहा था कि डिबिया मैंने ली है तो तुमने मेरी बीबी पर क्यों हाथ डाला?

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन बढ़ाकर हिश करके डाटता हुआ ]

    तुम जो कुछ कहना चाहोगे, उसे कहने का मौक़ा तुझे अभी मिलेगा। इस अफ़सर से तुम्हें कुछ पूछना है।

    जोन्स

    [ चिढ़कर ]

    नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। हम पहले मुजरिम औरत का बयान लेंगे।

    मिसेज़ जोन्स

    हज़ूर, मैं तो अब भी वही कहती हूं जो अब तक बराबर कहती आ रही हूँ कि मैंने डिबिया नहीं चुराई।

    मैजिस्ट्रेट

    ठीक है, लेकिन क्या तुमको मालूम था कि किसी ने उसे चुराया?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर, और मेरे शौहर ने जो कुछ कहा है उसके बारे में मैं कुछ नहीं जानती। हाँ इतना ज़रूर जानती हूँ कि वह सोमवार को बहुत रात गए घर आये। उस वक्त एक बज चुका था। और वह

    अपने आपे में न थे।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या वह शराब पीये था?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    और वह नशे में था?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हज़ूर, बिलकुल बे ख़बर था।

    मैजिस्ट्रेट

    और उसने तुमसे कुछ कहा?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर, खाली मुझे गालियाँ देता रहा। और सुबह को जब मैं उठी और काम करने चली गई तो वह सोता रहा। फिर मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती। हाँ, मिस्टर बार्थिविक ने जो मेरे मालिक हैं, मुझसे कहा कि डिबिया ग़ायब हो गई है।

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ! हाँ!

    मिसेज़ जोन्स

    तो जब मैं अपने शौहर का कोट हिलाने लगी तो सिग्रेट की डिबिया उस में से गिर पड़ी। और सारे सिग्रेट चारपाई पर बिखर गए।

    मैजिस्ट्रेट

    [ स्नो से ]

    तुम कहते हो कि सिग्रेट चारपाई पर बिखर गए? तुमने सिग्रेट चारपाई पर बिखरे देखे थे?

    स्नो

    नहीं हज़ूर, मैंने नहीं देखा।

    मैजिस्ट्रेट

    यह तो कहते हैं कि मैंने उन्हें बिखरे नहीं देखा!

    जोन्स

    न देखा हो, लेकिन बिखरे थे।

    स्नो

    हज़ूर, मैने कमरे की सब चीज़ों के देखने का मौक़ा ही नहीं पाया। इस मर्द ने मेरा काम ही हलका कर दिया।

    मैजिस्ट्रेट

    [ मिसेज़ जोन्स से ]

    अच्छा तुम्हें और क्या कहना है?

    मिसेज़ जोन्स

    तो हज़ूर, जब डिबिया देखी, तो मेरे होश उड़ गए। और मेरी समझ में न आया कि उन्होंने क्यों ऐसा काम किया। जब जासूस अफ़सर आया तो हम लोगों में इसीके बारे में कहा सुनी हो रही थी। क्योंकि हज़ूर, इसने मुझे तबाह कर दिया। अब मुझे कौन नौकर रक्खेगा। मेरे तीन तीन बच्चे हैं हज़ूर।

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन बढ़ाकर ]

    हाँ, हाँ! लेकिन उसने तुमसे कहा क्या?

    मिसेज़ जोन्स

    मैंने उससे पूछा कि तुम्हारे ऊपर ऐसी क्या अाफ़त आई कि तुमने ऐसा काम कर डाला। उसने कहा कि यह नशे के कारण हुआ। मैंने बहुत शराब पी ली थी और न जाने मुझपर क्या सनक सवार हो गई थी। और बात यह है हज़ूर, कि उन्होंने दिन भर कुछ नहीं खाया था। और जब ख़ाली पेट कोई शराब पीता है, तो चट दिमाग़ पर असर हो जाता है। हज़ूर, न जानते हों लेकिन यह बात सच है। और मैं क़सम खाकर कहती हूँ कि जबसे हमारा ब्याह हुआ, उसने कभी ऐसा काम नहीं किया। हालाँकि हम लोगों को बड़ी बड़ी आफ़तें झेलनी पड़ी।

    [ कुछ ज़ोर देकर बात करती हुई ]

    मुझे विश्वास है कि अगर वह अपने आप में होते तो ऐसा काम कभी न करते।

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ, हाँ! लेकिन क्या तुम नहीं जानती कि यह कोई उज्र नहीं है?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ जानती हूँ, हज़ूर।

    [ मैजिस्ट्रेट आगे झुक जाता है और क्लार्क से बातें करता है। ]

    जैक

    [ पीछे की जगह से आगे को झुककर ]

    दादा, मैं कहता हूँ।

    बार्थिविक

    चुप रहो।

    [ रोपर से बातें करते हुए मुंह छिपाकर ]

    रोपर, अच्छा हो कि तुम अब खड़े हो जाओ और कह दो कि और सब बातों और क़ैदियों की ग़रीबी का ख़याल करके हम इस मुक़दमे को और आगे नहीं बढ़ाना चाहते। और अगर मैजिस्ट्रेट साहब इसे उस आदमी का फ़िसाद समझ कर काररवाई करें—

    गंजा कांस्टेबिल

    खामोश!

    [ रोपर सिर हिलाता है ]

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा, अब अगर यह मान लिया जाय कि जो कुछ तुम कहती हो वह सच है और जो कुछ तुम्हारा शौहर कहता है वह भी सच है तो मुझे यह विचार करना पड़ेगा कि वह कैसे घर के अन्दर पहुँचा। और क्या तुमने अन्दर पहुँचने में उसकी कुछ मदद की? तुम उस मकान में मज़दूरनी का काम करती हो न?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ, हज़ूर, लेकिन अगर मैं उसको मकान के अन्दर घुसने में मदद देती तो मेरे लिए यह बहुत बुरा काम होता। और मैंने जहाँ जहाँ काम किया कभी ऐसा न किया।

    मैजिस्ट्रेट

    ख़ैर, यह तो तुम कहती हो। अब देखें तुम्हारा शौहर क्या बयान देता है।

    जोन्स

    [ जो पीछे के कठघरे में हाथ टेके हुए धीमी रूखी आवाज़ से बोलता है ]

    मैं वही कहता हूं जो कुछ मेरी बीबी कहती है। मैं कभी पुलीस कोर्ट में नहीं लाया गया। और मैं साबित कर सकता हूँ कि मैंने यह काम नशे में किया। मैंने अपनी बीबी से कह दिया और वह भी यही कहेगी कि मैं उस चीज़ को पानी में फेंकने जा रहा था। यह इससे कहीं अच्छा था कि मैं उसके पीछे परेशान होता।

    मैजिस्ट्रेट

    लेकिन तुम मकान के अन्दर घुसे कैसे?

    जोन्स

    मैं उधर से गुजर रहा था। मैं "गोट और बेल्स" सराय से घर जा रहा था।

    मैजिस्ट्रेट

    गोट और बेल्स क्या चीज़ है? क्या सराय है?

    जोन्स

    हाँ, उस कोने पर। उस दिन बैंक की छुट्टी थी और मैंने दो घूँट पी ली थी। मैंने छोटे मिस्टर बार्थिविक को ग़लत जगह दरवाज़े पर कुंजी लगाते हुए देखा।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा!

    जोन्स

    [ आहिस्ता से और कई बार रुककर ]

    तो मैंने उन्हें कुंजी का सुराख़ दिखा दिया। वह नवाबों की तरह शराब में चूर था। तब वह चला गया लेकिन थोड़ी देर के बाद लौटकर बोला, मेरे पास तुम्हें देने को कुछ नहीं है। लेकिन अन्दर आकर थोड़ी सी पी लो। तब मैं अन्दर चला गया। आप भी ऐसा ही करते। तब हमने थोड़ी सी ह्विस्की पी। आप भी इसी तरह पीते। तब छोटे मिस्टर बार्थिविक ने मुझसे कहा, थोड़ी सी शराब पी लो। और तम्बाक़ू भी पियो। तुम जो चीज़ चाहो ले लो। यह कह कर वह सोफ़ा पर सो गया। तब मैंने थोड़ी सी और शराब पी। और सिग्रेट भी पिया। फिर मैं आपसे नहीं कह सकता कि इसके बाद क्या हुआ।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तुम्हारा मतलब है कि तुम नशे में इतने चूर थे कि कुछ भी याद नहीं रहा?

    जैक

    [ बाप से नरमी के साथ ]

    ठीक यही बात है—जो—

    बार्थिविक

    चुप!

    जोन्स

    हाँ, मेरा यही मतलब है।

    मैजिस्ट्रेट

    फिर भी तुम कहते हो कि तुमने डिबिया चुराई?

    जोन्स

    मैंने डिबिया चुराई! हरगिज़ नहीं। मैंने सिर्फ ले ली थी

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन आगे बढ़ाकर ]

    तुमने इसे चुराया नहीं? तुमने इसे सिर्फ़ ले लिया? क्या तुम्हारी थी? यह चोरी नहीं तो और है क्या?

    जोन्स

    मैंने इसे ले लिया।

    मैजिस्ट्रेट

    तुमने इसे ले लिया! तुम इसे उनके घर से अपने घर ले गए—

    जोन्स

    [ ग़ुस्से से बात काट कर ]

    मेरे कोई घर नहीं है।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। देखें नवयुवक मिस्टर बार्थिविक तुम्हारे बयान के बारे में क्या कहते हैं?

    [ स्नो गवाहों के कठघरे से चला जाता है। गंजा कांस्टेबिल जैक को इशारे से बुलाता है और वह अपनी टोपी लिए गवाहों के कठघरे में आता है। रोपर मेज़ के पास चला पाता है जो वकीलों के लिए अलग की हुई है। ]

    हलफ़ देनेवाला क्लार्क

    तुम अदालत के सामने जो बयान दोगे उसे सच होना चाहिए बिलकुल सच होना चाहिए और सिवा सच के कुछ न होना चाहिए। ईश्वर तुम्हारी मदद करे। इस किताब को चूमो।

    [ जैक किताब चूमता है। ]

    रोपर

    [ जिरह करते हुए ]

    तुम्हारा क्या नाम है?

    जैक

    [ धीमी आवाज़ में ]

    जॉन बार्थिविक जूनियर।

    [ क्लार्क इसे लिख लेता है ]

    रोपर

    कहाँ रहते हो?

    जैक

    नं० ६ राकिंघम गेट।

    [ उसके सब जवाबों को क्लार्क लिखता जाता है ]

    रोपर

    तुम मालिक के लड़के हो?

    जैक

    [ बहुत धीमी आवाज़ में ]

    हाँ।

    रोपर

    ज़रा ज़ोर से बोलो। क्या तुम मुजरिम को जानते हो?

    जैक

    [ जोन्स स्त्री पुरुष की ओर देखकर धीमी आवाज़ में ]

    मैं मिसेज़ जोन्स को जानता हूँ। मैं—

    [ ऊंची आवाज़ में ]

    मर्द को नहीं जानता।

    जोन्स

    लेकिन मैं तुमको जानता हूँ।

    गंजा कांस्टेबिल

    चुप रहो।

    रोपर

    अच्छा क्या तुम ईस्टर-मंडे की रात को बहुत देर में घर आए थे?

    जैक

    हाँ!

    रोपर

    क्या तुमने ग़लती से दरवाज़े की कुंजी दरवाज़े में लगी हुई छोड़ दी?

    १४

    जैक

    हाँ।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा, तुमने कुंजी दरवाज़े में ही लगी छोड़ दी?

    रोपर

    और अपने आने के विषय में तुम्हें सिर्फ़ इतना ही याद है?

    जैक

    [ धीमी आवाज़ में ]

    हाँ, इतना ही।

    मैजिस्ट्रेट

    तुमने इस मर्द मुजरिम का बयान सुना है। उसके बारे में तुम क्या कहते हो?

    [ मैजिस्ट्रेट की तरफ़ मुड़ कर दृढ़ता के साथ ]

    बात यह है हज़ूर, कि मैं रात को थिएटर देखने चला गया था। वहाँ खाना खाया और बहुत रात गए घर पहुँचा।

    मैजिस्ट्रेट

    तुम्हें याद है कि जब तुम आए तो यह आदमी बाहर खड़ा था?

    जैक

    जी नहीं।

    [ वह हिचकता है ]

    मुझे तो यह याद नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ कुछ गड़बड़ा कर ]

    क्या इस आदमी ने तुम्हें दरवाज़ा खोलने में मदद दी? जैसा इसने अभी कहा है। किसी ने दरवाज़ा खोलने में तुम्हें मदद दी?

    जैक

    जी नहीं! मैं तो ऐसा नहीं समझता। मुझे याद नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    तुम्हें याद नहीं? लेकिन याद करना पड़ेगा। तुम्हारे लिए यह कोई मामूली बात तो नहीं है कि जब तुम आओ तो दूसरा आदमी दरवाज़ा खोल दे! क्यों?

    जैक

    [ लज्जा से मुसकिराकर ]

    नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा तब?

    जैक

    [ असमंजस में पड़कर ]

    बात यह है कि शायद मैंने उस रात को बहुत ज़्यादा शामपेन पी ली थी।

    मैजिस्ट्रेट

    [ मुसकिराकर ]

    अच्छा, तुमने बहुत ज़्यादा शामपेन पी ली थी?

    जोन्स

    मैं इन महाशय से एक सवाल पूछ सकता हूँ?

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ, हाँ! तुम जो कुछ पूछना चाहो पूछ सकते हो।

    जोन्स

    क्या आपको याद नहीं है कि आपने कहा था कि मैं अपने बाप की तरह लिबरल हूँ और मुझ से पूछा था कि तुम क्या हो?

    जैक

    [ माथे पर हाथ रखकर ]

    मुझे कुछ याद आता है—-

    जोन्स

    और मैंने आपसे कहा था कि मैं पक्का कंसर्वेटिव हूँ। तब आपने मुझसे कहा, तुम तो साम्यवादी से मालूम पड़ते हो। जो कुछ चाहो ले लो।

    जैक

    [ दृढ़ता के साथ ]

    नहीं मुझे इस तरह की कोई बात याद नहीं है।

    जोन्स

    लेकिन मुझे याद है। और मैं उतना ही सच बोलता हूँ जितना आप। मैं इसके पहले कभी पुलीस कोर्ट में नहीं लाया गया। ज़रा इधर देखिए, क्या आपको याद नहीं है कि आपके हाथ में एक नीले रंग की थैली थी? और—

    [ बार्थिविक उछल पड़ता है ]

    रोपर

    मैं हज़ूर से अर्ज़ करना चाहता हूँ कि यह प्रश्न फ़जूल है। क्योंकि क़ैदी ने ख़ुद इक़बाल कर लिया है कि उसे कुछ याद नहीं।

    [ मैजिस्ट्रेट के चेहरे पर मुसकराहट दिखाई पड़ती है ]

    अन्धा अन्धे को क्या रास्ता दिखा रहा है।

    जोन्स

    [ बिगड़ कर ]

    मैंने इनसे ज़्यादा ख़राब काम नहीं किया है। मैं ग़रीब आदमी हूँ, मेरे पास न रुपए हैं न दोस्त हैं। वह धनी है, वह जो कुछ चाहे कर सकता है।

    मैजिस्ट्रेट

    बस बस, इन बातों से कोई फ़ायदा नहीं। तुम्हें शान्त रहना चाहिए। तुम कहते हो, यह डिबिया मैंने लेली। तुमने क्यों उसे ले लिया? क्या तुम्हें रुपए की बहुत ज़रूरत थी?

    जोन्स

    रुपए की तो मुझे हमेशा ज़रूरत रहती है।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या इसी लिए तुमने उसे ले लिया?

    जोन्स

    नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ स्नो से ]

    उसके पास कोई चीज़ बरामद हुई?

    स्नो

    जी हाँ, हज़ूर। इसके पास ६ पौं० १२ शिलिंग निकले। और यह थैली।

    [ लाल रेशमी थैली मैजिस्ट्रेट के हाथ में रख दी जाती है। बार्थिविक अपनी जगह से उचक पड़ता है लेकिन फिर बैठ जाता है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    [ थैली की तरफ़ देख कर ]

    हाँ, हाँ! लाओ, इसे देखूँ।

    [ सब चुप हो जाते हैं ]

    नहीं, थैली के बारे में कोई बयान नहीं है। तुम्हें वे सब रुपए कहाँ मिले?

    जोन्स

    [ कुछ देर चुप रह कर एकाएक बोल उठता है ]

    मैं इस सवाल का जवाब देने से इनकार करता हूं।

    मैजिस्ट्रेट

    अगर तुम्हारे पास इतने रुपए थे तो तुम ने डिबिया क्यों ली?

    जोन्स

    मैंने इसे जलन की वजह से ली।

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन बढ़ा कर ]

    तुमने इसे जलन की वजह से लिया? ख़ैर, यह एक बात है। लेकिन क्या तुम ख़याल करते हो कि तुम जलन की वजह से दूसरों की चीज़ें लेकर शहर में रह सकते हो?

    जोन्स

    अगर आपकी हालत मेरी सी होती, अगर आप भी बेकार होते—-

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ हाँ, मैं जानता हूं। चूँकि तुम बेकार हो, तुम समझते हो कि चाहे तुम जो कुछ करो, माफ़ हो जायगा।

    जोन्स

    [ जैक की तरफ़ उँगली दिखला कर ]

    आप उनसे पूछिए। उन्हों ने क्यों उसकी थैली—-

    रोपर

    [ आहिस्ता से ]

    क्या हज़ूर को अभी इस गवाह को और ज़रूरत है?

    मैजिस्ट्रेट

    [ व्यंग से ]

    नहीं! कोई फायदा नहीं।

    [ जैक कठघरे से चला जाता है, और सिर झुकाए हुए अपनी जगह पर बैठ जाता है। ]

    जोन्स

    आप इनसे पूछिए कि इन्होंने क्यों उस औरत की—

    [ लेकिन गंजा कांस्टेबिल उसकी आस्तीन पकड़ लेता है। ]

    गंजा कान्स्टेबिल

    चुप!

    मैजिस्ट्रेट

    [ ज़ोर दे कर ]

    मेरी बात सुनो! मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि इन्होंने क्या लिया और क्या नहीं लिया? तुमने पुलिस के काम में मदाख़िलत क्यों की?

    जोन्स

    उनका काम यह नहीं था कि मेरी बीबी को गिरफ्तार करते! वह एक शरीफ़ औरत है और उसने कुछ, नहीं किया है।

    मैजिस्ट्रेट

    नहीं, पुलिस का यही काम था तुमने अफ़सर को घूँसा क्यों मारा?

    जोन्स

    ऐसी हालत में दूसरा आदमी भी मारता? अगर मेरा बस चलता तो फिर मारता।

    मैजिस्ट्रेट

    इस प्रकार बिगड़ कर तुम अपने मुक़दमे को कुछ मदद नहीं पहुँचा रहे हो। अगर सभी तुम्हारी तरह करने लगें तो हमारा काम ही न चले।

    जोन्स

    [ आगे झुककर, चिन्तित स्वर में ]

    लेकिन उसकी क्या दशा होगी? इस बदनामी से उसे जो नुक़सान हुआ, वह कोन भरेगा।

    मिसेज़ जोन्स

    हज़ूर, बच्चों की फ़िक्र इन्हें सता रही है। क्योंकि मेरी नौकरी जाती रही। और इस बदनामी की वजह से मुझे दूसरा मकान लेना पड़ा।

    मैजिस्ट्रेट

    हां हां, मैं जानता हूं। लेकिन इसने अगर ऐसा काम न किया होता, तो किसी का कुछ न होता।

    जोन्स

    [ घूम कर जैक की तरफ़ देखते हुए ]

    मेरा काम इतना बुरा नहीं है, कि जितना इनका। पूछता हूँ इनका क्या होगा?

    [ गंजा काँस्टेबिल फिर कहता है—-चुप ]

    रोपर

    मिस्टर बार्थिविक, यह अर्ज़ कर रहे हैं कि क़ैदी ग़रीबी का ख़याल करके वह डिबिए के मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। शायद हज़ूर। दंगे कर काररवाई करेंगे।

    जोन्स

    मैं इसको दबने न दूँगा। मैं चाहता हूं, कि सब कुछ इंसाफ़ के साथ किया जाय–मैं अपना हक़ चाहता हूँ।

    मैजिस्ट्रेट

    [ डेस्क को पीट कर ]

    तुमको जो कुछ कहना था, कह चुके। अब चुप रहो।

    [ सन्नाटा हो जाता है। मैजिस्ट्रेट झुक कर क्लार्क से बातें करता है। ]

    हां, मेरा ख़याल है कि इस औरत को बरी कर दूं।

    वह दया भाव से मिसेज़ जोन्स से कहता है जो अभी तक कठघरे पर हाथ धरे अनिश्चल खड़ी है ]

    मेरे लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि इस आदमी ने ऐसा काम किया। इसका फल उसको नहीं भोगना पड़ा बलिक तुमको भोगना पड़ा। तुम्हें यहाँ दो बार आना पड़ा, तुम्हारी नौकरी छूट गई।

    [ जोन्स की तरफ़ ताकता है ]

    और यही हमेशा होता है। तुम अब जाओ। मुझे दुःख है कि तुमको यहां व्यर्थ बुलाना पड़ा।

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमी आवाज़ से ]

    हज़ूर! अनेक धन्यवाद।

    [ वह कठघरे से चली जाती है और पीछे फिर कर जोन्स की तरफ़ देखती हुई अपने हाथों को मलती है। और खड़ी हो जाती है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ हाँ, मेरे बस की बात नहीं। अब जानो, तुम ख़ूब समझदार हो।

    [ मिसेज़ जोन्स पीछे खड़ी होती है, मैजिस्ट्रेट अपने हाथ पर झुका लेता है तब सिर उठा कर जोन्स से कहता है। ]

    मेरी बात सुनो। क्या तुम चाहते हो कि यह यहीं तय कर दिया जाय या जूरी

    [ पंचायत ]

    के पास भेज दिया जाय।

    जोन्स

    [ बड़ बड़ाता हुआ ]

    मैं जूरी नहीं चाहता।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। मैं यहीं तय कर दूँगा।

    [ ज़रा रुक कर ]

    तुमने डिबिया चुराना स्वीकार कर लिया है–

    जोन्स

    राना नहीं—

    गंजा कान्स्टेबिल

    मैजिस्ट्रेट

    पुलीस पर हमला करना–

    जोन्स

    कोई भी आदमी ऐसी बेजा—

    मैजिस्ट्रेट

    यहाँ तुम्हारा व्यवहार बहुत बुरा था। तुम यह सफ़ाई देते हो कि जब तुमने डिबिया चुराई तब तुम नशे में थे। यह कोई सफ़ाई नहीं है। अगर तुम शराब पीकर क़ानून को तोड़ोगे तो तुम्हें उसका फल भोगना पड़ेगा। और मैं तुमसे साफ़ साफ़ कहता हूँ कि तुम जैसे आदमी जो नशे में चूर हो जाते हैं, और जलन या उसे जो कुछ तुम कहना चाहो, उसके फेर में पड़ कर दूसरों की बुराई करते हैं वे समाज के शत्रु हैं।

    जैक

    [ अपनी जगह पर झुक कर ]

    दादा! यही तो आपने मुझसे भी कहा था।

    बार्थिविक

    चुप!

    [ सब चुप हो जाते हैं। मैजिस्ट्रेट क्लार्क से राय लेता है। जो आगे झुका हुआ प्रतीक्षा करता है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    यह तुम्हारा पहला क़सूर है और मैं तुम्हें हल्की से देना चाहता हूँ।

    [ तीव्र स्वर में लेकिन बिना कोई भाव प्रकट किए हुए ]

    एक महीने की कड़ी क़ैद।

    [ वह झुक कर क्लार्क से बातें करता है। गंजा कांस्टेबिल और एक दूसरा सिपाही मिल कर जोन्स को कठघरे से ले जाते हैं ]

    जोन्स

    [ रुककर और पीछे हट कर ]

    १५

    तुम इसे न्याय कहते हो? जैक का तो कुछ भी नहीं बिगड़ा? उसने शाराब पी, उसने थैली ली—उसी ने थैली ली लेकिन।

    [ ज़बान दबा कर ]

    रुपया उसे बचा ले गया। वाह रे इंसाफ!

    गठरी में बन्द कर दिया जाता है और स्त्री पुरुषों के मुँह से एक सूखी धीमी आह निकलती है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    अब हम नाशता करने जाते हैं।

    [ वह अपनी जगह से उठता है ]

    अदालत में हलचल मच जाती है, रोपर उठता है और समाचार के सम्वाददाता से बातें करता है। जैक सिर उठा कर अकड़ता हुआ बरामदे में चला जाता है। बार्थिविक भी उसके पीछे पीछे जाता है। ]

    मिसेज़ जोन्स

    [ विनीत भाव से उसकी तरफ़ फिर कर ]

    हज़ूर!

    [बार्थिविक असमंजस में पड़ जाता है। फिर हिम्मत हारकर अत्यंत लज्जित भाव से इंकार का संकेत करता है और जल्दी से कचहरी से चला जाता है। मिसेज़ जोन्स उसकी तरफ देखती खड़ीरह जाती है।]

    परदा गिरता है।

  • चन्द्रकान्ता सन्तति 6

    चन्द्रकान्ता सन्तति 6

    Aproximadamente 179.146 palavras.

    चन्द्रकान्ता सन्तति 6
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकान्ता_सन्तति_6

    स्त्री-तो यह कौन कहता है कि मैं तुम्हारी स्त्री हूँ ?

    मैं-अभी इसके पहले तूने क्या कहा था ?

    स्त्री-(हँस कर) मालूम होता है कि तुम अपने होश में नहीं हो।

    इतना सुनते ही मुझे क्रोध चढ़ आया और मैं अपनी हथकड़ी-बेड़ी तोड़ने का उद्योग करने लगा । यह हाल देखकर उस औरत को भी क्रोध आ गया और उसने अपनी एक सखी या लौंडी की तरफ देखकर कुछ इशारा किया। वह लौंडी इशारा पाते ही उठी और उसी जगह आले पर से एक बोतल उठा लाई जिसमें किसी प्रकार का अर्क था । उस से चुल्लू भर उसने दो-तीन छींटे मेरे मुंह पर दिये जिस से मैं बेहोश हो गया और मुझे तनो-बदन की सुध न रही। मैं नहीं बता सकता कि इसके बाद कितने घण्टे तक मैं उसके कब्जे में रहा, परन्तु जब होश में आया तो मैंने अपने को जंगल में एक पेड़ के नीचे पाया। घण्टों तक ताज्जुब के साथ चारों तरफ देखता रहा, इसके बाद एक चश्मे के किनारे जाकर हाथ-मुँह धोने के बाद इस तरफ रवाना हुआ। बस, यही सबब था कि मुझे हाजिर होने में देर हो गई।

    भूतनाथ की बातें सुनकर सभी को ताज्जुब हुआ, मगर वे दोनों नकाबपोश एक दम खिलखिलाकर हँस पड़े और उनमें से एक ने भूतनाथ की तरफ देखकर कहा-

    नकाबपोश-भूतनाथ, निःसन्देह तुम धोखे में पड़ गये । उस औरत ने जो कुछ तुमसे कहा, उसमें शायद ही दो तीन बातें सच हों। भूतनाथ–(ताज्जुब से) सो क्या ? उसने कौन सी बातें सच-सच कही थीं और कौन सी नकाबपोश-सो मैं नहीं कह सकता मगर आशा है कि शीघ्र ही तुम्हें सच-झूठ का पता लग जायगा।

    भूतनाथ ने बहुत-कुछ चाहा मगर नकाबपोश ने उसके मतलब की कोई बात न कही । थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें करके नकाबपोश बिदा हुए और जाते समय एक सवाल के जवाब में कह गये कि "आप लोग दो दिन और सब्र करें, इसके बाद कुंअर उन्हें इस बातों के जानने का बड़ा शौक है।"

    2

    रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है । महाराज सुरेन्द्रसिंह अपने कमरे में पलंग पर लेते हुए जीतसिंग से कुछ धिरे-धीरे बाते कर रहें हैं जो चारपाई के नीचे उनके पास ही बैठे है।केवल जीतसिंग ही नहीं बल्कि उनके पास वे दोनो नकापपोश भी बैठे हुए है जो रोज दरबार में आकर लोगों को ताज्जुब में डाला करते है और जिनका नाम है रामसिंह और लक्ष्मणसिंह है । हम नहीं कह सकते कि ये लोग कब से इस कमरे में बैठे हैं या इसके पहले इन लोगों में क्या-क्या बातें हो चुकी हैं, मगर इस समय तो ये सब लोग कई ऐसे मामलों पर बातचीत कर रहे हैं जिनका पूरा होना बहुत जरूरी समझा जाता है।

    बात करते-करते एक दफे कुछ रुक कर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने जीतसिंह से कहा,"इस राय में गोपाल सिंह का भी शरीक होना उचित जान पड़ता है, किसी को भेजकर उन्हें बुलाना चाहिए।"

    "जो आज्ञा" कहकर जीतसिंह उठे और कमरे के बाहर जाकर राजा गोपालसिंह को बुलाने के लिए चोबदार को हुक्म देने के बाद पुनः अपने ठिकाने बैठ कर बातचीत करने लगे।

    जीतसिंह–इसमें तो कोई शक नहीं कि भूतनाथ आदमी चालाक और पूरे दर्जेबका ऐयार है मगर उसके दुश्मन लोग उस पर बेतरह टूट पड़े हैं और चाहते हैं कि जिस तरह बने उसे बर्बाद कर दें और इसीलिए उसके पुराने ऐबों को उधेड़ कर तरह-तरह की तकलीफ दे रहे हैं।

    सुरेन्द्रसिंह–ठीक है, मगर हमारे साथ भूतनाथ ने सिवाय एक दफे चोरी करने के और कौन-सी बुराई की है जिसके लिए उसे हम सजा दें या बुरा कहें ?

    जीतसिंह-कुछ भी नहीं, और वह चोरी भी उसने किसी बुरी नीयत से नहीं की थी। इस विषय में नानक ने जो कुछ कहा था, महाराज सुन ही चुके हैं

    सुरेन्द्रसिंह-हाँ मुझे याद है, और उसने हम लोगों पर अहसान भी बहुत किये हैं बल्कि यों कहना चाहिए कि उसी की बदौलत कमलिनी, किशोरी, लक्ष्मीदेवी और इन्दिरा वगैरह की जानें बची और गोपालसिंह को भी उसकी मदद से बहुत फायदा पहुंचा है। इन्हीं सब बातों को सोच के तो देवीसिंह ने उसे अपना दोस्त बना लिया है, मगर साथ ही इसके इस बात भी समझ रखना चाहिए कि जब तक भूतनाथ का मामला तय नहीं हो जायगा तब तक लोग उसके ऐबों को खोद-खोद कर निकाला ही करेंगे और तरह-तरह की बातें गढ़ते रहेंगे।

    एक नकाबपोश-सो तो ठीक ही है, मगर सच पूछिए तो भूतनाथ का मुकदमा ही कसा और मामला ही क्या ? मुकदमा तो असल में नकली बलभद्रसिंह का है जिसने इतना बड़ा कसूर करने पर भी भूतनाथ पर इल्जाम लगाया है। उस पीतल वाली सन्दूकड़ी से तो हम लोगों को कोई मतलब ही नहीं, हाँ, बाकी रह गया चिट्ठियों वाला मुट्ठा जिसके पढ़ने से भूतनाथ लक्ष्मीदेवी का कसूरवार मालूम होता है, सो उसका।जवाब भूतनाथ काफी तौर पर दे देगा और साबित कर देगा कि वे चिट्ठियां उसके हाथ की लिखी हुई होने पर भी वह कसूरवार नहीं है और वास्तव में वह बलभद्रसिंह का दोस्त है, दुश्मन नहीं।

    सुरेन्द्रसिंह-(लम्बी सांस लेकर) ओफ-ओह, इस थोड़े से जमाने में कैसे-कैसे उलटफेर हो गए ! बेचारे गोपालसिंह के साथ कैसी-कैसी धोखेबाजी की गई!इन बातों पर जब हमारा ध्यान जाता है तो मारे क्रोध के बुरा हाल हो जाता है।

    जीतसिंह-ठीक है, मगर खैर अब इन बातों पर क्रोध करने की जगह नहीं रही क्योंकि जो कुछ होना था हो गया। ईश्वर की कृपा से गोपालसिंह भी मौत की तकलीफ उठा र बच गए और अब हर तरह से प्रसन्न हैं, इसके अतिरिक्त उनके दुश्मन लोग भी गिरफ्तार होकर अपने पंजे में आये हुए हैं।

    सुरेन्द्रसिंह–बेशक ऐसा ही है मगर हमें कोई ऐसी सजा नहीं सूझती जो उनके दुश्मनों को देकर कलेजा ठंडा किया जाय और समझा जाय कि अब गोपालसिंह के साथ बुराई करने का बदला ले लिया गया।

    महाराज सुरेन्द्रसिंह इतना कह ही रहे थे कि राजा गोपालसिंह कमरे के अन्दर आते हुए दिखाई पड़े क्योंकि उनका डेरा इस कमरे से बहुत दूर न था।

    राजा गोपालसिंह सलाम करके पलंग के पास बैठ गए और इसके बाद दोनों नकाबपोशों से भी साहब-सलामत करके मुस्कुराते हुए बोले-आप लोग कब से बैठे हैं ?

    एक नकाबपोश–हम लोगों को आये बहुत देर हो गई।

    सुरेन्द्रसिंह–ये बेचारे कई घण्टे से बैठे हुए हमारी तबीयत बहला रहे हैं और कई जरूरी बातों पर विचार कर रहे हैं। गोपालसिंह-वे कौन सी जरूरी बातें हैं ?

    सुरेन्द्रसिंह– यही लड़कों की शादी, भूतनाथ का फैसला, कैदियों का मुकदमा,कमलिनी और लाड़िली के साथ उचित बर्ताव इत्यादि विषयों पर बातचीत हो रही है और सोच रहे हैं कि किस तरह क्या किया जाय तथा पहले क्या काम हो ?

    गोपालसिंह–इस समय मैं भी इसी उलझन में पड़ा हुआ था। सोया नहीं था बल्कि जागता हुआ इन्हीं बातों को सोच रहा था कि आपका सन्देशा पहुँच गया और तुरन्त उठकर इस तरफ चला आया। (नकाबपोशों की तरफ बता कर) आप लोग तो अव हमारे घर के व्यक्ति हो रहे हैं अतः ऐसे विचारों में आप लोगों को शरीक होना ही चाहिए।

    सुरेन्द्रसिंह–जीतसिंह कहते हैं कि कैदियों का मुकदमा होने और उनको सजा देने के पहले ही दोनों लड़कों की शादी हो जानी चाहिए जिसमें कैदी लोग भी इस उत्सव को देखकर अपना जी जला लें और समझ लें कि उनकी बेईमानी, हरामजदगी और दुश्मनी का नतीजा क्या निकला। साथ ही इसके एक बात का फायदा और भी होगा,अर्थात् कैदियों के पक्षपाती लोग भी, जो ताज्जुब नहीं कि इस समय भी कहीं इधर-उधर छिपे मन के लड्डू बना रहे हों, समझ जायँगे कि अब उन्हें दुश्मनी करने की कोई जरूरत नहीं रही और न ऐसा करने से कोई फायदा ही है।

    गोपालसिंह- ठीक है, जब तक दोनों कुमारों की शादी न हो जायगी तब तक तरह-तरह के खुटके बने ही रहेंगे । शादी हो जाने के बाद मेहमानों के सामने ही कैदियों को जहन्नुम में पहुंचाकर दुनिया को दिखा दिया जायगा कि बुरे कर्मों का नतीजा यह होता है।

    सुरेन्द्र सिंह-खैर, तो आपकी भी यही राय होती है ?

    गोपालसिंह-बेशक !

    सुरेन्द्रसिंह–(जीतसिंह की तरफ देखकर) तो अब हमें और किसी से राय मिलाने की जरूरत नहीं रही। आप हर तरह का बन्दोबस्त शुरू कर दें और जहाँ-जहाँ न्यौता भेजना हो भिजवा दें।

    जीतसिंह-जो आज्ञा । अच्छा, अब भूतनाथ के विषय में कुछ तय हो जाना चाहिए।

    गोपालहिं-हम लोगों में से कौन सा आदमी ऐसा है जो भूतनाथ के अहसानों के बोझ से दबा हुआ न हो ? बाकी रही यह बात कि जयपाल ने भूतनाथ के हार की चिट्ठियाँ कमलिनी और लक्ष्मीदेवी को दिखाकर भूतनाथ को दोषी ठहराया है, सो वास्तव में भूतनाथ दोषी नहीं है और इस बात का सबूत भी वह दे देगा।

    सुरेन्द्रसिंह हाँ, तुमको तो इन सब बातों का सच्चा हाल जरूर ही मालूम होगा क्योंकि तुम्हीं ने कृष्ण जिन्न बनकर उसकी सहायता की थी। अगर वास्तव में वह दोषी होता तो तुम ऐसा करते ही क्यों? गोपालसिंह-बेशक यही बात है । इन्दिरा का किस्सा आपको मालूम ही है क्यों कि मैंने आपको लिख भेजा था और आशा है कि आपको वे बातें याद होंगी ?

    सुरेन्द्रसिंह-हाँ मुझे बखूबी याद है, बेशक उस जमाने में भूतनाथ ने तुम लोगों की बड़ी सहायता की थी बल्कि इसी सबब से उसमें और दरोगा में दुश्मनी हो गई थी,अतः कब हो सकता है कि भूतनाथ लक्ष्मीदेवी के साथ दगा करता जो कि दरोगा से दोस्ती और बलभद्र सिंह से दुश्मनी किए बिना हो ही नहीं सकता था ! लेकिन आखिर यह बात क्या हैं, वे चिट्ठियाँ भूतनाथ की लिखी हैं या नहीं? फिर, इस जगह एक बात का और भी खयाल होता है वह यह कि उस मुट्ठ में दोनों तरफ की चिट्ठियाँ मिली हुई हैं अर्थात् जो रघुबरसिंह ने भेजी वे भी हैं और जो रघुबर के नाम आई थीं वे भी हैं।

    गोपालसिंह-जी हाँ और यह बात भी बहुत से शकों को दूर करती है। असल यह है कि वे सब चिट्ठियां भूतनाथ के हाथ की नकल की हुई हैं ! वह रघुबरसिंह,जो दारोगा का दोस्त था और जमानिया में रहता था, उसी की यह सब कार्रवाई है और यह सब विष उसी के बोये हुए हैं। वह बहुत जगह इशारे के तौर पर अपना नाम भूतनाथ लिखा करता थ। आपने इन्दिरा के हाल में पढ़ा होगा कि भूतनाथ बेनीसिंह बनकर बहुत दिनों तक रघुबरसिंह के यहाँ रह चुका है और उन दिनों यही भूतनाथ हेलासिंह के यहाँ रघुबरसिंह का खत लेकर आया-जाया करता था।

    सुरेन्द्र सिंह-ठीक है, मुझे याद है ।

    गोपालसिंह-बस ये सब चिट्ठियाँ उन्हीं चिट्ठियों की नकलें हैं । भूतनाथ ने मौके पर दुश्मनों को कायल करने के लिए उन चिट्ठियों की नकल कर ली थी और कुछ उनके घर से भी चुराई थीं। बस, भूतनाथ की गलती या बेईमानी जो कुछ समझिए यही हुई कि उस समय कुछ नगदी फायदे के लिए उसने इस मामले को दबाये रक्खा और उसी वक्त मुझ पर प्रकट न कर दिया। रिश्वत लेकर दारोगा को छोड़ देना और कलमदान के भेद को छिपा रखना भी भूतनाथ के ऊपर धब्बा लगाता है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो मुझे यह बुरा दिन देखना नसीब न होता और इन्हीं भूलों पर आज भूतनाथ पछताता और अफसोस करता है। मगर आखिर में भूतनाथ ने इन बातों का बदला भी ऐसा अदा किया कि वे सब कसूर माफ कर देने के लायक हो गए।

    सुरेन्द्रसिंह-उस कलमदान में क्या चीज थी ?

    गोपालसिंह-उस कलमदान को दारोगा की गुप्त सभा का दफ्तर ही समझिए ।सब सभासदों के नाम और सभा के मुख्य भेद उसी में बन्द रहते थे, इसके अतिरिक्त दामोदरसिंह ने जो वसीयतनामा इन्दिरा के नाम लिखा था वह भी उसी में बन्द था।

    सुरेन्द्रसिंह-ठीक है, ठीक है, इन्दिरा के किस्से में यह बात भी तुमने लिखी थी, हमें याद आया। मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि उन दिनों लालच में पड़कर भूतनाथ ने बहुत बुरा किया और उसी सबब से तुम लोगों को तकलीफ उठानी पड़ी।

    एक नकाबपोश-शायद भूतनाथ को इस बात की खबर न थी कि इस लालच का नतीजा कहाँ तक बुरा निकलेगा।

    सुरेन्द्रसिंह-जो हो मगर उस समय की बातों पर ध्यान देने से यह भी कहना पड़ता है कि उन दिनों भूतनाथ एक हाथ से भलाई के नाम कर रहा था और दूसरे हाथ से बुराई के।

    गोपालसिंह-ठीक है, बेशक ऐसी ही बात थी।

    सुरेन्द्रसिंह-(जीतसिंह की तरफ देख के) भूतनाथ और इन्द्रदेव को भी इसी समय यहाँ बुलाकर इस मामले को तय कर देना चाहिए।

    "जो आज्ञा” कहकर जीतसिंह उठे और कमरे के बाहर जाकर चोबदार को हुक्म देने के बाद लौट आये, इसके बाद कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर गोपालसिंह ने कहा-

    गोपालसिंह-अपने खयाल में तो भूतनाथ ने कोई बुराई नहीं की थी क्योंकि बीस हजार अशर्फी दारोगा से वसूल करके उसे छोड़ देने पर भी उसने एक इकरार-नामा लिखा लिया था कि वह (दारोगा) ऐसे किसी काम में शरीक न होगा और न खुद ऐसा कोई काम करेगा जिसमें इन्द्रदेव, सरयू, इन्दिरा और मुझ (गोपालसिंह) को किसी तरह का नुकसान पहुँचे मगर दारोगा फिर भी बेईमानी कर ही गया और भूतनाथ इकरारनामे के भरोसे बैठा रह गया। इससे खयाल होता है कि शायद भूतनाथ को भी इन मामलों की ठीक खबर न हो अर्थात मुन्दर का हाल मालूम न हुआ हो, और वह लक्ष्मीदेवी के बारे में धोखा खा गया हो तो भी ताज्जुब नहीं।

    सुरेन्द्रसिंह-हो सकता है, (कुछ देर तक चुप रहने के बाद) मगर यह तो बताओ कि इन सब मामलों की खबर तुम्हें कब और क्योंकर लगी?

    गोपालसिंह-इन सब बातों का पता मुझे भूतनाथ के गुरुभाई शेरसिंह की जुबानी लगा जो भूतनाथ को भाई की तरह प्यार करता है मगर उसकी इन सब लालच भरी कार्रवाइयों के बुरे नतीजे को सोच और उसे पूरा कसूरवार समझकर उससे डरता और नफरत करता है। जिन दिनों रोहतासगढ़ का राजा दिग्विजयसिंह किशोरी को।अपने किले में ले गया था और इस सबब से शेरसिंह ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी, उन दिनों भूतनाथ छिपा-छिपा फिरता था। मगर जब शेरसिंह ने उस तिलिस्मी तहखाने

    1. इन्दिरा का किस्सा (चन्द्रकान्ता सन्तति, पन्द्रहवां भाग, पहला वयान)। में जाकर डेरा डाला, और छिपे-छिपे कमला और कामिनी की मदद करने लगा तो उन्हीं दिनों उस तिलिस्मी तहखाने में जाकर भूतनाथ ने शेरसिंह से एक तौर पर (बहुत दिनों तक गायब रहने के बाद) नई मुलाकात की, मगर धर्मात्मा शेरसिंह को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई।

    गोपालसिंह इतना कह ही रहे थे कि भूतनाथ और इन्द्रदेव कमरे के अन्दर आ पहुँचे और सलाम करके आज्ञानुसार जीतसिंह के पास बैठ गये।

    जीतसिंह-(भूतनाथ और इन्द्रदेव से) आप लोग बहुत जल्द आ गये।

    इन्द्रदेव-हम दोनों इसी जगह बरामदे के नीचे बाग में टहल रहे थे, इसलिए चोबदार नीचे उतरने के साथ ही हम लोगों से जा मिला।

    जीतसिंह-खैर, (गोपालसिंह से) हाँ तब ?

    गोपालसिंह-अपनी नेकनामी में धब्बा लगने और बदनाम होने के डर से भूतनाथ की सूरत देखना भी शेरसिंह पसन्द नहीं करता था, बल्कि उसका तो यही बयान है कि 'मुझे भूतनाथ से मिलने की आशा ही न थी और मैं समझे हुए था कि अपने दोषों से लज्जित होकर भूतनाथ ने जान दे दी।' मगर जिस दिन उसने उस तहखाने में भूतनाथ की सूरत देखी तो काँप उठा। उसने भूतनाथ की बहुत लानत-मलामत करने के बाद कहा कि "अब तुम हम लोगों को अपना मुंह मत दिखाओ और हमारी जान और आबरू पर दया करके किसी दूसरे देश में चले जाओ।" मगर मूतनाथ ने इस बात को मंजूर न किया और यह कहकर अपने भाई से बिदा हुआ कि चुपचाप बैठे देखते रहो कि मैं किस तरह अपने पुराने परिचितों में प्रकट होकर खास राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार बनता हूं। बस इसके बाद भूतनाथ कमलिनी से जा मिला और जी-जान से उसकी मदद करने लगा। मगर शेरसिंह को यह बात पसन्द न आई। यद्यपि कुछ दिनों तक शेरसिंह ने कमलिनी तथा हम लोगों का साथ दिया, मगर डरते-डरते । आखिर एक दिन शेरसिंह ने एकान्त में मुझसे मुलाकात की और अपने दिल का हाल तथा मेरे विषय में जो कुछ जानता था, कहने के बाद बोला, “यह सब हाल कुछ तो मुझे अपने भाई भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ और कुछ रोहतासगढ़ को इस्तीफा देने के बाद तहकीकात करने से मालूम हुआ, मगर इस बात की खबर हम दोनों भाइयों में से किसी को भी न थी कि आपको मायारानी ने कैद कर रक्खा है । खैर, अब ईश्वर की कृपा से आप छूट गये हैं इसलिए आपके सम्बन्ध जो कुछ मुझे मालूम है आपसे कह दिया, जिसमें आप दुश्मनों से अच्छी तरह बदला ले सकें। अब मैं आगे अपना मुंह किसी को दिखाना नहीं चाहता क्योंकि मेरा भाई भूतनाथ जिसे मैं मरा हुआ समझता था प्रकट हो गया और न मालूम क्या-क्या किया चाहता है । कहीं ऐसा न हो कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाय,अतः अब मैं जहाँ भागते बनेगा भाग जाऊँगा। हाँ, अगर भूतनाथ जो कि बड़ा जिद्दी और उत्साही है किसी तरह नेकनामी के साथ राजा वीरेन्द्र सिंह का ऐयार बन गया तो पुनः प्रकट हो जाऊँगा।" इतना कहकर शेरसिंह न मालूम कहाँ चला गया । मैंने बहुत

    1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, तीसरा भाग, तेरहवां बयान । कुछ समझाया मगर उसने एक न मानी। (कुछ रुककर) यही सब है कि मुझे इन सब बातों से आगाही हो गई और मैं भूतनाथ के भी बहुत से भेदों को जान गया।

    जीतसिंह-ठीक है । (भूतनाथ की तरफ देख के) भूतनाथ, इस समय तुम्हारा ही मामला पेश है ! इस जगह हम जितने भी आदमी हैं, सभी कोई तुमसे हमदर्दी रखते हैं; महाराज भी तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। ताज्जुब नहीं कि वह दिन आज ही हो कि तुम्हारे कसूर माफ किए जायं और तुम महाराज के ऐयार बन जाओ, मगर तुम्हें अपना हाल या जो कुछ तुमसे पूछा जाय उसका जवाब सच-सच कहना और देना चाहिए । इस समय तुम्हारा ही किस्सा हो रहा है ।

    भूतनाथ-(खड़े होकर सलाम करने के बाद) आज्ञा के विरुद्ध कुछ भी न करूंगा और कोई बात छिपा न रक्खूगा।

    जीतसिंह–तुम्हें यह तो मालूम हो गया कि सरयू और इन्दिरा भी यहाँ आ गई हैं जो जमानिया के तिलिस्म में फंस गई थी और उन्होंने अपना अनूठा किस्सा बड़े दर्द के साथ बयान किया था।

    भूतनाथ-(हाथ जोड़ के) जी हाँ, मुझ कम्बख्त की बदौलत उन्हें उस कैद की तकलीफ भोगनी पड़ी। उन दिनों बदकिस्मती ने मुझे हद से ज्यादा लालची बना दिया था। अगर मैं लालच में पड़कर दारोगा को न छोड़ देता तो यह बात कभी न होती। आपने सुना ही होगा कि उन दिनों हथेली पर जान लेकर मैंने कैसे-कैसे काम किये थे, मगर दौलत की लालच ने मेरे सब कामों पर मिट्टी डोल दी। अफसोस, मुझे इस बात की कुछ भी खबर न हुई कि दारोगा ने अपनी प्रतिज्ञा के विरुद्ध सारे काम किये,अगर मुझे खबर लग जाती तो उससे समझ लेता।

    जीतसिंह-अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा भाई शेरसिंह कहाँ है ?

    भूतनाथ-मेरे यहाँ होने के सबब से न मालूम वह कहाँ जाकर छिपा बैठा है । उसे विश्वास है कि भूतनाथ जिसने बड़े-बड़े कसूर किए हैं, कभी निर्दोष छूट नहीं सकता। बल्कि ताज्जुब नहीं कि उसके सबंब से मुझ पर भी किसी तरह का इलजाम लगे। हाँ, अगर वह मुझे बेकसूर छूटा हुआ देखेगा या सुनेगा तो तुरन्त प्रकट हो जायगा।

    जीतसिंह–वह चिट्ठयों वाला मुट्ठा तुम्हारे ही हाथ का लिखा हुआ है या नहीं?

    भूतसिंह-जी वे सब चिट्ठियाँ है तो मेरे ही हाथ की लिखी हुई, मगर वे असल नहीं बल्कि उन असली चिट्ठियों की नकलें हैं जो कि मैंने जयपाल (रघुवरसिंह) के यहाँ से चोरी की थीं । असल में इन चिट्ठियों का लिखने वाला मैं नहीं, बल्कि जयपाल है।

    जीतसिंह-खैर, तो जब तुमने जयमाल के यहाँ से असल चिट्ठियों की नकल की थी तो तुम्हें उसी समय मालूम हुआ होगा कि लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह पर क्या आफत आने वाली है ?

    भूतनाथ-क्यों न मालूम होता ! परन्तु रुपये की लालच में पड़कर अर्थात् कुछ लेकर मैंने जयपाल को छोड़ दिया। मगर बलभद्र सिंह से मैंने इस होनहार के बारे में इशारा जरूर कर दिया था, हाँ जयपाल का नाम नहीं बताया क्योंकि उससे रुपया वसूल कर चुका था। ओ यह कहना भी मैं भूल ही गया कि रुपये वसूल करने के साथ ही मैंने जयपाल को इस बात की कसम भी खिला दी थी कि अब वह लक्ष्मीदेवी और बल-भद्रसिंह से किसी तरह की बुराई न करेगा। मगर अफसोस, उसने (जयपाल ने) मेरे साथ दगा करके मुझे धोखे में डाल दिया और वह काम कर गुजरा जो किया चाहता था। इसी तरह मुझे वलभद्र सिंह के बारे में भी धोखा हुआ। दुश्मनों ने उन्हें कैद कर लिया और मुझे हर तरह से विश्वास दिला दिया कि बलभद्र सिंह मर गए । लक्ष्मीदेवी के बारे में जो कुछ चालाकी दारोगा ने की, उसका भी मुझे कुछ पता न लगा और न मैं कई वर्षों तक लक्ष्मीदेवी की सूरत ही देख सका कि पहचान लेता। बहुत दिनों के बाद जब मैंने नकली लक्ष्मी देवी को देखा भी तो मुझे किसी भी तरह का शक न हुआ, क्योंकि लड़कपन की सूरत और अधेड़पन की सूरत में बहुत बड़ा फर्क पड़ जाता है। इसके अतिरिक्त जिन दिनों मैंने नकली लक्ष्मीदेवी को देखा था, उस समय उनकी दोनों बहिनें अर्थात् श्यामा (कमलिनी) और लाडिली भी उसके साथ ही रहती थीं, जब वे ही दोनों उसकी बहन होकर धोखे में पड़ गईं तो मेरी कौन गिनती है ?

    बहुत दिनों के बाद जब यह कागज का मुट्ठा मेरे यहाँ से चोरी हो गया, तब मैं घबराया और डरा कि समय पर चोरी गया हुआ वह मुट्ठा मुझको मुजरिम बना देगा, और आखिर ऐसा ही हुआ । दुष्टों ने वही कागजों का मुट्ठा कैदखाने में बलभद्रसिंह को दिखाकर मेरी तरफ से उनका दिल फेर दिया और तमाम दोष मेरे ही सिर पर थोपा । इसके बाद और भी कई वर्ष बीत जाने पर जब राजा गोपालसिंह के मरने की खबर उड़ी और इस बात में किसी को किसी तरह का शक न रहा, तब धीरे-धीरे मुझे दारोगा और जयपाल की शैतानी का कुछ पता लगा, मगर फिर मैंने जान-बूझकर तरह दे दिया और सोचा कि अब उन बातों को खोदने से फायदा ही क्या, जब कि खुद राजा गोपालसिंह ही इस दुनिया से उठ गये तो मैं किसके लिए इन बखेड़ों को उठाऊँ ? (हाथ जोड़कर) बेशक यही मेरा कसूर है और इसीलिए मेरा भाई भी रंज है। हाँ इधर जब कि मैंने देखा कि अब श्रीमान् राजा वीरेन्द्रसिंह का दौरा-दौरा है और कमलिनी भी उस घर से निकल खड़ी हुई तब मैंने भी सिर उठाया और अबकी दफे नेकनामी के साथ नाम पैदा करने का इरादा कर लिया। इस बीच में मुझ पर बड़ी आफतें आई, मेरे मालिक रणधीरसिंह भी मुझसे बिगड़ गये और मैं अपना काला मुंह लेकर दुनिया से किनारे हो बैठा तथा अपने को मरा हुआ मशहूर कर दिया अब कहाँ तक बयान करूँ, बात तो यह है कि मैं सिर से पैर तक अपने को कसूरवार समझकर ही महाराजा की शरण में

    जीतसिंह-तुम्हारी पिछली कार्रवाई का बहुत-सा हाल महाराज को मालूम हो चुका है, उस जमाने में इन्दिरा को बचाने के लिए जो कार्रवाइयाँ तुमने की थीं उनसे महाराज प्रसन्न हैं, खास करके इसलिए कि तुम्हारे हरएक काम में दबंगता का हिस्सा ज्यादा था और तुम सच्चे दिल से इन्द्रदेव के साथ दोस्ती का हक अदा कर रहे थे,इस जगह एक बात का बड़ा ताज्जुब है।

    भूतनाथ-वह क्या ?

    जीतसिंह-इन्दिरा के बारे में जो-जो काम तुमने किये थे वे इन्द्रदेव से तो तुमने जरूर ही कहे होंगे?

    भूतनाथ-बेशक जो कुछ काम मैं करता था वह हमेशा ही इन्द्रदेव से पूरा-पूरा कह देता था।

    जीतसिंह-तो फिर इन्द्रदेव ने दारोगा को क्यों छोड़ दिया? सजा देना तो दूर रहा, इन्होंने गुरुभाई का नाता तक नहीं तोड़ा।

    भूतनाथ-(एक लम्बी साँस लेकर और उँगली से इन्द्रदेव की तरफ इशारा करके) इनके ऐसा भी बहादुर और मुरौवत का आदमी मैंने दुनिया में नहीं देखा । इनके साथ जो कुछ सलूक मैंने किया था उसका बदला भी अपने एक ही काम से इन्होंने ऐसा अदा किया कि जो इनके सिवाय दूसरा कर ही नहीं सकता था और जिससे मैं जन्म भर इनके सामने सिर उठाने लायक न रहा, अर्थात् जब मैंने रिश्वत लेकर दारोगा को छोड़ देने और कलमदान दे देने का हाल इनसे कहा, तो सुनते ही इनकी आँखों में आंसू भर आये और एक लम्बी साँस लेकर इन्होंने मुझसे कहा, "भूतनाथ, तुमने यह काम बहुत ही बुरा किया। किसी दिन इसका नतीजा बहुत ही खराब निकलेगा ! खैर, अब तो जो कुछ होना था हो गया, तुम मेरे दोस्त हो अतः जो कुछ तुम कर आये, उसे मैं भी मंजूर करता हूँ और दारोगा को एक दम भूल जाता हूँ । अब मेरी लड़की और स्त्री पर चाहे कैसी आफत क्यों न आये और मुझे भी चाहे कितना ही कष्ट क्यों न भोगना पड़े, मगर आज से दारोगा का नाम भी न लूंगा और न अपनी स्त्री के विषय में ही किसी से कुछ जिक्र करूँगा, जो कुछ तुम्हें करना हो करो और उस कम्बख्त दारोगा से भले ही कह दो कि 'इन बातों की खबर इन्द्रदेव को नहीं दी गई।' मैं भी अपने को ऐसा ही बनाऊँगा कि दारोगा को किसी तरह का खुटका न होगा और वह मुझे निरा उल्लू ही समझता रहेगा।" इन्द्रदेव की बात मेरे कलेजे में तीर की तरह लगी और मैं यह कहकर उठ खड़ा हुआ कि "दोस्त, मुझे माफ करो, बेशक मुझसे बड़ी भूल हुई है । अब मैं दारोगा को कभी न छोडूंगा और जो कुछ उससे लिया है उसे वापस कर दूंगा।" मगर इतना कहते ही इन्द्रदेव ने मेरी कलाई पकड़ ली और जोर के साथ मुझे बैठाकर कहा, “भूत-मैंने यह बात तुमसे ताने के ढंग पर नहीं कही है कि सुनने के साथ ही तुम उठ खड़े हुए। नहीं-नहीं, ऐसा कभी न होने पायेगा, हमने और तुमने जो कुछ किया और जो कहा सो कहा, अब उसके विपरीत हम दोनों में से कोई भी न जा सकेगा!"

    सुरेन्द्र सिंह-शाबाश !

    इतना कहकर सुरेन्द्र सिंह ने गहरी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रदेव की तरफ देखा और भूतनाथ ने फिर इस तरह कहना शुरू किया-

    भूतनाथ-मैंने बहुत कुछ कहा मगर इन्द्रदेव ने एक न माना और एक बहुत बड़ी कसम देकर मेरा मुंह बन्द कर दिया, मगर इस बात का नतीजा यह निकला कि उसी दिन से हम दोनों दोस्त दुनिया से उदासीन हो गये । मेरी उदासीनता में तो कुछ कसर न रह गई मगर इन्द्रदेव की उदासीनता में किसी तरह की कसर न रही। यही सबब था कि इन्द्रदेव के हाथ से दारोगा बच गया और दारोगा इन्द्रदेव की तरफ से (मेरे कहे मुताबिक) बेफिक्र रहा। सुरेन्द्रसिंह —— बेशक इन्द्रदेव ने यह बड़े हौसले और सब्र का काम किया !

    गोपालसिंह —— दोस्ती का हक अदा करना इसे कहते हैं, जितने अहसान भूतनाथ ने इन पर किये थे, सभी का बदला एक ही बात से चुका दिया ! भूतनाथ —– (गोपालसिंह की तरफ देख के) कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह से इन्दिरा ने अपना हाल किस तरह पर बयान किया था सो मुझे मालूम न हुआ । अगर यह मालूम हो जाता तो अच्छा होता कि इन्दिरा ने जो कुछ बयान किया था वह ठीक है अथवा उसने जो कुछ सुना था वह सच था ?

    गोपालसिंह —— जहाँ तक मेरा खयाल है, मैं कह सकता हूँ कि इन्दिरा ने अपने विषय में कोई बात ज्यादा नहीं कही, बल्कि ताज्जुब नहीं कि वह कई बातें मालूम न होने के कारण छोड़ गई हो। मैंने उसका पूरा-पूरा किस्सा महाराज को लिख भेजा था। (जीतसिंह की तरफ देखकर) अगर मेरी वह चिट्ठी यहाँ मौजूद हो, तो भूतनाथ को दे दीजिये, उसमें से इन्दिरा का किस्सा पढ़कर ये अपना शक मिटा लें।

    "हां वह चिट्ठी मौजूद है" इतना कह कर जीतसिंह उठे और आलमारी से वह किताबनुमा चिट्ठी निकाल कर और इन्दिरा का किस्सा बता कर भूतनाथ को दे दी। भूतनाथ उसे तेजी के साथ पढ़ गया और अन्त में बोला, "हाँ ठीक है, करीब-करीब सभी बातें उसे मालूम हो गई थी और आज मुझे भी एक बात नई मालूम हुई अर्थात् आखिरी मर्तबे जब मैं इन्दिरा को दारोगा के कब्जे से निकालकर ले गया था और अपने एक अड्डे पर हिफाजत के.साथ रख गया था तो वहाँ से एकाएक उसका गायब हो जाना मुझे बड़ा ही दुःखदायी हुआ। मैं ताज्जुब करता था कि इन्दिरा वहाँ से क्योंकर चली गई। जब मैंने अपने आदमियों से पूछा तो उन्होंने कहा कि 'हम लोगों को कुछ भी नहीं मालूम कि वह कब निकल कर भाग गई, क्योंकि हम लोग कैदियों की तरह उस पर निगाह नहीं रखते थे बल्कि घर का आदमी समझ कर कुछ बेफिक्र थे ।' परन्तु मुझे अपने आदमियों की बात पसन्द न आई और मैंने उन लोगों को सख्त सजा दी। आज मालूम हुआ कि वह कांटा मायाप्रसाद का बोया हुआ था। मैं उसे अपना दोस्त समझता था मगर अफसोस, उसने मेरे साथ बड़ी दगा की !"

    गोपालसिंह —— इन्दिरा की जुबानी यह किस्सा सुन कर मुझे भी निश्चय हो गया कि मायाप्रसाद दारोगा का हितू है अतः मैंने उसे तिलिस्म में कैद कर दिया है । अच्छा, यह तो बताओ कि उस समय जब तुम आखिरी मर्तबे इन्दिरा को दारोगा के यहाँ से निकाल कर अपने अड्डे पर रख आये और लौट कर पुनः जमानिया गये, तो फिर क्या हुआ, दारोगा से कैसे निपटे, और सरयू का पता क्यों न लगा सके ?

    भूतनाथ — इन्दिरा को उस ठिकाने रख कर जब मैं लौटा तो पुनः जमानिया गया परन्तु अपनी हिफाजत के लिए पाँच आदमिमों को अपने साथ लेता गया और उन्हें (अपने आदमियों को) कब क्या करना चाहिए इस बात को भी अच्छी तरह समझा दिया क्योंकि वे पांचों आदमी मेरे शागिर्द थे और कुछ ऐयारी भी जानते थे । मुझे सरयू के लिए दारोगा से फिर मुलाकात करने की जरूरत थी मगर उसके घर में जाकर भुलाकात करने का इरादा न था क्योंकि मैं खूब समझता था कि वह 'दूध का जला छाछ फूंक के

    पीता होगा' और मेरे लिए अपने घर में कुछ-न-कुछ बन्दोबस्त जरूर कर रक्खा होगा ! अगर अबकी दिलेरी के साथ उसके घर में जाऊँगा तो बेशक फंस जाऊँगा, इसलिए बाहर ही उससे मुलाकात करने का बन्दोबस्त करने लगा। खैर, इसी फेर में दस-बारह दिन बीत गए और इस बीच में मुलाकात करने का कोई अच्छा मौका न मिला। पता लगाने से मालूम हुआ कि वह बीमार है और घर से बाहर नहीं निकलता । यह बात मुझे मायाप्रसाद ने कही थी मगर मैंने मायाप्रसाद से इन्दिरा के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न राजा साहब (गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) ही से कुछ कहा, क्योंकि दारोगा को बेदाग छोड़ देने के लिए मेरे दोस्त इन्द्रदेव ने पहले ही से तय कर लिया था, अब अगर राजा साहब से मैं कुछ कहता तो दारोगा जरूर सजा पा जाता। लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मायाप्रसाद और दारोगा को इस बात का पता क्योंकर लग गया कि इन्दिरा फलां जगह है । खैर, मुख्जसिर यह है कि एक दिन स्वयं मायाप्रसाद ने मुझसे कहा-“गदाधरसिंह, मैं तुम्हें इसकी इत्तिला देता हूँ कि सरयू निःसन्देह दारोगा की कैद में है मगर बीमार है, अगर तुम किसी तरह दारोगा के मकान में चले जाओ तो उसे जरूर अपनी आँखों से देख सकोगे। मेरी इस बात में तुम किसी तरह का शक न करो, मैं बहुत पक्की बात तुमसे कह रहा हूँ ।” मायाप्रसाद की बात सुनकर मुझे एक दफे जोश चढ़ आया और मैं दारोगा के मकान में जाने के लिए तैयार भी हो गया। मैं क्या जानता था कि मायाप्रसाद दारोगा से मिला हुआ है । खैर, मैं अपनी हिफाजत के लिए कई तरह का बन्दोबस्त करके आधी रात के समय कमन्द के जरिये दारोगा के लम्बे- चौड़े और शैतान की आंत की सूरत वाले मकान में घुस गया और चोरों की तरह टोह लेता हुआ उस कमरे में जा पहुंचा जिसमें दारोगा एक गद्दी के ऊपर उदास बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। उस समय उसके बदन पर कई जगह पट्टी बंधी हुई थी जिससे वह चुटीला मालूम पड़ता था और उसके सिर का भी यही हाल था। दारोगा मुझे देखते ही चौंक उठा और आँखें चार होने के साथ ही मैंने उससे कहा, "दारोगा साहब, मैं आपके मकान में कैद होने के लिए नहीं आया हूँ बल्कि सरयू को देखने के लिए आया हूँ जिसके इस मकान में होने का पता मुझे लग चुका है। अतः इस समय मुझसे किसी तरह बुराई करने की उम्मीद न रखिए क्योंकि मैं अगर आधे घंटे के अन्दर इस मकान के बाहर होकर अपने साथियों के पास न चला जाऊँगा तो उन्हें विश्वास हो जायगा कि गदाधर- सिंह फंस गया और तब वे लोग आपको हर तरह से बर्बाद कर डालेगे, जिसका कि मैं पूरा-पूरा बन्दोबस्त कर आया हूँ।"

    इतना सुनते ही दारोगा खड़ा हो गया और उसने हँस कर जवाब दिया, "मेरे लिए आपको इस कड़े प्रबन्ध की कोई आवश्यकता न थी और न मुझमें इतनी सामर्थ्य ही है कि आप जैसे ऐयार का मुकाबला करूँ, मैं तो खुद आपकी तलाश में ही था कि किसी तरह आपको पाऊँ और अपना कसूर माफ कराऊँ । मुझे तो विश्वास है कि जब आप एक बड़ा कसुर माफ कर चुके हैं तो इसको भी माफ कर देंगे । गुस्से को दूर कीजिए, फिर भी आपके लिए हाजिर हूँ।"

    मैं-(बैठकर और दारोगा को बैठा कर) कसूर माफ कर देने के लिए तो कोई

    हर्ज नहीं है मगर आइन्दा के लिए कसूर न करने का वादा करके भी आपने मेरे साथ दगा की, इसका मुझे जरूर बड़ा रंज है !

    दारोगा —— (हाथ जोड़कर) खैर, जो हो गया सो हो गया, अब अगर फिर कोई कसूर मुझसे हो तो जो चाहे सजा दीजियेगा, मैं उफ भी न करूंगा।

    मैं —— खैर, एक दफा और सही, मगर इस कसूर के लिए आपको कुछ जुर्माना जरूर देना पड़ेगा।

    दारोगा —— यद्यपि आप मुझे पहले ही पूरी तरह कंगाल कर चुके हैं मगर फिर भी मैं आपकी आज्ञा-पालन के लिए हाजिर हूँ।

    मैं —— दो हजार अशर्फी।

    दारोगा —— (आलमारी में से एक थैली निकाल कर और मेरे सामने रखकर) बस, एक हजार अशर्फी को कबूल कीजिए और..

    मैं —— (मुस्कुराकर) मैं कबूल करता हूँ और अपनी तरफ से यह थैली आपको देकर इसके बदले में सरयू को मांगता हूँ जो इस समय आपके घर में है।

    दारोगा -– बेशक सरयू मेरे घर में है और मैं उसे अभी आपके हवाले करूँगा मगर इस थैली को आप कबूल कर लीजिए, नहीं तो मैं समझूगा कि आपने मेरा कसूर माफ नहीं किया।

    मैं —— नहीं-नहीं, मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने आपका कसूर माफ कर दिया और खुशी से यह थैली आपको वापस करता हूँ, अब मुझे सिवाय सरयू के और कुछ नहीं चाहिए।

    हम दोनों में देर तक इसी तरह की बातें हुईं और और इसके बाद मेरी आखिरी बात सुनकर दारोगा उठ खड़ा हुआ और मेरा हाथ पकड़ दूसरे कमरे की तरफ यह कहता हुआ ले चला कि “आओ मैं तुमको सरयू के पास ले चलूं, मगर अफसोस की बात है कि इस समय वह हद दर्जे की बीमार हो रही है !' खैर, वह मुझे घुमाता-फिराता एक दूसरे कमरे में ले गया और वहाँ मैंने एक पलंग पर सरयू को बीमार पड़े देखा। एक मामूली चिराग उससे थोड़ी ही दूर पर जल रहा था। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस, मैंने देखा कि बीमारी ने उसे आखिरी मंजिल के करीब पहुंचा दिया है और वह इतनी कमजोर हो रही है कि बात करना भी उसके लिए कठिन हो रहा है। मुझे देखते ही उसकी आँखें डबडबा आईं और मुझे भी रुलाई आने लगी। उस समय मैं उसके पास बैठ गया और अफसोस के साथ उसका मुंह देखने लगा। उस वक्त दो लौंडियाँ उसकी खिदमत के लिए हाजिर थीं जिनमें से एक ने आगे बढ़कर रूमाल से उसके आँसू पोंछे और पीछे हट गई ! मैंने अफसोस के साथ पूछा- “सरयू, यह तेरा क्या हाल है ?"

    इसके जवाब में सरयू ने बहुत बारीक आवाज में रुककर कहा, "भैया, (क्योंकि वह प्रायः मुझे भैया कह कर ही पुकारा करती थी) मेरी बुरी अवस्था हो रही है। अब मेरे बचने की आशा न करनी चाहिए । यद्यपि दारोगा साहब ने मुझे कैद किया था मगर मैं इनका अहसान मानती हूँ कि इन्होंने मुझे किसी तरह की तकलीफ नहीं दी बल्कि इस बीमारी में मेरी बड़ी हिफाजत की, दवा इत्यादि का भी पूरा प्रबन्ध रखा, मगर यह न

    बताया कि मुझे कैद क्यों किया था। खैर, जो भी हो, इस समय तो मैं आखिरी दम का इन्तजार कर रही हूँ और सब तरफ से मोह-माया को छोड़ ईश्वर से लौ लगाने का उद्योग कर रही हूँ। मैं समझ गई हूँ कि तुम मुझे लेने के लिए आये हो । मगर दया करके मुझे इसी जगह रहने दो और इधर-उधर कहीं मत ले जाओ, क्योंकि इस समय मैं किसी अपने को देख मायामोह में आत्मा को फंसाना नहीं चाहती और न गंगाजी का सम्बन्ध छोड़ कर दूसरी किसी जगह मरना ही पसन्द करती हूं, यहाँ यों भी अगर गंगाजी में फेंक दी जाऊँगी, तो मेरी सद्गति हो जायगी, बस यही आखिरी प्रार्थना है। एक बात और भी है कि मेरे लिए दारोगा साहब को किसी तरह की तकलीफ न देना और ऐसा करना जिसमें इनकी जरा बेइज्जती न हो, यह मेरी वसीयत है और यही मेरी आरजू है । अब श्रीगंगाजी को छुड़ाकर मुझे नरक में मत डालो।" इतना कह सरयू कुछ देर को चुप हो गई और मुझे उसकी अवस्था पर रुलाई आने लगी। मैं और भी कुछ देर तक उसके पास बैठा रहा और धीरे-धीरे बातें भी होती रहीं। मगर जो कुछ उसने कहा उसका तत्त्व यही था कि मुझे यहाँ से मत हटाओ और दारोगा को कुछ तकलीफ मत दो। उस समय मेरे दिल में यही बात आई कि इन्द्रदेव को इस बात की इत्तिला दे देनी चाहिए। वह जैसी आज्ञा देंगे किया जायगा। मगर अपना यह विचार मैंने दारोगा से नहीं कहा क्योंकि उसे मैं इन्द्रदेव की तरफ से बेफिक्र कर चुका था और कह चुका था कि सरयू और इन्दिरा के साथ जो कुछ बर्ताव तुमने किया है, उसकी इत्तिला मैं इन्द्रदेव को न दूंगा, दूसरे को कसूरवार ठहराकर तुम्हारा नाम बचा जाऊँगा । अतः मैं सरयू से दूसरे दिन मिलने का वायदा करके वहाँ से उठा और अपने डेरे पर चला आया । यद्यपि रात बहुत कम बाकी रह गई थी, परन्तु मैंने उसी समय अपने एक खास आदमी को पत्र देकर इन्द्रदेव के पास रवाना कर दिया और ताकीद कर दी कि एक घोड़ा किराये का लेकर दौड़ा-दौड़ चला जाय और जहाँ तक हो सके पत्र का जवाब लेकर जल्द ही लौट आवे । दूसरे दिन आधी रात जाते-जाते तक वह आदमी लौट आया और उसने इन्द्रदेव का पत्र मेरे हाथ में दिया, लिफाफा खोल कर मैंने पढ़ा । उसमें यह लिखा हुआ था ——

    "तुम्हारा पत्र पढ़ने से कलेजा हिल गया । सच तो यह है कि दुनिया में मुझ-सा बदनसीब भी कोई न होगा ! खैर, परमेश्वर की मर्जी ही ऐसी है तो मैं क्या कर सकता हूँ। दारोगा के बारे में मैंने जो प्रतिज्ञा तुमसे की है, उसे झूठ न होने दूंगा। मैं अपने कलेजे पर पत्थर रख कर सब कुछ सहूँगा। मगर वहाँ जाकर बेचारी सरयू को अपना मुंह न दिखाऊँगा और न दारोगा से मिलकर उसके दिल में किसी तरह का शक ही आने दूंगा। हाँ, अगर सरयू की जान बचती नजर आवे या इस बीमारी से बच जाय तो उसे जिस तरह मुनासिब समझना मेरे पास पहुंचा देना और अगर वह मर जाय तो मेरी जगह तुम बैठे ही हो, उसकी अन्त्येष्टि क्रिया अपनी हिम्मत के मुताबिक करके मेरे पास आना। मेरी तबीयत अब दुनिया से हट गई, बस, इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता । हाँ, यदि कुछ कहना होगा तो तुमसे मुलाकात होने पर कहूँगा। आगे जो ईश्वर की मर्जी ।

    तुम्हारा वही-इन्द्रदेव !"

    इस चिट्ठी को पढ़कर मैं बहुत देर तक रोता और अफसोस करता रहा। इसके

    बाद उठकर दारोगा के मकान की तरफ रवाना हुआ। मगर आज भी अपने बचाव का पूरा-पूरा इन्तजाम करता गया। मुलाकात होने पर दारोगा ने कल से ज्यादा खातिर- दारी के साथ मुझे बैठाया और देर तक बातचीत करता रहा । मगर जब मैं सरयू के पास गया तो उसकी हालत कल से ज्यादा खराब देखने में आई, अर्थात् आज उसमें बोलने की भी ताकत न थी। मुख्तसिर यह है कि तीसरे दिन बेहोश और चौथे दिन आधी रात के समय मैंने सरयू को मुर्दा पाया । उस समय मेरी क्या हालत थी, सो मैं बयान नहीं कर सकता। अस्तु, उस समय जो कुछ करना उचित था और मैं कर सकता था, उसे सवेरा होने के पहले ही करके छुट्टी किया, अपने खयाल से सरयू के शरीर की दाह-क्रिया इत्यादि करके पंचतत्व में मिला दिया और इस बात की इत्तिला इन्द्रदेव को दे दी। इसके बाद इन्दिरा के लिए अपने अड्डे पर गया और वहाँ उसे न पाकर बड़ा ताज्जुब हुआ। पूछने पर मेरे आदमियों ने जवाब दिया कि "हम लोगों को कुछ भी खबर नहीं कि वह कब और कहाँ भाग गई।" इस बात से मुझे सन्तोष न हुआ। मैंने अपने आद- मियों को सख्त सजा दी और बराबर इन्दिरा का पता लगाता रहा। अब सरयू के मिल जाने से मालूम हुआ कि उस दिन मेरी कम्बख्त आँखों ने मेरे साथ दगा की और दारोगा के मकान में बीमार सरयू को मैं पहचान न सका। मेरी आँखों के सामने सरयू मर चुकी थी और मैंने खुद अपने हाथ से इन्द्रदेव को यह समाचार लिखा था, इसलिए उन्हें किसी तरह का शक न हुआ और सरयू तथा इन्दिरा के गम में ये दीवाने से हो गये, हर तरह के चैन और आराम को इन्होंने इस्तीफा दे दिया और उदासीन हो एक प्रकार से साधू ही बन बैठे। मुझसे भी मुहब्बत कम कर दी और शहर का रहना छोड़ अपने तिलिस्म के अन्दर चले गये और उसी में रहने लगे, मगर न मालूम क्या सोचकर इन्होंने मुझे वहाँ का रास्ता न बताया। मुझ पर भी इस मामले का बड़ा असर पड़ा क्योंकि ये सब बातें मेरी ही नालायकी के सबब से हुई थीं। अतएव मैंने उदासीन हो रणधीरसिंहजी की नौकरी छोड़ दी और अपने बाल-बच्चों तथा स्त्री को भी उन्हीं के यहां छोड़, बिना किसी को कुछ कहे जंगल और पहाड़ का रास्ता लिया। उधर एक और स्त्री से मैंने शादी कर ली थी जिससे नानक पैदा हुआ है। उधर भी कई ऐसे मामले हो गये जिनसे मैं बहुत उदास और परेशान हो रहा था, उसका हाल नानक की जुबानी तेजसिंह को मालूम ही हो चुका है। बल्कि आप लोगों ने भी तो सुना ही होगा। अस्तु, हर तरह से अपने को नालायक समझकर मैं निकल भागा और फिर मुद्दत तक अपना मुंह किसी को न दिखाया। इधर जब जमाने ने पलटा खाया तब मैं कमलिनीजी से जा मिला। उन दिनों मेरे दिल में विश्वास हो गया था कि इन्द्रदेव मुझसे रंज हैं। अतः मैंने इनसे भी मिलना-जुलना छोड़ दिया, बल्कि यों कहना चाहिए कि हमारी इतनी पुरानी दोस्ती का उन दिनों अन्त हो गया था।

    इन्द्रदेव —— बेशक, यही बात थी। स्त्री के मरने की खबर सुन कर मुझे बड़ा ही रंज हुआ। मुझे कुछ तो भूतनाथ की जुबानी और कुछ तहकीकात करने पर मालूम ही हो चुका था कि मेरी लड़की और स्त्री इसी की बदौलत जहन्नुम चली गई। अस्तु, मैंने भूतनाथ की दोस्ती को तिलांजलि दे दी और मिलना-जुलना बिल्कुल बन्द कर दिया मगर इससे कहा कुछ भी नहीं क्योंकि मैं अपनी जुबान से दारोगा को माफ कर चुका था। इसके अतिरिक्त इसने मुझ पर कुछ अहसान भी जरूर ही किये थे, उनका भी मुझे खयाल था। अस्तु मैंने कुछ कहा तो नहीं, मगर इसकी तरफ से दिल हटा लिया और फिर अपना कोई भेद भी इसको नहीं बताया। कभी-कभी इसके साथ इधर-उधर की मुलाकात हो जाती थी, क्योंकि इसे मैंने अपने मकान का तिलिस्मी रास्ता नहीं दिखाया था । अगर यह कभी मेरे मकान पर आया भी तो अपनी आँखों पर पट्टी बांध कर । यही सबब था कि इसे लक्ष्मीदेवी का हाल मालूम न हुआ। लक्ष्मीदेवी के बारे में भी मैं इसे कसूरवार समझता था और मुझे यह भी विश्वास था कि यह अपना बहुत-सा भेद मुझसे छिपाता है और वास्तव में छिपाता भी था।

    भूतनाथ—(इन्द्रदेव से) नहीं, सो बात तो नहीं है, मेरे कृपालु मित्र!.

    इन्द्रजीतसिंह -अगर यह बात नहीं है तो कलमदान, जिसे तुम आखिरी मर्तबे इन्दिरा के साथ दारोगा के यहाँ से उठा लाये और मुझे दे गये थे, मेरे यहाँ से कैसे गायब हो गया?

    भूतनाथ-(मुस्करा कर) आपके किस मकान में से वह कलमदान गायव हो गया था?

    इन्द्रजीतसिंह-काशीजी वाले मकान में से । उसी दिन तुम मुझसे मिलने के लिए वहाँ आये थे और उसी दिन वह कलमदान गायब हो गया।

    भूतनाथ-ठीक है, तो उस कलमदान को चुराने वाला मैं नहीं हूं, बल्कि मेरा लड़का नानक है । मैं तो यों भी अगर जरूरत होती तो आपसे वह कलमदान मांग सकता था । दारोगा की आज्ञानुसार लाड़िली ने रामभोली बनकर नानक को धोखा दिया और अ के यहाँ से कलमदान चुरवा मंगवाया।

    गोपालसिंह-हाँ ठीक है, इस बात को तो मैं भी सकारूँगा क्योंकि मुझे इसका असल हाल मालूम है । बेशक इसी ढंग से वह कलमदान वहाँ पहुंचा था और अन्त में बड़ी मुश्किल से वह उस समय मेरे हाथ लगा, जब मैं कृष्ण जिन्न बन कर रोहतासगढ़ पहुंचा था। नानक को विश्वास है कि लाड़िली ने रामभोली बनकर उसे धोखा दिया था,मगर वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। वह एक दूसरी ही ऐयारा थी जो रामभोली बनी थी,लाड़िली ने तो केवल एक ही दिन या दो दिन रामभोली का रूप धरा था।

    जीतसिंह-(राजा गोपालसिंह से) वह कलमदान आपको कहाँ से मिल गया ? दारोगा ने तो उसे बड़ी ही हिफाजत से रखा होगा!

    गोपालसिंह-बेशक ऐसा ही है । मगर भूतनाथ की बदौलत वह मुझे सहज ही में मिल गया। ऐसी-ऐसी चीजों को दारोगा बहुत गुप्त रीति से अपने अजायबघर में रखता था, जिसकी ताली मायारानी से लेकर भूतनाथ ने मुझे दी थी । उस अजायबघर का भेद मेरे पिता और उस दारोगा के सिवाय कोई नहीं जानता था। मेरे पिता ही ने

    1.देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, चौथा भाग छठवां बयान । दारोगा को वहाँ का मालिक बना दिया था। जब भूतनाथ ने उसकी ताली मुझे दी, तब मुझे भी वहां का पूरा-पूरा हाल मालूम हुआ।

    जीतसिंह-(भूतनाथ से) खैर, यह बताओ कि मनोरमा और नागर का तुमसे क्या सम्बन्ध था?

    यह सवाल सुनकर भूतनाथ सन्न हो गया और सिर झुकाकर कुछ सोचने लगा। उस समय गोपालसिंह ने उसकी मदद की और जीतसिंह की तरफ देख कर कहा, “इस सवाल को छोड़ दीजिए, क्योंकि वह जमाना भूतनाथ का बहुत ही बुरा तथा ऐयाशी का था। इसके अतिरिक्त जिस तरह राजा वीरेन्द्रसिंहजी ने रोहतासगढ़ के तहखाने में भूतनाथ का कसूर माफ किया था, उसी तरह कमलिनी ने भी इसका वह कसूर कसम खिलाकर माफ किया और साथ ही उन ऐबों को छिपाने का बन्दोबस्त कर दिया है।"

    इसके जवाब में जीतसिंह ने कहा, "खैर, जाने दो, देखा जायेगा।"

    गोपालसिंह-जब से भूतनाथ ने कमलिनी का साथ किया है, तब से इसने (भूतनाथ ने) जो-जो काम किये हैं, उन पर ध्यान देने से आश्चर्य होता है।वास्तव में इसने ऐसे काम किये हैं, जिनकी ऐसे समय हमें सख्त जरूरत थी। मगर इसका लड़का नानक तो बिल्कुल ही बोदा और खुदगर्ज निकला। न तो कमलिनी के साथ मिल कर उसने कोई तारीफ का काम किया और न अपने बाप ही को किसी तरह की मदद दी।

    भूतनाथ-बेशक ऐसा ही है, मैंने कई दफा उसे समझाया, मगर

    सुरेन्द्र सिंह- (गोपाल से) अच्छा, अजायबघर में क्या बात है जिससे ऐसा अनूठा नाम उसका रखा गया ? अब तो तुम्हें उसका पूरा-पूरा हाल मालूम हो ही गया होगा।

    गोपालसिंह-जी हाँ। एक किताब है जिसे 'ताली' के नाम से सम्बोधित करते हैं। उसके पढ़ने से वहां का कुल हाल मालूम होता है । वह बड़ी हिफाजत और तमाशे की जगह थी और कुछ है भी, क्योंकि अब उसका काफी हिस्सा मायारानी की बदौलत बर्बाद हो गया।

    जीतसिंह-उस किताब (ताली) की बदौलत मायारानी को भी वहां का हाल मालूम हो गया होगा?

    गोपालसिंह-कुछ-कुछ, क्योंकि उस किताब की भाषा वह अच्छी तरह समझ नहीं सकती थी। इसके अतिरिक्त उस अजायबघर का जमानिया के तिलिस्म से भी सम्बन्ध है। इसलिए कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहां का हाल मुझसे भी ज्यादा मालूम हुआ होगा।

    जीतसिंह-ठीक है, (सुरेन्द्र सिंह की तरफ देख कर) आज यद्यपि बहुत-सी नई बातें मालूम हुई हैं । परन्तु फिर भी जब तक दोनों कुमार यहाँ न आ जायेंगे तत्र तक बहुत-सी बातों का पता न लगेगा।

    सुरेन्द्र सिंह–सो तो होगा ही, परन्तु इस समय हम केवल भूतनाथ के मामले को तय करना चाहते हैं । जहाँ तक मालूम हुआ है भूतनाथ ने हम लोगों के साथ सिवाय भलाई के बुराई कुछ भी नहीं की। अगर उसने बुराई की तो इन्द्रदेव के साथ या कुछ गोपालसिंह के साथ, सो भी उस जमाने में जब इनसे और हमसे कुछ सम्बन्ध नहीं था। आज ईश्वर की कृपा से ये लोग हमारे साथ हैं, बल्कि हमारे अंग हैं । इससे कहा भी जा सकता है कि भूतनाथ हमारा ही कसूरवार है। मगर फिर भी हम इसके कसूरों की माफी का अख्तियार इन्हीं दोनों अर्थात् गोपालसिंह और इन्द्रदेव को देते हैं। ये दोनों अगर भूतनाथ का कसूर माफ कर दें तो हम इस बात को खुशी से मंजूर कर लेंगे । हाँ,लोग यह कह सकते हैं कि इस माफी देने में बलभद्रसिंह को भी शरीक करना चाहिए था। मगर हम इस बात को जरूरी नहीं समझते, क्योंकि इस समय बलभद्रसिंह को कैद से छुड़ा कर भूतनाथ ने उन पर बल्कि सच तो ये है कि हम लोगों पर भी बहुत बड़ा अहसान किया है, इसलिए अगर बलभद्र सिंह को इससे कुछ रंज हो तो भी माफी देने में वे कुछ उज्र नहीं कर सकते।

    गोपालसिंह-इसी तरह हम दोनों को भी माफी देने में किसी तरह का उज्र न होना चाहिए। इस समय भूतनाथ ने मेरी बहुत बड़ी मदद की है और मेरे साथ मिल कर ऐसे अनूठे काम किये हैं कि जिनकी तारीफ सहज में नहीं हो सकती । इस हमदर्दी और मदद के सामने उन कसूरों की कुछ भी हकीकत नहीं, अतः मैं इससे बहुत प्रसन्न हूँ और सच्चे दिल से इसे माफी देता हूं।

    इन्द्रदेव-माफी देनी ही चाहिए ! जब आप माफी दे चुके तो मैं भी दे चुका!ईश्वर भूतनाथ पर कृपा करें, जिससे अपनी नेकनामी बढ़ाने का शौक इसके दिल में दिन-दिन तरक्की करता रहे। सच बात तो यह है कि कमलिनी की बदौलत इस समय हम लोगों को यह शुभ दिन देखने में आया और जब कमलिनी ने इससे प्रसन्न हो इसके कसूर माफ कर दिए तो हम लोगों को बाल-बराबर भी उज्र नहीं हो सकता।

    जीतसिंह-बेशक, बेशक !

    सुरेन्द्रसिंह-इसमें कुछ भी शक नहीं ! (भूतनाथ की तरफ देख कर) अच्छा, भूतनाथ, तुम्हारा सब कसूर माफ किया जाता है। इन दिनों हम लोगों के साथ तुमने जो-जो नेकियां की हैं उनके बदले में हम तुम पर भरोसा करके तुम्हें अपना ऐयार बनाते हैं ।

    इतना कहकर सुरेन्द्र सिंह उठ बैठे और अपने सिरहाने के नीचे से अपना खास बेशकीमत खंजर निकालकर भूतनाथ की तरफ बढ़ाया। भूतनाथ खड़ा हो गया और झुककर सलाम करने के बाद खंजर ले लिया और इसके बाद जीतसिंह, गोपालसिंह और इन्द्रदेव को भी सलाम किया। जीतसिंह ने अपना खास ऐयारी का बटुआ भूतनाथ को दिया। गोपालसिंह ने वह तिलिस्मी तमंचा, जिससे आखिरी वक्त मायारानी ने काम लिया था और जो इस समय उनके पास था, गोली बनाने की तरकीब सहित भूतनाथ को दिया और इन्द्रदेव ने यह कहकर उसे गले से लगा लिया कि “मुझ फकीर के पास इससे बढ़कर और कोई चीज नहीं है कि मैं फिर तुम्हें अपना भाई बना कर ईश्वर से प्रार्थना करूं कि अब इस नाते में किसी तरह का फर्क न पड़ने पावे।"

    इसके बाद दोनों आदमी अपनी-अपनी जगह पर बैठ गये और भूतनाथ ने हाथ जोड़कर सुरेन्द्रसिंह से कहा, "आज मैं समझता हूँ कि मुझ-सा खुशनसीब इस दुनिया में दूसरा कोई भी नहीं है। बदनसीबी के चक्कर में पड़कर मैं वर्षों परेशान रहा, तरह-तरह की तकलीफें उठाई, पहाड़-पहाड़ और जंगल-जंगल मारा फिरा, साथ ही इसके पैदा भी बहुत किया और बिगाड़ा भी बहुत, परन्तु सच्चा सुख नाम मात्र के लिए एक दिन भी न मिला और न किसी को मुंह दिखाने की अभिलाषा ही रह गई। अन्त में न मालूम किस जन्म का पुण्य सहायक हुआ जिसने मेरे रास्ते को बदल दिया और जिसकी बदौलत आज मैं इस दर्जे को पहुँचा। अब मुझे किसी बात की परवाह न रही। आज तक जो मुझसे दुश्मनी रखते थे, कल से वे मेरी खुशामद करेंगे, क्योंकि दुनिया का कायदा ही ऐसा है। महाराज इस बात का भी निश्चय रखें कि उस पीतल की सन्दूकड़ी से महाराज या महाराज के पक्षपातियों का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, जो नकली बलभद्रसिंह की गठरी में से निकली है और जिसके बयान ही से मेरे रोंगटे खड़े होते हैं । मैं उस भेद को भी महाराज से छिपाना नहीं चाहता, हाँ, यह अच्छा है कि सर्वसाधारण में वह भेद न फैलने पाये। मैंने उसका कुछ हाल देवी सिंह से कह दिया है, आशा है कि वे महाराज से जरूर अर्ज करेंगे।

    जीतसिंह–खैर, उसके लिए तुम चिन्ता न करो, जैसा होगा देखा जायेगा। अब अपने डेरे पर जाकर आराम करो, महाराज भी आज रात भर जागते ही रहे हैं।

    गोपालसिंह–जी हाँ, अब तो नाममात्र को रात बच गई होगी।

    इतना कहकर राजा गोपालसिंह उठ खड़े हुए और सबको साथ लिए हुए कमरे के बाहर चले गये।

    3

    इस समय रात बहुत कम बाकी थी और सुबह की सफेदी आसमान पर फैलना ही चाहती थी। और लोग तो अपने-अपने ठिकाने चले गए और दोनों नकाबपोशों ने भी अपने घर का रास्ता लिया, मगर भूतनाथ सीधे देवीसिंह के डेरे पर चला गया। दरवाजे पर ही पहरेवाले की जुबानी मालूम हुआ कि वे सोये हैं परन्तु देवीसिंह को न मालूम किस तरह भूतनाथ के आने की आहट मिल गई (शायद जागते हों)अतः वे तुरन्त बाहर निकल आए और भूतनाथ का हाथ पकड़कर कमरे के अन्दर ले गए। इस समय वहाँ केवल एक शमादान की मद्धिम रोशनी हो रही थी, दोनों आदमी फर्श पर बैठ गए और यों बातचीत होने लगी-

    देवीसिंह–कहो, इस समय तुम्हारा आना कैसे हुआ? क्या कोई नई बात हुई?

    भूतनाथ-बेशक नई बात हुई और वह इतनी खुशी की हुई है जिसके योग्य मैं नहीं था।

    देवीसिंह—(ताज्जुब से) वह क्या ?

    भूतनाथ-आज महाराज ने मुझे अपना ऐयार बना लिया और इस इज्जत के लिए मुझ अपना खंजर भी बख्शा है ।

    इतना कहकर भूतनाथ ने महाराज का दिया हुआ बंजर और जीतसिंह तथा गोपालसिंह का दिया हुआ बटुआ और तमंचा देवीसिंह को दिखाया और कहा, "इसी बात की मुबारकबाद देने के लिए मैं आया हूँ कि तुम्हारा एक नालायक दोस्त इस दर्जे को पहुँच गया।"

    देवीसिंह-(प्रसन्न होकर और भूतनाथ को गले से लगाकर) बेशक यह बड़ी खुशी की बात है, ऐसी अवस्था में तुम्हें अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह को भी सलाम करने के लिए जाना चाहिए।

    भूतनाथ-जरूर जाऊँगा !

    देवीसिंह-यह कार्रवाई कब हुई ?

    भूतनाध-अभी थोड़ी ही देर पहले हुई । मैं इस समय महाराज के पास से ही चला आ रहा हूँ। इतना कहकर भूतनाथ ने आज की रात का कुल हाल देवीसिंह से बयान किया ।इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह में देर तक बातचीत होती रही, और जब दिन अच्छी तरह निकल आया, तब दोनों ऐयार वहाँ से उठे और स्नान-संध्या की फिक्र में लगे ।

    जरूरी कामों से निश्चिन्ती पा और स्नान-पूजा से निवृत्त होकर भूतनाथ अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह के पास चला गया। बेशक उसके दिल में इस बात का खुटका लगा हुआ था कि उसका पुराना मालिक उसे देखकर प्रसन्न न होगा, बल्कि सामना होने पर भी कुछ देर तक उसके दिल में इस बात का गुमान बना रहा, मगर जिस समय भूतनाथ ने अपना खुलासा हाल बयान किया, उस समय बहुत परेशान रणधीरसिंह को और प्रसन्न पाया। रणधीरसिंह ने उसको खिलअत और इनाम भी दिया और बहुत देर तक उससे तरह-तरह की बातें करते रहे।

    4

    यह बात तो तय पा चुकी थी कि सब कामों के पहले कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी हो जानी चाहिए, अतः इसी खयाल से जीतसिंह शादी के इन्तजाम में जी-जान से कोशिश कर रहे हैं और इस बात की खबर पाकर सभी प्रसन्न हो रहे हैं कि आज दोनों कुमार आ जायेंगे और शीघ्र ही उनकी शादी भी हो जायेगी। महाराज की आज्ञानुसार जीतसिंह मुलाकात करने के बाद इस बात का फैसला भी कर आये कि किशोरी के साथ-ही-साथ कामिनी का भी कन्यादान रणधीरसिंह ही करेंगे। साथ ही इसके रणधीरसिंह की यह बात भी जीतसिंह ने मंजूर कर ली कि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आने के पहले किशोरी और कामिनी उनके (रणधीरसिंह के) खेमे में पहुंचा दी जायेंगी। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् किशोरी और कामिनी बड़ी हिफाजत के साथ रणधीरसिंह के खेमे में पहुँचा दी गई और बहुत से फौजी सिपाहियों के साथ पन्नालाल, रामनारायण, चुन्नीलाल और पण्डित बद्रीनाथ ऐयार खास उनकी हिफाजत के लिए छोड़ दिए गए। आज कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आने की उम्मीद में लोग खुशी-खुशी तरह-तरह के चर्चे कर रहे हैं । आज ही के दिन आने के लिए दोनों कुमारों ने चिट्ठी लिखी थी, इसलिए आज उनके दादा-दादी, मां-बाप, दोस्तों और प्रेमियों को भी उम्मीद हो रही है कि उनकी तरसती हुई आँखें ठण्डी होंगी, और जुदाई के सदमों से मुरझाया हुआ दिल हरा होगा। अलहकार और खैरख्वाह लोग जरूरी कामों को भी छोड़कर तिलिस्मी इमारत में इकट्ठे हो रहे हैं। इसी तरह हर एक अदना और आला दोनों कुमारों के आने की उम्मीद में खुश हो रहा है । गरीबों और मोहताजों की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं, उन्हें इस बात का पूरा विश्वास हो रहा है कि अब उनका दारिद्र्य दूर हो जायगा !

    दो पहर दिन ढलने के बाद दोनों नकाबपोश भी आकर हाजिर हो गए हैं, केवल वे ही नहीं, बल्कि उनके साथ और भी कई नकाबपोश हैं, जिनके बारे में लोग तरह-तरह के चर्चे कर रहे हैं और साथ ही यह भी कह रहे हैं कि "जिस समय ये नकाबपोश लोग अपने चेहरों से नकाबें हटायेंगे, उस समय जरूर कोई-न-कोई अनूठी घटना देखने-सुनने में आयेगी।"

    नकाबपोशों की जुबानी यह तो मालूम हो ही चुका था कि दोनों कुमार उसी पत्थर वाले तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से प्रकट होंगे जिस पर पत्थर का आदमी सोया हुआ है, इसलिए इस समय महाराज, राजासाहब और सलाहकार लोग उसी दालान में इकट्ठे हो रहे हैं, और वह दालान भी सज-सजाकर लोगों के बैठने के लायक बना दिया गया है।

    तीन पहर दिन बीत जाने पर तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से कुछ विचित्र ही ढंग के बाजे की आवाज आने लगी जोकि भारी मगर सुरीली थी और जिसके सबब से लोगों का ध्यान उसकी तरफ खिंचा। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और गोपालसिंह तथा दोनों नकाबपोश उठकर उस चबूतरे के पास गये। ये लोग बड़े गौर से उस चबूतरे की अवस्था पर ध्यान देते रहे, क्योंकि इस बात का पूरा गुमान था कि पहले की तरह आज भी उस चबूतरे का अगला हिस्सा किवाड़ के पल्ले की तरह खुलकर जमीन के साथ लग जायेगा। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् जिस तरह बलभद्रसिंह के आने और जाने के वक्त उस चबूतरे का अगला हिस्सा खुल गया था, उसी तरह इस समय भी वह किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलकर जमीन के साथ लग गया और उसके अन्दर से कुंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह बाहर निकलकर महाराज सुरेन्द्रसिंह के पैरों पर गिर पड़े। उन्होंने बड़े प्रेम से उठाकर छाती से लगा लिया। इसके बाद दोनों कुमारों ने अपने पिता के चरण छूए, फिर जीतसिंहजी और तेजसिंह को प्रणाम करने के बाद राजा लसिंह से मिले । इसके बाद नकाबपोशों, ऐयारों व दोस्तों से भी मुलाकात की।

    बन्दोबस्त पहले से हो चुका था और इशारा भी बंधा हुआ था, अतएव जिस समय दोनों कुमार महाराज के चरणों पर गिरे उसी समय फाटक पर से बाजों की आवाज आने लगी जिससे बाहर वालों को भी मालूम हो गया कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह आ गये।

    इस समय की खुशी का हाल लिखना हमारी ताकतसे बाहर है। हाँ, इसका अन्दाज पाठक स्वयं कर सकते हैं कि जब दोनों कुमार मिलने के लिए महल के अन्दर गए तो औरतों में खुशी का दरिया कितने जोश के साथ उमड़ा होगा। महल के अन्दर दोनों कुमारों का इन्तजार बनिस्बत बाहर से ज्यादा होगा, यह सोचकर ही महाराज ने दोनों कुमारों को ज्यादा देर तक बाहर रोकना मुनासिब न समझकर शीघ्र ही महल में जाने की आज्ञा दी, और दोनों कुमार भी खुशी-खुशी महल के अन्दर जाकर सबसे मिले । उनकी माँ और दादी की बढ़ती हुई खुशी का तो आज अन्दाज करना ही कठिन है, जिन्होंने लड़कों की जुदाई तथा रंज और नाउम्मीदी के साथ-ही-साथ तरह-तरह की खबरों से पहुंची हुई चोटों को अपने नाजुक कलेजों पर झेलकर और देवताओं की मिन्नतें मान-मानकर आज का दिन देखने के लिए अपनी नन्ही-सी जान को बचाकर रखा था। अगर उन्हें समय और नीति पर विशेष ध्वान न रहता तो आज घण्टों तक अपने बच्चों को कलेजे से अलग करके बातचीत करने और महल के बाहर जाने का मौका न देतीं।

  • चन्द्रकान्ता सन्तति 5

    चन्द्रकान्ता सन्तति 5

    Aproximadamente 178.942 palavras.

    चन्द्रकान्ता सन्तति 5
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकान्ता_सन्तति_5

    सत्रहवाँ भाग

    1

    हमारे पाठक 'लीला' को भूले न होंगे। तिलिस्मी दारोगा वाले बँगले की बर्बादी के पहले तक इसका नाम आया है जिसके बाद फिर इसका जिक्र नहीं आया ।

    लीला को जमानिया की खबरदारी पर मुकर्रर करके मायारानी काशी वाले नागर के मकान में चली गई थी और वहाँ दारोगा के आ जाने पर उसके साथ इन्द्रदेव के यहाँ चली गई। जब इन्द्रदेव के यहाँ से भी वह भाग गई और दारोगा तथा शेरअली खाँ की मदद से रोहतासगढ़ के अन्दर घुसने का प्रबन्ध किया गया, जैसा कि सन्तति के बारहवें भाग के तेरहवें बयान में लिखा गया है उस समय लीला भी मायारानी के साथ थी, मगर रोहतासगढ़ में जाने के पहले मायारानी ने उसे अपनी हिफाजत का जरिया बनाकर पहाड़ के नीचे ही छोड़ दिया था। मायारानी ने अपना तिलिस्मी तमंचा, जिससे बेहोशी बारूद की गोली चलाई जाती थी, लीला को देकर कह दिया था कि मैं शेरअली खाँ की मदद से और उन्हीं के भरोसे पर रोहतासगढ़ के अन्दर जाती हूँ मगर ऐयारों के हाथ मेरा गिरफ्तार हो जाना कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार बड़े ही चालाक हैं। यद्यपि उनसे बचे रहने की पूरी-पूरी तरकीब की गई है मगर फिर भी मैं बेफिक्र नहीं रह सकती, अस्तु, यह तिलिस्मी तमंचा तू अपने पास रख और इस पहाड़ के नीचे ही रहकर हम लोगों के बारे में टोह लेती रह। अगर हम लोग अपना काम करके राजी-खुशी के साथ लौट आये तब तो कोई बात नहीं। ईश्वर न करे यदि मैं गिरफ्तार हो जाऊँ तो तू मुझे छुड़ाने का बन्दोबस्त करना और इस तमंचे से काम निकालना। इसमें चलाने वाली गोलियाँ और वह ताम्र-पत्र भी मैं तुझे दिए जाती हूँ जिसमें गोली बनाने की तरकीब लिखी हुई है।

    जब दारोगा और शेरअली खाँ सहित मायारानी गिरफ्तार हुई और वह खबर शेरअली खाँ के लश्कर में पहुँची जो पहाड़ के नीचे था, तो लीला ने भी सब हाल सुना और वह उसी समय वहाँ से टलकर कहीं छिप रही, फिर भी जब तक राजा वीरेन्द्रसिंह वहाँ से चुनारगढ़ की तरफ रवाना न हुए तब तक वह भी उस इलाके के बाहर न गई और इसी से शिवदत्त और कल्याणसिंह (जो बहुत से आदमियों को लेकर रोहतासगढ़ के तहखाने में घुसे थे) वाला मामला भी उसे बखूबी मालूम हो गया था।

    माधवी, मनोरमा, और शिवदत्त ने जब ऐयारों की मदद से कल्याणसिंह को छुड़ाया था तो भीमसेन भी उसी के साथ ही छुड़ाया गया, मगर भीमसेन कुछ बीमार था इसलिए शिवदत्त के साथ मिल-जुलकर के रोहतासगढ़ तहखाने में न जा सका था, शिवदत्त ने अपने ऐयारों की हिफाजत में उसे शिवदत्तगढ़ भेज दिया था।

    सब बखेड़ों से छुट्टी पाकर जब राजा वीरेन्द्रसिंह कैदियों को लिए हुए चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए तो मायारानी को कैद से छुड़ाने को फिक्र में लीला भी भेष बदले हुए उन्हों के लश्कर के साथ रवाना हुई। लश्कर में नकली किशोरी, कामिनी और कमला के मारे जाने वाला मामला उसके सामने ही हुआ और तब तक उसे अपनी कार्रवाई करने का कोई मौका न मिला मगर जब नकली किशोरी, कामिनी और कमला की दाहक्रिया करके राजा साहब आगे बढ़े और दुश्मनों की तरफ से कुछ बेफिक्र हुए तब लीला को भी अपनी कार्रवाई का मौका मिला और वह उस खेमे के चारों तरफ ज्यादा फेरे लगाने लगी जिसमें मायारानी कैद थी और चालीस आदमी नंगी तलवारे लिए बारी-बारी से उसके चारों तरफ पहरा दिया करते थे। एक दिन इत्तिफाक से आंधी-पानी का जोर हो गया और इसी से उस कम्गख्त को अपने काम का अच्छा मौका मिला।

    वीरेन्द्रसिंह का लश्कर एक सुहावने जंगल में पड़ा हुआ था। समय बहुत अच्छा था, संध्या होने के पहले ही से बादलों का शामियाना खड़ा हो गया था, बिजली चमकने लग गई थी, और हवा के झपेटे पेड़-पत्तों के साथ हाथापाई कर रहे थे। पहर रात जाते-जाते पानी अच्छी तरह बरसने लग गया और उसके बाद तो आँधी-पानी ने एक भयानक तूफान का रूप धारण कर लिया। उस समय लश्कर वालों को बहुत ही तकलीफ हुई। हजारों सिपाही, गरीब बनिये, घसियारे और शागिर्द पेशे वाले जो मैदान में सोया करते थे इस तूफान से दुःखी होकर जान बचाने की फिक्र करने लगे। यद्यपि राजा वीरेन्द्रसिंह की रहमदिली और रिआयापरवरी ने बहुतों को आराम दिया और बहुत से आदमी खेमों और शामियानों के अन्दर घुस गये यहां तक कि राजा वीरेन्द्र सिंह और तेजसिंह के खेमों में भी सैकड़ों को पनाह मिल गई मगर फिर भी हजारों आदमी ऐसे रह गये थे जिनकी भौंडी किस्मत में दुःख भोगना बदा था। यह सब-कुछ था मगर लीला को ऐसे समय भी चैन न था और वह दुःख को दुःख नहीं समझती थी, क्योंकि उसे अपना काम साधने के लिए बहुत दिनों बाद आज यही एक मौका अच्छा मालूम हुआ।

    जिस खेमे में मायारानी और दारोगा वगैरह कैद थे, उससे चालीस या पचास हाथ की दूरी पर सलई का एक बड़ा और पुराना दरख्त था। इस आँधी-पानी और तूफान का खौफ न करके लीला उसी पेड़ पर चढ़ गई और कैदियों के खेमे की तरफ मुंह करके तिलिस्मी तमंचे का निशाना साधने लगी। जब-जब बिजली चमकती तब-तब वह अपने निशाने को ठीक करने का उद्योग करती। सम्भव था कि बिजली की चमक में कोई उसे पेड़ पर चढ़ा हुआ देख लेता, मगर मगर जिन सिपाहियों के पहरे में वह खेमा था उस (कैदियों वाले) खेमे के पास जो लोग रहते थे, सभी इस तूफान से घबराकर उसी खेमे के अन्दर घुस गये थे जिसमें मायारानी और दारोगा वगैरह कैद थे। खेमे के बाहर या उस पेड़ के पास कोई भी न था जिस पर लीला चढ़ी हुई थी।

    लीला जब अपने निशाने को ठीक कर चुकी तब उसने एक गोली (बेहोशी वाली) चलाई। हम पहले के किसी बयान में लिख चुके हैं कि इस तिलिस्मी तमंचे के चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती थी मगर जब गोली जमीन पर गिरती थी तब कुछ हलकी-सी आवाज पटाखे की तरह होती थी।

    लीला की चलाई हुई गोली खेमे को छेद के अन्दर चली गई और एक सिपाही के बदन पर गिरकर फूटी। उस सिपाही का कुछ नुकसान नहीं हुआ जिस पर गोली गिरी थी। न तो उसका कोई अंग-भंग हुआ और न कपड़ा जला, केवल हलकी-सी आवाज हुई और बेहोशी का बहुत ज्यादा धुआं चारों तरफ फैलने लगा। मायारानी उस वक्त बैठी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी। पटाखे की आवाज से वह चौंककर उसी तरफ देखने लगी और बहुत जल्द समझ गई कि यह उसी तिलिस्मी तमंचे से चलाई गई गोली है जो मैं लीला के सुपुर्द कर आयी थी।

    मायारानी यद्यपि जान से हाथ धो बैठी थी और उसे विश्वास हो गया था कि अब इस कैद से किसी तरह छुटकारा नहीं मिल सकता मगर इस समय तिलिस्मी तमंचे की गोली ने खेमे के अन्दर पहुंचकर उसे विश्वास दिला दिया कि अब भी तेरा एक दोस्त मदद करने लायक मौजूद है जो यहां आ पहुंचा और कैद से छुड़ाया ही चाहता है।

    वह मायारानी, जिसकी आँखों के आगे मौत की भयानक सूरत घूम रही थी और हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी, चौंककर सम्हल बैठी। बेहोशी का असर करने वाला धुआँ बच रहने की मुबारकबाद देता हुआ आँखों के सामने फैलने लगा और तरह- तरह की उम्मीदों ने उसका कलेजा ऊँचा कर दिया। यद्यपि वह जानती कि यह धुआँ मुझे भी बेहोश कर देगा, मगर फिर भी वह खुशी की निगाहों से चारों तरफ देखने लगी और इतने में ही एक दूसरी गोली भी उसी ढंग की वहाँ आकर गिरी।

    मायारानी और दारोगा को छोड़कर जितने आदमी उस खेमे में थे सभी को उन दोनों गोलियों ने ताज्जुब में डाल दिया। अगर गोली चलाते समय तमंचे में से किसी तरह की आवाज निकलकर उनके कानों तक पहुँचती, तो शायद कुछ पता लगाने की नीयत से दो-चार आदमी खेमे के बाहर निकलते, मगर उस समय सिवाय एक-दूसरे का मुँह देखने के किसी को किसी तरह का गुमान न हुआ और धुएँ ने तेजी के साथ फैलकर अपना असर जमाना शुरू कर दिया। बात की बात में जितने आदमी उस खेमे के अन्दर थे, सभी का सिर घूमने लगा और एक-दूसरे के ऊपर गिरते हुए सब के सब बेहोश हो गए, मायारानी और दारोगा को दीन-दुनिया की सुध न रही।

    पेड़ पर चढ़ी हुई लीला ने थोड़ी देर तक इन्तजार किया। जब खेमे के अन्दर से किसी को निकलते न देखा और उसे विश्वास हो गया कि खेमे के अन्दर वाले अब बेहोश हो गये होंगे, तब वह पेड़ से उतरी और खेमे के पास आई। आँधी-पानी का जोर अभी तक वैसा ही था, मगर लीला ने इसे अच्छी तरह सह लिया और कनात के नीचे से झाँककर खेमे के अन्दर देखा तो सभी को बेहोश पाया।

    पाठकों को यह मालूम है कि लीला ऐयारी भी जानती थी। कनात काटकर वह खेमे के अन्दर चली गई। आदमी बहुत ज्यादा भरे हुए थे, इसलिए उसे मायारानी के पास तक पहुँचने में बड़ी कठिनाई हुई। आखिर वह उसके पास पहुँची और हाथ-पैर खोलने के बाद लखलखा सुंघाकर होश में लाई। मायारानी ने होश में आकर लीला को देखा और धीरे से कहा, "शाबाश, खूब पहुँची। बस, दारोगा को छुड़ाने की कोई जरूरत नहीं।" इतना कहकर मायारानी उठ खड़ी हुई और लीला के हाथ का सहारा लेती हुई खेमे के बाहर निकल गयी।

    लीला ने चाहा कि लश्कर में से दो घोड़े भी सवारी के लिए चुरा लावे मगर मायारानी ने स्वीकार न किया और उसी तूफान में दोनों कम्बख्तों ने एक तरफ का रास्ता लिया।

    ↑

    देखिए, चन्द्रकान्ता सन्तति, नौवाँ और आठवाँ बयान।

    2

    पाठकों को मालूम है कि शिवदत्त और कल्याणसिंह ने जब रोहतासगढ़ पर चढ़ाई की थी तब उनके साथ मनोरमा और माधवी मौजूद थीं। भूतनाथ और सरयूसिंह ने शिवदत्त और कल्याणसिंह को डरा-धमकाकर मनोरमा को तो गिरफ्तार कर लिया परन्तु माधवी कहाँ गई या क्या हुई, इसका हाल कुछ लिखा नहीं गया, अस्तु अब हम थोड़ा-सा हाल माधवी का लिखना उचित समझते हैं।

    जिस जमाने में माधवी गया और राजगृह की रानी कहलाती थी, उस जमाने उसका राज्य केवल तीन आदमियों के भरोसे पर चलता था। एक दीवान अग्निदत्त, दूसरा कोतवाल धरमसिंह और तीसरा सेनापति कुबेरसिंह। बस यही तीनों उसके राज्य का आनन्द लेते थे और इन्हीं तीनों का माधवी को भरोसा था। यद्यपि ये तीनों ही माधवी की चाह में डूबने वाले थे मगर कुबेरसिंह और धरमसिंह प्यासे ही रह गये जिसका उन दोनों को बराबर बहुत ही रंज बना रहा।

    जब राजगृह और गया की किस्मत ने पलटा खाया, तब धर्मसिंह कोतवाल को तो चपला ने माधवी की सूरत बना और धोखा दे गिरफ्तार कर लिया, और दीवान अग्निदत्त बहुत दिनों तक बचा रह कर अन्त में किशोरी के कारण एक खोह के अन्दर मारा गया, परन्तु अभी तक यह न मालूम हुआ कि उसके मर जाने का सबब क्या था। हाँ सेनापति कुबेरसिंह जिसने माधवी के राज्य में सबसे ज्यादा दौलत पैदा की थी, रह गया क्योंकि उसने जमाने को पलटा खाते देख चुपचाप अपने घर (मुर्शिदाबाद) का रास्ता लिया मगर माधवी के हाल-चाल की खबर लेता रहा, क्योंकि यद्यपि उसने माधवी का राज्य छोड़ दिया था, मगर माधवी के इश्क ने उसके दिल में से अपना दखल नहीं उठाया था।

    माधवी की बिगड़ी हुई अवस्था देखकर भी उसकी मुहब्बत से हाथ न धोने के दो सबब थे एक तो माधवी वास्तव में खूबसूरत हसीन और नाजुक थी, दूसरे राजगृह और गया के राज्य से खारिज हो जाने पर भी वह माधवी को अमीर और बेहिसाब दौलत की मालिक समझता था और इसलिए वह समय पर ध्यान रखकर माधवी के हाल-चाल की बराबर खबर लेता रहा और वक्त पर काम देने के लिए थोड़ी-सी फौज का मालिक भी बना रहा।

    मनोरमा के गिरफ्तार हो जाने के बाद शिवदत्त और कल्याणसिंह के साथ जब माधवी रोहतासगढ़ की तराई में पहुँची तो वहाँ एक आदमी ने गुप्त रीति से उसे एक चिट्ठी दी और जल्द उसका जवाब माँगा। यह चिट्ठी कुवेरसिंह की थी और उसमें यह लिखा हुआ था––

    "मुझे आपकी अवस्था पर बहुत रंज और अफसोस है। यद्यपि आपकी हालत बदल गई है और आप मुझसे बहुत दूर हैं, मगर मैं अभी तक आपकी खयाली तस्वीर अपने दिल के अन्दर कायम रखकर दिन-रात उसकी पूजा किया करता हूँ। यही सबब है कि बहुत दिनों तक मेहनत करके मैंने इतनी ताकत पैदा कर ली है कि आपकी मदद कर सकूँ और आपको पुनः राजगृह की गद्दी का मालिक बनाऊँ। आप अपने ही दिल से पूछ देखिये कि अग्निदत्त, जिसके साथ आपने सब-कुछ किया, कैसा बेईमान और बेमुरौवत निकला और मैं, जिसे आपने हद से ज्यादा तरसाया कैसी हालत में आपकी मदद करने को तैयार हूँ! यदि आप मुनासिब समझें तो इस आदमी के साथ मेरे पास चलीं आवें या मुझको अपने पास बुला लें। यह आदमी जो चिट्ठी लेकर जाता है मेरा ऐयार है।

    आपका––कुबेर।"

    माधवी ने उस चिट्ठी को बड़े गौर से दोहरा कर पढ़ा और देर तक तरह-तरह की बातें सोचती रही। हम नहीं जानते कि उसका दिल किन-किन बातों का फैसला करता रहा या वह किस विचार में देर तक डूबी रही, हाँ थोड़ी देर बाद उसने सिर उठा चिट्ठी लाने वाले की तरफ देखा और कहा, "कुबेरसिंह कहाँ पर है?"

    ऐयार––यहाँ से थोड़ी दूर पर

    माधवी––फिर वह खुद यहाँ क्यों न आया?

    ऐयार––इसीलिए कि आप इस समय दूसरों के साथ हैं जिन्होंने आपको न मालूम किस तरह का भरोसा दिया होगा या आप ही ने शायद उनसे किस तरह का इकरार किया हो, ऐसी अवस्था में आपसे दरियाफ्त किये बिना इस लश्कर में आना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा।

    माधवी––ठीक है, अच्छा तुम जाकर उसे बहुत जल्द मेरे पास ले आओ। कितनी देर में आओगे?

    ऐयार––(सलाम करके) आधे घंटे के अन्दर। वह ऐयार तेजी के साथ दौड़ता हुआ वहाँ से चला गया और माधवी उसी जगह टहलती हुई उसका इन्तजार करने लगी।

    दिन आधे घंटे से कुछ ज्यादा बाकी था और इस समय माधवी कुछ खुश मालूम होती थी। शिवदत्त और कल्याणसिंह का लश्कर एक जंगल में छिपा हुआ था और माधवी अपने डेरे से निकल कर सौ सवा सौ कदम की दूरी पर चली गई थी। माधवी कुबेरसिंह के अक्षर अच्छी तरह पहचानती थी इसलिए उसे किसी तरह का धोखा खाने का शक कुछ भी न हुआ और वह बेखौफ उसके आने का इन्तजार करने लगी।

    संध्या होने के पहले ही उसी ऐयार को साथ लिए हुए कुबेरसिंह माधवी की तरफ आता दिखाई दिया जो थोड़ी ही देर पहले उसकी चिट्ठी लेकर आया था। उस समय वह ऐयार भी एक घोड़े पर सवार था और कुबेरसिंह अपनी सूरत-शक्ल तथा हैसियत को अच्छी तरह सजाये हुए था। माधवी के पास पहुँच कर दोनों आदमी घोड़े से नीचे उतर पड़े और कुबेरसिंह ने माधवी को सलाम करके कहा, "आज बहुत दिनों के बाद ईश्वर ने मुझे आपसे मिलाया! मुझे इस बात का बहुत रंज है कि आपने लौंडियों के भड़काने पर चुपचाप घर छोड़कर जंगल का रास्ता ले लिया और अपने खैरख्वाह कुबेरसिंह (हम) को याद तक न किया। मैं खूब जानता हूँ कि आपने दीवान अग्निदत्त से डर कर ऐसा किया था मगर उसके बाद भी तो मुझे याद करने का मौका जरूर मिला होगा।"

    माधवी––(मुस्कुराती हुई कुबेरसिंह का हाथ पकड़ के) मैं घर से निकलने के बाद ऐसी मुसीबत में पड़ गयी थी कि अपनी भलाई-बुराई पर कुछ भी ध्यान न दे सकी, और जब मैंने सुना कि गया और राजगृह में वीरेन्द्रसिंह का राज्य हो गया तब और भी हताश हो गई, फिर भी मैं अपने उद्योग की बदौलत बहुत-कुछ कर गुजरती, मगर गयाजी में अग्निदत्त की लड़की कामिनी ने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया और मुझे किसी लायक न रक्खा। (अपनी कटी हुई कलाई दिखाकर) यह उसी की बदौलत है।

    कुबेरसिंह––वह खानदान का खानदान ही नमकहराम निकला और इसी फेर में अग्निदत्त मारा भी गया।

    माधवी––हाँ, उसके मरने का हाल मायारानी की सखी मनोरमा की जुबानी मैंने सुना था। (पीछे की तरफ देखकर) कौन आ रहा है?

    कुबेरसिंह––आप ही के लश्कर का कोई आदमी है, शायद आपको बुलाने आता हो, नहीं वह दूसरी तरफ घूम गया, मगर अब आपको कुछ सोच-विचार करना, किसी से मिलना या इस जगह खड़े-खड़े बातों में समय नष्ट न करना चाहिए और यह मौका भी बातचीत करने का नहीं है। आप (घोड़े की तरफ इशारा करके) इस घोड़े पर शीघ्र सवार होकर मेरे साथ चली चलें, मैं आपका ताबेदार सब लायक और सब कुछ करने के लिए तैयार हूँ, फिर किसी की खुशामद की जरूरत ही क्या है? यदि कल्याणसिंह के लश्कर में आपका कुछ असबाब हो तो उसकी परवाह न कीजिए।

    माधवी––नहीं, अब मुझे किसी की परवाह नहीं रही, मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ। इतना कहकर माधवी कुबेरसिंह के घोड़े पर सवार हो गई। कुबेरसिंह अपने ऐयार के घोड़े पर सवार हुआ तथा पैदल ऐयार को साथ लिए हुए दोनों एक तरफ को रवाना हुए।

    यही सबब था कि शिवदत्त वगैरह के साथ माधवी रोहतासगढ़ के तहखाने में दाखिल नहीं हुई।

    ↑

    देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति, चौदहवां भाग, दुसरा बयान।

    3

    कैद से छुटकारा मिलने के बाद बीमारी के सबब से यद्यपि भीमसेन को घर जाना पड़ा और वहाँ उसकी बीमारी बहुत जल्दी जाती रही, मगर घर में रहने का जो सुख उसको मिलना चाहिए वह न मिला क्यों एक तो माँ के मरने का रंज और गम उसे हद से ज्यादा था और अब वह घर काटने को दौड़ता था, दूसरे थोड़े ही दिन बाद बाप के मरने की खबर भी उसे पहुँची, जिससे वह बहुत ही उदास और बेचैन हो गया। इस समय उसके ऐयार लोग भी वहीं मौजूद थे जो बाहर से यह दुखदायी खबर लेकर लौट आये थे। पहले तो उसके ऐयारों ने उसे बहुत समझाया और राजा वीरेन्द्रसिंह से सुलह कर लेने में बहुत सी भलाइयाँ दिखाईं, मगर उस नालायक के दिल में एक भी न बैठी और वह राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला लेने तथा किशोरी को जान से मार डालने की कसम खाकर घर से बाहर निकल पड़ा। बाकरअली, खुदाबक्श, अजायबसिंह और यारअली इत्यादि उसके लालची ऐयारों ने भी लाचार होकर उसका साथ दिया।

    अब की दफा भीमसेन ने अपने ऐयारों के सिवाय और किसी को भी साथ न लिया, हाँ रुपये-अशर्फी या जवाहिरात की किस्म में से जहाँ तक उससे बना या जो कुछ भी उसके पास था, लेकर अपने ऐयारों को लालच भरी उम्मीदों का सब्जबाग दिखाता रवाना हुआ और थोड़ी दूर जाने के बाद ऐयारों के साथ ही उसने भी अपनी सूरत बदल ली।

    "राजा वीरेन्द्रसिंह को किस तरह नीचा दिखाना चाहिए और क्या करना चाहिए?" इस विषय पर तीन दिन तक उन लोगों में बहस होती रही और अन्त में यह निश्चय किया गया कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान तथा आपस वालों का मुकाबला करने के पहले उनके दुश्मनों से दोस्ती बढ़ाकर अपना बल खूब पुष्ट कर लेना चाहिए। इस इरादे पर वे लोग बहुत कुछ कायम भी रहे और माधवी, मायारानी तथा तिलिस्मी दारोगा वगैरह से मुलाकात करने की फिक्र करने लगे।

    कई दिनों तक सफर करने और घूमने-फिरने के बाद एक दिन ये लोग दोपहर होते-होते एक घने जंगल में पहुँचे। चार-पाँच घण्टे आराम कर लेना इन लोगों को बहुत जरूरी मालूम हुआ क्योंकि गर्मी की चलाचली का जमाना था और धूप बहुत कड़ी और दुःखदायी थी। मुसाफिरों को तो जाने दीजिये, जंगली जानवरों और आकश में उड़ने वाली तथा बात-की-बात में दूर-दूर की खबर लाने वाली चिड़ियाओं को भी पत्तों की आड़ से निकलना बुरा मालूम होता था।

    इस जंगल में एक जगह पानी का झरना भी जारी था और उसके दोनों तरफ पेड़ों की घनाहट के सबब और जगहों के बनिस्बत ज्यादा ठंडक थी। ये पाँचों मुसाफिर भी झरने के किनारे पत्थर की साफ चट्टान देखकर बैठ गए और आपस में इधर-उधर की बातें करने लगे। इसी समय बातचीत की आहट पाने और निगाह दौड़ाने पर इन लोगों की निगाह दस-बारह सिपाहियों पर पड़ी जिन्हें देख भीमसेन चौंका और उनका पता लगाने के लिए अजायबसिंह से कहा, क्योंकि दोस्तों और दुश्मनों के खयाल से उसका जो एक पल के लिए भी ठिकाने नहीं रहता था और 'पत्ता खड़का बन्दा भड़का' की कहावत का नमूना बन रहा था।

    भीमसेन की आज्ञानुसार अजायबसिंह ने उन आदमियों का पीछा किया और दो घंटे तक लौट कर न आया। तब दूसरे ऐयारों को भी चिन्ता हुई और वे अजायबसिंह की खोज में जाने के लिए तैयार हुए मगर इसकी नौबत न पहुँची, क्योंकि उसी समय अजायबसिंह अपने साथ कई सिपाहियों को लिए भीमसेन की तरफ आता दिखाई दिया। अजायबसिंह के इस तरह आने ने पहले तो सभी को खुटके में डाल दिया मगर जब अजायबसिंह ने दूर ही से खुशी का इशारा किया तब सभी का जी ठिकाने हुआ और उसके आने का इन्तजार करने लगे। पास आने पर अजायबसिंह ने भीमसेन से कहा, "इस जंगल में आकर टिक जाना हम लोगों के लिए बहुत अच्छा हुआ क्योंकि रानी माधवी से मुलाकात हो गई। आज ही उनका डेरा भी इस जंगल में आया है। कुबेरसिंह सेनापति और चार-पाँच सौ सिपाही उनके साथ हैं। जिन लोगों का मैंने पीछा किया था वे भी उन्हीं के सिपाहियों में से थे और ये भी उन्हीं के सिपाही हैं जो मेरे साथ आपको बुलाने के लिए आए हैं।"

    माधवी की खबर सुनकर भीमसेन उतना ही खुश हुआ जितना अजायबसिंह की जुबानी भीमसेन के आने की खबर पाकर माधवी खुश हुई थी। अजायबसिंह की बात सुनते ही भीमसेन उठ खड़ा हुआ और अपने ऐयारों को साथ लिए हुए घड़ी भर के अन्दर ही अपनी बेहया बहिन माधवी से जा मिला। ये दोनों एक-दूसरे को देखकर बहुत खुश हुए मगर उन दोनों की मुलाकात कुबेरसिंह को अच्छी न मालूम पड़ी जिसका सबब क्या था सो हमारे पाठक लोग खुद ही समझ सकते हैं।

    थोड़ी देर तक भीमसेन और माधवी ने कुशल-मंगल पूछने में बिताया। माधवी ने खाने-पीने की चीजें तैयार करने का हुक्म दिया, क्योंकि उसे अपने अनूठे भाई की खातिरदारी आज मंजूर थी और इसलिए बड़ी मुहब्बत के साथ देर रात तक बातें होती रहीं।

    माधवी को इस जंगल में आये आज पाँच दिन हो चुके हैं। पाँचवें दिन दोपहर के समय भीमसेन से मुलकात हुई थी। उसका (कुबेरसिंह का) ऐयार दुश्मनों की खोज खबर लगाने के लिए कहीं गया हुआ था क्योंकि माधवी और कुबेरसिंह ने इस जंगल में पहुँच कर निश्चय कर लिया था कि पहले दुश्मनों का हाल-चाल मालूम करना चाहिए, इसके वाद जो कुछ मुनासिब होगा; किया जायगा।

    4

    कैद से छूटने के बाद लीला को साथ लिए हुए मायारानी ऐसी भागी कि उसने पीछे की तरफ फिर के भी नहीं देखा। आँधी और पानी के कारण उन दोनों को भागने में बड़ी तकलीफ हुई, कई दफा वे दोनों गिरी और चोट भी लगी, मगर प्यारी जान को बचा कर ले भागने के खयाल ने उन्हें किसी तरह दम न लेने दिया। दो घण्टे के बाद आँधी-पानी का जोर जाता रहा, आसमान साफ हो गया और चन्द्रमा भी निकल आया, उस समय उन दोनों को भागने में सुभीता हुआ और सवेरा होने तक ये दोनों बहुत दूर निकल गई।

    मायारानी यद्यपि खूबसूरत थी नाजुक थी, और परले सिरे की अमीरी कर चुकी थी मगर इस समय ये सब बातें हवा हो गई। पैरों में छाले पड़ जाने पर भी उसने भागने में कसर न की और सवेरा हो जाने पर भी दम न लिया, बराबर भागती ही चली गई। दूसरा दिन भी उसके लिए बहुत अच्छा था, आसमान पर बदली छाई हुई थी और धूप को जमीन तक पहुँचने का मौका नहीं मिला था। अब मायारानी बातचीत करती हुई और पिछली बातें लीला को सुनाती हुई रुक कर चलने लगी। थोड़ी दूर जाती फिर जरा दम ले लेती, पुनः उठकर चलती और कुछ देर बाद दम लेने के लिए बैठ जाती। इसी तरह दूसरा दिन भी मायारानी ने सफर ही में बिता दिया और खाने-पीने की कुछ विशेष परवाह न की। संध्या होने के कुछ पहले वे दोनों एक पहाड़ी की तराई में पहुंची जहां साफ पानी का सुन्दर चश्मा बह रहा था और जंगली बेर तथा मकोय के पेड़ भी बहुतायत से थे। वहाँ पर लीला ने मायारानी से कहा कि अब डरने तथा चलते-चलते जान देने की कोई जरूरत नहीं। अब हम लोग बहुत दूर निकल आये हैं और ऐसे रास्ते से आये हैं कि जिधर से किसी मुसाफिर की आमद-रफ्त नहीं होती अतः अब हम को बेफिक्री के साथ आराम करना चाहिए। यह जगह इस लायक है कि हम लोग खा पीकर अपनी आत्मा को सन्तोष दे लें और अपनी-अपनी सूरतें भी अच्छी तरह बदल कर पहचाने जाने का खटका मिटा लें!"

    लीला की बात मायारानी ने स्वीकार की और चश्मे के पानी से हाथ-मुँह धोने और जरा दम लेने के बाद सबके पहले सूरत बदलने का बन्दोबस्त करने लगी क्योंकि दिन नाममात्र को रह गया था और रात हो जाने पर बिना रोशनी के सहारे यह काम अच्छी तरह नहीं हो सकता था।

    सुरत––शक्ल के हेर-फेर से छुट्टी पाने के बाद दोनों ने जंगली बेर और मकोय को अच्छे-से-अच्छा मेवा समझकर भोजन किया और चश्मे का जल पीकर आत्मा को संतोष दिया, तब निश्चिन्त होकर बैठी और यों बातचीत करने लगीं––

    मायारानी––अब जरा जी ठिकाने हुआ, मगर शरीर चूर-चूर हो गया है। खैर, किसी तरह तेरी बदौलत जान बच गई, नहीं तो मैं हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी और राह देखती थी कि मेरी जान किस तरह ली जाती है। लीला––चाहे तुम्हारे सारे नौकर-चाकर तुम्हारे अहसानों को भूल जायें और तुम्हारे नमक का खयाल न करें मगर मैं कब ऐसा कर सकती हूँ! मुझे दुनिया में तुम्हारे बिना चैन कब पड़ सकता है, जब तक तुम्हें कैद से छुड़ा न लिया, अन्न का दाना मुँह में न डाला बल्कि अभी तक जंगली बेर और मकोय पर ही गुजारा कर रही हूँ!

    मायारानी––शाबाश! मैं तुम्हारे इस अहसान को जन्म भर नहीं भूल सकती, जिस तरह आप रहूँगी उसी तरह तुम्हें भी रक्खूँगी। यह जान तुमने बचाई है इसलिए जब तक इस दुनिया में रहूँगी इस जान का मालिक तुम्हीं को समझेंगी।

    लीला––(तिलिस्मी तमंचा और गोली मायारानी के सामने रख कर) यह अपनी अमानत आप लीजिए और अब इसे अपने पास रखिये, इसने बड़ा काम किया।

    मायारानी––(तमंचा उठा कर और थोड़ी-सी गोलियाँ लीला को देकर) इन गोलियों को अपने पास रक्खो, बिना तमंचे के भी ये बड़ा काम देंगी। जिस तरफ फेंक दोगी या जहाँ जमीन पर पटकोगी उसी जगह ये अपना गुण दिखलावेंगी।

    लीला––(गोलियाँ रख कर) बेशक ये बड़े वक्त पर काम देती हैं। अच्छा, यह कहिये कि अब हम लोगों को क्या करना और कहाँ जाना चाहिए?

    मायारानी––इसका जवाब भी तुम्हीं बहुत अच्छा दे सकती हो, मैं केवल इतना ही कहूँगी कि गोपालसिंह और कमलिनी को इस दुनिया से उठा देना सबसे पहला और जरूरी काम समझना चाहिए। किशोरी, कामिनी और कमला को मारकर मनोरमा ने कुछ भी न किया, उतनी ही मेहनत अगर गोपालसिंह और कमलिनी को मारने के लिए करती तो इस समय मैं पुनः तिलिस्म की रानी कहलाने लायक हो सकती थी।

    लीला––ठीक है मगर मुझे … (कुछ रुक कर) देखो तो, वह कौन सवार जा रहा है! मुझे तो उस छोकरे रामदीन की छटा मालूम पड़ती है। यह पंचकल्यान मुश्की घोड़ी भी अपने ही अस्तबल की मालूम पड़ती है बल्कि …

    मायारानी––(गौर से देखकर) यह वही घोड़ी है जिस पर मैं सवार हुआ करती थी, और बेशक वह सवार भी रामदीन ही है। उसे पकड़ो तो गोपालसिंह का ठीक हाल मालूम हो।

    लीला––पकड़ना तो कोई कठिन काम नहीं है क्योंकि तिलिस्मी तमंचा तुम्हारे पास मौजूद है, मगर यह कम्बख्त कुछ बताने वाला नहीं है।

    मायारानी––खैर जो हो, मैं गोली चलाती हूँ।

    इतना कहकर मायारानी ने फुर्ती से तिलिस्मी तमंचे में गोली भर कर सवार की तरफ चलाई। गोली घोड़ी को गर्दन में लगी और तुरन्त फट गई, घोड़ी भड़की और उछली-कूदी मगर गोली से निकले हुए बेहोशी के धुएँ ने अपना असर करने में उससे भी ज्यादा तेजी और फुर्ती दिखाई। घोड़ी और सवार दोनों ही पर बेहोशी का असर हो गया। सवार जमीन पर गिर पड़ा और दो कदम आगे बढ़कर घोड़ी भी लेट गई। मायारानी और लीला ने दूर से यह तमाशा देखा और दौड़ती हुईं सवार के पास पहुँची।

    लीला––पहसे इसकी मुश्कें बाँधनी चाहिए। मायारानी––क्या जरूरत है?

    लीला––क्यों, फिर इसे बेहोश किस लिए किया?

    मायारानी––तुम खुद ही कह चुकी हो कि यह कुछ बताने वाला नहीं है, फिर मुश्कें बाँधने से मतलब?

    लीला––आखिर फिर किया क्या जायगा?

    मायारानी––पहले तुम इसकी तलाशी ले लो, फिर जो कुछ करना होगा, मैं तुम्हें बताऊँगी।

    लीला––बहुत खूब, यह तुमने ठीक कहा

    इस समय संध्या पूरे तौर पर हो चुकी थी, परन्तु चन्द्रदेव के दर्शन हो रहे थे, इसलिए यह नहीं कह सकते कि अन्धकार पल-पल में बढ़ता जाता था। लीला उस सवार की तलाशी लेने लगी और पहली ही दफा जेब में हाथ डालने से उसे दो चीजें मिलीं। एक तो हीरे की कीमती अँगूठी जिस पर राजा गोपालसिंह का नाम खुदा हुआ था और दूसरी चीज एक चिट्ठी थी जो लिफाफे के तौर पर लपेटी हुई थी।

    चाहे अन्धकार न हो मगर चिट्ठी और अँगूठी पर खुदे हुए नाम को पढ़ने के लिए रोशनी की जरूरत थी और जब तक चिट्ठी का हाल मालूम न हो जाय तब तक कुछ काम करना या आगे तलाशी लेना उन दोनों को मंजूर न था, अतः लीला ने अपने ऐयारी के बटुए में से सामान निकाल कर रोशनी पैदा की और मायारानी ने सबसे पहले अँगूठी पर निगाह दौड़ाई। अँगूठी पर 'श्रीगोपाल' खुदा हुआ देख उसके रोंगटे खड़े हो गये फिर भी अपनी नबीयत सम्हाल कर वह चिट्ठी पढ़नी पड़ी। चिट्ठी में यह लिखा हुआ था––

    "बेनीराम जोग लिखी गोपालसिंह––

    आज हमने अपना पर्दा खोल दिया, कृष्ण जिन्न के नाम का अन्त हो गया, जिनके लिए यह स्वांग रचा गया था, उन्हें मालूम हो गया कि गोपालसिंह और कृष्ण जिन्न में कोई भी भेद नहीं है, अतः अब हमने काम-काज के लिए इस छोकरे को अपनी अँगूठी देकर विश्वास का पात्र बनाया है। जब तक यह अँगूठी इसके पास रहेगी तब तक इसका हुक्म हमारे हुक्म के बराबर सभी को मानना होगा। इसका बन्दोबस्त कर देना और दो सौ सवार तथा चार रथ बहुत जल्द पिपलिया घाटी में भेज देना। हम किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को लेकर आ रहे हैं। थोड़ा-सा जलपान का सामान उम्दा अलग भेजना। परसों रविवार की शाम तक हम लोग वहाँ पहुँच जायेंगे।"

    इस चिट्ठी ने मायारानी का कलेजा दहला दिया और उसने घबरा कर इसे पढ़ने के लिए लीला के हाथ में दे दिया।

    मायारानी––ओफ! मुझे स्वप्न में भी इस बात का गुमान न था कि कि कृष्ण जिन्न वास्तव में गोपालसिंह है! आह, जब मैं पिछली बातें याद करती हूँ तो कलेजा काँप जाता है और मालूम होता है कि गोपालसिंह ने मेरी तरफ से लापरवाही नहीं की बल्कि मुझे बुरी तरह से दुःख देने का इरादा कर लिया था। किशोरी, कामिनी और कमला के बारे में भी … ओफ! बस अब मैं इस जगह दम भर भी नहीं ठहर सकती और ठहरना उचित भी नहीं है।

    लीला––बेशक ऐसा ही है, मगर कोई हर्ज नहीं, आज यदि कृष्ण जिन्न का भेद खुल गया है तो यह (अँगूठी और चिट्ठी दिखा कर) चीजें भी बड़ी ही अनूठी मिल गई हैं। तुम बहुत जल्द देखोगी कि इस चिट्ठी और अँगूठी की बदौलत मैं कैसे-कैसे नामी ऐयारों की आँखों में धूल डालती हूँ और गोपालसिंह तथा उसके सहायकों को किस तरह तड़पा कर मारती हूँ। तुम यह भी देखोगी कि तुम्हारे उन लोगों ने जो ऐयारों का बाना पहने हुए थे और नामी ऐयार कहलाते थे, उसका पासंग भी नहीं किया जो मैं अब कर दिखाऊँगी। तो अब यहाँ से चलना चाहिए।

    मायारानी––बहुत जल्द ही चलना चाहिए, मगर क्या इस छोकरे को जीता ही छोड़ जाओगी?

    लीला––नहीं-नहीं, कदापि नहीं। क्या इसे मैं इसलिए जीता छोड़ जाऊँगी कि यह होश में आकर जमानिया या गोपालसिंह के पास चला जाय और मेरी कार्रवाइयों बट्टा लगाए!

    इतना कह कर लीला ने खंजर निकाला और एक ही हाथ में बेचारे रामदीन का सिर काट दिया, तब लाश को उसी तरह छोड़ घोड़ी को होश में लाने का उद्योग करने लगी।

    थोड़ी देर में घोड़ी भी चैतन्य हो गयी। उस समय लीला के कहे अनुसार मायारानी उस घोड़ी पर सवार हुई और दोनों ने वहाँ से हटकर एक घने जंगल का रास्ता लिया। लीला घोड़ी की रकाब थामे साथ-साथ बातें करती हुई जाने लगी।

    मायारानी––यह मदद मुझे गैब से मिली है। यकायक रामदीन का मिल जाना और उसकी जेब में से अँगूठी तथा चिट्ठी का निकल आना कहे देता है कि मेरे बुरे दिन बहुत जल्द खत्म होना चाहते हैं।

    लीला––इसमें क्या शक है! अबकी दफे तो राजा गोपालसिंह सचमुच हमारे कब्जे में आ गये हैं। अफसोस इतना ही है कि हम लोग अकेले हैं, अगर सौ-पचास आदमियों की भी मदद होती तो आज गोपालसिंह तथा किशोरी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को सहज ही में गिरफ्तार कर लेते।

    मायारानी––अब उन लोगों को गिरफ्तार करने का खयाल तो बिल्कुल जाने दे और एकदम से उन लोगों को मारकर बखेड़ा निपटा डालने की ही फिक्र कर। इस अँगूठी और चिट्ठी के मिल जाने पर यह काम कोई मुश्किल नहीं है।

    लीला––ठीक है, जो कुछ तुम चाहती हो, मैं पहले से समझे बैठी हूँ। मेरा इरादा है कि तुम्हें किसी अच्छी और हिफाजत की जगह पर छोड़कर मैं जमानिया जाऊँ और दीवान साहब से मिलूँ जिनके नाम गोपालसिंह ने यह चिट्ठी लिखी है।

    मायारानी––बस, रामदीन छोकरे की सूरत बना ले और इसी घोड़ी पर सवार होकर चिट्ठी लेकर जा। इस चिट्ठी के अलावा भी तू जो कुछ दीवान को कहोगी वह उससे इन्कार न करेगा। गोपालसिंह के लिखे अनुसार जो कुछ खाने-पीने की चीजें तू लेकर उस घाटी की तरफ जायगी, उसमें जहर मिला देना तो तेरे लिए कोई मुश्किल न होगा और इस तरह एक साथ ही कई दुश्मनों को सफाई हो जायगी, मगर इसमें भी मुझे एक बात का खुटका होता है।

    लीला––वह क्या?

    मायारानी––जिस वक्त से मुझे यह मालूम हुआ है कि गोपालसिंह ही ने कृष्ण जिन्न का रूप धारण किया था, उस वक्त से मैं उसे बहुत ही चालाक और धूर्त ऐयार समझने लग गई हूँ। ताज्जुब नहीं कि वह तेरा भेद मालूम कर ले या वे खाने-पीने की चीजें, जो उसने मँगाई हैं, उनमें से स्वयं कुछ भी न खाय।

    लीला––यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है। मेरा दिल भी यही कहता है कि उसने खाने-पीने का बहुत बड़ा ध्यान रखा होगा, सिवाय अपने हाथ के और किसी का बनाया कदापि न खाता होगा, क्योंकि वह तकलीफें उठा चुका है, अब उसे धोखा देना जरा टेढ़ी खीर है, मगर फिर भी तुम देखोगी कि इस अँगूठी की बदौलत मैं उसे कैसा धोखा देती हूँ और किस तरह अपने पंजे में फँसाती हूँ।

    मायारानी––खैर, जो मुनासिब समझे, मगर इसमें तो कोई शक नहीं कि रामदीन छोकरे की सूरत बनाकर और घोड़ी पर सवार होकर तू दीवान साहब के पास जायगी।

    लीला––मैं जाऊँगी और जरूर जाऊँगी। नहीं तो इस अँगूठी और चिट्ठी के मिलने का फायदा ही क्या हुआ! बस, तुम्हें किसी अच्छे ठिकाने पर रख देने भर की देर है।

    मायारानी––मगर मैं एक बात और कहना चाहती हूँ।

    लीला––वह क्या!

    मायारानी––मैं इस समय बिल्कुल कंगाल हो रही हूँ और ऐसे मौके पर रुपये की बड़ी जरूरत है। इसलिए मैं चाहती हूँ कि दीवान साहब के पास तुझे न भेजकर खुद ही जाऊँ और किसी तरह तिलिस्मी बाग में घुसकर कुछ जवाहरात और सोना जहाँ तक ला सकूँ ले आऊँ, क्योंकि मुझे वहाँ के खजाने का हाल मालूम है और यह काम तेरे किये नहीं हो सकता, जब मुझे रुपये की मदद मिल जायगी, तो कुछ सिपाहियों का भी बन्दोबस्त कर सकूँगी और …

    लीला––यह सब कुछ ठीक है, मगर मैं तुम्हें दीवान साहब के पास कदापि न जाने दूँगी। कौन ठिकाना कही तुम गिरफ्तार हो जाओ तो फिर मेरे किए कुछ भी न हो सकेगा। बाकी रही रुपये-पैसे वाली बात, सो इसके लिए तरद्दुद करना वृथा है, क्या यह नहीं हो सकता कि जब मैं दीवान साहब के पास जाऊँ और सवारी इत्यादि तथा खाने-पीने की चीजें लूँ, तो एक रथ पर थोड़ी सी अशर्फियाँ और कुछ जवाहिरात भी रख देने के लिए कहूँ? क्या वह इस अँगूठी के प्रताप से मेरी बात न मानेगा? और अगर अशफियों और जवाहरात का बन्दोबस्त कर देगा तो क्या मैं उन्हें रास्ते में से गुम नहीं कर सकती? इसे भी जाने दो, अगर तुम पता-ठिकाना ठीक-ठीक बताओ तो क्या मैं तिलिस्मी बाग में जाकर जवाहरात और अशफियों को कहीं निकाल ला सकती? मायारानी––निकाल ला सकती है और दीवान साहब से भी जो कुछ माँगेगी, सम्भव है कि बिना कुछ विचारे दे दें, मगर इसमें भी मुझे दो बातों की कठिनाई मालूम पड़ती है।

    लीला––वह क्या?

    मायारानी––एक तो दीवान साहब के पास अन्दाज से ज्यादा रुपये-अशफियों की तहवील नहीं रहती और जवाहरात तो बिल्कुल ही उसके पास नहीं रहते, शायद आज कल गोपालसिंह के हुक्म से रहता हो, मगर मुझे उम्मीद नहीं है, अब जो चीज तू उससे माँगेगी, वह अगर उसके पास न हुई तो उसे तुझ पर शक करने की जगह मिलेगी और ताज्जुब नहीं कि काम में विघ्न पड़ जाय।

    लीला––अगर ऐसा है तो जरूर खुटके की बात है, अच्छा दूसरी बात क्या है?

    मायारानी––दूसरे यह कि तिलिस्मी बाग के खजाने में घुसकर वहाँ से कुछ निकाल लाना, नये आदमी का काम नहीं है। खैर, मैं तुझे रास्ता बता दूँगी, फिर जो कुछ करते बने, तू कर लेना।

    लीला––खैर, जैसा होगा देखा जायगा, मगर मैं यह रांय कभी नहीं दे सकती कि साहब के सामने या खास बाग में जाओ, ज्यादा नहीं तो थोड़ा-बहुत मैं ले ही आऊँगी।

    मायारान––अच्छा, यह बता कि मुझे कहाँ छोड़ जायगी और तेरे जाने मैं क्या करूँगी?

    लीला––इतनी जल्दी में कोई अच्छी जगह तो मिलती नहीं, किसी पहाड़ कन्दरा में दो दिन गुजारा करो और चुपचाप बैठी रहो, इसी बीच में मैं अपना काम करके लौट आऊँगी। मुझे जमानिया जाने में अगर देर हो जायगी तो काम चौपट हो जायगा। ताज्जुब नहीं कि देर हो जाने के कारण गोपालसिंह किसी दूसरे को भेज दें और अँगूठी का भेद खुल जाय।

    इत्तिफाक अजब चीज है। उसने यहाँ भी एक बेढब सामान खड़ा कर दिया। इत्तिफाक से लीला और मायारानी भी उसी जंगल में जा पहुँची जिसमें माधवी और भीमसेन का मिलाप हुआ था और वे लोग अभी तक वहाँ टिके हुए थे

    5

    आधी रात का समय था जब लीला और मायारानी उस जंगल में पहुँची जिसमें माधवी और भीमसेन टिके हुए थे। जब ये दोनों उसके पास पहुँची और लीला को वहाँ टिके हुए बहुत से आदमियों की आहट मिली तो वह मायारानी को एक ठिकाने खड़ा करके पता लगाने के लिए उसकी तरफ गई।

    हम ऊपर बयान कर चुके है कि सेनापति कुबेरसिंह के साथ थोड़ी-सी फौज भी थी––अब लीला को थोड़ी ही कोशिश से मालूम हो गया कि यहाँ सैकड़ों आदमियों का डेरा पड़ा हुआ है और वे लोग इस ढंग से घने जंगल में आड़ देख टिके हुए हैं जैसे डाकुओं का गिरोह या छिपकर धावा मारने वाले टिकते हैं और हर वक्त होशियार रहते हैं। लीला खूब जानती थी कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी या सम्बन्धी अगर किसी काम के लिए कहीं जाते हैं या लड़ाई करते हैं तो छिपकर या आड़ पकड़कर डेरा नहीं डालते। हाँ, अगर अकेले या ऐयार लोग हों तो शायद ऐसा करें, मगर जब उनके साथ सौ-पचास आदमी या कुछ फौज होगी, तब कदापि ऐसा न करेंगे, इसलिए उसे गुमान हुआ कि ये लोग जरूर कोई गैर हैं, बल्कि ताज्जुब नहीं कि हमारा साथ देने वाले हों, अब बहुत सी बातों को सोच-विचार और अपनी ऐयारी पर भरोसा करके लीला माधवी की फौज में घुस गयी और वहाँ बहुत से सिपाहियों को होशियार तथा पहरा देते हुए देखा।

    पहले लिखा जा चुका है कि लीला भेष बदले हुए थी और यह भी दर्शाया गया है कि माधवी और कुबेरसिंह अपनी सुरत में सफर करते थे।

    लीला को कई सिपाहियों ने देखा और एक ने टोका कौन है?

    लीला––एक मुसाफिर परदेशी औरत।

    सिपाही––यहाँ क्यों चली आ रही है?

    लीला––अपनी भलाई की आशा से।

    सिपाही––क्या चाहती है?

    लीला––आपके सरदार से मिलना।

    सिपाही––अपना परिचय दे तो सरदार के पास भिजवा दूँ।

    लीला––परिचय देने में तो कोई हर्ज नहीं है, मगर डरती हूँ कि आप लोग भी कहीं उन्हीं में से न हों जिन्होंने मुझे लूट लिया है, यद्यपि अब मैं बिल्कुल खाली हो रही हूँ मगर …

    इतने में और भी कई सिपाही वहाँ जुट आये और सभी ने लीला को घेरकर सवाल करना शुरू किया और लीला ने भी गौर करके जान लिया कि ये लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के दल वाले नहीं हैं, क्योंकि उनके फौजी सिपाही अक्सर जर्द पोशाक काम में लाते हैं, इसी तरह से जमानिया वाले भी नहीं मालूम हुए, क्योंकि उनकी बातचीत और चाल-ढाल को लीला खूब पहचानती थी, अब कुछ और बातचीत होने पर लीला को विश्वास हो गया कि ये लोग उनमें से नहीं हैं जिसका मुझे डर है।

    उन सिपाहियों को भी एक अकेली औरत से डरने की कोई जरूरत न थी, इसलिए उन्होंने अपने मालिक का नाम जाहिर कर दिया और लीला को लिए हुए उस जगह जा पहुँचे जहाँ माधवी और भीमसेन का बिस्तर लगा हुआ था और ये दोनों इस समय भी बैठे बातचीत कर रहे थे। लालटेन जलाया गया और लीला की सूरत अच्छी तरह देखी गयी, लीला ने भी उसी रोशनी में माधवी को पहचान लिया और खुश होकर बोली, "अहा, आप तो गया की रानी माधवीदेवी हैं।"

    माधवीदेवी––और तू कौन है? लीला––मैं प्रसिद्ध मायारानी की ऐयारा हूँ और उन्हीं के साथ यहाँ तक आई भी हूँ। यह दुनिया का कायदा है कि एक से दूसरे को मदद पहुँचती है। अब जिस तरह आपको मायारानी से मदद पहुँच सकती है, उसी तरह आप मायारानी की भी मदद कर सकती हैं। वाह-वाह, यह समागम तो बहुत ही अच्छा हुआ। अगर आजकल मायारानी मुसीबत के दिन काट रही हैं तो क्या हुआ, मगर फिर भी वह तिलिस्म की रानी रह चुकी हैं और जो वह कर सकती हैं, किसी दूसरे से नहीं हो सकता। आप लोगों का एक हो जाना बहुत ही मुनासिब होगा, तब आप लोग जो चाहेंगी, कर सकेंगी।"

    माधवीदेवी––(खुश होकर) मायारानी कहाँ हैं? उन्हें तो राजा वीरेन्द्रसिंह कैद करके चुनार ले गये थे।

    लीला––जी हाँ, मगर मैं अभी कह चुकी हूँ कि मायारानी आखिर तिलिस्म की रानी हैं, इसलिए जो कुछ वह कर सकती हैं, किसी दूसरे के किए नहीं हो सकता। राजा वीरेन्द्रसिंह ने उन्हें कैद किया तो क्या हुआ, उनका छूटना कोई मुश्किल न था!

    माधवीदेवी––बेशक-वेशक, अच्छा बताओ, वह कहाँ हैं?

    लीला––यहाँ से थोड़ी दूर पर खड़ी हैं। किसी सरदार को भेजिये, उनका इस्तकबाल करके यहाँ ले आवे, दो-तीन सौ कदम से ज्यादा न चलना पड़ेगा।

    माधवीदेवी––मैं खुद उन्हें लेने के लिए चलूँगी।

    लीला––इससे बढ़कर और क्या हो सकता है? अगर आप उनकी इज्जत करेंगी तो वह भी आपके लिए जान तक देना जरूरी समझेंगी।

    लीला ने अपनी लम्बी-चौड़ी बातों में माधवी को खूब उलझाया, यहाँ तक कि माधवी अपने साथ भीमसेन और कुबेरसिंह तथा सिपाहियों को लेकर मायारानी के पास गयी और उसे बड़ी खातिर और इज्जत के साथ अपने डेरे पर ले आई। जल मँगवाकर हाथ-मुँह धुलवाया और फिर बातचीत करने लगी।

    माधवीदेवी––(मायारानी से) आपको वीरेन्द्रसिंह की कैद से छूट जाने पर मैं मुबारकबाद देती हूँ यद्यपि आपके लिए यह कोई बड़ी बात न थी।

    मायारानी––बेशक, यह कोई बड़ी बात न थी, इस काम को तो अकेली मेरी सखी या ऐयारा लीला ही ने कर दिखाया। इस समय आपसे मिलकर मैं बहुत खुश हुई और इसमें अब शक करने की कोई जगह न रही कि आप पुनः गया की रानी और मैं जमानिया की मालिक बन जाऊँगी। दुनिया में एक का काम दूसरे हुआ ही करता है और जब हम आप एक दिल हो जायेंगे तो वह कौन-सा काम है जिसे नहीं कर सकते! मुझे आपके कैद होने की भी खबर लगी थी और मुझे इस बात का बहुत रंज था कि आपको मेरी छोटी बहिन कमलिनी ने कैदखाने की सूरत दिखाई थी।

    माधवीदेवी––इधर तो यह सुनने में आया है कि आपसे और कमलिनी से कोई नाता नहीं है और लक्ष्मीदेवी भी प्रकट हो गई है। तथा उसे राजा वीरेन्द्रसिंह चुनार ले गये हैं।

    मायारानी––(मुस्कुराकर) बेशक, ऐसा ही है, मगर जिस जमाने का मैं जिक्र कर रही हूँ, उस जमाने में वह मेरी ही बहिन कहलाती थी। और लक्ष्मीदेवी को राजा

    च॰ स॰-5-1

    वीरेन्द्रसिंह चुनार नहीं ले गये हैं, वह तो किशोरी, कामिनी, कमलिनी, लाड़िली और कमला के सहित किसी दूसरी ही जगह छिपाई गई हैं, मगर इसमें कोई सन्देह नहीं है कि कल शाम को गोपालसिंह उन सभी को जमानिया की तरफ ले जायेंगे और हम लोग उन्हें गोपालसिंह के सहित रास्ते ही में गिरफ्तार कर लेंगे।

    माधवीदेवी––(ताज्जुब से) हाँ! क्या कल मैं दुष्टा किशोरी की नापाक सूरत देख सकूँगी! उस पर मुझे बड़ा ही रंज है, और कमलिनी ने तो मुझे कैद ही किया था।

    मायारानी––बेशक, कल किशोरी और कमलिनी इत्यादि तुम्हारे कब्जे में होंगी और गोपालसिंह भी तुम्हारे काबू में होगा जो वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों की बदौलत तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन हो रहा है?

    माधवीदेवी––निःसन्देह वह मेरा और तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है, तो क्या उसकी गिरफ्तारी का इन्तजाम हो चुका है?

    मायारानी––हाँ, चौदह आना इन्तजाम हो चुका जो दो आना बाकी है सो वह भी हो जायगा।

    माधवी––क्या बन्दोबस्त हुआ है? और किस समय तथा किस तरह वे लोग गिरफ्तार किये जायेंगे?

    मायारानी––(इधर-उधर देखकर)बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो मैं केवल तुम्हीं से कहूँगी कोई दूसरा उसके सुनने का अधिकारी नहीं है।

    माधवी––बहुत अच्छा यह कोई बड़ी बात नहीं है।

    इतना कहकर माधवी ने भीमसेन और कुबेरसिंह की तरफ देखा क्योंकि माधवी मायारानी और लीला के सिवाय केवल ये ही दो आदमी वहाँ मौजूद थे। भीमसेन ने कहा, "हम दोनों यहाँ से हट जाते हैं, तुम लोग बेधड़क बातें करो मगर (मायारानी से)मेरे एक सवाब का जवाब पहले मिलना चाहिए।"

    मायारानी––वह क्या?

    भीमसेन––आप अभी कह चुकी हैं कि कल किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह गिरफ्तार हो जायेंगी मगर मैंने सुना था कि राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में पहुँच कर मनोरमा ने किशोरी, कामिनी और कमला को जान से मार डाला, अब इस समय कोई और ही बात सुनने में आ रही है।

    माधवी––हाँ, यह सवाल मैं भी करने वाली थी लेकिन बातों का सिलसिला दूसरी तरफ चला गया और मैं पूछना भूल गई।

    मायारानी––हाँ, यह बात अच्छी तरह सुनने में आई थी और मुझे विश्वास भी हो गया था कि वास्तव में ऐसा ही हुआ है मगर आज यह बात खुद गोपालसिंह की लिखावट से खुल गई कि वास्तव में वे तीनों मारी नहीं गई, परन्तु मुझे यह मालूम नहीं है कि इस विषय में किस तरह की चालाकी खेली गई या मनोरमा ने जिन्हें मारा, वे कौन थीं।

    भीमसेन––तो निश्चय है कि वे तीनों मारी नहीं गई?

    मायारानी––बेशक वे तीनों जीती हैं। (गोपालसिंह वाली चिट्ठी दिखाकर) देखो एक ही सबूत से मैं तुम्हारी दिलजमई कर देती हूँ, इसे पढ़ो और माधवी रानी को सुनाओ। (माधवी से) देखो बहिन, तुम इस बात का खयाल न करना कि मैं तुम्हें आप कहकर सम्बोधन नहीं करती, मेरा तुम्हारा अब दोस्ती और मुहब्बत का नाता हो चुका इसलिए अब इन बातों का खयाल नहीं हो सकता।

    माधवी––मैं भी यही पसन्द करती हूँ और इस बारे में अपने लिए भी तुमसे पहले ही माफी माँग लेती हूँ।

    भीमसेन ने पत्र पढ़ा और माधवी को सुनाया।

    भीमसेन––इस पत्र से तो बड़ा काम निकल सकता है! यह कब का लिखा है और तुम्हारे हाथ क्योंकर लगा तथा जिस अँगूठी का इसमें जिक्र किया गया है वह कहाँ है?

    मायारानी––(अँगूठी दिखाकर) अँगूठी भी मुझे मिल गई है और यह चिट्ठी आज ही की लिखी है और आज ही मेरे हाथ लगी है। अभी इसकी कार्रवाई बिल्कुल बाकी है।

    भीमसेन––अफसोस इतना ही है कि मेरे ऐयारों में से कोई भी रामदीन को नहीं जानता …

    मायारानी––क्या हर्ज है, यह मेरी ऐयारा लीला बखूबी उसकी तरह बनकर काम निकाल सकती है, तुम्हारे ऐयार इसकी मदद पर मुस्तैद रह सकते हैं, और यह जब रामदीन की सूरत बनेगी तो इसे अच्छी तरह देख भी सकते हैं।

    भीमसेन––(चिट्ठी मायारानी के हाथ में देकर) अच्छा अब तुम दोनों को जो कुछ गुप्त बातें करनी हैं कर लो पीछे मैं इस विषय में कुछ कहूँ सुनूँगा।

    इतना कहकर भीमसेन उठ खड़ा हुआ और कुबेरसिंह को साथ लिए हुए कुछ दूर चला गया और मौका समझकर लीला भी कुछ पीछे हट गई।

    मायारानी––जो कुछ पीछे कहोगी-सुनोगी उसे मैं पहले ही निपटा देना चाहती हूँ। सच पूछो तो मेरी और तुम्हारी अवस्था बराबर है, तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूँ, क्योंकि मैं वास्तव में गोपालसिंह की स्त्री नहीं हूँ और यह बात सभी को मालूम हो गई, बल्कि तुम भी सुन चुकी होगी।

    माधवी––हाँ, मैं सुन चुकी हूँ, और मैंने यह भी सुना था कि तुमने राजा गोपालसिंह को वर्षों तक कैद कर रखा था पर आखिर कमलिनी ने उन्हें छुड़ा दिया। तो तुमने ऐसा क्यों किया और उन्हें मार ही क्यों न डाला?

    मायारानी––यही मुझसे भूल हो गई। तिलिस्म के दो-चार भेद जो मुझे मालूम न थे जानने के लिए मैंने ऐसा किया था, मुझे उम्मीद थी कि वह कैद की तकलीफ उठाकर बता देगा। तब उसे मार डालती तो आज यह दिन देखना नसीब न होता, मैं तिलिस्म की बदौलत अकेली ही राजा वीरेन्द्रसिंह ऐसे दस को जहन्नुम में पहुँचा देने की ताकत रखती थी। अब भी अगर गोपालसिंह को मैं पकड़ पाऊँ और मार सकूँ तो पुनः तिलिस्म की रानी होने से मुझे कोई भी रोक नहीं सकता और तब मैं बात-की-बात में तुम्हें राजगृही और गया की रानी बना सकती हूँ, मगर उस बात का सिलसिला तो टूटा ही जाता है। तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूँ, तुम भी नौजवान और आशिक-मिजाज मैं भी नौजवान और आशिक-मिजाज हूँ, तुम भी इन्द्रजीतसिंह के फेर में पड़कर दुःख भोग रही हो और मैं भी आनन्दसिंह की मुहब्बत में इस दशा तक आ पहुँची हूँ, अब भी मेरी और तुम्हारी किस्मतों का फैसला एक साथ और एक ही ठिकाने हो सकता है क्योंकि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी आजकल जमानिया में तिलिस्म तोड़ रहे हैं, अगर हम तुम एक होकर काम करें तो बहुत जल्द दुश्मनों का नाम-निशान मिटाकर अपने प्यारों के साथ दुनिया का सुख भोग सकती हैं, मगर इस समय तुम्हारे दो कंटक दिखाई देते हैं।

    माधवी––हाँ, एक तो मेरा भाई भीमसेन, और दूसरा मेरा सेनापति कुबेरसिंह, मगर तुम इन दोनों का कुछ भी खयाल न करो, इस समय हमें इन दोनों को मिला-जुलाकर काम ले लेना चाहिए फिर तुम जैसा कहोगी वैसा किया जायेगा।

    मायारानी––शाबाश-शाबाश! यही मालूम करने के लिए मैं तुमसे निराले में बातचीत किया चाहती थी क्योंकि ये बातें ऐसी हैं कि सिवाय मेरे और तुम्हारे किसी तीसरे का न जानना ही अच्छा है।

    माधवी––निःसन्देह ऐसा ही है, हम दोनों के दिल की बातें हवा को भी मालूम न होनी चाहिए। आज बड़ी खुशी का दिन है कि हम दोनों जो एक ही तरह का दिल रखती हैं यहाँ पर आ मिली हैं, अब हम दोनों को हमेशा मेल-मिलाप रखने और समय पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करने के लिए कसम खाकर मजबूत हो जाना चाहिए।

    पाठक, मायारानी और माधवी दोनों ही अपना मतलब देख रही हैं। दोनों ही धूर्त, दोनों ही खुदगरज, और दोनों विश्वासघातिनी हैं। इस समय कुछ देर तक दोनों में घुल-घुलकर बातें होती रहीं, वादे भी हुए और कसमें भी खाई गईं। इसके बाद फिर भीमसेन और कुबेरसिंह बुलाए गए तथा लीला भी आ गई और आपस में बातें होने लगीं।

    भीमसेन––अच्छा तो अब क्या निश्चय किया जाता है? राजा गोपालसिंह की चिट्ठी लेकर जमानिया कौन जायेगा और क्या होगा?

    मायारानी––पहले तुम अपनी राय दो।

    भीमसेन––मेरी राय तो यह है कि लीला रामदीन की सूरत बना दीवानसाहब के पास जाये और वहाँ से उनकी फरमाइश लेकर 'पिपलिया घाटी' पहुँचे और हम लोग भी अपनी फौज लेकर वहीं मौजूद रहें। लीला को यह चाहिए कि उन दो सौ सवारों को जिन्हें जमानिया से अपने साथ लायेगी किसी वजह से पीछे टिकवा दे जिसमें गोपालसिंह के पहुँचते ही हम लोग बात-की-बात मे उन सभी को गिरफ्तार कर लें या मार डालें।

    मायारानी––मगर यह बात मुझे नापसन्द है क्योंकि एक तो उसके लिखे अनुसार फौज 'पिपलिया घाटी' तक जरूर जायेगी, अगर मान लिया जाये कि नकली रामदीन के हुक्म से फौज पीछे रह भी जाये और तुम लोग उन सभी को गिरफ्तार कर लो तो भी हमारा काम न निकल सकेगा क्योंकि राजा गोपालसिंह के पकड़े या मारे जाने की खबर दीवान को तुरन्त लग जायेगी और वह अपनी फौज को दुरुस्त करके लड़ने के लिए तैयार हो जायेगा और हम लोगों को जमानिया के अन्दर कभी घुसने न देगा। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी जमानिया ही में तिलिस्म के अन्दर हैं, वे दोनों भी लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे और उस समय हम लोग फिर लंडूरे ही रह जायेंगे, इतना बखेड़ा करने का कुछ फायदा न निकलेगा, न तो जमानिया की गद्दी मिलेगी और न गया का राज्य।

    भीमसेन––तब आप ही कहिए कि क्या करना चाहिये।

    मायारानी––(कुबेरसिंह से) इस वक्त आपके पास कितनी फौज है?

    कुबेरसिंह––पाँच सौ।

    मायारानी––(माधवी से) ऐसा करना चाहिए कि हम तुम भीमसेन और कुबेरसिंह चारों आदमी जमानिया वाले तिलिस्मी बाग के अन्दर जा घुसे और इन पाँच सौ आदमियों को इस तरह तिलिस्मी बाग के अन्दर ले चलें और छिपा रखें कि किसी को कानों-कान खबर न हो, क्योंकि उस बाग में इतने आदमियों को छिपा रखने की जगह है और वह बाग भी इस लायक है कि अगर मैं उसके अन्दर मौजूद रहूँ तो चाहे कैसा ही‌ जबरदस्त दुश्मन हो और चाहे कितनी ही ज्यादा फौज लेकर क्यों न चढ़ आवे मगर बाग के अन्दर किसी की नजर तक पहुँचने न दूँ।

    माधवी––बेशक वह ऐसा ही सुनने आया है और तुम तो वहाँ की रानी ही ठहरी तथा तुम्हें वहाँ के सब भेद मालूम हैं, अच्छा तब?

    मायारानी––जब किशोरी और कमलिनी इत्यादि को लेकर गोपालसिंह जमानिया जायेगा तो निःसन्देह सबको लिए उसी बाग में पहुँचेगा। बस उस समय हम लोग जो छिपे हुए रहेंगे, निकल आवेंगे और बात-की-बात में सभी को मार लेंगे। ऐसा से जमानिया में दखल भी बना रहेगा और इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह भी कब्जे में आ जायेंगे।

    माधवी––(खुश होकर) बात तो बहुत ठीक है, मगर हम लोग इतने आदमियों को लेकर चुपचाप उस बाग के अन्दर किस तरह पहुँच सकते हैं?

    मायारानी––इसका बन्दोबस्त इस तरह हो सकता है कि हम तुम भीमसेन और कुबेरसिंह एक साथ ही भेष बदलकर लीला के साथ जमानिया जायें और लीला दीवान साहब से कहे कि गोपालसिंह ने इन सभी अर्थात् हम लोगों को खास बाग के अन्दर पहुँचा देने का हुक्म दिया है। बस इतना कहकर हम लोगों को उस बाग के अन्दर पहुँचा दे क्योंकि दीवान इस नकली रामदीन की बात अँगूठी की बरकत से टाल न सकेगा और रामदीन पहले भी उस बाग के अन्दर आता-जाता था यह बात दीवान जानता है। जब हम लोग उस बाग के अन्दर जा पहुँचेंगे तो एक गुप्त रास्ते से कुल फौज को बाग के अन्दर ले लेंगे। इन फौजी सिपाहियों को उस सुरंग के मुहाने का पता बता दिया जायेगा जिसकी राह से हम सभी को खास बाग के अन्दर पहुँचावेंगे।

    माधवी––यह बात तो तुमने बहुत ही अच्छी सोची! भीमसेन––इससे बढ़कर और कोई तरकीब फतेह पाने के लिए हो ही नहीं सकती!

    कुबेरसिंह––और ऐसा करने में कोई टण्टा भी नहीं है।

    लीला––बस, अब इसी राय को पक्की रखिए।

    इसके बाद फिर सभी में बातचीत और राय होती रही यहाँ तक कि सवेरा हो या। मायारानी, माधवी, भीमसेन और कुबेरसिंह ने सूरतें बदल ली और लीला भी रामदीन बन बैठी। भीमसेन के चारों ऐयारों को सुरंग का पता-ठिकाना अच्छी तरह बता दिया गया और कह दिया गया कि उसी ठिकाने सुरंग के मुहाने पर फौजी सिपाहियों को लेकर इन्तजार करना, इसके बाद मायारानी, माधवी, भीमसेन, कुबेरसिंह और लीला ने घोड़ों पर सवार होकर जमानिया का रास्ता लिया।

    6

    दिन दो पहर से कुछ ज्यादा ढल चुका था जब जमानिया में दीवान साहब को रामदीन के आने की इत्तिला मिली। दीवान साहब ने रामदीन को अपने पास बुलाया और उसने दीवान साहब के सामने पहुँचकर गोपालसिंह की चिट्ठी उनके हाथ में दी तथा जब वे चिट्ठी पढ़ चुके तो अँगूठी भी दिखाई। दीवान साहब ने नकली रामदीन से कहा, "महाराज का हुक्म हम लोगों के सिर आँखों पर, तुम अँगूठी को पहन लो और हम लोगों को अपने हुक्म का पाबन्द समझो! सवारी और सवारों का इन्तजाम दो घड़ी के अन्दर हो जायेगा। तुम यहां रहोगे या सवारों के साथ जाओगे?" रामदीन ने कहा, "मैं सवारों के साथ ही राजा साहब के पास जाऊँगा मगर इस समय चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुँचाकर उनके खाने-पीने का इन्तजाम कर देना है जैसा कि हमारे राजा साहब का हुक्म है।"

    दीवान––(ताज्जुब से) खास बाग के अन्दर?

    रामदीन––जी, हाँ।

    दीवान–और वे चारों आदमी हैं कहाँ पर?

    रामदीन––उन्हें मैं बाहर छोड़ आया हूँ।

    दीवान––(कुछ सोचकर) खैर, जो कुछ राजा साहब ने हुक्म दिया हो या जो तुम्हारे जी में आवे वह करो। अब हम लोगों को तो रोकने-टोकने का अधिकार ही नहीं रहा।

    रामदीन सलाम करके उठ खड़ा हुआ और अपने चारों साथियों को लेकर तिलिस्मी बाग के अन्दर चला गया जहाँ इस समय बिल्कुल ही सन्नाटा था। अँगूठी के खयाल से उसे किसी ने भी नहीं रोका और मायारानी बे-खटके अपने ठिकाने पहुच गई तथा लुकने-छिपने और दरवाजों को बन्द करने लगी। अब हम रामदीन के साथ राजा गोपालसिंह की तरफ रवाना होते हैं और देखते हैं कि बनी-बनाई बात किस तरह चौपट होती है।

    संध्या होने से पहले खाने-पीने का सामान, चार रथ और दो सौ सवारों को लेकर नकली रामदीन पिपलिया घाटी की तरफ रवाना हुआ और दूसरे दिन दोपहर के बाद वहाँ पहुँचा।

    आज ही संध्या होने के पहले राजा गोपालसिंह यहाँ पहुँचने वाले थे यह बात रामदीन की जुबानी सभी को मालूम हो चुकी थी और सभी आदमी उनके आने का इन्तजार कर रहे थे।

    संध्या हो गई, चिराग जल गया, पहर रात गई, दोपहर रात गुजरी, आखिर तमाम रात बीत गई, मगर राजा गोपालसिंह नहीं आये, इसलिए नकली रामदीन के ताज्जुब का तो कहना ही क्या? उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं, मगर इसके अतिरिक्त जितने फौजी सवार तथा अन्य लोग साथ आये थे उन सबको भी बहुत ताज्जुब हुआ और वे घड़ी-घड़ी राजा साहब के न आने का सबब उससे पूछने लगे, मगर रामदीन क्या जवाब देता? उसे इन बातों की खबर क्या थी!

    दूसरे दिन संध्या के समय राजा गोपालसिंह घोड़े पर सवार वहाँ आ पहुँचे मगर अकेले थे, साईस तक साथ न था। सिपाहियाना ठाठ से बेशकीमत कपड़ों के ऊपर तिलिस्मी कवच खंजर और ढाल-तलवार लगाये बहुत ही सुन्दर तथा रोआबदार मालूम होते थे। सभी ने झुककर सलाम किया और नकली रामदीन ने आगे बढ़कर घोड़े की लगाम थाम ली तथा उसकी गर्दन पर चार थपकी देकर कहा, "आश्चर्य है कि आपके आने में पूरे आठ पहर की देर हो गई है और फिर भी अकेले ही हैं!"

    यह सुनकर राजा साहब ने कई पल तक रामदीन का मुँह देखा और तब कहा, "हाँ, किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह ने हमारे साथ आने से इनकार किया इसलिये हम अकेले ही आये हैं और हमारे जाने में रात भर की देर है। इस समय हम किसी काम को जाते हैं सवेरे यहाँ आयेंगे, तब तक तुम सभी को इस घाटी में टिके रहना होगा!"

    रामदीन––घोड़ों का दाना तो सिर्फ एक ही दिन का आया था, और सवार लोग भी …

    गोपालसिंह––खैर, क्या हर्ज है, घोड़े चराई पर गुजर कर लेंगे और सवार लोग रात भर फाका करेंगे।

  • चन्द्रकांता सन्तति 4

    चन्द्रकांता सन्तति 4

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    सिपाही–मालूम नहीं हुजूर, अभी तो इसी जगह पर टहल रहे थे।

    शिवदत्त–देखो कहाँ है, जल्द बुलाओ।

    हुक्म पाकर वे सब चले गए और थोड़ी ही देर में वापस आकर बोले, "हुजूर, करीब में तो कहीं पता नहीं लगता।"

    शिवदत्त–बड़े आश्चर्य की बात है। उसे दूर जाने की आज्ञा किसने दी ?

    इतने ही में हांफत-काँपता धन्नूसिंह भी आ मौजूद हुआ जिसे देखते ही शिवदत्त ने पूछा, "तुम कहाँ चले गये थे !"

    धन्नूसिंह–महाराज, कुछ न पूछिये, मैं तो बड़ी आफत में फंस गया था !

    शिवदत्त–सो क्या ? और तुम बदहवास क्यों हो रहे हो ?

    च० स०-4-4

    धन्नूसिंह–मैं इसी जगह पर घूम-घूम कर पहरा दे रहा था कि एक लड़के ने

    जिसे मैंने आज के सिवाय पहले कभी देखा न था आकर कहा, “एक औरत तुमसे कुछ कहना चाहती है.।" यह सुन कर मुझे ताज्जुब हुआ और मैंने उससे पूछा, "वह औरत कौन है, कहाँ है और मुझ से क्या कहना चाहती है ?" इसके जवाब में लड़का बोला, "सो सब मैं कुछ नहीं जानता, तुम खुद चलो और जो कुछ वह कहती है सुन लो, इसी जगह पास ही में तो है।" इतना सुन कर ताज्जुब करता हुआ मैं उस लड़के के साथ चला और थोड़ी ही दूर पर एक औरत को देखा। (काँप कर) क्या कहूँ, ऐसा दृश्य तो आज तक मैंने देखा ही न था।

    शिवदत्त–अच्छा-अच्छा कहो, वह औरत कैसी और किस उम्र की थी ?

    धन्नूसिंह–कृपानिधान, वह बड़ी भयानक औरत थी। काला रंग, बड़ी-बड़ी लाल आँखें, और हाथ में लोहे का एक डंडा लिये हुए थी जिसमें बड़े-बड़े काँटे लगे थे और उसके चारों तरफ बड़े-बड़े और भयानक शक्ल के कुत्ते मौजूद थे जो मुझे देखते ही गुर्राने लगे। उस औरत ने कुत्तों को डाँटा जिससे वे चुप हो रहे, मगर चारों तरफ से मुझे घेर कर खड़े हो गये। डर के मारे मेरी अजब हालत हो गई। उस औरत ने मुझसे कहा, "आपने हाथ की तलवार म्यान में कर ले नहीं तो ये कुत्ते तुझे फाड़ खायेंगे।" इतना सुनते ही मैंने तलवार म्यान में कर ली और इसके साथ ही वे कुत्ते मुझसे कुछ दूर हट कर खड़े हो गए। (लम्बी सांस लेकर)ओफ-ओह ! इतने भयानक और बड़े कुत्ते मैंने आज तक नहीं देखे थे !

    शिवदत्त–(आश्चर्य और भय से) अच्छा-अच्छा, आगे चलो, तब क्या हुआ ?

    धन्नूसिंह-मैंने डरते-डरते उस औरत से पूछा-"आपने मुझे क्यों बुलाया ?" उस औरत ने कहा, "मैं अपनी बहिन मनोरमा से मिलना चाहती हूँ उसे बहुत जल्द मेरे पास ले आ!"

    शिवदत्त—(आश्चर्य से) अपनी बहिन मनोरमा से !

    धन्नूसिंह–जी हाँ। मुझे यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि मुझे स्वप्न में भी इस बात का गुमान न हो सकता था कि मनोरमा की बहिन ऐसी भयानक राक्षसी होगी ! और महाराज, उसने आपको और कुंअर साहब को अपने पास बुलाने के लिए कहा।

    कल्याणसिंह–(चौंक कर) मुझे और महाराज को?

    धन्नूसिंह–जी हाँ।

    शिवदत्त–अच्छा, तब क्या हुआ

    धन्नूसिंह–मैंने कहा कि तुम्हारा सन्देशा मनोरमा को अवश्य दे दंगा, मगर महाराज और कुंअर साहब तुम्हारे कहने से यहाँ नहीं आ सकते।

    कल्याणसिंह–तब उसने क्या कहा ?

    धन्नूसिंह–बस, मेरा जवाब सुनते वह बिगड़ गई और डॉट कर बोली, "ओ कम्बख्त ! खबरदार ! जो मैं कहती हूँ वह तुझे और तेरे महाराज को करना ही होगा!" (कांप कर) महाराज, उसके डाँटने के साथ ही एक कुत्ता उछल कर मुझ पर चढ़ बैठा। अगर वह औरत अपने कुत्ते को न डाँटती और न रोकती तो बस मैं आज ही समाप्त हो चुका था ! (गर्दन और पीठ के कपड़े दिखाकर) देखिए मेरे तमाम कपड़े उस कुत्ते के बड़े-बड़े नाखूनों की बदौलत फट गए और बदन भी छिल गया, देखिये, यह मेरे ही खून से मेरे कपड़े तर हो गये हैं।

    शिवदत्त–(भय और घबराहट से)ओफ-ओह धन्नूसिंह, तुम तो जख्मी हो गये! तुम्हारे पीठ पर के कपड़े सब लहू से तर हो रहे हैं!

    धन्नूसिंह–जी हां महाराज, बस आज मैं काल के मुंह से निकलकर आया हूँ, मगर अभी तक मुझे इस बात का विश्वास नहीं होता कि मेरी जान बचेगी।

    कल्याणसिंह–सो क्यों?

    धन्नूसिंह–जवाब देने के लिए लौट कर मुझे फिर उसके पास जाना होगा।

    कल्याणसिंह–सो क्यों ? अगर न जाओ तो क्या हो? क्या हमारी फौज में भी आकर वह उत्पात मचा सकती है?

    इतने ही में दो-तीन भयानक कुत्तों के भौंकने की आवाज थोड़ी ही दूर पर से आई जिसे सुनते ही धन्नूसिंह थर-थर कांपने लगा। शिवदत्त तथा कल्याणसिंह भी डर कर उठ खड़े हुए और कांपते हुए उस तरफ देखने लगे। उसी समय बदहवास और घबराई हुई मनोरमा भी वहां आ पहुंची और बोली, "अभी मैंने भूतनाथ की सूरत देखी है, वह बेखौफ मेरी पालकी के पास आकर कह गया है कि आज तुम लोगों की जान लिये बिना मैं नहीं रह सकता ! अब क्या होगा? उसका बेखौफ यहां चले तक आना मामूली बात नहीं है !" धन्नूसिंह की बातों ने शिवदत्त और कल्याणसिंह को ऐसा बदहवास कर दिया कि उन्हें बात करना मुश्किल हो गया। शिवदत्त सोच रहा था कि कुछ देर की सच्ची मोहलत मिले तो मनोरमा से उसकी बहिन का हाल पूछे, मगर उसी समय घबराई हुई मनोरमा खुद ही वहाँ आ पहुंची और उसने जो कुछ कहा वह और भी परेशान करने वाली बात थी। आखिर शिवदत्त ने मनोरमा से पूछा, "क्या तुमने अपनी आँखों से भूतनाथ को देखा?"

    मनोरमा हाँ,–मैंने स्वयं देखा और उसने वह बात मुझी से कही थी जो मैं आप से कह चुकी हूँ?

    शिवदत्त–क्या वह तुम्हारी पालकी के पास आया था?

    मनोरमा–हाँ, मैं माधवी से बातें कर रही थी कि वह निडर होकर हम लोगों के पास आ पहुँचा और धमका कर चला गया।

    शिवदत्त–-तो तुमने आदमियों को ललकारा क्यों नहीं?

    मनोरमा–आप भूतनाथ को नहीं जानते कि वह कैसा भयानक आदमी है ? क्या वे तीन-चार आदमी भूतनाथ को गिरफ्तार कर लेते जो मेरी पालकी के पास थे?

    शिवदत्त–ठीक है, वह बड़ा ही भयानक ऐयार है, दो-चार क्या, दस-पाँच आदमी भी उसे गिरफ्तार नहीं कर सकते। मैं तो उसके नाम से कांप जाता हूँ। ओफ, वह समय मुझे कदापि नहीं भूल सकता जब उसने 'रूहा' बनकर मुझे अपने चंगुल में फंसा लिया था, अपने चेले को भीमसेन की सूरत में ऐसा बनाया कि मैं भी पहचान ही न सका। मगर बड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज वह असली सूरत में तुम्हें दिखाई पड़ा। उसका इस तरह चले आना मामूली बात नहीं है।

    मनोरमा–जितना मैं उसका हाल जानती हूँ आप उसका सोलहवां हिस्सा भी

    1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, छठवां भाग, दूसरा बयान। न जानते होंगे, और यही सबब है कि इस समय डर के मारे मेरा कलेजा काँप रहा है, फिर जहाँ तक मैं खयाल करती हूँ वह अकेला भी नहीं है।

    शिवदत्त–नहीं-नहीं, वह अकेला कदापि न होगा। (धन्नूसिंह की तरफ इशारा करके) इसने भी एक ऐसी ही भयानक खबर मुझे सुनाई है।

    मनोरमा–(ताज्जुब से) वह क्या?

    शिवदत्त–इसका हाल धन्नूसिंह की जुबानी ही सुनना ठीक होगा। (धन्नूतिह से) हाँ, तुम जरा उन बातों को दोहरा तो जाओ!

    धन्नूसिंह–बहुत खूब।

    इतना कहकर धन्नूसिंह उन वातों को ऐसे ढंग से दोहरा गया कि मनोरमा का कलेजा कांप उठा और शिवदत्त तथा कल्याणसिंह पर पहले से भी ज्यादा असर पड़ा।

    शिवदत्त–(मनोरमा से) क्या वास्तव में वह तुम्हारी बहिन है?

    मनोरमा–राम-राम, ऐसी भयानक राक्षसी मेरी बहिन हो सकती है? असल वात तो यह है कि मैं अकेली हूँ, मेरी न कोई बहिन है, न भाई।

    धन्नूसिंह–तब जरा खड़े-खड़े उसके पास चली चलो और जो कुछ वह पूछे, उसका जवाब दे दो।

    मनोरमा–(रंज होकर) मैं क्यों उसके पास जाने लगी ! जाकर कह दो कि मनोरमा नहीं आती।

    धन्नूसिंह–(खैरखाही दिखाने के ढंग से) मालूम होता है कि तुम अपने साथ ही साथ हमारे मालिक पर भी आफत लाना चाहती हो। (शिवदत्त से) महाराज, राक्षसी ने जितनी बातें मुझसे कहीं मैं अदब के खयाल से अर्ज नहीं कर सकता, तथापि एक बात केवल आप ही से कहने की इच्छा है।

    धन्नूसिंह की बात सुनकर मनोरमा को डर के साथ ही साथ क्रोध भी चढ़ आया और वह कड़ी निगाह से धन्नू सिंह की तरफ देखकर बोली, "महाराज के खैरखाह एक तुम्हीं तो दिखाई देते हो ! इतनी बड़ी फौज की अफसरी करने के लिए क्यों मरे जाते हो जो एक औरत के सामने जाने की हिम्मत नहीं है?"

    धन्नूसिंह–मेरी हिम्मत तो लाखों आदमियों के बीच घुसकर तलवार चलाने की है, मगर केवल तुम्हारे सबब से अपने मालिक पर आफत लाने और अपनी जान देने का हौसला कोई बेवकूफ आदमी भी नहीं कर सकता। (शिवदत्त से)तिस पर भी महाराज जो। आज्ञा दें उसे करने के लिए मैं तैयार हूँ। यदि आग में कूद पड़ने के लिए भी कहें तो क्षण- भर देर लगाने पर लानत भेजता हूँ, परन्तु मेरी बात सुनकर तब जो चाहें आज्ञा दें !

    इतना सुनकर शिवदत्त उठ खड़ा हुआ और धन्नू सिंह को अपने पीछे आने का इशारा करके दूर चला गया जहाँ से उनकी बातचीत कोई दूसरा नहीं सुन सकता था।

    शिवदत्त-–हाँ धन्नूसिंह, अब कहो, क्या कहते हो?

    धन्नूसिंह–महाराज क्षमा करें, रंज न हों ! मैं सरकार का नमकख्वार गुलाम हूँ इसलिए सिवाय सरकार की भलाई के मुझे और कुछ मैं यह नहीं चाहता मनोरमा के सबब से, जो आपकी कुछ भी भलाई नहीं कर सकती, बल्कि आपके सबब से अपने को फायदा पहुंचा सकती है, आप किसी आफत में फंस जायें। मैं सच कहता हूँ, कि वह भयानक औरत साधारण नहीं मालूम होती। उसने कसम खाकर कहा था कि "मैं केवल एक पहर तक राजा शिवदत्त का मुलाहिजा करूँगी, इसके अन्दर अगर मनोरमा मेरे पास न भेजी जायगी या अलग न कर दी जायगी तो राजा शिवदत को इस दुनिया से उठा दूंगी और अपने कुत्तों को जो आदमी के खून के हरदम प्यासे रहते हैं…!" बस महाराज, अब आगे कहने से अदब जबान रोकती है। (कांपकर) ओफ वे भयानक कुत्ते जो शेर का कलेजा फाड़कर खा जायें ! (रुककर) फिर मनोरमा की जुबानी भी आप सुन ही चुके हैं कि भूतनाथ यकायक यहाँ पहुँचकर मनोरमा से क्या कह गया है, इसलिए (हाथ जोड़कर) मैं अर्ज करता हूँ कि किसी भी बहाने मनोरमा को अपने से अलग कर दें। सरकार खूब समझते हैं कि जिस काम के लिए जा रहे हैं उसमें सिवाय कुंअर कल्याणसिंह के और कोई भी मदद नहीं कर सकता, फिर एक मामूली औरत के लिए अपना हर्ज या नुकसान करना उचित नहीं, आगे महाराज मालिक हैं जो चाहें करें।

    शिवदत्त–तुम्हारा कहना बहुत ठीक है, मैं भी यही सोच रहा हूँ।

    जिस जगह खड़े होकर ये दोनों बातें कर रहे थे, वहाँ एकदम निराला था, कोई आदमी पास न था। शिवदत्त ने अपनी बात पूरी भी न थी कि यकायक भूतनाथ वहाँ आ पहुँचा और कड़ाई के ढंग से शिवदत्त की तरफ देखकर बोला, "इस अँधेरे में शायद तुम मुझे न पहचान सको इसलिए मैं अपना नाम भूतनाथ बताकर तुम्हें होशियार करता हूँ कि घण्टे भर के अन्दर मेरी खूराक मनोरमा को मेरे हवाले करो या अपने साथ से अलग कर दो, नहीं तो जीता न छोड़ें गा ! इतना कहकर बिना कुछ जवाब सुने भूतनाथ वहाँ

    से चला गया और शिवदत्त उसकी तरफ देखता ही रह गया।

    शिवदत्त एक दफे भूतनाथ के हाथ में पड़ चुका था और भूतनाथ ने जो सलूक उसके साथ किया था उसे वह कदापि भूल नहीं सकता था बल्कि भूतनाथ के नाम ही से उसका कलेजा काँपता था, इसलिए वहाँ यकायक भूतनाथ के आ पहुंचने से वह कांप उठा और धन्नूसिंह की तरफ देखकर बोला, "निःसन्देह यह बड़ा ही भयानक ऐयार है !"

    धन्नूसिंह–इसीलिए मैं अर्ज करता हूँ कि एक साधारण औरत के लिए इस भयानक ऐयार और उस राक्षसी को अपना दुश्मन बना लेना उचित नहीं है।

    शिवदत्त–तुम ठीक कहते हो, अच्छा आओ मैं कल्याणसिंह से राय मिलाकर इसका बन्दोबस्त करता हूँ।

    धन्नूसिंह को साथ लिए हुए शिवदत्त अपने ठिकाने पहुंचा जहाँ कल्याणसिंह और मनोरमा को छोड़ गया था। मनोरमा को यह कहकर वहाँ से बिदा कर दिया कि–'तुम अपने ठिकाने जाकर बैठो, हम यहाँ से कूच करने का बन्दोबस्त करते हैं और निश्चय हो जाने पर तुमको बुलावेंगे' और जब वह चली गई और वहाँ केवल ये ही तीन आदमी रह गये तव बातचीत होने लगी।

    शिवदत्त ने धन्नूसिंह की जुबानी जो कुछ सुना था और धन्नूसिंह की जो कुछ राय हुई थी वह सब तथा बातचीत के समय यकायक भूतनाथ के आ पहुँचने और धमकाकर चले जाने का पूरा हाल कल्याणसिंह से कहा और पूछा कि–अब आपकी क्या राय होती है ?' कुंअर कल्याणसिंह ने कहा, "मैं धन्नूसिंह की राय पसन्द करता हूँ। मनोरमा के लिए अपने को आफत में फंसाना बुद्धिमानी का काम नहीं है, अस्तु किसी मुनासिब ढंग से उसे अलग ही कर देना चाहिए।"

    शिवदत्त–तिस पर भी अगर जान बचे तो समझें कि ईश्वर की बड़ी कृपा हुई।

    कल्याणसिंह–सो क्या?

    शिवदत्त–मैं यह सोच रहा हूँ कि भूतनाथ का यहां आना केवल मनोरमा ही के लिए नहीं है। ताज्जुब नहीं कि हम लोगों का कुछ भेद भी उसे मालूम हो और वह हमारे काम में बाधा डाले।

    कल्याणसिंह–ठीक है, मगर काम आधा हो चुका है, केवल हमारे और आपके वहां पहुंचने भर की देर है। यदि भूतनाथ हम लोगों का पीछा भी करेगा तो रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर हमारी मर्जी के बिना वह कदापि नहीं जा सकता और जब तक वह मनोरमा को ले जाकर कहीं रखने या अपना कोई काम निकालने का बन्दोबस्त करेगा तब तक तो हम लोग रोहतासगढ़ में पहुँचकर जो कुछ करना है, कर गुजरेंगे।

    शिवदत्त–ईश्वर करे ऐसा ही हो, अच्छा अब यह कहिये कि मनोरमा को किस ढंग से अलग करना चाहिए?

    कल्याणसिंह–(धन्नूसिंह से) तुम बहुत पुराने और तजुर्बेकार आदमी हो, तुम ही बताओ कि क्या करना चाहिए?

    धन्नूसिंह–-मेरी तो यही राय है कि मनोरमा को बुलाकर समझा दिया जाय कि 'अगर तुम हमारे साथ रहोगी तो भूतनाथ तुम्हें कदापि न छोड़ेगा, सो तुम मर्दानी पोशाक पहनकर धन्नूसिंह के (हमारे) साथ शिवदत्तगढ़ की तरफ चली जाओ, वह तुम्हें हिफाजत के साथ वहाँ पहुँचा देगा, जब हम लौटकर तुमसे मिलेंगे तो जैसा होगा, किया जायेगा। अगर तुम अपने आदमियों को साथ ले जाना चाहोगी तो भूतनाथ को मालूम हो जायेगा अतएव तुम्हारा अकेला ही यहाँ से निकल जाना उत्तम है।"

    शिवदत्त–ठीक है लेकिन अगर इस बात को मंजूर कर ले तो क्या तुम भी उसी के साथ जाओगे ? तब तो हमारा बड़ा हर्ज होगा!

    धन्नू–जी नहीं, मैं चार-पांच कोस तंक उसके साथ चला जाऊंगा, इसके बाद भुलावा देकर उसे छोड़ आपसे आ मिलूंगा।

    शिवदत्त–(आश्चर्य से)धन्नूसिंह, क्या तुम्हारी अक्ल में कुछ फर्क पड़ गया है या तुम्हें निसयान (भूल जाने) की बीमारी हो गई है अथवा तुम कोई दूसरे धन्नूसिंह हो गए हो? क्या तुम नहीं जानते कि मनोरमा ने मुझे किस तरह से रुपये की मदद की है और उसके पास कितनी दौलत है ? तुम्हारी मार्फत मनोरमा से कितने ही रुपये मँगवाये थे ? तो क्या इस हीरे की चिड़िया को मैं छोड़ सकता हूँ ? अगर मुझे ऐसा ही करना होता तो तरदुद की जरूरत ही क्या थी, इसी समय कह देते कि हमारे यहाँ से निकल जा!

    धन्नूसिंह–(कुछ सोचकर) आपका कहना ठीक है, मैं इन बातों को भूल नहीं गया, मैं खूब जानता हूँ कि वह बेइन्तहा खजाने की चाभी है, मगर मैंने यह बात इसलिए कही कि जब उसके सबब से हमारे सरकार ही आफत में फंस जायेंगे, तो वह हीरे की चिड़िया किसके काम आवेगी !

    शिवदत्त–नही-नहीं, तुम इसके सिवाय कोई और तरकीब ऐसी सोचो जिसमें मनोरमा इस समय हमारे साथ से अलग तो जरूर हो जाये, मगर हमारी मुट्ठी से न निकल जाये।

    धन्नूसिंह–(सोचकर) अच्छा, तो एक काम किया जाये।

    शिवदत्त–वह क्या?

    धन्नूसिंह–इसे तो आप निश्चय जानिये कि यदि मनोरमा इस लश्कर से साथ रहेगी तो भूतनाथ के हाथ से कदापि न बचेगी और जैसा कि भूतनाथ कह चुका है वह सरकार के साथ भी बेअदबी जरूर करेगा, इसलिए यह तो अवश्य है कि उसे अलग जरूर किया जाये मगर वह रहे अपने कब्जे ही में। तो बेहतर होगा कि वह मेरे साथ की जाये, मैं जंगल-ही-जंगल एक गुप्त पगडण्डी से जिसे मैं बखूबी जानता हूं रोहतासगढ़ तक उसे ले जाऊँ और जहाँ आप या कुंअर साहब आज्ञा दें ठहरकर राह देखू। भूतनाथ को जब मालूम हो जायेगा कि मनोरमा अलग कर दी गई तब वह उसके खोजने की धुन में लगेगा, मगर मुझे नहीं पा सकता। हाँ, एक बात और है, आप भी यहाँ से शीघ्र ही डेरा उठायें और मनोरमा की पालकी इसी जगह छोड़ दें, जिससे मनोरमा को अलग कर देने का विश्वास भूतनाथ को पूरा-पूरा हो जाये।

    कल्याण–हाँ, यह राय बहुत अच्छी है, मैं इसे पसन्द करता हूं।

    शिवदत्त–मुझे भी पसन्द है, मगर धन्नूसिंह को टिककर राह देखने का ठिकाना बताना आप ही का काम है।

    कल्याण–हाँ-हाँ, मैं बताता हूँ, सुनो धन्नूसिंह !

    धन्नूसिंह–जी सरकार !

    कल्याण–रोहतासगढ़ पहाड़ी के पूरब की तरफ एक बहुत बड़ा कुआँ है और उस पर एक टूटी-फूटी इमारत भी है।

    धन्नू सिंह–जी हाँ, मुझे मालूम है!

    कल्याण–अच्छा तो अगर तुम उस कुएँ पर खड़े होकर पहाड़ की तरफ देखोगे तो टीले का ढंग का एक खण्ड पर्वत दिखाई देगा, जिसके ऊपर सूखा हुआ पुराना पीपल का पेड़ है और उसी पेड़ के नीचे एक खोह का मुहाना है। उसी जगह तुम हम लोगों का इन्तजार करना क्योंकि उसी खोह की राह से हम लोग रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर घुसेंगे, मगर उस झील तक पहुंचने का रास्ता जब तक हम न बतावें, तुम वहां नहीं जा सकते। (शिवदत्त से) आप मनोरमा को बुलवाकर सब हाल कहिये। अगर वह मंजूर करे तो हम धन्नूसिंह को रास्ते का हाल समझा दें।

    शिवदत्त–(धन्नूसिंह से) तुम ही जाकर उसे बुला लाओ।

    "बहुत अच्छा" कहकर धन्नू सिंह चला गया और थोड़ी ही देर में मनोरमा को साथ लिये हुआ आ पहुँचा। उसके विषय में जो कुछ राय हो चुकी थी, उसे कल्याणसिंह ने ऐसे ढंग से मनोरमा को समझाया कि उसने कबूल कर लिया और धन्नूसिंह के साथ चले जाना ही अच्छा समझा। कुंअर कल्याणसिंह ने उस ठीले तक पहुँचने का रास्ता धन्नूसिंह को अच्छी तरह समझा दिया। दो घोड़े चुपचुपाते ही तैयार किये गये, मनोरमा ने मर्दानी पोशाक पालकी के अन्दर बैठकर पहनी और घोड़े पर सवार हो धन्नूसिंह से साथ रवाना हो गई। धन्नूसिंह की सवारी का घोड़ा बनिस्बत मनोरमा के घोड़े से तेज और ताकत- वर था।

    2

    मनोरमा और धन्नूसिंह घोड़ों पर सवार होकर तेजी के साथ वहाँ से रवाना हुए और चार कोस तक बिना कुछ बातचीत किए चले आए। जब ये दोनों एक ऐसे मैदान में पहुंचे जहां बीचोंबीच में एक बहुत बड़ा आम का पेड़ और उसके चारों तरफ आधा कोस का मैदान साफ था यहाँ तक कि सरपत, जंगली बेर या पलास का भी कोई पेड़ न था जिसका होना जंगल या जंगल के आसपास आवश्यक समझा जाता है, तब धन्नू सिंह ने अपने घोड़े का मुंह उसी आम के पेड़ की तरफ यह कहके फेरा–'मेरे पेट में कुछ दर्द हो रहा है इसलिए थोड़ी देर तक इस पेड़ के नीचे ठहरने की इच्छा होती है।"

    मनोरमा–ठहर तो जाओ, मगर खौफ है कि कहीं भूतनाथ न आ पहुँचे।

    धन्नूसिंह–अब भूतनाथ के आने की आशा छोड़ो क्योंकि जिस राह से हम लोग आये हैं वह भूतनाथ को कदापि मालूम न होगी। मगर मनोरमा, तुम तो भूतनाथ से इतना डरती हो कि'

    मनोरमा–(बात काटकर) भूतनाथ निःसन्देह ऐसा ही भयानक ऐयार है। पर थोड़े ही दिन की बात है कि जिस तरह आज मैं भूतनाथ से डरती हूँ उससे ज्यादा भूतनाथ मुझसे डरता था।

    धन्नूसिंह–हाँ, जब तक उसके कागजात तुम्हारे या नागर के कब्जे में थे !

    मनोरमा–(चौंककर, ताज्जुब से) क्या यह हाल तुमको मालूम है?

    धन्नूसिंह–हाँ, बहुत अच्छी तरह।

    मनोरमा–सो कैसे?

    इतने ही में वे दोनों उस पेड़ के नीचे पहुँच गये और धन्नूसिंह यह कहकर घोड़े से नीचे उतर गया कि 'अब जरा बैठ जायें तो कहें।'

    मनोरमा भी घोड़े से नीचे उतर पड़ी। दोनों घोड़े लम्बी बागडोर के सहारे पेड़ के साथ बांध दिए और जीनपोश बिछाकर दोनों आदमी जमीन पर बैठ गये। रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी और चन्द्रमा की विमल चांदनी, जिसका थोड़ी ही देर पहले कहीं नाम-निशान भी न था, बड़ी खूबी के साथ चारों तरफ फैल रही थी।

    मनोरमा हाँ, अब बताओ कि भूतनाथ के कागजात का हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ ?

    धन्नूसिंह–मैंने भूतनाथ की ही जुबानी सुना था। मनोरमा–हैं ! क्या तुमसे और भूतनाथ से जान-पहचान है ?

    धन्नूसिंह–बहुत अच्छी तरह।

    मनोरमा–तो भूतनाथ ने तुमसे यह भी कहा होगा कि उसने अपने कागजात नागर के हाथ से कैसे पाये!

    धन्नूसिंह–हाँ, भूतनाथ ने मुझसे वह किस्सा भी बयान किया था, क्या तुमको वह हाल मालूम नहीं हुआ?

    मनोरमा–-मुझे वह हाल कैसे मालूम होता ? मैं तो मुद्दत तक कमलिनी के कैदखाने में सड़ती रही और जब वहाँ से छूटी तो दूसरे ही फेर में पड़ गई। मगर तुम जब वह सब हाल जानते ही हो तो फिर जान-बूझकर ऐसा सवाल क्यों करते हो?

    धन्नूसिंह–ओफ, पेट का दर्द ज्यादा होता जा रहा है ! जरा देर ठहरो तो मैं तुम्हारी बातों का जवाब दूं।

    इतना कहकर धन्नूसिंह चुप हो गया और घण्टे भर से ज्यादा देर तक बातों का सिलसिला बन्द रहा। धन्नूसिंह यद्यपि इतनी देर तक चुप रहा मगर बैठा ही रहा और मनोरमा की तरफ से इस तरह होशियार और चौकन्ना रहा जैसे किसी दुश्मन की तरफ से होना वाजिब था। साथ ही इसके धन्नूसिंह की निगाह मैदान की तरफ भी इस ढंग से पड़ती रही जैसे किसी के आने की उम्मीद हो। मनोरमा उसके इस ढंग पर आश्चर्य कर रही थी। यकायक उस मैदान में दो आदमी बड़ी तेजी के साथ दौड़ते हुए उसी तरफ आते दिखाई पड़े जिधर मनोरमा और धन्नूसिंह का डेरा जमा हुआ।

    मनोरमा–ये दोनों कौन हैं जो इस तरफ आ रहे हैं ?

    धन्नूसिंह–यही बात मैं तुमसे पूछना चाहता था मगर जब तुमने पूछ ही लिया तो कहना पड़ा कि इन दोनों में एक तो भूतनाथ है।

    मनोरमा—क्या तुम मुझसे दिल्लगी कर रहे हो ?

    धन्नूसिंह–नहीं, कदापि नहीं।

    मनोरमा–तो फिर ऐसी बात क्यों कहते हो?

    धन्नू सिंह–इसलिए कि मैं वास्तव में धन्नूसिंह नहीं हूँ।

    मनोरमा,–(चौंककर) तब तुम कौन हो?

    धन्नूसिंह–भूतनाथ का दोस्त और इन्द्रदेव का ऐयार सरयूसिंह।

    इतना सुनते ही मनोरमा का रंग बदल गया और उसने बड़ी फुती से अपना दाहिना हाथ सरयू सिंह की तरफ बढ़ाया, मगर सरयूसिंह पहले ही से होशियार और चौकन्ना था, उसने चालाकी से मनोरमा की कलाई पकड़ ली।

    मनोरमा की उँगली में उसी तरह के जहरीले नगीने वाली अंगूठी थी, जैसी कि नागर की उँगली में थी और जिसने भूतनाथ को मजबूर कर दिया था तथा जिसका हाल इस उपन्यास के सातवें भाग में हम लिख आये हैं। उसी अंगूठी से मनोरमा ने नकली धन्नूसिंह को मारना चाहा मगर न हो सका, क्योंकि उसने मनोरमा की कलाई पकड़ ली और उसी समय भूतनाथ और सरयूसिंह का शागिर्द भी वहाँ आ पहुंचे। अब मनोरमा ने अपने को काल में मुंह में समझा और वह इतनी डरी कि जो उन ऐयारों ने कहा बेउज करने के लिए तैयार हो गई।

    भूतनाथ के हाथ से क्षमा-प्रार्थना की सहायता छूटने की आशा मनोरमा को कुछ भी न थी, इसीलिए जब तक भूतनाथ ने उससे किसी तरह का सवाल न किया वह भी कुछ न बोली और बेउज्र हाथ-पैर बंधवाकर कैदियों की तरह मजबूर हो गई। इसके बाद भूतनाथ तथा सरयू सिंह में यों बातचीत होने लगी-

    भूतनाथ–अब क्या करना होगा?

    सरयू सिंह–अब यही करना होगा कि तुम इसे अपने घोड़े पर सवार करा के घर ले जाओ और हिफाजत के साथ रखकर शीघ्र लौट जाओ।

    भूतनाथ–और उस धन्नूसिंह के बारे में क्या किया जाये जिसे आप गिरफ्तार करने के बाद बेहोश करके डाल आए हैं?

    सरयूसिंह–(कुछ सोचकर) अभी उसे अपने कब्जे ही में रखना चाहिए क्योंकि मैं धन्नूसिंह की सुरत में राजा शिवदत्त के साथ रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर जाकर इन दुष्टों की चालबाजियों को जहाँ तक हो सके, बिगाड़ना चाहता हूँ। ऐसी अवस्था में अगर वह छूट जायेगा तो केवल काम ही नहीं बिगड़ेगा, बल्कि मैं खुद आफत में फंस जाऊँगा यदि शिवदत्त के साथ रोहतासगढ़ के तहखाने में जाने का साहस करूँगा।

    इसके बाद सरयूसिंह ने भूतनाथ से वे बातें कहीं जो उससे शिवदत्त तथा कल्याण- सिंह से हुई थीं और जो हम ऊपर लिख आए हैं। उस समय मनोरमा को मालूम हुआ कि नकली धन्नूसिंह ने जिस भयानक कुत्ते वाली औरत का हाल शिवदत्त से कहा और जिसे मनोरमा की बहिन बताया था, वह सब विलकुल झूठ और बनावटी किस्सा था।

    भूतनाथ–(सरयूसिंह से)तब तो आपको दुश्मनों के साथ मिल-जुलकर रोहतास- गढ़ तहखाने के अन्दर जाने का बहुत अच्छा मौका मिला है।

    सरयूसिंह–हाँ, इसी से मैं कहता हूँ कि उस धन्नूसिंह को अभी अपने कब्जे में ही रखना चाहिए जिसे हम लोगों ने गिरफ्तार किया है।

    भूतनाथ-कोई चिन्ता नहीं, मैं लगे हाथ किसी तरह उसे भी अपने घर पहुंचा दूंगा। (शागिर्द की तरफ इशारा करके) इसे तो आप मनोरमा बनाकर अपने साथ ले जाएँगे ?

    सरयूसिंह–जरूर ले जाऊँगा और कल्याणसिंह के बताये हुए ठिकाने पर पहुँच- कर उन लोगों की राह देखूंगा।

    भूतनाथ–और मुझको क्या काम सुपुर्द किया जाता है?

    सरयूसिंह–मुझे इस बात का पता ठीक-ठीक लग चुका है कि शेरअलीखाँ आजकल रोहतासगढ़ में है और कुंअर कल्याणसिंह उससे मदद लिया चाहता है। ताज्जुब नहीं कि अपने दोस्त का लड़का समझकर शेरअलीखाँ उसकी मदद करे, और अगर ऐसा हुआ तो राजा वीरेन्द्रसिंह को बड़ा नुकसान पहुँचेगा।

    भूतनाथ–मैं आपका मतलव समझ गया, अच्छा तो इस काम से छुट्टी पाकर मैं बहुत जल्द रोहतासगढ़ पहुँचंगा और शेरअलीखाँ की हिफाजत करूँगा।(कुछ सोचकर) मगर इस बात का खौफ है कि अगर मेरा वहाँ जाना राजा वीरेन्द्रसिंह पर खुल जायेगा तो कहीं मुझे बलभद्रसिंह का बिना पता लगाये लौट आने के जुर्म में सजा तो न मिलेगी? (इतना कहकर भूतनाथ ने मनोरमा की तरफ देखा)।

    सरयूसिंह–नहीं-नहीं, ऐसा न होगा, और अगर हुआ भी तो मैं तुम्हारी मदद करूँगा।

    बलभद्रसिंह का नाम सुनकर मनोरमा जो सब बातचीत सुन रही थी चौंक पड़ी और उसके दिल में एक हौल-सा पैदा हो गया। उसने अपने को रोकना चाहा, मगर रोक न सकी और घबराकर भूतनाथ से पूछ बैठी, "बलभद्रसिंह कौन ?"

    भूतनाथ–(मनोरमा से) लक्ष्मीदेवी का बाप, जिसका पता लगाने के लिए ही हम लोगों ने तुझे गिरफ्तार किया है।

    मनोरमा–(घबराकर)मुझसे और उससे भला क्या सम्बन्ध ? मैं क्या जानूं, वह कौन है, कहाँ है और लक्ष्मी देवी किसका नाम है !

    भूतनाथ–खैर, जब समय आवेगा तो सब कुछ मालूम हो जायेगा। (हँसकर) लक्ष्मीदेवी से मिलने के लिए तो तुम लोग रोहतासगढ़ जाते ही थे, मगर बलभद्रसिंह और इन्दिरा से मिलने का बन्दोबस्त अब मैं करूँगा, घबराती काहे को हो !

    मनोरमा–(घबराहट के साथ ही बेचैनी से)इन्दिरा, कैसी इन्दिरा ?ओफ !नहीं- नहीं, मैं क्या जानूं कौन इन्दिरा ! क्या तुम लोगों से उसकी मुलाकात हो गई ?क्या उसने मेरी शिकायत की थी ! कभी नहीं, वह झूठी है, मैं तो उसे प्यार करती थी और अपनी बेटी समझती थी : मगर उसे किसी ने बहका दिया है या बहुत दिनों तक दुःख भोगने के कारण वह पागल हो गई है, या ताज्जुब नहीं कि मेरी सूरत बनाकर किसी ने उसे धोखा दिया हो। नहीं-नहीं, वह मैं न यी कोई दूसरी थी, मैं उसका भी नाम बताऊँगी। (ऊँची साँस लेकर) नहीं-नहीं, इन्दिरा नहीं, मैं तो मथुरा गई हुई थी, वह कोई दूसरी ही थी, भला मैं तेरे साथ क्यों ऐसा करने लगी थी ! ओफ ! मेरे पेट में दर्द हो रहा है, आह, आह, मैं क्या करूँ !

    मनोरमा की अजब हालत हो गई। उसका बोलना और बकना पागलों की तरह मालूम पड़ता था जिसे देख भूतनाथ और सरयूसिंह आश्चर्य करने लगे, मगर दोनों ऐयार इतना तो समझ ही गये कि दर्द का बहाना करके मनोरमा अपने असली दिली दर्द को छिपाना चाहती है जो होना कठिन है।

    सरयूसिंह–(भूतनाथ से)खैर अब इसका पाखण्ड कहाँ तक देखोगे, बस, झटपट ले जाओ और अपना काम करो। यह समय अनमोल है और इसे नष्ट न करना चाहिए। (अपने शागिर्द की तरफ इशारा करके) इसे हमारे पास छोड़ जाओ, मैं भी अपने काम की फिक्र में लगूं।

    भूतनाथ ने बेहोशी की दवा सुंघाकर मनोरमा को बेहोश किया और जिस घोड़े पर वह आई थी उसी पर उसे लाद आप भी सवार हो पूरब का रास्ता लिया। उधर सरयूसिंह अपने चेले को मनोरमा बनाने की फिक्र में लगा।

    हमने ऊपर लिखा है कि शेरअलीखाँ को बड़ी खातिरदारी और इज्जत के साथ रोहतासगढ़ में रखा गया क्योंकि उसने अपने कसूरों की माफी मांगी थी और तेजसिंह ने उसे माफी दे भी दी थी । अब हम उस रात का हाल लिखते हैं जिस रात राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और इन्द्रदेव वगैरह तहखाने के अन्दर गये थे और यकायक आ पड़ने वाली मुसीबत में गिरफ्तार हो गये थे। उन लोगों का किसी काम के लिए तहखाने के अन्दर जाना शेरअलीखाँ को मालूम था मगर उसे इन बातों से कोई मतलब न था, उसे तो सिर्फ इसकी फिक्र थी कि भूतनाथ का मुकदमा खतम हो ले तो वह अपनी राजधानी पटने की तरफ पधारे और इसीलिए वह राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ से रोका भी गया था ।

    जिस कमरे में शेरअलीखाँ का डेरा था वह बहुत लम्बा-चौड़ा और कीमती असबाब से सजा हुआ था। उसके दोनों तरफ दो कोठरियाँ थीं और बाहर दालान तथा दालान के बाद एक चौखूटा सहन था। उन दोनों कोठरियों में से जो कमरे के दोनों तरफ थों एक में तो सोने के लिए बेशकीमती मसहरी बिछी हुई थी और दूसरी कोठरी में पहनने के कपड़े तथा सजावट का सामान रहता था। इस कोठरी में एक दरवाजा और भी था जो उस मकान के पिछले हिस्से में जाने का काम देता था, मगर इस समय वह बन्द था और उसकी ताली दारोगा के पास थी। जिस कोठरी में सोने की मसहरी थी उसमें सिर्फ एक ही दरवाजा था और दरवाजे वाली दीवार को छोड़ के उसकी बाकी तीनों तरफ की दीवारें आबनूस की लकड़ी की बनी हुई थीं जिन पर बहुत चमकदार पालिश किया हुआ था । वही अवस्था उस कमरे की भी थी जिसमें शेरअलीखाँ रहता था।

    रात डेढ़ पहर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। शेरअली खाँ अपने कमरे में मोटी गद्दी पर लेटा हुआ कोई किताब पढ़ रहा था और सिरहाने की तरफ संगमरमर की छोटी-सी चौकी के ऊपर एक शमादान जल रहा था, इसके अतिरिक्त कमरे में और कोई रोशनी न थी। यकायक सोने वाली कोठरी के अन्दर से एक ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने मसहरी के साथ ठोकर खाई हो। शेरअलीखाँ चौंक पड़ा और कुछ देर तक उसी कोठरी की तरफ जिसके आगे पर्दा गिरा हुआ था देखता रहा । जब पर्दे को भी हिलते देखा तो किताब जमीन पर रखकर बैठ गया और उसी समय कल्याणसिंह को पर्दा हटा- कर बाहर निकलते देखा। शेरअलीखाँ घबराकर उठ खड़ा हुआ और बड़े गौर से उसे देखकर बोला, "हैं, क्या तुम कुंअर कल्याणसिंह हो?"

    कल्याणसिंह–(सलाम करके) जी हां।

    शेरअलीखाँ–तुम इस कमरे में कब आये और कब इस कोठरी में गये मुझे कुछ भी नहीं मालूम !

    कल्याणसिंह–मैं बाहर से इस कमरे में नहीं आया बल्कि इसी कोठरी में से आ रहा हूँ।

    शेरअलीखाँ–सो कैसे ? इस कोठरी में तो कोई दूसरा रास्ता नहीं है!

    क्योंकि चुनारगढ कल्याणसिंह–जी हाँ, एक रास्ता है जिसे शायद आप नहीं जानते, मगर पहले मैं दरवाजा बन्द कर लूं।

    इतना कहकर कल्याणसिंह दरवाजे की तरफ बढ़ गया और इस कमरे के तीनों दरवाजे बन्द करके शेरअलीखां के पास लौट आया।

    शेरअलीखाँ–-दरवाजे क्यों बन्द कर दिए ? यह क्या करते हो?

    कल्याणसिंह–जी हाँ, यदि कोई देख लेगा तो मुश्किल होगी।

    शेरअलीखाँ-तो इससे मालूम होता है कि तुम राजा वीरेन्द्र सिंह की मर्जी से नहीं छूटे, बल्कि किसी की मदद और चोरी से निकल भागे हो, में तुम्हारे कैद होने का हाल मैं अच्छी तरह जानता हूँ।

    कल्याणसिंह–जी हाँ, ऐसी ही बात है।

    शेरअलीखाँ–(बैठकर) अच्छा आओ, मेरे पास बैठ जाओ और कहो कि तुम कैसे छूटे और यहाँ क्योंकर आ पहुँचे?

    कल्याणसिंह–(बैठकर) खुलासा हाल कहने का तो इस समय मौका नहीं है। परन्तु इतना कहना जरूरी है कि अपनी मदद के लिए मुझे राजा शिवदत्त ने छुड़ाया है और अब मैं सहायता लेने के लिए आपके पास आया हूँ। यदि आप मदद देंगे तो मैं आज ही राजा वीरेन्द्रसिंह से अपने बाप का बदला ले लूंगा।

    शेरअलीखाँ–(हँस कर) यह तुम्हारी नादानी है। तुम अभी लड़के हो, ऐसे मामलों पर गौर नहीं कर सकते । राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ दुश्मनी करना अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारना है, उनसे लड़कर कोई जीत नहीं सकता और न उनके ऐयारों के सामने किसी की चालाकी ही चल सकती है।

    कल्याणसिंह–आपका यह कहना ठीक है, मगर इस समय हम लोगों ने राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयारों को हर तरह से मजबूर कर रखा है।

    शेरअलीखाँ–सो कैसे ?

    कल्याणसिंह-क्या आप नहीं जानते कि वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयार किशोरी, कामिनी इत्यादि को लेकर तहखाने के अन्दर गये हैं?

    शेरअलीखाँ–हाँ, सो तो जानते हैं, मगर इससे क्या?

    कल्याणसिंह–जिस समय वीरेन्द्रसिंह वगैरह तहखाने में गये हैं, उसके पहले ही हम लोग अपनी छोटी सेना सहित तहखाने में पहुंच चुके थे और गुप्त राह से यकायक इस किले में पहुंचकर अपना दखल जमाना चाहते थे, मगर ईश्वर ने उन लोगों को तहखाने ही में पहुँचा दिया जिससे हम लोगों को बड़ा सुभीता हुआ। शिवदत्तसिंह ने तो सेना सहित दुश्मनों को घेर लिया है और मैं एक सुरंग की राह से जिसका दूसरा मुहाना (सोने वाली कोठरी की तरफ इशारा करके) इस कोठरी में निकला है, आपके पास मदद के लिए आया हूँ, आशा है कि उधर शिवदत्तसिंह ने दुश्मनों को काबू में कर लिया होगा या मार डाला होगा और इधर मैं आपकी मदद से किले में अपना अधिकार जमा लूंगा।

    शेरअलीखाँ–(कुछ सोचकर) मैं खूब जानता हूँ कि इस तहखाने का और यहाँ के कई पेचीले रास्तों का हाल तुमसे ज्यादा जानने वाला अब और कोई नहीं है । इसलिए तुम लोगों का तहखाने में राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को मार डालना तो यद्यपि मुश्किल है। हाँ, घेर लिया हो तो ताज्जुब की बात नहीं है, मगर साथ ही इसके इस बात का भी खयाल करना चाहिए कि यद्यपि राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह इस तहखाने का हाल बखूबी नहीं जानते, परन्तु आज इन्द्रदेव उनके साथ है जिसे हम-तुम अच्छी तरह जानते हैं। क्या तुम्हें उस दिन की बात याद नहीं है जिस दिन तुम्हारे पिता ने हमारे सामने तुमसे कहा था कि यहां के तहखाने का हाल हमसे ज्यादा जानने वाला इस दुनिया में यदि कोई है तो केवल इन्द्रदेव !

    कल्याणसिंह–(ताज्जुब से) हाँ, मुझे याद है। मगर क्या इन्द्रदेव राजा वीरेन्द्र- सिंह के साथ तहखाने में गये हैं और क्या वीरेन्द्रसिंह ने उन्हें अपना दोस्त बना लिया ?

    शेरअलीखाँ–हाँ, अतः यह आशा नहीं हो सकती कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह तुम लोगों के काबू में आ जायेंगे, दूसरी बात यह है कि तुम अकेले या दो-एक मददगारों को लेकर इस किले में कर ही क्या सकते हो?

    कल्याणसिंह–मैं आपके पास अकेला नहीं आया हूँ वल्कि सौ सिपाही भी साथ लाया हूँ जिन्हें आप आज्ञा देने के साथ ही इसी कोठरी में से निकलते देख सकते हैं । क्या ऐसी हालत में जब कि मालिकों या अफसरों में से यहाँ कोई भी न हो और यहाँ रहने वाली केवल पाँच-सात सौ की फौज बेफिक्र पड़ी हो, हम और आप सौ बहादुरों को साथ लेकर कुछ नहीं कर सकते ? इन्द्रदेव का इस समय वीरेन्द्रसिंह वगैरह के साथ तहखाने में होना बेशक हमारे काम में विघ्न डाल सकता है, मगर मुझे इसकी भी विशेष चिन्ता नहीं है, क्योंकि यदि दुश्मन लोग काबू में न आवेंगे तो हर तरफ से रास्ता बन्द हो जाने के कारण तहखाने के बाहर भी न निकल सकेंगे और भूखे-प्यासे उसी में रहकर मर जायेंगे, और इधर जब आप किले में अपना दखल जमा लेंगे

    शेरअलीखाँ–(बात काटकर) ये सब बातें फिजूल की हैं, मैं जानता हूँ कि तुम अपने को बहादुर और होनहार समझते हो, मगर राजा वीरेन्द्रसिंह के प्रबल प्रताप के चमकते हुए सितारे की रोशनी को अपने हाथ की ओट लगाकर नहीं रोक सकते और न उनकी सचाई, सफाई और नेकियों को भूलकर इस किले का रहनेवाला कोई तुम्हारा साथ ही दे सकता है । बुद्धिमानों को तो जाने दो, यहाँ का एक बच्चा भी राजा वीरेन्द्रसिंह का निकल जाना पसन्द न करेगा। अहा, क्या ऐसा जबान का सच्चा, रहमदिल और नेक राजा कोई दूसरा होगा? यह राजा वीरेन्द्रसिंह ही का काम था कि उसने मेरे कसूरों को माफ ही नहीं किया बल्कि इज्जत और आबरू के साथ मुझे अपना मेहमान बनाया। मेरी रग-रग में उनके अहसान का खून भरा है, मेरा बाल-बाल उन्हें दुआ देता है, मेरे दिल में उनकी हिम्मत, मर्दानगी, इन्साफ और रहमदिली का दरिया जोश मार रहा है । ऐसे बहादुर शेरदिल राजा के साथ शेरअली कभी दगाबाजी या बेईमानी नहीं कर सकता, बल्कि ऐसे की ताबेदारी अपनी इज्जत, हुर्मत और नामवरी का वायस समझता है । तुम मेरे दोस्त के लड़के हो, मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि तुम्हारे बाप ने वीरेन्द्रसिंह के साथ दगाबाजी की ! खैर, जो कुछ हुआ सो हुआ, अब तुम तो ऐसा न करो । मैं तुम्हें पुरानी मोहब्बत और दोस्ती का वास्ता दिलाता हूँ कि तुम ऐसा मत करो। राजा वीरेन्द्रसिंह दुश्मनी करने योग्य राजा नहीं बल्कि दर्शन करने योग्य हैं ! मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारा भी कसूर माफ करा दूंगा और अगर तुमको रोहतासगढ़ की लालच है तो इसे भी तुम राजा वीरेन्द्रसिंह को दावेदारी करके ले सकते हो। वह बड़ा उदार दाता है, यह राज्य दे देना उसके सामने कोई बात नहीं है ।

    कल्याणसिंह–अफसोस ! मुझे इन शब्दों के सुनने की कदापि आशा न थी जो इस समय आपके मुंह से निकल रहे हैं। मुझे इस बात का ध्यान भी न था कि आज आपको हिम्मत और मर्दानगी से इस तरह खाली देखूगा। मैं किसी के कहने पर भी विश्वास नहीं कर सकता था कि आपकी रगों में बुजदिली का खून पाऊँगा। मुझे स्वप्न में भी विश्वास नहीं हो सकता कि आपको उसी राजा वीरे द्रसिंह की खुशामद करते पाऊँगा जिसके लड़के ने आपकी लड़की को हर तरह से बेइज्जत किया।

    शेरअलीखा–ओफ, तुम्हारी जली-कटी बातें मेरे दिल को हिलाकर मुझे बेई- मान, दगाबाज या विश्वासघाती की पदवी नहीं दिला सकतीं। उस गौहर की याद मेरे दिल की सच्ची तथा इन्साफपसन्द आँखों को फोड़कर नेकों की दुनिया में मुझको अंधा नहीं बना सकती जो बुजुर्गों की इज्जत को मिट्टी में मिला मेरी बदनामी का झण्डा बन- कर जहरीली हवा में उड़ती हुई आसमान की तरफ बढ़ती ही जाती थी, और जिसका गिरफ्तार होकर सजा पाना बल्कि इस दुनिया से उठ जाना मुझे पसन्द है। किसी नाला- यक के लिए लायक के साथ बुराई करना, किसी अधर्मी के लिए धर्मी का खून करना, किसी बेईमान के लिए ईमान का सत्यानाश करना, और किसी अविश्वासी के लिए विश्वासघात करना शेरअलीखां का काम नहीं। मैं समझता था कि तुम्हारे दिल का प्याला सच्ची बहादुरी की शराब से भरा हुआ होगा और तुम दुनिया में नामवरी पैदा कर सकोगे, इसलिए मैं तुम्हारी सिफारिश करने वाला था, मगर अब निश्चय हो गया कि तुम्हारी किस्मत का जहाज शिवदत्त के तूफान में पड़कर एक भारी पहाड़ से टक्कर खाना चाहता है । अब तुम यहाँ से चले जाओ और मुझसे किसी तरह की उम्मीद मत रखो, अगर मैं तुम्हारे बाप का दोस्त न होता और तुम मेरे दोस्त के लड़के न होते'

    कल्याणसिंह–-अफसोस, मैं आपकी इस समय यह लम्बी-चौड़ी वक्तृता नहीं सुन सकता क्योंकि समय कम है और काम बहुत करना है, बस आप इतना ही बताइये कि मैं आपसे किसी तरह की आशा रखू या नहीं ?

    शेरअलीखां–नहीं, बल्कि इस बात की भी आशा मत रखो कि तुम्हें राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ दुश्मनी करते देखकर मैं चुपचाप बैठा रहूँगा।

    कल्याणसिंह–(क्रोध में आकर) क्या आप मेरी मदद अगर न करेंगे तो चुप- चाप भी न बैठे रहेंगे?

    शेरअलीखाँ–हरगिज नहीं !

    कल्याणसिंह–तो आप मेरे साथ दुश्मनी करेंगे?

    शेरअलीखाँ–अगर ऐसा करें तो हर्ज ही क्या है ? जिसकी लोग इज्जत करते हों या जिसे दुनिया मोहब्बत की निगाह से देखती है, उसके साथ दुश्मनी करना बेशक बुरा है। मगर ऐसे के साथ बेमुरौबती करने में कुछ भी हर्ज नहीं है जिसके हृदय की आँख फूट गई हो, जिसे दुनिया में किसी तरह की इज्जत हासिल करने का शौक न हो,

    और जिसे लोग हमदर्दी की निगाह से न देखते हों । कल्याणसिंह-(दाँत पीसकर)तो फिर सबसे पहले आप ही का बन्दोबस्त करना पड़ेगा !

    इसके पहले कि कल्याणसिंह की बात का शेरअलीखाँ कुछ जवाब दे, बाहर से एक आवाज आई-"हाँ, यदि तेरे किए कुछ हो सके !"

    इस आवाज ने दोनों को चौंका दिया, मगर कल्याणसिंह ने ज्यादा देर तक राह देखना मुनासिब न जाना और उस कोठरी की तरफ बढ़कर जोर से ताली बजाई। शेर- अलीखाँ समझ गया कि कल्याणसिंह अपने साथियों को बुला रहा है, क्योंकि वह थोड़ी ही देर पहले कह चुका था कि मेरे साथ सौ सिपाही भी आए हैं जो हुक्म देने के साथ ही इस कोठरी में से मेरी ही तरह निकल सकते हैं।

    कल्याण सिंह ताली बजाता हुआ कोठरी की तरफ बढ़ा और उसका मतलब समझ कर शेरअलीखाँ ने शीघ्रता से कमरे का दरवाजा अपने मददगारों को बुलाने की नीयत से खोल दिया तथा उसी समय एक नकाबपोश को हाथ में खंजर लिए कमरे के अन्दर पैर रखते देखा । शेरअलीखाँ ने पूछा, "तुम कौन हो?" नकाबपोश ने जवाब दिया, "तुम्हारा मददगार !"

    इससे ज्यादा बातचीत करने का मौका न मिला, क्योंकि कोठरी के अन्दर से कई आदमी हाथों में नंगी तलवारें लिए हुए निकलते दिखाई दिए जिन्हें कल्याणसिंह ने अपनी मदद के लिए बुलाया था।

    4

    अब हम अपने पाठकों को कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ ले चलते हैं जिन्हें जमानिया के तिलिस्म में नहर के किनारे पत्थर की चट्टान पर बैठकर राजा गोपाल सिंह से बातचीत करते छोड़ आए हैं।

    दोनों कुमार बड़ी देर तक राजा गोपालसिंह से बातचीत करते रहे। राजा साहब ने बाहर का सब हाल दोनों भाइयों से कहा और यह भी कहा कि किशोरी और कामिनी राजी-खुशी के साथ कमलिनी के तालाब वाले मकान में जा पहुँची हैं, अब उनके लिए चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।

    किशोरी और कामिनी का शुभ समाचार सुनकर दोनों भाई बड़े प्रसन्न हुए। राजा गोपालसिंह से इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "हम चाहते हैं कि इस तिलिस्म से बाहर होकर पहले अपने माँ-बाप से मिल आवें, क्योंकि उनका दर्शन किए बहुत दिन हो गये और वे भी हमारे लिए बहुत उदास होंगे।"

    गोपालसिंह–मगर यह तो हो नहीं सकता।

    च० स०-4-5

    इन्द्रजीतसिंह–-सो क्यों?

    गोपालसिंह–जब तक आप बाहर जाने के लिए रास्ता न बना लेंगे बाहर कैसे जायेंगे और जब तक इस तिलिस्म को आप तोड़ न लेंगे, तब तक बाहर जाने का रास्ता कैसे मिलेगा?

    इन्द्रजीतसिंह–जिस रास्ते से आप यहां आये हैं या आप जायेंगे, उसी रास्ते से आपके साथ अगर हम लोग भी चले जायें तो कौन रोक सकता है ?

    गोपालसिंह–वह रास्ता केवल मेरे ही आने-जाने के लिए है। आप लोगों के लिए नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह–(हँसकर) क्योंकि आपसे हम लोग ज्यादा मोटे-ताजे हैं, दरवाजे में अँट न सकेंगे!

    गोपालसिंह–(हँसकर) आप भी बड़े मसखरे हैं । मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं जानबूझकर आपको नहीं ले जाता बल्कि यहाँ के नियमों का ध्यान करके मैंने ऐसा कहा था, आपने तो तिलिस्मी किताब में पढ़ा ही होगा।

    इन्द्रजीतसिंह–हां, हम पढ़ तो चुके हैं और उससे भी मालूम यही होता है कि हम लोग बिना तिलिस्म तोड़े बाहर नहीं जा सकते । मगर अफसोस कि इस किताब का लिखने वाला हमारे सामने मौजूद नहीं । अगर होता तो पूछते कि क्यों नहीं जा सकते ? जिस राह से राजा साहब आए उसी राह से उनके साथ जाने में क्या हर्ज है ?

    गोपालसिंह–किसी तरह का हर्ज होगा तभी तो बुजुर्गों ने ऐसा लिखा है ! कौन ठिकाना, किसी तरह की आफत आ जाए तो जीवन-भर के लिए मैं बदनाम हो जाऊँगा। अस्तु, आपको भी इसके लिए जिद न करनी चाहिए, हाँ यदि अपने उद्योग से आप बाहर जाने का रास्ता बना लें तो बेशक चले जायँ।

    इन्द्रजीत–(मुस्कुराकर) बहुत अच्छा, आप जाइए, हम अपने लिए रास्ता ढूंढ़ लेंगे।

    गोपालसिंह–(हँसकर) मेरे पीछे-पीछे चलकर ! अच्छा आइए।

    यह कहकर गोपालसिंह उठ खड़े हुए और उसी कुएं पर चले गए जिसमें पहले दफे उस वक्त कूद कर गायब हो गए थे जब बुड्ढे की सूरत बनाकर आए थे। दोनों कुमार भी मुस्कुराते हुए उनके पीछे-पीछे गए और पास पहुँचने के पहले ही उन्होंने राजा गोपालसिंह को कुएँ के अन्दर कूद पड़ते देखा। यह कुआँ यद्यपि बहुत चौड़ा था तथापि नीचे के हिस्से में सिवाय अन्धकार के और कुछ भी दिखाई न देता था। दोनों कुमार भी जल्दी से उसी कुएँ पर गए और बारी-बारी से कुछ विलम्ब करके कुएँ के अन्दर कूद पड़े।

    हम पहले आनन्दसिंह का हाल लिखते हैं जो इन्द्रजीतसिंह के बाद उस कुएँ में कूदे थे । आनन्दसिंह सोचे हुए थे कि कुएँ में कूदने के बाद अपने भाई से मिलेंगे, मगर ऐसा न हुआ । जब उनका पैर जमीन पर लगा तो उन्होंने अपने को नरम-नरम घास पर पाया जिसकी ऊँचाई या तौल का अन्दाजा नहीं कर सकते थे और उसीके सबब से उन्हें चोट की तकलीफ भी बिलकुल न उठानी पड़ी। अन्धकार के सबब से कुछ मालूम न पड़ता था इसलिए दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कुंअर आनन्दसिंह उस कुएँ में घूमने लगे। तब मालूम हुआ कि नीचे से यह कुआँ बहुत चौड़ा है और उसकी दीवार चिकनी तथा संगीन है। टटोलते और घूमते हुए एक छोटे-से बन्द दरवाजे पर इनका हाथ पड़ा, वहाँ वह ठहर गए और कुछ सोचकर आगे बढ़े । तीन-चार कदम के बाद फिर एक बन्द दरवाजा मिला, उसे भी छोड़ और आगे बढ़े। इसी तरह घूमते हुए इन्हें चार दरवाजे मिले जिनमें दो तो खुले हुए थे और दो बन्द । आनन्दसिंह ने सोचा कि बेशक इन्हीं दोनों दरवाजों में से जो खुले हुए हैं किसी एक दरवाजे में कुंअर इन्द्रजीतसिंह गए होंगे। बहुत सोचने- विचारने के बाद आनन्दसिंह ने भी एक दरवाजे के अन्दर पैर रक्खा मगर दो ही चार कदम आगे गए होंगे कि पीछे से दरवाजा बन्द होने की आवाज आई । उस समय उन्हें विश्वास हो गया कि हमने धोखा खाया, कुंअर इन्द्रजीतसिंह किसी दूसरे दरवाजे अन्दर गये होंगे और वह दरवाजा भी उनके जाने के बाद इसी तरह बन्द हो गया होगा। अफसोस करते हुए आगे की तरफ बढ़े मगर दो ही चार कदम जाने के बाद अन्धकार के सबब से जी घबड़ा गया। उन्होंने कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल उसका कब्जा दबाया जिससे बहुत तेज रोशनी हो गई और वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। कुमार ने अपने को एक कोठरी में पाया जिसमें चारों तरफ दरवाजे बने थे। उनमें एक दरवाजा तो वही था जिससे कुमार आए थे और बाकी के तीन दरवाजे बन्द थे और उनकी कुण्डियों में ताला लगा हुआ था, मगर उस दरवाजे में कोई ताला या ताले का निशान या जंजीर न थी जिससे कुमार आये थे। चारों तरफ की संगीन दीवारों में कई बड़े-बड़े सूराख थे जिनमें से हवा आती और निकल जाती थी। जिस दरवाजे से कुमार आए थे उसके पास जाकर उसे खोलना चाहा मगर किसी तरह से वह दरवाजा न खुला, तब दूसरे दरवाजे के पास आए, तिलिस्मी खंजर से उसकी जंजीर काटकर दरवाजा खोला और उसके अन्दर गए । यह कोठरी बनिस्बत पहले के तिगुनी लम्बी थी। जमीन और दीवार संगमरमर की बनी हुई थी और हवा आने-जाने के लिए दीवारों में सुराख भी थे। इस कमरे के बीचोंबीच में एक ऊँचा चबूतरा था और उस पर एक बड़ा संदूक, जो असल में बाजा था, रक्खा हुआ था । कुमार के अन्दर आते ही वह बाजा बजने लगा और उसकी सुरीली आवाज ने कुमार का दिल अपनी तरफ खींच लिया। चारों तरफ दीवारों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं जिनमें एक तस्वीर बहुत ही बड़ी और जड़ाऊ चौखटे के अन्दर थी। इस तस्वीर में किसी तरह की चमक देखकर कुमार ने अपने खंजर की रोशनी बन्द कर दी । उस समय मालूम हुआ कि यहाँ की सब तस्वीरें इस तरह चमक रही हैं कि उनके देखने के लिए किसी तरह की रोशनी की दरकार नहीं । कुमार उस बड़ी तस्वीर को गौर से देखने लगे । देखा कि जड़ाऊ सिंहासन पर एक बूढ़े महाराज बैठे हैं । उम्र अस्सी वर्ष से कम न होगी, सफेद लम्बी दाढ़ी नाभि तक लटक रही है, जड़ाऊ मुकुट माथे पर चमक रहा है, कपड़ों पर काढ़ी बेलों में मोती और जवाहरात के फूल और बेल-बूटे बने हुए हैं। सामने सोने की चौकी पर एक ग्रन्थ रक्खा हुआ है और पास ही

    1. हरएक कोठरी या कमरे में, जहाँ जहाँ ये दोनों कुमार गए थे, दीवारों में सूराख देखा, जिनसे हवा आने के लिए रास्ता था। एक सिंहासन पर मृगछाला बिछाए एक बहुत ही वृद्ध साधु महाशय बैठे हुए हैं जिनके भाव से साफ मालूम होता है कि महात्माजी ग्रन्थ का मतलब महाराज को समझा रहे हैं और महाराज बड़े गौर से सुन रहे हैं। उस तस्वीर के नीचे यह लिखा हुआ था-

    "महाराज सूर्यकान्त और उनके गुरु सोमदत्त जिन्होंने इस तिलिस्म को बनाया और इसके कई हिस्से किये । महाराज के दो लड़के थे-एक का नाम धीरसिंह, दूसरे का नाम जयदेवसिंह । जब इस हिस्से की उम्र समाप्त होने पर आवेगी, तब धीरसिंह के खानदान में गोपालसिंह और जयदेवसिंह के खानदान में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह होंगे और नाते में वे तीनों भाई होंगे। इसलिए इस तिलिस्म के दो हिस्से किये गए जिनमें से आधे का मालिक गोपालसिंह होगा और आधे के मालिक इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह होंगे, लेकिन यदि उन तीनों में मेल न होगा तो इस तिलिस्म से सिवाय हानि के किसी को भी फायदा न होगा अतएव चाहिए कि वे तीनों भाई आपस में मेल रक्खें और इस तिलिस्म से फायदा उठावें । इन तीनों के हाथ से इस तिलिस्म के कुल बारह दों में से सिर्फ तीन टूटेंगे और बाकी के नौ दों के मालिक उन्हीं के खानदान में कोई दूसरे होंगे। इसी तिलिस्म में से कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को एक ग्रन्थ प्राप्त होगा जिसकी बदौलत वे दोनों भाई चरणाद्रि (चुनारगढ़) के तिलिस्म को तोड़ेंगे।"

    इसके बाद कुछ और भी लिखा हुआ था मगर अक्षर इतने बारीक थे कि पढ़ा नहीं जाता था। यद्यपि उनके पढ़ने का शौक आनन्द सिंह को बहुत हुआ मगर लाचार : होकर रह गए। उस तस्वीर के बाईं तरफ जो तस्वीर थी उसके नीचे केवल 'धीरसिंह' लिखा हुआ था और दाहिनी तरफ वाली तस्वीर के नीचे 'जयदेवसिंह' लिखा हुआ था। उन दोनों की तस्वीरें नौजवानी के समय की थीं। उसके बाद क्रमशः और भी तस्वीरें थीं और सभी के नीचे नाम लिखा हुआ था । कुँअर आनन्दसिंह बाजे की सुरीली आवाज सुनते जाते थे और तस्वीरों को भी देखते जाते थे। जब इन तस्वीरों को देख चुके तो अन्त में राजा गोपालसिंह, अपनी और अपने भाई की तस्वीर भी देखी और इस काम में उन्हें कई घंटे लग गए।

    इस कमरे में जिस दरवाजे से कुँअर आनन्दसिंह गये थे उसी के ठीक सामने एक दरवाजा और था जो बन्द था और उसकी जंजीर में ताला लगा हुआ था । जब वे घूमते हुए उस दरवाजे के पास गए तब मालूम हुआ कि इसकी दूसरी तरफ से कोई आदमी उस दरवाजे को ठोकर दे रहा है या खोलना चाहता है। कुमार को इन्द्रजीतसिंह का खयाल हुआ और सोचने लगे कि ताज्जुब नहीं कि किसी राह से घूमते-फिरते भाई साहब यहाँ तक आ गए हों। यह खयाल उनके दिल में बैठ गया और उन्होंने तिलिस्मी खंजर से उस दरवाजे की जंजीर काट डाली। दरवाजा खुल गया और एक औरत कमरे के अन्दर आती हुई दिखाई दी जिसके हाथ में एक लालटेन थी और उसमें तीन मोम- बत्तियां जल रही थीं । यह नौजवान और हसीन औरत इस लायक थी कि अपनी सुघराई, खूबसुरती, नजाकत, सादगी और बाँकपन की बदौलत जिसका दिल चाहे मुट्ठी में कर ले । यद्यपि उसकी उम्र सत्रह-अट्ठारह वर्ष से कम न होगी मगर बुद्धिमानों और विद्वानों की बारीक निगाह जांच कर कह सकती थी कि इसने अभी तक मदनमहीप की पंचरंगी बाटिका में पैर नहीं रक्खा और इसकी रसीली कली को समीर के सत्संग से गुदगुदा कर खिल जाने का अवसर नहीं मिला, इसके सतीत्व की अनमोल गठरी पर किसी ने लालच में पड़कर मालिकाना दखल जमाने की नीयत से हाथ नहीं डाला और न इसने अपनी अनमोल अवस्था का किसी के हाथ सट्टा, ठीका या बीमा किया। इसके रूप के खजाने की चौकसी करने वाली बड़ी-बड़ी आँखों के निचले हिस्से में अभी तक ऊदी डोरी नहीं पड़ने पाई थी, और न उसकी गर्दन में स्वर-घंटिका का उभार ही दिखाई देता था। इस गोरी नायिका को देखकर कुंअर आनन्दसिंह भौचक्के से रह गए और ललचाही निगाह से इसे देखने लगे। इस औरत ने भी इन्हें एक दफे तो नजर भरकर देखा मगर साथ ही गर्दन नीची कर ली और पीछे की तरफ हटने लगी तथा धीरे-धीरे कुछ दूर जाकर किसी दीवार या दरवाजे के ओट में हो गई जिससे उस जगह फिर अँधेरा हो गया । आनन्दसिंह आश्चर्य, लालच और उत्कंठा के फेर में पड़े रहे, इसलिए खंजर की रोशनी की सहायता से दरवाजा लाँघ कर वे भी उसी तरफ गए जिधर वह नाज- नीन गई थी। अब जिस कमरे में कुंअर आनन्दसिंह ने पैर रक्खा वह बनिस्बत तस्वीरों वाले कमरे के कुछ बड़ा था और उसके दूसरे सिरे पर भी वैसा ही एक दूसरा दरवाजा था जैसा तस्वीर वाले कमरे में था। कुंअर साहब बिना इधर-उधर देखे उस दरवाजे तक चले गये मगर जब उस पर हाथ रखा तो बन्द पाया । उस दरवाजे में भी कोई जंजीर या ताला दिखाई न दिया जिसे खोलकर या तोड़कर वे दूसरी तरफ जाते । इससे मालूम हुआ कि इस दरवाजे का खोलना या बन्द करना उस दूसरी तरफ वाले के आधीन है। बड़ी देर तक आनन्दसिंह उस दरवाजे के पास खड़े होकर सोचते रहे, मगर इसके बाद जब पीछे की तरफ हटने लगे तो उस दरवाजे के खोलने की आहट सुनाई दी। आनन्दसिंह रुके और गौर से देखने लगे। इतने ही में एक और आवाज इस ढंग की आई जिसने आनन्दसिंह को विश्वास दिला दिया कि उस तरफ की जंजीर किसी ने तलवार या खंजर से काटी है। थोड़ी ही देर बाद दरवाजा खुला और कुंअर इन्द्रजीत- सिंह दिखाई पड़े । आनन्दसिंह को उस औरत के देखने की लालसा हद से ज्यादा थी और कुछ-कुछ विश्वास हो गया था कि अबकी दफे पुनः उसी औरत को देखेंगे, मगर उसके बदले में अपने बड़े भाई को देखा और देखते ही खुश होकर बोले, "मैंने तो समझा था कि आपसे जल्द मुलाकात न होगी परन्तु ईश्वर ने बड़ी कृपा की !"

    इन्द्रजीतसिंह–मैं भी यही सोचे हुए था, क्योंकि कुएँ के अन्दर कूदने के बाद जब मैंने एक दरवाजे में पैर रक्खा दो-चार कदम जाने के बाद वह बन्द हो गया, तभी मैंने सोचा कि अब आनन्द से मुलाकात होना कठिन है।

    आनन्दसिंह–मेरा भी यही हाल हुआ, जिस दरवाजे के अन्दर मैंने पैर रक्खा था वह भी दो ही चार कदम जाने के बाद बन्द हो गया था।

    इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस कमरे में चले आये जिसमें आनन्दसिंह थे। दोनों भाई एक-दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुए और यों बातचीत करने लगे-

    आनन्दसिंह–इस कोठरी में आपने किसी को देखा था?

    इन्द्रजीतसिंह–(ताज्जुब से) नहीं तो! आनन्दसिंह–बड़े आश्चर्य की बात है ! (कोठरी के अन्दर झांककर) कोठरी तो बहुत बड़ी नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह–तुम किसे पूछ रहे हो सो कहो ?

    आनन्दसिंह–अभी-अभी एक औरत हाथ में लालटेन लिए मुझे दिखाई दी थी जो इसी कोठरी में घुस गई और इसके थोड़ी ही देर बाद आप आये हैं।

    इन्द्रजीतसिंह–जब से मैं कुएँ में कूदा तब से इस समय तक मैंने किसी दूसरे की सूरत नहीं देखी।

    आनन्दसिंह–अच्छा यह कहिए कि आप जब कुएं में कूदे तब क्या हुआ और यहाँ क्योंकर पहुँचे ?

    इन्द्रजीतसिंह–कुएँ की तह में पहुँचकर जब मैं टटोलता हुआ दीवार के पास पहुंचा तो एक छोटे से दरवाजे पर हाथ पड़ा। मैं उसके अन्दर चला गया। दो ही चार कदम गया था कि पीछे से दरवाजा बन्द हो जाने की आवाज आई । मैंने तिलिस्मी खंजर हाथ में ले लिया और कब्जा दबाकर रोशनी करने के बाद चारों तरफ देखा तो मालूम हुआ कि कोठरी बहुत छोटी है और सामने की तरफ एक दरवाजा और है। खंजर से जंजीर काटकर दरवाजा खोला तो एक कमरा और नजर आया जिसकी लम्बाई पचीस हाथ से कुछ ज्यादा थी। मगर उस कमरे में जो कुछ मैंने देखा कहने योग्य नहीं है बल्कि इस योग्य है कि तुम्हें अपने साथ जाकर दिखाऊँ। वह कमरा बहुत दूर भी नहीं है। (जिस कोठरी में से आये थे, उसे बताकर) इस कोठरी के बाद ही वह कमरा है, चलो तो वहाँ का विचित्र तमाशा तुम्हें दिखावें ।

    आनन्दसिंह–पहले इस कमरे को देख लीजिये जिसकी सैर मैं कर चुका हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह–मैं समझ गया, जरूर तुमने भी कोई अनूठा तमाशा देखा होगा। (रुककर) अच्छा चलो, पहले इसी को देख लें।

    इतना कहकर आनन्दसिंह के पीछे-पीछे इन्द्रजीतसिंह उस कमरे में गए और जो कुछ उनके छोटे भाई ने देखा था उन्होंने भी बड़े गौर और ताज्जुब के साथ देखा।

    इन्द्रजीतसिंह–मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि राजा गोपालसिंह नाते में हमारे भाई होते हैं । (कुछ सोचकर) मगर इस बात की सचाई का कोई और सबूत भी होना चाहिए।

    आनन्दसिंह–जब इतना मालूम हुआ है तब और भी कोई-न-कोई सबूत मिल ही जायगा।

    इन्द्रजीतसिंह–अच्छा अब हमारे साथ आकर उस कमरे का तमाशा देखो जिसका जिक्र हम कर चुके हैं और इसके बाद सोचो कि हम लोग यहाँ से क्योंकर निकल सकेंगे क्योंकि जिस राह से यहाँ आये हैं वह तो बन्द ही हो गई।

    आनन्दसिंह–जी हाँ, हम दोनों भाइयों को धोखा हुआ, गोपालसिंहजी के साथ कोई भी न जा सका।

    इन्द्रजीतसिंह–यह कैसे निश्चय हो कि हम लोगों ने धोखा खाया ? कदाचित् गोपालसिंह जी इसी राह से आते-जाते हों या यहाँ से बाहर होने के लिए कोई दूसरा ही रास्ता हो?

    आनन्दसिंह–यह भी हो सकता है, मगर बड़े आश्चर्य की बात है कि खून से लिखी किताब में, जिसे हम लोग अच्छी तरह पढ़ चुके हैं, इस जगह का तथा इन तस्वीरों का हाल कुछ भी नहीं लिखा है।

    इन्द्रजीतसिंह इसका कुछ जवाब न देकर यहाँ से रवाना हुआ ही चाहते थे कि बाजे की सुरीली आवाज (जो इस कमरे में बोल रहा था) बन्द हो गई और दो-चार पल तक बन्द रहने बाद पुनः इस ढंग से बोलने लगी जैसे कोई मनुष्य बोलता हो। दोनों कुमारों ने चौंककर उस पर ध्यान दिया तो 'सुनो सुनो सुनो' की आवाज सुनाई पड़ी अर्थात् उस बाजे में से 'सुनो सुनो' की आवाज आ रही थी। दोनों कुमार उत्कंठा के साथ उसके पास गए और ध्यान देकर सुनने लगे। 'सुनो सुनो' की आवाज बहुत देर तक निकलती रही, जिस पर इन्द्रजीतसिंह ने यह कहकर कि 'निःसन्देह यह कोई मतलब की बात कहेगा'–अपनी जेब से एक सादी किताब और जस्ते की कलम निकाली और लिखने के लिए तैयार हो गए। अपना खंजर कमर में रख लिया और आनन्दसिंह को अपने खंजर का कब्जा दबाकर रोशनी करने के लिए कहा। थोडी देर तक और 'सुनो सुनो' की आवाज आती रही और फिर सन्नाटा हो गया। कई पल के बाद फिर धीरे-धीरे आवाज आने लगी और इन्द्रजीतसिंह लिखने लगे। वह आवाज यह थी––

    साकरा खति गलि घस्मङ तो चड़ छनेज

    काझ खञ या लठ नड कढ रोण औत

    रथ इद सध तिन लिप स्मफ कीब ताभ

  • चन्द्रकांता सन्तति 3

    चन्द्रकांता सन्तति 3

    Aproximadamente 180.094 palavras.

    चन्द्रकांता सन्तति 3
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकांता_सन्तति_3

    चन्द्रकान्ता सन्तति

    नौवाँ भाग

    1

    अब वह मौका आ गया है कि हम अपने पाठकों को तिलिस्म के अन्दर ले चलें और वहाँ की सैर करावें, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा मायारानी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा विराजे हैं जिसे एक तरह तिलिस्म का दरवाजा कहना चाहिए। ऊपर के भाग में यह लिखा जा चुका है कि भैरोंसिंह को रोहतासगढ़ की तरफ और राजा गोपालसिंह और देवीसिंह को काशी की तरफ रवाना करने के बाद इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, तारासिंह, शेरसिंह और लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुँची और उसने राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार देवमन्दिर में, जिसका हाल आगे चलकर खुलेगा, डेरा डाला। हमने कमलिनी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह को दारोगा वाले मकान के पास के एक टीले पर ही पहुँचा कर छोड़ दिया था और यह नहीं लिखा कि वे लोग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में किस राह से पहुँचे या वह रास्ता किस प्रकार का था। खैर, हमारे पाठक महाशय ऐयारों के साथ कई दफा उस तिलिस्मी बाग में जायँगे इसलिए वहाँ के रास्ते का हाल उनसे छिपा न रह जायगा।

    तिलिस्मी बाग का चौथा दर्जा अद्भुत और भयानक रस का खजाना था। वहाँ का पूरा हाल तो तब मालूम होगा जब तिलिस्म बखूबी टूट जायगा मगर जाहिरा हाल जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों ने वहाँ पहुँचने के साथ ही देखा, हम इस जगह लिख देते हैं।

    उस हिस्से में फूल-फल और पत्तों की किस्म में से ऐसा कुछ विशेष न था जिससे हम उसे बाग कहते, हाँ चारों तरफ तरह-तरह की इमारतें जरूर बहुतायत से बनी हुई थीं जिनका हाल हम उस देवमन्दिर को मध्य मान कर लिखते हैं जिसमें इस समय हमारे दोनों कुमार और दोनों नेक दिल खैरख्वाह और मुहब्बत का नायाब नमूना दिखानेवाली नायिकाएँ तथा उनके साथी लोग विराज रहे हैं। जैसा कि नाम से समझा जाता है वह देवमन्दिर वास्तव में कोई मन्दिर या शिवालय नहीं था, वह केवल सुर्ख पत्थर का बना हुआ एक मकान था जिसमें दस हाथ की कुर्सी के ऊपर चालीस खम्भों का केवल एक अपूर्व कमरा था जिसके बीचोंबीच में दस हाथ के घेरे का एक गोल खम्भा था और उस पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। बस, इसके अतिरिक्त देवमन्दिर में और कोई बात न थी। उस देवमन्दिर वाले कमरे में जाने के लिए जाहिर में कोई रास्ता न था, इसके सिवाय एक बात यह और थी कि कमरा चारों तरफ से परदेनुमा ऊँची दीवारों से ऐसा घिरा हुआ था कि उसके अन्दर रहने वाले आदमियों को बाहर से कोई देख नहीं सकता था। उस देवमन्दिर के चारों तरफ थोड़ी-सी जमीन में बाग की पक्की क्यारियाँ बनी हुई थीं और उनमें तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे, मगर ये पेड़ भी सच्चे न थे, बल्कि एक प्रकार की धातु के बने थे और असली मालूम होने के लिए उन पर तरह-तरह के रंग चढ़े हुए थे, यदि इस खयाल से उसे हम बाग कहें तो हो सकता है और ताज्जुब नहीं कि इन्हीं पेड़ों की वजह से वह हिस्सा वाग के नाम से पुकारा भी जाता हो। उस नकली बाग में दो-दो आदमियों के बैठने लायक कई कुर्सियाँ भी जगह-जगह बनी हुई थीं।

    उन क्यारियों के चारों तरफ छोटी-छोटी कई कोठरियाँ और मकान भी बने थे जिनका अलग-अलग हाल लिखना इस समय आवश्यक नहीं, मगर उन चार मकानों का हाल लिखे बिना काम न चलेगा जो कि देवमन्दिर या यों कहिए कि इस नकली बाग के चारों तरफ एक-दूसरे के मुकाबले में बने हुए थे और जिन चारों ही मकानों के बगल में एक-एक कोठरी और कोठरी से थोड़ी दूर के फासले पर एक-एक कुआँ भी बना हुआ था।

    पूरब की तरफ वाले मकान के चारों तरफ पीतल की ऊँँची दीवार थी इसलिए उस मकान का केवल ऊपर वाला हिस्सा दिखाई देता था और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हाँ छत के ऊपर एक लोहे का पतला महराबदार खम्भ निकला हुआ जरूर दिखाई दे रहा था जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया हुआ था। उस मकान के चारों तरफ जो पीतल की दीवार थी उसी में एक बन्द दरवाजा भी दिखाई देता था जिसके दोनों तरफ पीतल के दो-दो आदमी हाथ में नंगी तलवारें लिए खड़े थे।

    पश्चिम तरफ वाले मकान के दरवाजे पर हड्डियों का एक बड़ा-सा ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी थी जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया था।

    उत्तर तरफ वाला मकान गोलाकार स्याह पत्थरों का बना हुआ था और उसके चारों तरफ चखियाँँ और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। इसी मकान के पास वाले कुएँ के अन्दर मायारानी अपने पति का काम तमाम करने के लिए गई थी।

    दक्खिन की तरफ वाले मकान के ऊपर चारों कोनों पर चार बुर्जियाँ थीं और उनके ऊपर लोहे का जाल पड़ा था। उन चारों बुर्जियों पर (जाल के अन्दर) चार मोर न मालूम किस चीज के बने हुए थे जो हर वक्त नाचा करते थे।

    आज उसी देवमन्दिर के कमरे में दोनों कुमार, कमलिनी, लाड़िली और ऐयार लोग बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। रिक्तगन्थ अर्थात् किसी के खून से लिखी हुई किताब कुँँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथों में है और वह बड़े प्रेम से उसकी जिल्द को देख रहे हैं, मगर अभी तक उस किताब को पढ़ने की नौबत नहीं आई है। कमलिनी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रजीतसिंह को देख रही है और उसी तरह लाड़िली भी छिपी निगाहें कुँँअर आनन्दसिंह पर डाल रही है।

    कमलिनी―(इन्द्रजीतसिंह से) अब आपको चाहिए कि जहाँ तक जल्द हो सके यह रिक्तगंथ पढ़ जायँ।

    इन्द्रजीतसिंह―हाँ, मैं भी यही चाहता हूँ, परन्तु पहले उन कामों से छुट्टी पा लेनी चाहिए जिनके लिए तेजसिंह चाचा को और ऐयारों को हम लोग यहाँ तक साथ लाए हैं।

    कमलिनी—मैं इन लोगों को केवल रास्ता दिखाने के लिए यहाँ तक लाई थी सो काम तो हो ही चुका, अब इन लोगों को यहाँ से जाना और कोई नया काम करना चाहिए और आपको भी रिक्तग्रंथ पढ़ने के बाद तिलिस्म तोड़ने में लग जाना चाहिए।

    इन्द्रजीतसिंह―राजा गोपालसिंह ने कहा था कि किशोरी और कामिनी को छुड़ा कर जब हम आ जायँ तब तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाना। इसके अतिरिक्त तेजसिंह चाचा से मुझे राजा गोपालसिंह के छुड़ाने का हाल सुनना भी बाकी है।

    तेजसिंह―उस बारे में कुछ हाल तो मैं आपसे कह भी चुका हूँ!

    आनन्दसिंह―जी हाँ, आप वहाँ तक कह चुके हैं जब (कमलिनी की तरफ देख कर) ये चंडूल की सूरत बनाकर आपके पास आई थीं, मगर हमें यह न मालूम हुआ कि इन्होंने हरनामसिंह, बिंहारीसिंह और मायारानी के कान में क्या कहा जिसे सुन सभी की अवस्था बदल गई थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, शायद इन्होंने राजा गोपालसिंह के ही बारे में कोई इशारा किया होगा।

    कमलिनी–जी हाँँ, यही बात है। राजा गोपालसिंह को कैद करने में हरनामसिंह और बिहारीसिंह ने भी मायारानी का साथ दिया था और धनपत इस काम की जड़ है।

    इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) धनपत इस काम की जड़ है!

    कमलिनी―जी हाँ, मैं बोलने में भूलती नहीं, धनपत वास्तव में औरत नहीं है बल्कि मर्द है। उसकी खूबसूरती ने मायारानी को फँसा लिया और उसी की मुहब्बत में पड़ कर उसने यह अनर्थ किया था। ईश्वर ने धनपत का चेहरा ऐसा बनाया है कि वह मुद्दत तक औरत बन कर रह सकता है। एक तो वह नाटा है। दूसरे अठारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी दाढ़ी-मूँँछ की निशानी नहीं आई। लेकिन जनानी सूरत होने पर भी उसमें ताकत बहुत है।

    इन्द्रजीतसिंह―(ताज्जुब से) यह तो एक नई बात तुमने सुनाई। अच्छा तब?

    लाड़िली―क्या धनपत मर्द है?

    कमलिनी―हाँ, और यह हाल मायारानी, बिहारीसिंह और हरनामसिंह के सिवाय और किसी को मालूम नहीं है। कुछ दिन बाद मुझे मालूम हो गया था, मगर आज के पहले यह हाल मैंने भी किसी से नहीं कहा था। इसी तरह राजा गोपालसिंह का हाल भी उन चारों के सिवाय और कोई नहीं जानता था और जब कोई पाँँचवाँँ आदमी उस भेद को जानेगा तो बेशक हम चारों की जान जायगी और यही सबब उस समय उन लोगों की बदहवासी का था जब मैंने चंडूल बन कर उन तीनों के कानों में पते की बात कही थी, मगर उस समय इसके साथ-साथ ही मैंने यह भी कह दिया था कि राजा गोपालसिंह का हाल हजारों आदमी जान गए हैं और राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में भी यह बात मशहूर हो गई है।

    आनन्दसिंह―ठीक है, मगर बिहारीसिंह ने मायारानी से यह हाल क्यों नहीं कहा?

    कमलिनी―इसका एक खास सबब है।

    इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?

    कमलिनी―बिहारी और हरनाम ने मायारानी के दो प्रेमी पात्रों का खून किया है जिसका हाल मायारानी को भी मालूम नहीं है, उसका भी इशारा मैंने उन दोनों के कानों में किया था।

    इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) तुम्हारी बहिन बड़ी ही शैतान है! मगर देखना चाहिए तुम कैसी निकलती हो, खून का साथ देती हो या नहीं!

    कमलिनी―(हाथ जोड़ कर) बस, माफ कीजिए, ऐसा कहना हम दोनों बहिनों (लाड़िली की तरफ इशारा करके) के लिए उचित नहीं! इसका एक सबब भी है।

    इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?

    कमलिनी—मेरे पिता की दो शादियाँँ हुई थीं। मैं और लाड़िली एक माँ के पेट से हुईं और कम्बख्त मायारानी दूसरी माँ के पेट से, इसलिए हम दोनों का खून उसके संग नहीं मिल सकता।

    इन्द्रजीतसिंह—(हँस कर) शुक्र है, खैर यह कहो कि चंडूल बनने के बाद तुमने क्या किया?

    कमलिनी―चंडूल बनने के बाद मैंने नानक को बाग के बाहर कर दिया और तेजसिंह जी को राजा गोपालसिंह के पास ले जाकर दोनों की मुलाकात कराई, इसके बाद वहाँँ रहने का स्थान, राजा गोपालसिंह के छुड़ाने की तरकीब, और फिर उन्हें साथ लेकर बाग के बाहर हो जाने का रास्ता बताकर मैं तेजसिंह जी से बिदा हुई और आप लोगों को कैद से छुड़ाने का उद्योग करने लगी। इसके बाद जो कुछ हुआ आप जान ही चुके हैं। हाँ, राजा गोपालसिंह को छुड़ाने के समय तेजसिंहजी ने क्या-क्या किया सो आप इन्हीं से पूछिए।

    अब पाठक समझ ही गये होंगे कि राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ाने वाले तेजसिंह थे और जब राजा गोपालसिंह को मारने के लिए मायारानी कैदखाने में गई थी तो तेजसिंह ही ने आवाज देकर उसे परेशान कर दिया था। दोनों कुमारों के पूछने पर तेजसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल बयान किया जिसे सुनकर कुमार बहुत प्रसन्न हुए।

    2

    ऐयारों को जो कुँँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ थे, बाग के चौथे दर्जे के देवमन्दिर में आने-जाने का रास्ता बताकर कमलिनी ने तेजसिंह को रोहतासगढ़ जाने के लिए कहा और बाकी ऐयारों को अलग-अलग काम सुपुर्द करके दूसरी तरफ बिदा किया।

    इस बाग के चौथे दर्जे की इमारत का हाल हम ऊपर लिख आए हैं और यह भी लिख आये हैं कि वहाँ असली फूल-पत्तों का नाम-निशान भी न था। यहाँ की ऐसी अवस्था देखकर कुँँअर इन्द्रजीतसिंह ने कमलिनी से पूछा, “राजा गोपालसिंह ने कहा था कि ‘चौथे दर्जे में मेवे बहुतायत से हैं खाने-पीने की तकलीफ न होगी’, मगर यहाँ तो कुछ भी दिखाई नहीं देता! हम लोगों को यहाँ कई दिनों तक रहना होगा, कैसे काम चलेगा?” इसके जवाब में कमलिनी ने कहा, “आपका कहना ठीक है और राजा गोपालसिंह ने भी गलत नहीं कहा। यहाँ मेवों के पेड़ नहीं हैं मगर (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोड़ी-सी जमीन मजबूत चहारदीवारी से घिरी हुई है जिसे आप मेवों का बाग कह सकते हैं। उसको कोई सींचता या दुरुस्त नहीं करता है, बाहर से एक नहर दीवार तोड़ कर उसके अन्दर पहुँँचाई गई है और उसी की तरावट से वह बाग सूखने नहीं पाता। कई पेड़ पुराने होकर मर जाते है और कई नये पैदा होते रहते हैं। इस तिलिस्मी बाग का राजा दस-पन्द्रह वर्ष पीछे कभी उसकी सफाई करा दिया करता है। मैं वहाँ जाने का रास्ता आपको बता दूँँगी!”

    ऐयारों को बिदा करने के बाद ही कमलिनी भी लाड़िली को लेकर दोनों कुमारों से यह कह कर बिदा हुई—“कई जरूरी कामों को पूरा करने के लिए मैं जाती हूँ, परसों यहाँ आऊँगी।”

    तीन दिन तक कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह देवमन्दिर में रहे। जब आवश्यकता होती मेवों वाले बाग में चले जाते और पेट भर कर फिर उस देवमन्दिर में चले आते। इस बीच में दोनों भाइयों ने मिल कर 'रिक्तगंथ' (खून से लिखी किताब) भी पढ़ डाली, मगर रिक्तगंथ में जो भी बातें लिखी थीं, वे सब-की-सब बखूबी समझ में न आई क्योंकि उसमें बहुत से शब्द इशारे के तौर पर लिखे थे जिनका भेद जाने बिना असल बात का पता लगाना बहुत ही कठिन था, तथापि तिलिस्म के कई भेदों और रास्तों का पता उन दोनों को मालूम हो गया और बाकी के विषय में निश्चय किया कि कमलिनी से मुलाकात होने पर उन शब्दों का अर्थ पूछेंगे जिनके जाने बिना कोई काम नहीं चलता।

    यद्यपि कुँअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी के लिए और आनन्दसिंह कामिनी के लिए बेचैन हो रहे थे, मगर कमलिनी और लाड़िली की भोली सूरत के साथ-साथ उनके अहसानों ने भी दोनों कुमारों के दिलों को पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था फिर भी किशोरी और कामिनी की मुहब्बत के खयाल से दोनों कुमार अपने दिलों को कोशिश के साथ दबाए जाते थे।

    दोनों कुमारों को देवमन्दिर में टिके हुए आज तीसरा दिन है। ओढ़ने और बिछाने का कोई सामान न होने पर भी उन दोनों को किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे से होती और वहाँ के खुशबूदार फूलों से बसी हुई मन्द चलने वाली हवा ने नर्म थपकियाँ लगा-लगाकर दोनों नौजवान, सुन्दर और सुकुमार कुमारों को सुला दिया है। ताज्जुब नहीं कि दिन-रात ध्यान बने रहने के कारण दोनों कुमार इस समय स्वप्न में भी अपनी-अपनी माशूकाओं से लाड़-प्यार की बातें कर रहे हों, और उन्हें इस बात का गुमान भी न हो कि पलक उठते ही रंग बदल जायगा और नर्म कलाइयों का आनन्द लेने वाला हाथ सिर तक पहुँचने का उद्योग करेगा।

    यकायक घड़घड़ाहट की आवाज ने दोनों को जगा दिया। वे चौंक कर उठ बैठे और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। ज्यादा ध्यान देने पर भी यह निश्चय न हो सका कि आवाज किस चीज की है, हाँ, इतनी बात मालूम हो गई कि देवमन्दिर के पूरब तरफ वाले मकान के अन्दर से यह आवाज आ रही है। दोनों राजकुमारों को देवमन्दिर से नीचे उतर कर उस मकान के पास जाना उचित न मालूम न हुआ, इसलिए वे देवमन्दिर की छत पर चढ़ गये और गौर से उस तरफ देखने लगे।

    आधे घंटे तक वह आवाज एक रंग से बराबर आती रही और इसके बाद धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गई। उस समय दरवाजा खोलकर अन्दर से आता हुआ एक आदमी उन्हें दिखाई पड़ा। वह आदमी धीरे-धीरे देवमन्दिर के पास आया और थोड़ी देर तक खड़ा रहकर उस कुएँ की तरफ लौटा जो पूरव की तरफ वाले मकान के साथ और उससे थोड़ी ही दूर पर था। कुएँ के पास पहुँचकर थोड़ी देर तक वहाँ भी खड़ा रहा और फिर आगे बढ़ा, यहाँ तक कि घूमता-फिरता छोटे-छोटे मकानों की आड़ में जाकर वह न जाने कहाँ नज़रों से ओझल हो गया और इसके थोड़ी ही देर बाद उस तरफ एक कमसिन औरत के रोने की आवाज आई।

    इन्द्रजीतसिंह―जिस तौर से यह आदमी इस चौथे दर्जे में आया है, वह बेशक ताज्जुब की बात है।

    आनन्दसिंह―तिस पर इस रोने की आवाज ने और भी ताज्जुब में डाल दिया है। मुझे आज्ञा हो तो जाकर देखूँँ कि क्या मामला है?

    इन्द्रजीतसिंह―जाने में कोई हर्ज नहीं है, मगर…खैर, तुम इसी जगह ठहरो, मैं जाता हूँ।

    आनन्दसिंह―यदि ऐसा ही है तो चलिये हम दोनों आदमी चलें।

    इन्द्रजीतसिंह―नहीं, एक आदमी का यहाँ रहना बहुत जरूरी है। खैर, तुम ही जाओ, कोई हर्ज नहीं, मगर तलवार लेते जाओ।

    दोनों भाई छत के नीचे उतर आये। आनन्दसिंह ने खूँँटी से लटकती हुई अपनी तलवार ले ली और कमरे के बीचोंबीच वाले गोल खम्भे के पास पहुँँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि उस खम्भे में तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। आनन्दसिंह ने एक मूरत पर हाथ रख कर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। छोटे कुमार उसी खिड़की की राह उस गोल खम्भे के अन्दर घुस गये, और थोड़ी ही देर बाद उस नकली बाग में दिखाई देने लगे। खम्भे के अन्दर रास्ता कैसा था और वह नकली बाग के पास क्योंकर पहुँँचे, इसका हाल आगे चलकर दूसरी दफे किसी और के आने या जाने के समय बयान करेंगे, यहाँ मुख्तसिर ही में लिखकर मतलब पूरा करते हैं।

    आनन्दसिंह भी उस तरफ गये, जिधर वह आदमी गया था या जिधर से किसी औरत के रोने की आवाज आई थी। घूमते-फिरते एक छोटे मकान के आगे पहुँँचे जिस का दरवाजा खुला हुआ था। वहाँ औरत तो कोई दिखाई न दी, मगर उस आदमी को दरवाजे पर खड़े हुए जरूर पाया।

    आनन्दसिंह को देखते ही वह आदमी झट मकान के अन्दर घुस गया और कुमार भी तेजी के साथ उसका पीछा किए बेखौफ मकान के अन्दर चले गये। वह मकान दो मंजिल का था, उसके अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियाँ थीं और हर एक कोठरी में दो-दो दरवाजे थे, जिससे आदमी एक कोठरी के अन्दर जाकर कुल कोठरियों की सैर कर सकता था।

    यद्यपि कुमार तेजी के साथ पीछा किए हुए चले गये, मगर वह आदमी एक कोठरी के अन्दर जाने के बाद कई कोठरियों में घूम-फिर कर कहीं गायब हो गया। रात का समय था और मकान के अन्दर तथा कोठरियों में बिल्कुल अन्धकार छाया हुआ था, ऐसी अवस्था में कोठरियों के अन्दर घूम-घूम कर उस आदमी का पता लगाना बहुत ही मुश्किल था, दूसरे, इसका भी शक था कि वह कहीं हमारा दुश्मन न हो, लाचार होकर कुमार वहाँ से लौटे, मगर मकान के बाहर न निकल सके, क्योंकि वह दरवाजा बन्द हो गया था जिसकी राह से कुमार मकान अन्दर घुसे थे। कुमार ने दरवाजा उतारने का भी उद्योग किया मगर उसकी मजबूती के आगे कुछ बस न चला। आखिर दुखी होकर फिर मकान के अन्दर घुसे और एक कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये। थोड़ी देर के बाद ऊपर की छत पर से फिर किसी औरत के रोने की आवाज आई, गौर करने से कुमार को मालूम हुआ कि यह बेशक उसी औरत की आवाज है जिसे सुनकर यहाँ तक आए थे। उस आवाज की सीध पर कुमार ने ऊपर की दूसरी मंजिल पर जाने का इरादा किया, मगर सीढ़ियों का पता न लगा।

    इस समय कुमार का दिल कैसा बेचैन था, यह वही जानते होंगे। हमारे पाठकों में भी जो दिलेर और बहादुर होंगे, वह उनके दिल की हालत कुछ समझ सकेंगे। बेचारे आनन्दसिंह हर तरह से उद्योग करके रह गए, पर कुछ भी न बन पड़ा। न तो वे उस आदमी का पता लगा सकते थे, जिसके पीछे-पीछे मकान के अन्दर घुसे थे, न उस औरत का हाल मालूम कर सकते थे, जिसके रोने की आवाज से दिल बेताब हो रहा था, और न उस मकान ही से बाहर होकर अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को इन सब बातों की खबर कर सकते थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि सिवाय चुपचाप खड़े रहने या बैठ

    जाने के और कुछ भी नहीं कर सकते थे।

    जो कुछ रात थी खड़े-खड़े बीत गई। सुबह की सुफेदी ने जिधर से रास्ता पाया मकान के अन्दर घुसकर उजाला कर दिया, जिससे कुंअर आनन्दसिंह को वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यकायक पीछे की तरफ से दरवाजा खुलने की आवाज कुमार के कान में पड़ी। कुमार ने घूमकर देखा तो एक कोठरी का दरवाजा, जो इसके पहले बन्द था, खुला हुआ पाया। वे बेधड़क उसके अन्दर घुस गए और वहां ऊपर की तरफ गई हुई छोटी-छोटी खूबसूरत सीढ़ियाँ देखीं। धडधडाते हए दूसरी मंजिल पर चढ़ गए और हर तरफ गौर करके देखने लगे। इस मंजिल में बारह कोठरियाँ एक ही रंग-ढंग की देखने में आईं। हर एक कोठरी में दो दरवाजे थे। एक दरवाजा कोठरी के अन्दर घुसने के लिए और दूसरा अन्दर की तरफ से दूसरी कोठरी में जाने के लिए था। इस तरह पर किसी एक कोठरी के अन्दर घुसकर कुल कोठरियों में आदमी घूम आ सकता था। धीरे-धीरे अच्छी तरह उजाला हो गया और वहां की हर एक चीज बखूबी देखने का मौका कुमार को मिला। छोटे कुमार एक कोठरी के अन्दर घुसे और देखा कि वहां सिवाय एक चबूतरे के और कुछ भी नहीं है। यह चबूतरा स्याह पत्थर का बना हआ था और उसके ऊपर एक कमान और पाँच तीर रखे हए थे। कूमार ने तीर और कमान पर हाथ रखा, मालूम हुआ कि सब पत्थर का बना हआ है और किसी काम में आने योग्य नहीं है। दूसरे दरवाजे से दूसरी कोठरी में घुसे तो वहाँ एक लाश पड़ी देखी जिसका कटा हुआ सिर पास ही पड़ा हुआ था और वह लाश भी पत्थर ही की थी। उसे अच्छी तरह देखभाल कर तीसरी कोठरी में पहुँचे।

    इसके चारों तरफ दीवार में कई खूटियाँ थीं और हर एक खंटी से एक-एक नंगी तलवार लटक रही थी। ये तलवारें नकली न थीं, बल्कि असली लोहे की थीं मगर हर एक पर जंग चढा हआ था। जब चौथा कोठरी में पहुंचे तो वहाँ चाँदी के सिंहासन पर बैठी हई एक मूरत दिखाई पड़ी। वह मूरत किसी प्रकार की धातु की बहुत ही खूबसूरत और ठीक-ठीक बनी हई थी, जिसे देखने के साथ ही कुमार ने पहचान लिया कि यह मायारानी की छोटी बहन लाडिला का मूरत है। कुमार मुहब्बत भरी निगाहें उस मूरत पर डालने लगे। निराली जगह अपन माशूक को देखने का उन्हें अच्छा मौका मिला, यदापि वर माशक असली नहीं, बल्कि कवल उसका एक छवि मात्र थी तथापि इस सबब से कि यहां पर कोई ऐसा आदमी न था जिसका लिहाज या खयाल होता, उन्हें एक निराले ढंग की खुशी हुई और वे देर तक उसक हर एक अंग की खूबसूरती को देखते रहे। इसी बीच बगल वाली कोठरी में से यकायक एक, एक खटके की आवाज आई। कुमार चौंकपड़े और यह सोचते हुए उस कोठारी का तरफ बढ़े कि शायद वर आदमी उसमें मिले जिसके पीछे-पीछे इस मकान के अन्दर आए हैं, मगर इस कोठरी में भी किसी की सूरत दिखाई न दी।

    इस कोठरी में, जिसमें कुमार पहुँचे हैं, चाँदी का का केवल एक सन्दूक था, जिसके बीच में हाथ डालने के लायक एक छेद भी बना हुआ था हुआ था और छेद के ऊपर सुनहले हर्को में यह लिखा हुआ था-

    "इस छेद में हाथ डाल के देखो, क्या अनूठी चीज है।"

    कुँवर आनन्दसिंह ने बिना सोचे-विचारे उस छेद में हाथ डाल दिया, मगर फिर हा निकाल न सके। सन्दूक के अन्दर हाथ जाते ही मानो लोहे की हथकड़ी पड़ गई जो किसी तरह हाथ बाहर निकालने की इजाजत नहीं देती थी। कुमार ने झक कर सन्दूक नीचे की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि सन्दूक जमीन से अलग नहीं है और इसलिए उसे किसी तरह खिसका भी नहीं सकते थे।

    3

    कुँवर आनन्दसिंह के जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह देर तक उनके आने की राह देखते रहे। जैसे-जैसे देर होती थी, जी बेचैन होता जाता था। यहाँ तक कि तमाम बीत गई, सवेरा हो गया, और पूरब तरफ से सूर्य भगवान दर्शन देकर धीरे-धीरे आसमान पर चढ़ने लगे। जब पहर भर से ज्यादा दिन चढ़ गया, तब इन्द्रजीतसिंह नदी बेताब हुए और उन्हें निश्चय हो गया कि आनन्दसिंह जरूर किसी आफत में फंस गये।

    कुँवर इन्द्रजीतसिंह सोच ही रहे थे कि स्वयं चल के आनन्दसिंह का पता लगाना कि इतने ही में लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी वहाँ आ पहुँची। इन्हें देख की बेचैनी कुछ कम हुई और आशा की सूरत दिखाई देने लगी। कमलिनी ने जब कुमार को उस जगह अकेले और उदास देखा तो उसे ताज्जुब हुआ, मगर वह बुध्दिमान औरत तुरत ही समझ गई कि इनके छोटे भाई आनन्दसिंह इनके साथ नहीं दिखाई देते जरूर वे किसी मुसीबत में पड़ गए हैं, और ऐसा होना कोई ताज्जुब की बात क्योंकि यह तिलिस्म का मौका है, और यहाँ का रहने वाला थोड़ी भूल में तकलीफ उठा सकता है।

    कमलिनी ने कुँवर इन्द्रजीतसिंह से उदासी का कारण और कुंअर आनन्दसिंह के का सबब पूछा, जिसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ हुआ था, बयान करके कहा कि "आनन्द को गए हुए नौ घंटे के लगभग हो गये।"

    समय कोई लाड़िली की सूरत गौर से देखता तो बेशक समझ जाता कि आनन्दसिंह का हाल सुनकर उसको हद से ज्यादा रंज हुआ है। ताज्जुब नहीं कि कम और इन्द्रजीतसिंह भी उसके दिल की हालत जान गये हों, क्योंकि वह अपनी आंखों को डबडबाने और आंसू के निकलने को बड़े परिश्रमपूर्वक रोक रही थी। यद्यपि उसे निश्चय था कि दोनों कुमार इस तिलिस्म को अवश्य तोड़ेंगे, तथापि उसका दिल दख गया था। कौन ऐसा है जो अपने प्यारे पर आई हुई मुसीबत का हाल सुनकर बेचैन न हो?

    कमलिनी-(सब बातें सुनकर) किसी का आना ताज्जुब नहीं है, हाँ, किसी

    औरत का आना बेशक ताज्जुब है, क्योंकि (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप कहते हैं कि एक औरत के रोने की आवाज आई थी।

    लाड़ली-ठीक है, जहाँ तक मैं समझती हूँ सिवाय तुम्हारे, मायारानी के और मेरे किसी चौथी औरत को यहां आने का रास्ता मालूम नहीं है, हाँ, मर्दो में कई जरूर ऐसे हैं, जो यहाँ आ सकते हैं।

    कमलिनी-मगर इस देवमन्दिर के अन्दर हम लोगों के अतिरिक्त राजा गोपालसिंह के सिवाय और कोई भी नहीं आ सकता। खैर, इन सब बातों को जाने दो, अब यहाँ से चलकर कुँवर साहब का पता लगाना बहुत जरूरी है। यद्यपि यहाँ किसी दुश्मन का आना बहुत कठिन है, तथापि खुटका लगा ही रहता है। जब दोनों कुमारों को मायारानी के कैदखाने से छुड़ाकर हम लोग सुरंग ही सुरंग तिलिस्मी बाग से बाहर हो रहे थे, तो उस हरामजादे के आ पहुँचने की कौन उम्मीद थी, जिसने कुमार को जख्मी किया था! इसी तरह कौन ठिकाना यहाँ भी कोई दुष्ट आ पहुँचा हो!

    आखिर कुँवर आनन्दसिंह को खोजने के लिए तीनों वहाँ से रवाना हुए और देवमन्दिर के नीचे उतर उसी तरफ चले जिधर आनन्दसिंह गये थे। जब एक मकान के दरवाजे पर पहुँचे तो कमलिनी रुकी और बड़े गौर से उस दरवाजे को जो बन्द था, देखने लगी। इसके बाद फिर आगे बढ़ी, दूसरे मकान के दरवाजे पर पहुँच कर उसे भी गौर से देखा और सिर हिलाती हुई फिर आगे बढ़ी। इसी तरह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और लाड़िली को साथ लिए हए, कमलिनी सात-आठ मकानों के दरवाजे पर गई। हर एक मकान का दरवाजा बन्द था और हर एक दरवाजे को कमलिनी ने गौर से देखा लेकिन कुछ काम न चला, मगर जब उस मकान के दरवाजे पर पहुँची, जिसमें कुँवर आनन्दसिंह गये थे तो रुककर मामूली तौर पर उसके दरवाजे को भी बड़े गौर से देखने लगी और थोड़ी ही देर में बोल उठी, "वेशक कुँवर आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं। (उँगली से दरवाजे के ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) देखिये, यह स्याह पत्थर की तीन खूटियाँ नीचे की तरफ झुक गई हैं।"

    कुमार-इन खूटियों से क्या मतलब है?

    कमलिनी-इस मकान के अन्दर जितने आदमी जायेंगे, उतनी खूटियाँ नीचे की तरफ झुक जायँगी।

    कुमार-(ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) ऊपर कुल बारह खूटियाँ हैं, मान लिया जाय कि बारहों खंटियाँ उस समय झुक जायेंगी, जब बारह आदमी इस मकान के अन्दर जा पहुँचेंगे, मगर जब बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जायेंगे, तब क्या होगा?

    कमलिनी-बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जा ही नहीं सकते! तिलिस्मी बातों में किसी की जबर्दस्ती नहीं चल सकती।

    कुमार-ठीक है, मगर तुमने यह कैसे जाना कि आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं?

    कमलिनी–सिर्फ अन्दाज से समझती हूँ कि आनन्दसिंह इसी मकान में होंगे,

    क्योंकि इस बाग में एक आदमी का का आना आपने बयान किया था, इसके बाद कहा था किसी औरत के रोने की आवाज आई थी, दो हो तो चुके, तीसरे आनन्दसिंह भी पीछा किये हुए इधर ही आये हैं और इस तरह इस मकान के अन्दर तीन आदमियों का होना साबित होता है। इन्हीं सब बातों से मुझे विश्वास होता है कि वे ही तीन आदमी इस मकान के अन्दर हैं।

    कुमार—तुम्हारा सोचना बहुत ठीक है, मगर जहाँ तक जल्द हो सके, इस बात का निश्चय करके आनन्द को छुड़ाना चाहिए, न मालूम वह किस आफत में फंस गया है।

    कमलिनी–देखिये, मैं बहुत जल्द इसका बन्दोबस्त करती हूँ।

    इसके बाद कमलिनी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "इस मकान का दरवाजा खोलना तो जरा मुश्किल है, मगर चौखट के ऊपर जो बारह खूटियाँ हैं उनमें से तीन नीचे की तरफ झुक गई हैं, और बाकी नौ ऊपर की तरफ उठी हुई हैं, उनमें से किसी एक को आप उछल कर थाम लीजिए और जोर करके नीचे की तरफ झुकाइए, देखिये, क्या होता है।" कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछल कर एक खूटी को थाम लिया और झटका देकर उसे नीचे की तरफ झुकाया तथा जब वह नीचे को झुक गई तो उसे छोड़कर अलग हो गये। यकायक मकान के अन्दर से इस तरह की आवाज आने लगी, जैसे बड़े-बड़े कल पुर्जे और चरखे घूमते हों, या कई गाड़ियाँ मकान के अन्दर दौड़ रही हों। तीनों आदमी दरवाजे से हटकर खड़े हो गये और राह देखने लगे कि अब क्या होता है।

    थोड़ी ही देर बाद मकान की छत पर से एक आवाज आई-"इधर देखो" जिसे सुनते ही तीनों आदमी चौंके और ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी, जो अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था, छत से नीचे की तरफ झाँकता हुआ दिखाई दिया। उसने कमलिनी, लाड़िली और कुँवर इन्द्रजीतसिंह को अपनी तरफ देखते देख एक लपेटा हुआ कागज नीचे गिरा दिया, जिसे झट कमलिनी ने उठा लिया और बढ़कर कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "बस अब जिस तरह हो सके आप इस खूटी को, जिसे झुकाया है, ज्यों-की-त्यों सीधी कर दीजिए।"

    इन्द्रजीतसिंह-आखिर इसका क्या सबब है? इस पुर्जे में क्या लिखा हुआ है?

    कमलिनी-पहले आप उसे कीजिए, जो मैं कह चुकी हूँ। देर करने में हमारा ही हर्ज होगा।

    लाचार कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछलकर नीचे की तरफ से एक झटका ऐसा दिया कि वह खूटी सीधी हो गई और इसके साथ ही मकान के अन्दर सन्नाटा छा गया, अर्थात् वह जोर-शोर की आवाज, जो खूटी झुकने के साथ ही आने लगी थी, एकदम बन्द हो गई। इसके बाद कमलिनी ने वह कागज का पुर्जा जो मकान की छत पर से गिराया गया था, कुमार के हाथ में दे दिया। कुमार ने उसे देखा, यह लिखा हुआ था-

    1

    2

    3

    4

    5

    6

    एच

    मेमचे

    काटनो

    केआरेयाँ

    डेह

    नेपो

    7

    8

    9

    10

    11

    12

    किमटू

    च्वाला

    मेम

    कुम

    नीपो

    इच्चो

    13

    लव

    14

    कचीचा

    15

    टेप

    इस चिट्ठी का मतलब तो कुमार तुरत समझ गए, क्योंकि यह ऐयारी भाषा में लिखी हुई थी और कुमार ऐयारी भाषा बखूबी जानते थे, मगर यह उनकी समझ में न आया कि चिट्ठी लिखने वाला कौन है, क्योंकि उसने अपना नाम टेप लिखा था। कुमार ने कमलिनी से 'टेप' का अर्थ पूछा, जिसके जवाब में उसने कहा, "थोड़ी देर सब्र कीजिए, आप-से-आप उस आदमी का पता लग जायगा।" कुमार चुप हो रहे और दरवाजे की तरफ देखने लगे। हमारे पाठक महाशय ऐयारी भाषा शायद न जानते होंगे, अस्तु उन्हें समझाने के लिए उस चिट्ठी का अर्थ हम नीच लिखे देते हैं––

    1

    2

    3

    4

    5

    6

    यहाँ

    मैं हूँ

    डरो मत

    कुमार को

    तकलीफ

    न होगी

    7

    8

    9

    10

    11

    12

    थोड़ी देर

    सब्र करो

    मैं

    स्वयं

    नीचे

    आता हूँ

    13

    वही

    14

    दिलजला

    15

    टेप

    4

    मायारानी आज यह विचार कर बहुत खुश है कि आधी रात के समय कमलिनी इस बाग में आयेगी और मैं उसे अवश्य गिरफ्तार करूँगी, मगर इस बात को जानने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा कि उसके सोने वाले कमरे में रात को कौन आया था। वह चारों तरफ खयाल दौड़ाती थी, मगर कुछ समझ में न आता था और आखिर दिल में यही कहती थी कि आने वाला चाहे कोई हो, मगर काम कमलिनी ही का है। आज अगर कमलिनी गिरफ्तार हो जायगी तो सब टण्टा मिट जायगा। जितनी बेफिक्री राजा गोपालसिंह के मरने से मिली है, उतनी ही कमलिनी के भी मारने से मिलेगी, क्योंकि उसके मरने के बाद मेरे साथ दुश्मनी करने का साहस फिर कोई भी नहीं कर सकता।

    आधी रात जाने के पहले ही मायारानी धनपत को साथ लिए हुए उस दरवाजे के पास आ पहुँची जिधर से कमलिनी के आने की खबर सुनी थी। मायारानी के कहे

    मताबिक पहरा देने वाली कई औरतें भी नंगी तलवारें लिए उस चोर दरवाजे के पास पहुँच कर इधर-उधर पेड़ों और झाड़ियों की आड़ में दुबक रही थीं और धनपत भी उस चोरदरवाजे के बगल ही में एक झाड़ी के अन्दर घुस गई थी। मायारानी अपने को हर बला से बचाये रहने की नीयत से कुछ दूर पर छिप कर बैठ रही।

    अब वह समय आ गया कि चोर-दरवाजे की राह से कमलिनी बाग के अन्दर आवे, इसलिए धनपत अपने छिपे रहने वाले स्थान से उठ कर चोर दरवाजे के पास आई और यह विचार कर बैठ गई कि बाहर से कोई आदमी दरवाजा खोलने का इशारा करे तो मैं झट से दरवाजा खोल दूं। इस समय धनपत अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थी और हाथ में खंजर लिए मौका पड़ने पर लड़ने के लिए भी तैयार थी। थोड़ी देर के बाद बाहर से किसी ने चोरदरवाजे पर थपकी मारी। धनपत खुश होकर उठी और झट से दरवाजा खोल कर एक किनारे हो गई। दो आदमी बाग के अन्दर दाखिल हुए। इन दोनों ही का बदन स्याह कपड़ों से ढंका हुआ था और दोनों ही के चेहरों पर नकाब पड़ी हुई थी जिससे रात के समय यह जानना बहुत ही कठिन था कि ये औरतें हैं या मर्द, हाँ लिए उस पर मर्द होने का गुमान हो सकता था।

    जब दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर आ गए तो धनपत ने चोर-दरवाजा बन्द कर दिया और उन दोनों को अपने पीछे-पीछे आने का इशारा किया। मालूम होता था कि वे दोनों नकाबपोश बेफिक्र हैं और उन्हें इस बात की जरा भी खबर नहीं कि यहां का रंग बदला हुआ है। उन दोनों को साथ लिए धनपत जब उस जगह पहुंची जहाँ पहरा देने वाली लौंडियाँ नंगी तलवारें लिए हुए छिपी हुई थीं, तो खड़ी हो गई और उन दोनों की तरफ देख कर बोली, "आपकी आज्ञानुसार मैंने अपना काम पूरा कर दिया अब मुझे इनाम मिलना चाहिए!" इसके जवाब में उस नकाबपोश ने, जिसका कद बनिस्बत दूसरे के छोटा था, जवाब दिया, "धनपत को जो मर्द होकर औरत की सूरत में मायारानी के साथ रहता है, किसी से इनाम लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं मालदार है, मगर मैं समझता हूँ कि कम्बख्त मायारानी भी लोगों को गिरफ्तार करने की नीयत से इसी जगह आकर कहीं छिपी होगी, उसे जल्द बुला, क्योंकि खास उसी को इनाम देने के लिए हम लोग यहाँ आये हैं।"

    धनपत वास्तव में मर्द था, मगर यह हाल किसी को मालूम न था, इसलिए हम भी उसे अभी तक औरत ही लिखते चले आए मगर अब पूरी तरह से निश्चय हो गया कि वह मर्द है और हमारे पाठकों को भी यह बात मालूम हो गई इसलिए अब हम उसके लिए उन्हीं शब्दों का बर्ताव करेंगे, जो मर्दो के लिए उचित हैं।

    उस आदमी की बात सुन कर धनपत परेशान हो गया, उसे यह फिक्र पैदा हुई कि अब हमारा भेद खुल गया और इसलिए जान बचना मुश्किल है। केवल धनपत ही नहीं बल्कि मायारानी और उन लौंडियों ने भी उस आदमी की बातें सुन ली जो उसी के आसपास पेड़ों के नीचे छिपी हुई थीं। मायारानी के दिल में भी तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। उसने पहचानने की नीयत से उस नकाबपोश की आवाज पर ध्यान दिया, मगर कुछ काम न चला क्योंकि उसकी आवाज फंसी हुई थी और इस समय हर

    एक आदमी जो उसकी बात सुनता कह सकता था कि वह अपनी आवाज को बिगाड़ कर बातें कर रहा है।

    धनपत यद्यपि इस फिक्र में था कि दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करना चाहिए मगर इस नकाबपोश की गहरी और भेद से भरी हुई बात ने उसका कलेजा यहाँ तक दहला दिया कि उसके लिए बात का जवाब देना भी कठिन हो गया, मगर वे लौंडियाँ जो उस जगह छिपी हुई थीं चारों तरफ से आकर जरूर वहाँ जुट गईं और उन्होंने दोनों नकाबपोशों को घेर लिया। धनपत सोच रहा था कि मायारानी भी इसी जगह आ पहुँचेगी लेकिन यह आशा उसकी वृथा ही हुई, क्योंकि उस नकाबपोश की आवाज का सबसे ज्यादा असर मायारानी पर ही हुआ। वह घबरा कर वहाँ से भागी और अपने दवानखाने में जाकर बैठ रही, जहाँ कई लौंडियां पहरा दे रही थीं। आते ही उसने एक लौंडी की जुबानी अपने सिपाहियों को जो बाग के पहले दर्जे में रहा में रहा करते थे, कहला भेजा कि 'खास बाग में फलां जगह पर दो दुश्मन घुस आये हैं, उन्हें जाकर फौरन गिरफ्तार करो और उनका सिर काट कर मेरे पास भेजो।" इधर धनपत ने देखा कि बहुत-सी लौंडियाँ हमारी मदद पर आ पहुंची हैं तो उसे भी कुछ हिम्मत हुई और वह उस नकाबपोश की तरफ देख कर बोला

    धनपत-तुम लोग यहाँ किस काम के लिए आये हो?

    नकाब–इसका जवाब हम तुझ कम्बख्त को क्यों दें? धनपत-मालम होता है कि मौत तम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।

    नकाब-(हँस कर) हाँ, मैं भी यही समझता हूँ कि तेरी मौत हम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।

    इतना सुनते ही धनपत ने नकाबपोश पर खंजर का वार किया। मगर उसने फुर्ती से पैतरा बदल कर वार खाली कर दिया, मगर दूसरे नकाबपोश ने चालाकी से धनपत के पीछे जाकर एक लात उसकी कमर में ऐसे जोर से मारी कि वह औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा। मगर तुरन्त ही सम्हल कर उठ बैठा और दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए लौंडियों को ललकारा। लौंडियां दोनों नकाबपोशों की अवस्था देख परेशान हो रही थीं। एक तो उन्हें विश्वास हो गया कि ये दोनों नकाबपोश मर्द हैं, दूसरे धनपत की ताकत पर उन सभी को बहुत-कुछ भरोसा था सो उसकी भी दुर्दशा आँखों के सामने देखने में आई। तीसरे, नकाबपोश की जुबानी यह सुनकर कि धनपत मर्द है और उसके जवाब में धनपत को चुप पाकर लौंडियों का खयाल बिल्कुल ही बदल गया था, तिस पर भी, वे सब दोनों नकाबपोशों को घेर कर खड़ी हो गई। धनपत ने फिर ललकार कर कहा, "देखो, ये दोनों चोर हैं, भागने न पावें।"

    लम्बे नकाबपोश ने लपक कर बहादुरी के साथ धनपत की दाहिनी कलाई जिसमें खंजर था, पकड़ ली और कहा, "हम लोग भागने के लिए नहीं आये हैं, बल्कि गिरफ्तार होकर एक अनूठा तमाशा दिखाने के लिए आये हैं। मगर तुमको भाग जाने का मौका न देंगे। (लौंडियों की तरफ देख कर) हम लोग स्वयं यहाँ से टलने वाले नहीं हैं और जहाँ कहो चलने के लिए तैयार हैं।"

    धनपत को मालूम हो गया कि ये दोनों नकाबपोश कोई साधारण आदमी नहीं हैं और इनके सामने ताकत का घमंड करना वृथा है। वह सोचने लगा–"अफसोस, अब भारी मुसीबत का सामना हुआ चाहता है।"

    इतने ही में 'चोर-चोर' का गुल मचा और कई मशालों की रोशनी दिखाई दी। यह रोशनी उन सिपाहियों के साथ थी जो बाग के पहले दर्जे में रहने वाले सिपाहियों में से थे और इस समय वे सब मायारानी की आज्ञानुसार दोनों चोरों को अर्थात् इन नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए यहाँ आये थे। बात की बात में वे सब वहाँ पहुंच गये और उन्होंने देखा कि लौंडियों के घेरे में दो नकाबपोश छाती ऊँची किये खड़े हैं और उनमें से एक धनपत की कलाई पकड़े हुए है।

    इसके पहले कि सिपाहियों को दोनों नकाबपोशों के साथ किसी तरह के बर्ताव की नौबत आवे, छोटे नकाबपोश ने ऊंची आवाज में ललकार कर कहा, "भाइयो, तुम लोग यह न समझो कि हम लोग भाग जायेंगे, मैं भागने के लिए नही आया हूँ, मैं तुम लोगों का दुश्मन नहीं हूँ और न तुम लोगों के दुश्मनों का साथी हूँ, बल्कि तुम्हारा सच्चा दोस्त और खैरखाह हूँ। जिस समय सूर्य भगवान के दर्शन होंगे और मैं अपने चेहरे पर से नकाब उठाऊँगा, तुम लोगों को मालूम हो जायगा कि मैं तुम्हारा पुराना साथी हूँ। इस समय मैं तुम लोगों की वह बेवकूफी जाहिर करने आया हूँ, जिसे तुम लोग खुद नहीं जानते हो। हाय, तुम्हारे प्यारे मालिक राजा गोपालसिंह के गले पर छुरी फिर जाय और तुम लोगों को खबर तक न हो? इससे भी बढ़ कर अफसोस की बात तो यह है कि राजा गोपालसिंह को मारने वाला, उनकी उम्मीदों का खून करने वाला, उनकी रिआया के दिल पर सदमा पहुँचाने वाला, उनकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला, उनके धर्म और अर्थ का सत्यानाश करने वाला, दिन-रात तुम्हारे पास रहे, तुम पर हुकूमत करे, तुम्हें बेवकूफ बनावे, और तुम उसका कुछ भी न कर सको! यह मत समझो कि राजा गोपाल सिंह को मरे हुए कई वर्ष हो गये, मैं साबित कर दूंगा कि उनके खून से गीली हुई जमीन भी अभी तक सूखी नहीं है और अगर तुम मुझ से पूछने और यह जानने की इच्छा करोगे कि तुम्हारे राजा गोपालसिंह को किसने मारा या उनका कातिल कौन है तो मैं जरूर उसका भी पता दूंगा और वास्तव में मैं इसी काम के लिए यहां आया भी हूँ।"

    छोटे नकाबपोश की इस बात ने सिपाहियों और पहरा देने वाली लौंडियों का दिल हिला दिया। राजा गोपालसिंह की याद ने और इस खबर ने कि-'उन्हें मरे बहुत दिन नहीं हुए और उनका कातिल इसी जगह रह कर उन पर हुकूमत करता है' उनके दिलों को बेचैन कर दिया। सभी की आँखों से आंसू की बूंदें जारी हो गई और हर तरफ से आवाज आने लगी-'कहो-कहो, जल्द कहो, नेक दिल गरीबपरवर और हमारे हितैषी राजा को मारने वाला दुष्ट कौन है और कहाँ है?" इसके जवाब में छोटे नकाबपोश ने पुनः कहा, 'यही कम्बख्त, जिसे इस समय मेरे साथी ने पकड़ रखा है, तुम्हारे राजा का कातिल तथा उसकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला है। इस बात से मत डरो कि इसकी इज्जत मायारानी के दरबार में बहुत है बल्कि आजमाओ और देखो कि यह मर्द है या औरत! मैं सच कहता हूँ कि यह कई वर्ष से तुम लोगों की आँखों में धूल डाल कर अर्थात् औरत बन कर तुम्हारे घर में रहता है और इस राज्य को चौपट कर रहा है, मगर तुम लोगों को इसकी कुछ भी खबर नहीं है। इतना ही नहीं, मैं तुम लोगों से एक बात और कहूँगा, मगर अभी नहीं, जरा ठहरो, घंटे भर और गम खाओ, सवेरा होने दो और हम दोनों को इसी जगह रहने देकर और कहीं ले जाने का उद्योग मत करो!”

    छोटे नकाबपोश की इस दूसरी बात ने रंग और भी चोखा कर दिया। चारों तरफ सिपाहियों और लौंडियों में गुरचूँ-गुरचूँ और काना-फूसी होने लगी। किसी की आँखों से आँसू जारी था, किसी भी गर्दन शर्म से नीची हो रही थी, किसी ने अफसोस से अपना हाथ अपने कलेजे पर रख लिया, कोई ठुड्डी पकड़ कर सोच रहा था, और कोई दाँत पीस-पीस कर धनपत की तरफ देख रहा था। यद्यपि रात का समय था मगर उन मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी, जो मायारानी के सिपाहियों के हाथ में थे और इस सबब से वहाँ की हर एक चीज साफ दिखाई दे रही थी। सिपाहियों ने धनपत का चेहरा गौर से देखा और उसमें बहुत फर्क पाया। खौफ और तरद्दुद ने धनपत को अधमरा कर दिया था और उसका रंग जर्द हो रहा था। दोनों नकाबपोशों ने जब देखा कि इस समय सिपाहियों के दिलों में जोश बखूबी पैदा हो गया है और वे लोग अब सब्र करना पसन्द न हीं करेंगे तो आपस में कुछ इशारा करने के बाद छोटे नकाबपोश ने धनपत की साड़ी का ऊपरी भाग फुर्ती से खींच लिया और उसकी चोली भी फाड़ डाली, इसके साथ ही दो बनावटी गेंद बाहर गिर पड़े और उसकी सूरत से मर्दानापन झलकने लगा। अब तो मायारानी के सिपाहियों को पूरे दर्जे पर क्रोध चढ़ आया और उन्हें निश्चय हो गया कि उनके मालिक राजा गोपालसिंह इसी कम्बख्त के सबब से मारे गए हैं। पहरा देने वाली जितनी औरतें थीं, सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे की सूरत देखने लगी और उधर सिपाहियों ने पास पहुँच कर धनपत को घेर लिया तथा उसकी दुर्गत करने लगे। ऐसी अवस्था में दोनों नकाबपोश धनपत को छोड़कर अलग जा खड़े हुए। सिपाहियों ने बारी-बारी से धनपत से प्रश्न करना शुरू किया, मगर उसकी अवस्था इस लायक न थी कि किसी के प्रश्न का उत्तर देता। बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद यह राय पक्की हुई कि धनपत को राजदीवान के पास ले चलना चाहिए और इसी के साथ-साथ इन दोनों नकाबपोशों को भी उन्हीं के सामने पेश करना उचित होगा।

    सिपाही लोग जिस समय धनपत के विषय में सोच-विचार कर रहे और क्रोध में भरे हुए थे। दोनों नकाबपोशों से जो धनपत को छोड़ अलग हो गये थे, थोड़ी देर के लिए बिल्कुल बेफिक्र और लापरवाह हो गए थे, मगर इस समय जब यह राय पक्की हुई कि धनपत के साथ ही साथ उन दोनों को भी दीवान साहब के पास ले चलना चाहिए तो उन दोनों की खोज करने लगे, मगर वे, दोनों नकाबपोश मौका पाकर ऐसा गायब हुए कि उनकी झलक तक दिखाई न दी। एक बोला, “अभी इसी जगह तो थे!” दूसरे ने कहा, “यह तो हम भी जानते हैं। मगर यह बताओ कि वे चले कहाँ गए?” तीसरे ने कहा, “भाई वे दोनों भागने वाले तो हैं नहीं, इसी जगह कहीं छिप कर हम लोगों का तमाशा देखते होंगे!” इत्यादि तरह-तरह की बातें सब लोग आपस में करने और दोनों नकाबपोशों को चारों तरफ ढूँढ़ने लगे, लेकिन दोनों वहाँ थे कहाँ, जो पता लगता! आखिर खोजते-ढूँढ़ते सुबह हो गई और इतनी ही देर में इस आश्चर्यजनक घटना की खबर जादू की तरह हवा के साथ मिल कर दूर-दूर तक फैल गई। इस समय मायारानी के सिपाही बिल्कुल ही स्वतन्त्र और खुदराय बल्कि बागियों की तरह हो रहे थे खोजने और ढूँढ़ने पर भी उन्हें जब दोनों नकाबपोशों का पता न लगा तब लाचार होकर कम्बख्त धनपत को घसीटते हुए, वे बाग के बाहर की तरफ रवाना हुए।

    जब इन बातों की खबर मायारानी को पहुँची तो वह बहुत ही घबराई। अपनी तथा धनपत की जान से नाउम्मीद होकर सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए? इस समय उसकी सुरत से उसके दिल का बहुत-कुछ पता लगता था। उसका चेहरा जर्द और पलकें नीचे की तरफ झुकी हुई थीं। कभी-कभी उसके बदन में कंप हो जाता और कभी आँखें चंचल होकर सुर्ख हो जातीं। मगर थोड़ी ही देर बाद उसके होंठ काँपने लगे और आँखों की सुर्थी बढ़ जाने के साथ ही उसका चेहरा भी लाल हो गया जिसे देखते ही वे लौंडियाँ जो उसके सामने मौजूद थीं समझ गई कि अब उसे हद दर्जे का क्रोध चढ़ आया है। कुछ सोच-विचार कर मायारानी बोल उठी, “इस समय उन कम्बख्तों को समझाने-बुझाने का उद्योग करना वृथा समय नष्ट करना है, दूसरे, मैं तिलिस्म की रानी ही क्या ठहरी, जो इन थोड़े-से कम्बख्तों को काबू में न कर सकी या इन थोड़े सिपाहियों को आज्ञा भंग करने की सजा न दे सकी!” इतना कहते ही मायारानी अपने स्थान से उठी और दीवानखाने में से होती हुई उस कोठरी में जा पहुँची, जहाँ से बाग के तीसरे दर्जे में जाने का वह रास्ता था जिसका जिक्र हम उस समय कर आये हैं जब पागल बने तेजसिंह मायारानी की आज्ञानुसार हरनामसिंह द्वारा बाग के तीसरे दर्जे में पहुँचाए गये थे।

    मायारानी कोठरी के अन्दर गई। वहाँ एक दूसरी कोठरी में जाने के लिए दरवाजा था, उस दरवाजे को खोल कर दूसरी कोठरी में गई। वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था, जिसमें उतरने के लिए जंजीर लगी हुई थी। वह इस कुएँ के अन्दर उतर गई और एक लम्बे-चौड़े स्थान में पहुँची, जहाँ बिल्कुल ही अंधकार था। मायारानी टटोलती हुई एक कोने की तरफ चली गई और वहाँ उसने कोई पेंच घुमाया, जिसके साथ ही उस स्थान में बखूबी रोशनी हो गई और वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यह रोशनी शीशे के एक गोले में से निकल रही थी, जो छत के साथ लटक रहा था। यह स्थान, जिसे एक लम्बा-चौड़ा दालान या चारों तरफ दीवार होने के कारण कमरा कहना चाहिए, अद्भुत चीजों और तरह-तरह के कल-पुर्जों से भरा हुआ था। बीच में कतार बाँध कर चौबीस खम्भे संगमरमर के खड़े थे और हर दो खम्भों के ऊपर एक-एक महरादार पत्थर चढ़ा हुआ था, जिसे मामूली तौर पर आप बिना दरवाजे का फाटक कह सकते हैं। इन महराबी पत्थरों के बीचोंबीच बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे और हर एक घण्टे के नीचे एक गरारीदार पहिया था।

    मायारानी ने हर एक महाराब को, जिस पर मोटे-मोटे अक्षर लिखे थे,

    गौर से देखना शुरू किया और एक महाराब के नीचे पहुँच कर खड़ी हो गई जिस पर यह लिखा हुआ था- "दूसरे दर्जे का तिलिस्मी दरवाजा।" मायारानी ने उस पहिये, को घुमाना शुरू किया जो उस महराब में लटकते हुए घण्टे के नीचे था। पहिया चारपाँच दफे घूम कर रुक गया, तब मायारानी वहाँ से हटी और यह कहती हुई घूम कर सामने वाली दीवार के पास गई कि 'देखें अब वे कम्बख्त क्योंकर बाग के बाहर जाते हैं!' दीवार में नम्बरवार बिना पल्ले की पाँच गालमारियाँ थीं और हर एक आलमारी में चार दर्जे बने हुए थे। पहिली आलमारी में शीशे की सुराहियाँ थीं, दूसरी में तांबे के बहुत से डिब्बे थे, तीसरी कागज के मुट्ठों से भरी थी, जिन्हें दीमकों ने बर्बाद कर डाला था, चौथी अष्ट धातु की छोटी-छोटी बहुत-सी मूरतें थीं और पांचवीं आलमारी में केवल चार ताम्रपत्र थे जिनमें खूबसुरत उभरे हुए अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।

    मायारानी उस आलमारी के पास गई जिसमें शीशे की सुराहियाँ थीं और एक सुराही उठा ली। शायद उसमें किसी तरह का अर्क था, जिसे थोड़ा-सा पीने के बाद सुराही हाथ में लिए हए, वहाँ से हटी और दूसरी आलमारी के पास गई, जिसमें तांबे के डिब्बे थे। एक डिब्बा उठा लिया और वहाँ से रवाना हुई। जिस तरह उसका जाना हम लिख आये हैं, उसी तरह घूमती हई वह अपने दीवानखाने में पहुँची। जिसके आगे तरह-तरह के खुशनुमा पत्तों वाले खूबसूरत गमले सजाये हुए थे। वहाँ पहुँच कर उसने वह डिब्बा खोला। उसके अन्दर एक प्रकार की बुकनी भरी हुई थी। उसमें से आधी बुकनी अपने हाथ से खूबसूरत गमलों में छिड़कने के बाद बची हुई आधी बुकनी डिब्बे में लिए हुए वह दीवानखाने की छत पर चढ़ गई और अपने साथ केवल एक लौंडी को जिसका नाम लीला था और जो उसकी सब लौंडियों की सरदार थी, लेती गई। यह सब काम, जो हम ऊपर लिख आये हैं, मायारानी ने बड़ी फुर्ती से उसके पहले-पहले ही कर लिया जब तक कि उसके बागी सिपाही धनपत को लिए हुए बाग के दूसरे दर्जे के बाहर जायें।

    जब मायारानी लीला को साथ लिये हए दीवानखाने की छत पर चढ़ गई तब उसने एक सुराही दिखाकर लीला से कहा, "चल्लू कर, इसमें से थोड़ा सा अर्क तुझे देती हूँ उसे पी जा और आफत से बची रह, जो थोड़ी ही देर में यहाँ के रहने वालों पर आने वाली है।"

    लीला—(हाथ फैला कर) मैं खूब जानती हूँ कि आपकी मेहरबानी जितनी मुझ पर रहती है उतनी और किसी पर नहीं।

    मायारानी—(लीला की अंजुली में अर्क डाल कर) इसे जल्दी पी जा और जो कुछ मैं कहती हूँ उसे गौर से सुन।

    लीला-बेशक मैं पूरा ध्यान देकर सुनंगी, क्योंकि इस समय आपकी अवस्था बिल्कुल ही बदल रही है और यह जानने के लिए मेरा जी बहुत बेचैन है कि अब क्या किया जायगा?

    मायारानी—मैं अपने भेद तुझसे छिपा नहीं रखती। जो कुछ मैं कर चुकी हूँ तुझे सब मालूम है। केवल दो भेद मैंने तझसे छिपाए, जिनमें से एक तो आज खुल ही

    गया और एक का हाल मैं तुझसे फिर किसी समय कहूँगी। इन भेदों के विषय में मेरा विश्वास था कि यदि किसी को मालूम हो जायगा तो मेरी जान आफत में फंस जायगी और आखिर वैसा ही हुआ। तू देख ही चुकी है कि दो कम्बख्त नकाबपोशों ने यहाँ पहुँच कर क्या गजब मचा रखा है। अब जहाँ तक मैं समझती हूं, धनपत का भेद छिपा रहना बहुत मुश्किल है और साथ ही इसके कम्बख्त फौजी सिपाहियों का भी मिजाज बिगड़ गया है। मान लिया जाय कि अगर मैंने किसी तरह की बुराई की भी तो उनको मेरे खिलाफ होना मुनासिब न था। खैर, सिपाही लोग तो उजड्ड हुआ ही करते हैं, मगर मुझसे बुराई करने का नतीजा कदापि अच्छा न होगा। अफसोस, उन लोगों ने इस बात पर ध्यान न दिया कि आखिर मायारानी तिलिस्म की रानी है! देख, मैंने इस बाग के बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया, अब उन लोगों की मजाल नहीं कि यहां से बाहर जा सकें, बल्कि थोड़ी ही देर में तू देखेगी कि उन लोगों को मैं कैसे हलाल करती हूँ। यह दवा जो मैंने गमलों में छिड़की है, बहुत ही तेज और अपनी महक दूर-दूर तक फैलाने वाली है, इससे बढ़कर बेहोशी की कोई दवा दुनिया में न होगी, और यही उन बदमाशों के साथ जहर का काम करेगी। तू उन सभी के पास जा और उन्हें ऊंच-नीच समझा कर मेरे पास ले आ–या-नहीं, अच्छा देख-खैर जाने दे—मैं तुझसे एक बात और कहती हूँ-यह तो मैं समझ ही चुकी कि अब मेरी जान जाना चाहती है मगर तो भी हजारों को मारे बिना मैं न छोडूंगी। अफसोस, वे दोनों कम्बख्त नकाबपोश न मालूम कहाँ चले गए। खैर, देखा जायगा-ओफ, (अपनी ठुड्डी पकड़ के) मुझे शक है-एक तो उनमें से जरूर–हाँ जरूर-जरूर-बेशक वही है और होगा, दूसरा भी-मैं समझ गई, मगर ओफ, उस चीज का जाना ही बुरा हुआ। अच्छा अब मैं दूसरे काम की फिक्र करती हूँ, अब तो जान पर खेलना ही पड़ा, एक दफे तो मुझे तुझे छोड़ हाँ, तू मेरा मतलब तो समझ गई न? इस समय मेरी तबीयत-अच्छा, तू जा, देख मान जाय तो ठीक है, नहीं तो आज इस बाग को मैं उन्हीं के खून से तर करुँगी!

    इस समय मायारानी की बातें यद्यपि बिल्कुल बेढंगी और बेतुकी थों तथापि चालाक और धूर्त लीला उसका मतलब समझ गई और यह कहती हुई वहाँ से रवाना हुई, "आप चिन्ता न कीजिए, मैं अभी जाकर उन सभी को ठीक करती हूँ। जरा आप अपना मिजाज ठिकाने कीजिए और तिलिस्मी कवच को भी झटपट…"

    5

    मायारानी के सिपाही जो दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने आए थे, धनपत को लिए हुए बाग के पहले दर्जे की तरफ रवाना हुए जहाँ वे रहा करते थे, मगर वे इच्छानुसार अपने ठिकाने न पहुँच सके, क्योंकि बाग के दूसरे दर्जे के बाहर निकलने का रास्ता मायारानी की कारीगरी से बन्द हो गया था। ये दरवाजे तिलिस्मी और बहुत

    ही मजबूत थे और इनका खोलना या तोड़ना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। पाठकों को याद होगा कि बाग के दूसरे दर्जे और पहले दर्जे के बीच में एक बहुत लम्बी-चौड़ी दीवार थी जिस पर कमन्द लगा कर चढ़ना भी असम्भव था और सीढ़ियों के जरिए उस दीवार पर चढ़ और उसे लाँघ कर ही एक दर्जे से दूसरे दर्जे में जाना होता था। इस समय जो दरवाजा मायारानी ने तिलिस्मी रीति से बन्द किया है इसी के बाद वह दीवार पड़ती थी जिसे लाँघ कर सिपाही लोग पहले दर्जे में जाते थे। उस दीवार पर चढ़ने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं वे लोहे की थीं और इस समय दोनों तरफ की सीढ़ियाँ दीवार के अन्दर घुस गई थीं इसलिए दीवार पर चढ़ना एकदम असम्भव हो गया था।

    दरवाजे को तिलिस्मी रीति से बन्द देखकर सिपाही लोग समझ गए कि यह मायारानी की कार्रवाई है। इसलिए उन लोगों के दिल में डर पैदा हुआ और वे सोचने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि मायारानी हम लोगों को इसी बाग में फँसा कर मार डाले, क्योंकि आखिर वह तिलिस्म की रानी है, मगर यह विचार उन लोगों के दिल में ज्यादा देर तक न रहा क्योंकि राजा गोपालसिंह के साथ दगा किये जाने का जो हाल नकाबपोशों की जुबानी सुना था उस पर उन लोगों को पूरा-पूरा विश्वास हो गया था और इसी सबब से गुस्से के मारे उन सब की अवस्था ही बदली हुई थी।

    आखिर धनपत को साथ लिए हुए वे सिपाही यह सोच कर पीछे की तरफ लौटे कि उस चोरदरवाजे की राह से बाहर निकल जायँगे जिस राह से दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर घुसे थे, मगर उस ठिकाने पर पहुँचकर भी वे लोग बहुत ही घबराये और ताज्जुब करने लगे क्योंकि उन्हें वह खिड़की कहीं नजर न आई। हाँ एक निशान दीवार में जरूर पाया जाता था, जिससे यह कहा जा सकता था कि शायद इसी जगह वह खिड़की रही होगी। यह निशान भी मामूली न था बल्कि ऐसा मालूम होता था कि दीवार वाले चोरदरवाजे पर फौलादी चादर जड़ दी गई है। अब उन सिपाहियों को पहले से भी ज्यादा तरदुद्द हुआ क्योंकि सिवाय उन दोनों रास्तों के बाहर निकलने का कोई और जरिया न था। एक बार उन सिपाहियों के दिल में यह भी आया कि मायारानी की तरफ चलना चाहिए, मगर खौफ से ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी।

    उस समय दिन घण्टे भर से कुछ ज्यादा चढ़ चुका था। सिपाही लोग क्रोध की अवस्था में भी तरदुद्द और घबराहट से खाली न थे और खड़े-खड़े सोच ही रहे थे कि किधर जाना और क्या करना चाहिए कि इतने ही में सामने से लीला आती हुई दिखाई पड़ी। जब वह पास पहुंची तो सिपाहियों की तरफ देख कर ऊँची आवाज में बोली, "तुम लोग अपनी जान के दुश्मन क्यों हो रहे हो? क्या तुम जमानिया राज्य के नौकर हो कर भी इस बात को भूल गए कि मायारानी एक भारी तिलिस्म की रानी है और जो चाहे कर सकती है? दो-चार सौ आदमियों को बरबाद कर डालना उसके लिए एक अदना काम है। अफसोस, ऐसे मालिक के खिलाफ होकर तुम अपनी जान बचाना चाहते हो? याद रक्खो कि इस बाग में भूखे-प्यासे मर जाओगे, तुम्हारे किए कुछ भा न होगा। मैं तुम लोगों को समझाती हूँ और कहती हैं कि अपने मालिक के पास चलो और उससे माफी मांग कर अपनी जान बचाओ।" इसी तरह की ऊँच-नीच की बहुत-सी बातें लीला उन सिपाहियों से देर तक कहती रही और सिपाही लोग भी लीला की बात पर गौर कर ही रहे थे कि यकायक बाईं तरफ से एक शंख के बजने की आवाज आई, घूम कर देखा तो वे ही दोनों नकाबपोश दिखाई पड़े जो हाथ के इशारे से उन सिपाहियों को अपनी तरफ बुला रहे थे। उन्हें देखते ही सिपाहियों की अवस्था बदल गई और उनके दिल के अन्दर उम्मीद, रंज, डर और तरदुद्द का चर्खा तेजी के साथ घूमने लगा। लीला की बातों पर जो कुछ सोच कर रहे थे उसे छोड़ दिया और धनपत को साथ लिए हुए इस तरह दोनों नकाबपोशों की तरफ बढ़े जैसे प्यासे पंसाले (पौसारे) की तरफ लपकते हैं।

    जब उन दोनों नकाबपोशों के पास पहुंचे तो एक नकाबपोश ने पुकार कर कहा, "इस बात से मत घबराओ कि मायारानी ने तुम लोगों को मजबूर कर दिया और इस बाग से बाहर जाने लायक नहीं रक्खा। आओ हम तुम सभी को इस बाग से बाहर कर देते हैं मगर इसके पहले तुम्हें एक ऐसा तमाशा दिखाना चाहते हैं जिसे देख कर तुम बहुत ही खुश हो जाओगे और हद से ज्यादा बेफिक्री तुम लोगों के भाग में पड़ेगी, मगर वह तमाशा हम एकदम से सभी को नहीं दिखाना चाहते। मैं एक कोठरी में (हाथ का इशारा करके) जाता हूँ, तुम लोग बारी-बारी से पांच-पाँच आदमी आओ और अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा तथा आश्चर्यजनक तमाशा देखो।"

    इस समय दोनों नकाबपोश जिस जगह खड़े थे, उसके पीछे की तरफ एक दीवार थी जो बाग के दूसरे और तीसरे दर्जे की हद को अलग कर रही थी और उसी जगह पर एक मामूली कोठरी भी थी। बात पूरी होते ही दोनों नकाबपोश पाँच सिपाहियों को अपने साथ आने के लिए कहकर उस कोठरी के अन्दर घुस गए। इस समय इन सिपाहियों की अवस्था कैसी थी, इसे दिखाना जरा कठिन है। न तो इन लोगों का दिल उन दोनों नकाबपोशों के साथ दुश्मनी करने की आज्ञा देता था और न यही कहता था कि उन दोनों को छोड़ दो और जिधर जाएँ जाने दो।

    जब दोनों नकाबपोश कोठरी के अन्दर घुस गए तो उसके बाद पाँच सिपाही जो दिलावर और ताकतवर थे कोठरी में घुसे और चौथाई घड़ी तक उसके अन्दर रहे। इसके बाद जब वे उस कोठरी के बाहर निकले तो उनके साथियों ने देखा कि उन पाँचों के चेहरे से उदासी झलक रही है, आँखों से आँसू की बूंदें टपक रही हैं और वे सिर झुकाए अपने साथियों की तरफ आ रहे हैं। जब पास आए तो उन पाँचों की अवस्था एकदम बदल जाने का सबब सिपाहियों ने पूछा जिसके जवाब में उन पांचों ने कहा, "पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम लोग पाँच-पाँच आदमी बारी-बारी से जाओ और जो कुछ है अपनी आँखों से देख लो, हम लोगों से पूछोगे तो कुछ भी न बतायेंगे, हां इतना अवश्य कहेंगे कि वहाँ जाने में किसी तरह का हर्ज नहीं है।"

  • चन्द्रकांता सन्तति २

    चन्द्रकांता सन्तति २

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    चन्द्रकांता सन्तति २
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    पाँचवाँ भाग

    1

    बेचारी किशोरी को चिता पर बैठाकर जिस समय दुष्टा धनपति ने आग लगाई, उसी समय बहुत-से आदमी, जो उसी जंगल में किसी जगह छिपे हुए थे, हाथों में नंगी तलवारें लिये 'मारो! मारो!' कहते हुए उन लोगों पर आ टूटे। उन लोगों ने सबसे पहले किशोरी को चिता पर से खींच लिया और इसके बाद धनपति के साथियों को पकड़ने लगे।

    पाठक समझते होंगे कि ऐसे समय में इन लोगों के आ पहुँचने और जान बचने से किशोरी खुश हुई होगी और इन्द्रजीतसिंह से मिलने की कुछ उम्मीद भी उसे हो गई होगी। मगर नहीं, अपने बचानेवालों को देखते ही किशोरी चिल्ला उठी और उसके दिल का दर्द पहले से भी ज्यादा बढ़ गया। किशोरी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, "मुझे तो विश्वास हो गया था कि इस चिता में जलकर ठंडे-ठंडे बैकुण्ठ चली जाऊँगी, क्योंकि इसकी आँच कुँअर इन्द्रजीतसिंह की जुदाई की आँच से ज्यादा गर्म न होगी, मगर हाय, इस बात का गुमान भी न था कि यह दुष्ट आ पहुँचेगा और मैं एक सचमुच की तपती हुई भट्ठी में झोंक दी जाऊँगी। मौत, तू कहाँ है? तू कोई वस्तु है भी या नहीं, मुझे तो इसी में शक है!"

    वह आदमी, जिसने ऐसे समय में पहुँचकर किशोरी को बचाया, माधवी का दीवान अग्निदत्त था, जिसके चंगुल में फँसकर किशोरी ने राजगृह में बहुत दुःख उठाया था और कामिनी की मदद से, जिसका नाम कुछ दिनों तक किन्नरी था, छुट्टी मिली थी। किशोरी को अपने मरने की कुछ भी परवाह न थी और वह अग्निदत्त की सूरत देखने की बनिस्बत मौत को लाख दर्जे उत्तम समझती थी, यही सबब था कि इस समय उसे अपनी जान बचने का रंज हुआ।

    अग्निदत्त और उसके आदमियों ने किशोरी को तो बचा लिया, मगर जब उसके दुश्मनों को, अर्थात् धनपति और उसके साथियों को, पकड़ने का इरादा किया तो लड़ाई गहरी हो पड़ी। मौका पाकर धनपति भाग गई और गहन वन में किसी झाड़ी के अन्दर छिपकर उसने अपनी जान बचाई। उसके साथियों में से एक भी न बचा, सब मारे गये। अग्निदत्त के भी केवल दो ही आदमी जीवित बचे। उस संगदिल ने रोती और चिल्लाती हुई बेचारी किशोरी को जबर्दस्ती उठा लिया और एक तरफ का रास्ता लिया।

    पाठक आश्चर्य करते होंगे कि अग्निदत्त को तो राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने राजगृह में गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया था, वह यकायक यहाँ कैसे आ पहुँचा? इसलिए अग्निदत्त का थोड़ा-सा हाल इस जगह लिख देना हम मुनासिब समझते हैं।

    राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने दीवान अग्निदत्त को गिरफ्तार करके अपने बीस सवारों के पहरे में चुनारगढ़ रवाना कर दिया और एक चिट्ठी भी सब हाल की महाराज सुरेन्द्रसिंह को लिखकर उन्हीं लोगों की मार्फत भेजी। अग्निदत्त को हथकड़ी डाल घोड़े पर सवार कराया गया और उसके पैर रस्सी से घोड़े की जीन के साथ बाँध दिये गए। घोड़े की लम्बी बागडोर दोनों तरफ से दो सवारों ने पकड़ ली और सफर शुरू किया। तीसरे दिन जब वे लोग सोन नदी के पास पहुँचे, अर्थात् जब वह नदी दो कोस दूर रह गई, तब उन लोगों पर डाका पड़ा। पचास आदमियों ने चारों तरफ से घेर लिया। घण्टे भर की लड़ाई में राजा वीरेन्द्रसिंह के सब आदमी मारे गये। खबर पहुँचाने के लिए भी एक आदमी न बचा और अग्निदत्त को उन लोगों के हाथों से छुट्टी मिली। वे डाकू सब अग्निदत्त के तरफदार और उन लोगों में से थे जो गयाजी में फसाद मचाया करते और उन लोगों की जानें लेते और घर लूटते थे जो दीवान अग्निदत्त के विरुद्ध जाने जाते। इस तरह अग्निदत्त को छुट्टी मिली और बहुत दिन तक इस डाके की खबर राजा वीरेन्द्रसिंह या उनके आदमियों को न मिली।

    यद्यपि दीवान अग्निदत्त के हाथ से गया की दीवानी जाती रही और वह एक साधारण आदमी की तरह मारा-मारा फिरने लगा, तथापि वह अपने साथी डाकुओं में मालदार गिना जाता था क्योंकि उसके पास जुल्म की कमाई हुई दौलत बहुत थी और वह उस दौलत को राजगृह से थोड़ी दूर पर एक मढ़ी में, जो पहाड़ी के ऊपर थी, रखता था। इस मढ़ी का हाल दस-बारह आदमियों के सिवाय और किसी को भी मालूम न था। उस दौलत को निकालने में अग्निदत्त ने विलम्ब न किया और उसे अपने कब्जे में लेकर साथी डाकुओं के साथ अपनी धुन में चारों तरफ घूमने तथा इस बात की टोह लेने लगा कि राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ क्या होता है।

    थोड़े ही दिन बाद मौका समझकर वह रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमने लगा और जिस तरह किशोरी से मिला, उसका हाल आप ऊपर पढ़ चुके हैं।

    जिस जगह अग्निदत्त किशोरी से मिला था, उससे थोड़ी ही दूर पर एक पहाड़ी थी जिसमें कई खोह और गार थे। वह किशोरी को उठाकर उसी पहाड़ी पर ले गया। रोते और चिल्लाते-चिल्लाते किशोरी बेहोश हो गई थी। अग्निदत्त ने उसे खोह के अन्दर ले जाकर लिटा दिया और आप बाहर चला आया।

    पहर रात जाते-जाते जब किशोरी होश में आई, तो उसने अपने को अजब हालत में पाया। ऊपर-नीचे चारों तरफ पत्थर देखकर वह समझ गई कि मैं किसी खोह में हूँ। एक तरफ चिराग जल रहा था‌। गुलाब की फूल-सी नाजुक किशोरी की अवस्था इस समय बहुत ही नाजुक थी। अग्निदत्त की याद से उसे घड़ी-घड़ी में रोमांच होता था। उसके धड़कते हुए कलेजे में अजब तरह का दर्द था। और इस सोच ने उसे बिल्कुल ही निकम्मा कर रखा था कि देखें चाण्डाल अग्निदत्त के पहुँचने पर मेरी क्या दुर्दशा होती है। घण्टों की मेहनत में बड़ी कोशिश करके उसने अपने होश-हवास दुरुस्त किए और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उसने इस इरादे को तो पक्का कर ही लिया था कि अगर अग्निदत्त मेरे पास आवेगा, तो पत्थर पर सिर पटक कर अपनी जान दे दूँगी, मगर यह भी सोचती थी कि पत्थर पर सिर पटकने से जान नहीं जा सकती, किसी तरह खोह के बाहर निकल कर ऐसा मौका ढूँढ़ना चाहिए कि अपने को इस पहाड़ के नीचे गिराकर बखेड़ा खत्म कर दिया जाय, जिसमें हमेशा के लिए इस खिंचाखिंची से छुट्टी मिले।

    किशोरी चिराग बुझाने के लिए उठी ही थी कि सामने से किसी के पैरों की चाप मालूम हुई। वह डर कर उसी तरफ देखने लगी कि यकायक अग्निदत्त पर नजर पड़ी। देखते ही वह काँप गई, ऐसा मालूम हुआ कि रगों में खून की जगह पारा भर गया। वह अपने को किसी तरह सम्हाल न सकी और जमीन पर बैठ कर रोने लगी। अग्निदत्त सामने आकर खड़ा हो गया और बोला––

    अग्निदत्त––तुमने मुझको बड़ा ही धोखा दिया। अपने साथ मेरी लड़की को भी मुझसे जुदा कर दिया। अभी तक मुझे इस बात का पता न लगा कि मेरी स्त्री पर क्या बीती और वीरेन्द्रसिंह ने उसके साथ क्या सलूक किया, और यह सब तुम्हारी बदौलत हुआ।

    किशोरी––फिर भी मैं कहती हूँ कि यदि मुझे छोड़ दोगे, तो मैं राजा वीरेन्द्रसिंह से कहकर तुम्हारा कसूर माफ करा दूँगी और तुम्हारी जीविका-निर्वाह के लिए भी बन्दोबस्त हो जायगा। नहीं तो याद रखना, तुम्हारी स्त्री भी…

    अग्निदत्त––जो तुम कहोगी, सो मैं समझ गया। मेरी स्त्री पर चाहे जो बीते इसकी परवाह नहीं, न मुझे वीरेन्द्रसिंह का डर है। मुझे दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई चीज नहीं दिखाई देती। देखो, तुम्हारे लिए मैंने कितना दुख भोगा और भोगने को तैयार हूँ, क्या अब भी तुमको मुझ पर तरस नहीं आता! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हें अपनी जान से ज्यादा प्यार करूँगा, यदि मेरी होकर रहोगी।

    किशोरी––अरे दुष्ट चाण्डाल, खबरदार, फिर ऐसी बात मुँह से न निकालना!

    अग्निदत्त––चाहे जो हो, मैं तुम्हें किसी तरह नहीं छोड़ सकता!

    किशोरी––जान जाय तो जाय, मगर तेरी हवा अपने बदन से नहीं लगने दूँगी।

    अग्निदत्त––(हँस कर) देखूँ, तू अपने को मुझसे कैसे बचाती है!

    इतना कहकर अग्निदत्त किशोरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। किशोरी घबराकर उठ खड़ी हुई और दूर हट गई। थोड़ी देर तक तो इस तंग जगह में दौड़-धूप कर किशोरी ने अपने को बचाया, मगर कहाँ तक? आखिर मर्द के सामने औरत की क्या पेश आ सकती थी! अग्निदत्त को क्रोध आ गया। उसने किशोरी को पकड़ लिया और जमीन पर पटक दिया।

    2

    पाठक अभी भूले न होंगे कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह कहाँ हैं। हम ऊपर लिख आए हैं कि उस मकान में जो तालाब के अन्दर बना हुआ था, कुँअर इन्द्रजीतसिंह दो औरतों को देखकर ताज्जुब में आ गए। कुमार उन औरतों का नाम नहीं जानते थे मगर पहचानते जरूर थे, क्योंकि उन्हें राजगृह में माधवी के यहाँ देख चुके थे और जानते थे कि ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं। परन्तु यह जानने के लिए कुमार व्याकुल हो रहे थे कि ये दोनों ‌यहाँ कैसे आई। क्या इस औरत से, जो इस मकान की मालिक है, और उस माधवी से कोई सम्बन्ध है? इसी समय उन दोनों औरतों के पीछे-पीछे वह औरत भी आ पहुँची जिसने इन्द्रजीतसिंह के ऊपर अहसान किया था और जो उस मकान की मालिक थी। अभी तक इस औरत का नाम मालूम नहीं हुआ, मगर आगे इससे काम बहुत पड़ेगा, इसलिए जब तक इसका असल नाम मालूम न हो कोई बनावटी नाम रख दिया जाय तो उत्तम होगा, मेरी समझ में तो कमलिनी नाम कुछ बुरा न होगा।

    जिस समय कुँअर इन्द्रजीतसिंह की निगाह उन दोनों औरतों पर पड़ी, वे हैरान होकर उनकी तरफ देखने लगे। उसी समय दौड़ती हुई कमलिनी भी आई और दूर ही से बोली––

    कमलिनी––कुमार, इन दोनों हरामजादियों का कोई मुलाहिजा न कीजिएगा और न किसी तरह की जुबान ही दीजिएगा। अपनी जान बचाने के लिए ही दोनों आपके पास आई हैं।

    इन्द्रजीतसिंह––क्या मामला है? ये दोनों कौन हैं?

    कमलिनी––ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं और आपकी जान लेने आई थीं। मेरे आदमियों के हाथ गिरफ्तार हो गईं।

    इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारे आदमी कहाँ हैं? मैंने तो इस मकान में सिवाय तुम्हारे किसी को भी नहीं देखा!

    कमलिनी––बाहर निकलकर देखिये, मेरे वे सिपाही यहीं मौजूद हैं जिन्होंने इन्हें गिरफ्तार किया।

    इन्द्रजीतसिंह––अगर ये गिरफ्तार होकर आई हैं तो इनके हाथ-पैर खुले क्यों हैं?

    कमलिनी––इसके लिए कोई हर्ज नहीं। ये मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, जब तक कि मैं जागती हूँ या अपने होश में हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह––(उन दोनों की तरफ देखकर) तुम क्या कहती हो?

    एक––(कमलिनी की तरफ इशारा करके) ये जो कुछ कहती हैं, ठीक है। परन्तु आप वीर पुरुष हैं, आशा है कि हम लोगों का अपराध क्षमा करेंगे!

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह इन बातों को सुनकर सोच में पड़ गये। उन्हें उन दोनों औरतों की और कमलिनी की बातों का विश्वास न हुआ, बल्कि यकीन हो गया कि ये लोग किसी तरह का धोखा देना चाहती हैं। आधी घड़ी तक सोचने के बाद कुमार बँगले के बाहर निकले तो देखा कि तालाब के बाहर लगभग बीस सिपाही खड़े आपस में कुछ बातें कर रहे और घड़ी-घड़ी इसी तरफ देख रहे हैं। कुमार वहाँ से लौट आये और कमलिनी की तरफ देखकर बोले––

    इन्द्रजीतसिंह––खैर, जो तुम्हारे जी में आये करो, हम इस बारे में कुछ नहीं कह सकते।

    कमलिनी––करना क्या है, इन दोनों का सिर काटा जायगा।

    इन्द्रजीतसिंह––खुशी तुम्हारी। मैं जरा इस तालाब के बाहर जाना चाहता। हूँ।

    कमलिनी––क्यों?

    इन्द्रजीतसिंह––यह समय मजेदार है। जरा मैदान की हवा खाऊँगा और उस घोड़े की भी खबर लूँगा जिस पर सवार होकर आया था।

    कमलिनी––इस मकान की छत पर चढ़ने से अच्छी और साफ हवा आपको मिल सकती है। घोड़े के लिए चिन्ता न करें, या फिर ऐसा ही है तो सवेरे जाइयेगा!

    न मालूम, क्या सोचकर इन्द्रजीतसिंह चुप हो रहे। कमलिनी ने उन दोनों औरतों का हाथ पकड़ा और धमकाती हुई न जाने कहाँ ले गई, इसका हाल कुमार को न मालूम हुआ और न उन्होंने जानने का उद्योग ही किया।

    यद्यपि इस औरत अर्थात् कमलिनी ने कुमार की जान बचाई थी, तथापि उन्हें विश्वास हो गया कि कमलिनी ने दोस्ती की राह पर यह काम नहीं किया, बल्कि किसी मतलब से किया है। उस मकान में गुलदस्ते के नीचे से जो चिट्ठी कुमार ने पाई थी, उसके पढ़ने से कुमार होशियार हो गये थे तथा समझ गये थे कि यह मुझे किसी फरेब में फँसाना चाहती है और किशोरी के साथ भी किसी तरह की बुराई किया चाहती है। इसमें कोई शक नहीं कि कुमार इसे चाहने लगे थे और जान बचाने का बदला चुकाने की फिक्र में थे, मगर उस चिट्ठी के पढ़ते ही उनका रंग बदल गया और वे किसी दूसरी ही धुन में लग गए।

    कुमार चाहते तो शायद यहाँ से निकल भागते, क्योंकि उस औरत की तरफ से होशियार हो चुके थे, मगर इस काम में उन्होंने यह समझकर जल्दी न की कि इस औरत का कुछ हाल मालूम करना चाहिए और जानना चाहिए कि यह कौन है। पर कमलिनी को कुमार के दिल की क्या खबर थी, उसने तो सोच रखा था कि मैंने कुमार पर अहसान किया है और वे किसी तौर पर मुझसे बदगुमान न होंगे।

    कुमार के पास इस समय सिवाय कपड़ों के कोई चीज ऐसी न थी जिससे वे अपनी हिफाजत करते या समय पड़ने पर मतलब निकाल सकते।

    कुछ दिन बाकी था जब कुमार उस मकान की छत पर चढ़ गए और चारों तरफ के पहाड़, जंगल तथा मैदान के बाहर देखने लगे। कुमार को यह जगह बहुत ही पसन्द आई और उन्होंने दिल में कहा कि यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो सब बखेड़ों से छुट्टी पा कर किशोरी के साथ कुछ दिनों तक इस मकान में जरूर रहेंगे। थोड़ी देर तक प्रकृति की शोभा देखकर दिल बहलाते रहे, जब सूर्य अस्त हो गया तो कमलिनी भी वहाँ पहुँची और कुमार के पास खड़ी होकर बातचीत करने लगी।

    कमलिनी––यहाँ से अच्छी बहार दिखाई देती है।

    कुमार––ठीक है मगर यह छटा मेरे दिल को किसी तरह नहीं बहला सकती।

    कमलिनी––सो क्यों?

    कुमार––तरह-तरह की फिक्रों और तरद्दुदों ने मुझे दुखी कर रखा है, बल्कि यहाँ आने और तुम्हारे मिलने से तरद्दुद और भी ज्यादा हो गया।

    कमलिनी––यहाँ आकर कौन सी फिक्र बढ़ गई?

    कुमार––यह तो तब कह सकता हूँ जब कुछ तुम्हारा हाल मुझे मालूम हो। अभी तो मैं यह भी नहीं जानता कि तुम कौन हो और कहाँ की रहने वाली हो और इस मकान में आके रहने का सबब क्या है।

    कमलिनी––कुमार, मुझे आपसे बहुत बातें कहनी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मेरे बारे में आप तरह-तरह की बातें सोचते होंगे, कभी मुझे खैर-ख्वाह तो कभी बदख्वाह समझते होंगे, बल्कि बदख्वाह समझने का मौका ही ज्यादा मिलता होगा। अक्सर उन लोगों ने जो मुझे जानते हैं, मुझे शैतान और खूनी समझ रखा है, और इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। मैं उन लोगों का जिक्र इस समय केवल इसीलिए करती हूँ कि शायद उन लोगों ने, जो केवल दो-तीन ऐयार लोग हैं, कुछ चर्चा आपसे की हो।

    कुमार––नहीं, मैंने किसी से कभी तुम्हारा जिक्र नहीं सुना।

    कमलिनी––खैर, ऐसा मौका न पड़ा होगा। पर मेरा मतलब यह है कि जब तक मैं अपने मुँह से कुछ न कहूँगी, मेरे बारे में कोई भी अपनी राय ठीक नहीं कह सकता और …

    इतने ही में सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आवाज मालूम हुई जिसे सुनकर दोनों चौंके और उसी तरफ देखने लगे।

    कुमार––इस मकान में तो केवल तुम्हीं रहती हो?

    कमलिनी––नहीं, और भी कई आदमी रहते हैं, मगर वे लोग उस समय नहीं थे जब आप आए थे।

    दो लौंडियाँ आती हुई दिखाई पड़ीं। एक के हाथ में छोटा-सा गलोचा था, दूसरी के हाथ में शमादान और तीसरी पानदान लिये हुए थी। गलीचा बिछा दिया गया, शमादान और पानदान रखकर लौंडियाँ हाथ जोड़े सामने खड़ी हो गई। कमलिनी के कहने से कुमार गलीचे पर बैठ गए और कमलिनी भी पास बैठ गई। इस समय इन तीनों लौंडियों का वहाँ पहुँचकर बातचीत में बाधा डालना कुमार को बहुत बुरा मालूम हुआ, क्योंकि वे बड़े ही गौर से कमलिनी की बातें सुन रहे थे और इस बीच में उनके दिल की अजीब हालत थी। कुमार ने कमलिनी की तरफ देख के कहा, "हाँ, तुम अपनी बातों का सिलसिला मत तोड़ो।"

    कमलिनी––(लौंडियों की तरफ देखकर) अच्छा, तुम लोग जाओ! बहुत जल्दी खाने का बन्दोबस्त करो। कुमार––अभी खाने के लिए जल्दी न करो।

    कमलिनी––खैर, ये लोग अपना काम पूरा कर रखें, आप जब चाहें, भोजन करें।

    कुमार––अच्छा हाँ, तब?

    कमलिनी––(डिब्बे से पान निकालकर) लीजिए, पान खाइए।

    कुमार ने पान हाथ में रख लिया और पूछा, "हाँ, तब?"

    कमलिनी––पान खाइए, आप डरिए मत, इसमें बेहोशी की दवा नहीं मिली है। हाँ, अगर आप ऐसा खयाल करें भी तो कोई बेमौका नहीं!

    कुमार––(हँस कर) इसमें कोई शक नहीं कि इतनी खैरख्वाही करने पर भी मैं तुम्हारी तरफ से बदगुमान हूँ। मगर तुम्हारी बातें अजब ढंग पर चल रही हैं। (पान खाकर) अब जो हो, जब तुमने मेरी जान बचाई है तो कब हो सकता है कि तुम अपने हाथ से मुझे जहर दो।

    कमलिनी––(हँसकर) कुमार, यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि आप मुझ पर शक करें। माधवी की दोनों लौंडियों का मामला, जो अभी थोड़ी देर हुआ, आप देख चुके हैं, मुझ पर शक करने का मौका आपको देगा। मगर नहीं, आप पूरा विश्वास रखिए कि मैं आपके साथ कभी बुराई न करूँगी। कई आदमी मेरी शिकायत आपसे करेंगे, आप ही के कई ऐयार असल हाल न जानने के कारण मेरे दुश्मन हो जायँगे, मगर सिवाय कसम खाकर कहने के और किस तरह आपको विश्वास दिलाऊँ कि मैं आपकी खैरख्वाह हूँ। आप यह भी सोच सकते हैं कि मैं आपके साथ इतनी खैरख्वाह क्यों हो रही हूँ! दुनिया का कायदा है कि बिना मतलब कोई किसी का काम नहीं करता और मैं भी दुनिया के बाहर नहीं हूँ, अस्तु मैं भी आपसे बहुत-कुछ उम्मीद करती हूँ मगर उसे जुवान से कह नहीं सकती। अभी आपको मुझसे वर्षों तक काम पड़ेगा, जब आप हर तरह से निश्चिन्त हो जायँगे, आपकी किशोरी, जो इस समय रोहतासगढ़ में कैद है, आपको मिल जायगी। इसके अतिरिक्त एक और भी भारी काम आपके हाथ से हो लेगा, तब कहीं मेरी मुराद पूरी होगी, अर्थात् उस समय मुझे जो कुछ आपसे माँगना होगा, माँगूंगी। आप मेरी बात याद रखिएगा कि आप ही के ऐयार मेरे दुश्मन होंगे और अन्त में झख मार के मुझ ही से दोस्ती के तौर पर सलाह लेनी पड़ेगी। आप यह भी न समझिए कि मैं आज या कल से आपकी तरफदार बनी हूँ, नहीं, बल्कि मैं महीनों से आपका काम कर रही हूँ और इस सबब से सैकड़ों आदमी मेरे दुश्मन हो रहे हैं। दुश्मनों ही के डर से मैं इस तालाब में छिपकर बैठी रहती हूँ क्योंकि जिन्हें इसका भेद मालूम नहीं है वे इस मकान के अन्दर पैर नहीं रख सकते। आप मुझे अकेली समझते होंगे, मगर मैं अकेली नहीं हूँ, लौंडियाँ, सिपाही और ऐयार मिलाकर इस गई-गुजरी हालत में भी पचास आदमी मेरी तावेदारी कर रहे हैं।

    कुमार––वे लोग कहाँ हैं?

    कमलिनी––उनमें से कई आदमियों को तो आप इसी जगह बैठे देखेंगे, बाकी सब को मैंने काम पर भेजा है। जब मैं आपकी खैरख्वाह हूँ तो किशोरी की मदद भी जरूर ही करनी पड़ेगी, इसलिए मेरी एक ऐयार रोहतासगढ़ किले के अन्दर भी घुस कर बैठी है और किशोरी के हाल-चाल की खबर दिया करती है। अभी कल ही उसने एक चिट्ठी भेजी थी, (कमर से चिट्ठी निकाल कर और कुमार के हाथ में देकर) लीजिए यही चिट्ठी है, पहले आप इसे पढ़ लीजिए फिर और कुछ कहूँगी।

    कुमार हाथ में चिट्ठी लेकर गौर से पढ़ने लगे। यह वही चिट्ठी थी जिस पर पहले कुमार की निगाह पड़ चुकी थी और जिसे एक गुलदस्ते के नीचे से निकाल कर कुमार पढ़ चुके थे। कुमार ने चोरी से उस चिट्ठी को पढ़ने का हाल कमलिनी से कहना मुनासिब न समझा और उसे इस तौर पर पढ़ गए जैसे पहली दफे वह चिट्ठी उनके हाथ में पड़ी हो। परन्तु इस समय इस तरह कमलिनी उनकी दुश्मन नहीं है इस बात को वे अच्छी तरह समझ गए। मगर साथ-ही-साथ उनके दिल में एक दूसरी ही तरह की उत्कण्ठा बढ़ गई और वे यह जानने के लिए व्याकुल हो गए कि कमलिनी और इसकी ऐयारा ने रोहतासगढ़ किले में पहुँच कर क्या किया!

    पाठक, शायद आप इस चिट्ठी का मजमून भूल गए होंगे, मगर आप उसे याद करें या पुनः पढ़ जायँ, क्योंकि उसके एक-एक शब्द का मतलब इस समय कमलिनी से कुमार पूछना चाहते हैं।

    कुमार––मैं नहीं कह सकता और न मुझे मालूम ही है कि तुम इतनी भलाई मेरे साथ क्यों कर रही हो, तो भी मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इस समय मुझे चिन्ता में डाल कर दुःख न दोगी, बल्कि जो मैं पूछूँगा उसका ठीक-ठीक जवाब दोगी।

    कमलिनी––आप मेरी तरफ से किसी तरह का बुरा खयाल न रक्खें। आज मैं इस बात पर मुस्तैद हूँ कि अगर आपको कष्ट न हो तो रात भर जाग के बहुत कुछ हाल जो अब तक आपको मालूम नहीं है और आपके मतलब का है, आपसे कहूँ और जो-जो सवाल आप करें, उसका जवाब दूँ।

    कुमार––मुझे तुम्हारे इस कहने से बड़ी खुशी हुई। अच्छा पहले इस बात का जवाब दो कि तुम्हारी वह ऐयारा, जो रोहतासगढ़ में है और इस चिट्ठी के पढ़ने से जिसका नाम तारा मालूम होता है, रोहतासगढ़ में किस तौर पर है? जहाँ तक मैं सोचता हूँ वह भेष बदल कर नौकरी करती होगी?

    कमलिनी––नहीं, उसने नौकरी नहीं, बल्कि वहाँ इस तरह छिपकर रहती है कि वहाँ के किसी आदमी को उसका पता लग जाना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है।

    कुमार––अच्छा, तो उसने यह क्या लिखा है कि––'किशोरी का आशिक भी यहाँ मौजूद है!'

    कमलिनी––यह कटाक्ष माधवी के दीवान अग्निदत्त पर है, क्योंकि हम लोगों के हिसाब से वह किशोरी पर आशिक है! वह आपकी तरह सच्चा आशिक नहीं है, मगर बेईमान ऐयारों की तरह जरूर आशिक है।

    कुमार––नहीं-नहीं, उसे तो हमारे आदमियों ने गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया है!

    कमलिनी––आपका यह खयाल गलत है। वह चुनार नही पहुँचा, न मालूम किस तरह उसने अपनी जान बचा ली है। इसका हाल आपको लश्कर में जाने या किसी को चुनारगढ़ भेजने से मालूम होगा।

    कुमार––तो क्या वह भी रोहतासगढ़ पहुँच गया?

    कमलिनी––पहुँच ही गया तभी तो तारा ने लिखा है।

    कुमार––अच्छा, तो ये लाली और कुन्दन कौन हैं?

    कमलिनी––आपकी और मेरी दुश्मन, इन दोनों को मामूली दुश्मन न समझिएगा।

    कुमार––इसमें किशोरी के आशिक के बारे में लिखा है कि 'उसे किशोरी से बहुत-कुछ उम्मीद भी है'––इसका मतलब क्या है?

    कमलिनी––सो ठीक अभी मालूम नहीं हुआ।

    कुमार––यह जवाब तुमने बड़े खुटके का दिया।

    कमलिनी––(हँसकर) आप चिन्ता न करें। किशोरी तन-मन-धन आपको समर्पण कर चुकी है, वह किसी दूसरे की न होगी।

    कुमार––खैर, जब खुलासा हाल मालूम ही नहीं है तो जो कुछ सोचा जाय, मुनासिब है। इसमें लिखा है कि 'किशोरी ने भी पूरा धोखा खाया'––सो क्या?

    कमलिनी––इसका भी हाल अभी नहीं मालूम हुआ। शायद आज-कल में कोई दूसरी चिट्ठी आवेगी तो मालूम होगा। बल्कि और भी जो कुछ लिखा है, इशारा ही भर है, असल क्या बात है सो मैं नहीं कह सकती।

    कुमार––अच्छा, अब मैं तुम्हारा पूरा हाल जानना चाहता हूँ और इसी के साथ रोहतासगढ़ में रहने वाली लाली और कुन्दन का वृत्तान्त भी तुम्हारी जुबानी सुनना चाहता हूँ।

    कमलिनी––मैं सब हाल आपसे कहूँगी और इसके अलावा एक ऐसे भेद की खबर भी आपको दूँगी कि आप खुश हो जायँगे, मगर इसके लिए आपको तीन-चार तक दिन और सब्र करना चाहिए। इसी बीच में तारा भी रोहतासगढ़ से आ जायेगी या मैं खुद उसे बुलवा लूँगी।

    कुमार––इन सब बातों को जानने के लिए मैं बहुत बेचैन हो रहा हूँ, कृपा करके जो कुछ तुम्हें कहना हो, अभी कहो।

    कमलिनी––नहीं-नहीं, आप जल्दी न करें, मेरा दो-चार दिन के लिए टालना भी आप ही के फायदे के लिए है। आप यह न समझें कि मैं आपको जानबूझ कर यहाँ अटकाना चाहती हूँ। आप यदि मुझ पर भरोसा रक्खें और मुझे अपना दुश्मन न समझें तो यहाँ रहें। मैं लौंडियों की तरह आपकी ताबेदारी करने को तैयार हूँ, और यदि मुझ पर एतबार न हो तो अपने लश्कर चले जायें, चार-पाँच दिन के बाद मैं स्वयं आपसे मिलकर सब हाल कहूँगी।

    कुमार––बेशक मैं तुम्हारे बारे में तरह-तरह की बातें सोचता था और तुम पर विश्वास करना मुनासिब नहीं समझता था, मगर अब तुम्हारी तरफ से मुझे किसी तरह का खुटका नहीं है। तुम्हारी बातों का मेरे दिल पर बड़ा ही असर हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम सिवाय भलाई के मेरे साथ बुराई कभी न करोगी। मैं जरूर यहाँ रहूँगा और जब तक अपने दिल का शक अच्छी तरह न मिटा लूँगा, न जाऊँगा।

    कमलिनी––अहोभाग्य! (हँसकर) मगर ताज्जुब नहीं कि इसी बीच में आपके ऐयार लोग यहाँ पहुँचकर मुझे गिरफ्तार कर लें।

    कुमार––क्या मजाल है!

    3

    कुमार कई दिनों तक कमलिनी के यहाँ मेहमान रहे। उसने बड़ी खातिरदारी और नेकनीयती के साथ इन्हें रक्खा। इस मकान में कई लौंडियाँ भी थीं जो दिलोजान से कुमार की खिदमत किया करती थीं, मगर कभी-कभी वे सब दो-दो पहर के लिए न मालूम कहाँ चली जाया करती थीं।

    एक दिन शाम के वक्त उस मकान की छत पर कमलिनी और कुमार बैठे बात कर रहे थे, इसी बीच में कुमार ने पूछा––

    कुमार––कमलिनी, अगर किसी तरह का हर्ज न हो तो इस मकान के बारे में कुछ कहो। इन पुतलियों की तरफ, जो इस मकान के चारों कोनों में तथा इस छत के बीचोंबीच में हैं, जब मेरी निगाह पड़ती है तो ताज्जुब से अजब हालत हो जाती है।

    कमलिनी––बेशक इन्हें देख आप ताज्जुब करते होंगे। यह मकान एक तरह का छोटा-सा तिलिस्म है जो इस समय बिल्कुल मेरे अधीन है। मगर यहाँ का हाल बिना मेरे कहे थोड़े ही दिनों में आपको पूरा-पूरा मालूम हो जायगा।

    कुमार––उन दोनों औरतों के साथ, जो माधवी की लौंडियाँ थीं, तुमने क्या सलूक किया?

    कमलिनी––अभी तो वे दोनों कैद हैं।

    कुमार––माधवी का भी कुछ हाल मालूम हुआ है?

    कमलिनी––उसे आपके लश्कर और रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमते कई दफे मेरे आदमियों ने देखा है। जहाँ तक मैं समझती हूँ वह इस धुन में लगी है कि किसी तरह आप दोनों भाई और किशोरी उसके हाथ लगें और वह अपना बदला ले।

    कुमार––अभी तक रोहतासगढ़ का कुछ हाल नहीं मालूम हुआ, न लश्कर का कोई समाचार मिला।

    कमलिनी––मुझे भी इस बात का ताज्जुब है कि मेरे आदमी किस काम में फँसे हुए हैं। क्योंकि अभी तक एक ने भी लौटकर खबर न दी। (चौंककर और मैदान की तरफ देख के) मालूम होता है, इस समय कोई नया समाचार मिलेगा। मैदान की तरफ देखिए, दो आदमी एक बोझ लिये इसी तरफ आते दिखाई दे रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि ये मेरे ही आदमियों में से हों। कुमार––(मैदान की तरफ देख कर) हाँ ठीक है, इसी तरफ आ रहे हैं। उस गट्ठर में शायद कोई आदमी है।

    कमलिनी––बेशक ऐसा ही है, (हँसकर) नहीं तो क्या मेरे आदमी मालअसबाब चुराकर लावेंगे! देखिए, वे दोनों कितनी तेजी के साथ आ रहे हैं। (कुछ अटक कर) अब मैंने पहचाना, बेशक इस गठरी में माधवी होगी।

    थोड़ी देर तक दोनों आदमी चुपचाप उसी तरफ देखते रहे। जब वे लोग इस मकान के पास पहुँचे तो कमलिनी ने कुमार से कहा––

    कमलिनी––मुझे आज्ञा दीजिए तो जाकर इन लोगों को यहाँ लाऊँ।

    कुमार––क्या बिना तुम्हारे गये वे लोग यहाँ नहीं आ सकते?

    कमलिनी––जी नहीं, जब तक मैं खुद उन्हें किश्ती पर चढ़ा कर यहाँ न लाऊँ वे लोग नहीं आ सकते। वे क्या, कोई भी नहीं आ सकता।

    कुमार––क्या हरएक के लिए जब वह इस मकान में आना या जाना चाहे तुम्हीं को तकलीफ करनी पड़ती है? मैं समझता हूँ कि जिस आदमी को तुम एक दफे भी किश्ती पर चढ़ाकर ले जाओगी, उसे रास्ता मालूम हो जाएगा।

    कमलिनी––अगर ऐसा ही होता तो मैं इस मकान में बेखटके कैसे रह सकती थी? आप जरा नीचे चलें, मैं इसका सबब आपको बतला देती हूँ।

    कुमार खुशी-खुशी उठ खड़े हुए और कमलिनी के साथ नीचे उतर गए। कमलिनी उन्हें उस कोठरी में ले गई जो नहाने के काम में लाई जाती थी और जिसे कुमार देख चुके थे। उस कोठरी में दीवार के साथ एक आलमारी थी जिसे कमलिनी ने खोला। कुमार ने देखा कि उस दीवार के साथ चाँदी का एक मुट्ठा, जो हाथ भर से छोटा न होगा, लगा हुआ है। इसके सिवाय और कोई चीज उसमें नहीं थी।

    कमलिनी––मैं पहले ही आपसे कह चुकी हूँ कि इस तालाब में चारों ओर लोहे का जाल पड़ा हुआ है।

    कुमार––हाँ, ठीक है। मगर उस रास्ते में जाल न होगा, जिधर से तुम किश्ती लेकर आती-जाती हो।

    कमलिनी––ऐसा खयाल न कीजिए। उस रास्ते में भी जाल है, मगर उसे यहाँ आने का दरवाजा कहना चाहिए, जिसकी ताली यह है। देखिये, अब आप अच्छी तरह समझ जायेंगे। (उस चाँदी के मुट्ठे को कई दफे घुमाकर) अब उतनी दूर का या उस रास्ते का जाल, जिधर से किश्ती लेकर मैं आती-जाती हूँ हट गया, मानो दरवाजा खुल गया। अब मैं क्या, कोई भी जिसको आने-जाने का रास्ता मालूम है, किश्ती पर चढ़ के आ-जा सकता है। जब मैं इसको उलटा घुमाऊँगी तो वह रास्ता बन्द हो जायगा अर्थात् वहाँ भी जाल फैल जायगा, फिर किश्ती नहीं आ सकती।

    कुमार––(हँसकर) बेशक यह एक अच्छी बात है।

    इसके बाद कमलिनी किश्ती पर सवार होकर तालाब के बाहर गई और उन दोनों आदमियों को गठरी सहित सवार कराके मकान में से आई तथा तालाब में आने का रास्ता उसी रीति से, जैसे कि हम ऊपर लिख चुके हैं, बन्द कर दिया। इस समय यहाँ कई लौंडियाँ भी मौजूद थीं। उन्होंने कमलिनी के इशारे से छत के ऊपर रोशनी का बन्दोबस्त कर दिया और सब कोई छत के ऊपर चले गए। कुमार के पास ही कमलिनी गलीचे पर बैठ गई और वे दोनों आदमी भी गठरी सामने रखकर बैठ गये। इस छत की जमीन चिकने पत्थर की बहुत साफ और सुथरी बनी हुई थी, अगर नजाकत की तरफ खयाल न किया जाय तो फर्श या बिछाबन बिछाकर वहाँ बैठने की कोई जरूरत न थी।

    कमलिनी––कुमार, देखिए, इन दोनों आदमियों को मैंने माधवी को गिरफ्तार करने को भेजा था। मालूम होता है कि ये लोग अपना काम पूरा कर आए हैं और इस गठरी में शायद माधवी को ही लाए हैं। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) क्यों जी, माधवी ही है या किसी दूसरे को लाए हो?

    एक––जी, माधवी को ही लाए हैं।

    कमलिनी––गठरी खोलो, जरा इसकी सूरत देखू।

    उन दोनों ने गठरी खोली, कमलिनी और कुमार ने बड़े चाव से माधवी की सूरत देखी, परन्तु यकायक कमलिनी चौंकी और बोली, "क्या यह जख्मी है?"

    एक––जी हाँ, मुझे उम्मीद नहीं कि इसकी जान बचेगी क्योंकि चोट भारी है।

    एक––इसे किसने जख्मी किया है?

    एक––किसी औरत ने रोहतासगढ़ के तिलिस्मी तहखाने में इसे चोट पहुँचाई है।

    कुमार––(कमलिनी की तरफ देखकर) क्या रोहतासगढ़ में कोई तिलिस्मी तहखाना भी है?

    कमलिनी––जी हाँ, पर उसका भेद बहुत आदमियों को मालूम नहीं है, बल्कि जहाँ तक मैं समझती हूँ, वहाँ का राजा दिग्विजयसिंह भी उसका पूरा-पूरा हाल न जानता होगा। वहाँ का मामला भी बड़ा ही विचित्र है, किसी समय मैं आपसे उसका हाल कहूँगी।

    एक––मगर अब उस तहखाने की रंगत बदल गई।

    कमलिनी––सो क्यों?

    एक––(कुमार की तरफ इशारा करके) आपके ऐयारों ने उसमें अपना दखल कर लिया, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि रोहतासगढ़ ही ले लिया।

    कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) मुबारक हो, अच्छी खबर आई है।

    कुमार––बेशक इस खबर ने मुझे खुश कर दिया। ईश्वर करे, तुम्हारी तारा भी जल्द आ जाय और किशोरी का कुछ हल मालूम हो। (माधवी को गौर से देख और चौंककर) यह क्या? माधवी की दाहिनी कलाई दिखाई नहीं देती।

    कमलिनी––(हँसकर) इसका हाल आपको नहीं मालूम?

    कुमार––कुछ नहीं।

    कमलिनी––पूरा हाल तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर इतना सुना है कि कहीं गयाजी में इसकी और इसके दीवान अग्निदत्त की लड़की कामिनी से लड़ाई हो गई थी। उसी लड़ाई में यह अपनी दाहिनी कलाई खो बैठी। यह भी सुनने में आया है कि यह लड़ाई उसी मकान में हुई थी जिसमें आप लोग रहते थे और इसमें कमला भी शामिल थी।

    कमलिनी की यह बात सुन कर कुमार को वे ताज्जुब की बातें याद आ गई जो बीमारी की हालत में गयाजी में महल के अन्दर कई दफे रात के समय देखने में आई थीं और जब कि अन्त में कोठरी के अन्दर एक लाश और औरत की कलाई पाई गई थी।

    कुमार––हाँ, अब याद आया। वह मामला भी बड़ा ही विचित्र हुआ था अभी तक उसका ठीक-ठीक पता न लगा।

    कमलिनी––क्या हुआ था, जरा मैं भी सुनूँ।

    कुमार ने वह सब हाल कहा और जो कुछ देखने और सुनने में आया था, वह भी बताया।

    कमलिनी––कमला से मुलाकात हो तो कुछ और सुनने में आवे (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) पहले माधवी को यहाँ से ले जाओ, लौंडियों के हवाले करो और कह दो, इसे कैदखाने में रक्खें और होश में लाकर इसका इलाज करें। इसके बाद आओ तो तुम्हारी जुबानी वहाँ का सब हाल सुनें। शाबाश, तुम लोगों ने बेशक अपना काम पूरा किया, जिससे मैं बहुत ही खुश हूँ।

    'बहुत अच्छा' कहकर दोनों आदमी माधवी को वहाँ से उठाकर नीचे ले गए और इधर कमलिनी और कुमार में बातचीत होने लगी।

    कमलिनी––(मुस्कराकर) लीजिए आपकी मुराद पूरी होना चाहती है, पहले-पहले यह खुशखबरी मेरे ही सबब से आपको मिली है, सो सबसे भारी इनाम मुझी को मिलना चाहिए।

    कुमार––बेशक ऐसी ही बात है, मेरे पास इस वक्त कोई ऐसी चीज नहीं जो तुम्हारी नजर के लायक हो, खैर इसके बदले में मैं खुद अपने को तुम्हारे हाथ में देता हूँ।

    कमलिनी––वाह, क्या खूब!

    कुमार––सो क्यों?

    कमलिनी––आपको अपने बदन पर अख्तियार ही क्या है! यह तो किशोरी की मिलकियत है!

    कुमार लाजवाब हो गए और हँसकर चुप हो रहे। कमलिनी बड़ी ही खूबसूरत थी, इसके साथ-ही-साथ उसकी अच्छी चालचलन, मुरौवत, अहसान और नेकियों ने कुमार को अपना ताबेदार बना लिया। उसकी एक-एक बात पर कुमार प्रसन्न होते थे और दिल में बराबर उसकी तारीफ करते थे।

    कुमार––कमलिनी, मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मगर ईश्वर के लिए सच-सच जवाब देना, बात बनाकर टालने की कोशिश न करना।

    कमलिनी––कहिए तो सही, क्या बात है? रंग बेढंग मालूम होता है! कुमार––अगर सच जवाब देने का वादा करो तो पूछूँ, नहीं तो व्यर्थ मुँह क्यों दुखाऊँ।

    कमलिनी––आपकी नजाकत तो औरतों से भी बढ़ गई। जरा सी बात कहने में मुँह दुखा जाता है, दम फूलने लगता है। खैर पूछिये, मैं वादा करती हूँ कि सच्चा जवाब दूँगी, अगर कहिए तो कागज पर लिख दूँ!

    कुमार––(मुस्कुराकर) यह तो तुम वादा कर ही चुकी हो कि अपना हाल पूरा पूरा मुझसे कहोगी, मगर इस समय मैं तुमसे केवल इतना ही पूछता हूँ कि तुम्हारा कोई वली-वारिस भी है या नहीं? तुम्हारे व्यवहार से स्वतन्त्रता मालूम होती है और यह भी जाना जाता है कि तुम कुँआरी हो।

    कमलिनी––यह सवाल जवाब देने योग्य है। (मुस्कराकर) परन्तु क्या किया जाय, वादा करके चुप रहना भी मुनासिब नहीं। वास्तव में मैं स्वतन्त्र हूँ। कुँआरी तो हूँ परन्तु शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है।

    कुमार––कब और कहाँ?

    कमलिनी––यह दूसरा सवाल है, इसका सच्चा जवाब देने के लिए मैंने वादा नहीं किया है, इसलिए आप इसका उत्तर न पा सकेंगे।

    कुमार––अगर इसका भी जवाब दो, तो क्या कोई हर्ज है?

    कमलिनी––हाँ हर्ज है, बल्कि नुकसान है।

    कुमार चुप हो रहे और जिद करना मुनासिब न जाना। मगर यह सुनकर कि 'शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है' कुमार को रंज हुआ। क्यों रंज हुआ? इसमें कुमार की हानि ही क्या थी? क्या कुछ दूसरा इरादा था? नहीं, नहीं, कुमार यह नहीं चाहते थे कि हम ही इससे शादी करें, वे किशोरी के सच्चे प्रेमी थे, खूबसूरती के अतिरिक्त कमलिनी के अहसानों ने कुमार को ताबेदार बना लिया था और अभी उन्हें कमलिनी से बहुत-कुछ उम्मीद थी तथा यह भी सोचते थे कि ऐसी तरकीब निकल आवे जिससे इस अहसान का बदला चुक जाय। मगर इन बातों से कुमार के रंज होने का मतलब नहीं खुला। खैर, जो हो, पहले यह तो मालूम हो कि कमलिनी है कौन!

    वे दोनों आदमी भी, जो माधवी को लाये थे, छत पर आ पहुँचे और हाथ जोड़ कर सामने बैठ गये। कमलिनी ने उनसे खुलासा हाल कहने के लिए कहा और उन दोनों में से एक ने इस तरह कहना सुरू किया।

    दोनों––हम दोनों हुक्म के मुताबिक यहाँ से जाकर माधवी को खोजने लगे, मगर उसका पता गयाजी और राजगृह के इलाकों में कहीं भी न लगा। लाचार होकर रोहतासगढ़ किले के पास पहुँचे और पहाड़ी के चारों तरफ घूमने लगे। कभी-कभी रोहतासगढ़ की पहाड़ी के ऊपर भी जाते और घूम-घूमकर पता लगाते कि वहाँ क्या हो रहा है। एक दिन रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर घूमते-फिरते यकायक हम दोनों एक खोह के मुहाने पर जा पहुँचे और वहाँ कई आदमियों के धीरे-धीरे बातचीत करने की आवाज सुनकर एक झाड़ी में, जहाँ से उन लोगों की आवाज साफ सुनाई देती थी, छिपे रहे। अन्दाज से यह मालूम हुआ कि वे लोग कई आदमी हैं और उन्हीं के साथ एक औरत भी हैं। नीचे लिखी बातें हम लोगों ने सुनीं––

    एक––न मालूम हम लोगों को कब तक यहाँ अटकना और राह देखना पड़ेगा।

    दूसरा––अब हम लोगों को यहाँ ज्यादा दिन न रहना पड़ेगा। या तो काम हो जायेगा या खाली ही लौटकर चले जाने की नौबत आवेगी।

    तीसरा––रंग तो ऐसा ही नजर आता है, भाई, जो हो, हमें तो यही विश्वास होता है कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग तहखाने में घुस गये क्योंकि पहले कभी एक आदमी तहखाने में आता-जाता दिखाई नहीं देता था, बल्कि मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ कि कल उस कब्रिस्तान में हम लोगों ने जिसे देखा था, वह कोई ऐयार ही था।

    चौथा––खैर, और दो-तीन दिन में सब मालूम हो जाएगा।

    औरत––तुम लोगों का काम चाहे जब हो, मगर मेरा काम तो आज हुआ ही चाहता है। माधवी और तिलोत्तमा को मैंने खूब ही धोखा दिया है। आज उसी कब्रिस्तान की राह से मैं उन दोनों को तहखाने में ले जाऊँगी।

    एक––अब तुम्हें वहाँ जाना चाहिए, शायद माधवी वहाँ पहुँच गयी हो।

    औरत––हाँ, अब जाती हूँ, पर अभी समय नहीं हुआ।

    दूसरा––दम-भर पहले ही पहुँचना अच्छा है।

    ये बातें सुनकर मैं उन लोगों को पहचान गया। वे रामू वगैरह धनपतिजी के सिपाही लोग थे और औरत चमेली थी।

    इतना सुनते ही कमलिनी ने रोका और पूछा, "जिस खोह के मुहाने पर वे लोग बैठे थे, वहाँ कोई सलई का पेड़ भी है?"

    इसके जवाब में उन दोनों ने कहा, "हाँ-ह, दो पेड़ सलई के वहाँ थे, पर उनके सिवाय और दूर-दूर तक कहीं सलई का पेड़ दिखाई नहीं दिया।"

    कमलिनी––बस मैं समझ गयी। वह खोह का मुहाना भी तहखाने से निकलने का एक रास्ता है, शायद धनपति ने अपने आदमियों को कह रखा होगा कि मैं किशोरी को लिए हुए इसी राह से निकलूँगी तुम लोग मुस्तैद रहना, इसी से वे लोग वहाँ बैठे थे।

    एक––शायद ऐसा ही हो।

    कुमार––धनपति कौन है?

    कमलिनी––उसे आप नहीं जानते। ठहरिए, पहले इन लोगों का हाल सुन लूँ तो कहूँगी। (उन दोनों की तरफ देखकर) हाँ, तब क्या हुआ?

    उसने फिर यों कहना शुरू किया––

    "थोड़ी ही देर में चमेली वहाँ से उठी और एक तरफ को रवाना हुई, हम दोनों भी उसके पीछे-पीछे चले और सुबह की सफेदी निकलना ही चाहती थी कि उस कब्रिस्तान के पास पहुँच गये जो तहखाने में जाने का दरवाजा है। हम दोनों एक आड़ की जगह में छिप रहे और तमाशा देखने लगे। उसी समय माधवी और तिलोत्तमा भी वहाँ आ पहुँचीं। तीनों में धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगी जिसे दूर होने के सबब मैं बिलकुल न सुन सका। आखिर वे तीनों तहखाने में घुस गयीं और पहरों गुजर जाने पर भी बाहर न निकलीं। हम दोनों यह निश्चय कर चुके थे कि जब तक वे तहखाने से न निकलेंगी, यहाँ से न टलेंगे। सवेरा हो गया बल्कि धीरे-धीरे तीन पहर दिन भी बीत गया। आखिर हम दोनों तहखाने में घुसने के इरादे से कब्रिस्तान में गये। वहाँ पहुँचकर हमारे साथी ने कहा, "आखिर हम लोग दिन-भर परेशान हो ही चुके हैं, अब शाम हो लेने दो, तो तहखाने में चलें।" मैंने भी यही मुनासिब समझा और हम दोनों आदमी वहाँ से लौटना ही चाहते थे कि तहखाने का दरवाजा खु‌ला और चमेली दिखाई पड़ी, हम दोनों को भी चमेली ने देखा और पहचाना, मगर उसको ठहरने या कुछ कहने का साहस न हुआ। वह कुछ परेशान मालूम होती थी और खुन से भरा हुआ एक छुरा उसके हाथ में था। हम दोनों ने भी उसको कुछ टोकना मुनासिब न समझा और यह विचार कर कि शायद कोई और भी इस तहखाने से निकले, एक कब्र की आड़ में छिपकर बीच वाली कब्र, अर्थात् तहखाने के दरवाजे की तरफ देखने लगे। चमेली हम लोगों को देखते-देखते भाग गयी और थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा।

    "थोड़ी देर बाद हम लोगों ने दूर से राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार पण्डित बद्रीनाथ को आते देखा। वह तहखाने के दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि अन्दर से तिलोत्तमा निकली और पण्डित बद्रीनाथ ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ही एक बूढ़ा आदमी तहखाने से निकला और पण्डित बद्रीनाथ से बातें करने लगा। हम लोगों को कुछ-कुछ वे बातें सुनाई देती थीं। इतना मालूम हो गया कि तहखाने के अन्दर खून हुआ है और इन दोनों ने तिलोत्तमा को दोषी ठहराया है, मगर हम लोगों ने खून से भरा हुआ छुरा हाथ में लिए चमेली को देखा था, इसलिए विश्वास था कि अगर तहखाने में कोई खून हुआ है तो जरूर चमेली के ही हाथ से हुआ, तिलोत्तमा निर्दोष है।

    "पण्डित बद्रीनाथ और वह बूढ़ा आदमी तिलोत्तमा को लेकर फिर तहखाने में घुस गये। हम लोगों ने भी वहाँ अटकना मनासिब न समझा और थोड़ी ही देर बाद हम लोग भी तहखाने में घुस गये तथा तहखाने की पचासों कोठरियों में घूमने और देखने लगे कि कहाँ क्या होता है। बद्रीनाथ थोड़ी ही देर बाद तहखाने के बाहर निकल गये और हम लोगों ने तिलोत्तमा को एक खम्भे से साथ बँधे हुए पाया। हम्माम वाली कोठरी में माधवी को पड़े हुए पाकर हम लोग बड़े खुश हुए और उसे उठाकर ले भागे, फिर न मालूम, पीछे क्या हुआ और किस पर क्या गुजरी ‌

    कमलिनी––ताज्जुब नहीं कि वहाँ के दस्तूर के मुताबिक तिलोत्तमा की बलि दे दी गयी हो!

    एक––जो भी हो।

    इतने ही में नीचे से एक लौंडी दौड़ी हुई आयी और हाथ जोड़कर कमलिनी से बोली, "तारा आ गयी, तालाब के बाहर खड़ी है!"

    तारा के आने की खबर सुनकर कमलिनी बहुत खुश हुई और खुशी के मारे कुँअर इन्द्रजीतसिंह की घबराहट का तो ठिकाना ही न रहा, क्योंकि तारा ही की जुबानी रोहतासगढ़ का हाल और बेचारी किशोरी की खबर सुनने वाले थे और इसी के बाद कमलिनी का असल भेद उन्हें मालूम होने को था।

    कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) जिस तरह इन दोनों आदमियों को मैं तालाब के बाहर लायी हूँ उसी तरह तारा को भी लाना पड़ेगा।

    कुमार––हाँ-हाँ, उसे बहुत जल्द लाओ। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

    कमलिनी––आप क्यों तकलीफ करते हैं। बैठिए, मैं उसे अभी लाती हूँ। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) चलो, तुम दोनों को भी तालाब के बाहर पहुँचा दूँ।

    लाचार कुमार उसी जगह बैठे रहे। उन दोनों आदमियों को साथ लेकर कमलिनी वहाँ से चली गयी तथा थोड़ी देर में तारा को लेकर आ पहुँची। कुँअर इन्द्रजीत सिंह को देखकर तारा चौंकी और बोली––

    तारा––क्या कुमार यहाँ विराज रहे हैं?

    कमलिनी––हाँ, कई दिनों से यहाँ हैं और तुम्हारी राह देख रहे हैं। तुम्हारी जुबानी रोहतासगढ़ और किशोरी तथा लाली और कुन्दन का असल भेद और हाल सुनने के लिए बड़े बेचैन हो रहे हैं। आओ, मेरे पास बैठ जाओ और कहो, क्या हाल है?

    तारा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, मैं इस समय यहाँ बैठ नहीं सकती और न कुछ वहाँ का हाल ही कह सकती हूँ, क्योंकि हम लोगों का यह समय बड़ा ही अमूल्य है। कुमार को यहाँ देख मैं बहुत खुश हुई, अब वह काम बखूबी निकल जायगा! कुमार की तरफ देखकर) बेचारी किशोरी इस समय बड़े ही संकट में पड़ी हुई है। अगर आप उनकी जान बचाना चाहते हैं तो इस समय मुझसे कुछ न पूछिये, बस तुरन्त खड़े होइए और जहाँ मैं चलती हूँ, चले चलिये, हाँ, यदि बन बड़ा तो रास्ते में मैं वहाँ का हाल आपसे कहूँगी। (कमलिनी की तरफ देखकर) आप भी चलिए और कुछ आदमी अपने साथ लेती चलिए, मगर सब कोई घोड़े पर सवार और लड़ाई के सामान से दुरुस्त रहें।

    कमलिनी––ऐसा ही होगा।

    कुमार––(खड़े होकर) मैं तैयार हूँ।

    तीनों आदमी छत के नीचे उतरे और तारा के कहे मुताबिक कार्रवाई की गयी।

    सुबह की सफेदी आसमान पर निकलना ही चाहती है। आओ, देखो, हमारा बहादुर नौजवान कुँअर इन्द्रजीतसिंह किस ठाठ से मुश्की घोड़े पर सवार मैदान की तरफ घोड़ा फेंके चला जा रहा है और उसकी पेटी से लटकती हुई जड़ाऊ नयाम (म्यान) की तलवार किस तरह उछल-उछलकर घोड़े के पेट में थपकियाँ मार रही है, मानो उसकी चाल की तेजी पर शाबाशी दे रही है। कुमार के आगे-आगे घोड़े पर सवार तारा जा रही है, कुमार के पीछे सब्ज घोड़े पर कमलिनी सवार है और घोड़े की तेजी को बढ़ाकर कुमार के बराबर हुआ चाहती है। उसके पीछे दस दिलावर और बहादुर सवार घोड़ा फेंके चले जा रहे हैं और इस जंगली मैदान के सन्नाटे को घोड़ों के टापों की आवाज से तोड़ रहे हैं।

    ↑

    यहाँ पर तो पाठक समझ ही होंगे कि तहखाने में एक बड़ी मूरत के सामने जिस औरत की बलि दी गई थी, वह माधवी की ऐयारा तिलोत्तमा थी और माधवी के लाश को ले भागने वाले ये ही दोनों कमलिनी के नौकर थे।

    4

    हम ऊपर लिख आये हैं कि देवीसिंह को साथ लेकर शेरसिंह कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए रोहतासगढ़ से रवाना हुए। शेरसिंह इस बात को तो जानते थे कि भी खबर कुँअर इन्द्रजीतसिंह फलाँ जगह हैं परन्तु उन्हें तालाब के गुप्त भेदों की न थी। राह में आपस में बातचीत होने लगी।

    देवीसिंह––लाली का भेद कुछ मालूम हुआ?

    शेरसिंह––अफसोस, उसके और कुन्दन के बारे में मुझसे बड़ी भारी भूल हुई। ऐसा धोखा खाया कि शर्म के मारे कुछ कह नहीं सकता।

    देवीसिंह––इसमें शर्म की क्या बात है। ऐसा कोई ऐयार दुनिया में न होगा जिसने कभी धोखा न खाया हो। हम लोग कभी धोखा देते हैं, कभी स्वयं धोखे में आ जाते हैं, फिर इसका अफसोस कहाँ तक किया जाय!

    शेरसिंह––आपका कहना बहुत ठीक है, खैर, इस बारे में मैंने जो-कुछ मालूम किया है उसे कहता हूँ! यद्यपि थोड़े दिनों तक मैंने रोहतासगढ़ से अपना सम्बन्ध छोड़ दिया था, तथापि मैं कभी-कभी वहाँ जाया करता और गुप्त राहों से महल के अन्दर जाकर वहाँ की खबर भी लिया करता था। जब किशोरी वहाँ फँस गयी तो अपनी भतीजी कमला के कहने से मैं वहाँ दूसरे-तीसरे बराबर जाने लगा। लाली और कुन्दन को मैंने महल में देखा। यह न मालूम हुआ कि ये दोनों कौन हैं। बहुत-कुछ पता लगाया मगर कुछ काम न चला। परन्तु कुन्दन के चेहरे पर जब मैं गौर करता तो मुझे शक होता कि वह सरला है।

    देवीसिंह––सरला कौन?

    शेरसिंह––वही, सरला जिसे तुम्हारी चम्पा ने चेली बनाकर रखा था और जो उस समय चम्पा के साथ थी जब उसने एक खोह के अन्दर माधवी के ऐयार की लाश काटी थी।

    देवीसिंह––हाँ वह छोकरी, मुझे अब याद आया। मालूम नहीं कि आजकल वह कहाँ है। खैर, तब क्या हुआ? तुमने समझा कि वह सरला है मगर उस खोह का और लाश काटने का हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?

    शेरसिंह––वह हाल स्वयं सरला ने कहा था। वह मेरे आपस वालों में से है। इत्तिफाक से एक दिन मुझसे मिलने के लिए रोहतासगढ़ आयी थी, तब सब हाल मैंने सुना था। मगर मुझे यह नहीं मालूम कि आजकल वह कहाँ है।

    शेरसिंह––एक यही भेद खोलने की नीयत से मैं रात के समय रोहतासगढ़ महल के अन्दर गया और छिपकर सरला के सामने जाकर बोला, "मैं पहचान गया कि तू सरला है, फिर अपना भेद मुझसे क्यों छिपाती है?" इसके जवाब में कुन्दन से पूछा, "तुम कौन हो?"

    मैं––शेरसिंह। सरला––मुझे जब तक निश्चय न हो कि तुम शेरसिंह ही हो, मैं अपना भेद कैसे कहूँ?

    मैं––क्या तू मुझे नहीं पहचानती?

    सरला––क्या जाने, कोई ऐयार सूरत बदल के आया हो। अगर तुम पहचान गए कि मैं सरला हूँ तो कोई ऐसी छिपी हुई बात कहो जो मैंने तुमसे कही हो।

    इसके जवाब में मैं वही खोह वाला अर्थात् लाश काटने वाला किस्सा कह गया और अन्त में मैं बोला कि यह हाल स्वयं तूने मुझसे बयान किया था।

    उस किस्से को सुनकर कुन्दन हँसी और बोली, "हाँ, अब मैं समझ गयी। मैं चम्पा के हुक्म से यहाँ का हाल-चाल लेने आयी थी और अब किशोरी को छुड़ाने की फिक्र में हूँ। मगर लाली मेरे काम में बाधा डालती है। कोई ऐसी तरकीब बताइये जिसमें लाली मुझसे दबे और डरे।"

    मैं उस समय यह कहकर वहाँ से चला आया कि अच्छा, मैं सोच कर इसका जवाब दूँगा।

    देवीसिंह––तब क्या हुआ?

    शेरसिंह––मैं वहाँ से रवाना हुआ और पहाड़ी के नीचे उतरते समय एक विचित्र बात मेरे देखने और सुनने में आई।

    देवीसिंह––वह क्या?

    शेरसिंह––जब मैं अँधेरी रात में पहाड़ी के नीचे उतर रहा था तो जंगल में मालूम हुआ कि दो-तीन आदमी जो पगडण्डी के पास ही थे, आपस बातें कर रहे हैं। मैं पैर दवाता हुआ उनके पास गया और छिपकर बातें सुनने लगा, मगर उस समय उनकी बातें समाप्त हो चुकी थीं, केवल एक आखिरी बात सुनने में आई।

    देवीसिंह––वह क्या थी?

    शेरसिंह––एक ने कहा––'भरसक तो लाली और कुन्दन दोनों उन्हीं में से हैं, नहीं तो लाली तो जरूर इन्द्रजीतसिंह की दुश्मन है! मगर इसकी पहचान तो सहज ही में हो सकती है। केवल 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' इन दोनों जुमलों से अगर वह डर जाय, तो हम समझ जायँगे कि वीरेन्द्रसिंह की दुश्मन है। खैर, बूझा जायगा, पहले महल में जाने का मौका भी तो मिले। इसके बाद और कुछ सुनने में न आया और वे लोग वहाँ से न मालूम कहाँ चले गए। दूसरे दिन मैं फिर कुन्दन के पास गया और उससे बोला कि "तू लाली के सामने 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' का जिक्र करके देख, क्या होता है!"

    देवीसिंह––फिर क्या हुआ?

    शेरसिंह––तीन-चार दिन बाद मैं कुन्दन के पास गया तो उसकी जुबानी मालूम हुआ कि कुन्दन के मुँह से वे बातें सुनकर लाली बहुत डरी और उसने कुन्दन का मुकाबला करना छोड़ दिया। मगर मुझे थोड़े ही दिनों में मालूम हो गया कि कुन्दन सरला न थी, उसने मुझे धोखा दिया और चालाकी से मेरी जुबानी भेद मालूम करके अपना काम निकाल लिया। मुझे इस बात की बड़ी शर्म है कि मैंने अपने दुश्मन को दोस्त समझा और धोखा खाया।

    देवीसिंह––अक्सर ऐसा धोखा हो जाता है। खैर, लाली तो अभी हम लोगों के कैद ही में है, कहीं जाती नहीं, रही कुन्दन, सो इन्द्रजीतसिंह को लेकर लौटने पर कोई तरकीब ऐसी जरूर निकाली जायगी, जिसमें बाकी लोगों का असल हाल मालूम हो।

    इसी तरह की बातें करते हुए दोनों ऐयार चलते गये। रात को एक जगह दो-तीन घण्टे आराम किया और फिर चल पड़े। सवेरा होते-होते एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ एक छोटा-सा टीला ऐसा था जिस पर चढ़ने से दूर-दूर तक की जमीन दिखाई देती थी तथा वहाँ से कमलिनी का तालाब वाला मकान भी बहुत दूर न था। दोनों ऐयार उस टीले पर चढ़ गये और मैदान की तरफ देखने लगे। यकायक शेरसिंह ने चौंक कर कहा, "अहा, हम लोग क्या अच्छे मौके पर आये हैं! देखो, वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और वह औरत, जिसने उन्हें फँसा रक्खा है, घोड़े पर सवार इसी तरफ चले आ रहे हैं!"

    देवीसिंह––हाँ, ठीक तो है, उनके साथ और भी कई सवार हैं।

    शेरसिंह––मालूम होता है, उस औरत ने उन्हें अच्छी तरह अपने वश में कर लिया है। बेचारे इन्द्रजीतसिंह क्या जानें कि यह उनकी दुश्मन है। चाहे जो हो, इस समय इन लोगों को आगे न बढ़ने देना चाहिए।

    देवीसिंह––सबके आगे एक औरत घोड़े पर सवार आ रही है। मालूम होता है कि उन लोगों को रास्ता दिखाने वाली यही है।

    शेरसिंह––बेशक ऐसा ही है, तभी तो सब कोई उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं। पहले उसी को रोकना चाहिए, मगर घोड़ों की चाल बहुत तेज है।

    देवीसिंह––कोई हर्ज नहीं, हम दोनों आदमी घोड़े की राह पर अड़कर खड़े हो जायँ और अपने को घोड़े से बचाने के लिए मुस्तैद रहें। अच्छी नसल का घोड़ा यकायक आदमी के ऊपर टाप न रक्खेगा, वह लोगों को राह में देख जरूर अड़ेगा या झिककेगा, बस, उसी समय घोड़े की बाग थाम लेंगे।

    दोनों ऐयारों ने बहुत जल्द अपनी राय ठीक कर ली और दोनों आदमी एक साथ घोड़ों की राह में अड़ के खड़े हो गये। बात-की-बात में वे लोग भी आ पहुँचे। तारा का घोड़ा रास्ते में आदमियों को खड़ा देख कर झिझका और आड़ देकर बगल की तरफ घूमना चाहा, उसी समय देवीसिंह ने फुर्ती से लंगाम पकड़ ली। इस समय तारा का घोड़ा लाचार रुक गया और उसके पीछे आने वालों को भी रुकना पड़ा। कुँअर इन्द्रजीत सिंह शेरसिंह को तो नहीं जानते थे, मगर देवीसिंह को उन्होंने पहचान लिया और समझ गये कि ये लोग मेरी ही खोज में घूम रहे हैं। आखिर वे देवीसिंह के पास आये और बोले––

    कुमार––यद्यपि आप सब काम मेरी भलाई ही के लिए करते होंगे, परन्तु इस समय हम लोगों को रोका सो अच्छा न किया।

    देवीसिंह––क्या मामला है, कुछ कहिए तो!

    कुमार––(जल्दी में घबराए हुए ढंग से) बेचारी किशोरी एक आफत में फँसी हुई है उसी को बचाने जा रहे हैं।

    देवीसिंह––किस आफत में फँसी है?

    कुमार––इतना कहने का मौका नहीं है।

    देवीसिंह––यह औरत आपको अवश्य धोखा देगी जिसके साथ आप जा रहे हैं।

    कुमार––ऐसा नहीं हो सकता, यह बड़ी ही नेक और मेरी हमदर्द है।

    इतना सुनते ही कमलिनी आगे बढ़ आई और देवीसिंह से बोली––

    कमलिनी––मैं खूब जानती हूँ कि आप लोगों को मेरी तरफ से शक है, तथापि मुझे कहना ही पड़ता है कि इस समय आप हम लोगों को न रोकें, नहीं तो पछताना पड़ेगा। यदि आप लोगों को मेरी और कुमार की बात का विश्वास न हो तो मेरे सवारों में से दो आदमी घोड़ों पर से उतर पड़ते हैं, उनके बदले में आप दोनों आदमी घोड़ों पर सवार होकर साथ चलें और देख लें कि हम आपके खैरख्वाह हैं या बदख्वाह।

    देवीसिंह––बेशक यह अच्छी बात है और मैं इसे मंजूर करता हूँ।

    कमलिनी के इशारा करते ही दो सवारों ने घोड़ों की पीठ खाली कर दी। उनके बदले में देवीसिंह और शेरसिंह सवार हो गए और फिर उसी तरह सफर शुरू हुआ। इस समय कुछ-कुछ सूरज निकाल चुका था और सुनहरी धूप ऊँचे पेड़ों के ऊपर वाले हिस्सों पर फैल चुकी थी।

    आधे घण्टे और सफर करने के बाद वे लोग उस जगह पहुँचे जहाँ धनपति ने किशोरी को जलाकर खाक कर डालने के लिए चिता तैयार की थी और जहाँ से दीवान अग्निदत्त लड़-भिड़कर किशोरी को ले गया था। इस समय भी वह चिता कुछ बिगड़ी हुई सूरत में तैयार थी और इधर-उधर बहुत-सी लाशें पड़ी हुई थीं। उस जगह पहुँचकर तारा ने घोड़ा रोका और इसके साथ ही सब लोग रुक गये। तारा ने कमलिनी की तरफ देखकर कहा––

    तारा––बस, इसी जगह मैं आप लोगों को लाने वाली थी, क्योंकि इसी जगह धनपति के बहुत से आदमी मौजूद थे और यहीं वह किशोरी को लेकर आने वाली थी। (लाशों की तरफ देखकर) मालूम होता है, यहाँ बहुत खून-खराबा हुआ है!

    कमलिनी––तूने कैसे जाना कि किशोरी को लेकर धनपति इसी जगह आने वाली थी और धनपति को तूने कहाँ छोड़ा था?

    तारा––रात के समय खूब छिपकर धनपति के आदमियों की बात मैंने सुनी थी जिससे बहुत-कुछ हाल मालूम हुआ था और धनपति को मैंने उसी खोह के मुहाने पर छोड़ा था जो रोहतासगढ़ तहखाने से बाहर निकलने का रास्ता है और जहाँ सलई के दो पेड़ लगे हैं। उस समय बेहोश किशोरी धनपति के कब्जे में थी और धनपति के कई आदमी वहाँ मौजूद थे। उन लोगों की बातें सुनने से मुझे विश्वास हो गया था कि वे लोग किशोरी को लिए हुए इसी जगह आवेंगे। (एक लाश की तरफ देख के और चौंक के) देखिए, पहिचानिए।

    कमलिनी––बेशक यह धनपति का नौकर है। (और लाशों को भी अच्छी तरह देखकर) बेशक धनपति यहाँ तक आई थी, पर किसी से लड़ाई हो गई जो इन लाशों को देखने से जाना जाता है। मगर इनमें बहुत-सी लाशें ऐसी हैं जिन्हें मैं नहीं पहचानती। न मालूम इस लड़ाई का क्या नतीजा हुआ, धनपति गिरफ्तार हो गई या भाग गई, और किशोरी किसके कब्जे में पड़ गई! (कुमार की तरफ देखकर) शायद आपके सिपाही या ऐयार लोग यहाँ आए हों?

    कुमार––नहीं। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आप क्या खयाल करते हैं?

    देवीसिंह––खयाल तो मैं बहुत-कुछ करता हूँ, इसका हाल कहाँ तक पूछिएगा, मगर इन लाशों में हमारी तरफ वालों की कोई लाश नहीं है जिससे यह मालूम हो कि वे लोग यहाँ आये होंगे।

    सब लोग इधर-उधर घूमकर उन लाशों को देखने लगे। यकायक देवीसिंह एक ऐसी लाश के पास पहुँचे जिसमें जान बाकी थी और वह धीरे-धीरे कराह रहा था। उसके बदन में कई जगह जख्म लगे हुए थे और कपड़े खून से तर थे। देवीसिंह ने कुमार की तरफ देख के कहा, "इसमें जान बाकी है, अगर बच जाय और कुछ बातचीत कर सके, तो बहुत-कुछ हाल मालूम होगा।"

    कई आदमी उस लाश के पास जा मौजूद हुए और उसे होश में लाने की फिक्र करने लगे। उसके जख्मों पर पट्टी बाँधी गई और ताकत देने वाली दवा भी पिलाई गई। घोड़े नंगी पीठ करके दम लेने, हरारत मिटाने और चरने के लिए लम्बी बागडोरों से बाँध कर छोड़ दिए गए।

    आधे घण्टे बाद उस आदमी को होश आया और उसने कुछ बोलने का इरादा किया, मगर जैसे ही उसकी निगाह कमलिनी पर पड़ी, वह काँप उठा और उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई। उसके दिल का हाल कमलिनी समझ गई और उसके पास जाकर मुलायम आवाज में बोली, "बाँकेसिंह, डरो मत, मैं वादा करती हूँ कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ न दूँगी। हाँ, होश में आओ और मेरी बात का जवाब दो।"

    कमलिनी की बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत बदल गई, डर की निशानी जाती रही, और यह भी जाना गया कि वह कमलिनी की बातों का जवाब देने के लिए तैयार है।

    कमलिनी––किशोरी को लेकर धनपति यहाँ आई थी?

    बाँकेसिंह––(सिर हिलाकर धीरे से) हाँ, मगर …

    कमलिनी––मगर क्या?

    बाँकेसिंह––उसने किशोरी को जला देना चाहा था, मगर एकाएक अग्निदत्त और उसके साथी लोग आ पहुँचे और लड़-भिड़ कर किशोरी को ले गये। हम लोग उन्हीं के हाथ से जख्मी …

    बाँकेसिंह ने इतनी बातें धीरे-धीरे और रुक-रुककर कहीं क्योंकि जख्मों से ज्यादे खून निकल जाने के कारण वह बहुत ही कमजोर हो रहा था, यहाँ तक कि बात पूरी न कर सका और गश में आ गया। इन लोगों ने उसे होश में लाने के लिए बहुत-कुछ उद्योग किया मगर दो घण्टे तक होश न आया। इस बीच में देवीसिंह ने उसे कई दफे दवा पिलाई। देवीसिंह––इसमें कोई शक नहीं कि यह बच जायगा।

    शेरसिंह––(देवीसिंह की तरफ देखकर) हमने (कमलिनी की तरफ इशारा करके) इनके बारे में भी धोखा खाया, वास्तव में यह कुमार के साथ नेकी कर रही हैं।

    देवीसिंह––बेशक यह कुमार की दोस्त हैं, मगर तुमने इनके बारे में कई बातें ऐसी कही थीं कि अब भी

    कुमार––नहीं-नहीं देवीसिंह जी, मैं इन्हें अच्छी तरह आजमा चुका हूँ; सच तो यह है कि इन्हीं की बदौलत आज आप लोगों ने मेरी सूरत देखी।

  • चन्द्रकांता सन्तति १

    चन्द्रकांता सन्तति १

    Aproximadamente 18.787 palavras.

    चन्द्रकांता सन्तति १
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकांता_सन्तति_१

    चन्द्रकान्ता सन्तति

    पहिला हिस्सा

    पहिला बयान

    गढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के लङके बीरेन्द्रसिंह की शादी विजयगढ़ | के महज जयसिह की लडकी चन्द्रकान्ता के साथ हो गई । भारत वाले | दिन तेजसिंह की अाखिरी दिल्ली के सर्वत्र चुनार के महाराज शिवदत्त को मशालची बनना पडा । बहुत की यह राय हुई कि महाराज शिवदत्त | कह दिल भी साफ नहीं हुआ इसलिये अब इनको कैद ही में रखना मुनासिव है, मगर महाराजा सुरेन्द्रसिंह ने इस बात को नापसन्द करके कहा कि 'महाराज शिवदत्त को हम छोड़ चुके हैं, इस वक्त जो तेजसिंह से उनकी लवई हो गई यह हमारे साथ बैर रखने का सबूत नहीं हो सकता, अाखिर महाराज शिवदत्त क्षत्री हैं, जब तेजसिंह उनकी सूरत बन बेइज्जती करने पर उतारू हो गये तो यद्द देख कर भी ये कैसे बरदाश्त कर सकते थे ! में यह भी नहीं कह सकता कि महाराज शिवदत्त का दिल हम लोगों की तरफ से बिल्कुल साफ हो गया क्योकि अगर उनका दिल साफ ही होता तो इस बात को छिप कर देखने के लिए आने की जरूरत क्या थी तो भी यह मानकर कि तेजसिंह के साथ की इनकी यह लड़ाई हमारी दुश्मनी का मन नहीं कहा जा सकता, हम फिर इनको छोड़ देते हैं। अगर अव भी ये हमारे साथ दुश्मनी करेंगे तो क्या हर्ज है, ये भी मर्द हैं और हम भी मर्द, देखा जायगा। __ महाराज शिवदत्त फिर भी छूट कर न मालूम कहाँ चले गए। बीरेन्द्रसिंह की शादी होने के बाद महाराज सुरेन्द्रसिंह और जयसिंह की राय से चपला की शादी तेजसिंह के साथ और चम्पा की शादी देवीसिंह के साथ की गई । चम्पा दूर के नाते में चपला की बहिन होती थी। ।

    न्यासी मब ऐयारों की शादी भई हुई थी। उन लोगो की घर गृहस्थी चुनार ही में थी, अदल बदल करने की जरूरत न पड़ी, क्योंकि शादी होने के थोड़े ही दिन बाद बड़े धूमधाम के साथ कुँवर वीरेन्द्रसिंह चुनार की राजगद्दी पर बैठाए गए और कुंवर छोड राजा कहलाने लगे । तेजतिह उनो राजद वान मुकर र रुए योर इसीलिए सब ऐयारों को भी चुनार ही मेसना पा। मुरेन्द्रसिंह अपने लके को ग्रॉसी के मामने से हटाया 'नहीं चाहते थे, लाचार नीदमा मद्दा फतेविद के सुपुर वे भी चुनार ही में राने लगे, मगर राज्य का काम मिल्कुन वीरेन्द्रहिस के जिम्मे या, हाँ कभी कमी गय दे दे।। ते जनिए के बार जीतसिंह भी बी भाजार के सात गुनार में लगे । महाराज मुरेन्दरिद और जीतसिद में बहुत सुन्नत भीती दमत नि दिन बढ़ता ही गई। रात म जातसिंह इसी गारकि उनती जितनी स्टर की जाना था। थी। नादीगने दाम बाट ता की लार या। मी गानो न भागमा पर सके न रस कागो तरान:दे चन्द्रमाता के बड़े लडके ________________

    पहिला हिस्सा | का नाम इन्द्रजीतसिंह, छोटे का नाम अनिन्दसिंह, चपला के लडके का | नाम भैरोसिह, और चम्पा के लक्ष्के को नाम तारासिंह रक्खा गया । जब ये चारो लडके कुछ बड़े श्रौर बातचीत करने लायक हुए तत्र इनके लिखने पढ़ने और तालीम का इन्तजाम किया गया और राजा सुरेन्द्रसिंह ने इन चारो लडको को जीतसिंह को शागिदीं और हिफाजत में छोड़ दिया। । भैरोसिंह और तारासिंह ऐवारी के फन में बड़े ही तेज और चालाक निकले । उनकी ऐयारी का इम्तिहान बराबर लिया जाता था । जैतह का हुक्म था कि भैरोसिंह और तारासिंह बुल ऐयारो को दकि अपने चाप तक को धोखा दे की कोशिश करें और इस तरह पन्नालाल बचे रह ऐयार भी उन दोनों लड़कों को भुलावा दिया करें । धीरे धीरे ये दोनों लडके इतने तेज और चालाक हो गए कि पन्नालाल वरह की ऐयारी इनके सामने व गई । भैरोसिंह ग्रोर तारासिंह इन दोनों में चान्नाक ज्या दे कौन था इसके कहने का कोई जरूरत नहीं, आगे मौका पने पर यापही मालूम हो | जायगा, ह इतना कह देना जरूरी है कि भैभिह को इन्द्रजीतसिंह के । साथ और तारासिंह को आनन्दसिंह के साथ ज्यादे मुहब्ब्त थी । चारो लडके होशियार हुए अर्थात् इन्द्रजीतसिंह भैरसिंह शौर तारा { सिंह की उम्र अट्र ह अटारह वर्ष की श्रौर नन्दसिंह की उम्र पन्द्रह .. वर्ष की हुई ! इतन दिन तक चुनार राज्य में बराबर शान्ति रही बल्कि ", छिनी तकलं फे श्रौर महाराज शिवदत्त की शैतानी एक स्वप्न की तरह सभी के दिल में रह गई ।। इन्द्रज तसिंह को शिकार का शौक बहुत था, जहाँ तक बन पडता वे • रोज शिकार खेला करते ! एक दिन किसी वनरखे ने हाजिर हो कर बयान | किया कि इन दिनो फलाने जंगल की शोभा खूब बढ़ो चढो है और । शिकारी जानवर भी इतने झाए हुए हैं कि अगर वहाँ महीने भर टिक कर ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति शिकार खेला जाय तो भी जानवर न घटें और कोई दिन खाली भी न जाय | यह सुन दोनों भाई बड़े खुश हुए। अपने बाप राजा बीरेन्द्रसिंह ते शिकार पेलने की इजाजत माँगी और कहा कि “हम लोगों का इरादा झाट दस दिन तक जंगल में रद्द कर शिकार खेलने का है । इसके जवाब में राज चोरेन्द्रसिंह ने कहा कि इतने दिनो तक जगल में रह कर शिकार पैलने का हुक्म में नहीं दे सकता, हाँ अपने दादा से पूछोअगर चे हुक्म है तो कोई हर्ज नहीं है। यह सुन इन्द्रजीतसिंह अौर अानन्दसिंह ने अपने दादा महाराज सुरेन्द्र के पास जाकर अपना मतलन अर्ज किया । उन्होंने खुशी से मन्जूर किया और हुक्म दिया कि शिकीरगाह में इन दोनों के लिए खेमा उदा किया जाय और जब तक वे शिकारगाह में रहे पाँच सौ फौज बरावर इनके साथ रहे ! शिफार पेलने का हुक्म पा इन्द्र जीतसिंह शौर श्रीनन्दसिंह बहुत पुग्न हुए श्रीर अपने दोनों ऐयार भैरोसिंह और तारासिंह को साथ ले मय पाँच मी फोन के चुनार से रवाना हुए। नुनार से पाँच कम दक्षि एक घने और भयानक जंगल में पहुँच कर उन्होंने देश ४ाला ! दिन थोटा बाकी रह गया था इसलिए यह राय गरि 'प्राज्ञ श्रीराम करे, कल सवेरे शिकार का बन्दोवस्त किया जायगा, मगर वनरम्प 5 ॐा शेर का पता लगाने के लिए, आज ही कर दिया जाय । जगली की हिफाजत के लिए जो नौकरे रहते हैं उनको बनरखे ने १ । शिर पिलाने का काम देनरी हा का है। ये लोग जगल * पून घूम र श्री शिकारी जानवरों के पैर का निशान दे और उस -गज पर जा जा जर पता लगाते हैं कि शेर इत्यादि कोई चिंकारा जानपर म जान ५१ ना, या प्रगर है तो कहाँ पर है । वनरखो का | ":{" ::रना ना । टप झा व उत्रर कि फलानो हो। ः । नागः या २५ ।। ________________

    पहिला हिस्सा भैंसा + बाधने की कोई जरूरत नहीं, शेर का शिकार पैदल ही किया जायगा । । दूसरे दिन सवेरे मनरखों ने हाजिर होकर अर्ज किया कि इस जुगल | में शेर तो है मगर रात हो जाने के सबब हम लोग उन्हें अपनी अॉखों से न दे सके, अगर आज का दिन शिकार न खेला जाय तो हम लोग देख कर उनका पता दे सकेंगे ।। | आज के दिन भी शिकार खेलना बन्द किया गया । पहर भर दिन बाकी रहे इन्द्रजीतसिंह और शानन्दसिंह घो पर सवार हो अपने दोनों + खास शेर के शिकार मै भैसा बाँधा जाता है । भैंसा बाँधने के दो कारण हैं । एक तो शिकार को अटकाने के लिए अथात् जब बनरखे आकर खवर दें कि फलाने जगले में शेर है, उस वक्त या कई दिनों तक अगर शिकार खेलने वाले को किसी कारण शिकार खेलने की फुरसत न हुई और शेर को अटकाना चाहा तो भंसा बाँधने का हुक्म दिया जाता है । बनरले भैसा ले जाते हैं और जिस जगह शेर का पता लगता हैं उसके पास ही किसी भयानक और सायेदार जगल या नाले में मजबूत लूटा बाड़ कर भैंसे को वाँध देते हैं । जब शेर भ से की वं पाता है तो वह आता है और भैंसे को खा कर उस जगल में कई दिनों तक मस्त और वैफिक्र पड़ा रहता है । इस वकीब से दो चार भैंसा देकर महेनो श्र को अटका लिया जाता है। शेर को जब तक खाने के लिए मिलता है वह दूसरे जगल में नहीं जाता | शेर का पेट अगर एक दफे खूब भर जाये – तो उसे सात आठ दिनों तक खाने की परवाह नहीं रहता 1 खुले भेसे को शेर जल्दी नहीं मार सकता है। – दूसरे जर मचान बॉध कर शेर का शिकार किया चाहते है या एक जंगल से दूसरे जंगल में अपने सुबीते के लिए उसे ले जाया चाहते हैं तेव ३ भो इसी तरह भैसे वय वव कर हटाते ले जाते है | इसको शिकार लोरा 'भर' भी कहते हैं । ऐयारों को साथ ले घूमने और दिल बहलाने के लिए डेरे से बाहर निकले और टहलते हुए दूर तक चले गए।

    ये लोग धीरे धीरे टहलते और बातें करते जा रहे थे कि बायें तरफ से शेर के गरजने की आवाज आई जिसे सुनते ही चारो अटक गए और धूम कर उस तरफ देखने लगे जिधर से वह आवाज आई थी।

    लगभग दो सौ गज की दूरी पर एक साधू शेर पर सवार जाता दिखाई पडा जिसकी लम्बी लम्बी और घनी जटाये पीछे की तरफ लटक रही थी एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में शख लिए हुए था। इसकी सवारी का शेर बहुत बड़ा था और उनके गर्दन के बाल जमीन तक पहुंच रहे थे।

    इसके आठ दस हाथ पीछे एक शेर और जा रहा था जिसकी पीट पर आदमी के बदले बोझ लदा हुया नजर आया। शायद यह असबाब उन्हीं शेर सवार महात्मा का हो।

    शाम हो जाने के सबब साधू की सूरत साफ मालूम न पडी तौ भी उसे देव दन चारो को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और कई तरह की बाते सोचने लगे।

    इन्द्र०। इस तरह शेर पर सवार हो कर घूमना मुश्किल है।

    आनन्द०। कोई अच्छे महात्मा मालूम होते।

    मैने०। पीछे वाने शेर को देखिए जिस पर असबाब लदा हुया है किस त भेद की तरह सिर नीचा किए जा रहा है।

    तास०। शेरों को बस में कर लिया है।

    इन्द्र०। जी चाहता है उनके पास चल कर दर्शन करें।

    आनन्द०। अच्ची बात है, चलिए पास से दरों कैसा शेर है।

    साग०। बिना पास गए महात्मा और पाखण्टी में भेद भी न मालूम होगा।

    भैगे०। शाम तो हो गई है, और चलिए आगे से बढ़ कर रोकें।

    आनन्द०। आगे से चल कर गरने से बुरा न मानें। ________________

    पहिला हिस्सा भैरो० } हम ऐयारों का तो पेशा ही ऐसा है कि पहले तो उनका साधू ना ही विश्वास न कर सकवै ! । इन्द्र० । अाप लोगों की क्या बात है जिनकी मूछ मेरो ही मुई। तो है, खैर चलिए तो सही । भै३० ३,लए ।। | चारो अामा अागे से घूम कर उन अरबाजी के सामने गए ? शेर र सवार जा रहे थे । इन लोगों को अपने पास अ.ते देख बाबाजी स्क ए ! पहिले तो इन्द्रजीतसिह और श्रानन्दसिह का ६ शेर को देख र अ मगर पिर ललकारने से आगे बढ़ा । थो दूर जाकर दोनों राई घोड़े के ऊपर से उतर पड़े, भैरोसिह और तारासिह में दोनों घो। को पेद से बाँध दिया। इसके बाद पैदल ही चारो अादमी महात्मा के इस पहुँचे ।। | बाबाजी० } { दूर ही से ) यो राजकुमार इन्द्रजंतसिंह और निन्दसिंह, कहो कुशल तो है ? इन्द्र० } ( प्रणाम करके ) आपकी कृपा से सब मंगल है । | बा० । ( भैरोसिंह और तारासिंह की तरफ देख कर ) को भैरो और तार, अच्छे हौ ? दोनो० ( पृथ जोड़ कर ) यापकी दया से । चा० । राजकुमार, मैं खुद तुम लोगों के पास जाने को था क्योंकि मने शेर के शिकार करने के लिए इस जल में डेरा डाला हैं । मैं रिनार जा रहा हूँ, घूमता फिरता इस जगल में भी र पचा | यह ल अच्छी मालूम होता है इसलिए दो तीन दिन तक यहाँ रहने का । चार है, कोई अच्छी जगह देख कर धूनी लगाऊँगा । मैरे साथ सवारी र अमात्र लादने के कई शोर हैं, इसलिए कहता हूँ कि धासे में मेरे सी शेर के मत मारना नहीं तो मुश्किल होग, सैक शेर पच कर हारे लश्कर में हलचल मचा डानेंगे और बहुत की जान जाय । ________________

    च द्रकान्ता सन्तति तुम प्रतापी राजा सुरेन्द्रसिंह * के लड़के ही इसलिए तुम्हें पहले ही समझा देना मुनासिव है जिसमें किसी तरह का दुःख न हो । इन्द्र० । महाराज में कैसे जानें गई कि यह श्रापका शेर है। ऐसा ही है तो शिकार न पैलूगा । बाथा ० । नहीं नहीं, तुम शिकार खेली, मगर मेरे शेरों को मत मारो । इन्द० | मगर यह कैसे मालूम हो कि फलाना शेर श्रीपका है। बाबा० । टेप में अपने शेरों को बुलाता हूँ, पहिचान ले । बाबाजी ने शंख बजाया । भारी शख की विजि चारो तरफ जंगल में गुज गई और हर तरफ से गुर्राहट की आवाज आने लगी । थोडी हो देर में इधर उधर से दौडते हुए पॉच शेर श्री श्री पहुचे । ये चारो दिलावर शौर बहादुर ये, अगर कोई दूसरा होता तो डर से उसकी जान निकल जाती । इन्द्रजीतसिह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देख उछनने कूदने लगे मगर रेशम को मजबूत बागडोर से बंधे हुए थे इससे माग न मके } इन शेरों ने श्राकर बडी उधम मचाई, इन्द्रजातसिंह वगैह को दे गरजने कूदने अौर उछलने लगे, मगर बाबाजी के डॉटते ही मी ठण्डे रो सिर नीचा कर भइ बकरी की तरह खड़े हो गए। यत्रि० । दे। इन शेरी को पहिचान लो, अभी दो चार शौर है, माग होता है उन्होंने शर ीं अविाज नहीं सुनी । खेर अभी तो * गं जगत् मे हैं, उन बाकी शेरों को भी दिखला दूंगा, कल भर • । गदा श्रीर त्रुट क्यो । | भो० } फिर अपने मुलत कहाँ होगी १ अापकी धूनी किस जग गई है। | जावा० | मुझे तो यही जग आनन्द की मालूम होती है, के : ना सुना होगा । | गाध माग भूल गए, वरिन्द्रसिद्द की जगह सुरेन्द्रसिंह का ना चाचीजी शेर से ना उत हे गौर जितने शेर उस जग्इ आए थे वे मन बावाजी चार तरफ धूने तथा मुहब्बत से उनके बदन को चाटने और सूधन लगे।व चार!दिम।धोडी देर तक वह और अटकने के बाद वविाजी से विदा है। अमे में शाये।

    जब सन्नाटा हुआ भैरोसिंह ने इन्द्रजःतभिह से कहा,"मेरे दिमाग में इम समय बहुत सी बातें घूम रही हैं।मैं चाहताहूँ कि हम लोग चारों|आदिमी एक जगह बैठ कुमेटी कर कुछ राय पक्की करें।

    इन्द्रजीतसिंह ने कहा, अच्छा आनन्द और तारा को भी इसी जगह बुला लो।

    भैरोसिंह गये और आनन्दसिह तथा तारासिंह को उसी जगह बुला लाए।उस वक्त सिवाय इन चारा के उस खेमे में और कोई न रहा।भैरोसिंह ने अपने दिल को हालै कद्दा जिसे सभी ने बड़े गौर से सुना,इसके बाद पहर भर तक कुमेटी करके निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।

    यह कुमेटी कैसी भई?भैरोसिंह का क्या इरादा हुशा श्रौर उन्होंने क्या निश्चय किया है?तथा रात भर वे लोग क्या करते रहे है?इसके कहनेकी कोई जरूरत नहीं, समय पर सब कुछ खुन जाय।

    सवेरा होते ही चारो आदमी खेमे के बाहर हुए और अपनी फौज के सदर कञ्चनसिंह को बुला कुछ समझा बुझा बावाजी की तरफ रवाना हुए । जव लश्कर से दूर निकल गए,नन्दसिंह भैरोसिंह और तारासिंह ता तेजी के साथ चुचार की तरफ रवाना हुए, और अकले इन्द्रजीतसिंह शबाजी से मिलने के लिए गए।

    बाबाजी शो के बीच में धूनी रमाए बैठे थे।दो शेर उनके चारो। तरफ घूम घूम कर पहरा दे रहे थे।इन्द्रजीतसिंह ने पहुँच कर प्रणाम किया और चार्ज ने प्रार्शीवाद देकर चैठने के लिए कहा।

    इन्द्रजतसिंह ने बनिस्बत कल के आज दो शेर और ज्यादै देखे।थोड़ी देर चुप रहने के बाद बातचीत होने लगी है।

    २

    बाबा कही इन्द्रजीतसिंह,तुम्हारे भाई और दोनों ऐयार कहाँ रह गए,वे नहीं आए?

    इन्द्र०।हमारे छोटे भाई आनन्द को बुखार आ गया।इस सबब से वह न या सका।उसी की हिफा नत में दोनों ऐयारों को छोड मैं अकेला आपके दर्शन को आया हूँ!

    वावा०।अच्छा क्या हर्ज है,आज शाम तक वह अच्छे हो जायेंगे,कहो आज कल तुम्हारे राज्य में कुशल तो है?

    इन्द्र०।आपकी कृपा से सब ग्रानन्द है।

    वावा०।बेचारे वीरेन्द्रसिंह ने भी बड़ा ही कष्ट पायो!खैर जो हो दुनिया।उनका नाम रह जायगा।इस हजार वर्ग के अन्दर कोई ऐसा सजा नहीं है जिसने तिलिस्म ताड़ हो!एक और तिलिस्म है,असल में वही भरी और तारीफ के लायक है।।

    एन्द्र०।पिताजी तो कहते हैं कि वह तिलिस्म तेरे हाथ से टूटेगा।

    वावा०।हाँ ऐसा ही होगा,वह जरूर तुम्हारे हाथ से फतह होगा,सभे केाई मन्दे नए।

    इन्द्र०।देखें कर तक ऐसा होता है,उसकी ताली का तो कही पता ही नहीं लगता।

    बावा°। ईश्वर चाहेंगा तो एक ही दो दिन तक तुम उस तिलिस्म के होने में हाथ लगा दोगे।उस तिलिस्म की ताली में हूं।कई पुश्त ने हम लोगों उस तिलिस्म के दागी होते चले आए हैं।मेरे परदादा दाट श्री बाप उमी तिलिस्म के दारोगा,जब मेरे पिता का देहान्तने लगा तो हैन को ताली मेरे सुपुर्द कर मुझे उसका दारोगा मुररर:दिइ।अप वर उतर आ गया है कि में उस ताला तुम्हारे या वह निन्मि तुग्गु नाम पर वाया गया है और मित नुरा’ र ? उमा मानिस' नद्दा पन मना है। • १ २ १ देर का है ? पहिला हिस्सा।वाचा।कुछ नहीं,कल से तुम उसके तोडने में हाथ लगा दो,मगर एक बात तुम्हारे फायदे की हम कहते हैं।

    इन्द्र०।वृह क्या?

    वावा॰तुम उसके तोड़ने में अपने भाई अनिन्द को भी शरीक कर लो,ऐसा करने से दौलत भी दूनी मिलेगी और नास मी दोनों भाइयों की दुनिया में हमेशा के लिए बना रहेगा।

    इन्द्र०।उसकी तो तबीयत ही ठीक नहीं!

    वाचा॰।क्या हर्ज है, तुम अभी जाकर जिस तरह बने उसे मेरे।पास ले आओ,मैं बात की बात में उसको चगा कर दूगा!श्रीज ही तुम लोग मेरे साथ चलो,जिसमें कल तिलिस्म टूटने में हाथ लग जाय,नहीं तो साल भर फिर मौका न मिलेगा।

    इन्द्र०।बावाजी, शअसल तो यह है कि मैं अपने भाई की बढ़ती नहीं चाहता,मुझे यह मजूर नहीं कि मेरे साथ उसका भी नाम हो।

    वावा॰।नहीं नहीं,तुम्हें ऐसा न सोचना चाहिए,दुनिया में भाई से बढ़ के कोई रन नहीं है।

    इन्द्र०।जी हाँ,दुनिया में भाई से बढ़ के रन नहो तो भाई से बढ़ के कोई दुश्मन भी नहीं,यह बात मेरे दिल में ऐसी वैठ गई है कि उसके हटाने के लिए ब्रह्मा भी कर समझा बुझा तो भी कुछ नतीजा न निकलेगा।

    बाबा०।विना उसको साथ लिए तुम तिलिस्म नहीं तोड़ सकते।

    इन्द्र०!( हाथ जोड़ कर ) बस तों जाने दीजिए,माफ कीजिए,मुझे तिलिस्म तोडने की जरूरत नहीं!

    वावा॰। क्या तुम्हें इतनी जिद्द है?

    इन्द्र०।में कह जो चुकी कि ब्रह्मा भी मेरी राय पलट नहीं सकते।

    वावा०।खैर तुम्हीं चलो,मगर इसी वक्त चलना होगा।

    इन्द्र०।हाँ हाँ,मैं तैयार है,अभी चलिए । नावाजी उसी समय उठ खड़े हुए,अपनी गठडी मुठडी चाध एक शैर पर लाद दिया तथा दूमरे पर आप सवार हो गए।इसके बाद एक गैर की तरफ देख कर कहा, 'इसा गङ्गाराम, यहाँ तो आओ।”वह शेर नुरत इनके पास आया ।बाबा जी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा,“तुम दुग्न पर मार हो लो।"इन्द्रजीतसिंह भी कूद कर सवार हो गए और था गज के साथ साथ दक्षिण का रास्ता लिया!बावाजी के साथ शेर भी कई प्रागे कोई पीछे कोई ये कोई दाहिने हो बाबाजी के साथ साथ जाने लगे।

    सब शेर तो पीछे रह गए मगर दो शेर जिन पर बावाजी श्रीर इन्द्र जीनसिंह मवार थे झागे निकल गएदो पहर तक ये दोन चल गए!जब दिन दुनने लगा वावज ने इन्द्र तमिह से कहा,'यह टड्र कर कुछ ग्या पी लेना चाहिए। इसके जवाब में कुमार चले,"बाबा,खाने पीन की कोई जरूरत नहीं।अभी महात्मा हा ठहरे,मुझे भूख ही नई लगी, फिर अटकने की क्या जरूरत है।जिस काम के पीछे पड़े उसमे मुला ऊना ठीकनहीं।

    बाबाजी न कर, शाबाश,तुम बड़े बहादुर,अगर तुम्हारा दिल इतना मजा न होता तो तिलिस्म तु हारे ही हाथ से टूटेगा ऐसा‌ लान न ह जाते,खेर चलो!

    कुछ दिन फ{ द्दा जब ये दान एक पहा के नाचे पहुंचे 1 बावज ने श ३ वजाया 1 धंदा हूँ दर में चारो तरफ से संकः पहाडा बुटेर द्दा * वर लिए आते दिपाई पई श्रीर में हैं। बीस पचास अदिमय मा५ लिए पूरा तप में ग्राती या राजा शिवदत्त नजर पजिरे * :17 िन ऊचा मायाज में कहा, “इन । म पहिचान *, * नाराज शिवदत्त । न तस्यार मेरे कमरे में लटका हुई। * 1 दादा नी म न तन्त्र र मुझे दियो कर कहा था कि हमारे सत्र में र न प दिन * | श्री श६, काश्ते में चावाज पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    घूमते फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी भरी सुहावनी पहाडी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए,मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमर और दालान रहने लायक थे।यह छोटी पहाडी अपने चारे तरफ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दत्री हुई थी वि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना श्रौर कुछ पता लगाना मुश्किल था।।इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ वास आदमी थे जिन तीन मुसलमान ऐयार भी थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्ते शरों में में से झीर यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गए।कि इनके शामिल रहने से कभी न कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला ले का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के श्रौर केाई इर लायक नजर भी न झात्ती था जो इन बेईमान को ऐयारी के लिए अपने मा राता।नेचे लिखे नाम से ये तीनों ऐयार पुकारे जाते थे-चाकर अला,ईटावक्श और यारग्रल!इन सत्र ऐयारों श्रौर साथियों ने मुपए,पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा महाराज शिवदत्त की मदद की।

    राजा वारेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ मगर मेंका न मिलने के स व मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा।अपनी चालाकी और होशियारी से वह् पहाटी भिल्ल कोल और पवार इत्यादि जाति के श्रादमिर्यों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजार में गल्ला मी शहद श्रीर,बहुत मी जगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों के मारफत दर में भैरवा और विया कर रुपए,बटोरने लगा।उन्हीं लोगो से शियार रके थे।बहुत फौज भी उस वन लधापहाति के लोग भै होशियार हो गए और खुद्द शहर मेंर मला वर्ग इंच रुपए इक्ट्ठा करने लगे । शिवदत्तगढ़ भा अच्छी तरह अबाद आ गया।

    दूध बो रह ऐयारी ने भी अपने कुल साथ को जो ________________

    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३

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    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३ ________________

    चन्द्र गन्ना सन्तति रेन्द्र शवदत्त के ऐयारों के चालाका ता खूब की था मगर… मेन्द्र । या जा सर पर मवार हा सिद्ध ता बन लेकिन अपना काम न कर सके न! मगर मे भैरामिह का अब वहत जल्द छुडाना चाहिए। नात० । कुमार घबगायो मत, तुम्हारे दोस्त को किसी तरह की तकलीप नाही हो वती, लेकिन अभी उमका शिवदत्त के यहाँ फंसे ही रहना मुना गय – । वह वाफ नहीं है, बिना मदद के श्राप ही छूट कर या राकना , तिस पर पनानाल रामनागयण चुन्नीलाल बद्रीनाथ और ज्योलीना उसकी मदद को भेजे हो गए है, देखो तो क्या होता है। स्तनांनी तक चुपचाप बैठे रह कर शिवदत्त ने फिर अपना स्वराया करने पर उमर योधी है। दर' । कुमारी के साथ फौज शिकारगाह में गई है उसके लिए शर दश 'क्माता ? जीत० । अभी शरगाह से डेरा उठाना मुनासिब नही । (तेजसिंह ताप दास का ) क्यों तेज ? ने० । (गाय नोट कर ) जी हाँ, शिकारगाह में डेरा कायम रहने से हम लोग बदी ग्यूवमूरती श्रीर दिल्लगी से अपना काम निकाल सकेंगे। मुंगेन्द्र यार शिवदत्तगढ़ से लौटे तो कुच हालचाल मालूम हो । तेजल ना नई मार परमी तक कोई न काई जसर पायेगा। पर भर में ज्याद देर तक बातचीत होती रहो । कुल बातों को सोचना पन नुनाममममले बल्कि यासिरी बात का पता तो हम मानगा जो मजान्न म उन के बाद जतसिंह नाले में तेजहि को राम जान दीजिए, लोहोगा देखा जायगा, जल्दा क्या है। गगा friअनी बादरोम इन्द्रजातसिंह और आनन्दसिंह नामा पल देव । वरमात का मीसिम है, गगा पदाग्नि के नीन जल पहुँचा हुआ है, छोटी छाटी सदर ________________

    पहिला हिस्सा दीवारों में टक्कर मार रही है, अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा जेल में पड़ कर लहरों को शाभा दूनी बढ़ा रही है, सन्नाटे का आलम है, इस चारदरी में सिवाय इन दोनों भाइयों के अौर कोई तीसरा दिखाई नहीं देता } इन्द्र० | अभी जल कुछ और बढ़ेगा । अानन्द० । जी हाँ, पारसाल तो गगा आज से कहीं ज्यादे बढी हुई यी जय दादाजी ने हम लोगों को तर केर पार जाने के लिए कहा था । | इन्द्र० { उस दिन भी खून ही दिल्लगी हुई, भैरोसिंर सभों में तेज रहा, बद्रीनाथ ने कितना ही चाहा कि उनके आगे निकल जायें मगर न हो सका। अनिन्द० । हम दोनो भी कास भर तक उस किश्ती के साथ ही साथ राएं जो हम लोगों की हिफाजत के लिए लग गई थी। इन्द्र० ! बम वही तो हम लोगो का शाखिरी इन्तिहीन रहा, फिर तव से जल में तेरने की नौबत ही कहाँ थाई ।। आनन्द० । कल तो मन दादाजी से कहा था कि आज कल गंगाजी खून बढ़ी हुई है तरने को जी चाहता है । इन्द्र० | तव क्या बोले ? | अनिन्द० । कहने लगे कि बस अब तुम लोगों का तेरना मुनासिब नहीं है, हँसी गो । तेरना भी एक इल्म है जिसमे तुम लोग होशियार हो चुके, अब क्या जरूरत है ? ऐसी है। जी चाहे तो किश्ती पर सवार हो कर जाग्रो सैर करो ।। इन्द्र० । उन्होंने वहुत ठीक कहा, चलो किश्ती पर थोडी दृर घूम श्रायें, इसके लिए इजाजत लेने की भी कोई जरूरत नहीं । बात चीत हो ही रही थी कि चोवदार ने आकर अर्ज किया, “एक * बहुत बूढ़ा जवहरी हाजिर है, दर्शन किया चाहती हैं ।” आनन्द० । यह कौन सा वक्त है ? चोपदार० । ( हाथ जोड़ कर ) तावेदार ने तो चाहा था कि इस ________________

    चन्द्रकान्त सन्ततिं समय उसे पिटा करै मगर यह ख्याल करके ऐसा करने का हौसला ने पदा कि एक तो लटकपन दो से व इस देवर को नमकवार है और भाराज की भी उन पर निगाह रहती है, दूसरे अस्सी वर्ष का बुड्डा है, तीसरे करता है कि अभी इस शहर में पहुंचा हूं, महाराज का दर्शन कर चुका है, सरकार के भी दर्शन हो जायें तब आराम से सराय में डेरा डाऊँ, र मेरे से उसका यह दस्तूर भी है ।। न्ट्र० । अगर ऐसा है तो उसे अपने ही देना मुनासिब है ।। अनिन्द्र० । तर अाज किश्ती पर सैर करने का रगनजर नहीं आता है। इन्द्र० । या दृर्ज है, कल सही । चोदार सलाम करके चला गया और थोड़ी ही देर में सौदागर को ले कर जिर हुआ । हकीकत में वह सौदागर बहुत ही बुड्ढा शा, यामत ग्रौर शरफ्त उसके चेहरे से बरसती थी । आते ही मुलाम करके उगने दोनों भाइयों को दो अंगूठियों नजर दी और कबूल होने के बाद गइन पर कर जमीन पर बैठ गया ।। म भुइवें जयरी की इजत ही गई, मिजाज का हल सफर की *पियत पूछने उद देने पर जाकर गर्म करने और कल फिर हाजिर होने का हुक्म हुआ, तीदागर सलाम करके चला गया । मंदिर में जो दो टूठिया दोनों भाइयों को नजर दी थी उनमें प्रानन्दर्भिद् की अंगूठी पर निहायत खुरार मानिक जना हुआ था और दर्जनह् िकी अँगूठी पर सिर्फ एक छोटी सी तस्वीर थी जिसे दो एक र निग" भर र इन्द्रजीतसिंह ने देगा श्ररि कुछ सोच कर चुप हो रहे । | एरन्त होने पर रात के शुमटान की रोशनी में फिर उसे अॅटूटी ३ र नि नगीने की जद कमसिन इमीन अँरित की तस्वीर

    : १ । चाहे थट तुन्दर निर्भर इन छोटो या न हो मगर मुसीवर ३ २ १ माई उम६ गचं कर थे | इ पर्ने देते एक मरतने तो इन्द्रादि । २ए लिन हो गई कि अपने का कोईर उस औरत की बैठ कर भोजन भी करना ही पडा़,हाँ शाम को इनकी बेचैनी बहुत बढ़ गई जब सुना कि तमाम शहर छान डालने पर भी उस जवहरी का कही पता न लगा और यह भी मालूम हुआ कि उस जवहरी ने यह बिल्कुल झूठ कहा था कि 'महाराज का दर्शन कर आया हूँ, अब कुमार के दर्शन हो जायँ तब आराम से सराय में डेरा डालू ।' वह वास्तव में महाराजा सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह से नहीं मिला था ।

    तीसरे दिन इनको बहुत ही उदास देख आनन्दसिंह ने किश्ती पर सवार होकर गद्गाजी को सेर करने और दिल बहलाने के लिए जिद्द की, लाचार उनकी बात माननी ही पड़ी ।

    एक छोटी सी खूबसूरत और तेज जाने वाली किश्ती पर सवार हो इन्द्रजीतसिंह ने चाहा कि किसी को साथ न ले जायें सिर्फ दोनों भाई ही सवार हो और खे कर दरिया की सैर करें,। किसी की मजाल थी जो इनकी बात काटता, मगर एक पुराने खिदमतगार में जिसने कि बीरेन्द्रसिंह को गोद में खिलाया था और अब इन दोनों के साथ रहता था ऐसा करने से रोका और जब दोनों भाइयों ने न माना तो वह खुद किश्ती पर सवार हो गया । पुराना नौकर होने के ख्याल से दोनों भाई कुछ न बोले, लाचार साथ ले जाना पड़ा ।

    आनन्द० । किश्ती को धारा में ले जाकर बहाव पर छोड़ दीजिए फिर से कर ले आवेगे ।

    इन्द्र० । अच्छी बात है ।

    सिर्फ दो घण्टे दिन बाकी था जब दोनों भाई किश्ती पर सवार हो दरिया की सैर करने को गए क्योंकि लौटती समय चॉदनी रात का भी आनंद लेना मंजूर था ।

    चुनार से दो कोस पश्चिम गंगा के किनारे ही पर एक छोटा सा जंगल था । जब किश्ती के पास पहुंची, वसी की और साथ ही गाने की बारीक सुरीली आवाज इन लोगों के कानो में पड़ी । संगीत एक ऐसी

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    चन्द्रकान्ता सन्तति चीज है कि हर एक के दिल को चाहे वह कैला ही नासमझ क्यों न हो | अपनी तरफ खेंच लेती है यहाँ तक कि जानवर भी इसके वश में हो कर अपने को भूल जाता है ! दो तीन दिन से कुअर इन्द्रजीतसिंह का दिल चुटीला हो रहा था, दरिया की बहार देखना तो दूर रहे इन्हें अपने तनोबदन की भी सुध न थी, ये तो अपनी प्यारी तस्वीर की धुन में सर झुकाए बैठे कुछ सोच रहे थे, इनके हिसाब चारो तरफ सन्नाटर था, मगर इस सुरीली आवाज ने इनकी गर्दन घुमा दी और उस तरफ देखने को मजबूर किया जिधर से वह अावाज आ रही थी ! किनारे की तरफ देखने से यह तो मालूम न हुअा कि बसी बजाने यो गाने वाला कौन है मगर इस बात का अन्दाजा जरूर मिल गया कि लोग बहुत दूर नहीं हैं जिनके गाने की विजि सुनने वालों पर जादू का सा असर कर रही है ! इन्द्र० | श्राहा, क्या सुरीली आवाज है !! । ग्रानन्द० ! दूसरी अावाज भी आई । बेशक कई औरतें मिल कर | गा ३ जा रही हैं। | इन्द्रजीत० । ( किश्ती का मुहूं किनारे की तरफ फेर कर ) ताज्जुब है कि इन लोगों ने गाने बजाने और दिल बहलाने के लिए ऐसी जगह पसन्द की ! जरा देखना चाहिए । | आनन्द० | क्या हुई है, चलिए। वृहे रिपदमतगार ने किनारे किश्ती लगाने और उतरने के लिए मन। फ़िया और बहुत समझाया मगर इन दोनों ने न मानी, किश्ती किनारे लगाई और उतर कर उस तरफ चले जिधर से अचाने आ रही थी । जगन्न में थोड़ी ही दूर जा कर उसे पन्द्रह नौजवान औरतों का झुण्ड नजर पडा ऊँ। रग विरगर पोशाक और कीमती जेवरों वे अपने हुस्न को दूना किए ऊँचे पेड़ से लटकते हुए एक फूले की फुला रही थीं। कोई वंसी कोई मृदग वजाती, कोई हाथ से ताल दे दे कर गा रही थी । उस हिंडोले ________________

    पहीली इसी पर सिर्फ एक ही शौरत गगा की तरफ रुर किए बैठी थी । ऐसा मालूम होता था मानों परिय साक्षात् किसी देवकन्या को झुना र ग वजा कर | इसलिए प्रसन्न कर रही है कि लुबरती बढ़ने और नौजवानी के स्थिर रहने का वरदान पावें । मगर नहीं, उनके भी दिल की दिल ही दे रही और कुँअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह को आते देख हिंडोले पर बैठी हुई नाजनीन को अकेली छोड़ न जाने क्यों भाग जाना ही पडा । शानन्द० । भैया, वह सब तो भाग गई ! इन्द्र० । हो, मैं इस हिंटोले के पास जाता हूँ, तुम देखो वे शौरतें किधर गई । अानन्द । दृत गच्छा ।। चाहे जो हो मगर कुअर इन्द्रजीतसिंह ने उसे पहिचान ही लिया | जो हिंडोले पर अकेली रह गई थी । भला यह क्यों न पहिचानते ? जवहरी की नजर दी हुई अंगटी पर उसकी तस्वीर देख चुके थे, उनके दिल में उसकी तस्वीर खुद गई थी, अत्र तर मु हमारी मुराद पाई, जिसके लिए अपने को मिटाना मंजूर था उसे विना परिश्रम पाया, फिर क्या चाहिए । ग्रानन्दसिंह पता लगाने के लिए उन ग्रेरितों के पीछे गए मगर वे ऐसी भागी कि झलक तक दिखाई न दी, लाचार आधे घंटे तक रान होकर फिर उसे हिंटोले के पास पहुचे ! हिंटले पर बैठी हु श्रेरित की कौन कहे अपने भाई को भी वहा ने पायी । वर्षा कर इधर उधर हुने और पुकारने लगे, चरा तक कि रात हो गर्ट और यह सोचकर क्रिती के पास पहुंचे कि शायद वह चले गए हों, लेकिन वह भी सिवाय उन चुढे | पिदमतगार के किसी दूसरे को न देता । जी बेचैन हो गया, ज़िदमतगार को सन्द हाल कह कर बोले, "ज तक अपने व्यारे भाई का पता ने लगा टूगा घर न जाऊंगा, तू जाकर यहां के हवाले की सभी को पयर कर दे ।” खिदमतगार नै र तरह से नन्दसिंह को समझाया बुझाया और घर चलने के लिए कहा मगर कुछ फायदा न निकला । लाचार उसने ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति किश्ती उसी जगह छोडी और पैदल रोता कलपती किले की तरफ रवाना हुआ क्योंकि यहा जो कुछ हो चुका था उसका हाल राजा बीरेन्द्रसिंह से कहना भी उसने आवश्यक समझा ! चौथा बयान खिदमतगार ने किले में पहुच कर और यह सुन कर कि इस समय दोनों एक ही जगह बैठे हैं कु अर इन्द्रजीतसिंह के गायब होने का हाल और सवत्र जो कु र आनन्दसिंह की जुबानी सुना था महाराज सुरेन्द्र सिंह और श्रीरेन्द्रसिंह के पास हाजिर होकर अर्ज किया । इस खबर के सुनते ही उन दोनों के कलेजे में चोट सी लगी । थोड़ी देर तक घबराहट के सब कुछ सोच न सके कि क्या करना चाहिये | रात भी एक पहर से ब्याई जा चुकी यी 1 आखिर जीतसिंह तेजसिंह और देवीसिंह को बुला कर खिदमतगार की जुबानी जो कुछ सुना था कहा और पूछा कि अब क्या करना चाहिये । तेजसिंह० | उस जगल में इतनी अौरत को इकट्ठे हो कर गाना बजाना और इस तरह धोखा देना बेसबब नहीं है ।। | सुरेन्द्र० । जत्र से शिवदत्त के उभरने की खबर सुनी है एक खुटका सा बना रहा है, मैं समझता हूँ यह भी उसी की शैतानी है। | वीरेन्द्र० । दोनों के ऐसे कमजोर तो नहीं हैं कि जिसका जी चाहे पकड़ ले । सुरेन्द्र० । ठीक है, मगर आनन्द का भी वही रह जाना बुरा ही हुआ ) तेज० । बेचारा खिदमतगार जबर्दस्ती साथ हो गया था नहीं तो पता भी न लगता कि दोनें कहा चले गये । खैर उनके बारे में जो कुछ सोचना हैं सोचिये मगर मुझे जल्द इजाजत दीजिए कि हजार सिपाहियों को साथ लेकर वहा जाऊँ और इस वक्त उसे छोटे से जङ्गल को चारो तरफ से घेर लू, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा | ________________

    पहिला हिस्सा सुरेन्द्रः । ( जीतसिंह से ) क्या राय है? |जत० । तेज टीक कहता है, इसे भी जाना चाहिए ।। | हुक्म पाने ही तेजसिंह दीवानखाने के ऊपर एक बुर्ज पर चढ़ गए जहाँ ग्र; मा नक्कारा और उसके पास ही एक भारी चोव :मलिए रक्खा हा था कि वक्त चैवक्त जत्र कोई जरूरत या पई ग्रार फौज को तुरंत तैयार कराना हो तो इस नकारे पर चोब मारी जाय । इसकी अावाज भी निराले ही ढंग की थी जो किमी नारे की आवाज मे मिलती न थी शौर म बजाने के लिए तेजसिंह ने कई इशारे भी मुर्रर किए हुए थे । नेत्रवि ने चोर उठा क्रेर जोर से एक दफे नक्का पर भारी जिसको प्रीम्राज तमाम शहर में बल्कि दूर दूर तक गूंज गई । चाहें इसका मवव तिमी २ वाले की ममझ में न आया हो मगर सेनापति ममझ गया कि मी वक्तेः इजार पीजी सिपाहियों की जरूरत है जिरका इन्तजाम उसने बदृत जल्द किया । तेजसि” अपने सामान से तैयार हो किले के बाहर निकले शोर हजार फाजी सिपारी तथा बहुत से मशालचियो को साथ ले उस छोटे से जगल की तरफ रवाना होकर बहुत जल्दी ही वहॉ जा पहुचे ।। | थोडी थोडी दृर पर पहरा मुकर्रर कर के चारो तरफ से उस जंगल को घेर लिया । इन्द्रजीतसिंह तो गायत्र हो ही चुके थे, आनन्दसिंह से भी मिलने को बहुत तकत्रि की गई मगर उनका भी पता न लेगा । तरत में रात निताई सवेरा होते ही तेजसि न हेक्म दिया कि एक तरफ से इसे अगल को तेजी के साथ काटना शुरू करो जिधर्म दिन भर में तमाम जगल स्पः हो जाय । उसी समय महाराजा सुरेन्द्रसिह और जीतसिह भी व आ पहुँचे । जगल का काटना इन्होने भी पसन्द किया और बोले कि बहुत अच्छा होगा अगर हम लोग इस जगल से एक दम ही निश्चित हो जॉय ।। | इस छोटे से जगल को काटते देर ही कितनी लगनी थी, तिस पर महा ________________

    २६ चन्द्रकान्ता सन्तति राज की मुस्तैदी के सबब यहाँ कोई भी ऐसा नजर नहीं आता था जो पेड़ की कटाई में न लगा हो । दोपहर होते होते जगल कट के साफ हो गया मगर किसी का कुछ पता न लगा यहाँ तक कि इन्द्रजीतसिंह को तरह आनन्दसिंह के मी गायब हो जाने का निश्चय करना पडा हाँ इस जगल के अन्त में एक कमसिन नौजवान हसीन और बेशकीमती गहने कपड़े से सजी हुई औरत की लाश जरूर पाई गई जिसके सिर का पता न था ।। | यह लाश महाराज सुरेन्द्रसिंह के सामने लाई गई। अब सभी की परेशानी और भी बढ़ गई और तरह तरह के ख्याल पैदा होने लगे । लाचार उस लाश को साथ ले शहर की तरफ लौटे। जीतसिंह ने तेजसिंह से कहा, हम लोग जाते हैं, तारासिंह को भेज के सब ऐयारी को जो शिवदत्त की फिक्र में गए हुए हैं बुलवा कर इन्द्रजीतसिंह और अनिन्दसिंह की तलाश में भेजेंगे, मगर तुम इसी वक्त उनकी खोज में जहाँ तुम्हारा दिल गवाही दे जायो !

    तेजसिंह अपने सामान से तैयार ही थे, उसी वक्त सलाम कर एक तरफ को रवाना हो गए, और महाराज रूमाल से अखिों को पोंछते हुए चुनार कीतरफ विदा हुए । उदास और पोतों की जुदाई से दुखी महाराज सुरेन्द्रसिंह घर पहुँचे । दोनों लड़कों के गायब होने का हाल चन्द्रकान्ता ने भी सुना वह बेचारी दुनिया के दु:ख सुख को अच्छी तरह समझ चुकी थी इसलिए कलेजा मसोस कर रह गई, जादिर में रोकना चिल्लाना उसने पसन्द न किया, मगर ऐसा करने से उसके नाजुक दिल पर और मी सदमा पहुची, घडी भर में ही उसकी सूरत बदल गई । चपला शोर चम्पा को चन्द्रकान्ता से कितनो मुहब्बत थी इसको आप लोग बूब जानते है लिखने की कोई जरूरत नहीं, दोनों लटक के गायब होने का गम इन दोनों को चन्द्रकान्ता से ज्यादे हुया श्रीर दोनों ने निश्चय कर लिया कि मौका पा कर इन्द्रजीतसिंह अौर श्रानन्दसिंह का पता लगाने की कोशिश करेंगी ।। ________________

    पहिला हिस्सा | महाराज सुरेन्द्रसिंह के अाने की खबर पाकर वीरेन्द्रसिंह मिलने के लिये उनके पास गए । देवीसिंह भी वहाँ मौजूद थे । वीरेन्द्रसिंह के सामने ही महाराज ने सन हाल देवीसिंह से कह कर पूछा कि अब क्या करना देवी० } मै पहिने उस लाश को देखा चाहता हूँ जो उस जगल में पाई गई थी । । सुरेन्द्र० 1 हाँ तुम उसे जरूर देखो । जीत० } ( चोचदार से ) उस लाश को जो जगल में पाई गई थी इसी जगह लाने के लिये कहो । “बहुत अच्छा" कह कर चवदार बाहर चला गया मगर थोडी हीं देर में वापस आकर बोला, “महाराज के साथ आते आते न मालूम वह लाश' कहा गुम हो गई ! कई आदमी उसकी खोज में परेशान है मगर | पता नहीं लगता !!" | वीरेन्द्र० 1 अब फिर हम लोगों को होशियारी से रहने का जमाना श्रा गया । जय हजारों अदिमियो के बीच से लाश गुम हो गई तो मालूम होता है, अभी बहुत कुछ उपद्रव होने वाला है । | जीत० । मने तो समझा था कि अब जो कुछ थोड़ी सी उम्र रह गई। है श्रीराम से कटेगी, मगर नहीं, ऐसी उम्मीद किसी को कुछ भी न रखनी चाहिए। | सुरेन्द्र० 1 खेर जो होगा देखा जायगा, इस समय क्या करना मुनासिन। उमे सोच । जति० 1 मेरा विचार था कि तारासिंह को बद्रीनाथ वगैरह के पास भेजते जिसमें वे लोग भैरोसिंह को छुड़ा कर ग्रौंर किसी कार्रवाई में न फंसे और मीधे यहाँ चले श्रावे, मगर अब ऐसा करने की भी जी नहीं चाहतः । आज भर अप और सन्न करे, अच्छी तरह सोच विचार कर कल में अपनी राय दूगी । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति पांचवां बयान परित बड़ीनाथ पन्नालाल रामनारायण श्रौर जगन्नाथ ज्योतिषी भैरोसिर ऐयार को छुड़ाने के लिए शिवदत्तगढ़ की तरफ गए । हुक्म के मुताविक कञ्चनसिंह मेनापति ने शेर वाले बाबाजी के पीछे जासूस भेज कर पता लगा लिया था कि भैरोसिंह ऐयार शिवदत्तगढ़ किले के अन्दर पहुँचाए गए, इसीलिए इन ऐयारों को पता लगाने की जरूरत न पडी, साधे शिवदत्तगढ़ पहुँचे और अपनी अपनी सूरत बदल शहर में घूमने लगे, पॉचो ने एक दूसरे का साथ छोड़ दिया मगर यह ठीक कर लिया था कि सब लोग घूम फिर कर फलानी जगह इकट्ठे हो जायँगे । दिन भर घूम फिर कर भैरोसिंह का पता लगाने के बाद कुल ऐयार शहर के बाहर एक पहाड़ी पर इकट्ठे हुए और रात मर सलाह करके राय कायम करने में काटी, दुमरे दिन ये लोग फिर सूरत बदल बदल कर शिवदत्तगढ़ में पहुँचे । रामनारायण और चुन्नीलाल ने अपनी सूरत उसी जगर के चोदारों की सी बनाई और वहा पहुँचे जहाँ भैरोसिंह कैद थे । कई दिनों तक कैद रहने के सवव उन्होने अपने को जाहिर कर दिया था और अपनी असली सूरत में एक कोठड़ी के अन्दर जिसके तीन तरफ दीवार श्रीर एक तरफ लोहे का अँगला ल हुया था वन्द थे । उस कोठी के बगल में उसी तरह की एक कोटी ग्रौर थी जिसमें गद्दी लगाए एफ वृद्धा दारोगा बेटा था और बार कई सिपाही नंगी तलवार लिए घूम घूम कर पा दे रहे थे । रामनारायण श्रौर चुन्नीलाल उस ६ट के देने पर जाकर पड़े हुए र बृढे दारोगा से बातचीत इग्न लगे। राम० | श्रापी महाराज ने याद किया है । चुदा० | क्यों क्या चाम १ १ भीतर श्राश्रा, बैठो, चलते हैं | रामनारायण श्रीर चुन्नीलाल कोटडी के अन्दर गए और बोले- ________________

    पहिला हिस्सा राम० । न मालूम क्यों बुलाया है मगर ताकीद की है कि जल्द बुला लाश्रो ! वृहा० । अभी घण्टे भर भी नहीं हुए जब किसी ने श्री के कहा था | कि महाराज खुद आने वाले हैं, क्या वह वात झूठ थी १ । राम० | हा महाराज ग्राने वाले थे मगर अब न अावेंगे । बूढ० अच्छा शाप दोग आदमी इसी उग्र वैट थ्रार कैदी की | हिफाजन करे में जाता हू ।। राम | बहुत अच्छा । रामनारायण श्रौर चुन्नीलाल को कड़ी के अन्दर बैठा कर बुढा दारोगा बाह्र श्राय और चालाकी से फूट इस कोठडी की दवा बन्द कर के बाहर से बोला, “इन्दगी । में दोनों को पहिचान राधा किं ऐयार हौ ! कहिये अब हमारे द मैं आप लोग फंसे या नहीं ? मने भी क्या मजे में पता लगा लिया ! पूछा कि अभी तो मालूम हुआ था कि महाराज खुद आने वाले हैं, अपने भी झट आबूल कर लिया अॅार कहा कि 'इवा आने वाले थे मगर अर्य न झायेगे। यह न समझे कि में धोखा देता है । इसी अक्ल पर ऐयारी करते ही १ वैर अप लोग भी अचे इसी कैदखाने की हवा खाइये और जान लीजिये कि मैं बाकरअली ऐयार झाप लोगो को मजा चखाने के लिए इस जगह बैठाया गया हू ।' चुढे की बातचीत मुन रामनारायण और बुन्नालाल चुप हो गये बल्कि शम कर सिर नीचा कर लिया 1 बूढा दारोगा वहा से रवाना हुआ और शिवदत्त के पास पहुंच इन दोन ऐयारों के रिप्तार करने का हाल का । महाराज ने खुश होकर चाकरअली को इनाम दिया और खुशी खुशी खुद रामनारायण और चुन्नीलाल को देखने आये । । | बद्रीनाथ पन्नालाल र ज्योतिदीजो को भी मालूम हो गया कि हमारे साथियों में से दो ऐयार पकड़े गये । अब तो एक की जगह तीन श्रादभिया के छुने की फिक्र करनी पड़ी। ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति कुछ रात गये ये तीनों ऐयार घूम फिर कर शहर के बाहर की तरफ जा रहे थे कि पीछे से एक आदमी काले कपड़े से अपना तमाम वदन छिपाये लपकता हुआ उनके पास आया और लपेटा हुशा छोटा सा एक कागज उनके सामने फेंक और अपने साथ ग्राने के लिये हाथ से इशारा कर के तेजी से आगे बढ़ा ।। बड़ीनाथ ने उम पुर्जे को उठा कर सड़क के किनारे एक वनिये की दुकान पर जलते हुए चिराग की रोशनी में पढ़ा, सिर्फ इतना ही लिखा था—“भैरोसिंह ।' बद्रीनाथ समझ गए कि भैरोसिंह किसी तरकीब से निकल भाग है और यही जा रहा है। बद्रीनाथ ने भैरोसिंह के हाथ की लिखी भी पहिचाना ।। भैरोंसिह पुर्जा फेंक कर इन तीनों को हाथ के इशारे से बुला गया श्री ग्रौर दम बारह कदम आगे बढ़ अब इन लोगों के आने की राह देख रहा था । | बद्रीनाथ वगैरपुश हो कर आगे बढ़े और उसे जगह पहुचे जहा भैरोसिंहू काले कपड़े से बटन को छिपाये सड़क के किनारे झाड देख कर पड़ा था । बातचीत करने का मौका न था, आगे आगे भैरोसिंह और पीछे पीछे बद्रीनाथ पन्नालाल और ज्योतिपीजी तेजी से कदम बढ़ाते शहर के वाइर हो गये ।। रात अन्धेरी थी । मैदान में जाकर भैरोसिंह ने काला कपडा उतार दिया | इन तीनों ने चन्द्रमा की गेशनी में भैरोसिंह को पहिचाना, खुश होकर बारी बारी तीनों ने उसे गले लगाया और तब एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर बातचीत करने लगे । | बद्री० । नैमिर, इस वक्त तुम्हें देय कर तबीयत बहुत ही खुश हुई । ६० { में तो किसी तरह छूट श्राया मगर रामनारायण श्रीर गुनीलाल दब जा फँसे है । पति० } उन दोनों ने भी क्या हो घोसा साया है । ________________

    पहिला हिस्सा भैरो० | मैं उनके छुडाने की भी फिक्र कर रहा हूँ। पन्ना० | वह क्यों ? भैरो० । सो सब कहने सुनने का मौका तो रात भर है मगर इस | समय मुझे भूख बटर जोर से लगी है कुछ हो तो खिलायो । | बद्री० } दो चार पेड़े है, जी चाहे तो खा लो ।। भै) ० । इन दो चार पेडों से क्या होगा ? खैर कम से कम पानी का तो बन्दोस्त होना चाहिये ।। वर्द्रः । पिर क्या करना चाहिये १ भैरो० 1 ( हाथ से इशारा कर के } वह देखो शहर के किनारे जो चिराग जल रहा है अभी देखते आये है कि वह हलवाई की दुकान है। और वह ताजी पूरियाँ बना रहा है, बल्कि पानी भी उसः हलवाई से मिल जायेगा | पन्ना० ! अच्छा में जाता है । भैरो० | हम लोग भी साथ ही चलते हैं, सभों को इकट्ठे ही रहना ठीक है, कहीं ऐसा न हो कि आप फेस जाये और हम लोग राह ही देखते रहे । | पन्ना० । फेसना क्या खिलवाड़ हो गया ? | भैरो० । खैर हर्ज ही क्या है अगर हमलोग साथ ही चले चले ? तीन आदमी किनारे खड़े हो जायगे एक अादमी आगे बढ़ कर सौदा ले लेगा ।। बढी • } हाँ हाँ यही ठीक होगा, चलो हम लोग एक साथ चलें । चारो ऐयार एक साथ वहाँ से रवाने हुए और उस इलवाई के पास पहुंचे जिसकी अकेली दूकान शहर के किनारे पर थे 1 बद्रीनाथ ज्योति जी और भैरोसिंहू कुछ दूर इधर ही खड़े रहे और पन्नालाल सौदा खरीदने के लिए दुकान पर गये ! जाने के पहले ही भैरोसिंह ने कहा, मिट्टी के बर्तन में पानी भी देने का एकरार हलवाई से पहिले कर लेना नहीं तो पीछे हुज्जत करेगा।

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    ३२ चन्द्रकान्ता सन्तति पन्नालाल हलवाई की दुकान पर गये और दो सेर पूरी सेर भर मिठाई मॉगी ! हलवाई ने खुद पूछा कि ‘पानी भी चाहिये या नहीं ? पन्ना० ! हा हा पानी जरूर देना होगा । इल० । कोई वर्तन है ? पन्ना० | वर्तन तो है मगर छोटा है, तुम्ही किसी मिट्टी के ठिलिये में जल दे दो } हले० । एक घटा जल के लिये अाठ अाने और देने पड़े गे ) पन्ना० । इतना अधेर ! खैर हम देगे । पूरी मिटाई और एक घडा जल लेकर चारो ऐयार वहा से चले मगर यह खबर किसी को भी न थी कि कुछ दूर पीछे दो आदमी साथ लिए छिपता हुआ हलवाई भी ग्रा रहा है । मैदान में एक बड़े पत्थर की चट्टान पर वैट चारो ने भोजन किया जल पिया और हाथ में है वो निश्चिन्त हो धीरे धीरे अ पुस में बातचीत करने लगे । आधा घण्टा भी न बीता होगा कि चारों बेहोश होकर चट्टान पर लेट गए और दोनों श्रादमियों का साथ लिए हलवाई दनकी खोपटी पर था मौजूद हुआ। | हुलचाई के साथ आए हुए दो श्रादमियों ने बद्रीनाथ ज्योतिपीजी शौर पन्नालाल की मुश्के कस टाली शोर कुछ सुधा भैरामिह को हाश में लाकर बोले, “वाह जी अजायबसिंह, श्रापकी चालाकी तो खूत्र काम कृर गर्ट 1 अत्र तो शिवदत्तगढ़ में आये हुए पाचो नालायक हमारे हाथ फस । महाराज से सच से ज्याद इनाम पान का काम तो श्राप ही न किय!" छठवां वयान बरन मी तली उठा कर महाराज मुरेन्द्रसिंह और बीरेन्द्रसिंह तथा इन् । बदलत चन्द्रकान्ता चपला चम्पा तेजसिंह ौर देवीसिह वगैरह ३ थे; दिन र मुगु र मगर अ५ व जमाना न रह 1 सच है सुख दु प र पहरा अविर बदलता रहता है। खुशी के दिन बात ________________

    पहिला हिस्सा की बात में निकल गए कुछ मालूम न पा थीं तक कि मुझे भी कोई बात उन लोगों की लिखने लायक न मिली लेकिन अब उन लोगों की मुमावत के, प्र काटे नहीं करते। | कौन जानना था कि गया जिरा शिवदत्त फिर बुला की तरह निकल आवेग १ किले खबर थी कि बेचार चन्द्र कान्ता की गौद से पले पाए दोनों होनहार ल* यो अल कर दिये जाए गे ? कौन साफ कह सकता था कि इन लो की वैशावली र राप्य में जितनी तरक्की होगी यकायक उतनी ही यादे श्राफत भी आ पड़ेगी ? खैर खुशी के दिन तो उन्होने काटे, अब मुनावत का घडी कौन झेन १ हाँ बेचारे जगन्नाथ ज्योतिया ने इतना अन्र कह दिया था कि वीरेन्द्रसिंह के राज्य शोर वश की बहुत कुछ वर होते. मगर मुसीबत को लिए हुए । खैर श्रागे जो कुछ होगा देखा जायगा पर इस समय ते सत्र के सब तर दुद में पड़े हैं । देखिए अपन एकान्त के कमरे म महाराजा सुरेन्द्र सिंह कैसा चिन्ता में बैठे हैं और वाई' तरफ गद्दी का कान ए राजा वीरेन्द्रसिंह अपने मामने बैठे हुए जीतहि की सूरत किस नेचैन। स देख रहे हैं। दोनो नाप बा अर्थ तु देवसिंह और तारासिंह अपने पास ऊपर के दर्ज पर बेठे हुए बुजुग और गुरू के समान जीतसिंह की तरफ कुरै हुए इस उम्र में बैठे हैं कि देले अब आखिरी हुक्म क्या होता हैं । (1वाय इन लोगों के इस कमरे में और कोई भी नहीं है, एक दम सन्नाटा छाया हुआ है । न मालूम इसके पहिले क्या क्या बातें हो चुकी है मगर इस वक्त ती महाराजा सुरेन्द्रसिंह ने इस सन्नाटे की सिर्फ इतना ही कह के तांदा, *बर चम्पा और चपला की भी दति मान लेनी चाहिए । जं.त० | जो मजी, मगर देवास के लिए क्या हुक्म होता है ? सुरेन्द्र० । और तो कुछ नहीं सिर्फ इतना ही ख्याल है कि चुनार की हिफाजत ऐसे वक्त है क्यों कर होगी १ जीत० । मैं समझता हूं कि यह की हिफाजत के लिए तारा बहुत है। और फिर वक्त पड़ने पर इस बुढौती में भी में कुछ कर गुजरूर । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति सुरेन्द्र० । कुल मुस्कुरा कर और उम्मीद भरी निगाहों से जीतसिंह की तरफ दे कर ) वैर, जो मुनासिब ममीको ।। जीत० } ( देव मिह से ) लीजिए साहवे, असे आपको भी पुरानी कसर निकालने का मौका दिया जाता है, देखें आप क्या करते हैं ! ईश्वर इस मुस्तेदो को पूरा करें ।। | इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए और सलाम कर कमरे के बाहर चले गए। सातवां बयान अपने माई इन्द्रजीतसिंह की जुदाई से व्याकुल हो उसी समय आनन्द सिंह उम जगल के बाहर हुए और मैदान में खड़े हो इधर उधर निगाह दौड़ाने लगे । पश्चिम तरफ दो औरतें घोड पर सवार धीरे धीरे जाती हुई दिखाई पड़ा । ये तेजी के साथ उस तरफ बढे और उन दोनों के पास पहुँचने की उम्मीद में दो कोस तक पीछा किए चले गए मगर उम्मीद पूरी न हुई क्योंकि एक पहाड़ी के नीचे पहुंच कर चे दोनों रुकी और अपने पीछे अाते हुए अनन्दसिंह की तरफ देख घोड़े को एक दम तेज कर पाटी के बगल में घूमती हुई गायब हो गई है। तू खिली हुई चाँदनी रात होने के समय से आनन्दर्भिह को ये दोनों रिते दिखाई पदी र उन्होंने इतनी हिम्मत भी की, पर पहाटी के पास पहुचते ही उन दोनों के भाग जाने से इनको वा ही रञ्च हुश्रा । खड़े हो कर मोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए । इनकी हैरान शौर सोचते हुए चोट कर निर्दयी चन्द्रमा ने भी धीरे धीरे अपने घर का रास्ता लिया और अपने दुश्मन को जाते देत मौका पाकर अन्धेरे ने चारो तरफ दुमत 'जमाई । शानन्दसि श्रीर भी दुरजी ए ! क्या करें ? कहाँ जाप ? किमले पूलें कि इन्द्रजीत िको कौन ले गया ? दूर से एक रोशनी दिखाई पड़ी। गौर करने से मालूम हुआ कि किसी ________________

    ३५, पहिला हिस्सा झ ! के आगे आग जल रही है। नन्दसिह उभी तरफ चले और थोडी ही देर में कुटी के पास पहुँच कर देखा कि पते की बनाई हुई हरी झोपी के आगे आठ से आदमी जर्मन पर फर्श त्रिछाये बेटे है जो कि दाढी र पहिरावे से साफ मुसलमान मालूम पड़ते हैं 1 बीच में दो मोमी शमदिन जल रहे हैं । एक आदमी फारसी के शेर पढ़ पढ़ कर मुना रहा है और बाकी सब ‘वाह वाह की धुन ला रहे है । एक तरफ अग जल रही शौर दो तीन आदमी कुछ खाने की चीजें पका रहे हैं । आनन्दसिंह फर्श के पास जाकर खड़े हो गए। अानन्दसिंह को देखते ही सब के सब उठ खड़े हुए और बड़ी इज्जत से उनको फर्श पर बैठाया । उस आदमी ने जो फारम की शेरै पढ़ पढ़ कर सुना रह था खड़े हो कर अपनी रगीली भाषा में कही, खुदा का शुक्र है कि शारदये चुनार ने इस मजलिस में पहुँच कर हम लोर की इज्जत क्रो फल्केहफ्तुम * तक पहुँचाया । इस जगल बयावान में हम लोग क्या खातिर कर सकते हैं सिवाय इसके कि इनके कदमों को अपनी अखिों पर जगह दें और इत्र व इलायची पेशकश करे !” केवल इतना ही कह कर इत्रदान और इलायची की दिव्यी उनके मागे ले गया । पढे लिखे भले आदमियों की खातिर जरूरी सम कर मानन्दसिंह ने इत्र सा और दो इलायची ले लिया, इसके बाद इनसे इजाजत ले कर वह फिर पारसी कविता पढ़ने लगा ! दूसरे आदमियों ने दो एक तकिए इनके अलग बगल में रख दिए । | इत्र की विचित्र खुशबू ने इनको मस्त कर दिया, इनकी पलकें भारी हो गई थौर बेहोशी ने धीरे धीरे अपना असर जमा कर इनको फर्श पर सुला दिया । दूसरे दिन दोपहर को आँख टलने पर इन्हें ने अपने को

    मुसलमानों के किताब में गत र आसमान के लिखे हैं, सत्र के ऊपर वाले दर्जे का नाम फल्नेहफ्तुम है । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति एक दूसरे ही मकान में मसहरी पर पड़े हुए पाया। धवडा कर उठ वैट और इधर उधर देखने लगे । | पाच कममिन और खूपसूरत औरतें सामने खड़ी हुई दिखाई दी जिनमें से एक मदारी की तरह पर कुछ आगे बढ़ः हुई थी । उनके हुस्न ग्रौर अदा को देख ग्रानन्दसिंह दग हो गये । उसकी बडी बडी अखि शौर बाझी चितवन ने इन्हें प्रापे से बाहर कर दिया, उसको जरा सी इसी ने इनके दिल पर बिजली गिराई, और आगे बढ़ हाथ जोड़े इस कहने ने ती शोर भो भितम ढाया कि-क्या श्राप मुझसे खफा है ? अनिन्दसिंह भाई ३ जुदाई, रात की बात, ऐयारो के धोखे में पड़ना, सूत्र कुछ बिल्कुल भूल गए और उसकी मुहब्बत में चूर हो बोले"तुम्हारा सी परीजमाल से और रज !! | वह शौरत पल पर बैठ गई और आनन्दसिंह के गले में हाथ डाल के बोली, “बुदा को कमम खा कर कद्दती हूँ कि साल भर से आपके इश्क ने मुझे बेकार कर दिया ! मिवाय अापके ध्यान के स्वाने पीने की विल्कुल सुध न रही, मगर मौका न मिलने से लाचार या !' ग्रानन्द० ! ( चाक कर ) हैं ! क्या तुम मुसलमान हौ जो खुद को कसम खाती है ? ग़ौरत० } ( हम कर ) हा, क्या मुसलमान बुरे होते हैं ? ग्रानन्दसिंह य" कह कर उठ खड़े हुए—*अफमोम | अगर तुम मुसलमान न होता तो में तुम्हें जी जान में प्यार करता, मगर एक अंग्त ३ निए अपना मन नही गाड मफ्ता ??? ग्रीन ! ( हाथ थाम कर ) ३ । वेमुरी उनी मत करी । म मच को 7 प तु हारा जुदाई मुझमे न मह जायेग, ! अन द भ न मचे हना है कि मुझसे किस तरह के उम्मीद न ३ ] । *प्रश्न० । ( भा मिकी केर ) या यह बात दिल से कहते हो ? ________________

    39 पहिला हिस्सा अानन्द० । हाँ, बल्कि कसम खा कर ! श्रीरत० | देखो पछताओगे शीर मुझ सी चाहने वाली कभी न पाओगे ! ग्रानन्द० 1 ( अपना हाथ छुड़ा कर ) लानत है ऐसी चाह पर } औरत० । तो क्या तुम यहाँ से चले जाओगे ? अनिन्द० } जरूर ! औरत० } मुमकिन नहीं ।। आनन्द० | क्या मजाले कि तुम मुझे रोको ! श्रीरत० } ऐमा खयाल भी न करना ।

    देखें मुझे केन रोकता है !" कह कर नन्दसिंह उसे कमरे | के बाहर हुए श्रीर उसी कमरे को एक खिडकी जो दोबार में लगी हुई यी रोल ३ श्रीरते वहाँ से निकल गई ।।

    अानन्दसिंह इस उम्मीद में चारों तरफ घूमने लगे कि कहीं रास्ता | मिले तो बाहर हो जायं मगर उनकी उम्मीद किसी तरह पूरी नहीं हुई ।। यः मकान बहुत लम्बा चौडा न था । सिवाय इस कमरे और एक | सरन के और कोई जगह इसमें न थी ! चारो तरफ ऊ ची ऊंची दीवारों के सिवाय बाहर जाने के लिए कहीं कोई दुर्वाजा न था | हर तरह से | लाचार और दुःरी हो फिर उसी पत्नग पर श्री लेटे और सोचने लगे– । “अब म्या करना चाहिए ? इस कम्बख्त से किस तरह जान बचे ? यह तो हो ही नहीं सकता कि में इसे चाहूं या प्यार करें ! राम रमि, मुसलमानिन से और इश्क ! यह तो सपने में भी नहीं होने का । | तब फिर क्या करू ? लाचारी है, जब किसी तरह छुट्टी न देखें या तो | इसी खञ्जर से जो मेरी कमर में हैं अपनी जान दे देंगी । कमर से खञ्जर निकालना चाहा, देखा तो कृमर खाली है । फिर सोचने लगे— | गजब गया। इस हरामजादी ने तो मुझे किसी लायक न रक्खा। | अगर कोई दुश्मन आ जाय तो में क्या कर सकूगा । वेश्या अगर मैरे

    पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    घूमते फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी भरी सुहावनी पहाडी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए,मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमर और दालान रहने लायक थे।यह छोटी पहाडी अपने चारे तरफ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दत्री हुई थी वि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना श्रौर कुछ पता लगाना मुश्किल था।।इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ वास आदमी थे जिन तीन मुसलमान ऐयार भी थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्ते शरों में में से झीर यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गए।कि इनके शामिल रहने से कभी न कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला ले का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के श्रौर केाई इर लायक नजर भी न झात्ती था जो इन बेईमान को ऐयारी के लिए अपने मा राता।नेचे लिखे नाम से ये तीनों ऐयार पुकारे जाते थे-चाकर अला,ईटावक्श और यारग्रल!इन सत्र ऐयारों श्रौर साथियों ने मुपए,पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा महाराज शिवदत्त की मदद की।

    राजा वारेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ मगर मेंका न मिलने के स व मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा।अपनी चालाकी और होशियारी से वह् पहाटी भिल्ल कोल और पवार इत्यादि जाति के श्रादमिर्यों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजार में गल्ला मी शहद श्रीर,बहुत मी जगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों के मारफत दर में भैरवा और विया कर रुपए,बटोरने लगा।उन्हीं लोगो से शियार रके थे।बहुत फौज भी उस वन लधापहाति के लोग भै होशियार हो गए और खुद्द शहर मेंर मला वर्ग इंच रुपए इक्ट्ठा करने लगे । शिवदत्तगढ़ भा अच्छी तरह अबाद आ गया।

    दूध बो रह ऐयारी ने भी अपने कुल साथ को जो ________________

    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३

  • गो-दान

    गो-दान

    Aproximadamente 279.363 palavras.

    ⁠ उसने कहा-वह एक नेवते में गयी हैं;और मेरी ओर दो पग और बढ़ आया।

    ⁠ मैने कहा–तुम्हें दूध लेना हो तो लो,नहीं मैं जाती हूँ। बोला–आज तो तुम यहाँ से न जाने पाओगी झूनी रानी, रोज-रोज कलेजे पर छुरी चलाकर भाग जाती हो,आज मेरे हाथ से न बचोगी। तुमसे सच कहती हूँ गोवर,मेरे रोएँ खड़े हो गय।।

    ⁠ गोबर आवेश में बोला-मैं बच्चा को देख पाऊँ,तो खोदकर जमीन में गाड़ दूं। खून चूस लूं। तुम मुझे दिखा तो देना।

    ⁠ 'सुनो तो, ऐसों का मुंह तोड़ने के लिए मैं ही काफी हूँ। मेरी छाती धक-धक करने लगी। यह कुछ बदमासी कर बैठे, तो क्या करूँगी। कोई चिल्लाना भी तो न सुनेगा;लेकिन मन में यह निश्चय कर लिया था कि मेरी देह छुई,तो दूध की भरी हाँड़ी उसके मुंह पर पटक दूंगी। बला से चार-पाँच सेर दूध जायगा, बचा को याद तो हो जायगी। कलेजा मजबूत करके बोली-इस फेर में न रहना पण्डितजी!मैं अहीर की लड़की हूँ। मूंछ का एक-एक बाल चुनवा लूंगी। यही लिखा है तुम्हारे पोथी-पत्रे में कि दूसरों की बहू-बेटी को अपने घर में बन्द करके बेइज्जत करो। इसीलिए तिलक-मुद्रा का जाल विछाये बैठे हो? लगा हाथ जोड़ने,पैरों पड़ने-एक प्रेमी का मन रख दोगी,तो तुम्हारा क्या बिगड़ जायगा,झूना रानी! कभी-कभी गरीबों पर दया किया करो,नहीं भगवान पूछेगे,मैंने तुम्हें इतना रूपधन दिया था,तुमने उससे एक ब्राह्मण का उपकार भी नहीं किया, तो क्या जवाब दोगी? बोले,मैं विप्र हूँ,रुपए-पैसे का दान तो रोज ही पाता हूँ,आज रूप का दान दे दो।

    ⁠ 'मैने यों ही उसका मन परखने को कह दिया,मैं पचास रुपए लूंगी। सच कहती हूँ गोबर,तुरन्त कोठरी में गया और दस-दस के पाँच नोट निकालकर मेरे हाथों में देने लगा और जब मैंने नोट जमीन पर गिरा दिये और द्वार की ओर चली,तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं तो पहले ही से तैयार थी। हाँड़ी उसके मुंह पर दे मारी। सिर से पाँव तक सराबोर हो गया। चोट भी खूब लगी। सिर पकड़कर बैठ गया और लगा हायहाय करने। मैने देखा,अब यह कुछ नहीं कर सकता,तो पीठ में दो लातें जमा दी और किवाड़ खोलकर भागी।'

    ⁠ गोबर ठट्ठा मारकर बोला-बहुत अच्छा किया तुमने। दूध से नहा गया होगा। तिलक-मुद्रा भी धुल गयी होगी। मूंछे भी क्यों न उखाड़ लीं?

    ⁠ दूसरे दिन मैं फिर उसके घर गयी। उसकी घरवाली आ गयी थी। अपने बैठक में सिर में पट्टी बाँधे पड़ा था। मैंने कहा-कहो तो कल की तुम्हारी करतूत खोल दूं पण्डित!लगा हाथ जोड़ने। मैंने कहा-अच्छा थूककर चाटो,तो छोड़ दूं। सिर जमीन पर रगड़कर कहने लगा—अब मेरी इज्जत तुम्हारे हाथ है झूना, यही समझ लो कि पण्डिताइन मुझे जीता न छोड़ेंगी। मुझे भी उस पर दया आ गयी।'

    ⁠ गोबर को उसकी दया बुरी लगी-यह तुमने क्या किया? उसकी औरत से जाकर कह क्यों नहीं दिया? जूतों से पीटती। ऐसे पाखंडियों पर दया न करनी चाहिए। तुम मुझे कल उनकी सूरत दिखा दो,फिर देखना कैसी मरम्मत करता हूँ।

    ⁠ झुनिया ने उसके अर्द्ध-विकसित यौवन को देखकर कहा-तुम उसे न पाओगे। खासा देव है।मुफ्त का माल उड़ाता है कि नहीं।

    ⁠ गोवर अपने यौवन का यह तिरस्कार कैसे सहता। डींग मारकर बोला-मोटे होने से क्या होता है। यहाँ फौलाद की हड्डियाँ है। तीन सौ डण्ड रोज मारता हूँ। दूधघी नहीं मिलता,नहीं अब तक सीना यों निकल आया होता।

    ⁠ यह कहकर उसने छाती फैला कर दिखायी।

    ⁠ झुनिया ने आश्वस्त आँखों से देखा-अच्छा,कभी दिखा दूंगी। लेकिन यहाँ तो सभी एक-से है,तुम किस-किस की मरम्मत करोगे। न जाने मरदों की क्या आदत है कि जहाँ कोई जवान, सुन्दर औरत देखी और बस लगे घूरने,छाती पीटने। और यह जो बड़े आदमी कहलाते है,ये तो निरे लम्पट होते हैं। फिर मै तो कोई सुन्दरी नहीं हूँ. . . .

    ⁠ गोबर ने आपत्ति की-तुम! तुम्हें देखकर तो यही जी चाहता है कि कलेजे में विठा लें।

    ⁠ झुनिया ने उसकी पीठ में हलका-सा घूसा जमाया-लगे औरों की तरह तुम भी चापलूसी करने। मै जैसी कुछ हूँ,वह मैं जानती हूँ। मगर इन लोगों को तो जवान मिल जाय। घड़ी-भर मन बहलाने को और क्या चाहिए। गुन तो आदमी उसमे देखता है,जिसके साथ जनम-भर निबाह करना हो। सुनती भी हूँ और देखती भी हूँ,आजकल बड़े घरों की विचित्र लीला है। जिस महल्ले में मेरी ससुराल है,उसी में गपडू-गपडू नाम के कासमीरी रहते थे। बड़े भारी आदमी थे। उनके यहाँ पाँच सेर दूध लगता था। उनकी तीन लड़कियाँ थीं। कोई बीस-बीस,पच्चीस-पच्चीस की होंगी। एक-से-एक सुन्दर। तीनों बड़े कालिज में पढ़ने जाती थीं। एक साइत कालिज में पढ़ाती भी थी। तीन सौ का महीना पाती थी। सितार वह सब बजावें,हरमुनियाँ वह सब बजावें,नाचें वह, गावें वह;लेकिन ब्याह कोई न करती थी। राम जाने,वह किसी मरद को पसन्द नहीं करती थीं कि मरद उन्ही को पसन्द नहीं करता था। एक बार मैने बड़ी बीबी से पूछा,तो हँसकर बोलीं-हम लोग यह रोग नही पालते;मगर भीतर-ही-भीतर खूब गुलछरें उड़ाती थीं। जब देखें,दो-चार लौंडे उनको घेरे हुए है। जो सबसे बड़ी थी, वह तो कोटपतलून पहनकर घोड़े पर सवार होकर मर्दो के साथ सैर करने जाती थी। सारे सहर में उनकी लीला मशहूर थी। गपडू बाबू सिर नीचा किये,जैसे मुंह में कालिख-सी लगाये रहते थे। लड़कियों को डाँटते थे,समझाते थे;पर सब-की-सब खुल्लमखुल्ला कहती थीं-तुमको हमारे बीच में बोलने का कुछ मजाल नहीं है। हम अपने मन की रानी हैं,जो हमारी इच्छा होगी,वह हम करेंगे। बेचारा बाप जवान-जवान लड़कियों से क्या बोले। मारने-बाँधने से रहा,डाटने-डपटने से रहा;लेकिन भाई वड़े आदमियों की बातें कौन चलाये। वह जो कुछ करें,सब ठीक है। उन्हें तो बिरादरी और पंचायत का भी डर नहीं। मेरी समझ में तो यही नहीं आता कि किसी का रोज-रोज मन कैसे बदल जाता है। क्या आदमी गाय-बकरी से भी गया बीता हो गया है? लेकिन किसी को बुरा नहीं कहती भाई !(मन को जैसा बनाओ,वैसा बनता है। ऐसों को भी देखती हूँ,जिन्हें रोज-रोज की दाल-रोटी के बाद कभी-कभी मुंह का सवाद बदलने के लिए हलवा-पूरी भी चाहिए। और ऐसों को भी देखती हूँ, जिन्हें घर की रोटी-दाल देखकर ज्वर आता है। कुछ बेचारियाँ ऐसी भी हैं, जो अपनी रोटी-दाल में ही मगन रहती हैं। हलवा-पूरी से उन्हें कोई मतलब नहीं। मेरी दोनों भावजोंही को देखो। हमारे भाई काने-कुबड़े नहीं हैं,दस जवानों में एक जवान है;लेकिन भावजों को नहीं भाते। उन्हें तो वह चाहिए,जो सोने की बालियाँ बनवाये,महीन साड़ियाँ लाये,रोज चाट खिलाये। वालियाँ और मिठाइयाँ मुझे भी कम अच्छी नहीं लगतीं;लेकिन जो कहो कि इसके लिए अपनी लाज बेचती फिरूं तो भगवान इससे बचायें। एक के साथ मोटा-झोटा खा-पहनकर उमिर काट देना,बस अपना तो यही राग है। बहुत करके तो मर्द ही औरतों को बिगाड़ते हैं। जब मर्द इधर-उधर ताक-झाँक करेगा तो औरत भी आँख लड़ायेगी। मर्द दूसरी औरतों के पीछे दौड़ेगा,तो औरत भी ज़रूर मर्यों के पीछे दौड़ेगी। मर्द का हरजाईपन औरत को भी उतना ही बुरा लगता है,जितना औरत का मर्द को। यही समझ लो। मैंने तो अपने आदमी से साफ़-साफ़ कह दिया था,अगर तुम इधर-उधर लपके, तो मेरी भी जो इच्छा होगी वह करूँगी। यह चाहो कि तुम तो अपने मन की करो और औरत को मार के डर से अपने काबू में रखो,तो यह न होगा। तुम खुले-खजाने करते हो,वह छिपकर करेगी। तुम उसे जलाकर सुखी नहीं रह सकते।

    ⁠ गोबर के लिए यह एक नयी दुनिया की बातें थीं। तन्मय होकर सुन रहा था। कभी-कभी तो आप-ही-आप उसके पाँव रुक जाते, फिर सचेत होकर चलने लगता। झुनिया ने पहले अपने रूप से मोहित किया था। आज उसने अपने ज्ञान और अनुभव से भरी बातों और अपने सतीत्व के बखान से मुग्ध कर लिया। ऐसी रूप,गुण,ज्ञान की आगरी उसे मिल जाय,तो धन्य भाग। फिर वह क्यों पंचायत और बिरादरी से डरे? झुनिया ने जब देख लिया कि उसका गहरा रंग जम गया,तो छाती पर हाथ रख कर जीभ दाँत से काटती हई बोली-अरे,यह तो तुम्हारा गांव आ गया!तुम भी बड़े मुरहे हो,मुझसे कहा भी नहीं कि लौट जाओ।

    ⁠ यह कहकर वह लौट पड़ी।

    ⁠ गोबर ने आग्रह करके कहा–एक छन के लिए मेरे घर क्यों नहीं चली चलती?अम्माँ भी तो देख लें।

    ⁠ झुनिया ने लज्जा से आँखें चुराकर कहा–तुम्हारे घर यों न जाऊंगी। मुझे तो यही अचरज होता है कि मैं इतनी दूर कैसे आ गयी।अच्छा,बताओ अब कब आओगे? रात को मेरे द्वार पर अच्छी संगत होगी। चले आना,मै अपने पिछवाड़े मिलूंगी।

    ⁠ 'और जो न मिली?'

    ⁠ 'तो लौट जाना।'

    ⁠ 'तो फिर मैं न आऊँगा।'

    ⁠ 'आना पड़ेगा,नही कहे देती हूँ।'

    ⁠ 'तुम भी बचन दो कि मिलोगी?'

    ⁠ 'मैं बचन नहीं देती।'

    ⁠ 'तो मैं भी नहीं आता।'

    ⁠ 'मेरी बला से!'

    ⁠ झुनिया अँगूठा दिखाकर चल दी। प्रथम-मिलन में ही दोनों एक दूसरे पर अपनाअपना अधिकार जमा चुके थे। झुनिया जानती थी,वह आयेगा,कैसे न आयेगा? गोबर जानता था,वह मिलेगी,कैसे न मिलेगी।

    ६

    ⁠ गोबर जब अकेला गाय को हाँकता हुआ चला,तो ऐसा लगता था,मानो स्वर्ग से गिर पड़ा है।

    ⁠ जेठ की उदास और गर्म सन्ध्या सेमरी की सड़कों और गलियों में पानी के छिड़काव से शीतल और प्रसन्न हो रही थी। मण्डप के चारों तरफ फूलों और पौधों के गमले सजा दिये गये थे और बिजली के पंखे चल रहे थे। राय साहब अपने कारखाने में बिजली बनवा लेते थे। उनके सिपाही पीली वर्दियाँ डाटे,नीले साफे बाँधे,जनता पर रोब जमाते फिरते थे। नौकर उजले कुरते पहने और केसरिया पाग बाँधे,मेहमानों और मुखियों का आदर-सत्कार कर रहे थे। उसी वक्त एक मोटर सिंह-द्वार के सामने आकर रुकी और उसमें से तीन महानुभाव उतरे। वह जो खद्दर का कुरता और चप्पल पहने हुए हैं उनका नाम पण्डित ओंकारनाथ है। आप दैनिक-पत्र'बिजली'के यशस्वी सम्पादक हैं,जिन्हें देश-चिन्ता ने घुला डाला है। दूसरे महाशय जो कोट-पैंट में हैं,वह हैं तो वकील,पर वकालत न चलने के कारण एक बीमा कम्पनी की दलाली करते हैं और ताल्लुकेदारों को महाजनों और बैंकों से कर्ज दिलाने में वकालत से कहीं ज्यादा कमाई करते हैं। इनका नाम है श्यामबिहारी तंखा और तीसरे सज्जन जो रेशमी अचकन और तंग पाजामा पहने हुए हैं,मिस्टर बी० मेहता,युनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं। ये तीनों सज्जन राय साहब के सहपाठियों में हैं और शगून के उत्सव में निमन्त्रित हुए हैं। आज सारे इलाके के आसामी आयेंगे और शगून के रुपए भेंट करेंगे। रात को धनुष-यज्ञ होगा और मेहमानों की दावत होगी। होरी ने पाँच रुपए शगून के दे दिये हैं और एक गुलाबी मिर्जई पहने,गुलाबी पगड़ी बाँधे,घुटने तक कछनी काछे,हाथ में एक खुरपी लिये और मुख पर पाउडर लगवाये राजा जनक का माली बन गया है और गरूर से इतना फूल उठा है मानो यह सारा उत्सव उसी के पुरुषार्थ से हो रहा है।

    ⁠ राय साहब ने मेहमानों का स्वागत किया। दोहरे बदन के ऊँचे आदमी थे,गठा हुआ शरीर,तेजस्वी चेहरा,ऊँचा माथा, गोरा रंग,जिस पर शर्बती रेशमी चादर खूब खिल रही थी।

    ⁠ पण्डित ओंकारनाथ ने पूछा-अबकी कौन-सा नाटक खेलने का विचार है?मेरे ग्म की तो यहाँ वही वस्तु है।

    ⁠ राय साहब ने तीनों सज्जनों को अपनी रावटी के सामने कुर्सियों पर बैठाते हुए कहा– पहले तो धनुष-यज्ञ होगा,उसके बाद एक प्रहसन। नाटक कोई अच्छा न मिला। कोई तो इतना लम्बा कि शायद पाँच घण्टों में भी खतम न हो और कोई इतना क्लिप्ट कि शायद यहाँ एक व्यक्ति भी उसका अर्थ न समझे। आखिर मैने स्वयं एक प्रहसन लिख डाला,जो दो घण्टों में पूरा हो जायगा।

    ⁠ ओंकारनाथ को राय साहब की रचना-शक्ति में बहुत सन्देह था। उनका खयाल था कि प्रतिभा तो गरीबी ही में चमकती है दीपक की भाँति,जो अँधेरे ही में अपना प्रकाश दिखाता है। उपेक्षा के साथ,जिसे छिपाने की भी उन्होंने चेप्टा नहीं की, पंडित ओंकारनाथ ने मुंह फेर लिया।

    ⁠ मिस्टर तंखा इन वेमतलब की बातों में न पड़ना चाहते थे,फिर भी राय साह्न को दिखा देना चाहते थे कि इस विषय में उन्हें कुछ बोलने का अधिकार है। बोले– नाटक कोई भी अच्छा हो सकता है,अगर उसके अभिनेता अच्छे हों। अच्छा-से-अच्छा नाटक बुरे अभिनेताओं के हाथ में पड़कर बुरा हो सकता है। जब तक स्टेज पर शिक्षित अभिनेत्रियाँ नहीं आतीं,हमारी नाट्य-कला का उद्धार नहीं हो सकता। अबकी तो आपने कौसिल मे प्रश्नों की धूम मचा दी। मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी मेम्बर का रिकार्ड इतना शानदार नहीं है।

    ⁠ दर्शन के अध्यापक मिस्टर मेहता इस प्रशंसा को सहन न कर सकते थे। विरोध तो करना चाहते थे पर सिद्धान्त की आड़ में। उन्होंने हाल ही में एक पुस्तक कई साल के परिश्रम से लिखी थी। उसकी जितनी धूम होनी चाहिए थी,उसकी शतांश भी नहीं हुई थी। इससे बहुत दुखी थे। बोले-भाई,मैं प्रश्नों का कायल नहीं। मैं चाहता हूँ हमारा जीवन हमारे सिद्धान्तों के अनुकूल हो। आप कृषकों के शुभेच्छु हैं,उन्हें तरह-तरह की रियायत देना चाहते है,जमींदारों के अधिकार छीन लेना चाहते हैं,बल्कि उन्हें आप समाज का शाप कहते हैं,फिर भी आप जमींदार हैं,वैसे ही जमींदार जैसे हजारों और जमी दार हैं। अगर आपकी धारणा है कि कृषकों के साथ रियायत होनी चाहिए,तो पहले आप खुद शुरू करें–काश्तकारों को बगैर नज़राने लिए पट्टे लिख दें, बेगार बन्द कर दें,इज़ाफ़ा लगान को तिलांजलि दे दें,चरावर ज़मीन छोड़ दें। मुझे उन लोगों से ज़रा भी हमदर्दी नहीं है,जो बातें तो करते हैं कम्युनिस्टों की-सी,मगर जीवन है रईसों का-सा,उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।

    ⁠ राय साहब को आघात पहुंचा। वकील साहब के माथे पर बल पड़ गये और सम्पादकजी के मुंह में जैसे कालिख लग गयी। वह खुद समष्टिवाद के पुजारी थे,पर सीधे घर में आग न लगाना चाहते थे।

    ⁠ तंखा ने राय साहब की वकालत की-मैं समझता हूँ, राय साहब का अपने असामियों के माथ जितना अच्छा व्यवहार है,अगर सभी जमींदार वैसे ही हो जायें,तो यह प्रश्न ही न रहे।

    ⁠ मेहता ने हथौड़े की दूसरी चोट जमायी-मानता हूँ, आपका अपने असामियों के साथ बहुत अच्छा बर्ताव है,मगर प्रश्न यह है कि उसमें स्वार्थ है या नहीं। इसका एक कारण क्या यह नहीं हो सकता कि मद्धिम आँच में भोजन स्वादिष्ट पकता है? गुड़ से मारनेवाला जहर से मारनेवाले की अपेक्षा कहीं सफल हो सकता है। मैं तो केवल इतना जानता हूँ,हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं। हैं तो उसका व्यवहार करें,नहीं हैं,तो बकना छोड़ दें। मैं नकली जिन्दगी का विरोधी हूँ। अगर मांस खाना अच्छा समझते हो तो खुलकर खाओ। बुरा समझते हो,तो मत खाओ,यह तो मेरी समझ में आता है। लेकिन अच्छा समझना और छिपकर खाना,यह मेरी समझ में नहीं आता। मै तो इसे कायरता भी कहता है और धर्तता भी जो वास्तव मे एक हैं।

    ⁠ राय साहब सभा-चतुर आदमी थे। अपमान और आघात को धैर्य और उदारता से सहने का उन्हें अभ्यास था। कुछ असमंजस में पड़े हुए बोले-आपका विचार बिल्कुल ठीक है मेहताजी। आप जानते है,मै आपकी साफगोई का कितना आदर करता हूँ,लेकिन आप यह भूल जाते हैं कि अन्य यात्राओं की भाँति विचारों की यात्रा में भी पड़ाव होते हैं,और आप एक पड़ाव को छोड़कर दूसरे पड़ाव तक नहीं जा सकते। मानव-जीवन का इतिहास इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। मै उस वातावरण में पला हूँ,जहाँ राजा ईश्वर है और जमींदार ईश्वर का मन्त्री। मेरे स्वर्गवासी पिता असामियों पर इतनी दया करते थे कि पाले या सूखे में कभी आधा और कभी पूरा लगान माफ़ कर देते थे। अपने बखार से अनाज निकालकर असामियों को खिला देते थे। घर के गहने बेचकर कन्याओं के विवाह में मदद देते थे;मगर उसी वक्त तक,जब तक प्रजा उनको सरकार और धर्मावतार कहती रहे,उन्हें अपना देवता समझकर उनकी पूजा करती रहे। प्रजा का पालन उनका सनातनधर्म था,लेकिन अधिकार के नाम पर वह कौड़ी का एक दाँत भी फोड़कर देना न चाहते थे। मैं उसी वातावरण में पला हूँ और मुझे गर्व है कि मैं व्यवहार में चाहे जो कुछ करूँ,विचारों में उनसे आगे बढ़ गया हूँ और यह मानने लग गया हूँ कि जब तक किसानों को ये रियायतें अधिकार के रूप में न मिलेंगी,केवल सद्भावना के आधार पर उनकी दशा सुधर नहीं सकती। स्वेच्छा अगर अपना स्वार्थ छोड़ दे,तो अपवाद है। मैं खुद सद्भावना करते हुए भी स्वार्थ नहीं छोड़ सकता और चाहता हूँ कि हमारे वर्ग को शासन और नीति के बल से अपना स्वार्थ छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाय। इसे आप कायरता कहेंगे,मैं इसे विवशता कहता हूँ। मैं इसे स्वीकार करता हूँ कि किसी को भी दूसरे के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है। उपजीवी होना घोर लज्जा की बात है। कर्म करना प्राणीमात्र का धर्म है। समाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें कुछ लोग मौज करेंऔर अधिक लोग पीसें और खपें, कभी सुखद नहीं हो सकती। पूँजी और शिक्षा,जिसे मैं पूंजी ही का एक रूप समझता हूँ,इनका किला जितनी जल्द टूट जाय, उतना ही अच्छा है। जिन्हें पेट की रोटी मयस्सर नहीं,उनके अफसर और नियोजक दस-दस पाँच-पाँच हजार फटकारें,यह हास्यास्पद है और लज्जास्पद भी। इस व्यवस्था ने हम जमींदारों में कितनी विलासिता,कितना दुराचार,कितनी पराधीनता और कितनी निर्लज्जता भर दी है,यह मैं खूब जानता हूँ;लेकिन मैं इन कारणों से इस व्यवस्था का विरोध नहीं करता। मेरा तो यह कहना है कि अपने स्वार्थ की दृष्टि से भी इसका अनुमोदन नहीं किया जा सकता। इस शान को निभाने के लिए हमें अपनी आत्मा की इतनी हत्या करनी पड़ती है कि हममें आत्माभिमान का नाम भी नहीं रहा। हम अपने असामियों को लूटने के लिए मजबूर हैं। अगर अफसरों को कीमती-कीमती डालियाँ न दें,तो वागी समझे जायें,शान से न रहें,तो कंजूस कहलायें। प्रगति की जरा-सी आहट पाते ही हम काँप उठते हैं,और अफसरों के पास फरियाद लेकर दौड़ते हैं कि हमारी रक्षा कीजिए। हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा,न पुरुपार्थ ही रह गया। बस,हमारी दशा उन बच्चों की-सी है,जिन्हें चम्मच से दूध पिलाकर पाला जाता है,बाहर से मोटे,अन्दर से दुर्बल,सत्वहीन और मुहताज।

    ⁠ मेहता ने ताली वजाकर कहा-हियर,हियर!आपकी ज़बान में जितनी बुद्धि है,काश उसकी आधी भी मस्तिष्क में होती! खेद यही है कि सब कुछ समझते हुए भी आप अपने विचारों को व्यवहार में नहीं लाते।

    ⁠ ओंकारनाथ बोले–अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, मिस्टर मेहता! हमें समय के साथ चलना भी है और उसे अपने साथ चलाना भी। बुरे कामों में ही सहयोग की ज़रूरत नहीं होती। अच्छे कामों के लिए भी सहयोग उतना ही ज़रूरी है। आप ही क्यों आठ सौ रुपए महीने हड़पते हैं,जब आपके करोड़ों भाई केवल आठ रुपए में अपना निर्वाह कर रहे हैं?

    ⁠ राय साहब ने ऊपरी खेद,लेकिन भीतरी सन्तोष से सम्पादकजी को देखा और बोलेव्यक्तिगत वातों पर आलोचना न कीजिए सम्पादक जी!हम यहाँ समाज की व्यवस्था पर विचार कर रहे है।

    ⁠ मिस्टर मेहता उसी ठण्ढे मन से बोले-नहीं-नहीं,मैं इसे बुरा नहीं समझता। समाज व्यक्ति ही से बनता है।और व्यक्ति को भूलकर हम किसी व्यवस्था पर विचार नहीं कर सकते। मैं इसलिए इतना वेतन लेता हूँ कि मेरा इस व्यवस्था पर विश्वास नहीं है।

    ⁠ सम्पादकजी को अचम्भा हुआ–अच्छा,तो आप वर्तमान व्यवस्था के समर्थक हैं?

    ⁠ 'मैं इस सिद्धान्त का समर्थक हूँ कि संसार में छोटे-बड़े हमेशा रहेंगे,और उन्हें हमेशा रहना चाहिए। इसे मिटाने की चेष्टा करना मानव-जाति के सर्वनाश का कारण होगा।'

    ⁠ कुश्ती का जोड़ वदल गया। राय साह्व किनारे खड़े हो गये। सम्पादक जी मैदान में उतरे–आप इस बीसवीं शताब्दी में भी ऊँच-नीच का भेद मानते हैं।

    ⁠ 'जी हाँ,मानता हूँ और बड़े जोरों से मानता हूँ। जिस मत के आप समर्थक हैं,वह भी तो कोई नयी चीज़ नहीं। जब से मनुष्य में ममत्व का विकास हुआ,तभी उस मत का जन्म हुआ। बुद्ध और प्लेटो और ईसा सभी समाज में समता के प्रवर्तक थे। यूनानी और रोमन और सीरियाई,सभी सभ्यताओं ने उसकी परीक्षा की पर अप्राकृतिक होने के कारण कभी वह स्थायी न बन सकी।

    ⁠ 'आपकी वातें सुनकर मुझे आश्चर्य हो रहा है।'

    ⁠ 'आश्चर्य अज्ञान का दूसरा नाम है।'

    ⁠ 'मैं आपका कृतज्ञ हूँ!अगर आप इस विषय पर कोई लेखमाला शुरू कर दें।'

    ⁠ 'जी, मैं इतना अहमक़ नहीं हूँ,अच्छी रकम दिलवाइए, तो अलबत्ता।'

    {{Gap{{'आपने सिद्धान्त ही ऐसा लिया है कि खुले खज़ाने पब्लिक को लूट सकते हैं।'

    ⁠ 'मुझमें और आपमें अन्तर इतना ही है कि मैं जो कुछ मानता हूँ उस पर चलता हूँ। आप लोग मानते कुछ हैं,करते कुछ हैं। धन को आप किसी अन्याय से बराबर फैला सकते हैं। लेकिन बुद्धि को,चरित्र को,और रूप को,प्रतिभा को और बल को बराबर फैलाना तो आपकी शक्ति के बाहर है। छोटे-बड़े का भेद केवल धन से ही तो नहीं होता। मैंने बड़े-बड़े धन-कुबेरों को भिक्षकों के सामने घुटने टेकते देखा है,और आपने भी देखा होगा। रूप के चौखट पर बड़े-बड़े महीप नाक रगड़ते हैं। क्या यह सामाजिक विषमता नहीं है?आप रूस की मिसाल देंगे। वहाँ इसके सिवाय और क्या है कि मिल के मालिक ने राज कर्मचारी का रूप ले लिया है। बुद्धि तब भी राज करती थी,अब भी करती है और हमेशा करेगी।'

    ⁠ तश्तरी में पान आ गये थे। राय साहब ने मेहमानों को पान और इलायची देते हुए कहा–बुद्धि अगर स्वार्थ से मुक्त हो, तो हमें उसकी प्रभुता मानने में कोई आपत्ति नहीं। समाजवाद का यही आदर्श है। हम साधु-महात्माओं के सामने इसीलिए सिर झुकाते हैं कि उनमें त्याग का बल है। इसी तरह हम बुद्धि के हाथ में अधिकार भी देना चाहते हैं,सम्मान भी,नेतृत्व भी;लेकिन सम्पत्ति किसी तरह नहीं। बुद्धि का अधिकार और सम्मान व्यक्ति के साथ चला जाता है,लेकिन उसकी सम्पत्ति विप बोने के लिए,उसके बाद और भी प्रबल हो जाती है। बुद्धि के बगैर किसी समाज का संचालन नहीं हो सकता। हम केवल इस बिच्छू का डंक तोड़ देना चाहते हैं।

    ⁠ दूसरी मोटर आ पहुँची और मिस्टर खन्ना उतरे, जो एक बैंक के मैनेजर और शक्करमिल के मैनेजिंग डाइरेक्टर हैं। दो देवियाँ भी उनके साथ थीं। राय साहब ने दोनों देवियों को उतारा। वह जो खद्दर की साड़ी पहने बहुत गंभीर और विचारशील-सी हैं, मिस्टर खन्ना की पत्नी,कामिनी खन्ना है। दूसरी महिला जो ऊँची एड़ी का जूता पहने हुए हैं और जिनकी मुख-छवि पर हँसी फूटी पड़ती है,मिस मालती हैं। आप इंगलैंड से डाक्टरी पढ़ आयी हैं और अब प्रैक्टिस करती हैं। ताल्लुकेदारों के महलों में उनका बहुत प्रवेश है। आप नवयुग की साक्षात् प्रतिमा है। गात कोमल,पर चपलता कूट-कट कर भरी हुई। झिझक या संकोच का कहीं नाम नहीं,मेक-अप में प्रवीण,बला की हाजिर-जवाब,पुरुष-मनोविज्ञान की अच्छी जानकार,आमोद-प्रमोद को जीवन का तत्व समझनेवाली,लुभाने और रिझाने की कला में निपुण। जहाँ आत्मा का स्थान है,वहाँ प्रदर्शन;जहाँ हृदय का स्थान है,वहाँ हाव-भाव;मनोद्गारों पर कठोर निग्रह,जिसमें इच्छा या अभिलापा का लोप-सा हो गया।

    ⁠ आपने मिस्टर मेहता से हाथ मिलाते हुए कहा-सच कहती हूँ,आप सूरत से ही फिलासफर मालूम होते हैं। इस नयी रचना में तो आपने आत्मवादियों को उधेड़कर रख दिया। पढ़ते-पढ़ते कई बार मेरे जी में ऐसा आया कि आपसे लड़ जाऊँ। फ़िलासफ़रों में सहृदयता क्यों गायब हो जाती है?

    ⁠ मेहता झेंप गये। बिना-ब्याहे थे और नवयुग की रमणियों से पनाह माँगते थे। पुरुषों की मंडली में खूब चहकते थे;मगर ज्योंही कोई महिला आयी और आपकी ज़बान बन्द हुई। जैसे बुद्धि पर ताला लग जाता था। स्त्रियों से शिष्ट व्यवहार तक करने की सुधि न रहती थी।

    ⁠ मिस्टर खन्ना ने पूछा-फ़िलासफ़रों की सूरत में क्या खास बात होती है देवीजी?

    ⁠ मालती ने मेहता की ओर दया-भाव से देखकर कहा-मिस्टर मेहता बुरा न मानें,तो बतला दूं।

    ⁠ खन्ना मिस मालती के उपासकों में थे। जहाँ मिस मालती जाय,वहाँ खन्ना का पहुँचना लाज़िम था। उनके आस-पास भौंरे की तरह मॅडराते रहते थे। हर समय उनकी यही इच्छा रहती थी कि मालती से अधिक-से-अधिक वही बोलें,उनकी निगाह अधिकसे-अधिक उन्हीं पर रहे।

    ⁠ खन्ना ने आँख मारकर कहा–फ़िलासफ़र किसी की बात का बुरा नहीं मानते। उनकी यही सिफ़त है।

    ⁠ 'तो सुनिए,फ़िलासफ़र हमेशा मुर्दा-दिल होते है,जब देखिए,अपने विचारों में मगन बैठे हैं। आपकी तरफ़ ताकेंगे,मगर आपको देखेंगे नहीं;आप उनसे बातें किय जायें,कुछ सुनेंगे नहीं। जैसे शून्य में उड़ रहे हों।' ⁠ सब लोगों ने कहक़हा मारा। मिस्टर मेहता जैसे जमीन में गड़ गये।

    ⁠ 'आक्सफोर्ड में मेरे फ़िलासफ़ी के प्रोफेसर मिस्टर हसबेंड थे…'

    ⁠ खन्ना ने टोका–नाम तो निराला है।

    ⁠ 'जी हाँ, और थे क्वारे….'

    ⁠ 'मिस्टर मेहता भी तो क्वारे हैं….'

    ⁠ 'यह रोग सभी फिलासफ़रों को होता है।'

    {{Gap}]अब मेहता को अवसर मिला। बोले-आप भी तो इसी मरज में गिरफ्तार हैं?

    ⁠ 'मैने प्रतिज्ञा की है किसी फिलासफ़र से शादी करूँगी और यह वर्ग शादी के नाम से घबराता है।हसबेंड साहब तो स्त्री को देखकर घर में छिप जाते थे। उनके शिष्यों में कई लड़कियाँ थीं। अगर उनमें से कोई कभी कुछ पूछने के लिए उनके आफिस में चली जाती थी तो आप ऐसे घबड़ा जाते जैसे कोई शेर आ गया हो। हम लोग उन्हें खूब छेड़ा करते थे,मगर थे बेचारे सरल-हृदय। कई हजार की आमदनी थी,पर मैंने उन्हें हमेशा एक ही सूट पहने देखा। उनकी एक विधवा बहन थी। वही उनके घर का सारा प्रबन्ध करती थीं। मिस्टर हसबेंड को तो खाने की फिक्र ही न रहती थी। मिलनेवालों के डर से अपने कमरे का द्वार बन्द करके लिखा-पढ़ी करते थे। भोजन का समय आ जाता,तो उनकी बहन आहिस्ता से भीतर के द्वार से उनके पास जाकर किताब बन्द कर देती थीं,तब उन्हें मालूम होता कि खाने का समय हो गया। रात को भी भोजन का समय बँधा हुआ था। उनकी बहन कमरे की बत्ती बझा दिया करती थीं। एक दिन बहन ने किताब बन्द करना चाहा,तो आपने पुस्तक को दोनों हाथों से दवा लिया और बहन-भाई में जोर-आजमाई होने लगी। आखिर बहन उनकी पहियेदार कुर्सी को खींच कर भोजन के कमरे में लायी।'

    ⁠ राय साहब बोले–मगर मेहता साहब तो बड़े खुशमिज़ाज और मिलनसार हैं,नहीं इस हंगामे में क्यों आते।

    ⁠ 'तो आप फ़िलासफ़र न होंगे। जब अपनी चिन्ताओं से हमारे सिर में दर्द होने लगता है,तो विश्व की चिन्ता सिर पर लादकर कोई कैसे प्रसन्न रह सकता है!'

    ⁠ उधर सम्पादकजी श्रीमती खन्ना से अपनी आर्थिक कठिनाइयों की कथा कह रहे थे–बस यों समझिए श्रीमतीजी,कि सम्पादक का जीवन एक दीर्घ विलाप है,जिसे सुनकर लोग दया करने के बदले कानों पर हाथ रख लेते हैं। बेचारा न अपना उपकार कर सके न औरों का। पब्लिक उससे आशा तो यह रखती है कि हरएक आन्दोलन में वह सबसे आगे रहे,जेल जाय,मार खाय,घर के माल-असबाब की कुर्की कराये,यह उसका धर्म समझा जाता है,लेकिन उसकी कठिनाइयों की ओर किसी का ध्यान नहीं। हो तो वह सब कुछ। उसे हरएक विद्या,हरएक कला में पारंगत होना चाहिए;लेकिन उसे जीवित रहने का अधिकार नहीं। आप तो आजकल कुछ लिखती ही नहीं। आपकी सेवा करने का जो थोड़ा-सा सौभाग्य मुझे मिल सकता है,उससे क्यों मुझे वंचित रखती हैं? ⁠ मिसेज़ खन्ना को कविता लिखने का शौक था। इस नाते से सम्पादकजी कभी-कभी उनसे मिल आया करते थे; लेकिन घर के काम-धन्धों में व्यस्त रहने के कारण इधर बहुत दिनों से कुछ लिख नहीं सकी थी। सच बात तो यह है कि सम्पादकजी ने ही उन्हें प्रोत्साहित करके कवि बनाया था। सच्ची प्रतिभा उनमें बहुत कम थी।

    ⁠ 'क्या लिखू कुछ सूझता ही नहीं। आपने कभी मिस मालती से कुछ लिखने को नहीं कहा?'

    ⁠ सम्पादकजी उपेक्षा भाव से बोले–उनका समय मूल्यवान है कामिनी देवी! लिखते तो वह लोग हैं,जिनके अन्दर कुछ दर्द है,अनुराग है,लगन है,विचार है,जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया,वह क्या लिखेंगे।

    ⁠ कामिनी ने ईर्ष्या-मिश्रित विनोद से कहा–अगर आप उनसे कुछ लिखा सकें,तो आपका प्रचार दुगना हो जाय। लखनऊ में तो ऐसा कोई रसिक नहीं है,जो आपका ग्राहक न बन जाय।

    ⁠ 'अगर धन मेरे जीवन का आदर्श होता,तो आज मैं इस दशा में न होता। मुझे भी धन कमाने की कला आती है। आज चाहूँ,तो लाखों कमा सकता हूँ;लेकिन यहाँ तो धन को कभी कुछ समझा ही नहीं। साहित्य की सेवा अपने जीवन का ध्येय है और रहेगा।'

    {{Gap{{'कम-से-कम मेरा नाम तो ग्राहकों में लिखवा दीजिए।'

    ⁠ 'आपका नाम ग्राहकों में नहीं,संरक्षकों में लिखूगा।'

    ⁠ 'संरक्षकों में रानियों-महारानियों को रखिए,जिनकी थोड़ी-सी खुशामद करके आप अपने पत्र को लाभ की चीज बना सकते हैं।'

    ⁠ 'मेरी रानी-महारानी आप है। मैं तो आपके सामने किसी रानी-महारानी की हक़ीकत नहीं समझता। जिसमें दया और विवेक है,वही मेरी रानी है। खुशामद से मुझे घृणा है।'

    ⁠ कामिनी ने चुटकी ली-लेकिन मेरी खुशामद तो आप कर रहे हैं सम्पादकजी!

    ⁠ सम्पादकजी ने गम्भीर होकर श्रद्धा-पूर्ण स्वर में कहा-यह खुशामद नहीं है देवीजी,हृदय के सच्चे उद्गार हैं।

    ⁠ राय साहब ने पुकारा–मम्पादकजी,जरा इधर आइएगा। मिस मालती आपसे कुछ कहना चाहती हैं।

    ⁠ सम्पादकजी की वह सारी अकड़ गायब हो गयी। नम्रता और विनय की मूर्ति बने हुए आकर खड़े हो गये। मालती ने उन्हें सदय नेत्रों से देखकर कहा-मैं अभी कह रही थी कि दुनिया में मुझे सबसे ज्यादा डर सम्पादकों से लगता है। आप लोग जिसे चाहें,एक क्षण में बिगाड़ दें। मुझी से चीफ़ सेक्रेटरी साहव ने एक बार कहा-अगर मैं इस ब्लडी ओंकारनाथ को जेल में बन्द कर सकूँ,तो अपने को भाग्यवान समझू।

    ⁠ ओंकारनाथ की बड़ी-बड़ी मूंछे खड़ी हो गयीं। आँखों में गर्व की ज्योति चमक उठी। यों वह बहुत ही शान्त प्रकृति के आदमी थे;लेकिन ललकार सुनकर उनका पुरुषत्व उत्तेजित हो जाता था। दृढ़ता भरे स्वर में बोले-इस कृपा के लिए आपका कृतज्ञ हूँ। उस बज्म (सभा) में अपना जिक्र तो आता है, चाहे किसी तरह आये। आप सेक्रेटरी महोदय से कह दीजिएगा कि ओंकारनाथ उन आदमियों में नहीं है जो इन धमकियों से डर जाय। उसकी कलम उसी वक्त विश्राम लेगी,जब उसकी जीवन-यात्रा समाप्त हो जायगी। उसने अनीति और स्वेच्छाचार को जड़ से खोदकर फेंक देने का जिम्मा लिया है।

    ⁠ मिस मालती ने और उकसाया-मगर मेरी समझ में आपकी यह नीति नहीं आती कि जब आप मामूली शिष्टाचार से अधिकारियों का सहयोग प्राप्त कर सकते हैं,तो क्यों उनमे कन्नी काटते हैं? अगर आप अपनी आलोचनाओं में आग और विप ज़रा कम दें,तो मैं वादा करती हूँ कि आपको गवर्नमेंट से काफ़ी मदद दिला सकती हूँ। जनता को तो आपने देख लिया। उससे अपील की,उसकी खुशामद की,अपनी कठिनाइयों की कथा कही,मगर कोई नतीजा न निकला। अब ज़रा अधिकारियों को भी आजमा देखिए। तीसरे महीने आप मोटर पर न निकलने लगें, और सरकारी दावतों में निमन्त्रित न होने लगें तो मुझे जितना चाहें कोसिएगा। तब यही रईस और नेशनलिस्ट जो आपकी परवा नहीं करते,आपके द्वार के चक्कर लगायेंगे।

    ⁠ ओंकारनाथ अभिमान के साथ बोले–यही तो मैं नहीं कर सकता देवीजी!मैने अपने सिद्धान्तों को सदैव ऊंचा और पवित्र रखा है,और जीते-जी उनकी रक्षा करूंगा। दौलत के पुजारी तो गली-गली मिलेंगे,मैं सिद्धान्त के पुजारियों में हूँ।

    ⁠ 'मैं इसे दम्भ कहती हूँ।'

    ⁠ 'आपकी इच्छा।'

    ⁠ 'धन की आपको परवा नहीं है ?'

    ⁠ 'सिद्धान्तों का खून करके नहीं।'

    ⁠ 'तो आपके पत्र में विदेशी वस्तुओं के विज्ञापन क्यों होते हैं? मैने किसी भी दूसरे पत्र में इतने विदेशी विज्ञापन नहीं देखे। आप बनते तो हैं आदर्शवादी और सिद्धान्तवादी,पर अपने फ़ायदे के लिए देश का धन विदेश भेजते हुए आपको ज़रा भी खेद नहीं होता? आप किसी तर्क से इस नीति का समर्थन नहीं कर सकते।'

    ⁠ ओंकारनाथ के पास सचमुच कोई जवाब न था। उन्हें बगलें झाँकते देखकर राय साहब ने उनकी हिमायत की-तो आखिर आप क्या चाहती हैं? इधर से भी मारे जायें उधर से भी मारे जायें,तो पत्र कैसे चले?

    ⁠ मिस मालती ने दया करना न सीखा था।

    ⁠ ‘पत्र नहीं चलता तो बन्द कीजिए। अपना पत्र चलाने के लिए आपको विदेशी वस्तुओं के प्रचार का कोई अधिकार नहीं। अगर आप मजबूर हैं,तो सिद्धान्त का ढोंग छोड़िए। मैं तो सिद्धान्तवादी पत्रों को देखकर जल उठती हूँ। जी चाहता है, दियासलाई दिखा दूं। जो व्यक्ति कर्म और वचन में सामंजस्य नहीं रख सकता,वह और चाहे जो कुछ हो सिद्धान्तवादी नहीं है।' ⁠ मेहता खिल उठे। थोड़ी देर पहले उन्होंने खुद इसी विचार का प्रतिपादन किया था। उन्हें मालूम हुआ कि इस रमणी में विचार की शक्ति भी है,केवल तितली नहीं। संकोच जाता रहा।

    ⁠ 'यही बात अभी मैं कह रहा था। विचार और व्यवहार में सामंजस्य का न होना ही धूर्तता है,मक्कारी है।'

    ⁠ मिस मालती प्रसन्न मुख से बोली-तो इस विषय में आप और मैं एक हैं,और मैं भी फिलासफ़र होने का दावा कर सकती हूँ।

    ⁠ खन्ना की जीभ में खुजली हो रही थी। बोले–आपका एक-एक अंग फिलासफ़ी में डूबा हुआ है।

    ⁠ मालती ने उनकी लगाम खींची-अच्छा,आपको भी फ़िलासफ़ी में दखल है। मैं तो समझती थी,आप बहुत पहले अपनी फिलासफ़ी को गंगा में डुबो बैठे। नहीं,आप इतने बैंकों और कम्पनियों के डाइरेक्टर न होते।

    ⁠ राय साहब ने खन्ना को सँभाला–तो क्या आप समझती हैं कि फिलासफ़रों को हमेशा फ़ाकेमस्त रहना चाहिए।

    ⁠ 'जी हाँ! फ़िलासफ़र अगर मोह पर विजय न पा सके, तो फिलासफ़र कैसा?'

    ⁠ 'इस लिहाज़ से तो शायद मिस्टर मेहता भी फिलासफ़र न ठहरें!'

    ⁠ मेहता ने जैसे आस्तीन चढ़ाकर कहा-मैंने तो कभी यह दावा नहीं किया राय साहब! मैं तो इतना ही जानता हूँ कि जिन औजारों से लोहार काम करता है,उन्हीं औजारों से सोनार नहीं करता। क्या आप चाहते हैं, आम भी उसी दशा में फले-फूलें,जिसमें बबूल या ताड़? मेरे लिए धन केवल उन सुविधाओं का नाम है जिनमें मैं अपना जीवन सार्थक कर सकूँ। धन मेरे लिए बढ़ने और फलने-फूलनेवाली चीज नहीं, केवल माधन है। मुझे धन की बिल्कुल इच्छा नहीं,आप वह साधन जुटा दें,जिसमें मैं अपने जीवन का उपयोग कर सकूँ।।

    ⁠ ओंकारनाथ समष्टिवादी थे। व्यक्ति की इस प्रधानता को कैसे स्वीकार करते?

    ⁠ 'इसी तरह हर एक मजदूर कह सकता है कि उसे काम करने की सुविधाओं के लिए एक हज़ार महीने की ज़रूरत है।'

    ⁠ 'अगर आप समझते है कि उस मजदूर के बगैर आपका काम नहीं चल सकता,तो आपको वह सुविधाएँ देनी पड़ेंगी। अगर वही काम दूसरा मजदूर थोड़ी-सी मजदूरी में कर दे,तो कोई वजह नहीं कि आप पहले मजदूर की खुशामद करें।'

    ⁠ 'अगर मजदूरों के हाथ में अधिकार होता,तो मजदूरों के लिए स्त्री और शराब भी उतनी ही ज़रूरी सुविधा हो जाती जितनी फिलासफ़रों के लिए।'

    ⁠ 'तो आप विश्वास मानिए,मैं उनसे ईर्ष्या न करता।'

    ⁠ 'जब आपका जीवन सार्थक करने के लिए स्त्री इतनी आवश्यक है,तो आप शादी क्यों नहीं कर लेते?'

    ⁠ मेहता ने निस्संकोच भाव से कहा-इसीलिए कि मैं समझता हूँ,मुक्त भोग आत्मा के विकास में बाधक नहीं होता। विवाह तो आत्मा को और जीवन को पिंजरे में बन्द कर देता है।

    ⁠ खन्ना ने इसका समर्थन किया-बंधन और निग्रह पुरानी थ्योरियाँ हैं। नयी थ्योरी है मुक्त भोग।

    ⁠ मालती ने चोटी पकड़ी-तो अब मिसेज़ खन्ना को तलाक़ के लिए तैयार रहना चाहिए।

    ⁠ 'तलाक़ का बिल पास तो हो।'

    ⁠ 'शायद उसका पहला उपयोग आप ही करेंगे।'

    ⁠ कामिनी ने मालती की ओर विष-भरी आँखों से देखा और मुंह सिकोड़ लिया, मानो कह रही है-खन्ना तुम्हें मुबारक रहें,मुझे परवा नहीं।

    ⁠ मालती ने मेहता की तरफ देख कर कहा-इस विषय में आपके क्या विचार हैं मिस्टर मेहता?

    ⁠ मेहता गम्भीर हो गये। वह किसी प्रश्न पर अपना मत प्रकट करते थे,तो जैसे अपनी सारी आत्मा उसमें डाल देते थे।

    ⁠ विवाह को मैं सामाजिक समझौता समझता हूँ और उसे तोड़ने का अधिकार न पुरुष को है न स्त्री को। समझौता करने के पहले आप स्वाधीन हैं,समझौता हो जाने के बाद आपके हाथ कट जाते हैं।'

    ⁠ 'तो आप तलाक़ के विरोधी है,क्यों?'

    {{Gap{}'पक्का।'

    ⁠ 'और मुक्त भोग वाला सिद्धान्त?'

    ⁠ 'वह उनके लिए है,जो विवाह नहीं करना चाहते।'

    ⁠ 'अपनी आत्मा का सम्पूर्ण विकास सभी चाहते हैं; फिर विवाह कौन करे और क्यों करे?'

    ⁠ 'इसीलिए कि मुक्ति सभी चाहते हैं। पर ऐसे बहुत कम हैं,जो लोभ मे अपना गला छुड़ा सकें।'

    ⁠ 'आप श्रेष्ठ किसे समझते हैं,विवाहित जीवन को या अविवाहित जीवन को?'

    ⁠ 'ममाज की दृष्टि से विवाहित जीवन को,व्यक्ति की दृष्टि से अविवाहित जीवन को।'

    ⁠ धनुष-यज्ञ का अभिनय निकट था। दस से एक तक धनुष-यज्ञ,एक से तीन तक प्रहसन,यह प्रोग्राम था। भोजन की तैयारी शुरू हो गयी। मेहमानों के लिए बॅगले में रहने का अलग-अलग प्रबन्ध था। खन्ना-परिवार के लिए दो कमरे रखे गये थे। और भी कितने ही मेहमान आ गये थे। सभी अपने-अपने कमरों में गये और कपड़े बदल-बदलकर भोजनालय में जमा हो गये। यहाँ छूत-छात का कोई भेद न था। सभी जातियों और वर्गों के लोग साथ भोजन करने बैठे।केवल सम्पादक ओंकारनाथ सबसे अलग अपने कमरे में फलाहार करने गये।और कामिनी खन्ना को सिर दर्द हो रहा था,उन्होंने भोजन करने से इनकार किया। भोजनालय में मेहमानों की संख्या पच्चीस से कम न थी। शराब भी थी और मांस भी। इस उत्सव के लिए राय साहब अच्छी किस्म की शराब खास तौर पर खिंचवाते थे? खींची जाती थी दवा के नाम से;पर होती थी खालिस शराब। मांस भी कई तरह के पकते थे,कोफ़ते,कबाब और पुलाव मुर्ग,मुर्गियांबकरा,हिरन,तीतर,मोर,जिसे जो पसन्द हो,वह खाये।

    ⁠ भोजन शुरू हो गया तो मिस मालती ने पूछा–सम्पादकजी कहाँ रह गये? किसी को भेजो राय साहब,उन्हें पकड़ लाये।

    ⁠ राय साहब ने कहा-वह वैष्णव हैं,उन्हें यहाँ बुलाकर क्यों बेचारे का धर्म नष्ट करोगी। बड़ा ही आचारनिष्ठ आदमी है।

    ⁠ 'अजी और कुछ न सही,तमाशा तो रहेगा।'

    ⁠ सहसा एक सज्जन को देखकर उसने पुकारा-आप भी तशरीफ़ रखते हैं मिर्जा खुर्शद,यह काम आपके सुपुर्द।आपकी लियाक़त की परीक्षा हो जायगी।

    ⁠ मिर्जा खुर्शद गोरे-चिट्टे आदमी थे,भूरी-भूरी मूंछे,नीली आँखें,दोहरी देह,चाँद के बाल सफाचट। छकलिया अचकन और चूड़ीदार पाजामा पहने थे। ऊपर से हैट लगा लेते थे। वोटिंग के समय चौंक पड़ते थे और नेशनलिस्टों की तरफ वोट देते थे। सूफ़ी मुसलमान थे। दो बार हज कर आये थे;मगर शराब खूब पीते थे। कहते थे,जब हम खुदा का एक हुक्म भी कभी नहीं मानते,तो दीन के लिए क्यों जान दें!बड़े दिल्लगीवाज,बेफिक्रे जीव थे। पहले बसरे में ठीके का कारोबार करते थे। लाखों कमाये,मगर शामत आयी कि एक मेम से आशनाई कर बैठे। मुकदमेबाजी हुई। जेल जाते-जाते बचे। चौबीस घण्टे के अन्दर मुल्क से निकल जाने का हुक्म हुआ। जो कुछ जहाँ था,वहीं छोड़ा और सिर्फ पचास हजार लेकर भाग खड़े हुए। बम्बई में उनके एजेण्ट थे। सोचा था,उनसे हिसाब-किताब कर लेंऔर जो कुछ निकलेगा उसी में जिन्दगी काट देंगे,मगर एजेण्टों ने जाल करके उनसे वह पचास हजार भी ऐंठ लिये। निराश होकर वहाँ से लखनऊ चले। गाड़ी में एक महात्मा से साक्षात् हुआ। महात्माजी ने उन्हें सब्ज बाग दिखाकर उनकी घड़ी,अंगूठियाँ,रुपए सब उड़ा लिये। बेचारे लखनऊ पहुंचे तो देह के कपड़ों के सिवा और कुछ न था। राय साहब से पुरानी मुलाकात थी। कुछ उनकी मदद से और कुछ अन्य मित्रों की मदद से एक जूते की दूकान खोल ली। वह अब लखनऊ की सबसे चलती हुई जते की दूकान थी चार-पाँच सौ रोज की बिक्री थी। जनता को उन पर थोड़े ही दिनों में इतना विश्वास हो गया कि एक बड़े भारी मुस्लिम ताल्लुकेदार को नीचा दिखाकर कौंसिल में पहुँच गये।

    ⁠ अपनी जगह पर बैठे-बैठे बोले–जी नहीं;मैं किसी का दीन नहीं बिगाड़ता। यह काम आपको खुद करना चाहिए। मज़ा तो जब है कि आप उन्हें शराब पिलाकर छोड़ें। यह आपके हुस्न के जादू की आज़माइश है।

    ⁠ चारों तरफ़ से आवाजें आयीं-हाँ-हाँ,मिस मालती, आज अपना कमाल दिखाइए। मालती ने मिर्जा को ललकारा,कुछ इनाम दोगे?

    ⁠ 'सौ रुपए की थैली!' ⁠ 'हुश!सौ रुपए! लाख रुपए का धर्म बिगाडूँ सौ के लिए।'

    ⁠ 'अच्छा,आप खुद अपनी फ़ीस बताइए।'

    ⁠ 'एक हजार,कौड़ी कम नहीं।'

    ⁠ 'अच्छा मंजूर।'

    ⁠ 'जी नहीं,लाकर मेहताजी के हाथ में रख दीजिए।'

    ⁠ मिर्जा़जी ने तुरन्त सौ रुपए का नोट जेब से निकाला और उसे दिखाते हुए खड़े होकर बोले-भाइयो!यह हम सब मरदों की इज्जत का मामला है। अगर मिस मालती की फ़रमाइश न पूरी हुई,तो हमारे लिए कहीं मुंँह दिखाने की जगह न रहेगी; अगर मेरे पास रुपए होते तो मैं मिस मालती की एक-एक अदा पर एक-एक लाख कुरबान कर देता। एक पुराने शायर ने अपने माशूक के एक काले तिल पर समरक़न्द और बोखारा के सूबे कुरबान कर दिये थे। आज आप सभी साहबों की जवाँमरदी और हुस्नपरस्ती का इम्तहान है। जिसके पास जो कुछ हो,सच्चे सूरमा की तरह निकालकर रख दे। आपको इल्म की क़सम,माशूक की अदाओं की क़सम,अपनी इज्जत की क़सम,पीछे क़दम न हटाइए। मरदो!रुपए खर्च हो जायँगे,नाम हमेशा के लिए रह जायगा। ऐसा तमाशा लाखों में भी सस्ता है। देखिए,लखनऊ के हसीनों की रानी एक जा़हिद पर अपने हुस्न का मन्त्र कैसे चलाती है?

    ⁠ भाषण समाप्त करते ही मिर्जा़जी ने हर एक की जेव की तलाशी शुरू कर दी पहले मिस्टर खन्ना की तलाशी हुई। उनकी जेब से पाँच रुपए निकले।

    ⁠ मिर्जा ने मुंँह फीका करके कहा–वाह खन्ना साहब, वाह!नाम बड़े दर्शन थोड़े। इतनी कम्पनियों के डाइरेक्टर,लाखों की आमदनी और आपके जेब में पाँच रुपए!लाहौल बिला कूबत!कहाँ है मेहता?आप ज़रा जाकर मिसेज़ खन्ना से कम-से-कम सौ रुपए वसूल कर लायें।

    ⁠ खन्ना खिसियाकर बोले-अजी,उनके पास एक पैसा भी न होगा। कौन जानता था कि यहाँ आप तलाशी लेना शुरू करेंगे?

    ⁠ 'खैर आप खामोश रहिए। हम अपनी तकदीर तो आज़मा लें।'

    ⁠ 'अच्छा तो मै जाकर उनसे पूछता हूँ।'

    ⁠ 'जी नहीं,आप यहाँ से हिल नहीं सकते। मिस्टर मेहता, आप फ़िलासफ़र है,मनोविज्ञान के पण्डित। देखिए अपनी भद न कंराइएगा।'

    ⁠ मेहता शराब पीकर मस्त हो जाते थे। उस मस्ती में उनका दर्शन उड़ जाता था और विनोद सजीव हो जाता था। लपककर मिसेज़ खन्ना के पास गये और पाँच मिनट ही में मुंँह लटकाये लौट आये।

    ⁠ मिर्जा़ ने पूछा-अरे! क्या खाली हाथ?

    ⁠ राय साहब हँसे-का़जी के घर चूहे भी सयाने।

    ⁠ मिर्जा़ ने कहा–हो बड़े खुशनसीब खन्ना,खुदा की क़सम!

    ⁠ मेहता ने क़हक़हा मारा और जेब से सौ-सौ रुपए के पाँच नोट निकाले। ⁠ मिर्जा़ ने लपककर उन्हें गले लगा लिया।

    ⁠ चारों तरफ़ से आवाजें आने लगीं–कमाल है,मानता हूँ उस्ताद,क्यों न हो,फ़िलासफ़र ही जो ठहरे!

    ⁠ मिर्जा़ ने नोटों को आँखों से लगाकर कहा–भई मेहता,आज से मैं तुम्हारा शागिर्द हो गया। बताओ,क्या जादू मारा?

    ⁠ मेहता अकड़कर, लाल-लाल आँखों से ताकते हुए बोले–अजी कुछ नहीं। ऐसा कौन-सा बड़ा काम था। जाकर पूछा,अन्दर आऊँ? बोलीं–आप हैं मेहताजी,आइए!मैंने अन्दर जाकर कहा,वहाँ लोग ब्रिज खेल रहे हैं। अंगूठी एक हजार से कम की नहीं है। आपने तो देखा है। बस वही। आपके पास रुपए हों,तो पाँच सौ रुपए देकर एक हजा़र की चीज़ ले लीजिए। ऐसा मौक़ा फिर न मिलेगा। मिस मालती ने इस वक्त रुपए न दिये, तो बेदाग निकल जायँगी। पीछे से कौन देता है, शायद इसीलिए उन्होंने अंगूठी निकाली है कि पाँच सौ रुपए किसके पास धरे होंगे। मुसकराई और चट अपने वटुवे से पाँच नोट निकालकर दे दिये,और बोलीं–मैं बिना कुछ लिये घर से नहीं निकलती। न जाने कब क्या जरूरत पड़े।

    ⁠ खन्ना खिसियाकर बोले–जब हमारे प्रोफेसरों का यह हाल है, तो यूनिवर्सिटी का ईश्वर ही मालिक है।खुर्शद ने घाव पर नमक छिड़का–अरे तो ऐसी कौन-सी बड़ी रकम है, जिसके लिए आपका दिल बैठा जाता है। खुदा झूठ न बुलवाये तो यह आपकी एक दिन की आमदनी है। समझ लीजिएगा,एक दिन बीमार पड़ गये और जायगा भी तो मिस मालती ही के हाथ में। आपके दर्दजिगर की दवा मिस मालती ही के पास तो है।

    ⁠ मालती ने ठोकर मारी–देखिए मिर्जा़जी तबेले में लतिआहुज अच्छी नहीं। मिर्जा़ ने दुम हिलायी–कान पकड़ता हूँ देवीजी।

    ⁠ मिस्टर तंखा की तलाशी हुई। मुश्किल से दस रुपए निकले, मेहता की जेब से केवल अठन्नी निकली। कई सज्जनों ने एक-एक,दो-दो रुपए खुद दे दिये। हिसाब जोड़ा गया,तो तीन सौ की कमी थी। यह कमी राय साहब ने उदारता के साथ पूरी कर दी।

    ⁠ सम्पादकजी ने मेवे और फल खाये थे और ज़रा कमर सीधी कर रहे थे कि राय साहब ने जाकर कहा–आपको मिस मालती याद कर रही हैं।

    {{Gap}]खुश होकर बोले–मिस मालती मुझे याद कर रही हैं, धन्य-भाग! राय साहब के साथ ही हा़ल में आ विराजे।

    ⁠ उधर नौकरों ने मेजें साफ़ कर दी थीं। मालती ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया।

    ⁠ सम्पादकजी ने नम्रता दिखायी–बैठिए, तकल्लुफ़ न कीजिए। मैं इतना बड़ा आदमी नहीं हूँ।

    ⁠ मालती ने श्रद्धा भरे स्वर में कहा–आप तकल्लुफ़ समझते होंगे,मैं समझती हूँ,मैं अपना सम्मान बढ़ा रही हूँ;यों आप अपने को कुछ न समझें और आपको शोभा भी नहीं देता है,लेकिन यहाँ जितने सज्जन जमा है,सभी आपकी राष्ट्र और साहित्य-सेवा से भली-भाँति परिचित हैं। आपने इस क्षेत्र में जो महत्त्वपूर्ण काम किया है,अभी चाहे लोग उसका मूल्य न समझें;लेकिन वह समय बहुत दूर नहीं है–मैं तो कहती हूँ वह समय आ गया है–जब हरएक नगर में आपके नाम की सड़कें बनेंगी,क्लब बनेंगे,टाउन हालों में आपके चित्र लटकाये जायेंगे। इस वक्त जो थोड़ी बहुत जागृति है,वह आप ही के महान् उद्योग का प्रसाद है। आपको यह जानकर आनन्द होगा कि देश में अब आपके ऐसे अनुयायी पैदा हो गये हैं जो आपके देहात-सुधार आन्दोलन मे आपका हाथ वँटाने को उत्सुक हैं,और उन सज्जनों की बड़ी इच्छा है कि यह काम संगठित रूप से किया जाय और एक देहात-सुधार संघ स्थापित किया जाय,जिसके आप सभापति हों।

    ⁠ ओंकारनाथ के जीवन में यह पहला अवसर था कि उन्हें चोटी के आदमियों में इतना सम्मान मिले। यों वह कभी-कभी आम जलसों में बोलते थे और कई सभाओं के मन्त्री और उपमन्त्री भी थे; लेकिन शिक्षित-समाज ने अब तक उनकी उपेक्षा ही की थी। उन लोगों में वह किसी तरह मिल न पाते थे, इसीलिए आम जलसों में उनकी निषिकयता और स्वार्थान्धता की शिकायत किया करते थे,और अपने पत्र में एक-एक को रगेदते थे। क़लम तेज थी, वाणी कठोर, साफ़गोई की जगह उच्छृँख़लता कर बैठते थे,इसलिए लोग उन्हें खाली ढोल समझते थे। उसी समाज में आज उनका इतना सम्मान!कहाँ हैं आज'स्वराज' और'स्वाधीनभारत'और'हंटर'के सम्पादक,आकर देखें और अपना कलेजा ठंढा करें। आज अवश्य ही देवताओं की उन पर कृपादृष्टि है। सदुद्योग कभी निष्फल नहीं जाता,यह ऋषियों का वाक्य है। वह स्वयं अपनी नज़रों में उठ गये। कृतज्ञता से पुलकित होकर बोले–देवीजी,आप तो मुझे काँटों में घसीट रही हैं। मैने तो जनता की जो कुछ भी सेवा की,अपना कर्तव्य समझकर की। मैं इस सम्मान को अपना नहीं,उस उद्देश्य का सम्मान समझ रहा हूँ,जिसके लिए मैंने अपना जीवन अर्पित कर दिया है,लेकिन मेरा नम्र-निवेदन है कि प्रधान का पद किसी प्रभावशाली पुरुष को दिया जाय,मैं पदों में विश्वास नहीं रखता। मैं तो सेवक हूँ और सेवा करना चाहता हूँ।

    ⁠ मिस मालती इसे किसी तरह स्वीकार नहीं कर सकतीं। सभापति पंडितजी को बनना पड़ेगा। नगर में उसे ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति दूसरा नहीं दिखायी देता। जिसकी क़लम में जादू है, जिसकी जबान में जादू है,जिसके व्यक्तित्व में जादू है,वह कैसे कहता है कि वह प्रभावशाली नहीं है। वह जमाना गया,जब धन और प्रभाव में मेल था। अब प्रतिभा और प्रभाव के मेल का युग है। सम्पादकजी को यह पद अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। मन्त्री मिस मालती होंगी। इस सभा के लिए एक हज़ार का चन्दा भी हो गया है और अभी तो सारा शहर और प्रान्त पड़ा हुआ है। चार-पाँच लाख मिल जाना मामूली बात है।

    ⁠ ओंकारनाथ पर कुछ नशा-सा चढ़ने लगा। उनके मन में जो एक प्रकार की फुरहरीसी उठ रही थी,उसने गम्भीर उत्तरदायित्व का रूप धारण कर लिया। बोले-मगर यह आप समझ लें,मिस मालती, कि यह बड़ी जिम्मेदारी का काम है और आपको अपना बहुत समय देना पड़ेगा। मैं अपनी तरफ़ से आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप सभाभवन में मुझे सबसे पहले मौजूद पायेंगी।

    ⁠ मिर्जाजी ने पुचारा दिया–आपका बड़े-से-बड़ा दुश्मन भी यह नहीं कह सकता कि आप अपना फ़र्ज़ अदा करने में कभी किसी से पीछे रहे।

    ⁠ मिस मालती ने देखा,शराब कुछ-कुछ असर करने लगी है,तो और भी गम्भीर बनकर बोलीं–अगर हम लोग इस काम की महानता न समझते,तो न यह सभा स्थापित होती और न आप इसके सभापति होते। हम किसी रईस या ताल्लुकेदार को सभापति बनाकर धन खूब वटोर सकते हैं,और सेवा की आड़ में स्वार्थ सिद्ध कर सकते हैं,लेकिन यह हमारा उद्देश्य नहीं। हमारा एकमात्र उद्देश्य जनता की सेवा करना है। और उसका सबसे बड़ा साधन आपका पत्र है। हमने निश्चय किया है कि हरएक नगर और गाँव में उसका प्रचार किया जाय और जल्द-से-जल्द उसकी ग्राहक-संख्या को बीस हजार तक पहुँचा दिया जाय। प्रान्त की सभी म्युनिसिपैलिटियों और ज़िला बोर्ड के चेयरमैन हमारे मित्र हैं। कई चेयरमैन तो यहीं विराजमान हैं। अगर हरएक ने पाँच-पाँच सौ प्रतियाँ भी ले लीं,तो पचीस हजार प्रतियाँ तो आप यक़ीनी समझें। फिर राय साहब और मिर्जा साहब की यह सलाह है कि कौंसिल में इस विषय का एक प्रस्ताव रखा जाय कि प्रत्येक गाँव के लिए 'विजली' की एक प्रति सरकारी तौर पर मॅगाई जाय, या कुछ वार्पिक सहायता स्वीकार की जाय। और हमें पूरा विश्वास है कि यह प्रस्ताव पास हो जायगा।

    ⁠ ओंकारनाथ ने जैसे नशे में झूमते हुए कहा–हमें गवर्नर के पास डेपुटेशन ले जाना होगा।

    ⁠ मिर्जा़ खुर्शद बोले–ज़रूर-जरूर!

    ⁠ 'उनसे कहना होगा कि किसी सभ्य शासन के लिए यह कितनी लज्जा और कलंक की बात है कि ग्रामोत्थान का अकेला पत्र होने पर भी 'विजली'का अस्तित्व तक नहीं स्वीकार किया जाता।'

    ⁠ मिर्जा खुर्शद ने कहा–अवश्य-अवश्य!

    ⁠ 'मैं गर्व नही करता। अभी गर्व करने का समय नहीं आया; लेकिन मुझे इसका दावा है कि ग्राम्य-संगठन के लिए 'विजली'ने जितना उद्योग किया है…'

    ⁠ मिस्टर मेहता ने सुधारा–नहीं महाशय,तपस्या कहिए।

    ⁠ 'मैं मिस्टर मेहता को धन्यवाद देता हूँ। हाँ, इसे तपस्या ही कहना चाहिए,बड़ी कठोर तपस्या।'विजली' ने जो तपस्या की है,वह इस प्रान्त के ही नहीं,इस राष्ट्र के इतिहास में अभूतपूर्व है।'

    ⁠ मिर्जा़ खुर्शद वोले–ज़रूर-ज़रूर!

    ⁠ मिस मालती ने एक पेग और दिया–हमारे संघ ने यह निश्चय भी किया है कि कौंसिल में अब की जो जगह खाली हो, उसके लिए आपको उम्मेदवार खड़ा किया जाय। आपको केवल अपनी स्वीकृति देनी होगी। शेष सारा काम हम लोग कर लेंगे। आपको न खर्च से मतलब, न प्रोपेगेंडा, न दौड़-धूप से।

    ओंकारनाथ की आँखों की ज्योति दुगुनी हो गयी। गर्वपूर्ण नम्रता से बोले––मैं आप लोगों का सेवक हूँ, मुझसे जो काम चाहे ले लीजिए।

    'हम लोगों को आपसे ऐसी ही आशा है। हम अब तक झूठे देवताओं के सामने नाक रगड़ते-रगड़ते हार गये और कुछ हाथ न लगा। अब हमने आप में सच्चा पथ-प्रदर्शक, सच्चा गुरु पाया है और इस शुभ दिन के आनन्द में आज हमें एकमन, एकप्राण होकर अपने अहंकार को, अपने दम्भ को तिलांजलि दे देना चाहिए। हममें आज से कोई ब्राह्मण नहीं है, कोई शूद्र नहीं है, कोई हिन्दू नहीं है, कोई मुसलमान नहीं है, कोई ऊँच नही है, कोई नीच नहीं है। हम सब एक ही माता के बालक, एक ही गोद के खेलनेवाले, एक ही थाली के खानेवाले भाई हैं। जो लोग भेद-भाव में विश्वास रखते हैं, जो लोग पृथकता और कट्टरता के उपासक हैं, उनके लिए हमारी सभा में स्थान नहीं है। जिस सभा के सभापति पूज्य ओंकारनाथजी जैसे विशाल-हृदय व्यक्ति हों, उस सभा में ऊँच-नीच का, खान-पान का और जाति-पाँति का भेद नहीं हो सकता। जो महानुभाव एकता में और राष्ट्रीयता में विश्वास न रखते हों वे कृपा करके यहाँ से उठ जायें।

    राय साहब ने शंका की––मेरे विचार में एकता का यह आशय नहीं है कि सब लोग खान-पान का विचार छोड़ दें। मैं शराब नहीं पीता, तो क्या मुझे इस सभा से अलग हो जाना पड़ेगा?

    मालती ने निर्मम स्वर में कहा––बेशक अलग हो जाना पड़ेगा। आप इस संघ में रहकर किसी तरह का भेद नहीं रख सकते।

    मेहता ने घड़े को ठोका––मुझे सन्देह है कि हमारे सभापतिजी स्वयं खान-पान की एकता में विश्वास नहीं रखते हैं।

    ओंकारनाथ का चेहरा ज़र्द पड़ गया। इस बदमाश ने यह क्या बेवक्त की शहनाई बजा दी। दुष्ट कहीं गड़े मुर्दे न उखाड़ने लगे, नहीं, यह सारा सौभाग्य स्वप्न की भांति शून्य में विलीन हो जायगा।

    मिस मालती ने उनके मुँह की ओर जिज्ञासा की दृपिट से देखकर दृढ़ता से कहा–आपका सन्देह निराधार है मेहता महोदय! क्या आप समझते हैं कि राष्ट्र की एकता का ऐसा अनन्य उपासक, ऐसा उदारचेता पुरुष, ऐसा रसिक कवि इस निरर्थक और लज्जाजनक भेद को मान्य समझेगा? ऐसी शंका करना उसकी राष्ट्रीयता का अपमान करना है।

    ओंकारनाथ का मुख-मंडल प्रदीप्त हो गया। प्रसन्नता और सन्तोष की आभा झलक पड़ी।

    मालती ने उसी स्वर में कहा––और इससे भी अधिक उनकी पुरुष-भावना का। एक रमणी के हाथों से शराब का प्याला पाकर वह कौन भद्र पुरुष है जो इनकार कर दे? यह तो नारी-जाति का अपमान होगा, उस नारी-जाति का जिसके नयन-बाणों से अपने हृदय को बिंधवाने की लालसा पुरुष-मात्र में होती है, जिसकी अदाओं पर मर-मिटने के लिए बड़े-बड़े महीप लालायित रहते हैं। लाइए, बोतल और प्याले, और दौर चलने दीजिए। इस महान् अवसर पर किसी तरह की शंका, किसी तरह की आपत्ति राष्ट्र-द्रोह से कम नहीं। पहले हम अपने सभापति की सेहत का जाम पीयेंगे।

    बर्फ, शराब और सोडा पहले ही से तैयार था। मालती ने ओंकारनाथ को अपने हाथों से लाल विष से भरा हुआ ग्लास दिया, और उन्हें कुछ ऐसी जादू-भरी चितवन से देखा कि उनकी सारी निष्ठा, सारी वर्ण-श्रेष्ठता काफूर हो गयी। मन ने कहा––सारा आचार-विचार परिस्थितियों के अधीन है। आज तुम दरिद्र हो, किसी मोटरकार को धूल उड़ाते देखते हो,तो ऐसा बिगड़ते हो कि उसे पत्थरों से चूर-चूर कर दो; लेकिन क्या तुम्हारे मन में कार की लालसा नहीं है? परिस्थिति ही विधि है और कुछ नहीं। बाप-दादों ने नहीं पी थी, न पी हो। उन्हें ऐसा अवसर ही कब मिला था। उनकी जीविका पोथी-पत्रों पर थी। शराब लाते कहाँ से, और पीते भी तो जाते कहाँ? फिर वह तो रेलगाड़ी पर न चढ़ने थे, कल का पानी न पीते थे, अंग्रेजी पढ़ना पाप समझते थे। समय कितना बदल गया है। समय के साथ अगर नहीं चल सकते, तो वह तुम्हें पीछे छोड़कर चला जायगा। ऐसी महिला के कोमल हाथों से विष भी मिले, तो शिरोधार्य करना चाहिए। जिस सौभाग्य के लिए बड़े-बड़े राजे तरसते हैं; वह आज उनके सामने खड़ा है। क्या वह उसे ठुकरा सकते हैं?

    उन्होंने ग्लास ले लिया और सिर झुकाकर अपनी कृतज्ञता दिखाते हुए एक ही साँस में पी गये और तब लोगों को गर्व भरी आँखों से देखा, मानो कह रहे हों, अब तो आपको मुझ पर विश्वास आया। क्या समझते हैं, मैं निरा पोंगा पण्डित हूँ। अब तो मुझे दम्भी और पाखण्डी कहने का माहस नहीं कर सकते?

    हाल में ऐसा शोर-गुल मचा कि कुछ न पूछो, जैसे पिटारे में बन्द क़हक़हे निकल पड़े हों। वाह देवीजी! क्या कहना है! कमाल है मिस मालती, कमाल है! तोड़ दिया, नमक का क़ानून तोड़ दिया, धर्म का किला तोड़ दिया, नेम का घड़ा फोड़ दिया!

    ओंकारनाथ के कंठ के नीचे शराब का पहुंचना था कि उनकी रसिकता वाचाल हो गयी। मुस्कराकर बोले––मैंने अपने धर्म की थाती मिस मालती के कोमल हाथों में सौंप दी और मुझे विश्वास है, वह उसकी यथोचित रक्षा करेंगी। उनके चरण-कमलों के इस प्रसाद पर मैं ऐसे एक हजार धर्मो को न्योछावर कर सकता हूँ।

    क़हकहों में हाल गूँज उठा।

    सम्पादकजी का चेहरा फ़ूल उठा था, आँखें झुकी पड़ती थीं। दूसरा ग्लास भरकर बोले––यह मिस मालती की सेहत का जाम है। आप लोग पियें और उन्हें आशीर्वाद दें।

    लोगों ने फिर अपने-अपने ग्लास खाली कर दिये।

    उसी वक्त मिर्ज़ा खुर्शद ने एक माला लाकर सम्पादकजी के गले में डाल दी और बोले––सज्जनो, फ़िदवी ने अभी अपने पूज्य सदर साहब की शान में एक क़सीदा कहा है। आप लोगों की इजाज़त हो तो सुनाऊँ।

    चारों तरफ से आवाजें आयीं––हाँ-हाँ, जरूर सुनाइए।

    ओंकारनाथ भंग तो आये दिन पिया करते थे और उनका मस्तिष्क उसका अभ्यस्त हो गया था, मगर शराब पीने का उन्हें यह पहला अवसर था। भंग का नशा मन्थर गति से एक स्वप्न की भाँति आता था और मस्तिष्क पर मेघ के समान छा जाता था। उनकी चेतना बनी रहती थी। उन्हें खुद मालूम होता था कि इस समय उनकी वाणी बड़ी लच्छेदार है, और उनकी कल्पना बहुत प्रबल। शराब का नशा उनके ऊपर सिंह की भाँति झपटा और दबोच बैठा। वह कहते कुछ हैं, मुँह से निकलता कुछ है। फिर यह ज्ञान भी जाता रहा। वह क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसकी सुधि ही न रही। यह स्वप्न का रोमानी वैचित्र्य न था, जागृति का वह चक्कर था, जिसमें साकार निराकार हो जाता है।

    न जाने कैसे उनके मस्तिष्क में यह कल्पना जाग उठी कि क़सीदा पढ़ना कोई बड़ा अनुचित काम है। मेज़ पर हाथ पटककर बोले––नहीं, कदापि नहीं। यहाँ कोई क़सीदा नयी ओगा, नयी ओगा। हम सभापति हैं। हमारा हुक्म है। हम अबी इस सबा को तोड़ सकते हैं। अबी तोड़ सकते हैं। सभी को निकाल सकते हैं। कोई हमारा कुछ नहीं कर सकता। हम सभापति हैं। कोई दसरा सभापति नयी है।

    मिर्जा़ ने हाथ जोड़कर कहा––हुजूर, इस क़सीदे में तो आपकी तारीफ़ की गयी है।