चन्द्रकान्ता सन्तति 6
भरतसिंह की कथा समाप्त होने के बाद दरबार बर्खास्त किया गया और महाराज ने हुक्म दिया कि "कल के दरबार में दलीपशाह अपना किस्सा बयान करेंगे।"
11
दूसरे दिन पुनः उसी ढंग का दरबार लगा और सब लोग अपने-अपने ठिकाने पर बैठ गये।
इशारा पाकर दलीपशाह उठ खड़ा हुआ और उसने अपने चेहरे पर नकाब हटाकर दारोगा, जयपाल, बेगम और नागर वगैरह की तरफ देखकर कहा-
दलीपशाह-आप लोगों की खुशकिस्मती का जमाना तो बीत गया, अब वह जमाना आ गया है कि आप लोग अपने किये का फल भोगें और देखें कि आपने जिन लोगों को जहन्नुम में पहुँचाने का बीड़ा उठाया था आज ईश्वर की कृपा से वे ही लोग आपको हँसते-खेलते दिखाई देते हैं । खैर, मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं, इसका निपटारा तो महाराज की आज्ञा से होगा, मुझे अपना किस्सा बयान करने का हुक्म हुआ है सो बयान
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, बीसवाँ भाग, चौथा बयान । करता हूँ। (और लोगों की तरफ देखकर) मेरे किस्से से भूतनाथ का भी बहुत ही बड़ा सम्बन्ध है, मगर इस खयाल से कि महाराज ने भूतनाथ का कसूर माफ करके उसे अपना ऐयार बना लिया है, मैं अपने किस्से में उन बातों का जिक्र छोड़ता जाऊँगा जिनसे भूतनाथ की बदनामी होती है, इसके अतिरिक्त भूतनाथ प्रतिज्ञानुसार महाराज के आगे पेश करने लिए स्वयं अपनी जीवनी लिख रहा है जिससे महाराज को पूरा-पूरा हाल मालूम हो जायगा, अतः अब मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
मैं मिर्जापुर के रहने वाले दीनदयालसिंह ऐयार का लड़का हूँ । मेरे पिता महा- राज धौलपुर के यहां रहते थे और वहाँ उनकी बहुत इज्जत और कदर थी। उन्होंने मुझे ऐयारी सिखाने में किसी तरह की त्रुटि नहीं की। जहाँ तक हो सका, दिल लगाकर मुझे ऐयारी सिखाई और मैं भी इस फन में खूब हो शियार हो गया, परन्तु पिता के मरने के बाद मैंने किसी रियासत में नौकरी नहीं की। मुझे अपने पिता की जगह मिलती थी और महाराज मुझे बहुत चाहते थे, मगर मैंने पिता के मरने के साथ ही रियासत छोड़ दी और अपने जन्म-स्थान मिर्जापुर में चला आया क्योंकि मेरे पिता मेरे लिए बहुत दौलत छोड़ गये थे और मुझे खाने-पीने की कुछ परवाह न थी। पिता के देहान्त के साल भर पहले ही मेरी माँ मर चुकी थी, अतएव केवल मैं और मेरी स्त्री दो आदमी अपने घर के मालिक थे।
जमानिया की रियासत से मुझे किसी तरह का सम्बन्ध नहीं था, परन्तु इसलिए कि मैं एक नामी ऐयार का लड़का और खुद भी ऐयार था तथा बहुत से ऐयारों से गहरी जान-पहचान रखता था, मुझे चारों तरफ की खबरें बराबर मिला करती थीं, इसी तरह जामानिया में जो कुछ चालवाजियाँ हुआ करती थीं, वे भी मुझसे छिपी हुई न थीं। भूतनाथ की और मेरी स्त्री आपस में मौसेरी बहिनें होती हैं और भूतनाथ का जमानिया से बहुत घना संबंध हो गया था, इसलिए जमानिया का हाल जानने के लिए मैं उद्योग भी किया करता था, मगर उसमें किसी तरह का दखल नहीं देता था। (दारोगा की तरफ इशारा करके)इस हरामखोर दारोगा ने रियासत पर अपना दबाव डालने की नीयत से विचित्र ढोंग रच लिया था, शादी नहीं की थी और बाबाजी तथा ब्रह्मचारी के नाम से अपने को प्रसिद्ध कर रखा था, बल्कि मौके मौके पर लोगों को कहा करता था कि मैं तो साधू आदमी हूँ, मुझे रुपये-पैसे की जरूरत ही क्या है, मैं तो रियासत की भलाई और परोपकार में अपना समय बिताना चाहता हूँ, इत्यादि । परन्तु वास्तव में यह परले सिरे का ऐयाश, बदमाश और लालची था जिसके विषय में कुछ विशेष कहना मैं पसन्द नहीं करता।
मेरे पिता और इन्द्रदेव के पिता दोनों दिली दोस्त और ऐयारी में एक ही गुरु के शिष्य थे, अत एव मुझमें और इन्द्रदेव में भी उसी प्रकार की दोस्ती और मुहब्बत थी। इसलिए मैं प्रायः इन्द्रदेव से मिलने के लिए उनके घर जाया करता और कभी-कभी वे भी मेरे घर आया करते थे । जरूरत पड़ने पर इन्द्रदेव की इच्छानुसार मैं उनका कुछ काम कर दिया करता और उन्हीं के यहाँ कभी-कभी इस कम्बख्त दारोगा से भी मुलाकात हो जाया करती थी, बल्कि कहना चाहिए कि इन्द्रदेव ही के सबब से दारोगा, जयपाल राजा गोपालसिंह और भरतसिंह तथा जमानिया के और भी कई नामी आदमियों में मेरी मुलाकात ओर साहब-सलामत हो गई थी।
जब भूतनाथ के हाथ से बेचारा दयाराम मारा गया, तब से मुझमें और भूतनाथ में एक प्रकार की खिचाखिची हो गई थी और वह खिचाखिंची दिनों-दिन बढ़ती ही गई यहाँ तक कि कुछ दिनों बाद हम दोनों की साहब-सलामत भी छूट गई।
एक दिन मैं इन्द्रदेव के यहाँ बैठा हुआ भूतनाथ के विषय में बातचीत कर रहा था, क्योंकि उन दिनों यह खबर बड़ी तेजी के साथ मशहूर हो रही थी कि 'गदाधरसिंह (भूतनाथ)मर गया।" परन्तु उस समय इन्द्रदेव इस बात पर जोर दे रहे थे कि भूतनाथ मरा नहीं, कहीं छिपकर बैठ गया है, कभी न कभी यकायक प्रकट हो जायगा। इसी समय दारोगा के आने की इत्तिला मिली जो बड़ी शान-शौकत के साथ इन्द्रदेव से मिलने के लिए आया था। इन्द्रदेव बाहर निकल कर बड़ी खातिर के साथ इसे घर के अन्दर ले गये और अपने आदमियों को हुक्म दे गये कि दारोगा के साथ जो आदमी आये हैं उनके खाने-पीने और रहने का उचित प्रबन्ध किया जाय।
दारोगा को साथ लिए हुए इन्द्रदेव उसी कमरे में आये जिसमें मैं पहले ही से बैठा हुआ था, क्योंकि इन्द्रदेव की तरह मैं दारोगा को लेने के लिए मकान के बाहर नहीं गया था और न दारोगा के आ पहुँचने पर मैंने उठकर इसकी इज्जत ही बढ़ाई, हाँ, साहब-सलामत जरूर हुई । यह बात दारोगा को बहुत ही बुरी मालूम हुई, मगर इन्द्रदेव को नहीं, क्योंकि इन्द्रदेव गुरुभाई का सिर्फ नाता निबाहते थे, दिल से दारोगा की खातिर नहीं करते थे।
इन्द्रदेव से और दारोगा से देर तक तरह-तरह की बातें होती रहीं, जिसमें मौके- मौके पर दारोगा अपनी होशियारी और बुद्धिमानी की तस्वीर खींचता रहा। जब ऐयारों की कहानी छिड़ी तो वह यकायक मेरी तरफ पलट पड़ा और बोला, "आप इतने बड़े ऐयार के लड़के होकर घर में बेकार क्यों बैठे हैं ? और नहीं तो मेरी ही रियासत में काम कीजिए, यहां आपको बहुत आराम मिलेगा, देखिये बिहारीसिंह और हरनामसिंह कैसी इज्जत और खुशी के साथ रहते हैं, आप तो उनसे ज्यादा इज्जत के लायक हैं।"
मैं–मैं बेकार तो बैठा रहता हूँ, मगर अभी तक अपने को महाराज धौलपुर का नौकर समझता हूँ, क्योंकि रियासत का काम छोड़ देने पर भी वहाँ से मुझे खाने को बरा- बर मिल रहा है।
दारोगा–(मुंह बनाकर)अजी, मिलता भी होगा तो आखिर क्या, एक छोटी-सी रकम से आपका क्या काम चल सकता है ? आखिर अपने पल्ले की जमा तो खर्च करते ही होंगे।
मैं–यह भी तो महाराज का ही दिया हुआ है!
दारोगा–नहीं, वह आपके पिता का दिया हुआ है। खैर, मेरा मतलब यह है कि वहाँ से अगर कुछ मिलता है तो उसे भी ऑप रखिये और मेरी रियासत से भी फायदा उठाइए।
मैं–ऐसा करना बेईमानी और नमकहरामी कहा जायगा और यह मुझसे न हो सकेगा। दारोगा–(हँसकर) वाह याह ! ऐयार लोग दिन-रात ईमानदारी की हँडिया ही तो चढ़ाए रहते हैं!
मैं–(तेजी के साथ) बेशक ! अगर ऐसा नहीं तो वह ऐयार नहीं, रियासत का कोई ओहदेदार कहा जायगा!
दारोगा–(तनकर) ठीक है ! गदाधरसिंह आप ही का नातेदार तो है, जरा उसकी तस्वीर तो खींचिये!
मैं–गदाधरसिंह किसी रियासत का ऐयार नहीं है और न मैं उसे ऐयार समझता हूँ इतना होने पर भी आप यह नहीं साबित कर सकते कि उसने अपने मालिक के साथ किसी तरह की बेईमानी की।
दारीगा—(और भी तुनक के) बस-बस-बस, रहने दीजिये। हमारे यहां भी बिहारीसिंह और हरनामसिंह ऐयार ही तो हैं।
मैं—इसी से तो मैं आपकी रियासत में जाना बेइज्जती समझता हूं।
दारोगा–(भौंह सिकोड़कर) तो इसका यह मतलब कि हम लोग बेईमान और नमकहराम हैं!
मैं-(मुस्कराकर) इस बात को तो आप ही सोचिये!
दारोगा–देखिये, जुबान संभालकर बात कीजिए, नहीं तो समझ लीजिए कि मैं मामूली आदमी नहीं हूँ।
मैं–(क्रोध से) यह तो मैं खुद कहता हूँ कि आप मामूली आदमी नहीं हैं क्योंकि आदमी में शर्म होती है और वह जानता है कि ईश्वर भी कोई चीज है।
दारोगा–(क्रोध-भरी आँखें दिखाकर) फिर वही बात!
मैं–हाँ वही बात ! गोपालसिंह के पिता वाली बात ! गुप्त कमेटी वाली बात, गदाधरसिंह की दोस्ती वाली बात ! लक्ष्मीदेवी की शादी वाली बात और जो बात कि आपके गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है वह बात!
दारोगा–(दांत पीसकर और कुछ देर मेरी तरफ देखकर) खैर, अब इस बहुत- सी बात का जवाब लात ही से दिया जायगा।
मैं–बेशक, और साथ ही इसके यह भी समझ रखिए कि जवाब देने वाले भी एक-दो नहीं हैं, लातों की गिनती भी आप न सम्हाल सकेंगे । दारोगा साहब, जरा होश में आइए और सोच-विचार कर बातें कीजिए । अपने को आप ईश्वर न समझिए, बल्कि यह समझकर बातें कीजिए कि आप आदमी हैं और रियासत धौलपुर के किसी ऐयार से बातें कर रहे हैं।
दारोगा–(इन्द्रदेव की तरफ आँखें तरेरकर)क्या आप चुपचाप बैठे तमाशा देखेंगे और अपने मकान में मुझे बेइज्जत करावेंगे?
इन्द्रदेव–आप तो खुद ही अपनी अनोखी मिलनसारी से अपने को बेइज्जत करा रहे हैं, इनसे बात बढ़ाने की आपको जरूरत ही क्या थी ? मैं आप दोनों के बीच में नहीं क्योंकि दलीपशाह को भी अपना भाई समझता और इज्जत की निगाह से बोल सकता, देखता हूँ। दारोगा तो फिर जैसे बने, हम इनसे निपट लें! इन्द्रदेव–हाँ-हाँ !
दारोगा–पीछे उलाहना न देना, क्योंकि आप इन्हें अपना भाई समझते हैं!
इन्द्रदेव–मैं कभी उलाहना न दूंगा।
दारोगा–अच्छा तो अब मैं जाता हूँ, फिर कभी मिलूंगा तो बातें करूंगा!
इन्द्रदेव ने इस बात का कुछ भी जवाब न दिया। हां, जब दारोगा साहब वहाँ से बिदा हुए तो उन्हें दरवाजे तक पहुंचा आये । जब लौटकर कमरे में मेरे पास आये तो मुस्कुराते हुए बोले, “आज तो तुमने इसकी खूब खबर ली। 'जो बात तुम्हारे गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है, वही बात' इन शब्दों ने तो उसका कलेजा छेद दिया होगा। मगर तुमसे बेहतर रंज होकर गया है, इस बात का खूब खयाल रखना।"
मैं–आप इस बात की चिन्ता न कीजिए, देखिए मैं इन्हें कैसे छकाता हूँ। मगर वाह रे आपका कलेजा ! इतना कुछ हो जाने पर भी आपने अपनी जुबान से कुछ न कहा, बल्कि पुराने बर्ताव में बल तक न पड़ने दिया !
इन्द्रदेव–मैंने तो अपना मामला ईश्वर के हवाले कर दिया है।
मैं-खैर, ईश्वर अवश्य इन्साफ करेगा। अच्छा तो अब मुझे भी बिदा कीजिए, क्योंकि अब इसके मुकाबले का बन्दोबस्त शीघ्र करना पड़ेगा।
इन्द्रदेव–यह तो मैं फिर कहूँगा कि आप बेफिक्र न रहिए । थोड़ी देर तक और बातचीत करने के बाद मैं इन्द्रदेव से बिदा होकर अपने घर आया और उसी समय से दारोगा के मुकाबले का ध्यान मेरे दिमाग में चक्कर लगाने लगा।
घर पहुँचकर मैंने सब हाल अपनी स्त्री से बयान किया और ताकीद की कि हरदम होशियार रहा करना। उन दिनों मेरे यहाँ कई शागिर्द भी रहा करते थे, जिन्हें मैं ऐयारी सिखाता था। उनसे भी यह सब हाल कहा और होशियार रहने की ताकीद की। उन शागिर्दो में गिरिजाकुमार नाम का एक लड़का बड़ा ही तेज और चंचल था, लोगों को धोखे में डाल देना तो उसके लिए मामूली बात थी। बातचीत के समय वह अपना चेहरा ऐसा बना लेता था कि अच्छे-अच्छे उसकी बातों में फंसकर बेवकूफ बन जाते थे। यह गुण उसे ईश्वर का दिया हुआ था जो बहुत कम ऐयारों में पाया जाता है । अतः गिरिजाकुमार ने मुझसे कहा कि "गुरुजी, यदि दारोगा वाला मामला आप मेरे सुपुर्द कर दीजिए, तो मैं बहुत ही प्रसन्न होऊँगा और उसे ऐसा छकाऊँगा कि वह भी याद करे । जमानिया में मुझे कोई पहचानता भी नहीं है, अतएव मैं अपना काम बड़े मजे में निकाल लूंगा।"
मैंने उसे समझाया और कहा कि "कुछ दिन सब्र करो, जल्दी क्यों करते हो, फिर जैसा मौका होगा किया जायेगा।" मगर उसने एक न मानी । हाथ जोड़कर और खुशामद करके, गिड़गिड़ा करके, जिस तरह हो सका, उसने आज्ञा ले ही ली और उसी दिन सब सामान दुरुस्त करके मेरे यहां से चला गया।
अब मैं थोड़ा-सा हाल गिरिजाकुमार का बयान करूंगा कि इसने दारोगा के साथ क्या किया। आप लोगों को यह बात सुनकर ताज्जुब होगा कि मनोरमा असल में दारोगा साहब की रण्डी है। इन्हीं की बदौलत मायारानी के दरबार में उसकी इज्जत बढ़ी और इन्हीं की बदौलत उसने मायारानी को अपने फन्दे में फंसाकर बे-हिसाब दौलत पैदा की। पहले-पहल गिरिजाकुमार ने मनोरमा के मकान पर ही दारोगा से मुलाकात की थी।
दारोगा साहब मनोरमा से प्रेम रखते थे सही, मगर इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रेम और ऐयाशी को इन्होंने बहुत अच्छे ढंग से छिपाया और बहुत आदमियों को मालूम न होने दिया तथा लोगों की निगाहों में साधु और ब्रह्मचारी ही बने रहे। स्वयं तो जमानिया में रहते थे, मगर मनोरमा के लिए इन्होंने काशी में एक मकान भी बनवा दिया था, दसवें-बारहवें दिन अथवा जब कभी समय मिलता, तेज घोड़े पर या रथ पर सवार होकर काशी चले जाते और दस-बारह घण्टे मनोरमा के मेहमान रहकर लौट जाते।
एक दिन दारोगा साहब आधी रात के समय मनोरमा के खास कमरे में बैठे हुए उसके साथ शराब पी रहे थे और साथ-ही-साथ हँसी-दिल्लगी का आनन्द भी लूट रहे थे। उन समय इन दोनों में इस तरह की बातें हो रही थीं-
दारोगा-जो कुछ मेरे पास है, सब तुम्हारा है । रुपये-पैसे के बारे में तुम्हें कभी तकलीफ न होने दूंगा! तुम बेशक अमीराना ठाठ के साथ रहो और खुशी से जिन्दगी विताओ, गोपालसिंह अगर तिलिस्म का राजा है तो क्या हुआ, मैं भी तिलिस्म का दारोगा हूँ, उसमें दो-चार स्थान ऐसे हैं कि जिनकी खबर राजा साहब को भी नहीं, मगर मैं वहाँ बखूबी जा सकता हूँ और वहाँ की दौलत को अपनी मिल्कियत समझता हूँ। इसके अति- रिक्त मायारानी से भी मैंने तुम्हारी मुलाकात करा दी है और वह भी हर तरह से तुम्हारी खातिर करती ही है, फिर तुम्हें परवाह किस बात की है?
मनोरमा–बेशक मुझे किसी बात की परवाह नहीं है और आपकी बदौलत मैं बहुत खुश रहती हूँ, मगर मैं यह चाहती हूँ कि मायाराती के पास खुल्लम-खुल्ला मेरी आमद-रफ्त हो जाये । अभी गोपालसिंह के डर से बहुत लुक-छिपकर और नखरे-तिल्ले के साथ जाना पड़ता है।
दारोगा–फिर यह तो जरा मुश्किल बात है।
मनोरमा–मुश्किल क्या है ? लक्ष्मीदेवी की जगह दूसरी औरत को राजरानी बना देना क्या साधारण काम था? सो तो आपने सहज ही में कर दिखाया और इस एक सहज काम के लिए कहते हैं कि मुश्किल है!
दारोगा–(मुस्कराकर) सो तो ठीक है, गोपालसिंह को मैं सहज में वैकुण्ठ पहुंचा सकता हूँ, मगर यह काम मेरे करने पर भी न हो सकेगा, उसके ऊपर मेरा हाथ सहज ही न उठेगा।
मनोरमा–(तिनककर)अब इतनी रहम-दिली से तो काम नहीं चलेगा ! उसके मौजूद रहने से बहुत बड़ा हर्ज हो रहा है । अगर वह न रहें, तो बेशक आप खुद ही जमानिया और तिलिस्म का राज्य कर सकते हैं, मायारानी तो अपने को आपका तावे- दार समझती है।
दारोगा–बेशक ऐसा ही है, मगर
मनोरमा–और इसमें आपको कुछ करना भी न पड़ेगा, सब काम मायारानी
ठीक कर लेंगी।
दारोगा-(चौंककर) क्या मायारानी का भी ऐसा इरादा है?
मनोरमा—जी हाँ, वह इस काम के लिए तैयार हैं, मगर आपसे डरती हैं, आप आज्ञा दें, तो सब-कुछ ठीक हो जाये।
दारोगा–तो तुम उसी की तरफ से इस बात की कोशिश कर रही हो?
मनोरमा–बेशक ! साथ ही इसमें आपका और अपना भी फायदा समझती हूँ, तब ऐसा कहती हूँ। (दारोगा के गले में हाथ डालकर) बस, आप आज्ञा दे दीजिए।
दारोगा–(मुस्कराकर) खैर, तुम्हारी खातिर मुझे मंजूर है, मगर एक काम करना कि मायारानी से और मुझसे इस बारे में बातचीत न कराना, जिसमें मौका पड़े तो मैं यह कहने के लायक रह जाऊँ कि मुझे इसकी कुछ भी खबर नहीं । तुम मायारानी की दिलजमई करा दो कि दारोगा साहब इस बारे में कुछ भी न बोलेंगे, तुम जो कुछ चाहो कर गुजरो, मगर साथ ही इसके इस बात का खयाल रखो कि सर्वसाधारण को किसी तरह का शक न होने पाये और लोग ये समझें कि गोपालसिंह अपनी मौत ही मरा है। मैं भी जहां तक हो सकेगा, छिपाने की कोशिश करूँगा।
मनोरमा–(खुश होकर) बस, अब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि तुम मुझसे सच्चा प्रेम रखते हो।
इसके बाद दोनों में बहुत ही धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगीं, जिन्हें गिरिजाकुमार सुन न सका। गिरिजाकुमार चोरों की तरह उस मकान में घुस गया था और छिपकर ये बातें सुन रहा था। जब मनोरमा ने कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया, तब वह कमन्द लगाकर मकान के पीछे की तरफ उतर गया और धीरे-धीरे मनोरमा के अस्तबल में जा पहुँचा । अबकी दफे दारोगा यहाँ रथ पर सवार होकर आया था, वह रथ अस्तबल में था, घोड़े बंधे हुए थे और सारथी रथ के अन्दर सो रहा था। इससे कुछ दूर पर मनोरमा के और सब साईस तथा घसियारे वगैरह पड़े खर्राटे ले रहे थे।
बहुत होशियारी से गिरिजाकुमार ने दारोगा के सारथी को बेहोशी की दवा सुंघाकर बेहोश किया और उठाकर बाग के एक कोने में घनी झाड़ी के अन्दर छिपाकर रख आया, उसके कपड़े पहन लिए और चुपचाप रथ के अन्दर घुसकर सो रहा।
जब रात घण्टा–भर के लगभग बाकी रह गई, तब दारोगा साहब जमानिया जाने के लिए बिदा हुए और एक लौंडी ने अस्तबल में आकर रथ जोतने की आज्ञा सुनाई। नये सारथी अर्थात् गिरिजाकुमार ने रथ जोतकर तैयार किया और फाटक पर लाकर दारोगा साहब का इन्तजार करने लगा। शराब के नशे में चूर झूमते हुए एक लौंडी का हाथ थामे हुए दारोगा साहब भी आ पहुंचे। उनके रथ पर सवार होने के साथ ही रथ तेजी के साथ रवाना हुआ। सुबह की ठण्ठी हवा ने दारोगा साहब के दिमाग में खुनकी पैदा कर दी और वे रथ के अन्दर लेटकर बेखबर सो गये। गिरिजाकुमार ने जिधर चाहा, घोड़ों का मुंह फेर दिया और दारोगा साहब को लेकर रवाना हो गया। इस तौर पर उसे सूरत बदलने की भी जरूरत न पड़ी। नहीं कह सकते कि मनोरमा के बाग में दारोगा का असली सारथी जब होश में आया होगा तो वहाँ कैसी खलबली मची होगी, मगर गिरिजाकुमार को इस बात की कुछ भी परवाह न थी, उसने रथ को रोहतासगढ़ की सड़क पर रवाना किया और चलते-चलते अपने बटुए में से मसाला निकालकर अपनी सूरत साधारण ढंग पर बदल ली, जिसमें होश आने पर दारोगा उसकी सूरत से जानकार न हो सके। इसके बाद उसने तेज दवा सुंघाकर दारोगा को और भी बेहोश कर दिया।
जब रथ एक घने जंगल में पहुंचा और सुबह की सफेदी भी निकल आई, तब गिरिजाकुमार रथ को सड़क पर से हटाकर जंगल में ले आया, जहां सड़क पर चलने वाले मुसाफिरों की निगाह न पड़े। घोड़ों को खोल लम्बी बागडोर के सहारे एक पेड़ के साथ बाँध दिया और दारोगा को पीठ पर लाद वहाँ से थोड़ी दूर पर एक घनी झाड़ी के अन्दर ले गया, जिसके पास ही एक पानी का झरना भी बह रहा था। घोड़े की रास से दारोगा साहब को एक पेड़ के साथ बांध दिया और बेहोशी दूर करने की दवा सुंघाने के बाद थोड़ा पानी भी चेहरे पर डाला, जिसमें शराब का नशा ठण्डा हो जाये और तब हाथ में कोड़ा लेक र सामने खड़ा हो गया।
दारोगा साहब जब होश में आये तो बड़ी परेशानी के साथ चारों तरफ निगाह दौड़ाने लगे। अपने को मजबूर और एक अनजान आदमी को हाथ में कोड़ा लिए सामने खड़ा देख काँप उठे और बोले, "भाई, तुम कौन हो और मुझे इस तरह क्यों सता रखा है ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?"
गिरिजाकुमार–क्या करूँ, लाचार हूँ । मालिक का हुक्म ही ऐसा है।
दारोगा–तुम्हारा मालिक कौन है और उसने ऐसी आज्ञा तुम्हें क्यों दी?
गिरिजाकुमार–मैं मनोरमाजी का नौकर हूँ, और उन्होंने अपना काम ठीक करने के लिए मुझे ऐसी आज्ञा दी है।
दारोगा–(ताज्जुब से) तुम मनोरमा के नौकर हो ! नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, मैं उसके सब नौकरों को अच्छी तरह पहचानता हूँ।
गिरिजाकुमार–मगर आप मुझे नहीं पहचानते, क्योंकि मैं गुप्त रीति पर उनका काम किया करता हूँ और उनके मकान पर बराबर नहीं रहता!
दारोगा–शायद ऐसा ही हो, मगर विश्वास नहीं होता। खैर, यह बताओ कि उन्होंने किस काम के लिए ऐसा करने को कहा है?
गिरिजाकुमार–आपको विश्वास हो चाहे न हो, इसके लिए मैं लाचार हूँ, हाँ, उनके हुक्म की तामील किए बिना नहीं रह सकता। उन्होंने मुझे यह कहा है कि "दारोगा साहब मायारानी के लिए इस बात की इजाजत दे गये हैं कि वह जिस तरह हो सके, राजा गोपालसिंह को मार डाले, हम इस मामले में कुछ दखल न देंगे, मगर यह बात वह नशे में कह गये हैं, कहीं ऐसा न हो कि भूल जायें । अतः जिस तरह हो सके, तुम इस बात की एक चिट्ठी उनसे लिखाकर मेरे पास आओ, जिसमें उन्हें अपना वादा अच्छी तरह याद रहे।" अब आप कृपाकर इस मजमून की एक चिट्ठी लिख दीजिये कि मैं गोपालसिंह को मार डालने के लिए मायारानी को इजाजत देता हूँ। दारोगा–(ताज्जुब का चेहरा बनाकर) न मालूम तुम क्या कह रहे हो! मैंने मनोरमा से ऐसा कोई वादा नहीं किया!
गिरिजाकुमार–तो शायद मनोरमाजी ने मुझसे झूठ कहा होगा। मैं इस बात को तो नहीं जानता, हाँ, उन्होंने जो आज्ञा दी है सो आपसे कह रहा हूँ।
इतना सुनकर दारोगा कुछ सोच में पड़ गया। मालूम होता था कि उसे गिरिजा- कुमार की बातों पर विश्वास हो रहा है, मगर फिर भी बात को टालना चाहता है।
दारोगा–मगर ताज्जुब है कि मनोरमा ने मेरे साथ बुरा ऐसा बर्ताव क्यों किय और उसे जो कुछ कहना था वह स्वयं मुझसे क्यों नहीं कहा?
गिरिजाकुमा–मैं इस बात का जवाब क्योंकर दे सकता हूँ?
दारोगा–अगर मैं तुम्हारे कहे मुताबिक चिट्ठी लिखकर न दूं तो?
गिरिजाकुमार–तब इस कोड़े से आपकी खबर ली जायेगी और जिस तरह हो सकेगा, आपसे चिट्ठी लिखाई जायेगी। आप खुद समझ सकते हैं कि यहाँ आपका कोई मददगार नहीं पहुंच सकता।
दारोगा–क्या तुमको या मनोरमा को इस बात का कुछ भी खयाल नहीं है कि चिट्ठी लिखकर भी छूट जाने के बाद मैं क्या कर सकता हूँ?
गिरिजाकुमार–अब ये सब बातें तो आप उन्हीं से पूछियेगा ! मुझे जवाब देने की कोई जरूरत नहीं। मैं सिर्फ उनके हुक्म की तामील करना जानता हूँ । बताइए आप जल्दी चिट्ठी लिख देते हैं या नहीं, मैं ज्यादा देर तक इन्तजार नहीं कर सकता।
दारोगा–(झुंझलाकर और यह समझकर कि यह मुझ पर हाथ नहीं उठायेगा, केवल धमकाता है)अबे, मैं चिट्ठी किस बात की लिख दूं!तूनेयहव्यर्थ की बकवक लगा रखी है!
इतना सुनते ही गिरिजाकुमार ने कोड़े जमाने शुरू किए । पाँच-सात ही कोड़े खाकर दारोगा बिलबिला उठा और हाथ जोड़कर बोला, "बस-बस, माफ करो, जो कुछ कहो, मैं लिख देने को तैयार हूं!"
गिरिजाकुमार ने झट कलम-दवात और कागज अपने बटुए में से निकालकर दारोगा के सामने रख दिया और उसके हाथ की रस्सी ढीली कर दी। दारोगा ने उसकी इच्छानुसार चिट्ठी लिख दी। चिट्ठी को अपने कब्जे में कर लेने के बाद उसने दारोगा की तलाशी ली, कमर में खंजर और कुछ अशर्फियाँ निकलीं, वह भी ले लेने के बाद दारोगा के हाथ-पैर खोल दिए और बता दिया कि फलां जगह आपके रथ और घोड़े खड़े हैं, जाइए, सीधे कस-कसाकर अपने घर का रास्ता लीजिए।
इतना कहकर गिरिजाकुमार चला गया और फिर दारोगा को मालूम न हुआ कि वह कहाँ गया और क्या हुआ।
च० स०-6-11
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इतना किस्सा कहकर दिलीपशाह ने दम लिया और फिर इस तरह कहना शुरू किया-
"गिरिजाकुमार ने अपना काम करके दारोगा का पीछा नहीं छोड़ा, बल्कि उसे यह जानने का शौक पैदा हुआ कि देखें, अब दारोगा साहब क्या करते हैं। जमानिया की तरफ विदा होते हैं, या पुनः मनोरमा के घर जाते हैं, या अगर मनोरमा के घर जाते हैं तो देखना चाहिए कि किस ढंग की बातें होती हैं और कैसी रंगत निकलती है।"
यद्यपि दारोगा का चित्त दुविधा में पड़ा हुआ था, परन्तु उसे इस बात का कुछ- कुछ विश्वास जरूर हो गया था कि मेरे साथ ऐसा खोटा बर्ताव मनोरमा ने ही किया है, दूसरे किसी को क्या मालूम है कि मुझमें उसमें किस समय क्या बातें हुई ! मगर साथ ही इसके वह इस बात को भी जरूर सोचता था कि मनोरमा ने ऐसा क्यों किया? मैं तो कभी उसकी बात से किसी तरह इनकार नहीं करता था। जो कुछ भी उसने कहा, उस बात की इजाजत तुरन्त दे दी, अगर वह चिट्ठी लिख देने के लिए कहती तो चिट्ठी भी लिख देता, फिर उसने ऐसा क्यों किया ..?
खैर, जो कुछ भी हो, दारोगा साहब अपने हाथ से रथ जोतकर सवार हुए और भनोरमा के पास न जाकर सीधे जमानिया की तरफ रवाना हो गये। यह देखकर गिरिजा- कुमार ने उस समय उनका पीछा छोड़ दिया और मेरे पास चला आया। जो कुछ मामला हुआ था, खुलासा बयान करने के बाद दारोगा साहब की लिखी हुई चिट्ठी दी और फिर मुझसे विदा होकर जमानिया की तरफ चला गया।
मुझे यह जानकर हौल-सी पैदा हो गई कि बेचारे गोपालसिंह की जान मुफ्त ही जाना चाहती है । मैं सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए, जिसमें गोपालसिंह की जान बचे। एक दिन और रात तो इसी सोच में पड़ा रह गया और अन्त में यह निश्चय किया कि इन्द्रदेव से मिलकर यह सब हाल कहना चाहिए। दूसरा दिन मुझे घर का इन्त- जाम करने में लग गया, क्योंकि दारोगा की दुश्मनी के खयाल से मुझे घर की हिफाजत का पूरा-पूरा इन्तजाम करके ही तब बाहर जाना जरूरी था, अतः मैंने अपनी स्त्री और बच्चे को गुप्त रीति से अपनी ससुराल अर्थात् स्त्री के माँ-धाप के घर पहुंचा दिया और उन लोगों को जो कुछ समझाना था, सो भी समया दिया। इसके बाद घर का इन्तजाम करके इन्द्रदेव की तरफ रवाना हुआ।
जब इन्द्रदेव के मकान पर पहुंचा तो देखा कि वे सफर की तैयारी कर रहे हैं। पूछने पर जवाब मिला कि गोपालसिंह बीमार हो गये हैं, उन्हें देखने के लिए ही जाते हैं । सुनने के साथ ही मेरा दिल धड़क उठा और मेरे मुंह से ये शब्द निकल पड़े-"हाय, अफसोस ! कम्बख्त दुश्मन लोग अपना काम कर गये!"
मेरी बात सुनकर इन्द्रदेव चौंक पड़े और उन्होंने पूछा, "आपने 'यह क्या कहा?" दो-चार खिदमतगार वहां मौजूद थे। उन्हें बिदा करके मैंने गिरिजाकुमार का सब हाल इन्द्रदेव से बयान किया और दारोगा साहब की लिखी हुई वह चिट्ठी उनके हाथ पर रख दी। उसे देखकर और सब हाल सुनकर इन्द्रदेव बेचैन हो गए, आधे घण्टे तक तो ऐसा मालूम होता था कि उन्हें तन-बदन की सुध नहीं है इसके बाद उन्होंने अपने को सम्हाला और मुझसे कहा-"बेशक, दुश्मन लोग अपना काम कर गए, मगर तुमने भी बहुत बड़ी भूल की, कि दो दिन की देर कर दी और आज मेरे पास खबर करने के लिए आये ! अभी दो ही घड़ी बीती हैं कि मुझे उनके बीमार होने की खबर मिली है, ईश्वर ही कुशल करें!"
इसके जवाब में चुप रह जाने के सिवाय मैं कुछ भी न बोल सका और अपनी भूल स्वीकार कर ली। कुछ और बातचीत होने के बाद इन्द्रदेव ने मुझसे कहा, "खैर, जो कुछ होना था सो हो गया, अब तुम भी मेरे साथ जमानिया चलो, वहाँ पहुँचने तक अगर ईश्वर कुशल रखी तो जिस तरह बन पड़ेगा, उनकी जान बचायेंगे!"
अतः हम दोनों आदमी तेज घोड़ों पर सवार होकर जमानिया की तरफ रवाना हो गये और साथियों को पीछे से आने की ताकीद कर गए।
जब हम लोग जमानिया के करीब पहुँचे और जमानिया सिर्फ दो कोस की दूरी पर रह गया तो सामने से कई देहाती आदमी रोते और चिल्लाते हुए आते दिखाई पड़े। हम लोगों ने घबराकर रोने का सबब पूछा तो उन्होंने हिचकियाँ लेकर कहा कि हमारे राजा गोपालसिंह हम लोगों को छोड़कर बैकुण्ठ चले गये।
सुनने के बाद हम लोगों का कलेजा धक् हो गया। आगे बढ़ने की हिम्मत न पड़ी और सड़क के किनारे एक घने पेड़ के नीचे जाकर घोड़ों पर से उतर पड़े। दोनों घोड़ों को पेड़ के साथ बांध दिया और जीनपोश बिछाकर बैठ गये, आँखों से आंसू की धारा बहने लगी। घण्टे भर तक हम दोनों में किसी तरह की बातचीत न हुई, क्योंकि चित्त बड़ा ही दुःखी हो गया था। उस समय दिन अनुमान तीन घण्टे के करीब बाकी था। हम दोनों आदमी पेड़ के नीचे बैठे आंसू बहा रहे थे कि यकायक जमानिया से लौटता हुआ गिरिजा- कुमार भी उसी जगह आ पहुँचा। उस समय उसकी सूरत बदली हुई थी, इसलिए हम लोगों ने तो नहीं पहचाना, परन्तु वह हम लोगों को देखकर स्वयं पास चला आया और अपना गुप्त परिचय देकर बोला, "मैं गिरिजाकुमारहूँ।"
इन्द्रदेव–(आँसू पोंछकर) अच्छे मौके परतुम आ पहुँचे । यह बताओ कि क्या वास्तव में राजा गोपालसिंह मर गये?
गिरिजाकुमार–जी हाँ, उनकी चिता मेरे सामने लगाई गई और देखते-ही- देखते उनकी लाश पंचतत्व में मिल गई, परन्तु अभी तक मेरे दिल को विश्वास नहीं होता कि राजा साहब मर गये।
इन्द्रदेव–(चौंककर) सो क्यों? यह कैसी बात?
गिरिजाकुमार–जी हाँ, हर तरह का रंग-ढंग देखकर मेरा दिल यह कबूल नहीं करता कि वे मर गये।
-क्या तुम्हारी तरह वहाँ और भी किसी को इस बात का शक है?
गिरिजाकुमार–नहीं, ऐसा तो नहीं मालूम होता, बल्कि मैं तो समझता हूँ कि खास दारोगा साहब को भी उनके मरने का विश्वास है, मगर क्या किया जाये. मुझे विश्वास नहीं होता और दिल बार-बार यही कहता है कि राजा साहब मरे नहीं।
इन्द्रदेव–आखिर, तुम क्या सोचते हो और इस बात का तुम्हारे पास क्या सबूत है ? तुमने कौन-सी ऐसी बात देखी, जिससे तुम्हारे दिल को अभी तक उनके मरने का विश्वास नहीं होता?
गिरिजाकुमार–और बातों के अतिरिक्त दो बातें तो बहुत ही ज्यादा शक पैदा करती हैं। एक तो यह है कि कल दो घण्टे रात रहते मैंने हरनामसिंह और बिहारीसिंह को एक कॅगले की लाश उठाये हुए चोर दरवाजे की राह से महल के अन्दर जाते हुए देखा, फिर बहुत टोह लेने पर भी लाश का कुछ पता न लगा और न वह लाश लौटाकर महल के बाहर ही निकाली गई, तो क्या वह महल ही में हजम हो गई ? उसके बाद केवल राजा साहब की लाश बाहर निकली।
इन्द्रदेव–जरूर, यह शक करने की जगह है।
गिरिजाकुमार–इसके अतिरिक्त राजा गोपालसिंह की लाश को बाहर निकालने और जलाने में हद दर्जे की फुर्ती और जल्दबाजी की गई, यहाँ तक कि रियासत के उमरा लोगों के भी इकट्ठा होने का इन्तजार नहीं किया गया। एक साधारण आदमी के लिए भी इतनी जल्दी नहीं की जाती, वे तो राजा ही ठहरे ! हां, एक बात और भी सोचने लायक है। चिता पर नियम के विरुद्ध लाश का मुंह खोले बिना ही क्रिया कर दी गई और इस बारे में बिहारीसिंह और हरनामसिंह तथा लौंडियों ने यह बहाना किया कि "राजा साहब की सूरत देख मायारानी बहुत बेहाल हो जायेंगी, इसलिए मुर्दे का मुंह खोलने की कोई जरूरत नहीं।" और लोगों ने इन बातों पर खयाल किया हो चाहे न किया हो, मगर मेरे दिल पर तो इन वातों ने बहुत बड़ा असर किया और यही सबब है कि मुझे राजा साहब के मरने का विश्वास नहीं होता।
इन्द्रदेव–(कुछ सोचकर) शक तो तुम्हारा बहुत ठीक है, अच्छा यह बताओ कि तुम इस समय कहाँ जा रहे थे?
गिरिजाकुमार–(मेरी तरफ इशारा करके) गुरुजी के पास यही सब हाल कहने के लिए जा रहा था।
मैं–इस समय मनोरमा कहाँ है सो बताओ!
गिरिजाकुमार–जमानिया में मायारानी के पास है। मैं तुम्हारे हाथ से छूटने के बाद दारोगा और मनोरमा में कैसी निपटी इसका कुछ हाल मालूम हुआ?
गिरिजाकुरार–जी हाँ, मालूम हुआ। उस बारे में बहुत बड़ी दिल्लगी हुई जो मैं निश्चिन्ती के साथ बयान करूंगा।
इन्द्रदेव–अच्छा, यह तो बताओ कि गोपालसिंह के बारे में तुम्हारी क्या राय है और अब हम लोगों को क्या करना चाहिए?
गिरिजाकुमार–इस बारे में मैं एक अदना और नादान आदमी आपको क्या राय दे सकता हूँ ! हाँ, मुझे जो कुछ आज्ञा हो सो करने के लिए जरूर तैयार हूँ।
इतनी बातें हो ही रही थी कि सामने जमानिया की तरफ से दारोगा और जयपाल घोड़ों पर सवार आते हुए दिखाई पड़े, जिन्हें देखते ही गिरिजाकुमार ने कहा, "देखिए, ये दोनों शैतान कहीं जा रहे हैं, इसमें भी कोई भेद जरूर है, यदि आज्ञा हो तो मैं इनके पीछे जाऊँ।"
दारोगा और जयपाल को देखकर हम दोनों पेड़ की तरफ घूम गये, जिसमें वे हमें पहचान न सकें। जब वे आगे निकल गए, तब मैंने अपना घोड़ा गिरिजाकुमार को देकर कहा, "तुम जल्द सवार होकर इन दोनों का पीछा करो।" और गिरिजाकुमारने ऐसा ही किया।
चन्द्रकान्ता सन्तति
चौबीसवाँ भाग
1
दिन घंटे भर से ज्यादा चढ़ चुका है। महाराज सुरेन्द्रसिंह सुनहरी चौकी पर बैठे दातुन कर रहे हैं और जीतसिंह, तेजसिंह, इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ और राजा गोपालसिंह उनके सामने की तरफ बैठे हुए इधर-उधर की बातें कर रहे हैं। रात महाराज की तबीयत कुछ खराब थी, इसलिए आज स्नान-संध्या में देर हो गई है।
सुरेन्द्रसिंह–(गोपालसिंह से) गोपाल, इतना तो हम जरूर कहेंगे कि गद्दी पर वैठने के बाद तुमने कोई बुद्धिमानी का काम नहीं किया, बल्कि हर एक मामले में तुमसे भूल ही होती गई है।
गोपालसिंह–निःसन्देह ऐसा ही है और उस लापरबाही का नतीजा भी मुझे वैसा ही भोगना पड़ा। वीरेन्द्रसिंह धोखा खाये बिना कोई होशियार नहीं होता। कैद से छूटने के बाद तुमने बहुत से अनूठे काम भी किये हैं। हाँ, यह तो बताओ कि दारोगा और जयपाल के लिए तुमने क्या सजा तजवीज की है?
गोपालसिंह–इस बारे में दिन-रात सोचा ही करता हूँ मगर कोई सजा ऐसी नहीं सूझती जो उन लोगों के लायक हो और जिससे मेरा गुस्सा शान्त हो।
सुरेन्द्रसिंह–(मुस्कुरा कर) मैं तो समझता हूँ कि यह काम भूतनाथ के हवाले किया जाय, यही उन शैतानों के लिए कोई मजेदार सजा तजवीज करेगा। (भूतनाथ की तरफ देख के) क्यों जी, तुम कुछ बात सकते हो?
भूतनाथ–(हाथ जोड़ के) उनके योग्य क्या सजा है इसका बताना तो बड़ा ही कठिन है, मगर एक छोटी सी सजा मैं जरूर बात सकता हूँ।
गोपालसिंह–वह क्या?
भूतनाथ–पहले तो उन्हें कच्चा पारा खिलाना चाहिए जिसकी गरमी से उन्हें सख्त तकलीफ हो और तमाम बदन फूट जाय, जब जख्म खूब मजेदार हो जाये तो नित्य लाल मिर्च और नमक का लेप चढ़ाया जाय । जब तक वे दोनों जीते रहें तब तक ऐसा ही होता रहे। सुरेन्द्रसिंह–सजा हलकी तो नहीं है, मगर किसी की आत्मा..
गोपालसिंह-(बात काटकर) खैर उन कम्बख्तों के लिए आप कुछ न सोचिये, उन्हें मैं जमानिया ले जाऊँगा और उसी जगह उनकी मरम्मत करूँगा।
वीरेन्द्रसिंह–इन सब रज देने वाली बातों का जिक्र जाने दो, यह बताओ कि अगर हम लोग जमानिया के तिलिस्म की सैर करना चाहें तो कैसे कर सकते हैं?
गोपालसिंह–यह तो मैं आप ही निश्चय कर चुका हूँ कि आप लोगों को वहाँ की सैर जरूर कराऊँगा।
इन्द्रजीतसिंह–(गोपाल से) हाँ, खूब याद आया। वहां के बारे में मुझे भी दो- एक बातों का शक बना हुआ है।
गोपालसिंह–वह क्या?
इन्द्रजीतसिंह–एक तो यह बताइए कि तिलिस्म के अन्दर जिस मकान में पहले पहल आनन्दसिंह फंसे थे, उस मकान में सिंहासन पर बैठी हुई लाड़िली की मूरत कहाँ से आई और उस आईने (शीशे) वाले मकान में, जिसमें कमलिनी, लाड़िली तथा हमारे ऐयारों की सी मूरतों ने हमें धोखा दिया, क्या था ? जब हम दोनों उसके अन्दर गये तो उन मूरतों को देखा जो नालियों पर चला करती थीं, मगर ताज्जुब कि
गोपालसिंह–(बात काट कर) वह सब कार्रवाई मेरी थी। एक तौर पर मैं आप लोगों को कुछ-कुछ तमाशा भी दिखाता जाता था। वे सब मूरतें बहुत पुराने जमाने की बनी हुई हैं मगर मैंने उन पर ताजा रंग-रोगन चढ़ाकर कमलिनी, लाडिली वगैरह की सूरतें बना दी थीं।
इन्द्रजीतसिंह–ठीक है। मेरा भी यही खयाल था। अच्छा, एक बात और बताइये!
गोपालसिंह–पूछिये।
इन्द्रजीतसिंह—जिस तिलिस्मी मकान में हम लोग हँसते-हँसते कूद पड़े थे उसमें कमलिनी के कई सिपाही भी जा फंसे थे और…
गोपलसिंह–जी हाँ, ईश्वर की कृपा से वे लोग कैदखाने में जीते-जागते पाये गये और इस समय जमानिया में मौजूद हैं। उन्हीं में से एक आदमी को दारोगा ने गठरी बाँध कर रोहतासगढ के किले में छोड़ा था जब मैं कृष्ण जिन्न बनकर पहले-पहले वहाँ गया था।
इन्दजीतसिंह–यहबहुत अच्छा हुआ । उन बेचारों की तरफ से मुझे बहुत ही खुटका रहता था।
वीरेन्द्रसिंह–(गोपालसिंह से) आज दलीपशाह की जुबानी जो कुछ उसका किस्सा सुनने में आया उससे हमें बड़ा ही आश्चर्य हुआ। यद्यपि उसका किस्सा अभी तक समाप्त नहीं हुआ और समाप्त होने तक शायद और भी बहुत-सी बातें नई मालूम हों,
1. देखिए नौवां भाग, दूसरा बयान।
2. देखिए सोलहवाँ भाग, छठवां बयान।
3. देखिए बारहवाँ भाग, सातवाँ वयान। परन्तु इस बात का ठीक-ठीक जवाब तो तुम्हारे सिवाय दूसरा शायद कोई नहीं दे सकता कि तुम्हें कैद करने में मायारानी ने कौन सी ऐसी कार्रवाई की कि किसी को पता न लगा और सभी लोग धोखे में पड़ गये, यहाँ तक कि तुम्हारी समझ में भी कुछ न आया और तुम चारपाई पर से उठाकर कैदखाने में डाल दिये गये।
गोपालसिंह––इसका ठीक-ठीक जवाब तो मैं नहीं दे सकता। कई बातों का पता मुझे भी नहीं लगा, क्योंकि मैं ज्यादा देर तक बीमारी की अवस्था में पड़ा नहीं रहा, बहुत जल्द बेहोश कर दिया गया। मैं क्योंकर जान सकता था कि कम्बख्त मायारानी दवा के बदले मुझे जहर पिला रही है, मगर मुझको विश्वास है कि दलीपशाह को इसका हाल बहुत ज्यादा मालूम हुआ होगा।
जीतसिंह––खैर आज के दरबार में और हाल भी मालूम हो जायगा।
कुछ देर तक इसी तरह की बातें होती रहीं। जब महाराज उठ गये तब सब लोग अपने ठिकाने चले गये और कारिन्दे लोग दरबार की तैयारी करने लगे।
भोजन आदि से छुट्टी पाने के बाद दोपहर होते-होते महाराज दरबार में पधारे। आज का दरबार कल की तरह रौनकदार था और आदमियों की गिनती बनिस्बत कल के आज बहुत ज्यादा थी।
महाराज की आज्ञानुसार दलीपशाह ने इस तरह अपना किस्सा बयान करना शुरू किया––
"मैं बयान कर चुका हूँ कि मैंने अपना घोड़ा गिरिजाकुमार को देकर दारोगा का पीछा करने के लिए कहा, अतः जब वह दारोगा के पीछे चला गया तब हम दोनों में सलाह होने लगी कि अब क्या करना चाहिए, अन्त में यह निश्चय हुआ कि इस समय जमानिया न जाना चाहिए, बल्कि घर लौट चलना चाहिए।
"उसी समय इन्द्रदेव के साथी लोग भी वहाँ आ पहुँचे। उनमें से एक का घोड़ा मैंने ले लिया और फिर हम लोग इन्द्रदेव के मकान की तरफ रवाना हुए। मकान पर पहुँचकर इन्द्रदेव ने अपने कई जासूसों और ऐयारों को हर एक बातए का पता लगाने के लिए जमानिया की तरफ रवाना किया किया। मैं भी अपने घर जाने को तैयार हुआ, मगर इन्द्रदेव ने मुझे रोक दिया।
"यद्यपि मैं कह चुका हूँ कि अपने किस्से में भूतनाथ का हाल बयान न करूँगा तथापि मौका पड़ने पर कहीं-कहीं लाचारी से उसका जिक्र करना ही पड़ेगा, अतः इस जगह यह कह देना जरूरी जान पड़ता है कि इन्द्रदेव के मकान पर ही मुझे इस बात की खबर लगी कि भूतनाथ की स्त्री बहुत बीमार हैं। मेरे एक शागिर्द ने आकर यह संदेशा दिया और साथ ही इसके यह भी कहा कि आपकी स्त्री उसे देखने के लिए जाने की आज्ञा माँगती है।
"भूतनाथ की स्त्री शान्ता बड़ी नेक और स्वभाव की बहुत अच्छी है। मैं भी उसे बहिन की तरह मानता था इसलिए उसकी बीमारी का हाल सुनकर मुझे तरद्दुद हुआ और मैंने अपनी स्त्री को उसके पास जाने की आज्ञा दे दी तथा खूबर लगी कि मेरे स्त्री शान्ता को लेकर अपने घर आ गई। "आठ-दस दिन बीत जाने पर भी न तो जमानिया से कुछ खबर आई और न गिरिजाकुमार ही लौटा। हाँ रियासत की तरफ से एक चिट्ठी न्यौते की जरूर आई, थी जिसके जवाब में इन्द्रदेव ने लिख दिया कि गोपालसिंह से और मुझसे दोस्ती थी सो वह तो चल बसे, अब उनकी क्रिया मैं अपनी आँखों से देखना पसन्द नहीं करता।
"मेरी इच्छा तो हुई कि गिरिजाकुमार का पता लगाने के लिए मैं खुद जाऊँ, मगर इन्द्रदेव ने कहा कि अभी दो-चार दिन और राह देख लो, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसकी खोज में जाओ और वह यहाँ आ जाय। अतः मैंने भी ऐसा ही किया।
"बारहवें दिन गिरिजाकुमार हम लोगों के पास आ पहुँचा। उसके साथ अर्जुनसिंह भी थे जो हम लोगों की मण्डली में एक अच्छे ऐयार गिने जाते थे, मगर भूतनाथ और इनके बीच खूब ही चख-चख चली आती थी। (महाराज और जीतसिंह की तरफ देखकर) आपने सुना ही होगा कि इन्होंने एक दिन भूतनाथ को धोखा देकर कुएं में धकेल दिया था और उसके बटुए में से कई चीजें निकाल ली थीं।
जीतसिंह––हाँ मालूम है, मगर इस बात का पता नहीं लगा कि अर्जुन ने भूतनाथ के बटुए में से क्या निकाला था।
इतना कहकर जीतसिंह ने भूतनाथ की तरफ देखा।
भूतनाथ––(महाराज की तरफ़ देखकर) मैंने जिस दिन अपना किस्सा सरकार को सुनाया था उस दिन अर्ज किया था कि जब वह कागज का मुट्ठा मेरे पास से चोरी गया तो मुझे बड़ा ही तरद्दुद हुआ, उसके बहुत दिनों के बाद राजा गोपालसिंह के मरने की खबर उड़ी इत्यादि। यह वही कागज का मुट्ठा था जो अर्जुनसिंह ने मेरे बटुए में से निकाल लिया था, तथा इसके साथ और भी कई कागज थे। असल बात यह है कि उन चिट्ठियों की नकल के मैंने दो मुढे तैयार किये थे, एक तो हिफाजत के लिए अपने मकान में रख छोड़ा था और दूसरा मुट्ठा समय पर काम लेने के लिए हरदम अपने बटुए में रखता था। मुझे गुमान था कि अर्जुनसिंह ने जो मुट्ठा ले लिया था उसी से मुझे नुकसान पहुँचा मगर अब मालूम हुआ कि ऐसा नहीं हुआ, अर्जुनसिंह ने न तो वह किसी को दिया और न उससे मुझे कुछ नुकसान पहुँचा। हाल में जो दूसरा मुट्ठा जयपाल ने मेरे घर से चुरवा लिया था, उसी ने तमाम बखेड़ा मचाया।
जीतसिंह––ठीक है (दलीपशाह की तरफ देख के) अच्छा, तब क्या हुआ?
दलीपशाह ने फिर इस तरह कहना शुरू किया––
दलीपशाह––गिरिजाकुमार और अर्जुनसिंह में एक तरह की नातेदारी भी है परन्तु उसका खयाल न करके ये दोनों आपस में दोस्ती का बर्ताव रखते थे। खैर, उस समय दोनों के आ जाने से हम लोगों को खुशी हुई और इस तरह बातें होने लगीं––
मैं––गिरिजाकुमार, तुमने तो बहुत दिन लगा दिए!
गिरजाकुमार––जी हाँ, मुझे तो और भी कई दिन लग जाते मगर इत्तिफाक से अर्जुनसिंह से मुलाकात हो गई और इनकी मदद से मेरा काम बहुत जल्द हो गया। मैं––खैर यह बताओ कि तुमने किन-किन बातों का पता लगाया और मुझसे बिदा होकर तुम दारोगा के पीछे कहाँ तक गए?
गिरिजाकुमार––जयपाल को साथ लिए हुए दारोगा सीधे मनोरमा के मकान पर चला गया। उस समय मनोरमा वहाँ न थी, वह दारोगा के आने के तीन पहर बाद रात के समय अपने मकान पर पहुँची। मैं भी छिपकर किसी-न-किसी तरह उस मकान में दाखिल हो गया। रात को दारोगा और मनोरमा में खूब हुज्जत हुई, मगर अन्त में मनोरमा ने उसे विश्वास दिला दिया कि राजा गोपालसिंह को मारने के विषय में उससे जबर्दस्ती पुर्जा लिखा लेने वाला मेरा आदमी न था बल्कि वह कोई और था जिसे मैं नहीं जानती। दारोगा ने बहुत सोच-विचार कर विश्वास कर लिया कि यह काम भूतनाथ का है। इसके बाद उन दोनों में जो कुछ बातें हुईं उनसे यही मालूम हुआ कि गोपालसिंह जरूर मर गये और दारोगा को भी यही विश्वास है, मगर मेरे दिल में यह बात नहीं बैठती, खैर, जो कुछ हो। उसके दूसरे दिन मनोरमा के मकान में से एक कैदी निकाला गया जिसे बेहोश करके जयपाल ने बेगम के मकान में पहुँचा दिया। मैंने उसे पहचानने के लिए बहुत कुछ उद्योग किया मगर पहचान न सका क्योंकि उसे गुप्त रखने में उन्होंने बहुत कोशिश की थी, मगर मुझे गुमान होता है कि यह जरूर बलभद्रसिंह होगा। अगर वह दो-दिन भी बेगम के मकान में रहता तो मैं जरूर निश्चय कर लेता मगर न मालूम किस वक्त और कहाँ बेगम ने उसे पहुँचवा दिया कि मुझे इस बात का कुछ भी पता न लगा, हाँ इतना जरूर मालूम हो गया कि दारोगा भूतनाथ को फँसाने के फेर में पड़ा हुआ है और चाहता है किसी तरह भूतनाथ मार डाला जाय।
"इन कामों से छुट्टी पाकर दारोगा अकेला अर्जुनसिंह के मकान पर गया, इनसे बड़ी नरमी और खुशामद के साथ मुलाकात की, और देर तक मीठी-मीठी बातें करता रहा जिसका तत्व यह था कि तुम दलीपशाह को साथ लेकर मेरी मदद करो और जिस तरह हो सके, भूतनाथ को गिरफ्तार करा दो। अगर तुम दोनों की मदद से भूतनाथ गिरफ्तार हो जायगा तो मैं इसके बदले में दो लाख रुपया तुम दोनों को इनाम दूँगा, इसके अतिरिक्त वह आपके नाम का एक पत्र भी अर्जुनसिंह को दे गया।
"अर्जुनसिंह ने दारोगा का वह पत्र निकाल कर मुझे दिया, मैंने पढ़कर इन्द्रदेव के हाथ में दे दिया और कहा, "इसका मतलब भी वही है जो गिरिजाकुमार ने अभी बयान किया है परन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मैं भूतनाथ के साथ किसी तरह की बुराई करूँ, हाँ, दारोगा के साथ दिल्लगी अवश्य करूँगा।"
"इसके बाद कुछ देर तक और भी बातचीत होती रही। अन्त में गिरिजाकुमार ने कहा कि मेरे इस सफर का नतीजा कुछ भी न निकला और न मेरी तबीयत ही भरी, आप कृपा करके मुझे जमानिया जाने की इजाजत दीजिए।
"गिरिजाकुमार की दरखास्त मैंने मंजूर कर ली। उस दिन रात-भर हम लोग इन्द्रदेव के यहाँ रहे, दूसरे दिन गिरिजाकुमार जमानिया की तरफ रवाना हुआ और मैं अर्जुनसिंह को साथ लेकर अपने घर मिर्जापुर चला आया।
"घर पहुँचकर मैंने भूतनाथ की स्त्री शान्ता को देखा जो बीमार तथा बहुत ही कमजोर और दुबली हो रही थी, मगर उसकी सब बीमारी भूतनाथ की नादानी के सबब से थी और वह चाहती थी कि जिस तरह भूतनाथ ने अपने को मरा हुआ हुआ मशहूर किया था उसी तरह वह भी अपने और अपने छोटे बच्चे के बारे में मशहूर करे । उसकी अवस्था पर मैं बड़ा दुःखी हुआ और जो कुछ वह चाहती थी, उसका प्रबन्ध मैंने कर दिया । यही सबब था कि भूतनाथ ने अपने छोटे बच्चे के विषय में धोखा खाया जिसका हाल महाराज तथा राजकुमारों को मालूम है, मगर सर्वसाधारण के लिए मैं इस समय उसका जिक्र न करूंगा। इसका खुलासा हाल भूतनाथ अपनी जीवनी में बयान करेगा। खैर–
"घर पहुँचकर मैंने दिल्लगी के तौर पर भूतनाथ के विषय में दारोगा से लिखा-पढ़ी शुरू कर दी मगर ऐसा करने में मेरा असल मतलब यह था कि मुलाकात होने पर मैं वह सब पत्र, जो इस समय हरनामसिंह के पास मौजूद हैं भूतनाथ को दिखाऊँ और उसे होशियार कर दूं, अतः अन्त में मैंने उसे (दारोगा को) साफ-साफ जवाब दे दिया।"
यहाँ तक अपना किस्सा कहकर दलीपशाह ने हरनामसिंह की तरफ देखा और हरनामसिंह ने सब पत्र जो एक छोटी-सी सन्दूकड़ी में बन्द थे महाराज के आगे पेश किये जिसे मामूली तौर पर सभी ने देखा। इन चिट्ठियों से दारोगा की बेईमानी के साथ-ही साथ यह भी साबित होता था कि भूतनाथ ने दलीपशाह पर व्यर्थ ही कलंक लगाया। महाराज की आज्ञानुसार वे चिट्ठियाँ कम्बख्त दारोगा के आगे फेंक दी गईं और इसके बाद दलीपशाह ने फिर इस तरह बयान करना शुरू किया-
"मेरे और दारोगा के बीच में जो कुछ लिखा-पढ़ी हुई थी, उसका हाल किसी तरह भूतनाथ को मालूम हो गया या शायद वह स्वयं दारोगा से जाकर मिला और दारोगा ने मेरी चिट्ठियाँ दिखाकर इसे मेरा दुश्मन बना दिया तथा खुद भी मेरी बर्बादी के लिए तैयार हो गया। इस तरह दारोगा की दुश्मनी का वह पौधा जो कुछ दिनों के लिए मुरझा गया था फिर से लहलहा उठा और हरा-भरा हो गया, और साथ ही इसके मैं भी हर तरह से दारोगा का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया।
"कई दिन के बाद गिरिजाकुमार जमानिया से लौटा तो उसकी जुबानी मालूम हुआ कि मायारानी के दिन बड़ी खुशी और चहल-पहल के साथ गुजर रहे हैं । मनोरमा और नागर के अतिरिक्त धनपत नामकी एक और औरत भी है जिसे मायारानी बहुत प्यार करती है मगर उस पर मर्द होने का शक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी मालूम हुआ कि दारोगा ने मेरी गिरफ्तारी के लिए तरह-तरह के बन्दोबस्त कर रक्खे हैं और भूतनाथ भी दो-तीन दफे उसके पास आता-जाता दिखाई दिया है, मगर यह बात निश्चय रूप से मैं नहीं कह सकता कि वह जरूर भूतनाथ ही था।
"एक दिन संध्या के समय जब दारोगा अपने बाग में टहल रहा था तो भेष बदले हुए गिरिजाकुमार पिछली दीवार लाँघ के उसके पास जा पहुंचा और बेखौफ सामने खड़ा होकर बोला, "दारोगा साहब, इस समय आप मुझे गिरफ्तार करने का खयाल भी न कीजिएगा क्योंकि मैं आपके कब्जे में नहीं आ सकता, साथ ही इसके यह भी समझ रखिए कि मैं आपकी जान लेने के लिए नहीं आया हूँ, बल्कि आपसे दो-चार बातें करने के लिए आया हूँ।"
दारोगा घबरा गया और उसकी बातों का कुछ विशेष जवाब न देकर बोला,"खैर कहो, क्या कहते हो।"
गिरिजाकुमार–मनोरमा और मायारानी के फेर में पड़कर तुमने राजा गोपालसिंह को मरवा डाला, इसका नतीजा एक-न-एक दिन तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।मगर अब मैं यह पूछता हूं कि जिनके डर से तुमने लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह को कैद कर रखा था वे तो मर ही गये। अब अगर तुम उन दोनों को छोड़ भी दोगे तो तुम्हारा क्या बिगड़ेगा?
दारोगा–(ताज्जुब में आकर) मेरी समझ में नहीं आता कि तुम कौन हो और क्या कह रहे हो?
गिरिजाकुमार–मैं कौन हूँ यह जानने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं, मगर क्या तुम कह सकते हो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब झूठ है ?
दारोगा–-बेशक झूठ है तुम्हारे पास इन बातों का क्या सबूत है ?
गिरिजाकुमार–जयपाल और हेलासिंह के बीच में जो कुछ लिखा-पढ़ी हुई है उसके अतिरिक्त वह चिट्ठी इस समय भी मेरे पास मौजूद है जो राजा गोपालसिंह को मार डालने के लिए तुमने मनोरमा को लिख दी थी।
दारोगा-—मैंने कोई चिट्ठी नहीं लिखी थी, मालूम होता है कि दिलीपशाह और भूतनाथ वगैरह मिल-जुल कर मुझ पर जाल बाँधा चाहते हैं और तुम उन्हीं में से किसी के नौकर हो।
गिरिजाकुमार– भूतनाथ तो मर गया, अब तुम उसे क्यों बदनाम करते हो ?
दारोगा–भूतनाथ जैसा मरा है सो मैं खूब जानता हूँ, अगर खुद मुझसे मुलाकात न हुई होती तो शायद मैं धोखे में आ भी जाता।
गिरिजाकुमार–भूतनाथ तुम्हारे पास न आया होगा, किसी दूसरे आदमी ने सूरत बदलकर तुम्हें धोखा दिया होगा, वह बेशक मर गया !
दारोगा–(सिर हिलाकर) हाँ ठीक है, शायद ऐसा ही हो । मगर उन सब बातों से तुम्हें मतलब ही क्या है और तुम मेरे पास किस लिए आये हो सो कहो ।
गिरिजासिंह-मैं केवल इसीलिए आया हूँ कि लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह को छोड़ देने के लिए तुमसे प्रार्थना करूँ।
दारोगा–पहले तुम अपना ठीक-ठीक परिचय दो, तब मैं तुम्हारी बातों का जवाब दूंगा।
गिरिजासिंह–अपना ठीक परिचय तो नहीं दे सकता।
दारोगा–तब मैं तुम्हारी बातों का जवाब भी नहीं दे सकता।
"इतना कहकर दारोगा पीछे की तरफ हटा और अपने आदमियों को आवाज दो मगर गिरिजाकुमार ने झपटकर एक मुक्का दारोगा की गर्दन पर जमाया और मारने के बाद तेजी के साथ बाग के बाहर निकल गया ।
"उसके दूसरे दिन गिरिजाकुमार ने उसी तरह मायारानी से भी मिलने की कोशिश की मगर उसके खास बाग के अन्दर न जा सका। लाचार उसने मायारानी के ऐयार बिहारीसिंह और हरनामसिंह का पीछा किया और दो ही तीन दिन की मेहनत में धोखा देकर बिहारीसिंह को गिरफ्तार कर लिया और उसे अर्जुनसिंह के यहाँ पहुँचा कर मेरे पास चला आया।
'ऊपर लिखी सब बातें बयान करके गिरिजाकुमार चुप हो गया और तब मैंने उससे कहा, 'बिहारीसिंह को तुमने गिरफ्तार कर लिया, यह बहुत बड़ा काम हुआ और जब तुम बिहारीसिंह बनकर वहाँ जाओगे और चालाकी से उन लोगों में मिल-जुल कर अपने को छिपा सकोगे, तो बेशक बहुत-सी छिपी बातों का पता लग जायगा और हम लोगों के साथ जो कुछ दारोगा करना चाहता है वह भी मालूम हो जायगा।"
गिरिजाकुमार–-बेशक ऐसा ही है । मैं आपसे विदा होकर अर्जुनसिंह के यहाँ जाऊँगा और फिर बिहारीसिंह बनकर जमानिया पहुंचूंगा। मेरे जी में तो यही आया था कि मैं कम्बख्त दारोगा को सीधे यमलोक पहुँचा दूं मगर यह काम आपकी आज्ञा के बिना नहीं कर सकता था।
मैं–नहीं-नहीं, इन्द्रदेव की आज्ञा के बिना यह काम कभी न करना चाहिए, पहले वहाँ का असल हाल तो मालूम करो, फिर इस बारे में इन्द्रदेव से बातचीत करेंगे।
गिरिजाकुमार–जो आज्ञा।
"इसके बाद और भी तरह-तरह की बातचीत होती रही । उस दिन गिरिजा- कुमार मेरे ही घर पर रहा दूसरे दिन मुझसे बिदा हो अर्जुनसिंह के पास चला गया।"
इसके वाद आठ दिन तक' मुझे किसी नई बात का पता नहीं लगा। आखिर जब गिरिजाकुमार का पत्र आया तब मालूम हुआ कि वह बिहारीसिंह बनकर बड़ी खूबी के साथ उन लोगों में मिल गया है। उन लोगों की गुप्त कमेटी में भी बैठकर हर एक बात में राय दिया करता है जिससे बहुत जल्द कुल भेदों का पता लग जाने की आशा होती है । गिरिजाकुमार ने यह भी लिखा कि दारोगा को उस चिट्ठी की बड़ी ही चिन्ता लगी हुई है जो मनोरमा के नाम से राजा गोपालसिंह को मार डालने के लिए मैंने (गिरिजा- कुमार ने) जबर्दस्ती उससे लिखवा ली थी। वह चाहता है कि जिस तरह हो वह चिट्ठी उसके हाथ लग जाय और इस काम के लिए लाखों रुपये खर्च करने को तैयार है । वह कहता है और वास्तव में ठीक कहता है कि 'उस चिट्ठी का हाल अगर लोगों को मालूम हो जायगा तो दूसरों की कौन कहे, जमानिया की रिआया ही मुझे बुरी तरह से मारने के लिए तैयार हो जायगी। एक दिन हरनामसिंह ने उसे राय दी कि दलीपशाह को मार डालना चाहिए । इस पर बह बहुत ही झुंझलाया और बोला कि 'जब तक वह चिट्ठी मेरे हाथ न लग जाय तब तक दलीपशाह और उसके साथियों को मार डालने से मुझे क्या फायदा होगा। बल्कि मैं और भी बहुत जल्द बरबाद हो जाऊंगा क्योंकि दलीपशाह के मारे जाने से उसके दोस्त लोग जरूर उस चिट्ठी को मशहूर कर देंगे, इसलिए जब तक वह चिट्ठी अपने कब्जे में न आ जाय तब तक किसी के मारने का ध्यान भी मन में न लाना चाहिए । हाँ, दलीपशाह को गिरफ्तार करने से बेशक फायदा पहुँच सकता है । अगर वह कब्जे में आ जायगा तो उसे तरह-तरह की तकलीफ पहुँचाकर किसी प्रकार उस चिट्ठी का पता जरूर लगा लूंगा, इत्यादि।
"वास्तव में बात भी ऐसी ही थी। इसमें कोई शक नहीं कि उसी चिट्ठी की बदौलत हम लोगों की जान बची रही, यद्यपि तकलीफें हद दर्जे की भोगनी पड़ी मगर जान से मारने की हिम्मत दारोगा को न हुई, क्योंकि उसके दिल में विश्वास करा दिया गया था कि हम लोगों की मण्डली का एक भी आदमी जिस दिन मारा जायगा, उसी दिन वह चिट्ठी तमाम दुनिया में मशहूर हो जायगी, इसका बहुत ही उत्तम प्रबन्ध किया गया है।
"इसके बाद कई दिन बीत गये मगर गिरिजाकुमार की फिर ओर कोई चिट्ठी न आई जिससे एक तरह पर तरवुद हुआ और जी में आया कि अब खुद जमानिया चलकर उसका पता लगाना चाहिए।
दूसरे दिन अपने घर की हिफाजत का इन्तजाम करके मैं बाहर निकला और अर्जुनसिंह के घर पहुंचा । ये उस समय अपने कमरे में अकेले बैठे हुए एक चिट्ठी लिख रहे थे । मुझे देखते ही उठ खड़े हुए और बोले, "वाह-वाह, बहुत ही अच्छा हुआ जो आप आ गये, मैं इस समय आप ही के नाम एक चिट्ठी लिख रहा था और उसे अपने शागिर्द के हाथ आपके पास भेजने वाला था, आइये बैठिये।"
मैं–(बैठकर) क्या कोई नई बात मालूम हुई है?
अर्जुनसिंह–नहीं, बल्कि एक नई बात हो गई। मैं-वह क्या?
अर्जुनसिंह–आज रात को बिहारी सिंह हमारी कैद से निकलकर भाग गया है।
मैं–(घबराकर) यह तो बहुत बुरा हुआ।
अर्जुनसिंह–बेशक बुरा हुआ। जिस समय वह जमानिया पहुंचेगा उस समय बेचारे गिरिजाकुमार पर जो बिहारीसिंह बनकर बैठा हुआ है, आफत आ जायगी और वह भारी मुसीबत में गिरफ्तार हो जायगा। मैं यही खबर देने के लिए आपके पास आदमी भेजने वाला था।
मैं– आखिर ऐसा हुआ ही क्यों ? हिफाजत में कुछ कसर पड़ गई थी?
अर्जुनसिंह–अब तो ऐसा ही समझना पड़ेगा चाहे उसकी कैसी ही हिफाजत क्यों न की गई हो, मगर असल में यह एक सिपाही की बेईमानी का नतीजा है क्योंकि बिहारी- सिंह के साथ ही वह भी यहाँ से गायब हो गया है। जरूर बिहारीसिंह ने उसे लालच देकर अपना पक्षपाती बना लिया होगा।
मैं–खैर, जो कुछ होना था वह तो हो गया। अब किसी तरह गिरिजाकुमार को बचाना चाहिए क्योंकि असली बिहारीसिंह के जमानिया पहुंचते ही नकली बिहारी- सिंह (गिरिजाकुमार) का भेद खुल जायगा और वह मजबूर करके कैदखाने में झोंक दिया जायगा।
अजुनसिंह–मैं खुद यही बात कह चुका हूँ, खैर, अब इस विषय में विशेष सोच- विचार न करके जहाँ तक हो जल्द जमानिया पहुंचना चाहिए।
मैं–मैं तो तैयार ही हैं, क्योंकि अभी कमर भी नहीं खोली। अर्जुनसिंह–खैर, आप कमर खोलिए और कुछ भोजन कीजिए, मैं भी आपके साथ चलने के लिए घंटे भर के अन्दर ही तैयार हो जाऊँगा।
मैं–क्या आप जमानिया चलेंगे?
अर्जुनसिंह–(आवाज में जोर देकर) जरूर!
"घंटे भर के अन्दर ही हम दोनों आदमी जमानिया जाने के लिए हर तरह से तैयार हो गये और ऐवारी का पूरा-पूरा सामान दुरुस्त कर लिया। दोनों आदमी असली सुरत में पैदल ही घर से बाहर निकले और कई कोस निकल जाने के बाद जंगल में बैठ- कर अपनी सूरत बदली, इसके बाद कुछ देर आराम करके फिर आगे की तरफ रवाना हुए और इरादा लिया कि आज की रात जंगल में पेड़ के ऊपर बैठकर बिता देंगे।
"आखिर ऐसा ही हुआ। संध्या होने पर हम दोनों दोस्त जंगल में एक रमणीक स्थान देखकर अटक गये जहां पानी का सुन्दर चश्मा बह रहा था तथा सलई का एक बहुत बड़ा और घना पेड़ भी था जिस पर बैठने के लिए ऐसी अच्छी जगह थी कि उस पर बैठे-बैठे घंटे-दो घंटे नींद भी ले सकते थे।
यद्यपि हम लोग किसी सवारी पर बहुत जल्द जमानिया पहुँच सकते थे और वहाँ अपने लिए टिकने का भी इन्तजाम कर सकते थे, मगर उन दिनों जमानिया की ऐसी बुरी अवस्था थी कि ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी और जंगल में टिके रहना ही उचित जान पड़ा। दोनों आदमी एक-दिल थे, इसलिए कुछ तरदुद या किसी तरह के खुटके का भी कुछ खयाल न था।
"अंधकार छा जाने के साथ ही हम दोनों आदमी पेड़ के ऊपर जा बैठे और धीरे धीरे बातें करने लगे, थोड़ी ही देर बाद कई आदमियों के आने की आहट मालूम हुई, हम देनों चुप हो गये और इन्तजार करने लगे कि देखें कौन आता है। थोड़ी ही देर में दो आदमी उस पेड़ के नीचे आ पहुंचे। रात हो जाने के सबब से हम उनकी शक्ल-सूरत अच्छी तरह नहीं देख सकते थे, घने पेड़ों में से छनी हुई कुछ-कुछ और कहीं-कहीं चन्द्रमा रोशनी जमीन पर पड़ रही थी, उसी से अन्दाजा कर लिया कि ये दोनों सिपाही हैं, मगर ताज्जुब होता था कि ये लोग रास्ता छोड़ भेदियों और ऐयारों की तरह जंगल में क्यों टिके हैं!"
"दोनों आदमी अपनी छोटी गठरी जमीन पर रखकर पेड़ के नीचे बैठ गये और इस तरह बातें करने लगे–
JIM – Assistente
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