चन्द्रकान्ता सन्तति 6
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रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। महल के अन्दर एक सजे हुए कमरे में एक तरफ रानी चन्द्रकान्ता, चपला और चम्पा बैठी हुई हैं और उनसे थोड़ी ही दूर पर राजा वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह और भैरोंसिंह बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे हैं।
चन्द्रकान्ता––(वीरेन्द्रसिंह से) सच्चा-सच्चा हाल मालूम होना तो दूर रहा मुझे इस बात का किसी तरह कुछ गुमान भी न गुआ। इस समय मैं दुल्हिनों की सोहागरात का इन्तजाम देख-सुनकर यहाँ आई और दिन भर की थकावट से सुस्त होकर पड़ रही, जी में आया कि घंटे दो घंटे सो रहूँ, मगर इसी बीच में चपला बहिन आ पहुँची और बोली, "लो बहिन, मैं तुम्हें एक अनूठा हाल सुनाती हूँ जिसकी अब तक हम लोगों को
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रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। महल के अन्दर एक सजे हुए कमरे में एक तरफ रानी चन्द्रकान्ता, चपला और चम्पा बैठी हुई हैं और उनसे थोड़ी ही दूर पर राजा वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह और भैरोंसिंह बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे हैं।
चन्द्रकान्ता––(वीरेन्द्रसिंह से) सच्चा-सच्चा हाल मालूम होना तो दूर रहा मुझे इस बात का किसी तरह कुछ गुमान भी न गुआ। इस समय मैं दुल्हिनों की सोहागरात का इन्तजाम देख-सुनकर यहाँ आई और दिन भर की थकावट से सुस्त होकर पड़ रही, जी में आया कि घंटे दो घंटे सो रहूँ, मगर इसी बीच में चपला बहिन आ पहुँची और बोली, "लो बहिन, मैं तुम्हें एक अनूठा हाल सुनाती हूँ जिसकी अब तक हम लोगों को कुछ खबर ही न थी!" बस इतना कहकर बैठ गईं और कहने लगी कि 'कमलिनी और लाड़िली की शादी तिलिस्म के अन्दर ही इन्द्रजीत और आनन्द के साथ भी हो चुकी है जिसके बारे में अब तक हम लोगों को किसी ने कुछ भी नहीं कहा। इसी समय लड़के (भैरोंसिंह) ने मुझसे कहा है।' सुनते ही मैं सन्न हो गई कि हे राम, यह कौन-सी बात थी जिसे अभी तक सब कोई छिपाये बैठे रहे!
चपला––(भैरोंसिंह की तरफ इशारा करके) सामने तो बैठा हुआ है, पूछिये कि इस समय के पहले ही कभी कुछ कहा था। यद्यपि दोनों की शादियाँ इसके सामने ही तिलिस्म के अन्दर हुई थीं।
वीरेन्द्रसिंह––मुझे भी इस विषय में किसी ने कुछ नहीं कहा था, अभी थोड़ी देर हुई कि गोपालसिंह ने यह सब हाल पिताजी से बयान किया तब मालूम हुआ।
चन्द्रकान्ता––यही सुन के तो मैंने आपको तकलीफ दी, क्योंकि आपकी जुबानी सुने बिना मेरी दिलजमई नहीं हो सकती।
वीरेन्द्रसिंह––जो कुछ तुमने सुना, सब ठीक है।
चन्द्रकान्ता––मजा तो यह है कि लड़कों ने भी मुझसे इस बात की कुछ चर्चा नहीं की।
वीरेन्द्रसिंह––लड़कों को तो खुद ही इस बात की खबर नहीं है कि उनकी शादी कमलिनी और लाड़िली के साथ हुई थी।
चन्द्रकान्ता––यह तो आप और भी ताज्जुब की बात कहते हैं। यह भला कैसे हो सकता है कि उनकी शादी हो, उन्हीं को पता न लगे कि हमारी शादी हो गई है? इस पर कौन किश्वास करेगा!
वीरेन्द्रसिंह––बात ही कुछ ऐसी हो गई थी और यह शादी जान-बूझकर किसी मतलब से छिपाई गई थी। (गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) अब ये खुलासा हाल तुमसे बयान करेंगे, तब तुम समझ जाओगी कि ऐसा क्यों हुआ।
गोपालसिंह––मैं सब हाल आपसे खुलासा बयान करता हूँ और आशा करता हूँ कि आप मेरा कसूर माफ करेंगी, क्योंकि यह सब मेरी ही करतूत है और मैंने ही यह शादी कराई है।
चन्द्रकान्ता––अगर तुमने ऐसा किया तो छिपाने की क्या जरूरत थी? क्या हम लोग तुमसे रंज हो जाते? या हम लोग इस बात को नहीं समझते कि जो कुछ भी तुम करोगे, अच्छा ही समझ के करोगे!
गोपालसिंह––ठीक है, मगर किया क्या जाय! इस बात को छिपाये बिना काम नहीं चलता था, यही तो सबब हुआ कि खुद दोनों कुमारों को भी इस बात का पता न लगा कि उनकी शादी फलां के साथ हो गई है।
चन्द्रकान्ता––आखिर ऐसा क्यों किया गया, सो तो कहो!
गोपालसिंह––इसका सबब यह है कि एक दिन कमला मेरे पास आई और बोली कि 'मैं आपसे एक जरूरी बात कहती हूँ जिस पर आपको विशेष ध्यान देना होगा।' मैंने पूछा––'क्या?' इस पर उसने जवाब दिया कि 'कमलिनी ने जो कुछ अहसान हम लोगों पर, खास करके दोनों कुमारों तथा किशोरी और कामिनी पर किये हैं, वह किसी से छिपे नहीं हैं। किशोरी का खयाल है कि इसका बदला किसी तरह अदा हो ही नहीं सकता, और बात भी ऐसी ही है, अब किशोरी ने बात-ही-बात में अपने दिल का हाल मुझसे भी कह दिया और इस बारे में जो कुछ उसने सोच रखा था, वह भी बयान किया, किशोरी कहती है कि अगर मैं शादी न करूँ या शादी होने के पहले ही इस दुनिया से उठ जाऊँ तो उसके अहसान और ताने से कुछ बच सकती हूँ। इस विषय पर जब मैंने किशोरी को बहुत-कुछ समझाया तो बोली कि खैर, अगर मेरी शादी के पहले कमलिनी की शादी कुँअर इन्द्रजीतसिंह के साथ हो जायेगी तब मैं सुख से जिंदगी बिता सकूँगी और उसके अहसान से भी हलकी हो जाऊँगी, क्योंकि ऐसा होने से कमलिनी को पटरानी की पदवी मिलेगी और उसी का लड़का गद्दी का मालिक समझा जायेगा। मैं छोटी और कमलिनी की लौंडी होकर रहूँगी; तभी मेरे दिल को तस्कीन होगा और मैं समझूगी कि कमलिनी के अहसान का बोझ मेरे सिर से उतर गया।'
चन्द्रकान्ता––शाबाश! शाबाश!
वीरेन्द्रसिंह––बेशक, किशोरी ने बड़े हौसले की और लासानी बात सोची!
चपला––बेशक, यह साधारण बात नहीं है, यह बड़े कलेजे वाली औरतों का काम है, और इससे बढ़कर किशोरी कुछ कर ही नहीं सकती थी।
गोपालसिंह––मैंने जब कमला की जुबानी यह बात सुनी तो दंग हो गया और मन में किशोरी की तारीफ करने लगा। सच तो यों है कि यह बात मेरे दिल में भी जम गई। अब मैंने कमला से वादा तो कर दिया कि 'ऐसा ही होगा', मगर तरद्दुद में पड़ गया कि यह काम क्योंकर पूरा होगा, क्योंकि यह बात बड़ी ही कठिन बल्कि असम्भव थी कि इन्द्रजीतसिंह और कमलिनी इस राय को मंजूर करें। इसके अतिरिक्त यह भी मंजूरी नहीं हो सकती थी कि हमारे महाराज इस बात को स्वीकार कर लेंगे।
भैरोंसिंह––बेशक, यह कठिन काम था, इन्द्रजीतसिंह इस बात को कभी मंजूर न करते।
गोपालसिंह––कई दिन के सोच-विचार के बाद मैंने और भैरोंसिंह ने मिलकर एक तरकीब निकाल ली और किसी न किसी तरह कमलिनी और लाड़िली को इन्द्रानी और आनन्दी बनाकर दोनों की शादी इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ करा दी। उन दिनों कमलिनी के पिता बलभद्रसिंहजी, भूतनाथ की मदद से छूटकर यहाँ (अर्थात् बगुले वाले तिलिस्मी मकान में) आ चुके थे। अब मैं तिलिस्म के अन्दर ही अन्दर यहाँ आया और बलभद्रहिंजी को कन्यादान करने के लिए समझा-बुझाकर जमानिया ले गया। उस दिन भूतनाथ बहुत परेशान हुआ था और भैरोंसिंह मेरे साथ था। हम लोग पहले जब इस मकान में आये थे, तो भूतनाथ और बलभद्रसिंहजी के नाम की एक-एक चिट्ठी दोनों की चारपाई पर रख के चले गये थे। बलद्रसिंहजी की चिट्ठी में उनकी दिलजमई के लिए एक अँगूठी भी रखी थी जो उन्होंने ब्याह के पहले मुझे बतौर सगुन के दी थी। इसके बाद दूसरे दिन फिर पहुँचे और भूतनाथ को अपना पूरा-पूरा निश्चय देकर बलभद्र सिंहजी को ले गये। उनके जाने का सबब भूतनाथ को ठीक-ठीक कह दिया था। मगर साथ इसके इस बात की भी ताकीद कर दी थी कि यह हाल किसी को मालूम न होवे। इतना कहते-कहते गोपालसिंह कुछ देर के लिए रुके और फिर इस तरह कहने लगे––
"पहले तो मुझे इस बात की चिन्ता थी कि बलभद्रसिंह मेरा कहना मानेंगे या नहीं, मगर उन्होंने इस बात को बड़ी खुशी से मंजूर कर लिया। अपनी लड़कियों से मिल कर वे बहुत ही प्रसन्न हुए और हम लोगों पर जो कुछ आफतें बीत चुकी थीं, उन्हें सुन-सुनाकर अफसोस करते रहे, फिर अपनी बीती सुनाकर प्रसन्नतापूर्वक हम लोगों के काम में शरीक हुए, अर्थात् हँसी-खुशी के साथ उन्होंने कमलिनी और लाड़िली का कन्यादान कर दिया। इस काम में भैरोंसिंह को भी कम तरद्दुद नहीं उठाना पड़ा, बल्कि दोनों कुमार इनसे रंज भी हो गये थे, क्योंकि इनकी जुबानी असल बातों का पता उन्हें नहीं लगता था, अतः शादी हो जाने के बाद इस बात का बन्दोबस्त किया गया कि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह इस अनूठे ब्याह को भूल जायें तथा इन्द्रानी और आनन्दी से मिलने की उम्मीद न रखें।
इसके बाद राजा गोपालसिंह ने भी बहुत-सा हाल बयान किया जो हम सन्तति के अठारहवें भाग में लिख आये हैं और सब बातें सुनकर अन्त में चन्द्रकान्ता ने कहा, "खैर, जो हुआ अच्छा हुआ, हम लोगों के लिए तो जैसे किशोरी और कामिनी हैं, वैसे ही कमलिनी और लाड़िली हैं। मगर किशोरी के नाना को यदि इस बात का कुछ रंज हो तो ताज्जुब नहीं।"
वीरेन्द्रसिंह––पिताजी भी यही कहते थे। मगर इसमें कोई शक नहीं कि किशोरी ने परले सिरे की हिम्मत दिखलाई!
गोपालसिंह––साथ ही इसके यह भी समझ लीजिए कि कमलिनी ने भी इस बात को सहज ही में स्वीकार नहीं कर लिया, इसके लिए भी हम लोगों को बहुत-कुछ उद्योग करना पड़ा। बात यह है कि कमलिनी भी किशोरी को जान से ज्यादा चाहती है और मानती है।
चन्द्रकान्ता––मगर मुझे इस बात का अफसोस जरूर है कि इन दोनों की शादी में किसी तरह की तैयारी नहीं की गई और न कुछ धूमधाम ही हुई।
इसके बाद बहुत देर तक इन सभी में बातचीत होती रही।
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देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, अठारहवाँ भाग, बारहवाँ बयान।
3
अब हम कुँअर इन्द्रजीतसिंह की तरफ चलते और देखते हैं कि उधर क्या हो रहा है। किशोरी और कमलिनी की बातचीत सुनकर कुंअर इन्द्रजीतसिंह से न रहा गया और उन्होंने बेचैनी के साथ उन दोनों की तरफ देखकर कहा, "क्या तुम लोगों ने मुझे सताने और दुःख देने के लिए कसम ही खा ली है ? क्यों मेरे दिल में हौल पैदा कर रही हो? असल बात क्यों नहीं बतातीं?"
किशोरी-–(मुस्कुराती हुई) यद्यपि मुझे आपसे शर्म करनी चाहिए, मगर कमला और कमलिनी बहिन ने मुझे बेहया बना दिया, तिस पर आज की दिल्लगी मुझे हंसाते- हँसाते बेहाल कर रही है। आप बिगड़े क्यों जाते हैं । ठहरिये-ठहरिये, जल्दी न कीजिए, और समझ लीजिए कि मेरी शादी आपके साथ नहीं हुई बल्कि कमलिनी की शादी आपके साथ हुई है।
कुमार–सो कैसे हो सकता है ! और मैं क्योंकर ऐसी अनहोनी बात मान लूं?
कमलिनी–अब आपकी हालत बहुत ही खराब हो गई ! क्या कहूँ, मैं तो आप को अभी और छकाती, मगर दया आती है इसलिए छोड़ देती हूँ । इसमें कोई शक नहीं कि मैंने आपसे दिल्लगी की है, मगर इसके लिए मैं आपसे इजाजत ले चुकी हूँ ! अपनी तर्जनी उंगली की अंगूठी दिखाकर) आप इसे पहचानते हैं?
कुमार–हाँ-हाँ, मैं इस अंगूठी को खूब पहचानता हूं। तिलिस्म के अन्दर यह अंगूठी मैंने इन्द्रानी को दो थी, मगर अफसोस !
कमलिनी–अफसोस न कीजिए, आपकी इन्द्रानी मरी नहीं, बल्कि जीती-जागती आपके सामने खड़ी है।
कमलिनी की इस आखिरी बात ने कुमार के दिल से आश्चर्य और दुःख को धोकर साफ कर दिया और उन्होंने खुशी-खुशी कमलिनी और किशोरी का हाथ पकड़कर कहा, "क्या यह सच है ?"
किशोरी–जी हाँ, सच है।
कुमार–और जिन दोनों को मैंने मरी हुई देखा था, वे कौन थीं? किशोरी-वे वास्तव में माधवी और मायारानी थीं जो तिलिस्म के अन्दर ही अपनी बदकारियों का फल भोगकर मर चुकी थीं । आपके दिल से उस शादी का खयाल उठा देने के लिए ही उनकी लाशें इन्द्रानी और आनन्दी बनाकर दिखा दी गई थीं, मगर वास्तव में इन्द्रानी यहीं मौजूद हैं और आनन्दी, यही लाड़िली थी जो आनन्दसिंह के साथ ब्याही गई थी-इस समय उधर भी कुछ ऐसा ही रंग मचा हुआ है।
कुमार–तुम्हारी बातों ने इस समय मुझे प्रसन्न कर दिया । विशेष प्रसन्नता तो इस बात से होती है कि तुम खुले दिल से इन बातों को बयान कर रही हो और कम- लिनी में तथा तुममें पूरे दर्जे की मुहब्बत मालूम होती है । ईश्वर इस मुहब्बत को बरा- बर इसी तरह बनाए रहे। (कमलिनी से) मगर तुमने मुझे बड़ा ही धोखा दिया, ऐसी दिल्लगी भी कभी किसी ने नहीं सुनी होगी ! आखिर ऐसा किया ही क्यों !
कमलिनी–अब क्या सब बातें खड़े-खड़े ही खतम होंगी और वैठने की इजाजत न दी जायगी?
कुमार–क्यों नहीं, अब बैठकर हँसी-दिल्लगी करने और खुशी मनाने के सिवाय और हम लोगों को करना ही क्या है !
इतना कहकर कुंअर इन्द्रजीतसिंह गद्दी पर बैठ गये और हाथ पकड़कर किशोरी और कमलिनी को अपने दोनों बगल बैठा लिया। कमला आज्ञा पाकर बैठा ही चाहती थी कि दरवाजे पर ताली बजने की आवाज आई जिसे सुनते ही वह बाहर चली गई और तुरन्त लौटकर बोली, "पहरे वाली लौंडी कहती है कि भैरोसिंह खड़े हैं।"
कुमार–(खुश होकर) हां-हो, उन्हें जल्द ले आओ, इन हजरत ने मेरे साथ क्या कम दिल्लगी की है ? अब तो मैं सब बातें समझ गया। भला आज उन्हें इत्तिला कराके मेरे पास आने का दिन तो नसीब हुआ।
कुमार की बातें सुनकर कमला पुनः बाहर चली गई और कमलिनी तथा किशोरी, कुमार के बगल से कुछ हटकर बैठ गईं, इतने ही में भैरोंसिंह भी आ पहुँचे।
कुमार–आइए-आइए ! आपने भी मुझे बहुत छकाया है। पर क्या चिन्ता है, समय मिलने पर समझ लूंगा।
भैरोंसिंह–(हँसकर)जो कुछ किया (किशोरी की तरफ बताकर) इन्होंने किया, मेरा कोई कसूर नहीं!
कुमार–खैर, जो कुछ हुआ सो हुआ, अब मुझे सच्चा-सच्चा हाल तो सुना दो कि तिलिस्म के अन्दर इस तरह की रूखी-फीकी शादी क्यों कराई गई और इस काम के अगुआ कौन महापुरुष थे?
भैरोंसिंह–(किशोरी की तरफ इशारा करके)जो कुछ किया सब इन्होंने किया, यही सब काम थे। अगुआ थीं और राजा गोपालसिंह इस काम में इनकी मदद कर रहे थे। उन्ही के आज्ञानुसार मुझे भी मजबूर होकर इन लोगों का साथ देना पड़ा था। इसका खुलासा हाल आप कमला से पूछिये, यही ठीक-ठीक बतावेगी।
कुमार–(कमला से) खैर, तुम्हीं बताओ कि क्या हुआ?
कमला–(किशोरी से) कहो बहिन, अब तो मैं साफ-ही-साफ कह दूं?
किशोरी–अब छिपाने की जरूरत ही क्या है?
कमला ने इस तरह से कहना शुरू किया, "किशोरी बहिन ने मुझसे कई दफे कहा कि 'तू इस बात का बन्दोबस्त कर कि किसी तरह मेरी शादी के पहले ही कमलिनी की शादी कुमार के साथ हो जाय ।' मगर मेरे किये इसका कुछ भी बन्दोबस्त न हो सका और कमलिनी रानी भी इस बात पर राजी होती दिखाई न दीं, अतः मैं बात टाल कर चुपकी हो बैठी, मगर मुझे इस काम में सुस्त देखकर किशोरी ने फिर मुझसे कहा कि 'देख कमला, तू मेरी बात पर कुछ ध्यान नहीं देती, मगर इसे खूब समझ रखना कि अगर मेरा इरादा पूरा न हुआ अर्थात् मेरी शादी के पहले ही कमलिनी की शादी कुमार के साथ न हो गई तो मैं कदापि ब्याह न करूँगी, बल्कि अपने गले में फांसी लगाकर जान दे दूंगी । कमलिनी ने जो कुछ अहसान मुझ पर किये हैं, उनका बदला मैं किसी तरह चुका नहीं सकती, अगर कुछ चुका सकती हूँ तो इसी तरह कि कमलिनी को पटरानी बनाऊँ और आप उसकी लौंडी होकर रहूँ, मगर अफसोस है कि तू मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं देती जिसका नतीजा यह होगा कि एक दिन तू रोयेगी और पछताएगी।' "किशोरी की इस आखिरी बात से मेरे कलेजे पर एक चोट-सी लगी और मैंने सोचा कि जो कुछ यह कहती हैं, बहुत ठीक है, ऐसा होना ही चाहिए । आखिर मैंने राजा गोपालसिंह से यह सब हाल कहा और उन्हें अपनी तरफ से भी बहुत-कुछ सम- झाया जिसका नतीजा यह निकला कि वे दिलोजान से इस काम के लिए तैयार हो गये। जब वे खुद तैयार हो गये तो फिर क्या था ? सब काम खूबी के साथ होने लगा।
"राजा गोपालसिंह ने इस विषय में कमलिनीजी से कहा और इन्हें बहुत सम- झाया, मगर ये राजी न हुई और बोली कि 'आपकी आज्ञानुसार मैं कुमार से व्याह कर लेने के लिए तैयार हूँ, मगर यह नहीं हो सकता कि किशोरी से पहले ही अपनी शादी करके उसका हक मार दूं । हाँ, किशोरी की शादी हो जाने के बाद जो कुछ आप आज्ञा देंगे मैं करूंगी।" यह जवाब सुनकर गोपालसिंहजी ने फिर कमलिनी को समझाया और कहा कि 'अगर तुम किशोरी की इच्छा पूरी न करोगी तो वह अपनी जान दे देगी, फिर तुम ही सोच लो कि उसके मर जाने पर कुमार की क्या हालत होगी और तुम्हारी इस जिद का क्या नतीजा निकलेगा?'
"गोपालसिंहजी की इस बात ने इन्हें (कमलिनी की तरफ बता कर) लाजवाब कर दिया और ये लाचार हो शादी करने पर राजी हो गईं। तब राजा साहब ने भैरों- सिंह को मिलाया और ये भी इस बात पर राजी हो गये। इसके बाद यह सोचा गया कि कुमार इस बात को स्वीकार न करेंगे अतः उन्हें धोखा देकर जहाँ तक जल्द हो तिलिस्म के अन्दर ही कमलिनी के साथ उनकी शादी कर देनी चाहिए, क्योंकि तिलिस्म के बाहर हो जाने पर हम लोग स्वाधीन न रहेंगे और अगर बड़े महाराज इस बात को सुनकर अस्वीकार कर देंगे तो फिर हम लोग कुछ भी न कर सकेंगे, इत्यादि ।
"बस यही सबब हुआ कि तिलिस्म के अन्दर आपसे तरह-तरह की चालबाजियाँ खेली गईं और भैरोंसिंह ने भी आप से सब भेद छिपा रक्खा । खुद राजा गोपालसिंहजी तिलिस्म के अन्दर आये और बुड्ढे दारोगा बनकर इस काम में उद्योग करने लगे।"
कुमार–(बात रोक कर ताज्जुब के साथ) क्या खुद गोपालसिंह बुड्ढे दारोगा बने थे?
कमला–जी हां, वह बुड्ढी मैं बनी थी, तथा किशोरी और इन्दिरा आदि ने लड़कों का रूप धरा था।
कमला–(हँसकर) यह बुड्ढी भैरोंसिंह की जोरू बनी थी। अब इस बात को सच कर दिखाना चाहिए, अर्थात् इस बुड्ढी को भैरोंसिंह के गले मढ़ना चाहिए।
कुमार–जरूर ! (कमला से) तब तो मैं समझता हूँ कि 'मकरन्द' इत्यादि के बारे में जो भैरोंसिंह ने बयान किया था, वह सब झूठ था?
कमलिनी–हां, बेशक उसमें बारह आने से ज्यादा झूठ था।
कुमार–खैर, तब क्या हुआ ? तुभ आगे बयान करो।
कमला ने फिर इस तरह बयान करना शुरू किया–
"भैरोंसिंह जान-बूझ कर इसलिए पागल बनाकर आपको दिखाये गये थे जिसमें एक तो आप धोखे में पड़ जायँ और समझें कि हमारे विपक्षी लोग भी वहाँ रहते हैं, दूसरे आपसे मिलाप हो जाने पर यदि भैरोंसिंह से कुछ भूल भी हो जाय तो आप यही समझें कि अभी तक इनके दिमाग में पागलपन का कुछ धुआं बचा हुआ है । जिस समय हम लोग तिलिस्म के अन्दर पहुँचाए गये थे, उस समय राजा गोपालसिंह ने अपनी खास तिलिस्मी किताब कमलिनीजी को दे दी थी जिससे तिलिस्म का बहुत-कुछ हाल मालूम हो गया था और इनकी मदद से हम लोग जो चाहते थे करते थे तथा हमें किसी बात की तकलीफ भी नहीं होती थी और खाने-पीने की सभी चीजें राजा गोपालसिंहजी पहुंचा दिया करते थे।
"भैरोंसिंह जव पागल बनने के बाद आपसे मिले थे तो अपना ऐयारी का बटुआ जान-बूझ कर कमलिनी के पास रख गये थे। फिर जब भैरोंसिंह को बुलाने की इच्छा हुई तो उन्हीं का बटुआ और पीले मकरन्द की लड़ाई दिखा कर वे आपसे अलग कर लिए गये, कमलिनी पीछे मकरन्द की सूरत में थीं और मैं उनका मुकाबला कर रही थी, कही-बदी और मेल की लड़ाई थी इसलिए आपने समझा होगा कि हम दोनों बड़े बहादुर और लड़ाके हैं । अतः इस मामले के बाद जब इन्द्रानी और आनन्दी वाले बाग में भैरों- सिंह आपसे मिले तब भी इन्होंने बहुत-सी झूठी बातें बनाकर आपसे कहीं और जब आप इनसे रंज हुए तो आपका संग छोड़ कर ये फिर हम लोगों की तरफ चले आये। आप दोनों भाई उस शादी करने से इन्कार करते थे, मगर मजबूरी और लाचारी ने आपका पीछा न छोड़ा, इसके अतिरिक्त खुद इन्द्रानी और आनन्दी ने भी आप दोनों को किशोरी और कामिनी की चिट्ठी दिखा कर खुश कर लिया था। यहाँ आकर आपने सुना ही है कि कमलिनीजी के पिता बलभद्रसिंहजी, जिन्हें भूतनाथ छुड़ा लाया था, यकायक गायब हो गए और कई दिनों के बाद लौट कर आये।"
कुमार-–हाँ, सुना था।
कमला–बस, उन्हें राजा गोपालसिंह ही यहाँ आकर ले गये थे और खुद बल- भद्रसिंहजी ने ही अपनी दोनों लड़कियों का कन्या-दान किया था।
कुमार–(हंसते हुए) ठीक है, अब मैं सब बातें समझ गया और यह भी मालूम हो गया कि केवल धोखा देने के लिए ही माधवी और मायारानी, जो पहले ही मर चुकी थीं, इन्द्रानी और आनन्दी बनाकर दिखाई गई थीं।
भैरोंसिंह–जी हाँ।
कुमार–मगर नानक वहाँ क्योंकर पहुंचा था? भैरोंसिंह–आप सुन चुके हैं कि तारासिंह ने नानक को कैसा छकाया था, अतः वह हम लोगों से बदला लेने की नीयत करके वहाँ गया और मायारानी से मिल गया था। कमलिनीजी ने वहाँ का रास्ता उसे बता दिया था, उसी का यह नतीजा निकला। जब मायारानी राजा गोपालसिंह के कब्जे में पड़ गई तब राजा साहब ने नानक को बहुत कुछ बुरा-भला कहा, यहाँ तक कि नानक उनके पैरों पर गिर पड़ा और उनसे अपने कसूर की माफी मांगी। उस समय राजा साहब ने उसका कसूर माफ करके उसे अपने साथ रख लिया। तब से वह उन्हीं के कब्जे में रहा और उन्हीं की आज्ञानुसार आपको धोखे में
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, अठारहवाँ भाग, ग्यारहवाँ बयान । डालने की नीयत से मायारानी और माधवी की लाश के पास दिखाई दिया था। वे दोनों पहले ही मारी जा चुकी थीं, मगर आपको भुलावा देने की नीयत से उनकी लाश इन्द्रानी और आनन्दी बना कर दिखाई गई थीं । इसके अतिरिक्त और जो कुछ हाल है, वह आपको राजा गोपालसिंहजी की जुबानी मालूम होगा।
कुमार-ठीक है, मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मायारानी और माधवी की लाश को इन्द्रानी और आनन्दी की सुरत में देखकर जो कुछ रंज मुझे हुआ था और आज तक इस घटना का जो कुछ असर मेरे दिल पर था वह जाता रहा अब मैं अपने को खुश- नसीब समझने लगा । (कमलिनी से) अच्छा यह बताओ कि रात की दिल्लगी तुमने किस तौर पर की ? मेरी समझ में कुछ नहीं आया और न इसी बात का पता लगा कि मेरी सूरत क्योंकर बदल गई?
कमलिनी–इस बात का जवाब आपको कमला से मिलेगा।
कमला–यह तो एक मामूली बात है। समझ लीजिये कि जब आप सो गए तो इन्हीं (कमलिनी) ने आपको बेहोश करके आपकी सूरत बदल दी।
कुमार–ठीक है मगर ऐसा क्यों किया?
कमला–एक तो दिल्लगी के लिए और दूसरे किशोरी के इस खयाल से कि जिसकी शादी पहले हुई है, उसी की सुहागरात भी पहले होनी चाहिए।
कुमार–(हँस कर और किशोरी की तरफ देखकर) अच्छा, तो यह सब आपकी बहादुरी है । खैर, आज आपकी पारी होगी ही, समझ लूंगा!
किशोरी ने शरमाकर सिर नीचा कर लिया और कुमार की बात का कुछ भी जवाब न दिया।
इसके बाद वे लोग कुछ देर तक हंसी-खुशी की बातें करते रहे और तब अपने- अपने ठिकाने चले गये।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी के बाद कई दिनों तक हँसी-खुशी का जलसा बराबर बना रहा क्योंकि इस शादी के आठवें ही दिन कमला की शादी भैरों- सिंह के साथ और तारासिंह की शादी इन्दिरा के साथ हो गई और इस नाते को भूतनाथ तथा इन्द्रदेव ने बड़ी खुशी के साथ मंजूर कर लिया।
इन सब कामों से छुट्टी पाकर महाराज ने निश्चय किया कि अब पुनः उसी बगुले वाले तिलिस्मी मकान में चल कर कैदियों का मुकदमा सुना जाय, अतः आज्ञानुसार बाहर के आये हुए मेहमान लोग हँसी-खुशी के साथ बिदा किए गये और फिर कई दिनों तक तैयारी करने के बाद सभी का डेरा कूच हुआ और पहले की तरह पुनः वह तिलिस्मी मकान हरा-भरा दिखाई देने लगा। कैदी भी उसी मकान के तहखानों में पहुँचाये गये और सब का मुकदमा सुनने की तैयारी होने लगी।
1.यही काम उघर लाडिली ने किया 'था। खुद तो पहले ही से कामिनी बनी हुई थी मगर जब कुमार सो गये तब उन्हें बेहोश करके उनकी सूरत बदल दी और सुबह को उनके जागने के पहले ही अपना चेहरा साफ कर लिया।
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अब हम थोड़ा-सा हाल नानक और उसकी मां का बयान करते हैं जो हर तरफ से कसूरवार होने पर भी महाराज की आज्ञानुसार कैद किये जाने से बच गये और उन्हें केवल देश-निकाले का दण्ड दिया गया।
यद्यपि महाराज ने उन दोनों पर दया की और उन्हें छोड़ दिया, मगर यह बात सर्वसाधारण को पसन्द न आई। लोग यही कहते रहे कि 'यह काम महाराज ने अच्छा नहीं किया और इसका नतीजा बहुत बुरा निकलेगा।' आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् नानक ने इस अहसान को भूल कर फसाद करने और लोगों की जान लेने पर ही कमर बांधी।
जब नानक की माँ और नानक को देश-निकाले का हुक्म हो गया और इन्द्रदेव के आदमी इन दोनों को सरहद के पार करके लौट आये तब ये दोनों बहुत ही दुःखी और उदास हो एक पेड़ के नीचे बैठ कर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। उस समय सवेरा हो चुका था और सूर्य की लालिमा पूरब में आसमान पर फैल रही थी।
रामदेई–-कहो, अब क्या इरादा है ? हम लोग तो बड़ी मुसीबत में फंस गए !
नानक–बेशक मुसीबत में फंस गए और बिल्कुल कंगाल कर दिये गए । तुम्हारे जेवरों के साथ ही साथ मेरे हर्वे भी छीन लिए गये और हम इस लायक भी न रहे कि किसी ठिकाने पहुंच कर रोजी के लिए कुछ उद्योग कर सकते ।
रामदेई-ठीक है, मगर मैं समझती हूँ कि अगर हम लोग किसी तरह नन्हीं के यहां पहुँच जायँगे तो खाने का ठिकाना हो जायेगा और उससे किसी तरह की मदद भी ले सकेंगे।
नानक-नन्हीं के यहां जाने से क्या फायदा होगा? वह तो खुद गिरफ्तार होकर कैद की हवा खा रही होगी ! हाँ, उसका भतीजा बेशक बचा हुआ है जिसे उन लोगों ने छोड़ दिया और जो नन्हीं की जायदाद का मालिक बन बैठा होगा, मगर उससे किसी तरह की उम्मीद मुझको नहीं हो सकती।
रामदेई–ठीक है, मगर नन्हीं की लौंडियों में से दो-एक ऐसी हैं जिनसे मुझे मदद मिल सकती है।
नानक–मुझे इस बात की भी उम्मीद नहीं है, इसके अतिरिक्त वहाँ तक पहुंचने के लिए भी तो समय चाहिए, यहाँ तो शाम की भूख बुझाने को पल्ले में कुछ नहीं है।
रामदेई–ठीक है मगर क्या तुम अपने घर भी मुझे नहीं ले जा सकते? वहीं तो तुम्हारे पास रुपये-पैसे की कमी नहीं होगी!
नानक–हाँ, यह हो सकता है, वहां पहुंचने पर फिर मुझे किसी तरह की तक- लीफ नहीं हो सकती, मगर इस समय तो वहाँ तक पहुँचना भी कठिन हो रहा है। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस, मेरा ऐयारी का बटुआ भी छीन लिया गया और हम लोग इस लायक भी नहीं रह गये कि किसी तरह सूरत बदल कर अपने को लोगों की आँखों से छिपा लेते। रामदेई–खैर, जो होना था सो हो गया, अब इस समय अफसोस करने से काम नहीं चलेगा। सब जेवर छिन जाने पर भी मेरे पास थोड़ा-सा सोना बचा हुआ है, अगर इससे कुछ काम चले तो
नानक–(चौंक कर) क्या कुछ है?
रामदेई–-हाँ !
इतना कहकर रामदेई ने धोती के अन्दर से छिपी हुई सोने की एक करधनी निकाली और नानक के आगे रख दी।
नानक–(करधनी को हाथ में लेकर) बहुत है, हम लोगों घर तक पहुँचा देने के लिए काफी है, और वहाँ पहुंचने पर किसी तरह की तकलीफ न रहेगी, क्योंकि वहाँ मेरे पास खाने-पीने की कमी नहीं है।
रामदेई–तो क्या वहाँ चलकर इन बातों को भूल
नानक–(बात काट कर) नहीं-नहीं, यह न समझना कि वहाँ पहुँच कर हम इन बातों को भूल जायेंगे और बेकार बैटे टुकड़े तोड़ेंगे, बल्कि वहाँ पहुँच कर इस बात का बन्दोबस्त करेंगे कि अपने दुश्मनों से बदला लिया जाय।
रामदेई–-हां, मेरा भी यही इरादा है, क्योंकि मुझे तुम्हारे बाप की बेमुरौवती का बड़ा रंज है जिसने हम लोगों को दूध की मक्खी की तरह एकदम निकाल कर फेंक दिया और पिछली मुहब्बत का कुछ खयाल न किया । शान्ता और हरनामसिंह को पाकर ऐंठ गया और इस बात का कुछ भी खयाल न किया कि आखिर नानक भी तो उसका ही लड़का है और वह ऐयारी भी जानता है।
नानक–-(जोश के साथ) बेशक यह उसकी बेईमानी और हरामजदगी है ! अगर वह चाहता तो हम लोगों को बचा सकता था।
रामदेई–बचा लेना वया, यह जो कुछ किया सब उसी ने तो किया। महाराज ने तो हुक्म दे ही दिया था कि 'भूतनाथ की इच्छानुसार इन दोनों के साथ बर्ताव किया जाय।
नानक–बेशक ऐसा ही है ! उसी कम्बख्त ने हम लोगों के साथ ऐसा सलूक किया । मगर क्या चिन्ता है, इसका बदला लिये बिना मैं कभी न छोड़े गा।
रामदेई–(आँसू बहाकर) मगर तेरी बातों पर मुझे विश्वास नहीं होता क्योंकि तेरा जोश थोड़ी ही देर का होता है।
नानक-(क्रोध के साथ रामदेई के पैरों पर हाथ रख के) मैं तुम्हारे चरणों की कसम खाकर कहता हूँ कि इसका बदला लिए बिना कभी न रहूँगा।
रामदेई–भला मैं भी तो सुनूं कि तू क्या बदला लेगा? मेरे खयाल से तो वह जान से मार देने लायक है।
नानक–ऐसा ही होगा, ऐसा ही होगा ! जो तुम कहती हो वही करूँगा बल्कि उसके लड़के हरनामसिंह को भी यमलोक पहुँचाऊँगा!
रामदेह–शाबाश ! मगर मेरा चित्त तब तक प्रसन्न नहीं होगा जब तक शान्ता का सिर अपने तलवों से न रगड़ने पाऊँगी! नानक-मैं उसका सिर भी काट कर तुम्हारे सामने लाऊँगा और तब तुमसे आशीर्वाद लूंगा।
रासदेई-शाबाश, ईश्वर तेरा भला करे ! मैं समझती हूँ कि इन बातों के लिए तू एक दफा फिर कसम खा जिसमें मेरी पूरी दिलजमई हो जाय।
नानक–(सूर्य की तरफ हाथ उठाकर) मैं त्रिलोकीनाथ के सामने हाथ उठाकर कसम खाता हूँ कि अपनी माँ की इच्छा पूरी करूँगा और जब तक ऐसा न कर लूंगा, अन्न न खाऊँगा।
रामदेई–(नानक की पीठ पर हाथ फेरकर) बस-बस, अब मैं प्रसन्न हो गई और मेरा आधा दुःख जाता रहा।
नानक–अच्छा, तो फिर यहाँ से उठो। (हाथ का इशारा करके) किसी तरह उस गांव में पहुँचना चाहिए, फिर सब बन्दोबस्त होता रहेगा।
दोनों उठे और एक गाँव की तरफ रवाना हुए जो वहां से दिखाई दे रहा था।
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पाठक, आपने सुना कि नानक ने क्या प्रण किया ? अतः अब यहाँ पर हम यह कह देना उचित समझते हैं कि नानक अपनी मां को लिये हुए जब घर पहुंचा तो वहाँ उसने एक दिन के लिए भी आराम न किया। ऐयारी का बटुआ तैयार करने के बाद हर तरह का इन्तजाम करके और चार-पांच शागिर्दो और नौकरों को साथ लेकर वह उसी दिन घर के बाहर निकला और चुनार की तरफ रवाना हुआ। जिस दिन कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की बारात निकलने वाली थी उस दिन वह चुनार की सरहद में मौजूद था। वारात की कैफियत उसने अपनी आँखों से देखी थी और इस बात की फिक्र में भी लगा हुआ था कि किसी तरह दो-चार कैदियों को कैद से छुड़ा कर अपना साथी बना लेना चाहिए और मौका मिलने पर राजा गोपालसिंह को भी इस दुनिया से उठा देना चाहिए।
अब हम कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल बयान करते हैं।
दोपहर दिन का समय है और सब कोई भोजन इत्यादि से निश्चिन्त हो चुके हैं।
एक सजे हुए कमरे में राजा गोपालसिंह, भरतसिंह, कुंअर आन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह बैठे हुए हँसी-खुशी की बातें कर रहे हैं।
गोपालसिंह-(भरतसिंह से) क्या मुझे स्वप्न में भी इस बात की उम्मीद हो सकती थी कि आपसे किसी दिन मुलाकात होगी? कदापि नहीं, क्योंकि लोगों के कहने पर मुझे विश्वास हो गया कि आप जंगल में डाकुओं के हाथ से मारे गए
भरतसिंह–और इसका बहुत बड़ा सबब यह था कि तब तक दारोगा की बेई- मानी का आपको पता न लगा था, उसे आप ईमानदार समझते थे और उसी ने मुझे कैद किया था।
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पाठक, आपने सुना कि नानक ने क्या प्रण किया ? अतः अब यहाँ पर हम यह कह देना उचित समझते हैं कि नानक अपनी मां को लिये हुए जब घर पहुंचा तो वहाँ उसने एक दिन के लिए भी आराम न किया। ऐयारी का बटुआ तैयार करने के बाद हर तरह का इन्तजाम करके और चार-पांच शागिर्दो और नौकरों को साथ लेकर वह उसी दिन घर के बाहर निकला और चुनार की तरफ रवाना हुआ। जिस दिन कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की बारात निकलने वाली थी उस दिन वह चुनार की सरहद में मौजूद था। वारात की कैफियत उसने अपनी आँखों से देखी थी और इस बात की फिक्र में भी लगा हुआ था कि किसी तरह दो-चार कैदियों को कैद से छुड़ा कर अपना साथी बना लेना चाहिए और मौका मिलने पर राजा गोपालसिंह को भी इस दुनिया से उठा देना चाहिए।
अब हम कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल बयान करते हैं।
दोपहर दिन का समय है और सब कोई भोजन इत्यादि से निश्चिन्त हो चुके हैं।
एक सजे हुए कमरे में राजा गोपालसिंह, भरतसिंह, कुंअर आन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह बैठे हुए हँसी-खुशी की बातें कर रहे हैं।
गोपालसिंह-(भरतसिंह से) क्या मुझे स्वप्न में भी इस बात की उम्मीद हो सकती थी कि आपसे किसी दिन मुलाकात होगी? कदापि नहीं, क्योंकि लोगों के कहने पर मुझे विश्वास हो गया कि आप जंगल में डाकुओं के हाथ से मारे गए
भरतसिंह–और इसका बहुत बड़ा सबब यह था कि तब तक दारोगा की बेई- मानी का आपको पता न लगा था, उसे आप ईमानदार समझते थे और उसी ने मुझे कैद किया था। गोपालसिंह–बेशक यही बात है मगर खैर, ईश्वर जिसका सहायक रहता है वह किसी के बिगाड़े नहीं बिगड़ सकता । देखिए, मायारानी ने मेरे साथ क्या कुछ नहीं किया, मगर ईश्वर ने मुझे बचा लिया और साथ ही इसके बिछुड़े हुओं को भी मिला दिया!
भरतसिंह–ठीक है, मगर मेरे प्यारे दोस्त, मैं कह नहीं सकता कि कम्बख्त दारोगा ने मुझे कैसी-कैसी तकलीफें दी हैं और मजा तो यह है कि इतना करने पर भी वह बराबर अपने को निर्दोष ही बताता रहा । अतः जब मैं अपना हाल बयान करूंगा तब आपको मालूम होगा कि दुनिया में कैसे-कैसे नमकहराम और संगीन लोग होते हैं और बदों के साथ नेकी करने का नतीजा बहुत बुरा होता है।
गोपालसिंह–ठीक है, ठीक है, इन्हीं बातों को सोचकर तो भैरोंसिंह बार-बार मुझसे कहते हैं कि 'आपने नानक को सूखा छोड़ दिया सो अच्छा नहीं किया, वह बद है और बदों के साथ नेकी करना वैसा ही है जैसा नेकों के साथ बदी करना।'
भरतसिंह–भैरोंसिंह का कहना वाजिब है, मैं उनका समर्थन करता हूँ।
भैरोंसिंह–कृपानिधान, सच तो यह है कि नानक की तरफ से मुझे किसी तरह बेफिक्री होती ही नहीं। मैं अपने दिल को कितना ही समझाता हूँ मगर वह जरा भी नहीं मानता। ताज्जुब नहीं कि भैरोंसिंह इतना कह ही रहा था कि सामने से भूतनाथ आता हुआ दिखाई पड़ा।
गोपालसिंह–अजी वाह जी भूतनाथ, चार-चार दफा बुलाने पर भी हमें आपके दर्शन नहीं होते!
भूतनाथ–(मुस्कुराता हुआ) अभी क्या हुआ है, दो-चार दिन बाद तो मेरे दर्शन और भी दुर्लभ हो जायेंगे!
गोपालसिंह–(ताज्जुब से) सो क्यों?
भूतनाथ–यही कि मेरा सपूत नानक शहर में आ पहुँचा है और मेरी अन्त्येष्टि क्रिया करके बहुत जल्द अपने सिर का बोझ हलका करने की फिक्र में लगा है । (बैठ कर) कृपा कर आप भी जरा होशियार रहियेगा!
गोपालसिंह–तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि वह इस बदनीयती के साथ यहाँ पर आ गया है?
भूतनाथ–-मुझे अच्छी तरह मालूम हो गया है। इसी से तो मुझे यहाँ आने में देर हो गई क्योंकि मैं यह हाल कहने और तीन-चार दिन की छुट्टी लेने के लिए महाराज के पास चला गया था, वहाँ से लौटा हुआ आपके पास आ रहा हूँ।
गोपालसिंह–तो क्या महाराज से छुट्टी ले आये?
भूतनाथ–-जी हाँ, अब आपसे यह पूछना है कि आप अपने लिए क्या बन्दोबस्त करेंगे?
गोपालसिंह–तुम तो इस तरह की बातें करते हो जैसे उसकी तरफ से कोई बहुत बड़ा तरवुद हो गया हो ! वह बेचारा कल का लौंडा हम लोगों के साथ क्या कर सकता है?
भूतनाथ–सो तो ठीक है, मगर दुश्मन को कभी छोटा और कमजोर नहीं समझना चाहिए।
गोपालसिंह-तुम्हें ऐसा ही डर है तो कहो बैठे-ही-बैठे चौबीस घण्टे के अन्दर उसे गिरफ्तार कराकर तुम्हारे हवाले कर दूं?
भूतनाथ-यह मुझे विश्वास है और आप ऐसा कर सकते हैं, मगर मुझे यह मंजूर नहीं है, क्योंकि मैं जरा दूसरे ढंग से उसका मुकाबला करना चाहता हूँ। आप जरा बाप-बेटे की लड़ाई देखिए तो! हाँ, अगर वह आपकी तरफ झुके, तो जैसा मौका देखिये, कीजियेगा।
गोपालसिंह-खैर, ऐसा ही सही ! मगर तुमने क्या सोचा है, जरा अपना मन- सूबा तो सुनाओ!
इसके बाद उन लोगों में देर तक बातें होती रहीं और दो घण्टे के बाद भूतनाथ उठकर अपने डेरे की तरफ चला गया।
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नानक जब चुनारगढ़ की सरहद पर पहुंचा, तब सोचने लगा कि दुश्मनों से क्यों कर बदला लेना चाहिए। वह पांच आदमियों को अपना शिकार समझे हुए था और उन्हीं पांचों की जान लेने का विचार करता था। एक तो राजा गोपालसिंह, दूसरे इन्द्रदेव, तीसरा भूतनाथ, चौथा हरनाम सिंह और पांचवीं शान्ता । बस, ये ही पाँच उसकी आँखों में खटक रहे थे, मगर इनमें से दो अर्थात् राजा गोपालसिंह और इन्द्रदेव के पास फटकने की तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ती थी और वह समझता था कि ये दोनों तिलिस्मी आदमी हैं, इनके काम जादू की तरह हुआ करते हैं और इनमें लोगों के दिल की बात समझ जाने की कुदरत है। मगर बाकी तीनों को वह निरा शिकार ही समझता था और विश्वास करता था कि इन तीनों को किसी न किसी तरह फंसा लेंगे। अतः चुनारगढ़ की सरहद में आ पहुँचने के बाद उसने गोपालसिंह और इन्द्रदेव का खयाल तो छोड़ दिया और भूतनाथ की स्त्री और उसके लड़के हरनामसिंह की जान लेने के फेर में पड़ा। साथ ही इसके यह भी समझ लेना चाहिए कि नानक यहाँ अकेला नहीं आया था, बल्कि समय पर मदद पहुँचाने के लायक सात-आठ आदमी और भी अपने साथ लाया था, जिसमें से चार-पाँच तो उसके शागिर्द ही थे।
दोनों कुमारों की शादी में जिस तरह दूर-दूर के मेहमान और तमाशबीन लोग आये थे, उसी तरह साधु-महात्मा तथा साधु वेषधारी पाखण्डी लोग भी बहुत से इकट्ठे हो गये थे, जिन्हें सरकार की तरफ से खाने-पीने को भरपूर मिलता था और इस लालच में पड़े हुए उन लोगों ने अभी तक चुनारगढ़ का पीछा नहीं छोड़ा था तथा तिलिस्मी मकान के चारों तरफ तथा आस-पास के जंगलों में डेरा डाले हुए पड़े थे। नानक और उसके साथी लोग भी साधुओं ही के वेष में वहाँ पहुंचे और उसी मंडली में मिल-जुलकर रहने लगे। नानक को यह बात मालूम थी कि भूतनाथ का डेरा तिलिरमी इमारत के अन्दर है और वह वहाँ बड़ी कड़ी हिफाजत के साथ रहता है । इसलिए वह कभी-कभी यह सोचता था कि मेरा काम सहज ही में नहीं हो जायेगा, बल्कि उसके लिए बड़ी भारी मेहनत करनी पड़ेगी। मगर वहाँ पहुँचने के कुछ ही दिन बाद (जब शादी-ब्याह से सब कोई निश्चिन्त होकर तिलिस्मी इमारत में आ गए) उसने सुना और देखा कि महाराज की आज्ञानुसार भूतनाथ ने स्त्री और लड़के सहित तिलिस्मी इमारत के बाहर एक बहुत बड़े और खूबसूरत खेमे में डेरा डाला है, अतएव वह बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसे विश्वास हो गया कि मैं अपना काम शीघ्र और सुभीते के साथ निकाल लूंगा।
नानक ने और भी दो-तीन रोज तक इन्तजार किया और इस बीच में यह भी जान लिया कि भूतनाथ के खेमे की कुछ विशेष हिफाजत नहीं होती और पहरे वगैरह का इन्तजाम भी साधारण-सा ही है तथा उसके शागिर्द लोग भी आजकल मौजूद नहीं हैं।
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी थी । यद्यपि चन्द्रदेव के दर्शन नहीं होते थे, मगर आसमान साफ होने के कारण टुटपूंजिया तारागण अपनी नामवरी पैदा करने का उद्योग कर रहे और नानक जैसे बुद्धिमान लोगों से पूछ रहे थे कि यदि हम लोग इकट्ठ हो जाये तो क्या चन्द्रमा से चौगुनी और पांचगुनी चमक-दमक नहीं दिखा सकते तथा जवाब में यह भी सुनना चाहते थे कि 'निःसन्देह !' ऐसे समय में एक आदमी स्याह लवादा ओढ़े रहने पर भी लोगों की निगाहों से अपने को बचाता हुआ भूतनाथ के खेमे की तरफ जा रहा है। पाठक समझ ही गए होंगे कि यह नानक है, अतः जब वह खेमे के पास पहुंचा तो अपने मतलव का सन्नाटा देखकर खड़ा हो गया और किसी के आने का इन्तजार करने लगा। थोड़ी ही देर में एक दूसरा आदमी भी उसके पास आया और दो-चार सायत तक बातें करके चला मया। उस समय नानक जमीन पर लेट गया और धीरे-धीरे खिसकता हुआ खेमे की कनात के पास जा पहूँचा, तब उसे धीरे से उठाकर अन्दर चला गया। यहाँ उसने अपने को गुलामगर्दिश में पाया, मगर यहाँ बिल्कुल ही अंधकार था, हाँ यह जरूर मालूम होता था कि आगे वाली कनात के अन्दर अर्थात् खेमे में कुछ रोशनी हो रही है । नानक फिर वहाँ लेट गया और पहले की तरह यह दूसरी कनात भी उठाकर खेमे के अन्दर जाने का विचार कर ही रहा था कि दाहिनी तरफ से कुछ खड़खड़ाहट की आवाज मालूम पड़ी। वह चौंका और उसी अँधेरे में तीन-चार कदम बाईं तरफ हटकर पुनः कोई आवाज सुनने और उसे जाँचने की नीयत से ठहर गया । जब थोड़ी देर तक किसी तरह की आहट नहीं मालूम हुई तो पहले की तरह ही जमीन पर लेट गया और कनात उठाकर अन्दर जाना ही चाहता था कि दाहिनी तरफ फिर किसी के पैर पटक-पटक कर चलने की आहट मालूम हुई। वह खड़ा हो गया और पुनः चार-पाँच कदम पीछे की तरफ (बाईं तरफ) हट गया, मगर इसके बाद फिर किसी तरह की आहट मालूम न हुई। कुछ देर तक इन्तजार करने के बाद वह पुनः जमीन पर लेट गया और कनात के अन्दर सिर डाल कर देखने लगा। कोने की तरफ एक मामूली शमादान जल रहा था, जिसकी मद्धिम रोशनी में दो चारपाई बिछी हुई दिखाई पड़ी। कुछ देर तक गौर करने पर नानक को निश्चय हो गया कि इन दोनों चारपाइयों पर भूतनाथ तथा उसकी स्त्री शान्ता सोई हुई है । परन्तु उनका लड़का हरामसिंह खेमे के अन्दर दिखाई न दिया और उसके लिए नानक को कुछ चिन्ता हुई, तथापि वह साहस करके खेमे के अन्दर चला ही गया।
डरता-काँपता नानक धीरे-धीरे चारपाई के पास पहुंच गया, चाहा कि खंजर से इन दोनों का गला काट डाले, मगर फिर यह सोचने लगा कि पहले किस पर वार करूं, भूतनाथ पर या शान्ता पर? वे दोनों सिर से पैर तक चादर ताने पड़े हुए थे, इससे यह मालूम करने की जरूरत थी कि किस चारपाई पर कौन सो रहा है, साथ ही इसके नानक इस बात पर भी गौर कर रहा था कि रोशनी बुझा दी जाये या नहीं। यद्यपि वह वार करने के लिए खंजर हाथ में ले चुका था, मगर उसकी दिली कमजोरी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था और उसका हाथ कांप रहा था।
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किशोरी, कामिनी, कमलिनी और लाड़िली ये चारों बड़ी मुहब्बत के साथ अपना दिन बिताने लगीं। इनकी मुहब्बत दिखावा नहीं थी, बल्कि दिली और सचाई के साथ थी। चारों ही जमाने के ऊँच-नीच को अच्छी तरह समझ चुकी थीं और खूब जानती थीं कि दुनिया में हर एक के साथ दुःख और सुख का चरखा लगा ही रहता है, खुशी तो मुश्किल से मिलती है, मगर रंज और दुःख के लिए किसी तरह का उद्योग नहीं करना पड़ता, यह आप से आप पहुँचता है, और एक साथ दस को लपेट लेने पर भी जल्दो नहीं छोड़ता, इसलिए बुद्धिमान का काम यही है कि जहाँ तक हो सके खुशी का पल्ला न छोड़े और न कोई काम ऐसा करे, जिसमें दिल को किसी तरह का रंज पहुँचे । इन चार औरतों का दिल उन नादान और कमीनी औरतों का सा नहीं था, जो दूसरों को खुण देखते ही जलभुन कर कोयला हो जाती हैं और दिन-रात कुप्पे की तरह मुंह फुलाये आँखों से पाखण्ड के आंसू बहाया करती हैं अथवा घर की औरतों के साथ मिल-जुलकर रहना अपनी बेइज्जती समझती हैं।
इन चारों का दिल आईने की तरह साफ था । नहीं-नहीं, हम भूल गये, हमें दिल के साथ आईने की उपमा देना पसन्द नहीं । न मालूम लोगों ने इस उपमा को किस लिए पसन्द कर रखा है ! उपमा में उसी वस्तु का व्यवहार करना चाहिए जिसकी प्रकृति में उपमेय से किसी तरह का फर्क न पड़े, मगर आईने (शीशे) में तो यह बात पाई नहीं जाती, हरएक आईना बेऐब. साफ और बिना धब्बे के नहीं होता और वह हर एक की सूरत एक सी भी नहीं दिखाता बल्कि जिसकी जैसी सूरत होती है, उसके मुकाबले में वैसा ही बन जाता है । इसलिए आईना उन लोगों के दिल को कहना उचित है जो नीति- कुशल हैं या जिन्होंने यह बात ठान ली है कि जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही करना चाहिए, चाहे वह अपना हो या पराया, छोटा हो या बड़ा । मगर इन चारों में यह बात न थी, ये बड़ों की झिड़की को आशीर्वाद और छोटों की ऐंठ को उनकी नादानी समझती थीं। जब कोई हमजोली या आपस वाली क्रोध भरी हुई अपना मुंह बिगाड़े इनके सामने आती तो यदि मौका होता तो ये हँसकर कह देतीं कि 'वाह, ईश्वर ने अच्छी सूरत बनाई है !' या 'बहिन, हमने तो तुम्हारा जो कुछ बिगाड़ा सो बिगाड़ा मगर तुम्हारी सुरत ने तुम्हारा क्या कसूर किया है जो तुन उसे बिगाड़ रही हो ?' बस, इतने ही में उसका रंग बदल जाता । इन बातों को विचार कर हम इनके दिल का आईने के साथ मिलान करना पसन्द नहीं करते वल्कि यह कहना मुनासिब समझते हैं कि 'इनका दिल समुद्र की तरह गम्भीर था।'
इन चारों को इस का खयाल ही न था कि हम अमीर हैं, हाथ-पैर हिलाना या घर का कामकाज करना हमारे लिए पाप है । ये खुशी से घर का काम जो इनके लायक होता करतीं औरी खाने-पीने क चीजों पर विशेष ध्यान रखतीं। सबसे बड़ा खयाल इन्हें इस बात का रहता था कि इनके पति इनसे किसी तरह रंज न होने पावें और घर के किसी बड़े बुजुर्ग को इन्हें बेअदब कहने का मौका न मिले । महारानी चन्द्र- कान्ता की तो बात ही दूसरी है, ये चपला और चम्पा को भी सास की तरह समझती और इज्जत करती थीं । घर की लौंडियां तक इनसे प्रसन्न रहतीं और जब किसी लौंडी से कोई कसूर हो जाता तो झिड़की और गालियों के बदले नसीहत के साथ समझाकर ये उसे कायल और शर्मिन्दा कर देती और उसके मुंह से कहला देतीं कि 'बेशक मुझसे भूल हुई, आइन्दा कभी ऐसा न होगा !' सबसे विचित्र बात तो यह थी कि इनके चेहरे पर रंज क्रोध या उदासी कभी दिखाई देती ही न थी और जब कभी ऐसा होता तो किसी भारी घटना का अनुमान किया जाता था। हां, उस समय इनके दुःख और चिन्ता कोई ठिकाना नहीं रहता था जब ये अपने पति को किसी कारण दुःखी देखतीं । ऐसी अवस्था में इनकी सच्ची भक्ति के कारण इनके पति को अपनी उदासी छिपानी पड़ती या इन्हें प्रसन्न करने और हंसाने के लिए और किसी तरह का उद्योग करना पड़ता । मतलब यह है कि इन्होंने घ भर का दिल अपने हाथ में कर रखा था और ये घर भर की प्रसन्नता का कारण समझी जाती थीं।
भूतनाथ की स्त्री शान्ता का इन्हें बहुत बड़ा खयाल रहता और ये उसकी पिछली घटनाओं को याद करके उसकी पति-भक्ति की सराहना किया करतीं।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन्हें अपनी जिन्दगी में दुःखों के बड़े-बड़े समुद्र पार करने पड़े थे परन्तु ईश्वर की कृपा से जब ये किनारे लगी, तब इन्हें कल्पवृक्ष की छाया मिली और किसी बात की परवाह न रही।
इस समय संध्या होने में घण्टे भर की देर है । सूर्य भगवान् अस्ताचल की तरफ तेजी के साथ झुके चले जा रहे हैं और उनकी लाल-लाल पिछली किरणों से बड़ी-बड़ी अटारियां तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के ऊपरी हिस्सों पर ठहरा हुआ सुनहरा रंग बड़ा ही सुहा- वना मालूम पड़ता है । ऐसा जान पड़ता है मानो प्रकृति ने प्रसन्न होकर अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपनी सहचरियों और सहायकों को सुनहरा ताज पहना दिया है।
ऐसे समय में किशोरी, कामिनी, लाड़िली और कमला अटारी पर एक सजे हुए बंगले के अन्दर बैठी जालीदार खिड़कियों से उस जंगल की शोभा देख रही हैं जो इस तिलिस्मी मकान से थोड़ी दूर पर है और साथ ही इसके मीठी बातें भी करती जाती हैं।
कमलिनी–(किशोरी से) बहिन एक दिन वह था कि हमें अपनी इच्छा के विरुद्ध ऐसे बल्कि इससे भी बढ़कर भयानक जंगलों में घूमना पड़ता था और उस समय यह सोचकर डर मालूम पड़ता था कि कोई शेर इधर-उधर से निकलकर हम पर हमला न करे, और एक आज का दिन है कि इस जंगल की शोभा भली मालूम पड़ती है और इसमें घूमने को जी चाहता है।
किशोरी–ठीक है, जो काम लाचारी के साथ करना पड़ता है वह चाहे अच्छा ही क्यों न हो परन्तु चित्त को बुरा लगता है, फिर भयानक तथा कठिन कामों का तो कहना ही क्या ! मुझे तो जंगल में शेर और भेड़ियों का इतना खयाल न होता था जितना दुश्मनों का, मगर वह समय और ही था ईश्वर न करे किसी दुश्मन को दिखे । उस समय हम लोगों की किस्मत बिगड़ी हुई थी और अपने साथी लोग भी दुश्मन बनकर सताने के लिए तैयार हो जाते थे। (कमला की तरफ देखकर) भला तुम्ही बताओ कि उस चमेला छोकरी का मैंने क्या बिगाड़ा था जिसने मुझे हर तरह से तबाह कर दिया ? अगर वह मेरी मुहब्बत का हाल मेरे पिता से न कह देती तो मुझ पर वैसी भयानक मुसीबत क्यों आ जाती?
कमला–बेशक ऐसा ही है, मगर उसने जैसी नमकहरामी की, वैसी ही सजा पाई । मेरे हाथ के कोड़े वह जन्म भर न भूलेगी!
किशोरी–मगर इतना होने पर भी उसने मेरे पिता के जी का ठीक-ठीक भेद न बताया।
कमला–बेशक वह बहुत ही जिद्दी निकली, मगर तुमने भी यह बड़ी लायकी दिखाई कि अन्त में उसे छोड़ देने का हुक्म दे दिया। अब भी वह जहाँ जायगी, दुःख ही भोगेगी।
किशोरी–इसके अतिरिक्त उस जमाने में धनपत के भाई ने क्या मुझे कम तकलीफ दी थी जब मैं नागर के यहां कैद थी ! उस कम्बख्त की तो सूरत देखने से मेरा खून खुश्क हो जाता था!
लाड़िली-वही जिसे भूतनाथ ने जहन्नुम में पहुंचा दिया ? मगर नागर इस मामले को बिल्कुल ही छिपा गई, मायारानी से उसने कुछ भी न कहा और इसी में उसका भला भी था।
किशोरी–(लाड़िली से) बहिन, तुम तो बड़ी नेक हो और तुम्हारा ध्यान भी धर्म-विषयक कामों में विशेष रहता है, मगर उन दिनों तुम्हें क्या हो गया था कि माया- रानी के साथ बुरे कामों में अपना दिन बिताती थीं और हम लोगों की जान लेने के लिए तैयार रहती थीं?
लाड़िली–(लज्जा और उदासी के साथ) फिर तुमने वही चर्चा छेड़ी ! मैं कई दफे हाथ जोड़कर तुमसे कह चुकी हूँ कि अब उन बातों की याद दिलाकर मुझे शर्मिन्दा
1.देखिए चन्द्रकान्ता सन्तंति, पहला भाग, ग्यारहवें बयान का अन्त। 2. " " आठवा भाग, नौवां बयान। करो, दुःख न दो, मेरे मुंह में बार-बार स्याही न लगाओ। उन दिनों मैं पराधीन थी मेरा कोई सहायक न था, मेरे लिए कोई और ठिकाना न था, और उस दुष्टा का साथ छोड़कर मैं अपने को कहीं छिपा भी नहीं सकती थी और डरती थी कि वहां से निकल भागने पर कहीं मेरी इज्जत पर न आ बने ! मगर बहिन, तुम जान-बूझकर बार-बार उन बातों की याद दिलाकर मुझे सताती हो, कहो बैलूं या यहां से उठ जाऊँ?
किशोरी–अच्छा-अच्छा जाने दो, माफ करो, मुझसे भूल गई, मगर मेरा मत- लब वह न था जो तुमने समझा है, मैं दो-चार बातें नानक के विषय में पूछना चाहती थी जिसका पता अभी तक नहीं लगा और जो भेद की तरह हम लोगों
लाड़िली–(बात काटकर) वे बातें भी तो मेरे लिए वैसी ही दुःखदायी हैं।
किशोरी–नहीं-नहीं, मैं यह न पूडूंगी कि तुमने नानक के साथ रामभोली बन- कर क्या-क्या किया, बल्कि यह पूडूंगी कि उस टोन के डिब्बे में क्या था जो नानक ने चुरा लाकर तुम्हें बजरे में दिया था ? कुएं में से हाथ कैसे निकला था ? नहर के किनारे वाले बंगले में पहुंचकर वह क्योंकर फंसा लिया गया ? उस बंगले में वह तस्वीरें कैसी थों ? असली रामभोली कहाँ गई और क्या हुई ? रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर तुम्हारी तस्वीर किसने लटकाई और तुम्हें वहाँ का भेद कैसे मालूम हुआ था इत्यादि बातें मैं कई दफे कई तरह से सुन चुकी हूँ मगर उनका असल भेअभी तक कुछ मालूम न हुआ।
लाड़िली–हां, इन सब बातों का जवाब देने के लिए मैं तैयार हूँ। तुम जानती हो और अच्छी तरह सुन और समझ भी चुकी हो कि वह तिलिस्मी बाग तरह-तरह के अजायबातों से भरा हुआ है, विशेष नहीं तो भी वहाँ का बहुत-कुछ हाल मायारानी और दारोगा को मालूम था। वहां या उसकी सरहद में ले जाकर किसी को हराने, धमकाने या तकलीफ देने के लिए कोई ताज्जुब का तमाशा दिखाना कौन बड़ी बात थी!
किशोरी–हां, सो तो ठीक ही है।
लाड़िली–और फिर नानक जान-बूझकर काम निकालने के लिए ही तो गिर- फ्तार किया गया था। इसके अतिरिक्त तुम पहले यह भी सुन चुकी हो कि दारोगा के बँगले या अजायबघर से खास बाग तक नीचे-नीचे रास्ता बना हुआ है, ऐसी अवस्था में नानक के साथ वैसा बर्ताव करना कौन-सी बड़ी बात थी!
किशोरी–बेशक ऐसा ही है, अच्छा उस डिब्बे वगैरह का भेद तो बताओ!
लाड़िली–उस गठरी में जो कलमदान था, वह तो हमारे विशेष काम का न था मगर उस डिब्बे में वही इन्दिरा वाला कलमदान था जिसके लिए दारोगा साहब बेताब हो रहे थे और चाहते थे कि वह किसी तरह पुनः उनके कब्जे में आ जाय । असल में उसी कलमदान के लिए मुझे रामभोली बनना पड़ा था । दारोगा ने असली रामभोली को तो गिरफ्तार करवा के इस तरह मरवा डाला कि किसी को कानों-कान खबर भी न हुई और मुझे रामभोली बनकर यह काम निकालने की आज्ञा दी । लाचार मैं रामभोली बनकर नानक से मिली और उसे अपने वश में करने के बाद इन्द्रदेव जी के मकान में से वह कलमदान तथा उसके साथ और भी कई तरह के कागज नानक की मार्फत चुरा
1. देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति, चौथा भाग, नानक का बयान ।
च०स०-6-9
मंगवाये । मुझे तो उस कलमदान की सूरत देखने से भी डर मालूम होता था क्योंकि म
जानती थी कि वह कलमदान हम लोगों के खून का प्यासा और दारोगा के बड़े-बड़े भेदों से भरा हुआ है । इसके अतिरिक्त उस पर इन्दिरा की बचपन की तस्वीर भी बनी हुई थी और सुन्दर अक्षरों में इन्दिरा का नाम लिखा हुआ था. जिसके विषय में मैं उन दिनों जानती थी कि वे माँ-बेटी बड़ी बेदर्दी के साथ मारी गई । यही सबब था कि उस कलम- दान की सूरत देखते ही मुझे तरह-तरह की बातें याद आ गईं, मेरा कलेजा दहल गया और मैं डर के मारे काँपने लगी। खैर, जब मैं नानक को लिए हुए जमानिया की सर- हद में पहुंची तो उसे धनपत के हवाले करके खास बाग में चली गई, अपना दुपट्टा नहर में फेंकती गई। दूसरी राह से उस तिलिस्मी कुएं के नीचे पहुँच कर पानी का प्याला और बनावटी हाथ निकालने के बाद मायारानी से जा मिली और फिर बचा हुआ काम धनपत और दारोगा ने पूरा किया। दारोगा वाले बंगले में जो तस्वीर रक्खी हुई थी वह केवल नानक को धोखा देने के लिए थी, उसका और कोई मतलब न था, और रोहतासगढ़ के तहखाने में जो मेरी तस्वीर आप लोगों ने देखी थी, वह वास्तव में दिग्विजयसिंह की बुआ ने मेरे सुभीते के लिए लटकाई थी और तहखाने की बहुत-सी बातें समझाकर बता दिया था कि 'जहाँ तू अपनी तस्वीर देखना समझ लेना कि उसके फला तरफ फलां बात है' इत्यादि । बस, वह तस्वीर इतने ही काम के लिए लटकाई गई, थी । वह बुढ़िया बड़ी नेक थी, और उस तहखाने का हाल बनिस्बत दिग्विजयसिंह के बहुत ज्यादा जानती थी, मैं पहले भी महाराज के सामने बयान कर चुकी हूं कि उसने मेरी मदद की थी। वह कई दफे मेरे डेरे पर आई थी और तरह-तरह की बातें समझा गई थी। मगर न तो दिग्विजयसिंह उसकी कदर करता था और न वही दिग्विजयसिंह को चाहती थी। इसके अतिरिक्त यह भी कह देना आवश्यक है कि मैं तो उस बुढ़िया की मदद से तहखाने के अन्दर चली गई थी मगर कुन्दन अर्थात् धनपत ने वहां जो कुछ किया वह मायारानी के दारोगा की बदौलत था। घर लौटने पर मुझे मालूम हुआ कि दारोगा वहाँ कई दफे छिपकर गया और कुन्दन से मिला था मगर उसे मेरे बारे में कुछ खबर न थी, अगर खबर होती तो मेरे और कुन्दन के बीच जुदाई न रहती। मगर मुझे इस बात का ताज्जुब जरूर है कि वापस घर पहुंचने पर भी धनपत ने वहां की बहुत- सी बातें मुझसे छिपा रक्खीं।
किशोरी–अच्छा, यह तो बताओ कि रोहतासगढ़ में जो तस्वीर तुमने कुन्दन को दिखाने के लिए मुझे दी थी, वह तुम्हें कहाँ से मिली थी और तुम्हें तथा कुन्दन को उसका असली हाल क्योंकर मालूम हुआ था?
लाड़िली–उन दिनों मैं यह जानने के लिए बेताब हो रही थी कि कुन्दन असल में कौन हैं । मुझे इस बात का भी शक हुआ था कि वह राजा साहब (वीरेन्द्रसिंह) की कोई ऐयारा होगी और यही शक मिटाने के लिए मैंने वह तस्वीर खुद बनाकर उसे दिखाने के लिए तुम्हें दी थी । असल में उस तस्वीर का भेद हम लोगों को मनोरमा की
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, चौथा भाग, दसवां बयान। जुबानी मालूम हुआ था और मनोरमा ने इन्दिरा से उस समय सुना था जब मनोरमा को माँ समझ के वह उसके फेर में पेड़ गई थी।
किशोरी–-ठीक है मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि इन सब बखेड़ों की जड़ वही कम्बख्त दारोगा है। यदि जमानिया के राज्य में दारोगा न होता तो इन सब बाटों में से एक भी न सुनाई देती और न हम लोगों की दुःखमय कहानी का कोई अंश लोगों के कहने सुनने के लिए पैदा होता । (कमलिनी से) मगर बहिन, यह तो बताओ कि इस हरामी के पिल्ले (दारोगा) का कोई वारिस या रिश्तेदार भी दुनिया में है या नहीं?
कमलिनी–सिवाय एक के और कोई नहीं ! दुनिया का कायदा है कि जब आदमी भलाई या बुराई कुछ सीखता है तो पहले अपने घर ही से उसे आरम्भ करता है । मां-बाप के अनुचित लाड़-प्यार और उनकी असावधानी से बुरी राह पर चलने वाले लड़के घर ही में श्रीगणेश करते हैं और तब कुछ दिन के बाद वे दुनिया में मशहूर होने योग्य होते हैं । यही बात इस हरामखोर की भी थी, इसने पहले अपने नाते-रिश्तेदार ही पर सफाई का हाथ फेरा और उन्हें जहन्नुम पहुँचाकर समय के पहले घर का मालिक बन बैठा । साधु का भेष धरना इसने लड़कपन ही से सीखा है और विशेष करके इसके इसी भेष की बदौलत लोग धोखे में भी पड़े । हमारे राजा गोपालसिंह ने भी (मुस्कुराती हुई) इसे वशिष्ठ मुनि ही समझकर अपने यहाँ रक्खा था। हाँ, इसका एक चचेरा भाई जरूर बच गया था जो इसके हत्थे नहीं चढ़ा था, क्योंकि वह खुद भी परले सिरे का बदमाश था और इसकी करतूतों को खूब समझता था जिससे लाचार होकर इसे उसकी खुशामद करनी ही पड़ी और उसे अपना साथी बनाना ही पड़ा।
किशोरी–क्या वह मर गया? उसका क्या नाम था?
कमलिनी–नहीं वह मरा नहीं, मगर मरने के ही बराबर है, क्योंकि वह हमारे यहां कैद है । उसने अपना नाम शिखण्डी रख लिया था। तुम जानती ही हो कि जब मैं जमानिया के खास बाग के तहखाने और सुरंग की राह से दोनों कुमारों तथा बाकी कैदियों को लेकर बाहर निकल रही थी तो हाथी वाले दरवाजे पर उसने इनके (इन्द्र- जीतसिंह) के ऊपर वार किया था।
किशोरी-–हाँ-हाँ, तो क्या वह वही कम्बख्त था?
कमलिनी–-हाँ वही था। उसे मैं अपना पक्षपाती समझती थी मगर बेईमान ने मुझे धोखा दिया । ईश्वर की कृपा थी कि पहले ही वार में वह उसी जगह गिरफ्तार हो गया, नहीं तो शायद मुझे धोखे में पड़कर बहुत तकलीफें उठानी पड़ती और
कमलिनी ने इतना कहा ही था कि उसका ध्यान सामने के जंगल की तरफ जा पड़ा। उसने देखा कि कुंअर आनन्दसिंह एक सब्ज घोड़े पर सवार सामने की तरफ से आ रहे हैं, साथ में केवल तारासिंह एक छोटे टटू पर सवार बातें करते आ रहे हैं, और दूसरा कोई आदमी नहीं है । साथ ही इसके कमलिनी को एक और अद्भुत दृश्य दिखाई दिया जिससे वह यकायक चौंक पड़ी और इसलिए उसका तथा और सभी का
1. देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति, तीसरा भाग, दसवाँ बयान, और उन्नीसवाँ भाग, छठवां बयान। 2. देखिए। " " आठवाँ भाग, दूसरा बयान। ध्यान भी उसी तरफ जा पड़ा।
उसने देखा कि आनन्दसिंह और तारासिंह जंगल में से निकलकर कुछ ही दूर मैदान में आये थे कि यकायक एक बार पुनः पीछे की तरफ घूमे और गौर के साथ कुछ देखने लगे। कुछ ही देर बाद और भी दस-बारह नकाबपोश आदमी हाथ में तीर-कमान लिए दिखाई पड़े जो जंगल से बाहर निकलते ही इन दोनों पर फुर्ती के साथ तीर चलाने लगे। ये दोनों भी म्यान से तलवार निकालकर उन लोगों की तरफ झपटे और देखते ही देखते सब लड़ते-भिड़ते पुनः जंगल में घुसकर देखने वालों की नजरों से गायब हो गए।कमलिनी, किशोरी और कामिनी वगैरह इस घटना को देखकर घबरा गयीं, सभी की इच्छानुसार कमला दौड़ी हुई गई और एक लौंडी को इस मामले की खबर करने के लिए नीचे कुंअर इन्द्रजीतसिंह के पास भेजा।
JIM – Assistente
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