चन्द्रकांता सन्तति 3
किशोरी, कामिनी और तारा कैदियों को घसीटते हुए ले गईं और आधे घंटे में मुरंग के दूसरे मुहाने पर पहुंची। यह मुहाना पहाड़ी के एक खोह से संबन्ध रखता था और वहाँ लोहे का छोटा सा दरवाजा लगा हुआ था जो इस समय खुला था। तारा ने कैदियों को बाहर फेंक कर दरवाजा बन्द कर दिया और इसके बाद तीनों वहाँ से लौट
च० स०-3-8
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पड़ी। रास्ते में तारा ने तिलिस्मी नेजे और खंजर का पूरा-पूरा हाल किशोरी और कामिनी को समझाया।
तहखाने में पहुँचकर सुरंग का दूसरा दरवाजा बन्द किया गया और फिर ऊपर पहुँच कर तारा ने तहखाने का दरवाजा भी बन्द करके ताला लगा दिया। है।
इधर तालाब का जल तेजी के साथ सूख रहा था क्योंकि तालाब के ऊपरी हिस्से में लम्बाई-चौड़ाई ज्यादा होने के कारण जल भी ज्यादा अँटता है इसी तरह निचले हिस्से में लम्बाई-चौड़ाई कम होने के कारण जल कम रहता है, इसीलिए बनिस्बत ऊपरी हिस्से के तालाब के निचले हिस्से का जल क्रमशः तेजी के साथ कम होता गया, यहाँ तक कि जब तारा सुरंग और तहखाने से निकल कर मकान की छत पर पहुंची तो उस ने तालाब को सुखा हुआ पाया। मकान के चारों तरफ घूमने वाले लोहे के चक्र तेजी के साथ घूम रहे थे और दुश्मन लोग यह सोचकर कि उन चक्रों की बदौलत मकान तक पहुँचना बहुत कठिन बल्कि असम्भव है उन चक्रों को ताज्जुब के साथ देख और उनको रोकने की तरकीब सोच रहे थे। इधर किशोरी, कामिनी और तारा भी उनकी इस अवस्था को मकान की छत पर से दीवार के उन छेदों की राह देख रही थीं जो दुश्मनों पर तोप के गोले बरसाने के लिए बने हुए थे।
इस समय रात दो घण्टे से ज्यादा जा चुकी थी मगर पहर ही भर तक दर्शन देकर अस्त हो जाने वाले चन्द्रमा की रोशनी दुश्मनों की किसी कार्रवाई को अंधेरे के पर्दे में छिपी रहने नहीं देती थी।
दुश्मनों ने जब देखा कि चक्रों के सबब से मकान तक पहुँचना असम्भव है तो उन्होंने उद्योग का एक मजेदार ढंग निकला जिसे देख तारा, किशोरी और कामिनी के दिल में खौफ पैदा हुआ, अर्थात् दुश्मनों ने तालाब को मिट्टी से पाटना शुरू किया। बेशक यह तरकीब बहुत ही अच्छी थी क्योंकि तालाब पट जाने पर उन चक्रों का घूमना न घमना बराबर था और आश्चर्य नहीं कि मिट्टी के अन्दर दब जाने के कारण वे रुक भी जाते, मगर इस काम के लिए दुश्मनों को मामूली से बहुत ज्यादा समय नष्ट करना पड़ा क्योंकि उन लोगों के पास जमीन खोदने के लिए फावड़ा या कुदाली की किस्म का कोई औजार न था, खञ्जर, तलवार और नेजों ही से वे लोग जो कुछ कर सकते थे, करने लगे।
दुश्मनों के इस उद्योग को देखकर तारा का कलेजा दहल गया और उसने अफसोस के साथ किशोरी की तरफ देख के कहा
तारा-अहो अब इस उद्योग का क्या जवाब दिया जाय?
किशोरी–यद्यपि वे लोग एक दिन में तालाब नहीं पाट सकते मगर हम लोगों के बचाव के लिए अब कोई तरकीब सोचनी चाहिए क्योंकि तालाब पट जाने पर ये चारों चक्र जमीन के अन्दर हो जायेंगे और उस समय इस मकान में दुश्मनों का घुस आना कुछ कठिन न होगा।
कामिनी-उस सुरंग की राह भाग जाने के सिवाय हम लोग और कुछ भी नहीं कर सकेंगे।
तारा-क्या दुश्मन लोग सुरंग के उस मुहाने को सूना छोड़ देंगे जिसका पूरापूरा हाल उन लोगों को मालूम हो चुका है?
कामिनी-इसकी आशा भी नहीं हो सकती, वेशक भागना मुश्किल हो जायगा। खैर जो कुछ होगा देखा जायगा। इस समय तो मैं यही मुनासिब समझती हूँ कि तीर मार कर दुश्मनों की गिनती कम करनी चाहिए। वे लोग हम लोगों पर कोई हर्वा नहीं चला सकते।
तारा–हाँ, इस समय तो यही करना मुनासिब होगा इसके बाद जो राय होगी किया जायगा, मगर बहिन, मैं फिर भी कहती हूँ कि तुम मुझे तिलिस्मी नेजा हाथ में लेकर सुरंग की राह से निकल जाने दो, फिर देखो तो सही कि मैं अकेली इतने दुश्मनों को क्योंकर बात की बात में मार गिराती हूँ। तुम्हें इस नेजे का हाल पूरा-पूरा मालूम हो ही चुका है अतएव उस पर भरोसा करके तुम्हें उचित है कि मुझे न रोको, मैं नहीं चाहती कि यह तालाब पट जाय और फिर सफाई कराने के लिए तकलीफ उठानी पड़े।
कामिनी तुम्हारा कहना ठीक है, इस नेजे की जहाँ तक तारीफ की जाय कम है, और तुम उन सभी को जहन्नुम में पहुंचा सकोगी जो दुश्मनी की नीयत से तुम्हारे पास आयेंगे, मगर उनका तुम क्या बिगाड़ सकोगी जो दूर ही से तुम्हें तीर का निशाना बनावेंगे।
तारा-(कुछ सोचकर) बेशक, यह एक ऐसी बात तुमने कही जिस पर विचार करना चाहिए "अच्छा, खूब याद आया। इस मकान में फौलाद का एक ऐसा कवच है, जो बदन पर ठीक आ सकता है, मैं उसे पहनकर जाऊँगी और तीर की चोट से बेफिक्र रहूंगी। यद्यपि इस पर भी तुम कह सकती हो कि आँख, नाक, कान, मुँह इत्यादि किसकिस जगह की तुम हिफाजत कर सकती हो? मगर इसके साथ ही यह बात भी सोचना चाहिए कि अगर तालाब पाटकर दुश्मन यहाँ घुस आवेंगे और हम लोगों को पकड़ लेंगे तो क्या होगा? अपनी बेइज्जती कराना और बेहुर्मती के साथ जान देना अच्छा होगा या बहादुरी के साथ सौ-पचास को मारकर लड़ाई के मैदान में मिट जाना उचित होगा?
किशोरी–जब ऐसा ही है और तुम प्राण देने के लिए मुस्तैद होकर जाती ही हो तो हम दोनों को क्यों छोड़े जाती हो? क्या इसलिए कि तुम्हारे बाद हम लोगों की दुर्दशा और बेइज्जती हो?
इस विषय में किशोरी, कामिनी और तारा में देर तक हुज्जत और बहस होती रही, अन्त में यही निश्चय हुआ कि सूरत बदलने और कवच पहनने के बाद हाथ में तिलिस्मी नेजा लेकर तारा सुरंग की राह से जाय और दुश्मनों का मुकाबला करे, किशोरी और कामिनी दोनों में से एक या दोनों तारा के साथ सुरंग में जायें और जब तारा सुरंग के बाहर हो जाय तो हर एक दरवाजे को बन्द करती हुई लौट आवें। इसके बाद दुश्मनों के भाग जाने पर मकान में तारा का लौट आना कोई मुश्किल न होगा।
यह बात तै पाई गई और तीनों नौजवान औरतें जिनमें आपस में बहिनों से भी बढ़कर मुहब्बत हो गई थी, छत के नीचे उतर आई और एक कोठरी में चली गयीं। तारा ने ऐयारी के मसाले से अपने को रँगा और अपनी ऐसी भयानक सूरत बनाई कि
देखने वाला कैसी ही जीवट का क्यों न हो, मगर एक दफे तो अवश्य ही डर जाय। इसके बाद कवच पहना और तिलिस्मी नेजा लेकर सुरंग में रवाना हुई, हाथ में एक लालटेन लिए किशोरी और कामिनी भी साथ हुईं।
पहले तहखाने वाली कोठरी का दरवाजा खोला गया, फिर सुरंग का दरवाजा खोलकर तीनों मुँहबोली बहिनें सुरंग में दाखिल हो गयीं।
ये तीनों बीस-पच्चीस कदम से ज्यादा न गई होंगी कि पीछे की तरफ से यकायक दरवाजा बन्द कर लेने की आवाज आई, जिसे सुनते ही तीनों चौंक पड़ी और खड़ी हो गयीं। तारा ने किशोरी और कामिनी की तरफ देखकर कहा-"हैं, यह क्या बात है? मालूम होता है कि हमारा दुश्मन हमारे घर ही में है!" यह कहती हुई किशोरी और कामिनी के साथ तारा पीछे की तरफ लौटी और जब सुरंग के दरवाजे के पास आई तो दरवाजा बन्द पाया। खटखटाया, धक्का दिया, जोर किया, मगर दरवाजा न खुला। इस समय उन तीनों अबलाओं के दिल की क्या हालत हुई होगी सो हमारे बुद्धिमान पाठक स्वयं सोच सकते हैं। कामिनी ने घबराकर तारा से कहा, "तुम्हारा कहना ठीक है, बेशक हमारा दुश्मन हमारे घर ही में है।"
किशोरी-चाहे कोई हमारा नौकर हमारा दुश्मन हो या दुश्मन का कोई ऐयार हमारे नौकर की सूरत में यहां आकर टिका हो।
तारा-अब शक दूर हो गया और निश्चय हो गया कि कैदियों को इसी कम्बख्त ने निकाल दिया। मैं ताज्जुब में थी कि यह दरवाजा जो दूसरी तरफ से किसी तरह नहीं खुल सकता क्योंकर खुला और कैदी लोग क्योंकर निकल गये, मगर अब जो कुछ असल बात थी, जाहिर हो गई। अब उस शैतान ने (चाहे वह कोई भी हो) इसलिए यह दरवाजा बन्द कर दिया कि हम लोग पुनः लौटकर घर में न आ पावें। अफसोस बड़ा ही धोखा हुआ कि इतने पर भी हम लोग उससे बेफिक्र रहे और इस समय भी वह छिपकर हम लोगों के साथ ही साथ कैदखाने में उतरा, मगर कुछ मालूम न हुआ। (कुछे रुककर) हमारे नौकरों और लौंडियों को क्या मालूम हो सकता है कि इस समय हम लोगों के साथ किस दुष्ट ने कैसा बर्ताव किया!
कामिनी-क्या इस तरफ इस दरवाजे को खोलने की कोई तरकीब नहीं है?
तारा-कोई नहीं।
कामिनी-और अगर दुश्मनों ने सुरंग के मुहाने का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया हो तो क्या होगा?
तारा-उस दरवाजे के दूसरी तरफ ऐसी चीज नहीं है जो दरवाजा बन्द करने के काम में आवे, मगर फिर भी दुश्मन होशियार हो तो हर तरह से वह मुहाना बन्द कर सकता है। उस दरवाजे के ऊपर मिट्टी, पत्थर या चूने का ढेर लगा सकता है, ईंटपत्थर की जुड़ाई कर सकता है, या उस खोह भर को ईंट-पत्थर से बन्द कर सकता है।
किशोरी–हाय, अब हम लोग बेमौत मारे गये| ताज्जुब नहीं कि इस बात का बन्दोबस्त पहले ही मे कर लिया गया हो।
कामिनी-बस, अब हम लोगों को यहां जरा भी न अटक कर सुरंग के बाहर
निकल चलना चाहिए. शायद उधर का रास्ता अभी बन्द न हुआ हो।
तारा, किशोरी और कामिनी तेजी के साथ सुरंग के दूसरे मुहाने की तरफ रवाना हुई और थोड़ी ही देर में वहाँ जा पहुँची। इस सुरंग में मकान की तरफ जिस तरह की सीढ़ियां बनी हुई थीं, उसी तरह की सीढ़ियां सुरंग के दूसरी तरफ भी थीं। जब तारा ने दरवाजे की कुण्डी खोली और उसे धक्का देकर खोलना चाहा तो दरवाजा न खुला, उस समय तारा हाय करके बैठ गई और बोली-'बहिन, बस जो कुछ हम लोगों को शक था वही हुआ। इस समय दुश्मनों की बन पड़ी और हम लोग बेमौत मारे गये। यह दरवाजा भीतर की तरफ हटता होता तो खुल जाता और हमें मालूम हो जाता कि आगे रास्ता किस चीज से बन्द किया गया है, ईंट-पत्थर और चने से या खाली मिट्टी से, और हम लोग इस तिलिस्मी नेजे से उसमें रास्ता बनाकर निकल जाने का उद्योग करते क्योंकि यह नेजा हरएक चीज में घुस जाने की ताकत रखता है, मगर अफसोस तो यह है कि यह लोहे का मजबूत दरवाजा खुलने के समय बाहर की तरफ खुलता है। यह भी कारीगर की भूल है। भूलों का मजा समय पड़ने पर ही मालूम होता है, अब मुझे मालूम हुआ कि मकान बनाने वाले को दरवाजे की अवस्था पर विशेष ध्यान देना चाहिए, कोई दरवाजा ऐसा न बनाना चाहिए जो खुलते समय बाहर की तरफ खुलता हो, जिसे बाहर वाला मामूली तौर पर मिट्टी का ढेर लगाकर भी बन्द कर सकता है। हाय, अब मैं क्या करूं? मुझे अपने मरने का तो कुछ भी रंज नहीं है अगर रंज है तो केवल इतना ही कि तुम दोनों को कमलिनी ने हिफाजत से रखने के लिए के लिए मेरे पास भेजा और मेरी बदौलत तुम्हें यह दिन देखना नसीब हुआ!"
मामूली तौर पर जैसा कि अक्सर मौका पड़ने पर लोग कह दिया करते हैं, इस समय किशोरी और कामिनी यह बात तारा को कह सकती थीं कि 'बहिन, हम लोग तो तुम्हें मना करते थे कि सुरंग की राह से बाहर मत जाओ, मगर तुमने न माना, अगर मान जाती तो यह दुःख भोगना क्यों नसीब होता?'
मगर नहीं, बेचारी किशोरी और कामिनी बड़ी ही नेकदिल थीं, वे जानती थीं कि जो होना था सो तो हो चुका, अब ऐसी बातें कहकर तारा का दिल दुखाना नादानी है और इससे कोई फायदा नहीं, तारा ने जो कुछ किया उसे भला ही समझ के किया। मगर जब ईश्वर की भी ऐसी मर्जी हो तो क्या किया जाय।
इस सुरंग के दोनों तरफ की दीवार बहुत ही मजबूत थी और उस पर फौलादी मोटी चादर चढ़ी हुई थी। यद्यपि तिलिस्मी नेजा उस फौलादी मोटी चादर में भी घुस सकता था, मगर इसमें कोई फायदा न था। तिलिस्मी नेजा ऐसे स्थान से सुरंग खोदकर रास्ता बनाने का काम नहीं दे सकता था, तिस पर भी तारा ने उद्योग में कोई बात उठा न रखी, मगर नतीजा कुछ भी न निकला।
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इस तालाब के बीच वाले तिलिस्मी मकान में कमलिनी दस लौंडियों के साथ रहती थी। नौकर और सिपाही भी उसके साथ बहुत थे मगर उनके रहने के लिए स्थान इस मकान में नहीं था, वे लोग काम-काज किया करते थे और समय पड़ने पर जान देने के लिए इकट्ठे हो जाते थे, मगर कमलिनी और तारा को छोड़ के कोई यह भी नहीं जानता था कि वे लोग कहाँ रहते हैं और क्या करते हैं। उन सिपाहियों में से कई तो मायारानी के कैदी हो गये थे और जो दस-बारह बचे थे सो इधर-उधर घूम-फिरकर कमलिनी का काम कर रहे थे। उन्हीं बचे हुए सिपाहियों में से चार-पांच सिपाही इस समय मकान में मौजूद थे जो किसी काम के सम्बन्ध में तारा के पास आये थे और दुश्मनों का हंगामा देखकर बाहर न जा सके थे। कमलिनी की लौंडियाँ जितनी थीं, वे सब जमानिया से कमलिनी के साथ उस समय आई थी जब मायारानी से लड़ कर कमलिनी अलग हो गई थी। इन लौंडियों में के एक लौंडी, जिसका नाम भगवानी था, बड़ी ही शैतान और दिल की खोटी थी। यद्यपि वह जाहिर में अपने को बहुत ही बनाये हुए रहती थी और बात-बात में खैरखाही जताती थी, मगर वास्तव में वह ऐसी काली नागिन थी जिसके काटे का कोई मन्त्र ही न था। उसे रुपये की लालच हद से ज्यादा थी। मगर इतने दोष पहने पर भी वह अपनी चालाकी से अपने मालिक तथा तारा को खुश रखती थी और उन दोनों के आगे अपने अवगुण जाहिर नहीं होने देती थी। यही लौंडी प्रायः कैदियों को खाना-पानी भी पहुँचाया करती थी।
कमलिनी के कैदखाने को पहले माधवी और शिवदत्त ने आबाद किया था और उसके बाद मनोरमा इस कैदखाने में आई थी। मायारानी की सखी होने के कारण मनोरमा भगवानी को बखूबी जानती थी और इसी तरह भगवानी भी उसे अच्छी तरह पहचानती थी। खाना-पानी पहुँचाने के लिए जब भगवानी कैदखाने में जाती थी तो मनोरमा उसे अपनी लच्छेदार बातों में घड़ियों उलझा कर भविष्य के लिए सब्जबाग दिखाती और तरह-तरह की उम्मीदों से ललचाया करती यहाँ तक कि उसे तीन लाख रुपये की लालच दिखाकर उसने अपनी, माधवी और शिवदत्त की मदद पर राजी कर लिया। माधवी दवा-इलाज की बदौलत यहाँ आकर तन्दुरुस्त हो गई थी।
भगवानी इस बात पर राजी हो गई कि मौका मिलने पर कैदियों की मदद करे और जिस तरह हो कैदियों को तहखाने के बाहर निकाल दे। भगवानी ने माधवी, शिवदत्त और मनोरमा से कहा कि तुम लोगों को छुड़ाने के लिए मुझे बहुत कुछ उद्योग करना पड़ेगा और तुम्हारे नौकरों तथा सिपाहियों से मिलने और उनसे कुछ काम लेने की आवश्यकता पड़ेगी, इसलिए उचित होगा कि तुम लोग मुझे एक परवाना लिख दो जिसमें तुम लोगों के आदमी मुझे तुम्हारा मददगार समझें और जो कुछ मैं कहूँ करें और खर्च के लिए आवश्यकतानुसार मुझे दिया भी करें। आखिर तीनों कैदियों ने भगवानी की बात मंजूर कर ली। भगवानी मौका पाकर कलम दवात और कागज छिपाकर तहखाने
में ले गई और तीनों कैदियों से अपने मतलब की बातें लिखवा लीं।
कमलिनी के जाने के बाद केवल तारा की मौजूदगी में भगवानी को अपना काम करने का बहुत अच्छा मौका मिला। उसने गुप्त रीति से कई नौकर रखे और उनके जरिये से माधवी, मनोरमा और शिवदत्त के आदमियों को, जो छिति र-बितिर हो गये थे, इकट्ठा कराया, तथा इस बात से होशियार कर दिया कि तुम्हारे मालिक लोग यहाँ कैद हैं।
धीरे-धीरे बन्दोबस्त करके भगवानी ने सामान दुरुस्त कर लिया और एक दिन सुरंग की राह से तीनों कैदियों को निकाल बाहर किया। आज जो इतने दुश्मन इस मकान को घेरे हुए हैं या जो कुछ वे लोग कर रहे हैं सब भगवानी ही की करामात है। इस समय भगवानी ही ने किशोरी, कामिनी और तारा को सुरंग में बन्द कर दिया है। वह चाहती है कि दुश्मन लोग इस मकान में घुस आवें और मनमानी चीजें लूट ले जायें, मगर कीमती चीजें जवाहिर इत्यादि मैं पहले ही से बटोर कर अलग रख दूँ, और जब दुश्मन लोग यहाँ घुस आबें तो उन्हें लेकर चल दूँ। शिवदत्त, माधवी और मनोरमा के हाथ का लिखा हुआ परवाना मौजूद ही है अस्तु कमलिनी के दुश्मनों में मुझे कोई भी नहीं रोक सकता। यह भगवानी का थोड़ा-सा हाल इस जगह हमने इसलिए लिख दिया कि बीती बहुत-सी बातें समझने में हमारे पाठकों को कठिनाई न पड़े।
किशोरी, कामिनी और तारा को सुरंग में बन्द करके जब भगवानी कैदखाने के बाहर निकली तो कोठरी में ताला लगा दिया और ताली अपने कब्जे में रखी, इसके बाद हाथ में लालटेन लेकर मकान की छत पर चढ़ गई और लालटेन को घुमा-फिराकर दुश्मनों को इशारे ही इशारे में कुछ कहा। मालूम होता है कि पहले ही इस इशारे की बातचीत पक्की हो चुकी थी क्योंकि लालटेन का इशारा पाते ही दुश्मनों ने खुश होकर अपना काम तेजी से करना शुरू किया अर्थात् तालाब पाटने में बहुत फुर्ती दिखाने लगे। एक दफे तो भगवानी के दिल में यह बात पैदा हुई कि चारों पुतलियों को खड़ी करके घूमते हुए चारों चक्रों को रोक दे, जिसमें दुश्मन लोग यहाँ शीघ्र ही आ जायें, मगर तुरन्त ही उसने अपना इरादा बदल दिया। उसे यह बात सूझ गयी कि यदि मैं घूमते हुए चारों चक्रों को रोक दूँगी तो कमलिनी के नौकरों को तुरत मुझ पर शक हो जायगा और फिर बना-बनाया मामला बिगड़ जायगा।
अब कम्बख्त भगवनिया (भगवानी) इस फिक्र में लगी कि दुश्मनों के घर में आने के पहले ही यहाँ से अच्छी-अच्छी कीमती चीजें बटोर ली जायें और जब दुश्मन इस मकान में घुस आवें, तो ले लपेट के चलती बनूं। शिवदत्त, माधवी और मनोरमा की चिट्ठियों की बदौलत, जो मेरे पास हैं, मुझे कोई भी न रोकेगा।
कमलिनी की लौंडियों और नौकरों को इस बात का गुमान भी न था कि नमकहराम भगवानी यहाँ वालों को चौपट कर रही है या उसने किशोरी, कामिनी और तारा को सुरंग में बन्द कर दिया है। वे लोग यही जानते थे कि किशोरी और कामिनी को किसी खास काम के लिए तारा अपने साथ लेती गई है।
रात बीत गई, दूसरा दिन समाप्त हो गया, बल्कि दूसरे दिन की रात भी गुजर
गई और तीसरा दिन आ पहुँचा। आज दुश्मनों का मनोरथ पूरा हुआ अर्थात् उन्होंने तालाव को दो तरफ से बखूबी भर दिया और उस मकान में आ पहुँचे।
लौंडिया और नौकरों की इतनी हिम्मत कहां कि सैकड़ों दुश्मनों का मुकाबला करते। वे लोग चुपचाप अलग हो गये और अपनी तथा अपने मालिक की बदकिस्मती पर विचार करते रहे, जिस पर भी कई बेचारे दुश्मनों के हाथों से मारे गये। दुश्मनों ने मनमानी लूट मचाई और जिसने जो पाया अपने बाप दादे का माल समझ के हथिया लिया। कम कीमत की चीजें या ऐसी चीजें जो वे लोग अपने साथ ले जाना पसन्द नहीं करते थे तोड़ फोड़ बिगाड़ या जलाकर सत्यानाश कर दी गईं और घण्टे ही भर में ऐसी सफाई कर दी गई मानो उन मकान में कोई बसता ही न था या कोई चीज वहाँ थी ही नहीं। इस काम के बाद किशोरी, कामिनी और तारा की खोज शुरू हुई क्योंकि दुष्टों ने जब उस तीनों को वहाँ न पाया तो उन्हें आश्चर्य हुआ और वे इस फिक्र में हुए कि भगवानी से उन तीनों का हाल पूछना चाहिए मगर भगवानी वहाँ कहाँ, वह तो अपना काम करके निकल भागी और ऐसी गायब हुई कि किसी को कुछ गुमान तक न हुआ। हाय, बेचारी किशोरी, कामिनी और तारा का हाल किसीको भी मालूम नहीं, कोई भी नहीं जानता कि वे बेचारियाँ कहाँ और किस आफत में पड़ी हैं या कई दिनों तक दाना पानी न मिलने के कारण जीती भी हैं या मर गईं। उनकी लौंडियों और नौकरों को भी इसका पता नहीं, इसी से वे लोग अपनी जान लेकर जिस तरफ भाग सके भाग गये और इस तिलिस्मी मकान पर दुश्मनों को पूरा-पूरा कब्जा करने दिया, क्योंकि इतने आदमियों का मुकाबला करके जान देना दूसरे उद्योग का भी रास्ता रोकना था।
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पाठक महाशय, अब आप यह जानना चाहते होंगे कि हरामजादी भगवनिया के मेल से जो दुश्मन लोग इस मकान पर चढ़ आये, वे लोग शिवदत्त, माधवी और मनोरमा को छुड़ाने की नीयत से आये थे या इन तीनों के छूटकर निकल जाने का हाल उन्हें मालूम हो चुका था और वे लोग इस समय केवल किशोरी, कामिनी और तारा को गिरफ्तार करने आये थे?
नहीं, इस समय दुश्मन यह नहीं जानते थे कि इस मकान में कोई सुरंग है और भगवानी की मदद से उसी सुरंग की राह राजा शिवदत्त वगैरह बाहर हो गये। भगवानी ने जब उन लोगों को खबर पहुँचाई थी तो यही कहा था कि तुम्हारा मालिक इस मकान में कैद है, तुम जिस तरह बने उसे छुड़ा लो और इसके बाद जो कुछ उन लोगों ने किया वह बहुत बुद्धिमानी से किया। तालाब सुखाने के लिए सुरंग खोदने में उन्हें बहुत दिन मेहनत करनी पड़ी, इस बीच में भगवानी भी उन लोगों से मिलती रही मगर उसने यह नहीं कहा कि शिवदत्त को छुड़ाने के लिए मैं भी उद्योग कर रही हूँ,
यदि मौका मिला तो सुरंग की राह निकाल दूँगी, क्योंकि भगवानी को यह आशा न थी कि मैं स्वयं उद्योग करके कैदियों को बाहर कर सकूँगी, उसे कैदियों को छुड़ाने का मौका उस दिन दोपहर के लगभग मिला था जिस दिन संध्या के समय बलवाइयों ने आकर तालाब को घेर लिया था और उनकी बनाई हुई सुरंग की राह से तालाब का जल निकल जा रहा था।
रुपये की लालच ने कम्बख्त भगवानी को ऐसा अन्धा बना दिया था कि उसे भलाई का रास्ता कुछ भी न सूझा। वह इस बात को न सोच सकी कि अगर तारा कैदियों को न देखेगी तो बेशक मुझ पर शक करेगी, क्योंकि कैदखाने और सुरंग की ताली सिवाय मेरे और किसी के हाथ में तारा नहीं देती थी। उसने बेधड़क कैदियों को बाहर कर दिया मगर इसके दो ही घण्टे बाद उसके दिल में हौल पैदा हो गया और वह सोचने लगी कि यदि तारा मुझसे पूछेगी कि कैदखाने की ताली तो सिवाय तेरे मैं और किसी के हाथ में नहीं देती फिर कैदी क्योंकर निकल गये तो मैं क्या जवाब दूँगी? इस विषय में उसने बहुत कुछ सोच-विचार किया मगर सिवाय भाग जाने के और कोई बात न सूझी। उसने भाग जाने के लिए भी उद्योग किया मगर न हो सका क्योंकि तालाब के बाहर से किसी को इस मकान में लाने या इस मकान से किसी को बाहर करने के लिए रास्ता खोलना या बन्द करना केवल तारा के अधीन था। जब इस बात को दो पहर बीत गए और दुश्मनों ने तालाब को घेर लिया तब उसे यह सूझा कि दुश्मनों को इस बात की खबर न देनी चाहिए कि शिवदत्त को मैंने छुड़ा दिया। ऐसा करने से दुश्मन उद्योग करके इस मकान में जरूर आवेंगे और उस समय मुझे यहाँ से निकल भागने का अच्छा मौका मिलेगा। इस बीच में भगवानी को इस बात का भी मौका मिल गया कि उसने तारा, किशोरी और कामिनी को सुरंग में बंद कर दिया और तब उसके दिल में अपने भाग जाने की पूरी-पूरी आशा हुई। यही कारण हुआ कि दुश्मनों को शिवदत्त के निकल जाने का हाल मालूम न हुआ और उन्होंने उद्योग करके मकान को अपने दखल में कर लिया जिससे भगवानी को भागने का अच्छा मौका मिला।
अब यह प्रश्न हो सकता है कि क्या तारा इतनी बेवकूफ थी कि कैदखाने में कैदियों को न देखकर और सुरंग का दरवाजा खुला हुआ पाकर भी उसे किसी पर कुछ शक न हुआ, सो भी ऐसी अवस्था में जब कि कैदखाने की ताली सिवाय भगवानी के और किसी के हाथ में देती ही न थी? इस सवाल का जवाब भी इसी जगह दे देना उचित जान पड़ता है।
तारा ने जब कैदियों को कैदखाने में न देखा तो सबके पहले उसके दिल में यही शक पैदा हुआ कि यह काम हमारे ही किसी आदमी का है। थोड़े ही सोच-विचार में उसने भगवानी को दोषी ठहरा लिया क्योंकि सिवाय उसके वह कैदखाने की ताली किसी दूसरे के हाथ में देती न थी यह सब कुछ था परन्तु भगवानी की जांच करने और उसे सजा देने के विषय में जल्दी करना तारा ने उचित न जाना और इस हो-हल्ले के समय इसका मौका भी न था, तथापि तारा ने इस शक को श्यामसुन्दरसिंह नामी अपने एक विश्वासी खैरख्वाह बहादर से इस दौड़-धूप के समय ही जाहिर कर दिया और
यह भी कह दिया कि मुझे इस मकान के बचाव की तरकीब के सिवाय और कोई काम करने की फुरसत नहीं है मगर तुम इस विषय में जो कुछ उचित जान पड़े वह करो।
श्यामसुन्दर सिंह बहुत ही होशियार चालाक, बुद्धिमान और बहादुर आदमी था। यह कमलिनी के कुल सिपाहियों का सरदार था और इसकी अच्छी चाल-चलन तथा बहादुरी की कदर कमलिनी दिल से करती थी तथा यह भी कम लिनी की भलाई के लिए जान तक दे देने को हरदम तैयार रहता था। यद्यपि काम-काज के सबब से श्यामसुन्दर सिंह यहां बराबर नहीं रहता था परन्तु जिस समय दुश्मनों ने इस मकान को घेरा था उस समय वह मौजूद था। जब उसने तारा की जुबानी कैदियों के निकल जाने का हाल सुना तो उसने भी अपनी राय वही कायम की जो तारा ने की थी।
श्यामसुन्दरसिंह भगवानी की तरफ से होशियार हो गया और उसके कार्यों को विशेष ध्यान से देखने लगा, मगर इस बात का तो उसको गुमान भी न हुआ कि भगवानी ने किशोरी, कामिनी और तारा को भी सुरंग में बन्द कर दिया है।
श्यामसुन्दरसिंह इस बात को भी तो समझ ही गया था कि अब यह मकान दृश्मनों के हमले से किसी तरह बच नहीं सकता तथापि उसे कुछ-कुछ आशा इस बात की थी कि जिस समय तिलिस्मी नेजा हाथ में लेकर तारा इस झुण्ड में पहुंचेगी तो ताज्जुब नहीं कि दुश्मनों का जी टूट जाय, परन्तु बहुत समय निकल जाने पर भी जब तारा वहाँ तक न पहुंची तो श्यामसुन्दरसिंह को आश्चर्य हुआ और वह तरह-तरह की बातें सोचने लगा।
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कीमती जवाहरात के चीजों की गठरी लादे हुए मालिक को चौपट करने वाली हरामजादी भगवानी जब भागी तो उसने फिर के देखा भी नहीं कि पीछे क्या हो रहा है या कौन आ रहा है।
रात पहर भर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी और चांदनी खूब निखरी हुई थी जब हांफती और काँपती हुई भगवानी एक घने जंगल के अन्दर जिसमें चारों तरफ परले सिरे का सन्नाटा छाया हुआ था पहुँचकर एक पत्थर की चट्टान पर बैठी और फिर इस तरह से लेट गई जैसे कोई हताश होकर गिर पड़ता है। वह अपनी बिसात से ज्यादा चल और दौड़ चुकी थी और इसीलिए बहुत सृस्त हो गई थी। इस पत्थर की चट्टान पर पहुँचकर उसने सोचा था कि अब बहुत दूर निकल आये हैं कोई धरने-पकड़ने वाला है नहीं अतएव थोड़ी देर तक बैठ कर आराम कर लेना चाहिए, मगर बैठने के साथ ही पहले जिस पर उसकी निगाह पड़ी, वह श्यामसुन्दरसिंह था जिसे देखते ही उसका कलेजा धक से हो गया और चेहरे पर मुर्दनी छा गई। उसकी तेजी के साथ चलनी साँस दो-चार पल के लिए रुक गयी और वह घबराकर उसका मुँह देखने लगी। श्यामसुन्दरसिंह-क्यों? तूने तो समझा होगा कि बस अब मैं बच कर निकल आई और जवाहरात की गठरी नरम चारे की तरह हजम हो गई!
भगवानी—(कुछ सोचकर) नहीं-नहीं, मैं इसमें से तुम्हें आधा बाँट देने के लिए तैयार हूँ। आखिर दुश्मन लोग इसे भी लूट कर ले ही जाते, अगर मैं बचाकर ले आई तो क्या बुरा हुआ? सो भी बाँट देने के लिए तैयार हूँ।
श्यामसुन्दरसिंह-ठीक है मगर मैं आधा बाँट कर नहीं लिया चाहता बल्कि सब लिया चाहता हूँ।
भगवानी—सो कैसे होगा? जरा सोचो तो सही कि मैं दुश्मनों के हाथ से कितनी मेहनत करके इसे बचा लाई हूँ, और सब तुम्ही ले लोगे तो मुझे क्या फायदा होगा?
श्यामसुन्दरसिंह-तो क्या तू कुछ फायदा उठाना चाहती है? अगर ऐसा ही है तो मालिक के नाथ नमकहरामी या दगा करने और दुश्मनों को बचाकर कैदखाने के बाहर कर देने में जो उचित लाभ होना चाहिए वह तुझे होगा!
भगवानी-(चौंक कर) आपने क्या कहा सो मैं न समझी! क्या आपको मुझ पर किसी तरह का शक है?
श्याम-नहीं, शक तो कुछ भी नहीं है या अगर है भी तो केवल दो बातों का एक तो कैदियों को बचाकर निकाल देने का और दूसरे मालिक के साथ दगा करने का।
भगवानी-नहीं-नहीं, कैदी लोग किसी और ढंग से निकल गये होंगे, मुझे तो उनकी कुछ खबर नहीं और तारा के साथ दगा करने के विषय में जो कुछ आप कहते हैं सो वह काम मेरा न था, बल्कि एक-दूसरी लौंडी का था जिसके सबब से बेचारी तारा मौत…
इतना कहकर भगवानी रुक गई। उसके रंग-ढंग से मालूम होता था कि जल्दी में आकर वह कोई ऐसी बात मुँह से निकाल बैठी है जिसे वह बहुत छिपाती थी। श्याम सुन्दरसिंह को भी उसकी आखिरी बात से निश्चय हो गया कि हरामजादी भगवानी ने दुश्मनों से मिलकर बेचारी तारा को मौत के पंजे में फंसा दिया, अस्तु बिना असल भेद का पता लगाए इसे कदापि न छोड़ना चाहिए।
श्याम–हाँ-हाँ, कहती चल, रुकी क्यों?
भगवानी-यही कि मैं ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे मालिक का नुकसान हो।
श्याम-अच्छा यह बता कि कैदियों को निकालने वाला और तारा को फंसाने वाला कौन है?
भगवानी—यह काम नमकहराम लालन लौंडी का है।
श्याम–-यदि मैं इस समय के लिए तेरा ही नाम लालन रख दूँ तो क्या हर्ज है क्योंकि मेरी समझ में बेचारी लालन निर्दोष है जो कुछ किया तू ही ने किया, कैदियों ने तुझी को अपना विश्वासपात्र समझा, तुझी से काम लिया और तेरो ही मदद से निकल भागे, इतने दुश्मनों को भी तू ही बटोर कर लाई है और इतने पर भी संतोष न पाकर बेचारी तारा को भी तू ने ही…. भगवानी-(हाथ जोड़कर) नहीं-नहीं, आप मुझे व्यर्थ दोषी न ठहरायें, भला ऐसे मालिक के साथ मैं विश्वासघात करूँगी जो मुझे दिल से चाहे?
श्याम—(कमर से एक चिट्ठी निकालकर और भगवानी को दिखाकर) और यह क्या है? क्या इसमें भी लालन का नाम लिखा है? कोई हर्ज नहीं, अपने हाथ में लेकर अच्छी तरह देख ले क्योंकि यद्यपि यह रात का समय है, फिर भी चन्द्रदेव ने अपनी किरणों से दिन की तरह बना रक्खा है।
यह चिट्ठी न तीनों चिट्ठियों में एक थी जो शिवदत्त, माधवी और मनोरमा ने लिखकर भगवानी को दी थी। न मालूम श्यामसुन्दरसिंह के हाथ यह चिट्ठी कैसे लगी। भगवनिया इस चिट्ठी को देखते ही जदं पड़ गई, कलेजा धकधक करने लगा, मौत की भयानक सूरत सामने दिखाई देने लगी, गला रुक गया, वह कुछ भी जवाब न दे सकी। अब श्यामसुन्दरसिंह बर्दाश्त न कर सका, उसने एक तमाचा भगवानी के मुह पर जमाया और कहा-"कम्बख्त! अब बोलती क्यों नहीं!"
जब भगवानी ने इस बात का भी जवाब न दिया तब श्यामसुन्दरसिंह ने म्यान से तलवार निकाल ली और हाथ ऊँचा करके कहा, "अब भी अगर साफ-साफ भेद न बतावेगी तो मैं एक ही हाथ में दो टुकड़े कर दूँगा।"
भगवानी को निश्चय हो गया कि अब जान किसी तरह नहीं बच सकती, इसके अतिरिक्त डर के मारे उसकी अजब हालत हो गई, और कुछ तो न कर सकी, हाँ एक दम जोर से चिल्ला उठी और इसके साथ ही एक तरफ से आवाज आई-"कौन है जो मर्द होकर एक स्त्री की जान लिया चाहता है?"
श्यामसुन्दरसिंह ने फिर कर देखा तो दाहिनी तरफ थोड़ी ही दूर पर एक नौजजवान को हाथ में खंजर लिए मौजूद पाया। उस नौजवान ने श्यामसुन्दरसिंह से पुनः कहा, "यह काम मर्दो का नहीं है जो तुम किया चाहते हो!" जिसके जवाब में श्यामसन्दरसिंह ने कहा, "बेशक यह काम मर्दो का नहीं मगर लाचार हूँ कि यह नमकहराम मेरी बातों का जवाब नहीं देती और मैं बिना जवाब पाये इसे किसी तरह नहीं छोड़ सकता।"
यह आदमी, जो श्यामसुन्दरसिंह के पास यकायक आ पहुँचा था, हमारा नामी प्यार भैरोंसिंह था जो कमलिनी के मकान के दुश्मनों से घिर जाने की खबर पाकर उसी तरफ जा रहा था और इत्तिफाक से यहाँ आ पहुँचा था, मगर वह श्यामसुन्दरसिंह और भगवनिया को नहीं पहचानता था और वे दोनों भी इसे सूरत बदले हुए और रात का समय होने के कारण न पहचान सके। भैरोंसिंह ने पुनः कहा–
भैरोंसिंह-यदि हर्ज न हो तो मुझे बताओ कि यह तुम्हारी किन बातों का जवाब नहीं देती?
श्याम–बता देने में हर्ज तो कोई नहीं अगर आप उन लोगों में से नहीं हैं जिन्हें हम लोग अपना दुश्मन समझते हैं, क्योंकि यह भेद की बात है और अपना भेद दुश्मनों के सामने प्रकट करना नीति के विरुद्ध है। उत्तम तो यह होगा कि हमारा भेद जानने के पहले आप अपना परिचय दें। भैरों तो तुम्हीं अपना परिचय क्यों नहीं देते?
श्याम- इसलिए कि ऐयार लोग भेद जानने के लिए समय पड़ने पर उसी पक्ष वाले बन जाते हैं जिससे अपना काम निकालना होता है।
भैरोंसिंह-ठीक है, मगर बहादुर राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों में से कोई भी ऐसा कमहिम्मत नहीं है जो खुले मैदान में एक औरत और एक मर्द से अपने को छिपाने का उद्योग करे।
श्याम–(खुश होकर) अहा, अब मालूम हो गया कि आप राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों में से कोई हैं। ऐसी अवस्था में मैं भी यह कहने में विलम्ब न लगाऊँगा कि मैं श्यामसुन्दरसिंह नामी कमलिनीजी का सिपाही हूँ और यह भगवानी नाम की उन्हीं की बेईमान लौंडी है जिसकी नमकहरामी और बेईमानी का यह नतीजा निकला कि दुश्मनों ने तालाब वाले तिलिस्मी मकान पर कब्जा कर लिया और किशोरी, कामिनी तथा तारा का कुछ पता नहीं लगता। अब तक जो मालूम हुआ है उससे जाना जाता है कि इसी कम्बख्त ने उन तीनों को भी किसी आफत में फंसा दिया है जिसका खुलासा भेद मैं इससे पूछ रहा था कि आपकी आवाज आई और आपसे बातचीत करने की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
भैरोंसिंह-(जोश के साथ) वाह, यह तो एक ऐसा भेद है जिसके जानने का सबसे पहला हकदार मैं हूँ। मैं उन्हीं तीनों से मिलने के लिए जा रहा था जब रास्ते में मुझे यह मालूम हुआ कि उस तिलिस्मी मकान को दुश्मनों ने घेर लिया है इसलिए जल्द पहुँचने की इच्छा से जंगल ही जंगल दौड़ा जा रहा था कि यहाँ तुम लोगों से भट हो गई।
श्याम–यदि ऐसा है तो अब कृपा कर आप अपनी असली सूरत शीघ्र दिखाइये जिससे मैं आपको पहचान कर अपने दिल के बचे-बचाये खुटके को निकाल डालूँ क्योंकि राजा वीरेन्द्रसिंह के कुल ऐयारों को मैं पहचानता हूँ।
श्यामसुन्दरसिंह की बात सुनकर भैरोंसिंह ने बटुए में से सामान निकाल कर बत्ती जलाई और बनावटी बालों को अलग करके अपना चेहरा साफ दिखा दिया। श्याम सुन्दरसिंह यह कहकर कि 'अहा, मैंने बखूबी पहचान लिया कि आप भैरोंसिंह जी हैं भैरोंसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और भैरोंसिंह ने उसे उठा कर गले से लगा लिया। इसके बाद श्यामसुन्दर सिंह ने अपनी तरफ का पूरा-पूरा हाल इस समय तक का कह सुनाया।
भैरोंसिंह-अफसोस, बात ही बात में यहाँ तक नौबत जा पहुँची। लोग सच कहते हैं कि घर का एक गुलाम वैरी बाहर के बादशाह बैरी से भी जबर्दस्त होता है जिसकी ताबेदारी में हजारों दिलावर पहलवान और ऐयार लोग रहा करते हैं। खैर जो होना था सो तो हो गया, अब इस (भगवनिया की तरफ इशारा करके) कम्बख्त से किशोरी, कामिनी और तारा का सच्चा-सच्चा हाल मैं बात की बात में पूछ लेता हूँ। यह औरत है इसलिए मैं खंजर को तो म्यान में कर लेता हूँ और हाथ में उस दुष्टदमन को लेता हूँ जिसके भरोसे ऐसे जंगल में काँटों से निर्भय रहकर चलता रहा, चलता हूँ
और यदि इसकी खातिरदारी से यह बच गया तो चलूँगा! हाँ एक बात तो मैंने कही ही नहीं।
श्याम-वह क्या?
भैरोंसिंह-वह यह कि मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ बल्कि दो ऐयारों को साथ लिए हुए कमलिनी रानी भी इसी जंगल में मौजूद हैं।
श्याम–आहा, यह तो आपने भारी खुशखबरी सुनाई, बताइये वे कहाँ हैं, मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।
कम्बख्त भगवनिया अब अपनी मौत अपनी आँखों के सामने देख रही थी। भैरों सिंह के पहुँचने से उसकी आधी जान तो जा ही चुकी थी, अब यह खबर सुन के कि कमलिनी भी यहाँ मौजूद है वह एकदम मुर्दा सी हो गई। उसे निश्चय हो गया कि अब उसकी जान किसी तरह नहीं बच सकती। भैरोंसिंह ने जोर से जफील बजाई और इसके साथ ही थोड़ी दूर में सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट के साथ ही घोड़ों की टापों की आवाज आने लगी और उस आवाज ने क्रमशः नजदीक होकर भूतनाथ तथा देवीसिंह और घोड़ों पर सवार कमलिनी रानी तथा लाड़िली की सूरत पैदा कर दी।
6
दुश्मन जब तालाब वाले तिलिस्मी मकान पर कब्जा कर चुके और लूटपाट से निश्चिन्त हुए तो शिवदत्त, माधवी और मनोरमा को छुड़ाने की फिक्र करने लगे। तमाम मकान छान डाला मगर उनका पता न लगा, तब थोड़े सिपाही जो अपने को होशियार और बुद्धिमान लगाते थे एक जगह जमा होकर सोच-विचार करने लगे। वे लोग इस बात का तो गुमान भी नहीं कर सकते थे कि हमारे मालिक लोग यहां कैद नहीं हैं या भगवनिया ने हमलोगों को धोखा दिया क्योंकि भगवनिया द्वारा वे लोग शिवदत्त, माधवी और मनोरमा के हाथ की लिखी चिट्ठी देख चुके थे। अब अगर तरद्दुद था तो यही कि कैदी लोग कहाँ हैं और भगवनिया हम लोगों से बिना कुछ कहे चुपचाप भाग क्यों गई। केवल इतना ही नहीं किशोरी, कामिनी और तारा यकायक कहाँ गायब हो गई जिनके इस मकान में होने का हम लोगों को पूरा विश्वास था बल्कि दौड़-धूप करते जिन्हें अपनी आँखों से देख चुके हैं।
जब तमाम मकान ढूंढ़ डाला और अपने मालिकों को तथा किशोरी, कामिनी या तारा को न पाया तो उन लोगों को निश्चय हो गया कि इस मकान में कोई तहखाना अवश्य है जहां हमारे मालिक लोग कैद हैं और जहाँ अपनी जान बचाने के लिए किशोरी, कामिनी और तारा भी छिपकर बैठ गई हैं।
इस लिखावट से हमारे पाठक अवश्य इस सोच में पड़ जायेंगे कि यदि इन दुश्मनों को इस मकान में तहखाना और सुरंग होने का हाल मालूम न था, तो क्या वे लोग
किसी दूसरे गिरोह के आदमी थे जिन्होंने तहखाने के अन्दर से किशोरी और कामिनी को गिरफ्तार कर लिया था या जिन्होंने सुरंग का दूसरा मुहाना बन्द कर दिया था जिस के सबब से बेचारी किशोरी, कामिनी और तारा को सुरंग के अन्दर बेबसी के साथ पड़ी रहकर अपनी ग्रहदशा का फल भोगना पड़ा?
बेशक ऐसा ही है। जिस समय भगवानी की कृपा से माधवी, मनोरमा और शिव दत्त ने कैदखाने से छुट्टी पाई और सुरंग की राह से बाहर निकले, तो माधवी के कई आदमी वहाँ मौजूद मिले और वे लोग आज्ञानुसार माधवी के साथ वहाँ से चले गये, उनमें से किसी से भी उन लोगों की मुलाकात नहीं हुई जिन्होंने तालाब वाले मकान पर हमला किया था। ये ही लोग थे जिन्होंने तहखाने में से किशोरी और कामिनी को भी निकाल ले जाने का इरादा किया था परन्तु कृतकार्य न हुए थे और इन्हीं लोगों ने भागते भागते सुरंघ का दूसरा मुहाना ईंट-पत्थरों से बन्द कर दिया था। उन दुश्मनों में जिन्होंने इस मकान को फतह किया था तीन सिपाही ऐसे थे जो उनमें सरदार गिने जाते थे और सब काम उन्हीं की राय पर होता था, वही तीनों खोज ढूंढ़कर तहखाने का पता लगाने लगे।
बचा हुआ दिन और रात का बहुत बड़ा हिस्सा खोज ढूंढा में बीत गया और सुबह हुआ ही चाहती थी जब हाथ में लालटेन लिए हए तीनों सिपाही उस कोठरी के दरवाजे पर जा पहुँचे जिसमें से कैदखाने वाले तहखाने के अन्दर जाने का रास्ता था। ताला तोड़ा गया और वे तीनों उस कोठरी के अन्दर पहुँचे। तहखाने के अन्दर जान वाला रास्ता दिखाई पड़ा जिसका दरवाजा जमीन के साथ सटा हआ और ताला भी लगा हुआ था। उस जगह खड़े होकर तीनों सिपाही आपस में बातचीत करने लगे।
एक–बेशक इसी तहखाने में महाराज शिवदत्त कैद होंगे, बड़ी मुश्किल से इस का पता लगा।
दूसरा-मगर हम लोग जो यह सोचे हुए थे कि किशोरी, कामिनी और तारा भी इसी तहखाने में छिपकर बैठी होंगी यह बात अब दिल से जाती रही क्योंकि वे भी अगर इसी तहखाने में होती तो हम लोगों को ताला न तोड़ना पड़ता।
तीसरा-ठीक है मैं भी यहीं सोचता हूँ कि वे लोग किसी दूसरे गुप्त स्थान में छिपकर बैठी होंगी, खैर पहले अपने मालिक को तो छडाओ फिर उन तीनों को भी ढूंढ़ निकालेंगे, आखिर इस मकान के अन्दर ही तो होंगी।
दूसरा-हाँ जी, देखा जायगा, बस अब इस ताले को भी झटपट तोड़ डालो।
वह ताला भी तोड़ा गया और हाथ में लालटेन लेकर एक आदमी उसके अन्दर उतरा तथा दो उसके पीछे चले। चार-पांच सीढ़ियों से ज्यादा न उतरे होंगे कि कई आदमियों के टहलने और बातचीत करने की आहट मिली जिससे ये तीनों बड़े गौर से नीचे की तरफ देखने लगे मगर जो सिपाही सबसे आगे था उसके सिवाय और किसी को कुछ भी दिखाई न दिया। उसने तहखाने में तीन आदमियों को देखा जो इन सिपाहियों के आने की आहट पाकर और लालटेन की रोशनी देखकर ठिठके हुए ऊपर की तरफ देख रहे थे। इनमें एक मर्द और दो औरतें थीं। तीनों सिपाहियों को निश्चय हो गया
कि बेशक यही तीनों माधवी, मनोरमा और शिवदत्त हैं। इन सिपाहियों ने छठी सीढ़ी पर पैर नहीं रखा था कि नीचे से आवाज आई, "ठहरो, हम लोग खुद ऊपर आते हैं!"
उन सिपाहियों में से एक आदमी जिसका नाम रामचन्दर था शिवदत्त का पुराना खैरख्वाह मुलाजिम था और बाकी के दोनों सिपाही मनोरमा के नौकर थे। आवाज सुनकर तीनों सिपाही ऊपर चले आये और तहखाने के अन्दर वाले तीनों व्यक्ति भी, जिन्हें सिपाहियों ने अपना मालिक समझ रक्खा था, बाहर होकर क्रमशः उस कमरे में पहँचे जिसमें कमलिनी रहा करती थी और जिसे एक तौर पर दीवानखाना भी कह सकते हैं। यद्यपि लूट-खसोट का दिन था मगर फिर भी वहाँ इस समय रोशनी बखूबी हो रही थी और उस रोशनी में सभी ने बखूबी पहचान लिया कि वे वास्तव में माधवी, मनोरमा और शिवदत्त हैं।
इस समय दुश्मनों की खुशी का अन्दाजा करना बड़ा ही कठिन है क्योंकि जिसे छुड़ाने के लिए उन लोगों ने उद्योग किया था, उसे अपने सामने मौजूद देखते हैं, लाखों रुपये का माल जो लूट में मिला था, अब पूरा-पूरा हलाल समझते हैं, इसके अतिरिक्त इनाम पाने की प्रबल अभिलाषा और भी प्रसन्न किये देती है। चारों तरफ से भीड़ उमड़ी पड़ती है और शिवदत्त के पैरों पर गिरने के लिए सभी उतावले हो रहे हैं। शिवदत्त ने सभी की तरफ देखा और नर्म आवाज में कहा, "शाबाश मेरे बहादुर सिहाहियो, आज जो काम तुमने किया, वह मुझे जन्म भर याद रहेगा। निःसन्देह तुमने मेरी जान बचाई। देखो इस कैद की सख्ती ने मेरी क्या अवस्था कर दी है, मेरी आवाज कैसी कमजोर हो रही है, मेरा शरीर कैसा दुर्बल और बलहीन हो गया है, मगर खैर, कोई चिन्ता नहीं जान बची है तो ताकत भी हो रहेगी! यह मत समझो कि मैं इस समय हर तरह से लाचार हो रहा हूँ, अतएव तुम्हारी आज की कार्रवाई के बदले में कुछ इनाम नहीं दे सकूँगा। नहीं-नही, ऐसा कदापि न सोचना। तुम लोग स्वयं देखोगे कि कल जितनी दौलत मैं इनाम में तुम लोगों को दूँगा, वह उस लूट के माल से सौगुना ज्यादा होगी, जो तुमने इस मकान में से पाई होगी। मैं मर्द हूँ और तुम लोग खूब जानते हो कि मर्दो की हिम्मत कभी कम नहीं होती, जिसने हिम्मत तोड़ दी, वह मर्द नहीं औरत है। इसमें तुम इस बात पर भी विश्वास रखना कि मैं अपने पुराने दुश्मन वीरेन्द्रसिंह का पीछा कदापि न छोड़ेंगा, सो भी ऐसी अवस्था में कि जब तुम लोगों ऐसे मर्द दिलावर और नमकहलाल सिपाही मेरे साथी हैं। अच्छा यह सब बातें तो फिर होती रहेंगी, इस समय मैं मकान से बाहर निकल कर अपने वीरों को देखा और उनसे मिला चाहता हूँ क्योंकि यह मकान इतना बड़ा नहीं है कि सब सिपाही इसमें समा जायें और मैं इसी जगह बैठा-बैठा सबसे मिल लूँ। चलो, तुम लोग तालाब के पार चलो, मैं भी आता हूँ!"
शिवदत्त की बातें सुनकर ये सिपाही लोग बहुत ही प्रसन्न हुए और जल्दी के साथ उस मकान से निकल कर तालाब के बाहर हो गये, जहां और सब सिपाही खड़े बेचैनी के साथ इन लोगों की राह देख रहे थे और यह जानने के लिए उत्सुक थे कि मकान के अन्दर क्या हो रहा है।
सिपाहियों के बाहर हो जाने के बाद शिवदत्त भी मकान से निकला और तालाब
से बाहर हो गया। माधवी और मनोरमा उस मकान के अन्दर ही रह गई।
अब सवेरा हो चुका था। पूरब तरफ आसमान पर भगवान सूर्यदेव का लाल पेशखेमा दिखाई देने लगा। शिवदत्त मैदान में खड़ा हो गया और खुशी के मारे उसकी जयजयकार करते उसके सिपाहियों ने चारों तरफ से उसे घेर लिया तथा यह सुनने के लिए उत्सुक होने लगे कि देखें अब हमारी तारीफ में हमारे राजा साहब क्या कहते हैं।
पर इसी समय पूरब की तरफ से बाजे की आवाज इन लोगों के कानों में पहुँची। सिपाहियों के साथ-साथ शिवदत्त भी चौकन्ना हो गया और गौर के साथ पूरब की तरफ देखता हुआ बोला, "यह तो फौजी बाजे की आवाज है। वह देखो इसकी गत साफ कहे देती है कि राजा वीरेन्द्रसिंह की फौज आ रही है, क्योंकि वीरेन्द्रसिंह जब चुनार की गद्दी पर बैठे थे तो तेजसिंह ने अपने फौजी बाजे वालों के लिए यह खास गत तैयार की थी। तब से उनकी फौज में प्रायः यह गत बजाई जाती है। मैं इसे अच्छी तरह जानता हूँ। देखो वह गर्द भी दिखाई देने लगी, अब क्या करना चाहिए? जहाँ तक मैं समझता हूँ, तुम्हारे हमले की खबर रोहतासगढ़ पहुँची है और यह फौज रोहतासगढ़ से आ रही है, मगर दो-तीन सौ से ज्यादा आदमी न होंगे।"
इसके बाद पश्चिम की तरह से बाजे की आवाज आई और गौर करने पर मालूम हआ कि पश्चिम तरफ से भी फौज आ रही है।
शिवदत्त के सिपाही बहुत मेहनत कर चुके थे, न भी मेहनत किये हों, तो क्या था, राजा वीरेन्द्रसिंह की फौज की खबर पाकर अपने कलेजे को मजबूत रखना ऐसे सिपाहियों का काम न था जो वर्षों बिना तनखाह के सिर्फ मालिक के नाम पर अपने सिपाहीपन को टेरे जाते हों। उन लोगों ने घबड़ा कर शिवदत्त की तरफ देखा। यद्यपि कैद की सख्ती ने शिवदत्त की सूरत-शक्ल और आवाज में भी फर्क डाल दिया था, मगर इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह की फौज के आने से उसके चेहरे पर किसी तरह की घबड़ाहट या उदासी नहीं पाई गई। शिवदत्त ने अपने सिपाहियों की तरफ देखा और हिम्मत दिलाने वाले शब्दों में कहा, "घबराओ मत हिम्मत न हारो, हौसले के साथ भिड़ जाओ और इन सभी का असबाब भी लूट लो, मगर इस बात का खूब ध्यान रखो कि भाग कर इस मकान के अन्दर न घुस जाना, नहीं तो चारों तरफ से घेर कर सहज ही में मार डाले जाओगे। यदि मैदान में डटे रहोगे तो कठिन समय पड़ जाने पर भागने को भी जगह मिलेगी-" इत्यादि।
क्या करें? लड़ें या न लड़ें? रुकें या भाग जायें? इत्यादि सोच-विचार और सलाह में ही बहुत-सा अमूल्य समय निकल गया और धावा करते हुए राजा वीरेन्द्रसिंह के फौजी सिपाहियों ने पूरब और पश्चिम तरफ से आकर दुश्मनों को घेर लिया। यद्यपि शिवदत्त के सिपाही भागने के लिए तैयार थे, मगर शिवदत्त के हिम्मत दिलाने वाले शब्दों की बदौलत जिन्हें वह बार-बार अपने मुँह से निकाल रहा था, थोड़ी देर के लिए अड़ गये और राजा वीरेन्द्रसिंह की फौज से जो गिनती में दो सौ से ज्यादा न होगी, जी तोड़ के लड़ने लगे। उनके अटल रहने और जी तोड़ कर लड़ने का एक यह भी सबब था कि उन लोगों ने राजा वीरेन्द्रसिंह के फौजी सिपाहियों को जो वास्तव में रोहतासगढ़ से
च० स०-3-9
आये थे, गिनती में अपने से बहुत कम पाया था।
यह थोड़ी-सी फौज जो रोहतासगढ़ से आई थी, चुन्नीलाल ऐयार के आधीन थी। चुन्नीलाल ने जासूसों को भेज कर इस बात का पता पहले ही लगा लिया था कि तालाब वाले तिलिस्मी मकान पर हमला करने वाले दुश्मन कितने और किस ढंग के हैं, इसके बाद उसने अपनी फौज को फैला कर दुश्मनों को चारों तरफ से घेर लेने का उद्योग किया था और जो कुछ सोच रखा था वही हुआ।
चुन्नीलाल की मातहत फौज ने दुश्मनों को घेर कर बेतरह मारा। चुन्नीलाल स्वयं तलवार लेकर मैदान में अपनी बहादुरी दिखाता हुआ अपने सिपाहियों की हिम्मत बढ़ा रहा था और जिधर धंस जाता था उधर ही दस-पाँच को खीरे-ककड़ी की तरह काट गिराता था। यह हाल देख दुश्मन बगलें झांकने लगे, मगर लड़ाई इस ढंग से हो रही थी कि यहाँ से बचकर निकल भागना भी मुश्किल था। दो घंटे की लड़ाई में आधे से भी ज्यादा दुश्मन मारे गये और बाकी भाग कर अपनी जान बचा ले गये। वीरेन्द्रसिंह के केवल बीस बहादुर काम आये। इस घमासान लड़ाई के अन्त में इस बात का कुछ भी पता न लगा कि शिवदत्त बहादुरी के साथ लड़कर मारा गया या मौका मिलने पर निकल भागा।
जब दश्मनों में से सिवाय उन सभी के जो मौत की गोद में सो चुके थे या जमीन पर पड़े सिसक रहे थे और कोई भी न रहा, सब भाग गये, तब केवल दस-बारह आदमियों को साथ लेकर चुन्नीलाल तिलिस्मी मकान की तरफ बढ़ा मगर मकान में पहुँचने के पहले ही सिपाही सूरत का एक आदमी जो उसी मकान में से निकल कर इनकी तरफ आ रहा था उसे मिला। उसके हाथ में लिफाफे के अन्दर बन्द एक चिट्ठी थी जो उसने चन्नीलाल के हाथ में दे दी और चुपचाप खड़ा हो गया। चुन्नीलाल ने भी उसी जगह अटक कर लिफाफा खोला और बड़े ध्यान से चिट्ठी पढ़ने लगा। समाप्त होने तक कई दफे चुन्नीलाल के चेहरे पर हँसी दिखाई दी और अन्त में वह बड़े गौर से उस आदमी की सूरत देखने लगा, जिसने चिट्ठी दी थी तथा इसके बाद इशारे से सिर हिलाया मानो उस आदमी को यहाँ से बेफिक्री के साथ चले जाने के लिए कहा और वह आदमी भी बिना सलाम किये झूमता हुआ वहाँ से चला गया।
चन्नीलाल कई आदमियों को साथ लेकर तिलिस्मी मकान के अन्दर गया, उसने वहां अच्छी तरह घूमकर देखा, मगर किसी को न पाया, तब बाहर निकला और अपने मातहत सिपाहियों को लेकर रोहतासगढ़ की तरफ लौट गया।
7
ऊपर का बयान पढ़कर हमारे प्रेमी पाठक ताज्जुब करते होंगे कि यह क्या हुआ और क्या लिखा गया। और बातों को जाने दीजिये, मगर अन्त में यह क्या अश्चर्य की
बात हो गई कि चुन्नीलाल तिलिस्मी मकान के अन्दर आया और मामूली तौर पर देखभाल कर चला गया, बेचारी किशोरी, कामिनी और तारा की कुछ सुध न ली। खैर सब्र कीजिये और जरा हमारे साथ फिर उस जगह चलिये, जहाँ श्यामसुन्दर, भगवनिया, भैरोंसिंह, कमलिनी, लाड़िली, देवीसिंह और भूतनाथ को छोड़ आये हैं।
जिस समय भगवनिया ने कमलिनी को अपने सामने देखा वह बदहवास हो गई, कलेजा काँपने लगा, साँस में रुकावट पैदा हुई और मौत की सी तकलीफ मालूम होने लगी। उसने चाहा कि कमलिनी के पैरों पर गिर कर अपना कसूर माफ करावे, मगर डर के मारे उसके खून की हरकत बिल्कुल बंद हो गई थी इसलिए वह कुछ भी न कर सकी बल्कि क्रमशः बढ़ते ही जाने वाले खौफ के सबब बेदम होकर पीछे की तरफ जमीन पर गिर पड़ी।
भगवानी की यह अवस्था देखकर कमलिनी को आश्चर्य मालूम हुआ क्योंकि उसने अभी तक श्यामसुन्दरसिंह और भगवानी का हाल कुछ न जाना था। भैरोंसिंह ने भूतनाथ को रोशनी करने के लिए कह कर संक्षेप में वह सब हाल कमलिनी को कह सुनाया जो भगवानी के विषय में श्यामसुन्दरसिंह से सुना था। कमलिनी को हद से ज्यादा क्रोध चढ़ आया मगर वह बुद्धिमान थी और इस बात को खूब समझती थी कि ऐसे मौके पर क्रोध के ऊपर अधिकार न कर लेने से प्रायः तकलीफ और नुकसान हुआ करता है, कहीं ऐसा न हो कि डर के मारे या विशेष धमकाने से भगवानी का दम निकल जाये या वह जिसका दिल और दिमाग बहुत ही कमजोर है पागल हो जाय जैसा कि प्रायः हुआ करता है, तो बड़ी ही मुश्किल होगी और किशोरी कामिनी तथा तारा का कुछ भी पता न लगेगा।
रोशनी हो जाने पर जब कमलिनी ने भगवानी की सूरत देखी तो मालूम हुआ कि उस पर हद से ज्यादा खौफ पड़ चुका है। आँखें बन्द हैं, चेहरे पर जर्दी छाई हुई है, और बदन काँप रहा है। कमलिनी ने कुछ ऊँची आवाज में कहा, "होश में आ और मेरी बातें सुन, एकदम नाउम्मीद न हो, कदाचित तेरी जान बच जाय!"
इस आवाज ने बेशक अच्छा असर किया जैसा कि कमलिनी ने सोचा था, 'कदाचित् तेरी जान बच जाय' यह सुनकर भगवानी ने आंखें खोल दी! कमलिनी ने फिर कहा, "यद्यपि तूने बहुत बड़ा कसूर किया है मगर मैं वादा करती हूँ कि यदि तू झटपट सच्चा-सच्चा हाल कह देगी तो तेरी जान छोड़ दी जायगी।"
अब भगवानी उठ बैठी और अपने को सँभाल कर हाथ जोड़ के कांपती हुई आवाज के साथ बोली, 'क्या मेरी जान छोड़ दी जायगी?"
कमलिनी-हां, छोड़ दी जायगी यदि तू सच्चा हाल कहकर अपने दोष को स्वीकार कर लेगी और किशोरी, कामिनी तथा तारा का ठीक-ठीक पता बता देगी।
भगवानी—(कमलिनी के पैरों पर गिरकर और फिर खड़ी होकर) बेशक मैं कसूरवार हूँ। जो कुछ मैंने किया है मैं साफ कह दूँगी। अफसोस लालच में पड़कर मैंने बहुत बुरा किया था। मुझे शिवदत्त ने धोखा दिया, बिना समझे-बूझे मैं..
कमलिनी-बस-बस, ज्यादा बात बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं, जो कुछ कहना है जल्दी मे कह दे, विलम्ब होना तेरे लिए अच्छा नहीं है। भगवानी ने सब हाल अर्थात् जो कुछ उसने कसुर किया था, सच-सच कह दिया और अन्त में फिर कमलिनी के पैरों पर गिर कर बोली, "मैंने कोई बात नहीं छिपाई, अब अपनी प्रतिज्ञानुसार मुझे छोड़ दीजिए।"
"हाँ, छोड़ दूँगी।" कहकर कमलिनी ने भूतनाथ और श्यामसुन्दरसिंह की तरफ देखा और कहा, "इसकी मुश्कें बाँध लो और जहाँ उचित समझो ले जाकर अपनी हिफाजत में रक्खो। हम लोग मकान की तरफ न जाकर पहले किशोरी, कामिनी और तारा को छुड़ाने का उद्योग करते हैं और इसके बाद जैसा मौका होगा किया जायगा। कल इसी समय इसी जगह हम लोग या हम लोगों में से कोई आवेगा, तुम मौजद रहना, अगर भगवानी की बात सच निकली तो ठीक है, नहीं तो एक बात भी झूठी निकलने पर कल इसी जगह इसका सिर उतार लिया जायगा। बस अब मैं एक पल भी नहीं रुक सकती।"
भूतनाथ और भगवानी को इसी जगह छोड़ भैरोंसिंह देवीसिंह और लाडिली को साथ लिए हए कमलिनी वहाँ से रवाना हुई। इस समय उसके पास तिलिस्मी खंजर मौजद था, वही तिलिस्मी खंजर जो भैरोंसिंह का पत्र पाकर इन्द्रदेव ने उसे दे दिया था।
वहाँ से थोड़ी दूर पर एक पहाड़ी थी जिससे मिली-जुली छोटी-बड़ी पहाड़ियों का सिलसिला पीछे की तरफ दूर तक चला गया था। कमलिनी अपने साथियों को लिए हए उसी तरफ रवाना हुई। कमलिनी को अपने मकान के बर्बाद होने और लूटे जाने का इतना रंज न था जितना किशोरी, कामिनी और तारा की अवस्था पर रंज था। वह साथियों से में निम्नलिखित बातें करती हुई तेजी से उस पहाड़ी की तरफ जा रही थी।
कमलिनी-अफसोस, तारा ने बड़ा धोखा खाया! अब देखना चाहिए उन तीनों को मैं जीता पाती हैं या नहीं!
लाडिली-किशोरी और कामिनी बेचारी ने न मालम विधाता का क्या बिगाड़ा है कि सिवा दुःख के सुख तो उन्हें…
कमलिनी-दु:खों ने तो तो पहले ही उन्हें अधमरा कर दिया था, अब देखना चाहिए कि कई दिन की भूख-प्यास ने उन्हें जीता भी छोड़ा है या नहीं? (रोकर) सच तो यह है कि यदि वे जीती-जागती आज मुझे न मिलीं तो मैं दोनों कुमारों को मुँह दिखाने लायक न रहूँगी और जब इस योग्य हो जाऊँगी तो फिर जी कर ही क्या करूँगी! (कुछ सोचकर) निसन्देह अगर ऐसा हुआ तो आज मुझे भी उसी जगह मरकर रह जाना होगा। हे ईश्वर, तेरी सृष्टि में एक-से-एक बढ़कर खूबसुरत गुलबूटे मौजूद है, इन दोनों के लिए कमी नहीं है, क्या तू नहीं जानता कि उन कुमारों की जिन्दगी के लिए जिनकी प्रसन्नता पर हमारी प्रसन्नता निर्भर है केवल ये ही दोनों हैं? अफसोस, यद्यपि कम्बख्त भगवानी से मैं खटकी रहती थी मगर यह आशा न थी, कि वह यहाँ तक कर गुजरेगी।
भैरोंसिंह-क्या आप जानती थीं कि भगवानी दिल की खौटी है?
कमलिनी-मुझे इस बात का निश्चय तो न था कि वह खोटी है मगर उसके बात-बात पर कसम खाने से मैं खटकी रहती थी, क्योंकि मैं खूब जानती हूँ कि जो आदमी
लापरवाही के साथ बात-बात पर कसमें खाया करता है, वह वास्तव में झूठा और खोटा होता है। मायारानी की सुहबत के सबब से यदि वह मेरे इस तिलिस्मी मकान के तहखाने के भेद से अनजान रहती तो मैं स्वयं उसे वह भेद कदापि न बताती। तिस पर भी खुटका बना रहने के कारण मैं स्वयं जब ताला खोलकर उस तहखाने और सुरंग में जाती थी तो ताले को जमीन पर नहीं रख देती थी बल्कि कुण्डी में लगाकर ताली अपने पास रख लेती थी जिससे तहखाने या सुरंग में जाने के बाद पीछे से कोई आदमी ताला बन्द करना तो दूर रहा, जंजीर भी न चढ़ा सके।
देवीसिंह-बेशक यह बड़ी चालाकी की बात है। जब खाली कुण्डी में ताला लगा रहेगा तो किसी तरह कोई जंजीर नहीं चढ़ा सकता।
कमलिनी-और यह बात तारा को मालूम थी मगर अफसोस, उसने इस पर कुछ ध्यान न दिया और धोखा खा गई। मैं बहुत दिनों से इस फिक्र में थी कि भगवानी को अच्छी तरह जांच कर खटका मिटा लिया जावे लेकिन इतनी फुरसत ही न मिली। दस दिन निश्चिन्त होकर घर में बैठने की कभी नौबत ही न आई। मगर आश्चर्य की बात है कि भगवानी ने इतनी खोटी होने पर भी हमारे यहाँ की कोई बात मायारानी के कान तक न पहुँचाई क्योंकि अभी तक कोई ऐसी बात पाई नहीं गई जिससे मैं समझती कि मेरा फलाँ भेद मायारानी को मालूम हो गया है।
भैरोंसिंह-यह बात कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मौका मिलने पर आदमी की तबीयत यकायक बदल जाय। एक पुरानी मसल चली आती है कि 'आदमी का शैतान आदमी होता है।' इसका मतलब यही है कि चालाक और धूर्त आदमी अपनी लच्छेदार बातों में फंसाकर किसी आदमी की तबीयत को बदल सकता है। मन बड़ा ही चंचल है, इसे स्वाधीन रखना कोई मामूली बात नहीं है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों का सैकड़ों वर्षों का उद्योग भी, जो केवल मन को स्वाधीन करने के विषय में किया गया था, बात-की-बात में वृथा हो चुका है। हाँ, नेक और बद आदमियों के मन में इतना भेद अवश्य होता है कि भाव बदल जाने या धोखे में पड़कर किसी बराई के हो जाने पर नेक आदमी तुरत चौकन्ना हो जाता है और सोचता है कि 'बेशक यह काम मुझसे बुरा हो गया, मगर बुरे मनुष्य में जिसने अपने मन पर अधिकार जमाने के लिए कुछ उद्योग न किया हो, यह बात नहीं होती। जो आदमी इस बात को सोचता कि मन क्या वस्तु है, इसकी चंचलता कैसी है, यह कितनी जल्दी बदल जाने की सामर्थ्य रखता है, या उसे अधिकार में न रखने से क्या-क्या खराबियां हो सकती हैं, उसके हृदय में एक ऐसी ताकत पैदा हो जाती है जिसकी उत्पत्ति तो विचारशक्ति से है मगर यह कहना बहुत कठिन है कि वह स्वयं क्या पदार्थ है। उसका काम यह है कि मन की चंचलता या शिथिलता के कारण यदि कोई बुराई होना चाहती है तो वह विचित्र ढंग से खुटका पैदा कर तुरन्त खबर दे देता है कि यह काम बुरा है या तूने बुरा किया। यह विषय बड़ा गम्भीर है, ऐसे समय में अर्थात् राह चलते-चलते इस विषय को स्पष्ट रूप से मैं नहीं दिखा सकता मगर मेरे कहने का मतलब केवल यही है कि आदमी का शैतान आदमी होता है। आदमी अपने हमजिन्स की तबीयत को बेशक बदल सकता है हाँ यह
बात विचारशक्ति की दृढ़ता और स्थिरता पर निर्भर है कि किसका मन कितनी देर में बदल सकता है। भगवानी औरत की जात है जिनका मन वनिस्बत मर्दो के बहुत कमजोर होता है। ऐसे को यदि तीन धूर्तों की लच्छेदार बातों ने, जो आपके यहाँ कैद थे, मौका पाकर बदल दिया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं, इससे इस बात को निश्चित तौर पर कह नहीं सकते कि भगवानी अवश्य पहले से ही खोटी थी या पहले अच्छी थी, बीच में खोटी बना दी गई।
कमलिनी–(भैरोंसिंह के विचारों से प्रसन्न होकर) बेशक तुम्हारा यह कहना बहुत ठीक है, मैं स्वीकार करती हूँ।
देवीसिंह–(भैरोंसिंह की पीठ मुहब्बत से ठोंककर) शाबाश! मैं यह जानकर प्रसन्न हुआ कि तुम मन की अवस्था को अच्छी तरह से समझते हो, जिसका नतीजा भविष्य में बहुत अच्छा निकलेगा। ईश्वर हमारे उस मनोरथ को पूरा करे जिसके लिए इस समय तेजी और घबराहट के साथ हम लोग जा रहे हैं फिर किसी समय इस विषय पर बहुत-सी बातें मैं तुमसे कहूँगा।
JIM – Assistente
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