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  • चन्द्रकान्ता सन्तति 6

    चन्द्रकान्ता सन्तति 6

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    दोनों कुमार खुशी-खुशी सबसे मिले। एक-एक करके सबसे कुशल-मंगल पूछा,कमलिनी और लाड़िली से भी चार आँखें हुईं, मगर वहाँ किशोरी और कामिनी की सुरत दिखाई न पड़ी, जिनके बारे में सुन चुके थे कि महल के अन्दर पहुंच चुकी हैं। इस सबब से उनके दिल को जो कुछ तकलीफ हुई उसका अन्दाज औरों को तो नहीं, मगर कुछ-कुछ कमलिनी और लाड़िली को मिल गया और उन्होंने बात-ही-बात में इस भेद को खुलवाकर कुमारों की तसल्ली करवा दी।

    थोड़ी देर तक दोनों भाई महल के अन्दर रहे, और इस बीच में बाहर से कई दफे तलबी का सन्देश पहुँचा, अतः पुनः मिलने का वादा करके वहाँ से उठकर वह बाहर की तरफ रवाना हुए और उस आलीशान कमरे में पहुंचे, जिसमें कई खास-खास आदमियों और आपस वालों के साथ महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह उनका इन्तजार कर रहे थे। इस समय इस कमरे में यद्यपि राजा गोपालसिंह, नकाबपोश लोग, जीतसिंह, तेजसिंह, भूतनाथ और ऐयार लोग भी उपस्थित थे, मगर कोई आदमी ऐसा न था, जिसके सामने भेद की बातें करने में किसी तरह का संकोच हो । दोनों कुमार इशारा पाकर अपने दादा साहब के बगल में बैठ गए और धीरे-धीरे बातचीत होने लगी।

    सुरेन्द्रसिंह-(दोनों कुमारों की तरफ देखकर) भैरोंसिंह और तारासिंह तुम्हारे पास गये थे, उन दोनों को कहाँ छोड़ा ?

    इन्द्रजीतसिंह-(मुस्कराते हुए) जी वे दोनों तो हम लोगों के आने से पहले ही से हजूर में हाजिर हैं !

    सुरेन्द्रसिंह-(ताज्जुब से चारों तरफ देखकर) कहाँ ?

    महाराज के साथ-ही-साथ और लोगों ने भी ताज्जुब के साथ एक-दूसरे पर निगाह डाली।

    इन्द्रजीतसिंह-(दोनों सरदार नकाबपोशों की तरफ बताकर जिनके साथ और भी कई नकाबपोश थे) रामसिंह और लक्ष्मणसिंह का काम आज वे ही दोनों पूरा कर

    इतना सुनते ही दोनों नकाबपोशों ने अपने-अपने चेहरे पर से नकाबें हटा दी, और उनके बदले में भैरोंसिंह तथा तारासिंह दिखाई देने लगे। इस जादू के से मामले को देखकर सबकी विचित्र अवस्था हो गई और सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह की तो और ही अवस्था हो रही थी। बड़े जोरों के साथ कलेजा उछलने लगा और वे कुछ बातें उन्हें याद आ गईं जो नकाबपोशों के मकान में जाकर देखी-सुनी थीं और वे दोनों ही ताज्जुब के साथ गौर करने लगे।

    सुरेन्द्रसिंह-(दोनों कुमारों से) जब भैरोंसिंह और तारासिंह तुम्हारे पास नहीं गये और यहाँ मौजूद थे, तब भी तो रामसिंह और लक्ष्मणसिंह कई दफे आये थे,उस समय इस विचित्र पर्दे (नकाब)के अन्दर कौन छिपा हुआ था ?

    इन्द्रजीतसिंह-(और सब नकाबपोशों की तरफ बताकर) कई दफे इन लोगों में से बारी-बारी से समयानुसार और कई दफे स्वयं हम दोनों भाई इसी पोशाक और नकाब को पहनकर हाजिर हुए थे।

    कुंअर इन्द्रजीतसिंह की इस बात ने इन लोगों को और भी ताज्जुब में डाल दिया और सब कोई हैरानी के साथ उनकी तरफ देखने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह की तो बात ही निराली थी, इनको तो विश्वास हो गया कि नकाबपोशों की टोह में जिस मकान के अन्दर हम लोग गए थे, उस मालिक ये ही दोनों हैं, इन्हीं दोनों की मर्जी से हम लोग गिरफ्तार हुए थे, और इन्हीं दोनों के सामने पेश किए गए थे। देवीसिंह यद्यपि अपने दिल को बार-बार समझा-बुझाकर सम्हालते थे, मगर इस बात का खयाल हो ही जाता था कि अपने ही लोगों ने मेरी बेइज्जती की, और मेरे ही लड़के ने इस काम में शरीक होकर मेरे साथ दगा की। मगर देखना चाहिए, इन सब बातों का भेद, सबब और नतीजा क्या खुलता है।

    भूतनाथ इस सोच में घड़ी-घड़ी सिर झुका लेता था कि मेरे पुराने ऐब, जिन्हें मैं बड़ी कोशिश से छिपा रहा था, अब छिपे न रहे, क्योंकि इन नकाबपोशों को मेरा रत्ती-रत्ती हाल मालूम है, और दोनों कुमार इन सबके मालिक और मुखिया हैं, अतः इनसे कोई बात छिपी न रह गई होगी। इसके अतिरिक्त मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ, कि मुझसे बदला लेने की नीयत रखने वाला मेरा दुश्मन उस विचित्र तस्वीर को लिए हुए इनके सामने हाजिर हुआ था और मेरा लड़का हरनामसिंह भी वहां मौजूद था। यद्यपि इस बात की आशा नहीं हो सकती कि ये दोनों कुमार मुझे जलील और बे-आबरू करेंगे, मगर फिर भी शर्मिन्दगी मेरा पल्ला नहीं छोड़ती। इत्तिफाक की बात है कि जिस तरह मेरी स्त्री और लड़के ने इस मामले में शरीक होकर मुझे छकाया है, उसी तरह देवीसिंह की स्त्री-लड़के ने उनके दिल में भी चुटकी ली है।

    देवीसिंह और भूतनाथ की तरह हमारे और ऐयारों के दिलों में भी करीब-करीब इसी ढंग की बातें पैदा हो रही थीं, और इन सब भेदों को जानने के लिए वे बनिस्बत पहले के अब और ज्यादा बेचैन हो रहे थे, तथा यही हाल हमारे महाराज सुरेन्द्रसिंह और गोपालसिंह वगैरह का भी था।

    कुछ देर तक ताज्जुब के साथ सन्नाटा रहा, और इसके बाद पुनः महाराज ने दोनों कुमारों की तरफ देखकर कहा सुरेन्द्रसिंह-ताज्जुब की बात है कि तुम दोनों भाई यहाँ आकर भी अपने को छिपाये रहे !

    इन्द्रजीतसिंह—(हाथ जोड़कर) मैं यहाँ हाजिर होकर पहले ही अर्ज कर चुका था कि "हम लोगों का भेद जानने के लिए उद्योग न किया जाये, हम लोग मौका पाकर स्वयं अपने को प्रकट कर देंगे।" इसके अतिरिक्त तिलिस्मी नियमों के अनुसार तब तक हम दोनों भाई प्रकट नहीं हो सकते थे, जब तक कि अपना सारा काम पूरा करके इसी तिलिस्मी चबूतरे की राह से तिलिस्म के बाहर नहीं निकल आते। साथ ही इसके हम लोगों की यह भी इच्छा थी कि जब तक निश्चिन्त होकर खुले तौर पर यहाँ न आ जायें,तब तक कैदियों के मुकदमे का फैसला न होने पाये, क्योंकि इस तिलिस्म के अन्दर जाने के बाद हम लोगों को बहुत से नए-नए भेद मालूम हुए हैं जो(नकाबपोशों की तरफ इशारा करके)इन लोगों से सम्बन्ध रखते हैं, और जिनका आपसे अर्ज करना बहुत जरूरी था।

    सुरेन्द्रसिंह-(मुस्कराते हुए और नकाबपोशों की तरफ देखकर) अब तो इन लोगों को भी अपने चेहरों से नकाबें उतार देनी चाहिए । हम समझते हैं इस समय इन लोगों का चेहरा साफ होगा।

    कुंअर इन्द्रजीतसिंह का इशारा पाकर उन नकाबपोशों ने भी अपने-अपने चेहरे से नकाबें हटा दी, और खड़े होकर अदब के साथ महाराज को सलाम किया । ये नकाबपोश गिनती में पांच थे और इन्हीं पांचों में इस समय वे दोनों सूरतें भी दिखाई पड़ीं,जो यहाँ दरबार में पहले दिखाई पड़ चुकी थी, या जिन्हें देखकर दारोगा और बेगम के छक्के

    अब सबका ध्यान उन पांचों नकाबपोशों की तरफ खिंच गया, हाल जानने के लिए लोग पहले ही से बेचैन हो रहे थे, क्योंकि इन्होंने कैदियों के मामले,में कुछ विचित्र ढंग की कैफियत और उलझन पैदा कर दी थी। यद्यपि कह सकते हैं कि यहाँ पर इन पाँचों को पहचानने वाला कोई न था, मगर भूतनाथ और राजा गोपालसिंह बड़े गौर से उनकी तरफ देखकर अपने हाफजे (स्मरणशक्ति)पर जोर दे रहे थे, और उम्मीद करते थे कि इन्हें हम पहचान लेंगे।

    सुरेन्द्रसिंह- (गोपालसिंह की तरफ देखकर)केवल हम लोग नहीं बल्कि हजारों आदमी इनका हाल जानने के लिए बेताब हो रहे हैं, अतः ऐसा करना चाहिए कि एक साथ ही इनका हाल मालूम हो जाये ।

    गोपालसिंह-मेरी भी यही राय है ।

    एक नकाबपोश-कैदियों के सामने ही हम लोगों का किस्सा सुना जाये तो ठीक है, क्योंकि ऐसा होने ही से महाराज का विचार पूरा होगा। इसके अतिरिक्त हम लोगों के किस्से में वही कैदी हामी भरेंगे, और कई अधूरी बातों को पूरा करके महाराज का शक दूर करेंगे, जिन्हें हम लोग भी नहीं जानते, और जिनके लिए महाराज भी छूट गए थे। निका असल उत्सुक होंगे।

    इन्द्रजीतसिंह-(सुरेन्द्रसिंह से) बेशक ऐसा ही है । यद्यपि हम दोनों भाई इन लोगों का किस्सा सुन चुके हैं, मगर कई भेदों का पता नहीं लगा, जिनके जाने बिना जी बेचैन हो रहा है, और उनका मालूम होना कैदियों की इच्छा पर निर्भर है ।

    सुरेन्द्रसिंह–(कुछ सोचकर) खैर, ऐसा ही किया जायेगा।

    इसके बाद उन लोगों में दूसरे तरह की बातचीत होने लगी, जिसके लिखने की कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती । इसके घण्टे भर बाद यह दरबार बर्खास्त हुआ और सब कोई अपने-अपने स्थान पर चले गए।

    कुंअर इन्द्रजीतसिंह का दिल किशोरी को देखने के लिए बेताब हो रहा था। उन्हें विश्वास था कि यहां पहुंचकर उससे अच्छी तरह मुलाकात होगी और बहुत दिनों का अरमान-भरा दिल उसकी सोहबत से तस्कीन पाकर पुनः उसके कब्जे में आ जायेगा मगर ऐसा नहीं हुआ अर्थात् कुमार के आने से पहले ही वह अपने नाना के डेरे में भेज दी गई, और उनका अरमान-भरा दिल उसी तरह तड़पता रह गया । यद्यपि उन्हें इस बात का भी विश्वास था कि अब उनकी शादी किशोरी के साथ बहुत जल्द होने वाली है, मगर फिर भी उनका मनचला दिल जिसे उनके कब्जे के बाहर हुए मुद्दत हो चुकी थी, इन चापलूसियों को कब मानता था ! इसी तरह कमलिनी से भी मीठी-मीठी बातें करने के लिए वे कम बेताब न थे, मगर बड़ों का लिहाज उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देता था कि उससे एकान्त में मुलाकात करें, यद्यपि वे ऐसा करते तो कोई हर्ज की बात न थी। मगर इसलिए कि उसके साथ भी शादी होने की उम्मीद थी, शर्म और लिहाज के फेर में पड़े हुए थे । परन्तु कमलिनी को इस बात का सोच-विचार कुछ भी न था । हम इसका सबब भी बयान नहीं कर सकते, हाँ, इतना कहेंगे कि जिस कमरे में कुंअर इन्द्रजीतसिंह का डेरा था उसी के पीछे वाले कमरे में कमलिनी का डेरा था, और उस कमरे से कुँअर इन्द्रजीतसिंह के कमरे के आने-जाने के लिए एक छोटा-सा दरवाजा भी था जो इस समय भीतर की तरफ से अर्थात् कमलिनी की तरफ से बन्द था और कुमार को इस बात की कुछ भी खबर न थी।

    रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी थी। कुंअर इन्द्रजीतसिंह अपने पलंग पर लेटे हुए किशोरी और कमलिनी के विषय में तरह-तरह की बातें सोच रहे थे। उनके पास कोई दूसरा आदमी न था और एक तरह पर सन्नाटा छाया हुआ था, यकायक पीछे वाले कमरे का (जिसमें कमलिनी का डेरा था)दरवाजा खुला और अन्दर से एक लौंडी आती हुई दिखाई पड़ी।

    कुमार ने चौंककर उसकी तरफ देखा और उसने हाथ जोड़कर अर्ज किया,"कमलिनीजी आपसे मिलना चाहती हैं, आज्ञा हो तो स्वयं यहाँ आवें या आप ही वहाँ

    कुमार–वे कहां हैं ?

    लौंडी-(पिछले कमरे की तरफ बताकर) इसी कमरे में तो उनका डेरा है ।

    कुमार-(ताज्जुब से) इसी कमरे में ! मुझे इस बात की कुछ भी खबर न थी। अच्छा मैं स्वयं चलता हूँ, तू इस कमरे का दरवाजा बन्द कर दे।

    आज्ञा पाते ही लौंडी ने कुमार के कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया जिसमें बाहर से कोई यकायक आ न जाय । इसके बाद इशारा पाकर लौंडी कमलिनी के कमरे की तरफ रवाना हुई और कुमार उसके पीछे-पीछे चले। चौखट के अन्दर पैर रखते ही कुमार की निगाह कमलिनी पर पड़ी और वे भौचक्के से होकर उसकी सूरत देखने लगे।

    इस समय कमलिनी की सुन्दरता बनिस्बत पहले के बहुत ही बढ़ी-चढ़ी देखने में आई । पहले जिन दिनों कुमार ने कमलिनी की सूरत देखी थी, उन दिनों वह बिल्कुल उदासीन और मामूली ढंग पर रहा करती थी। मायारानी के झगड़े की बदौलत उसकी जान जोखिम में पड़ी हुई थी और इस कारण से दिमाग को एक पल के लिए भी छुट्टी नहीं मिलती थी । इन्हीं सब कारणों से उसके शरीर और चेहरे की रौनक में भी बहुत बड़ा फर्क पड़ गया था, तिस पर भी वह कुमार की सच्ची निगाह में एक ही दिखाई देती थी। फिर आज उसकी खुशी और खूबसूरती का क्या कहना है जब कि ईश्वर की कृपा से वह अपने तमाम दुश्मनों पर फतह पा चुकी है, तर दुदों के बोझ से हलकी हो चुकी है और मनमानी उम्मीदों के साथ अपने को बनाने-सँवारने का भी मुनासिब मौका उसे मिल गया है ! यही सबब है कि इस समय वह रानियों की सी पोशाक और सजावट में दिखाई देती है।

    कमलिनी की इस समय की खूबसूरती ने कुमार पर बहुत बड़ा असर किया और बनिस्बत पहले के इस समय बहुत ज्यादा कुमार के दिल पर अपना अधिकार जमा लिया,कुमार को देखते ही कमलिनी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुमार ने आगे बढ़कर बड़े प्रेम से उसका हाथ पकड़कर पूछा, "कहो, अच्छी तो हो?"

    "अब भी अच्छी न होऊँगी !" कहकर मुस्कुराती हुई कमलिनी ने कुमार को ले जाकर एक ऊँची गद्दी पर बैठाया और आप भी उनके पास बैठकर यों बातचीत करने लगी।

    कमलिनी-कहिये, तिलिस्म के अन्दर आपको किसी तरह की तकलीफ तो नहीं नहीं हुई

    इन्द्रजीतसिंह-ईश्वर की कृपा से हम लोग कुशलपूर्वक यहाँ तक चले आये और अब तुम्हें धन्यवाद देते हैं, क्योंकि यह सब बातें हमें तुम्हारी ही बदौलत नसीब हुई हैं । अगर तुम मदद न करतीं तो न मालूम हम लोगों की क्या दशा होती ! हमारे साथ तुमने जो कुछ उपकार किया है, उसका बदला चुकाना मेरी सामर्थ्य के बाहर है, सिवाय इसके मैं क्या कह सकता हूँ कि मेरी (अपनी छाती पर हाथ रख के) यह जान और शरीर तुम्हारा है।

    कमलिनी-(मुस्कुरा कर) अब कृपा कर इन सब बातों को तो रहने दीजिए, क्योंकि इस समय मैंने इसलिए आपको तकलीफ नहीं दी है कि अपनी बढ़ाई सुनूं या आप पर अपना अधिकार जमाऊँ।

    इन्द्रजीतसिंह–अधिकार तो तुमने उसी दिन मुझ पर जमा लिया जिस दिन ऐयार के हाथ से मेरी जान बचाई और मुझसे तलवार की लड़ाई लड़कर यह भी दिखा दिया कि मैं तुमसे ताकत में कम नहीं हूँ।

    कमलिनी- (हँसकर) क्या खूब ! मैं और आपका मुकाबला करूं!आपने मुझे भी क्या कोई पहलवान समझ लिया है ? इन्द्रजीतसिंह-आखिर बात क्या थी जो उस दिन मैं तुमसे हार गया था ?

    कमलिनी-आपको उस बेहोशी की दवा ने कमजोर और खराब कर दिया था जो एक अनाड़ी ऐयार की बनाई हुई थी। उस समय केवल आपको चैतन्य करने के लिए मैं लड़ पड़ी थी, नहीं तो कहाँ मैं और कहाँ आप !

    इन्द्रजीतसिंह-खैर, ऐसा ही होगा । मगर इसमें तो कोई शक नहीं कि तुमने मेरी जान बचाई, केवल उसी दफे नहीं बल्कि उसके बाद भी कई दफे ।

    कमलिनी-छोड़िए भी, अव इन सब बातों को जाने दीजिये, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहती । हाँ, यह बतलाइये कि तिलिस्म के अन्दर आपने क्या-क्या देखा, और क्या-क्या किया?

    इन्द्रजीतसिंह- मैं सब हाल तुमसे कहूँगा, बल्कि उन नकाबपोशों की कैफियत भी तुमसे बयान करूंगा जो मुझे तिलिस्म के अन्दर कैद मिले और जिनका हाल अभी तक मैंने किसी से बयान नहीं किया। मगर तुम यह सब हाल अपनी जुबान से किसी से न कहना।

    कमलिनी-बहुत खूब ।

    इसके बाद कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना कुल हाल कमलिनी से बयान किया।और कमलिनी ने भी अपना पिछला किस्सा और उसी के साथ-साथ भूतनाथ, नानक तथा तारा वगैरह का हाल बयान किया जो कुमार को मालूम न था। इसके बाद पुनः उन।दोनों में यों बातचीत होने लगी-

    इन्द्रजीतसिंह-आज तुम्हारी जुबानी बहुत-सी ऐसी बातें मालूम हुई हैं जिनके विषय में मैं कुछ भी नहीं जानता था।

    कमलिनी-इसी तरह आपकी जुबानी उन नकाबपोशों का हाल सुनकर मेरी अजीब हालत हो रही है, क्या करूँ, आपने मना कर दिया है कि किसी से इस बात का जिक्र न करना, नहीं तो अपने सुयोग्य पति से उनके विषय में

    इन्द्रजीतसिंह-(चौंककर) हैं ! क्या तुम्हारी शादी हो गई ?

    कमलिनी—(कुमार के चेहरे का रंग उड़ा हुआ देख मुस्कुराकर) मैं अपने उस तालाब वाले मकान में अर्ज कर चुकी थी कि मेरी शादी बहुत जल्द होने वाली है !

    इन्द्रजीतसिंह- (लम्बी सांस लेकर) हाँ, मुझे याद है, मगर यह उम्मीद न थी कि वह इतनी जल्दी हो जायगी।

    कमलिनी-तो क्या आप मुझे हमेशा कुँआरी ही देखना पसन्द करते थे ?

    इन्द्रजीतसिंह-नहीं, ऐसा तो नहीं है, मगर

    कमलिनी -मगर क्या ? कहिए-कहिए, रुके क्यों ?

    इन्द्रजीतसिंह-यही कि मुझसे पूछ तो लिया होता।

    कमलिनी-क्या खूब ! आपने क्या मुझसे पूछकर इन्द्रानी के साथ शादी की थी जो मैं आपसे पूछ लेती !

    इतना कहकर कमलिनी हँस पड़ी और कुमार ने शरमाकर सिर झुका लिया । मगर इस समय कुमार के चेहरे से भी मालूम होता था कि उन्हें हद दर्जे का रंज है और कलेजे में बेहिसाब तकलीफ हो रही है।

    कुमार—(कमलिनी के पास से कुछ खिसककर) मुझे विश्वास था कि जन्म-भर तुमसे हँसने-बोलने का मौका मिलेगा।

    कमलिनी-मेरे दिल में भी यही बात बैठी हुई थी और यही तय करके मैंने शादी की है कि आपसे कभी अलग होने की नौबत न आवे। मगर आप हट क्यों गये ? आइये-आइये, जिस जगह बैठे थे, वहीं बैठिए ।

    कुमार-नहीं-नहीं, पराई स्त्री के साथ एकान्त में बैठना ही धर्म के विरुद्ध है न कि साथ सटकर, मगर आश्चर्य है कि तुम्हें इस बात का कुछ भी खयाल नहीं है ! मुझे विश्वास था कि तुमसे कभी कोई काम धर्म के विरुद्ध न हो सकेगा।

    कमलिनी–मुझमें आपने कौन-सी बात धर्म-विरुद्ध पाई ?

    कुमार—यही कि तुम इस तरह एकान्त में बैठकर मुझसे बातें कर रही हो इससे भी बढ़कर वह बात जो अभी तुमने अपनी जुबान से कबूल की है कि 'तुमसे कभी अलग न होऊँगी' । क्या यह धर्म-विरुद्ध नहीं है ? क्या तुम्हारा पति इस बात को जानकर भी तुम्हें पतिव्रता कहेगा?

    कमलिनी-कहेगा, और जरूर कहेगा । अगर न कहे तो इसमें उसकी भूल है । उसे निश्चय है और आप सच समझिये कि कमलिनी प्राण दे देना स्वीकार करेगी, परन्तु धर्म-विरुद्ध पथ पर चलना कदापि नहीं। आपको मेरी नीयत पर ध्यान देना चाहिए । दिल्लगी की बातों पर नहीं, क्योंकि मैं ऐयार भी हूँ। यदि मेरा पति इस समय यहाँ आ जाय तो आपको मालूम हो जाय कि मुझ पर वह जरा भी शक नहीं करता और मेरा इस तरह बैठना उसे कुछ भी नहीं अखरता ।

    कुमार—(कुछ सोचकर) ताज्जुब है !

    कमलिनी-अभी क्या, आगे आपको और भी ताज्जुब होगा। इतना कहकर कमलिनी ने कुमार की कलाई पकड़ ली और अपनी तरफ खींचकर कहा, "पहले आप अपनी जगह पर आकर बैठ जाइये तब मुझसे बात कीजिए।"

    कुमार-नहीं-नहीं कमलिनी, तुम्हें ऐसा उचित नहीं है । दुनिया में धर्म से बढ़कर और कोई वस्तु नहीं है। अतएव तुम्हें भी धर्म पर ध्यान रखना चाहिए । अब तुम स्वतन्त्र नहीं हो, पराये की स्त्री हो।

    कमलिनी-यह सच है, परन्तु मैं आपसे पूछती हूँ कि यदि मेरी शादी आपके साथ होती तो क्या मैं आनन्दसिंह से हँसने-बोलने या दिल्लगी करने लायक न रहती ?

    कुमार—बेशक, उस हालत में तुम आनन्द से हँस-बोल और दिल्लगी भी कर सकती थीं, क्योंकि यह बात हम लोगों में लौकिक व्यवहार के ढंग पर प्रचलित है।

    कमलिनी–बस, तो मैं आपसे भी उसी तरह हँस-बोल सकती हूँ और ऐसा करने के लिए मेरे पति ने मुझे आज्ञा भी दे दी है, मैं उनका पत्र आपको दिखा सकती हूँ इसलिए कि मेरा-आपका नाता ही ऐसा है, एक नहीं बल्कि तीन-तीन नाते हैं।

    इन्द्रजीतसिंह–सो कैसे ?

    कमलिनी-सुनिये, मैं कहती हूँ। एक तो मैं किशोरी को अपनी बहिन समझती

    हूँ अतएव आप मेरे बहनोई हुए, कहिए कि हाँ ।

    कुमार —— यह कोई बात नहीं है, क्योंकि अभी किशोरी की शादी मेरे साथ नहीं हुई है।

    कमलिनी –– खैर, जाने दीजिये। मैं दूसरा और तीसरा नाता बताती हूँ। जिनके साथ मेरी शादी हुई है, वे राजा गोपालसिंह के भाई हैं। इसके अतिरिक्त लक्ष्मीदेवी की मैं छोटी बहिन हूं अतएव आपकी साली भी हुई।

    कुमार —— (कुछ सोचकर) हां, इस बात से तो मैं कायल हुआ। मगर तुम्हारी नीयत में किसी तरह फर्क न आना चाहिए।

    कमलिनी —— इससे आप बेफिक्र रहिये। मैं अपना धर्म किसी तरह नहीं बिगाड़ सकती और न दुनिया में कोई ऐसा पैदा हुआ है जो मेरी नीयत बिगाड़ सके, आइए अब तो अपने ठिकाने पर बैठ जाइए।

    लाचार कुंअर इन्द्रजीतसिंह अपने ठिकाने आ बैठे और पुनः बातचीत करने लगे, मगर उदास बहुत थे और यह बात उनके चेहरे से जाहिर हो रही थी।

    यकायक कमलिनी ने मसखरेपन के साथ हँस दिया जिससे कुमार को खयाल हो गया कि इसने जो कुछ कहा सब झूठ और केवल दिल्लगी के लिए था। मगर साथ ही इसके उनके दिल का खुटका साफ नहीं हुआ।

    कमलिनी — अच्छा आप यह बताइए कि तिलिस्म की कैफियत देखने के लिए राजा साहब तिलिस्म के अन्दर जायेंगे या नहीं ?

    कुमार — जरूर जायेंगे।

    कमलिनी —— कब ?

    कुमार —— सो मैं ठीक नहीं कह सकता, शायद कल या परसों ही जायें। कहते थे कि तिलिस्म के अन्दर चलकर उसे देखने का इरादा है। इसके जवाब में भाई गोपालसिंह ने कहा कि कि जरूर और जल्द चलकर देखना चाहिए।

    कमलिनी —— तो क्या हम लोगों को साथ ले जायेंगे?

    कुमार —— सो मैं कैसे कहूँ ? तुम गोपाल भाई से कहो, वह इसका बन्दोबस्त जरूर कर देंगे, मुझे तो कुछ शर्म मालूम होगी।

    कमलिनी —— सो तो ठीक है, अच्छा, मैं कल उनसे कहूँगी।

    कुमार ——- मगर तुम लोगों के साथ किशोरी भी अगर तिलिस्म के अन्दर जाकर वहाँ की कैफियत न देखेगी तो मुझे इस बात का रंज जरूर होगा।

    कमलिनी —— बात तो वाजिब है, मगर वह इस मकान में तभी आवेगी जब उनकी शादी आपके साथ हो जायगी और इसीलिए वह अपने नाना के डेरे में भेज दी गई हैं। खैर, तो आप इस मामले को तब तक के लिए टाल दीजिए जब तक आपकी शादी न हो जाय।

    कुमार —— मैं भी यही उचित समझता हूँ, अगर महाराज मान जायें तो।

    कमलिनी —— या आप हम लोगों को फिर दूसरी दफे ले जायेगा।

    कुमार — हाँ, य. भी हो सकता है। अबकी दफे का वहाँ जाना महाराज की

    इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिए, वे जिसे चाहें ले जायें।

    कमलिनी — बेशक, ऐसा ही ठीक होगा । अब तिलिस्म के अन्दर जाने में आपत्ति ही काहे की है, जब और जितनी दफे आप चाहेंगे हम लोगों को ले जायेंगे ।

    कुमार — नहीं, सो बात ठीक नहीं । वहुत सी जगहें ऐसी हैं जहाँ सैकड़ों दफे जाने में भी कोई हर्ज नहीं है, मगर बहुत-सी जगहें तिलिस्म टूट जाने पर भी नाजुक हालत में बनी हुई हैं और जहाँ बार-बार जाना कठिन है, तथापि मैं तुम लोगों को वहाँ की सैर जरूर कराऊँगा।

    कमलिनी–मैं समझती हूँ कि मेरे उस तालाब वाले तिलिस्मी मकान के नीचे भी कोई तिलिस्म जरूर है । उस खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब का मजमून पूरी तरह से मेरी समझ में नहीं आता था, तथापि इस ढंग की बातों पर कुछ शक जरूर होता था।

    कुमार — तुम्हारा ख्याल बहुत ठीक है, हम दोनों भाइयों को खून ने लिखी उस तिलिस्मी किताब के पढ़ने से बहुत ज्यादा हाल मालूम हुआ है, इसके अतिरिक्त मुझे तुम्हारा वह स्थान भी ज्यादा पसन्द है और पहले भी मैं (जब तुम्हारे पास वहाँ था) यह विचार कर चुका था कि 'सब कामों से निश्चिन्त होकर कुछ दिनों के लिए जरूर यहाँ डेरा जमाऊँगा, परन्तु अब मेरा वह विचार कुछ काम नहीं दे सकता।

    कमलिनी — सो क्यों ?

    कुमार — इसलिए कि अगर तुम्हारी बातें ठीक हैं, तो अब वह स्थान तुम्हारे पति के अधिकार में होगा।

    कमलिनी — (मुस्कुराकर) तो क्या हर्ज है, मैं उनसे कहकर आपको दिला दूंगी।

    कुमार — मैं किसी से भीख मांगना पसन्द नहीं करता और न उनसे लड़कर वह स्थान छीन लेना ही मुझे मंजूर होगा। कमलिनी, सच तो ये है कि तुमने मुझे धोखा दिया और बहुत बड़ा धोखा दिया ! मुझे तुमसे यह उम्मीद न थी। (कुछ सोचकर) एक दफे तुम मुझसे फिर कह दो कि सचमुच शादी हो गई।

    इसके जवाब में कमलिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली, "हाँ, हो गई।"

    कुमार — मेरे सिर पर हाथ रखकर कसम खाओ।

    कमलिनी —— (कुमार के पैरों पर हाथ रख के) आपसे मैं कसम खाकर कहती हूं कि मेरी शादी हो गई।

    हम लिख नहीं सकते कि इस समय कुमार के दिल की कैसी बुरी हालत थी, रंज और अफसोस से उनका दिल बैठा जाता था और कमलिनी हँस-हँसकर चुटकियाँ लेती थी। बड़ी मुश्किल से कुमार थोड़ी देर तक और उसके पास बैठे और फिर उठकर लम्बी साँसें लेते हुए अपने कमरे में चले गए। रात भर उन्हें नींद न आई ।

    5

    महाराज की आज्ञानुसार कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के विवाह की तैयारी बड़ी धूमधाम से हो रही है। यहां से चुनार तक की सड़कें दोनों तरफ जाफरी वाली टट्टियों से सजाई हैं, जिन पर रोशनी की जायेगी और जिनके बीच में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बड़े फाटक बने हुए हैं और उन पर नौबतखाने का इन्तजाम किया गया है। टट्टियों के दोनों तरफ बाजार बसाया जायेगा, जिसकी तैयारी कारिन्दे लोग बड़ी खूबी और मुस्तैदी के साथ कर रहे हैं। इसी तरह और भी तरह-तरह के तमाशों का इन्तजाम बीच-बीच में हो रहा है, जिसके सबब से बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ होने की उम्मीद है और अभी से तमाशबीनों का जमावड़ा भी हो रहा है। रोशनी के साथ-साथ आतिशबाजी के इन्तजाम में भी बड़ी सरगर्मी दिखाई जा रही है, कोशिश हो रही है कि उम्दा से उम्दा तथा अनूठी आतिशबाजी का तमाशा लोगों को दिखाया जाये। इसी तरह और भी कई तरह के खेल-तमाशे और नाच इत्यादि का बन्दोबस्त हो रहा है, मगर इस समय हम इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है क्योंकि हम अपने पाठकों को उस तिलिस्मी मकान की तरफ ले चलना चाहते हैं, जहां भूतनाथ और देवीसिंह ने नकाबपोशों के फेर में पड़कर शर्मिन्दगी उठाई थी और जहाँ इस समय दोनों कुमार अपने दादा, पिता तथा और सब आपस वालों को तिलिस्मी तमाशा दिखाने के लिए ले जा रहे हैं।

    सुबह का सुहावना समय है और ठंडी हवा चल रही है। जंगली फूलों की खुशबू से मस्त सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगी खूबसूरत चिड़ियाएं हमारे सर्वगुण-सम्पन्न मुसाफिरों को मुबारकबाद दे रही हैं, जो तिलिस्म की सैर करने की नीयत से मीठी-मीठी बातें करते हुए जा रहे हैं।

    घोड़े पर सवार महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा पैदल तेजसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ, पंडित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल वगैरह अपने ऐयार लोग जा रहे थे। तिलिस्म के अन्दर मिले हुए कैदी अर्थात् नकाबपोश लोग तथा भैरोंसिंह और तारासिंह इस समय साथ न थे।इस समय देवीसिंह से ज्यादा भूतनाथ का कलेजा उछल रहा था और वह अपनी स्त्री का असली भेद जानने के लिए बेताब हो रहा है। जब से उसे इस बात का पता लगा कि वे दोनों सरदार नकाबपोश यही दोनों कुमार हैं तथा उस विचित्र मकान के मालिक भी यही हैं, तब से उसके दिल का खुटका कुछ कम तो हो गया, मगर खुलासा हाल जानने और पूछने का मौका न मिलने के सबब उसकी बेचैनी दूर नहीं हुई थी। वह यह भी जानना चाहता था कि अब उसकी स्त्री तथा लड़का हरनामसिंह किस फिक्र में हैं। इस समय जब वह फिर उसी ठिकाने जा रहा था, जहाँ अपनी स्त्री की बदौलत गिरफ्तार होकर अपने लड़के का विचित्र हाल देखा था, तब उसका दिल और बेचैन हो उठा था मगर साथ ही इसके उसे इस बात की भी उम्मीद हो रही थी कि अब उसे उसकी स्त्री का हाल मालूम हो जायेगा या कुछ पूछने का मौका ही मिलेगा। ये लोग धीरे-धीरे बातचीत करते हुए उसी खोह या सुरंग की तरफ जा रहे थे।दिन पहर भर से ज्यादा न चढ़ा होगा, जब ये लोग उस ठिकाने पहुंच गए। महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह वगैरह घोड़ों पर से नीचे उतर पड़े, साईसों ने घोड़े थाम लिए और इसके बाद उन सभी ने सुरंग के अन्दर पैर रखा । इस सुरंग वाले रास्ते का कुछ खुलासा हाल हम इस सन्तति के उन्नीसवें भाग में लिख आये हैं, जब भूतनाथ यहाँ आया था, अब उसे पुनः दोहराने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। हाँ, इतना लिख देना जरूरी जान पड़ता है कि दोनों कुमारों ने सभी को यह बात समझा दी कि यह रास्ता बन्द क्योंकर हो सकता है। बन्द होने का स्थान वही चबूतरा था जो सुरंग के बीच में पड़ता था।

    जिस समय ये लोग सुरंग तय करके मैदान में पहुँचे, सामने वही छोटा बँगला दिखाई दिया, जिसका हाल हम पहले लिख चुके हैं। इस समय उस बँगले के आगे वाले दालान में दो नकाबपोश औरतें हाथ में तीर-कमान लिए टहलती पहरा दे रही थीं जिन्हें देखते ही खास करके भूतनाथ और देवीसिंह को बड़ा ताज्जुब हुआ और उनके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं । भूतनाथ का इशारा पाकर देवीसिंह ने कुंअर इन्द्र-जीतसिंह से पूछा, "ये दोनों नकाबपोश औरतें कौन हैं जो पहरा दे रही हैं?' इसके जवाब में कुमार तो चुप रह गए, मगर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने कहा, "इसके जानने की तुम लोगों को क्या जल्दी पड़ी हुई है? जो कोई होंगी, सब मालूम ही हो जायेगा !"

    इस जवाब ने देवीसिंह और भूतनाथ को देर तक के लिए चुप कर दिया और विश्वास दिला दिया कि महाराज को इनका हाल जरूर मालूम है। जब उन औरतों ने इन सभी को पहचाना और अपनी तरफ आते देखा, तो बैंगले के अन्दर घुसकर गायब हो गईं, तब तक ये लोग भी उस दालान में जा पहुँचे। इस जर भी यह बँगला उसी हालत में था जैसा कि भूतनाथ और देवीसिंह ने देखा था।

    हम पहले लिख चुके हैं और अब भी लिखते हैं कि यह बंगला जैसा बाहर से सादा और साधारण मालूम होता था वैसा अन्दर से न था और यह बात दालान में पहुंचने के साथ ही सभी को मालूम हो गई । दालान की दीवारों में निहायत खूबसूरत और आलादर्जे की कारीगरी का नमूना दिखाने वाली तस्वीरों को देखकर सब कोई दंग हो गए और मुसौवर के हाथों की तारीफ करने लगे। ये तस्वीरें एक निहायत आलीशान इमारत की थीं और उसके ऊपर बड़े-बड़े हरफों में यह लिखा हुआ था-

    "यह तिलिस्म चुनारगढ़ के पास ही एक निहायत खूबसूरत जंगल में कायम किया गया है, जिसे महाराज सुरेन्द्रसिंह के लड़के वीरेन्द्रसिंह तोड़ेंगे।"

    इस तस्वीर को देखते ही सभी को विश्वास हो गया कि वह तिलिस्मी खंडहर जिसमें तिलिस्मी बगुला था और जिस पर इस समय निहायत आलीशान इमारत बनी हुई है पहले इसी शक्ल-सूरत में था, जिसे जमाने के हेर-फेर ने अच्छी तरह बर्वाद करके उजाड़ और भयानक बना दिया । इमारत की उस बड़ी और पूरी तस्वीर के नीचे उसके भीतर वाले छोटे-छोटे टुकड़े भी बनाकर दिखलाए गए थे और उस बगुले की तस्वीर भी बनी हुई थी जिसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने बखूबी पहचान लिया और कहा, "बेशक अपने जमाने में वह बहुत अच्छी इमारत थी।"

    सुरेन्द्रसिंह-यद्यपि आजकल जो इमारत तिलिस्मी खंडहर पर बनी है और जिसके बनवाने में जीतसिंह ने अपनी तबीयतदारी और कारीगरी का अच्छा नमूना दिखाया है, बुरी नहीं है, मगर हमें इस पहली इमारत का ढंग कुछ अनूठा और सुन्दर मालूम पड़ता है।

    जीतसिंह-बेशक ऐसा ही है । यदि इस तस्वीर को मैं पहले देखे हुए होता तो जरूर इसी ढंग की इमारत बनवाता।

    वीरेन्द्रसिंह-और ऐसा होने से वह तिलिस्म एक दफे नया मालूम पड़ता।

    इन्द्रजीतसिंह–यह नारगढ़ वाला तिलिस्म साधारण नहीं बल्कि बहुत बड़ा है। नौगढ़, विजयगढ़ और जमानिया तक इसकी शाखा फैली हुई है । इस बँगले को इस बहुत बड़े और फैले तिलिस्म का 'केन्द्र' समझना चाहिए, बल्कि ऐसा भी कह सकते हैं कि यह बंगला तिलिस्म का नमूना है ।

    थोड़ी देर तक दालान में खड़े इसी किस्म की बातें होती रहीं और इसके बाद सभी को साथ लिए हुए दोनों कुमार बँगले के अन्दर रवाना हुए।

    सदर दरवाजे का पर्दा उठाकर अन्दर जाते ही ये लोग एक गोल कमरे में पहुंचे,जो भूतनाथ और देवीसिंह का देखा हुआ था। इस गोल और गुम्बददार खूबसूरत कमरे की दीवारों पर जंगलों, पहाड़ों और रोहतासगढ़ की तस्वीरें बनी हुई थीं। घड़ी-घड़ी तारीफ न करके एक ही दफे लिख देना ठीक होगा कि इस बँगले में जितनी तस्वीरें देखने में आईं, सभी आला दर्जे की कारीगरी का नमूना थीं और यही मालूम होता था कि आज ही बनकर तैयार हुई हैं । इस रोहतासगढ़ की तस्वीर को देखकर सब कोई बड़े प्रसन्न हुए और राजा वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखकर कहा, "रोहतासगढ़ किले और पहाड़ी की बहुत ठीक और साफ तस्वीर बनी हुई है।"

    तेजसिंह-जंगल भी उसी ढंग का बना हुआ है, कहीं-कहीं से ही फर्क मालूम पड़ता है, नहीं तो बाज जगहें तो ऐसी बनी हुई हैं जैसी मैंने अपनी आँखों से देखी हैं ।(उँगली का इशारा करके) देखिये यह वही कब्रिस्तान है जिस राह से हम लोग रोहतास- गढ़ के तहखाने में घुसे थे। हाँ, यह देखिए, बारीफ हरफों में लिखा हआ भी है-"तहखाने में जाने का बाहरी फाटक ।"

    इन्द्रजीतसिंह–इस तस्वीर को अगर गौर से देखेंगे तो वहाँ का बहुत ज्यादा हाल मालूम होगा। जिस जमाने में यह इमारत तैयार हुई थी, उस जमाने में वहां की और उसके चारों तरफ की जैसी अवस्था थी, वैसी ही इस तस्वीर में दिखाई है,आज चाहे कुछ फर्क पड़ गया हो!

    तेजसिंह-बेशक ऐसा ही है।

    इन्द्रजीतसिंह-इसके अतिरिक्त एक और ताज्जुब की बात अर्ज करूंगा।

    वीरेन्द्रसिंह-वह क्या ?

    इन्द्रजीतसिंह-इसी दीवार में से वहाँ (रोहतासगढ़) जाने का रास्ता भी है !

    सुरेन्द्रसिंह-वाह-वाह ! क्या तुम इस रास्ते को खोल भी सकते हो? इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, हम लोग इसमें बहुत दूर तक जाकर घूम आये हैं ।

    सुरेन्द्रसिंह –यह भेद तुम्हें क्योंकर मालूम हुआ ?

    इन्द्रजीतसिंह–उसी 'रिक्तगन्थ' की बदौलत हम दोनों भाइयों को इन सब जगहों का हाल और भेद पूरा-पूरा मालूम हो चुका है। यदि आज्ञा हो तो दरवाजा खोलकर मैं आपको रोहतासगढ़ के तहखाने में ले जा सकता हूँ। वहाँ के तहखाने में भी एक छोटा-सा तिलिस्म है, जो इसी बड़े तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और हम लोग उसे खोल या तोड़ भी सकते हैं परन्तु अभी तक ऐसा करने का इरादा नहीं किया।

    सुरेन्द्रसिंह–उस रोहतासगढ़ वाले तिलिस्म के अन्दर क्या चीज है ?

    इन्द्रजीतसिंह-उसमें केवल अनूठे अद्भुत आश्चर्य गुण वाले हर्षे रखे हुए हैं,उन्हीं हरबों पर वह तिलिस्म बँधा है। जैसा तिलिस्मी खंजर हम लोगों के पास है या जैसे तिलिस्मी जिरह-बख्तर और हरबों की बदौलत राजा गोपालसिंह ने कृष्ण जिन्न का रूप धरा था, वैसे हरबों और असबाबों का तो वहां ढेर लगा हुआ है, हाँ, खजाना वहाँ कुछ भी नहीं है

    सुरेन्द्रसिंह-ऐसे अनूठे हर्के खजाने से क्या कम हैं ?

    जीतसिंह–वेशक ! (इन्द्रजीतसिंह से) जिस हिस्से को तुम दोनों भाइयों ने तोड़ा है, उसमें भी तो ऐसे अनूठे हरबे होंगे?

    इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, मगर बहुत कम हैं।

    वीरेन्द्रसिंह–अच्छा यदि ईश्वर की कृपा हुई तो फिर किसी मौके पर इस रास्ते से रोहतासगढ़ जाने का इरादा करेंगे। (मकान की सजावट और परदों की तरफ देखकर) क्या यह सब सामान, कन्दील, पर्दे और बिछावन वगैरह तुम लोग तिलिस्म के अन्दर से लाए थे?

    इन्द्रजीतसिंह-जी नहीं, जब हम लोग यहां आए, तो इस बंगले को इसी तरह सजा-सजाया पाया और तीन-चार आदमियों को भी देखा जो इस बंगले की हिफाजत और मेरे आने का इन्तजार कर रहे थे।

    सुरेन्द्रसिंह-(ताज्जुब से) वे लोग कौन थे और अब कहां हैं ?

    इन्द्रजीतसिंह–दरियाफ्त करने पर मालूम हुआ कि वे लोग इन्द्रदेव के मुलाजिम थे, जो इस समय अपने मालिक के पास चले गए हैं। इस तिलिस्म का दारोगा असल इन्द्रदेव है, और आज के पहले भी इसी के बुजुर्ग लोग दारोगा होते आए हैं।

    सुरेन्द्रसिंह-यह तुमने बड़ी खुशी की बात सुनाई, मगर अफसोस यह है कि इन्द्रदेव ने हमें इन बातों की कुछ भी ख़बर न की। आनन्दसिंह-अगर इन्द्रदेव ने इन सब बातों को आपसे छिपाया, तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है, तिलिस्मी कायदे के मुताबिक ऐसा होना ही चाहिए था।

    सुरेन्द्रसिंह –ठीक है, तो मालूम होता है कि यह सब सामान तुम्हारी खातिर-दारी के लिए इन्द्रदेव की आज्ञानुसार किया गया है।

    आनन्दसिंह-जी हाँ, उसके आदमियों की जबानी मैंने भी यही सुना है ।

    इसके बाद बड़ी देर तक ये लोग इन तस्वीरों को देखते और ताज्जुब भरी बातें करते रहे और फिर आगे की तरफ बढ़े । जब पहले भूतनाथ और देवीसिंह यहाँ आये थे, तब हम लिख चुके हैं कि इस कमरे में सदर दरवाजे के अतिरिक्त और भी तीन दरवाजे थे—इत्यादि । अतः उन दोनों ऐयारों की तरह इस समय भी सभी को साथ लिए हुए दोनों कुमार दाहिनी तरफ वाले दरवाजे के अन्दर गए, और घूमते हुए उसी बहुत बड़े और आलीशान कमरे में पहुँचे, जिसमें पहले भूतनाथ और देवी सिंह ने पहुंच कर आश्चर्य-भरा तमाशा देखा था।

    इस आलीशान कमरे की तस्वीरें खूबी और खूबसूरती में संब तस्वीरों से बढ़ी-चढ़ी थी तथा दीवारों पर जंगल, मैदान पहाड़, खोह, दरे, झरने, शिकारगाह तथा शहरपनाह, किले, मोर्चे और लड़ाई इत्यादि की बहुत तस्वीरें बनी हुई थीं, जिन्हें सब कोई गौर और ताज्जुब के साथ देखने लगे।

    सुरेन्द्रसिंह-(किले की तरफ इशारा करके) यह तो चुनारगढ़ की तस्वीर है।

    इन्द्रजीतसिंह—जी हाँ, (उँगली का इशारा करके) और यह जमानिया के किले तथा खास बाग की तस्वीर है । इसी दीवार में से वहाँ जाने का भी रास्ता है । महाराज सूर्यकान्त के जमाने में उनके शिकारगाह और जंगल की यह सूरत थी।

    वीरेन्द्रसिंह-और यह लड़ाई की तस्वीर कैसी है ? इसका क्या मतलब है ?

    इन्द्रजीतसिंह-इन तस्वीरों में बड़ी कारीगरी खर्च की गई है। महाराज सूर्य-कान्त ने अपनी फौज को जिस तरह की कवायद और व्यूह-रचना इत्यादि का ढंग सिखाया था वे सब बातें इन तस्वीरों में भरी हुई हैं। एक तरकीब करने से ये सब तस्वीरें चलती-फिरती और काम करती नजर आएँगी और साथ ही इसके फौजी बाजा भी बजता हुआ सुनाई देगा अर्थात् इन तस्वीरों में जितने बाजे वाले हैं वे सब भी अपना-अपना काम करते हुए मालूम पड़ेंगे, परन्तु इस फौजी तमाशे का आनन्द रात को मालूम पड़ेगा, दिन को नहीं । इन्हीं तस्वीरों के कारण इस कमरे का नाम 'व्यूह-मण्डल' रक्खा गया है, वह देखिए ऊपर की तरफ बड़े हरफों में लिखा हुआ है।

    सुरेन्द्रसिंह–यह बहुत अच्छी कारीगरी है। इस तमाशे को हम जरूर देखेंगे बल्कि और भी कई आदमियों को दिखाएंगे ।

    इन्द्रदेव-बहुत अच्छा, रात हो जाने पर मैं इसका बन्दोबस्त करूँगा, तब तक आप और चीजों को देखें।

    ये लोग जिस दरवाजे से इस कमरे में आये थे, उसके अतिरिक्त एक दरवाजा और भी था जिस राह से सभी को लिए दोनों कुमार दूसरे कमरे में पहुँचे । इस कमरे की दीवार बिल्कुल साफ थी अर्थात् उस पर किसी तरह की तस्वीर बनी हुई न थी। कमरे के बीचोंबीच दो चबूतरे संगमरमर के बने हुए थे जिसमें एक तो खाली था और दूसरे चबूतरे के ऊपर सफेद पत्थर की एक खूबसूरत पुतली बैठी हुई थी। इस जगह पर ठहर कर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपने दादा और पिता की तरफ देखा और कहा,"नकाबपोशों की जुबानी हम लोगों का तिलिस्मी हाल जो कुछ आपने सुना है, वह तो याद ही होगा, अतः हम लोग पहली दफा तिलिस्म से बाहर निकलकर जिस सुहावनी घाटी में पहुंचे थे वह यही स्थान है ।' इसी चबूतरे के अन्दर से हम लोग बाहर हुए थे ।उस 'रिक्तगंथ' की बदौलत हम दोनों भाई यहाँ तक तो पहुँच गए मगर उसके बाद इस चबूतरे ले तिलिस्म को खोल न सके, हाँ इतना जरूर है कि उस'रिक्तगंथ' की बदौलत इस चबूतरे में से (जिस पर एक पुतली बैठी हुई थी उसकी तरफ इशारा करके) एक दूसरी किताब हाथ लगी जिसकी बदौलत हम लोगों ने उस चबूतरे वाले तिलिस्म को खोला और उसी राह से आपकी सेवा में जा पहुंचे।

    "आप सुन चुके हैं कि जब हम दोनों भाई राजा गोपालसिंह को मायारानी की कैद से छुड़ा कर जमानिया के खास बाग वाले देवमन्दिर में गये थे तब वहाँ पहले आनन्द-सिंह तिलिस्म के फन्दे में फंस गये थे, उन्हें छुड़ाने के लिए जब मैं भी उसी गड़हे या कुएँ में कूद पड़ा तो चलता-चलता एक दूसरे बाग में पहुँचा जिसके बीचोंबीच में एक मन्दिर था। उस मन्दिर वाले तिलिस्म को जब मैंने तोड़ा तो वहाँ एक पुतली के अन्दर कोई चमकती हुई चीज मुझे मिली।"2

    वीरेन्द्रसिंह–हाँ, हमें याद है, उस मूरत को तुमने उखाड़ कर किसी कोठरी के अन्दर फेंक दिया था और वह फूट कर चूने की कली की तरह हो गई थी। उसी पेट में से…

    इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ।

    सुरेन्द्रसिंह-तो वह चमकती हुई चीज क्या थी और वह कहाँ है ? इन्द्रजीतसिंह-वह हीरे की बनी हुई एक चाबी थी जो अभी तक मेरे पास मौजूद है, (जेब में से निकाल कर और महाराज को दिखा कर) देखिये, यही ताली इस पुतली के पेट में लगती है।

    सभी ने उस चाबी को गौर से देखा और इन्द्रजीतसिंह ने सभी के देखते-देखते उस चबूतरे पर बैठी हुई पुतली की नाभि में वह ताली लगाई। उसका पेट छोटी आलमारी के पल्ले की तरह खुल गया।

    इन्द्रजीतसिंह -बस इसी में से वह किताब मेरे हाथ लगी जिसकी बदौलत वह चबूतरे वाला तिलिस्म खोला।

    सुरेन्द्रसिंह-अब वह किताब कहाँ है ?

    इन्द्रजीतसिंह-आनन्दसिंह के पास मौजूद है ।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह की तरफ देखा और उन्होंने एक छोटी-सी किताब, जिसके अक्षर बहुत बारीक थे, महाराज के हाथ में दे दी।यह किताब भोजपत्र की थी जिसे महाराज ने बड़े गौर से देखा और दो-तीन जगहों से कुछ पढ़ कर आनन्दसिंह के हाथ में देते हुए कहा, "इसे निश्चिन्ती में एक दफा पढ़ेंगे।"

    इन्द्रजीतसिंह—यह पुतलीवाला चबूतरा उस तिलिस्म में घुसने का दरवाजा है ।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस पुतली के पेट में (जो खुल गया था)

    1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, बीसवाँ भाग, नौवां बयान

    2,देखिए " "दसवाँ भाग, पहला बयान । डाल के कोई पेंच घुमाया जिससे चबूतरे के दाहिनी तरफ वाली दीवार किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलं कर जमीन के साथ सट गई और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं। इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर हाथ में लिया और उसका कब्जा दबा कर रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे तथा सभी को अपने पीछे आने के लिए कहा। सभी के पीछे आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे । लगभग पन्द्रह-बीस चक्करदार सीढ़ियों के नीचे उतरने के बाद ये लोग एक बहुत बड़े कमरे में पहुंचे जिसमें सोने-चांदी के सैकड़ों बड़े-बड़े हण्डे, अशफियों और जवाहिरात से भरे हुए पड़े थे जिन्हें सभी ने बड़े गौर और ताज्जुब के साथ देखा और महाराज ने कहा, "इस खजाने का अन्दाज करना भी मुश्किल है।"

    इन्द्रजीतसिंह-जो कुछ खजाना इस तिलिस्म के अन्दर मैंने देखा और पाया है उसका यह पासंगा भी नहीं है। उसे बहुत जल्द ऐयार लोग आपके पास पहुँचावेंगे । उन्हीं के साथ-साथ कई चीजें दिल्लगी की भी हैं जिसमें एक चीज वह भी है जिसकी बदौलत हम लोग एक दफा हँसते-हँसते दीवार अन्दर कूद पड़े थे और मायारानी के हाथ में गिरफ्तार हो गए थे।

    जीतसिंह-(ताज्जुब से) हाँ ! अगर वह चीज शीघ्र बाहर निकाल ली जाय तो (सुरेन्द्रसिंह से) कुमारों की शादी में सर्वसाधारण को भी उसका तमाशा दिखाया जा सकता है।

    सुरेन्द्रसिंह-बहुत अच्छी बात है, ऐसा ही होगा।

    इन्द्रजीतसिंह-इस तिलिस्म में घुसने के पहले ही मैंने सभी का साथ छोड़ दिया अर्थात् नकाबपोशों को (कैदियों को) बाहर ही छोड़कर केवल हम दोनों भाई ही इसके अन्दर घुसे और काम करते हुए धीरे-धीरे आपकी सेवा में जा पहुंचे।

    सुरेन्द्रसिंह-तो शायद उसी तरह हम लोग भी यह सब तमाशा देखते हुए उसी चबूतरे की राह बाहर निकलेंगे ?

    जीतसिंह–मगर क्या उन चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा न देखिएगा?

    सुरेन्द्रसिंह–हाँ, ठीक है, उस तमाशे को तो जरूर देखेंगे।

    इन्द्रजीत सिंह–तो अब यहाँ से लौट चलना चाहिए, क्योंकि इस कमरे के आगे बढ़कर फिर आज ही लौट आना कठिन है, इसके अतिरिक्त अब दिन भी थोड़ा ही रह गया है, संध्या-वन्दन और भोजन इत्यादि के लिए भी कुछ समय चाहिए और फिर उन तस्वीरों का तमाशा भी कम-से-कम चार-पांच घण्टे में पूरा होगा।

    सुरेन्द्रसिंह-क्या हर्ज है, लौट चलो।

    महाराज की आज्ञानुसार सब कोई वहाँ से लौटे और घूमते हुए बँगले के बाहर निकल आये, देखा तो वास्तव में दिन बहुत कम रह गया था।

    6

    रात आधे घण्टे से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब सब कोई अपने जरूरी कामों से निश्चिन्त हो बंगले के अन्दर घुसे और घूमते-फिरते उसी चलती-फिरती तस्वीरों वाले कमरे में पहुंचे। इस समय बँगले के अन्दर हर एक कमरे में रोशनी बखूबी हो रही थी जिसके विषय में भूतनाथ और देवीसिंह ने ताज्जुब के साथ खयाल किया कि यह काम बेशक उन्हीं लोगों का होगा जिन्हें यहाँ पहुँचने के साथ ही हम लोगों ने पहरा देते देखा था या जो हम लोगों को देखते ही बँगले के अन्दर घुसकर गायब हो गए थे। ताज्जुब है कि महाराज को तथा और लोगों को भी उनके विषय में कुछ खयाल नहीं है और न कोई पूछता ही है कि वे कौन थे और कहां गए, मगर हमारा दिल उनका हाल जाने बिना बेचैन हो रहा है।

    चलती-फिरती तस्वीरों वाले कमरे में फर्श बिछा हुआ था और गद्दी लगी हुई थी जिस पर सब कोई कायदे से अपने-अपने ठिकाने पर बैठ गए और इसके बाद इन्द्रजीत-सिंह की आज्ञानुसार रोशनी गुल कर दी गई। कमरे में बिल्कुल अन्धकार छा गया, यह नहीं मालूम होता था कि कौन क्या कर रहा है, खास करके इन्द्रजीतसिंह की तरफ लोगों का ध्यान था जो इस तमाशे को दिखाने वाले थे, मगर कोई कह नहीं सकता था कि वह क्या कर रहे हैं।

    थोड़ी ही देर बाद चारों तरफ की दीवारें चमकने लगीं और उन पर की कुल तस्वीरें बहुत साफ और बनिस्वत पहले के अच्छी तरह पर दिखाई देने लगी। पहले तो वे तस्वीरें केवल चित्रकारी ही मालूम पड़ती थीं परन्तु अब सचमुच की बातें दिखाई देने लगीं। मालूम होता था कि जैसे हम बहुत दूर से सच्चे किले, पहाड़, जंगल, मैदान,आदमी, जानवर और फौज इत्यादि को देख रहे हैं। सब कोई बड़े ताज्जुब के साथ इस कैफियत को देख रहे थे कि यकायक बाजे की आवाज कान में आई। उस समय सभी का ध्यान जमानिया के किले की तस्वीर पर जा पड़ा, जिधर से बाजे की आवाज आ रही थी । देखा कि-

    एक बहुत बड़े मैदान में बेहिसाब फौज खड़ी है जिसके आमने-सामने दो हिस्से हैं मानो दो फौजें लड़ने के लिए तैयार खड़ी हैं। पैदल और सवार दोनों तरह की फौजें हैं तथा तोप इत्यादि और भी जो कुछ सामान फौज में होना चाहिए, सब मौजूद है । इन दोनों फौजों में एक की पोशाक सुर्ख और दूसरे की आसमानी थी। वाजे की आवज केवल सुर्ख वर्दी वाली फौज में से आ रही थी बल्कि बाजे वाले अपना काम करते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। यकायक सुर्ख वर्दी वाली फौज हिलती हुई दिखाई पड़ी। गौर करने पर मालूम हुआ कि सिपाहियों का मुंह घूम गया है और वे दाहिनी तरफ वाली एक पहाड़ी की तरफ तेजी के साथ बाजे की गत पर पैर रखते हुए जा रहे हैं । जैसे-जैसे फौज दूर होती जाती, वैसे ही वैसे बाजे की आवाज भी दूर होती जाती थी। देखते-ही-देखते वह फौज मानो कोसों दूर निकल गई और एक पहाड़ी के पीछे की तरफ जाकर आँखों की ओट हो गई। अब यह मैदान ज्यादा खुलासा दिखाई देने लगा। जितनी जगह दोनों फौजों से भरी थी, वह एक फौज के हिस्से में रह गई । अब दूसरी अर्थात् आसमानी वर्दी वाली फौज में से बाजे की आवाज आने लगी और सवार तथा पैदल भी चलते हुए दिखाई देने लगे। एक सवार हाथ में झंडा लिए तेजी के साथ घोड़ा दौड़ा कर मैदान में आ खड़ा हुआ और झंडे के इशारे से फौज को कवायद कराने लगा । यह

    कवायद घण्टे भर तक होती रही और इस बीच में आला दर्जे की होशियारी, चालाकी,मुस्तैदी, सफाई और बहादुरी दिखाई दी जिससे सब कोई बहुत ही खुश हुए और महाराज बोले, "बेशक फौज को ऐसा ही तैयार करना चाहिए।"कवायद खतम करने के बाद बाजा बन्द हुआ और वह फौज एक तरफ को रवाना हुई, मगर थोड़ी ही दूर गई होगी कि उस लाल वर्दी वाली फौज ने यकायक पहाड़ी के पीछे से निकल कर इस फौज पर धावा मारा। इस कैफियत को देखते ही आसमानी वर्दी वाली फौज के अफसर होशियार हो गए, झंडे का इशारा पाते ही बाजा पुनःबजने लगा, और फौजी सिपाही लड़ने के लिए तैयार हो गये। इस बीच में वह फौज भी आ पहुंची और दोनों में घमासान लड़ाई होने लगी।

    इस कैफियत को देखकर महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, जीतसिंह,तेजसिंह वगैरह तथा ऐयार लोग हैरान हो गए और हद से ज्यादा ताज्जुब करने लगे। लड़ाई के फन की ऐसी कोई बात नहीं बच गई थी जो इसमें न दिखाई पड़ी हो। कई तरह की घुसबन्दी और किलेबन्दी के साथ ही साथ घुड़सवारों की कारीगरी ने सभी को सकते में डाल दिया और सभी के मुंह से बार-बार 'वाह-वाह' की आवाज निकलती रही। यह तमाशा कई घण्टे में खत्म हुआ और इसके बाद एकदम से अन्धकार हो गया,उस समय इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी की और देवीसिंह ने इशारा पाकर कमरे में रोणनी कर दी जो पहले बुझा दी गई थी।

    इस समय रात थोड़ी-सी बच गई थी जो सभी ने सोकर बिता दी, मगर स्वप्न में भी इसी तरह के खेल-तमाशे देखते रहे । जब सब की आँखें खुली तो दिन घण्टे भर से ज्यादा चढ़ चुका था। घबड़ा कर सब कोई उठ खड़े हुए और कमरे के बाहर निकल कर जरूरी कामों से छुट्टी पाने का बन्दोबस्त करने लगे। इस समय जिन चीजों की सभी को जरूरत पड़ी वे सब चीजें वहाँ मौजूद पाई गईं, मगर उन दोनों स्त्रियों पर किसी की निगाह न पड़ी जिन्हें यहाँ आने के साथ ही सभी ने देखा था।

    7

    जरूरी कामों से छुट्टी पाकर ऐयारों ने रसोई बनाई, क्योंकि इस बंगले में खाने-पीने की सभी चीजें मौजूद थीं और सभी ने खुशी-खुशी भोजन किया। इसके बाद सब कोई उसी कमरे में आ बैठे जिसमें रात को चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा

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    जरूरी कामों से छुट्टी पाकर ऐयारों ने रसोई बनाई, क्योंकि इस बंगले में खाने-पीने की सभी चीजें मौजूद थीं और सभी ने खुशी-खुशी भोजन किया। इसके बाद सब कोई उसी कमरे में आ बैठे जिसमें रात को चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा

    था। इस समय भी सभी की निगाहें ताज्जुब के साथ उन्हीं तस्वीरों पर पड़ रही थीं।

    सुरेन्द्रसिंह — मैं बहुत गौर कर चुका मगर अभी तक समझ में न आया कि इन तस्वीरों में किस तरह की कारीगरी खर्च की गई है जो ऐसा तमाशा दिखाती हैं । अगर मैं अपनी आँखों से इस तमाशे को देखे हुए न होता और कोई गैर आदमी मेरे सामने ऐसे तमाशे का जिक्र करता तो मैं उसे पागल ही समझता, मगर अब स्वयं देख लेने पर भी विश्वास नहीं होता कि दीवार पर लिखी तस्वीरें इस तरह काम करेंगी।

    जीतसिंह — बेशक ऐसी ही बात है । इतना देखकर भी किसी के सामने यह कहने का हौसला न होगा कि मैंने ऐसा तमाशा देखा था और सुनने वाला भी कभी विश्वास न करेगा।

    ज्योतिषीजी — आखिर यह एक तिलिस्म ही है, इसमें सभी बातें आश्चर्य की ही दिखायी देती हैं।

    जीतसिंह –– चाहे यह तिलिस्म हो मगर इसके बनाने वाले तो आदमी ही थे। जो बात मनुष्य के किये नहीं हो सकती वह तिलिस्म में भी नहीं दिखाई दे सकती।

    गोपालसिंह — आपका कहना बहुत ठीक है, तिलिस्म की बातें चाहे कैसा ही ताज्जुब पैदा करने वाली क्यों न हों मगर गौर करने से उनकी कारीगरी का पता लग ही जायगा । आपने बहुत ठीक कहा, आखिर तिलिस्म के बनानेवाले भी तो मनुष्य ही थे !

    वीरेन्द्रसिंह — जब तक समझ में न आवे तब तक उसे चाहे कोई जादू कहे या करामात कहे मगर हम लोग सिवाय कारीगरी के कुछ भी नहीं कह सकते और पता लगाने तथा भेद मालूम हो जाने पर यह बात सिद्ध हो ही जाती है। इन चित्रों की कारीगरी पर भी अगर गौर किया जायगा तो कुछ न कुछ पता लग ही जायगा। ताज्जुब नहीं कि इन्द्रजीतसिंह को इसका भेद मालूम हो ।

    सुरेन्द्रसिंह — बेशक इन्द्रजीत को इसका भेद मालूम होगा ही। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) तुमने किस तरकीब से इन तस्वीरों को चलाया था ?

    इन्द्रजीतसिंह — (मुस्कुराते हुए) मैं आपसे अर्ज करूँगा और यह भी बताऊंगा कि इसमें भेद क्या है । मालूम हो जाने पर आप इसे एक साधारण बात ही समझेंगे। पहली दफा जब मैंने इस तमाशे को देखा था, तो मुझे भी बड़ा ही ताज्जुब पैदा हुआ था, मगर तिलिस्मी किताब की मदद से जब मैं इस दीवार के अन्दर पहुँचा तो सब भेद खुल गया।

    सुरेन्द्रसिंह — (खुश होकर) तब तो हम लोग बेकार ही परेशान हो रहे हैं और इतना सोच-विचार कर रहे हैं । तुम अब तक चुप क्यों थे ?

    गोपालसिंह — ऐयारों की तबीयत देख रहे थे।

    सुरेन्द्रसिंह — खैर बताओ तो सही कि इसमें क्या कारीगरी है ?

    इतना सुनते ही इन्द्रजीतसिंह उठ कर उस दीवार के पास चले गये और सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर बोले, "आप जरा तकलीफ कीजिए तो मैं इस भेद को भी समझा दूं !"

    महाराज सुरेन्द्रसिंह उठकर कुमार के पास चले गये और उनके पीछे-पीछे और लोग भी वहाँ जाकर खड़े हो गये। इन्द्रजीतसिंह ने दीवार पर हाथ फेरकर सुरेन्द्रसिंह

    से कहा, "देखिये, असल में इस दीवार पर किसी तरह की चित्रकारी या तस्वीर नहीं है, दीवार साफ है और वास्तव में शीशे की है, तस्वीरें जो दिखाई देती हैं वे इसके अन्दर और दीवार से अलग हैं।"

    कुमार की बात सुनकर सभी ने ताज्जुब के साथ उस दीदार पर हाथ फेरा और जीतसिंह ने खुश होकर कहा-"ठीक है, अब हम इस कारीगरी को समझ गए ! ये तस्वीरें अलग-अलग किसी धातु के टुकड़ों पर बनी हुई हैं और ताज्जुब नहीं कि तार या कमानी पर जड़ी हों, किसी तरह की शक्ति पाकर उस तार या कमानी में हरकत होती है और उस समय ये तस्वीरें चलती हुई दिखाई देती हैं।"

    इन्द्रजीतसिंह — बेशक यही बात है, देखिये, अब मैं इन्हें फिर चलाकर आपको दिखाता हूँ और इसके बाद दीवार के अन्दर ले चलकर सब भ्रम दूर कर दूंगा।

    इस दीवार में जिस जगह जमानिया के किले की तस्वीर बनी थी, उसी जगह किले के तुर्ज के ठिकाने पर कई सूराख भी दिखाये गये थे जिनमें से एक छेद (सूराख) वास्तव में सच्चा था पर वह केवल इतना ही लम्बा-चौड़ा था कि एक मामूली खंजर का कुछ हिस्सा उसके अन्दर जा सकता था इन्द्रजीतसिंह ने कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल कर उसके अन्दर डाल दिया और महाराज सुरेन्द्रसिंह तथा जीतसिंह की तरफ देखकर कहा "इस दीवार के अन्दर जो पुर्जे बने हैं, वे बिजली का असर पहुँचने ही से चलने- फिरने या हिलने लगते हैं। इस तिलिस्मी खंजर में आप जानते ही हैं कि पूरे दर्जे की बिजली भरी हुई है, अस्तु, उन पुों के साथ इनका संयोग होने ही से काम हो जाता है।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह चुपचाप खड़े हो गये और सभी ने बड़े गौर से उन तस्वीरों को देखना शुरू किया बल्कि महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र सिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और राजा गोपालसिंह ने तो कई तस्वीरों के ऊपर हाथ भी रख दिया। इतने ही में दीवार चमकने लगी और इसके बाद तस्वीरों ने वही रंगत पैदा की जो हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं। महाराज और राजा गोपालसिंह वगैरह ने जो अपना हाथ तस्वीरों पर रख दिया था वह ज्यों का त्यों बना रहा और तस्वीरें उनके हाथों के नीचे से निकलकर इधर-उधर आने-जाने लगी जिसका असर उनके हाथों पर कुछ भी नहीं होता था। इस सबब से सभी को निश्चय हो गया कि उन तस्वीरों का इस दीवार के साथ कोई सम्बन्ध नहीं। इस बीच में कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना तिलिस्मी खंजर दीवार के अन्दर से खींच लिया। उसी समय दीवार का चमकना बन्द हो गया और तस्वीरें जहाँ की तहाँ खड़ी हो गई अर्थात् जो जितनी चल चुकी थीं, उतनी ही चलकर रुक गई । दीवार पर गौर करने से मालूम होता था कि तस्वीरें पहले ढंग की नहीं बल्कि दूसरे ही ढंग की बनी हुई हैं ।

    जीतसिंह — यह भी बड़े मजे की बात है, लोगों को तस्वीरों के विषय में धोखा देने और ताज्जुब में डालने के लिए इससे बढ़कर कोई खेल नहीं हो सकता।

    तेजसिंह — जी हाँ, एक दिन में पचासों तरह की तस्वीरें इस दीवार पर लोगों को दिखा सकते हैं, पता लगना तो दूर रहा गुमान भी नहीं हो सकता कि यह क्या मामला है और ऐसी अनूठी तस्वीरें नित्य क्यों बन जाती हैं। सुरेन्द्रसिंह — बेशक यह खेल मुझे बहुत अच्छा माल्म हुआ। परन्तु अब इन तस्वीरों को ठीक अपने ठिकाने पर पहुँचाकर छोड़ देना चाहिए।

    "बहुत अच्छा" कहकर इन्द्रजीतसिंह आगे बढ़ गये और पुनः तिलिस्मी खंजर उसी सूराख में डाल दिया जिससे उसी तरह दीवार चमकने और तस्वीरें चलने लगीं। ताज्जुब के साथ लोग उसका तमाशा देखते रहे । कई घण्टे के बाद जब तस्वीरों की यह लीला समाप्त हुई और एक विचित्र ढंग के खटके की आवाज आई, तब इन्द्रजीतसिंह ने दीवार के अन्दर से तिलिस्मी खंजर निकाल लिया और दीवार का चमकना भी बन्द हो गया।

    इस तमाशे से छुट्टी पाकर महाराज सुरेन्द्र सिंह ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कहा, "अब हम लोगों को इस दीवार के अन्दर ले चलो।"

    इन्द्रजीतसिंह — जो आज्ञा, पहले बाहर से जांच कर आप अन्दाजा कर लें कि यह दीवार कितनी मोटी है।

    सुरेन्द्रसिंह — इसका अन्दाज हमें मिल चुका है, दूसरे कमरे में जाने के लिए इसी दीवार में जो दरवाजा है उसकी मोटाई से पता लग जाता है जिस पर हमने गौर किया है।

    इन्द्रजीतसिंह — अच्छा तो अब एक दफे आप पुनः उसी दूसरे कमरे में चलें क्यों कि इस दीवार के अन्दर जाने का रास्ता उधर ही से है।

    इन्द्रजीतसिंह की बात सुनकर महाराज सुरेन्द्रसिंह तथा और सब लोग उठ खड़े हुए और कुमार के साथ-साथ पुनः उसी कमरे में गए जिसमें दो चबूतरे बने हुए थे।

    इस कमरे में तस्वीर वाले कमरे की तरफ जो दीवार थी, उसमें एक आलमारी का निशान दिखाई दे रहा था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक खूटी गड़ी हुई थी जिसे इन्द्रजीतसिंह ने उमेठना शुरू किया। तीस-पैंतीस दफे उमेठ कर अलग हो गए और दूर खड़े होकर उस निशान की तरफ देखने लगे । थोड़ी देर बाद वह आलमारी हिलती हुई मालूम पड़ी और फिर यकायक उसके दोनों पल्ले दरवाजे की तरह खुल गए। साथ ही उसके अन्दर से दो औरतें निकलती हुई दिखाई पड़ी जिनमें एक तो भूतनाथ की स्त्री थी और दूसरी देवीसिंह की स्त्री चम्पा । दोनों औरतों पर निगाह पड़ते ही भूतनाथ और देवीसिंह चमक उठे और उनके ताज्जुब की कोई हद न रही, साथ ही इसके दोनों ऐयारों को क्रोध भी चढ़ आया और लाल-लाल आँखें करके उन औरतों की तरफ देखने लगे । उन्हीं के साथ-ही-साथ और लोगों ने भी ताज्जुब के साथ उन औरतों को देखा।

    इस समय उन दोनों औरतों का चेहरा नकाब से खाली था, मगर भूतनाथ और देवीसिंह के चेहरे पर निगाह पड़ते ही उन दोनों ने आँचल से अपना चेहरा छिपा लिया और पलट कर पुनः उसी आलमारी के अन्दर जा लोगों की निगाह से गायब हो गईं। उनकी इस करतूत ने भूतनाथ और देवीसिंह के क्रोध को और भी बढ़ा दिया।

    8

    अब हम पीछे की तरफ लौटते हैं और पुनः उस दिन का हाल लिखते हैं जिस दिन महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह वगैरह तिलिस्मी तमाशा देखने के लिए रवाना हुए हैं । हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं कि उस समय महाराज और कुमार लोगों के साथ भैरोंसिंह और तारासिंह न थे, अर्थात् वे दोनों घर पर ही रह गए थे, अतः इस समय उन्हीं दोनों का हाल लिखना बहुत जरूरी हो गया है ।

    महाराज सुरेन्द्र सिंह, वीरेन्द्रसिंह, कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह वगैरह के पचले जाने के बाद भैरोंसिंह अपनी मां से मिलने के लिए तारासिंह को साथ लिए हुए महल में गये । उस समय चपला अपनी प्यारी सखी चम्पा के कमरे में बैठी हुई धीरे-धीरे कुछ बातें कर रही थी जो भैरोंसिंह और तारासिंह को आते देख चुप हो गई और इन दोनों की तरफ देखकर वोली, "क्या महाराज तिलिस्मी तमाशा देखने के लिए गए ?"

  • चन्द्रकान्ता सन्तति 5

    चन्द्रकान्ता सन्तति 5

    Aproximadamente 178.942 palavras.

    आनन्दसिंह––क्या यह हो सकता है कि वह तिलिस्मी किताब जो गोपाल भाई के पास थी हमारे किसी दुश्मन के हाथ लग गई और वह उस किताब की मदद से अपने साथियों सहित यहाँ पहुँच कर हम लोगों को नुकसान पहुँचाने की नीयत से तिलिस्म के अन्दर चला गया है?

    इन्द्रजीतसिंह––यह तो हो सकता है कि उनकी किताब किसी दुश्मन ने चुरा ली हो, मगर यह नहीं हो सकता कि उसका मतलब भी हर कोई समझ ले। खुद मैं ही 'रिक्तगन्थ' का मतलब ठीक-ठीक नहीं समझ सकता था, आखिर जब उन्होंने बताया तब कहीं तिलिस्म के अन्दर जाने लायक हुआ। (कुछ रुककर) आज के मामले तो कुछ अजब बेढंगे दिखाई दे रहे हैं खैर कोई चिन्ता नहीं, आखिर हम लोगों को इस दरवाजे की राह तिलिस्म के अन्दर जाना ही है, चलो फिर जो कुछ होगा देखा जायगा!

    आनन्दसिंह––यद्यपि सूर्योदय हो जाने के कारण प्रातः-कृत्य से छुट्टी पा लेना आवश्यक जान पड़ता है यह सोच कर कि क्या जाने कैसा मौका आ पड़े तथापि आज्ञानुसार तिलिस्म के अन्दर चलने के लिए मैं तैयार हूँ, चलिए।

    आनन्दसिंह की बात सुन कर इन्द्रजीतसिंह कुछ गौर में पड़ गए और कुछ सोचने के बाद बोले, "कोई चिन्ता नहीं, जो कुछ होगा देखा जायगा।"

    दीवार के नीचे जो जमीन खुदी हुई थी, उसकी लम्बाई-चौड़ाई चार-पाँच गज से ज्यादा न थी। मिट्टी हट जाने के कारण एक पत्थर की पटिया (ताज्जुब नहीं कि वह लोहे या पीतल की हो) दिखाई दे रही थी और उसे उठाने के लिए बीच में लोहे की कड़ी लगी हुई थी जिसका एक सिरा दीवार के साथ सटा हुआ था। इन्द्रजीतसिंह ने कड़ी में हाथ डाल कर जोर किया और उस पटिया (छोटी चट्टान) को उठा कर किनारे पर रख दिया। नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ दिखाई दी और दोनों भाई सरयू को साथ लिए नीचे उतर गए।

    लगभग बीस सीढ़ी के नीचे उतर जाने के बाद एक छोटी कोठरी मिली जिसकी जमीन किसी धातु की बनी हुई थी और खूब चमक रही थी। ऊपर दो-तीन सूराख (छेद) भी इस ढंग से बने हुए थे जिससे दिन-भर उस कोठरी में कुछ-कुछ रोशनी रह सकती थी। आनन्दसिंह ने चारों तरफ गौर से देखकर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "भैया, रिक्तगंथ में लिखा था कि यह कोठरी तुम्हें तिलिस्म के अन्दर पहुँचावेगी। मगर समझ में नहीं आता कि यह कोठरी किस तरह से हम लोगों को तिलिस्म के अन्दर पहुँचावेगी क्योंकि इसमें न तो कहीं दरवाजा दिखाई देता है और न कोई ऐसा निशान ही मालूम पड़ता है जिसे हम लोग दरवाजा बनाने के काम में लावें।"

    इन्द्रजीतसिंह––हम भी इसी सोच-विचार में पड़े हुए हैं, मगर कुछ समझ में नहीं आता है।

    इसी बीच में दोनों कुमार और सरयू के पैरों में झुनझुनी और कमजोरी मालूम होने लगी और वह बात की बात में इतनी ज्यादा बढ़ी कि वे लोग वहाँ से हिलने लायक भी न रहे। देखते-देखते तमाम बदन में सनसनाहट और कमजोरी ऐसी बढ़ गई कि वे तीनों बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े और फिर तन-बदन की सुध न रही।

    घण्टे भर के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह की बेहोशी जाती रही और वह उठ कर बैठ गए। मगर चारों तरफ घोर अंधकार छाया रहने के कारण यह नहीं जान सकते थे कि वे किस अवस्था में या कहाँ पड़े हुए हैं। सबसे पहले उन्हें तिलिस्मी खंजर की फिकर हुई, कमर में हाथ लगाने पर उसे मौजूद पाया। अस्तु उसे निकाल कर और उसका कब्जा दबा कर रोशनी पैदा की और ताज्जुब की निगाह से चारों तरफ देखने लगे।

    जिस स्थान में इस समय कुमार थे, वह सुर्ख पत्थर से बना हुआ था और यहाँ की दीवारों पर पत्थरों पर गुलबूटों का काम बहुत खूबसूरती और कारीगरी का अनूठा नमूना दिखाने वाला बना हुआ था। चारों तरफ की दीवारों में चार दरवाजे थे, मगर उनमें किवाड़ के पल्ले लगे हुए न थे। पास ही कुँअर आनन्दसिंह भी पड़े हुए थे परन्तु सरयू का कहीं पता न था, जिससे कुमार को बहुत ही ताज्जुब हुआ। उसी समय आनन्दसिंह की बेहोशी भी जाती रही और वे उठ कर घबराहट के साथ चारों तरफ देखते हुए कुँअर इन्द्रजीतसिंह के पास आकर बोले––

    आनन्दसिंह––हम लोग यहाँ क्योंकर आये?

    इन्द्रजीतसिंह––मुझे मालूम नहीं, तुमसे थोड़ी ही देर पहले मैं होश में आया हूँ और ताज्जुब के साथ चारों तरफ देख रहा हूँ।

    आनन्दसिंह––और सरयू कहाँ चली गई?

    इन्द्रजीतसिंह––यह भी नहीं मालूम, तुम चारों तरफ की दीवारों में चार दरवाजे देख रहे हो। शायद वह हमसे पहले होश में आकर इन दरवाजों में से किसी एक के अन्दर चली गई हो।

    आनन्दसिंह––शायद ऐसा ही हो, चल कर देखना चाहिए। रिक्तगंथ का कहा बहुत ठीक निकला, आखिर उसी कोठरी ने हम लोगों को यहाँ पहुँचा दिया। मगर किस ढंग से पहुँचाया सो मालूम नहीं होता! (छत की तरफ देख कर) शायद वह कोठरी इसके ऊपर हो और उसकी छत ने नीचे उतरकर हम लोगों को यहाँ लुढ़का दिया हो।

    इन्द्रजीतसिंह––(कुछ मुस्करा कर) शायद ऐसा ही हो, मगर निश्चय नहीं कह सकते, हाँ, अब व्यर्थ न खड़े न रहकर हमें सरयू और नकाबपोशों का पता लगाना चाहिए। इन्द्रजीतसिंह ने इतना कहा ही था कि दीवार वाले एक दरवाजे के अन्दर से आवाज आई, "बेशक, बेशक!"

    13

    "बेशक बेशक" की आवाज ने दोनों कुमारों को चौंका दिया। वह आवाज सरयू की न थी और न किसी ऐसे आदमी की थी जिसे कुमार पहचानते हों, यह सबब उनके चौंकने का और भी था। दोनों कुमारों को निश्चय हो गया कि यह आवाज उन्हीं नकाबपोशों में से किसी है जो तिलिस्म के अन्दर लटकाये गए थे और जिन्हें हम लोग खोज रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि सरयू भी इन्हीं लोगों के सबब से गायब हो गई हो क्योंकि एक कमजोर औरत की बेहोशी हम लोगों की बनिस्बत जल्दी दूर नहीं हो सकती।

    दोनों भाइयों के विचार एक से थे। अतएव दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और इसके बाद इन्द्रजीतसिंह और उनके पीछे-पीछे आनन्दसिंह उस दरवाजे के अन्दर चले गये जिसमें किसी के बोलने की आवाज आई थी।

    कुछ आगे जाने पर कुमार को मालूम हुआ कि रास्ता सुरंग के ढंग का बना हुआ है मगर बहुत छोटा और केवल एक ही आदमी के जाने लायक है अर्थात् इसकी चौड़ाई डेढ़ हाथ से ज्यादा नहीं है।

    लगभग बीस हाथ जाने के बाद दूसरा दरवाजा मिला जिसे लांघ कर दोनों भाई एक छोटे-से बाग में गये जिसमें सब्जी की बनिस्बत इमारत का हिस्सा बहुत ज्यादा था अर्थात् उसमें कई दालान; कोठरियाँ और कमरे थे जिन्हें देखते ही इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "इसके अन्दर थोड़े आदमियों का पता लगाना भी कठिन होगा।"

    दोनों कुमार दो ही चार कदम आगे बढ़े थे कि पीछे से दरवाजे के बन्द होने की आवाज आई, घूमकर देखा तो उस दरवाजे को बन्द पाया जिसे लांघ कर इस बाग में पहुँचे थे। दरवाजा लोहे का और एक ही पल्ले का था जिसने चूहेदानी की तरह ऊपर से गिर कर दरवाजे का मुँह बन्द कर दिया। उस दरवाजे के पल्ले पर मोटे-मोटे अक्षरों में यह लिखा हुआ था––

    "तिलिस्म का यह हिस्सा टूटने लायक नहीं है, हाँ, तिलिस्म को तोड़ने वाला यहाँ तमाशा जरूर देख सकता है।"

    इन्द्रजीतसिंह––यद्यपि तिलिस्मी तमाशे दिलचस्प होते हैं मगर हमारा यह समय बड़ा नाजुक है और तमाशा देखने योग्य नहीं, क्योंकि तरह-तरह के तरद्दुदों ने दुःखी कर रक्खा है। देखना चाहिए इस तमाशबीनी से छुट्टी कब मिलती है।

    आनन्दसिंह––मेरा भी यही खयाल है बल्कि मुझे तो इस बात का अफसोस है कि इस बाग में क्यों आए, अगर किसी दूसरे दरवाजे के अन्दर गये होते तो अच्छा होता।

    इन्द्रजीतसिंह––(कुछ आगे बढ़कर ताज्जुब से) देखो तो सही, उस पेड़ के नीचे कौन बैठा है! कुछ पहचान सकते हो?

    आनन्दसिंह––यद्यपि पोशाक में बहुत बड़ा फर्क है मगर सूरत भैरोंसिंह की सी मालूम पड़ती है!

    इन्द्रजीतसिंह––मेरा भी यही खयाल है, आओ, उसके पास चलकर देखें।

    आनन्दसिंह––चलिये।

    इस बाग के बीचोंबीच में एक कदम का बहुत बड़ा पेड़ था जिसके नीचे एक आदमी गाल पर हाथ रक्खे बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। उसी को देखकर दोनों कुमार चौंके थे और उस पर भैरोंसिंह के होने का शक हुआ था। जब दोनों भाई उसके पास पहुँचे तो शक जाता रहा और अच्छी तरह पहचान कर इन्द्रजीतसिंह ने पुकारा और कहा, "क्यों यार भैरोंसिंह, तुम यहाँ कैसे आ पहुँचे?"

    उस आदमी ने सिर उठाकर ताज्जुब से दोनों कुमारों की तरफ देखा और तब हलकी आवाज में जवाब दिया, "तुम दोनों कौन हो? मैं तो सात वर्ष से यहाँ रहता हूँ मगर आज तक किसी ने भी मुझसे यह न पूछा कि तुम यहाँ कैसे आ पहुँचे?"

    आनन्दसिंह––कुछ पागल तो नहीं हो गये हो?

    इन्द्रजीतसिंह––क्योंकि तिलिस्म की हवा बड़े-बड़े चालाकों और ऐयारों को पागल बना देती है!

    भैरोंसिंह––(शायद वह भैरोंसिंह ही हो) कदाचित् ऐसा ही हो मगर मुझे आज तक किसी ने यह भी नहीं कहा कि तू पागल हो गया है! मेरी स्त्री भी यहाँ रहती है, वह भी मुझे बुद्धिमान ही समझती है।

    आनन्दसिंह––(मुस्कुरा कर) स्त्री कहाँ है? उसे मेरे सामने बुलाओ, मैं उससे पूछूँगा कि वह तुम्हें पागल समझती है या नहीं।

    भैरोंसिंह––वाह-वाह, तुम्हारे कहने से मैं अपनी स्त्री को तुम्हारे सामने बुला लूँ! कहीं तुम उस पर आशिक हो जाओ या फिर वही तुम पर मोहित हो जाय तो फिर क्या होगा?

    इन्द्रजीतसिंह––(हँसकर) वह भले ही मुझ पर आशिक हो जाय मगर मैं वादा करता हूँ कि उस पर मोहित न होऊँगा।

    भैरोंसिंह––सम्भव है कि मैं तुम्हारी बातों पर मैं विश्वास कर लूँ मगर उसकी नौजवानी मुझे उस पर विश्वास नहीं करने देती। अच्छा ठहरो, मैं उसे बुलाता हूँ। अरी ए री मेरी नौजवान स्त्री भोली ई … ई … ई … !

    एक तरफ से आवाज आई, "मैं आप ही चली आ रही हूँ, तुम क्यों चिल्ला रहे हो? कम्बख्त को जब देखो 'भोली-भोली' करके चिल्लाया करता है!"

    भैरोंसिंह––देखो कम्बख्त को! साठ घड़ी में एक पल भी सीधी तरह से बात नहीं करती। खैर, नौजवान औरतें ऐसी हुआ ही करती हैं!

    इतने में दोनों कुमारों ने देखा कि बाईं तरफ से एक नव्वै वर्ष की बुढ़िया छड़ी टेकती धीरे-धीरे चली आ रही है जिसे देखते ही भैरोंसिंह उठा और यह कहता हुआ उसकी तरफ बढ़ा, "आओ मेरी प्यारी भोली, तुम्हारी नौजवानी तुम्हें अकड़ कर चलने नहीं देती तो मैं अपने हाथों का सहारा देने के लिए तैयार हूँ।"

    भैरोंसिंह ने बुढ़िया को हाथ का सहारा देकर अपने पास ला बैठाया और आप भी उसी जगह बैठकर बोला, "मेरी प्यारी भोली, देखो ये दो नये आदमी आज यहाँ आये हैं जो मुझे पागल बताते हैं। तू ही बता कि क्या मैं पागल हूँ?"

    बुढ़िया––राम-राम, ऐसा भी कभी हो सकता है? मैं अपनी नौजवानी की कसम खाकर कहती हूँ कि तुम्हारे ऐसे बुद्धिमान बुड्ढे को पागल कहने वाला स्वयं पागल है (दोनों कुमारों की तरफ देखकर) ये दोनों उजड्ड यहाँ कैसे आ पहुँचे? क्या किसी ने इन्हें रोका नहीं?

    भैरोंसिंह––मैंने इनसे अभी कुछ भी नहीं पूछा कि ये कौन हैं और यहाँ कैसे आ पहुँचे क्योंकि मैं तुम्हारी मुहब्बत में डूबा हुआ तरह-तरह की बातें सोच रहा था। अब तुम आई हो तो जो कुछ पूछना हो स्वयं पूछ लो।

    बुढ़िया––(कुमारों से) तुम दोनों कौन हो?

    भैरोंसिंह––(कुमारों से) बताओ-बताओ, सोचते क्या हो? आदमी हो, जिन्न हो, भूत हो, प्रेत हो, कौन हो, कहते क्यों नहीं! क्या तुम देखते नहीं कि मेरी नौजवान स्त्री को तुमसे बात करने में कितना कष्ट हो रहा है?

    भैरोंसिंह और उस बुढ़िया की बातचीत और अवस्था पर दोनों कुमारों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और कुछ सोचने के बाद इन्द्रजीतसिंह ने भैरोंसिंह से कहा, "अब मुझे निश्चय हो गया कि जरूर तुम्हें किसी ने इस तिलिस्म में ला फँसाया है और कोई ऐसी चीज खिलाई या पिलाई है कि जिससे तुम पागल और कोई हो गए हो, ताज्जुब नहीं कि यह सब बदमाशी इसी बुढ़िया की हो, अब अगर तुम होश में न आओगे तो मैं तुम्हें मार-पीट कर होश में लाऊँगा।" इतना कह कर इन्द्रजीतसिंह भैरोंसिंह की तरफ बढ़े, मगर उसी समय बुढ़िया ने यह कहकर चिल्लाना शुरू किया, "दौड़ियो-दौड़ियो, हाय रे, मारा रे, मारे रे, चोर-चोर, डाकू-डाकू, दौड़ो-दौड़ो, ले गया, ले गया, ले गया!"

    बुढ़िया चिल्लाती रही मगर कुमार ने उसकी एक भी न सुनी और भैरोंसिंह का हाथ पकड़ के अपनी तरफ खींच ही लिया, मगर बुढ़िया का चिल्लाना भी व्यर्थ न गया। उसी समय चार-पाँच खूबसूरत लड़के दौड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे जिन्होंने दोनों कुमारों को चारों तरफ से घेर लिया। उन लड़कों के गले में छोटी-छोटी झोलियाँ लटक रही थीं और उनमें आटे की तरह की कोई चीज भरी हुई थी। आने के साथ ही इन लड़कों ने अपनी झोली में से वह आटा निकाल कर दोनों कुमारों की तरफ फेंकना शुरू किया।

    निसन्देह उस बुकनी में तेज बेहोशी का असर था जिसने दोनों कुमारों को बात की बात में बेहोश कर दिया और दोनों चक्कर खाकर जमीन पर लेट गये, जब आंख खुली तो दोनों ने अपने को एक सजे-सजाये कमरे में फर्श के ऊपर पड़े पाया।

    14

    जिस कमरे में दोनों कुमारों की बेहोशी दूर हो जाने के कारण आँख खुली थी वह लम्बाई में बीस और चौड़ाई में पन्द्रह गज से कम न था। इस कमरे की सजावट कुछ विचित्र ढंग की थी और दीवारों में भी एक तरह का अनूठापन था। रोशनी के शीशों (हाँडी और कन्दीलों) की जगह उसमें दो-दो हाथ लम्बी तरह-तरह की खूबसूरत पुतलियाँ लटक रही थीं और दीवारगीरों की जगह पचासों किस्म के जानवरों के चेहरे दीवारों में लगे हुए थे। दीवारें इस कमरे की लहरदार बनी हुई थीं और उन पर तरह- तरह की चित्रकारी की हुई थी। ऊपर की तरफ छत से कुछ नीचे हट कर चारों तरफ छोटी-छोटी खिड़कियाँ थीं जिससे जान पड़ता था कि ऊपर की तरफ कोई गुलामगदिश या मकान है मगर इस समय सब खिड़कियाँ बन्द थीं और इस कमरे में से कोई रास्ता ऊपर जाने का नहीं दिखाई देता था।

    कुँअर आनन्दसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, "भैया, वह बुढ़िया तो अजब आफत की पुड़िया मालूम होती है। और उन लड़कों की तेजी भी भूलने योग्य नहीं है।"

    इन्द्रजीतसिंह––बेशक ऐसा ही है! ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने हम लोगों को जीता छोड़ दिया। मगर हमें भैरोंसिंह की बातों पर आश्चर्य मालूम होता है! क्या हम उसे वास्तव में कोई ऐयार समझें?

    आनन्दसिंह––यदि वह ऐयार होता तो निःसन्देह हम लोगों को धोखा देने के लिए भैरोंसिंह बना होता और साथ ही इसके पोशाक भी वैसी ही रखता जैसी भैरोंसिंह पहना करता है, इसके सिवाय वह स्वयं अपने को भैरोंसिंह प्रकट करके हम लोगों का साथी बनता, ऐसा न कहता कि मैं भैरोंसिंह नहीं हूँ। मगर उसकी नौजवान औरत (बुढ़िया) के विषय में …

    इन्द्रजीतसिंह––उस बुढ़िया बात जाने दो, अगर वह वास्तव में भैरोंसिंह है तो ताज्जुब नहीं कि मसखरापन करता है या पागल हो गया है। और अगर वह पागल हो गया है तो निःसन्देह उस बुढ़िया की बदौलत जो उसकी आँखों में अभी तक नौजवान बनी हुई है।

    आनन्दसिंह––उस बुढ़िया को जिस तरह हो गिरफ्तार करना चाहिए।

    इन्द्रजीतसिंह––मगर उसके पहले अपने को बेहोशी से बचाने का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए क्योंकि लड़ाई-दंगे से तो हम लोग डरते ही नहीं।

    आनन्दसिंह––जी हाँ, जरूर ऐसा करना चाहिए। दवा तो हम लोगों के पास मौजूद ही है और ईश्वर की कृपा से कमरे का दरवाजा भी खुला है।

    दोनों भाइयों ने कमर से एक डिबिया निकाली जिसमें किसी तरह की दवा थी और उसे खाने के बाद कमरे के बाहर निकलना ही चाहते थे कि ऊपर वाले छोटे-छोटे दरवाजों में से एक दरवाजा खुला और पुनः उसी नौजवान बुढ़िया के खसम भैरोंसिंह की सूरत दिखाई दी। दोनों भाई रुक गये और आनन्दसिंह ने उसकी तरफ देखकर कहा,

    च॰ स॰-5-3

    "अब आप यहाँ क्यों आ पहुँचे?"

    भैरोंसिंह––आपके हालचाल की खबर लेने और साथ ही इसके अपनी नौजवान औरत की तरफ से आपको ज्याफत का न्यौता देने आया हूँ। मालूम होता है कि वह तुम लोगों पर आशिक हो गई है तभी खातिरदारी का बन्दोबस्त कर रही है। उसने तुम लोगों के लिए कितनी अच्छी-अच्छी चीजें खाने को तैयार की हैं और अभी तक बनाती ही जाती है।

    आनन्दसिंह––(हँसकर) और उन चीजों में जहर कितना मिलाया है?

    भैरोंसिंह––केवल डेढ़ छटांक! मैं उम्मीद करता हूँ कि इतने से तुम लोगों की जान न जायगी।

    आनन्दसिंह––आपकी इस कृपा के लिए मैं धन्यवाद देता हूँ और आपसे बहुत ही प्रसन्न होकर आपको कुछ इनाम भी देना चाहता हूँ। आप मेहरबानी करके जरा यहाँ आइये तो अच्छी बात है।

    भैरोंसिंह––बहुत अच्छा, इनाम लेने में देर करना भले आदमियों का काम नहीं है।

    इतना कहकर भैरोंसिंह वहाँ से हट गया और थोड़ी ही देर बाद सदर दरवाजे की राह से कमरे के अन्दर आता हुआ दिखाई दिया। जब कुँअर आनन्दसिंह के पास आया तो बोला "लाइए, क्या इनाम देते हैं।"

    आनन्दसिंह ने फुर्ती से तिलिस्मी खंजर उसके हाथ पर रख दिया जिसके असर से वह एक दफा काँपा और बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। तब आनन्दसिंह ने अपने भाई से कहा, "अब इसे अच्छी तरह जाँच कर देख लेना चाहिए कि यह भैरोंसिंह ही है या कोई और?"

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, अब बखूबी पता लग जायगा, पहले इसका दाहिनी बगल वाला मस्सा देखो।

    आनन्दसिंह––(भैरोंसिंह की बगल देखकर) देखिये मस्सा मौजूद है। अब कमर वाला दाग देखिये––लीजिए यह भी मौजूद है। इसके भैरोंसिंह होने में अब मुझे तो किसी तरह का सन्देह नहीं रहा।

    इन्द्रजीतसिंह––अब सन्देह हो ही नहीं सकता। मैंने इस मस्से को अच्छी तरह खींच कर भी देख लिया, अच्छा अब इसे होश में लाना चाहिए।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने अपना वह हाथ जिसमें तिलिस्मी खंजर के जोड़ की अँगूठी थी, भैरोंसिंह के बदन पर फेरा। भैरोंसिंह तुरन्त होश में आकर उठ बैठा और ताज्जुब से चारों तरफ देखता हुआ बोला, "वाह-वाह! मैं यहाँ क्योंकर आ गया और आप लोगों ने मुझे कहाँ पाया?"

    आनन्दसिंह––मालूम होता है अब आपका पागलपन उतर गया?

    भैरोंसिंह––(ताज्जुब से) पागलपन कैसा?

    इन्द्रजीतसिंह––इसके पहले तुम किस अवस्था में थे और क्या करते थे, कुछ याद है? भैरोंसिंह––मुझे कुछ भी याद नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह––अच्छा बताओ कि तुम इस तिलिस्म के अन्दर कैसे आ पहुँचे?

    भैरोंसिंह––केवल मुझी को नहीं बल्कि किशोरी, कामिनी, कमला, लक्ष्मीदेवी, लाड़िली, कमलिनी और इन्दिरा को भी राजा गोपालसिंह ने इस तिलिस्म के अन्दर पहुँचा दिया है, बल्कि मुझे तो सबके आखिर में पहुँचाया है। आपके नाम की एक चिट्ठी भी दी थी मगर अफसोस! आपसे मुलाकात होने न पाई और मेरी अवस्था बदल गई।

    इन्द्रजीतसिंह––वह चिट्ठी कहाँ है?

    भैरोंसिंह––(इधर-उधर देखकर) जब मेरे बटुए ही का पता नहीं तो चिट्ठी के बारे में क्या कह सकता हूँ?

    आनन्दसिंह––मगर यह तो तुम्हें याद होगा कि उस चिट्ठी में क्या लिखा हुआ था?

    भैरोंसिंह––क्यों नहीं, मेरे सामने ही तो वह लिखी गई थी। उसमें कोई विशेष बात न थी, केवल इतना ही लिखा था कि "उस गुप्त स्थान से किशोरी, कामिनी इत्यादि को लेकर मैं जमानिया जा रहा था मगर मायारानी की कुटिलता के कारण अपने इरादे में बहुत कुछ उलट-फेर करना पड़ा। जब यह मालूम हुआ हुआ कि मायारानी तिलिस्मी बाग के अन्दर घुस गई है तब लाचार सब औरतों को तिलिस्म के अन्दर पहुँचाता हूँ। बाकी हाल भैरोंसिंह से सुन लेना"––बस इतना लिखा था। मालूम होता है कि पहले का हाल वह आपसे कह चुके हैं।

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, पहले का बहुत-कुछ हाल वह हमसे कह चुके हैं।

    भैरोंसिंह––क्या यह भी कहा था कि कृष्ण जिन्न का रूप भी उन्हीं कृपानिधान ने धारण किया था?

    आनन्दसिंह––नहीं सो तो साफ नहीं कहा था, मगर उनकी बातों से हम लोग कुछ-कुछ समझ गये थे कि कृष्ण जिन्न वही बने थे। खैर, अब तुम खुलासा बताओ कि क्या हुआ?

    भैरोंसिंह ने वह सब हाल दोनों कुमारों से कहा जो ऊपर के बयानों में लिखा जा चुका है और जिसमें का बहुत-कुछ हाल राजा गोपालसिंह की जुबानी दोनों कुमार सुन चुके थे। इसके बाद भैरोंसिंह ने कहा––"जब राजा गोपालसिंह को मालूम हो गया कि मायारानी बहुत से आदमियों को लेकर तिलिस्मी बाग के अन्दर जा छिपी है तब वे एक गुप्त राह से छिप कर सब औरतों को साथ लिए हुए उस मकान में पहुँचे जिसमें से कमन्द के सहारे सभी को लटकाते हुए शायद आपने देखा होगा।"

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, देखा था, तो क्या उस समय वे औरतें बेहोश थी?

    भैरोंसिंह––जी हाँ, न मालूम किस खयाल से उन्होंने सब औरतों को बेहोश कर दिया था मगर इसके पहले यह कह दिया था तुम्हें तिलिस्म के अन्दर पहुँचा देते हैं जहाँ दोनों कुमार हैं, यद्यपि वहाँ पहुँचना बहुत कठिन था मगर अब एक दीवार वाले तिलिस्म को दोनों कुमार तोड़ चुके हैं इसलिए वहाँ तक पहुँचा देने में कोई कठिनता न रही!

    इन्द्रजीतसिंह––तो क्या तुम भी उन सातों औरतों के साथ ही उस बाग में उतारे गये थे?

    भैरोंसिंह––पहले तो उन्होंने इन्द्रदेव को बहुत सी बातें समझाई-बुझाई, जिन्हें मैं समझ न सका। इसके बाद इन्द्रदेव को तो गोपालसिंह बनाया और इन्द्रदेव के एक ऐयार को भैरोंसिंह बनाकर दोनों को खास बाग के अन्दर भेजा। इस काम से छुट्टी पाकर सब औरतों को और मुझे साथ-साथ लिए उस मकान में आये। सभी को तो उस कमरे में बैठा दिया जिसमें से कमन्द के सहारे सबको लटकाया था और फिर मुझे उनकी हिफाजत के लिए छोड़ने के बाद कमलिनी को साथ लिए हुए कहीं चले गये और घण्टे भर के बाद वापस आये। उस समय कमलिनी के हाथ में एक छोटी-सी किताब थी जिसे उन्होंने कई दफा तिलिस्मी किताब के नाम से सम्बोधन किया था। इसके बाद उन्होंने सभी को बेहोश करके नीचे लटका दिया। इस काम से छुट्टी पाकर उन्होंने आपके नाम की दो चिट्ठियाँ लिखीं, एक तो उस कमरे में रक्खी और दूसरी चिट्ठी जिसका मैं अभी जिक्र कर चुका हूँ मुझे देकर कहा कि "जब कुमारों से तुम्हारी मुलाकात हो तो यह चिट्ठी उन्हें देना और सब काम कमलिनी की आज्ञानुसार करना, यहाँ तक कि यदि कमलिनी तुम्हें सामना हो जाने पर भी कुमारों से मिलने के लिए मना करे तो तुम कदापि न मिलना" इत्यादि कहकर मुझे नीचे उतर जाने के लिए कहा। (कुछ रुक कर) नहीं-नहीं, मैं भूलता हूँ, मुझे उन्होंने पहले ही नीचे उतार दिया था, क्योंकि सभी की गठरी मैंने ही नीचे से थामी थी, सभी को नीचे उतार देने के बाद जब मैं उनकी आज्ञानुसार पुनः ऊपर गया तब उन्होंने ये सब बातें मुझे समझाईं और आपके मित्र इन्द्रदेव भी वहाँ आ पहुँचे जो गोपालसिंह की सूरत बने हुए थे। इन्द्रदेव ने राजा गोपालसिंह से कुछ कहना चाहा, मगर उन्होंने रोक दिया और मुझसे कहा कि अब तुम भी कमंद के सहारे नीचे उतर जाओ और इन्द्रदेव के आने का इन्तजार करो। मैं उनकी आज्ञानुसार नीचे उतर आया। मैं अन्दाज से कहता हूँ कि उन बेहोशों में आप या छोटे कुमार छिपे थे और आप ही दोनों में से किसी ने मेरे बदन के साथ तिलिस्मी खंजर लगाया था जिससे मैं बेहोश हो गया।

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, ठीक है ऐसा ही हुआ था।

    भैरोंसिंह––फिर तो मैं बेहोश हो ही गया, मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि इन्द्रदेव, जो गोपालसिंह की सूरत में थे, कब नीचे आये, क्या हुआ।

    आनन्दसिंह––ठीक है, वह भी थोडी ही देर बाद नीचे उतरे और तुम्हारी तरह से वह भी बेहोश किए गए। (इन्द्रजीतसिंह से) अब मालूम हुआ कि इन्द्रदेव ही के कहे मुताबिक मैं आपको बुलाने के लिए ऊपर गया था।

    भैरोंसिंह––हाँ, जब हम लोगों को उन्होंने चैतन्य किया तो कहा था कि दोनों कुमार ऊपर गए हैं। आखिर इन्द्रदेव ने कमन्द खींच ली और हम लोगों को लिए हुए दूसरी दीवार की तरफ गये। वहाँ कमलिनी ने जमीन खोद कर एक दरवाजा पैदा किया। ताज्जुब नहीं कि उसी दरवाजे की राह से आप लोग भी यहाँ तक आये हों, और अगर ऐसा है तो उस कोठरी में भी अवश्य पहुँचे होंगे जहाँ की जमीन लोगों को बेहोश करके तिलिस्म के अन्दर पहुँचा देती है?

    आनन्दसिंह––हम लोग भी उसी रास्ते से यहाँ तक आये हैं, अच्छा तो क्या इन्द्र–– देव भी तुम लोगों के साथ यहाँ आये हैं?

    भैरोंसिंह––जी नहीं, वह तो ऊपर ही रह गये, बोले कि मुझे तिलिस्म के अन्दर जाने की आज्ञा नहीं है। तुम लोग जाओ। मैं अब इसी बाग में छिप कर रहूँगा। जब दोनों कुमार यहाँ आ जायेंगे तब उनसे छिप कर पुनः कमन्द के सहारे ऊपर जाऊँगा और राजा गोपालसिंह के साथ मिलकर काम करूँगा।

    आनन्दसिंह––(इन्द्रजीतसिंह से) तब ताज्जुब नहीं कि इन्द्रदेव ने ही सरयू को बेहोश किया हो?

    इन्द्रजीतसिंह––जरूर ऐसा ही है। (भैरों से) अच्छा तब क्या हुआ?

    भैरोंसिंह––नीचे उतर कर जब हम लोग उस कोठरी में पहुँचे जहाँ की जमीन थोड़ी ही देर में लोगों को बेहोश कर देती है तब नियमानुसार सभी के साथ मैं भी बेहोश हो गया। उस समय से इस समय तक का हाल मुझे कुछ भी मालूम नहीं है, मैं बिल्कुल नहीं जानता कि उसके बाद क्या हुआ और मैं किस अवस्था में होकर क्यों इस तरह अपने को यहाँ पाता हूँ।

    15

    भैरोंसिंह की बातें सुनकर दोनों कुमार देर तक तरह-तरह की बातें सोचते रहे और तब उन्होंने अपना किस्सा भैरोंसिंह से कह सुनाया। बुढ़िया वाली बात को सुनकर भैरोंसिंह हँस पड़ा और बोला, "मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है कि वह बुढ़िया कौन है और कहाँ है, यदि अब मैं उसे पाऊँ तो जरूर उसकी बदमाशी का मजा उसे चखाऊँ। मगर अफसोस तो यह है कि मेरा ऐयारी का बटुआ मेरे पास नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी अनमोल चीजें थीं। हाय, वे तिलिस्मी फूल भी उसी बटुए में थे जिसके देने से मेरा बाप भी मुझे टाल बताना चाहता था मगर महाराज ने दिलवा दिया। इस समय बटुए का न होना मेरे लिए बड़ा दुखदायी है क्योंकि आप कह रहे हैं कि 'उन लड़कों ने एक तरह की बुकनी उड़ाकर हमें बेहोश कर दिया।' कहिए, अब मैं क्योंकर अपने दिल का हौसला निकाल सकता हूँ?"

    इन्द्रजीतसिंह––निःसन्देह उस बटुए का जाना बहुत ही बुरा हुआ। वास्तव में उसमें बड़ी अनूठी चीजें थीं, मगर इस समय उनके लिए अफसोस जाहिर करना फिजूल है। हाँ, इस समय मैं दो चीजों से तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।

    भैरोंसिंह––वह क्या?

    इन्द्रदेव––एक तो वह दवा हम दोनों के पास मौजूद है जिसके खाने से बेहोशी असर नहीं करती और वह मैं तुम्हें खिला सकता हूँ। दूसरे हम लोगों के पास दो-दो हर्बे मौजूद हैं, बल्कि यदि तुम चाहो तो तिलिस्मी खंजर भी दे सकता हूँ।

    भैरोंसिंह––जी नहीं, तिलिस्मी खंजर मैं न लूँगा, क्योंकि आपके पास उसका

    15

    भैरोंसिंह की बातें सुनकर दोनों कुमार देर तक तरह-तरह की बातें सोचते रहे और तब उन्होंने अपना किस्सा भैरोंसिंह से कह सुनाया। बुढ़िया वाली बात को सुनकर भैरोंसिंह हँस पड़ा और बोला, "मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है कि वह बुढ़िया कौन है और कहाँ है, यदि अब मैं उसे पाऊँ तो जरूर उसकी बदमाशी का मजा उसे चखाऊँ। मगर अफसोस तो यह है कि मेरा ऐयारी का बटुआ मेरे पास नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी अनमोल चीजें थीं। हाय, वे तिलिस्मी फूल भी उसी बटुए में थे जिसके देने से मेरा बाप भी मुझे टाल बताना चाहता था मगर महाराज ने दिलवा दिया। इस समय बटुए का न होना मेरे लिए बड़ा दुखदायी है क्योंकि आप कह रहे हैं कि 'उन लड़कों ने एक तरह की बुकनी उड़ाकर हमें बेहोश कर दिया।' कहिए, अब मैं क्योंकर अपने दिल का हौसला निकाल सकता हूँ?"

    इन्द्रजीतसिंह––निःसन्देह उस बटुए का जाना बहुत ही बुरा हुआ। वास्तव में उसमें बड़ी अनूठी चीजें थीं, मगर इस समय उनके लिए अफसोस जाहिर करना फिजूल है। हाँ, इस समय मैं दो चीजों से तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।

    भैरोंसिंह––वह क्या?

    इन्द्रदेव––एक तो वह दवा हम दोनों के पास मौजूद है जिसके खाने से बेहोशी असर नहीं करती और वह मैं तुम्हें खिला सकता हूँ। दूसरे हम लोगों के पास दो-दो हर्बे मौजूद हैं, बल्कि यदि तुम चाहो तो तिलिस्मी खंजर भी दे सकता हूँ।

    भैरोंसिंह––जी नहीं, तिलिस्मी खंजर मैं न लूँगा, क्योंकि आपके पास उसका रहना तब तक बहुत ही जरूरी है जब तक आप तिलिस्म तोड़ने का काम समाप्त न कर लें। मुझे बस मामूली तलवार दे दीजिए, मैं अपना काम उसी से चला लूँगा और वह दवा खिला कर मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं उस बुढ़िया के पास से अपना बटुआ निकालने का उद्योग करूँ।

    दोनों कुमारों के पास तिलिस्मी खंजर के अतिरिक्त एक-एक तलवार भी थी। इन्द्रजीतसिंह ने अपनी तलवार भैरोंसिंह को दी और डिबिया में से निकाल कर थोड़ी-सी दवा भी खिलाने के बाद कहा, मैं तुमसे कह चुका हूँ कि जब हम दोनों भाई इस बाग पहुँचे तो चूहेदानी के पल्ले की तरह वह दरवाजा बन्द हो गया जिस राह से हम दोनों आये थे और उस दरवाजे पर लिखा हुआ था कि यह तिलिस्म टूटने लायक नहीं है।

    भैरोंसिंह––हाँ, यह आप कह चुके हैं।

    आनन्दसिंह––(इन्द्रजीतसिंह से) भैया, मुझे तो उस लिखावट पर विश्वास नहीं होता।

    इन्द्रजीतसिंह––यही मैं भी कहने को था क्योंकि रिक्तगंथ की बातों से तिलिस्म का यह हिस्सा भी टूटने योग्य जान पड़ता है, (भैरोंसिंह से) इसी से मैं कहता हूँ कि इस बाग में जरा समझ-बूझ के घूमना।

    भैरोंसिंह––खैर, इस समय तो मैं भी आपके साथ-साथ चलता हूँ। चलिए बाहर निकलिए।

    आनन्दसिंह––(भैरोंसिंह से) तुम्हें याद है कि तुम ऊपर से उतरकर इस कमरे में किस राह से आए थे?

    भैरोंसिंह––मुझे कुछ भी याद नहीं।

    इतना कहकर भैरोंसिंह उठ खड़ा हुआ और दोनों कुमार भी उठकर कमरे के बाहर निकलने के लिए तैयार हो गये।

    16

    तीनों आदमी कमरे के बाहर निकल कर सहन में आये। उस समय कुमार को मालूम हुआ कि यह कमरा बाग के पूरब तरफ वाली इमारत के सब से निचले हिस्से में बना हुआ है, और इस कमरे के ऊपर और भी दो मंजिल की इमारत है, मगर वे दोनों मंजिलें बहुत छोटी थीं और उनके साथ ही दोनों तरफ इमारतों का सिलसिला बराबर चला गया था। दिन चढ़ आया था और नित्यकर्म न किए जाने के कारण कुमारों की तबीयत कुछ भारी हो रही थी।

    जिस तरह इस तिलिस्म में पहले दूसरे बाग के अन्दर नहर की बदौलत पानी की कमी न थी उसी तरह इस वाग भी नहर का पानी छोटी नालियों के जरिये चारों ओर घूमता हुआ आता था और दस-पाँच मेवों के पेड़ भी थे जिनमें बहुतायत के साथ मेवे लगे हुए थे।

    दोनों कुमार और भैरोंसिंह टहलते हुए बाग के बीचोंबीच से उसी कदम्ब के पेड़ तले आए जिसके नीचे पहले-पहले भैरोंसिंह के दर्शन हुए थे। बातचीत करने के बाद तीनों ने जरूरी कामों से छुट्टी पा हाथ-मुँह धोकर स्नान किया और संध्योपासन से छुट्टी पाकर वे बाग के मेवों और नहर के जल से संतोष करने के बाद बैठकर यों बातचीत करने लगे––

    इन्द्रजीतसिंह––मैं उम्मीद करता हूँ कि कमलिनी, किशोरी और कामिनी वगैरह से इसी बाग में मुलाकात होगी।

    आनन्दसिंह––निःसन्देह ऐसा ही है। इस बाग में अच्छी तरह घूमना और यहाँ की हरएक बात का पूरा-पूरा पता लगाना हम लोगों के लिए जरूरी है।

    भैरोंसिंह––मेरा दिल भी यही गवाही देता है कि वे सब जरूर इसी बाग में होंगी मगर कहीं ऐसा न हुआ हो कि मेरी तरह से उन लोगों का दिमाग भी किसी कारणविशेष से बिगड़ गया हो।

    इन्द्रजीतसिंह––कोई ताज्जुब नहीं अगर ऐसा ही हुआ हो, मगर तुम्हारी जुबानी मैं सुन चुका हूँ कि राजा गोपालसिंह ने कमलिनी को बहुत-कुछ समझा-बुझाकर एक तिलिस्मी किताब भी दी है।

    भैरोंसिंह––हाँ, बेशक मैं कह चुका हूँ और ठीक कह चुका हूँ। इन्द्रजीतसिंह-तो यह भी उम्मीद कर सकता हूँ कि कमलिनी को इस तिलिस्म का कुछ हाल मालूम हो गया हो और वह किसी के फंदे में न फँसे।

    भैरोंसिंह––इस तिलिस्म में और है ही कौन जो उन लोगों के साथ दगा करेगा? आनन्दसिंह-बहुत ठीक! शायद आप अपनी नौजवान स्त्री और उसके हिमायती लड़कों को बिल्कुल ही भूल गए, या हम लोगों की जुबानी सब हाल सुनकर भी आपको उसका कुछ खयाल न रहा।

    भैरोंसिंह––(मुस्कुराकर) आपका कहना ठीक है मगर उन सभी को···

    इतना कहकर भैरोंसिंह चुप हो गया और कुछ सोचने लगा। दोनों कुमार भी किसी बात पर गौर करने लगे और कुछ देर बाद भैरोंसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा––

    भैरोंसिंह––आपको तो यह याद होगा कि लड़कपन में एक दफा मैंने पागलपन की नकल की थी।

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, याद है। तो क्या आज भी तुम जान-बूझ कर पागल बने हुए थे?

    भैरोंसिंह––नहीं-नहीं, मेरे कहने का मतलब यह नहीं है, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि इस समय भी उसी तरह का पागल बन के शायद कोई काम निकाल सकूँ।

    आनन्दसिंह––हाँ, ठीक तो है, आप पागल बन के अपनी नौजवान स्त्री को बुलाइए जिस ढंग से मैं बताता हूँ।

    कुमार के बताये हुए ढंग से भैरोंसिंह ने पागल बन के अपनी नौजवान स्त्री को कई दफा बुलाया मगर उसका नतीजा कुछ न निकला, न तो कोई उसके पास आया और न किसी ने उसकी बात का जवाब ही दिया, आखिर इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "बस करो, उसे मालूम हो गया कि तुम्हारा पागलपन जाता रहा, अब हम लोगों को फँसाने के लिए वह जरूर कोई दूसरा ही ढंग काम में लावेगी।"

    आखिर भैरोंसिंह चुप हो रहे और थोड़ी देर बाद तीनों आदमी इधर-उधर का तमाशा देखने के लिए यहाँ से रवाना हुए। इस समय दिन बहुत कम बाकी था।

    तीनों आदमी बाग के पश्चिम की तरफ गये जिधर संगमरमर की एक बारहदरी थी। उसके दोनों तरफ दो इमारतें और थीं जिनके दरवाजे बन्द रहने के कारण यह नहीं जाना जाता था कि उसके अन्दर क्या है मगर बारहदरो खुले ढंग की बनी हुई थी अर्थात् उसके पीछे की तरफ दीवानखाना और आगे की तरफ केवल तेरह खम्भे लगे हुए थे जिनमें दरवाजा चढ़ाने की जगह न थी।

    इस बारहदरी के मध्य में एक सुन्दर चबूतरा बना हुआ था जिस पर कम-से-कम पन्द्रह आदमी बखूबी बैठ सकते थे। उस चबूतरे के ऊपर बीचोंबीच में लोहे का चौखूटा तख्ता था जिसमें उठाने के लिए कड़ी लगी हुई थी और चबूतरे के सामने की दीवार में एक छोटा-सा दरवाजा था जो इस समय खुला हुआ था और उसके अन्दर दो-चार हाथ के बाद अंधकार सा जान पड़ता था। भैरोंसिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "यदि आज्ञा हो तो इस छोटे-से दरवाजे के अन्दर जाकर देखू कि इसमें क्या है?"

    इन्द्रजीतसिंह––यह तिलिस्म का मुकाम है, खिलवाड़ नहीं है। कहीं ऐसा न हो कि तुम अन्दर जाओ और दरवाजा बन्द हो जाय! फिर तुम्हारी क्या हालत होगी, सो तुम्हीं सोच लो।

    आनन्दसिंह––पहले यह तो देखो कि दरवाजा लकड़ी का है या लोहे का?

    इन्द्रजीतसिंह––भला तिलिस्म बनाने वाले इमारत के काम में लकड़ी क्यों लगाने लगे जिसके थोड़े ही दिन में बिगड़ जाने का खयाल होता है, मगर शक मिटाने के लिए यदि चाहो तो देख लो।

    भैरोंसिंह––(उस दरवाजे को अच्छी तरह जाँचकर) बेशक यह लोहे का बना हुआ है। इसके अन्दर कोई भारी चीज डालकर देखना चाहिए कि बन्द होता है या नहीं, यदि किसी आदमी के जाने से बन्द हो जाता होगा तो मालूम हो जायेगा।

    आनन्दसिंह––(चबूतरे की तरफ इशारा करके) पहले इस तख्ते को उठाकर देखो कि इसके अन्दर क्या है!

    "बहुत अच्छा" कहकर भैरोंसिंह चबूतरे के ऊपर चढ़ गया और कड़ी में हाथ डाल के उस तख्ते को उठाने लगा। तख्ता किसी कब्जे या पेंच के सहारे उसमें जड़ा हुआ न था बल्कि चारों तरफ से अलग था, इसलिए भैरोंसिंह ने उसे उठाकर चबूतरे के नीचे रख दिया, इसके बाद झाँककर देखने से मालूम हुआ कि नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं।

    भैरोंसिंह ने नीचे उतरने के लिए आज्ञा माँगी मगर कुँअर इन्द्रजीतसिंह उसे रोककर स्वयं नीचे उतर गये और भैरोंसिंह तथा आनन्दसिंह को ऊपर मुस्तैद रहने के लिए ताकीद कर गये। नीचे उतरने के लिए चक्करदार सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और हर एक सीढ़ी के दोनों तरफ गेंदे के बनावटी पेड़ बने हुए थे जो सीढ़ी पर पैर रखने के साथ ही झुक जाते और पैर (या बोझ) हट जाने से पुनः ज्यों-के-त्यों खड़े हो जाते थे। इस तमाशे को देखते हुए इन्द्रजीतसिंह कई सीढ़ियाँ नीचे उतर गये और जब अंधेरे में पहुँचे तो बन्द दरवाजा मिला जिसे उस समय कुमार ने कुछ खुला हुआ देखा था जब तक वहाँ तक पहुँचने में तीन-चार सीढ़ियाँ बाकी थी अर्थात् कुमार के देखते-देखते वह दरवाजा बन्द हो गया था।

    कुमार को ताज्जुब मालूम हुआ और जब उद्योग करने पर भी दरवाजा न खुला तो कुमार ऊपर की तरफ लौटे। तीन सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ने के बाद घूमकर देखा तो दरवाजे को पुनः कुछ खुला हुआ देखा मगर जब नीचे उतरे तो फिर बन्द हो गया।

    इन्द्रजीतिसिंह को विश्वास हो गया कि इस दरवाजे का खुलना और बन्द होना भी इन्हीं सीढ़ियों के अधीन है। आखिर लाचार होकर कुछ सोचते-विचारते चले आए। ऊपर आते समय भी सीढ़ियों के दोनों तरफ वाले पेड़ों की वही दशा हुई अर्थात् जिस सीढ़ी पर पैर रखा जाता, उसके दोनों तरफ वाले पेड़ झुक जाते और जब उस पर से पैर हट जाता तो फिर ज्यों-के-त्यों हो जाते।

    ऊपर आकर इन्द्रजीतसिंह ने कुल हाल आनन्दसिंह और भैरोंसिंह से कहा और इस बात का विचार करने की आज्ञा दी कि 'हम नीचे उतरकर किस तरह उस दरवाजे को खुला हुआ पा सकते हैं।'

    थोड़ी देर बाद भैरोंसिंह ने कहा, "मैं पेड़ों का मतलब समझ गया, यदि आप मुझे अपने साथ ले चलें तो मैं ऐसी तरकीब कर सकता हूँ कि वह दरवाजा आपको खुला मिले।"

    इस समय संध्या हो चुकी थी इसलिए सब लोगों की राय नीचे उतरने को न हुई। कुमार की आज्ञानुसार भैरोंसिंह ने उस गड्ढे का मुँह ज्यों-का-त्यों ढाँक दिया और उस बारहदरी में निश्चिन्ती के साथ बैठ बातचीत करने लगे क्योंकि आज की रात इसी बारहदरी में होशियारी के साथ रहकर बिताने का निश्चय कर लिया था और भैरोंसिंह के जिद करने से यह बात भी तय पाई थी कि इन्द्रजीतसिंह आराम के साथ सोवें और भैरोंसिंह तथा आनन्दसिंह बारी-बारी से जागकर पहरा

    17

    आधी रात का समय है। तिलिस्मी बाग में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। इमारत के ऊपरी हिस्से पर चन्द्रमा की कुछ थोड़ी-सी चाँदनी जरा झलक मार रही है बाकी सब तरफ अन्धकार छाया हुआ है। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह सोये हुए हैं और भैरोंसिंह एक खम्भे के सहारे बैठे हुए बारहदरी के सामने वाली इमारत को देख बारहदरी के सामने वाली इमारत दोमंजिली थी और उसकी लम्बाई तो बहुत ज्यादा मगर चौड़ाई बहुत कम थी। इमारत की ऊपर वाली मंजिल में बाग की तरफ छोटे-छोटे दरवाजे एक सिरे से दूसरे सिरे तक बराबर एक ही रंग-ढंग के बने हुए थे। दरवाजों के बीच में केवल एक खम्भे का फासला था और वे खम्भे भी सब एक ही ढंग के नक्काशीदार बने हुए थे जिसकी खूबी इस समय कुछ भी मालूम नहीं पड़ती थी मगर एक दरवाजे के अन्दर यकायक कुछ रोशनी की झलक पड़ जाने के कारण भैरोंसिंह एकटक उसी तरफ देख रहे थे।

    थोड़ी ही देर बाद ऊपर वाली मंजिल का एक दरवाजा खुला और पीठ पर गठरी लादे हुए एक आदमी बाईं तरफ से दाहिनी तरफ जाता हुआ दिखाई दिया। भैरोंसिंह चैतन्य होकर सम्हलकर बैठ गये और बड़ी दिलचस्पी के साथ ध्यान देकर उस तरफ देखने लगे। कुछ देर बाद दरवाजा बन्द हो गया और उसके दाहिनी तरफ चार दरवाजे छोड़कर पांचवाँ दरवाजा खुला जिसके अन्दर हाथ में चिराग लिए हुए एक और आदमी इस तरह खड़ा दिखाई दिया जैसे किसी के आने का इन्तजार कर रहा हो। थोड़ी ही देर में चार-पाँच औरतें मिलकर किसी लटकते बोझ को लिए हुए उसी आदमी के पास से निकल गई जिसके हाथ में चिराग था और उन्हीं के पीछे-पीछे वह आदमी भी चिराग लिए चला गया। दरवाजा बन्द नहीं हुआ मगर उसके अन्दर अन्धकार हो गया।

    भैरोंसिंह ने यह समझकर कि शायद हम और भी कुछ तमाशा देखें दोनों कुमारों को चैतन्य कर दिया और जो कुछ देखा था, बयान किया।

    हम कह आये है कि इस बारहदरी की पिछली दीवार के नीचे बीचोंबीच में अर्थात् चबूतरे के सामने एक छोटा दरवाजा था जिसके अन्दर भैरोंसिंह ने जाने का इरादा किया था। इस समय यकायक उसी दरवाजे के अन्दर चिराग की रोशनी देखकर भैरोंसिंह और दोनों कुमार चौंक पड़े और उठकर दरवाजे के सामने जा झाँककर देखने लगे। मालूम हुआ कि इस छोटे से दरवाजे के अन्दर एक बहुत बड़ा कमरा है जिसके दोनों तरफ की लोहे वाली शहतीरें (बड़ी धरने) बड़े-बड़े चौखूटे खम्भों के ऊपर हैं और उसकी छत लदाव की बनी हुई है। उस कमरे के दोनों तरफ के खम्भों के बाद भी एक दालान बना है और दालान की दीवारों में कई बड़े दरवाजे बने हैं जिनमें कुछ खुले और कुछ बन्द हैं।

    दोनों कुमारों और भैरोंसिंह ने देखा कि उसी कमरे के मध्य में एक आदमी जिसके चेहरे पर नकाब पड़ी थी, हाथ में चिराग लिए हुए खड़ा छत की तरफ देख रहा है। कुछ देर तक देखने के बाद वह आदमी एक खम्भे के सहारे चिराग रखकर पीछे की तरफ लौट गया।

    भैरोंसिंह और दोनों कुमार आड़ में खड़े होकर सब तमाशा देख रहे थे और जब वह आदमी चिराग रखकर हट गया तब भी यह सोचकर खड़े ही रहे कि जब चिराग रखकर गया है तो पुन आवेगा।

    उस नकाबपोश को चिराग रखकर गये हुए दस-बारह पल से ज्यादा न बीते होंगे कि दूसरी तरफ वाले दरवाजे के अन्दर से कोई दूसरा आदमी निकलकर तेजी से साथ इस कमरे के मध्य में आ पहुँचा और हाथ की हवा देकर उस चिराग को बुझा दिया जिसे पहला आदमी एक खम्भे के सहारे रखकर चला गया था, और इसके बाद कमरे में अन्धकार हो जाने के कारण कुछ मालूम न हुआ कि यह दूसरा आदमी चिराग बुझाकर चला गया या उसी जगह कहीं आड़ देकर छिप रहा।

    यह दूसरा आदमी भी जिसने कमरे में आकर चिराग बुझा दिया था, अपने चेहरे पर स्याह नकाब डाले हुए था, केवल नकाब ही नहीं, उसका तमाम बदन भी स्याह कपड़े से ढंका हुआ था और कद में छोटा होने के कारण इसका पता नहीं लग सकता था कि वह मर्द है या औरत।

    थोड़ी ही देर बाद दोनों कुमार और भैरोंसिंह के कान में किसी के बोलने की आवाज सुनाई दी जैसे किसी ने उस अंधेरे में आकर ताज्जुब के साथ कहा हो कि "हैं! चिराग कौन बुझा गया?"

    इसके जवाब में किसी ने कहा, "अपने को सम्हाले रहो और जल्दी से हट जाओ, कोई दुश्मन न आ पहुँचा हो।"

    इसके बाद चौथाई घड़ी तक न तो किसी तरह की आवाज ही सुनाई दी और न कोई दिखाई ही पड़ा मगर दोनों कुमार और भैरोंसिंह अपनी जगह से न हिले।

    आधी घड़ी के बाद वह पुनः हाथ में चिराग लिए हुए आया जो पहले खम्भे के सहारे चिराग रखकर चला गया था। इस आदमी का बदन गठीला और फुर्तीला मालूम पड़ता था। इसका पायजामा, अंगा; पटूका, मुंडासा और नकाब ढीले कपड़े का बना हुआ था। अबकी दफे वह बायें हाथ में चिराग और दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए हुए था, शायद उसे पहले दुश्मन का खयाल था जिसने चिराग बुझा दिया था, इसलिए उसने चिराग जमीन पर रख दिया और तलवार लिए चारों तरफ घूमकर किसी को ढूँढने लगा। वह आदमी जिसने चिराग बुझा दिया था एक खम्भे की आड़ में छिपा हुआ था। जब पीले कपड़े वाला उस खम्भे के पास पहुँचा तो उस आदमी पर निगाह पड़ी, उसी समय वह नकाबपोश भी सम्हल गया और तलवार खींचकर सामने खड़ा हो गया। पीले कपड़े वाले ने तलवार वाला हाथ ऊँचा करके पूछा, "सच बता, तू कौन है?"

    इसके जवाब में स्याह नकाबपोश ने यह कहते हुए उस पर तलवार का वार किया कि "मेरा नाम इसी तलवार की धार पर लिखा हुआ है।"

    पीले कपड़े वाले ने बड़ी चालाकी से दुश्मन का वार बचाकर अपना वार किया और इसके बाद दोनों में अच्छी तरह लड़ाई होने लगी

    दोनों कुमार और भैरोंसिंह लड़ाई के बड़े ही शौकीन थे, इसलिए बड़ी चाह से ध्यान देकर उन दोनों की लड़ाई देखने लगे। निःसन्देह दोनों नकाबपोश लड़ने में होशियार और बहादुर थे, एक-दूसरे के वार को बड़ी खूबी से बचाकर अपना वार करता था जिसे देख इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "दोनों अच्छे हैं, चिराग की रोशनी एक ही तरफ पड़ती है दूसरी तरफ सिवाय तलवार की चमक के और कोई सहारा वार बचाने के लिए नहीं हो सकता, ऐसे समय में इस खूबी के साथ लड़ना मामूली काम नहीं है!"

    इसी बीच यकायक स्याह नकाबपोश ने अपने हाथ की तलवार जमीन पर फेंक दी और एक खम्भे की आड़ में घूमता हुआ खंजर खींच और उसका कब्जा दबाकर बोला, "अब तू अपने को किसी तरह नहीं बचा सकता।"

    निःसन्देह वह तिलिस्मी खंजर था जिसकी चमक से उस कमरे में दिन की तरह उजाला हो गया। मगर पीले नकाबपोश ने भी उसका जवाब तिलिस्मी खंजर ही से दिया क्योंकि उसके पास भी तिलिस्मी खंजर मौजूद था। तिलिस्मी खंजरों से लड़ाई अभी पूरी तौर से होने भी न पाई थी कि एक तरफ से आवाज आई, "पीले मरकंद, लेना जाने न पावे! अब मुझे मालूम हो गया कि भैरोंसिंह के तिलिस्मी खंजर और बटुए का चोर यही है, देखो इसकी कमर से वह बटुआ लटक रहा है! अगर तुम इस बटुए के मालिक बन जाओगे तो फिर इस दुनिया में तुम्हारा मुकाबला करने वाला कोई भी न रहेगा क्योंकि यह तुम्हारे ही ऐसे ऐयारों के पास रहने योग्य है!"

    यह एक ऐसी बात थी जिसने सबसे ज्यादा भैरोंसिंह को चौंका ही नहीं दिया बल्कि बेचैन कर दिया। उसने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "बस आप कृपा करके अपना तिलिस्मी खंजर मुझे दीजिए, मैं स्वयं इसके पास जाकर अपनी चीज ले लूँगा, क्योंकि यहां पर तिलिस्मी खंजर के बिना काम न चलेगा और यह मौका भी हाथ से गंवा देने के लायक नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, बेशक ऐसा ही है, अच्छा चलो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।

    आनन्दसिंह––और मैं?

    इन्द्रजीतसिंह––तुम इसी जगह खड़े रहो, दोनों भाइयों का एक साथ वहाँ चलना ठीक नहीं, अकेला मैं ही उन दोनों के लिए काफी हूँ।

    आनन्दसिंह––फिर भैरोंसिंह जाकर क्या करेंगे? तिलिस्मी खंजर की चमक में इनकी आँख खुली नहीं रह सकती।

    इन्द्रजीतसिंह––सो तो ठीक है।

    भैरोंसिंह––अजी, आप इस समय ज्यादा सोच-विचार न कीजिए! आप अपना खंजर मुझे दीजिये, बस मैं निपट लूँगा।

    इन्द्रजीत ने खंजर जमीन पर रख दिया और उसके जोड़ की अंगूठी भैरोंसिंह की उँगली में पहना देने के बाद खंजर उठा लेने के लिए कहा। भैरोंसिंह ने तिलिस्मी खंजर उठा लिया और उस छोटे दरवाजे के अन्दर जाकर बोला, "मैं भैरोंसिंह स्वयं आ पहुँचा!"

    भैरोंसिंह के अन्दर जाते ही दरवाजा आप-से-आप बन्द हो गया और दोनों कुमार ताज्जुब से एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

    अठारहवाँ भाग

    1

    कह सकते हैं कि तारासिंह के हाथ में नानक का मुकदमा दे ही दिया गया। राजा वीरेन्द्रसिंह ने तारासिंह को इस काम पर मुकर्रर किया था कि वह नानक के घर जाय और उसकी चालचलन तथा उसके घर के सच्चे-सच्चे हाल की तहकीकात करके लौट आवे मगर इसके पहले कि तारासिंह नानक की चालचलन और उसकी नीयत का हाल जाने, उसने नानक के घर ही की तहकीकात शुरू कर दी और उसकी स्त्री का भेद जानने के लिए उद्योग किया। जब नानक की स्त्री सहज ही में तारासिंह के पास आ गई तो उसे उसकी बदचलनी का विश्वास हो गया और उसने चाहा कि किसी तरह नानक की स्त्री को टाल दे और इसके बाद नानक की नीयत का अन्दाजा करे मगर उसकी कार्रवाई में उस समय विघ्न पड़ गया जब नानक की स्त्री तारासिंह के सामने जा बैठी और उसी समय बाहर से किसी के चिल्लाने की आवाज आई।

    हम कह चुके हैं कि नानक के यहाँ एक मजदूरनी थी। वह नानक के काम की चाहे न हो मगर उसकी स्त्री के लिए उपयुक्त पात्र थी और उसके द्वारा नानक की स्त्री का सब काम चलता था। मगर इस तारासिंह वाले मामले में नानक की स्त्री श्यामा की बातचीत हनुमान छोकरे की मार्फत हुई थी, इसलिए बीच वाले मुनाफे की रकम में उस मजदूरनी के हाथ झंझी कौड़ी भी न लगी थी जिसका उसे बहुत रंज हुआ और वह दोस्ती के बदले में दुश्मनी करने पर उतारू हो गई। इसलिए कि श्यामारानी को उससे किसी तरह का पर्दा तो था ही नहीं, उसने मजदूरनी से अपना भेद तो सब कह दिया मगर उसके हानि-लाभ पर ध्यान न दिया। इसलिए वह मजदूरनी चुपचाप सब कार्रवाई देखती-सुनती और समझती रही, मगर जब श्यामारानी तारासिंह के यहाँ चली गई और कुछ देर बाद नानक घर में आया तो उसने अपना नाम प्रकट न करने का वादा कराके सब हाल नानक से कह दिया और तारासिंह का मकान दिखा देने के लिए भी तैयार हो गई क्योंकि उसे पता-ठिकाना तो मालूम हो ही चुका था।

    नानक ने जब सुना कि उसकी स्त्री किसी परदेशी के घर गई है, तब उसे बड़ा ही क्रोध आया और उसने ऐयारी के सामान से लैस होकर अकेले ही अपनी स्त्री का पीछा किया।

    नानक ने यद्यपि किसी कारण से लोकलाज को तिलांजलि दे दी थी मगर ऐयारी को नहीं। उसे अपनी ऐयारी पर बहुत भरोसा था और वह दस-पाँच आदमियों में अकेला घुस कर लड़ने की हिम्मत भी रखता था। यही सबब था कि उसने किसी संगी-साथी का खयाल न करके अकेले ही श्यामारानी का पीछा किया, हाँ यदि उसे यह मालूम होता कि श्यामारानी का उपपति तारासिंह है तो कदापि अकेला न जाता।

    नानक औरत के वेष में घर से बाहर निकला और जब उस मकान के पास पहुँचा जिसमें तारासिंह ने डेरा डाला था, तो कमन्द लगा कर मकान के ऊपर चढ़ गया और धीरे-धीरे उस कोठरी के पास जा पहुँचा जिसके अन्दर तारासिंह और श्यामारानी थी और बाहर तारासिंह का चेला और नानक का नौकर हनुमान हिफाजत कर रहा था। वहाँ पहुँचते ही उसने एक लात अपने नौकर की कमर में ऐसी जमाई कि वह तिलमिला गया और जब वह चिल्लाया तो उसे चिढ़ाने की नीयत से नानक स्वयं भी औरतों ही की तरह चिल्ला उठा।

    यही वह चिल्लाने की आवाज थी जिसे कोठरी के अन्दर बैठे हुए तारासिंह और श्यामा ने सुना था। चिल्लाने की आवाज सुनते ही तारासिंह उठ खड़ा हुआ और हाथ में खंजर लिए कोठरी के बाहर निकला। वहाँ अपने चेले और हनुमान के अतिरिक्त एक औरत को खड़ा देख वह ताज्जुब करने लगा और उसने औरत अर्थात् नानक से पूछा, "तू कौन है?"

    नानक––पहले तू ही बता कि तू कौन है जिसमें तुझे मार डालने के बाद यह तो मालूम रहे कि मैंने फलाने को मारा था।

    तारासिंह––तेरी ढिठाई पर मुझे ताज्जुब ही नहीं होता, बल्कि यह भी मालूम होता है कि तू औरत नहीं, कोई ऐयार है!

    नानक––(गम्भीरता के साथ) बेशक मैं ऐयार हूँ तभी तो अकेले तेरे घर में घुस आया हूँ! शैतान, तू नहीं जानता कि बुरे कर्मों का फल क्योंकर मिलता है और वह कितना बड़ा ऐयार है जिसकी स्त्री को तूने धोखा देकर बुला लिया है!

    तारासिंह––(जोर से हँस कर) अ ह ह ह! अब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि बेहया नानक तू ही है और शायद अपनी पतिव्रता की आमदनी गिनने के लिए यहाँ आ पहुँचा है। अच्छा तो अब तुझे यह भी जान लेना चाहिए कि जिसका तू मुकाबला कर रहा है उसका नाम तारासिंह है और वह राजा वीरेन्द्रसिंह की आज्ञानुसार तेरे चालचलन की तहकीकात करने आया है।

    तारासिंह और राजा वीरेन्द्रसिंह का नाम सुनते ही नानक सन्न हो गया। उधर उसकी स्त्री ने जब यह जाना कि इस कोठरी के बाहर उसका पति खड़ा है, तो वह नखरे से रोने और पीटने लगी तथा यह कहती हुई कोठरी के बाहर निकल कर नानक के पैरों पर गिर पड़ी कि मुझे तो तुम्हारा नाम लेकर हनुमान यहाँ ले आया है। नानक थोड़ी देर तक तो सन्नाटे में रहा, इसके बाद तारासिंह की तरफ देख के बोला।

    नानक––क्या ऐयारों का यही धर्म है कि दूसरों की औरतों को खराब करें और बदकारी का धब्बा अपने नाम के साथ लगावें!

    तारासिंह––नहीं-नहीं, ऐयारों का यह काम नहीं है, और ऐयारों को यह भी उचित नहीं है कि सब तरफ का खयाल छोड़ केवल औरत की कमाई पर गुजारा करें। मैंने तेरी औरत को किसी बुरी नीयत से नहीं बुलाया बल्कि चालचलन का हाल जानने के लिए ऐसा किया है। जो बातें तेरे बारे में सुनी गई हैं और जो कुछ यहाँ आने पर मैंने मालूम की हैं उनसे जाना जाता है कि तू बड़ा ही कमीना और नमकहराम है। नमकहराम इसलिए कि मालिक के काम की तुझे कुछ भी फिक्र नहीं है और इसका सबूत केवल मनोरमा ही बहुत है जिसके साथ तू शादी किया चाहता था और जिसने जूतियों से तेरी पूजा ही नहीं की बल्कि तिलिस्मी खंजर भी तुझसे ले लिया।

    नानक––यह कोई आवश्यक नहीं है कि ऐयारों का काम सदैव पूरा ही उतरा करे, कभी धोखा खाने में न आवे! यदि मनोरमा की ऐयारी मुझ पर चल गई तो इसके बदले में कमीना और नमकहराम कहे जाने लायक मैं नहीं हो सकता। क्या तुमने और तुम्हारे बाप ने कभी धोखा नहीं खाया? और मेरी स्त्री को जो तुम बदनाम कर रहे हो, वह तुम्हारी भूल है। वह तो खुद कह रही है कि 'मुझे तो तुम्हारा नाम लेकर हनुमान यहाँ ले आया है।' मेरी स्त्री बदकार नहीं है बल्कि वह साध्वी और सती है, असल में बदमाश तू है जो इस तरह धोखा देकर पराई स्त्री को अपने घर में बुलाता है और मुझे यहाँ पर अकेला जान कर गालियाँ देता है, नहीं तो मैं तुझसे किसी बात में कम नहीं हूँ।

    तारासिंह––नहीं-नहीं, तू बहुत बातों में मुझसे बढ़ के है, और मैं भी अकेला समझ तुझे गालियाँ नहीं देता बल्कि दोषी जान कर गालियाँ देता हूँ। तू अपनी स्त्री को साध्वी सती छोड़ के चाहे माता से भी बढ़ कर समझ ले, मेरी कोई हानि नहीं है। मैं वास्तव में जिस काम के लिए आया था उसे कर चुका, अब यहाँ से जाकर मालिक से सब कह दूँगा और तेरे गम्भीर स्वभाव की प्रशंसा भी करूँगा, जिसे सुनकर तेरा बाप बहुत ही प्रसन्न होगा जो अपनी एक भूल के कारण हद से ज्यादे पछता रहा है और बदनामी का टीका मिटाने के लिए जी-जान से उद्योग कर रहा है मगर तुझ कपूत के मारे कुछ भी करने नहीं पाता। (हँस कर) ऐसी कुलटा स्त्री को सती और साध्वी समझने वाला अपने को ऐयार कहे, यही आश्चर्य है।

    नानक––मेरे ऐयार होने में तुम्हें कुछ शक है?

    तारासिंह––कुछ? अजी, बिल्कुल शक है!

    नानक––यदि तुम ऐसा समझ भी लो तो इसमें मेरी कुछ हानि नहीं है, इससे ज्यादा तुम और कुछ भी नहीं कर सकते कि यहाँ से जाकर राजा वीरेन्द्रसिंह से मेरी झूठी शिकायतें करो मगर इस बात को भी समझ लो कि मैं किसी का ताबेदार नहीं हूँ।

    तारासिंह––(क्रोध से) तू किसी का ताबेदार नहीं है?

    तारासिंह को क्रोधित देखकर नानक डर गया, केवल इसलिए कि इस जगह वह अकेला था और अकेले ही इस मकान में तारासिंह का मुकाबला करना अपनी ताकत से बाहर समझता था जिसके दो चेले भी यहाँ मौजूद थे, अस्तु, समय पर ध्यान देकर वह चुप हो गया मगर दिल में वह तारासिंह का जानी दुश्मन हो गया। उसने मन में निश्चय कर लिया कि तारासिंह को किसी-न-किसी ढंग से अवश्य नीचा दिखाना बल्कि मार डालना चाहिए।

    नानक ने और भी न मालूम क्या सोचकर अपनी जुबान को रोका और सिर नीचा करके चुपचाप खड़ा रह गया। तारासिंह ने कहा, "बस, अब तू जा और अपनी सती-साध्वी स्त्री तथा नौकर को भी अपने साथ लेता जा!"

    नानक ने इस आज्ञा को गनीमत समझा और चुपचाप वहाँ से रवाना हो गया। उसकी स्त्री और नौकर भी उसके पीछे चल पड़े।

    उसी समय तारासिंह ने भी अपना डेरा कूच कर दिया और शहर के बाहर हो चुनार का रास्ता लिया, मगर दिल में सोच लिया कि कम्बख्त नानक अवश्य मेरा पीछा करेगा, बल्कि ताज्जुब नहीं कि धोखा देकर जान लेने की फिक्र भी करे।

    2

    संध्या होना ही चाहती है। पटने की बहुत बड़ी सराय के दरवाजे पर मुसाफिरों की भीड़ हो रही है। कई भटियारे भी मौजूद हैं जो तरह-तरह के आराम की लालच दे अपनी-अपनी तरफ मुसाफिरों को ले जाने का उद्योग कर रहे हैं, और मुसाफिर लोग भी अपनी-अपनी इच्छानुसार उनके साथ जाकर डेरा डाल रहे हैं। मुसाफिरों को भटियारी के सुपुर्द करके भटियारे पुनः सराय के फाटक पर लौट आते और नये मुसाफिरों को अपनी तरफ ले जाने का उद्योग करते हैं।

    यह सराय बहुत बड़ी और इसका फाटक मजबूत तथा बड़ा था। फाटक के दोनों तरफ (मगर दरवाजे के अन्दर) बारह सिपाही और एक जमादार का डेरा था जो इस सराय में रहने वाले मुसाफिरों की हिफाजत के लिए राजा की तरफ से मुकर्रर थे, उनकी तनखाह सराय के भटियारों से वसूल की जाती थी। ये ही सिपाही बारी-बारी से घूमकर सराय के अन्दर पहरा दिया करते थे और जब मुसाफिरों को किसी तरह की तकलीफ होती तो सीधे राजदीवान के पास जाकर रपट किया करते थे।

    थोड़ी देर बाद जब सब मुसाफिरों के टिकने का बन्दोबस्त हो गया और सराय के फाटक पर कुछ सन्नाटा हुआ तो उन सिपाहियों का जमादार अपनी जगह से उठकर सराय के अन्दर इसलिए घूमने लगा कि देखें सब मुसाफिरों का ठीक-ठीक बन्दोबस्त हो गया या नहीं। वह जमादार केवल घूमता ही न था, बल्कि भटियारों से भी तरह-तरह के सवाल करके मुसाफिरों का हाल दरियाफ्त करता जाता था।

    जमादार घूमता हुआ जब उत्तर की तरफ वाले उस कमरे के पास पहुँचा जो

    2

    संध्या होना ही चाहती है। पटने की बहुत बड़ी सराय के दरवाजे पर मुसाफिरों की भीड़ हो रही है। कई भटियारे भी मौजूद हैं जो तरह-तरह के आराम की लालच दे अपनी-अपनी तरफ मुसाफिरों को ले जाने का उद्योग कर रहे हैं, और मुसाफिर लोग भी अपनी-अपनी इच्छानुसार उनके साथ जाकर डेरा डाल रहे हैं। मुसाफिरों को भटियारी के सुपुर्द करके भटियारे पुनः सराय के फाटक पर लौट आते और नये मुसाफिरों को अपनी तरफ ले जाने का उद्योग करते हैं।

    यह सराय बहुत बड़ी और इसका फाटक मजबूत तथा बड़ा था। फाटक के दोनों तरफ (मगर दरवाजे के अन्दर) बारह सिपाही और एक जमादार का डेरा था जो इस सराय में रहने वाले मुसाफिरों की हिफाजत के लिए राजा की तरफ से मुकर्रर थे, उनकी तनखाह सराय के भटियारों से वसूल की जाती थी। ये ही सिपाही बारी-बारी से घूमकर सराय के अन्दर पहरा दिया करते थे और जब मुसाफिरों को किसी तरह की तकलीफ होती तो सीधे राजदीवान के पास जाकर रपट किया करते थे।

    थोड़ी देर बाद जब सब मुसाफिरों के टिकने का बन्दोबस्त हो गया और सराय के फाटक पर कुछ सन्नाटा हुआ तो उन सिपाहियों का जमादार अपनी जगह से उठकर सराय के अन्दर इसलिए घूमने लगा कि देखें सब मुसाफिरों का ठीक-ठीक बन्दोबस्त हो गया या नहीं। वह जमादार केवल घूमता ही न था, बल्कि भटियारों से भी तरह-तरह के सवाल करके मुसाफिरों का हाल दरियाफ्त करता जाता था।

    जमादार घूमता हुआ जब उत्तर की तरफ वाले उस कमरे के पास पहुँचा जो इस सराय में सबसे अच्छा, ऊँचा, दो-मंजिला और अमीरों के रहने लायक बना और सजा हुआ था तो कुछ देर के लिए अटक गया और उस कमरे तथा उसमें रहने वालों की तरफ ध्यान देकर देखने लगा, क्योंकि उसमें एक जौहरी का डेरा पड़ा हुआ था जो बहुत मालदार मालूम होता था। वह जवहरी भी जमादार को देखकर कमर के बाहर निकल आया और इशारे से जमादार को अपने पास बुलाया।

  • चन्द्रकांता सन्तति 4

    चन्द्रकांता सन्तति 4

    Aproximadamente 365.067 palavras.

    चन्द्रकांता सन्तति 4
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकांता_सन्तति_4

    तेरहवाँ भाग

    1

    अब हम अपने पाठकों का ध्यान जमानिया के तिलिस्म की तरफ फेरते हैं क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहाँ छोड़े बहुत दिन हो गये और अब बीच में उनका हाल लिखे बिना किस्से का सिलसिला ठीक नहीं होता।

    हम लिख आये हैं कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताब को पढ़कर समझने का भेद आनन्दसिंह को बताया और इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ से चिल्लाने की आवाज आई। दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और फिर यह आवाज सुनाई पड़ी, "अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले, मैं भी यही चाहती हूँ कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूँ। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी खबर कुछ भी न होगी!" इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन और बेताब हो गये और आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि 'कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है' मन्दिर के पीछे की तरफ लपके। आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले गये।

    जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह मन्दिर के पीछे की तरफ पहुँचे तो एक विचित्र वेषधारी मनुष्य पर उनकी निगाह पड़ी। उस आदमी की उम्र अस्सी वर्ष से कम न होगी। उसके सिर, मूँछ-दाढ़ी और भौं इत्यादि के तमाम बाल बर्फ की तरफ सफेद हो रहे थे मगर गर्दन और कमर पर बुढ़ापे ने अपना दखल जमाने से परहेज कर रक्खा था; अर्थात् न तो उसकी गर्दन हिलती थी और न कमर झुकी हुई थी। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ (बहुत कम) पड़ी हुई थीं मगर फिर भी उसका गोरा चेहरा रौनकदार और रौबीला दिखाई पड़ता था और दोनों तरफ के गालों पर अब भी सुर्खी मौजूद थी। एक नहीं बल्कि सारे ही अंगों की किसी-न-किसी हालत से वह अस्सी बरस का बुड्ढा जान पड़ता था परन्तु कमजोरी, पस्त हिम्मती, बुजदिली और आलस्य इत्यादि के धावे से अभी तक उसका शरीर बचा हुआ था।

    उसकी पोशाक राजों-महाराजों की पोशाकों की तरह बेशकीमती तो न थी मगर इस योग्य भी न थी कि उससे गरीबी और कमलियाकत जाहिर होती। रेशमी तथा मोटे कपड़े की पोशाक हर जगह से चुस्त और फौजी अफसरों के ढंग की मगर सादी थी। कमर में एक भुजाली, लगी हुई थी और बाएँ हाथ में सोने की एक बड़ी-सी डलिया या चँगेर लटकाए हुए था। जिस समय वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ देख कर हँसा, उस समय यह भी मालूम हो गया कि उसके मुँह में जवानों की तरह कुल दाँत अभी तक मौजूद हैं और मोती की तरह चमक रहे हैं।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को आशा थी कि वे इस जगह कमलिनी को नहीं तो किसी-न-किसी औरत को अवश्य देखेंगे, मगर आशा के विपरीत एक ऐसे आदमी को देख उन्हें बड़ा ही ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह ने वह तिलिस्मी खंजर, जो मन्दिर के नीचे वाले तहखाने में पाया था, आनन्दसिंह के हाथों में दे दिया और आगे बढ़कर उस आदमी से पूछा, "यहाँ से एक औरत के चिल्लाने की आवाज आई थी, वह कहाँ है?"

    बुड्ढा—(इधर-उधर देख के) यहाँ तो कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—अभी-अभी हम दोनों ने उसकी आवाज सुनी थी।

    बुड्ढा—बेशक सुनी होगी, मगर मैं ठीक कहता हूँ कि यहाँ पर कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर वह आवाज किसकी थी ?

    बुड्ढा—वह आवाज मेरी ही थी।

    आनन्दसिंह—(सिर हिला कर) कदापि नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह—मुझे इस बात का विश्वास नहीं हो सकता। आपकी आवाज वैसी नहीं है जैसी वह आवाज थी।

    बुड्ढा—जो मैं कहता हूँ उसे आप विश्वास करें या यह बतावें कि आपको मेरी बात का विश्वास क्योंकर होगा? क्या मैं फिर उसी तरह से बोलूँ?

    इन्द्रजीतसिंह—हाँ यदि ऐसा हो तो हम लोग आपकी बात मान सकते हैं।

    बुड्ढा—(उसी तरह से और वे ही शब्द अर्थात्—'अच्छा-अच्छा तू मेरा सिर काट ले'—इत्यादि बोल कर) देखिये वे ही शब्द और उसी ढंग की आवाज है या नहीं?

    आनन्दसिंह—(ताज्जुब से) बेशक वही शब्द और ठीक वैसी ही आवाज है।

    इन्द्रजीतसिंह—मगर इस ढंग से बोलने की आपको क्या आवश्यकता थी?

    बुड्ढा—मैं इस तिलिस्म में कल से चारों तरफ घूम-घूमकर आपको खोज रहा हूँ। सैकड़ों आवाजें दीं और बहुत उद्योग किया मगर आप लोगों से मुलाकात न हुई। तब मैंने सोचा कदाचित् आप लोगों ने यह सोच लिया हो कि इस तिलिस्म के कारखाने की आवाज का उत्तर देना उचित नहीं है और इसी से आप मेरी आवाज पर ध्यान नहीं देते। आखिर मैंने यह तरकीब निकाली और इस ढंग से बोला जिसमें सुनने के साथ ही आप बेताब हो जायँ और स्वयं ढूँढ़ कर मुझसे मिलें, और आखिर जो कुछ मैंने सोचा था वही हुआ।

    इन्द्रजीतसिंह—आप कौन हैं और मुझे यों बुला रहे थे? आनन्दसिंह—और इस तिलिस्म के अन्दर आप कैसे आए?

    बुड्ढा—मैं एक मामूली आदमी हूँ और आपका एक अदना गुलाम हूँ। इसी तिलिस्म में रहता हूँ और यही तिलिस्म मेरा घर है। आप लोग इस तिलिस्म में आए हैं तो मेरे घर में आए हैं अतएव आप लोगों की मेहमानी और खातिरदारी करना मेरा धर्म है इसीलिए मैं आप लोगों को ढूँढ़ रहा था।

    इन्द्रजीतसिंह—अगर आप इसी तिलिस्म में रहते हैं और यह तिलिस्म आपका घर है तो हम लोगों को आप दोस्ती की निगाह से नहीं देख सकते, क्योंकि हम लोग आपका घर अर्थात् यह तिलिस्म तोड़ने के लिए यहाँ आए हैं। और कोई आदमी किसी ऐसे की खातिर नहीं कर सकता जो उसका मकान तोड़ने आया हो, तब हम क्योंकर विश्वास कर सकते हैं कि आप हमें अच्छी निगाह से देखते होंगे या हमारे साथ दगा या फरेब न करेंगे?

    बुड्ढा—आपका खयाल बहुत ठीक है, ऐसे समय पर इन सब बातों को सोचना और विचार करना बुद्धिमानी का काम है, परन्तु इस बात का आप दोनों भाइयों को विश्वास करना ही होगा कि मैं आपका दोस्त हूँ। भला सोचिए तो सही कि मैं दुश्मनी करके आपका क्या बिगाड़ सकता हूँ? हाँ, आपकी मेहरबानी से अवश्य फायदा उठा सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—हमारी मेहरबानी से आपका क्या फायदा होगा और आप इस तिलिस्म के अन्दर हमारी क्या खातिर करेंगे? इसके अतिरिक्त यह भी बतलाइए कि क्या सबूत पाकर हम लोग आप को अपना दोस्त समझ लेंगे और आपकी बात पर विश्वास कर लेंगे?

    बुड्ढा—आपकी मेहरबानी से मुझे बहुत-कुछ फायदा हो सकता है। यदि आप चाहेंगे तो मेरे घर को अर्थात् इस तिलिस्म को बिल्कुल चौपट न करेंगे। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप इस तिलिस्म को न तोड़ें और इससे फायदा न उठाएँ, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि इस तिलिस्म को उतना ही तोड़िए जितने से आपको गहरा फायदा पहुँचे और कम फायदे के लिए व्यर्थ उन मजेदार चीजों को चौपट न कीजिए जिनके बनाने में बड़े-बड़े बुद्धिमानों ने वर्षों मेहनत की है और जिसका तमाशा देखकर बड़े-बड़े होशियारों की अक्ल भी चकरा सकती है। अगर इसका थोड़ा-सा हिस्सा आप छोड़ दें तो मेरा खेल-तमाशा बना रहेगा और इसके साथ ही साथ आपके दोस्त गोपालसिंह की इज्जत और नामवरी में भी फर्क न पड़ेगा और वह तिलिस्म के राजा कहलाने लायक बने रहेंगे। मैं इस तिलिस्म में आपकी खातिरदारी अच्छी तरह कर सकता हूँ तथा ऐसे-ऐसे तमाशे दिखा सकता हूँ जो आप तिलिस्म तोड़ने की ताकत रखने पर भी बिना मेरी मदद के नहीं देख सकते, हाँ उसका आनन्द लिए बिना उसको चौपट अवश्य कर सकते हैं। बाकी रही यह बात कि आप मुझ पर भरोसा किस तरह कर सकते हैं, इसका जवाब देना अवश्य ही जरा कठिन है।

    इन्द्रजीतसिंह—(कुछ सोचकर) तुम्हारी राजा गोपालसिंह से जान-पहचान है?

    बुड्ढा—अच्छी तरह जान-पहचान है बल्कि हम दोनों में मित्रता है। इन्द्रजीतसिंह—(सिर हिलाकर) यह बात तो मेरे जी में नहीं बैठती।

    बुड्ढा—सो क्यों?

    इन्द्रजीतसिंह—इसलिए कि एक तो यह तिलिस्म तुम्हारा घर है, कहो, हाँ।

    बुड्ढा—जी हाँ।

    इन्द्रजीतसिंह—जब यह तिलिस्म तुम्हारा घर है तो यहाँ का एक-एक कोना तुम्हारा देखा हुआ होगा, बल्कि आश्चर्य नहीं कि राजा गोपालसिंह की बनिस्बत इस तिलिस्म का हाल तुमको ज्यादा मालूम हो।

    बुड्ढा—जी हाँ, बेशक ऐसा ही है।

    इन्द्रजीतसिंह—(मुस्कुराकर) तिस पर राजा गोपालसिंह से तुम्हारी मित्रता है!

    बुड्ढा—अवश्य।

    इन्द्रजीतसिंह—तो तुमने इतने दिनों तक राजा गोपालसिंह को मायारानी के कैदखाने में क्यों सड़ने दिया? इसके जवाब में तुम यह नहीं कह सकते कि मुझे गोपाल सिंह के कैद होने का हाल मालूम न था, या मैं उस सींखचे वाली कोठरी तक नहीं जा सकता था जिसमें वे कैद थे।

    इन्द्रजीतसिंह के इस सवाल ने बुड्ढे को लाजवाब कर दिया और वह सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने समझ लिया कि यह झूठा है और हम लोगों को धोखा देना चाहता है। बहुत थोड़ी देर तक सोचने के बाद बुड्ढे ने सिर उठाया और मुस्कराकर कहा, "वास्तव में आप बड़े होशियार हैं, बातों की उलझन में भुलावा देकर मेरा हाल जानना चाहते हैं, मगर ऐसा नहीं हो सकता, हाँ, जब आप तिलिस्म तोड़ लेंगे तो मेरा परिचय भी आपको मिल जायगा, लेकिन यह बात झूठी नहीं हो सकती कि राजा गोपालसिंह मेरे दोस्त हैं और यह तिलिस्म मेरा घर है।"

    इन्द्रजीतसिंह—आप स्वयं अपने मुँह से झूठे बन रहे हैं, इसमें मेरा क्या कसूर है? यदि गोपालसिंह आपके दोस्त हैं तो आप मेरी बात का पूरा-पूरा जवाब देकर मेरा दिल क्यों नहीं भर देते हैं?

    बुड्ढा—नहीं, आपकी इस बात का जवाब मैं नहीं दे सकता कि गोपालसिंह को मैंने मायारानी के कैदखाने से क्यों नहीं छुड़ाया।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर मेरा दिल कैसे भरेगा और मैं कैसे आप पर विश्वास करूँगा?

    बुड्ढा—इसके लिए मैं दूसरा उपाय कर सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—चाहे कोई भी उपाय कीजिए, परन्तु इस बात का निश्चय होना चाहिए कि यह तिलिस्म आपका घर है और गोपालसिंह आपके मित्र हैं।

    बुड्ढा—आपको तो केवल इसी बात का विश्वास होना चाहिए कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ।

    आनन्दसिंह—नहीं-नहीं, हम लोग और किसी बात का सबूत नहीं चाहते, केवल ये दो बात आप साबित कर दें, जो भाईजी चाहते हैं।

    बुड्ढा—तो इस समय मेरा यहाँ आना व्यर्थ ही हुआ!(चंगेर की तरफ इशारा करके) देखिए आप लोगों के खाने के लिए मैं तरह-तरह की चीजें लेता आया था, मगर अब लौटा ले जाना पड़ा, क्योंकि जब आपको मुझ पर विश्वास ही नहीं है को कब स्वीकार करेंगे।

    इन्द्रजीतसिंह–बेशक, मैं इन चीजों को स्वीकार नहीं कर सकता, जब तक कि मुझे आपकी बातों का विश्वास न हो जाय ।

    आनन्दसिंह–(मुस्कुराकर) क्या आपके लड़के-बाले भी इसी तिलिस्म में रहते हैं ? ये सब चीजें आपके घर की बनी हुई हैं या बाजार से लाये हैं ?

    बुड्ढा–जी मेरे लड़के वाले नहीं हैं न मैं दुनियादार ही हूँ। यहाँ तक कि कोई नौकर भी मेरे पास नहीं है–ये चीजें तो बाहर से खरीद लाया हूँ।

    आनन्दसिंह–तो इससे यह भी जाना जाता है कि आप दिन-रात इस तिलिस्म में नहीं रहते, जब कभी खेल-तमाशा देखने की इच्छा होती होगी तो चले आते होंगे ।

    इन्द्रजीतसिंह–खैर, जो हो । हमें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं, हमारे सामने जब ये अपने सच्चे होने का सबूत लाकर रखेंगे, तब हम इनसे बातें करेंगे और इनके साथ चलकर इनका घर भी देखेंगे।

    इस बात का जवाब उस बुड्ढे ने कुछ न दिया और सिर झुकाये वहाँ से चला गया । इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी यह देखने के लिए कि वह कहां जाता है और क्या करता है, उसके पीछे चले। बुड्ढे ने घूमकर इन दोनों भाइयों को अपने पीछे-पीछे आते देखा, मगर इस बात की उसने कुछ परवाह न की और बराबर चलता गया ।

    हम पहले के किसी बयान में लिख आये हैं कि इस बाग में पश्चिम की तरफ की दीवार के पास एक कुआं था । वह बुड्ढा उसी कुएँ की तरफ चला गया और जब उसके पास पहुँचा तो बिना कुछ रुके एकदम उसके अन्दर कूद पड़ा, इन्द्रजीतसिंह और आनन्द-सिंह भी उस कुएँ के पास पहुँचे और झाँककर देखने लगे, मगर सिवाय अंधकार के और कुछ भी दिखाई न दिया।

    आनन्दसिंह–जब वह बुड्ढा बेधड़क इसके अन्दर कूद गया तो यह कुआँ जरूर किसी तरफ निकल जाने का रास्ता होगा !

    इन्द्रजीतसिंह–मैं भी यही समझता हूँ ।

    आनन्दसिंह–यदि कहिए तो मैं इसके अन्दर जाऊँ ?

    इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, ऐसा करना बड़ी नादानी होगी । तुम इस तिलिस्म का हाल कुछ भी नहीं जानते, हाँ, मैं इसके अन्दर बेखटके जा सकता हूँ क्योंकि तिलिस्मी किताब को पढ़ चुका हूँ और वह मुझे अच्छी तरह याद भी है, मगर मैं नहीं चाहता कि तुम्हें इस जगह अकेला छोड़कर जाऊँ।

    आनन्दसिंह–तो फिर अब क्या करना चाहिए?

    इन्द्रजीतसिंह–बस सबसे पहले तुम इस तिलिस्मी किताब को पढ़ जाओ और इस तरह याद कर जाओ कि पुन: इसके देखने की आवश्यकता न रहे, फिर जो कुछ करना होगा किया जायगा। इस समय इस बुड्ढे का पीछा करना हमें स्वीकार नहीं है।जहाँ तक मैं समझता हूं यह दगाबाज बुड्ढा खुद हम लोगों का पीछा करेगा और फिर हमारे पास आएगा, बल्कि ताज्जुब नहीं कि अबकी दफे कोई नया रंग लावे।

    आनन्दसिंह-जैसी आज्ञा, अच्छा तो वह किताब मुझे दीजिए, मैं भी पढ़ जाऊँ।

    दोनों भाई लौटकर फिर उसी मन्दिर के पास आए और आनन्दसिंह तिलिस्मी किताब को पढ़ने में लौलीन हुए।

    दोनों भाई चार दिन तक उसी बाग में रहे। इस बीच में उन्होंने न तो कोई कार्रवाई की और न कोई तमाशा देखा। हाँ, आनन्दसिंह ने उस किताब को अच्छी तरह पढ़ डाला और सब बातें दिल में बैठा लीं। वह खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब बहुत बड़ी न थी और उसके अन्त में यह बात लिखी हुई थी-

    "निःसन्देह तिलिस्म खोलने वाले का जेहन तेज होगा। उसे चाहिए कि इस किताब को पढ़कर अच्छी तरह याद कर ले क्योंकि इसके पढ़ने से ही मालूम हो जायगा कि यह तिलिस्म खोलने वाले के पास बची न रहेगी, किसी दूसरे काम में लग जायगी,ऐसी अवस्था में अगर इसके अन्दर लिखी हुई कोई बात भूल जायगी तो तिलिस्म खोलने वाले की जान पर आ बनेगी। जो आदमी इस किताब को आदि से अन्त तक याद न कर सके, वह तिलिस्म के काम में कदापि हाथ न लगावे, नहीं तो धोखा खायेगा।"

    तेरहवाँ भाग

    1

    अब हम अपने पाठकों का ध्यान जमानिया के तिलिस्म की तरफ फेरते हैं क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहाँ छोड़े बहुत दिन हो गये और अब बीच में उनका हाल लिखे बिना किस्से का सिलसिला ठीक नहीं होता।

    हम लिख आये हैं कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताब को पढ़कर समझने का भेद आनन्दसिंह को बताया और इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ से चिल्लाने की आवाज आई। दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और फिर यह आवाज सुनाई पड़ी, "अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले, मैं भी यही चाहती हूँ कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूँ। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी खबर कुछ भी न होगी!" इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन और बेताब हो गये और आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि 'कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है' मन्दिर के पीछे की तरफ लपके। आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले गये।

    जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह मन्दिर के पीछे की तरफ पहुँचे तो एक विचित्र वेषधारी मनुष्य पर उनकी निगाह पड़ी। उस आदमी की उम्र अस्सी वर्ष से कम न होगी। उसके सिर, मूँछ-दाढ़ी और भौं इत्यादि के तमाम बाल बर्फ की तरफ सफेद हो रहे थे मगर गर्दन और कमर पर बुढ़ापे ने अपना दखल जमाने से परहेज कर रक्खा था; अर्थात् न तो उसकी गर्दन हिलती थी और न कमर झुकी हुई थी। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ (बहुत कम) पड़ी हुई थीं मगर फिर भी उसका गोरा चेहरा रौनकदार और रौबीला दिखाई पड़ता था और दोनों तरफ के गालों पर अब भी सुर्खी मौजूद थी। एक नहीं बल्कि सारे ही अंगों की किसी-न-किसी हालत से वह अस्सी बरस का बुड्ढा जान पड़ता था परन्तु कमजोरी, पस्त हिम्मती, बुजदिली और आलस्य इत्यादि के धावे से अभी तक उसका शरीर बचा हुआ था।

    उसकी पोशाक राजों-महाराजों की पोशाकों की तरह बेशकीमती तो न थी मगर इस योग्य भी न थी कि उससे गरीबी और कमलियाकत जाहिर होती। रेशमी तथा मोटे कपड़े की पोशाक हर जगह से चुस्त और फौजी अफसरों के ढंग की मगर सादी थी। कमर में एक भुजाली, लगी हुई थी और बाएँ हाथ में सोने की एक बड़ी-सी डलिया या चँगेर लटकाए हुए था। जिस समय वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ देख कर हँसा, उस समय यह भी मालूम हो गया कि उसके मुँह में जवानों की तरह कुल दाँत अभी तक मौजूद हैं और मोती की तरह चमक रहे हैं।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को आशा थी कि वे इस जगह कमलिनी को नहीं तो किसी-न-किसी औरत को अवश्य देखेंगे, मगर आशा के विपरीत एक ऐसे आदमी को देख उन्हें बड़ा ही ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह ने वह तिलिस्मी खंजर, जो मन्दिर के नीचे वाले तहखाने में पाया था, आनन्दसिंह के हाथों में दे दिया और आगे बढ़कर उस आदमी से पूछा, "यहाँ से एक औरत के चिल्लाने की आवाज आई थी, वह कहाँ है?"

    बुड्ढा—(इधर-उधर देख के) यहाँ तो कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—अभी-अभी हम दोनों ने उसकी आवाज सुनी थी।

    बुड्ढा—बेशक सुनी होगी, मगर मैं ठीक कहता हूँ कि यहाँ पर कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर वह आवाज किसकी थी ?

    बुड्ढा—वह आवाज मेरी ही थी।

    आनन्दसिंह—(सिर हिला कर) कदापि नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह—मुझे इस बात का विश्वास नहीं हो सकता। आपकी आवाज वैसी नहीं है जैसी वह आवाज थी।

    बुड्ढा—जो मैं कहता हूँ उसे आप विश्वास करें या यह बतावें कि आपको मेरी बात का विश्वास क्योंकर होगा? क्या मैं फिर उसी तरह से बोलूँ?

    इन्द्रजीतसिंह—हाँ यदि ऐसा हो तो हम लोग आपकी बात मान सकते हैं।

    बुड्ढा—(उसी तरह से और वे ही शब्द अर्थात्—'अच्छा-अच्छा तू मेरा सिर काट ले'—इत्यादि बोल कर) देखिये वे ही शब्द और उसी ढंग की आवाज है या नहीं?

    आनन्दसिंह—(ताज्जुब से) बेशक वही शब्द और ठीक वैसी ही आवाज है।

    इन्द्रजीतसिंह—मगर इस ढंग से बोलने की आपको क्या आवश्यकता थी?

    बुड्ढा—मैं इस तिलिस्म में कल से चारों तरफ घूम-घूमकर आपको खोज रहा हूँ। सैकड़ों आवाजें दीं और बहुत उद्योग किया मगर आप लोगों से मुलाकात न हुई। तब मैंने सोचा कदाचित् आप लोगों ने यह सोच लिया हो कि इस तिलिस्म के कारखाने की आवाज का उत्तर देना उचित नहीं है और इसी से आप मेरी आवाज पर ध्यान नहीं देते। आखिर मैंने यह तरकीब निकाली और इस ढंग से बोला जिसमें सुनने के साथ ही आप बेताब हो जायँ और स्वयं ढूँढ़ कर मुझसे मिलें, और आखिर जो कुछ मैंने सोचा था वही हुआ।

    इन्द्रजीतसिंह—आप कौन हैं और मुझे यों बुला रहे थे? आनन्दसिंह—और इस तिलिस्म के अन्दर आप कैसे आए?

    बुड्ढा—मैं एक मामूली आदमी हूँ और आपका एक अदना गुलाम हूँ। इसी तिलिस्म में रहता हूँ और यही तिलिस्म मेरा घर है। आप लोग इस तिलिस्म में आए हैं तो मेरे घर में आए हैं अतएव आप लोगों की मेहमानी और खातिरदारी करना मेरा धर्म है इसीलिए मैं आप लोगों को ढूँढ़ रहा था।

    इन्द्रजीतसिंह—अगर आप इसी तिलिस्म में रहते हैं और यह तिलिस्म आपका घर है तो हम लोगों को आप दोस्ती की निगाह से नहीं देख सकते, क्योंकि हम लोग आपका घर अर्थात् यह तिलिस्म तोड़ने के लिए यहाँ आए हैं। और कोई आदमी किसी ऐसे की खातिर नहीं कर सकता जो उसका मकान तोड़ने आया हो, तब हम क्योंकर विश्वास कर सकते हैं कि आप हमें अच्छी निगाह से देखते होंगे या हमारे साथ दगा या फरेब न करेंगे?

    बुड्ढा—आपका खयाल बहुत ठीक है, ऐसे समय पर इन सब बातों को सोचना और विचार करना बुद्धिमानी का काम है, परन्तु इस बात का आप दोनों भाइयों को विश्वास करना ही होगा कि मैं आपका दोस्त हूँ। भला सोचिए तो सही कि मैं दुश्मनी करके आपका क्या बिगाड़ सकता हूँ? हाँ, आपकी मेहरबानी से अवश्य फायदा उठा सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—हमारी मेहरबानी से आपका क्या फायदा होगा और आप इस तिलिस्म के अन्दर हमारी क्या खातिर करेंगे? इसके अतिरिक्त यह भी बतलाइए कि क्या सबूत पाकर हम लोग आप को अपना दोस्त समझ लेंगे और आपकी बात पर विश्वास कर लेंगे?

    बुड्ढा—आपकी मेहरबानी से मुझे बहुत-कुछ फायदा हो सकता है। यदि आप चाहेंगे तो मेरे घर को अर्थात् इस तिलिस्म को बिल्कुल चौपट न करेंगे। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप इस तिलिस्म को न तोड़ें और इससे फायदा न उठाएँ, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि इस तिलिस्म को उतना ही तोड़िए जितने से आपको गहरा फायदा पहुँचे और कम फायदे के लिए व्यर्थ उन मजेदार चीजों को चौपट न कीजिए जिनके बनाने में बड़े-बड़े बुद्धिमानों ने वर्षों मेहनत की है और जिसका तमाशा देखकर बड़े-बड़े होशियारों की अक्ल भी चकरा सकती है। अगर इसका थोड़ा-सा हिस्सा आप छोड़ दें तो मेरा खेल-तमाशा बना रहेगा और इसके साथ ही साथ आपके दोस्त गोपालसिंह की इज्जत और नामवरी में भी फर्क न पड़ेगा और वह तिलिस्म के राजा कहलाने लायक बने रहेंगे। मैं इस तिलिस्म में आपकी खातिरदारी अच्छी तरह कर सकता हूँ तथा ऐसे-ऐसे तमाशे दिखा सकता हूँ जो आप तिलिस्म तोड़ने की ताकत रखने पर भी बिना मेरी मदद के नहीं देख सकते, हाँ उसका आनन्द लिए बिना उसको चौपट अवश्य कर सकते हैं। बाकी रही यह बात कि आप मुझ पर भरोसा किस तरह कर सकते हैं, इसका जवाब देना अवश्य ही जरा कठिन है।

    इन्द्रजीतसिंह—(कुछ सोचकर) तुम्हारी राजा गोपालसिंह से जान-पहचान है?

    बुड्ढा—अच्छी तरह जान-पहचान है बल्कि हम दोनों में मित्रता है। इन्द्रजीतसिंह—(सिर हिलाकर) यह बात तो मेरे जी में नहीं बैठती।

    बुड्ढा—सो क्यों?

    इन्द्रजीतसिंह—इसलिए कि एक तो यह तिलिस्म तुम्हारा घर है, कहो, हाँ।

    बुड्ढा—जी हाँ।

    इन्द्रजीतसिंह—जब यह तिलिस्म तुम्हारा घर है तो यहाँ का एक-एक कोना तुम्हारा देखा हुआ होगा, बल्कि आश्चर्य नहीं कि राजा गोपालसिंह की बनिस्बत इस तिलिस्म का हाल तुमको ज्यादा मालूम हो।

    बुड्ढा—जी हाँ, बेशक ऐसा ही है।

    इन्द्रजीतसिंह—(मुस्कुराकर) तिस पर राजा गोपालसिंह से तुम्हारी मित्रता है!

    बुड्ढा—अवश्य।

    इन्द्रजीतसिंह—तो तुमने इतने दिनों तक राजा गोपालसिंह को मायारानी के कैदखाने में क्यों सड़ने दिया? इसके जवाब में तुम यह नहीं कह सकते कि मुझे गोपाल सिंह के कैद होने का हाल मालूम न था, या मैं उस सींखचे वाली कोठरी तक नहीं जा सकता था जिसमें वे कैद थे।

    इन्द्रजीतसिंह के इस सवाल ने बुड्ढे को लाजवाब कर दिया और वह सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने समझ लिया कि यह झूठा है और हम लोगों को धोखा देना चाहता है। बहुत थोड़ी देर तक सोचने के बाद बुड्ढे ने सिर उठाया और मुस्कराकर कहा, "वास्तव में आप बड़े होशियार हैं, बातों की उलझन में भुलावा देकर मेरा हाल जानना चाहते हैं, मगर ऐसा नहीं हो सकता, हाँ, जब आप तिलिस्म तोड़ लेंगे तो मेरा परिचय भी आपको मिल जायगा, लेकिन यह बात झूठी नहीं हो सकती कि राजा गोपालसिंह मेरे दोस्त हैं और यह तिलिस्म मेरा घर है।"

    इन्द्रजीतसिंह—आप स्वयं अपने मुँह से झूठे बन रहे हैं, इसमें मेरा क्या कसूर है? यदि गोपालसिंह आपके दोस्त हैं तो आप मेरी बात का पूरा-पूरा जवाब देकर मेरा दिल क्यों नहीं भर देते हैं?

    बुड्ढा—नहीं, आपकी इस बात का जवाब मैं नहीं दे सकता कि गोपालसिंह को मैंने मायारानी के कैदखाने से क्यों नहीं छुड़ाया।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर मेरा दिल कैसे भरेगा और मैं कैसे आप पर विश्वास करूँगा?

    बुड्ढा—इसके लिए मैं दूसरा उपाय कर सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—चाहे कोई भी उपाय कीजिए, परन्तु इस बात का निश्चय होना चाहिए कि यह तिलिस्म आपका घर है और गोपालसिंह आपके मित्र हैं।

    बुड्ढा—आपको तो केवल इसी बात का विश्वास होना चाहिए कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ।

    आनन्दसिंह—नहीं-नहीं, हम लोग और किसी बात का सबूत नहीं चाहते, केवल ये दो बात आप साबित कर दें, जो भाईजी चाहते हैं।

    बुड्ढा—तो इस समय मेरा यहाँ आना व्यर्थ ही हुआ!(चंगेर की तरफ इशारा करके) देखिए आप लोगों के खाने के लिए मैं तरह-तरह की चीजें लेता आया था, मगर अब लौटा ले जाना पड़ा, क्योंकि जब आपको मुझ पर विश्वास ही नहीं है को कब स्वीकार करेंगे।

    इन्द्रजीतसिंह–बेशक, मैं इन चीजों को स्वीकार नहीं कर सकता, जब तक कि मुझे आपकी बातों का विश्वास न हो जाय ।

    आनन्दसिंह–(मुस्कुराकर) क्या आपके लड़के-बाले भी इसी तिलिस्म में रहते हैं ? ये सब चीजें आपके घर की बनी हुई हैं या बाजार से लाये हैं ?

    बुड्ढा–जी मेरे लड़के वाले नहीं हैं न मैं दुनियादार ही हूँ। यहाँ तक कि कोई नौकर भी मेरे पास नहीं है–ये चीजें तो बाहर से खरीद लाया हूँ।

    आनन्दसिंह–तो इससे यह भी जाना जाता है कि आप दिन-रात इस तिलिस्म में नहीं रहते, जब कभी खेल-तमाशा देखने की इच्छा होती होगी तो चले आते होंगे ।

    इन्द्रजीतसिंह–खैर, जो हो । हमें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं, हमारे सामने जब ये अपने सच्चे होने का सबूत लाकर रखेंगे, तब हम इनसे बातें करेंगे और इनके साथ चलकर इनका घर भी देखेंगे।

    इस बात का जवाब उस बुड्ढे ने कुछ न दिया और सिर झुकाये वहाँ से चला गया । इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी यह देखने के लिए कि वह कहां जाता है और क्या करता है, उसके पीछे चले। बुड्ढे ने घूमकर इन दोनों भाइयों को अपने पीछे-पीछे आते देखा, मगर इस बात की उसने कुछ परवाह न की और बराबर चलता गया ।

    हम पहले के किसी बयान में लिख आये हैं कि इस बाग में पश्चिम की तरफ की दीवार के पास एक कुआं था । वह बुड्ढा उसी कुएँ की तरफ चला गया और जब उसके पास पहुँचा तो बिना कुछ रुके एकदम उसके अन्दर कूद पड़ा, इन्द्रजीतसिंह और आनन्द-सिंह भी उस कुएँ के पास पहुँचे और झाँककर देखने लगे, मगर सिवाय अंधकार के और कुछ भी दिखाई न दिया।

    आनन्दसिंह–जब वह बुड्ढा बेधड़क इसके अन्दर कूद गया तो यह कुआँ जरूर किसी तरफ निकल जाने का रास्ता होगा !

    इन्द्रजीतसिंह–मैं भी यही समझता हूँ ।

    आनन्दसिंह–यदि कहिए तो मैं इसके अन्दर जाऊँ ?

    इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, ऐसा करना बड़ी नादानी होगी । तुम इस तिलिस्म का हाल कुछ भी नहीं जानते, हाँ, मैं इसके अन्दर बेखटके जा सकता हूँ क्योंकि तिलिस्मी किताब को पढ़ चुका हूँ और वह मुझे अच्छी तरह याद भी है, मगर मैं नहीं चाहता कि तुम्हें इस जगह अकेला छोड़कर जाऊँ।

    आनन्दसिंह–तो फिर अब क्या करना चाहिए?

    इन्द्रजीतसिंह–बस सबसे पहले तुम इस तिलिस्मी किताब को पढ़ जाओ और इस तरह याद कर जाओ कि पुन: इसके देखने की आवश्यकता न रहे, फिर जो कुछ करना होगा किया जायगा। इस समय इस बुड्ढे का पीछा करना हमें स्वीकार नहीं है।जहाँ तक मैं समझता हूं यह दगाबाज बुड्ढा खुद हम लोगों का पीछा करेगा और फिर हमारे पास आएगा, बल्कि ताज्जुब नहीं कि अबकी दफे कोई नया रंग लावे।

    आनन्दसिंह-जैसी आज्ञा, अच्छा तो वह किताब मुझे दीजिए, मैं भी पढ़ जाऊँ।

    दोनों भाई लौटकर फिर उसी मन्दिर के पास आए और आनन्दसिंह तिलिस्मी किताब को पढ़ने में लौलीन हुए।

    दोनों भाई चार दिन तक उसी बाग में रहे। इस बीच में उन्होंने न तो कोई कार्रवाई की और न कोई तमाशा देखा। हाँ, आनन्दसिंह ने उस किताब को अच्छी तरह पढ़ डाला और सब बातें दिल में बैठा लीं। वह खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब बहुत बड़ी न थी और उसके अन्त में यह बात लिखी हुई थी-

    "निःसन्देह तिलिस्म खोलने वाले का जेहन तेज होगा। उसे चाहिए कि इस किताब को पढ़कर अच्छी तरह याद कर ले क्योंकि इसके पढ़ने से ही मालूम हो जायगा कि यह तिलिस्म खोलने वाले के पास बची न रहेगी, किसी दूसरे काम में लग जायगी,ऐसी अवस्था में अगर इसके अन्दर लिखी हुई कोई बात भूल जायगी तो तिलिस्म खोलने वाले की जान पर आ बनेगी। जो आदमी इस किताब को आदि से अन्त तक याद न कर सके, वह तिलिस्म के काम में कदापि हाथ न लगावे, नहीं तो धोखा खायेगा।"

    2

    दिन लगभग पहर भर के चढ़ चुका है। दोनों कुमार स्नान-ध्यान-पूजा से छुट्टी पाकर तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाने के लिए जा ही रहे थे कि रास्ते में फिर उसी बुड्ढे से मुलाकात हुई। बुड्ढे ने झुककर दोनों कुमारों को सलाम किया और अपनी जेब में से एक चिट्ठी निकालकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथ में देकर बोला, "देखिए राजा गोपालसिंह के हाथ को सिफारिशी चिट्ठी ले आया हूँ, इसे पढ़कर तब कहिए कि मुझ पर भरोसा करने में अब आपको क्या उज्र है ?" कुमार ने चिट्ठी पढ़ी और आनन्दसिंह को दिखाने के बाद हँसकर उस बुड्ढे की तरफ देखा।

    बुड्ढा—(मुस्कुराकर) कहिए, अब आप क्या कहते हैं ? क्या इस पत्र को आप जाली या बनावटी समझते हैं ?

    इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, यह चिट्ठी जाली नहीं हो सकती, मगर देखो तो सही

    –इस (आनन्दसिंह के हाथ से चिट्ठी लेकर और चिट्ठी में लिखे हुए एक निशान को दिखाकर) इस निशान को तुम पहचानते हो या इसका मतलब तुम जानते हो?

    वुड्ढा—(निशान देखकर) इसका मतलव तो आप जानिए या गोपालसिंह जानें मुझे क्या मालूम,यदि आप बतलाइए तो…

    इन्द्रजीतसिंह–इसका मतलब यही है कि यह चिट्ठी बेशक सच्ची है, मगर इसमें लिखा है उस पर ध्यान न देना!

    बुड्ढा–क्या गोपालसिंह ने आपसे कहा था कि हमारी लिखी जिस चिट्ठी पर ऐसा निशान हो, उसकी लिखावट पर ध्यान न देना ?

    इन्द्रजीतसिंह–हाँ, मुझसे उन्होंने ऐसा ही कहा था, इसलिए जाना जाता है कि यह चिट्ठी उन्होंने अपनी इच्छा से नहीं लिखी, बल्कि जबर्दस्ती किये जाने के सबब से लिखी है।

    बुड्ढा–नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता, आप भूलते हैं, उन्होंने आपसे इस निशान के बारे में कोई दूसरी बात कही होगी।

    कुमार-नहीं-नहीं, मैं ऐसा भुलक्कड़ नहीं हूँ। अच्छा आप ही बताइये, यह निशान उन्होंने क्यों बनाया ?

    बुड्ढा–यह निशान उन्होंने इसलिए स्थिर किया है कि कोई ऐयार उनके दोस्तों को उनकी लिखावट का धोखा न दे सके। (कुछ सोचकर और हँसकर) मगर कुमार,तुम भी बड़े बुद्धिमान और मसखरे हो !

    कुमार–कहो, अब मैं तुम्हारी दाढ़ी नोंच लूं ?

    आनन्द्रसिंह–(हंसकर और ताली बजाकर) या मैं नोंच लूं ?

    बुड्ढा–(हँसते हुए) अब आप लोग तकलीफ न कीजिए मैं स्वयं इस दाढ़ी को नोंचकर अलग फेंक देता हूँ !

    'इतना कह उस बुड्ढे ने अपने चेहरे से दाढ़ी अलग कर दी और इन्द्रजीतसिंह के गले से लिपट गया।

    पाठक, यह बुड्ढा वास्तव में राजा गोपाल सिंह थे जो चाहते थे कि सूरत बदल-कर इस तिलिस्म में कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की मदद करें, मगर कुमार की चालाकियों ने उनकी हिम्मत लडने न दी और लाचार होकर उन्हें प्रकट होना ही पड़ा।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह-आनन्द सिंह दोनों भाई राजा गोपालसिंह से गले मिले और उनका हाथ पकड़े हुए नहर के किनारे गये जहाँ पत्थर की एक चट्टान पर बैठकर तीनों आदमी बातचीत करने लगे।

    3

    अब हम रोहतासगढ़ का हाल लिखते हैं। जिस समय बाहर यह खबर आई कि लक्ष्मीदेवी की तबीयत ठीक हो गई और वे सब पर्दे के पास आकर बैठ गईं उस समय राजा वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखा और कहा, "लक्ष्मीदेवी से पूछना चाहिए कि उसकी तबीयत यह कलमदान देखने के साथ ही क्यों खराब हो गई ?"

    इसके पहले कि तेजसिंह राजा वीरेन्द्रसिंह की बात का जवाब दें या उठने का इरादा करें, जिन्न ने कहा, "आश्चर्य है कि आप इसके लिए जल्दी करते हैं।"

    जिन्न की बात सुन राजा वीरेन्द्रसिंह मुस्कुराकर चुप हो रहे और भूतनाथ का कागज पढ़ने के लिए तेजसिंह को इशारा किया। आज भूतनाथ का मुकदमा फैसला होने वाला है इसलिए भूतनाथ और कमला का रंज और तरदुद तो वाजिब ही है मगर इस समय भूतनाथ से सौगुनी बुरी हालत बलभद्रसिंह की हो रही है। चाहे सभी का ध्यान उस कागज के मुछे की तरफ लगा हो जिसे अब तेजसिंह पढ़ना चाहते हैं मगर बलभद्र सिंह का खयाल किसी दूसरी तरफ है। उसके चेहरे पर बदहवासी और परेशानी छाई है और वह छिपी निगाहों से चारों तरफ इस तरह देख रहा है जैसे कोई मुजरिम निकल भागने के लिए रास्ता ढूंढ़ता हो, मगर भैरोंसिंह को मुस्तैदी के साथ अपने ऊपर तैनात पाकर सिर नीचा कर लेता है।

    हम यह लिख चुके हैं कि तेजसिंह पहले उन चिट्ठियों को पढ़ गये जिनका हाल हमारे पाठकों को मालूम हो चुका है, अब तेजसिंह ने उसके आगे वाला पत्र पढ़ना आरंभ किया जिसमें यह लिखा हुआ था-

    "मेरे प्यारे दोस्त,

    आज मैं बलभद्रसिंह की जान ले ही चुका था मगर दारोगा साहब ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया। मैंने सोचा था कि बलभद्रसिंह के खतम हो जाने पर लक्ष्मीदेवी की शादी रुक जायगी और उसके बदले में मुन्दर को भरती कर देने का अच्छा मौका मिलेगा मगर दारोगा साहब की यह राय न ठहरी। उन्होंने कहा कि गोपालसिंह को भी लक्ष्मी- देवी के साथ शादी करने की जिद हो गई है ऐसी अवस्था में यदि बलभद्रसिंह को तुम मार डालोगे तो राजा गोपालसिंह दूसरी जगह शादी करने के बदले कुछ दिन अटक जाना मुनासिब समझेंगे और शादी का दिन टल जाना अच्छा नहीं है, इससे यही उचित होगा कि बलभद्रसिंह को कुछ न कहा जाय, लक्ष्मीदेवी की माँ को मरे ग्यारह महीने हो ही चुके हैं, महीना-भर और बीत जाने दो, जो कुछ करना होगा शादी वाले दिन किया जायगा। शादी वाले दिन जो कुछ किया जायगा उसका बन्दोबस्त भी हो चुका है। उस दिन मौके पर लक्ष्मीदेवी गायब कर दी जायगी और उसकी जगह मुन्दर बैठा दी जायगी और उसके कुछ देर पहले ही बलभद्रसिंह ऐसी जगह पहुँचा दिया जायगा जहाँ से पुनः लौट आने की आशा नहीं है, बस, फिर किसी तरह का खटका न रहेगा। यह सब तो हुआ मगर आपने अभी तक फुटकर खर्च के लिए रुपए न भेजे। जिस तरह हो सके उस तरह बन्दोबस्त कीजिए और रुपए भेजिये, नहीं तो सब काम चौपट हो जायेगा, आगे आपको अख्तियार है।

    वही भूतनाथ"

    वीरेन्द्रसिंह–(भूतनाथ की तरफ देख के) क्यों भूतनाथ, यह चिट्ठी तुम्हारे हाथ की लिखी हुई है ?

    भूतनाथ–(हाथ जोड़कर) जी हाँ महाराज, यह कागज मेरे हाथ का लिखा हुआ है।

    वीरेन्द्रसिंह–तुमने यह पत्र हेलासिंह के पास भेजा था? भूतनाथ–जी नहीं।

    वीरेन्द्रसिंह–तुम अभी कह चुके हो कि यह पत्र मेरे हाथ का लिखा है और फिर कहते हो कि नहीं!

    भूतनाथ–जी मैं यह नहीं कहता कि यह कागज मेरे हाथ का लिखा हुआ नहीं है बल्कि मैं यह कहता हूँ कि यह पत्र हेलासिंह के पास मैंने नहीं भेजा था।

    वीरेन्द्रसिंह-तब किसने भेजा था?

    भूतनाथ–(बलभद्रसिंह की तरफ इशारा करके) इसने भेजा था और इसी ने अपना नाग भूतनाथ रक्खा था क्योंकि यह वास्तव में लक्ष्मीदेवी का बाप बलभद्रसिंह नहीं है।

    वीरेन्द्रसिंह–अगर यह चिट्ठी (बलभद्रसिंह की तरफ इशारा करके) इन्होंने हेलासिंह पास भेजी थी तो फिर तुमने इसे अपने हाथ से क्यों लिखा? क्या तुम इनके नौकर या मुहर्रिर थे ?

    भूतनाथ–जी नहीं, इसका कुछ दूसरा ही सबब है, मगर इसके पहले कि मैं आपकी बातों का पूरा-पूरा जवाब दूं, इस नकली बलभद्रसिंह से दो-चार बातें पूछने की आज्ञा चाहता हूँ।

    वीरेन्द्रसिंह–क्या हर्ज है, जो कुछ पूछना चाहते हो, पूछो।

    भूतनाथ—(बलभद्रसिंह की तरफ देख के) इस कागज के मुझे को तुम शुरू से आखिर तक पढ़ चुके हो या नहीं?

    बलभद्रसिंह–हाँ, पढ़ चुका हूँ।

    भूतनाथ–जो चिट्ठी अभी पढ़ी गई है इसके आगे वाली चिट्ठियाँ जो अभी पढ़ी नहीं गईं, तुम्हारे इस मुकदमे से कुछ सम्बन्ध रखती हैं?

    बलभद्र–नहीं।

    भूतनाथ–सो क्यों?

    बलभद्र–आगे की चिट्ठियों का मतलब हमारी समझ में नहीं आता।

    भूतनाथ–तो अब आगे वाली चिट्ठियों को पढ़ने की कोई आवश्यकता न रही।

    बलभद्र–तेरा कसूर साबित करने के लिए क्या इतनी चिट्ठियाँ कम हैं जो पढ़ी जा चुकी हैं?

    भूतनाथ–बहुत हैं बहुत हैं, अच्छा तो अब मैं यह पूछता हूँ कि लक्ष्मीदेवी के शादी के दिन तुम कैद कर लिए गए थे?

    बलभद्रसिंह–हाँ।

    भूतनाथ–उस समय बालासिंह कहाँ था और अब बालासिंह कहाँ है?

    भूतनाथ के इस सवाल ने बलभद्रसिंह की अवस्था फिर बदल दी। वह और भी घबराया-सा होकर वोला, "इन सब बातों के पूछने से क्या फायदा निकलेगा?" इतना कहकर उसने दारोगा और मायारानी की तरफ देखा। मालूम होता था कि बालासिंह के नाम ने मायारानी और दारोगा पर भी अपना असर किया जो मायारानी के बगल ही में एक खम्भे के साथ बँधा हुआ था। वीरेन्द्रसिंह और उनके बुद्धिमान ऐयारों ने भी बलभद्र और दारोगा तथा मायारानी के चेहरे और उन तीनों की इस देखा-देखी पर गौर किया और वीरेन्द्रसिंह ने मुस्कुराकर जिन्न की तरफ देखा।

    जिन्न–मैं समझता हूँ कि इस बलभद्रसिंह के साथ अब आपको बेमुरोवती करनी होगी।

    वीरेन्द्रसिंह–बेशक ! मगर क्या आप कह सकते हैं कि यह मुकदमा आज फैसला हो जायगा?

    जिन्न–नहीं, यह मुकदमा इस लायक नहीं है कि फैसला हो जाय। यदि आप इस मुकदमे की कलई अच्छी तरह खोलना चाहते हैं तो इस समय इसे रोक दीजिए और भूतनाथ को छोड़कर आज्ञा दीजिए कि महीने-भर के अन्दर जहाँ से हो सके वहाँ से असली बलभद्रसिंह को खोज लावे नहीं तो उसके लिए बेहतर न होगा।

    वीरेन्द्रसिंह–भूतनाथ को किसकी जमानत पर छोड़ दिया जाय?

    जिन्न–मेरी जमानत पर।

    वीरेन्द्रसिंह–जब आप ऐसा कहते हैं तो हमें कोई उज्र नहीं है यदि लक्ष्मीदेवी और लाड़िली तथा कमलिनी भी इसे स्वीकार करें।

    जिन्न–उन सब को भी कोई उज्र नहीं होना चाहिए।

    इतने में पर्दे के अन्दर से कमलिनी ने कहा, "हम लोगों को कोई उज्र न होगा, हमारे महाराज को अधिकार है जो चाहें करें !"

    वीरेन्द्रसिंह–(जिन्न की तरफ देख के) तो फिर कोई चिन्ता नहीं, हम आपकी बात मान सकते हैं। (भूतनाथ से) अच्छा तुम यह तो बताओ कि जब वह चिट्ठी तुम्हारे ही हाथ की लिखी हुई है तो तुम इसे हेलासिंह के पास भेजने से क्यों इनकार करते हो?

    भूतनाथ–इसका हाल भी उसी समय मालूम हो जायगा जब मैं असली बलभद्रसिंह को छुड़ाकर ले आऊँगा।

    जिन्न–आप इस समय इस मुकदमे को रोक ही दीजिए, जल्दी न कीजिए, क्योंकि इसमें अभी तरह-तरह के गुल खिलने वाले हैं।

    बलभद्र–नहीं-नहीं, भूतनाथ को छोड़ना उचित नहीं होगा, यह बड़ा भारी बेईमान जालियांँ धूर्त और बदमाश है। यदि इस समय यह छूटकर चल देगा, तो फिर कदापि न आवेगा।

    तेजसिंह–(घुड़ककर बलभद्र से) बस, चुप रहो, तुमसे इस बारे में राय नहीं मांगी जाती।

    बलभद्रसिंह–(खड़े होकर) तो फिर मैं जाता हूँ, जिस जगह ऐसा अन्याय हो वहाँ ठहरना भले आदमियों का काम नहीं।

    बलभद्रसिंह उठकर खड़ा हुआ ही था कि भैरोंसिंह ने उसकी कलाई पकड़ ली और कहा, "ठहरिये, आप भले आदमी हैं, आपको क्रोध न करना चाहिए, अगर ऐसा कीजिएगा तो भलमनसी में बट्टा लग जायगा। यदि आपको हम लोगों की सोहबत अच्छी नहीं मालूम पड़ती तो आप मायारानी और दारोगा की सोहबत में रक्खे जायेंगे, जिसमें आप खुश रहें हम लोग वही करेंगे।"

    भैरोंसिंह ने बलभद्रसिंह की कलाई पकड़ के कोई नस ऐसी दबाई कि वह बेताब हो गया, उसे ऐसा मालूम हुआ मानो उसके तमाम बदन की ताकत किसी ने खींच ली हो, और वह बिना कुछ बोले इस तरह बैठ गया जैसे कोई गिर पड़ता है। उसकी यह अवस्था देख सभी ने मुस्करा दिया।

    जिन्न–(वीरेन्द्रसिंह से) अब मैं आपसे और तेजसिंहजी से दो-चार बातें एकान्त में कहना चाहता हूँ।

    वीरेन्द्रसिंह–हमारी भी यही इच्छा है।

    इतना कहकर वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह देवीसिंह से कुछ इशारा करके उठ खड़े हुए और दूसरे कमर की ओर चले गये।

    राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और जिन्न आधे घण्टे तक एकान्त में बैठकर बातचीत करते रहे। सभी को जिन्न के विषय में जितना आश्चर्य था उतना ही इस बात का निश्चय भी हो गया था कि जिन्न का हाल राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और भैरोंसिंह को मालूम हो गया है परन्तु किसी से न कहेंगे और न कोई उनसे पूछ सकेगा।

    आधे घण्टे के बाद तीनों आदमी कमरे के बाहर निकलकर अपने-अपने ठिकाने आ पहुंचे और तेजसिंह ने देवीसिंह की तरफ देख के कहा, "भूतनाथ को छोड़ देने की आज्ञा हुई है। तुम भूतनाथ और जिन्न के साथ जाओ और हिफाजत के साथ पहाड़ के नीचे पहुँचाकर लौट आओ।"

    इतना सुनते ही देवीसिंह ने भूतनाथ की हथकड़ी-बेड़ी खोल दी और उसको तथा जिन्न को साथ लिये वहाँ से बाहर चले गये। इसके बाद तेजसिंह पर्दे के अन्दर गये और लक्ष्मीदेवी, कमलिनी तथा लाडिली को कुछ समझा-बुझाकर बाहर निकल आए। बलभद्र- सिंह को खातिरदारी और चौकसी के साथ हिफाजत में रखने के लिए भैरोंसिंह के हवाले किया गया होगा और बाकी कैदियों को कैदखाने में पहुँचाने की आज्ञा लेकर राजा वीरेन्द्रसिंह बाहर चले आए तथा अदालत बरखास्त कर दी गई।

    4

    जब जिन्न और भूतनाथ को पहाड़ के नीचे पहुँचाकर देवीसिंह चले गए तो वे दोनों आपस में नीचे लिखी बातें करते हुए पूरब की तरफ रवाना हुए–

    भूतनाथ–निःसन्देह आपने मुझ पर बड़ी कृपा की, यदि आज आप मेरे सहायक न होते तो मैं तबाह हो चुका था।

    जिन्न–सो सब तो ठीक है, मगर देखो, आज हमने तुमको अपनी जमानत पर इसलिए छुड़ा दिया है कि तुम जिस तरह हो, असली बलभद्रसिंह को खोज निकालो और उन्हें अपने साथ लेकर राजा वीरेन्द्रसिंह के पास हाजिर हो जाओ, लेकिन ऐसा न करना कि बलभद्रसिंह का पता लगाने के बदले तुम स्वयं अन्तर्धान हो जाओ और हमको राजा वीरेन्द्रसिंह के आगे झूठा करो।

    भूतनाथ–नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। यदि मुझे नेकनामी के साथ राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार बनने का शौक न होता तो मैं इन बखेड़ों में क्यों पड़ता ? बिना कुछ पाये उनका इतना काम क्यों करता? रुपये की मुझे कुछ परवाह न थी, मैं किसी दूसरे देश में चला जाता और खुशी के साथ जिन्दगी बिताता। मगर नहीं, मुझे राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ रहने का बड़ा उत्साह है और जिस दिन से राजा गोपालसिंह का पता लगा है, उसी दिन से मैं उनके दुश्मनों की खोज में लगा हूँ और बहुत सी बातों का पता लगा भी चुका हूँ।

    जिन्न–(बात काटकर)तो क्या तुमको इस बात की खबर न थी कि मायारानी ने गोपालसिंह को कैद करके किसी गुप्त स्थान में रख दिया है ?

    भूतनाथ–नहीं, बिल्कुल नहीं।

    जिन्न–और इस बात की भी खबर न थी कि मायारानी वास्तव में लक्ष्मीदेवी नहीं है ?

    भूतनाथ–इस बात को मैं अच्छी तरह जानता था।

    जिन्न–-तो तुमने गोपालसिंह के आदमियों को इसकी खबर क्यों नहीं की ?

    भूतनाथ–-मैंने इसलिए मायारानी का असल हाल किसी से नहीं कहा कि मुझे राजा गोपालसिंह के मरने का पूरा-पूरा विश्वास हो चुका था और उसके पहले मैं रणधीर- सिंहजी के यहाँ नौकर था, तब मुझे दूसरे राज्य के भले-बुरे कामों से मतलब ही क्या था?

    जिन्न–तुमसे और हेलासिंह से जब दोस्ती थी तब तुम किसके नौकर थे?

    भूतनाथ–-मुझसे और हेलासिंह से कभी दोस्ती थी ही नहीं ! मैं तो आपसे कंद- खाने के अन्दर ही कह चुका हूं कि राजा गोपालसिंह के छूटने के बाद मैंने उन कागजों का पता लगाया है जो इस समय मेरे ही साथ दुश्मनी कर रहे हैं और

    जिन्न–हाँ-हाँ, जो कुछ तुमने कहा था मुझे बखूबी याद है। अच्छा, अब यह बताओ कि इस समय तुम कहाँ जाओगे और क्या करोगे?

    भूतनाथ–मैं खुद नहीं जानता कि कहाँ जाऊँगा और क्या करूँगा, बल्कि यह बात मैं आप ही से पूछने वाला था।

    जिन्न–(ताज्जुब से) क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि बलभद्रसिंह को किसने कैद कैद किया और अब वह कहाँ है ?

    भूतनाथ-–इतना तो मैं जानता हूँ कि बलभद्रसिंह को मायारानी के दारोगा ने किया था मगर यह नहीं मालूम कि इस समय वह कहाँ है।

    जिन्न-–अगर ऐसा ही है तो कमलिनी के तिलिस्मी मकान के बाहर तुमने तेजसिंह से क्यों कहा था कि मेरे साथ कोई चले तो मैं असली बलभद्रसिंह को दिखा दूंगा? इस बात से तो तुम खुद झूठे साबित होते हो!

    भूतनाथ–जी हाँ, बेशक मैंने नादानी की जो ऐसा कहा, मगर मुझे इस बात का निश्चय हो चुका है कि बलभद्रसिंह अभी तक जीता है और उसे तिलिस्मी दारोगा ने

    च० स०-4-1

    कैद कर लिया था।

    जिन्न–इसी से तो मैं पूछता हूँ कि अब तुम कहाँ जाओगे और क्या करोगे?

    भूतनाथ–अगर वह दारोगा मेरे काबू में होता तब तो मैं सहज ही में पता लगा लेता मगर अब मुझे इसके लिए बहुत कुछ उद्योग करना होगा, तथापि इस समय मैं जमानिया में राजा गोपालसिंह के पास जाता हूँ, यदि उन्होंने मेरी मदद की तो अपना काम बहुत जल्द कर सकूँगा, मगर आशा नहीं कि वे मेरी मदद करेंगे, क्योंकि जब वे मेरे मुकदमे का हाल सुनेंगे तो जरूर मुझको नालायक बनायेंगे, (कुछ सोचकर) अभी तक यह भी मुझे मालूम नहीं हुआ कि आप कौन हैं, अगर जानता तो कहता कि राजा गोपालसिंह के नाम की आप एक चिट्ठी लिख दें।

    जिन्न–मेरा परिचय तुम्हें सिवाय इसके और कुछ नहीं मिल सकता कि मैं जिन्न हूँ और हर जगह पहुँचने की ताकत रखता हूँ। खैर, तुम राजा गोपालसिंह के पास जाओ और उनसे मदद मांगो, मैं तुम्हें एक सिफारिशी चिट्ठी देता हूँ, तुम्हारे पास कागज- कलम-दवात है ?

    भूतनाथ–जी हां, आपकी कृपा से मुझे मेरी ऐयारी का बटुआ मिल गया है और उसमें सव सामान मौजूद है।

    इतना कहकर भूतनाथ रुक गया और एक पेड़ के नीचे बैठने के लिए जिन्न को कहा मगर जिन्न ने ऐसा करने से इनकार किया और आगे की तरफ इशारा करके कहा, "उस पेड़ के नीचे चलकर हम ठहरेंगे क्योंकि वहाँ हमारा घोड़ा मौजूद है।"

    थोड़ी ही देर में दोनों आदमी उस पेड़ के नीचे जा पहुँचे। भूतनाथ ने देखा कि कसे-कसाए दो उम्दा घोड़े उस पेड़ की जड़ के साथ बागडोर के सहारे बँधे हैं और जिन्न ही की सूरत-शक्ल, चाल-ढाल का एक आदमी उनके पास टहल रहा है जो जिन्न के वहाँ पहुँचते ही सलाम करके एक किनारे खड़ा हो गया। जिन्न ने भूतनाथ से कलम-दवात और कागज लेकर कुछ लिखा और भूतनाथ को देकर कहा, "यह चिट्ठी राजा गोपालसिंह को देना, बस अब तुम जाओ।" इतना कहकर जिन्न एक घोड़े पर सवार हो गया, जिन्न ही की सूरत का दूसरा आदमी जो वहाँ मौजूद था, दूसरे घोड़े पर सवार हो गया और भूतनाथ के देखते-ही-देखते दूर जाकर वे दोनों उसकी नजरों से गायब हो गये। भूतनाथ तरदुद और परेशानी के सबब से उदास और सुस्त हो गया था, इसलिए थोड़ी देर तक आराम करने की नीयत से उसी पेड़ के नीचे बैठ जाने के बाद उस पत्र को पढ़ने लगा जो जिन्न ने राजा के लिए लिख दिया था मगर हजार कोशिश करने पर भी उससे वह चिट्ठी पढ़ी न गई क्योंकि सिवाय टेढ़ी-मेढ़ी और पेचीली लकीरों के किसी साफ अक्षर का उसके अन्दर भूतनाथ को पता ही न लगा।

    आधे घण्टे तक आराम करने के बाद भूतनाथ उठ खड़ा हुआ और 'लामा घाटी' की तरफ रवाना हुआ।

    5

    भूतनाथ अब बिल्कुल आजाद हो गया। इस समय उसकी ताकत उतनी ही है जितनी आज के दस दिन पहले थी और जितने आज के दस दिन पहले उसके ताबेदार थे उतने ही आज भी हैं। पाठक जानते ही हैं कि भूतनाथ अकेला है बल्कि बहुत से आदमी उसके नौकर भी हैं जो इधर-उधर घूम-फिरकर उसका काम किया करते हैं। भूतनाथ ने जब से नकली बलभद्रसिंह से यह सुना कि 'उसकी बहुत ही प्यारी चीज मेरे कब्जे में है जिसे वह लामा घाटी में छोड़ आया था' तब से वह और भी परेशान हो गया था। वह बहुत प्यारी चीज क्या थी ? बस, वही उसकी स्त्री जिसके पेट से नानक पैदा हुआ था और जिसे उसने नागर की मेहरबानी से पुनः पा लिया था। वास्तव में भूतनाथ अपनी प्यारी स्त्री को लामाघाटी में ही छोड़ आया था।

    भूतनाथ इस समय जमानिया जाने के बदले लामाघाटी ही की तरफ रवाना हुआ और तीसरे दिन संध्या के समय उस घाटी में जा पहुँचा जिसे वह अपना घर समझता था।

    यहाँ पर हम पाठकों के दिल में लामाघाटी की तस्वीर खींचकर भूतनाथ की ताकत और उसके स्वभाव या खयाल का कुछ अन्दाज करा देना मुनासिब समझते हैं। लामाघाटी में किसी अनजान आदमी का जाना बहुत कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। ध्यानशक्ति की सहायता से यदि आप वहाँ जायें तो सबके पहले एक छोटी-सी पहाड़ी मिलेगी जिस पर चढ़ने के एक बारीक पगडण्डी दिखाई देगी। जब उस पगडण्डी की राह से पहाड़ी के ऊपर चढ़ जायेंगे तो तीन तरफ मैदान और पश्चिम तरफ केवल आधा कोस की दूरी पर एक बहुत ऊँचा पहाड़ मिलेगा। उसके पास जाने पर मालूम होगा कि ऊपर चढ़ने के लिए कोई रास्ता या पगडण्डी नहीं है और न पहाड़ के दूसरी तरफ जाने का ही मौका है। परन्तु खोजने की कोई आवश्यकता नहीं, आप उस पहाड़ी के नीचे पहुंचकर दाहिनी तरफ घूम जाइये और जब तक एक छोटा-सा झरना आपको न मिले बराबर चले ही जाइये। वह दो-तीन हाथ चौड़ा झरना आपका रास्ता काट के बहता होगा, उसे लांघने की कोई आवश्यकता नहीं। आप बाईं तरफ आँख उठाकर देखेंगे तो बीस-पच्चीस हाथ की ऊंचाई पर एक छोटी-सी गुफा दिखाई देगी, आप बेधड़क उस गुफा में चले जाइये जिसके अन्दर बिल्कुल अँधेरा होगा और बनिस्बत बाहर के अन्दर गर्मी कुछ ज्यादा होगी। कोस भर तक बराबर उस गुफा के अन्दर-ही-अन्दर चलने के बाद जब आप बाहर निकलेंगे तो एक हरा-भरा छोटा-सा मैदान नजर आएगा। वह मैदान छोटे-छोटे जंगली फलों और लताओं से ऐसा भरा होगा कि दूर से देखने वालों को तो आनन्द मगर उसके अन्दर जाने वाले के लिए आफत समझिये। उसमें जाने वाला तीस-चालीस कदम मुश्किल से जाने के बाद इस तरह फंस जायगा कि निकलना कठिन होगा। उस मैदान के किनारे- किनारे दाहिनी तरफ और फिर बाईं तरफ घूम जाना होगा और जब आप बाहर पश्चिम

    1. 'लामा घाटी' एक पहाड़ी स्थान का नाम है। और उत्तर के कोने में पहुँचेंगे तो एक गुफा मिलेगी। आप उस गुफा के अंदर चले जाइये। लगभग दो-सौ कदम जाने के बाद जब आप बाहर निकलेंगे तो अनपढ़ और मोटे-मोटे पत्थर के ढोकों से बनी हुई दीवारें मिलेंगी जिसके बीचोबीच में एक बहुत बड़ा लकड़ी का दरवाजा लगा है। यदि दरवाजा खुला है तो आप दीवार के उस पार चले जाइये और एक पुरानी मगर बहुत बड़ी इमारत पर नजर डालिए। यद्यपि यह मकान बहुत पुराना है और कई जगह से टूट भी गया है तथापि जो कुछ बचा है बहुत मजबूत और पचासों बरसात सहने योग्य है, जिसमें अब भी कई बड़े-बड़े दालान और कोठरियां मौजूद हैं और उसी मकान या स्थान का नाम 'लामाघाटी' है। भूतनाथ के आदमी या नौकर-चाकर इसी मकान में रहते हैं और अपनी स्त्री को भी वह इसी जगह छोड़ गया था। उसके सिपाही जो बड़े ही दिमागदार, बहुत कट्टर और साथ ही इसके ईमानदार भी थे, गिनती में पचास से कम न थे और भूतनाथ के खजाने को हिफाजत बड़ी मुस्तैदी और नेकनीयती के साथ करते थे तथा बड़े-बड़े कठिन कामों को पूरा करने के लिए भूतनाथ की आज्ञा पाते ही मुस्तैद हो जाते थे। उस मकान के चारों तरफ बहुत बड़ा मैदान छोटे-छोटे जंगली खूब- सूरत पौधों से हरा-भरा बहुत ही खूबसूरत मालूम पड़ता था और उसके बाद भी चारों तरफ की पहाड़ियों के ऊपर जहाँ तक निगाह काम कर सकती थी छोटे-छोटे खूबसूरत पेड़- पौधे दिखाई पड़ते थे।

    भूतनाथ इसी लामाघाटी में पहुँचा। पहुँचने के साथ ही चारों तरफ से उसके आदमियों ने खुशी-खुशी उसे घेर लिया और कुशल-मंगल पूछने लगे। भूतनाथ सभी से हँसकर मिला और 'हाँ, सब ठीक है, मेरा आना जिस लिये हुआ उसका हाल जरा ठहरकर कहूँगा' इत्यादि कहता हुआ अपनी स्त्री के पास चला गया जो बहुत दिनों से उसे देखे बिना बेताव हो रही थी। हँसी-खुशी से मिलने के बाद दोनों में यों बातचीत होने लगी-

    स्त्री–तुम बहुत दुबले और उदास मालूम पड़ते हो!

    भूतनाथ–हाँ, इधर कई दिन मुसीबत ही में कटे हैं।

    स्त्री–(चौंककर) सो क्यों, कुशल तो है?

    भूतनाथ–कुशल क्या, जान बच गई यही गनीमत है।

    स्त्री–सो क्यों ? तुम्हारा भेद खुल गया?

    भूतनाथ–(ऊँची सांस लेकर) हां, कुछ खुल ही गया।

    स्त्री–(हाथ मलकर) हाय-हाय, यह तो बड़ा ही गजब हुआ!

    भूतनाथ–बेशक गजब हो गया।

    स्त्री–फिर तुम बचकर कैसे निकल आये?

    भूतनाथ–ईश्वर ने एक सहायक भेज दिया जिसने अपनी जमानत पर महीने भर के लिए मुझे छोड़ दिया।

    स्त्री–तो क्या महीने भर के बाद तुम्हें फिर हाजिर होना पड़ेगा?

    भूतनाथ–हाँ।

    स्त्री–किसके आगे ?

    भूतनाथ–राजा वीरेन्द्रसिंह के आगे। स्त्री–राजा वीरेन्द्रसिंह से क्या सरोकार ? तुमने उनका तो कभी कुछ बिगाड़ा नहीं था।

    भूतनाथ–इतनी ही तो कुशल है कि वह दूसरी जगह जाने के बदले सीधा लक्ष्मीदेवी के पास चला गया।

    स्त्री–(चौंककर) हैं, क्या लक्ष्मीदेवी जीती है?

    भूतनाथ–-हाँ जीती है। मुझे इस बात की खबर कुछ भी न थी कि कमलिनी के साथ जो तारा रहती है, वह वास्तव में लक्ष्मीदेवी है और बालासिंह को यह बात मालूम हो गई थी, इसलिए वह सीधा लक्ष्मीदेवी के पास चला गया। यदि मुझे पहले लक्ष्मीदेवी की खबर लग गई होती तो आज मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के आगे अपनी तारीफ सुनता होता।

    स्त्री–तुम तो कहते थे कि बालासिंह मर गया।

    भूतनाथ–-हाँ, मैं ऐसा जानता था।

    स्त्री–उसी ने तुम्हारी सन्दूकड़ी चुराई थी?

    भूतनाथ–-हाँ, जब सन्दूकड़ी उसने चुराई थी, तभी मैं अधमरा हो चुका था। मगर यह सुनकर कि वह मर गया मैं निश्चिन्त भी हो गया था, परन्तु जिस समय वह यकायक मेरे सामने आ खड़ा हुआ मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ। उसके हाथ में वह गठरी उसी कपड़े में बंधी उसी तरह लटक रही थी जैसी तुम्हारे सन्दुक से चोरी की गई थी और जिसे देखने के साथ ही मैं पहवान गया। ओफ, मैं नहीं कह सकता कि उस समय मेरी क्या हालत थी। मेरे होश-हवास दुरुस्त न थे और मैं अपने को जिन्दा नहीं समझता था। इस बात के दो-चार दिन पहले जब मैं राजा गोपालसिंह के साथ किशोरी और कामिनी को कमलिनी के मकान में पहुँचाने गया था तो उसी समय तारा पर मुझे शक हो गया मगर अपनी भलाई का कोई दूसरा ही रास्ता सोचकर मैं उस समय चुप रहा परन्तु जिस समय बालासिंह से यकायक मुलाकात हो गई और उसने उस गठरी की तरफ इशारा करके मुझसे कहा कि इसमें सुहागिन तारा की किस्मत बन्द है उसी समय मुझे विश्वास हो गया कि तारा वास्तय में लक्ष्मीदेवी है और वह कागज का मुट्ठा भी इसी ने चुरा लिया है जिसे मैंने बड़ी मेहनत से बटोरकर नकल करके रखा था। मैं उस समय बदहवास हो गया और अफसोस करने लगा कि जिन कागजों से मैं फायदा उठाने वाला था वही अब मुझे चौपट करेंगे क्योंकि वह उन्हीं कागजों से मुझी को दोषी ठहराने का उद्योग करेगा। यदि वह सन्दूकड़ी उसके पास न होती तो मैं हताश न होकर और कोई बन्दोबस्त करता परन्तु उस सन्दूकड़ी के खयाल ही से मैं पागल हो गया और उस समय तो मैं बिलकुल ही मुर्दा हो गया जब उसकी बेगम पर मेरी निगाह पड़ी।

    स्त्री–(चौंककर) क्या बेगम भी जीती है?

    भूतनाथ–हां, उस समय वह उसके साथथी और थोड़ी ही दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपी हुई थी।

    स्त्री–यह बड़ा ही अंधेर हुआ, अगर तुम्हें मालूम होता कि वह जीती है तो तुम अपना नाम भूतनाथ काहे को रखते ! भूतनाथ–नहीं, अगर मुझे उसके मरने में कुछ भी शक होता तो मैं अपना नाम भूतनाथ न रखता। केवल इतना ही नहीं, उसने तो मुझे उस समय एक ऐसी बात कही जिससे मेरी बची-बचाई जान भी निकल गई और मैं ऐसा कमजोर हो गया कि उसके साथ लड़ने योग्य भी न रहा।

    स्त्री–सो क्या?

    भूतनाथ–उसने तुम्हारी तरफ इशारा करके मुझसे कहा कि 'तुम्हारी बहुत ही प्यारी चीज मेरे कब्जे में है जो तुम्हारे बाद बड़ी तकलीफ में पड़ जायेगी और जिसे तुम लामाघाटी में छोड़ आये हो' और यही सबब है कि छूटने के साथ ही सबसे पहले मैं इस तरफ आया, मगर ईश्वर को धन्यवाद है कि तुम उस शैतान के हाथ से बची रहीं और तुम्हें मैं इस समय राजी-खुशी देख रहा हूँ।

    स्त्री–उसकी क्या मजाल कि यहाँ आ सके, उसे स्वप्न में भी यहाँ का रास्ता मालूम नहीं हो सकता।

    भूतनाथ–सो तो मैं समझता हूँ। परन्तु 'लामाघाटी' का नाम लेने से मुझे उसकी बात पर विश्वास हो गया, मैंने सोचा, यदि वह लामाघाटी तक न गया होता तो लामा- घाटी का नाम भी उसे मालूम न होता और..

    स्त्री–नहीं-नहीं, लामाघाटी का नाम किसी दूसरे सबब से उसे मालूम हुआ होगा।

    भूतनाथ-–बेशक ऐसा ही है, खैर तुम्हारी तरफ से तो मैं निश्चित हो गया मगर अब अपनी जान बचाने के लिए मुझे असली बलभद्रसिंह का पता लगाना चाहिए।

    स्त्री–अब तुम अपना खुलासा हाल उस दिन से कह जाओ जिस दिन से तुम मुझसे जुदा हुए हो।

    भूतनाथ ने अपना कुल हाल अपनी स्त्री को कह सुनाया और इसके बाद थोड़ी देर तक बातचीत करके बाहर निकल आया। एक दालान में जिसमें सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था और रोशनी बखूबी हो रही थी उसके सब संगी-साथी या सिपाही बैठे उसके आने की राह देख रहे थे। भूतनाथ के आते ही वे सब अदब के तौर पर उठ खड़े हुए तथा वैठने के बाद उसकी आज्ञा पाकर बैठ गये और बातचीत होने लगी।

    भूतनाथ–कहो, तुम लोग अच्छे तो हो?

    सब–जी,आपके अनुग्रह से हम लोग अच्छे हैं।

    भूतनाथ–ऐसा ही चाहिए।

    एक–आप इतने दुबले और उदास क्यों हो रहे हैं?

    भूतनाथ–मैं एक भारी आफत में फंस गया था बल्कि अभी भी उसमें फंसा ही हुआ हूँ।

    सब–सो क्या, सो क्या?

    भूतनाथ–मैं तुमसे सब-कुछ कहता हूँ क्योंकि तुम लोग मेरे खैरख्वाह हो और मुझे तुम लोगों का बहुत सहारा रहता है

    सब–हम लोग आपके ताबेदार हैं और एक अपने इशारे पर जान देने के लिए तैयार हैं, औरों की बात दूर, खास राजा वीरेन्द्रसिंह से भिड़ जाने की हिम्मत रखते हैं।

    भूतनाथ–बेशक ऐसा ही है और इसीलिए मैं कोई बात तुम लोगों से नहीं छिपाता।

    इतना कह कर भूतनाथ ने अपना हाल कहना आरम्भ किया। जो कुछ अपनी स्त्री से कह चुका था वह तथा और भी बहुत-सी बातें उसने उन लोगों से कहीं और इसके बाद कई बहादुरों को कई तरह के काम करने की आज्ञा दे फिर अपनी स्त्री के पास चला गया।

    दूसरे दिन सवेरे जब भूतनाथ बाहर आया तब मालूम हुआ कि उसके बहादुर सिपाहियों में से चालीस आदमी उसकी आज्ञानुसार 'लामाघाटी' के बाहर जा चुके हैं।

    भूतनाथ भी वहाँ से रवाना होने के लिए तैयार ही था और अपनी स्त्री से बिदा होकर बाहर निकला था, अस्तु वह भी एक आदमी को लेकर चल पड़ा और दो ही घण्टे बाद 'लामाघाटी' के बाहर मैदान में जमानिया की तरफ जाता हुआ दिखलाई देने लगा।

  • चन्द्रकांता सन्तति 3

    चन्द्रकांता सन्तति 3

    Aproximadamente 180.094 palavras.

    चन्द्रकांता सन्तति 3
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकांता_सन्तति_3

    चन्द्रकान्ता सन्तति

    नौवाँ भाग

    1

    अब वह मौका आ गया है कि हम अपने पाठकों को तिलिस्म के अन्दर ले चलें और वहाँ की सैर करावें, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा मायारानी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा विराजे हैं जिसे एक तरह तिलिस्म का दरवाजा कहना चाहिए। ऊपर के भाग में यह लिखा जा चुका है कि भैरोंसिंह को रोहतासगढ़ की तरफ और राजा गोपालसिंह और देवीसिंह को काशी की तरफ रवाना करने के बाद इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, तारासिंह, शेरसिंह और लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुँची और उसने राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार देवमन्दिर में, जिसका हाल आगे चलकर खुलेगा, डेरा डाला। हमने कमलिनी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह को दारोगा वाले मकान के पास के एक टीले पर ही पहुँचा कर छोड़ दिया था और यह नहीं लिखा कि वे लोग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में किस राह से पहुँचे या वह रास्ता किस प्रकार का था। खैर, हमारे पाठक महाशय ऐयारों के साथ कई दफा उस तिलिस्मी बाग में जायँगे इसलिए वहाँ के रास्ते का हाल उनसे छिपा न रह जायगा।

    तिलिस्मी बाग का चौथा दर्जा अद्भुत और भयानक रस का खजाना था। वहाँ का पूरा हाल तो तब मालूम होगा जब तिलिस्म बखूबी टूट जायगा मगर जाहिरा हाल जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों ने वहाँ पहुँचने के साथ ही देखा, हम इस जगह लिख देते हैं।

    उस हिस्से में फूल-फल और पत्तों की किस्म में से ऐसा कुछ विशेष न था जिससे हम उसे बाग कहते, हाँ चारों तरफ तरह-तरह की इमारतें जरूर बहुतायत से बनी हुई थीं जिनका हाल हम उस देवमन्दिर को मध्य मान कर लिखते हैं जिसमें इस समय हमारे दोनों कुमार और दोनों नेक दिल खैरख्वाह और मुहब्बत का नायाब नमूना दिखानेवाली नायिकाएँ तथा उनके साथी लोग विराज रहे हैं। जैसा कि नाम से समझा जाता है वह देवमन्दिर वास्तव में कोई मन्दिर या शिवालय नहीं था, वह केवल सुर्ख पत्थर का बना हुआ एक मकान था जिसमें दस हाथ की कुर्सी के ऊपर चालीस खम्भों का केवल एक अपूर्व कमरा था जिसके बीचोंबीच में दस हाथ के घेरे का एक गोल खम्भा था और उस पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। बस, इसके अतिरिक्त देवमन्दिर में और कोई बात न थी। उस देवमन्दिर वाले कमरे में जाने के लिए जाहिर में कोई रास्ता न था, इसके सिवाय एक बात यह और थी कि कमरा चारों तरफ से परदेनुमा ऊँची दीवारों से ऐसा घिरा हुआ था कि उसके अन्दर रहने वाले आदमियों को बाहर से कोई देख नहीं सकता था। उस देवमन्दिर के चारों तरफ थोड़ी-सी जमीन में बाग की पक्की क्यारियाँ बनी हुई थीं और उनमें तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे, मगर ये पेड़ भी सच्चे न थे, बल्कि एक प्रकार की धातु के बने थे और असली मालूम होने के लिए उन पर तरह-तरह के रंग चढ़े हुए थे, यदि इस खयाल से उसे हम बाग कहें तो हो सकता है और ताज्जुब नहीं कि इन्हीं पेड़ों की वजह से वह हिस्सा वाग के नाम से पुकारा भी जाता हो। उस नकली बाग में दो-दो आदमियों के बैठने लायक कई कुर्सियाँ भी जगह-जगह बनी हुई थीं।

    उन क्यारियों के चारों तरफ छोटी-छोटी कई कोठरियाँ और मकान भी बने थे जिनका अलग-अलग हाल लिखना इस समय आवश्यक नहीं, मगर उन चार मकानों का हाल लिखे बिना काम न चलेगा जो कि देवमन्दिर या यों कहिए कि इस नकली बाग के चारों तरफ एक-दूसरे के मुकाबले में बने हुए थे और जिन चारों ही मकानों के बगल में एक-एक कोठरी और कोठरी से थोड़ी दूर के फासले पर एक-एक कुआँ भी बना हुआ था।

    पूरब की तरफ वाले मकान के चारों तरफ पीतल की ऊँँची दीवार थी इसलिए उस मकान का केवल ऊपर वाला हिस्सा दिखाई देता था और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हाँ छत के ऊपर एक लोहे का पतला महराबदार खम्भ निकला हुआ जरूर दिखाई दे रहा था जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया हुआ था। उस मकान के चारों तरफ जो पीतल की दीवार थी उसी में एक बन्द दरवाजा भी दिखाई देता था जिसके दोनों तरफ पीतल के दो-दो आदमी हाथ में नंगी तलवारें लिए खड़े थे।

    पश्चिम तरफ वाले मकान के दरवाजे पर हड्डियों का एक बड़ा-सा ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी थी जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया था।

    उत्तर तरफ वाला मकान गोलाकार स्याह पत्थरों का बना हुआ था और उसके चारों तरफ चखियाँँ और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। इसी मकान के पास वाले कुएँ के अन्दर मायारानी अपने पति का काम तमाम करने के लिए गई थी।

    दक्खिन की तरफ वाले मकान के ऊपर चारों कोनों पर चार बुर्जियाँ थीं और उनके ऊपर लोहे का जाल पड़ा था। उन चारों बुर्जियों पर (जाल के अन्दर) चार मोर न मालूम किस चीज के बने हुए थे जो हर वक्त नाचा करते थे।

    आज उसी देवमन्दिर के कमरे में दोनों कुमार, कमलिनी, लाड़िली और ऐयार लोग बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। रिक्तगन्थ अर्थात् किसी के खून से लिखी हुई किताब कुँँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथों में है और वह बड़े प्रेम से उसकी जिल्द को देख रहे हैं, मगर अभी तक उस किताब को पढ़ने की नौबत नहीं आई है। कमलिनी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रजीतसिंह को देख रही है और उसी तरह लाड़िली भी छिपी निगाहें कुँँअर आनन्दसिंह पर डाल रही है।

    कमलिनी―(इन्द्रजीतसिंह से) अब आपको चाहिए कि जहाँ तक जल्द हो सके यह रिक्तगंथ पढ़ जायँ।

    इन्द्रजीतसिंह―हाँ, मैं भी यही चाहता हूँ, परन्तु पहले उन कामों से छुट्टी पा लेनी चाहिए जिनके लिए तेजसिंह चाचा को और ऐयारों को हम लोग यहाँ तक साथ लाए हैं।

    कमलिनी—मैं इन लोगों को केवल रास्ता दिखाने के लिए यहाँ तक लाई थी सो काम तो हो ही चुका, अब इन लोगों को यहाँ से जाना और कोई नया काम करना चाहिए और आपको भी रिक्तग्रंथ पढ़ने के बाद तिलिस्म तोड़ने में लग जाना चाहिए।

    इन्द्रजीतसिंह―राजा गोपालसिंह ने कहा था कि किशोरी और कामिनी को छुड़ा कर जब हम आ जायँ तब तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाना। इसके अतिरिक्त तेजसिंह चाचा से मुझे राजा गोपालसिंह के छुड़ाने का हाल सुनना भी बाकी है।

    तेजसिंह―उस बारे में कुछ हाल तो मैं आपसे कह भी चुका हूँ!

    आनन्दसिंह―जी हाँ, आप वहाँ तक कह चुके हैं जब (कमलिनी की तरफ देख कर) ये चंडूल की सूरत बनाकर आपके पास आई थीं, मगर हमें यह न मालूम हुआ कि इन्होंने हरनामसिंह, बिंहारीसिंह और मायारानी के कान में क्या कहा जिसे सुन सभी की अवस्था बदल गई थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, शायद इन्होंने राजा गोपालसिंह के ही बारे में कोई इशारा किया होगा।

    कमलिनी–जी हाँँ, यही बात है। राजा गोपालसिंह को कैद करने में हरनामसिंह और बिहारीसिंह ने भी मायारानी का साथ दिया था और धनपत इस काम की जड़ है।

    इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) धनपत इस काम की जड़ है!

    कमलिनी―जी हाँ, मैं बोलने में भूलती नहीं, धनपत वास्तव में औरत नहीं है बल्कि मर्द है। उसकी खूबसूरती ने मायारानी को फँसा लिया और उसी की मुहब्बत में पड़ कर उसने यह अनर्थ किया था। ईश्वर ने धनपत का चेहरा ऐसा बनाया है कि वह मुद्दत तक औरत बन कर रह सकता है। एक तो वह नाटा है। दूसरे अठारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी दाढ़ी-मूँँछ की निशानी नहीं आई। लेकिन जनानी सूरत होने पर भी उसमें ताकत बहुत है।

    इन्द्रजीतसिंह―(ताज्जुब से) यह तो एक नई बात तुमने सुनाई। अच्छा तब?

    लाड़िली―क्या धनपत मर्द है?

    कमलिनी―हाँ, और यह हाल मायारानी, बिहारीसिंह और हरनामसिंह के सिवाय और किसी को मालूम नहीं है। कुछ दिन बाद मुझे मालूम हो गया था, मगर आज के पहले यह हाल मैंने भी किसी से नहीं कहा था। इसी तरह राजा गोपालसिंह का हाल भी उन चारों के सिवाय और कोई नहीं जानता था और जब कोई पाँँचवाँँ आदमी उस भेद को जानेगा तो बेशक हम चारों की जान जायगी और यही सबब उस समय उन लोगों की बदहवासी का था जब मैंने चंडूल बन कर उन तीनों के कानों में पते की बात कही थी, मगर उस समय इसके साथ-साथ ही मैंने यह भी कह दिया था कि राजा गोपालसिंह का हाल हजारों आदमी जान गए हैं और राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में भी यह बात मशहूर हो गई है।

    आनन्दसिंह―ठीक है, मगर बिहारीसिंह ने मायारानी से यह हाल क्यों नहीं कहा?

    कमलिनी―इसका एक खास सबब है।

    इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?

    कमलिनी―बिहारी और हरनाम ने मायारानी के दो प्रेमी पात्रों का खून किया है जिसका हाल मायारानी को भी मालूम नहीं है, उसका भी इशारा मैंने उन दोनों के कानों में किया था।

    इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) तुम्हारी बहिन बड़ी ही शैतान है! मगर देखना चाहिए तुम कैसी निकलती हो, खून का साथ देती हो या नहीं!

    कमलिनी―(हाथ जोड़ कर) बस, माफ कीजिए, ऐसा कहना हम दोनों बहिनों (लाड़िली की तरफ इशारा करके) के लिए उचित नहीं! इसका एक सबब भी है।

    इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?

    कमलिनी—मेरे पिता की दो शादियाँँ हुई थीं। मैं और लाड़िली एक माँ के पेट से हुईं और कम्बख्त मायारानी दूसरी माँ के पेट से, इसलिए हम दोनों का खून उसके संग नहीं मिल सकता।

    इन्द्रजीतसिंह—(हँस कर) शुक्र है, खैर यह कहो कि चंडूल बनने के बाद तुमने क्या किया?

    कमलिनी―चंडूल बनने के बाद मैंने नानक को बाग के बाहर कर दिया और तेजसिंह जी को राजा गोपालसिंह के पास ले जाकर दोनों की मुलाकात कराई, इसके बाद वहाँँ रहने का स्थान, राजा गोपालसिंह के छुड़ाने की तरकीब, और फिर उन्हें साथ लेकर बाग के बाहर हो जाने का रास्ता बताकर मैं तेजसिंह जी से बिदा हुई और आप लोगों को कैद से छुड़ाने का उद्योग करने लगी। इसके बाद जो कुछ हुआ आप जान ही चुके हैं। हाँ, राजा गोपालसिंह को छुड़ाने के समय तेजसिंहजी ने क्या-क्या किया सो आप इन्हीं से पूछिए।

    अब पाठक समझ ही गये होंगे कि राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ाने वाले तेजसिंह थे और जब राजा गोपालसिंह को मारने के लिए मायारानी कैदखाने में गई थी तो तेजसिंह ही ने आवाज देकर उसे परेशान कर दिया था। दोनों कुमारों के पूछने पर तेजसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल बयान किया जिसे सुनकर कुमार बहुत प्रसन्न हुए।

    2

    ऐयारों को जो कुँँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ थे, बाग के चौथे दर्जे के देवमन्दिर में आने-जाने का रास्ता बताकर कमलिनी ने तेजसिंह को रोहतासगढ़ जाने के लिए कहा और बाकी ऐयारों को अलग-अलग काम सुपुर्द करके दूसरी तरफ बिदा किया।

    इस बाग के चौथे दर्जे की इमारत का हाल हम ऊपर लिख आए हैं और यह भी लिख आये हैं कि वहाँ असली फूल-पत्तों का नाम-निशान भी न था। यहाँ की ऐसी अवस्था देखकर कुँँअर इन्द्रजीतसिंह ने कमलिनी से पूछा, “राजा गोपालसिंह ने कहा था कि ‘चौथे दर्जे में मेवे बहुतायत से हैं खाने-पीने की तकलीफ न होगी’, मगर यहाँ तो कुछ भी दिखाई नहीं देता! हम लोगों को यहाँ कई दिनों तक रहना होगा, कैसे काम चलेगा?” इसके जवाब में कमलिनी ने कहा, “आपका कहना ठीक है और राजा गोपालसिंह ने भी गलत नहीं कहा। यहाँ मेवों के पेड़ नहीं हैं मगर (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोड़ी-सी जमीन मजबूत चहारदीवारी से घिरी हुई है जिसे आप मेवों का बाग कह सकते हैं। उसको कोई सींचता या दुरुस्त नहीं करता है, बाहर से एक नहर दीवार तोड़ कर उसके अन्दर पहुँँचाई गई है और उसी की तरावट से वह बाग सूखने नहीं पाता। कई पेड़ पुराने होकर मर जाते है और कई नये पैदा होते रहते हैं। इस तिलिस्मी बाग का राजा दस-पन्द्रह वर्ष पीछे कभी उसकी सफाई करा दिया करता है। मैं वहाँ जाने का रास्ता आपको बता दूँँगी!”

    ऐयारों को बिदा करने के बाद ही कमलिनी भी लाड़िली को लेकर दोनों कुमारों से यह कह कर बिदा हुई—“कई जरूरी कामों को पूरा करने के लिए मैं जाती हूँ, परसों यहाँ आऊँगी।”

    तीन दिन तक कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह देवमन्दिर में रहे। जब आवश्यकता होती मेवों वाले बाग में चले जाते और पेट भर कर फिर उस देवमन्दिर में चले आते। इस बीच में दोनों भाइयों ने मिल कर 'रिक्तगंथ' (खून से लिखी किताब) भी पढ़ डाली, मगर रिक्तगंथ में जो भी बातें लिखी थीं, वे सब-की-सब बखूबी समझ में न आई क्योंकि उसमें बहुत से शब्द इशारे के तौर पर लिखे थे जिनका भेद जाने बिना असल बात का पता लगाना बहुत ही कठिन था, तथापि तिलिस्म के कई भेदों और रास्तों का पता उन दोनों को मालूम हो गया और बाकी के विषय में निश्चय किया कि कमलिनी से मुलाकात होने पर उन शब्दों का अर्थ पूछेंगे जिनके जाने बिना कोई काम नहीं चलता।

    यद्यपि कुँअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी के लिए और आनन्दसिंह कामिनी के लिए बेचैन हो रहे थे, मगर कमलिनी और लाड़िली की भोली सूरत के साथ-साथ उनके अहसानों ने भी दोनों कुमारों के दिलों को पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था फिर भी किशोरी और कामिनी की मुहब्बत के खयाल से दोनों कुमार अपने दिलों को कोशिश के साथ दबाए जाते थे।

    दोनों कुमारों को देवमन्दिर में टिके हुए आज तीसरा दिन है। ओढ़ने और बिछाने का कोई सामान न होने पर भी उन दोनों को किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे से होती और वहाँ के खुशबूदार फूलों से बसी हुई मन्द चलने वाली हवा ने नर्म थपकियाँ लगा-लगाकर दोनों नौजवान, सुन्दर और सुकुमार कुमारों को सुला दिया है। ताज्जुब नहीं कि दिन-रात ध्यान बने रहने के कारण दोनों कुमार इस समय स्वप्न में भी अपनी-अपनी माशूकाओं से लाड़-प्यार की बातें कर रहे हों, और उन्हें इस बात का गुमान भी न हो कि पलक उठते ही रंग बदल जायगा और नर्म कलाइयों का आनन्द लेने वाला हाथ सिर तक पहुँचने का उद्योग करेगा।

    यकायक घड़घड़ाहट की आवाज ने दोनों को जगा दिया। वे चौंक कर उठ बैठे और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। ज्यादा ध्यान देने पर भी यह निश्चय न हो सका कि आवाज किस चीज की है, हाँ, इतनी बात मालूम हो गई कि देवमन्दिर के पूरब तरफ वाले मकान के अन्दर से यह आवाज आ रही है। दोनों राजकुमारों को देवमन्दिर से नीचे उतर कर उस मकान के पास जाना उचित न मालूम न हुआ, इसलिए वे देवमन्दिर की छत पर चढ़ गये और गौर से उस तरफ देखने लगे।

    आधे घंटे तक वह आवाज एक रंग से बराबर आती रही और इसके बाद धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गई। उस समय दरवाजा खोलकर अन्दर से आता हुआ एक आदमी उन्हें दिखाई पड़ा। वह आदमी धीरे-धीरे देवमन्दिर के पास आया और थोड़ी देर तक खड़ा रहकर उस कुएँ की तरफ लौटा जो पूरव की तरफ वाले मकान के साथ और उससे थोड़ी ही दूर पर था। कुएँ के पास पहुँचकर थोड़ी देर तक वहाँ भी खड़ा रहा और फिर आगे बढ़ा, यहाँ तक कि घूमता-फिरता छोटे-छोटे मकानों की आड़ में जाकर वह न जाने कहाँ नज़रों से ओझल हो गया और इसके थोड़ी ही देर बाद उस तरफ एक कमसिन औरत के रोने की आवाज आई।

    इन्द्रजीतसिंह―जिस तौर से यह आदमी इस चौथे दर्जे में आया है, वह बेशक ताज्जुब की बात है।

    आनन्दसिंह―तिस पर इस रोने की आवाज ने और भी ताज्जुब में डाल दिया है। मुझे आज्ञा हो तो जाकर देखूँँ कि क्या मामला है?

    इन्द्रजीतसिंह―जाने में कोई हर्ज नहीं है, मगर…खैर, तुम इसी जगह ठहरो, मैं जाता हूँ।

    आनन्दसिंह―यदि ऐसा ही है तो चलिये हम दोनों आदमी चलें।

    इन्द्रजीतसिंह―नहीं, एक आदमी का यहाँ रहना बहुत जरूरी है। खैर, तुम ही जाओ, कोई हर्ज नहीं, मगर तलवार लेते जाओ।

    दोनों भाई छत के नीचे उतर आये। आनन्दसिंह ने खूँँटी से लटकती हुई अपनी तलवार ले ली और कमरे के बीचोंबीच वाले गोल खम्भे के पास पहुँँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि उस खम्भे में तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। आनन्दसिंह ने एक मूरत पर हाथ रख कर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। छोटे कुमार उसी खिड़की की राह उस गोल खम्भे के अन्दर घुस गये, और थोड़ी ही देर बाद उस नकली बाग में दिखाई देने लगे। खम्भे के अन्दर रास्ता कैसा था और वह नकली बाग के पास क्योंकर पहुँँचे, इसका हाल आगे चलकर दूसरी दफे किसी और के आने या जाने के समय बयान करेंगे, यहाँ मुख्तसिर ही में लिखकर मतलब पूरा करते हैं।

    आनन्दसिंह भी उस तरफ गये, जिधर वह आदमी गया था या जिधर से किसी औरत के रोने की आवाज आई थी। घूमते-फिरते एक छोटे मकान के आगे पहुँँचे जिस का दरवाजा खुला हुआ था। वहाँ औरत तो कोई दिखाई न दी, मगर उस आदमी को दरवाजे पर खड़े हुए जरूर पाया।

    आनन्दसिंह को देखते ही वह आदमी झट मकान के अन्दर घुस गया और कुमार भी तेजी के साथ उसका पीछा किए बेखौफ मकान के अन्दर चले गये। वह मकान दो मंजिल का था, उसके अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियाँ थीं और हर एक कोठरी में दो-दो दरवाजे थे, जिससे आदमी एक कोठरी के अन्दर जाकर कुल कोठरियों की सैर कर सकता था।

    यद्यपि कुमार तेजी के साथ पीछा किए हुए चले गये, मगर वह आदमी एक कोठरी के अन्दर जाने के बाद कई कोठरियों में घूम-फिर कर कहीं गायब हो गया। रात का समय था और मकान के अन्दर तथा कोठरियों में बिल्कुल अन्धकार छाया हुआ था, ऐसी अवस्था में कोठरियों के अन्दर घूम-घूम कर उस आदमी का पता लगाना बहुत ही मुश्किल था, दूसरे, इसका भी शक था कि वह कहीं हमारा दुश्मन न हो, लाचार होकर कुमार वहाँ से लौटे, मगर मकान के बाहर न निकल सके, क्योंकि वह दरवाजा बन्द हो गया था जिसकी राह से कुमार मकान अन्दर घुसे थे। कुमार ने दरवाजा उतारने का भी उद्योग किया मगर उसकी मजबूती के आगे कुछ बस न चला। आखिर दुखी होकर फिर मकान के अन्दर घुसे और एक कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये। थोड़ी देर के बाद ऊपर की छत पर से फिर किसी औरत के रोने की आवाज आई, गौर करने से कुमार को मालूम हुआ कि यह बेशक उसी औरत की आवाज है जिसे सुनकर यहाँ तक आए थे। उस आवाज की सीध पर कुमार ने ऊपर की दूसरी मंजिल पर जाने का इरादा किया, मगर सीढ़ियों का पता न लगा।

    इस समय कुमार का दिल कैसा बेचैन था, यह वही जानते होंगे। हमारे पाठकों में भी जो दिलेर और बहादुर होंगे, वह उनके दिल की हालत कुछ समझ सकेंगे। बेचारे आनन्दसिंह हर तरह से उद्योग करके रह गए, पर कुछ भी न बन पड़ा। न तो वे उस आदमी का पता लगा सकते थे, जिसके पीछे-पीछे मकान के अन्दर घुसे थे, न उस औरत का हाल मालूम कर सकते थे, जिसके रोने की आवाज से दिल बेताब हो रहा था, और न उस मकान ही से बाहर होकर अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को इन सब बातों की खबर कर सकते थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि सिवाय चुपचाप खड़े रहने या बैठ

    जाने के और कुछ भी नहीं कर सकते थे।

    जो कुछ रात थी खड़े-खड़े बीत गई। सुबह की सुफेदी ने जिधर से रास्ता पाया मकान के अन्दर घुसकर उजाला कर दिया, जिससे कुंअर आनन्दसिंह को वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यकायक पीछे की तरफ से दरवाजा खुलने की आवाज कुमार के कान में पड़ी। कुमार ने घूमकर देखा तो एक कोठरी का दरवाजा, जो इसके पहले बन्द था, खुला हुआ पाया। वे बेधड़क उसके अन्दर घुस गए और वहां ऊपर की तरफ गई हुई छोटी-छोटी खूबसूरत सीढ़ियाँ देखीं। धडधडाते हए दूसरी मंजिल पर चढ़ गए और हर तरफ गौर करके देखने लगे। इस मंजिल में बारह कोठरियाँ एक ही रंग-ढंग की देखने में आईं। हर एक कोठरी में दो दरवाजे थे। एक दरवाजा कोठरी के अन्दर घुसने के लिए और दूसरा अन्दर की तरफ से दूसरी कोठरी में जाने के लिए था। इस तरह पर किसी एक कोठरी के अन्दर घुसकर कुल कोठरियों में आदमी घूम आ सकता था। धीरे-धीरे अच्छी तरह उजाला हो गया और वहां की हर एक चीज बखूबी देखने का मौका कुमार को मिला। छोटे कुमार एक कोठरी के अन्दर घुसे और देखा कि वहां सिवाय एक चबूतरे के और कुछ भी नहीं है। यह चबूतरा स्याह पत्थर का बना हआ था और उसके ऊपर एक कमान और पाँच तीर रखे हए थे। कूमार ने तीर और कमान पर हाथ रखा, मालूम हुआ कि सब पत्थर का बना हआ है और किसी काम में आने योग्य नहीं है। दूसरे दरवाजे से दूसरी कोठरी में घुसे तो वहाँ एक लाश पड़ी देखी जिसका कटा हुआ सिर पास ही पड़ा हुआ था और वह लाश भी पत्थर ही की थी। उसे अच्छी तरह देखभाल कर तीसरी कोठरी में पहुँचे।

    इसके चारों तरफ दीवार में कई खूटियाँ थीं और हर एक खंटी से एक-एक नंगी तलवार लटक रही थी। ये तलवारें नकली न थीं, बल्कि असली लोहे की थीं मगर हर एक पर जंग चढा हआ था। जब चौथा कोठरी में पहुंचे तो वहाँ चाँदी के सिंहासन पर बैठी हई एक मूरत दिखाई पड़ी। वह मूरत किसी प्रकार की धातु की बहुत ही खूबसूरत और ठीक-ठीक बनी हई थी, जिसे देखने के साथ ही कुमार ने पहचान लिया कि यह मायारानी की छोटी बहन लाडिला का मूरत है। कुमार मुहब्बत भरी निगाहें उस मूरत पर डालने लगे। निराली जगह अपन माशूक को देखने का उन्हें अच्छा मौका मिला, यदापि वर माशक असली नहीं, बल्कि कवल उसका एक छवि मात्र थी तथापि इस सबब से कि यहां पर कोई ऐसा आदमी न था जिसका लिहाज या खयाल होता, उन्हें एक निराले ढंग की खुशी हुई और वे देर तक उसक हर एक अंग की खूबसूरती को देखते रहे। इसी बीच बगल वाली कोठरी में से यकायक एक, एक खटके की आवाज आई। कुमार चौंकपड़े और यह सोचते हुए उस कोठारी का तरफ बढ़े कि शायद वर आदमी उसमें मिले जिसके पीछे-पीछे इस मकान के अन्दर आए हैं, मगर इस कोठरी में भी किसी की सूरत दिखाई न दी।

    इस कोठरी में, जिसमें कुमार पहुँचे हैं, चाँदी का का केवल एक सन्दूक था, जिसके बीच में हाथ डालने के लायक एक छेद भी बना हुआ था हुआ था और छेद के ऊपर सुनहले हर्को में यह लिखा हुआ था-

    "इस छेद में हाथ डाल के देखो, क्या अनूठी चीज है।"

    कुँवर आनन्दसिंह ने बिना सोचे-विचारे उस छेद में हाथ डाल दिया, मगर फिर हा निकाल न सके। सन्दूक के अन्दर हाथ जाते ही मानो लोहे की हथकड़ी पड़ गई जो किसी तरह हाथ बाहर निकालने की इजाजत नहीं देती थी। कुमार ने झक कर सन्दूक नीचे की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि सन्दूक जमीन से अलग नहीं है और इसलिए उसे किसी तरह खिसका भी नहीं सकते थे।

    3

    कुँवर आनन्दसिंह के जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह देर तक उनके आने की राह देखते रहे। जैसे-जैसे देर होती थी, जी बेचैन होता जाता था। यहाँ तक कि तमाम बीत गई, सवेरा हो गया, और पूरब तरफ से सूर्य भगवान दर्शन देकर धीरे-धीरे आसमान पर चढ़ने लगे। जब पहर भर से ज्यादा दिन चढ़ गया, तब इन्द्रजीतसिंह नदी बेताब हुए और उन्हें निश्चय हो गया कि आनन्दसिंह जरूर किसी आफत में फंस गये।

    कुँवर इन्द्रजीतसिंह सोच ही रहे थे कि स्वयं चल के आनन्दसिंह का पता लगाना कि इतने ही में लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी वहाँ आ पहुँची। इन्हें देख की बेचैनी कुछ कम हुई और आशा की सूरत दिखाई देने लगी। कमलिनी ने जब कुमार को उस जगह अकेले और उदास देखा तो उसे ताज्जुब हुआ, मगर वह बुध्दिमान औरत तुरत ही समझ गई कि इनके छोटे भाई आनन्दसिंह इनके साथ नहीं दिखाई देते जरूर वे किसी मुसीबत में पड़ गए हैं, और ऐसा होना कोई ताज्जुब की बात क्योंकि यह तिलिस्म का मौका है, और यहाँ का रहने वाला थोड़ी भूल में तकलीफ उठा सकता है।

    कमलिनी ने कुँवर इन्द्रजीतसिंह से उदासी का कारण और कुंअर आनन्दसिंह के का सबब पूछा, जिसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ हुआ था, बयान करके कहा कि "आनन्द को गए हुए नौ घंटे के लगभग हो गये।"

    समय कोई लाड़िली की सूरत गौर से देखता तो बेशक समझ जाता कि आनन्दसिंह का हाल सुनकर उसको हद से ज्यादा रंज हुआ है। ताज्जुब नहीं कि कम और इन्द्रजीतसिंह भी उसके दिल की हालत जान गये हों, क्योंकि वह अपनी आंखों को डबडबाने और आंसू के निकलने को बड़े परिश्रमपूर्वक रोक रही थी। यद्यपि उसे निश्चय था कि दोनों कुमार इस तिलिस्म को अवश्य तोड़ेंगे, तथापि उसका दिल दख गया था। कौन ऐसा है जो अपने प्यारे पर आई हुई मुसीबत का हाल सुनकर बेचैन न हो?

    कमलिनी-(सब बातें सुनकर) किसी का आना ताज्जुब नहीं है, हाँ, किसी

    औरत का आना बेशक ताज्जुब है, क्योंकि (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप कहते हैं कि एक औरत के रोने की आवाज आई थी।

    लाड़ली-ठीक है, जहाँ तक मैं समझती हूँ सिवाय तुम्हारे, मायारानी के और मेरे किसी चौथी औरत को यहां आने का रास्ता मालूम नहीं है, हाँ, मर्दो में कई जरूर ऐसे हैं, जो यहाँ आ सकते हैं।

    कमलिनी-मगर इस देवमन्दिर के अन्दर हम लोगों के अतिरिक्त राजा गोपालसिंह के सिवाय और कोई भी नहीं आ सकता। खैर, इन सब बातों को जाने दो, अब यहाँ से चलकर कुँवर साहब का पता लगाना बहुत जरूरी है। यद्यपि यहाँ किसी दुश्मन का आना बहुत कठिन है, तथापि खुटका लगा ही रहता है। जब दोनों कुमारों को मायारानी के कैदखाने से छुड़ाकर हम लोग सुरंग ही सुरंग तिलिस्मी बाग से बाहर हो रहे थे, तो उस हरामजादे के आ पहुँचने की कौन उम्मीद थी, जिसने कुमार को जख्मी किया था! इसी तरह कौन ठिकाना यहाँ भी कोई दुष्ट आ पहुँचा हो!

    आखिर कुँवर आनन्दसिंह को खोजने के लिए तीनों वहाँ से रवाना हुए और देवमन्दिर के नीचे उतर उसी तरफ चले जिधर आनन्दसिंह गये थे। जब एक मकान के दरवाजे पर पहुँचे तो कमलिनी रुकी और बड़े गौर से उस दरवाजे को जो बन्द था, देखने लगी। इसके बाद फिर आगे बढ़ी, दूसरे मकान के दरवाजे पर पहुँच कर उसे भी गौर से देखा और सिर हिलाती हुई फिर आगे बढ़ी। इसी तरह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और लाड़िली को साथ लिए हए, कमलिनी सात-आठ मकानों के दरवाजे पर गई। हर एक मकान का दरवाजा बन्द था और हर एक दरवाजे को कमलिनी ने गौर से देखा लेकिन कुछ काम न चला, मगर जब उस मकान के दरवाजे पर पहुँची, जिसमें कुँवर आनन्दसिंह गये थे तो रुककर मामूली तौर पर उसके दरवाजे को भी बड़े गौर से देखने लगी और थोड़ी ही देर में बोल उठी, "वेशक कुँवर आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं। (उँगली से दरवाजे के ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) देखिये, यह स्याह पत्थर की तीन खूटियाँ नीचे की तरफ झुक गई हैं।"

    कुमार-इन खूटियों से क्या मतलब है?

    कमलिनी-इस मकान के अन्दर जितने आदमी जायेंगे, उतनी खूटियाँ नीचे की तरफ झुक जायँगी।

    कुमार-(ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) ऊपर कुल बारह खूटियाँ हैं, मान लिया जाय कि बारहों खंटियाँ उस समय झुक जायेंगी, जब बारह आदमी इस मकान के अन्दर जा पहुँचेंगे, मगर जब बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जायेंगे, तब क्या होगा?

    कमलिनी-बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जा ही नहीं सकते! तिलिस्मी बातों में किसी की जबर्दस्ती नहीं चल सकती।

    कुमार-ठीक है, मगर तुमने यह कैसे जाना कि आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं?

    कमलिनी–सिर्फ अन्दाज से समझती हूँ कि आनन्दसिंह इसी मकान में होंगे,

    क्योंकि इस बाग में एक आदमी का का आना आपने बयान किया था, इसके बाद कहा था किसी औरत के रोने की आवाज आई थी, दो हो तो चुके, तीसरे आनन्दसिंह भी पीछा किये हुए इधर ही आये हैं और इस तरह इस मकान के अन्दर तीन आदमियों का होना साबित होता है। इन्हीं सब बातों से मुझे विश्वास होता है कि वे ही तीन आदमी इस मकान के अन्दर हैं।

    कुमार—तुम्हारा सोचना बहुत ठीक है, मगर जहाँ तक जल्द हो सके, इस बात का निश्चय करके आनन्द को छुड़ाना चाहिए, न मालूम वह किस आफत में फंस गया है।

    कमलिनी–देखिये, मैं बहुत जल्द इसका बन्दोबस्त करती हूँ।

    इसके बाद कमलिनी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "इस मकान का दरवाजा खोलना तो जरा मुश्किल है, मगर चौखट के ऊपर जो बारह खूटियाँ हैं उनमें से तीन नीचे की तरफ झुक गई हैं, और बाकी नौ ऊपर की तरफ उठी हुई हैं, उनमें से किसी एक को आप उछल कर थाम लीजिए और जोर करके नीचे की तरफ झुकाइए, देखिये, क्या होता है।" कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछल कर एक खूटी को थाम लिया और झटका देकर उसे नीचे की तरफ झुकाया तथा जब वह नीचे को झुक गई तो उसे छोड़कर अलग हो गये। यकायक मकान के अन्दर से इस तरह की आवाज आने लगी, जैसे बड़े-बड़े कल पुर्जे और चरखे घूमते हों, या कई गाड़ियाँ मकान के अन्दर दौड़ रही हों। तीनों आदमी दरवाजे से हटकर खड़े हो गये और राह देखने लगे कि अब क्या होता है।

    थोड़ी ही देर बाद मकान की छत पर से एक आवाज आई-"इधर देखो" जिसे सुनते ही तीनों आदमी चौंके और ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी, जो अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था, छत से नीचे की तरफ झाँकता हुआ दिखाई दिया। उसने कमलिनी, लाड़िली और कुँवर इन्द्रजीतसिंह को अपनी तरफ देखते देख एक लपेटा हुआ कागज नीचे गिरा दिया, जिसे झट कमलिनी ने उठा लिया और बढ़कर कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "बस अब जिस तरह हो सके आप इस खूटी को, जिसे झुकाया है, ज्यों-की-त्यों सीधी कर दीजिए।"

    इन्द्रजीतसिंह-आखिर इसका क्या सबब है? इस पुर्जे में क्या लिखा हुआ है?

    कमलिनी-पहले आप उसे कीजिए, जो मैं कह चुकी हूँ। देर करने में हमारा ही हर्ज होगा।

    लाचार कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछलकर नीचे की तरफ से एक झटका ऐसा दिया कि वह खूटी सीधी हो गई और इसके साथ ही मकान के अन्दर सन्नाटा छा गया, अर्थात् वह जोर-शोर की आवाज, जो खूटी झुकने के साथ ही आने लगी थी, एकदम बन्द हो गई। इसके बाद कमलिनी ने वह कागज का पुर्जा जो मकान की छत पर से गिराया गया था, कुमार के हाथ में दे दिया। कुमार ने उसे देखा, यह लिखा हुआ था-

    1

    2

    3

    4

    5

    6

    एच

    मेमचे

    काटनो

    केआरेयाँ

    डेह

    नेपो

    7

    8

    9

    10

    11

    12

    किमटू

    च्वाला

    मेम

    कुम

    नीपो

    इच्चो

    13

    लव

    14

    कचीचा

    15

    टेप

    इस चिट्ठी का मतलब तो कुमार तुरत समझ गए, क्योंकि यह ऐयारी भाषा में लिखी हुई थी और कुमार ऐयारी भाषा बखूबी जानते थे, मगर यह उनकी समझ में न आया कि चिट्ठी लिखने वाला कौन है, क्योंकि उसने अपना नाम टेप लिखा था। कुमार ने कमलिनी से 'टेप' का अर्थ पूछा, जिसके जवाब में उसने कहा, "थोड़ी देर सब्र कीजिए, आप-से-आप उस आदमी का पता लग जायगा।" कुमार चुप हो रहे और दरवाजे की तरफ देखने लगे। हमारे पाठक महाशय ऐयारी भाषा शायद न जानते होंगे, अस्तु उन्हें समझाने के लिए उस चिट्ठी का अर्थ हम नीच लिखे देते हैं––

    1

    2

    3

    4

    5

    6

    यहाँ

    मैं हूँ

    डरो मत

    कुमार को

    तकलीफ

    न होगी

    7

    8

    9

    10

    11

    12

    थोड़ी देर

    सब्र करो

    मैं

    स्वयं

    नीचे

    आता हूँ

    13

    वही

    14

    दिलजला

    15

    टेप

    4

    मायारानी आज यह विचार कर बहुत खुश है कि आधी रात के समय कमलिनी इस बाग में आयेगी और मैं उसे अवश्य गिरफ्तार करूँगी, मगर इस बात को जानने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा कि उसके सोने वाले कमरे में रात को कौन आया था। वह चारों तरफ खयाल दौड़ाती थी, मगर कुछ समझ में न आता था और आखिर दिल में यही कहती थी कि आने वाला चाहे कोई हो, मगर काम कमलिनी ही का है। आज अगर कमलिनी गिरफ्तार हो जायगी तो सब टण्टा मिट जायगा। जितनी बेफिक्री राजा गोपालसिंह के मरने से मिली है, उतनी ही कमलिनी के भी मारने से मिलेगी, क्योंकि उसके मरने के बाद मेरे साथ दुश्मनी करने का साहस फिर कोई भी नहीं कर सकता।

    आधी रात जाने के पहले ही मायारानी धनपत को साथ लिए हुए उस दरवाजे के पास आ पहुँची जिधर से कमलिनी के आने की खबर सुनी थी। मायारानी के कहे

    मताबिक पहरा देने वाली कई औरतें भी नंगी तलवारें लिए उस चोर दरवाजे के पास पहुँच कर इधर-उधर पेड़ों और झाड़ियों की आड़ में दुबक रही थीं और धनपत भी उस चोरदरवाजे के बगल ही में एक झाड़ी के अन्दर घुस गई थी। मायारानी अपने को हर बला से बचाये रहने की नीयत से कुछ दूर पर छिप कर बैठ रही।

    अब वह समय आ गया कि चोर-दरवाजे की राह से कमलिनी बाग के अन्दर आवे, इसलिए धनपत अपने छिपे रहने वाले स्थान से उठ कर चोर दरवाजे के पास आई और यह विचार कर बैठ गई कि बाहर से कोई आदमी दरवाजा खोलने का इशारा करे तो मैं झट से दरवाजा खोल दूं। इस समय धनपत अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थी और हाथ में खंजर लिए मौका पड़ने पर लड़ने के लिए भी तैयार थी। थोड़ी देर के बाद बाहर से किसी ने चोरदरवाजे पर थपकी मारी। धनपत खुश होकर उठी और झट से दरवाजा खोल कर एक किनारे हो गई। दो आदमी बाग के अन्दर दाखिल हुए। इन दोनों ही का बदन स्याह कपड़ों से ढंका हुआ था और दोनों ही के चेहरों पर नकाब पड़ी हुई थी जिससे रात के समय यह जानना बहुत ही कठिन था कि ये औरतें हैं या मर्द, हाँ लिए उस पर मर्द होने का गुमान हो सकता था।

    जब दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर आ गए तो धनपत ने चोर-दरवाजा बन्द कर दिया और उन दोनों को अपने पीछे-पीछे आने का इशारा किया। मालूम होता था कि वे दोनों नकाबपोश बेफिक्र हैं और उन्हें इस बात की जरा भी खबर नहीं कि यहां का रंग बदला हुआ है। उन दोनों को साथ लिए धनपत जब उस जगह पहुंची जहाँ पहरा देने वाली लौंडियाँ नंगी तलवारें लिए हुए छिपी हुई थीं, तो खड़ी हो गई और उन दोनों की तरफ देख कर बोली, "आपकी आज्ञानुसार मैंने अपना काम पूरा कर दिया अब मुझे इनाम मिलना चाहिए!" इसके जवाब में उस नकाबपोश ने, जिसका कद बनिस्बत दूसरे के छोटा था, जवाब दिया, "धनपत को जो मर्द होकर औरत की सूरत में मायारानी के साथ रहता है, किसी से इनाम लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं मालदार है, मगर मैं समझता हूँ कि कम्बख्त मायारानी भी लोगों को गिरफ्तार करने की नीयत से इसी जगह आकर कहीं छिपी होगी, उसे जल्द बुला, क्योंकि खास उसी को इनाम देने के लिए हम लोग यहाँ आये हैं।"

    धनपत वास्तव में मर्द था, मगर यह हाल किसी को मालूम न था, इसलिए हम भी उसे अभी तक औरत ही लिखते चले आए मगर अब पूरी तरह से निश्चय हो गया कि वह मर्द है और हमारे पाठकों को भी यह बात मालूम हो गई इसलिए अब हम उसके लिए उन्हीं शब्दों का बर्ताव करेंगे, जो मर्दो के लिए उचित हैं।

    उस आदमी की बात सुन कर धनपत परेशान हो गया, उसे यह फिक्र पैदा हुई कि अब हमारा भेद खुल गया और इसलिए जान बचना मुश्किल है। केवल धनपत ही नहीं बल्कि मायारानी और उन लौंडियों ने भी उस आदमी की बातें सुन ली जो उसी के आसपास पेड़ों के नीचे छिपी हुई थीं। मायारानी के दिल में भी तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। उसने पहचानने की नीयत से उस नकाबपोश की आवाज पर ध्यान दिया, मगर कुछ काम न चला क्योंकि उसकी आवाज फंसी हुई थी और इस समय हर

    एक आदमी जो उसकी बात सुनता कह सकता था कि वह अपनी आवाज को बिगाड़ कर बातें कर रहा है।

    धनपत यद्यपि इस फिक्र में था कि दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करना चाहिए मगर इस नकाबपोश की गहरी और भेद से भरी हुई बात ने उसका कलेजा यहाँ तक दहला दिया कि उसके लिए बात का जवाब देना भी कठिन हो गया, मगर वे लौंडियाँ जो उस जगह छिपी हुई थीं चारों तरफ से आकर जरूर वहाँ जुट गईं और उन्होंने दोनों नकाबपोशों को घेर लिया। धनपत सोच रहा था कि मायारानी भी इसी जगह आ पहुँचेगी लेकिन यह आशा उसकी वृथा ही हुई, क्योंकि उस नकाबपोश की आवाज का सबसे ज्यादा असर मायारानी पर ही हुआ। वह घबरा कर वहाँ से भागी और अपने दवानखाने में जाकर बैठ रही, जहाँ कई लौंडियां पहरा दे रही थीं। आते ही उसने एक लौंडी की जुबानी अपने सिपाहियों को जो बाग के पहले दर्जे में रहा में रहा करते थे, कहला भेजा कि 'खास बाग में फलां जगह पर दो दुश्मन घुस आये हैं, उन्हें जाकर फौरन गिरफ्तार करो और उनका सिर काट कर मेरे पास भेजो।" इधर धनपत ने देखा कि बहुत-सी लौंडियाँ हमारी मदद पर आ पहुंची हैं तो उसे भी कुछ हिम्मत हुई और वह उस नकाबपोश की तरफ देख कर बोला

    धनपत-तुम लोग यहाँ किस काम के लिए आये हो?

    नकाब–इसका जवाब हम तुझ कम्बख्त को क्यों दें? धनपत-मालम होता है कि मौत तम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।

    नकाब-(हँस कर) हाँ, मैं भी यही समझता हूँ कि तेरी मौत हम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।

    इतना सुनते ही धनपत ने नकाबपोश पर खंजर का वार किया। मगर उसने फुर्ती से पैतरा बदल कर वार खाली कर दिया, मगर दूसरे नकाबपोश ने चालाकी से धनपत के पीछे जाकर एक लात उसकी कमर में ऐसे जोर से मारी कि वह औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा। मगर तुरन्त ही सम्हल कर उठ बैठा और दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए लौंडियों को ललकारा। लौंडियां दोनों नकाबपोशों की अवस्था देख परेशान हो रही थीं। एक तो उन्हें विश्वास हो गया कि ये दोनों नकाबपोश मर्द हैं, दूसरे धनपत की ताकत पर उन सभी को बहुत-कुछ भरोसा था सो उसकी भी दुर्दशा आँखों के सामने देखने में आई। तीसरे, नकाबपोश की जुबानी यह सुनकर कि धनपत मर्द है और उसके जवाब में धनपत को चुप पाकर लौंडियों का खयाल बिल्कुल ही बदल गया था, तिस पर भी, वे सब दोनों नकाबपोशों को घेर कर खड़ी हो गई। धनपत ने फिर ललकार कर कहा, "देखो, ये दोनों चोर हैं, भागने न पावें।"

    लम्बे नकाबपोश ने लपक कर बहादुरी के साथ धनपत की दाहिनी कलाई जिसमें खंजर था, पकड़ ली और कहा, "हम लोग भागने के लिए नहीं आये हैं, बल्कि गिरफ्तार होकर एक अनूठा तमाशा दिखाने के लिए आये हैं। मगर तुमको भाग जाने का मौका न देंगे। (लौंडियों की तरफ देख कर) हम लोग स्वयं यहाँ से टलने वाले नहीं हैं और जहाँ कहो चलने के लिए तैयार हैं।"

    धनपत को मालूम हो गया कि ये दोनों नकाबपोश कोई साधारण आदमी नहीं हैं और इनके सामने ताकत का घमंड करना वृथा है। वह सोचने लगा–"अफसोस, अब भारी मुसीबत का सामना हुआ चाहता है।"

    इतने ही में 'चोर-चोर' का गुल मचा और कई मशालों की रोशनी दिखाई दी। यह रोशनी उन सिपाहियों के साथ थी जो बाग के पहले दर्जे में रहने वाले सिपाहियों में से थे और इस समय वे सब मायारानी की आज्ञानुसार दोनों चोरों को अर्थात् इन नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए यहाँ आये थे। बात की बात में वे सब वहाँ पहुंच गये और उन्होंने देखा कि लौंडियों के घेरे में दो नकाबपोश छाती ऊँची किये खड़े हैं और उनमें से एक धनपत की कलाई पकड़े हुए है।

    इसके पहले कि सिपाहियों को दोनों नकाबपोशों के साथ किसी तरह के बर्ताव की नौबत आवे, छोटे नकाबपोश ने ऊंची आवाज में ललकार कर कहा, "भाइयो, तुम लोग यह न समझो कि हम लोग भाग जायेंगे, मैं भागने के लिए नही आया हूँ, मैं तुम लोगों का दुश्मन नहीं हूँ और न तुम लोगों के दुश्मनों का साथी हूँ, बल्कि तुम्हारा सच्चा दोस्त और खैरखाह हूँ। जिस समय सूर्य भगवान के दर्शन होंगे और मैं अपने चेहरे पर से नकाब उठाऊँगा, तुम लोगों को मालूम हो जायगा कि मैं तुम्हारा पुराना साथी हूँ। इस समय मैं तुम लोगों की वह बेवकूफी जाहिर करने आया हूँ, जिसे तुम लोग खुद नहीं जानते हो। हाय, तुम्हारे प्यारे मालिक राजा गोपालसिंह के गले पर छुरी फिर जाय और तुम लोगों को खबर तक न हो? इससे भी बढ़ कर अफसोस की बात तो यह है कि राजा गोपालसिंह को मारने वाला, उनकी उम्मीदों का खून करने वाला, उनकी रिआया के दिल पर सदमा पहुँचाने वाला, उनकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला, उनके धर्म और अर्थ का सत्यानाश करने वाला, दिन-रात तुम्हारे पास रहे, तुम पर हुकूमत करे, तुम्हें बेवकूफ बनावे, और तुम उसका कुछ भी न कर सको! यह मत समझो कि राजा गोपाल सिंह को मरे हुए कई वर्ष हो गये, मैं साबित कर दूंगा कि उनके खून से गीली हुई जमीन भी अभी तक सूखी नहीं है और अगर तुम मुझ से पूछने और यह जानने की इच्छा करोगे कि तुम्हारे राजा गोपालसिंह को किसने मारा या उनका कातिल कौन है तो मैं जरूर उसका भी पता दूंगा और वास्तव में मैं इसी काम के लिए यहां आया भी हूँ।"

    छोटे नकाबपोश की इस बात ने सिपाहियों और पहरा देने वाली लौंडियों का दिल हिला दिया। राजा गोपालसिंह की याद ने और इस खबर ने कि-'उन्हें मरे बहुत दिन नहीं हुए और उनका कातिल इसी जगह रह कर उन पर हुकूमत करता है' उनके दिलों को बेचैन कर दिया। सभी की आँखों से आंसू की बूंदें जारी हो गई और हर तरफ से आवाज आने लगी-'कहो-कहो, जल्द कहो, नेक दिल गरीबपरवर और हमारे हितैषी राजा को मारने वाला दुष्ट कौन है और कहाँ है?" इसके जवाब में छोटे नकाबपोश ने पुनः कहा, 'यही कम्बख्त, जिसे इस समय मेरे साथी ने पकड़ रखा है, तुम्हारे राजा का कातिल तथा उसकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला है। इस बात से मत डरो कि इसकी इज्जत मायारानी के दरबार में बहुत है बल्कि आजमाओ और देखो कि यह मर्द है या औरत! मैं सच कहता हूँ कि यह कई वर्ष से तुम लोगों की आँखों में धूल डाल कर अर्थात् औरत बन कर तुम्हारे घर में रहता है और इस राज्य को चौपट कर रहा है, मगर तुम लोगों को इसकी कुछ भी खबर नहीं है। इतना ही नहीं, मैं तुम लोगों से एक बात और कहूँगा, मगर अभी नहीं, जरा ठहरो, घंटे भर और गम खाओ, सवेरा होने दो और हम दोनों को इसी जगह रहने देकर और कहीं ले जाने का उद्योग मत करो!”

    छोटे नकाबपोश की इस दूसरी बात ने रंग और भी चोखा कर दिया। चारों तरफ सिपाहियों और लौंडियों में गुरचूँ-गुरचूँ और काना-फूसी होने लगी। किसी की आँखों से आँसू जारी था, किसी भी गर्दन शर्म से नीची हो रही थी, किसी ने अफसोस से अपना हाथ अपने कलेजे पर रख लिया, कोई ठुड्डी पकड़ कर सोच रहा था, और कोई दाँत पीस-पीस कर धनपत की तरफ देख रहा था। यद्यपि रात का समय था मगर उन मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी, जो मायारानी के सिपाहियों के हाथ में थे और इस सबब से वहाँ की हर एक चीज साफ दिखाई दे रही थी। सिपाहियों ने धनपत का चेहरा गौर से देखा और उसमें बहुत फर्क पाया। खौफ और तरद्दुद ने धनपत को अधमरा कर दिया था और उसका रंग जर्द हो रहा था। दोनों नकाबपोशों ने जब देखा कि इस समय सिपाहियों के दिलों में जोश बखूबी पैदा हो गया है और वे लोग अब सब्र करना पसन्द न हीं करेंगे तो आपस में कुछ इशारा करने के बाद छोटे नकाबपोश ने धनपत की साड़ी का ऊपरी भाग फुर्ती से खींच लिया और उसकी चोली भी फाड़ डाली, इसके साथ ही दो बनावटी गेंद बाहर गिर पड़े और उसकी सूरत से मर्दानापन झलकने लगा। अब तो मायारानी के सिपाहियों को पूरे दर्जे पर क्रोध चढ़ आया और उन्हें निश्चय हो गया कि उनके मालिक राजा गोपालसिंह इसी कम्बख्त के सबब से मारे गए हैं। पहरा देने वाली जितनी औरतें थीं, सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे की सूरत देखने लगी और उधर सिपाहियों ने पास पहुँच कर धनपत को घेर लिया तथा उसकी दुर्गत करने लगे। ऐसी अवस्था में दोनों नकाबपोश धनपत को छोड़कर अलग जा खड़े हुए। सिपाहियों ने बारी-बारी से धनपत से प्रश्न करना शुरू किया, मगर उसकी अवस्था इस लायक न थी कि किसी के प्रश्न का उत्तर देता। बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद यह राय पक्की हुई कि धनपत को राजदीवान के पास ले चलना चाहिए और इसी के साथ-साथ इन दोनों नकाबपोशों को भी उन्हीं के सामने पेश करना उचित होगा।

    सिपाही लोग जिस समय धनपत के विषय में सोच-विचार कर रहे और क्रोध में भरे हुए थे। दोनों नकाबपोशों से जो धनपत को छोड़ अलग हो गये थे, थोड़ी देर के लिए बिल्कुल बेफिक्र और लापरवाह हो गए थे, मगर इस समय जब यह राय पक्की हुई कि धनपत के साथ ही साथ उन दोनों को भी दीवान साहब के पास ले चलना चाहिए तो उन दोनों की खोज करने लगे, मगर वे, दोनों नकाबपोश मौका पाकर ऐसा गायब हुए कि उनकी झलक तक दिखाई न दी। एक बोला, “अभी इसी जगह तो थे!” दूसरे ने कहा, “यह तो हम भी जानते हैं। मगर यह बताओ कि वे चले कहाँ गए?” तीसरे ने कहा, “भाई वे दोनों भागने वाले तो हैं नहीं, इसी जगह कहीं छिप कर हम लोगों का तमाशा देखते होंगे!” इत्यादि तरह-तरह की बातें सब लोग आपस में करने और दोनों नकाबपोशों को चारों तरफ ढूँढ़ने लगे, लेकिन दोनों वहाँ थे कहाँ, जो पता लगता! आखिर खोजते-ढूँढ़ते सुबह हो गई और इतनी ही देर में इस आश्चर्यजनक घटना की खबर जादू की तरह हवा के साथ मिल कर दूर-दूर तक फैल गई। इस समय मायारानी के सिपाही बिल्कुल ही स्वतन्त्र और खुदराय बल्कि बागियों की तरह हो रहे थे खोजने और ढूँढ़ने पर भी उन्हें जब दोनों नकाबपोशों का पता न लगा तब लाचार होकर कम्बख्त धनपत को घसीटते हुए, वे बाग के बाहर की तरफ रवाना हुए।

    जब इन बातों की खबर मायारानी को पहुँची तो वह बहुत ही घबराई। अपनी तथा धनपत की जान से नाउम्मीद होकर सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए? इस समय उसकी सुरत से उसके दिल का बहुत-कुछ पता लगता था। उसका चेहरा जर्द और पलकें नीचे की तरफ झुकी हुई थीं। कभी-कभी उसके बदन में कंप हो जाता और कभी आँखें चंचल होकर सुर्ख हो जातीं। मगर थोड़ी ही देर बाद उसके होंठ काँपने लगे और आँखों की सुर्थी बढ़ जाने के साथ ही उसका चेहरा भी लाल हो गया जिसे देखते ही वे लौंडियाँ जो उसके सामने मौजूद थीं समझ गई कि अब उसे हद दर्जे का क्रोध चढ़ आया है। कुछ सोच-विचार कर मायारानी बोल उठी, “इस समय उन कम्बख्तों को समझाने-बुझाने का उद्योग करना वृथा समय नष्ट करना है, दूसरे, मैं तिलिस्म की रानी ही क्या ठहरी, जो इन थोड़े-से कम्बख्तों को काबू में न कर सकी या इन थोड़े सिपाहियों को आज्ञा भंग करने की सजा न दे सकी!” इतना कहते ही मायारानी अपने स्थान से उठी और दीवानखाने में से होती हुई उस कोठरी में जा पहुँची, जहाँ से बाग के तीसरे दर्जे में जाने का वह रास्ता था जिसका जिक्र हम उस समय कर आये हैं जब पागल बने तेजसिंह मायारानी की आज्ञानुसार हरनामसिंह द्वारा बाग के तीसरे दर्जे में पहुँचाए गये थे।

    मायारानी कोठरी के अन्दर गई। वहाँ एक दूसरी कोठरी में जाने के लिए दरवाजा था, उस दरवाजे को खोल कर दूसरी कोठरी में गई। वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था, जिसमें उतरने के लिए जंजीर लगी हुई थी। वह इस कुएँ के अन्दर उतर गई और एक लम्बे-चौड़े स्थान में पहुँची, जहाँ बिल्कुल ही अंधकार था। मायारानी टटोलती हुई एक कोने की तरफ चली गई और वहाँ उसने कोई पेंच घुमाया, जिसके साथ ही उस स्थान में बखूबी रोशनी हो गई और वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यह रोशनी शीशे के एक गोले में से निकल रही थी, जो छत के साथ लटक रहा था। यह स्थान, जिसे एक लम्बा-चौड़ा दालान या चारों तरफ दीवार होने के कारण कमरा कहना चाहिए, अद्भुत चीजों और तरह-तरह के कल-पुर्जों से भरा हुआ था। बीच में कतार बाँध कर चौबीस खम्भे संगमरमर के खड़े थे और हर दो खम्भों के ऊपर एक-एक महरादार पत्थर चढ़ा हुआ था, जिसे मामूली तौर पर आप बिना दरवाजे का फाटक कह सकते हैं। इन महराबी पत्थरों के बीचोंबीच बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे और हर एक घण्टे के नीचे एक गरारीदार पहिया था।

    मायारानी ने हर एक महाराब को, जिस पर मोटे-मोटे अक्षर लिखे थे,

    गौर से देखना शुरू किया और एक महाराब के नीचे पहुँच कर खड़ी हो गई जिस पर यह लिखा हुआ था- "दूसरे दर्जे का तिलिस्मी दरवाजा।" मायारानी ने उस पहिये, को घुमाना शुरू किया जो उस महराब में लटकते हुए घण्टे के नीचे था। पहिया चारपाँच दफे घूम कर रुक गया, तब मायारानी वहाँ से हटी और यह कहती हुई घूम कर सामने वाली दीवार के पास गई कि 'देखें अब वे कम्बख्त क्योंकर बाग के बाहर जाते हैं!' दीवार में नम्बरवार बिना पल्ले की पाँच गालमारियाँ थीं और हर एक आलमारी में चार दर्जे बने हुए थे। पहिली आलमारी में शीशे की सुराहियाँ थीं, दूसरी में तांबे के बहुत से डिब्बे थे, तीसरी कागज के मुट्ठों से भरी थी, जिन्हें दीमकों ने बर्बाद कर डाला था, चौथी अष्ट धातु की छोटी-छोटी बहुत-सी मूरतें थीं और पांचवीं आलमारी में केवल चार ताम्रपत्र थे जिनमें खूबसुरत उभरे हुए अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।

    मायारानी उस आलमारी के पास गई जिसमें शीशे की सुराहियाँ थीं और एक सुराही उठा ली। शायद उसमें किसी तरह का अर्क था, जिसे थोड़ा-सा पीने के बाद सुराही हाथ में लिए हए, वहाँ से हटी और दूसरी आलमारी के पास गई, जिसमें तांबे के डिब्बे थे। एक डिब्बा उठा लिया और वहाँ से रवाना हुई। जिस तरह उसका जाना हम लिख आये हैं, उसी तरह घूमती हई वह अपने दीवानखाने में पहुँची। जिसके आगे तरह-तरह के खुशनुमा पत्तों वाले खूबसूरत गमले सजाये हुए थे। वहाँ पहुँच कर उसने वह डिब्बा खोला। उसके अन्दर एक प्रकार की बुकनी भरी हुई थी। उसमें से आधी बुकनी अपने हाथ से खूबसूरत गमलों में छिड़कने के बाद बची हुई आधी बुकनी डिब्बे में लिए हुए वह दीवानखाने की छत पर चढ़ गई और अपने साथ केवल एक लौंडी को जिसका नाम लीला था और जो उसकी सब लौंडियों की सरदार थी, लेती गई। यह सब काम, जो हम ऊपर लिख आये हैं, मायारानी ने बड़ी फुर्ती से उसके पहले-पहले ही कर लिया जब तक कि उसके बागी सिपाही धनपत को लिए हुए बाग के दूसरे दर्जे के बाहर जायें।

    जब मायारानी लीला को साथ लिये हए दीवानखाने की छत पर चढ़ गई तब उसने एक सुराही दिखाकर लीला से कहा, "चल्लू कर, इसमें से थोड़ा सा अर्क तुझे देती हूँ उसे पी जा और आफत से बची रह, जो थोड़ी ही देर में यहाँ के रहने वालों पर आने वाली है।"

    लीला—(हाथ फैला कर) मैं खूब जानती हूँ कि आपकी मेहरबानी जितनी मुझ पर रहती है उतनी और किसी पर नहीं।

    मायारानी—(लीला की अंजुली में अर्क डाल कर) इसे जल्दी पी जा और जो कुछ मैं कहती हूँ उसे गौर से सुन।

    लीला-बेशक मैं पूरा ध्यान देकर सुनंगी, क्योंकि इस समय आपकी अवस्था बिल्कुल ही बदल रही है और यह जानने के लिए मेरा जी बहुत बेचैन है कि अब क्या किया जायगा?

    मायारानी—मैं अपने भेद तुझसे छिपा नहीं रखती। जो कुछ मैं कर चुकी हूँ तुझे सब मालूम है। केवल दो भेद मैंने तझसे छिपाए, जिनमें से एक तो आज खुल ही

    गया और एक का हाल मैं तुझसे फिर किसी समय कहूँगी। इन भेदों के विषय में मेरा विश्वास था कि यदि किसी को मालूम हो जायगा तो मेरी जान आफत में फंस जायगी और आखिर वैसा ही हुआ। तू देख ही चुकी है कि दो कम्बख्त नकाबपोशों ने यहाँ पहुँच कर क्या गजब मचा रखा है। अब जहाँ तक मैं समझती हूं, धनपत का भेद छिपा रहना बहुत मुश्किल है और साथ ही इसके कम्बख्त फौजी सिपाहियों का भी मिजाज बिगड़ गया है। मान लिया जाय कि अगर मैंने किसी तरह की बुराई की भी तो उनको मेरे खिलाफ होना मुनासिब न था। खैर, सिपाही लोग तो उजड्ड हुआ ही करते हैं, मगर मुझसे बुराई करने का नतीजा कदापि अच्छा न होगा। अफसोस, उन लोगों ने इस बात पर ध्यान न दिया कि आखिर मायारानी तिलिस्म की रानी है! देख, मैंने इस बाग के बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया, अब उन लोगों की मजाल नहीं कि यहां से बाहर जा सकें, बल्कि थोड़ी ही देर में तू देखेगी कि उन लोगों को मैं कैसे हलाल करती हूँ। यह दवा जो मैंने गमलों में छिड़की है, बहुत ही तेज और अपनी महक दूर-दूर तक फैलाने वाली है, इससे बढ़कर बेहोशी की कोई दवा दुनिया में न होगी, और यही उन बदमाशों के साथ जहर का काम करेगी। तू उन सभी के पास जा और उन्हें ऊंच-नीच समझा कर मेरे पास ले आ–या-नहीं, अच्छा देख-खैर जाने दे—मैं तुझसे एक बात और कहती हूँ-यह तो मैं समझ ही चुकी कि अब मेरी जान जाना चाहती है मगर तो भी हजारों को मारे बिना मैं न छोडूंगी। अफसोस, वे दोनों कम्बख्त नकाबपोश न मालूम कहाँ चले गए। खैर, देखा जायगा-ओफ, (अपनी ठुड्डी पकड़ के) मुझे शक है-एक तो उनमें से जरूर–हाँ जरूर-जरूर-बेशक वही है और होगा, दूसरा भी-मैं समझ गई, मगर ओफ, उस चीज का जाना ही बुरा हुआ। अच्छा अब मैं दूसरे काम की फिक्र करती हूँ, अब तो जान पर खेलना ही पड़ा, एक दफे तो मुझे तुझे छोड़ हाँ, तू मेरा मतलब तो समझ गई न? इस समय मेरी तबीयत-अच्छा, तू जा, देख मान जाय तो ठीक है, नहीं तो आज इस बाग को मैं उन्हीं के खून से तर करुँगी!

    इस समय मायारानी की बातें यद्यपि बिल्कुल बेढंगी और बेतुकी थों तथापि चालाक और धूर्त लीला उसका मतलब समझ गई और यह कहती हुई वहाँ से रवाना हुई, "आप चिन्ता न कीजिए, मैं अभी जाकर उन सभी को ठीक करती हूँ। जरा आप अपना मिजाज ठिकाने कीजिए और तिलिस्मी कवच को भी झटपट…"

    5

    मायारानी के सिपाही जो दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने आए थे, धनपत को लिए हुए बाग के पहले दर्जे की तरफ रवाना हुए जहाँ वे रहा करते थे, मगर वे इच्छानुसार अपने ठिकाने न पहुँच सके, क्योंकि बाग के दूसरे दर्जे के बाहर निकलने का रास्ता मायारानी की कारीगरी से बन्द हो गया था। ये दरवाजे तिलिस्मी और बहुत

    ही मजबूत थे और इनका खोलना या तोड़ना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। पाठकों को याद होगा कि बाग के दूसरे दर्जे और पहले दर्जे के बीच में एक बहुत लम्बी-चौड़ी दीवार थी जिस पर कमन्द लगा कर चढ़ना भी असम्भव था और सीढ़ियों के जरिए उस दीवार पर चढ़ और उसे लाँघ कर ही एक दर्जे से दूसरे दर्जे में जाना होता था। इस समय जो दरवाजा मायारानी ने तिलिस्मी रीति से बन्द किया है इसी के बाद वह दीवार पड़ती थी जिसे लाँघ कर सिपाही लोग पहले दर्जे में जाते थे। उस दीवार पर चढ़ने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं वे लोहे की थीं और इस समय दोनों तरफ की सीढ़ियाँ दीवार के अन्दर घुस गई थीं इसलिए दीवार पर चढ़ना एकदम असम्भव हो गया था।

    दरवाजे को तिलिस्मी रीति से बन्द देखकर सिपाही लोग समझ गए कि यह मायारानी की कार्रवाई है। इसलिए उन लोगों के दिल में डर पैदा हुआ और वे सोचने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि मायारानी हम लोगों को इसी बाग में फँसा कर मार डाले, क्योंकि आखिर वह तिलिस्म की रानी है, मगर यह विचार उन लोगों के दिल में ज्यादा देर तक न रहा क्योंकि राजा गोपालसिंह के साथ दगा किये जाने का जो हाल नकाबपोशों की जुबानी सुना था उस पर उन लोगों को पूरा-पूरा विश्वास हो गया था और इसी सबब से गुस्से के मारे उन सब की अवस्था ही बदली हुई थी।

    आखिर धनपत को साथ लिए हुए वे सिपाही यह सोच कर पीछे की तरफ लौटे कि उस चोरदरवाजे की राह से बाहर निकल जायँगे जिस राह से दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर घुसे थे, मगर उस ठिकाने पर पहुँचकर भी वे लोग बहुत ही घबराये और ताज्जुब करने लगे क्योंकि उन्हें वह खिड़की कहीं नजर न आई। हाँ एक निशान दीवार में जरूर पाया जाता था, जिससे यह कहा जा सकता था कि शायद इसी जगह वह खिड़की रही होगी। यह निशान भी मामूली न था बल्कि ऐसा मालूम होता था कि दीवार वाले चोरदरवाजे पर फौलादी चादर जड़ दी गई है। अब उन सिपाहियों को पहले से भी ज्यादा तरदुद्द हुआ क्योंकि सिवाय उन दोनों रास्तों के बाहर निकलने का कोई और जरिया न था। एक बार उन सिपाहियों के दिल में यह भी आया कि मायारानी की तरफ चलना चाहिए, मगर खौफ से ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी।

    उस समय दिन घण्टे भर से कुछ ज्यादा चढ़ चुका था। सिपाही लोग क्रोध की अवस्था में भी तरदुद्द और घबराहट से खाली न थे और खड़े-खड़े सोच ही रहे थे कि किधर जाना और क्या करना चाहिए कि इतने ही में सामने से लीला आती हुई दिखाई पड़ी। जब वह पास पहुंची तो सिपाहियों की तरफ देख कर ऊँची आवाज में बोली, "तुम लोग अपनी जान के दुश्मन क्यों हो रहे हो? क्या तुम जमानिया राज्य के नौकर हो कर भी इस बात को भूल गए कि मायारानी एक भारी तिलिस्म की रानी है और जो चाहे कर सकती है? दो-चार सौ आदमियों को बरबाद कर डालना उसके लिए एक अदना काम है। अफसोस, ऐसे मालिक के खिलाफ होकर तुम अपनी जान बचाना चाहते हो? याद रक्खो कि इस बाग में भूखे-प्यासे मर जाओगे, तुम्हारे किए कुछ भा न होगा। मैं तुम लोगों को समझाती हूँ और कहती हैं कि अपने मालिक के पास चलो और उससे माफी मांग कर अपनी जान बचाओ।" इसी तरह की ऊँच-नीच की बहुत-सी बातें लीला उन सिपाहियों से देर तक कहती रही और सिपाही लोग भी लीला की बात पर गौर कर ही रहे थे कि यकायक बाईं तरफ से एक शंख के बजने की आवाज आई, घूम कर देखा तो वे ही दोनों नकाबपोश दिखाई पड़े जो हाथ के इशारे से उन सिपाहियों को अपनी तरफ बुला रहे थे। उन्हें देखते ही सिपाहियों की अवस्था बदल गई और उनके दिल के अन्दर उम्मीद, रंज, डर और तरदुद्द का चर्खा तेजी के साथ घूमने लगा। लीला की बातों पर जो कुछ सोच कर रहे थे उसे छोड़ दिया और धनपत को साथ लिए हुए इस तरह दोनों नकाबपोशों की तरफ बढ़े जैसे प्यासे पंसाले (पौसारे) की तरफ लपकते हैं।

    जब उन दोनों नकाबपोशों के पास पहुंचे तो एक नकाबपोश ने पुकार कर कहा, "इस बात से मत घबराओ कि मायारानी ने तुम लोगों को मजबूर कर दिया और इस बाग से बाहर जाने लायक नहीं रक्खा। आओ हम तुम सभी को इस बाग से बाहर कर देते हैं मगर इसके पहले तुम्हें एक ऐसा तमाशा दिखाना चाहते हैं जिसे देख कर तुम बहुत ही खुश हो जाओगे और हद से ज्यादा बेफिक्री तुम लोगों के भाग में पड़ेगी, मगर वह तमाशा हम एकदम से सभी को नहीं दिखाना चाहते। मैं एक कोठरी में (हाथ का इशारा करके) जाता हूँ, तुम लोग बारी-बारी से पांच-पाँच आदमी आओ और अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा तथा आश्चर्यजनक तमाशा देखो।"

    इस समय दोनों नकाबपोश जिस जगह खड़े थे, उसके पीछे की तरफ एक दीवार थी जो बाग के दूसरे और तीसरे दर्जे की हद को अलग कर रही थी और उसी जगह पर एक मामूली कोठरी भी थी। बात पूरी होते ही दोनों नकाबपोश पाँच सिपाहियों को अपने साथ आने के लिए कहकर उस कोठरी के अन्दर घुस गए। इस समय इन सिपाहियों की अवस्था कैसी थी, इसे दिखाना जरा कठिन है। न तो इन लोगों का दिल उन दोनों नकाबपोशों के साथ दुश्मनी करने की आज्ञा देता था और न यही कहता था कि उन दोनों को छोड़ दो और जिधर जाएँ जाने दो।

    जब दोनों नकाबपोश कोठरी के अन्दर घुस गए तो उसके बाद पाँच सिपाही जो दिलावर और ताकतवर थे कोठरी में घुसे और चौथाई घड़ी तक उसके अन्दर रहे। इसके बाद जब वे उस कोठरी के बाहर निकले तो उनके साथियों ने देखा कि उन पाँचों के चेहरे से उदासी झलक रही है, आँखों से आँसू की बूंदें टपक रही हैं और वे सिर झुकाए अपने साथियों की तरफ आ रहे हैं। जब पास आए तो उन पाँचों की अवस्था एकदम बदल जाने का सबब सिपाहियों ने पूछा जिसके जवाब में उन पांचों ने कहा, "पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम लोग पाँच-पाँच आदमी बारी-बारी से जाओ और जो कुछ है अपनी आँखों से देख लो, हम लोगों से पूछोगे तो कुछ भी न बतायेंगे, हां इतना अवश्य कहेंगे कि वहाँ जाने में किसी तरह का हर्ज नहीं है।"

  • चन्द्रकांता सन्तति २

    चन्द्रकांता सन्तति २

    Aproximadamente 164.777 palavras.

    कमलिनी––कहो, क्या बात है और कौन-सी जरूरत आ पड़ी?

    भूतनाथ––पहले तुम कहो कि मुझसे मिलने की क्या आवश्यकता थी? कमलिनी––नहीं-नहीं, पहले तुम्हारा हाल सुन लूँगी तब कुछ कहूँगी, क्योंकि तुम्हारे चेहरे पर घबराहट और उदासी हद से ज्यादा पाई जाती है।

    भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है और मैं तुमसे आखिरी मुलाकात करने आया हूँ, क्योंकि अब जीने की उम्मीद नहीं रही और खुली बदनामी बल्कि कलंक मंजूर नहीं

    कमलिनी––क्यों क्यों, ऐसी क्या आफत आ गई, कुछ कहो तो सही!

    भूतनाथ––मेरे साथ पहाड़ी के नीचे चलो। मैं एक औरत को बेहोश करके लाद लाया हूँ, जो उसी खोह के अन्दर है, पहले उसे देख लो तब मेरी सुनो।

    कमलिनी––खैर ऐसा ही सही, चलो।

    भूतनाथ के साथ-ही-साथ कमलिनी पहाड़ी के नीचे उतरी और उस खोह के मुहाने पर आकर बैठ गई जिसके अन्दर भूतनाथ ने उस औरत को रखा था। भूतनाथ उस बेहोश औरत को खोह के बाहर निकाल लाया। कमलिनी उस औरत को देखते ही चौंकी और उठ खड़ी हुई।

    भूतनाथ––इसी के मारे मेरी जिन्दगी जवाल हो रही है, मगर तुम इसे देखकर चौंकी क्यों? क्या इस औरत को पहचानती हो?

    कमलिनी––हाँ, मैं इसे पहचानती। यह वह काली नागिन है कि जिसके डँसने का मन्त्र ही नहीं! जिसे इसने काटा वह पानी तक नहीं माँगता, तुमने इसके साथ दुश्मनी की सो अच्छा नहीं किया।

    भूतनाथ––मैंने जान-बूझकर इसके साथ दुश्मनी नहीं की। तुम खुद जानती हो कि मैं इसके काबू में हूँ किसी तरह इसका हुक्म टाल नहीं सकता, मगर कल इसने जो कुछ काम करने के लिए मुझे कहा वह मैं किसी तरह नहीं कर सकता था और इनकार की भी हिम्मत न थी, लाचार इसी खंजर की मदद से गिरफ्तार कर लाया हूँ। अब कोई ऐसी तरकीब निकालो जिसमें जान बचे और मैं वीरेन्द्रसिंह को मुँह दिखाने लायक हो जाऊँ।

    कमलिनी––मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे हो! मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि तुम इसके कब्जे में क्योंकर फँसे हो, न तुमने इसके बारे में कभी मुझसे कुछ कहा ही।

    भूतनाथ––बेशक मैं इसका हाल तुमसे कह चुका हूँ और यह भी कह चुका हूँ कि इसी की बदौलत मुझे मरना पड़ा, बल्कि तुमने वादा किया था कि इसके हाथ से तुम्हें छुट्टी दिला दूँगी।

    कमलिनी––हाँ, वह बात मुझे याद है, मगर तुमने तो श्यामा का नाम लिया था!

    भूतनाथ––ठीक है, वह यही श्यामा है।

    कमलिनी––(हँस कर) इसका नाम श्यामा नहीं है मनोरमा है। मैं इसकी सात पुश्तों को जानती हूँ। वेशक इसने अपने नाम में भी तुमको धोखा दिया। खैर, अब मालूम हुआ कि तुम्हें इसी ने सता रखा है, तुम्हारे हाथ की लिखी हुई दस्तावेज इसी के कब्जे में है और इस सबब से तुम इसे जान से मार भी नहीं सकते। इसने मुझे भी कई दफे धोखा देना चाहा था मगर मैं कब इसके पंजे में आने वाली हूँ। हाँ, यह तो कहो कि इसने क्या काम करने के लिए कहा था?

    भूतनाथ––इसने कहा था कि तू कमलिनी का सिर काट कर मेरे पास ले आ, यह काम तुझसे बखूबी हो सकेगा क्योंकि वह तुझ पर विश्वास करती है।

    कमलिनी––(कुछ देर तक सोचकर) खैर, कोई हर्ज नहीं। पहले तो मुझे इसकी कोई विशेष फिक्र न थी, परन्तु अब इसके साथ चाल चले बिना काम नहीं निकलता। देखो तो, मैं इसे कैसा दुरुस्त करती हूँ और तुम्हारे कागजात भी इसके कब्जे से कैसे निकालती हूँ।

    भूतनाथ––मगर इस काम में देर न करनी चाहिए।

    कमलिनी––नहीं-नहीं, देर न होगी, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए भी मुझे इसी के मकान पर जाना पड़ेगा। बस, दोनों काम एक साथ ही निकल जायेंगे।

    भूतनाथ––अच्छा, तो अब क्या करना चाहिए?

    कमलिनी––(हाथ का इशारा करके) तुम इस झाड़ी में छिपे रहो, मैं इसे होश में लाकर कुछ बातचीत करूँगी। आज यह मुझे किसी तरह नहीं पहचान सकती।

    भूतनाथ झाड़ी के अन्दर छिपा रहा। कमलिनी ने अपने बटुए में से लखलखे की डिबिया निकाली और सुँघाकर उस औरत को होश में लाई। मनोरमा जब होश में आई, उसने अपने सामने एक भयानक रूपवाली औरत को देखा। वह घबरा कर उठ बैठी और बोली––

    मनोरमा––तुम कौन हो और मैं यहाँ क्योंकर आई?

    कमलिनी––मैं जंगल की रहने वाली भिल्लिनी हूं। तुम्हें एक लम्बे कद का आदमी पीठ पर लादे लिये जाता था। मैं इस पहाड़ी के नीचे सूअर का शिकार कर रही थी। जब वह मेरे पास पहुँचा मैंने उसे ललकारा और पूछा कि पीठ पर क्या लादे लिये जाता है? जब उसने कुछ न बताया तो लाचार (नेजा दिखा कर) इसी जहरीले नेजे से उसे जख्मी किया। जब वह बेहोश होकर गिर पड़ा तब मैंने गठरी खोली, जब तुम्हारी सूरत नजर आई तो हाल जानने की इच्छा हुई। लाचार इस जगह उठा लाई और होश में लाने का उद्योग करने लगी। अब तुम्हीं बताओ कि वह आदमी कौन था और तुम्हें इस तरह क्यों लिये जाता था?

    मनोरमा––मैं अपना हाल तुमसे जरूर कहूँगी, मगर पहले यह बताओ कि वह आदमी तुम्हारे इस जहरीले नेजे के असर से मर गया या जीता है?

    कमलिनी––वह मर गया और मेरे साथी लोग उसे जला देने के लिए ले गए।

    मनोरमा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, यद्यपि उसने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया तथापि उसकी मुहब्बत मेरे दिल से किसी तरह नहीं जा सकती, क्योंकि वह मेरा प्यारा पति था। अफसोस अफसोस, तुमने उसके हाथ से मुझे व्यर्थ छुड़ाया।

    पाठक, झाड़ी के अन्दर छिपा हुआ भूतनाथ भी मनोरमा की बातें सुन रहा था। मनोरमा ने जो कुछ कमलिनी से कहा, न मालूम उसमें क्या तासीर थी कि सुनने के साथ ही भूतनाथ का कलेजा काँपने लगा और उसे चक्कर-सा आ गया। बहुत मुश्किल से उसने अपने को सम्हाला और कान लगाकर फिर दोनों की बातें सुनने लगा।

    कमलिनी––(कुछ सोचकर) मैं केसे विश्वास करूँ कि तुमने जो कुछ कहा वह सच है?

    मनोरमा––पहले यह सोचो कि मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूँगी?

    कमलिनी––इसके कई सबब हो सकते हैं। सब से भारी सबब यह है कि तुम्हारा भेद एक गैर के सामने खुल जायेगा जिससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। मगर मुझे विश्वास नहीं होता कि जो आदमी तुम्हें इतना कष्ट दे और बेहोश करके गठरी में बाँध कर कहीं ले जाने का इरादा रक्खे, उसे तुम प्यार करो और अपना पति कहकर सम्बोधित करो।

    मनोरमा––नहीं-नहीं, यों तो शक की कोई दवा नहीं। परन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगी कि उस आदमी के बारे में मैंने जो कुछ कहा, वह सच है।

    कमलिनी––खैर, ऐसा ही होगा, मुझे इससे कोई मतलब नहीं चाहे वह आदमी तुम्हारा पति हो अथवा नहीं, अब तो वह मर चुका, किसी तरह जी नहीं सकता। लेकिन यह बताओ कि अब तुम क्या करना चाहती हो और कहाँ जाने की इच्छा रखती हो?

    मनोरमा––मुझे गयाजी का रास्ता बता दो। मेरे माँ-बाप उसी शहर में रहते हैं। अब मैं उन्हीं के पास जाऊँगी।

    कमलिनी––अच्छा, पहाड़ी के नीचे चलो, मैं तुम्हें गयाजी का रास्ता बता देती हूँ। हाँ, मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गई।

    मनोरमा––मेरा नाम इमामन है।

    कमलिनी––(जोर से हँस कर) क्या ठगने के लिए मैं ही थी?

    मनोरमा––(चौंक कर और कमलिनी को सिर से पैर तक खूब अच्छी तरह देख कर) मुझे तुम पर शक होता है।

    कमलिनी––यह कोई ताज्जुब की बात नहीं, मगर शक होने ही से क्या हो सकता है? आज तक तुमने मुझे कभी नहीं देखा और न फिर देखोगी।

    मनोरमा––तब मैं अवश्य ही कह सकती हूँ कि तुम कमलिनी हो!

    कमलिनी––नहीं-नहीं, मैं कमलिनी नहीं हो सकती, हाँ कमलिनी को पहचानती जरूर हूँ, क्योंकि वह वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान की दोस्त है, इसलिए मेरी दुश्मन!

    मनोरमा––अब मैं तुम्हारी बातों का विश्वास नहीं कर सकती।

    कमलिनी––तो इसमें मेरा कोई भी हर्ज नहीं। (आहट पाकर और दाहिनी तरफ देख कर) लो देखो, अब तो मैं सच्ची हुई? वह कमलिनी आ रही है!

    संयोग से उसी समय तारा भी आ पहुँची जो कमलिनी की सूरत में उसके कहे मुताबिक सब काम किया करती थी। कमलिनी ने गुप्त रीति से तारा को कुछ इशारा किया जिससे वह कमलिनी का मतलब समझ गई। कमलिनी रूपी तारा लपक कर उन दोनों के पास पहुँची और कमर से खंजर निकाल कर और उसे चमका कर बोली, "इस समय तुम दोनों भले मौके पर मुझे मिल गई हो, आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ। अब मैं तुम दोनों से बिना बदला लिये टलने वाली नहीं।"

    तारा की यह बात सुन कमलिनी जान-बूझकर काँपने लगी। मालूम होता था कि वह डर से काँप रही है। मनोरमा भी यकायक कमलिनी को मौजूद देख कर घबरा गई, इसके अतिरिक्त उस चमकते हुए खंजर को देखकर उसे विश्वास हो गया कि अब किसी तरह जान नहीं बचती, क्योंकि इसी तरह का खंजर भूतनाथ के हाथ में चुकी थी और उसके प्रबल प्रताप का नमूना उसे मालूम हो चुका था, साथ ही उसे इस बात का भी विश्वास हो गया कि राक्षसी (कमलिनी), जिसने उसे भूतनाथ के हाथ से छुड़ाया, सच्ची और उसकी खैरख्वाह है।

    कमलिनी ने तारा को फिर इशारा किया जिसे मनोरमा ने नहीं जाना। पर तारा ने वह खंजर मनोरमा के बदन से लगा दिया और वह बात-की-बात में बेहोश होकर जमीन पर गिर गई। झाड़ी में छिपा हुआ भूतनाथ भी निकल आया और कमलिनी से बोला––

    भूतनाथ––जो हो, मगर मेरा काम कुछ भी न हुआ।

    कमलिनी––इसमें कोई शक नहीं कि तुम बड़े बुद्धिमान हो, परन्तु कभी-कभी तुम्हारी अक्ल भी हवा खाने चली जाती है। तुम इस बात को नहीं जानते कि तुम्हारा काम पूरा-पूरा हो गया। यकायक तारा के पहुँच जाने से मालूम हुआ कि तुम्हारी किस्मत तेज है, नहीं तो मुझे बहुत-कुछ बखेड़ा करना पड़ता।

    भूतनाथ––सो क्या, मुझे साफ समझा दो तो जी ठिकाने हो।

    कमलिनी––मेरे पास बैठ जाओ, मैं अच्छी तरह समझा देती हूँ। (तारा की तरफ देख कर) कहो, तुम्हारा आना क्योंकर हुआ?

    तारा––मुझे एक ऐसा काम आ पड़ा कि बिना तुमसे मिले कठिनता दूर होने की आशा न रही, लाचार झण्डी टेढ़ी करके तुमसे मिलने की उम्मीद में यहाँ आयी थी।

    कमलिनी––अच्छा हुआ कि तुम आईं, इस समय तुम्हारे आने से बड़ा ही काम चला। अच्छा, बैठ जाओ और जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे सुनो।

    इसके बाद कमलिनी, तारा और भूतनाथ में देर तक बातचीत होती रही जिसे यहाँ पर लिखना हम मुनासिब नहीं समझते, क्योंकि इन लोगों ने जो कुछ करना विचारा है, वह आगे के बयान में स्वयं खुल जायेगा। जब बातचीत से छुट्टी मिली तो मनोरमा को उठा तीनों आदमी पहाड़ी के नीचे उतरे। मनोरमा एक पेड़ के साथ बाँध दी गई। इस काम से छुट्टी पाकर तारा और भूतनाथ वहाँ से अलग हो गए और किसी झाड़ी में छिप कर दूर से इन दोनों को देखते रहे। थोड़ी ही देर बाद मनोरमा होश में आई और अपने को बेबस पाकर चारों तरफ देखने लगी। पास ही में पेड़ से बँधी हुई कमलिनी पर भी उसकी निगाह पड़ी और वह अफसोस के साथ कमलिनी की तरफ देख कर बोली–– मनोरमा––बेशक तुम सच्ची हो। मेरी भूल थी जो तुम पर शक करती थी।

    कमलिनी––खैर, इस समय तो तुम्हारे ही सबब से मुझे भी कष्ट भोगना पड़ा।

    मनोरमा––इसमें कोई सन्देह नहीं।

    कमलिनी––तुम्हारा छूटना तो मुश्किल है मगर मैं किसी-न-किसी तरह धोखा देकर छूट ही जाऊँगी और तब कमलिनी से समझूँगी। अब बिना उसकी जान लिए मुझे चैन कहाँ?

    मनोरमा––तुम्हारी भी तो वह दुश्मन है, फिर तुम्हें क्योंकर छोड़ देगी?

    कमलिनी––मेरी-उसकी दुश्मनी भीतर-ही-भीतर की है, इसके अतिरिक्त एक और सबब ऐसा है कि जिससे मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तब तुम्हारे छुड़ाने का भी उद्योग करूँगी।

    मनोरमा––वह कौन-सा सबब है?

    कमलिनी––सो मैं अभी नहीं कह सकती। तुम्हें वह स्वयं मालूम हो जायगा। (चारों तरफ देख कर) न मालूम वह कम्बख्त कहाँ गई!

    मनोरमा––क्या तुम्हें भी नहीं मालूम?

    कमलिनी––नहीं, मुझे जब होश आया मैंने अपने को इसी तरह बेबस पाया।

    मनोरमा––खैर, कहीं भी हो, आवेगी ही। हाँ तुम्हें यदि अपने छूटने की उम्मीद है तो कब तक?

    कमलिनी––उसके आने पर दो-चार बातें करने से ही मुझे छुट्टी मिल जायगी और मैं तुम्हें भी अवश्य छुड़ाऊँगी। हाँ, अकेली होने के कारण विलम्ब जो कुछ हो। यदि तुम्हारा कोई मददगार हो तो बताओ, ताकि छुट्टी मिलने पर मैं तुम्हारे हाल की उसे खबर दूँ।

    मनोरमा––(कुछ सोचकर) यदि कष्ट उठाकर तुम मेरे घर तक जाओ और मेरी सखी को मेरा हाल कह सको, तो वह सहज ही में मुझे छुड़ा लेगी।

    कमलिनी––इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तुम अपने घर का पता और अपनी सखी का नाम बताओ। मैं जरूर उससे मिलकर तुम्हारा हाल कहूँगी और स्वयं भी जहाँ तक हो सकेगा, तुम्हें छुड़ाने के लिए उसका साथ दूँगी।

    मनोरमा––यदि ऐसा करो तो मैं जन्म-भर तुम्हारा अहसान मानूँगी। जब उसके कान तक मेरा हाल पहुँच जायगा तो तुम्हारी मदद की आवश्यकता न रहेगी।

    कमलिनी––खैर, अब पता और नाम बताने में विलम्ब न करो। कहीं ऐसा न हो कि कमलिनी आ जाय, तब कुछ न हो सकेगा।

    मनोरमा––हाँ ठीक है-काशीजी में त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास लाल रंग का मकान एक छोटे से बाग के अन्दर है। मछली के निशान की स्याह रंग की झण्डी दूर से ही दिखाई पड़ेगी। मेरी सखी का नाम 'नागर' है, समझ गईं?

    कमलिनी––मैं खूब समझ गई, मगर उसे मेरी बात का विश्वास कैसे होगा?

    मनोरमा––इसमें विश्वास की कोई जरूरत नहीं है। वह मुझ पर आफत आने का हाल सुनते ही बेचैन हो जायगी और किसी तरह न रुकेगी। कमलिनी––तथापि मुझे हर तरह से दुरुस्त रहना चाहिए। शायद वह समझे कि यह मुझे धोखा देने आई है और चाहती है कि मैं घर के बाहर जाऊँ तो कोई मतलब निकाले।

    मनोरमा––(कुछ सोचकर) हाँ, ऐसा हो सकता है। अच्छा, मैं तुम्हें एक परिचय बताती हूँ। जब वह बात उसके कान में कहोगी, तब वह तुम्हारा पूरा विश्वास कर लेगी। परन्तु उस परिचय को बड़ी होशियारी से अपने दिल में रखना, खबरदार! दूसरा न जानने पावे, नहीं तो मुश्किल होगी और मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

    कमलिनी––तुम विश्वास रक्खो कि वह शब्द सिवाय एक दफे के जब मैं तुम्हारी सखी के कान में कहूँगी, दूसरी दफे मेरे मुँह से न निकलेगा। (इधर-उधर देख कर) जन्दी कहो, अब देर न करो।

    मनोरमा––(कमलिनी की तरफ झुक कर धीरे से) 'विकट' शब्द कहना। बस, सन्देह न करेगी और तुम्हें मेरा विश्वासपात्र समझेगी।

    कमलिनी––ठीक है, अब जहाँ तक जल्द हो सकेगा, मैं तुम्हारी सखी के पास पहुँचूंगी और अपना मतलब निकालूँगी।

    मनोरमा––पहले तो मुझे यह देखना है कि कमलिनी तुम्हें क्योंकर छोड़ती है! जब तुम छूट जाओगी तब कहीं जाकर मुझे अपने छूटने की कुछ उम्मीद होगी।

    कमलिनी––(हँस कर) मैं उतनी ही देर में छूट जाऊँगी जितनी देर में तुम एक से लेकर निन्यानवै तक गिन सको।

    इतना कह कर कमलिनी ने सीटी बजाई। सीटी की आवाज सुनते ही तारा और भूतनाथ जो वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपे हुए थे, कमलिनी के पास आ पहुँचे। कमलिनी ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा और कहा, "मुझे छोड़ दो।"

    भूतनाथ ने कमलिनी को, जो पेड़ से बँधी हुई थी, खोल दिया। कमलिनी उठ कर मनोरमा के पास आई और बोली, "क्यों, मैं अपने कहे मुताबिक छूट गयी या नहीं!"

    कमलिनी की चालाकी के साथ ही भूतनाथ की सूरत देखकर मनोरमा सन्न हो गई और ताज्जुब के साथ उन तीनों की तरफ देखने लगी। इस समय भूतनाथ के चेहरे पर उदासी के बदले खुशी की निशानी पाई जाती थी। भूतनाथ ने हँस कर मनोरमा की तरफ देखा और कहा, "क्या अब भी भूतनाथ तेरे कब्जे में है? अगर हो तो कह, इसी समय कमलिनी का सिर काट कर तेरे आगे रख दूँ, क्योंकि वह यहाँ मौजूद है।"

    मनोरगा ने क्रोध के मारे दाँत पीसे और सिर नीचा कर लिया। थोड़ी देर बाद बोली, "अफसोस, मैं धोखा खा गई!"

    कमलिनी––(तारा से) अब समय नष्ट करना ठीक नहीं। इस हरामजादी को तुम ले जाओ और लोहे वाले तहखाने में बन्द करो, फिर देखा जायगा। (अपने हाथ का नेजा देकर) इस नेजे को अपने पास रखो और वह खंजर मुझे दे दो। अब नेजे के बदले खंजर रखना ही मैं उत्तम समझती हूँ। यद्यपि एक खंजर मेरे पास है परन्तु वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह के लिए है। तारा––मैं भी यही कहना चाहती थी, क्योंकि खंजर और नेजे में गुण तो एक ही है फिर बोझ लेकर घूमने से क्या फायदा। यह लो खंजर, अपने पास रखो।

    कमलिनी––(भूतनाथ से) तुम भी तारा के साथ जाओ और इस हरामजादी को हमारे घर पहुँचाकर बहुत जल्द लौट जाओ, तब तक मैं इसी जगह रहूँगी और तुम्हारे आते ही तुम्हें साथ लेकर काशीजी जाऊँगी। पहले तुम्हारा काम करके कुँअर इन्द्रजीतसिंह से मिलूँगी और मायारानी की मण्डली को, जिसने दुनिया में अन्धेर मचा रखा है, जहन्नुम में भेजूँगी।

    भूतनाथ––(सिर झुकाकर) जो हुक्म!

    5

    रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, कभी-कभी कुत्तों के भोंकने की आवाज के सिवाय और किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे समय में काशी की तंग गलियों में दो आदमी, जिनमें एक औरत और दूसरा मर्द है, घूमते हुए दिखाई देते हैं। ये दोनों कमलिनी और भूतनाथ हैं जो त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास मनोरमा के मकान पर पहुँचने की धुन में कदम बढ़ाये हुए तेजी के साथ जा रहे हैं। जब ये दोनों एक चौमुहानी के पास पहुँचे तो देखा कि दाहिनी तरफ से एक आदमी पीठ पर गट्ठर लादे आया और उसी तरफ को घूमा जिधर ये दोनों जाने वाले थे। कमलिनी ने धीरे से भूतनाथ के कान में कहा, "इस गठरी में जरूर कोई आदमी है।"

    भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है। इस आदमी की चाल पर भी मुझे कुछ शक पड़ता है। ताज्जुब नहीं कि यह मनोरमा का नौकर श्यामलाल हो।

    कमलिनी––तुम्हारा शक ठीक हो सकता है क्योंकि तुम बहुत दिनों तक मनोरमा के मकान पर रह चुके हो और वहाँ के हर एक आदमी को बखूबी जानते हो।

    भूतनाथ––कहो तो इसे रोकू?

    कमलिनी––हाँ-हाँ रोको, जाने न पावे।

    भूतनाथ लपककर उस आदमी के सामने गया और कमर से खंजर निकालकर उसके सामने चमकाया। उसकी चमक में भूतनाथ और कमलिनी ने उस आदमी को पहचान लिया, मगर वह इन दोनों को अच्छी तरह न देख सका, क्योंकि बिजली की तरह चमकने वाली रोशनी ने उसकी आँखें बन्द कर दी और वह घबराकर बैठ गया। भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से लगाया जिसकी तासीर से वह एक दफे काँपा और बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। भूतनाथ ने उसे उसी तरह छोड़ दिया और गठरी का कोना खोलकर देखा तो उसमें एक कमसिन औरत बँधी पाई। कमलिनी के हुक्म से भूतनाथ ने वह गठरी अपनी पीठ पर लाद ली और मनोरमा के घर का रास्ता छोड़ दोनों आदमी गंगा-किनारे की तरफ रवाना हुए।

    बात-की-बात में दोनों गंगा-किनारे जा पहुँचे। इस समय चन्द्रमा की रोशनी अच्छी तरह फैली हुई थी। एक मढ़ी के ऊपर बैठने के बाद भूतनाथ ने बह गठरी खोली। उस बेहोश औरत के चेहर पर चन्द्रमा की रोशनी पड़ते ही भूतनाथ चौंक कर बोला, "ओफ, यह तो कमला है!"

    कमला होश में लाई गई। जब उसकी निगाह भूतनाथ के ऊपर पड़ी तो वह एकदम काँप उठी। कमला को उस दिन की बात याद आ गई जिस दिन खँडहर के तहखाने में अपने चाचा शेरसिंह पास भूतनाथ को देखा था, कमला को शक हो गया कि इस समय वह जिसके हुक्म से बेहोश करके लाई गई, वह भूतनाथ ही है। कमला की दूसरी निगाह कमलिनी पर पड़ी मगर वह कमलिनी को पहचान न सकी। यद्यपि कमला कमलिनी को रोहतासगढ़ पहाड़ी पर देख चुकी थी परन्तु इस समय कमलिनी उस भयानक राक्षसी के भेष में न थी, रंग काला जरूर था, परन्तु लम्बे-लम्बे दाँत उसके मुँह में न थे, इसी से वह कमलिनी को नहीं पहचान सकी।

    कमलिनी ने जब देखा कि कमला बहुत ही डरी हुई और हैरान मालूम पड़ती है तो उसने कमला का हाथ पकड़ लिया और धीरे से दवाकर कहा, "कमला, तू डर मत। हम लोगों ने इस समय तुझे एक दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है।"

    कमला––अब मेरा जी ठिकाने हुआ। मुझे उम्मीद है कि आप लोगों की तरफ से मुझे तकलीफ न पहुँचेगी। परन्तु आप लोगों को जानने के लिए मेरा जी बेचन हो रहा है।

    कमलिनी––ठीक है, जरूर तेरा जी चाहता होगा कि हम लोगों का हाल जाने और इसी तरह मैं भी तुझसे बहुत-कुछ पूछना चाहती हूँ मगर इस समय केवल चार-पाँच घण्टे के लिए तुझसे जुदा होती हूँ, तब तक तू (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनके साथ रह। किसी तरह से डर मत, सवेरा होने के पहले ही मैं तुझसे आकर मिलूँगी और बातचीत के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने का उद्योग करूँगी।

    कमला––मैं आपके हुक्म के खिलाफ कुछ न करूँगी। मैं आपसे हर तरह पर भलाई की आशा रखती हूँ क्योंकि आपने मुझे एक ऐसे दुश्मन के हाथ से जिसका हाल मैं ही जानती हूँ।

    कमलिनी––अच्छा, तो अब बातों में समय नष्ट करना ठीक नहीं है। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, यहाँ छोटी-छोटी बहुत-सी डोंगियाँ बँधी हुई हैं, सन्नाटा और मौका देखकर कोई एक डोंगी खोल लो और कमला को साथ लेकर गंगा-पार चले जाओ। मैं अब मनोरमा के घर जाती हूँ, वहाँ अपना मतलब साधकर सवेरा होने के पहले ही तुमसे आ मिलूँगी।

    कमला––(चौंककर) क्या नाम लिया, मनोरमा! हाय-हाय, वह तो बड़ी शैतान है। हम लोगों को तो उसने तबाह कर डाला! क्या तुम उसके …

    कमलिनी––डर मत कमला! मनोरमा को मैंने कैद कर लिया है और अब एक

    च॰ स॰-2-6

    जरूरी काम के लिए उसके घर पर जा रही हूँ। (आसमान की तरफ देखकर) ओफ, बहुत बिलम्ब हुआ, खैर, अब बिदा होती हूँ, पुनः मिलने पर सब हाल कहूँगी।

    कमलिनी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी ही देर में उस बाग के फाटक पर जा पहुँची जिसमें मनोरमा का मकान था। फाटक के साथ लोहे की एक जंजीर लगी हुई थी जिसे हिलाने से दरबान ने एक छोटे-से सुराख में से बाहर की तरफ देखा जो इसी काम के लिए बना हुआ था। केवल एक औरत को दरवाजे पर मौजूद पाकर दरबान ने फाटक खोल दिया और जब कमलिनी अन्दर चली आई तो फाटक उसी तरह बन्द कर दिया और तब कमलिनी से पूछा, "तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो?"

    कमलिनी––मुझे मनोरमा जी ने पत्र देकर अपनी सखी नागर के पास भेजा है, तुम मुझे नागर के पास बहुत जल्द ले चलो।

    दरबान––वह तो यहाँ नहीं हैं, किसी दूसरी जगह गई हैं।

    कमलिनी––कब आवेंगी?

    दरबान––सो मैं ठीक नहीं कह सकता।

    कमलिनी––क्या तुम यह भी नहीं कह सकते कि वे आज या कल तक लौट आवेंगी या नहीं?

    दरबान––हाँ, यह तो मैं कह सकता हूँ कि चार-पाँच दिन तक वे न आवेंगी; इसके बाद चाहे जब आवें।

    कमलिनी––अफसोस, अब बेचारी मनोरमा नहीं बच सकती।

    दरबान––(चौंककर) क्यों-क्यों? उन पर क्या आफत आई?

    कमलिनी––यह एक गुप्त बात है जो मैं तुमसे नहीं कह सकती, हाँ, इतना कहने में कोई हर्ज नहीं कि यदि तीन दिन के अन्दर उन्हें बचाने का उद्योग न किया जायगा तो चौथे दिन कुछ नहीं हो सकता, वे अवश्य मार डाली जायेंगी।

    दरबान––अफसोस, यदि आप एक दिन तक यहाँ अटकना मंजूर करें तो मैं नागरजी के पास जाकर उन्हें बुला लाऊँ। आपको यहाँ किसी तरह की तकलीफ न होगी!

    कमलिनी––(कुछ सोचकर) मुझे एक जरूरी काम है, इसलिए अटक तो नहीं सकती, परन्तु कल शाम तक अपना काम करके लौट आ सकती है।

    दरबान––यदि आप ऐसा कर तो भी काम चल सकता है, परन्तु आप अटक न जायँ। यदि आपका काम ऐसा हो जिसे हम लोग कर सकते हों तो आप कहें, उसका बन्दोबस्त कर दिया जायगा।

    कालिनी नहीं, बिना मेरे गये वह काम नहीं हो सकता। मगर कोई चिन्ता नहीं, मैं कल शाम तक अवश्य आ जाऊँगी।

    दरबान––जैसी मर्जी, आपकी मेहरबानी से यदि हमारे मालिक की जान बच जायगी तो हम लोग जन्म भर के लिए गुलाम रहेंगे।

    कमलिनी––मैं अवश्य आऊँगी और उनके लिए हर तरह का उद्योग करूँगी, तुम जाती समय इसका बन्दोबस्त कर जाना कि यदि तुम्हारे लौट आने के पहले ही मैं यहाँ पहुँच जाऊँ तो मुझे यहाँ रहने में किसी तरह का तरद्दुद न हो।

    दरबान––इससे आप बेफिक्र रहें, मैं पूरा-पूरा इन्तजाम करके जाऊँगा और नागरजी को लेकर बहुत जल्दी लौटूँगा।

    फाटक खोल दिया गया और कमलिनी बाग के बाहर हो गई। वह अभी बीस कदम भी आगे न गई होगी कि एक आदमी बदहवास और दौड़ता हुआ उसी बाग के फाटक पर पहुँचा और दरवाजा खुलवाने का उद्योग करने लगा। कमलिनी जान गई कि यह वही आदमी है जिसके हाथ से अभी थोड़ी ही देर पहले मैंने कमला को छुड़ाया है। कमलिनी उसी जगह आड़ में खड़ी होकर उसे देखने और कुछ सोचने लगी। जब बाग का फाटक खुल गया और वह आदमी अन्दर चला गया तो न मालूम क्या सोचती विचारती कमलिनी भी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी रात बाकी थी, जब कमला और भूतनाथ के पास पहुँची जो गंगा-पार उसके आने की राह देख रहे थे। कमलिनी को बहुत जल्दी लौट आते देख भूतनाथ को ताज्जुब हुआ और उसने कहा––

    भूतनाथ––मालूम होता है कि कुछ काम न हुआ और आपको खाली ही लौट आना पड़ा!

    कमलिनी––हाँ, इस समय तो खाली ही लौटना पड़ा, मगर काम हो जायगा। नागर घर पर मौजूद न थी, उसका आदमी उसे बुलाने के लिए गया है। मैं कल शाम तक फिर वहाँ पहुँचने का वादा कर आई हूँ। इच्छा तो यही थी कि वहाँ अटक जाऊँ क्योंकि ऐसा करने से और भी कुछ काम निकलने की उम्मीद थी, परन्तु कमला के खयाल से लौट आना पड़ा। मैं चाहती हूँ कि कमला को रोहतासगढ़ रवाना कर दूँ क्योंकि उसकी जुबानी कुछ हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को ढाढ़स होगी और लड़कों के सोच में बहुत व्याकुल न रहेंगे। (कमला की तरफ देख कर) तेरी क्या राय है?

    कमला––जो कुछ आप हुक्म दें मैं करने को तैयार हूँ, परन्तु इस समय मैं बहुत सी बातों का असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रही हूँ और सिवाय आपके कोई दूसरा मेरी दिलजमई नहीं कर सकता!

    कमलिनी––कोई हर्ज नहीं, मैं हर तरह से तेरी दिलजमई कर दूँगी।

    इतना सुनकर कमला भूतनाथ की तरफ देखने लगी। कमलिनी समझ गई कि यह निराले में मुझसे कुछ पूछना चाहती है। अस्तु, उसने भूतनाथ को वहाँ से हट जाने के लिए कहा और जब वह कुछ दूर चला गया तो कमला से बोली, "अब निराला हो गया, जो कुछ पूछना हो पूछो।"

    कमला––मुझे आपका कुछ हाल भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ है परन्तु उस से पूरी दिलजमई नहीं होती। मुझे पूरा-पूरा पता लग चुका था कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह आपके यहाँ कैद हैं, फिर न मालूम, उन पर क्या आफत आई और उनके साथ आपने क्या सलूक किया। यद्यपि उस समय हम लोग आपके नाम से डरते थे, परन्तु जब आपने कई दफे हम लोगों के साथ नेकी की जिसका हाल आज मालूम हुआ है तो वह बात अब मेरे दिल से जाती रही, फिर भी कुँअर इन्द्रजीतसिंह के बारे में शक बना ही रहा है। कमलिनी––सुन, मैं तुझसे पूरा-पूरा हाल कहती हूँ। यह तो तुझे मालूम ही हो चुका कि मैं कमलिनी हूँ।

    कमला––जी हाँ, यह तो (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनकी कृपा से मालूम हो गया और इन्हीं के जुबानी यह भी जान गई कि रोहतासगढ़ में उस कब्रिस्तान के अन्दर हाथ में चमकता हुआ नेजा लेकर आप ही ने हम लोगों की मदद की थी और बेहोश करके रोहतासगढ़ किले के अन्दर पहुँचा दिया था। दूसरी दफे राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को रोहतासगढ़ के कैदखाने से आप ही ने छुड़ाया था और तीसरी दफे उस खँडहर में यकायक विचित्र रीति से आप ही को पहुँचते हम लोगों ने देखा था।

    कमलिनी––यद्यपि कुछ लोगों ने मुझे बदनाम कर रक्खा है, परन्तु वास्तव से मैं वैसी नहीं हूँ। मैं नेकी करने के लिए हरदम तैयार रहती हूँ, इसी तरह दुष्टों को मजा चखाने की भी नीयत रहती है। मैंने कुँअर इन्द्रजीतसिंह के साथ किसी तरह की बुराई नहीं की, बल्कि उनके साथ नेकी की और उन्हें एक बहुत बड़े दुश्मन के हाथ से छुड़ाया। जब वे तुम लोगों से मिलेंगे और हाल कहेंगे, तब मालूम होगा कि कमलिनी ने सच कहा था!

    इसके बाद कमलिनी ने इन्द्रजीतसिंह का अपने लश्कर से गायब होना और उन्हें दुश्मन के हाथ से छुड़ाना, कई दिनों तक अपने मकान में रखना, माधवी को गिरफ्तार करना, किशोरी का रोहतासगढ़ के तहखाने से निकलना और धनपति के कब्जे में पड़ना, तारा के खबर पहुँचाने पर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर किशोरी को छुड़ाने के लिए जाना, रास्ते में शेरसिंह और देवीसिंह से मिलना, अग्निदत्त का हाल और अन्त में उस तिलिस्मी मकान के अन्दर सभी लोगों का कूद जाना आदि कमला से पूरा-पूरा बयान किया। कमला ताज्जुब से सब बातें सुनती रही और अब कमलिनी पर उसे पूरा पूरा विश्वास हो गया।

    कमला फिर किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस खँडहर वाले तहखाने में क्योंकर पहुँचे?

    कमलिनी––वह खँडहर एक छोटे से तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है। एक औरत जो मायारानी के नाम से पुकारी जाती है और जिसका हाल कुछ दिन बाद तुम लोगों को मालूम होगा, उस तिलिस्म पर राज्य करती है। मैं उसकी सगी बहिन हैं। हमारी तिलिस्मी किताब से साबित होता है कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह उस तिलिस्म को तोड़ेंगे क्योंकि तिलिस्म तोड़ने वालों के जो-जो लक्षण उस किताब में लिखे वे सब इन दोनों भाइयों में पाये जाते हैं, परन्तु मायारानी चाहती है कि तिलिस्म टने न पावे और इसीलिए वह दोनों कुमारों को अपनी कैद में रखने अथवा मार डालने का उद्योग कर रही है। मैंने उसे बहुत-कुछ समझाया और कहा कि तिलिस्म बनाने वालों के खिलाफ चलने और इन दोनों भाइयों से दुश्मनी रखने का नतीजा अच्छा न होगा परन्तु उसने न माना बल्कि वह मेरी भी दुश्मन बन बैठी। अन्त में लाचार मुझे उसका साथ छोड़ देना पड़ा। मैंने उस तालाब वाले मकान पर अपना कब्जा कर लिया और उसी में रहने लगी। उस मकान में मैं बेफिक्र रहती हूँ। मायारानी के कई आदमियों ने, जो नेक और ईमानदार थे, मेरा साथ दिया। तिलिस्म का जितना हाल उसे मालूम है, उतना ही मुझे भी मालूम है। यही सबब है कि वह अर्थात् तिलिस्मी महारानी (मायारानी) वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान के साथ दुश्मनी कर रही है और मैं हर तरह से उसकी मदद कर रही हूँ। उस तिलिस्मी मकान के अन्दर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों तथा मेरे नौकरों का हँसते-हँसते कूद जाना उसी तिलिस्मी महारानी की कार्रवाई थी और उस खँडहर वाले तहखाने में जो कुछ तुम लोगों ने देखा, वह सब भी उसी की बदौलत थी। अफसोस, गुप्त राह से महारानी के बहुत से आदमियों के पहुँच जाने के कारण मैं कुछ कर न सकी। खैर, कोई हर्ज नहीं। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी तथा कामिनी वगैरह का मायारानी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि उसकी असल जमा-पूँजी जो थी, वह मेरे हाथ लग चुकी है जिसका खुलासा हाल इस समय मैं नहीं कह सकती। हाँ, इतना प्रतिज्ञापूर्वक कहती हूँ कि उन लोगों को मैं बहुत जल्द कैद से छुड़ाऊँगी।"

    कमला––मैं समझती हूँ कि वह मकान भी तिलिस्मी होगा जिसके अन्दर कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद पड़े थे।

    कमलिनी––नहीं, उस मकान का तिलिस्म से कोई सम्बन्ध नहीं, वह नया बनाया गया है। मुझे उसकी खबर न थी इसी से मैं धोखे में आ गई, पीछे पता लगाने से मालूम हुआ कि वह भी मायारानी की कार्रवाई थी।

    कमला––अब मेरा जी ठिकाने हुआ और आपकी बदौलत अपनी प्यारी सखी किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह के छूटने की उम्मीद हई। अब आशा है कि आपकी कृपा से एक दफे मायारानी को भी देखूँगी।

    कमलिनी––इसके लिए जल्दी करना मुनासिब नहीं, मैं आज ही कल में तुझे अपने साथ मायारानी के घर ले चलती, क्योंकि मुझे वहाँ जाने की बहुत जल्दी है परन्तु इस समय तेरा रोहतासगढ़ लौट जाना ही ठीक है क्योंकि राजा वीरेन्द्रसिंह लड़कों की जुदाई में हद से ज्यादे दुःखी होंगे, तेरे लौट जाने से उन्हें ढाढ़स होगा और मेरी जुबानी जो कुछ तूने सुना है जब उनसे बयान करेगी तो उन्हें एक प्रकार की आशा हो जायगी। हाँ, एक बात तुझसे पूछना मैं भूल गई।

    कमला––वह क्या?

    कमलिनी––तू कहती है कि मैं मायारानी को देखना चाहती हूँ, तो क्या तूने उसे नहीं देखा? उसी के आदमी तो तुझे गिरफ्तार करके ले गए थे, जहाँ तक मैं समझती हूँ, तू उसके पास जरूर पहुँचाई गई होगी।

    कमला––हाँ-हाँ, मैं एक जनाने दरबार में पहुँचाई गई थी मगर यह नहीं कह सकती कि वह मायारानी का ही दरवार था या कोई दूसरा, और यदि मायरानी का ही दरवार था तो ……

    कमलिनी––पहले तू अपना हाल कह जा कि जब खँडहर के अन्दर तहखाने में घुमी तो क्या हुआ और क्योंकर गिरफ्तार होकर कहाँ गई?

    कमला––जब हम लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ कुमार को निकालने के लिए उस खँडहर वाले तहखाने में गये तो वहाँ किसी को न पाया। सीढ़ी के नीचे एक छोटी कोठरी थी, मैं उसमें घुस गई। देखा कि पत्थर की एक सिल्ली दीवार से अलग होकर जमीन पर पड़ी हुई और उस जगह एक आदमी के जाने लायक रास्ता है। उस दरवाजे के दूसरी तरफ एक और कोठरी नजर आई जिसमें चिराग जल रहा था। मैंने आनन्द सिंह और तारासिंह को पुकारा, जब वे आ गए तो तीनों आदमी उस कोठरी के अन्दर घसे। जब दो-तीन कदम आगे गये तो यकायक पीछे से खटके की आवाज आई, घूमकर देखा तो वह रास्ता बन्द पाया जिधर से आये थे। ताज्जुब में आकर हम लोग सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। यकायक कई आदमी एक तरफ से निकलकर आये और उन लोगों ने फुर्ती के साथ एक-एक चादर हम लोगों के ऊपर डाल दी। मुझे उस चादर की तेज महक कभी न भूलेगी। सिर पर पड़ते ही अजब हालत हो गई, एक प्रकार की तेज महक नाक के अन्दर घुसी और उसने तन-बदन की सुध भुला दी। न मालूम उसी दिन या दूसरे या कई दिन के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को रात के समय एक जनाने दरबार में पाया।

    कमलिनी––वह दरबार कैसा था?

    कमला––वह दरबार एक बारहदरी में था। जड़ाऊ सिंहासन पर एक नौजवान औरत दक्षिणी ढंग की पोशाक पहने बैठी थी। मैं कह सकती हूँ कि सिवाय किशोरी के उसके मुकाबले की खूबसूरत औरत आज तक किसी ने न देखी होगी।

    कमलिनी––बस-बस, मैं समझ गई, वही मायारानी थी। हाँ, और क्या देखा?

    कमला––उसके दाहिनी तरफ सोने की एक चौकी पर मृगछाला बिछा हुआ था मगर उस पर कोई बैठा न था।

    कमलिनी––वह तिलिस्म के दरोगा की जगह थी जो वृद्ध साधु के वेष में रहता है, मगर आज कल उसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने कैद कर लिया है।

    कमला––(ताज्जुब से) राजा वीरेन्द्रसिंह ने कब और किस दारोगा को कैद किया है?

    कमलिनी––उस तिलिस्मी खँडहर में जब तुम लोग गये तो किसी साधु को बेहोश पाया था या नहीं?

    कमला––(कुछ सोचकर) हाँ-हाँ, एक कोठरी के अन्दर जिसमें एक मूरत थी। क्या वही तिलिस्मी दारोगा है?

    कमलिनी––हाँ, वही दारोगा है, वही बहुत से आदमियों को साथ लेकर तहखाने में से कुमार को उठा लाने के लिए उस खँडहर में गया था, मगर तारासिंह की चालाकी से अपने साथियों के सहित बेहोश हो गया। उस समय वेष बदले मेरा भी एक आदमी वहाँ मौजूद था, मगर दूर ही से सब-कुछ देख रहा था। हाँ तो उस दरबार में और क्या देखा?

    कमला––उस मृगछाला बिछी हुई चौकी के पास अर्धगोलाकार बीस जड़ाऊ कुर्सियाँ और थीं और उसी तरह सिंहासन के बाईं तरफ छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर एक खूबसूरत औरत बैठी हुई थी जिसके बाद फिर बीस या इक्कीस जड़ाऊ कुर्सियाँ थीं, और दोनों तरफ वाली जड़ाऊ कुर्सियों पर नौजवान और खूबसूरत औरतें बड़े ठाठ से बैठी थीं । मैं उस दरबार को कभी न भूलूँगी।

    कमलिनी––ठीक है, तो अब तुझे मायारानी को देखने की कोई आवश्यकता नहीं, खैर, मुख्तसिर में कह, फिर क्या हुआ?

    कमला––पहले यह बता दीजिये कि मायारानी के बगल में छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर कौन औरत थी, क्योंकि वह भी बड़ी ही खूबसूरत थी?

    कमलिनी––वह मेरी छोटी बहिन थी। सब से बड़ी मायारानी, उससे छोटी मैं और मुझसे छोटी वही औरत है, उसका नाम लाड़िली है।

    कमल––आपकी और भी कोई बहिन है?

    कमलिनी––नही, हम तीनों के सिवाय और कोई बहिन या भाई नहीं है। अब तू अपना हाल कह, फिर क्या हुआ?

    कमला––मायारानी के सिंहासन के पीछे मनोरमा खड़ी थी। उन सभी की बातचीत से मुझे मालूम हुआ कि उसका नाम मनोरमा है। वह बड़ी दुष्ट थी!

    कमलिनी––थी नहीं, बल्कि है। हाँ, तब क्या हुआ?

    कमला––ऐसे दरबार को देख मैं घबरा गई। जिधर निगाह पड़ती थी उधर ही एक से एक बढ़ के जड़ाऊ चीजें नजर आती थीं। मैं हैरान थी कि इतनी दौलत इन लोगों के पास कहाँ से आई और ये लोग कौन हैं। मैं ताज्जब में आकर चारों तरफ देखने लगी। यकायक मेरी निगाह कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह पर पड़ी। कुँअर आनन्दसिंह हथकड़ी और बेड़ी से लाचार मेरे पीछे की तरफ बैठे थे। उनके पास उन्हीं की तरह हथकड़ी-वेड़ी से वेबस तारासिंह भी बैठे थे। फर्क इतना था कि कुँअर आनन्दसिंह जख्मी न थे, मगर तारासिंह बहुत ही जख्मी और खून से तरबतर हो रहे थे। उनकी पोशाक खून से रँगी हुई मालूम पड़ती थी। यद्यपि उनके जख्मों पर पट्टी बँधी हुई थी मगर सुरत देखने से साफ मालूम पड़ता था कि उनके बदन से खून बहुत निकल गया है और इसी से वे सुस्त और कमजोर हो रहे हैं। कुमार की अवस्था देखकर मुझ क्रोध चढ़ आया, मगर क्या कर सकती थी, क्योंकि हथकडी और बेडी ने मुझे भी लाचार कर रक्खा था। हाथ में नंगी तलवारें लिए कई औरतें कुँअर आनन्दसिंह, तारासिंह और मुझको घेरे हुए थीं। यह जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा था कि जब हम लोग बेहोश करके यहाँ लाए गये तो तारासिंह को जख्मी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। मायारानी ने मनोरमा की तरफ देखा और कुछ इशारा किया, मनोरमा तुरत मेरे पास आई। उसके एक हाथ में कोई चिट्ठी थी और दूसरे हाथ में कलम और दावात। मनोरमा ने वह चिट्ठी मेरे आगे रख दी और उस पर हस्ताक्षर कर देने के लिए मुझे कहा, मैंने चिट्ठी पढ़ी और क्रोध के साथ हस्ताक्षर करने से इनकार किया।

    कमलिनी––उस चिट्ठी में क्या लिखा हुआ था? कमला-वह चिट्ठी मेरी तरफ से राजा वीरेन्द्रसिंह के नाम लिखी गई थी और उसमें यह लिखा था––

    "आप चिट्ठी देखते ही केवल एक ऐयार को लेकर इस आदमी के साथ बेखौफ चले आइए। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी वगैरह इसी जगह कैद हैं। उनको छुड़ाने का पूरा-पूरा उद्योग में कर चुकी हूँ, केवल आपके आने की देर है। यदि आप तीन दिन के अन्दर यहाँ न पहुँचेंगे तो इन लोगों में से एक की भी जान न बचेगी।"

    कमलिनी––अच्छा फिर क्या हुआ?

    कमला––जब मैंने दस्तखत करने से इनकार किया तो मनोरमा बहुत बिगड़ी और बोली कि "यदि तू हस्ताक्षर न करेगी, तो तेरे सामने ही कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह का सिर काट लिया जायगा और उसके बाद तुझे भी सूली दे दी जायगी।" यह सुनकर मैं घबरा गई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। इतने में ही। तारासिंह ने मुझे पुकारकर कहा, "कमला, उस चिट्ठी में जो कुछ लिखा है मैं अन्दाज से कुछ-कुछ समझ गया। खबरदार, इन लोगों की धमकी में न आना, और चाहे जो हो, उस चिट्ठी पर दस्तखत भी न करना।" तारासिंह की बात सुनकर मायारानी की तो केवल भौंहें ही चढ़कर रह गयीं, परन्तु मनोरमा बहुत ही उछली-कूदी और बकझक करने लगी। उसने मायारानी की तरफ देखकर कहा, "कम्बख्त तारासिंह को अवश्य सूली देनी चाहिए उसने अब यहाँ का रास्ता भी देख लिया है इसलिए उसका मारना आवश्यक हो गया है, और इस नालायक कमला को सरकार मेरे हवाले करें, मैं इसे अपने घर ले जाऊँगी।" मायारानी ने इशारे से मनोरमा की बात मंजूर की। मनोरमा ने एक चोबदार औरत की तरफ देखकर कहा, "कमला को ले जाकर कैद में रखो। चार-पाँच दिन बाद काशीजी में हमारे घर पर भिजवा देना, क्योंकि इस समय मुझे एक जरूरी काम के लिए जाना है जहाँ से तीन-चार दिन के अन्दर शायद न लौट सकूँगी।" हुक्म के साथ ही मुझ पर पुनः चादर डाल दी गई जिसकी तेज महक ने मुझको बेहोश कर दिया और फिर जब मैं होश में आई, तो अपने को एक अँधेरी कोठरी में कैद पाया। कई दिन तक मैं उसी कोठरी में कैद रही और इस बीच में जो कुछ रंज और तकलीफ उठानी पडी, उसका कहना व्यर्थ है। आखिर एक दिन भोजन में मुझे बेहोशी की दवा दी गई और बेहोश होने के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को आपके कब्जे में पाया। अब न मालूम कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, किशोरी और उनके ऐयार लोगों पर क्या मुसीबत आई और वे लोग किस अवस्था में पड़े हुए हैं!

    यहाँ तक कहकर कमला चुप हो गई मगर उसकी आँखों से आँसू की बूँदें बराबर जारी थीं। कमलिनी भी बड़े गौर और अफसोस के साथ उसकी बातें सुनती जाती थी और जब वह चुप हो गई तो बोली––

    कमलिनी––कमला, सब्र कर, घबरा मत। देख, मैं उन लोगों को कैसा छकाती हूँ। उन लोगों की क्या मजाल जो मेरे हाथ से बचकर निकल जायें। तिलिस्मी मकान के अन्दर जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद गये थे तो उन लोगों के पहले मैंने अपने कई आदमी उस मकान के अन्दर कुदाये थे जिसका हाल थोड़ी देर पहले मैं तुझके कह चुकी हूँ। मैंने उन आदमियों को बेसबब दुश्मनों के हाथ में नहीं फँसाया, कुछ समझ-बूझ के ही ऐसा किया था। वे लोग साधारण मनुष्य न थे, आशा है कि थोड़े दिन में तू सुन लेगी कि उन लोगों ने क्या-क्या कार्रवाई की।

    कमला––आज आपके मिलने से और बहुत-सी बातें सुनकर मेरा जी ठिकाने हुआ। आप सरीखा मददगार के पाकर मैं भी अपने जी का हौसला निकालना चाहती हूँ और …

    कमलिनी––नहीं-नहीं, इस समय तू और कुछ मत सोच और सीधे रोहतासगढ़ चली जा। तेरे वहाँ जाने से दो काम निकलेंगे, एक तो तेरी जुबानी सब हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को बहुत-कुछ ढाढ़स होगी, दूसरे, तू इस बात से भी होशियार रहना और सबको भी होशियार कर देना कि वह तिलिस्मी दारोगा अर्थात् बूढ़ा साधु कहीं घोखा देकर निकल न जाय। इसमें कोई शक नहीं कि मायारानी ने उसे छुड़ाने के लिए कई आदमी रोहतासगढ़ भेजे होंगे।

    कमला––बहुत अच्छा! मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ और उस बुड्ढे कम्बख्त से होशियार रहूँगी। मगर एक भेद बहुत दिनों से मेरे दिल में खटक रहा है, यदि आप चाहें तो मेरे दिल से वह खुटका निकाल सकती हैं।

    कमलिनी––वह क्या है?

    कमला––(भूतनाथ की तरफ इशारा करके) यह कौन हैं? इनका असल भेद मुझको बता दीजिये।

    कमलिनी––(हँसकर) इसमें सन्देह नहीं कि भूतनाथ के बारे में तरह-तरह की बातें तू सोचती होगी, परन्तु लाचार है कि इस समय इनका असल भेद तुझसे नहीं कह सकती। थोड़े ही दिनों में इनका हाल तुझे ही नहीं, सभी को मालूम हो जायगा। हाँ, इतना अवश्य कहूँगी कि तुझे अपने चाचा शेरसिंह की तरह इनसे डरने की कोई जरूरत नहीं। ये तुझे किसी तरह की तकलीफ न देंगे, बल्कि जहाँ तक हो सकेगा, तेरी मदद करेंगे।

    कमलिनी से अपने सवाल का पूरा-पूरा जवाब न पाकर कमला चुप हो रही और कमलिनी की आज्ञानुसार उसको उसी समय रोहतासगढ़ चले जाना पड़ा।

    ↑

    इसी दरबार में रामभोली का आशिक नानक गया था।

    6

    दूसरे दिन कुछ रात बीते कमलिनी फिर मनोरमा के मकान पर पहुँची। बाग के फाटक पर उसी दरबान को टहलते पाया जिससे कल बातचीत कर चुकी थी। इस समय बाग का फाटक खुला हुआ था और उस दरबान के अतिरिक्त और भी कई सिपाही वहाँ मौजद थे। दरबान कमलिनी को देखते ही खुशी से आगे बढ़ा और बोला, "आइये आइये, मैं कब से आपकी राह देख रहा हूँ। नागरजी को आये दो घण्टे से ज्यादा हो गये और वे आपसे मिलने के लिए बेताब हो रही हैं।" दरबान के साथ ही साथ कमलिनी बाग के अन्दर गई और उस आलीशान मकान के सहन में पहुँची जो इस बाग के बीचोंबीच बना हुआ था। इस मकान के कमरों, दालानों, कोठरियों, तहखानों और पेचीले रास्तों का यदि यहाँ पूरा-पूरा बयान किया जाय तो पाठकों का बहुत समय नष्ट होगा, क्योंकि इस हिकमती मकान के हरएक दर्जे और हरएक हिस्से बड़ी कारीगरी और मतलब के साथ बनाये गये हैं। यदि हमारे पाठकों को तीन-चार बार इस मकान के अन्दर जाने और रात भर रहने का मौका मिल जायगा तो उन्हें यहाँ का बहुत भेद मालूम हो जायगा।

    कमलिनी ने नागर को सहन में टहलते हए पाया। वह सिर नीचा किये किसी सोच में डूबी हुई टहल रही थी, कमलिनी के पैर की आहट पाकर चौंकी और बोली––

    नागर––क्या मेरी सखी मनोरमा का सन्देशा लेकर तुम ही आई हो?

    कमलिनी––हाँ।

    नागर––तुम कौन और कहाँ की रहने वाली हो? मैंने तुम्हें सिवाय आज के पहले कभी नहीं देखा।

    कमलिनी––हाँ, ठीक है, परन्तु मैं अपना परिचय किसी तरह नहीं दे सकती।

    नागर––यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारी बातों पर क्योंकर विश्वास करूँगी?

    कमलिनी––यदि मेरी बातों पर विश्वास न करोगी तो मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा अगर कुछ बिगड़ेगा तो तुम्हारा या तुम्हारी सखी मनोरमा का। जब मनोरमा ने मुझे तुम्हारे पास भेजा तो मुझे भी इस बात का तरद्दुद हुआ और मैंने उनसे कहा कि तुम मुझे भेजती तो हो, मगर जाने से कोई काम न निकलेगा क्योंकि मैं किसी तरह अपना परिचय किसी को नहीं दे सकती और बिना मुझे अच्छी तरह जाँचे नागर मेरी बात पर विश्वास न करेंगी। इसके जवाब में मनोरमा ने कहा कि मैं लाचार हूँ, सिवाय तेरे यहाँ पर मेरा हित कोई नहीं जिसे नागर के पास भेजूँ। यदि तू न जायेगी तो मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती। खैर, तुम्हें मैं एक शब्द बताती हूँ, मगर खबरदार, वह शब्द सिवाय नागर के किसी दूसरे के सामने जबान से न निकालना। जिस समय नागर तेरी जबान से वह शब्द सुनेगी, उसी समय उसका शक जाता रहेगा और जो कुछ तू उसे कहेगी वह अवश्य करेगी। आखिर मनोरमा ने वह शब्द मुझे बताया और उसी के भरोसे मैं यहाँ तक आई हूँ।

    नागर––(कुछ सोचकर) वह शब्द क्या है?

    कमलिनी––(चारों तरफ देखकर और किसी को न पाकर) 'विकट'!

    नागर––(कुछ देर तक सोचने के बाद) खैर, मुझे तुम पर भरोसा करना पड़ा। अब कहो, मनोरमा किस अवस्था में है और मुझे क्या करना चाहिए?

    कमलिनी––मनोरमा भूतनाथ से मिलने के लिए गई थी, मगर उससे मुलाकात होने पर न मालूम कौन-सा ऐसा सबब आ पड़ा कि उसने भूतनाथ का सिर काट लिया।

    नागर––(चौंककर) हैं! भूतनाथ को मार ही डाला!

    कमलिनी––हाँ, उस समय मैं मनोरमा के साथ, मगर कुछ दूर पर, खड़ी यह हाल देख रही थी।

    नागर––अफसोस, मनोरमा ने बहुत ही बुरा किया! आजकल भूतनाथ से बहुत कुछ काम निकलने का जमाना था। खैर, तब क्या हुआ?

    कमलिनी––मनोरमा को मालूम न था कि राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार तेजसिंह इस समय थोड़ी ही दूर पर एक पेड़ की आड़ में खड़ा भूतनाथ और मनोरमा की तरफ देख रहा है।

    नागर––ओफ, तेजसिंह को भूतनाथ के मरने का सख्त रंज हुआ होगा, क्योंकि इन दिनों भूतनाथ दिलोजान से उन लोगों की मदद कर रहा था, अच्छा तब?

    कमलिनी––तेजसिंह बड़ी फुर्ती से उस जगह जा पहुँचा जहाँ मनोरमा खड़ी थी और एक लात मनोरमा की छाती पर ऐसी लगाई कि वह बदहवास हो जमीन पर गिर पड़ी। तेजसिंह ने उसकी मुश्कें बाँध लीं और जफील बजाई, जिसकी आवाज सुन कई आदमी वहाँ आ पहुँचे। उन लोगों ने मनोरमा के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर लिया। उसी समय मनोरमा के कई सवार दूर से आते हुए दिखाई पड़े, मगर उन लोगों के पहुँचने के पहले ही तेजसिंह और उसके साथी हम दोनों को लेकर वहाँ से थोड़ी दूर पर पेड़ों की आड़ में जा छिपे। दूसरे दिन हम दोनों ने अपने को रोहतासगढ़ किले के अन्दर पाया। मनोरमा ने अपने छूटने की बहुत-कुछ कोशिश की, मगर कोई काम न चला। आखिर उसने तेजसिंह से कहा कि "भूतनाथ बड़ा ही शैतान, नालायक और खूनी आदमी था; उसका असल हाल आप लोग नहीं जानते, यदि जानते तो आप लोग खुद भूतनाथ का सिर काट डालते।" इसके जवाब में तेजसिंह ने कहा कि "यदि इस बात को तू साबित कर दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा।" मनोरमा ने मेरी तरफ इशारा करके कहा कि "यदि आप इसे छोड़ दें और पाँच दिन की मोहलत दें तो इसे मैं अपने घर भेजकर भूतनाथ के लिखे थोड़े कागजात ऐसे मँगा दूँ कि जिन्हें पढ़ते ही आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाय और भूतनाथ का वह विचित्र हाल भी, जिसे आप लोग नहीं जानते, मालूम हो। यदि मैं झूठी निकलूं तो जो कुछ चाहें, मुझे सजा दीजियेगा।" तेजसिंह ने कुछ देर सोच-विचार कर कहा कि "हो सकता है मुझसे बहाना करके इसे घर भेजो और किसी तरह की मदद मँगाओ, मगर मुझे इसकी कुछ परवाह नहीं, मैं तुम्हारी बात मंजूर करता हूँ और इसे (मेरी तरफ इशारा करके) छोड़ देता हूँ, जो कुछ चाहो, इसे समझा-बुझाकर अपने घर भेजो।" इसके बाद मुझसे निराले में बातचीत करने के लिए आज्ञा माँगी गई और तेजसिंह ने उसे भी मंजूर किया। आखिर मनोरमा ने मुझे बहुत-कुछ समझा-बुझाकर तुम्हारे पास रवाना किया। अब मैं तो रोहतासगढ़ जाने वाली नहीं, क्योंकि बड़ी मुश्किल से जान बची है, मगर तुम्हें मुनासिब है कि जहाँ तक हो सके, भूतनाथ के कागजात लेकर जल्द रोहतासगढ़ जाओ और अपनी सखी के छुड़ाने का बन्दोवस्त करो।

    कमलिनी की बातें सुनकर नागर सोच-सागर में डूब गयी। न मालूम उसके दिल में क्या-क्या बातें पैदा हो रही थीं, मगर लगभग आधी घड़ी के वह चुपचाप बैठी रही। इसके बाद उसने सिर उठाया और कमलिनी की तरफ देखकर कहा, "खैर, अब मुझे रोहतासगढ़ जाना जरूरी हुआ। रात-भर में वे सब इन्तजाम करके सवेरे या कुछ दिन चढ़े रवाना हो जाऊँगी।"

    कमलिनी––अच्छा, तो मेरे जिम्मे जो कुछ काम था उसे मैं कर चुकी। अब तुम जो मुनासिब समझो करो और मुझे आज्ञा दो कि जाऊँ और अपना काम देखूँ।

    नागर––इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुमने मुझ पर और मनोरमा पर भारी अहसान किया। अब मैं चाहती हैं कि आज की रात यहाँ रह जाओ क्योंकि मनोरमा को छुड़ाने के लिए रात भर में मैं जो कुछ इन्तजाम करूँगी उसका हाल सवेरे तुमसे कहूँगी और उसके बाद तुमसे कुछ सलाह करके तब रोहतासगढ़ जाऊँगी।

    कमलिनी––मैं इस योग्य नहीं हूँ कि तुम्हें राय दूँ परन्तु रात भर के लिए अटक जाने में मेरा कोई हर्ज नहीं है, यदि इससे आप लोगों की कुछ भी भलाई हो।

    नागर ने कमलिनी के लिए एक कमरा खोल दिया और उसके खाने-पीने के लिए बखूबी इन्तजाम कर दिया।

    7

    आधी रात जा चुकी है। कमलिनी उस कमरे में, जो उसके सोने के लिए मुकर्रर किया गया था, चारपाई पर लेटी हुई करवटें बदल रही है क्योंकि उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं है। उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होती और मिटती हैं। उसे इस कोठरी की बनावट ने और भी तरदुद में डाल रखा है। यद्यपि इस कोठरी में विशेष सामान नहीं और न किसी तरह की सजावट ही है, केवल एक चारपाई जिस पर कमलिनी सोई है और एक चौकी पड़ी है तथा कोने में एक शमादान जल रहा है परन्त तीन तरफ की दीवारों पर वह ताज्जुब और तरदुद की निगाह डाल रही है। इस कमरे की एक तरफ की दीवार, जिधर से इसमें आने के लिए दरवाजा था, ईंट और चने से बनी हुई थी, परन्तु बाकी तीन तरफ की दीवारें तख्तेबन्दी की थीं, अर्थात लकडी से बनी हई थीं। कमलिनी के दिल में शक पैदा हआ और उसने सोचा कि इन तख्तेबन्दी की दीवारों में कोई भेद जरूर है। इस मकान का कछ-कछ भेद कमलिनी को मालम था, पर यहाँ का पूरा-पूरा हाल वह नहीं जानती थी और जानने की इच्छा रखती थी। आखिर कमलिनी से न रहा न गया, और वह चारपाई से उठी। पहले उसने उस दरवाजे को भीतर की तरफ से बन्द किया जो इस कमरे में आने-जाने के लिए था। इसके बाद कमर से खंजर निकाल लिया और उसके कब्जे से तख्तेबन्दी की दीवारों को जगह-जगह से ठोंककर देखने लगी। एक जगह से उसे दीवार पोली मालूम पड़ी और उस पर वह बखूबी गौर करने लगी। जब कुछ मालूम न हआ तो उसने शमादान उठा लिया और फिर उस जगह को गौर से देखा। थोड़ी ही देर में उसे विश्वास हो गया कि यहाँ पर एक छोटा-सा दरवाजा है, क्योंकि दरवाजे के चारों तरफ की बारीक दरार का निशान बहुत गौर करने पर मालूम होता था। कमलिनी ने दरार में खंजर की नोक चुभोई और उसे अच्छी तरह दो-चार बार हिलाया। दरार बड़ी हो गयी और आधा खंजर उसके अन्दर चला गया। फिर से कोशिश करने पर लकड़ी का एक तख्ता अलग हो गया और दूसरी तरफ जाने लायक रास्ता निकल आया।

    हाथ में शमादान लिए हुए कमलिनी अन्दर घुसी और एक बहुत लम्बी-चौड़ी कोठरी में पहुँची। इस कोठरी में चारों तरफ की दीवार भी तख्तेबन्दी की थी इसमें कई चीजें ऐसी पड़ी हुई थीं जिनके देखने से चाहे कैसा ही संगदिल और दिलावर आदमी क्यों न हो, एक दफे जरूर काँप उठे और उसका कलेजा मामूली से चौगुना और अठगुना धड़कने लग जाय।

    इस कोठरी में एक घोड़े की लाश थी, मगर वह अजीब ढंग की थी। उसके चारों तरफ चार खूँटियाँ जमीन में गड़ी हुई थीं और उन खूँटियों के सहारे उस घोड़े के चारों पैर बँधे हुए थे। उस घोड़े का पेट चीरा हुआ और आँतें निकाल कर बाहर रक्खी हुई थीं। चारों तरफ खून फैला हुआ था, मालूम होता था कि यह घोड़ा किसी काम के लिए आज ही मारा गया है। उसके पास ही थोड़ी दूर पर फूलों के कई गमले रक्खे हुए थे और उनके पास ही एक सुन्दर बिछौना था जिस पर सफेद चादर बिछी हुई थी तथा उस पर एक आदमी गर्दन तक सफेद ही चादर ओढ़े सो रहा था। घोड़े के पास से लेकर उस बिछावन तक पैर से लगे हुए खून के दाग जमीन पर दिखाई दे रहे थे और बिछावन की चादर तथा उस चादर में भी, जो वह आदमी ओढ़े हुए था, खून के धब्बे लगे हुए थे।

    उस आदमी को देखकर कमलिनी इसलिए हिचकी कि कहीं वह जागकर कमलिनी को देख न ले, मगर थोड़ी देर तक खड़े रहने पर भी उसके हिलने-डुलने अथवा उसकी साँस चलने की आहट न मिली। तब कमलिनी हाथ में शमादान लिए हए उस विछावन के पास गई और रोशनी में उस आदमी की सूरत देखने लगी जिसका बिल्कुल चेहरा बखूबी खुला हुआ था। सूरत देखते ही कमलिनी चौंक पड़ी और शमादान जमीन पर रख बेधड़क उस आदमी का बाजू पकड़ के हिलाने और यह कहकर उसको जगाने का उद्योग करने लगी कि "वाह-वाह! तुम यहाँ बेखबर पड़े हुए हो और मुझे इसका हाल जरा भी नहीं मालूम!"

    जब बाजू पकड़ के हिलाने से भी वह आदमी न जागा तब कमलिनी को ताज्जुब हआ और गौर से उसकी सूरत देखने लगी, मगर नब्ज पर हाथ रक्खा तो मालूम हो गया कि वह जिन्दा नहीं, बल्कि मुर्दा है। यह जानते ही कमलिनी का जी भर आया और वह मुर्दे के सिर पर हाथ रखकर रोने और गरम-गरम आँसू गिराने लगी। थोड़ी देर तक कमलिनी इसी अवस्था में पड़ी रही, आखिर वह चैतन्य हुई और यह कहकर उठ खड़ी हुई कि "बात तो बहुत ही बुरी हुई, मगर इस समय मुझे सब्र करना चाहिए, नहीं तो कुछ भी न कर सकूँगी। हाय, मेरा दिल और मेरे काबू में न रहे! नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं पूरा-पूरा सब करूँगी और देखूँगी कि क्या कर सकती हूँ। इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि इसकी जान निकले चार पहर से ज्यादा अभी नहीं हुए।" कमलिनी फिर शमादान उठाकर उस कोठरी में घूमने और चारों तरफ देखने लगी। पूरब और दक्खिन के कोने में एक लाश छत से लटकती हुई दिखाई पड़ी जिसके गले में फाँसी लगी थी। वह ताज्जुब के साथ शमादान ऊँचा करके उसकी सूरत देखने लगी, जब अच्छी तरह पहचान चुकी तो नफरत के साथ उस लाश पर थूककर अपना मुँह फेर लिया और दूसरी तरफ चली ही थी कि यह आवाज सुनकर ठहर गई और उस तरफ देखने लगी, जिधर से आवाज आई थी। आवाज यह थी––"हाय, मौत को भी मौत आ गई!" उसे ताज्जुब मालूम हुआ कि यह आवाज किधर से आई! वह यह देखने के लिए उस तरफ बढ़ी, जिधर से आवाज आई थी कि शायद कोई सूराख या खिड़की दिखाई दे और आखिर ऐसा ही हआ। दीवार के पास पहुँचते ही एक सूराख ऐसा दिखा जिसमें आदमी की गर्दन वखूबी जा सकती थी। यह टेढ़ा और नीचे की तरफ झुका हुआ सूराख, जिसे किसी कमरे का रोशनदान कहना चाहिए, दीवार के बिल्कुल नीचे की तरफ था।

    कमलिनी ने उस सूराख में से झाँककर देखा तो एक छोटे से मगर सजे हुए कमरे में निगाह गई। यह कमरा उस कोठरी से एक खंड नीचे था जिसमें से कमलिनी झाँक रही थीं। उस कमरे में जो कुछ कमलिनी ने देखा, उससे उसके दिल को बड़ा ही सदमा पहुँचा और जब तक वह देखती रही उसकी आँखों से आँसू बराबर जारी रहे।

    कमलिनी ने देखा कि एक पलंग पर, जिसके पास ही शमादान जल रहा है, आफत की मारी बेचारी किशोरी पड़ी हुई है। रंज और गम के मारे सुखकर काँटा हो रही है। चेहरे पर मुर्दनी छायी हुई है और कमजोरी की यह अवस्था है कि साँस भी मुश्किल से आती-जाती है। थोड़ी-थोड़ी देर पर उसके होंठ हिलते हैं और धीरे-धीरे कुछ कहती है, मगर जब कहती है तो उसकी आवाज साफ सुनाई देती है। वह कह रही थी––

    "हाय, इससे बढ़कर मेरी दुर्दशा और क्या हो सकती है! इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारी मुहब्बत में मैं यहाँ तक पहुँच चुकी, कुल में कलंकिनी कहाई, लज्जा को तिलांजलि दे बैठी, और वह सब दुःख झेलने को तैयार हुई, यह सब तुम्हारी बदौलत …

    "(थोड़ी देर चुप रहकर) यहाँ तक रोई कि अब आँखों में आँसू भी नहीं रहे। खाना-पीना छोड़ देने पर भी निगोड़ी जान नहीं निकलती। हाय, मौत को भी मौत आ गई! नहीं-नहीं, मौत को मौत नहीं आई, वह देखो, मेरे सामने खड़ा हुआ काल मेरी तरफ देख रहा है। अब कुछ दम की मेहमान हूँ। मैं तो जाती हूँ, मगर अफसोस, अपने प्यारे की जुदाई का रंज और उसकी बेवफाई और बेमुरौवती की शिकायत अपने साथ लिए जाती हैं। हाय, इस समय ऐसा कोई भी नहीं जो मेरी हालत देखे और मेरा हाल उनसे जाकर …

    "(थोड़ी देर चुप रहकर) जब उनको मेरी परवाह ही नहीं, तो मेरा हाल कोई उनसे कहकर करेगा ही क्या? उन्होंने तो खुद कहला भेजा है कि मुझे कुछ भी परवाह नहीं। हाय, मैं ऐसी बात कैसे सुन सकी! उसी समय मेरी जान क्यों न निकल गई! नहीं-नहीं, यह सब ऐयारी है, उन्होंने ऐसी बात कभी न कही होगी। पर इससे क्या हो सकता है जब कि दम निकलने में कुछ कसर बाकी नहीं है। देखो-देखो वह काल अब मेरी तरफ बढ़ा चला आता है। अच्छा है, किसी तरह वह सायत आए भी तो। हे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर, मैं तुम्हीं को गवाह रखती हूँ क्योंकि तुम खूब जानते हो कि मैं निर्दोष इस दुनिया से उठी जाती हूँ और इन्द्रजीतसिंह की मुहब्बत के सिवाय अपने साथ कुछ भी नहीं लिए जाती, हाँ उस प्यारे की … "

    इसके बाद बहुत देर तक राह देखने पर भी कुछ सुनाई न दिया। कमलिनी ने समझा कि या तो इसे कमजोरी से गश आ गया और या इस हसरत की मारी बेचारी का दम ही निकल गया। इस समय कमलिनी ने जो कुछ देखा या सुना, वह उसे बेसुध करने के लिए काफी था। कमलिनी जार-जार रो रही थी, यहाँ तक कि हिचकी बँध गई और उसे इस बात का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा कि मैं यहाँ किस काम के लिए आई हूँ क्या कर रही हूँ और इस समय कैसे खतरे में फँसी हुई हूँ।

    कमलिनी के लिए यह समय बड़े ही संकट का था। वह नहीं चाहती थी कि बेचारी किशोरी का पूरा-पूरा हाल जाने या उसे किसी तरह की मदद पहुँचाए बिना यहाँ से चली जाय और साथ ही इसके भूतनाथ के कागजात को भी, जिनके लेने का वह पूरापूरा उद्योग कर चुकी थी, किसी तरह छोड़ नहीं सकती थी, क्योंकि यह मौका निकल जाने पर फिर उनका हाथ लगना बहुत ही कठिन था।

  • चन्द्रकांता सन्तति १

    चन्द्रकांता सन्तति १

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    चन्द्रकांता सन्तति १
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    चन्द्रकान्ता सन्तति

    पहिला हिस्सा

    पहिला बयान

    गढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के लङके बीरेन्द्रसिंह की शादी विजयगढ़ | के महज जयसिह की लडकी चन्द्रकान्ता के साथ हो गई । भारत वाले | दिन तेजसिंह की अाखिरी दिल्ली के सर्वत्र चुनार के महाराज शिवदत्त को मशालची बनना पडा । बहुत की यह राय हुई कि महाराज शिवदत्त | कह दिल भी साफ नहीं हुआ इसलिये अब इनको कैद ही में रखना मुनासिव है, मगर महाराजा सुरेन्द्रसिंह ने इस बात को नापसन्द करके कहा कि 'महाराज शिवदत्त को हम छोड़ चुके हैं, इस वक्त जो तेजसिंह से उनकी लवई हो गई यह हमारे साथ बैर रखने का सबूत नहीं हो सकता, अाखिर महाराज शिवदत्त क्षत्री हैं, जब तेजसिंह उनकी सूरत बन बेइज्जती करने पर उतारू हो गये तो यद्द देख कर भी ये कैसे बरदाश्त कर सकते थे ! में यह भी नहीं कह सकता कि महाराज शिवदत्त का दिल हम लोगों की तरफ से बिल्कुल साफ हो गया क्योकि अगर उनका दिल साफ ही होता तो इस बात को छिप कर देखने के लिए आने की जरूरत क्या थी तो भी यह मानकर कि तेजसिंह के साथ की इनकी यह लड़ाई हमारी दुश्मनी का मन नहीं कहा जा सकता, हम फिर इनको छोड़ देते हैं। अगर अव भी ये हमारे साथ दुश्मनी करेंगे तो क्या हर्ज है, ये भी मर्द हैं और हम भी मर्द, देखा जायगा। __ महाराज शिवदत्त फिर भी छूट कर न मालूम कहाँ चले गए। बीरेन्द्रसिंह की शादी होने के बाद महाराज सुरेन्द्रसिंह और जयसिंह की राय से चपला की शादी तेजसिंह के साथ और चम्पा की शादी देवीसिंह के साथ की गई । चम्पा दूर के नाते में चपला की बहिन होती थी। ।

    न्यासी मब ऐयारों की शादी भई हुई थी। उन लोगो की घर गृहस्थी चुनार ही में थी, अदल बदल करने की जरूरत न पड़ी, क्योंकि शादी होने के थोड़े ही दिन बाद बड़े धूमधाम के साथ कुँवर वीरेन्द्रसिंह चुनार की राजगद्दी पर बैठाए गए और कुंवर छोड राजा कहलाने लगे । तेजतिह उनो राजद वान मुकर र रुए योर इसीलिए सब ऐयारों को भी चुनार ही मेसना पा। मुरेन्द्रसिंह अपने लके को ग्रॉसी के मामने से हटाया 'नहीं चाहते थे, लाचार नीदमा मद्दा फतेविद के सुपुर वे भी चुनार ही में राने लगे, मगर राज्य का काम मिल्कुन वीरेन्द्रहिस के जिम्मे या, हाँ कभी कमी गय दे दे।। ते जनिए के बार जीतसिंह भी बी भाजार के सात गुनार में लगे । महाराज मुरेन्दरिद और जीतसिद में बहुत सुन्नत भीती दमत नि दिन बढ़ता ही गई। रात म जातसिंह इसी गारकि उनती जितनी स्टर की जाना था। थी। नादीगने दाम बाट ता की लार या। मी गानो न भागमा पर सके न रस कागो तरान:दे चन्द्रमाता के बड़े लडके ________________

    पहिला हिस्सा | का नाम इन्द्रजीतसिंह, छोटे का नाम अनिन्दसिंह, चपला के लडके का | नाम भैरोसिह, और चम्पा के लक्ष्के को नाम तारासिंह रक्खा गया । जब ये चारो लडके कुछ बड़े श्रौर बातचीत करने लायक हुए तत्र इनके लिखने पढ़ने और तालीम का इन्तजाम किया गया और राजा सुरेन्द्रसिंह ने इन चारो लडको को जीतसिंह को शागिदीं और हिफाजत में छोड़ दिया। । भैरोसिंह और तारासिंह ऐवारी के फन में बड़े ही तेज और चालाक निकले । उनकी ऐयारी का इम्तिहान बराबर लिया जाता था । जैतह का हुक्म था कि भैरोसिंह और तारासिंह बुल ऐयारो को दकि अपने चाप तक को धोखा दे की कोशिश करें और इस तरह पन्नालाल बचे रह ऐयार भी उन दोनों लड़कों को भुलावा दिया करें । धीरे धीरे ये दोनों लडके इतने तेज और चालाक हो गए कि पन्नालाल वरह की ऐयारी इनके सामने व गई । भैरोसिंह ग्रोर तारासिंह इन दोनों में चान्नाक ज्या दे कौन था इसके कहने का कोई जरूरत नहीं, आगे मौका पने पर यापही मालूम हो | जायगा, ह इतना कह देना जरूरी है कि भैभिह को इन्द्रजीतसिंह के । साथ और तारासिंह को आनन्दसिंह के साथ ज्यादे मुहब्ब्त थी । चारो लडके होशियार हुए अर्थात् इन्द्रजीतसिंह भैरसिंह शौर तारा { सिंह की उम्र अट्र ह अटारह वर्ष की श्रौर नन्दसिंह की उम्र पन्द्रह .. वर्ष की हुई ! इतन दिन तक चुनार राज्य में बराबर शान्ति रही बल्कि ", छिनी तकलं फे श्रौर महाराज शिवदत्त की शैतानी एक स्वप्न की तरह सभी के दिल में रह गई ।। इन्द्रज तसिंह को शिकार का शौक बहुत था, जहाँ तक बन पडता वे • रोज शिकार खेला करते ! एक दिन किसी वनरखे ने हाजिर हो कर बयान | किया कि इन दिनो फलाने जंगल की शोभा खूब बढ़ो चढो है और । शिकारी जानवर भी इतने झाए हुए हैं कि अगर वहाँ महीने भर टिक कर ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति शिकार खेला जाय तो भी जानवर न घटें और कोई दिन खाली भी न जाय | यह सुन दोनों भाई बड़े खुश हुए। अपने बाप राजा बीरेन्द्रसिंह ते शिकार पेलने की इजाजत माँगी और कहा कि “हम लोगों का इरादा झाट दस दिन तक जंगल में रद्द कर शिकार खेलने का है । इसके जवाब में राज चोरेन्द्रसिंह ने कहा कि इतने दिनो तक जगल में रह कर शिकार पैलने का हुक्म में नहीं दे सकता, हाँ अपने दादा से पूछोअगर चे हुक्म है तो कोई हर्ज नहीं है। यह सुन इन्द्रजीतसिंह अौर अानन्दसिंह ने अपने दादा महाराज सुरेन्द्र के पास जाकर अपना मतलन अर्ज किया । उन्होंने खुशी से मन्जूर किया और हुक्म दिया कि शिकीरगाह में इन दोनों के लिए खेमा उदा किया जाय और जब तक वे शिकारगाह में रहे पाँच सौ फौज बरावर इनके साथ रहे ! शिफार पेलने का हुक्म पा इन्द्र जीतसिंह शौर श्रीनन्दसिंह बहुत पुग्न हुए श्रीर अपने दोनों ऐयार भैरोसिंह और तारासिंह को साथ ले मय पाँच मी फोन के चुनार से रवाना हुए। नुनार से पाँच कम दक्षि एक घने और भयानक जंगल में पहुँच कर उन्होंने देश ४ाला ! दिन थोटा बाकी रह गया था इसलिए यह राय गरि 'प्राज्ञ श्रीराम करे, कल सवेरे शिकार का बन्दोवस्त किया जायगा, मगर वनरम्प 5 ॐा शेर का पता लगाने के लिए, आज ही कर दिया जाय । जगली की हिफाजत के लिए जो नौकरे रहते हैं उनको बनरखे ने १ । शिर पिलाने का काम देनरी हा का है। ये लोग जगल * पून घूम र श्री शिकारी जानवरों के पैर का निशान दे और उस -गज पर जा जा जर पता लगाते हैं कि शेर इत्यादि कोई चिंकारा जानपर म जान ५१ ना, या प्रगर है तो कहाँ पर है । वनरखो का | ":{" ::रना ना । टप झा व उत्रर कि फलानो हो। ः । नागः या २५ ।। ________________

    पहिला हिस्सा भैंसा + बाधने की कोई जरूरत नहीं, शेर का शिकार पैदल ही किया जायगा । । दूसरे दिन सवेरे मनरखों ने हाजिर होकर अर्ज किया कि इस जुगल | में शेर तो है मगर रात हो जाने के सबब हम लोग उन्हें अपनी अॉखों से न दे सके, अगर आज का दिन शिकार न खेला जाय तो हम लोग देख कर उनका पता दे सकेंगे ।। | आज के दिन भी शिकार खेलना बन्द किया गया । पहर भर दिन बाकी रहे इन्द्रजीतसिंह और शानन्दसिंह घो पर सवार हो अपने दोनों + खास शेर के शिकार मै भैसा बाँधा जाता है । भैंसा बाँधने के दो कारण हैं । एक तो शिकार को अटकाने के लिए अथात् जब बनरखे आकर खवर दें कि फलाने जगले में शेर है, उस वक्त या कई दिनों तक अगर शिकार खेलने वाले को किसी कारण शिकार खेलने की फुरसत न हुई और शेर को अटकाना चाहा तो भंसा बाँधने का हुक्म दिया जाता है । बनरले भैसा ले जाते हैं और जिस जगह शेर का पता लगता हैं उसके पास ही किसी भयानक और सायेदार जगल या नाले में मजबूत लूटा बाड़ कर भैंसे को वाँध देते हैं । जब शेर भ से की वं पाता है तो वह आता है और भैंसे को खा कर उस जगल में कई दिनों तक मस्त और वैफिक्र पड़ा रहता है । इस वकीब से दो चार भैंसा देकर महेनो श्र को अटका लिया जाता है। शेर को जब तक खाने के लिए मिलता है वह दूसरे जगल में नहीं जाता | शेर का पेट अगर एक दफे खूब भर जाये – तो उसे सात आठ दिनों तक खाने की परवाह नहीं रहता 1 खुले भेसे को शेर जल्दी नहीं मार सकता है। – दूसरे जर मचान बॉध कर शेर का शिकार किया चाहते है या एक जंगल से दूसरे जंगल में अपने सुबीते के लिए उसे ले जाया चाहते हैं तेव ३ भो इसी तरह भैसे वय वव कर हटाते ले जाते है | इसको शिकार लोरा 'भर' भी कहते हैं । ऐयारों को साथ ले घूमने और दिल बहलाने के लिए डेरे से बाहर निकले और टहलते हुए दूर तक चले गए।

    ये लोग धीरे धीरे टहलते और बातें करते जा रहे थे कि बायें तरफ से शेर के गरजने की आवाज आई जिसे सुनते ही चारो अटक गए और धूम कर उस तरफ देखने लगे जिधर से वह आवाज आई थी।

    लगभग दो सौ गज की दूरी पर एक साधू शेर पर सवार जाता दिखाई पडा जिसकी लम्बी लम्बी और घनी जटाये पीछे की तरफ लटक रही थी एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में शख लिए हुए था। इसकी सवारी का शेर बहुत बड़ा था और उनके गर्दन के बाल जमीन तक पहुंच रहे थे।

    इसके आठ दस हाथ पीछे एक शेर और जा रहा था जिसकी पीट पर आदमी के बदले बोझ लदा हुया नजर आया। शायद यह असबाब उन्हीं शेर सवार महात्मा का हो।

    शाम हो जाने के सबब साधू की सूरत साफ मालूम न पडी तौ भी उसे देव दन चारो को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और कई तरह की बाते सोचने लगे।

    इन्द्र०। इस तरह शेर पर सवार हो कर घूमना मुश्किल है।

    आनन्द०। कोई अच्छे महात्मा मालूम होते।

    मैने०। पीछे वाने शेर को देखिए जिस पर असबाब लदा हुया है किस त भेद की तरह सिर नीचा किए जा रहा है।

    तास०। शेरों को बस में कर लिया है।

    इन्द्र०। जी चाहता है उनके पास चल कर दर्शन करें।

    आनन्द०। अच्ची बात है, चलिए पास से दरों कैसा शेर है।

    साग०। बिना पास गए महात्मा और पाखण्टी में भेद भी न मालूम होगा।

    भैगे०। शाम तो हो गई है, और चलिए आगे से बढ़ कर रोकें।

    आनन्द०। आगे से चल कर गरने से बुरा न मानें। ________________

    पहिला हिस्सा भैरो० } हम ऐयारों का तो पेशा ही ऐसा है कि पहले तो उनका साधू ना ही विश्वास न कर सकवै ! । इन्द्र० । अाप लोगों की क्या बात है जिनकी मूछ मेरो ही मुई। तो है, खैर चलिए तो सही । भै३० ३,लए ।। | चारो अामा अागे से घूम कर उन अरबाजी के सामने गए ? शेर र सवार जा रहे थे । इन लोगों को अपने पास अ.ते देख बाबाजी स्क ए ! पहिले तो इन्द्रजीतसिह और श्रानन्दसिह का ६ शेर को देख र अ मगर पिर ललकारने से आगे बढ़ा । थो दूर जाकर दोनों राई घोड़े के ऊपर से उतर पड़े, भैरोसिह और तारासिह में दोनों घो। को पेद से बाँध दिया। इसके बाद पैदल ही चारो अादमी महात्मा के इस पहुँचे ।। | बाबाजी० } { दूर ही से ) यो राजकुमार इन्द्रजंतसिंह और निन्दसिंह, कहो कुशल तो है ? इन्द्र० } ( प्रणाम करके ) आपकी कृपा से सब मंगल है । | बा० । ( भैरोसिंह और तारासिंह की तरफ देख कर ) को भैरो और तार, अच्छे हौ ? दोनो० ( पृथ जोड़ कर ) यापकी दया से । चा० । राजकुमार, मैं खुद तुम लोगों के पास जाने को था क्योंकि मने शेर के शिकार करने के लिए इस जल में डेरा डाला हैं । मैं रिनार जा रहा हूँ, घूमता फिरता इस जगल में भी र पचा | यह ल अच्छी मालूम होता है इसलिए दो तीन दिन तक यहाँ रहने का । चार है, कोई अच्छी जगह देख कर धूनी लगाऊँगा । मैरे साथ सवारी र अमात्र लादने के कई शोर हैं, इसलिए कहता हूँ कि धासे में मेरे सी शेर के मत मारना नहीं तो मुश्किल होग, सैक शेर पच कर हारे लश्कर में हलचल मचा डानेंगे और बहुत की जान जाय । ________________

    च द्रकान्ता सन्तति तुम प्रतापी राजा सुरेन्द्रसिंह * के लड़के ही इसलिए तुम्हें पहले ही समझा देना मुनासिव है जिसमें किसी तरह का दुःख न हो । इन्द्र० । महाराज में कैसे जानें गई कि यह श्रापका शेर है। ऐसा ही है तो शिकार न पैलूगा । बाथा ० । नहीं नहीं, तुम शिकार खेली, मगर मेरे शेरों को मत मारो । इन्द० | मगर यह कैसे मालूम हो कि फलाना शेर श्रीपका है। बाबा० । टेप में अपने शेरों को बुलाता हूँ, पहिचान ले । बाबाजी ने शंख बजाया । भारी शख की विजि चारो तरफ जंगल में गुज गई और हर तरफ से गुर्राहट की आवाज आने लगी । थोडी हो देर में इधर उधर से दौडते हुए पॉच शेर श्री श्री पहुचे । ये चारो दिलावर शौर बहादुर ये, अगर कोई दूसरा होता तो डर से उसकी जान निकल जाती । इन्द्रजीतसिह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देख उछनने कूदने लगे मगर रेशम को मजबूत बागडोर से बंधे हुए थे इससे माग न मके } इन शेरों ने श्राकर बडी उधम मचाई, इन्द्रजातसिंह वगैह को दे गरजने कूदने अौर उछलने लगे, मगर बाबाजी के डॉटते ही मी ठण्डे रो सिर नीचा कर भइ बकरी की तरह खड़े हो गए। यत्रि० । दे। इन शेरी को पहिचान लो, अभी दो चार शौर है, माग होता है उन्होंने शर ीं अविाज नहीं सुनी । खेर अभी तो * गं जगत् मे हैं, उन बाकी शेरों को भी दिखला दूंगा, कल भर • । गदा श्रीर त्रुट क्यो । | भो० } फिर अपने मुलत कहाँ होगी १ अापकी धूनी किस जग गई है। | जावा० | मुझे तो यही जग आनन्द की मालूम होती है, के : ना सुना होगा । | गाध माग भूल गए, वरिन्द्रसिद्द की जगह सुरेन्द्रसिंह का ना चाचीजी शेर से ना उत हे गौर जितने शेर उस जग्इ आए थे वे मन बावाजी चार तरफ धूने तथा मुहब्बत से उनके बदन को चाटने और सूधन लगे।व चार!दिम।धोडी देर तक वह और अटकने के बाद वविाजी से विदा है। अमे में शाये।

    जब सन्नाटा हुआ भैरोसिंह ने इन्द्रजःतभिह से कहा,"मेरे दिमाग में इम समय बहुत सी बातें घूम रही हैं।मैं चाहताहूँ कि हम लोग चारों|आदिमी एक जगह बैठ कुमेटी कर कुछ राय पक्की करें।

    इन्द्रजीतसिंह ने कहा, अच्छा आनन्द और तारा को भी इसी जगह बुला लो।

    भैरोसिंह गये और आनन्दसिह तथा तारासिंह को उसी जगह बुला लाए।उस वक्त सिवाय इन चारा के उस खेमे में और कोई न रहा।भैरोसिंह ने अपने दिल को हालै कद्दा जिसे सभी ने बड़े गौर से सुना,इसके बाद पहर भर तक कुमेटी करके निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।

    यह कुमेटी कैसी भई?भैरोसिंह का क्या इरादा हुशा श्रौर उन्होंने क्या निश्चय किया है?तथा रात भर वे लोग क्या करते रहे है?इसके कहनेकी कोई जरूरत नहीं, समय पर सब कुछ खुन जाय।

    सवेरा होते ही चारो आदमी खेमे के बाहर हुए और अपनी फौज के सदर कञ्चनसिंह को बुला कुछ समझा बुझा बावाजी की तरफ रवाना हुए । जव लश्कर से दूर निकल गए,नन्दसिंह भैरोसिंह और तारासिंह ता तेजी के साथ चुचार की तरफ रवाना हुए, और अकले इन्द्रजीतसिंह शबाजी से मिलने के लिए गए।

    बाबाजी शो के बीच में धूनी रमाए बैठे थे।दो शेर उनके चारो। तरफ घूम घूम कर पहरा दे रहे थे।इन्द्रजीतसिंह ने पहुँच कर प्रणाम किया और चार्ज ने प्रार्शीवाद देकर चैठने के लिए कहा।

    इन्द्रजतसिंह ने बनिस्बत कल के आज दो शेर और ज्यादै देखे।थोड़ी देर चुप रहने के बाद बातचीत होने लगी है।

    २

    बाबा कही इन्द्रजीतसिंह,तुम्हारे भाई और दोनों ऐयार कहाँ रह गए,वे नहीं आए?

    इन्द्र०।हमारे छोटे भाई आनन्द को बुखार आ गया।इस सबब से वह न या सका।उसी की हिफा नत में दोनों ऐयारों को छोड मैं अकेला आपके दर्शन को आया हूँ!

    वावा०।अच्छा क्या हर्ज है,आज शाम तक वह अच्छे हो जायेंगे,कहो आज कल तुम्हारे राज्य में कुशल तो है?

    इन्द्र०।आपकी कृपा से सब ग्रानन्द है।

    वावा०।बेचारे वीरेन्द्रसिंह ने भी बड़ा ही कष्ट पायो!खैर जो हो दुनिया।उनका नाम रह जायगा।इस हजार वर्ग के अन्दर कोई ऐसा सजा नहीं है जिसने तिलिस्म ताड़ हो!एक और तिलिस्म है,असल में वही भरी और तारीफ के लायक है।।

    एन्द्र०।पिताजी तो कहते हैं कि वह तिलिस्म तेरे हाथ से टूटेगा।

    वावा०।हाँ ऐसा ही होगा,वह जरूर तुम्हारे हाथ से फतह होगा,सभे केाई मन्दे नए।

    इन्द्र०।देखें कर तक ऐसा होता है,उसकी ताली का तो कही पता ही नहीं लगता।

    बावा°। ईश्वर चाहेंगा तो एक ही दो दिन तक तुम उस तिलिस्म के होने में हाथ लगा दोगे।उस तिलिस्म की ताली में हूं।कई पुश्त ने हम लोगों उस तिलिस्म के दागी होते चले आए हैं।मेरे परदादा दाट श्री बाप उमी तिलिस्म के दारोगा,जब मेरे पिता का देहान्तने लगा तो हैन को ताली मेरे सुपुर्द कर मुझे उसका दारोगा मुररर:दिइ।अप वर उतर आ गया है कि में उस ताला तुम्हारे या वह निन्मि तुग्गु नाम पर वाया गया है और मित नुरा’ र ? उमा मानिस' नद्दा पन मना है। • १ २ १ देर का है ? पहिला हिस्सा।वाचा।कुछ नहीं,कल से तुम उसके तोडने में हाथ लगा दो,मगर एक बात तुम्हारे फायदे की हम कहते हैं।

    इन्द्र०।वृह क्या?

    वावा॰तुम उसके तोड़ने में अपने भाई अनिन्द को भी शरीक कर लो,ऐसा करने से दौलत भी दूनी मिलेगी और नास मी दोनों भाइयों की दुनिया में हमेशा के लिए बना रहेगा।

    इन्द्र०।उसकी तो तबीयत ही ठीक नहीं!

    वाचा॰।क्या हर्ज है, तुम अभी जाकर जिस तरह बने उसे मेरे।पास ले आओ,मैं बात की बात में उसको चगा कर दूगा!श्रीज ही तुम लोग मेरे साथ चलो,जिसमें कल तिलिस्म टूटने में हाथ लग जाय,नहीं तो साल भर फिर मौका न मिलेगा।

    इन्द्र०।बावाजी, शअसल तो यह है कि मैं अपने भाई की बढ़ती नहीं चाहता,मुझे यह मजूर नहीं कि मेरे साथ उसका भी नाम हो।

    वावा॰।नहीं नहीं,तुम्हें ऐसा न सोचना चाहिए,दुनिया में भाई से बढ़ के कोई रन नहीं है।

    इन्द्र०।जी हाँ,दुनिया में भाई से बढ़ के रन नहो तो भाई से बढ़ के कोई दुश्मन भी नहीं,यह बात मेरे दिल में ऐसी वैठ गई है कि उसके हटाने के लिए ब्रह्मा भी कर समझा बुझा तो भी कुछ नतीजा न निकलेगा।

    बाबा०।विना उसको साथ लिए तुम तिलिस्म नहीं तोड़ सकते।

    इन्द्र०!( हाथ जोड़ कर ) बस तों जाने दीजिए,माफ कीजिए,मुझे तिलिस्म तोडने की जरूरत नहीं!

    वावा॰। क्या तुम्हें इतनी जिद्द है?

    इन्द्र०।में कह जो चुकी कि ब्रह्मा भी मेरी राय पलट नहीं सकते।

    वावा०।खैर तुम्हीं चलो,मगर इसी वक्त चलना होगा।

    इन्द्र०।हाँ हाँ,मैं तैयार है,अभी चलिए । नावाजी उसी समय उठ खड़े हुए,अपनी गठडी मुठडी चाध एक शैर पर लाद दिया तथा दूमरे पर आप सवार हो गए।इसके बाद एक गैर की तरफ देख कर कहा, 'इसा गङ्गाराम, यहाँ तो आओ।”वह शेर नुरत इनके पास आया ।बाबा जी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा,“तुम दुग्न पर मार हो लो।"इन्द्रजीतसिंह भी कूद कर सवार हो गए और था गज के साथ साथ दक्षिण का रास्ता लिया!बावाजी के साथ शेर भी कई प्रागे कोई पीछे कोई ये कोई दाहिने हो बाबाजी के साथ साथ जाने लगे।

    सब शेर तो पीछे रह गए मगर दो शेर जिन पर बावाजी श्रीर इन्द्र जीनसिंह मवार थे झागे निकल गएदो पहर तक ये दोन चल गए!जब दिन दुनने लगा वावज ने इन्द्र तमिह से कहा,'यह टड्र कर कुछ ग्या पी लेना चाहिए। इसके जवाब में कुमार चले,"बाबा,खाने पीन की कोई जरूरत नहीं।अभी महात्मा हा ठहरे,मुझे भूख ही नई लगी, फिर अटकने की क्या जरूरत है।जिस काम के पीछे पड़े उसमे मुला ऊना ठीकनहीं।

    बाबाजी न कर, शाबाश,तुम बड़े बहादुर,अगर तुम्हारा दिल इतना मजा न होता तो तिलिस्म तु हारे ही हाथ से टूटेगा ऐसा‌ लान न ह जाते,खेर चलो!

    कुछ दिन फ{ द्दा जब ये दान एक पहा के नाचे पहुंचे 1 बावज ने श ३ वजाया 1 धंदा हूँ दर में चारो तरफ से संकः पहाडा बुटेर द्दा * वर लिए आते दिपाई पई श्रीर में हैं। बीस पचास अदिमय मा५ लिए पूरा तप में ग्राती या राजा शिवदत्त नजर पजिरे * :17 िन ऊचा मायाज में कहा, “इन । म पहिचान *, * नाराज शिवदत्त । न तस्यार मेरे कमरे में लटका हुई। * 1 दादा नी म न तन्त्र र मुझे दियो कर कहा था कि हमारे सत्र में र न प दिन * | श्री श६, काश्ते में चावाज पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    घूमते फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी भरी सुहावनी पहाडी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए,मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमर और दालान रहने लायक थे।यह छोटी पहाडी अपने चारे तरफ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दत्री हुई थी वि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना श्रौर कुछ पता लगाना मुश्किल था।।इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ वास आदमी थे जिन तीन मुसलमान ऐयार भी थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्ते शरों में में से झीर यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गए।कि इनके शामिल रहने से कभी न कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला ले का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के श्रौर केाई इर लायक नजर भी न झात्ती था जो इन बेईमान को ऐयारी के लिए अपने मा राता।नेचे लिखे नाम से ये तीनों ऐयार पुकारे जाते थे-चाकर अला,ईटावक्श और यारग्रल!इन सत्र ऐयारों श्रौर साथियों ने मुपए,पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा महाराज शिवदत्त की मदद की।

    राजा वारेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ मगर मेंका न मिलने के स व मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा।अपनी चालाकी और होशियारी से वह् पहाटी भिल्ल कोल और पवार इत्यादि जाति के श्रादमिर्यों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजार में गल्ला मी शहद श्रीर,बहुत मी जगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों के मारफत दर में भैरवा और विया कर रुपए,बटोरने लगा।उन्हीं लोगो से शियार रके थे।बहुत फौज भी उस वन लधापहाति के लोग भै होशियार हो गए और खुद्द शहर मेंर मला वर्ग इंच रुपए इक्ट्ठा करने लगे । शिवदत्तगढ़ भा अच्छी तरह अबाद आ गया।

    दूध बो रह ऐयारी ने भी अपने कुल साथ को जो ________________

    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३

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    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३ ________________

    चन्द्र गन्ना सन्तति रेन्द्र शवदत्त के ऐयारों के चालाका ता खूब की था मगर… मेन्द्र । या जा सर पर मवार हा सिद्ध ता बन लेकिन अपना काम न कर सके न! मगर मे भैरामिह का अब वहत जल्द छुडाना चाहिए। नात० । कुमार घबगायो मत, तुम्हारे दोस्त को किसी तरह की तकलीप नाही हो वती, लेकिन अभी उमका शिवदत्त के यहाँ फंसे ही रहना मुना गय – । वह वाफ नहीं है, बिना मदद के श्राप ही छूट कर या राकना , तिस पर पनानाल रामनागयण चुन्नीलाल बद्रीनाथ और ज्योलीना उसकी मदद को भेजे हो गए है, देखो तो क्या होता है। स्तनांनी तक चुपचाप बैठे रह कर शिवदत्त ने फिर अपना स्वराया करने पर उमर योधी है। दर' । कुमारी के साथ फौज शिकारगाह में गई है उसके लिए शर दश 'क्माता ? जीत० । अभी शरगाह से डेरा उठाना मुनासिब नही । (तेजसिंह ताप दास का ) क्यों तेज ? ने० । (गाय नोट कर ) जी हाँ, शिकारगाह में डेरा कायम रहने से हम लोग बदी ग्यूवमूरती श्रीर दिल्लगी से अपना काम निकाल सकेंगे। मुंगेन्द्र यार शिवदत्तगढ़ से लौटे तो कुच हालचाल मालूम हो । तेजल ना नई मार परमी तक कोई न काई जसर पायेगा। पर भर में ज्याद देर तक बातचीत होती रहो । कुल बातों को सोचना पन नुनाममममले बल्कि यासिरी बात का पता तो हम मानगा जो मजान्न म उन के बाद जतसिंह नाले में तेजहि को राम जान दीजिए, लोहोगा देखा जायगा, जल्दा क्या है। गगा friअनी बादरोम इन्द्रजातसिंह और आनन्दसिंह नामा पल देव । वरमात का मीसिम है, गगा पदाग्नि के नीन जल पहुँचा हुआ है, छोटी छाटी सदर ________________

    पहिला हिस्सा दीवारों में टक्कर मार रही है, अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा जेल में पड़ कर लहरों को शाभा दूनी बढ़ा रही है, सन्नाटे का आलम है, इस चारदरी में सिवाय इन दोनों भाइयों के अौर कोई तीसरा दिखाई नहीं देता } इन्द्र० | अभी जल कुछ और बढ़ेगा । अानन्द० । जी हाँ, पारसाल तो गगा आज से कहीं ज्यादे बढी हुई यी जय दादाजी ने हम लोगों को तर केर पार जाने के लिए कहा था । | इन्द्र० { उस दिन भी खून ही दिल्लगी हुई, भैरोसिंर सभों में तेज रहा, बद्रीनाथ ने कितना ही चाहा कि उनके आगे निकल जायें मगर न हो सका। अनिन्द० । हम दोनो भी कास भर तक उस किश्ती के साथ ही साथ राएं जो हम लोगों की हिफाजत के लिए लग गई थी। इन्द्र० ! बम वही तो हम लोगो का शाखिरी इन्तिहीन रहा, फिर तव से जल में तेरने की नौबत ही कहाँ थाई ।। आनन्द० । कल तो मन दादाजी से कहा था कि आज कल गंगाजी खून बढ़ी हुई है तरने को जी चाहता है । इन्द्र० | तव क्या बोले ? | अनिन्द० । कहने लगे कि बस अब तुम लोगों का तेरना मुनासिब नहीं है, हँसी गो । तेरना भी एक इल्म है जिसमे तुम लोग होशियार हो चुके, अब क्या जरूरत है ? ऐसी है। जी चाहे तो किश्ती पर सवार हो कर जाग्रो सैर करो ।। इन्द्र० । उन्होंने वहुत ठीक कहा, चलो किश्ती पर थोडी दृर घूम श्रायें, इसके लिए इजाजत लेने की भी कोई जरूरत नहीं । बात चीत हो ही रही थी कि चोवदार ने आकर अर्ज किया, “एक * बहुत बूढ़ा जवहरी हाजिर है, दर्शन किया चाहती हैं ।” आनन्द० । यह कौन सा वक्त है ? चोपदार० । ( हाथ जोड़ कर ) तावेदार ने तो चाहा था कि इस ________________

    चन्द्रकान्त सन्ततिं समय उसे पिटा करै मगर यह ख्याल करके ऐसा करने का हौसला ने पदा कि एक तो लटकपन दो से व इस देवर को नमकवार है और भाराज की भी उन पर निगाह रहती है, दूसरे अस्सी वर्ष का बुड्डा है, तीसरे करता है कि अभी इस शहर में पहुंचा हूं, महाराज का दर्शन कर चुका है, सरकार के भी दर्शन हो जायें तब आराम से सराय में डेरा डाऊँ, र मेरे से उसका यह दस्तूर भी है ।। न्ट्र० । अगर ऐसा है तो उसे अपने ही देना मुनासिब है ।। अनिन्द्र० । तर अाज किश्ती पर सैर करने का रगनजर नहीं आता है। इन्द्र० । या दृर्ज है, कल सही । चोदार सलाम करके चला गया और थोड़ी ही देर में सौदागर को ले कर जिर हुआ । हकीकत में वह सौदागर बहुत ही बुड्ढा शा, यामत ग्रौर शरफ्त उसके चेहरे से बरसती थी । आते ही मुलाम करके उगने दोनों भाइयों को दो अंगूठियों नजर दी और कबूल होने के बाद गइन पर कर जमीन पर बैठ गया ।। म भुइवें जयरी की इजत ही गई, मिजाज का हल सफर की *पियत पूछने उद देने पर जाकर गर्म करने और कल फिर हाजिर होने का हुक्म हुआ, तीदागर सलाम करके चला गया । मंदिर में जो दो टूठिया दोनों भाइयों को नजर दी थी उनमें प्रानन्दर्भिद् की अंगूठी पर निहायत खुरार मानिक जना हुआ था और दर्जनह् िकी अँगूठी पर सिर्फ एक छोटी सी तस्वीर थी जिसे दो एक र निग" भर र इन्द्रजीतसिंह ने देगा श्ररि कुछ सोच कर चुप हो रहे । | एरन्त होने पर रात के शुमटान की रोशनी में फिर उसे अॅटूटी ३ र नि नगीने की जद कमसिन इमीन अँरित की तस्वीर

    : १ । चाहे थट तुन्दर निर्भर इन छोटो या न हो मगर मुसीवर ३ २ १ माई उम६ गचं कर थे | इ पर्ने देते एक मरतने तो इन्द्रादि । २ए लिन हो गई कि अपने का कोईर उस औरत की बैठ कर भोजन भी करना ही पडा़,हाँ शाम को इनकी बेचैनी बहुत बढ़ गई जब सुना कि तमाम शहर छान डालने पर भी उस जवहरी का कही पता न लगा और यह भी मालूम हुआ कि उस जवहरी ने यह बिल्कुल झूठ कहा था कि 'महाराज का दर्शन कर आया हूँ, अब कुमार के दर्शन हो जायँ तब आराम से सराय में डेरा डालू ।' वह वास्तव में महाराजा सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह से नहीं मिला था ।

    तीसरे दिन इनको बहुत ही उदास देख आनन्दसिंह ने किश्ती पर सवार होकर गद्गाजी को सेर करने और दिल बहलाने के लिए जिद्द की, लाचार उनकी बात माननी ही पड़ी ।

    एक छोटी सी खूबसूरत और तेज जाने वाली किश्ती पर सवार हो इन्द्रजीतसिंह ने चाहा कि किसी को साथ न ले जायें सिर्फ दोनों भाई ही सवार हो और खे कर दरिया की सैर करें,। किसी की मजाल थी जो इनकी बात काटता, मगर एक पुराने खिदमतगार में जिसने कि बीरेन्द्रसिंह को गोद में खिलाया था और अब इन दोनों के साथ रहता था ऐसा करने से रोका और जब दोनों भाइयों ने न माना तो वह खुद किश्ती पर सवार हो गया । पुराना नौकर होने के ख्याल से दोनों भाई कुछ न बोले, लाचार साथ ले जाना पड़ा ।

    आनन्द० । किश्ती को धारा में ले जाकर बहाव पर छोड़ दीजिए फिर से कर ले आवेगे ।

    इन्द्र० । अच्छी बात है ।

    सिर्फ दो घण्टे दिन बाकी था जब दोनों भाई किश्ती पर सवार हो दरिया की सैर करने को गए क्योंकि लौटती समय चॉदनी रात का भी आनंद लेना मंजूर था ।

    चुनार से दो कोस पश्चिम गंगा के किनारे ही पर एक छोटा सा जंगल था । जब किश्ती के पास पहुंची, वसी की और साथ ही गाने की बारीक सुरीली आवाज इन लोगों के कानो में पड़ी । संगीत एक ऐसी

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    चन्द्रकान्ता सन्तति चीज है कि हर एक के दिल को चाहे वह कैला ही नासमझ क्यों न हो | अपनी तरफ खेंच लेती है यहाँ तक कि जानवर भी इसके वश में हो कर अपने को भूल जाता है ! दो तीन दिन से कुअर इन्द्रजीतसिंह का दिल चुटीला हो रहा था, दरिया की बहार देखना तो दूर रहे इन्हें अपने तनोबदन की भी सुध न थी, ये तो अपनी प्यारी तस्वीर की धुन में सर झुकाए बैठे कुछ सोच रहे थे, इनके हिसाब चारो तरफ सन्नाटर था, मगर इस सुरीली आवाज ने इनकी गर्दन घुमा दी और उस तरफ देखने को मजबूर किया जिधर से वह अावाज आ रही थी ! किनारे की तरफ देखने से यह तो मालूम न हुअा कि बसी बजाने यो गाने वाला कौन है मगर इस बात का अन्दाजा जरूर मिल गया कि लोग बहुत दूर नहीं हैं जिनके गाने की विजि सुनने वालों पर जादू का सा असर कर रही है ! इन्द्र० | श्राहा, क्या सुरीली आवाज है !! । ग्रानन्द० ! दूसरी अावाज भी आई । बेशक कई औरतें मिल कर | गा ३ जा रही हैं। | इन्द्रजीत० । ( किश्ती का मुहूं किनारे की तरफ फेर कर ) ताज्जुब है कि इन लोगों ने गाने बजाने और दिल बहलाने के लिए ऐसी जगह पसन्द की ! जरा देखना चाहिए । | आनन्द० | क्या हुई है, चलिए। वृहे रिपदमतगार ने किनारे किश्ती लगाने और उतरने के लिए मन। फ़िया और बहुत समझाया मगर इन दोनों ने न मानी, किश्ती किनारे लगाई और उतर कर उस तरफ चले जिधर से अचाने आ रही थी । जगन्न में थोड़ी ही दूर जा कर उसे पन्द्रह नौजवान औरतों का झुण्ड नजर पडा ऊँ। रग विरगर पोशाक और कीमती जेवरों वे अपने हुस्न को दूना किए ऊँचे पेड़ से लटकते हुए एक फूले की फुला रही थीं। कोई वंसी कोई मृदग वजाती, कोई हाथ से ताल दे दे कर गा रही थी । उस हिंडोले ________________

    पहीली इसी पर सिर्फ एक ही शौरत गगा की तरफ रुर किए बैठी थी । ऐसा मालूम होता था मानों परिय साक्षात् किसी देवकन्या को झुना र ग वजा कर | इसलिए प्रसन्न कर रही है कि लुबरती बढ़ने और नौजवानी के स्थिर रहने का वरदान पावें । मगर नहीं, उनके भी दिल की दिल ही दे रही और कुँअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह को आते देख हिंडोले पर बैठी हुई नाजनीन को अकेली छोड़ न जाने क्यों भाग जाना ही पडा । शानन्द० । भैया, वह सब तो भाग गई ! इन्द्र० । हो, मैं इस हिंटोले के पास जाता हूँ, तुम देखो वे शौरतें किधर गई । अानन्द । दृत गच्छा ।। चाहे जो हो मगर कुअर इन्द्रजीतसिंह ने उसे पहिचान ही लिया | जो हिंडोले पर अकेली रह गई थी । भला यह क्यों न पहिचानते ? जवहरी की नजर दी हुई अंगटी पर उसकी तस्वीर देख चुके थे, उनके दिल में उसकी तस्वीर खुद गई थी, अत्र तर मु हमारी मुराद पाई, जिसके लिए अपने को मिटाना मंजूर था उसे विना परिश्रम पाया, फिर क्या चाहिए । ग्रानन्दसिंह पता लगाने के लिए उन ग्रेरितों के पीछे गए मगर वे ऐसी भागी कि झलक तक दिखाई न दी, लाचार आधे घंटे तक रान होकर फिर उसे हिंटोले के पास पहुचे ! हिंटले पर बैठी हु श्रेरित की कौन कहे अपने भाई को भी वहा ने पायी । वर्षा कर इधर उधर हुने और पुकारने लगे, चरा तक कि रात हो गर्ट और यह सोचकर क्रिती के पास पहुंचे कि शायद वह चले गए हों, लेकिन वह भी सिवाय उन चुढे | पिदमतगार के किसी दूसरे को न देता । जी बेचैन हो गया, ज़िदमतगार को सन्द हाल कह कर बोले, "ज तक अपने व्यारे भाई का पता ने लगा टूगा घर न जाऊंगा, तू जाकर यहां के हवाले की सभी को पयर कर दे ।” खिदमतगार नै र तरह से नन्दसिंह को समझाया बुझाया और घर चलने के लिए कहा मगर कुछ फायदा न निकला । लाचार उसने ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति किश्ती उसी जगह छोडी और पैदल रोता कलपती किले की तरफ रवाना हुआ क्योंकि यहा जो कुछ हो चुका था उसका हाल राजा बीरेन्द्रसिंह से कहना भी उसने आवश्यक समझा ! चौथा बयान खिदमतगार ने किले में पहुच कर और यह सुन कर कि इस समय दोनों एक ही जगह बैठे हैं कु अर इन्द्रजीतसिंह के गायब होने का हाल और सवत्र जो कु र आनन्दसिंह की जुबानी सुना था महाराज सुरेन्द्र सिंह और श्रीरेन्द्रसिंह के पास हाजिर होकर अर्ज किया । इस खबर के सुनते ही उन दोनों के कलेजे में चोट सी लगी । थोड़ी देर तक घबराहट के सब कुछ सोच न सके कि क्या करना चाहिये | रात भी एक पहर से ब्याई जा चुकी यी 1 आखिर जीतसिंह तेजसिंह और देवीसिंह को बुला कर खिदमतगार की जुबानी जो कुछ सुना था कहा और पूछा कि अब क्या करना चाहिये । तेजसिंह० | उस जगल में इतनी अौरत को इकट्ठे हो कर गाना बजाना और इस तरह धोखा देना बेसबब नहीं है ।। | सुरेन्द्र० । जत्र से शिवदत्त के उभरने की खबर सुनी है एक खुटका सा बना रहा है, मैं समझता हूँ यह भी उसी की शैतानी है। | वीरेन्द्र० । दोनों के ऐसे कमजोर तो नहीं हैं कि जिसका जी चाहे पकड़ ले । सुरेन्द्र० । ठीक है, मगर आनन्द का भी वही रह जाना बुरा ही हुआ ) तेज० । बेचारा खिदमतगार जबर्दस्ती साथ हो गया था नहीं तो पता भी न लगता कि दोनें कहा चले गये । खैर उनके बारे में जो कुछ सोचना हैं सोचिये मगर मुझे जल्द इजाजत दीजिए कि हजार सिपाहियों को साथ लेकर वहा जाऊँ और इस वक्त उसे छोटे से जङ्गल को चारो तरफ से घेर लू, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा | ________________

    पहिला हिस्सा सुरेन्द्रः । ( जीतसिंह से ) क्या राय है? |जत० । तेज टीक कहता है, इसे भी जाना चाहिए ।। | हुक्म पाने ही तेजसिंह दीवानखाने के ऊपर एक बुर्ज पर चढ़ गए जहाँ ग्र; मा नक्कारा और उसके पास ही एक भारी चोव :मलिए रक्खा हा था कि वक्त चैवक्त जत्र कोई जरूरत या पई ग्रार फौज को तुरंत तैयार कराना हो तो इस नकारे पर चोब मारी जाय । इसकी अावाज भी निराले ही ढंग की थी जो किमी नारे की आवाज मे मिलती न थी शौर म बजाने के लिए तेजसिंह ने कई इशारे भी मुर्रर किए हुए थे । नेत्रवि ने चोर उठा क्रेर जोर से एक दफे नक्का पर भारी जिसको प्रीम्राज तमाम शहर में बल्कि दूर दूर तक गूंज गई । चाहें इसका मवव तिमी २ वाले की ममझ में न आया हो मगर सेनापति ममझ गया कि मी वक्तेः इजार पीजी सिपाहियों की जरूरत है जिरका इन्तजाम उसने बदृत जल्द किया । तेजसि” अपने सामान से तैयार हो किले के बाहर निकले शोर हजार फाजी सिपारी तथा बहुत से मशालचियो को साथ ले उस छोटे से जगल की तरफ रवाना होकर बहुत जल्दी ही वहॉ जा पहुचे ।। | थोडी थोडी दृर पर पहरा मुकर्रर कर के चारो तरफ से उस जंगल को घेर लिया । इन्द्रजीतसिंह तो गायत्र हो ही चुके थे, आनन्दसिंह से भी मिलने को बहुत तकत्रि की गई मगर उनका भी पता न लेगा । तरत में रात निताई सवेरा होते ही तेजसि न हेक्म दिया कि एक तरफ से इसे अगल को तेजी के साथ काटना शुरू करो जिधर्म दिन भर में तमाम जगल स्पः हो जाय । उसी समय महाराजा सुरेन्द्रसिह और जीतसिह भी व आ पहुँचे । जगल का काटना इन्होने भी पसन्द किया और बोले कि बहुत अच्छा होगा अगर हम लोग इस जगल से एक दम ही निश्चित हो जॉय ।। | इस छोटे से जगल को काटते देर ही कितनी लगनी थी, तिस पर महा ________________

    २६ चन्द्रकान्ता सन्तति राज की मुस्तैदी के सबब यहाँ कोई भी ऐसा नजर नहीं आता था जो पेड़ की कटाई में न लगा हो । दोपहर होते होते जगल कट के साफ हो गया मगर किसी का कुछ पता न लगा यहाँ तक कि इन्द्रजीतसिंह को तरह आनन्दसिंह के मी गायब हो जाने का निश्चय करना पडा हाँ इस जगल के अन्त में एक कमसिन नौजवान हसीन और बेशकीमती गहने कपड़े से सजी हुई औरत की लाश जरूर पाई गई जिसके सिर का पता न था ।। | यह लाश महाराज सुरेन्द्रसिंह के सामने लाई गई। अब सभी की परेशानी और भी बढ़ गई और तरह तरह के ख्याल पैदा होने लगे । लाचार उस लाश को साथ ले शहर की तरफ लौटे। जीतसिंह ने तेजसिंह से कहा, हम लोग जाते हैं, तारासिंह को भेज के सब ऐयारी को जो शिवदत्त की फिक्र में गए हुए हैं बुलवा कर इन्द्रजीतसिंह और अनिन्दसिंह की तलाश में भेजेंगे, मगर तुम इसी वक्त उनकी खोज में जहाँ तुम्हारा दिल गवाही दे जायो !

    तेजसिंह अपने सामान से तैयार ही थे, उसी वक्त सलाम कर एक तरफ को रवाना हो गए, और महाराज रूमाल से अखिों को पोंछते हुए चुनार कीतरफ विदा हुए । उदास और पोतों की जुदाई से दुखी महाराज सुरेन्द्रसिंह घर पहुँचे । दोनों लड़कों के गायब होने का हाल चन्द्रकान्ता ने भी सुना वह बेचारी दुनिया के दु:ख सुख को अच्छी तरह समझ चुकी थी इसलिए कलेजा मसोस कर रह गई, जादिर में रोकना चिल्लाना उसने पसन्द न किया, मगर ऐसा करने से उसके नाजुक दिल पर और मी सदमा पहुची, घडी भर में ही उसकी सूरत बदल गई । चपला शोर चम्पा को चन्द्रकान्ता से कितनो मुहब्बत थी इसको आप लोग बूब जानते है लिखने की कोई जरूरत नहीं, दोनों लटक के गायब होने का गम इन दोनों को चन्द्रकान्ता से ज्यादे हुया श्रीर दोनों ने निश्चय कर लिया कि मौका पा कर इन्द्रजीतसिंह अौर श्रानन्दसिंह का पता लगाने की कोशिश करेंगी ।। ________________

    पहिला हिस्सा | महाराज सुरेन्द्रसिंह के अाने की खबर पाकर वीरेन्द्रसिंह मिलने के लिये उनके पास गए । देवीसिंह भी वहाँ मौजूद थे । वीरेन्द्रसिंह के सामने ही महाराज ने सन हाल देवीसिंह से कह कर पूछा कि अब क्या करना देवी० } मै पहिने उस लाश को देखा चाहता हूँ जो उस जगल में पाई गई थी । । सुरेन्द्र० 1 हाँ तुम उसे जरूर देखो । जीत० } ( चोचदार से ) उस लाश को जो जगल में पाई गई थी इसी जगह लाने के लिये कहो । “बहुत अच्छा" कह कर चवदार बाहर चला गया मगर थोडी हीं देर में वापस आकर बोला, “महाराज के साथ आते आते न मालूम वह लाश' कहा गुम हो गई ! कई आदमी उसकी खोज में परेशान है मगर | पता नहीं लगता !!" | वीरेन्द्र० 1 अब फिर हम लोगों को होशियारी से रहने का जमाना श्रा गया । जय हजारों अदिमियो के बीच से लाश गुम हो गई तो मालूम होता है, अभी बहुत कुछ उपद्रव होने वाला है । | जीत० । मने तो समझा था कि अब जो कुछ थोड़ी सी उम्र रह गई। है श्रीराम से कटेगी, मगर नहीं, ऐसी उम्मीद किसी को कुछ भी न रखनी चाहिए। | सुरेन्द्र० 1 खेर जो होगा देखा जायगा, इस समय क्या करना मुनासिन। उमे सोच । जति० 1 मेरा विचार था कि तारासिंह को बद्रीनाथ वगैरह के पास भेजते जिसमें वे लोग भैरोसिंह को छुड़ा कर ग्रौंर किसी कार्रवाई में न फंसे और मीधे यहाँ चले श्रावे, मगर अब ऐसा करने की भी जी नहीं चाहतः । आज भर अप और सन्न करे, अच्छी तरह सोच विचार कर कल में अपनी राय दूगी । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति पांचवां बयान परित बड़ीनाथ पन्नालाल रामनारायण श्रौर जगन्नाथ ज्योतिषी भैरोसिर ऐयार को छुड़ाने के लिए शिवदत्तगढ़ की तरफ गए । हुक्म के मुताविक कञ्चनसिंह मेनापति ने शेर वाले बाबाजी के पीछे जासूस भेज कर पता लगा लिया था कि भैरोसिंह ऐयार शिवदत्तगढ़ किले के अन्दर पहुँचाए गए, इसीलिए इन ऐयारों को पता लगाने की जरूरत न पडी, साधे शिवदत्तगढ़ पहुँचे और अपनी अपनी सूरत बदल शहर में घूमने लगे, पॉचो ने एक दूसरे का साथ छोड़ दिया मगर यह ठीक कर लिया था कि सब लोग घूम फिर कर फलानी जगह इकट्ठे हो जायँगे । दिन भर घूम फिर कर भैरोसिंह का पता लगाने के बाद कुल ऐयार शहर के बाहर एक पहाड़ी पर इकट्ठे हुए और रात मर सलाह करके राय कायम करने में काटी, दुमरे दिन ये लोग फिर सूरत बदल बदल कर शिवदत्तगढ़ में पहुँचे । रामनारायण और चुन्नीलाल ने अपनी सूरत उसी जगर के चोदारों की सी बनाई और वहा पहुँचे जहाँ भैरोसिंह कैद थे । कई दिनों तक कैद रहने के सवव उन्होने अपने को जाहिर कर दिया था और अपनी असली सूरत में एक कोठड़ी के अन्दर जिसके तीन तरफ दीवार श्रीर एक तरफ लोहे का अँगला ल हुया था वन्द थे । उस कोठी के बगल में उसी तरह की एक कोटी ग्रौर थी जिसमें गद्दी लगाए एफ वृद्धा दारोगा बेटा था और बार कई सिपाही नंगी तलवार लिए घूम घूम कर पा दे रहे थे । रामनारायण श्रौर चुन्नीलाल उस ६ट के देने पर जाकर पड़े हुए र बृढे दारोगा से बातचीत इग्न लगे। राम० | श्रापी महाराज ने याद किया है । चुदा० | क्यों क्या चाम १ १ भीतर श्राश्रा, बैठो, चलते हैं | रामनारायण श्रीर चुन्नीलाल कोटडी के अन्दर गए और बोले- ________________

    पहिला हिस्सा राम० । न मालूम क्यों बुलाया है मगर ताकीद की है कि जल्द बुला लाश्रो ! वृहा० । अभी घण्टे भर भी नहीं हुए जब किसी ने श्री के कहा था | कि महाराज खुद आने वाले हैं, क्या वह वात झूठ थी १ । राम० | हा महाराज ग्राने वाले थे मगर अब न अावेंगे । बूढ० अच्छा शाप दोग आदमी इसी उग्र वैट थ्रार कैदी की | हिफाजन करे में जाता हू ।। राम | बहुत अच्छा । रामनारायण श्रौर चुन्नीलाल को कड़ी के अन्दर बैठा कर बुढा दारोगा बाह्र श्राय और चालाकी से फूट इस कोठडी की दवा बन्द कर के बाहर से बोला, “इन्दगी । में दोनों को पहिचान राधा किं ऐयार हौ ! कहिये अब हमारे द मैं आप लोग फंसे या नहीं ? मने भी क्या मजे में पता लगा लिया ! पूछा कि अभी तो मालूम हुआ था कि महाराज खुद आने वाले हैं, अपने भी झट आबूल कर लिया अॅार कहा कि 'इवा आने वाले थे मगर अर्य न झायेगे। यह न समझे कि में धोखा देता है । इसी अक्ल पर ऐयारी करते ही १ वैर अप लोग भी अचे इसी कैदखाने की हवा खाइये और जान लीजिये कि मैं बाकरअली ऐयार झाप लोगो को मजा चखाने के लिए इस जगह बैठाया गया हू ।' चुढे की बातचीत मुन रामनारायण और बुन्नालाल चुप हो गये बल्कि शम कर सिर नीचा कर लिया 1 बूढा दारोगा वहा से रवाना हुआ और शिवदत्त के पास पहुंच इन दोन ऐयारों के रिप्तार करने का हाल का । महाराज ने खुश होकर चाकरअली को इनाम दिया और खुशी खुशी खुद रामनारायण और चुन्नीलाल को देखने आये । । | बद्रीनाथ पन्नालाल र ज्योतिदीजो को भी मालूम हो गया कि हमारे साथियों में से दो ऐयार पकड़े गये । अब तो एक की जगह तीन श्रादभिया के छुने की फिक्र करनी पड़ी। ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति कुछ रात गये ये तीनों ऐयार घूम फिर कर शहर के बाहर की तरफ जा रहे थे कि पीछे से एक आदमी काले कपड़े से अपना तमाम वदन छिपाये लपकता हुआ उनके पास आया और लपेटा हुशा छोटा सा एक कागज उनके सामने फेंक और अपने साथ ग्राने के लिये हाथ से इशारा कर के तेजी से आगे बढ़ा ।। बड़ीनाथ ने उम पुर्जे को उठा कर सड़क के किनारे एक वनिये की दुकान पर जलते हुए चिराग की रोशनी में पढ़ा, सिर्फ इतना ही लिखा था—“भैरोसिंह ।' बद्रीनाथ समझ गए कि भैरोसिंह किसी तरकीब से निकल भाग है और यही जा रहा है। बद्रीनाथ ने भैरोसिंह के हाथ की लिखी भी पहिचाना ।। भैरोंसिह पुर्जा फेंक कर इन तीनों को हाथ के इशारे से बुला गया श्री ग्रौर दम बारह कदम आगे बढ़ अब इन लोगों के आने की राह देख रहा था । | बद्रीनाथ वगैरपुश हो कर आगे बढ़े और उसे जगह पहुचे जहा भैरोसिंहू काले कपड़े से बटन को छिपाये सड़क के किनारे झाड देख कर पड़ा था । बातचीत करने का मौका न था, आगे आगे भैरोसिंह और पीछे पीछे बद्रीनाथ पन्नालाल और ज्योतिपीजी तेजी से कदम बढ़ाते शहर के वाइर हो गये ।। रात अन्धेरी थी । मैदान में जाकर भैरोसिंह ने काला कपडा उतार दिया | इन तीनों ने चन्द्रमा की गेशनी में भैरोसिंह को पहिचाना, खुश होकर बारी बारी तीनों ने उसे गले लगाया और तब एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर बातचीत करने लगे । | बद्री० । नैमिर, इस वक्त तुम्हें देय कर तबीयत बहुत ही खुश हुई । ६० { में तो किसी तरह छूट श्राया मगर रामनारायण श्रीर गुनीलाल दब जा फँसे है । पति० } उन दोनों ने भी क्या हो घोसा साया है । ________________

    पहिला हिस्सा भैरो० | मैं उनके छुडाने की भी फिक्र कर रहा हूँ। पन्ना० | वह क्यों ? भैरो० । सो सब कहने सुनने का मौका तो रात भर है मगर इस | समय मुझे भूख बटर जोर से लगी है कुछ हो तो खिलायो । | बद्री० } दो चार पेड़े है, जी चाहे तो खा लो ।। भै) ० । इन दो चार पेडों से क्या होगा ? खैर कम से कम पानी का तो बन्दोस्त होना चाहिये ।। वर्द्रः । पिर क्या करना चाहिये १ भैरो० 1 ( हाथ से इशारा कर के } वह देखो शहर के किनारे जो चिराग जल रहा है अभी देखते आये है कि वह हलवाई की दुकान है। और वह ताजी पूरियाँ बना रहा है, बल्कि पानी भी उसः हलवाई से मिल जायेगा | पन्ना० ! अच्छा में जाता है । भैरो० | हम लोग भी साथ ही चलते हैं, सभों को इकट्ठे ही रहना ठीक है, कहीं ऐसा न हो कि आप फेस जाये और हम लोग राह ही देखते रहे । | पन्ना० । फेसना क्या खिलवाड़ हो गया ? | भैरो० । खैर हर्ज ही क्या है अगर हमलोग साथ ही चले चले ? तीन आदमी किनारे खड़े हो जायगे एक अादमी आगे बढ़ कर सौदा ले लेगा ।। बढी • } हाँ हाँ यही ठीक होगा, चलो हम लोग एक साथ चलें । चारो ऐयार एक साथ वहाँ से रवाने हुए और उस इलवाई के पास पहुंचे जिसकी अकेली दूकान शहर के किनारे पर थे 1 बद्रीनाथ ज्योति जी और भैरोसिंहू कुछ दूर इधर ही खड़े रहे और पन्नालाल सौदा खरीदने के लिए दुकान पर गये ! जाने के पहले ही भैरोसिंह ने कहा, मिट्टी के बर्तन में पानी भी देने का एकरार हलवाई से पहिले कर लेना नहीं तो पीछे हुज्जत करेगा।

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    ३२ चन्द्रकान्ता सन्तति पन्नालाल हलवाई की दुकान पर गये और दो सेर पूरी सेर भर मिठाई मॉगी ! हलवाई ने खुद पूछा कि ‘पानी भी चाहिये या नहीं ? पन्ना० ! हा हा पानी जरूर देना होगा । इल० । कोई वर्तन है ? पन्ना० | वर्तन तो है मगर छोटा है, तुम्ही किसी मिट्टी के ठिलिये में जल दे दो } हले० । एक घटा जल के लिये अाठ अाने और देने पड़े गे ) पन्ना० । इतना अधेर ! खैर हम देगे । पूरी मिटाई और एक घडा जल लेकर चारो ऐयार वहा से चले मगर यह खबर किसी को भी न थी कि कुछ दूर पीछे दो आदमी साथ लिए छिपता हुआ हलवाई भी ग्रा रहा है । मैदान में एक बड़े पत्थर की चट्टान पर वैट चारो ने भोजन किया जल पिया और हाथ में है वो निश्चिन्त हो धीरे धीरे अ पुस में बातचीत करने लगे । आधा घण्टा भी न बीता होगा कि चारों बेहोश होकर चट्टान पर लेट गए और दोनों श्रादमियों का साथ लिए हलवाई दनकी खोपटी पर था मौजूद हुआ। | हुलचाई के साथ आए हुए दो श्रादमियों ने बद्रीनाथ ज्योतिपीजी शौर पन्नालाल की मुश्के कस टाली शोर कुछ सुधा भैरामिह को हाश में लाकर बोले, “वाह जी अजायबसिंह, श्रापकी चालाकी तो खूत्र काम कृर गर्ट 1 अत्र तो शिवदत्तगढ़ में आये हुए पाचो नालायक हमारे हाथ फस । महाराज से सच से ज्याद इनाम पान का काम तो श्राप ही न किय!" छठवां वयान बरन मी तली उठा कर महाराज मुरेन्द्रसिंह और बीरेन्द्रसिंह तथा इन् । बदलत चन्द्रकान्ता चपला चम्पा तेजसिंह ौर देवीसिह वगैरह ३ थे; दिन र मुगु र मगर अ५ व जमाना न रह 1 सच है सुख दु प र पहरा अविर बदलता रहता है। खुशी के दिन बात ________________

    पहिला हिस्सा की बात में निकल गए कुछ मालूम न पा थीं तक कि मुझे भी कोई बात उन लोगों की लिखने लायक न मिली लेकिन अब उन लोगों की मुमावत के, प्र काटे नहीं करते। | कौन जानना था कि गया जिरा शिवदत्त फिर बुला की तरह निकल आवेग १ किले खबर थी कि बेचार चन्द्र कान्ता की गौद से पले पाए दोनों होनहार ल* यो अल कर दिये जाए गे ? कौन साफ कह सकता था कि इन लो की वैशावली र राप्य में जितनी तरक्की होगी यकायक उतनी ही यादे श्राफत भी आ पड़ेगी ? खैर खुशी के दिन तो उन्होने काटे, अब मुनावत का घडी कौन झेन १ हाँ बेचारे जगन्नाथ ज्योतिया ने इतना अन्र कह दिया था कि वीरेन्द्रसिंह के राज्य शोर वश की बहुत कुछ वर होते. मगर मुसीबत को लिए हुए । खैर श्रागे जो कुछ होगा देखा जायगा पर इस समय ते सत्र के सब तर दुद में पड़े हैं । देखिए अपन एकान्त के कमरे म महाराजा सुरेन्द्र सिंह कैसा चिन्ता में बैठे हैं और वाई' तरफ गद्दी का कान ए राजा वीरेन्द्रसिंह अपने मामने बैठे हुए जीतहि की सूरत किस नेचैन। स देख रहे हैं। दोनो नाप बा अर्थ तु देवसिंह और तारासिंह अपने पास ऊपर के दर्ज पर बेठे हुए बुजुग और गुरू के समान जीतसिंह की तरफ कुरै हुए इस उम्र में बैठे हैं कि देले अब आखिरी हुक्म क्या होता हैं । (1वाय इन लोगों के इस कमरे में और कोई भी नहीं है, एक दम सन्नाटा छाया हुआ है । न मालूम इसके पहिले क्या क्या बातें हो चुकी है मगर इस वक्त ती महाराजा सुरेन्द्रसिंह ने इस सन्नाटे की सिर्फ इतना ही कह के तांदा, *बर चम्पा और चपला की भी दति मान लेनी चाहिए । जं.त० | जो मजी, मगर देवास के लिए क्या हुक्म होता है ? सुरेन्द्र० । और तो कुछ नहीं सिर्फ इतना ही ख्याल है कि चुनार की हिफाजत ऐसे वक्त है क्यों कर होगी १ जीत० । मैं समझता हूं कि यह की हिफाजत के लिए तारा बहुत है। और फिर वक्त पड़ने पर इस बुढौती में भी में कुछ कर गुजरूर । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति सुरेन्द्र० । कुल मुस्कुरा कर और उम्मीद भरी निगाहों से जीतसिंह की तरफ दे कर ) वैर, जो मुनासिब ममीको ।। जीत० } ( देव मिह से ) लीजिए साहवे, असे आपको भी पुरानी कसर निकालने का मौका दिया जाता है, देखें आप क्या करते हैं ! ईश्वर इस मुस्तेदो को पूरा करें ।। | इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए और सलाम कर कमरे के बाहर चले गए। सातवां बयान अपने माई इन्द्रजीतसिंह की जुदाई से व्याकुल हो उसी समय आनन्द सिंह उम जगल के बाहर हुए और मैदान में खड़े हो इधर उधर निगाह दौड़ाने लगे । पश्चिम तरफ दो औरतें घोड पर सवार धीरे धीरे जाती हुई दिखाई पड़ा । ये तेजी के साथ उस तरफ बढे और उन दोनों के पास पहुँचने की उम्मीद में दो कोस तक पीछा किए चले गए मगर उम्मीद पूरी न हुई क्योंकि एक पहाड़ी के नीचे पहुंच कर चे दोनों रुकी और अपने पीछे अाते हुए अनन्दसिंह की तरफ देख घोड़े को एक दम तेज कर पाटी के बगल में घूमती हुई गायब हो गई है। तू खिली हुई चाँदनी रात होने के समय से आनन्दर्भिह को ये दोनों रिते दिखाई पदी र उन्होंने इतनी हिम्मत भी की, पर पहाटी के पास पहुचते ही उन दोनों के भाग जाने से इनको वा ही रञ्च हुश्रा । खड़े हो कर मोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए । इनकी हैरान शौर सोचते हुए चोट कर निर्दयी चन्द्रमा ने भी धीरे धीरे अपने घर का रास्ता लिया और अपने दुश्मन को जाते देत मौका पाकर अन्धेरे ने चारो तरफ दुमत 'जमाई । शानन्दसि श्रीर भी दुरजी ए ! क्या करें ? कहाँ जाप ? किमले पूलें कि इन्द्रजीत िको कौन ले गया ? दूर से एक रोशनी दिखाई पड़ी। गौर करने से मालूम हुआ कि किसी ________________

    ३५, पहिला हिस्सा झ ! के आगे आग जल रही है। नन्दसिह उभी तरफ चले और थोडी ही देर में कुटी के पास पहुँच कर देखा कि पते की बनाई हुई हरी झोपी के आगे आठ से आदमी जर्मन पर फर्श त्रिछाये बेटे है जो कि दाढी र पहिरावे से साफ मुसलमान मालूम पड़ते हैं 1 बीच में दो मोमी शमदिन जल रहे हैं । एक आदमी फारसी के शेर पढ़ पढ़ कर मुना रहा है और बाकी सब ‘वाह वाह की धुन ला रहे है । एक तरफ अग जल रही शौर दो तीन आदमी कुछ खाने की चीजें पका रहे हैं । आनन्दसिंह फर्श के पास जाकर खड़े हो गए। अानन्दसिंह को देखते ही सब के सब उठ खड़े हुए और बड़ी इज्जत से उनको फर्श पर बैठाया । उस आदमी ने जो फारम की शेरै पढ़ पढ़ कर सुना रह था खड़े हो कर अपनी रगीली भाषा में कही, खुदा का शुक्र है कि शारदये चुनार ने इस मजलिस में पहुँच कर हम लोर की इज्जत क्रो फल्केहफ्तुम * तक पहुँचाया । इस जगल बयावान में हम लोग क्या खातिर कर सकते हैं सिवाय इसके कि इनके कदमों को अपनी अखिों पर जगह दें और इत्र व इलायची पेशकश करे !” केवल इतना ही कह कर इत्रदान और इलायची की दिव्यी उनके मागे ले गया । पढे लिखे भले आदमियों की खातिर जरूरी सम कर मानन्दसिंह ने इत्र सा और दो इलायची ले लिया, इसके बाद इनसे इजाजत ले कर वह फिर पारसी कविता पढ़ने लगा ! दूसरे आदमियों ने दो एक तकिए इनके अलग बगल में रख दिए । | इत्र की विचित्र खुशबू ने इनको मस्त कर दिया, इनकी पलकें भारी हो गई थौर बेहोशी ने धीरे धीरे अपना असर जमा कर इनको फर्श पर सुला दिया । दूसरे दिन दोपहर को आँख टलने पर इन्हें ने अपने को

    मुसलमानों के किताब में गत र आसमान के लिखे हैं, सत्र के ऊपर वाले दर्जे का नाम फल्नेहफ्तुम है । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति एक दूसरे ही मकान में मसहरी पर पड़े हुए पाया। धवडा कर उठ वैट और इधर उधर देखने लगे । | पाच कममिन और खूपसूरत औरतें सामने खड़ी हुई दिखाई दी जिनमें से एक मदारी की तरह पर कुछ आगे बढ़ः हुई थी । उनके हुस्न ग्रौर अदा को देख ग्रानन्दसिंह दग हो गये । उसकी बडी बडी अखि शौर बाझी चितवन ने इन्हें प्रापे से बाहर कर दिया, उसको जरा सी इसी ने इनके दिल पर बिजली गिराई, और आगे बढ़ हाथ जोड़े इस कहने ने ती शोर भो भितम ढाया कि-क्या श्राप मुझसे खफा है ? अनिन्दसिंह भाई ३ जुदाई, रात की बात, ऐयारो के धोखे में पड़ना, सूत्र कुछ बिल्कुल भूल गए और उसकी मुहब्बत में चूर हो बोले"तुम्हारा सी परीजमाल से और रज !! | वह शौरत पल पर बैठ गई और आनन्दसिंह के गले में हाथ डाल के बोली, “बुदा को कमम खा कर कद्दती हूँ कि साल भर से आपके इश्क ने मुझे बेकार कर दिया ! मिवाय अापके ध्यान के स्वाने पीने की विल्कुल सुध न रही, मगर मौका न मिलने से लाचार या !' ग्रानन्द० ! ( चाक कर ) हैं ! क्या तुम मुसलमान हौ जो खुद को कसम खाती है ? ग़ौरत० } ( हम कर ) हा, क्या मुसलमान बुरे होते हैं ? ग्रानन्दसिंह य" कह कर उठ खड़े हुए—*अफमोम | अगर तुम मुसलमान न होता तो में तुम्हें जी जान में प्यार करता, मगर एक अंग्त ३ निए अपना मन नही गाड मफ्ता ??? ग्रीन ! ( हाथ थाम कर ) ३ । वेमुरी उनी मत करी । म मच को 7 प तु हारा जुदाई मुझमे न मह जायेग, ! अन द भ न मचे हना है कि मुझसे किस तरह के उम्मीद न ३ ] । *प्रश्न० । ( भा मिकी केर ) या यह बात दिल से कहते हो ? ________________

    39 पहिला हिस्सा अानन्द० । हाँ, बल्कि कसम खा कर ! श्रीरत० | देखो पछताओगे शीर मुझ सी चाहने वाली कभी न पाओगे ! ग्रानन्द० 1 ( अपना हाथ छुड़ा कर ) लानत है ऐसी चाह पर } औरत० । तो क्या तुम यहाँ से चले जाओगे ? अनिन्द० } जरूर ! औरत० } मुमकिन नहीं ।। आनन्द० | क्या मजाले कि तुम मुझे रोको ! श्रीरत० } ऐमा खयाल भी न करना ।

    देखें मुझे केन रोकता है !" कह कर नन्दसिंह उसे कमरे | के बाहर हुए श्रीर उसी कमरे को एक खिडकी जो दोबार में लगी हुई यी रोल ३ श्रीरते वहाँ से निकल गई ।।

    अानन्दसिंह इस उम्मीद में चारों तरफ घूमने लगे कि कहीं रास्ता | मिले तो बाहर हो जायं मगर उनकी उम्मीद किसी तरह पूरी नहीं हुई ।। यः मकान बहुत लम्बा चौडा न था । सिवाय इस कमरे और एक | सरन के और कोई जगह इसमें न थी ! चारो तरफ ऊ ची ऊंची दीवारों के सिवाय बाहर जाने के लिए कहीं कोई दुर्वाजा न था | हर तरह से | लाचार और दुःरी हो फिर उसी पत्नग पर श्री लेटे और सोचने लगे– । “अब म्या करना चाहिए ? इस कम्बख्त से किस तरह जान बचे ? यह तो हो ही नहीं सकता कि में इसे चाहूं या प्यार करें ! राम रमि, मुसलमानिन से और इश्क ! यह तो सपने में भी नहीं होने का । | तब फिर क्या करू ? लाचारी है, जब किसी तरह छुट्टी न देखें या तो | इसी खञ्जर से जो मेरी कमर में हैं अपनी जान दे देंगी । कमर से खञ्जर निकालना चाहा, देखा तो कृमर खाली है । फिर सोचने लगे— | गजब गया। इस हरामजादी ने तो मुझे किसी लायक न रक्खा। | अगर कोई दुश्मन आ जाय तो में क्या कर सकूगा । वेश्या अगर मैरे

    पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    घूमते फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी भरी सुहावनी पहाडी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए,मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमर और दालान रहने लायक थे।यह छोटी पहाडी अपने चारे तरफ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दत्री हुई थी वि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना श्रौर कुछ पता लगाना मुश्किल था।।इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ वास आदमी थे जिन तीन मुसलमान ऐयार भी थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्ते शरों में में से झीर यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गए।कि इनके शामिल रहने से कभी न कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला ले का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के श्रौर केाई इर लायक नजर भी न झात्ती था जो इन बेईमान को ऐयारी के लिए अपने मा राता।नेचे लिखे नाम से ये तीनों ऐयार पुकारे जाते थे-चाकर अला,ईटावक्श और यारग्रल!इन सत्र ऐयारों श्रौर साथियों ने मुपए,पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा महाराज शिवदत्त की मदद की।

    राजा वारेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ मगर मेंका न मिलने के स व मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा।अपनी चालाकी और होशियारी से वह् पहाटी भिल्ल कोल और पवार इत्यादि जाति के श्रादमिर्यों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजार में गल्ला मी शहद श्रीर,बहुत मी जगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों के मारफत दर में भैरवा और विया कर रुपए,बटोरने लगा।उन्हीं लोगो से शियार रके थे।बहुत फौज भी उस वन लधापहाति के लोग भै होशियार हो गए और खुद्द शहर मेंर मला वर्ग इंच रुपए इक्ट्ठा करने लगे । शिवदत्तगढ़ भा अच्छी तरह अबाद आ गया।

    दूध बो रह ऐयारी ने भी अपने कुल साथ को जो ________________

    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३

  • गो-दान

    गो-दान

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    गो-दान
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    १

    होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा—गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूँ। जरा मेरी लाठी दे दे।

    धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली—अरे, कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है।

    होरी ने अपने झुर्रिर्यों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा—तुझे रस-पानी की पड़ी है, मुझे यह चिन्ता है कि अबेर हो गयी तो मालिक से भेंट न होगी। असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।

    'इसी से तो कहती हूँ, कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन हरज होगा। अभी तो परसों गये थे।'

    'तू जो बात नहीं समझती, उसमें टाँग क्यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है। नहीं कहीं पता न लगता कि किधर गये। गाँव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।'

    धनिया इतनी व्यवहार-कुशल न थी। उसका विचार था कि हमने ज़मींदार के खेत जोते हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी खुशामद क्यों करें, उसके तलवे क्यों सहलायें। यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस बरसों में उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो, चाहे एक-एक कौड़ी को दाँत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक़ होना मुश्किल है। फिर भी वह हार न मानती थी, और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आये दिन संग्राम छिड़ा रहता था। उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन जिन्दा है, एक लड़का गोबर कोई सोलह साल का, और दो लड़कियाँ सोना और रूपा, बारह और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ही में मर गये। उसका मन आज भी कहता था, अगर उनकी दवादारू होती तो वे बच जाते; पर वह एक धेले की दवा भी न मँगवा सकी थी। उसकी ही उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाँ ही साल तो था; पर सारे बाल पक गये थे, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। सारी देह ढल गयी थी, वह सुन्दर गेहुआँ रंग सँवला गया था और आँखों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिन्ता ही के कारण तो। कभी तो जीवन का सुख न मिला। इस चिरस्थायी जीर्णावस्था ने उसके आत्म-सम्मान को उदासीनता का रूप दे दिया था। जिस गृहस्थी में पेट की रोटियाँ भी न मिलें, उसके लिए इतनी खुशामद क्यों? इस परिस्थिति से उसका मन बराबर विद्रोह किया करता था। और दो चार घुड़कियाँ खा लेने पर ही उसे यथार्थ का ज्ञान होता था। उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ लाकर सामने पटक दिये।

    होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा—क्या ससुराल जाना है जो पाँचों पोसाक लायी है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जाकर दिखाऊँ।

    होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा—ऐसे ही तो बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जायेंगी!

    होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा—तो क्या तू समझती है, मै बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते है।

    'जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे! तुम्हारी दशा देख-देखकर तो मैं और भी भूखी जाती हूँ कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?'

    होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में जैसे झुलस गयी। लकड़ी सँभालता हुआ बोला—साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पायगी धनिया! इसके पहले ही चल देंगे।

    धनिया ने तिरस्कार किया—अच्छा रहने दो, मत असुभ मुंह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।

    होरी लाठी कन्धे पर रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाये हुए हृदय में आतंकमय कम्पन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के सम्पूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अन्तःकरण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अन्दर छिपाये लेता था। विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी मानो झटका देकर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गयी यी। काना कहने से काने को जो दुःख होता है, वह क्या दो आँखोंवाले आदमी को हो सकता है?

    होरी कदम बढ़ाये चला जाता था। पगडण्डी के दोनों ओर ऊख के पौधों की लहराती हुई हरियाली देख कर उसने मन में कहा—भगवान कहीं गौं से बरखा कर दें और डाँड़ी भी सुभीते से रहे, तो एक गाय जरूर लेगा। देशी गायें तो न दूध दें न उनके बछवे ही किसी काम के हों। बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले। नहीं, वह पछाई गाय लेगा। उसकी खूब सेवा करेगा। कुछ नहीं तो चार-पाँच सेर दूध होगा। गोबर दूध के लिए तरस-तरस कर रह जाता है। इस उमिर में न खाया-पिया, तो फिर कब खायेगा। साल-भर भी दूध पी ले, तो देखने लायक हो जाय। बछवे भी अच्छे बैल निकलेंगे। दो सौ से कम की गोंई न होगी। फिर, गऊ से ही तो द्वार की सोभा है। सबेरे-सबरे गऊ के दर्शन हो जायें तो क्या कहना। न जाने कब यह साध पूरी होगी, कब वह शुभ दिन आयेगा!

    हर एक गृहस्थ की भाँति होरी के मन में भी गऊ की लालसा चिरकाल से संचित चली आती थी। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न, सबसे बड़ी साध थी बैंक सूद से चैन करने या ज़मीन खरीदने या महल बनवाने की विशाल आकांक्षाएँ उसके नन्हें-से हृदय में कैसे समातीं।

    जेठ का सूर्य आमों के झुरमुट से निकलकर आकाश पर छायी हुई लालिमा को अपने रजत-प्रताप से तेज प्रदान करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था और हवा में गर्मी आने लगी थी। दोनों ओर खेतों में काम करनेवाले किसान उसे देखकर राम-राम करते और सम्मान-भाव से चिलम पीने का निमन्त्रण देते थे; पर होरी को इतना अवकाश कहाँ था। उसके अन्दर बैठी हुई सम्मान-लालसा ऐसा आदर पाकर उसके सूखे मुख पर गर्व की झलक पैदा कर रही थी। मालिकों से मिलते-जुलते रहने ही का तो यह प्रसाद है कि सब उसका आदर करते हैं। नहीं उसे कौन पूछता? पाँच बीघे के किसान की विसात ही क्या? यह कम आदर नहीं है कि तीन-तीन, चार-चार हलवाले महतो भी उसके सामने सिर झुकाते हैं।

    अब वह खेतों के बीच की पगडण्डी छोड़कर एक खलेटी में आ गया था, जहाँ बरसात में पानी भर जाने के कारण तरी रहती थी और जेठ में कुछ हरियाली नज़र आती थी। आस-पास के गाँवों की गउएँ यहाँ चरने आया करती थीं। उस समय में भी यहाँ की हवा में कुछ ताज़गी और ठंडक थी। होरी ने दो-तीन साँसें जोर से लीं। उसके जी में आया, कुछ देर यहीं बैठ जाय। दिन-भर तो लू-लपट में मरना है ही। कई किसान इस गड्ढे का पट्टा लिखाने को तैयार थे। अच्छी रकम देते थे; पर ईश्वर भला करे राय साहब का कि उन्होंने साफ़ कह दिया, यह ज़मीन जानवरों की चराई के लिए छोड़ दी गयी है और किसी दाम पर भी न उठायी जायगी। कोई स्वार्थी ज़मींदार होता, तो कहता, गायें जायें भाड़ में, हमें रुपए मिलते हैं, क्यों छोड़ें। पर राय साहब अभी तक पुरानी मर्यादा निभाते आते हैं। जो मालिक प्रजा को न पाले, वह भी कोई आदमी है?

    सहसा उसने देखा, भोला अपनी गायें लिये इसी तरफ़ चला आ रहा है। भोला इसी गाँव से मिले हुए पुरवे का ग्वाला था और दूध-मक्खन का व्यवसाय करता था। अच्छा दाम मिल जाने पर कभी-कभी किसानों के हाथ गायें बेच भी देता था। होरी का मन उन गायों को देख कर ललचा गया। अगर भोला वह आगेवाली गाय उसे दे तो क्या कहना! रुपए आगे पीछे देता रहेगा। वह जानता था घर में रुपए नहीं हैं, अभी तक लगान नहीं चुकाया जा सका, बिसेसर साह का देना भी बाकी है, जिस पर आने रुपए का सूद चढ़ रहा है। लेकिन दरिद्रता में जो एक प्रकार की अदूरदर्शिता होती है, वह निर्लज्जता जो तकाजे, गाली और मार से भी भयभीत नहीं होती, उसने उसे प्रोत्साहित किया। बरसों से जो साध मन को आन्दोलित कर रही थी, उसने उसे विचलित कर दिया। भोला के समीप जाकर बोला––राम-राम भोला भाई, कहो क्या रंग-ढंग है। सुना अबकी मेले से नयी गायें लाये हो।

    भोला ने रुखाई से जवाब दिया। होरी के मन की बात उसने ताड़ ली थी––हाँ, दो बछिये और दो गायें लाया। पहलेवाली गायें सब सूख गयी थीं। बन्धी पर दूध न पहुँचे तो गुजर कैसे हो।

    होरी ने आनेवाली गाय के पुट्टे पर हाथ रखकर कहा––दुधार तो मालूम होती है। कितने में ली?

    भोला ने शान जमायी––अबकी बाजार बड़ा तेज़ रहा महतो, इसके अस्सी रुपए देने पड़े। आंखे निकल गयीं। तीस-तीस रुपए तो दोनों कलोरों के दिये। तिस पर गाहक रुपए का आठ सेर दूध माँगता है।

    'बड़ा भारी कलेजा है तुम लोगों का भाई, लेकिन फिर लाये भी तो वह माल कि यहाँ दस-पाँच गाँवों में तो किसी के पास निकलेगी नहीं।'

    भोला पर नशा चढ़ने लगा। बोला––राय साहब इसके सौ रुपए देते थे। दोनों कलोरों के पचास-पचास झपाए, लेकिन हमने न दियें। भगवान ने चाहा, तो सौ रुपए इसी व्यान में पीट लूँगा।

    'इसमें क्या सन्देह है भाई! मालिक क्या खाके लेगे। नजराने मे मिल जाय, तो भले ले लें। यह तुम्ही लोगों का गुर्दा है कि अंजुली-भर रुपए तकदीर के भरोसे गिन देते हो। यही जी चाहता है कि इसके दरसन करता रहूँ। धन्य है तुम्हारा जीवन कि गउओं की इतनी सेवा करते हो। हमें तो गाय का गोबर भी मयस्सर नही। गिरस्त के घर मे एक गाय भी न हो, तो कितनी लज्जा की बात है। माल-के-माल बीत जाते है, गोरस के दरसन नहीं होते। घरवाली बार-बार कहती है, भोला भैया से क्यों नहीं कहते। मैं कह देता हूँ, कभी मिलेगे तो कहूँगा। तुम्हारे सुभाव से बड़ी परसन रहती है। कहती है, ऐसा मर्द ही नहीं देखा कि जब बातें करेगे, नीची आँखें करके, कभी सिर नहीं उठाते।'

    भोला पर जो नशा चढ़ रहा था, उसे इस भरपूर प्याले ने और गहरा कर दिया। बोला––भला आदमी वही है, जो दूसरों की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझे। जो दुष्ट किसी मेहरिया की ओर ताके, उसे गोली मार देना चाहिए।

    यह तुमने लाख रुपए की बात कह दी भाई। बस सज्जन वही, जो दूसरों की आबरू को अपनी आबरू समझे।'

    'जिस तरह मर्द के मर जाने से औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत के मर जाने से मर्द के हाथ-पाँव कट जाते हैं। मेरा तो घर उजड़ गया महतो, कोई एक लोटा पानी देनेवाला भी नहीं।'

    गत वर्ष भोला की स्त्री लू लग जाने से मर गयी थी। यह होरी जानता था, लेकिन पचास बरस का खंखड़ भोला भीतर से इतना स्निग्ध है, वह न जानता था। स्त्री की लालसा उसकी आँखों में सजल हो गयी थी। होरी को आसन मिल गया। उसकी व्यावहारिक कृषक-बुद्धि सजग हो गयी। ⁠ 'पुरानी मसल झूठी थोड़ी है–विन घरनी घर भूत का डेग। कहीं सगाई नहीं ठीक कर लेते?'

    ⁠ ताक में हूँ महतो,पर कोई जल्दी फंसता नहीं। सौ-पचास खरच करने को भी तैयार हूं। जैसी भगवान की इच्छा।'

    ⁠ 'अब मैं भी फिकर में रहूँगा। भगवान चाहेंगे, तो जल्दी घर बम जायगा।

    ⁠ 'बस यही समझ लो कि उवर जाऊँगा भैया! घर में खाने को भगवान का दिया बहुत है। चार पसेरी रोज दूध हो जाता है,लेकिन किस काम का।'

    ⁠ 'मेरे ससुराल में एक मेहरिया है। तीन-चार साल हुए, उसका आदमी उसे छोड़कर कलकत्ते चला गया। बेचारी पिसाई करके गुजर कर रही है। बाल-बच्चा भी कोई नहीं। देखने-सुनने में अच्छी है। वस,लच्छमी समझ लो।'

    ⁠ भोला का सिकुड़ा हुआ चेहरा जैसे चिकना गया। आशा में कितनी सुधा है। बोला–अब तो तुम्हारा ही आसरा है महतो! छुट्टी हो, तो चलो एक दिन देख आयें।

    ⁠ 'मैं ठीक-ठाक करके तव तुमसे कहूँगा। बहुत उतावली करने से भी काम बिगड़ जाता है।'

    ⁠ 'जब तुम्हारी इच्छा हो तब चलो। उतावली काहे की। इस कबरी पर मन ललचाया हो,तो ले लो।'

    ⁠ 'यह गाय मेरे मान की नहीं है दादा। मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता। अपना धरम यह नहीं है कि मित्रों का गला दबायें। जैसे इतने दिन बीते हैं,वैसे और भी बीत जायेंगे।'

    ⁠ 'तुम तो ऐसी बातें करते हो होरी, जैसे हम-तुम दो है। तुम गाय ले जाओ, दाम जो चाहे देना। जैसे मेरे घर रही, वैसे तुम्हारे घर रही। अस्सी रुपए में ली थी, तुम अस्सी रुपए ही दे देना। जाओ।'

    ⁠ 'लेकिन मेरे पास नगद नहीं है दादा, समझ लो।'

    ⁠ 'तो तुमसे नगद मांगता कौन है भाई!'

    ⁠ होरी की छाती गज़-भर की हो गयी। अस्सी रुपए में गाय मॅहगी न थी। ऐसा अच्छा डील-डौल, दोनों जून में छ:-सात सेर दूध, सीधी ऐसी कि बच्चा भी दुह ले। इसका तो एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा। द्वार पर बँधेगी तो द्वार की शोभा बढ़ जायगी। उसे अभी कोई चार सौ रुपए देने थे; लेकिन उधार को वह एक तरह से मुफ्त समझता था। कहीं भोला की सगाई ठीक हो गयी तो साल दो साल तो वह बोलेगा भी नहीं। सगाई न भी हुई, तो होरी का क्या बिगड़ता है। यही तो होगा, भोला बार-बार तगादा करने आयेगा, विगड़ेगा, गालियाँ देगा। लेकिन होरी को इसकी ज्यादा शर्म न थी। इस व्यवहार का वह आदी था। कृषक के जीवन का तो यह प्रसाद है। भोला के साथ वह छल कर रहा था और यह व्यापार उसकी मर्यादा के अनुकूल था। अब भी लेन-देन में उसके लिए लिखा-पढ़ी होने और न होने में कोई अन्तर न था। सूखे-बूड़े की विपदाएँ उसके मन को भीरु बनाये रहती थीं। ईश्वर का रौद्र रूप सदैव उसके सामने रहता था। पर यह छल उसकी नीति में छल न था। यह केवल स्वार्थ-सिद्धि थी और यह कोई बुरी बात न थी। इस तरह का छल तो वह दिन-रात करता रहता था। घर में दो-चार रुपए पड़े रहने पर भी महाजन के सामने कस्में खा जाता था कि एक पाई भी नहीं है। सन को कुछ गीला कर देना और रुई में कुछ बिनौले भर देना उसकी नीति में जायज था। और यहाँ तो केवल स्वार्थ न था, थोड़ा-सा मनोरंजन भी था। बुड्ढों का बुढ़भस हास्यास्पद वस्तु है और ऐसे बुड्ढों से अगर कुछ ऐंठ भी लिया जाय, तो कोई दोष-पाप नहीं।

    ⁠ भोला ने गाय की पगहिया होरी के हाथ में देते हुए कहा-ले जाओ महतो, तुम भी याद करोगे। ब्याते ही छ: सेर दूध ले लेना। चलो, मैं तुम्हारे घर तक पहुँचा दूं। साइत तुम्हें अनजान समझकर रास्ते में कुछ दिक करे। अब तुमसे सच कहता हूँ, मालिक नब्बे रुपए देते थे, पर उनके यहाँ गउओं की क्या क़दर। मुझसे लेकर किसी हाकिमहुक्काम को दे देते। हाकिमों को गऊ की सेवा से मतलब। वह तो खून चूसना-भर जानते हैं। जब तक दूध देती, रखते, फिर किसी के हाथ बेच देते। किसके पल्ले पड़ती कौन जाने। रुपया ही सब कुछ नहीं है भैया, कुछ अपना धरम भी तो है। तुम्हारे घर आराम से रहेगी तो। यह न होगा कि तुम आप खाकर सो रहो और गऊ भूखी खड़ी रहे। उसकी सेवा करोगे, चुमकारोगे। गऊ हमें आसिरवाद देगी। तुमसे क्या कहूँ भैया, घर में चंगुलभर भी भूसा नही रहा। रुपए सव बाजार में निकल गये। सोचा था महाजन से कुछ लेकर भूसा ले लेगे; लेकिन महाजन का पहला ही नही चुका। उसने इनकार कर दिया। इतने जानवरो को क्या खिलाये, यही चिन्ता मारे डालती है। चुटकीचुटकी भर खिलाऊँ, तो मन-भर रोज का खरच है। भगवान ही पार लगाये तो लगे।

    ⁠ होरी ने सहानुभूति के स्वर मे कहा–तुमने हमसे पहले क्यों नही कहा? हमने एक गाड़ी भूसा बेच दिया।

    ⁠ भोला ने माथा टोककर कहा-इसीलिए नहीं कहा भैया कि सबसे अपना दुःख क्यों रोऊँ। वॉटता कोई नही, हंसते सब है। जो गाये सूख गयी है उनका गम नहीं, पत्ती-सत्ती खिलाकर जिला लूंगा; लेकिन अब यह तो रानिव बिना नहीं रह सकती। हो सके, तो दस-बीस रुपए भूसे के लिए दे दो।

    ⁠ किसान पक्का स्वार्थी होता है,इसमे सन्देह नही। उसकी गाँठ से रिश्वत के पैसे बड़ी मुश्किल से निकलते है,भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की घण्टों चिरौरी करता है, जब तक पक्का विश्वास न हो जाय, वह किसी के फुसलाने में नही आता, लेकिन उसका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है। वृक्षों में फल लगते हैं, उन्हें जनता खाती है; खेती में अनाज होता है, वह संसार के काम आता है; गाय के थन में दूध होता है, वह खुद पीने नहीं जाती दूसरे ही पीते है; मेघों से वर्षा होती है,उससे पृथ्वी तृप्त होती है। ऐसी संगति में कुत्सित स्वार्थ के लिए कहाँ स्थान। होरी किसान था और किसी के जलते हुए घर में हाथ सेंकना उसने सीखा ही न था। ⁠ भोला की संकट-कथा सुनते ही उसकी मनोवृत्ति बदल गयी। पगहिया को भोला के हाथ में लौटाता हुआ बोला-रुपए तो दादा मेरे पास नहीं हैं, हाँ थोड़ा-सा भूसा बचा है,वह तुम्हें दूंगा। चलकर उठवा लो। भूसे के लिए तुम गाय बेचोगे,और मैं लूंगा। मेरे हाथ न कट जायेंगे?

    ⁠ भोला ने आर्द्र कण्ठ से कहा-तुम्हारे बैल भूखों न मरेंगे! तुम्हारे पास भी ऐसा कौन-सा बहुत-सा भसा रखा है।

    ⁠ 'मैंने तुमसे नाहक भूसे की चर्चा की।'

    ⁠ 'तुम न कहते और पीछे से मुझे मालूम होता, तो मुझे बड़ा रंज होता कि तुमने मुझे इतना गैर समझ लिया। अवसर पड़ने पर भाई की मदद भाई भी न करे, तो काम कैसे चले।'

    ⁠ 'तो भूसे के दाम दूध में कटवा लेना।'

    ⁠ होरी ने दुःखित स्वर में कहा-दाम-कौड़ी की इसमें कौन बात है दादा,मैं एकदो जून तुम्हारे घर खा लूं,तो तुम मुझसे दाम

    ⁠ 'भगवान कोई-न-कोई सबील निकालेंग ही। असाढ़ सिर

    ⁠ 'मगर यह गाय तुम्हारी हो गयी। जिस दिन इच्छा हो आकर ले जाना।'

    ⁠ 'किसी भाई का निलाम पर चढ़ा हुआ बैल लेने में जो पाप है,वह इस समय तुम्हारी गाय लेने में है।'

    ⁠ होरी में बाल की खाल निकालने की शक्ति होती,तो वह खुशी से गाय लेकर घर की राह लेता। भोला जब नकद रुपए नहीं माँगता तो स्पष्ट था कि वह भूसे के लिए गाय नहीं बेच रहा है,बल्कि इसका कुछ और आशय है; लेकिन जैसे पत्तों के खड़कने पर घोड़ा अकारण ही ठिठक जाता है और मारने पर भी आगे कदम नहीं उठाता वही दशा होरी की थी। संकट की चीज़ लेना पाप है,यह वात जन्म-जन्मान्तरों से उसकी आत्मा का अंश बन गयी थी।

    ⁠ भोला ने गद्गद् कंठ से कहा–तो किसी को भेज दूं भूसे के लिए?

    ⁠ होरी ने जवाब दिया-अभी मैं राय साहब की ड्योढ़ी पर जा रहा हूँ। वहाँ से घड़ी-भर में लौटूंगा,तभी किसी को भेजना। भोला की आँखों में आँसू भर आये। बोला-तुमने आज मुझे उबार लिया होरी भाई! मुझे अब मालूम हुआ कि मैं संसार में अकेला नहीं हूँ। मेरा भी कोई हितू है। एक क्षण के बाद उसने फिर कहा-उस बात को भूल ⁠ होरी आगे बढ़ा, तो उसका चित्त प्रसन्न था। मन में एक विचित्र स्फूर्ति हो रही थी। क्या हुआ,दस-पाँच मन भूसा चला जायगा,बेचारे को संकट में पड़ कर अपनी गाय तो न बेचनी पड़ेगी। जब मेरे पास चारा हो जायगा, तब गाय खोल लाऊँगा। भगवान करें, मुझे कोई मेहरिया मिल जाय। फिर तो कोई बात ही नहीं।

    उसने पीछे फिर कर देखा। कबरी गाय पूंछ से मक्खियाँ उड़ाती, सिर हिलाती, मस्तानी, मंद-गति से झूमती चली जाती थी, जैसे वादियों के बीच में कोई रानी हो। कैसा शुभ होगा वह दिन, जब यह कामधेनु उसके द्वार पर बँधेगी!

    २

    सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रान्त के गाँव हैं। जिले का नाम बताने की कोई ज़रूरत नहीं। होरी बेलारी में रहता है, राय साहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल पाँच मील का अन्तर है। पिछले सत्याग्रह-संग्राम में राय साहब ने बड़ा यश कमाया था। कौंसिल की मेम्बरी छोड़कर जेल चले गये थे। तब से उनके इलाके के असामियों को उनसे बड़ी श्रद्धा हो गयी थी। यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो, या डाँड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो; मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जाती थी। राय साहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था। वह बेचारे भी तो उसी व्यवस्था के गुलाम थे। ज़ाब्ते का काम तो जैसे होता चला आया है, वैसा ही होगा। राय साहब की सज्जनता उस पर कोई असर न डाल सकती थी। इसलिए आमदनी और अधिकार में जौ-भर की भी कमी न होने पर भी उनका यश मानो बढ़ गया था। असामियों से वह हँसकर बोल लेते थे। यही क्या कम है? सिंह का काम तो शिकार करना है। अगर वह गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता।

    राय साहब राष्ट्रवादी होने पर भी हुक्काम से मेल-जोल बनाये रखते थे। उनकी नजरें और डालियाँ और कर्मचारियों की दस्तूरियाँ जैसी की तैसी चली आती थीं। साहित्य और संगीत के प्रेमी थे, ड्रामा के शौकीन, अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक, अच्छे निशानेबाज़। उनकी पत्नी को मरे आज दस साल हो चुके थे; मगर दूसरी शादी न की थी। हँस-बोलकर अपने विधुर जीवन को बहलाते रहते थे।

    होरी ड्योढ़ी पर पहुंचा तो देखा जेठ के दशहरे के अवसर पर होनेवाले धनुषयज्ञ की बड़ी जोरों से तैयारियां हो रही हैं: कहीं रंग-मंच बन रहा था, कहीं मंडप, कहीं मेहमानों का आतिथ्य-गृह, कहीं दूकानदारों के लिए दूकानें। धूप तेज़ हो गयी थी; पर राय साहब खुद काम में लगे हुए थे। अपने पिता से सम्पत्ति के साथ-साथ उन्होंने राम की भक्ति भी पायी थी और धनुष-यज्ञ को नाटक का रूप देकर उसे शिष्ट मनोरंजन का साधन बना दिया था। इस अवसर पर उनके यार-दोस्त, हाकिम-हुक्काम सभी निमन्त्रित होते थे। और दो-तीन दिन इलाके में बड़ी चहल-पहल रहती थी। राय साहब का परिवार बहुत विशाल था। कोई डेढ़ सौ सरदार एक साथ भोजन करते थे। कई चचा थे, दरजनों चचेरे भाई, कई सगे भाई, बीसियों नाते के भाई। एक चचा

    साहब राधा के अनन्य उपासक थे और वरावर वृन्दावन में रहते थे। भक्ति-रस के कितने ही कवित्त रच डाले थे और समय-समय पर उन्हें छपवाकर दोस्तों की भेंट कर देते थे। एक दूसरे चचा थे, जो राम के परमभक्त थे और फ़ारसी-भापा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे। रियासत से सबके वसीके बँधे हुए थे। किसी को कोई काम करने की जरूरत न थी।

    ⁠ होरी मण्डप में खड़ा सोच रहा था कि अपने आने की सूचना कैसे दे कि सहसा राय साहव उधर ही आ निकले और उसे देखते ही बोले–अरे! तू आ गया होरी, मै तो तुझे बुलवानेवाला था। देख,अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। ममझ गया न, जिस वक्त श्रीजानकी जी मन्दिर में पूजा करने जाती हैं, उसी वक्त तू एक गुलदस्ता लिये खड़ा रहेगा और जानकी जी की भेंट करेगा। गलती न करना और देख,असामियों से ताकीद करके कह देना कि सव-के-सव शगुन करने आयें। मेरे साथ कोठी में आ, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।

    ⁠ वह आगे-आगे कोठी की ओर चले,होरी पीछे-पीछे चला। वहीं एक घने वृक्ष की छाया में एक कुरसी पर बैठ गये और होरी को जमीन पर बैठने का इशारा करके बोले–समझ गया,मैंने क्या कहा। कारकुन को तो जो कुछ करना है, वह करेगा ही, लेकिन असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकुन की नहीं सुनता। हमें इन्हीं पाँच-सात दिनों में बीस हजार का प्रवन्ध करना है। कैसे होगा, समझ में नहीं आता। तुम सोचते होगे, मुझ टके के आदमी से मालिक क्यों अपना दुखड़ा ले वैठे। किससे अपने मन की कहूँ? न जाने क्यों तुम्हारे ऊपर विश्वास होता है। इतना जानता हूँ कि तुम मन में मुझ पर हँसोगे नहीं। और हँसो भी, तो तुम्हारी हँसी मैं बरदाश्त कर सकूँगा। नहीं सह सकता उनकी हँसी, जो अपने वरावर के हैं, क्योंकि उनकी हॅसी में ईर्ष्या, व्यंग और जलन है। और वे क्यों न हॅसेंगे। मै भी तो उनकी दुर्दशा और विपत्ति और पतन पर हँसता हूँ, दिल खोलकर, तालियां बजाकर। सम्पत्ति और सहृदयता में वैर है। हम भी दान देते हैं, धर्म करते हैं। लेकिन जानते हो, क्यों? केवल अपने बराबरवालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार। हम में से किसी पर डिग्री हो जाय, कुर्की आ जाय, बकाया मालगुजारी की इल्लत में हवालात हो जाय, किसी का जवान बेटा मर जाय, किसी की विधवा बहू निकल जाय, किसी के घर में आग लग जाय, कोई किसी वेश्या के हाथों उल्लू बन जाय, या अपने असामियों के हाथों पिट जाय, तो उसके और सभी भाई उस पर हँसेंगे, बग़लें बजायेंगे, मानो सारे संसार की सम्पदा मिल गयी है। और मिलेंगे तो इतने प्रेम से, जैसे हमारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार हैं। अरे, और तो और, हमारे चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई जो इसी रियासत की बदौलत मौज उड़ा रहे हैं, कविता कर रहे हैं और जुए खेल रहे हैं, शराबें पी रहे हैं और ऐयाशी कर रहे हैं, वह भी मुझसे जलते हैं, और आज मर जाऊँ तो घी के चिराग जलायें। मेरे दुःख को दुःख समझनेवाला कोई नहीं। उनकी नजरों में मुझे दुखी होने का कोई अधि कार ही नहीं है। मैं अगर रोता हूँ, तो दुःख की हँसी उड़ाता हूँ। मैं अगर बीमार होता हूँ, तो मुझे सुख होता है। मैं अगर अपना ब्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है; अगर व्याह कर लूं, तो वह विलासांधता होगी। अगर शराब नहीं पीता तो मेरी कंजूसी है। शराब पीने लगूं, तो वह प्रजा का रक्त होगा। अगर ऐयाशी नहीं करता,तो अरसिक हूँ; ऐयाशी करने लगूं, तो फिर कहना ही क्या। इन लोगों ने मुझे भोग-विलास में फंसाने के लिए कम चालें नहीं चलीं और अब तक चलते जाते हैं। उनकी यही इच्छा है कि मैं अन्धा हो जाऊँ और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म यह है कि सब कुछ देखकर भी कुछ न देखू। सब कुछ जानकर भी गधा बना रहूँ।

    ⁠ राय साहब ने गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए दो वीड़े पान खाये और होरी के मुंह की ओर ताकने लगे,जैसे उसके मनोभावों को पढ़ना चाहते हों।

    ⁠ होरी ने साहस बटोरकर कहा-हम समझते थे कि ऐसी बातें हमीं लोगों में होती हैं, पर जान पड़ता है,बड़े आदमियों में भी उनकी कमी नहीं है।

    ⁠ राय साहब ने मुंह पान से भरकर कहा-तुम हमें बड़ा आदमी समझते हो? हमारे नाम बड़े हैं, पर दर्शन थोड़े। गरीबों में अगर ईर्ष्या या वैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और वैर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुंह की रोटी कोई छीन ले तो उसके गले में उँगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनन्द के लिए है। हम इतने बड़े आदमी हो गये हैं कि हमें नीचता और कुटिलता में ही निःस्वार्थ और परम आनन्द मिलता है। हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गये हैं जव हमें दूसरों के रोने पर हंसी आती है। इसे तुम छोटी साधना मत समझो। जव इतना बड़ा कुटुम्ब है, तो कोई-न-कोई तो हमेशा बीमार रहेगा ही। और बड़े आदमियों के रोग भी बड़े होते हैं। वह बड़ा आदमी ही क्या,जिसे कोई छोटा रोग हो। मामूली ज्वर भी आ जाय,तो हमें सरसाम की दवा दी जाती है,मामूली फन्सी भी निकल आये, तो वह जहरवाद बन जाती है। अब छोटे सर्जन और मझोले सर्जन और बड़े सर्जन तार से बुलाये जा रहे हैं,मसीहुलमुल्क को लाने के लिए दिल्ली आदमी भेजा जा रहा है,भिषगाचार्य को लाने के लिए कलकत्ता। उधर देवालय में दुर्गापाठ हो रहा है और ज्योतिपाचार्य कुण्डली का विचार कर रहे हैं और तन्त्र के आचार्य अपने अनुष्ठान में लगे हुए हैं। राजा साहब को यमराज के मुंह से निकालने के लिए दौड़ लगी हुई है। वैद्य और डाक्टर इस ताक में रहते हैं कि कब इनके सिर में दर्द हो और कब उसके घर में सोने की वर्षा हो। और ये रुपए तुमसे और तुम्हारे भाइयों से वसूल किये जाते हैं,भाले की नोक पर। मुझे तो यही आश्चर्य होता है कि क्यों तुम्हारी आहों का दावानल हमें भस्म नहीं कर डालता;मगर नहीं, आश्चर्य करने की कोई बात नहीं। भस्म होने में तो बहुत देर नहीं लगती,वेदना भी थोड़ी ही देर की होती है।हम जौ-जौ और अंगुलअंगुल और पोर-पोर भस्म हो रहे हैं। उस हाहाकार से बचने के लिए हम पुलिस की, हुक्काम की,अदालत की,वकीलों की शरण लेते हैं।और रूपवती स्त्री की भाँति सभी के हाथों का खिलौना बनते हैं।दुनिया समझती है, हम बड़े सुखी हैं।हमारे पास इलाक़े,महल, सवारियाँ,नौकर-चाकर,कर्ज, वेश्याएँ,क्या नहीं हैं, लेकिन जिसकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं,वह और चाहे कुछ हो,आदमी नहीं है।जिसे दुश्मन के भय के मारे रात को नींद न आती हो,जिसके दुःख पर सब हँसें और रोनेवाला कोई न हो,जिसकी चोटी दूसरों के पैरों के नीचे दबी हो,जो भोग-विलास के नशे में अपने को बिलकुल भूल गया हो,जो हुक्काम के तलवे चाटता हो और अपने अधीनों का खून चूसता हो, उसे मैं सुखी नहीं कहता। वह तो संसार का सबसे अभागा प्राणी है। साहब शिकार खेलने आयें या दौरे पर, मेरा कर्तव्य है कि उनकी दुम के पीछे लगा रहूँ। उनकी भौंहों पर शिकन पड़ी और हमारे प्राण सूखे। उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम क्या नहीं करते। मगर वह पचड़ा सुनाने लगूं तो शायद तुम्हें विश्वास न आये। डालियों और रिश्वतों तक तो खैर गनीमत है, हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं। मुफ्तखोरी ने हमें अपंग बना दिया है,हमें अपने पुरुपार्थ पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं, केवल अफ़सरों के सामने दुम हिला-हिलाकर किसी तरह उनके कृपापात्र बने रहना और उनकी सहायता से अपनी प्रजा पर आतंक जमाना ही हमारा उद्यम है। पिछलगुओं की खुशामद ने हमें इतना अभिमानी और तुनकमिजाज़ बना दिया है कि हममें शील, विनय और सेवा का लोप हो गया है। मैं तो कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर सरकार हमारे इलाके छीनकर हमें अपनी रोज़ी के लिए मेहनत करना सिखा दे तो हमारे साथ महान उपकार करे, और यह तो निश्चय है कि अब सरकार भी हमारी रक्षा न करेगी। हमसे अब उसका कोई स्वार्थ नहीं निकलता। लक्षण कह रहे है कि बहुत जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिट जानेवाली है। मैं उस दिन का स्वागत करने को तैयार बैठा हूँ। ईश्वर वह दिन जल्द लाये। वह हमारे उद्धार का दिन होगा। हम परिस्थितियों के शिकार बने हुए हैं। यह परिस्थिति ही हमारा सर्वनाश कर रही है और जब तक संपत्ति की यह बेड़ी हमारे पैरों से न निकलेगी, जव तक यह अभिशाप हमारे सिर पर मंडराता रहेगा, हम मानवता का वह पद न पा सकेंगे जिस पर पहुँचना ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।

    ⁠ राय साहब ने फिर गिलौरी-दान निकाला और कई गिलौरियाँ निकालकर मुंहमें भर लीं। कुछ और कहने वाले थे कि एक चपरासी ने आकर कहा–सरकार, बेगारों ने काम करने से इनकार कर दिया है। कहते हैं,जब तक हमें खाने को न मिलेगा हम काम न करेंगे। हमने धमकाया,तो सब काम छोड़कर अलग हो गये।

    ⁠ राय साहब के माथे पर बल पड़ गये। आँखें निकालकर बोले-चलो,मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया,तो आज यह नयी बात क्यों? एक आने रोज के हिसाब से मजूरी मिलेगी,जो हमेशा मिलती रही है;और इस मजूरी पर उन्हें काम करना होगा,सीधे करें या टेढ़े।

    ⁠ फिर होरी की ओर देखकर बोले-तुम अब जाओ होरी, अपनी तैयारी करो। जो बात मैंने कही है,उसका खयाल रखना। तुम्हारे गाँव से मुझे कम-से-कम पाँच सौ की आशा है। राय साहब झल्लाते हुए चले गये। होरी ने मन में सोचा,अभी यह कैसी-कैसी नीति और धरम की बातें कर रहे थे और एकाएक इतने गरम हो गये!

    सूर्य सिर पर आ गया था। उसके तेज से अभिभूत होकर वृक्षों ने अपना पसार समेट लिया था। आकाश पर मटियाला गर्द छाया हुआ था और सामने की पृथ्वी काँपती हुई जान पड़ती थी।

    होरी ने अपना डण्डा उठाया और घर चला। शगून के रुपये कहाँ से आयेंगे, यही चिन्ता उसके सिर पर सवार थी।

    ३

    {Gap}}होरी अपने गांव के समीप पहुंचा,तो देखा, अभी तक गोबर खेत में ऊख गोड़ रहा है और दोनों लड़कियाँ भी उसके साथ काम कर रही हैं। लू चल रही थी,वगूले उठ रहे थे, भूतल धधक रहा था। जैसे प्रकृति ने वायु में आग घोल दिया हो। यह सब अभी तक खेत में क्यों है? क्या काम के पीछे सब जान देने पर तुले हुए है? वह खेत की ओर चला और दूर ही से चिल्लाकर वोला-आता क्यों नहीं गोवर, क्या काम ही करता रहेगा? दोपहर ढल गया,कुछ सूझता है कि नहीं?

    उसे देखते ही तीनों ने कुदालें उठा ली और उसके साथ हो लिये। गोबर सांवला,लम्बा,एकहरा युवक था, जिसे इस काम से रुचि न मालम होती थी। प्रसन्नता की जगह मुख पर असंतोप और विद्रोह था। वह इसलिए काम में लगा हुआ था कि वह दिग्वाना चाहता था, उसे खाने-पीने की कोई फिक्र नहीं है। बड़ी लड़की सोना लज्जाशील कुमारी थी, साँवली, मुडौल, प्रसन्न और चपल। गाढ़े की लाल साड़ी जिसे वह घुटनों से मोड़कर कमर में बाँधे हुए थी, उसके हलके शरीर पर कुछ लदी हुई सी थी,और उसे प्रौढ़ता की गरिमा दे रही थी। छोटी रूपा पाँच-छ:साल की छोकरी थी मैली,सिर पर वालों का एक घोंसला-सा बना हुआ, एक लॅगोटी कमर में वाँधे,बहुत ही ढीठ और रोनी।

    रूपा ने होरी की टाँगों में लिपटकर कहा–काका! देखो, मैने एक ढेला भी नहीं छोड़ा। बहन कहती है, जा पेड़ तले बैठ। ढेले न तोड़े जायेंगे काका,तो मिट्टी कैसे वरावर होगी।

    होरी ने उसे गोद में उठाकर प्यार करते हुए कहा-तूने बहुत अच्छा किया बेटी, चल घर चलें। कुछ देर अपने विद्रोह को दबाये रहने के बाद गोबर बोला–यह तुम रोज़-रोज़ मालिकों की खुशामद करने क्यों जाते हो? बाकी न चुके तो प्यादा आकर गालियाँ सुनाता है,बेगार देनी ही पड़ती है,नजर-नज़राना सब तो हमसे भराया जाता है। फिर किसी की क्यों सलामी करो!

    इस समय यही भाव होरी के मन में भी आ रहे थे; लेकिन लड़के के इस विद्रोहभाव को दबाना ज़रूरी था। बोला–सलामी करने न जायँ, तो रहें कहाँ। भगवान ने जब गुलाम बना दिया है,तो अपना क्या बस है। यह इसी सलामी की बरकत है

    कि द्वार पर मईया डाल ली और किसी ने कुछ नहीं कहा। घरे ने द्वार पर खूटा गाड़ा था, जिस पर कारिन्दों ने दो रुपए डाँड़ ले लिये थे। तलैया से कितनी मिट्टी हमने खोदी, कारिन्दा ने कुछ नहीं कहा। दूसरा खोदे तो नजर देनी पड़े। अपने मतलव के लिए सलामी करने जाता हूँ, पाँव में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है। घण्टों खड़े रहो,तव जाके मालिक को खबर होती है। कभी बाहर निकलते हैं. कभी कहला देते हैं कि फुरसत नहीं है।

    ⁠ गोबर ने कटाक्ष किया-बड़े आदमियों की हॉ-में-हाँ मिलाने में कुछ-न-कुछ आनन्द तो मिलता ही है। नहीं लोग मेम्बरी के लिए क्यों खड़े हो?

    ⁠ 'जब सिर पर पड़ेगी तब मालूम होगा बेटा,अभी जो चाहे कह लो। पहले मैं भी यही सब वातें सोचा करता था; पर अब मालूम हुआ कि हमारी गरदन दूसरों के पैगे के नीचे दबी हुई है, अकड़ कर निबाह नहीं हो सकता।'

    ⁠ पिता पर अपना क्रोध उतारकर गोबर कुछ शान्त हो गया और चुपचाप चलने लगा। सोना ने देखा, रूपा वाप की गोद में चढ़ी बैठी है तो ईर्ष्या हुई। उसे डाँटकर बोली–अब गोद से उतरकर पाँव-पाँव क्यों नही चलती, क्या पांव टूट गये है? .

    ⁠ रूपा ने बाप की गरदन में हाथ डालकर ढिठाई से कहा–न उतरेंगे जाओ। काका, बहन हमको रोज़ चिढ़ाती है कि तू रूपा है, मै सोना हूँ। मेग नाम कुछ और रख दो।

    ⁠ होरी ने सोना को बनावटी रोप मे देखकर कहा–तू इसे क्यों चिढ़ाती है सोनिया? सोना तो देखने को है। निवाह तो रूपा से होता है। रूपा न हो,तो रुपए कहाँ से बनें,बता।

    ⁠ सोना ने अपने पक्ष का समर्थन किया–सोना न हो तो मोहन कैसे बने,नथुनियाँ कहाँ से आयें,कण्ठा कैसे बने?

    ⁠ गोवर भी इस विनोदमय विवाद में शरीक हो गया। रूपा से वोला-तू कह दे कि सोना तो सूवी पत्ती की तरह पीला होता है, रूपा तो उजला होता है जैसे मूरज।

    ⁠ सोना बोली-शादी-व्याह में पीली साड़ी पहनी जाती है, उजली साड़ी कोई नही पहनता।

    ⁠ रूपा इस दलील से परास्त हो गयी। गोबर और होरी की कोई दलील इसके सामने न ठहर सकी। उसने क्षुब्ध आँखों से होरी को देखा।

    ⁠ होरी को एक नयी युक्ति सूझ गयी। बोला–सोना वड़े आदमियों के लिए है। हम गरीबों के लिए तो रूपा ही है। जैसे जौ को राजा कहते हैं, गेहूँ को चमार; इसलिए न कि गेहूँ बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं।

    ⁠ सोना के पास इस सबल युक्ति का कोई जवाब न था। परास्त होकर बोली-तुम सब जने एक ओर हो गये,नहीं रुपिया को रुलाकर छोड़ती।

    ⁠ रूपा ने उँगली मटकाकर कहा-ए राम,सोना चमार-ए राम, सोना चमार।

    ⁠ इस विजय का उसे इतना आनन्द हुआ कि बाप की गोद में रह न सकी। ज़मीन पर कूद पड़ी और उछल-उछलकर यही रट लगाने लगी-रूपा राजा,सोना चमार– रूपा राजा,सोना चमार!

    ⁠ ये लोग घर पहुँचे तो धनिया द्वार पर खड़ी इनकी बाट जोह रही थी। रुष्ट होकर बोली-आज इतनी देर क्यों की गोवर? काम के पीछे कोई परान थोड़े ही दे देता है।

    ⁠ फिर पति से गर्म होकर कहा–तुम भी वहाँ से कमाई करके लौटे तो खेत में पहुंच गये। खेत कहीं भागा जाता था!

    ⁠ द्वार पर कुआँ था। होरी और गोबर ने एक-एक कलसा पानी सिर पर उँडेला, रूपा को नहलाया और भोजन करने गये। जौ की रोटियाँ थीं; पर गेहूँ-जैसी सुफ़ेद और चिकनी। अरहर की दाल थी जिसमें कच्चे आम पड़े हुए थे। रूपा बाप की थाली में खाने बैठी। सोना ने उसे ईर्ष्या-भरी आँखों से देखा,मानो कह रही थी,वाह रे दुलार!

    ⁠ धनिया ने पूछा–मालिक से क्या बात-चीत हुई?

    ⁠ होरी ने लोटा-भर पानी चढ़ाते हुए कहा-यही तहसील-वसूल की बात थी और क्या। हम लोग समझते हैं, बड़े आदमी बहुत सुखी होंगे; लेकिन सच पूछो, तो वह हमसे भी ज्यादा दुःखी हैं। हमें अपने पेट ही की चिन्ता है,उन्हें हजारों चिन्ताएं घेरे रहती है।

    ⁠ राय साहब ने और क्या-क्या कहा था, वह कुछ होरी को याद न था। उस सारे कथन का खुलासा-मात्र उसके स्मरण में चिपका हुआ रह गया था।

    ⁠ गोबर ने व्यंग्य किया–तो फिर अपना इलाका हमें क्यों नहीं दे देते!हम अपने खेत, बैल, हल, कुदाल सब उन्हें देने को तैयार हैं। करेंगे बदला? यह सब धूर्तता है,निरी मोटमरदी। जिसे दुःख होता है,वह दरजनों मोटरें नहीं रखता,महलों में नहीं रहता, हलवा-पूरी नहीं खाता और न नाच-रंग में लिप्त रहता है। मजे से राज का सुख भोग रहे हैं, उस पर दुखी हैं!

    ⁠ होरी ने झुंझलाकर कहा-अब तुमसे बहस कौन करे भाई! जैजात किसी से छोड़ी जाती है कि वही छोड़ देंगे। हमी को खेती से क्या मिलता है? एक आने नफरी की मजूरी भी तो नहीं पड़ती। जो दस रुपए महीने का भी नौकर है, वह भी हमसे अच्छा खाता-पहनता है; लेकिन खेतों को छोड़ा तो नहीं जाता। खेती छोड़ दें, तो और करें क्या? नौकरी कहीं मिलती है? फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है वह नौकरी में तो नहीं है। इसी तरह जमींदारों का हाल भी समझ लो! उनकी जान को भी तो सैकड़ों रोग लगे हुए हैं, हाकिमों को रसद पहुँचाओ, उनकी सलामी करो, अमलों को खुश करो। तारीख पर मालगुजारी न चुका दें, तो हवालात हो जाय, कुड़की आ जाय। हमें तो कोई हवालात नहीं ले जाता। दो-चार गालियाँघुड़कियाँ ही तो मिलकर रह जाती हैं।

    ⁠ गोबर ने प्रतिवाद किया-यह सब कहने की बातें हैं। हम लोग दाने-दाने को मुहताज हैं,देह पर साबित कपड़े नहीं हैं, चोटी का पसीना एड़ी तक आता है,तब भी गुजर नहीं होता। उन्हें क्या,मजे से गद्दी-मसनद लगाये बैठे हैं,सैकड़ों नौकर-चाकर

    हैं, हज़ारों आदमियों पर हुकूमत है। रुपए न जमा होते हों; पर सुख तो सभी तरह का भोगते हैं। धन लेकर आदमी और क्या करता है?

    ⁠ 'तुम्हारी समझ में हम और वह बराबर हैं?'

    ⁠ 'भगवान ने तो सबको बराबर ही बनाया है।'

    ⁠ 'यह बात नहीं है बेटा, छोटे-बड़े भगवान के घर से बनकर आते हैं। सम्पत्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। उन्होंने पूर्वजन्म में जैसे कर्म किये हैं, उनका आनन्द भोग रहे हैं। हमने कुछ नहीं संचा, तो भोगें क्या?

    ⁠ 'यह सब मन को समझाने की बातें हैं। भगवान सबको बराबर बनाते है। यहाँ जिसके हाथ में लाठी है,वह गरीबों को कुचलकर बड़ा आदमी बन जाता है।'

    ⁠ 'यह तुम्हारा भरम है। मालिक आज भी चार घण्टे रोज़ भगवान का भजन करते है।'

    ⁠ 'किसके बल पर यह भजन-भाव और दान-धर्म होता है ?'

    ⁠ 'अपने बल पर।'

    ⁠ 'नहीं, किसानों के बल पर और मजदूरों के बल पर। यह पाप का धन पचे कैसे? इसीलिए दान-धर्म करना पड़ता है, भगवान का भजन भी इसीलिए होता है,भूखेनंगे रहकर भगवान का भजन करें,तो हम भी देखें। हमें कोई दोनों जून खाने को दे तो हम आठों पहर भगवान का जाप ही करते रहें। एक दिन खेत में ऊख गोड़ना पड़े तो सारी भक्ति भूल जाय।'

    {{Gapहोरी ने हार कर कहा–अब तुम्हारे मुंह कौन लगे भाई, तुम तो भगवान की लीला में भी टाँग अड़ाते हो।

    ⁠ तीसरे पहर गोबर कुदाल लेकर चला, तो होरी ने कहा-ज़रा ठहर जाओ देगा, हम भी चलते हैं। तब तक थोड़ा-सा भूसा निकालकर रख दो। मैने भोला को देने को कहा है। बेचारा आजकल बहुत तंग है।

    ⁠ गोबर ने अवज्ञा-भरी आँखों से देखकर कहा-हमारे पास बेचने को भूसा नहीं है।

    ⁠ 'बेचता नहीं हूँ भाई, यों ही दे रहा हूँ। वह संकट में है, उसकी मदद तो करनी ही पड़ेगी।'

    ⁠ 'हमें तो उन्होंने कभी एक गाय नहीं दे दी।'

    ⁠ 'दे तो रहा था; पर हमने ली ही नहीं।'

    ⁠ धनिया मटककर बोली-गाय नहीं वह दे रहा था। इन्हें गाय दे देगा! आँख में अंजन लगाने को कभी चिल्लू-भर दूध तो भेजा नहीं, गाय देगा!

    ⁠ होरी ने कसम खायी-नहीं,जवानी क़सम, अपनी पछाईं गाय दे रहे थे। हाथ तंग है,भूसा-चारा नहीं रख सके। अब एक गाय बेचकर भूसा लेना चाहते हैं। मैंने सोचा,संकट में पड़े आदमी की गाय क्या लूँगा। थोड़ा-सा भूसा दिये देता हूँ, कुछ रुपए हाथ आ जायँगे तो गाय ले लूंगा। थोड़ा-थोड़ा करके चुका दूंगा। अस्सी रुपए की है; मगर ऐसी कि आदमी देखता रहे।

    ⁠ गोबर ने आड़े हाथों लिया-तुम्हारा यही धर्मात्मापन तो तुम्हारी दुर्गत कर रहा है। साफ-साफ तो वात है। अस्सी रुपए की गाय है, हमसे वीस रुपए का भूगा ले लें और गाय हमे दे दे। साठ रुपए रह जायेंगे,वह हम धीरे-धीरे दे देंगे।

    ⁠ होरी रहस्यमय ढंग से मुस्कराया–मैने ऐसी चाल सोची है कि गाय सेंत-मेंत में हाथ आ जाय। कहीं भोला की सगाई ठीक करनी है, बस। दो-नार मन भसा तो खाली अपना रंग जमाने को देता हूँ।

    ⁠ गोवर ने निरस्कार किया–तो तुम अब सब की सगाई ठीक करते फिरोगे?

    ⁠ धनिया ने तीखी आँखों से देखा-अब यही एक उद्यम तो रह गया है। न देनाह है हमें भूमा किसी को। यहाँ भोली-भाला किसी का करज़ नही खाया है।

    ⁠ होरी ने अपनी सफाई दी-अगर मेरे जतन से किसी का घर वस जाय,तो इसमें कौन-सी बुराई है?

    ⁠ गोवर ने चिलम उठाई और आग लेने चला गया। उगे यह झमेला बिल्कुल नहीं भाता था।

    ⁠ धनिया ने सिर हिला कर कहा–जो उनका घर बसायेगा,वह अम्सी रुपए की गाय लेकर चुप न होगा।एक थैली गिनवायेगा।

    ⁠ होरी ने पुचाग दिया–यह मै जानता है;लेकिन उनकी भलमनसी को भी तो देखो। मुझसे जब मिलता है,तेरा बखान ही करता है–ऐसी लक्ष्मी है, ऐसी सलीकेदार है।

    ⁠ धनिया के मुख पर स्निग्धता झलक पड़ी। मनभाय मुड़िया हिलाये वाले भाव से वोली–मै उनके बखान की भूखी नहीं हूँ,अपना बखान धरे रहें।

    ⁠ होरी ने स्नेह-भरी मुस्कान के साथ कहा-मैने तो कह दिया,भैया,वह नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती,गालियों से बात करती है। लेकिन वह यही कहे जाय कि वहऔरत नहीं, लक्ष्मी है। बात यह है कि उसकी घरवाली जवान की बड़ी तेज थी। वेचारा उसके डर के मारे भागा-भागा फिरता था। कहता था, जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुँह सवेरे देख लेता हूँ,उम दिन कुछ-न-कुछ जरूर हाथ लगता है। मैने कहा– तुम्हारे हाथ लगता होगा, यहाँ तो रोज देखते है,कभी पैसे से भेंट नहीं होती।

    ⁠ 'तुम्हारे भाग ही खोटे हैं, तो मैं क्या करूं।'

    ⁠ 'लगा अपनी घरवाली की बुराई करने-भिखारी को भीख तक नहीं देती थी, झाड़ लेकर मारने दौड़ती थी,लालचिन ऐसी थी कि नमक तक दूसरों के घर से माँग लाती थी!'

    ⁠ ‘मरने पर किसी की क्या बुराई करूं। मुझे देखकर जल उठती थी।'

    ⁠ भोला वड़ा गमखोर था कि उसके साथ निबाह कर दिया। दूसरा होता तो जहर खाके मर जाता। मुझसे दस साल बड़े होंगे भोला; पर राम-राम पहले ही करते हैं।'

    ⁠ 'तो क्या कहते थे कि जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुंह देख लेता हूँ, तो क्या होता है?"

    ⁠ 'उस दिन भगवान कहीं-न-कहीं से कुछ भेज देते हैं।'

    ⁠ 'बहुएँ भी तो वैसी ही चटोरिन आयी हैं। अबकी सबों ने दो रुपए के खरबूजे उधार खा डाले। उधार मिल जाय, फिर उन्हें चिन्ता नहीं होती कि देना पड़ेगा या नहीं।'

    ⁠ 'और भोला रोते काहे को हैं?'

    ⁠ गोबर आकर बोला-भोला दादा आ पहुँचे। मन-दो मन भूसा है, वह उन्हें दे फिर उनकी सगाई ढूंढ़ने निकलो।

    ⁠ धनिया ने समझाया–आदमी द्वार पर बैठा है,उसके लिए खाट-वाट तो डाल ही दी,ऊपर से लगे भुनभुनाने। कुछ तो भलमंसी सीखो। कलसा ले जाओ,पानी नरकर रख दो,हाथ-मुंह धोयें,कुछ रस-पानी पिला दो। मुसीबत में ही आदमी दूसरों के सामने हाथ फैलाता है।

    ⁠ होरी बोला–रस-वस का काम नहीं है,कौन कोई पाहुने हैं।

    ⁠ धनिया बिगड़ी-पाहुने और कैसे होते हैं! रोज़-रोज़ तो तुम्हारे द्वार पर नही आते? इतनी दूर से धूप-घाम में आये हैं, प्यास लगी ही होगी। रुपिया, देख डब्बे में तमाखू है कि नहीं, गोबर के मारे काहे को बची होगी। दौड़कर एक पैसे का तमाख सहुआइन की दुकान से ले ले।

    ⁠ भोला की आज जितनी खातिर हुई,और कभी न हुई होगी। गोबर ने खाट डाल दी,सोना रस घोल लायी,रूपा तमाखू भर लायी। धनिया द्वार पर किवाड़ की आड़ में खड़ी अपने कानों से अपना बखान मुनने के लिए अधीर हो रही थी।

    ⁠ भोला ने चिलम हाथ में लेकर कहा-अच्छी घरनी घर में आ जाय, तो समझ लो लक्ष्मी आ गयी। वही जानती है छोटे-बड़े का आदर-सत्कार कैसे करना चाहिए।

    ⁠ धनिया के हृदय में उल्लास का कम्पन हो रहा था। चिन्ता और निराशा और अभाव से आहत आत्मा इन शब्दों में एक कोमल शीतल स्पर्श का अनुभव कर रही थी।

    ⁠ होरी जब भोला का खाँचा उठाकर भूसा लाने अन्दर चला, तो धनिया भी पीछेपीछे चली। होरी ने कहा-जाने कहाँ से इतना बड़ा खाँचा मिल गया। किसी भड़भूजे से माँग लिया होगा। मन-भर से कम में न भरेगा। दो खाँचे भी दिये,तो दो मन निकल जायँगे।

    ⁠ धनिया फूली हुई थी। मलामत की आँखों से देखती हुई बोली–या तो किसी को नेवता न दो,और दो तो भरपेट खिलाओ। तुम्हारे पास फूल-पत्र लेने थोड़े ही आये है कि चेंगेरी लेकर चलते। देते ही हो,तो तीन खाँचे दे दो। भला आदमी लड़कों को क्यों नहीं लाया। अकेले कहाँ तक ढोयेगा। जान निकल जायगी।

    ⁠ 'तीन खाँचे तो मेरे दिये न दिये जायेंगे?'

    ⁠ 'तब क्या एक खाँचा देकर टालोगे? गोबर से कह दो, अपना खाँचा भरकर उनके साथ चला जाय।'

    ⁠ 'गोबर ऊख गोड़ने जा रहा है।'

    ⁠ 'एक दिन न गोड़ने से ऊख न सूख जायगी।'

    ⁠ 'यह तो उनका काम था कि किसी को अपने साथ ले लेते। भगवान के दिये दोदो बेटे हैं।'

    ⁠ 'न होंगे घर पर। दूध लेकर बाजार गये होंगे।'

    ⁠ 'यह तो अच्छी दिल्लगी है कि अपना माल भी दो और उसे घर तक पहुँचा भी दो। लाद दे, लदा दे, लादनेवाला साथ कर दे।'

    ⁠ 'अच्छा भाई, कोई मत जाय। मैं पहुँचा दूंगी। बड़ों की सेवा करने में लाज नहीं है।'

    ⁠ 'और तीन खाँचे उन्हें दे दूं,तो अपन वैल क्या खायेंगे?'

    ⁠ 'यह सब तो नेवता देने के पहले ही सोच लेना था। न हो, तुम और गोबर दोनों जने चले जाओ।

    ⁠ 'मुरौवत मुरौवत की तरह की जाती है, अपना घर उठाकर नहीं दे दिया जाता!'

    ⁠ 'अभी ज़मींदार का प्यादा आ जाय,तो अपने सिर पर भूसा लादकर पहुंचाओगे तुम,तुम्हारा लड़का,लड़की सब। और वहाँ साइत मन-दो-मन लकड़ी भी फाड़नी पड़े।'

    ⁠ 'ज़मींदार की बात और है।'

    साँचा:GaP 'हाँ,वह डंडे के ज़ोर से काम लेता है न।'

    ⁠ 'उसके खेत नहीं जोतते?'

    ⁠ 'खेत जोतते हैं,तो लगान नहीं देते?'

    ⁠ 'अच्छा भाई,जान न खा,हम दोनों चले जायेंगे। कहाँ-से-कहाँ मैंने इन्हें मूसा देने को कह दिया। या तो चलेगी नहीं,या चलेगी तो दौड़ने लगेगी।'

    ⁠ तीनों खाँचे भूसे से भर दिये गये। गोवर कुढ़ रहा था। उसे अपने बाप के व्यवहारों में ज़रा भी विश्वास न था। वह समझता था, यह जहाँ जाते हैं, वहीं कुछन-कुछ घर से खो आते है। धनिया प्रसन्न थी। रहा होरी, वह धर्म और स्वार्थ के बीच में डूब-उतरा रहा था।

    ⁠ होरी और गोबर मिलकर एक खाँचा बाहर लाये। भोला ने तुरन्त अपने अंगौछे का वीड़ बनाकर सिर पर रखते हुए कहा–मैं इसे रखकर अभी भागा आता हूँ। एक खाँचा और लूंगा।

    ⁠ होरी वोला-एक नहीं, अभी दो और भरे धरे हैं। और तुम्हें न आना पड़ेगा। मै और गोबर एक-एक खाँचा लेकर तुम्हारे साथ ही चलते हैं।

    ⁠ भोला स्तम्भित हो गया। होरी उसे अपना भाई बल्कि उससे भी निकट जान पड़ा। उसे अपने भीतर एक ऐसी तृप्ति का अनुभव हुआ, जिसने मानो उसके संपूर्ण जीवन को हरा कर दिया।

    ⁠ तीनों भूसा लेकर चले,तो राह में बातें होने लगीं।

    ⁠ भोला ने पूछा-दशहरा आ रहा है,मालिकों के द्वार पर तो बड़ी धूमधाम होगी?

    ⁠ 'हाँ,तम्बू सामियाना गड़ गया है। अब की लीला में मैं भी काम करूंगा। राय साहब ने कहा है,तुम्हें राजा जनक का माली बनना पड़ेगा।'

    ⁠ 'मालिक तुमसे बहुत खुश हैं।'

    ⁠ 'उनकी दया है।'

    ⁠ एक क्षण के बाद भोला ने फिर पूछा-सगुन करने के लिए रुपए का कुछ जुगाड़ कर लिया है? माली बन जाने से तो गला न छूटेगा।

    ⁠ होरी ने मुंह का पसीना पोंछकर कहा-उसी की चिन्ता तो मारे डालती है दादा!अनाज तो सब-का-सब खलिहान में ही तुल गया। ज़मींदार ने अपना लिया,महाजन ने अपना लिया। मेरे लिए पाँच सेर अनाज बच रहा। यह भूसा तो मैने रातोंरात ढोकर छिपा दिया था,नहीं तिनका भी न बचता। जमींदार तो एक ही है। मगर महाजन तीनतीन हैं,सहुआइन अलग,मॅगरू अलग और दातादीन पण्डित अलग। किसी का व्याज भी पूरा न चुका। जमींदार के भी आधे रुपए बाकी पड़ गये। सहुआइन से फिर रुपए उधार लिये तो काम चला। सब तरह किफायत कर के देख लिया भैया,कुछ नहीं होता। हमारा जनम इसी लिए हुआ है कि अपना रक्त वहायें और वड़ों का घर भरें। मूलका दुगना सूद भर चुका;पर मूल ज्यों-का-त्यों सिर पर सवार है। लोग कहते हैं, सर्दी-गर्मी में, तीरथ-बरत में हाथ बाँधकर खरच करो। मुदा रास्ता कोई नहीं दिखाता। राय साहब ने बेटे के व्याह में बीस हजार लुटा दिये। उनसे कोई कुछ नहीं कहता। मंगरू ने अपने वाप के क्रिया-करम में पाँच हजार लगाये। उनसे कोई कुछ नहीं पूछता। वैसा ही मरजाद तो सबका है।

    ⁠ भोला ने करुण भाव से कहा-बड़े आदमियों की वरावरी तुम कैसे कर सकते हो भाई?

    ⁠ 'आदमी तो हम भी है।'

    ⁠ 'कौन कहता है कि हम तुम आदमी है। हममें आदमियत कहाँ?आदमी वह हैं,जिनके पास धन है,अख्तियार है, इलम है,हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं। उसपर एक दूसरे को देख नहीं सकता। एका का नाम नहीं। एक किमान दूसरे के खेत पर न चढ़े तो कोई जाफा कैसे करे,प्रेम तो संसार से उठ गया।'

    ⁠ बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता। दोनों मित्र अपने-अपने दुखड़े रोते रहे। भोला ने अपने बेटों के करतूत सुनाये, होरी ने अपने भाइयों का रोना रोया और तब एक कुएँ पर बोझ रखकर पानी पीने के लिए बैठ गये। गोवर ने बनिये से लोटा माँगा और पानी खींचने लगा।

    ⁠ भोला ने सहृदयता से पूछा-अलगौझे के समय तो तुम्हें बड़ा रंज हुआ होगा। भाइयों को तो तुमने बेटों की तरह पाला था।

    ⁠ होरी आर्द्र कण्ठ से बोला-कुछ न पूछो दादा,यही जी चाहता था कि कहीं जाके डूब मरूँ। मेरे जीते जी सब कुछ हो गया। जिनके पीछे अपनी जवानी धूल में मिला दी वही मेरे मुद्दई हो गये और झगड़े की जड़ क्या थी?यही कि मेरी घरवाली हार में काम करने क्यों नहीं जाती। पूछो,घर देखनेवाला भी कोई चाहिए कि नहीं। लेना-देना, धरना-उठाना,सँभालना-सहेजना,यह कौन करे। फिर वह घर बैठी तो नहीं रहती थी, झाड़-बुहारू, रसोई, चौका-बरतन, लड़कों की देख-भाल यह कोई थोड़ा काम है। सोभा की औरत घर सँभाल लेती कि हीरा की औरत में यह सलीका था? जब से अलगौझा हुआ है,दोनों घरों में एक जून रोटी पकती है। नहीं सब को दिन में चार बार भूख लगती थी। अब खायें चार दफ़े, तो देखू। इस मालिकपन में गोबर की माँ की जो दुर्गती हुई है, वह मै ही जानता हूँ। बेचारी अपनी देवरानियों के फटे-पुराने कपड़े पहनकर दिन काटती थी,खुद भूखी सो रही होगी;लेकिन बहुओं के लिए जलपान तक का ध्यान रखती थी। अपनी देह पर गहने के नाम कच्चा धागा भी न था, देवरानियों के लिए दोदो चार-चार गहने बनवा दिये। सोने के न सही चाँदी के तो हैं। जलन यही थी कि यह मालिक क्यों है। बहुत अच्छा हुआ कि अलग हो गये। मेरे सिर से बला टली।

    ⁠ भोला ने एक लोटा पानी चढाकर कहा-यही हाल घर-घर है भैया! भाइयों की बात ही क्या,यहाँ तो लड़कों से भी नहीं पटती और पटती इसीलिए नहीं कि मैं किसी की कुचाल देखकर मुंह नहीं बन्द कर सकता। तुम जुआ खेलोगे, चरस पीओगे, गाँजे के दम लगाओगे, मगर आये किसके घर से? खरचा करना चाहते हो तो कमाओ;मगर कमाई तो किसी से न होगी। खरच दिल खोलकर करेंगे। जेठा कामता सौदा लेकर वाजार जायगा, तो आधे पैसे गायब। पूछो तो कोई जवाब नहीं। छोटा जंगी है,वह संगत के पीछे मतवाला रहता है। साँझ हुई और ढोल-मजीरा लेकर बैठ गये। संगत को मैं बरा नहीं कहता। गाना-बजाना ऐब नही; लेकिन यह सब काम फरसत के है। यह नहीं कि घर का तो कोई काम न करो,आठों पहर उसी धुन में पड़े रहो। जाती है मेरे सिर;सानी-पानी मैं करूँ,गाय-भैस मै दुहूँ, दूध लेकर बाजार मै जाऊँ। यह गृहस्थी जी का जंजाल है,सोने की हँसिया,जिसे न उगलते बनता है,न निगलते। लड़की है,झुनिया,वह भी नसीब की खोटी। तुम तो उसकी सगाई में आये थे। कितना अच्छा घरवर था। उसका आदमी बम्बई में दूध की दूकान करता था। उन दिनों वहाँ हिन्दूमुसलमानों में दंगा हुआ, तो किसी ने उसके पेट में छूरा भोंक दिया। घर ही चौपट हो गया। वहाँ अब उसका निवाह नहीं। जाकर लिवा लाया कि दूसरी सगाई कर दूंगा; मगर वह राजी ही नहीं होती। और दोनों भावजें हैं कि रात-दिन उसे जलाती रहती है। घर में महाभारत मचा रहता है। विपत की मारी यहाँ आई, यहाँ भी चैन नही।

    ⁠ इन्ही दुखड़ों मे रास्ता कट गया। भोला का पुरवा था तो छोटा; मगर बहुत गुलजार। अधिकतर अहीर ही वसते थे।और किसानों के देखते इनकी दशा बहुत बुरी न थी। भोला गाँव का मुखिया था। द्वार पर बड़ी-सी चरनी थी जिस पर दस-बारह गाय-भैसें खड़ी सानी खा रही थी। ओसारे में एक बड़ा-सा तख्त पड़ा था जो शायद दस आदमियों से भी न उठता। किसी खूटी पर ढोलक लटक रही थी किसी पर मजीरा। एक ताख पर कोई पुस्तक बस्ते में बँधी रखी हुई थी, जो शायद रामायण हो। दोनों बहुएँ सामने बैठी गोबर पाथ रही थीं और झुनिया चौखट पर खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं और नाक के सिरे पर भी सुीं थी। मालूम होता था,अभी रोकर उठी है।उसके मांसल,स्वस्थ,सुगठित अंगों में मानो यौवन लहरें मार रहा था। मुंह बड़ा और गोल था,कपोल फूले हुए,आँखें छोटी और भीतर घुसी हुई,माथा पतला;पर वक्ष का उभार और गात का वही गुदगुदापन आँखों को खींचता था। उस पर छपी हुई गुलाबी साड़ी उसे और भी शोभा प्रदान कर रही थी।

    ⁠ भोला को देखते ही उसने लपककर उनके सिर से खाँचा उतरवाया। भोला ने गोवर और होरी के खाँचे उतरवाये और झुनिया से बोले-पहले एक चिलम भर ला, फिर थोड़ा-सा रस बना ले। पानी न हो तो गगरा ला,मैं खींच दूं। होरी महतो को पहचानती है न?

    ⁠ फिर होरी से बोला-घरनी के बिना घर नहीं रहता भैया। पुरानी कहावत है– नाटन खेती वहुरियन घर। नाटे बैल क्या खेती करेंगे और बहुएँ क्या घर सँभालेंगी। जव से इसकी माँ मरी है, जैसे घर की बरकत ही उठ गयी। बहुएँ आटा पाथ लेती है। पर गृहस्थी चलाना क्या जानें। हाँ, मुँह चलाना खूब जानती हैं। लौंडे कहीं फड़ पर जमे होंगे। सब-के-सब आलसी हैं,कामचोर। जब तक जीता हूँ, इनके पीछे मरता हूँ। मर जाऊँगा,तो आप सिर पर हाथ धरकर रोयेंगे। लड़की भी वैसी ही है। छोटा-सा अढ़ौना भी करेगी,तो भुन-भुनाकर। मैं तो सह लेता हूँ,खसम थोड़े ही सहेगा।

    ⁠ झुनिया एक हाथ में भरी हुई चिलम, दूसरे में लोटे का रस लिये बड़ी फुर्ती से आ पहुँची। फिर रस्सी और कलसा लेकर पानी भरने चली। गोबर ने उसके हाथ से कलसा लेने के लिए हाथ बढ़ाकर झेंपते हुए कहा–तुम रहने दो,मैं भरे लाता हूँ।

    ⁠ झुनिया ने कलसा न दिया। कुएँ के जगत पर जाकर मुस्कराती हुई बोली–तुम हमारे मेहमान हो। कहोगे एक लोटा पानी भी किसी ने न दिया।

    ⁠ 'मेहमान काहे से हो गया। तुम्हारा पड़ोसी ही तो हूँ।'

    ⁠ 'पड़ोसी साल-भर में एक बार भी सूरत न दिखाये, तो मेहमान ही है।'

    ⁠ 'रोज-रोज आने से मरजाद भी तो नहीं रहती।'

    ⁠ झुनिया हँसकर तिरछी नजरों से देखती हुई बोली–वही मरजाद तो दे रही हूँ। महीने में एक बेर आओगे,ठण्डा पानी दूंगी। पन्द्रहवें दिन आओगे, चिलम पाओगे। सातवें दिन आओगे, खाली बैठने को माची दूंगी। रोज-रोज आओगे,कुछ न पाओगे।

    ⁠ 'दरसन तो दोगी?'

    ⁠ 'दरसन के लिए पूजा करनी पड़ेगी।'

    ⁠ यह कहते-कहते जैसे उसे कोई भूली हुई बात याद आ गयी। उसका मुंह उदास हो गया। वह विधवा है। उसके नारीत्व के द्वार पर पहले उसका पति रक्षक बना बैठा रहता था। वह निश्चिन्त थी। अब उस द्वार पर कोई रक्षक न था,इसलिए वह उस द्वार को सदैव बन्द रखती है। कभी-कभी घर के सूनेपन से उकताकर वह द्वार खोलती है;पर किसी को आते देखकर भयभीत होकर दोनों पट भेड़ लेती है। ⁠ गोबर ने कलसा भरकर निकाला। सबों ने रस पिया और एक चिलम तमाखू और पीकर लौटे। भोला ने कहा–कल तुम आकर गाय ले जाना गोबर,इस बखत तो सानी खा रही है।

    ⁠ गोवर की आँखें उसी गाय पर लगी हुई थीं और मन-ही-मन वह मुग्ध हुआ जाता था। गाय इतनी सुन्दर और मुडौल है,इसकी उसने कल्पना भी न की थी।

    ⁠ होरी ने लोभ को रोककर कहा–मंगवा लूंगा, जल्दी क्या है?

    ⁠ 'तुम्हें जल्दी न हो,हमें तो जल्दी है। उसे द्वार पर देखकर तुम्हें वह वात याद रहेगी।'

    ⁠ 'उमकी मुझे बड़ी फिकर है दादा!'

    ⁠ 'तो कल गोबर को भेज देना।'

    ⁠ दोनों ने अपने-अपने खाँचे सिर पर रखे और आगे बढ़े। दोनों इतने प्रसन्न थे मानो व्याह करके लौटे हों। होरी को तो अपनी चिर संचित अभिलापा के पूरे होने का हर्ष था,और विना पैसे के। गोवर को इससे भी बहुमूल्य वस्तु मिल गयी थी। उसके मन में अभिलापा जाग उठी थी।

  • गल्प समुच्चय

    गल्प समुच्चय

    Aproximadamente 103.452 palavras.

    गल्प समुच्चय
    https://hi.wikisource.org/wiki/गल्प_समुच्चय

    १—पं॰ ज्वालादत्त शर्मा

    आप मुरादाबाद के निवासी हैं। संस्कृत, फ़ारसी और उर्दू के अच्छे ज्ञाता हैं। आपने उर्दू के कई सुविख्यात कवियों पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं। आप की वर्णन-शैली और भाषा सरस है।

    २—महाशय सुदर्शन

    आप पंजाब के निवासी हैं। आप कई समाचार-पत्रों का सम्पादन भी कर चुके हैं। आपका हिन्दी और उर्दू-दोनों ही भाषाओं—पर अधिकार है। आपके गल्प बड़ें मनोरंजक, शिक्षाप्रद और भाव-पूर्ण होते हैं। आपके गल्पों के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आप अच्छे नाट्यकार भी हैं। आपको दो बार "पंजाब टेक्स्ट-बुक कमेटी" से पुरस्कार मिल चुके हैं। आपकी शैली बड़ी मर्म-स्पर्शी तथा लालित्य-पूर्ण है। मनोभावों का चित्रण करने में आप निपुण हैं।

    ३-पं० चतुरसेन शास्त्री

    आप देहली के निवासी हैं। आपकी रचनायें अधिकतर गद्यकाव्य-मयी होती हैं, माधुर्य में डूबी हुई। मनोभावों का विश्लेषण करने में आप सिद्ध-हस्त हैं। आपकी भाषा बहुत परिमार्जित और भाव श्रृङ्गार-मय होते हैं। 'अन्तस्तल' आपका एक गद्य-काव्य है। "हृदय की प्यास" नाम का रोचक उपन्यास भी आपने लिखा है।

    ४—श्रीप्रेमचन्द

    आप काशी के रहने वाले हैं। आपने कानपुर के उर्दू-पत्र "ज़माना" में लेख लिखना शुरू किया। आपकी "प्रेम-पच्चीसी" और “सोज़ेवतन" यह दोनों प्रथम ज़माना ही से प्रकाशित हुई। सन् १९१४ से आप हिन्दी में लिख रहे हैं। आपके कई उपन्यास "सेवा-सदन", "वरदान", "काया- कल्प", "प्रेमाश्रम", "रंगभूमि", "प्रतिज्ञा" तथा "ग़बन" आदि प्रसिद्ध हो चुके हैं। आपकी कहानियों के कई संग्रह निकल चुके हैं-"प्रेम-प्रतिमा", "प्रेम-पूर्णिमा", "प्रेम-पञ्चीसी", "प्रेम-प्रसून", "प्रेमतीर्थ”, “सप्त-सरोज", "नव-निधि", "पाँच फूल", "सप्त सुमन", "प्रेम कुंज" आदि। आपकी दो-चार गल्पों के अनुवाद जापानी तथा अंग्रेजी भाषा में भी निकल चुके हैं। आप 'माधुरी' के संयुक्तसम्पादक तो वर्षों रहे ही हैं, इधर 'हंस' का सम्पादन भी बड़ी ही योग्यता से कर रहे हैं। (रामदासगौड़)

    ५—श्रीपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी बी॰ ए॰

    आप मध्यप्रदेश के निवासी और प्रसिद्ध मासिक-पत्रिका 'सरस्वती' के सम्पादक हैं। आपकी शैली बहुत ही प्रौढ़ विचार-शील और कटाक्ष-पूर्ण है। आपने प्राच्य और पाश्चात्य-साहित्य का गहरा अध्ययन किया है। 'साहित्य-विमर्श' में आपने संसार-साहित्य की मार्मिक विवेचना की है। आप सुकवि भी हैं।

    ६—पं॰ विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

    आप कानपूर के निवासी हैं। आपकी कहानियाँ प्रायः हिन्दी-मासिक-पत्रिकाओं में निकलती रहती हैं। 'गल्प-मन्दिर' और 'चित्रशाला'——ये दो संग्रह आपकी कहानियों के प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आपने 'मनोरंजन' मासिक-पत्र का बड़ी योग्यता से सम्पादन किया। आपकी कहानियों में बहुधा निम्न-श्रेणी के चरित्रों का चित्रण होता है। आपकी कला की विशेषता संभाषण है। संभाषणों-द्वारा ही आपने कई ड्रामे लिखे हैं। आपका एक उपन्यास धारा-वाहिक रूप में 'सुधा' में निकला था, जो अब पुस्तक रूप में भी छप गया।

    ७—श्रीशिवपूजन सहाय

    आप बिहार के निवासी हैं। आपकी भाषा माधुर्य से परिपूर्ण होती है। आप सच्चे कलाविद् की भाँति भापा को खूब अलंकृत करते हैं। आपकी कई पुस्तकें—'महिला-महत्व' 'देहाती दुनिया' आदि—प्रकाशित हो चुकी हैं। पहले आपने 'बालक' का सम्पादन बड़ी योग्यता से किया, अब 'गंगा' का सम्पादन करते हैं।

    ८–श्रीचण्डीप्रसाद, बी० ए० 'हदयेश'

    आप पीलीभीत के निवासी थे। आपके देहावसान को तीन वर्ष हो गये। आप सानुप्रास भाषा लिखते थे। आपकी लेखन-शैली मधुर और चरित्र-चित्रण आकर्षक होता था। यदि आप कुछ काल तक और जीवित रहते, तो हिन्दी-साहित्य में एक विशिष्ट धारा प्रवाहित कर जाते। आपके 'मंगल-प्रभात' और 'मनोरमा' आदि उपन्यास तथा 'नन्दन-निकुञ्ज' आदि गल्प-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आप 'चाँद' के सहकारी संपादक भी रह चुके हैं। कविताएँ भी आप अच्छी लिख लेते थे।

    ९-श्रीराजेश्वरप्रसादसिंह

    आप प्रयाग के रहनेवाले हैं। पहले आप 'लीडर' के कार्यालय में काम करते थे। अब स्वतंत्र रूप से साहित्य-सेवा करते हैं। आपकी कहानियाँ समाज की दुर्बलताओं पर आधारित होती हैं। आपकी शैली में दार्शनिक विचारों का अच्छा सम्मिश्रण होता है। आप अंग्रेजी में भो लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं।

    (१) शतरंज के खिलाड़ी

    ______

    ( १ )

    वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विला-सिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था। शासन-विभाग में, साहित्य- क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला-कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी। राज-कर्मचारी विषय-वासना में, कवि-गण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में, व्यवसायी सुरमे, इत्र, मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में, लिप्त थे। सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे हैं; तीतरों की लड़ाई के लिये पाली बदी जा रही है। कहीं चौसर बिछी हुई है; पौ-बारह का शोर मचा हुआ है। कहीं शतरंज

    का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर रंक तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते, तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते। सतरंज, ताश, गंजीफ़ा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है। ये दलीलें जोरों के साथ पेश की जाती थीं (इस सम्प्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है) इस लिए अगर मिरजा सज्जादअली और मीर रौशनअली अपना अधिकांश समय बुद्धि तीव्र करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशील पुरुष को क्या आपत्ति हो सकती थी? दोनों के पास मौरूसी जागीरें थीं; जविका को कोई चिन्ता न थी; घर में बैठे चखौतियाँ करते थे। आखिर और करते ही क्या? प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके विसात बिछाकर बैठ जाते, मुहरे सज जाते, और लड़ाई के दाव पेंच होने लगते। फिर खबर न होती थी कि कब दोपहर हुई, कब तीसरा पहर, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा आता कि खाना तैयार है। यहाँ से जवाब मिलता-चलो, आते हैं; दस्तरख्वान बिछाओ। यहाँ तक कि बावरची विवश होकर कमरे ही में खाना रख जाता था। और दोनों मित्र दोनों काम साथ-साथ करते थे। मिरजा सज्जादअली के घर में कोई बड़ा-बूढ़ा न था, इसलिए उन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ होती थीं; मगर यह बात न थी कि मिरजा के घर के और लोग उनके इस व्यवहार से खुश हों। घरवालों का तो कहना ही क्या, महल्लेवाले, घर के नौकर

    चाकर तक नित्य द्वेष-चूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे-बड़ा मनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे, किसी को इसकी चाट पड़े, आदमी दीन दुनिया किसी के काम का नहीं रहता। न घर का न घाट का। बुरा रोग है। यहाँ तक कि मिरजा की बेगम साहब को इससे इतना द्वेष था कि अवसर खोज-खोज कर पति को लताड़ती थीं; पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था। वह सोती ही रहती थीं, तब तक उधर बाजी बिछ जाती थी। और रात को जब सो जाती थीं, तब कहीं मिरेजाजी घर में आते थे। हाँ नौकरों पर वह अपना गुस्सा उतारती रहती थीं-क्या पान मांगे हैं? कह दो आकर ले जायें। खाने की फुरसत नहीं है? ले जाकर खाना सिर पर पटक दो, खायें चाहे कुत्ते को खिलावें। पर दूबदू वह भी कुछ न कह सकती थीं। उनको अपने पति से उतना मलाल न था, जितना मीरसाहब से। उन्होंने उनका नाम मीर बिगाड़ू रख छोड़ा था। शायद मिरजाजी अपनी सफाई देने के लिए सारा इलजाम मीरसाहब ही के सिर थोप देते थे।

    एक दिन बेगम साहबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौंडी से कहा-जाकर मिरजासाहब को बुला ला। किसी हकीम के यहाँ से दवा लावें। दौड़ जल्दी कर। लौंडी गई, तो मिरजाजी ने कहा-चल अभी आते हैं। बेगम साहबा का मिज़ाज़ गरम था। इतनी ताब कहाँ कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरंज खेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौंडी से कहा-जाकर

    कह, अभी चलिए, नहीं तो वह आपही हकीम के यहाँ चली जायँगी।

    मिरजाजी बड़ी दिलचस्पी बाजी खेल रहे थे, दो ही किस्तों में मिरसाहब को मात हुई जाती थी। झुँझलाकर बोले- क्या ऐसे दम लबों पर है? जरा सब्र नहीं होता?

    मीर-अरे तो जाकर सुन हो आइए न। औरतें नाजुक मिज़ाज़ होती ही हैं।

    मिरजा-जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ! दो किस्तों में आपकी मात होती है।

    मीर-जनाब इस भरोसे न रहियेगा। वह चाल सोची है कि आपके मुहरे धरे रहें और मात हो जाय; पर जाइये सुन आइए। क्यों खामख्वाह उनका दिल दुखाइएगा?

    मिरजा इसी बात पर मात ही करके जाऊँगा।

    मीर-मैं खोलूगा ही नहीं। आप जाकर सुन आइए।

    मिरजा-अरे यार, जाना पड़ेगा हकीम के यहाँ। सिर-दर्द खाक नहीं है; मुझे परेशान करने का बहाना है।

    मीर-कुछ ही हो, उनकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी।

    मिरजा-अच्छा, एक चाल और चल लूँ।

    मीर-हरगिज़ नहीं, जब तक आप सुन न आवेंगे, मैं मुहरे में हाथ ही न लगाऊँगा।

    मीरजा साहब मजबूर होकर अन्दर गये, तो बेगम साहबा ने त्यौरियाँ बदल कर; लेकिन कराहते हुए कहा-तुम्हें निगोड़ी शत-

    रंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर ही जाय; पर उठने का नाम नहीं लेते! नौज कोई तुम-जैसा आदमी हो!

    मिरजा-क्या कहूँ, मीरसाहब मानते ही न थे। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाकर आया हूँ।

    बेगम-क्या जैसे वह खुद निखट्टू हैं, वैसे ही सबको समझते हैं? उनके भी तो बाल-बच्चे हैं, या सबका सफाया कर डाला?

    मिरजा-बड़ा लती आदमी है। जब आ जाता है, तब मजबूर होकर मुझे भी खेलना ही पड़ता है।

    बेगम-दुत्कार क्यों नहीं देते?

    मिरजा-बराबर के आदमी हैं, उम्र में, दर्जे में मुझसे दो अङ्गुल ऊँचे। मुलाहिजा करना ही पड़ता है।

    बेगम-तो मैं ही दुत्कारे देती हूँ। नाराज़ हो जायेंगे, हो जायें। कौन किसी की रोटियाँ चला देता है। रानी रूठेंगी, अपना सुहाग लेंगी।—-हिरिया, जा, बाहर से शतरंज उठा ला। मीरसाहब से कहना, मियाँ अब न खेलेंगे, आप तशरीफ़ ले जाइये!

    मिरजा– हाँ हाँ, कहीं ऐसा ग़ज़ब भी न करना! जलील कराना चाहती हो क्या!– ठहर हिरिया, कहाँ जाती है।

    बेगम–जाने क्यों नहीं देते! मेरा ही खून पिये, जो उसे रोके। अच्छा, उसे रोका, मुझे रोको तो जानू!

    यह कहकर बेगम साहबा झल्लाई हुई दीवानखाने की तरफ़ चलीं। मिरजा बेचारे का रंग उड़ गया। बीवी की मिन्नतें करने लगे-खुदा के लिए, तुम्हें हज़रत हुसेन की क़सम है। मेरी ही

    मैयत देखे, जो उधर जाय; लेकिन बेगम ने एक दीवानखाने के द्वार तक गई; पर एकाएक पर पुरुष के सामने जाते हुए पाँव बंध-से गये। भीतर झांका। संयोग से कमरा खाली था। मीरसाहब ने दो-एक मुहरे इधर-उधर कर दिए थे, और अपनी सफ़ाई जताने के लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, बेगम ने अन्दर पहुँचकर बाजी उलट दी, मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिए, कुछ बाहर और किवाड़े अन्दर से बन्द करके कुंडी लगा दी। मीरसाहब दरवाजे पर थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की झनक कान में पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गए, बेगम साहबा बिगड़ गई। चुपके से घर की राह ली।

    मिरजा ने कहा——तुमने ग़ज़ब किय !

    बेगम——अब मीरसाहब इधर आये, तो खड़े-खड़े निकलवा दूंगी। इतनी लौ खुदा से लगाते, तो वली हो जाते। आप तो शतरंज खेलें, और मैं यहाँ चूल्हे-चक्की की फ़िक्र में सिर खपाऊँ! ले जाते हो हकीम साहब के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है?

    मिरजा घर से निकले, तो हकीम के घर जाने के बदले मीर साहब के घर पहुँचे, और सारा वृत्तान्त कहा। मीरसाहब बोले——मैने तो जब मुहरे बाहर आते देखे, तभी ताड़ गया। फौरन् भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती है; मगर आपने उन्हें यों सिर चढ़ा रक्खा है, यह मुनासिब नहीं। उन्हें इससे क्या मतलब कि आप बाहर क्या करते हैं। इन्तजाम करना उनका काम है, दूसरी बातों से उन्हें क्या सरोकार? मिरजा––ख़ैर, यह तो बताइए, अब कहाँ जमाव होगा?

    मीर––इसका क्या ग़म है। इतना बड़ा घर पड़ा हुआ है। बस, यहीं जमे।

    मिरजा––लेकिन बेगम साहबा को कैसे मनाऊँगा? जब घर पर बैठा रहता था, तब तो वह इतना बिगड़ती थीं; यहाँ बैठक होगी, तो शायद जिन्दा न छोड़ेंगी।

    मीर––अजी बकने भी दीजिए; दो-चार रोज़ में आप ही ठीक हो जायेंगी। हाँ, आप इतना कीजिए कि आज से ज़रा तन जाइए।

    ( २ )

    मीरसाहब को बेगम किसी अज्ञात कारण से मीरसाहब का घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझती थी; इसलिए वह उनके शतरंज-प्रेम की कभी आलोचना न करती थीं; बल्कि कभी-कभी मीर- साहब को देर हो जाती, तो याद दिला देती थीं। इन कारणों से मीरसाहब को भ्रम हो गया था, कि मेरी स्त्री अत्यंत विनयशील और गम्भीर है; लेकिन जब दीवानखाने में बिसात बिछने लगी, और मीरसाहब दिन-भर घर में रहने लगे, तो बेगम साहबा को बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड़ गई। दिनभर दरवाजे पर झाँकने को तरस जाती।

    उधर नौकरों में भी कानाफूसी होने लगी। अब तक दिन-भर पड़े-पड़े, मक्खियो मारा करते थे। घर में कोई आवे, कोई जाय, उनले कुछ मतलब न था। अब आठों पहर की धौंस हो गई। कभी पान लाने का हुक्म होता। कभी मिठाई का। और, हुक्का तो किसी प्रेमी के हृदय की भाँति जलता ही रहता था। वे बेगम साहबा से जा-जाकर कहते––हुजूर, मियाँ की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गई! दिन-भर दौड़ते-दौड़ते पैरों में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे तो शाम कर दी! घड़ी-आध घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमें तो कोई शिकायत नहीं, हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा, बजा ही लावेंगे; मगर यह खेल मनहूस है। इसका खेलनेवाला कभी पनपता नहीं; घर पर कोई न कोई आफ़त ज़रूर आती है। यहाँ तक कि एक के पीछे महल्ले के महल्ले तबाह होते देखे गये है। सारे महल्ले में यही चरचा होती रहती है। हुजूर का नमक खाते है, अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज हाता है; मगर क्या करें। इस पर बेगम साहबा कहती-मै तो खुद इसको पसन्द नहीं करती; पर वह किसी को सुनते ही नहीं, तो क्या किया जाय।

    महल्ले मे भी जो दो-चार पुराने ज़माने के लोग थे, वे आपस में भाँति-भाँति के अमङ्गल की कल्पनाएं करने लगे-अब खैरियत नहीं है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल्क का खुदा ही हाफ़िज़ है। यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगा। आसार बुरे हैं।

    राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फ़रियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी

    दौलत लखनऊ में खिंची आती थी, और वह वेश्याओं में, भाँड़ों में, ओर विलासिता के अन्य अङ्गों को पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज़-कम्पनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता था। कमली दिन-दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार-बार चेतावनी देता था; पर यहाँ तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे; किसी के कानों पर जूं न रेंगती थी।

    खैर, मीरसाहब के दीवानखाने में शतरंज होते कई महीने गुज़र गये। नये-नये नक्शे हल किये जाते, नये-नये किले बनाये जाते, नित्य नई व्यूह-रचना होती, कभी-कभी खेलते-खेलते झौड़ हो जाती, तू-तू मैं-मैं तक की नौबत आ जाती; पर शीघ्र ही दोनों मित्रों में मेल हो जाता। कभी -कभी ऐसा भी होता, कि बाज़ी उठा दी जाती, मिरजा जी रूठकर अपने घर चले आते। मीर- साहब अपने घर में जा बैठते; पर रात-भर को निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्य शान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनों मित्र दीवानखाने में आ पहुँचते थे।

    एक दिन दोनों मित्र बैठे हुए शतरंज के दल-दल में ग़ोते खा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफ़सर मीरसाहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा! मीरसाहब के होश उड़ गये! यह क्या बला सिर पर आई! यह तलबी किस लिए हुई है! अब खैरियत नहीं नज़र आती ! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकरों से बोले-कह दो, घर में नहीं हैं। सवार––घर में नहीं, तो कहाँ है?

    नौकर––यह मैं नहीं जानता। क्या काम है?

    सवार––काम तुझे क्या बतलाऊँ? हुजूर में तलबी है––शायद फ़ौज के लिए कुछ सिपाही मांगे गये हैं। जागीरदार हैं कि दिल्लगी! मोरचे पर जाना पड़ेगा, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा!

    नौकर––अच्छा, तो जाइए, कह दिया जायगा।

    सवार––कहने की बात नहीं है। मैं कल खुद आऊँगा, साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

    सवार चला गया। मीरसाहब की आत्मा काँप उठी।

    मिरजाजी से बोले––कहिए जनाब अब क्या होगा?

    मिरजा––बड़ी मुसीबत है कहीं मेरी तलबी भी न हो।

    मीर––कम्बख्त कल फिर आने को कह गया है।

    मिरजा––आफत है और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो बे-मौत मरे।

    मीर––बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलो ही नहीं। कल से गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। वहाँ किसे खबर होगी। हज़रत आकर आप लौट जाँयगे।

    मिरजा––वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा और कोई तदबीर ही नहीं है।

    इधर मीरसाहब की बेगम उस सवार से कह रही थीं, तुमने खूब धता बताई। उसने जवाब दिया-ऐसे गावदियों को तो

    चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चर ली। अब भूलकर भी घर पर न रहेंगे।

    ( ३ )

    दूसरे दिन से दोनों मित्र मुँह-अँधेरे घर से निकल खड़े होते। बग़ल में एक छोटी-सी दरी दबाये, डिब्बे में गिलौरियाँ भरे, गोमती-पार की एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफ़उद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम और मदरिया ले लेते और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भरकर शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फ़िक्र न रहती थी। किश्त, शह आदि दो-एक शब्दों के सिवा उनके मुंह से और कोई वाक्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता होगा। दोपहर को जब भूख मालूम होती, तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना खा आते, और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम-क्षेत्र में डट जाते। कभी-कभी तो उन्हें भोजन का भी ख्याल न रहता था।

    इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फौजें लखनऊ की तरफ़ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हल-चल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे; पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी ज़रा भी फ़िक्र न थी। वे घर से आते, तो गलियों में होकर। डर था, कि कहीं किसी बादशाही मुलाज़िम की निगाह न पड़ जाय, जो

    बेगार में पकड़ जायें। हजारों रुपये सालाना की जागीर मुफ्त ही में हज़म करना चाहते थे।

    एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिरजा की बाज़ी कुछ कमजोर थी। मीरसाहब उन्हें किश्त-पर-किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिये। यह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार ज़माने के लिये आ रही थी।

    मीरसाहब बोले––अंगरेजी फ़ौज आ रही है; खुदा खैर करे।

    मिरजा––आने दीजिये, किश्त बचाइये। यह किश्त!

    मीर––ज़रा देखना चाहिए, यहीं आड़ में खड़े हो जायं।

    मिरजा––देख लीजियेगा, जल्दी क्या है, किश्त!

    मीर––तोपखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे-कैसे जवान हैं! लाल बन्दरों के-से मुँह। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

    मिरजा––जनाब, हीले न कीजिये। ये चकमे किसी और को दीजियेगा, यह किश्त!

    मीर––आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत आई हुई है, और आपको किश्त की सूझी है! कुछ इसकी भी खबर है, कि शहर घिर गया, तो घर कैसे चलेंगे?

    मिरजा––जब घर चलने का वक्त आएगा, तो देखी जायगी––यह किश्त! बस, अबकी शह में मात है।

    फौज़ निकल गई। दस बजे का समय था। फिर बाज़ी बिछ गई। मिरजा बोले––आज खाने की कैसे ठहरेगी?

    मीर––अजी, आज तो रोज़ा है। क्या आपको ज्यादा भूख मालूम होती है?

    मिरजा––जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।

    मीर––शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना-खा-कर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।

    दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे, तो तीन बज गये। अबकी मिरजाजी की बाज़ी कमज़ोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज़ का वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली पकड़ लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आजतक किमी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से, इस तरह खून बहे बिना, न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नीद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

    मिरजा ने कहा–– हुजूर नवाबसाहब को जालिमों ने क़ैद कर लिया है।

    मीर––होगा, यह लीजिये शह!

    मिरजा––जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत

    नहीं लगती। बेचारे नवाबसाहब इस वक्त़ खून के आँसू रो रहे होंगे।

    मीर––रोया ही चाहें। यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा–– यह किश्त!

    मिरजा––किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।

    मीर––हाँ सो तो है ही—–यह लो फिर किश्त! बस, अबकी किश्त में मात है, बच नहीं सकते।

    मिरजा––खुदा की कसम, आप बड़े बेदर्द हैं। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दु:ख नहीं होता। हाय, ग़रीब वाजिदअली शाह!

    मीर––पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब-साहब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात! लाना हाथ!

    बादशाह को लिये हुए सेना सामने से निकल गई! उनके जाते ही मिरजा ने फिर बाजी बिछा दी । हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा-आइये, नवाबसाहब के मातम में एक मरसिया कह डालें; लेकिन मिरजा की राज-भक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी। वह हार का बदला चुकाने के लिये अधीर हो रहे थे।

    ( ४ )

    शाम हो गई। खँडहर में चमगादड़ों ने चीखना शुरू किया। अबाबीलें आ आकर अपने-अपने घोसलों में चिमटीं। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे, मानों दो खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। मिरजा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाज़ी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़ निश्चय करके सँभाल कर खेलते थे; लेकिन एक-न-एक चाल ऐसी बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाजी खराब हो जाती थी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और भी उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के ग़ज़लें गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुम धन पा गये हों। मिरजाजी सुन-सुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे; पर ज्यों-ज्यों बाज़ी कमज़ोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकला जाता था! यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुंझलाने लगे—जनाब, आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि एक चाल चले, और फिर उसे बदल दिया। जो कुछ चलना हो, एक बार चल लीजिए। यह आप मुहरे पर हाथ क्यों रखे रहते हैं? मुहरे को छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरे छूइए ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं। जिसे एक चाल चलने में पाँच मिनट से ज्यादा लगे, उसकी मात समझी जाय। फिर आपने चाल बदली! चुपके से मुहरे वहीं रख दीजिए।

    मीर साहब का फ़रजी पिटता था। बोले—मैंने चाल चली ही कब थी? मिरजा––आप चाल चल चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए––उसी घर में!

    मीर––उस घर में क्यों रक्खूँ? मैंने हाथ से मुहरा छोड़ा ही कब था?

    मिरजा––मुहरा आप क़यामत तक न छोड़ें, तो क्या चाल ही न होगी? फ़रजी पिटते देखा, तो धाँधली करने लगे!

    मीर––धाँधली आप करते हैं। हार-जीत तक़दीर से होती है ; धाँधली करने से कोई नहीं जीतता?

    मिरजा––जो इस बाज़ी में आपको मात हो गई।

    मीर––मुझे क्यों मात होने लगी?

    मिरजा––तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रक्खा था।

    मीर––वहां क्यों रक्खूँ? नहीं रखता!

    मिरजा––क्यों न रखिएगा? आपको रखना होगा!

    तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था, न वह! अप्रासंगिक बातें होने लगी। मिरजा बोले-किसी ने खानदान में शतरंज खेली होती, तब तो इसके कायदे जानते। वे तो हमेशा घास छीला किये आप शतरंज क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज़ है। जागीर मिल जाने से ही कोई रईस नहीं हो जाता।

    मीर––क्या! घास आपके अब्बाजान छीलते होंगे। यहाँ तों पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आ रहे हैं। मिरजा––अजी, जाइए भी, गाज़िउद्दीन हैदर के यहाँ बावरची का काम करते-करते उम्र गुज़र गई, आज रईस बनने चले हैं। रईस बनना कुछ दिल्लगी नहीं है।

    मीर—क्यों अपने बुजर्गों के मुँह कालिख लगाते हो-वे ही बाबरची का काम करते होंगे। यहाँ तो हमेशा बादशाह के दस्तरख्वान पर खाना खाते चले आये हैं।

    मिरजा—अरे चल चरकटे, बहुत बढ़-बढ़कर बातें न कर।

    मीर—ज़बान संभालिये, वरना बुरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का आदी नहीं हूँ। यहाँ तो किसी ने आँखें दिखाई कि उसकी आँखें निकाला। है हौसला?

    मिरजा—आप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जाय, इधर या उधर!

    मीर—तो यहाँ तुमसे दबनेवाला कौन है?

    दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल ली। नवाबी ज़माना था; सभी तलवार, पेशक़म्ज, कटार वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे; पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अधःपतन हो गया था-बादशाह के लिए, बादशाहत के लिए क्यों मरें; पर व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनों ने पैतरें बदले, तलवार चमका, छपाछप की आवाज आई। दोनों जख्म खाकर गिरे, और दोनों ने वहां तड़प-तड़प कर जानें दे दी। अपने बादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक बूंद आँसू न निकला, उन्हीं दोनों प्राणियों ने शतरंज के वज़ीर की रक्षा में प्राण दे दिये। अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।

    चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। खंडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवार और धूल धूसरित मीनारें इन लाशों को देखती और सिर धुनती थीं।

    ____०____

    (२) कामना-तरु

    (१)

    राजा इंद्रनाथ का देहान्त हो जाने के बाद, कुँअर राजनाथ को शत्रुओं ने चारों ओर से ऐसा दबाया, कि उन्हें अपने प्राण लेकर एक पुराने सेवक की शरण जाना पड़ा, जो एक छोटे-से गाँव का जागीरदार था। कुँअर स्वभाव ही से शांति-प्रिय, रसिक, हँस-खेलकर समय काटनेवाले युवक थे। रण-क्षेत्र की अपेक्षा कवित्व के क्षेत्र में अपना चमत्कार दिखाना उन्हें अधिक प्रिय था। रसिकजनों के साथ, किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए, काव्य-चरचा करने में उन्हें जो आनन्द मिलता था, वह शिकार या राज-दरबार में नहीं। इस पर्वत-मालाओं से घिरे हुए गाँव में आकर, उन्हें जिस शांति और आनन्द का अनुभव हुआ, उसके बदले में वह ऐसे-ऐसे कई राज त्याग कर सकते थे। यह पर्वत-मालाओं की मनोहर छटा, यह नेत्र-रंजक हरियाली, यह जल-प्रवाह की मधुर वीणा, यह पक्षियों की मीठी बोलियाँ, यह मृग-शावकों की छलाँग, यह बछड़ों की कुलेलें, यह ग्राम-निवा

    सियों की बालोचित सरलता, यह रमणियों की संकोच-मय चपलता, ये सभी बातें उनके लिये नई थीं; पर इन सबों से बढ़कर जो वस्तु उनको आकर्षित करती थी, वह जागीरदार की युवती कन्या चन्दा थी।

    चन्दा घर का सारा काम-काज आप ही करती थी। उसको माता की गोद में खेलना नसीब ही न हुआ था। पिता की सेवा ही में रत रहती थी। उसका विवाह इसी साल होनेवाला था, कि इसी बीच मे कुँअरजी ने आकर उसके जीवन में नवीन भावनाओं और नवीन आशाओं को अंकुरित कर दिया। उसने अपने पति का जो चित्र मन में खींच रक्खा था, वहो मानों रूप धारण करके उमके सम्मुख आ गया। कुँअर की आदर्श रमणी भी चन्दा ही के रूप में अवतरित हो गई; लेकिन कुँअर समझते थे, मेरे ऐसे भाग्य कहाँ? चन्दा भी समझती थी, कहाँ यह और कहाँ मैं!

    (२)

    दोपहर का समय था और जेठ का महीना। खपरैल का घर भट्ठी की भाँति तपने लगा। ख़स की टट्टियों और तहखानों में रहनेवाले राजकुमार का चित्त गरमी से इतना बेचैन हुआ, कि वह बाहर निकल आये और सामने के बाग़ में जाकर एक घने वृक्ष के छाँह में बैठ गये। सहसा उन्होंने देखा-चन्दा नदी से जल की गागर लिये चली आ रही है। नीचे जलती हुई रेत थी, ऊपर जलता हुआ सूर्य। लू से देह झुलसी जाती थी। कदाचित् इस समय प्यास से तड़पते हुए आदमी की भी नदी तक जाने का

    हिम्मत न पड़ती थी। चन्दा क्यों जल लेने गई थी? घर में पानी भरा हुआ है। फिर इस समय वह क्यों पानी लेने निकली?

    कुँअर दौड़कर उसके पास जा पहुँचे और उसके हाथ से गागर छीन लेने की चेष्टा करते हुए बोले––मुझे दे दो और भागकर छाँह में चली जाओ। इस समय पानी का क्या काम था?

    चन्दा ने गागर न छोड़ी। सिर से खिसका हुआ अंचल सँभाल कर बोली––तुम इम समय कैसे आ गये? शायद मारे गरमी के अन्दर न रह सके!

    कुँअर––मुझे दे दो, नहीं मैं छीन लूँगा।

    चन्दा ने मुस्कुराकर कहा––राजकुमारों को गागर लेकर चलना शोभा नहीं देता।

    कुँअर ने गागर का मुँह पकड़कर कहा––इस अपराध का बहुत दण्ड सह चुका हूँ। चन्दा, अब तो अपने को राजकुमार कहने में भी लज्जा आती है।

    चन्दा––देखो धूप में खुद हैरान होते हो और मुझे भी हैरान करते हो। गागर छोड़ दो। सच कहती हूँ, पूजा का जल है।

    कुँअर––क्या मेरे ले जाने से, पूजा का जल अपवित्र हो जायगा?

    चन्दा––अच्छा भाई नहीं जानते, तो तुम्हीं ले चलो। हाँ नहीं तो!

    कुँअर गागर लेकर आगे-आगे चले। चन्दा पीछे हो ली। बग़ीचे में पहुँचे, तो चन्दा एक छोटे-से पौधे के पास रुक कर

    बोली––इसी देवता की पूजा करनी है, गागर रख दो। कुँअर ने आश्चर्य से पूछा––यहाँ कौन देवता है चन्दा? मुझे तो नहीं नज़र आता।

    चन्दा ने पौधे को सींचते हुए कहा––यही तो मेरा देवता है!

    पानी पाकर पौधे की मुरझाई हुई पत्तियाँ हरी हो गई, मानो उनकी आँखें खुल गई हों।

    कुँअर ने पूछा––यह पौधा क्या तुमने लगाया है चन्दा?

    चन्दा ने पौधे को एक सीधी लकड़ी से बाँधते हुए कहा––हाँ, उसी दिन तो, जब तुम यहाँ आए। यहाँ पहले मेरी गुड़ियों का घरौंदा था। मैंने गुड़ियों पर छाँह करने के लिए एक अमोल लगा दिया था। फिर मुझे इसकी याद नहीं रही। घर के काम धन्धे में भूल गई। जिस दिन तुम यहाँ आये, मुझे न-जाने क्यों इस पौधे की याद आ गई। मैंने आकर देखा, तो यह सूख गया था। मैंने तुरन्त पानी लाकर इसे सींचा, तो कुछ-कुछ ताज़ा होने लगा। तब से रोज़ इसे सींचती हूँ। देखो कितना हरा-भरा हो गया है!

    यह कहते-कहते उसने सिर उठाकर कुँअर की ओर ताकते हुए कहा––और सब काम भूल जाऊँ; पर इस पौधे को पानी देना नहीं भूलती। तुम्हीं इसके प्राण-दाता हो। यह तुम्हीं ने आकर इसे जिला दिया, नहीं तो बेचारा सूख गया होता। यह तुम्हारे शुभागमन का स्मृति-चिह्न है। ज़रा इसे देखो। मालूम होता है, हँस रहा है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, कि यह मुझसे बोलता है। सच कहती हूँ, कभी यह रोता है, कभी हँसता है, कभी रूठता है; आज तुम्हारा लाया हुआ पानी पाकर यह फूला नहीं समाता। एक-एक पत्ता तुम्हें धन्यवाद दे रहा है।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों वह पौधा कोई नन्हा-सा क्रीड़ाशील बालक है। जैसे चुम्बन से प्रसन्न होकर बालक गोद में चढ़ने के लिए दोनों हाथ फैला देता है, उसी भाँति यह पौधा भी हाथ फैलाए जान पड़ा। उसके एक-एक अणु में चन्दा का प्रेम झलक रहा था।

    चन्दा के घर में खेती के सभी औज़ार थे। कुँअर एक फावड़ा उठा लाए ओर पौधे का एक थाला बनाकर चारों ओर ऊँची मेंड़ उठा दी। फिर खुरपी लेकर अन्दर की मिट्टी को गोड़ दिया। पौधा और भी लहलहा उठा।

    चन्दा बोली––कुछ सुनते हो, क्या कह रहा है?

    कुँअर ने मुस्कुराकर कहा––हाँ! कहता है अम्माँ की गोद में बैठूँगा।

    चन्दा––नहीं, कह रहा है, इतना प्रेम करके फिर भूल न जाना।

    (३)

    मगर कुँअर को अभी राजपुत्र होने का दण्ड भोगना बाक़ी था। शत्रुओं को न-जाने कैसे उनकी टोह मिल गई इधर तो हित-चिन्तकों के आग्रह से विवश होकर बूढ़ा कुबेरसिंह चन्दा और कुँअर के विवाह की तैयारियाँ कर रहा था, उधर शत्रुओं का एक

    दल सिर पर आ पहुँचा। कुँअर ने उस पौधे के आस-पास फूल-पत्ते लगाकर एक फुलवाड़ी-सी बना दी थी। पौधे को सींचना अब उनका काम था। प्रातःकाल वह कन्धे पर काँवर रक्खे नदी से पानी ला रहे थे कि दस-बारह आदमियों ने उन्हें रास्ते में घेर लिया। कुबेर सिंह तलवार लेकर दौड़ा; लेकिन शत्रुओं ने उसे मार गिराया। अकेला, शस्त्र-हीन कुँअर क्या करता। कन्धे पर काँवर रक्खे हुए बोला––अब क्यों मेरे पीछे पड़े हो भाई? मैंने तो सब कुछ छोड़ दिया।

    सरदार बोला-हमें आपको पकड़ ले जाने का हुक्म है।

    "तुम्हारा स्वामी मुझे इस दशा में भी नहीं देख सकता? खैर, अगर धर्म समझो, तो कुबेरसिंह की तलवार मुझे दे दो। अपनी स्वाधीनता के लिए लड़कर प्राण दूँ।"

    इसका उत्तर यही मिला कि सिपाहियों ने कुँअर को पकड़कर मुश्कें कस दीं और उन्हें एक घोड़े पर बिठाकर घोड़े को भगा दिया काँवर वहीं पड़ी रह गई।

    उसी समय चन्दा घर में से निकली। देखा, काँवर पड़ी हुई है और कुँअर को लोग घोड़े पर बिठाए लिए जा रहे हैं। चोट खाए हुए पक्षी की भाँति वह कई कदम दौड़ी, फिर गिर पड़ी। उसकी आँखों में अँधेरा छा गया।

    सहसा उसकी दृष्टि पिता की लाश पर पड़ी। वह घबड़ाकर उठी और लाश के पास जा पहुँची। कुबेर अभी मरा न था। प्राण आँखों में अटके हुए थे। चन्दा को देखते ही क्षीण स्वर में बोला––बेटी…कुँअर!…इसके आगे वह कुछ न कह सका। प्राण निकल गए; पर इस एक शब्द––"कुँअर"––ने उसका आशय प्रगट कर दिया।

    (४)

    बीस वर्ष बीत गए! कुँअर कैद से न छूट सके।

    यह एक पहाड़ी क़िला था। जहाँ तक निगाह जाती, पहाड़ियाँ ही नजर आतीं। क़िले में उन्हें कोई कष्ट न था। नौकर-चाकर, भोजन-वस्त्र, सैर-शिकार, किसी बात की कमी न थी; पर उस वियोगाग्नि को कौन शान्ति करता, जो नित्य कुँवर के हृदय में जला करती थी। जीवन में अब उनके लिए कोई आशा न थी, कोई प्रकाश न था। अगर कोई इच्छा थी, तो यही कि एक बार उस प्रेम-तीर्थ की यात्रा कर लें, जहाँ उन्हें वह सब कुछ मिला जो मनुष्य को मिल सकता है। हाँ, उनके मन में एक-मात्र यही अभिलाषा थी कि उस पवित्र-स्मृतियों से रंजित भूमि के दर्शन करके जोवन का उसी नदी के तट पर अन्त कर दे। वही नदी का किनारा, वही वृक्षों का कुञ्ज, वही चन्दा का छोटा-सा सुन्दर घर, उसकी आँख में फिरा करता, और वह पोधा, जिसे उन दोनों ने मिलकर सींचा था, उसमें तो मानो उसके प्राण ही बसते थे। क्या वह दिन भी आएगा, जब वह उस पौधे को हरी-हरी पत्तियों से लदा हुआ देखेगा। कौन जाने वह अब है भी या सूख गया। कौन अब उसको सोचता होगा! चन्दा इतने दिनों अविवाहिता थोड़े ही बैठी होगी। ऐसा संभव भी तो नहीं। उसे अब मेरी सुधि भी न

    होगी। हाँ शायद कभी अपने घर की याद खींच लाती हो, तो पौधे को देखकर उसे मेरी याद आ जाती हो। मुझ-जैसे अभागे के लिए इससे अधिक वह और कर ही क्या सकती है। उस भूमि को एक बार देखने के लिए वह अपना जीवन दे सकता था; पर यह अभिलाषा पूरी न होती थी।

    आह! एक युग बीत गया, शोक और नैराश्य ने उठती जवानी को कुचल दिया। न आँखों में ज्योति रही, न पैरों में शक्ति। जीवन क्या था, एक दुःखदायी स्वप्न था। उस सघन अंधकार में उसे कुछ न सूझता था, बस जीवन का आधार एक अभिलाषा थी, एक सुखद स्वप्न जो जीवन में न-जाने कब उसने देखा था, एक बार फिर वही स्वप्न देखना चाहता था। फिर, उसकी अरिलाषाओं का अन्त हो जायगा, उसे कोई इच्छा न रहेगी। सारा अनन्त भविष्य, सारी अनन्त चिन्ताएँ, इसी एक स्वप्न में लीन हो जाती थीं।

    उसके रक्षकों को अब उसकी ओर से काई शंका न थी। उन्हें उस पर दया आती थी। रात को पहरे पर केवल कोई एक आदमी रह जाता था और लोग मीठी नींद सोते थे। कुँअर भाग जा सकता है, इसकी कोई संभावना, कोई शंका न थी। यहाँ तक कि एक दिन यह एक सिपाही भी निश्शंक होकर बन्दूक लिए लेट रहा। निद्रा किसी हिंसक पशु की भाँति ताक लगाए बैठी थी। लेटते ही टूट पड़ी। कुँअर ने सिपाही की नाक की आवाज़ सुनी। उनका हृदय बड़े वेग से उछलने लगा। यह अवसर आज कितने

    दिनों के बाद मिला था। वह उठे; मगर पाँव थरथर कांप रहे थे। बरामदे के नीचे उतरने का साहस न हो सका। कहीं इसकी नींद खुल गई तो? हिंसा उनकी सहायता कर सकती थी। सिपाही की बगल में उसकी तलवार पड़ी थी; पर प्रेम को हिंसा से बैर है। कुँअर ने सिपाही को जगा दिया। वह चौंककर उठ बैठा। रहा सहा संशय भी उसके दिल से निकल गया। दूसरी बार जो सोया तो खर्राटे लेने लगा।

    प्रातःकाल जब उसकी निद्रा टूटी, तो उसने लपककर कुँअर के कमरे में झाँका। कुँअर का पता न था।

    कुँअर इम समय हवा के घोड़ों पर सवार, कल्पना की द्रुतगति से, भागा जा रहा था- उसस्थान को, जहाँ उसने सुख-स्वप्न देखा था।

    किले में चारों ओर तलाश हुई, नायक ने सवार दौड़ाये; पर कहों पता न चला।

    ( ५ )

    पहाड़ी रास्तों का काटना कठिन, उस पर अज्ञातवास की कैद, मृत्यु के दूत पीछे लगे हुए, जिनसे बचना मुश्किल। कुँअर को कामना-तीर्थ में महीनो लग गये। जब यात्रा पूरी हुई, तो कुँअर में एक कामना के सिवा और कुछ शेष न था। दिन-भर की कठिन यात्रा के बाद जब वह उस स्थान पर पहुंचे, तो संध्या हो गई थी। वहाँ बस्ती का नाम भी न था। दो-चार टूटे-फूटे झोंपड़े उस बस्ती के चिह्न-स्वरूप शेष रह गये थे। वह झोंपड़ा, जिसमें कभी प्रेम का

    प्रकाश था, जिसके नीचे उन्होंने जीवन के सुखमय दिन काटे थे, जो उनकी कामनाओं का आगार और उनकी उपासना का मन्दिर था, अब उनकी अभिलाषाओं की भाँति भग्न हो गया था! झोंपड़े की भग्नावस्था मूक-भाषा में अपनी करुण-कथा सुना रही थी। कुँअर उसे देखते ही "चन्दा-चन्दा!" पुकारता हुआ दौड़ा। उसने उस रज को माथे पर मला, मानो किसी देवता की विभूति हो और उसकी टूटी हुई दीवारों से चिमटकर बड़ी देर तक रोता रहा। हाय रे अभिलाषा! यह रोने ही के लिये इतनी दूर से आया था? रोने ही की अभिलाषा इतने दिनों से उसे विकल कर रही थी; पर इस रोदन में कितना स्वर्गीय आनन्द था। क्या समस्त संसार का सुख इन आँसुओं की तुलना कर सकता था?

    तब वह झोंपड़े से निकला। सामने मैदान में एक वृक्ष हरे-हरे नवीन पल्लवों को गोद में लिये, मानो उसका स्वागत करने को खड़ा था। यह वही पौधा है, जिसे आज से बीस वर्ष पहले दोनों ने आरोपित किया था। कुँअर उन्मत्त की भाँति दौड़ा और जाकर उस वृक्ष से लिपट गया, मानो कोई पिता अपने मातृ-हीन पुत्र को छाती से लगाये हुए हो। यह उसी प्रेम की निशानी है, उसी अक्षय प्रेम की, जो इतने दिनों के बाद आज इतना विशाल हो गया है। कुँअर का हृदय ऐसा फूल उठा, मानों इस वृक्ष को अपने अन्दर रख लेगा, जिसमें उसे हवा का झोंका भी न लगे। उसके एक-एक पल्लव पर चन्दा की स्मृति बैठी हुई थी। पक्षियों का इतना रम्य संगीत क्या कभी उसने सुना था! उसके हाथों में

    दम न था, सारी देह भूख-प्यास और थकन से शिथिल हो रही थी। पर, वह उस वृक्ष पर चढ़ गया, इतनी फुर्ती से चढ़ा कि बन्दर भी न चढ़ता। सबसे ऊँची फुनगी पर बैठकर उसने चारों ओर गर्व-पूर्ण दृष्टि डाली। यही उसकी कामनाओं का स्वर्ग था। सारा दृश्य चंदामय हो रहा था। दूर की नीली पर्वत-श्रेणियों पर चन्दा बैठी गा रही थी, आकाश में तैरनेवाली लालिमा-मयी नौकाओं पर चन्दा ही उड़ी जाती थी। सूर्य की श्वेत-पीत प्रकाश की रेखाओं पर चन्दा ही बैठी हँस रही थी। कुँअर के मन में आया, पक्षी होता तो इन्हीं डालियों पर बैठा हुआ जीवन के दिन पूरे करता।

    जब अँधेरा हो गया, तो कुँअर नीचे उतरा और उसी वृक्ष के नीचे थोड़ी-सी भूमि झाड़कर, पतियों को शय्या बनाई और लेटा। यही उसके जीवन का स्वर्ण-स्वप्न था, आह यही वैराग्य! अब वह इस वृक्ष की शरण छोड़कर कहीं न जायगा। दिल्ली के तख्त के लिए भी वह इस आश्रम को न छोड़ेगा।

    ( ६ )

    उसी स्निग्ध अमल चाँदनी में सहसा एक पक्षी आकर उस वृक्ष पर बैठा और दर्द में डूबे हुए स्वरों में गाने लगा। ऐसा जान पड़ा, मानो वह वृक्ष सिर धुन रहा है। वह नीरव रात्रि उस वेदना-मय संगीत से हिल उठी, कुँअर का हृदय इस तरह ऐंठने लगा, मानो वह फट जायगा। उस स्वर में करुणा और वियोग के तीर-से भरे हुए थे। आह! पक्षी, तेरा जोड़ा भी अवश्य बिछुड़

    गया है, नहीं तेरे राग में इतनी व्यथा, इतना विषाद, इतना रुदन कहाँ से आता! कुँअर के हृदय के टुकड़े हुए जाते थे, एक-एक स्वर तीर की भाँति दिल को छेदे डालता था। वहाँ बैठे न रह सके। उठकर एक आत्म-विस्मृत की दशा में दौड़े हुए झोंपड़े में गये, वहाँ से फिर वृक्ष के नीचे आए। उस पक्षी को कैसे पाएँ। कहीं दिखाई नहीं देता।

    पक्षी का गाना बन्द हुआ, तो कुँअर को नींद आ गई। उन्हें स्वप्न में ऐसा जान पड़ा कि वही पक्षी उनके समीप आया। कुँअर ने ध्यान से देखा, तो वह पक्षी न था, चन्दा थी, प्रत्यक्ष चन्दा थी।

    कुँअर ने पूछा—चन्दा यह पक्षी यहाँ कहाँ?

    चन्दा ने कहा—मैं ही तो वह पक्षी हूँ।

    कुँअर—तुम पक्षी हो! क्या तुम्हीं गा रही थीं?

    चन्दा—हाँ प्रियतम, मैं ही गा रही थी। इसी तरह रोते एक युग बीत गया।

    कुँअर—तुम्हारा घोंसला कहाँ है?

    चन्दा—उसी झोंपड़े में, जहाँ तुम्हारी खाट थी। उसी खाट के बान से मैंने अपना घोंसला बनाया है।

    कुँअर—और तुम्हारा जोड़ा कहाँ है?

    चन्दा—मैं अकेली हूँ। चन्दा को अपने प्रियतम के स्मरण करने में, उसके लिए रोने में, जो सुख है वह जोड़े में नहीं, मैं इसी तरह अकेली रहूँगी और अकेली मरूँगी।

    कुँअर—मैं क्या पक्षी नहीं हो सकता? चन्दा चली गई। कुँअर की नींद खुल गई। ऊषा की लालिमा आकाश पर छाई हुई थी और वह चिड़िया, कुँअर की शय्या के समीप एक डाल पर बैठी चहक रही थी। अब उस संगीत में करुणा न थी, विलाप न था, उसमें आनन्द था, चापल्य था, सारस्य था। वह वियोग का करुण-क्रन्दन न हों, मिलन का मधुर संगीत था।

    कुँवर सोचने लगे—इस स्वप्न का क्या रहस्य है?

    ( ७ )

    कुँवर ने शय्या से उठते ही एक झाडू बनाया और उस झोंपड़े को साफ करने लगे। उनके जीते-जी इसकी यह भग्न-दशा नहीं रह सकती। वह इसकी दीवारें उठाएँगे, इस पर छप्पर डालेंगे, इसे लीपेंगे। इनमें उनका चन्द स्मृति वास करती है। झोंपड़े के एक कोने में वह काँवर रक्खी हुई थी, जिस पर पानी ला-लाकर वह इस बृक्ष को सींचते थे। उन्होंने काँवर उठा ली और पानी लाने लगे। दो दिन से कुछ भोजन न किया था। रात को भूख लगी हुई थी; पर इस समय भोजन की बिलकुल इच्छा न थी। देह में एक अद्भुत स्फूर्ति का अनुभव होता था। उन्होंने नदी से पानी ला-ला मिट्टी भिगोना शुरु किया। दौड़े जाते थे और दौड़े आते थे। इतनी शक्ति उनमें कभी न थी।

    एक ही दिन में इतनी दीवार उठ गई, जितनी चार मज़दूर भी न उठा सकते थे। और कितनी सीधी, चिकनी दीवार थी कि कारीगर भी देखकर लज्जित हो जाता। प्रेम की शक्ति अपार है। सन्ध्या हो गई। चिड़ियों ने बसेरा लिया। वृक्षों ने भी आँखें बन्द की; मगर कुँवर को आराम कहाँ। तारों के मलिन प्रकाश में मिट्टी के रद्दे रक्खे जाते थे। हाय रे कामना! क्या तू इस बेचारे के प्राण ही लेकर छोड़ेगी?

    वृक्ष पर पक्षी का मधुर स्वर सुनाई दिया। कुँवर के हाथ से घड़ा छूट पड़ा। हाथ और पैरों में मिट्टी लपेटे वह वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए। उस स्वर में कितना लालित्य था, कितना उल्लास, कितनी ज्योति! मानव-संगीत इसके सामने बेसुरा आलाप था। उसमें यह जागृति, यह अमृत, यह जीवक कहाँ? संगीत के आनन्द में विस्मृति है; पर वह विस्मृति कितनी स्मृति-मय होती है, अतीत को जीवन और प्रकाश से रञ्जित करके प्रत्यक्ष कर देने की शक्ति, संगीत के सिवा और कहां है? कुँवर के हृदय-नेत्रों के सामने वह दृश्य आ खड़ा हुआ, जब चन्दा इसी पौधे को नदी से जल ला-लाकर सींचती थी। हाय, क्या वे दिन फिर आ सकते हैं!

    सहसा एक बटोही आकर खड़ा हो गया ओर कुँअर को देखकर प्रश्न करने लगा, जो साधारणत: दो अपरिचित प्राणियों में हुआ करते हैं-कौन हो, कहाँ से आते हो कहाँ जाओगे? पहले वह भी इसी गाँव में रहता था; पर जब गाँव उजड़ गया, तो समीप के एक दूसरे गाँव में जा बसा था। अब भी उसके खेत यहाँ थे। रात को जङ्गली पशुओं से अपने खेतों की रक्षा करने के लिए वह यहीं आकर सोता था। कुँवर ने पूछा-तुम्हें मालूम है, इस गाँव में एक कुबेरसिंह ठाकुर रहते थे?

    किसान ने बड़ी उत्सुकता से कहा-हाँ-हाँ भाई, जानता क्यों नहीं! बेचारे यहीं तो मारे गये। तुमसे क्या उसकी जान-पहचान थी?

    कुँअर हाँ, उन दिनों कभी-कभी आया करता था। मैं भी राजा की सेना में नौकर था। उनके घर में और कोई न था?

    किसान-अरे भाई कुछ न पूछो, बड़ी करुण-कथा है। उसकी स्त्री तो पहले ही मर चुकी थी। केवल लड़की बच रही थी। आह! कैसी सुशीला, कैसी सुघड़ वह लड़की थी! उसे देखकर आँखों में ज्योति आ जाती थी। बिलकुल स्वर्ग की देवी जान पड़ती थी। जब कुबेरसिंह जोता था, तभी कुँअर इन्द्रनाथ यहाँ भाग कर आये थे और उसके यहाँ रहे थे। उस लड़की की कुँअर से कहीं बात-चीत हो गई। जब कुँवर को शत्रुओं ने पकड़ लिया, तो चन्दा घर में अकेली रह गई। गाँववालों ने बहुत चाहा, कि उसका विवाह हो जाय। उसके लिए वरों का तोड़ा न था भाई, ऐसा कौन था, जो उसे पाकर अपने को धन्य न मानता; पर वह किसी से विवाह करने पर राजी न हुई। यह पेड़ जो तुम देख रहे हो, तब छोटा-सा पौधा था। इसके आस-पास फूलों की कई ओर क्यारियाँ थीं। इन्हीं को गोड़ने, निराने, सींचने में उसका दिन कटता था। बस, यह कहती, कि हमारे कुँअर साहब आते होंगे।

    कुँअर की आँखों से आंसू की वर्षा होने लगी। मुसाफिर ने

    ज़रा दम लेकर कहा-दिन-दिन घुलती जाती थी। तुम्हें विश्वास न आयेगा भाई, उसने दस साल इसी तरह काट दिये। इतनी दुर्बल हो गई थी, कि पहचानी न जाती थी; पर अब भी उसे कुँअर साहब के आने की आशा बनी हुई थी। आखिर एक दिन इसी वृक्ष के नीचे उसकी लाश मिली। ऐसा प्रेम कौन करेगा भाई! कुँअर न जाने मरे कि जिए, कभी उन्हें इस विरहिणी की याद भी आती है, कि नहीं; पर उसने तो प्रेम को ऐसा निभाया जैसा चाहिए।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों हृदय फटा जा रहा है। वह कलेजा थामकर बैठ गए। मुसाफिर के हाथ में एक सुलगता हुआ उपला था। उसने चिलम भरी और दो-चार दम लगाकर बोला- उसके मरने के बाद यह घर गिर गया। गांव पहले ही उजाड़ था। अब तो और भी सुनसान हो गया। दो-चार असामी यहाँ आ बैठते थे। अब तो चिड़िए का पूत भी यहाँ नहीं आता। उसके मरने के कई महीने के बाद, यही चिडिया इस पेड़ पर बोलती हुई सुनाई दी। तब से बराबर इसे यहाँ बोलते सुनता हूँ। रात को सभी चिड़ियाँ सो जाती हैं; पर यह रात भर बोलती रहती है। उसका जोड़ा कभी नहीं दिखाई दिया। बस, बस, फुट्टैल है। दिन-भर उसी झोंपड़े में पड़ी रहती है। रात को इस पेड़ पर आ बैठती है; मगर इस समय इसके गाने में कुछ और ही बात है, नहीं तो सुनकर रोना आता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई कलेजे को मसोस रहा हो। मैं तो कभी-कभी पड़े-पड़े रो दिया करता हूँ। सब लोग कहते हैं कि यह वही चन्दा है। अब भी कुँअर के वियोग में विलाप कर रही है । मुझे भी ऐसा ही जान पड़ता है। आज न-जाने क्यों मगन है।

    किसान तम्बाकू पीकर सो गया। कुँअर कुछ देर तक खोया हुआ-सा खड़ा रहा। फिर धीरे से बोला-चन्दा, क्या सचमुच तुम्ही हो? मेरे पास क्यों नहीं आती?

    एक क्षण में चिड़िया आकर उसके हाथ पर बैठ गई। चन्द्रमा के प्रकाश में कुँअर ने चिड़िया को देखा। ऐसा जान पड़ा, मानो उनकी आँखें खुल गई हों, मानों आँखों के सामने से कोई आवरण हट गया हो। पक्षी के रूप में भी चन्दा की मुखाकृति अंकित थी।

    दूसरे दिन किसान सोकर उठा, तो कुँअर की लाश पड़ी हुई थी।

    ( ८ )

    कुँअर अब नहीं हैं; किन्तु इनके झोंपड़े की दीवारें बन गई हैं, ऊपर फूस का नया छप्पर पड़ गया है और झोंपड़े के द्वार पर फूलों की कई क्यारियाँ लगी हुई हैं। गाँव के किसान इससे अधिक और क्या कर सकते थे।

    उस झोंपड़े में अब पक्षियों के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया है। दोनों साथ-साथ दाने-चारे की खोज में जाते हैं, साथ-साथ आते हैं। रात को दोनों उसी वृक्ष की डाल पर बैठे दिखाई देते हैं। उनका सुरम्य संगीत, रात की नीरवता में दूर तक सुनाई

    देता है। बन के जीव-जन्तु वह स्वर्गीय गान सुनकर मुग्ध हो जाते हैं।

    यह पक्षियों का जोड़ा कुँअर और चन्दा का जोड़ा है, इसमें किसी को सन्देह नहीं है।

    एक बार एक व्याध ने इन पक्षियों को फँसाना चाहा; पर गाँववालों ने उसे मारकर भगा दिया।

    ______

    (३) रानी सारन्धा

    (१)

    अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चकियाँ। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है, जिसको जङ्गली वृक्षों ने घेर रक्खा है। टीले के पूर्व की ओर एक छोटा-सा गाँव है । यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुन्देला सरदार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियाँ व्यतीत हो गई, बुन्देलखण्ड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ, मुसलमान आये और गये, बुन्देला राजा उठे और गिरे, कोई गाँव, कोई इलाका, ऐसा न था, जो इस दुर्व्यवस्थाओं से पीड़ित न हो; मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहराई और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।

    अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था। वह जमाना ही ऐसा था, जब मनुष्य-मात्र को अपने बाहु-बल और पराक्रम ही का भरोसा था। एक ओर मुसलमान सेनाए पैर जमाये खड़ी रहती थीं, दूसरी ओर बलवान् राजा अपने निर्बल भाइयों का गला घोटने पर तत्पर रहते थे। अनिरुद्धसिंह के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा, मगर सजीव, दल था। इससे वह अपने कुल और मर्यादा की रक्षा किया करता था। उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था। तीन वर्ष पहले उसका विवाह शीलता- देवी से हुआ; मगर अनिरुद्ध बिहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में। वह कितनी बार पति से अनुरोध कर चुकी थी, कितनी बार उसके पैरों पर गिरकर रोई थी, कि तुम मेरी आँखों से दूर न हो, मुझे हरिद्वार ले चलो मुझे तुम्हार साथ वन-वास अच्छा है, यह वियोग अब नहीं सहा जाता। उसने प्यार से कहा, जिद से कहा, विनय की; मगर अनिरुद्ध बुन्देला था। शीतला अपने किसी हथियार से उसे परास्त न कर सकी।

    ( २ )

    अँधेरी रात थी। सारी दुनिया सोती थी; मगर तारे आकाश में भागते थे। शीतलादेवी पलङ्ग पर पड़ी करवटें बदल रही थी ओर उसकी ननद सारन्धा फर्श पर बैठी हुई मधुर स्वर से गाती थी-

    बिन रघुबीर कटत नहीं रैन।

    शीतला ने कहा-जी न जलाओ। क्या तुम्हें भी नींद नहीं आती?

    सारन्धा-तुम्हें लोरी सुना रही हूँ।

    शीतला-मेरी आँखों से तो नींद लोप हो गई। सारन्धा—किसी को ढूँढ़ने गई होगी।

    इमने में द्वार खुला और एक गठे हुए बदन के रूपवान् पुरुष ने भीतर प्रवेश किया। यह अनिरुद्ध था। उसके कपड़े भीगे हुए थे, और बदन पर कोई हथियार न था। शीतला चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठ गई।

    सारन्धा ने पूछा—भैया, यह कपड़े भीगे क्यों हैं?

    अनिरुद्ध—नदी पैरकर आया हूँ।

    सारन्धा—हथियार क्या हुए?

    अनिरुद्ध—छिन गये।

    सारन्धा—और साथ के आदमी?

    अनिरुद्ध—सबने वीर गति पाई।

    शीतला ने दबी ज़बान से कहा—"ईश्वर ने ही कुशल किया…" मगर सारन्धा के तीवरों पर बल पड़ गये और मुखमण्डल गर्व से सतेज हो गया। बोली "भैया, तुमने कुल की मर्यादा खो दी। ऐसा कभी न हुआ था।"

    सारन्धा भाई पर जान देती थी। उसके मुंह से वह धिक्कार सुनकर अनिरुद्ध लज्जा और खेद से विकल हो गया। वह वीराग्नि जिसे क्षण भर के लिये अनुराग ने दबा दिया था, फिर ज्वलन्त हो गई। वह उल्टे पांव लौटा और यह कहकर बाहर चला गया कि "सारन्धा, तुमने मुझे सदैव के लिये सचेत कर दिया। यह बात मुझे कभी न भुलेगी।"

    अँधेरी रात थी। आकाश मण्डल में तारों का प्रकाश बहुत

    धुंधला था। अनिरुद्ध किले से बाहर निकला। पलभर में नदी के उस पार जा पहुँचा, और फिर अन्धकार में लुप्त हो गया। शीतला उसके पीछे-पीछे किले की दीवारों तक आई; मगर जब अनिरुद्ध छलाँग मारकर बाहर कूद पड़ा, तो वह विरहिणी एक चट्टान पर बैठकर रोने लगी।

    इतने में सारन्धा भी वहीं आ पहुँची। शीतला ने नागिन की तरह बल खाकर कहा—मर्यादा इतनी प्यारी है?

    सारन्धा—हाँ।

    शीतला—अपना पति होता, तो हृदय में छिपा लेती।

    सारन्धा—न, छाती में छुरी चुभा देती।

    शीतला ने ऐंठकर कहा—डोली में छिपाती फिरोगी, मेरी बात गिरह में बाँध लो।

    सारन्धा—जिस दिन ऐसा होगा, मैं भी अपना वचन पूरा कर दिखाऊँगी।

    इस घटना के तीन महीने पीछे अनिरुद्ध महरौना को जीत करके लौटा और साल-भर पीछे सारन्धा का विवाह ओरछा के राजा चम्पतराय से हो गया। मगर उस दिन की बातें दोनों महिलाओं के हृदय-स्थल में काँटे की तरह खटकती रहीं।

    ( ३ )

    राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुँदेला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उसने मुग़ल बादशाहों को कर देना बन्द कर

    दिया और अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगा। मुसलमानों की सेनायें बार-बार उस पर हमले करती थीं; पर हार कर लौट जाती थीं।

    यही समय था, जब अनिरुद्ध ने सारन्धा का चम्पतराय से विवाह कर दिया। सारन्धा ने मुँहमाँगी मुराद पाई। उसकी यह अभिलाषा कि मेरा पतिदेला जाति का कुल-तिलक हो, पूरी हुई। यद्यपि राजा के रनिवास में पाँच रानियाँ थीं, मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम हो गया कि वह देवी जो हृदय में मेरी पूजा करती है, सारन्धा है।

    परन्तु कुछ ऐसी घटनायें हुई कि चम्पतराय को मुगल-बादशाह का आश्रित होना पड़ा। वह अपना राज्य अपने भाई पहाड़सिंह को सौंपकर आप देहली को चला गया। यह शाहजहाँ के शासनकाल का अन्तिम भाग था। शाहजादा दारा शिकोह राजकीय कार्यों को सँभालते थे। युवराज की आँखों में शील था और चित्त में उदारता। उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथायें सुनी थीं, इसलिए उसका बहुत आदर-सम्मान किया, और कालपी की बहुमूल्य जागीर उसके भेंट की, जिसकी आमदनी नौ लाख थी। यह पहला अवसर था कि चम्मराय की आये-दिन की लड़ाई-झगड़े से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग-विलास का प्राबल्य हुआ। रात-दिन आमोद-प्रमोद की चर्चा रहने लगी। राजा विलास में डूबे, रानियाँ जड़ाऊ गहनों पर रीझी। मगर सारन्धा इन दिनों बहुत उदास और संकुचित रहती। वह इन रहस्यों से दूर-दूर रहती, ये नृत्य और गान की सभायें से सूनी प्रतीत होती। एक दिन चम्पतराय ने सारन्धा से कहा—सारन, तुम उदास क्यों रहती हो? मैं तुम्हें कभी हँसते नहीं देखता। क्या मुझसे नाराज हो?

    सारन्धा की आँखों में जल भर आया। बोली-स्वामी जी! आप क्यों ऐसा विचार करते है? जहाँ आप प्रसन्न हैं, वहाँ मैं भी खुश हूँ।

    चम्पतराय—मैं जब से यहाँ आया हूँ मैंने तुम्हारे मुख-कमल पर कभी मनोहारिणी मुसकिराहट नहीं देखी। तुमने कभी अपने हाथों से मुझे बीड़ा नहीं खिलाया। कभी मेरी पाग नहीं सँवारी कभी मेरे शरीर पर शस्त्र नहीं सजाये। कहीं प्रेमलता मुराझाने तो नहीं लगी?

    सारन्धा—प्राणनाथ! आप मुझसे ऐसी बाते पूछते हैं, जिसका उत्तर मेरे पास नहीं है! यथार्थ में इन दिनों मेरा चित्त कुछ उदास रहता है। मैं बहुत चाहती हूँ कि खुश रहूँ; मगर एक बोझा-सा हृदय पर धरा रहता है।

    चम्पतराय स्वयं आनन्द में मग्न थे। इसलिये उनके विचार में सारन्धा को असन्तुष्ट रहने का कोई उचित कारण नहीं हो सकता था। वे भौंहें सिकोड़कर बोले—मुझे तुम्हें उदास रहने का कोई विशेष कारण नहीं मालूम होता। ओरछे में कौन सा सुख था,जो यहाँ नहीं है? सारन्धा का चेहरा लाल हो गया। बोली—मैं कुछ कहूँ, आप नाराज तो न होंगे?

    चम्पतराय—नहीं, शौक से कहो। सारन्धा—ओरछा में मैं एक राजा की रानी थी। यहाँ मैं एक जागीरदार की चेरी हूँ। ओरछा में मैं वह थी जो अवध में कौशल्या थीं; परन्तु यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से काँपता था । रानी से चेरी होकर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महंगे दामों में मोल ली हैं।

    चम्पतराय के नेत्रों से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारन्धा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे माँ-बाप का बालक माँ को चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह ओरछा की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गई। उन्होंने आदर-युक्त अनुराग के साथ सारन्धा को हृदय से लगा लिया।

    आज से उन्हें फिर उसी उजड़ी बस्ती की फिक्र हुई, जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषायें खींच लाई थीं।

    (४)

    माँ अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जोती है। चम्पतराय के आने से बुन्देलखण्ड निहाल हो गया। ओरछा के भाग जागे। नौबतें झड़ने लगी, और फिर सारन्धा के कमल-नेत्रों में जातीय अभिमान का आभास दिखाई देने लगा।

    यहाँ रहते कई महीने बीत गये। इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा। शाहज़ादाओं में पहले से ईर्षा की अग्नि दहक रही थी। यह ख़बर सुनते ही ज्वाला प्रचण्ड हुई। संग्राम की तैयारियाँ

    होने लगीं। शाहज़ादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने-अपने दल सजाकर दक्खिन से चले। वर्षा के दिन थे। उर्बरा भूमि रंग-बिरंग के रूप भरकर अपने सौन्दर्य को दिखाती थी।

    मुराद और मुहीउद्दीन उमंगों से भरे हुए कदम बढ़ाते चले आते थे। यहाँ तक कि वे धौलपुर के निकट चम्बल के तट पर आ पहुँचे; परन्तु यहाँ उन्होने बादशाही सेना को अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया।

  • कुछ विचार

    कुछ विचार

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    कुछ विचार
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    उपन्यास

    उपन्यास की परिभाषा विद्वानों ने कई प्रकार से की है, लेकिन यह क़ायदा है कि जो चीज़ जितनी ही सरल होती है, उसकी परिभाषा उतनी ही मुश्किल होती है। कविता की परिभाषा आज तक नहीं हो सकी। जितने विद्वान हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं। किन्हीं दो विद्वानों की रायें नहीं मिलतीं। उपन्यास के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। इसकी कोई ऐसो परिभाषा नहीं हैं जिस पर सभी लोग सहमत हों।

    मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र-मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।

    किन्हीं भी दो आदमियों की सूरतें नहीं मिलतीं, उसी भाँति आद- मियों के चरित्र भी नहीं मिलते। जैसे सब आदमियों के हाथ, पाँव, आँखें, कान, नाक, मुँह होते हैं––पर उतनी समानता पर भी जिस तरह उनमें विभिन्नता मौजूद रहती है, उसी भाँति, सब आदमियों के चरित्र में भी बहुत कुछ समानता होते हुए कुछ विभिन्नताएँ होती हैं। यही चरित्र-सम्बन्धी समानता और विभिन्नता––अभिन्नत्व में भिन्नत्व और विभिन्नत्व में अभिन्नत्व, दिखाना उपन्यास का मुख्य कर्तव्य है।

    सन्तान-प्रेम मानव-चरित्र का एक व्यापक गुण है। ऐसा कौन प्राणी होगा जिसे अपनी सन्तान प्यारी न हो। लेकिन इस सन्तान-प्रेम की मात्राएँ हैं––उसके भेद हैं। कोई तो सन्तान के लिए मर मिटता है, उसके लिए कुछ छोड़ जाने के लिए आप नाना प्रकार के कष्ट झेलता है, लेकिन, धर्म-भीरुता के कारण अनुचित रीति से धन-संचय नहीं करता; उसे शंका होती है कि कहीं इसका परिणाम हमारी सन्तान के लिए बुरा न हो। कोई ऐसा होता है कि औचित्य का लेश-मात्र भी

    विचार नहीं करता––जिस तरह भी हो कुछ धन संचय कर जाना अपना ध्येय समझता है, चाहे इसके लिए उसे दूसरों का गला ही क्यों न काटना पड़े––वह सन्तान-प्रेम पर अपनी आत्मा को भी बलिदान कर देता है। एक तीसरा सन्तान-प्रेम वह है जहाँ सन्तान का चरित्र प्रधान कारण होता है––जब कि पिता सन्तान का कुचरित्र देखकर उससे उदासीन हो जाता है––उसके लिये कुछ छोड़ जाना या कर जाना व्यर्थ समझता है। अगर आप विचार करेंगे तो इसी सन्तान-प्रेम के अगणित भेद आपको मिलेंगे। इसी भाँति अन्य मानव-गुणों की भी मात्राएँ और भेद हैं। हमारा चरित्राध्ययन जितना ही सूक्ष्म––जितना ही विस्तृत होगा, उतनी सफलता से हम चरित्रों का चित्रण कर सकेंगे। सन्तान-प्रेम की एक दशा यह भी है जब पुत्र को कुमार्ग पर चलते देख कर पिता उसका घातक शत्रु हो जाता है। वह भी सन्तान-प्रेम ही है जब पिता के लिए पुत्र घी का लड्डू होता है, जिसका टेढ़ापन उसके स्वाद में बाधक नहीं होता। वह सन्तान-प्रेम भी देखने में आता है जहाँ शराबी, जुआरी पिता पुत्र-प्रेम के वशीभूत होकर ये सारी बुरी आदतें छोड़ देता है।

    अब यहाँ प्रश्न होता है उपन्यासकार को इन चरित्रों का अध्ययन करके उनको पाठक के सामने रख देना चाहिए––उसमें अपनी तरफ़ से काट-छाँट, कमी वेशी कुछ न करनी चाहिए, या किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये चरित्रों में कुछ परिवर्तन भी कर देना चाहिए?

    यहीं से उपन्यासों के दो गरोह हो गये हैं। एक आदर्शवादी, दूसरा यथार्थवादी।

    यथार्थवादी चरित्रों को पाठक के सामने उनके यथार्थ नग्न रूप में रख देता है। उसे इससे कुछ मतलब नहीं कि सच्चरित्रता का परिणाम बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा––उसके चरित्र अपनी कमज़ोरियाँ या ख़ुबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन-लीला समाप्त करते हैं। संसार में सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नहीं होता; बल्कि इसके विपरीत हुआ करता है––नेक आदमी धक्के खाते हैं, यातनाएँ सहते हैं, मुसीबतें झेलते हैं, अपमानित होते हैं,––उनको नेकी का फल उलटा मिलता है, बुरे आदमी चैन करते हैं, नामवर होते हैं, यशस्वी बनते हैं––उनको बदी का फल उलटा मिलता है। (प्रकृति का नियम विचित्र है!) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियों में जकड़ा होता है और चूँकि संसार में बुरे चरित्रों की ही प्रधानता है––यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र में भी कुछ न कुछ दाग़-धब्बे रहते हैं, इसलिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नज़र आने लगती है।

    इसमें सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिये यथार्थवाद अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं काला दिखायें जितना वह वास्तव में है। लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है। फिर मानव-स्वभाव की एक विशेषता यह भी है कि वह जिस छल और क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे संसार में उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले––वह भूल जाय कि मैं चिन्ताओं के बंधन में पड़ा हुआ हूँ; जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हों; जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल में ख्याल होता है कि जब हमें क़िस्से-कहानियों में भी उन्हीं लोगों से साबक़ा है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़े ही क्यों?

    अँधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा होती है कि किसी बाग़ में निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का आनंद उठायें।––इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते हैं, जो स्वार्थ और वासना से रहित होते हैं, जो साधु प्रकृति के होते हैं। यद्यपि ऐसे चरित्र व्यवहार-कुशल नहीं होते, उनकी सरलता उन्हें सांसारिक विषयों में धोखा देती है; लेकिन काँइएपन से ऊबे हुए प्राणियों को ऐसे सरल, ऐसे व्यावहारिक ज्ञान-विहीन चरित्रों के दर्शन से एक विशेष आनंद होता है।

    यथार्थवाद यदि हमारी आँखें खोल देता है,तो आदर्शवाद हमें उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुँचा देता है। लेकिन जहाँ आदर्शवाद में यह गुण है, वहाँ इस बात की भी शंका है कि हम ऐसे चरित्रों को न चित्रित कर बैठें जो सिद्धांतों की मूर्तिमात्र हो––जिनमें जीवन न हो। किसी देवता की कामना करना मुश्किल नहीं है, लेकिन उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।

    इसलिए वही उपन्यास उच्च कोटि के समझे जाते हैं, जहाँ यथार्थ और आदर्श का समावेश हो गया हो। उसे आप 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' कह सकते हैं। आदर्श को सजीव बनाने ही के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिये और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है। उपन्यासकार की सबसे बड़ी विभूति ऐसे चरित्रों की सृष्टि है, जो अपने सद्व्यवहार और सद्विचार से पाठक को मोहित कर ले। जिस उपन्यास के चरित्रों में यह गुण नहीं है वह दो कौड़ी का है।

    चरित्र को उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि वह निर्दोष हो––महान् से महान् पुरुषों में भी कुछ न कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं––चरित्र को सजीव बनाने के लिए उसकी कमज़ोरियों का दिग्दर्शन कराने से कोई हानि नहीं होती। बल्कि यही कमज़ोरियाँ उस चरित्र को मनुष्य बना देतो हैं। निर्दोष चरित्र तो देवता हो जायगा और हम उसे समझ ही न सकेंगे। ऐसे चरित्र का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। हमारे प्राचीन साहित्य पर आदर्श की छाप

    लगी हुई है। वह केवल मनोरंजन के लिए न था। उसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ आत्मपरिष्कार भी था। साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसख़रों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है।—कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिये। इस मनोरथ को सिद्ध करने के लिए ज़रूरत है कि उसके चरित्र positive हों, जो, प्रलोभनों के आगे सिर न झुकायें; बल्कि उनको परास्त करें; जो वासनाओं के पंजे में न फँसे; बल्कि उनका दमन करे; जो किसी विजयी सेनापति की भाँति शत्रुओं का संहार करके विजय-नाद करते हुए निकले। ऐसे ही चरित्रों का हमारे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

    साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाय। 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलम्बित हो; ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और विराग, दुःख और लज्जा––ये सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं, इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती।

    जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आज-कल परिस्थितियाँ इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नये-नये विचार पैदा हो रहे हैं, कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख ही नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियों का असर न पड़े—वह उनसे आन्दोलित न हो। यही कारण है कि आजकल भारतवर्ष के ही नहीं, यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान् भी अपनी रचना द्वारा किसी 'वाद' का प्रचार कर रहे हैं। वे इसकी परवा नहीं करते कि इससे हमारी रचना जीवित रहेगी या नहीं; अपने मत की पुष्टि करना ही उनका ध्येय है, इसके सिवाय उन्हें कोई इच्छा नहीं। मगर यह क्योंकर मान लिया जाय कि जो उपन्यास किसी विचार के प्रचार के लिए लिखा जाता है, उसका महत्त्व क्षणिक होता है? विक्टर ह्यगो का 'ला मिज़रेबुल', टालस्टाय के अनेक ग्रन्थ, डिकेन्स की कितनी ही रचनाएँ, विचार-प्रधान होते हुए उच्च कोटि की साहित्यिक हैं और अब तक उनका आकर्षण कम नहीं हुआ। आज भी शॉ, वल्स आदि बड़े-बड़े लेखकों के ग्रन्थ प्रचार ही के उद्देश्य से लिखे जा रहे हैं।

    हमारा ख्याल है कि क्यों न कुशल साहित्यकार कोई विचार-प्रधान रचना भी इतनी सुन्दरता से करे जिसमें मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों का संघर्ष निभता रहे? 'कला के लिए कला' का समय वह होता है जब देश सम्पन्न और सुखी हो। जब हम देखते हैं कि हम भाँति-भाँति के राजनीतिक और सामाजिक बंधनों में जकड़े हुए हैं, जिधर निगाह उठती है दुःख और दरिद्रता के भीषण दृश्य दिखाई देते हैं, विपत्ति का करुण क्रंदन सुनाई देता है, तो कैसे संभव है कि किसी विचारशील प्राणी का हृदय न दहल उठे? हाँ, उपन्यासकार को इसका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये कि उसके विचार परोक्ष रूप से व्यक्त हों, उपन्यास की स्वाभाविकता में उस विचार के समावेश से कोई विघ्न न पड़ने पाये; अन्यथा उपन्यास नीरस हो जायगा।

    डिफेंस इंग्लैंड का बहुत प्रसिद्ध उपन्यासकार हो चुका है। 'पिकविक पेपर्स' उसकी एक अमर हास्य-रस-प्रधान रचना है। 'पिकविक' का नाम एक शिकरम गाड़ी के मुसाफिरों की ज़ुबान से डिकेंस के कान में आया। बस, नाम के अनुरूप ही चरित्र, आकार, वेष—सबकी रचना हो गई। 'साइलस मार्नर' भी अँगरेज़ी का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। जार्ज इलियट ने, जो इसकी लेखिका हैं, लिखा है कि अपने बचपन में उन्होंने एक फेरी लगानेवाले जुलाहे को पीठ पर कपड़े के थान लादे हुए कई बार देखा था। वह तसवीर उनके हृदय-पट पर अङ्कित हो गई थी और समय पर इस उपन्यास के रूप में प्रकट हुई। 'स्कारलेट लेटर' भी हॅथर्न की बहुत ही सुंदर, मर्मस्पर्शिनी रचना है। इस पुस्तक का बीजांकुर उन्हें एक पुराने मुकदमे की मिसिल से मिला। भारतवर्ष में अभी उपन्यासकारों के जीवन-चरित्र लिखे नहीं गये, इसलिए भारतीय उपन्यास-साहित्य से कोई उदाहरण देना कठिन है। 'रङ्गभूमि' का बीजांकुर हमें एक अंधे भिखारी से मिला जो हमारे गाँव में रहता था। एक ज़रा-सा इशारा, एक ज़रा-सा बीज, लेखक के मस्तिष्क में पहुँचकर इतना विशाल वृक्ष बन जाता है कि लोग उस पर आश्चर्य करने लगते हैं। 'एम॰ ऐंड्रूज हिम' रडयार्ड किपलिंग की एक उत्कृष्ट काव्य-रचना है। किपलिंग साहब ने अपने एक नोट में लिखा है कि एक दिन एक इञ्जीनियर साहब ने रात को अपनी जीवन-कथा सुनाई थी। वही उस काव्य का आधार थी। एक और प्रसिद्ध उपन्यासकार का कथन है कि उसे अपने उपन्यासों के चरित्र अपने पड़ोसियों में मिले। वह घण्टों अपनी खिड़की के सामने बैठे लोगों को आते-जाते सूक्ष्म दृष्टि से देखा करते और उनकी बातों को ध्यान से सुना करते थे। 'जेन आयर' भी उपन्यास के प्रेमियों ने अवश्य पढ़ी होगी। दो लेखिकाओं में इस विषय पर बहस हो रही थी कि उपन्यास की नायिका रूपवती होनी चाहिये या नहीं। 'जेन आयर' की लेखिका ने कहा, 'मैं ऐसा उपन्यास लिखूँगी जिसकी नायिका रूपवती न होते हुए भी आकर्षक होगी।' इसका फल था 'जेन आयर।'

    बहुधा लेखकों को पुस्तकों से अपनी रचनाओं के लिए अंकुर मिल जाते हैं। हाल केन का नाम पाठकों ने सुना है। आपकी एक उत्तम रचना का हिन्दी अनुवाद हाल ही में 'अमरपुरी' के नाम से हुआ है। आप लिखते हैं कि मुझे बाइबिल से प्लाट मिलते हैं। 'मेटरलिंक' बेलजियम के जगद्विख्यात नाटककार हैं। उन्हें बेलजियम का शेक्सपियर कहते हैं। उनका 'मोमाबोन' नामक ड्रामा ब्राउनिंग की एक कविता से प्रेरित हुआ था और 'मेरी मैगडालीन' एक जर्मन ड्रामा से! शेक्सपियर के नाटकों का मूल स्थान खोज-खोजकर कितने ही विद्वानों ने 'डाक्टर' की उपाधि प्राप्त कर ली है। कितने वर्तमान औपन्यासिकों और नाटककारों ने शेक्सपियर से सहायता ली है, इसकी खोज करके भी कितने ही लोग 'डाक्टर' बन सकते हैं। 'तिलिस्म होशरुबा' फारसी का एक वृहत् पोथा है जिसके रचयिता अकबर के दरबार वाले फैज़ी कहे जाते हैं, हालाँकि हमें यह मानने में संदेह है। इस पोथे का उर्दू में भी अनुवाद हो गया है। कम से कम २०,००० पृष्ठों की पुस्तक होगी। स्व॰ बाबू देवकीनंदन खत्री ने 'चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता-संतति' का बीजांकुर 'तिलिस्म होशरुबा' से ही लिया होगा, ऐसा अनुमान होता है।

    संसार-साहित्य में कुछ ऐसी कथाएँ हैं जिन पर हज़ारों बरसों से लेखकगण आख्यायिकाएँ लिखते आये हैं और शायद हज़ारों वर्षों तक लिखते जायँगे। हमारी पौराणिक कथाओं पर न जाने कितने नाटक और कितनी कथाएँ रची गई हैं। यूरोप में भी यूनान की पौराणिक गाथा कवि-कल्पना के लिए अशेष आधार है। 'दो भाइयों की कथा', जिसका पता पहले मिश्र देश के तीन हज़ार वर्ष पुराने लेखों से मिला था, फ्रान्स से भारतवर्ष तक की एक दर्जन से अधिक प्रसिद्ध भाषाओं के साहित्य में समाविष्ट हो गई है। यहाँ तक कि बाइबिल में उस कथा की एक घटना ज्यों की त्यों मिलती है।

    किन्तु, यह समझना भूल होगी कि लेखकगण आलस्य या कल्पना-शक्ति के अभाव के कारण प्राचीन कथाओं का उपयोग करते हैं। बात यह है कि नये कथानक में वह रस, वह आकर्षण, नहीं होता जो पुराने कथानकों में पाया जाता है। हाँ, उनका कलेवर नवीन होना चाहिए। 'शकुंतला' पर यदि कोई उपन्यास लिखा जाय, तो वह कितना मर्मस्पर्शी होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं।

    रचना-शक्ति थोड़ी-बहुत सभी प्राणियों में रहती है। जो उसमें अभ्यस्त हो चुके हैं उन्हें तो फिर झिझक नहीं रहती—क़लम उठाया और लिखने लगे; लेकिन नये लेखकों को पहले कुछ लिखते समय ऐसी झिझक होती है मानो वे दरिया में कूदने जा रहे हों। बहुधा एक तुच्छ-सी घटना उनके मस्तिष्क पर प्रेरक का काम कर जाती है। किसीका नाम सुनकर, कोई स्वप्न देखकर, कोई चित्र देखकर, उनकी कल्पना जाग उठती है। किसी व्यक्ति पर किस प्रेरणा का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, यह उस व्यक्ति पर निर्भर है। किसी की कल्पना दृश्य विषयों से उभरती है, किसी की गंध से, किसी की श्रवण से,—किसी की नये, सुरम्य स्थान की सैर से इस विषय में यथेष्ट सहायता मिलती है। नदी के तट पर अकेले भ्रमण करने से बहुधा नई-नई कल्पनाएँ जाग्रत् होती हैं।

    ईश्वरदत्त शक्ति मुख्य वस्तु है। जब तक यह शक्ति न होगी उपदेश, शिक्षा, अभ्यास सभी निष्फल जायगा। मगर यह प्रकट कैसे हो कि किसमें यह शक्ति है, किसमें नहीं? कभी इसका सबूत मिलने में बरसों गुजर जाते हैं और बहुत परिश्रम नष्ट हो जाता है। अमेरिका के एक पत्र-संपादक ने इसकी परीक्षा करने का नया ढंग निकाला है। दल के दल युवकों में से कौन रत्न है और कौन पाषाण? वह एक काग़ज़ के टुकड़े पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम लिख देता है और उम्मेदवार को वह टुकड़ा देकर उस नाम के सम्बंध में ताबड़तोड़ प्रश्न करना शुरू करता है—उसके बालों का रंग क्या है? उसके कपड़े कैसे हैं? कहाँ रहती है? उसका बाप क्या काम करता है? जीवन में उसकी मुख्य अभिलाषा क्या है? आदि। यदि युवक महोदय ने इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर न दिये, तो उन्हें अयोग्य समझकर बिदा कर देता है। जिसकी निरीक्षण-शक्ति इतनी शिथिल हो, वह उसके विचार में उपन्यास-लेखक नहीं बन सकता। इस परीक्षा-विभाग में नवीनता तो अवश्य है; पर भ्रामकता की मात्रा भी कम नहीं है।

    लेखकों इन लिए एक नोटबुक का रहना बहुत आवश्यक है। यद्यपि इन पंक्तियों के लेखक ने कभी नोटबुक नहीं रखी; पर इसकी ज़रूरत को वह स्वीकार करता है। कोई नई चीज़, कोई अनोखी सूरत, कोई सुरम्य दृश्य देखकर नोटबुक में दर्ज कर लेने से बड़ा काम निकलता यूरोप में लेखकों के पास उस वक्त तक नोटबुक अवश्य रहती है

    जब तक उनका मस्तिष्क इस योग्य नहीं बनता कि हर एक प्रकार की चीज़ों को वे अलग-अलग ख़ानों में संगृहीत कर लें। बरसों के अभ्यास के बाद यह योग्यता प्राप्त हो जाती है इसमें सन्देह नहीं; लेकिन आरम्भकाल में तो नोटबुक का रखना परमावश्यक है। यदि लेखक चाहता है कि उसके दृश्य सजीव हों, उसके वर्णन स्वाभाविक हों, तो उसे अनिवार्यतः इससे काम लेना पड़ेगा। देेखिये, एक उपन्यासकार की नोटबुक का नमूना—

    'अगस्त २१, १२ बजे दिन, एक नौका पर एक आदमी, श्याम वर्ण, सुफेद बाल, आँखें तिरछी, पलकें भारी, ओठ ऊपर को उठे हुए और मोटे, मूँछे ऐंठी हुईं।

    'सितम्बर १, समुद्र का दृश्य, बादल श्याम और श्वेत, पानी में सूर्य का प्रतिविम्ब काला, हरा, चमकीला; लहरें फेनदार, उनका ऊपरी भाग उजला। लहरों का शोर, लहरों के छींटे से झाग उड़ती हुई।'

    उन्हीं महाशय से जब पूछा गया कि आपको कहानियों के प्लाट कहाँ मिलते हैं? तो आपने कहा, 'चारों तरफ।—अगर लेखक अपनी आँखें खुली रखे, तो उसे हवा में से भी कहानियाँ मिल सकती हैं। रेलगाड़ी में, नौकाओं पर, समाचार-पत्रों में, मनुष्य के वार्तालाप में और हज़ारों जगहों से सुन्दर कहानियाँ बनाई जा सकती हैं। कई सालों के अभ्यास के बाद देख-भाल स्वाभाविक हो जाती है, निगाह आप ही आप अपने मतलब की बात छाँट लेती है। दो साल हुए, मैं एक मित्र के साथ सैर करने गया। बातों ही बातों में यह चर्चा छिड़ गई कि यदि दो के सिवा संसार के और सब मनुष्य मार डाले जायँ तो क्या हो? इस अंकुर से मैंने कई सुन्दर कहानियाँ सोच निकाली।'

    इस विषय में तो उपन्यास-कला के सभी विशारद सहमत हैं कि उपन्यासों के लिए पुस्तकों से मसाला न लेकर जीवन ही से लेना चाहिये। वालटर बेसेंट अपनी 'उपन्यास-कला' नामक पुस्तक में लिखते हैं—

    'उपन्यासकार को अपनी सामग्री, आले पर रखी हुई पुस्तकों से

    नहीं, उन मनुष्यों के जीवन से लेनी चाहिए जो उसे नित्य ही चारों तरफ मिलते रहते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकांश लोग अपनी आँखों से काम नहीं लेते। कुछ लोगों को यह शंका भी होती है कि मनुष्यों में जितने अच्छे नमूने थे वे तो पूर्वकालीन लेखकों ने लिख डाले, अब हमारे लिए क्या बाक़ी रहा? यह सत्य है; लेकिन अगर पहले किसी ने बूढ़े कंजूस, उड़ाऊ युवक, जुआरी, शराबी, रंगीन युवती आदि का चित्रण किया है, तो क्या अब उसी वर्ग के दूसरे चरित्र नहीं मिल सकते? पुस्तकों में नये चरित्र न मिलें; पर जीवन में नवीनता का अभाव कभी नहीं रहा।'

    हेनरी जेम्स ने इस विषय में जो विचार प्रकट किये हैं, वह भी देखिये—

    'अगर किसी लेखक की बुद्धि कल्पना-कुशल है तो वह सूक्ष्मतम भावों से जीवन को व्यक्त कर देती है, वह वायु के स्पंदन को भी जीवन प्रदान कर सकती है। लेकिन कल्पना के लिए कुछ आधार अवश्य चाहिये। जिस तरुणी लेखिका ने कभी सैनिक छावनियाँ नहीं देखीं उससे यह कहने में कुछ भी अनौचित्य नहीं है कि आप सैनिक जीवन में हाथ न डालें। मैं एक अँग्रेज़ उपन्यासकार को जानता हूँ जिसने अपनी एक कहानी में फ्रान्स के प्रोटेस्टेंट युवकों के जीवन का अच्छा चित्र खींचा था। उस पर साहित्यिक संसार में बड़ी चर्चा रही। उससे लोगों ने पूछा—आपको इन समाज के निरीक्षण करने का ऐसा अवसर कहाँ मिला? (फ्रान्स रोमन कैथोलिक देश है और प्रोटेस्टेंट वहाँ साधारणतः नहीं दिखाई पड़ते।) मालूम हुआ कि उसने एक बार, केवल एक बार, कई प्रोटेस्टेंट युवकों को बैठे और बातें करते देखा था। बस, एक बार का देखना उसके लिए पारस हो गया। उसे वह आधार मिल गया जिस पर कल्पना अपना विशाल भवन निर्माण था ती है। उसमें वह ईश्वरदत्त शक्ति मौजूद थी जो एक इञ्च से एक योजन की ख़बर लाती है और जो शिल्पी के लिए बड़े महत्त्व की वस्तु है।'

    मिस्टर जी॰ के॰ चेस्टरटन जासूसी कहानियाँ लिखने में बड़े प्रवीण

    हैं। आपने ऐसी कहानियाँ लिखने का जो नियम बताया है वह बहुत शिक्षाप्रद है। हम उसका आशय लिखते हैं—

    'कहानी में जो रहस्य हो उसे कई भागों में बाँटना चाहिये। पहले छोटी-सी बात खुले, फिर उससे कुछ बड़ी और अंत में रहस्य खुल जाय। लेकिन हरएक भाग में कुछ न कुछ रहस्योंद्धाटन अवश्य होना चाहिये जिसमें पाठक की इच्छा सब-कुछ जानने के लिए बलवती होती चली जाय। इस प्रकार की कहानियों में इस बात का ध्यान रखना परमावश्यक है कि कहानी के अंत में रहस्य खोलने के लिए कोई नया चरित्र न लाया जाय। जासूसी कहानियों में यही सबसे बड़ा दोष है। रहस्य के खुलने में तभी मज़ा है जब कि वही चरित्र अपराधी सिद्ध हो जिस पर कोई भूलकर भी सन्देह न कर सकता था।'

    उपन्यास-कला में यह बात भी बड़े महत्त्व की है कि लेखक क्या लिखे और क्या छोड़ दे। पाठक कल्पनाशील होता है। इसलिए वह ऐसी बातें पढ़ना पसन्द नहीं करता जिनकी वह आसानी से कल्पना कर सकता है। वह यह नहीं चाहता कि लेखक सब-कुछ ख़ुद कह डाले और पाठक की कल्पना के लिए कुछ भी बाक़ी न छोड़े। वह कहानी का ख़ाका-मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल लेखक वही है जो यह अनुमान कर ले कि कौन-सी बात पाठक स्वयं सोच लेगा और कौन-सी बात उसे लिखकर स्पष्ट कर देनी चाहिये। कहानी या उपन्यास में पाठक की कल्पना के लिए जितनी ही अधिक सामग्री हो उतनी ही वह कहानी रोचक होगी। यदि लेखक आवश्यकता से कम बतलाता है तो कहानी आशयहीन हो जाती है, ज़्यादा बतलाता है तो कहानी में मज़ा नहीं आता। किसी चरित्र की रूपरेखा या किसी दृश्य को चित्रित करते समय हुलिया-नवीसी करने की ज़रूरत नहीं। दो-चार वाक्यों में मुख्य-मुख्य बातें कह देनी चाहियें। किसी दृश्य को तुरत देखकर उसका वर्णन करने से बहुत-सी अनावश्यक बातों के आ जाने की सम्भावना रहती है। कुछ दिनों के बाद अनावश्यक बातें आप ही आप मस्तिष्क से निकल जाती हैं, केवल मुख्य बातें स्मृति पर अंकित रह जाती हैं। तब उस दृश्य के वर्णन करने में अनावश्यक बातें न रहेंगी। आवश्यक और अनावश्यक कथन का एक उदाहरण देकर हम अपना आशय और स्पष्ट करना चाहते हैं—

    दो मित्र संध्या समय मिलते हैं। सुविधा के लिए हम उन्हें 'राम' और 'श्याम' कहेंगे।

    राम—गुड ईवनिंग श्याम, कहो आनन्द तो है?

    श्याम—हलो राम, तुम आज किधर भूल पड़े?

    राम—कहो क्या रङ्ग-ढंग है? तुम तो भले ईद के चाँद हो गये।

    श्याम—मैं तो ईद का चाँद न था, हाँ, आप गूलर के फूल भले ही हो गये।

    राम—चलते हो संगीतालय की तरफ?

    श्याम—हाँ चलो।

    लेखक यदि ऐसे बच्चों के लिए कहानी नहीं लिख रहा है जिन्हें अभिवादन की मोटी-मोटी बातें बताना ही उसका ध्येय है तो वह केवल इतना ही लिख देगा—

    'अभिवादन के पश्चात् दोनों मित्रों ने संगीतालय की राह ली।'

    उपन्यास का विषय

    उपन्यास का क्षेत्र, अपने विषय के लिहाज़ से, दूसरी ललित कलाओं से कही ज़्यादा विस्तृत है। 'वाल्टर बेसेंट' ने इस विषय पर शब्दों में विचार प्रकट किये हैं—

    'उपन्यास के विषय का विस्तार मानव-चरित्र से किसी क़दर कम नहीं है। उसका सम्बन्ध अपने चरित्रों के कर्म और विचार, उनका देवत्व और पशुत्व, उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से है। मनोभाव के विभिन्न रूप और भिन्न-भिन्न दशाओं में उनका विकास उपन्यास के मुख्य विषय हैं।'

    इसी विषय-विस्तार ने उपन्यास को संसार-साहित्य का प्रधान अंग बना दिया है। अगर आपको इतिहास से प्रेम है तो आप अपने उपन्यास में गहरे से गहरे ऐतिहासिक तत्त्वों का निरूपण कर सकते हैं। अगर आपको दर्शन से रुचि है, तो आप उपन्सास में महान दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन कर सकते हैं। अगर आप में कवित्व-शक्ति है तो उपन्यास में उसके लिए भी काफी गुञ्जाइश है। समाज, नीति, विज्ञान, पुरातत्त्व आदि सभी विषयों के लिए उपन्यास में स्थान है। यहाँ लेखक को अपनी क़लम का जौहर दिखाने का जितना अवसर मिल सकता है, उतना साहित्य के और किसी अंग में नहीं मिल सकता; लेकिन इसका यह आशय नहीं कि उपन्यासकार के लिए कोई बन्धन ही नहीं है। उपन्यास का विषय-विस्तार ही उपन्यासकार को बेड़ियों में जकड़ देता है। तंग सड़कों पर चलनेवालों के लिए अपने लक्ष्य पर पहुँचना उतना कठिन नहीं है, जितना एक लम्बे-चौड़े मार्गहीन मैदान में चलनेवालों के लिए।

    उपन्यासकार का प्रधान गुण उसकी सृजन-शक्ति है। अगर उसमें इसका अभाव है, तो वह अपने काम में भी सफल नहीं हो सकता। उसमें और चाहे जितने अभाव हों; पर कल्पना-शक्ति की प्रखरता अनिवार्य है। अगर उसमें यह शक्ति मौजूद है तो वह ऐसे कितने दृश्यों, दशाओं और मनोभावों का चित्रण कर सकता है जिनका उसे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। अगर इस शक्ति की कमी है, तो चाहे उसने कितना ही देशाटन क्यों न किया हो, वह कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसके अनुभव का क्षेत्र कितना ही विस्तृत क्यों न हो, उसकी रचना में सरसता नहीं आ सकती। ऐसे कितने ही लेखक हैं जिनमें मानव-चरित्र के रहस्यों का बहुत मनोरंजक सूक्ष्म और प्रभाव डालनेवाली शैली में बयान करने की शक्ति मौजूद है; लेकिन कल्पना की कमी के कारण वे अपने चरित्रों में जीवन का संचार नहीं कर सकते, जीती-जागती तसवीरें नहीं खींच सकते। उनकी रचनाओं को पढ़कर हमें यह ख्याल नहीं होता कि हम कोई सच्ची घटना देख रहे हैं।

    इसमें सन्देह नहीं कि उपन्यास की रचना-शैली सजीव और प्रभावोत्पादक होनी चाहिये; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम शब्दों का गोरखधन्धा रचकर पाठक को इस भ्रम में डाल दें कि इसमें ज़रूर कोई न कोई गूढ़ आशय है। जिस तरह किसी आदमी का ठाट-बाट देखकर हम उसकी वास्तविक स्थिति के विषय में ग़लत राय क़ायम कर लिया करते हैं, उसी तरह उपन्यासों के शाब्दिक आडम्बर देखकर भी हम ख़्याल करने लगते हैं कि कोई महत्त्व की बात छिपी हुई है। सम्भव है, ऐसे लेखक को थोड़ी देर के लिए यश मिल जाय; किन्तु जनता उन्हीं उपन्यासों को आदर का स्थान देती है जिनकी विशेषता उनकी गूढ़ता नहीं, उनकी सरलता होती है।

    उपन्यासकार को इसका अधिकार है कि वह अपनी कथा को घटना-वैचित्र्य से रोचक बनाये; लेकिन शर्त यह है कि प्रत्येक घटना असली ढाँचे से निकट सम्बन्ध रखती हो; इतना ही नहीं, बल्कि उसमें इस तरह घुल-मिल गई हो कि कथा का आवश्यक अंग बन जाय, अन्यथा उपन्यास की दशा उस घर की-सी हो जायगी जिसके हरएक हिस्से अलग-अलग हों। जब लेखक अपने मुख्य विषय से हटकर किसी दूसरे प्रश्न पर बहस करने लगता है तो वह पाठक के उस आनन्द में बाधक हो जाता है जो उसे कथा में आ रहा था। उपन्यास में वही घटनाएँ, वही विचार, लाना चाहिये जिनसे कथा का माधुर्य बढ़ जाय, जो प्लाट के विकास में सहायक हों अथवा चरित्रों के गुप्त मनोभावों का प्रदर्शन करते हों पुरानी कथाओं में लेखक का उद्देश्य घटना-वैचित्र्य दिखाना होता था; इसलिए वह एक कथा में कई उपकथाएँ मिलाकर अपना उद्देश्य पूरा करता था। साम्प्रतकालीन उपन्यासों में लेखक का उद्देश्य मनोभावों और चरित्र के रहस्यों का खोलना होता है; अतएव यह आवश्यक है कि वह अपने चरित्रों को सूक्ष्म दृष्टि से देखे, उसके चरित्रों का कोई भाग उसकी निगाह से न बचने पाये। ऐसे उपन्यास मै उपकथाओं की गुञ्जाइश नहीं होती।

    यह सच है कि संसार की प्रत्येक वस्तु उपन्यास का उपयुक्त विषय बन सकती है। प्रकृति का प्रत्येक रहस्य, मानव-जीवन का हरएक पहलू, जब किसी सुयोग्य लेखक की कलम से निकलता है तो वह साहित्य का रत्न बन जाता है। लेकिन इसके साथ ही विषय का महत्त्व और उसकी गहराई भी उपन्यास के सफल होने में बहुत सहायक होती है। यह ज़रूरी नहीं कि हमारे चरित्रनायक ऊँची श्रेणी के ही मनुष्य हों। हर्ष और शोक, प्रेम और अनुराग, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य-मात्र में व्यापक हैं। हमें केवल हृदय के उन तारों पर चोट लगानी चाहिये जिनकी झंकार से पाठकों के हृदय पर भी वैसा ही प्रभाव हो। सफल उपन्यासकार का सबसे बड़ा लक्षण है कि वह अपने पाठकों के हृदय में उन्हीं भावों को जागरित कर दे जो उसके पात्रों में हो। पाठक भूल जाय कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा है—उसके और पात्रों के बीच में आत्मीयता का भाव उत्पन्न हो जाय।

    मनुष्य की सहानुभूति साधारण स्थिति में तब तक जागरित नहीं होती जब तक कि उसके लिए उस पर विशेष रूप से आघात किया जाय। हमारे हृदय के अंतरतम भाव साधारण दशाओं में आन्दोलित नहीं होते। इसके लिए ऐसी घटनाओं की कल्पना करनी होती है जो हमारा दिल हिला दे, जो हमारे भावों की गहराई तक पहुँच जायँ। अगर किसी अबला की पराधीन दशा का अनुभव कराना हो तो इस घटना से ज़्यादा प्रभाव डालनेवाली और कौन घटना हो सकती है कि शकुन्तला राजा दुष्यंत के दरबार में आकर खड़ी होती है और राजा उसे न पहचानकर उसकी उपेक्षा करता है? खेद है कि आजकल के उपन्यासों में गहरे भावों को स्पर्श करने का बहुत कम मसाला रहता है। अधिकांश उपन्यास गहरे और प्रचण्ड भावों का प्रदर्शन नहीं करते। हम आये-दिन की साधारण बातों ही में उलझकर रह जाते हैं।

    इस विषय में अभी तक मतभेद है कि उपन्यास में मानवीय दुर्बलताओं और कुवासनाओं का, कमज़ोरियों और अपकीर्तियों का, विशद वर्णन वांछनीय है या नहीं; मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि जो लेखक अपने को इन्हीं विषयों में बाँध लेता है वह कभी उस कलाविद् की महानता को नहीं पा सकता जो जीवन-संग्राम में एक मनुष्य की आंतरिक दशा को, सत् और असत् के संघर्ष और अंत में सत्य की विजय को, मार्मिक ढंग से दर्शाता है। यथार्थवाद का यह आशय नहीं है कि हम अपनी दृष्टि को अंधकार की ओर ही केन्द्रित कर दें। अंधकार में मनुष्य को अंधकार के सिवा और सूझ ही क्या सकता है? बेशक, चुटकियाँ लेना, यहाँ तक कि नश्तर लगाना, भी कभी-कभी आवश्यक होता है; लेकिन दैहिक व्यथा चाहे नश्तर से दूर हो जाय, मानसिक व्यथा सहानुभूति और उदारता से ही शान्त हो सकती है। किसी को नीच समझकर हम उसे ऊँचा नहीं बना सकते; बल्कि उसे और नीचे गिरा देंगे। कायर यह कहने से बहादुर न हो जायगा कि 'तुम कायर हो।' हमें यह दिखाना पड़ेगा कि उसमें साहस, बल और धैर्य—सब कुछ है, केवल उसे जगाने की ज़रूरत है। साहित्य का सम्बन्ध सत्य और सुंदर से है, यह हमें न भूलना चाहिये।

    मगर आजकल कुकर्म, हत्या, चोरी, डाके से भरे हुए उपन्यासों को जैसे बाढ़-सी आ गई है। साहित्य के इतिहास में ऐसा कोई समय न था जब ऐसे कुरुचिपूर्ण उपन्यासों की इतनी भरमार रही हो। जासूसी के उपन्यासों में क्यों इतना आनंद आता है? क्या इसका कारण यह है कि पहले से अब लोग ज़्यादा पापासक्त हो गये हैं? जिस समय लोगों को यह दावा है कि मानव-समाज नैतिक और बौद्धिक उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ है, यह कौन स्वीकार करेगा कि हमारी समाज पतन की ओर जा रहा है? शायद, इसका यह कारण हो कि इस व्यावसायिक शांति के युग में ऐसी घटनाओं का अभाव हो गया है जो मनुष्य के कुतूहल-प्रेम को संतुष्ट कर सकें––जो उसमें सनसनी पैदा कर दें। या इसका यह कारण हो सकता है कि मनुष्य की धन-लिप्सा उपन्यास के चरित्रों को धन के लोभ से कुकर्म करते देखकर प्रसन्न होती है। ऐसे उपन्यासों में यही तो होता है कि कोई आदमी लोभ-वश किसी धनाढ्य पुरुष की हत्या कर डालता है, या उसे किसी संकट में फँसाकर उससे मनमानी रकम ऐंठ लेता है। फिर जासूस आते हैं, वकील आते हैं और मुजरिम गिरफ्तार होता है, उसे सज़ा मिलती है। ऐसी रुचि को प्रेम, अनुराग या उत्सर्ग की कथाओं में आनंद नहीं आ सकता। भारत में वह व्यावसायिक वृद्धि तो नहीं हुई; लेकिन ऐसे उपन्यासों की भरमार शुरू हो गई। अगर मेरा अनुमान ग़लत नहीं है तो ऐसे उपन्यासों की खपत इस देश में भी अधिक होती है। इस कुरुचि का परिणाम रूसी उपन्यास लेखक मैक्सिम गोर्की के शब्दों में ऐसे वातावरण का पैदा होना है जो कुकर्म की प्रवृत्ति को द्दढ़ करता है। इससे यह तो स्पष्ट ही है कि मनुष्य में पशु-वृत्तियाँ इतनी प्रबल होती जा रही हैं कि अब उसके हृदय में कोमल भावों के लिए स्थान ही नहीं रहा।

    उपन्यास के चरित्रों का चित्रण जितना ही स्पष्ट, गहरा और विकासपूर्ण होगा उतना ही पढ़नेवालों पर उसका असर पड़ेगा; और यह लेखक की रचना-शक्ति पर निर्भर है। जिस तरह किसी मनुष्य को देखते ही हम उसके मनोभावों से परिचित नहीं हो जाते, ज्यों-ज्यों हमारी घनिष्ठता उससे बढ़ती है, त्यों-त्यों उसके मनोरहस्य खुलते हैं, उसी तरह उपन्यास के चरित्र भी लेखक की कल्पना में पूर्ण रूप से नहीं आ जाते; बल्कि उनमें क्रमशः विकास होता जाता है। यह विकास इतने गुप्त—अस्पष्ट रूप से होता है कि पढ़नेवाले को किसी तबदीली का ज्ञान भी नहीं होता। अगर चरित्रों में किसी का विकास रुक जाय तो उसे उपन्यास से निकाल देना चाहिये, क्योंकि उपन्यास चरित्रों के विकास का ही विषय है। अगर उसमें विकास-दोष है, तो वह उपन्यास कमज़ोर हो जायगा। कोई चरित्र अंत में भी वैसा ही रहे जैसा वह पहले था—उसके बल-बुद्धि और भावों का विकास न हो, तो वह असफल चरित्र है।

    इस दृष्टि से जब हम हिन्दी के वर्तमान उपन्यासों को देखते हैं तो निराशा होती है। अधिकांश चरित्र ऐसे ही मिलेंगे जो काम तो बहुतेरे करते हैं; 'लेकिन जैसे जो काम वे आदि में करते, उसी तरह वही अंत में भी करते हैं।

    कोई उपन्यास शुरू करने के लिए यदि हम उन चरित्रों का एक मानसिक चित्र बना लिया करें तो फिर उनका विकास दिखाने में हमें सरलता होगी। यह कहने की भी ज़रूरत नहीं है, विकास परिस्थिति के अनुसार स्वाभाविक हो, अर्थात्—पाठक और लेखक दोनों इस विषय में सहमत हों। अगर पाठक का यह भाव हो कि इस दशा में ऐसा नहीं होना चाहिये था तो इसका यह आशय हो सकता है कि लेखक अपने चरित्र के अङ्कित करने में असफल रहा। चरित्रों में कुछ न कुछ विशेषता भी रहनी चाहिये। जिस तरह संसार में कोई दो व्यक्ति समान नहीं होते, उसी भाँति उपन्यास में भी न होना चाहिये। कुछ लोग तो बातचीत या शक्ल-सूरत से विशेषता उत्पन्न कर देते हैं; लेकिन असली अंतर तो वह है, जो चरित्रों में हो।

    उपन्यास में वार्तालाप जितना अधिक हो और लेखक की क़लम से जितना ही कम लिखा जाय, उतना ही उपन्यास सुंदर होगा। वार्तालाप केवल रस्मी नहीं होना चाहिये। प्रत्येक वाक्य को—जो किसी चरित्र के मुँह से निकले—उसके मनोभावों और चरित्र पर कुछ न कुछ प्रकाश डालना चाहिये। बातचीत का स्वाभाविक, परिस्थितियों के अनुकूल, सरल और सूक्ष्म होना ज़रूरी है। हमारे उपन्यासों में अकसर बातचीत भी उसी शैली में कराई जाती है मानो लेखक खुद लिख रहा हो। शिक्षित-समाज की भाषा तो सर्वत्र एक है, हाँ भिन्न-भिन्न जातियों की ज़ुबान पर उसका रूप कुछ न कुछ बदल जाता है। बंगाली, मारवाड़ी और ऐंग्लो इण्डियन भी कभी-कभी बहुत शुद्ध हिन्दी बोलते पाये जाते हैं; लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं; पर ग्रामीण बातचीत कभी-कभी हमें दुबिधा में डाल देती है। बिहार की ग्रामीण भाषा शायद दिल्ली के आसपास का आदमी समझ ही न सकेगा।

    वास्तव में कोई रचना रचयिता के मनोभावों का, उसके चरित्र का, उसके जीवनादर्श का, उसके दर्शन का आईना होती है। जिसके हृदय में देश की लगन है उसके चरित्र, घटनावली और परिस्थितियाँ सभी उसी रंग में रँगी हुई नज़र आयेंगी। लहरी आनंदी लेखकों के चरित्रों में भी अधिकांश चरित्र ऐसे ही होंगे जिन्हें जगत्-गति नहीं व्यापती। वे जासूसी, तिलिस्मी चीज़ें लिखा करते हैं। अगर लेखक आशावादी है तो उसकी रचना में आशावादिता छलकती रहेगी, अगर वह शोकवादी है तो, बहुत प्रयत्न करने पर भी, वह अपने चरित्रों को ज़िन्दादिल न बना सकेगा। 'आज़ाद-कथा' को उठा लीजिये, तुरंत मालूम हो जायगा कि लेखक हँसने-हँसानेवाला जीव है जो जीवन को गम्भीर विचार के योग्य नहीं समझता। जहाँ उसने समाज के प्रश्नों को उठाया है वहाँ शैली शिथिल हो गई है।

    जिस उपन्यास को समाप्त करने के बाद पाठक अपने अंदर उत्कर्ष का अनुभव करे, उसके सद्भाव जाग उठें, वही सफल उपन्यास है। जिसके भाव गहरे हैं, प्रखर हैं,—जो जीवन में बद्दू बनकर नहीं, बल्कि सवार बनकर चलता है, जो उद्योग करता है और विफल होता है, उठने की कोशिश करता है और गिरता है, जो वास्तविक जीवन की गहराइयों में डूबा है, जिसने ज़िन्दगी के ऊँच-नीच देखे हैं, सम्पत्ति और विपत्ति का सामना किया है, जिसकी ज़िन्दगी मखमली गद्दों पर

    ही नहीं गुज़रती, वही लेखक ऐसे उपन्यास रच सकता है जिनमें प्रकाश, जीवन और आनंद-प्रदान की सामर्थ्य होगी।

    उपन्यास के पाठकों की रुचि भी अब बदलती जा रही है। अब उन्हें केवल लेखक की कल्पनाओं से संतोष नहीं होता। कल्पना कुछ भी हो, कल्पना ही है। वह यथार्थ का स्थान नहीं ले सकती। भविष्य उन्हीं उपन्यासों का है जो अनुभूति पर खड़े हों।

    इसका आशय यह है कि भविष्य में उपन्यास में कल्पना कम, सत्य अधिक होगा; हमारे चरित्र कल्पित न होंगे, बल्कि व्यक्तियों के जीवन पर आधारित होंगे। किसी हद तक तो अब भी ऐसा होता है; पर बहुधा हम परिस्थितियों का ऐसा क्रम बाँधते हैं कि अंत स्वाभाविक होने पर भी वह होता है जो हम चाहते हैं। हम स्वाभाविकता का स्वाँग जितनी खूबसूरती से भर सके, उतने ही सफल होते हैं; लेकिन भविष्य में पाठक इस स्वाँग से संतुष्ट न होगा।

    यों कहना चाहिये कि भावी उपन्यास जीवन-चरित होगा, चाहे किसी बड़े आदमी का या छोटे आदमी का। उसकी छुटाई-बड़ाई का फ़ैसला उन कठिनाइयों से किया जायगा कि जिन पर उसने विजय पाई है। हाँ, वह चरित्र इस ढंग से लिखा जायगा कि उपन्यास मालूम हो। अभी हम झूठ को सच बनाकर दिखाना चाहते हैं, भविष्य में सच को झूठ बनाकर दिखाना होगा। किसी किसान का चरित्र हो, या किसी देश-भक्त का, या किसी बड़े आदमी का; पर उसका आधार यथार्थ पर होगा। तब यह काम उससे कठिन होगा जितना अब है; क्योंकि ऐसे बहुत कम लोग हैं, जिन्हें बहुत-से मनुष्यों को भीतर से जानने का गौरव प्राप्त हो।

    उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी

    यह बात सभी लोग मानते हैं कि राष्ट्र को दृढ़ और बलवान बनाने के लिए देश में सांस्कृतिक एकता का होना बहुत आवश्यक है। और किसी राष्ट्र की भाषा तथा लिपि इस सांस्कृतिक एकता का एक विशेष अङ्ग है। श्रीमती ख़लीदा अदीब ख़ानम ने अपने एक भाषण में कहा था कि तुर्की जाति और राष्ट्र की एकता तुर्की भाषा के कारण ही हुई है। और यह निश्चित बात है कि राष्ट्रीय भाषा के बिना किसी राष्ट्र के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं हो सकती। जब तक भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा न हो, तब तक वह राष्ट्रीयता का दावा नहीं कर सकता। सम्भव है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष एक राष्ट्र रहा हो; परन्तु बौद्धों के पतन के उपरान्त उसकी राष्ट्रीयता का भी अन्त हो गया था। यद्यपि देश में सांस्कृतिक एकता वर्तमान थी, तो भी भाषाओं के भेद ने देश को खण्ड-खण्ड करने का काम और भी सुगम कर दिया था। मुसलमानों के शासन काल में भी जो कुछ हुआ था, उसमें भिन्न-भिन्न प्रान्तों का राजनीतिक एकीकरण तो हो गया था, परन्तु उस समय भी देश में राष्ट्रीयता का अस्तित्व नहीं था। और सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता की भावना अपेक्षाकृत बहुत थोड़े दिनों से संसार में उत्पन्न हुई है और इसे उत्पन्न हुए लगभग दो सौ वर्षों से अधिक नहीं हुए। भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का आरम्भ अंगरेज़ी राज्य की स्थापना के साथ-साथ हुआ था। और उसी की दृढ़ता के साथ-साथ इसकी भी वृद्धि हो रही है। लेकिन इस समय राजनीतिक पराधीनता के अतिरिक्त देश के भिन्न-भिन्न अङ्गों और तत्त्वों में कोई ऐसा पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है जो उन्हें संघटित करके एक राष्ट्र का स्वरूप दे सके। यदि आज भारतवर्ष से अंगरेज़ी राज्य उठ जाय तो इन तत्त्वों में जो एकता इस समय दिखाई दे रही है, बहुत सम्भव है कि वह विभेद और विरोध का रूप धारण

    कर ले और भिन्न-भिन्न भाषाओं के आधार पर एक ऐसा नया संघटन उत्पन्न हो जाय जिसका एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध ही न हो। और फिर वही खींचातानी शुरू हो जाय जो अंगरेज़ों के यहाँ आने से पहले थी। अतः राष्ट्र के जीवन के लिए यह बात आवश्यक है कि देश में सांस्कृतिक एकता हो। और भाषा की एकता उस सांस्कृतिक एकता का प्रधान स्तम्भ है; इसलिए यह बात भी आवश्यक है कि भारतवर्ष की एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा हो जो देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बोली और समझी जाय। इसी बात का आवश्यक परिणाम यह होगा कि कुछ दिनों में राष्ट्रीय साहित्य की सृष्टि भी आरम्भ हो जायगी और एक ऐसा समय आयेगा, जब कि भिन्न-भिन्न जातियों और राष्ट्रों के साहित्यिक मण्डल में हिन्दुस्तानी भाषा भी बराबरी की हैसियत से शामिल होने के क़ाबिल हो जायगी।

    परन्तु प्रश्न तो यह है कि इस राष्ट्रीय भाषा का स्वरूप क्या हो? आज-कल भिन्न-भिन्न प्रान्तों में जो भाषाएँ प्रचलित हैं उसमें तो राष्ट्रीय-भाषा बनने की योग्यता नहीं, क्योंकि उनके कार्य और प्रचार का क्षेत्र परिमित है। केवल एक ही भाषा ऐसी है जो देश के एक बहुत बड़े भाग में बोली जाती है और उससे भी कहीं बड़े भाग में समझी जाती है। और उसी को राष्ट्रीय भाषा का पद दिया जा सकता है।

    परन्तु इस समय उस भाषा के तीन स्वरूप हैं—उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी। और अभी तक यह बात राष्ट्रीय-रूप से निश्चित नहीं की जा सकी है कि इनमें से कौन-सा स्वरूप ऐसा है जो देश में सबसे अधिक मान्य हो सकता है और जिसका प्रचार भी ज़्यादा आसानी से हो सकता है। तीनों ही स्वरूपों के पक्षपाती और समर्थक मौजूद हैं और उनमें खींचा-तानी हो रही है। यहाँ तक कि इस मत भेद को राजनीतिक स्वरूप दे दिया गया है और हम इस प्रश्न पर शान्त चित्त और शान्त मस्तिष्क से विचार करने के अयोग्य हो गये हैं।

    लेकिन इन सब रुकावटों के होते हुए भी यदि हम भारतीय राष्ट्रीयता के लक्ष्य तक पहुँचना और उसकी सिद्धि करना असम्भव

    समझकर हिम्मत न हार बैठें तो फिर हमारे लिए इस प्रश्न की किसी-न-किसी प्रकार मीमांसा करना आवश्यक हो जाता है।

    देश में ऐसे आदमियों की संख्या कम नहीं है जो उर्दू और हिन्दी की अलग-अलग और स्वतन्त्र उन्नति और विकास के मार्ग में बाधक नहीं होना चाहते। उन्होंने यह मान लिया है कि आरम्भ में इन दोनों के स्वरूपों में चाहे जो कुछ एकता और समानता रही हो, लेकिन फिर भी इस समय दोनों की दोनों जिस रास्ते पर जा रही हैं, उसे देखते हुए इन दोनों में मेल और एकता होना असम्भव ही है। प्रत्येक भाषा की एक प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है। उर्दू का फ़ारसी और अरबी के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध है। और हिन्दी का संस्कृत तथा प्राकृत के साथ उसी प्रकार का सम्बन्ध है। उनकी यह प्रवृत्ति हम किसी शक्ति से रोक नहीं सकते। फिर इन दोनों को आपस में मिलाने का प्रयत्न करके हम क्यों व्यर्थ इन दोनों को हानि पहुँचावें?

    यदि उर्दू और हिन्दी दोनों अपने आपको अपने जन्म-स्थान और प्रचार-क्षेत्र तक ही परिमित रखें तो हमें इनकी प्राकृतिक वृद्धि और विकास के सम्बन्ध में कोई आपत्ति न हो। बँगला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू और कन्नडी आदि प्रान्तीय भाषाओं के सम्बन्ध में हमें किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है। उन्हें अधिकार है कि वे अपने अन्दर चाहें जितनी संस्कृत, अरबी या लैटिन आदि भरती चलें। उन भाषाओं के लेखक आदि स्वयं ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं; परन्तु उर्दू और हिन्दी की बात इन सबसे अलग है। यहाँ तो दोनों ही भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा कहलाने का दावा करती हैं। परन्तु वे अपने व्यक्तिगत रूप में राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकीं और इसी लिए संयुक्त रूप में स्वयं ही उनका संयोग और मेल आरम्भ हो गया। और दोनों का यह सम्मिलित स्वरूप उत्पन्न हो गया जिसे हम बहुत ठीक तौर पर हिन्दुस्तानी ज़बान कहते हैं। वास्तविक बात तो यह है कि भारतवर्ष की राष्ट्रीय-भाषा न तो वह उर्दू ही हो सकती है जो अरबी और फारसी के अप्रचलित तथा अपरिचित शब्दों के भार

    से लदी रहती है और न वह हिन्दी ही हो सकती है जो संस्कृत के कठिन शब्दों से लदी हुई होती है। यदि इन दोनों भाषाओं के पक्षपाती और समर्थक आमने-सामने खड़े होकर अपनी साहित्यिक भाषाओं में बातें करें तो शायद एक दूसरे का कुछ भी मतलब न समझ सकें। हमारी राष्ट्रीय भाषा तो वही हो सकती है जिसका आधार सर्व-सामान्य-बोधगम्यता हो—जिसे सब लोग सहज में समझ सकें। वह इस बात की क्यों परवाह करने लगी कि अमुक शब्द इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिये कि वह फ़ारसी, अरबी अथवा संस्कृत का है? वह तो केवल यह मान-दण्ड अपने सामने रखती है कि जन-साधारण यह शब्द समझ सकते हैं वा नहीं। और जन-साधारण में हिन्दू, मुसलमान, पंजाबी, बंगाली, महाराष्ट्र और गुजराती सभी सम्मिलित हैं। यदि कोई शब्द या मुहाबरा या पारिभाषिक शब्द जन साधारण में प्रचलित है तो फिर वह इस बात की परवाह नहीं करती कि वह कहाँ से निकला है और कहाँ से आया है। और यही हिन्दुस्तानी है। और जिस प्रकार अंगरेज़ों की भाषा अंगरेज़ी, जापान की जापानी, ईरान की ईरानी और चीन की चीनी है, उसी प्रकार हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय भाषा को इसी तौर पर हिंदुस्तानी कहना केवल उचित ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। और अगर इस देश को हिंदुस्तान न कहकर केवल हिंद कहें तो इसकी भाषा को हिंदी कह सकते हैं। लेकिन यहाँ की भाषा को उर्दू तो किसी प्रकार कहा ही नहीं जा सकता, जब तक हम हिंदुस्तान को उर्दूस्तान न कहने लगें, जो अब किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है। प्राचीन काल के लोग यहाँ की भाषा को हिन्दी ही कहते थे। और खुसरो ने ख़ालिकबारी की रचना करके हिन्दुस्तानी की नींव रखी थी। इस ग्रंथ की रचना में कदाचित् उसका यही अभिप्राय होगा कि जन-साधारण की आवश्यकता के शब्द उन्हें दोनों ही रूपों में सिखलाये जायँ, जिसमें उन्हें अपने रोज़मर्रा के कामों में सहूलियत हो जाय। अभी तक इस बात का निर्णय नहीं हो सका है कि उर्दू की सृष्टि कब और कहाँ हुई थी। जो हो; परंतु भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा न तो उर्दू ही है और न हिन्दी;

    बल्कि वह हिन्दुस्तानी है जो सारे हिन्दुस्तान में समझी जाती है और उसके बहुत बड़े भाग में बोली जाती है। लेकिन फिर भी लिखी कहीं नहीं जाती। और यदि कोई लिखने का प्रयत्न करता है तो उर्दू और हिन्दी के साहित्यिज्ञ उसे टाट बाहर कर देते हैं। वास्तव में उर्दू और हिंदी की उन्नति में जो बात बाधक है, वह उनका वैशिष्ट्य प्रेम है। हम चाहे उर्दू लिखें और चाहे हिन्दी, जन-साधारण के लिए नहीं लिखते; बल्कि एक परिमित वर्ग के लिए लिखते हैं। और यही कारण है कि हमारी साहित्यिक रचनाएँ जन-साधारण को प्रिय नहीं होतीं। यह बात बिलकुल ठीक है कि किसी देश में भी लिखने और बोलने की भाषाएँ एक नहीं हुआ करतीं। जो अंग्रेजी हम किताबों और अखबारों में पढ़ते हैं, वह कहीं बोली नहीं जाती। पढ़े-लिखे लोग भी उस भाषा में बातचीत नहीं करते, जिस भाषा में ग्रन्थ और समाचार-पत्र आदि लिखे जाते हैं। और जन-साधारण की भाषा तो बिलकुल अलग ही होती है। इंग्लैंड के हर एक पढ़े-लिखे आदमी से यह आशा अवश्य की जाती है कि वह लिखी जानेवाली भाषा समझे और अवसर पड़ने पर उसका प्रयोग भी कर सके। यही बात हम हिन्दुस्तान में भी चाहते हैं।

    परंतु आज क्या परिस्थिति है? हमारे हिन्दीवाले इस बात पर तुले हुए हैं कि हम हिन्दी से भिन्न भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में किसी तरह घुसने ही न देंगे। उन्हें 'मनुष्य' से तो प्रेम है; परंतु 'आदमी' से पूरी-पूरी घृणा है। यद्यपि 'दरख़्वास्त' जन-साधारण में भली-भाँति प्रचलित है; परंतु फिर भी उनके यहाँ इसका प्रयोग वर्जित है। इसके स्थान पर वे 'प्रार्थना' पत्र ही लिखना चाहते हैं, यद्यपि जन-साधारण इसका मतलब बिलकुल ही नहीं समझता। 'इस्तीफ़ा' को वे किसी तरह मंजूर नहीं कर सकते और इसके स्थान पर वे 'त्याग-पत्र' रखना चाहते हैं। 'हवाई जहाज़' चाहे कितना ही सुबोध क्यों न हो, परंतु उन्हें 'वायु यान' की सैर ही पसन्द है। उर्दूवाले तो इस बात पर और भी अधिक लट्टू हैं। वे 'ख़ुदा' को तो मानते हैं, परंतु 'ईश्वर' को नहीं मानते। 'कुसूर' तो वे बहुत-से कर सकते हैं, परंतु 'अपराध' कभी

    नहीं कर सकते। 'ख़िदमत' तो उन्हें बहुत पसंद है, परंतु 'सेवा' उन्हें एक आँख भी नहीं भाती। इसी तरह हम लोगों ने उर्दू और हिन्दी के दो अलग-अलग कैम्प बना लिए हैं। और मजाल नहीं कि एक कैम्प का आदमी दूसरे कैम्प में पैर भी रख सके। इस दृष्टि से हिन्दी के मुक़ाबले में उर्दू में कहीं अधिक कड़ाई है। हिन्दुस्तानी इस चारदीवारी को तोड़कर दोनों में मेल-जोल पैदा कर देना चाहती है, जिसमें दोनों एक दूसरे के घर बिना किसी प्रकार के संकोच के आ-जा सकें; और वह भी सिर्फ़ मेहमान की हैसियत से नहीं, बल्कि घर के आदमी की तरह। 'गारमन डि टासी' के शब्दों में उर्दू और हिन्दी के बीच में कोई ऐसी विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती जहाँ एक को विशेष रूप से हिन्दी और दूसरी को उर्दू कहा जा सके। अंग्रेज़ी भाषा के भी अनेक रंग हैं। कहीं लैटिन और यूनानी शब्दों की अधिकता होती है, कहीं ऐंग्लो-सैक्सन शब्दों की। परंतु है दोनों ही अंग्रेज़ी। इसी प्रकार हिन्दी या उर्दू शब्दों के विभेद के कारण दो भिन्न-भिन्न भाषाएँ नहीं हो सकतीं। जो लोग भारतीय-राष्ट्रीयता का स्वप्न देखते हैं और जो इस सांस्कृतिक एकता को दृढ़ करना चाहते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे लोग हिन्दुस्तानी का निमन्त्रण ग्रहण करें जो कोई नई भाषा नहीं है; बल्कि उर्दू और हिंदी का राष्ट्रीय स्वरूप है।

    संयुक्त-प्रान्त के अपर प्राइमरी स्कूलों में चौथे दरजे तक इसी मिश्रित भाषा अर्थात् हिन्दुस्तानी की रीडरें पढ़ाई जाती हैं। केवल उनकी लिपि अलग होती है। उनकी भाषा में कोई अन्तर नहीं होता। इसमें शिक्षा-विभाग का उद्देश्य यह होगा कि इस प्रकार विद्यार्थियों में बचपन में ही हिन्दुस्तानी की नींव पड़ जायगी और वे उर्दू तथा हिन्दी के विशेष प्रचलित शब्दों से भली-भाँति परिचित हो जायँगे और उन्हीं का प्रयोग करने लगेंगे। इसमें दूसरा लाभ यह भी है कि एक ही शिक्षक शिक्षा दे सकता है। इस समय भी यही व्यवस्था प्रचलित है। लेकिन हिन्दी और उर्दू के पक्षपातियों की ओर से इसकी शिकायतें शुरू हो गई हैं कि इस मिश्रित भाषा को शिक्षा से विद्यार्थियों को कुछ भी

    साहित्यिक ज्ञान नहीं होने पाता और वे अपर प्राइमरी के बाद भी साधारण पुस्तकें तक नहीं समझते। इसी शिकायत को दूर करने के लिए इन रीडरों के अतिरिक्त अपर प्राइमरी दरजों के लिए एक साहित्यिक रीडर भी नियत हुई है। हमारे मासिक-पत्र, समाचार-पत्र और पुस्तकें आदि विशुद्ध हिन्दी में प्रकाशित होती हैं। इसलिए जब तक उर्दू पढ़नेवाले लड़कों के पास फ़ारसी और अरबी शब्दों का और हिन्दी पढ़नेवाले लड़कों के पास संस्कृत शब्दों का यथेष्ट भंडार न हो, तब तक वे उर्दू या हिन्दी की कोई पुस्तक नहीं समझ सकते। इस प्रकार बाल्यावस्था से ही हमारे यहाँ उर्दू और हिन्दी का विभेद आरम्भ हो जाता है। क्या इस विभेद को मिटाने का कोई उपाय नहीं है?

    जो लोग इस विभेद के पक्षपाती हैं, उनके पास अपने-अपने दावे की दलीलें और तर्क भी मौजूद हैं। उदाहरण के लिए विशुद्ध हिन्दी के पक्षपाती कहते हैं कि संस्कृत की ओर झुकने से हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान की दूसरी भाषाओं के पास पहुँच जाती है। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे बने-बनाये शब्द मिल जाते हैं; लिखावट में साहित्यिक रूप आ जाता है, आदि, आदि। इसी तरह उर्दू का झण्डा लेकर चलनेवाले कहते हैं कि फ़ारसी और अरबी की ओर झुकने से एशिया की दूसरी भाषाएँ, जैसे फ़ारसी और अरबी, उर्दू के पास आ जाती हैं। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे अरबी का विद्या-सम्बन्धी भांडार मिल जाता है, जिससे बढ़कर विद्या की भाषा और कोई नहीं है, और लेखन-शैली में गम्भीरता और शान आ जाती है, आदि, आदि। इसलिए क्यों न इन दोनों को अपने-अपने ढंग पर चलने दिया जाय और उन्हें आपस में मिलाकर क्यों दोनों के रास्तों में रुकावटें पैदा की जायँ? यदि सभी लोग इन तर्कों से सहमत हो जायँ, तो इसका अभिप्राय यही होगा कि हिन्दुस्तान में कभी राष्ट्रीय भाषा की सृष्टि न हो सकेगी। इसलिए हमें आवश्यक है कि जहाँ तक हो सके, हम इस प्रकार की धारणाओं को दूर करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करें जिससे हम दिन पर दिन राष्ट्रीय भाषा के और भी अधिक समीप

    पहुँचते जायँ; और सम्भव है कि दस-बीस वर्षों में हमारा स्वप्न यथार्थता में परिणत हो जाय।

    हिन्दुस्तान के हर एक सूबे में मुसलमानों की थोड़ी-बहुत संख्या मौजूद ही है। संयुक्त प्रान्त के सिवा और-और सूबों में मुसलमानों ने अपने-अपने सूबे की भाषा अपना ली है। बंगाल का मुसलमान बँगला बोलता और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मदरास का तमिल और पंजाब का पंजाबी आदि। यहाँ तक कि उसने अपने अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है। उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक और सांस्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्यप्रति के जीवन में उसे उर्दू की बिल्कुल आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि दूसरे-दूसरे सूबों के मुसलमान अपने-अपने सूबे की भाषा निस्संकोच भाव से सीख सकते हैं और उसे यहाँ तक अपनी भी बना सकते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों की भाषा में नाम को भी कोई भेद नहीं रह जाता, तो फिर संयुक्त प्रांत और पंजाब के मुसलमान क्यों हिन्दी से इतनी घृणा करते हैं? हमारे सूबे के देहातों में रहनेवाले मुसलमान प्रायः देहातियों की भाषा ही बोलते हैं। जो बहुत-से मुसलमान देहातों से आकर शहरों में आबाद हो गये हैं, वे भी अपने घरों में देहाती ज़बान ही बोलते हैं। बोल-चाल की हिन्दी समझने में न तो साधारण मुसलमानों को ही कोई कठिनता होती है और न बोल-चाल की उर्दू समझने में साधारण हिन्दुओं को ही। बोल-चाल की हिन्दी और उर्दू प्रायः एक-सी ही हैं। हिन्दी के जो शब्द साधारण पुस्तकों और समाचार-पत्रों में व्यवहृत होते हैं और कभी-कभी पण्डितों के भाषणों में भी आ जाते हैं, उनकी संख्या दो हज़ार से अधिक न होगी। इसी प्रकार फ़ारसी के साधारण शब्द भी इससे अधिक न होंगे। क्या उर्दू के वर्तमान कोषों में दो हज़ार हिन्दी शब्द और हिन्दी के कोषों में दो हज़ार उर्दू शब्द नहीं बढ़ाये जा सकते? और इस प्रकार हम एक मिश्रित कोष की सृष्टि नहीं कर सकते? क्या हमारी स्मरण-शक्ति पर यह भार असह्य होगा? हम अंगरेज़ी के

    असंख्य शब्द याद कर सकते हैं और वह भी केवल एक अस्थायी आवश्यकता की पूर्त्ति करने के लिए। तो फिर क्या हम एक स्थायी उद्देश्य की सिद्धि के लिए थोड़े-से शब्द भी याद नहीं कर सकते। उर्दू और हिन्दी भाषाओं में न तो अभी विस्तार ही है और न दृढ़ता। उनके शब्दों की संख्या परिमित है। प्रायः साधारण अभिप्राय प्रकट करने के लिए भी उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। शब्दों की इस वृद्धि से यह शिकायत दूर हो सकती है।

    भारतवर्ष की सभी भाषाएँ या तो प्रत्यक्ष रूप से और या अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत से निकली हैं। गुजराती, मराठी और बँगला की तो लिपियाँ भी देव-नागरी से मिलती-जुलती हैं। यद्यपि दक्षिणी भारत की भाषाओं की लिपियाँ बिल्कुल भिन्न हैं; परन्तु फिर भी उनमें संस्कृत शब्दों की बहुत अधिकता है। अरबी और फ़ारसी के शब्द भी सभी प्रांतीय भाषाओं में कुछ न कुछ मिलते हैं। परंतु उनमें संस्कृत शब्दों की उतनी अधिकता नहीं होती जितनी हिन्दी में होती है। इसलिए यह बात बिल्कुल ठीक है कि भारतवर्ष में ऐसी हिन्दी बहुत सहज में स्वीकृत और प्रचलित हो सकती है जिसमें संस्कृत के शब्द अधिक हों। दूसरे प्रांतों के मुसलमान भी ऐसी हिन्दी सहज में समझ सकते हैं; परंतु फ़ारसी और अरबी के शब्दों से लदी हुई उर्दू भाषा के लिए संयुक्त प्रांत और पंजाब के नगरों और क़स्बों तथा हैदराबाद के बड़े-बड़े शहरों के सिवा और कोई क्षेत्र नहीं। मुसलमान संख्या में अवश्य आठ करोड़ हैं; लेकिन उर्दू बोलनेवाले मुसलमान इसके एक चौथाई से अधिक न होंगे। ऐसी अवस्था में क्या उच्चकोटि की राष्ट्रीयता के विचार से इसकी आवश्यकता नहीं है कि उर्दू में कुछ आवश्यक सुधार और वृद्धि करके उसे हिन्दी के साथ मिला लिया जाय? और हिन्दी में भी इसी प्रकार की वृद्धि करके उसे उर्दू से मिला दिया जाय? और इस मिश्रित भाषा को इतना दृढ कर दिया जाय कि वह सारे भारतवर्ष में बोली-समझी जा सके? और हमारे लेखक जो कुछ लिखें, वह एक विशेष क्षेत्र के लिए न हो; बल्कि सारे भारतवर्ष के लिए हो? सिन्धी

  • कायाकल्प

    कायाकल्प

    Aproximadamente 248.859 palavras.

    कायाकल्प
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    दोपहर का समय था, पर चारों तरफ अंधेरा था। आकाश में तारे छिटके हुए थे। ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था मानो संसार से जीवन का लोप हो गया हो। हवा भी बन्द हो गयी थी। सूर्यग्रहण लगा हुआ था। त्रिवेणी के घाट पर यात्रियों की भीड़ थी—ऐसी भीड़ जिसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती। वे सभी हिन्दू, जिनके दिल में श्रद्धा और धर्म का अनुराग था, भारत के हर एक प्रान्त से इस महान् अवसर पर त्रिवेणी की पावन धारा में अपने पापों का विसर्जन करने के लिए आ पहुँचे थे, मानो उस अँधेरे में भक्ति और विश्वास ने अधर्म पर छापा मारने के लिए अपनी असंख्य सेना सजायी हो। लोग इतने उत्साह से त्रिवेणी के संकरे घाट की ओर गिरते-पड़ते लपके चले जाते थे कि यदि जल की शीतल धारा की जगह अग्नि का जलता हुआ कुण्ड होता, तो भी लोग उसमें कूदते हुए जरा भी न झिझकते!

    कितने आदमी कुचल गये, कितने डूब गये, कितने खो गये, कितने अपंग हो गये, इसका अनुमान करना कठिन है। धर्म का विकट संग्राम था। एक तो सूर्यग्रहण, उसपर यह असाधारण और अद्भुत प्राकृतिक छटा! सारा दृष्य धार्मिक वृत्तियों को जगानेवाला था। दोपहर को तारों का प्रकाश माया के परदे को फाड़कर आत्मा को आलोकित करता हुया मालूम होता था। वैज्ञानिकों की बात जाने दीजिए; पर जनता में न जाने कितने दिनों से यह विश्वास फैला हुया था कि तारागण दिन को कहीं किसी सागर में डूब जाते हैं। आज वही तारागण आखों के सामने चमक रहे थे। फिर भक्ति क्यों न जाग उठे! सद्वृत्तियाँ क्यों न आँखें खोल दें!

    घण्टे भर के बाद फिर प्रकाश होने लगा, तारागण फिर अदृश्य हो गये, सूर्य भगवान् की समाधि टूटने लगी।

    यात्रीगण अपने-अपने पापों की गठरियाँ त्रिवेणी में डाल-डालकर जाने लगे। सन्ध्या होते-होते घाट पर सन्नाटा छा गया। हाँ, कुछ घायल, कुछ अधमरे प्राणी जहाँ-तहाँ पड़े कराह रहे थे और ऊँचे करार से कुछ दूर एक नाली में पड़ी तीन-चार साल की एक लड़की चिल्ला-चिल्लाकर रो रही थी।

    सेवा समितियों के युवक, जो अब तक भीड़ सँभालने का विफल प्रयत्न कर रहे थे, अब डोलियाँ कंधों पर ले-लेकर घायलों और भूले-भटकों को खबर लेने या पहुँचे। सेवा और दया का कितना अनुपम दृश्य था!

    सहसा एक युवक के कानों में उस बालिका के रोने की आवाज पड़ी। अपने जयी से बोला-यशोदा, उधर कोई लड़का रो रहा है। यशोदा-हाँ, मालूम तो होता है। इन मूर्खों को कोई कैसे समझाये कि यहाँ बच्चों को लाने का काम नहीं। चलो, देखें।

    दोनों ने उधर जाकर देखा, तो एक बालिका नाली में पड़ी रो रही है। गोरा रङ्ग था, भरा हुआ शरीर, बड़ी बड़ी आँखें, गोरा मुखड़ा, सिर से पाँव तक गहनों से लदी हुई। किसी अच्छे घर की लड़की थी। रोते-रोते उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। इन दोनों युवकों को देखकर डरी और चिल्लाकर रो पड़ी। यशोदा ने उसे गोद में उठा लिया और प्यार करके बोले-बेटी, रो मत, हम तुझे तेरी अम्मा के घर पहुँचा देंगे। तुझी को खोज रहे थे। तेरे बाप का क्या नाम है?

    लड़की चुप तो हो गयी, पर संशय की दृष्टि से देख देख सिसक रही थी। इस प्रश्न का कोई उत्तर न दे सकी।

    यशोदा ने फिर चुमकारकर पूछा—बेटी, तेरा घर कहाँ है?

    लड़की ने कोई जवाब न दिया।

    यशोदा—अब बताओ महमूद, क्या करें?

    महमूद एक अमीर मुसलमान का लड़का था। यशोदानन्दन से उसकी बड़ी दोस्ती थी। उनके साथ यह भी सेवासमिति में दाखिल हो गया था। बोला-क्या बताऊँ? कैंप में ले चलो, शायद कुछ पता चले।

    यशोदा—अभागे जरा-जरा से बच्चों को लाते हैं और इतना भी नहीं करते कि उन्हें अपना नाम और पता तो याद करा दें।

    महमूद—क्यों बिटिया, तुम्हारे बाबूजी का क्या नाम है?

    लड़की ने धीरे से कहा—बाबूजी!

    महमूद—तुम्हारा घर इसी शहर में है या कहीं और?

    लड़की—मैं तो बाबूदी के साथ लेल पर आई थी!

    महमूद—तुम्हारे बाबूदी क्या करते हैं?

    लड़की—कुछ नहीं कलते।

    यशोदा—इस वक्त अगर इसका बाप मिल जाय, तो सच कहता हूँ, बिना मारे न छोडूँ! बचा गहने पहनाकर लाये थे, जाने कोई तमाशा देखने आये हों।

    महमूद—और मेरा जी चाहता है कि तुम्हें पीटूँ। मियाँ बीवी यहाँ आये तो बच्चे को किस पर छोड़ आते? घर में और कोई न हो तो?

    यशोदा—तो फिर उन्हीं को यहाँ आने की क्या जरूरत थी।

    महमूद—तुम atheist ( नास्तिक ) हो, तुम क्या जानो कि सच्चा मजहबी जोश किसे कहते हैं?

    यशोदा—ऐसे मजहबी जोश को दूर से ही सलाम करता हूँ। इस वक्त दोनों मियाँ-बीवी हाय हाय कर रहे होंगे।

    महमूद—कौन जाने, वे भी यहीं कुचल कुचला गये हों।

    लड़की ने साहस कर कहा—तुम हमें घल पहुँचा दोगे? बाबूदी तुमको पैछा देंगे।

    यशोदा—अच्छा बेटी, चलो तुम्हारे बाबूदी को खोजें।

    दोनों मित्र बालिका को लिये हुए कैम्प में आये; पर यहाँ कुछ पता न चला। तब दोनों उस तरफ गये जहाँ मैदान में बहुत से यात्री पड़े हुए थे। महमूद ने बालिका को कन्धे पर बैठा लिया और यशोदानन्दन चारों तरफ चिल्लाते फिरे—यह किसकी लड़की है? किसी की लड़की तो नहीं खो गयी? यह आवाजें सुनकर कितने ही यात्री 'हाँ-हाँ, कहाँ-कहाँ' करके दौड़े; पर लड़की को देखकर निराश लौट गये।

    चिराग जले तक दोनों मित्र घूमते रहे। नीचे-ऊपर, किले के आस-पास, रेल के स्टेशन पर, अलोपी देवी के मन्दिर की तरफ यात्री-ही-यात्री पड़े हुए थे; पर बालिका के माता-पिता का कहीं पता न चला। आखिर निराश होकर दोनों आदमी कैम्प लौट आये।

    दूसरे दिन समिति के और कई सेवकों ने फिर पता लगाना शुरू किया। दिन भर दौड़े, सारा प्रयाग छान मारा, सभी धर्मशालाओं की खाक छानी; पर कहीं पता न चला।

    तीसरे दिन समाचार-पत्रो में नोटिस दिया गया और दो दिन वहाँ और रहकर समिति आगरे लौट गयी। लड़की को भी अपने साथ लेती गयी। उसे आशा थी कि समाचार-पत्रों से शायद सफलता हो। जब समाचार-पत्रों से कुछ पता न चला तब विवश होकर कार्यकर्ताओं ने उसे वहाँ के अनाथालय में रख दिया। महाशय यशोदानन्दन ही उस अनाथालय के मैनेजर थे।

    २

    बनारस में महात्मा कबीर के चौरे के निकट मुंशी वज्रधरसिंह का मकान है। आप हैं तो राजपूत, पर अपने को 'मुंशी' लिखते और कहते हैं। 'मुन्शी' की उपाधि से आपको बहुत प्रेम है। 'ठाकुर' के साथ आपको गँवारपन का बोध होता है, इसलिए हम भी आपको मुन्शीजी कहेंगे। आप कई साल से सरकारी पेंशन पाते हैं। बहुत छोटे पद से तरक्की करते करते आपने अन्त मे तहसीलदारी का उच्च पद प्राप्त कर लिया था। यद्यपि आप उस महान् पद पर तीन मास से अधिक न रहे और उतने दिन भी केवल एवज पर रहे; पर आप अपने को 'साबिक तहसीलदार' लिखते थे और मुहल्लेवाले भी उन्हें खुश करने को 'तहसीलदार साहब' ही कहते थे। यह नाम सुनकर आप खुशी से अकड़ जाते है पर पेंशन केवल २५) मिलती थी; इसलिए तहसीलदार साहब को बाजार-हाट खुद ही करना पड़ता था। घर मे चार प्राणियों का खर्च था। एक लड़की थी, एक लड़का और स्त्री। लड़के का नाम चक्रधर था। वह इतना जहीन था कि पिता के पेन्शन के जमाने मे जब घर से किसी प्रकार की सहायता न मिल सकती थी, केवल अपने बुद्धि-बल से उसने एम० ए० की उपाधि प्राप्त कर ली थी। मुन्शीजीने पहले ही से सिफारिश पहुँचानी शुरू की थी। दरबारदारी की

    कला में वह निपुण थे। हुक्काम को सलाम करने का उन्हें मरज था । हाकिमों के दिये हुए सैकड़ों प्रशसा पत्र उनकी अतुल सम्पत्ति थे। उन्हें वह बङे गर्व से दूसरी का दिखाया करते थे। कोई नया हाकिम आये, उससे जरूर रब्त-जब्त कर लेते थे। हुक्काम ने चक्रधर का ख्याल करने के वादे भी किये थे, लेकिन जब परीक्षा का नतीजा निकला और मुन्शीजीने चक्रधर से कमिश्नर के यहाँ चलने को कहा, तो उन्हाने जाने से साफ इनकार किया।

    मुन्शीनीने त्योरी चढ़ाकर पूछा-क्यो ? क्या घर बैठे तुम्हे नोकरी मिल जायगी?

    चक्रघर मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।

    वज्रधर-~यह खब्त तुम्हें कब से सवार हुया ? नौकरी के सिवा और करोगे ही क्या?

    चक्रधर-मैं आजाद रहना चाहता हूँ।

    वज्रधर-आजाद रहना था, तो एम० ए० क्यो पास किया ?

    चक्रधर इसीलिए कि आजादी का महत्व समझूंँ।

    उस दिन से पिता और पुत्र में आये-दिन बमचख मचती रहती थी। मुंशीजा बुढापे में भी शौकीन आदमी थे। अच्छा सा खाने और अच्छा पहनने की इच्छा अभी तक बनी हुई थी। अब तक इसी खयाल से दिल को समझाते थे कि लइका नोकर हो जायगा तो मौज करेंगे।अब लड़के का रंग देखकर बार-बार झुँझलाते और उमे काम-चोर, घमण्डी, मूर्ख कहकर अपना गुस्सा उतारते रहते थे । अभी तुम्हें कुछ नहीं सूझती, जब मैं मर जाऊँगा तब सूझेगो । तब सिर पर हाथ रखकर रोओगे | लाख बार कह दिया-बेटा, यह जमाना खुशामद और सलामी का है। तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेंत भो न पूछेगा। तुम बैठे आजादी का मजा उठा रहे हो और तुम्हारे पीछेवाले वाजी मारे जाते हैं। वह जमाना लद गया, जब विद्वानो की कद्र थी, अब तो विद्वान् टके सेर मिलते है, कोई बात नहीं पूछता । जैसे और भी चीजें बनाने के कारखाने खुल गये हैं, उसी तरह विद्वानों के कारखान है, और उनकी संख्या हर साल बढती जाती है।

    चक्रधर पिता का अदब करते थे, उनका जवाब तो न देते, पर अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए उन्होंने जो मार्ग तय कर लिया था, उससे वह न हटते थे। उन्हें यह हास्यासद मालूम होता था कि आदमी केवल पेट पालने के लिए आधी उम्र पढ़ने में लगा दे। अगर पेट पालना ही जीवन का आदर्श हो, तो पढने का जरूरत ही क्या है। मजदूर एक अच्छर भी नहीं जानता, फिर भी वह अपना और अपने बाल बच्चों का पेट बड़े मजे से पाल लेता है । विद्या के साथ जीवन का आदर्श कुछ ऊँचा न हुआ, तो पढना व्यर्थ है। विद्या को जीविका का साधन बनाते उन्हें लज्जा आती थी। वह भूखों मर जाते, लेकिन नौकरी के लिए आवेदन पत्र लेकर कहीं न नाते । विद्याभ्यास के दिनों में भी वह सेवा कार्य में अग्रसर रहा करते थे अब तो इसके सिवा उन्हें और कुछ सूझता ही न था। दीनों की सेवा और ता में जो आनन्द और आत्मगौरव था, वह दफ्तर में बैठकर कलम घिसने कहांँ।

    इस प्रकार दो साल गुजर गये। मुशी वज्रधर ने समझा था, जब यह भूत इसके सर से उतर नायगा, शादी-व्याह की फिक्र होगी, तो आप-ही-आप नौकरी की तलाश पङेगा! जवानी का नशा बहुत दिन तक नहीं ठहरता । लेकिन जब दो साल जाने पर भी भूत के उतरने का कोई लक्षण न दिखायी दिया, तो एक उन्होंने चक्रधर को खूब फटकारा-दुनिया का दस्तूर है कि पहले अपने घर में जलाकर तब मसजिद में जलाते हैं। तुम अपने घर को अंधेरा रखकर मसजिद को रोशन करना चाहते हो। जो मनुष्य अपनों का पालन न कर सका, वह ख़ुदा की किस मुँह से मदद करेगा। मै बुढापे में खाने कपड़े को तरसू और अफसरो का कल्याण करते फिरो। मैंने तुम्हें पैदा किया, दूसरो ने नहीं, मैने तुम्हें पोसा, दूसरो ने नहीं, मैं गोद में लेकर हकीम वैद्यों के द्वार-द्वार दौड़ता फिरा, नहीं | तुम पर सबसे ज्यादा हक मेरा है, दूसरो का नहीं।

    चक्रधर अब पिता की इच्छा से मुँह न मोड़ सके। उन्हें अपने कॉलेज ही मे जगह मिल सकती थी। वहाँ सभी उनका आदर करते थे; लेकिन यह उन्हे न था। बस कोई ऐसा धन्धा चाहते थे, जिससे थोड़ी देर रोज काम करके अपने की मदद कर सके। एक घण्टे से अधिक समय न देना चाहते थे । सयोग से शपुर के दीवान ठाकुर हरिसेवकसिंह को अपनी लड़की को पढ़ाने के लिए सुयोग्य और सच्चरित्र अध्यापक को जरूरत पड़ी। उन्होंने कालेज के प्रधानाध्यापक को इस विषय म एक पत्र लिखा । वेतन ३०) मासिक तक रक्खा । कालेज का प्राध्यापक इतने वेतन पर राजी न हुआ । आखिर उन्होने चक्रधर को उस काम में लगा दिया। काम बड़ी जिम्मेदारी का था, किन्तु चक्रधर इतने सुशील, इतने परिश्रमी और इतने सयमी थे कि उन पर सत्रको पूरा विश्वास था।

    दूसरे दिन से चक्रधर ने लडकी को पढ़ाना शुरू कर दिया ।

    ३

    कई महीने बीत गये । चक्रधर महीने के अन्त में रुपए लाते और माता के हाथ रख देते। अपने लिए उन्हे रुपए की कोई जरूरत न थी। दो मोटे कुरतों पर काट देते थे। हाँ, पुस्तको से उन्हें रुचि यो; पर इसके लिए कॉलेज का पुस्तकालय खुला हुआ था, सेवा कार्य के लिए चन्दों से रुपये या जाते थे । मुंशी वज्रघर द भी कुछ सीधा हो गया । डरे कि इससे ज्यादा दबाऊँ, तो शायद यह भो हाथ से निकल जाय। समझ गये कि जब तक विवाह की बेङी पाँव मे न पड़ेगी यह महाशय काबू आयेंगे । वह बेङी बनवाने का विचार करने लगे।

    मनोरमा की उम्र अभी १३ वर्ष से अधिक न हो, लेकिन वक्रधर को उसे पढ़ाते हुए बड़ी झेप होती थी। वह यही प्रयत्न करते थे कि टाकुर साहेब की उपस्थिति ही में उसे पढायें। यदि कभी ठाकुर साहब कही चले नाते, तो चक्रधर को महान् संकट का सामना करना पड़ता था।

    एक दिन चक्रधर इसी सकट मे जा फँसे । ठाकुर माहब कही गये हुए थे। चक्रधर कुरसी पर बैठे, पर मनोरमा की ओर न ताककर द्वार की ओर ताक रहे थे, मानो वहाँ बैठते डरते हों। मनोरमा वाल्मीकीय रामायण पढ रही थी। उसने दो-तीन बार चक्रधर की और ताका, पर उन्हें द्वार की ओर ताकते देखकर फिर किताब देखने लगी। उसके मन में सीता के वनवास पर एक शङ्का हुई थी और वह इसका समाधान करना चाहती थी। चक्रधर ने द्वार की ओर ताकते हुए पूछा-चुप क्यों बैठी हो, आज का पाठ क्यों नहीं पढती ?

    मनोरमा-मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ, आज्ञा हो तो पूछूंँ ?

    चक्रधर ने कातर भाव से कहा- क्या बात है ?

    मनोरमा-रामचन्द्र ने सीताजी को घर से निकाला, तो वह चली क्यों गयी ?

    चक्रधर-और क्या करती ?

    मनोरमा-वह जाने से इनकार कर सकती थी। एक तो राज्य पर उनका अधिकार भी रामचन्द्र ही के समान था, दूसरे वह निर्दोष थी। अगर वह यह अन्याय न स्वीकार करतीं, तो क्या उन पर कोई आपत्ति हो सकती थी ?

    चक्रधर-हमारे यहाँ पुरुषों की आज्ञा मानना स्त्रियों का परम धर्म माना गया है। यदि सीताजी पति की आज्ञा न मानतीं, तो वह भारतीय सती के आदर्श से गिर जाती।

    मनोरमा यह तो मै जानती हूँ कि स्त्री को पुरुष की आज्ञा माननी चाहिए। लेकिन क्या सभी दशाओं में ? जब राजा से साधारण प्रजा न्याय का दावा कर सकती है, तो क्या उसकी स्त्री नहीं कर सकती ? जब गमचन्द्र ने सीता की परीक्षा ले ली थी. और अन्त:करण से उन्हें पवित्र समझते थे, तो केवल झूठी निन्दा से बचने के लिए उन्हें घर से निकाल देना कहाँ का न्याय था?

    चक्रधर-राज धर्म का आदर्श भी तो पालन करना था !

    मनोरमा-तो क्या दोनों प्राणी जानते थे कि हम संसार के लिए आदर्श खड़ा कर रहे हैं ? इससे तो यह सिद्ध होता है कि वे कोई अभिनय कर रहे थे। अगर आदर्श भी मान लें, तो यह ऐसा आदर्श है, जो सत्य की हत्या करके पाला गया है। यह आदर्श नहीं है, चरित्र की दुर्बलता है। मैं आपसे पूछती हूँ, आप रामचन्द्र की जगह होते, तो क्या आप भी सीता को घर से निकाल देते ?

    चक्रधर बड़े असमंस में पड़ गये। उनके मन में स्वयं यही शङ्का और लगभग इसी उम्र में पैदा हुई थी, पर वह इसका समाधान न कर सके थे। अब साफ साफ जवाब देने की जरूरत पड़ी, तो बगलें झॉकने लगे। मनोरमा ने उन्हें चुप देखकर फिर पूछा-क्या आप भी उन्हें घर से निकाल देते?

    चक्रधर-नहीं, मै तो शायद न निकालता ।

    मनोरमा-आप निन्दा की जरा भी परवा न करते ?

    चक्रघर-नहीं, मैं झूठी निन्दा की परवा न करता ।

    मनोरमा की आँखें खुशी से चमक उठीं, प्रफुल्लित होकर बोली-यही बात मेरे भी मन में थी। मैंने दादाजी से, भाई जी से, पण्डितजी से, लौंगी अम्मों से, भाभी से यही शङ्का की, पर सब लोग यही कहते थे कि रामचन्द्र तो भगवान् हैं, उनके विषय में कोई शङ्का हो ही नही सकती। आपने आज मेरे मन की बात कही । मैं जानती थी कि आप यही जवाब देंगे। इसीलिए मैने आपसे पूछा था । अब मै उन लोगो को खूब भाड़े हाथों लूँगी।

    उस दिन से मनोरमा को चक्रधर से कुछ स्नेह हो गया। पढ़ने-लिखने से उसे विशेष रुचि हो गयी, चक्रधर उसे जो काम करने को दे जाते, वह उसे अवश्य पूरा करती । पहले की भांति अब हीले-हवाले न करती । जब उनके पाने का समय होता, तो वह पहले ही से आकर बैठ जाती और उनका इन्तजार करती। अब उसे उनसे अपने मन के भाव प्रकट करते हुए संकोच न होता। वह जानती थी कि कम से कम यहाँ उनका निरादर न होगा, उनकी हसी न उड़ायी जायगी।

    ठाकुर हरिसेवकसिह की आदत थी कि पहले दो चार महीनो तक तो नौकरों का वेतन ठीक समय पर दे देते; पर ज्यों ज्यों नौकर पुराना होता जाता था, उन्हें उसके वेतन की याद भूलती जाती थी। उनके यहाँ कई नौकर ऐसे भी पड़े थे, जिन्होंने बरसों से अपने वेतन नहीं पाये थे । चक्रधर को भी इधर चार महीनों से कुछ न मिला था। न वह आप-ही-आप देते थे, न चक्रधर संकोचवश मांँगते थे। उधर घर मे रोज तकरार होती थी। मुशी वजधर बार बार तकाजे करते, झंझलाते-मॉगते क्यों नहीं ? क्या मुँह मे दही जमाया हुआ है, या काम नहीं करते ? लिहाज भले आदमी का किया जाता है । ऐसे लुच्चो का लिहाज नहीं किया जाता, जो मुफ्त मे काम कराना चाहते हैं । आखिर एक दिन चक्रधर ने विवश हो ठाकुर साहब को एक पुरजा लिखकर अपना वेतन मॉगा। ठाकुर साहब ने पुरजा लौटा दिया-व्यर्थ को लिखापढ़ी करने की उन्हें फुरसत न थी और कहा-उनको जो कुछ कहना हो खुद आकर कहें। चक्रधर शरमाते हुए गये और बहुत-कुछ शिष्टाचार के बाद रुपए मांगे । ठाकुर साहब हँसकर बोले-वाह बाबूजी, वाह ! आप भी अच्छे मौजी जीव है । चार महीनों से वेतन नहीं मिला और आपने एक बार भी न मॉगा। अब तो आपके पूरे १२०) हो गये। मेरा हाथ इस वक्त तंग है। जरा दस-पाँच दिन ठहरिए । आपको महीने महीने अपना वितन ले लेना चाहिए था। सोचिए, मुझे एक मुश्त देने में कितनी असुविधा होगी । खैर, जाइये दस पाँच दिन मे रुपये मिल जायेंगे । चक्रधर कुछ न कह सके । लौटे, तो मुँह पर घोर निराशा छायी हुई थी। आज दादाजी शायद जीता न छोड़ेंगे। इस ख्याल से उनका दिल काँपने लगा। मनोरमा ने उनका पुरजा अपने पिता के पास ले जाते हुए राह में पढ़ लिया था। उन्हें उदास देखकर पूछा-दादाजी ने आपसे क्या कहा !

    चक्रधर उसके सामने रुपये पैसे का जिक्र न करना चाहते थे । झेंपते हुए बोले- कुछ तो नहीं ।

    मनोरमा-आपको रुपए नहीं दिये ?

    चक्रधर का मुंह लाल हो गया। बोले-मिल जायँगे ।

    मनोरमा-आपको १२०) चाहिए न ?

    चक्रधर-इस वक्त कोई ऐसी जरूरत नहीं है ।

    मनोरमा-जरूरत न होती तो श्राप मांगते ही न । दादाजी से बड़ा ऐब है कि 'किसी के रुपये देते हुए उन्हें मोह लगता है। देखिए, मैं जाकर'

    चक्रधर ने रोककर कहा-नहीं नहीं, कोई जरूरत नहीं।

    मनोरमा ने न माना | तुरन्त घर मे गई और एक क्षण में पूरे रुपये लाकर मेज पर रख दिये, मानो कहीं गिने गिनाये रक्खे हुए थे।

    चक्रधर-तुमने ठाकुर साहब को व्यर्थ कष्ट दिया ।

    मनोरमा-मेने उन्हें कष्ट नहीं दिया। उनसे तो कहा भी नहीं। दादाजी किसी की जरूरत नहीं समझते। अगर अपने लिए कभी मोटर मॅगपानी हो तो तुरत मंगवा लेंगे, पहाड़ों पर जाना हो, तो तुरन्त चले जायेंगे, पर जिसके रुपए पाते हैं, उसको न देंगे।

    वह तो पढने बैठ गयी, लेकिन चक्रधर के सामने यह समस्या पड़ी कि रुपए लुंँ, या न लुँ। उन्होंने निश्चय किया कि न लेना चाहिए । पाठ हो चुकने पर यह उठ खड़े हुए और बिना रुपये लिये बाहर निकल आये । मनोरमा रुपये लिये हुए पीछे पीछे बरामदे तक आयी । बार-बार कहती रही- इसे आप लेते जाइए, जब दादाजा दें, तो मुझे लौटा दीजिएगा। पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गये।

    ४

    चक्रघर डरते हुए घर पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है; उसपर कालीन विछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उसपर बैठे हुए है। उनके सामने हो एक कुरसी पर मुशी वज्रधर बैठे फर्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था । चक्रधर के प्राण सूख गये । अनुमान से ताड़ गये कि यह महाशय वर की खोज में आये हैं । निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा, तो अनुमान सच्चा निकला | वोले-दादाजी ने इनसे क्या कहा ?

    निर्मला ने मुस्कराकर कहा-नानी क्यों मरी जाती है, क्या जन्म भर क्वारे ही‌

    रहोगे ! जाओ, बाहर बैठो; तुम्हारी तो बड़ी देर से जोहाई हो रही है। आज क्यों इतनी देर लगायी?

    चक्रधर-यह है कौन ?

    निर्मला-आगरे के कोई वकील है, मुंशी यशोदानन्दन !

    चक्रधर-मै तो घूमने जाता हूँ। जब यह यमदूत चला जायगा, तो आऊँगा।

    निर्मला-वाह रे शर्मीले ! तेरा-सा लड़का तो देखा ही नहीं। आ, जरा सिर में तेल डाल दूं, बाल न जाने कैसे बिखरे हुए हैं। साफ कपड़े पहनकर जरा देर के लिए बाहर जाकर बैठ ।

    चक्रधर-घर में भोजन भी है कि व्याह ही कर देने का जी चाहता है ? मैं कहे देता हूँ, विवाह न करूँगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय ।

    किन्तु स्नेहमयी माता कब सुननेवाली थी। उसने उन्हें जबरदस्ती पकडकर सिर में तेल डाल दिया सन्दूक से एक धुला हुआ कुरता निकाल लायी और यों पहनाने लगी, जैसे कोई बच्चे को पहनाये । चक्रधर ने गरदन फेर ली।

    निर्मला-मुझसे शरारत करेगा, तो मार बैठूँगी। इधर ला सिर ! क्या जन्म- भर छटे सॉड़ बने रहने का जी चाहता है ? क्या मुझसे मरते दम तक चूल्हा-चक्की कराता रहेगा ? कुछ दिनों तो बहू का सुख उठा लेने दे।

    चक्रधर-तुमसे कौन कहता है भोजन बनाने को ? मैं कल से बना दिया करूँगा। मंगला को क्यों छोड़ रखा है ?

    निर्मला- अब मैं मारनेवाली ही हूँ। आज तक कभी न मारा; पर आज पीट चलूँगी, नहीं तो जाकर चुपके से बाहर बैठ ।

    इतने में मुशीजी ने पुकारा-नन्हें, क्या कर रहे हो ? जरा यहाँ तो आओ।

    चक्रधर के रहे-साहे होश भी उड़ गये। बोले-जाता तो हुँ, लेकिन कहे देता हूँ, मैं यह जुआ गले मे न डालुगा । जीवन में मनुष्य का यही काम नहीं है कि विवाह कर ले, बच्चों का बाप बन जाय और कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर गृहस्थी मे जुत जाय।

    निर्मला-सारी दुनिया जो करती है, वही तुम्हें भी करना पड़ेगा | मनुष्य का जन्म होता ही किस लिए है ?

    चक्रधर-हजारों काम है।

    निर्मला-रुपए आज भी नहीं लाये क्या ? कैसे आदमी हैं कि चार-चार महीने हो गये, रुपए देने का नाम ही नहीं लेते ! जाकर अपने दादा को किसी बहाने से भेज दो। कहीं से जाकर रुपए लायें। कुछ दावत आवत का सामान करना ही पड़ेगा, नहीं तो कहेंगे कि नाम बड़े और दर्शन थोड़े।

    चक्रधर बाहर आये, तो मुंशी यशोदानन्दन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लगा लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए बोले–अब की 'सरस्वती' मे आपका लेख दे‌

    चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैमनस्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताये हैं, वे वहुत ही विचारपूर्ण हैं।

    इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयता-पूर्ण आलोचना ने चक्रधर को मोहित कर लिया। वह कुछ जवाब देना ही चाहते थे कि मुशी बज्रधर बोल उठे-आज बहुत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ बातचीत होने लगी क्या? (यशोदानन्दन से) राजा साहब की इनके ऊपर बड़ी कृपा है। बिलकुल लड़कों की तरह मानते हैं। इनकी बातें सुनने से उनका जी ही नहीं भरता। (नाई से) देख, चिलम बदल दे और जाकर झिनकू से कह दे, सितार वितार लेंकर थोड़ी देर के लिए यहाँ आ जाय। इधर ही से गणेश के घर जाकर कहना कि तहसीलदार साहब ने एक हाँड़ी अच्छा दही माँगा है। कह देना, दही खराव हुआ, तो दाम न मिलेंगे।

    यह हुक्म देकर मुशीजी घर मे चले गये। उधर की फ्रिक थी, पर मेहमान को छोड़कर न जा सकते थे। आज उनका ठाट बाट देखते ही बनता था। अपना अल्पकालीन तहसीलदारी के समय का आलपाके का चोंगा निकाला था उसी जमाने की मदील भी सिर पर थी। आँखों में सुरमा भी था, बालों में तेल भी, मानो उन्हीं का व्याह होनेवाला है। चक्रधर शरमा रहे थे कि यह महाशय इनके वेश पर दिल में क्या कहते होंगे। राजा साहब की बात सुनकर तो वह गड़-से गये।

    मुशीजी चले गये, तो यशोदानन्दन बोले— अब आपका क्या काम करने का इरादा है?

    चक्रधर— अभी तो कुछ निश्चय नहीं किया है, हाँ, यह इरादा है कि कुछ दिनों आजाद रहकर सेवा कार्य करूँँ।

    यशोदा— इससे बढकर क्या हो सकता है। आप जितने उत्साह से समिति को चला रहे हैं, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। आप-जैसे उत्साही युवकों का ऊँचे आदर्शों के साथ सेवा क्षेत्र में आना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्हीं गुणों ने मुझे आपकी ओर खींचा है। यह तो आपको मालूम ही होगा कि मैं किस इरादे से आया हूँ। अगर मुझे धन या जायदाद की परवा होती, तो यहाँ न आता! मेरी दृष्टि में चरित्र का जो मूल्य है, वह और किसी वस्तु का नहीं।

    चक्रधर ने ऑखें नीची करके कहा— लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता। मेरा विचार है कि गृहस्थी में फँसकर कोई तन मन से सेवा कार्य नहीं कर सकता।

    यशोदा— ऐसी बात तो नहीं। इस वक्त भी जितने आदमी सेवा कार्य कर रहे हैं, वे प्राय सभी बाल-बच्चोंवाले आदमी हैं।

    चक्रधर— इसी से तो सेवा कार्य इतना शिथिल है!

    यशोदा— मैं समझता हूँ कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक से हों, तो स्त्री पुरुष के कामो में वाधक होने के बदले सहायक हो सकती है। मेरी पुत्री कायाकल्प] १५

    का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप दोनों एक साथ रहकर सुखी होंगे। उसे कपड़े का शौक नहीं, गहने का शौक नहीं; अपनी हैसियत को बढ़ाकर दिखाने की धुन नहीं। आप के साथ वह मोटे-से-मोटे वस्त्र और मोटे-से-मोटे भोजन में सन्तुष्ट रहेगी। अगर आप इसे अत्युक्ति न समझें, तो मैं यहॉ तक कह सकता हूँ कि ईश्वर ने आपको उसके लिए बनाया है और उसको आपके लिए। सेवा-कार्य में वह हमेशा आपसे एक कदम आगे रहेगी। अँगरेजी, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत पढ़ी हुई है; घर के कामों में इतनी कुशल है कि मैं नही समझता, उसके बिना मेरी गृहस्थी कैसे चलेगी? मेरी दो बहुएँ हैं, लड़की की मा है; किन्तु सब-की-सब फूहड़; किसी में भी वह तमीज नहीं। रही शक्ल सूरत, वह भी आपको इस तसवीर से मालूम हो जायगी।

    यह कहकर यशोदानन्दन ने कहार से तसवीर मॅगवायी और चक्रधर के सामने रखते हुए बोले— मै तो इसमें कोई हरज नहीं समझता। लडके को क्या खबर है कि मुझे बहू कैसी मिलेगी। स्त्री मे कितने ही गुण हों, लेकिन यदि उसकी सूरत पुरुष को पसन्द न आयी, तो वह उसकी नजरो से गिर जाती है, और उनका दाम्पत्य-जीवन दुःखमय हो जाता है। मैं तो यहॉ तक कहता हूँ कि वर और कन्या में दो चार बार मुलाकात भी हो जानी चाहिए। कन्या के लिए तो वह अनिवार्य है। पुरुष को स्त्री पसन्द न आयी, तो वह और शादियाँ कर सकता है। स्त्री को पुरुष पसन्द न आया, तो उसकी सारी उम्र रोते ही गुजरेगी।

    चक्रधर के पेट में चूहे दौडने लगे कि तसवीर क्योंकर ध्यान से देखूँँ। वहाँ देखते शरम आती थी, मेहमान को अकेला छोडकर घर में न जाते बनता था। कई मिनठ तक तो सब्र किये बैठे रहे, लेकिन न रहा गया। पान की तश्तरी और तसवीर लिये हुए घर में चले आए। चाहते थे कि अपने कमरे में जाकर देखें कि निर्मला ने पूछा— क्या बातचीत हुई? कुछ देंगे दिलायेंगे कि वही ५१) वालो मे हैं?

    चक्रधर ने उग्र होकर कहा— अगर तुम मेरे सामने देने दिलाने का नाम लोगी तो जहर खा लूँगा।

    निर्मला— वाह रे! तो क्या पचीस बरस तक यों ही पाला-पोसा है क्या? मुँह घो रखें!

    चक्रधर— तो बाजार में खडा करके वेच क्यो नहीं लेती? देखो, कै टके मिलते हैं?

    निर्मला— तुम तो अभी से ससुर के पक्ष मे मुझसे लड़ने लगे। व्याह के नाम ही में कुछ जादू है क्या!

    इतने में चक्रधर को छोटी बहन मगला तश्तरी में पान रखकर उनको देने लगा तो कागज में लिपटी हुई तस्वीर उसे नजर आयी। उसने तस्वीर ले ली और लालटेन के सामने ले जाकर बोली— यह बहू की तस्वीर है। देखो, कितनी सुन्दर है! झिनकू—(यशोदानन्दन से) हुजूर को गाने का शौक मालूम होता है।

    यशोदा॰—अजी, जब था तब था। सितार वितार की दो-चार गतें बजा लेता था। अब सब छोड़-छाड़ दिया।

    झिनकू—कितना ही छोड़-छाड़ दिया है, लेकिन आजकल के नौसिखियों से अच्छे ही होंगे। अब की आप ही की हो।

    यशोदानन्दन ने भी दो-चार बार इनकार करने के बाद काफी की धुन में एक ठुमरी छेड़ दी। उनका गला मँजा हुया था, इस कला में निपुण थे, ऐसा मस्त है होकर गाया कि सुनने वाले झूम-झूम गये। उनकी सुरीली तान साज में मिल जाती थी। वज्रधर ने तो वाह-वाह का तार बाँध दिया। झिनकू के भी छक्के छुट गये। मजा यह कि साथ-ही-साथ सितार भी बजाते थे। आस पास के लोग आकर जमा हो गये। समाँ बँध गया। चक्रधर ने यह आवाज सुनी, तो दिल में कहा—यह महाशय भी उसी टुकरी के लोगों में है, उसी रंग में रँगे हुए। अब झेंप जाती रही। बाहर आकर बैठ गये।

    वज्रघर ने कहा—भाई साहब, आपने तो कमाल कर दिया। बहुत दिनों से ऐसा गाना न सुना था। कैसी रही, झिनकू?

    झिनकू—हुजूर, कुछ न पूछिए, सिर धुन रहा हूँ। मेरी तो अब गाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। आपने हम सबी का रंग फीका कर दिया। पुराने जमाने के रईसों की क्या बातें हैं।

    यशोदा॰—कभी-कभी जी बदला लिया करता हूँ, वह भी लुक छिपकर। लड़के सुनते हैं, तो कानों पर हाथ रख लेते हैं। मैं समझता हूँ, जिसमे यह रस नहीं, वह किसी सोहबत में बैठने लायक नहीं। क्यों बाबू चक्रधर, आपको तो शौक होगा?

    वज्रधर—जी, छू नहीं गया। बस, अपने लड़कों का हाल समझिए।

    चक्रधर ने झेंपते हुए कहा—मैं गाने को बुरा नहीं समझता। हाँ, इतना जरूर चाहता हूँ कि शरीफ लोग शरीफों ही में गायें बजायें।

    यशोदा॰—गुणियों की जात पात नहीं देखी जाती। हमने तो बरसों एक अन्धे फकीर की गुलामी की, तब जाके सितार बजाना आया।

    आधीरात के करीब गाना बन्द हुआ। लोगों ने भोजन किया। जब मुंशी यशोदानन्दन बाहर आकर बैठे, तो वज्रधर ने पूछा—आपसे कुछ बातचीत हुई?

    यशोदा—जी हाँ, हुई, लेकिन साफ नहीं खुले।

    वज्रधर—विवाह के नाम से चिढ़ता है।

    यशोदा॰—अब शायद राजी हो जायँ।

    वज्रघर—अजी, सैकड़ें आदमी आ-आकर लौट गये। कई आदमी तो दस दस हजार तक देने पर तैयार थे। एक साहब तो अपनी रियासत ही लिख देते थे, लेकिन इसने हामी न भरी। दोनों श्रादमी सोये। प्रातःकाल यशोदानन्दन ने चक्रवर से पूछा-क्यों बेटा, एक दिन के लिए मेरे साथ आगरे चलोगे ?

    चक्रधर -मुझे तो आप इस जजाल मे न फंसायें, तो वहुत अच्छा हो ।

    यशोदा० -तुम्हें मजाल में नहीं फँसाता वेटा, तुम्हें ऐसा सच्चा मन्त्री, ऐसा सच्चा सहायक और ऐसा सन्या मित्र दे रहा हूँ, जो तुम्हारे उद्देश्यों को पूरा करना अपने जीवन का मुख्य कर्त्तव्य समझेगी । मै स्वार्थवश ऐसा नहीं कह रहा हूँ। मै स्वय गरे की हिन्द-सभा का मन्त्री हूँ और सेवा कार्य का महत्व समझता हूँ। अगर मै समझता कि यह सम्बन्ध आपके काम में बाधक होगा, तो कभी आग्रह न करता । मैं चाहता हूँ कि आप एक बार अहल्या से मिल लें। यों तो मैं मन से आपको अपना दामाद बना चका, पर अहल्या की अनुमति ले लेनी आवश्यक समझता हूँ। आप भी शायद यह पसन्द न करेंगे कि मैं इस विषय में स्वेच्छा से काम लूँ। आप शरमायें नहीं, यों समझ लीजिए कि आप मेरे दामाद हो चुके; केवल मेरे साथ सैर करने चल रहे है। आपको देखकर आपकी सास, साले सभी खुश होगे।

    चक्रधर बडे सकटा में पड़े। सिद्धान्त-रूप से वह विवाह के विषय में स्त्रियों को पूरी स्वाधीनता देने के पान में थे; पर इस समय प्रागरे जाते हुए उन्हें बढ़ा सकोच हो रहा था । कहीं उसकी इच्छा न हुई तो ? कौन बड़ा सजीला जवान हूँ, बात चीत करने में भी तो चतुर नही, और उसके सामने तो शायद मेरा मुँह ही न खुले । यही उसने मन फीका कर लिया, तो मेरे लिए डूब मरने की जगह होगी। फिर कपड़े लते भी नहीं है, बस, यही दो कुरतों को पूँजी है । बहुत हैस-वैस के बाद बोले-पापसे सच कहता हूँ, मैं अपने को ऐसी . ऐसी सुयोग्य स्त्री के योग्य नहीं समझता।

    यशोदा०-इन हीलों से मैं पापका दामन छोड़नेवाला नही हूँ। मैं आपके मनोभावों को समझ रहा हूँ। आप सकोच के कारण ऐसा कह रहे हैं; पर ग्रहल्या उन चचल लड़कियों में नहीं है, जिसके सामने जाते हुए आपको शरमाना पड़े। आप उसकी सरलता देखकर प्रसन्न होंगे। हाँ, मैं इतना कर सकता हूँ कि आपकी ख़ातिर से पहले यह कहूँ कि आप परदेशी आदमी है, यहाँ सैर करने आये हैं । स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे। मैंने समझा, सीधे आदमी है, होटल मे लुट जायँगे, साथ लेता अाया । क्यो, कैसी रहेगी?

    चक्रधर ने अपनी प्रसन्नता को छिपाकर कहा- क्या यह नहीं हो सकता कि मै और किसी समय आ जाऊँ ?

    यशोदा०-नहीं, मै इस काम मे विलम्ब नहीं करना चाहता। में तो उसी को लाकर दो चार दिन के लिए यहाँ ठहरा सकता हूँ, पर शायद अापक घर के लोग यह पसन्द न करेंगे।

    चक्रवर ने सोचा-अगर मैने और ज्यादा टालमटोल की, तो कही यह महाशय सचमुच ही अहल्या को यहाँ न पहुंचा दें। तब तो सारा परदा ही खुल जायगा ! घर की दशा देखकर अवश्य ही उसका दिल फिर जायगा। एक तो जरा-सा घर, कहीं बैठने की जगह नही, उसपर न कोई साज, न सामान । विवाह हो जाने के बाद दूसरी बात हो जाती है। लड़की कितने ही बड़े घराने की हो, समझ लेती है, अब तो यही मेरा घर है-अच्छा हो या बुरा। दो चार दिन अपनी तक्दीर को रोकर शान्त हो जाती है । बोले-जी हाँ, यह मुनासिब नहीं मालूम होता । मैं ही चला चलूँगा।

    घर में विद्या का प्रचार होने से प्रायः सभी प्राणी कुछ न कुछ उदार हो जाते है। निर्मला तो खुशी से राजी हो गयी। हाँ, मुन्शी वज्रघर को कुछ सकोच हुअा, लेकिन यह समझकर कि यह महाशय लड़के पर लट्टू हो रहे हैं, कोई अच्छी रकम दे मरेगे, उन्होंने भी कोई आपत्ति न की। अब केवल ठाकुर हरिसेवकसिह को सूचना देनी थी। चक्रधर यों तीसरे पहर पढाने जाया करते थे, पर श्रान ६ बजते-बजते ना पहुंचे।

    ठाकुर साहब इस वक्त अपनी प्राणेश्वरी लौंगी से कुछ बातें कर रहे थे। मनोरमा की माता का देहान्त हो चुका था। लौंगी उस वक्त लौडी थी। उसने इतनी कुशलता से घर सँभाला कि ठाकुर साब उसपर रीझ गये और उसे गृहिणी के रिक्त स्थान पर अभिषिक्त कर दिया । नाम और गुण मे इतना प्रत्यक्ष विरोध बहुत कम होगा। लोग कहते हैं, पहले वह इतनी दुबली थी कि फूक टो तो उड़ जाय, पर गृहिणी.का पद पाते ही उसकी प्रतिमा स्थूल रूप धारण करने लगी।

    क्षीण जलधारा बरसात की नदी की भाँति बढ़ने लगी और इस समय तो स्थूल प्रतिमा की विशाल मूति थी, अचल और अपार । बरसाती नदी का जल गढ़हो और.गढ़हियों में भर गया था। बस, जल ही जल दिखायी देता था। न आँखों का पता या, न नाक का, न मुँह का, सभी जगह स्थूलता व्याप्त हो रही थी, पर बाहर की.स्थूलता ने अन्दर की कोमलता को अक्षुण्ण रखा था। सरल, सदय, हँसमुख, सहन-शोल स्त्री थी, निसने सारे घर को वशीभूत कर लिया था। यह उसी की सजनता यो,.जो नौकरों को वेतन न मिलने पर भी जाने न देती थी। मनोरमा पर तो वह प्राण देती थी। ईर्ष्या, क्रोध, मत्सर उसे छू भी न गया था । वह उदार न हो, पर कृपण न यी । ठाकुर साहब कभी कभी उसपर भी बिगड़ जाते थे, मारने दौड़ते थे, दो-एक वार.मारा भी था, पर उसके माथे पर जरा भी बल न आता था । ठाकुर साहब का सिर भी दुखे, तो उसकी जान निकल जाती थी। वह उसकी स्नेहमयी सेवा ही थी, जिसने ऐसे हिंसक जीव को जकड़ रखा था।

    इस वक्त दोनों प्राणियों में कोई बहस छिड़ी हुई थी। ठाकुर साहव झला भल्ला-कर बोल रहे थे, और लौंगी अपराधियों की भाँति सिर झुकाये खड़ी थी कि मनोरमा ने आकर कहा-वावूनी आये हुए हैं, आपसे कुछ कहना चाहते हैं ।

    ठाकुर साहब की भौहें तन गयीं। बोले-कहना क्या चाहते होगे, रुपए मॉगने. श्राये होंगे। अच्छा, नाकर कह दो कि श्राते है, बैठिए । लौंगी-इनके रुपए दे क्यों नहीं देते ? वेचारे गरीब आदमी हैं; सकोच के मारे नहीं मांगते, कई महीने तो चढ गये ?

    ठाकुर-यह भी तुम्हारी मुर्खता थी जिसकी बदौलत मुझे यह तावान देना पड़ता है। कहता था कि कोई ईसाइने रख लो, दो-चार रुपये में काम चल जायगा। तुमने कहा-नहीं, कोई लायक आदमी होना चाहिए। इनके लायक होने मे शक नहीं; पर यह तो बुरा मालूम होता है कि जब देखो रुपए के लिए सिर पर सवार । अभी कल कह दिया कि घबराइए नही, दस-पाँच दिनों मे मिल जायेंगे। तब तक फिर भूत की तरह सवार हो गये।

    लौंगो-कोई ऐसी ही जरूरत या पढ़ी होगी, तभी आये होंगे । १२०) हुए न ? मैं लाये देती हूँ।

    ठाकुर-हॉ, सन्दूक खोल कर लाना तो कोई कठिन काम नहो । अखर तो उने होती है, जिसे कुआँ खोदना पड़ता है।

    लोगी-वही कुऑ तो उन्होने भी खोदा है । तुम्हें चार महीने तक कुछ न मिले, तो क्या हाल होगा, साचो। मुझे तो वेचारे पर दया पाती है।

    कह कहकर लौंगी गयी ओर रुपये लाकर ठाकुर साहब से बोली-लो, दे आयो । सुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों।

    ठाकुर-लायी भी तो रुपये, नोट न थे क्या ?

    लौंगी-जैसे नोट वैसे पर क्या इसमे भी कुछ भेद है?

    ठाकुर-अब तुमसे क्या कहूँ। अच्छा, रख दो, जाता हूँ। पानी तो नहीं वरस रहा है कि भींग रहे होगे।

    ठाकुर साहब ने झंझलाकर रुपए उठा लिये पोर बाहर चले; लेकिन रास्ते में.क्रोध शान्त हो गया। चक्रधर के पास पहुंचे, तो विनय के देवता बने हुए थे।

    चक्रधर-पापको कष्ट देने..

    ठाकुर-नही-नहीं, मुझे कई कष्ट नहीं हुआ। नेने आपसे दस-पॉच दिन में देने का वादा किया था। मेरे पास रुपए न थे, पर स्त्रियों को तो आप जानते हैं;कितनी चतुर होती हैं । घर में सए निकल पाए । यह लीजिए।

    चक्रधर-मै इस वक्त एक दूसरे हो काम से पाया हूँ। मुझे एक काम ते अागरे जाना है । शायद दो-तीन दिन लगेगे। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।

    ठाकुर-हॉ हाँ, शौक से जाइए, मुझने पूछने की जरूरत न थी।

    ठाकुर साहब अन्दर चले गये, तो मनोरमा ने पूछा-आप आगरे क्या करने ला रहे हैं?

    चक्रधर-एक जरूरत से ज्ञाता हूँ।

    मनोरमा-कोई बीमार है क्या ?

    चक्रधर-नहीं, बीमार कोई नहीं है । मनोरमा- फिर क्या काम है, बताते क्यों नहीं ? जब तक न तलाइएगा, में जाने न दूंगी।

    चक्रधर-लौटवर बता दूंगा।

    मनोरमा-जी नहीं, मै यह नहीं मानती, अभी बतलाइए।

    चक्रधर-एक मित्र मे मिलने जाता हूँ।

    मनोरमा-आप मुस्करा रहे हैं ! में समझ गयी, नौकरी की तलाश में जाते हैं।

    चक्रधर नहीं मनोरमा, यह बात नहीं है। मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।

    मनोरमा-तो क्या आप हमेशा इसी तरह देहातो मे घुमा करेंगे ?

    चक्रधर-विचार तो ऐसा ही है, फिर जैसी ईश्वर की इच्छा।

    मनोरमा-आप रुपए कहाँ से लायेंगे? उन कामों के लिए भी तो रुपयो की जरूरत होती होगी?

    चक्रधर-भिक्षा माँगूंगा । पुण्य कार्य भिक्षा हो पर चलते हैं।

    मनोरमा-तो पानकल भी आप भिक्षा मांगते होंगे ?

    चक्रधर–हॉ, मॉगता क्यो नहीं । न मागू, तो काम कैसे चले ।

    मनोरमा-मुझसे तो अापने कभी नहीं मांगा।

    चक्रधर-तुम्हारे ऊपर तो विश्वास है कि जब मॉDगा, तब दे दोगी, इसीलिए कोई विशेष काम पा पड़ने पर मॉगूगा।

    मनोरमा-और जो उस वक्त मेरे पास न हुए तो।

    चक्रघर- तो फिर कभी मॉगूंगा।

    मनोरमा-तो श्राप मुझसे अभी माँग लीजिए, अभी मेरे पास रुपए है, दे दूंगी। फिर आप न जाने किस वक मॉग बैठे ।

    यह कहकर मनोरमा अन्दर गयी और क्लवाले १२०) रुपए लाकर चक्रधर के सामने रख दिये।

    चक्रधर इस वक्त तो मुझे जरूरत नहीं । फिर कभी ले लूँगा।

    मनोरमा-जी नहीं, लेते जाइए। मेरे पास खर्च हो जायेंगे | एक दफे भी बाजार गयी, तो यह गायब हो जायेंगे । इसी डर के मारे मैं बाजार नहीं जाती।

    चक्रधर-तुमने ठाकुर साहब से पूछ लिया है ?

    मनोरमा उनसे क्यों पूछ् ? गुड़िया लाती हूँ, तो उनसे नहीं पूछती, तो फिर.इसके लिए उनसे क्यों पूछ ?

    चक्रधर–तो फिर यो मै न लूँगा । यह स्थिति और ही है। यह ख्याल हो सकता है कि मेने तुमसे रुपए ठग लिये । तुम्ही सोचो, हो सकता है या नहीं।

    मनोरमा–अच्छा, आप अमानत समझकर अपने पास रखे रहिए। इतने में सामने से मुश्की घोड़ों की फिटन नाती हुई दिखायी दी। घोड़ों के साजों पर गगा ममुनी काम किया हुआ था। चार सवार भाले उठाये पीछे दौड़ते चले पात थे । चक्रघर-कोई रानी मालूम होती है ।

    मनोरमा-जगदीशपुर की महारानी है । जब उनके यहाँ जाती हूँ, मुझे एक.गिनी देती हैं । ये आठों गिनियाँ उन्हीं की दी हुई हैं । न जाने क्यों मुझे बहुत.मानती हैं।

    चक्रधर-इनको कोठी दुर्गाकुण्ड की तरफ है न ? मैं एक दिन इनके यहाँ भिक्षा माँगने जाऊँगा।

    मनोरमा-मैं जगदीशपुर की रानी होती, तो आपको बिना माँगे ही बहुत-सा धन – दे देती।

    चक्रधर ने मुस्कराकर कहा-तब भूल जाती।

    मनोरमा-जी नहीं, मै कभी न भूलती।

    चक्रधर-अच्छा, कभी याद दिलाउँगा। इस वक्त यह रुपए अपने ही पास रहने दो।

    मनोरमा – अापको इन्हे लेते सकोच क्यों होता है ? रुपए मेरे हैं, महारानी ने मुझे.दिये हैं । मै इन्हें पानी में डाल सकती हूँ, किसीको मुझे रोकने का क्या अधिकार है । आप न लेंगे तो मै सच कहती हूँ, याज ही जाकर इन्हें गगा में फेंक पाऊँगी।

    चक्रधर ने धर्म-संकट में पड़कर कहा-तुम इतना अाग्रह करती हो, तो मै लिये लेता हूँ, लेकिन इसे अमानत समझगा।

    मनोरमा प्रसन्न होकर बोली-हॉ, अमानत ही समझ लीजिए।

    चक्रधर-तो मैं नाता हूँ । किताब देखती रहना ।

    मनोरमा-अाप अगर मुझसे बिना बताये चले जायेंगे, तो मैं कुछ न पढगी।

    चक्रधर-यह तो बड़ी टेढ़ी शर्त है । बतला ही हूँ। अच्छा, हँसना मत । तुम जरा भी मुस्कराई और मैं चला।

    मनोरमा-में दोनों हाथों से मुंह बन्द किये लेती है।

    चक्रधर ने झंपते हुए कहा- मेरे विवाह की कुछ बातचीत है | मेरी तो इच्छा नहीं है; पर एक महाशय जबरदस्ती खींचे लिये जाते हैं ।

    यह कहकर चक्रधर उठ खड़े हुए। मनोरमा भी उनके साथ साथ आयो । जब वह बरामदे से नीचे उतरे, तो प्रणाम किया और तुरत अपने कमरे में लौट प्रायी। उसकी आँखे डबडवायी हुई थीं और बार-चार रुलाई अाती थी, मानो चक्रधर किसी दूर देश जा रहे हो!

    ५

    सन्ध्या समय जब रेलगाड़ी बनारस से चली, तो यशोदानन्दन ने चक्रधर से पूछा-क्यों भैया, तुम्हारी राय में झूठ बोलना किसी दशा मे क्षम्य है, या नहीं?.

    चक्रधर ने विस्मित होकर कहा-मै तो समझता हूँ, नहीं।

    यशोदा-किसी भी दशा मे नहीं ? चक्रधर-मैं तो यही कहूँगा कि किसी दशा में भी नहीं, हालाँकि कुछ लोग परोपकार के लिए असत्य को क्षम्य समझते हैं ।

    यशोदा०-मैं भी उन्हीं लोगों मे हूँ। मेरा ख्याल है कि पूरा वृत्तान्त सुनकर शायद आप भी मुझसे सहमत हो जायँ । मेने अहल्या के विषय में आप से झूठी बातें कही है । वह वास्तवमे मेरी लड़की नहीं है । उसके माता-पिता का हमें कुछ भी पता नहीं।

    चक्रधर ने बड़ी-बड़ी आँखें करके कहा-तो फिर अापके यहाँ कैसे पायी ।

    यशोदा०-विचित्र कथा है। १५ वर्ष हुए, एक बार सूर्यग्रहण लगा था । मैं उन दिनों कालेज में था। हमारी एक सेवा समिति थी। हम लोग उसी म्नान के अवसर पर यात्रियों की सेवा करने प्रयाग याये थे। तुम तो उस वक्त बहुत छोटे-मे रहे होगे । इतना बड़ा मेला फिर नही लगा । वही हमें यह लड़की एक नाली मे पड़ी

    रोती मिली । । न जाने उसके माँ बाप नदी मे हव गये, या भीड़ मे कुचल गये । बहुत खोज की, पर उनका पता न लगा। विवश होकर उसे साथ लेते गये । ४५ वर्ष तक तो उसे अनाथालय मे रखा, लेकिन जब कार्यकर्तायों की पृट के कारण अनाथालय वन्द हो गया, तो अपने ही घर में उसका पालन पोषण करने लगा। जन्म से न हो,पर सरकारों से वह हमारी लडकी है। उसके कुलीन होने मे भी सन्देह नहा । उसका शील, स्वभाव और चातुर्य देखकर अच्छे-अच्छे घरों की स्त्रियाँ चकित रह जाती हैं । मै इधर एक साल से उसके लिए योग्य वर की तलाश में था। ऐसा आदमी चाहता था, जो स्थिति को जानकर उसे सहर्ष स्वीकार करे और पाकर अपने को धन्य समझे । पनों में आपके लेख देखकर और आपके सेवाकार्य को प्रशसा सुनकर मेरो धारणा हो गयी कि आप ही उसके लिए सबसे योग्य है । यह निश्चय करके आपके यहाँ पाया। मैंने आपसे सारा वृत्तान्त कह दिया । अब आपको अख्तियार है, उसे अपनायें या त्यागें । हाँ, इतना कह सकता हूँ कि ऐसा रन श्राप फिर न पायेंगे | में यह जानता हूँ कि आपके पिताजी को यह बात असह्य होगी, पर यह भी जानता हूँ कि वोरात्माएँ सत्कार्य में विरोध की परवा नही करतो और अन्त मे उस पर विजय हो पाती हैं।

    चक्रधर गहरे विचार में पड़ गये । एक तरफ अहल्या का अनुपम सौन्दर्य और उज्ज्वल चरित्र था, दूसरी ओर माता पिता का विरोध और लोक-निन्दा का भय, मन मे तर्क सग्राम होने लगा यशोदानन्दन ने उन्हें असमजस में पड़े देखकर कहा-श्राप चिन्तित देख पडते हैं और चिन्ता की बात भी है, लेकिन जब आप जैसे सुश-क्षित और उदार पुरुष विरोध और भय के कारण कर्तव्य और न्याय से मुंह मोड़ें,तो फिर हमारा उद्धार हो चुका । मै अापसे सच कहता हूँ, यदि मेरे दो पुत्रों में से एक भी क्वॉरा होता और अहल्या उसे स्वीकार करती, तो मैं बढ़े हर्प स उसका विवाह उससे कर देता । अापके सामाजिक विचारो की स्वतन्त्रता का परिचय पाकर ही मने अापके ऊपर इस बालिका के उद्धार का भार रखा है और यदि आपने भी अपने कर्तव्य को न समझा, तो मैं नहीं कह सकता, उस अवला की क्या दशा होगी।

    चक्रधर रूप-लावण्य की अोर मे तो ऑखें बन्द कर सकते थे; लेकिन उदार के भाव को दवाना उनके लिए असम्भव था । वह स्वतन्त्रता के उपासक थे और निर्भी-कता स्वतन्त्रता की पहली सीढी है। उनके मन ने कहा- क्या यह काम ऐसा है कि समाज हॅसे ? समाज को इसकी प्रशसा करनी चाहिए। अगर ऐसे काम के लिए कोई मेरा तिरस्कार करे, तो मैं तृण बराबर भी उसकी परवाह न करूँगा। चाहे वह मेरे माता-पिता ही हों। दृढ़ भाव से बोले-मेरी ओर से आप जरा भो शंका न करें। मैं इतना भीरु नहीं हूँ कि ऐसे कामों में समाज-निन्दा से डरूँ। माता-पिता को प्रसन्न रखना मेरा धर्म है; लेकिन कर्तव्य और न्याय की हत्या करके नहीं । कर्तव्य के सामने माता पिता की इच्छा का मूल्य नहीं है ।

    यशोदानन्दन ने चक्रधर को गले लगाते हुए कहा- भैया, तुमसे ऐसी ही आशा थी।

    यह कहकर यशोदानन्दन ने अपना सितार उठा लिया और बजाने लगे । चक्र-घर को कभी सितार की ध्वनि इतनी प्रिय, इतनी मधुर न लगी थी। और न चॉदनी कभी इतनी सुहृदय और विहसित | दायें-बायें चाँदनी छिटकी हुई थी और उसकी-मन्द छटा मे अहल्या रेलगाडी के साथ, अगणित रूप धारण किये दोड़तो चली जाती थी। कभी वह उछलकर आकाश जा पहुँचती थी, कभी नदियों की चन्द्र-चञ्चल तरगो मे । यशोदानन्दन को न कभी इतना उल्लास हुअा था, न चक्र घर का कभी इतना गर्व, दोनों अानन्द-कल्पना मे हवे हुए थे।

    गाडी नागरे पहुंची, तो दिन निकल आया था । सुनहरा नगर हरे हरे कुजों के बीच में विश्राम कर रहा था, मानों वालक माता की गोद में सोया हो।

    इस नगर को देखते ही चक्रधर को कितनी हो ऐतिहासिक घटनाएँ याद आ गयों । सारा नगर किसी उजडे हुए घर की भॉति श्री-हीन हो रहा था ।

    मुशी यशोदानन्दन अभी कुलियों को पुकार रहे थे कि उनकी निगाह पुलिस के सिपाहियो पर पड़ी। चारों तरफ पहरा था। मुसाफिरों के बिस्तरे, सन्दूक खोल-खोलकर देखे जाने लगे। एक थानेदार ने यशोदानन्दन का भी असबाब देखना शुरू किया।

    यशोदानन्दन ने आश्चर्य से पूछा-क्यों माहव, ग्राज यह सख्ती क्यों है ?

    थानेदार-आप लोगों ने जो कॉटे बोये हैं, उन्ही का फल है। शहर में फिसाद हो गया है।

    यशोदा-अभी तीन दिन पहले तो अमन का राज्य था, यह भूत कहाँ से उठ खड़ा हुया?

    इतने मे समिति का एक तेवक दौड़ता हुआ या पहुँचा । यशोदानन्दन ने ग्रागे बढकर पूछा-क्यों राधामोहन, यह क्या मामला हो गयो ? अभी जिस दिन म गया हूँ, उस दिन तक तो दगे का कोई लक्षण न था।

    राधा-जिस दिन श्राप गये, उसी दिन पंजाब से मौलवी दीनमुहम्मद साहब का श्रागमन हुअा। खुले मैदान मे मुसलमानों का एक बड़ा जलसा हुया । उसमें मौलाना साहब ने न जाने क्या लहर उगला कि तभी से मुसलमानो को कुरबानी की धुन सवार है। इधर हिन्दुत्रों को भी यह जिद है कि चाहे खून की नदी बह जाय, पर कुरबानी न होने पायेगी। दोनों तरफ से तैयारियाँ हो रही है, हम लोग तो समझाकर हार गये।

    यशोदानन्दन ने पूछा-ख्वाना महमूद कुछ न बोले ।

    राधा-वही तो उस जलसे के प्रधान थे।

    यशोदानन्दन आँखें फाड़कर बोले-ख्वाजा महमूद !

    राधा~जी हॉ, ख्वाना महमूद | आप उन्हें फरिश्ता समझे, असल में वे रेंगे सियार हैं। हम लोग हमेशा से कहते पाते हैं कि इनसे होशियार र हए, लेकिन आपको न जाने क्यों उन पर इतना विश्वास था ।

    यशोदानन्दन ने श्रात्म ग्लानि से पीड़ित होकर कहा-जिस आदमी को श्राज २५ बरसों से देखता अाता हूँ, जिसके साथ कालेज में पढा, जो इसी समिति का किसी जमाने में मेम्बर था, उसपर क्योंकर विश्वास न करता। दुनिया कुछ कहे, पर मुझे ख्वाजा महमूद पर कभी शक न होगा।

    राधा-आपको अख्तियार है कि उन्हें देवता समझे, मगर अभी अभी आप देखेंगे कि वह कितनी मुस्तैदी से कुरबानी की तैयारियों कर रहे हैं। उन्होने देहातों से लठैत बुलाये हैं, उन्हीं ने गौएँ मोल ली हैं और उन्हीं के द्वार पर कुरबानी होने जा रही है।

    यशादा०– ख्वाना महमूद के द्वार पर कुरबानी होगी। उनके द्वार पर इसके पहले या तो मेरी कुरबानी हो जायगी, या ख्वाजा महमूद की। तॉगेवाले को बुलाओ।

    राधा-बहुत अच्छा हो यदि आप इस समय यही ठहर जायें ।

    यशादा०-वाह-वाह ! शहर में आग लगी हुई है और तुम कहते हो, मैं यहीं रह जाऊँ । जो औरो पर बीतेगी वही मुझपर भी बीतेगी, इससे क्या भागना । तुम लोगों ने बड़ी भूल की कि मुझे पहले से सूचना न दी ।

    राधा-कल दोपहर तक तो हमें खुद हो न मालूम था कि क्या गुल खिल रहा है। ख्वाजा साहब के पास गये तो उन्होंने विश्वास दिलाया कि कुरबानी न होने पायेगी, आप लोग इत्मीनान रखें । हमसे तो यह कहा, उधर शाम ही को लठैत श्रा पहुँचे और मुसलमानों का डेपुटेशन सिटी मैजिस्ट्रेट के पास कुरबानी की सूचना देने पहुँच गया ।

    यशादा.-महमूद भी डेपुटेशन में थे ? राधा-~वही तो उसके कर्ता-धर्ता थे, भला वही क्यों न होते ? हमारा तो विचार है कि वही इस फिसाद की जड़ हैं।

    यशोदा–अगर महमूद मे सचमुच यह काया पलट हो गयी है, तो मैं यही कहूँगा कि धर्म से ज्यादा द्वेष पैदा करनेवालो वस्तु ससार में नहीं। और कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो महमूद में द्वेष के भाव पैदा कर सके । चलो, पहले उन्हीं से बातें होगी। मेरे द्वार पर तो इस वक्त बड़ा जमाव होगा।

    राधा-जी हॉ, इधर आपके द्वार पर जमाव है, उधर ख्वाजा साहब के ! बीच मे थोडी-सी जगह खाली है। ' तीनों श्रादमी तांगे पर बैठकर चले | सड़कों पर पुलिस के जवान चक्कर लगा रहे थे । मुसाफिरों की छड़ियाँ छीन ली जाती थी। दो-चार आदमी भी साथ न खड़े होने पाते थे। सिपाही तुरन्त ललकारता था। दुकानें सब बन्द थीं, कुंजड़े भी साग वेचते न नजर आते थे । हॉ, गलियों में लोग जमा हो-होकर बातें कर रहे थे।

    कुछ दूर तक तीनो श्रादमी मोन धारण किये बैठे रहे। चक्रधर शक्ति होकर इधर उधर ताक रहे थे। जरा भी घोड़ा रुक जाता, तो उनका दिल धड़कने लगता कि किसी ने तॉगा रोक तो नहीं लिया, लेकिन यशोदानन्दन के मुख पर ग्लानि का गहरा चिन्ह दिखायी दे रहा था। उनके मुहल्ले में आज तक कभी कुरबानी न हुई थी। हिंदू और मुसलमान का भेद ही न मालूम होता था। उन्हें आश्चर्य होता था कि और शहरों में कैसे हिन्द-मुसलमानों में झगडे हो जाते हैं। और तीन ही दिन मे यह नौबत आ गयी।

    सहसा उन्होंने उत्तेजित होकर कहा-राधामोहन, देखो, मै तो यहीं उतरा जाता हूँ ! जरा महमूद से मिलूंगा। तुम इन वावू साहब को लेकर घर जाओ । श्राप मेरे एक मित्र के लड़के हैं, यहाँ सैर करने आये हैं। बैठक में आपकी चारपाई डलवा देना और देखो, अगर देवसयोग से मैं लौटकर न आ सकूँ, तो घबराने की बात नहीं । जब लोग खून खच्चर करने पर तुले हुए हैं, तो सब कुछ सम्भव है और में उन अाद-मियों में नहीं हूं कि गौ को हत्या होते देखू और शान्त खड़ा रहूँ। अगर मै लाटकर न पा सक, तो तुम घर में हला देना कि अहल्या का पाणि ग्रहण आप ही के साथ, कर दिया जाय।

    यह कहकर उन्होंने कोचवान से ताँगा रोकने को कहा।

    चक्रधर में भी आपके साथ ही रहना चाहता हूँ।

    यशोदा-नही भैया, तुम मेरे मेहमान हो, तुम्हें मेरे साथ रहने की जरूरत नहीं। तुम चलो, में भी अभी पाता हूँ।

    चक्रधर-क्या पार समझते है कि गौ रक्षा आप ही का धर्म है, मेरा धर्म नहीं ?

    यशोदा-नहीं, यह बात नहीं वेटा । तुम मेरे मेहमान हो और तुम्हारी रक्षा करना मेरा धर्म है। इस वक्त ताँगा धीरे-धीरे ख्वाजा महमूद के मकान के सामने या पहुँचा। हजारों आदमियों का जमाव था। यद्यपि किसी के हाथ में लाठी या डण्डे न थे, पर उनके मुख जिहाद के जोश से तमतमाये हुए थे। यशोदानन्दन को देखते ही कई आदमी उनकी तरफ लपके, लेकिन जब उन्होंने जोर से कहा— तुमसे लड़ने नहीं आया हूँ। कहाँ हैं ख्वाजा महमूद? मुमकिन हो तो जरा उन्हें बुला लो, तो लोग हट गये?

    जरा देर में एक लम्बा सा आदमी, गाढे़ को अचकन पहने, आकर खड़ा हो गया। भरा हुआ बदन था, लम्बी दाढ़ी, जिसके कुछ बाल खिचड़ी हो गये थे और गोरा रंग। मुख से शिष्टता झलक रही थी। यही ख्वाजा महमूद थे।

    यशोदानन्दन ने त्योरियाँ बदलकर कहा—क्यों ख्वाजा साहब, आपको याद है, इस मुहल्ले में कभी कुरबानी हुई है?

    महमूद—जी नहीं, जहाँ तक मेरा ख्याल है, यहाँ कभी कुरबानी नहीं हुई।

    यशोदा॰—तो फिर आज आप यहाँ कुरबानी करने की नयी रम्म क्यों निकाल रहे हैं?

    महमूद—इसलिए कि कुरबानी करना हमारा हक है। अब तक हम आपके जजबात का लिहाज करते थे, अपने माने हुए हक को भूल गये थे, लेकिन जब आप लोग अपने हकों के सामने हमारे जजबात की परवा नहीं करते, तो कोई वजह नहीं कि हम अपने हकों के सामने आपके जजबात की परवा करें। मुसलमानों को शुद्धि करने का आप को पूरा हक हासिल है, लेकिन कम-से कम पाँच सौ बरसों मे आपके यहाँ शुद्धि की कोई मिसाल नहीं मिलती। आप लोगों ने एक मुर्दा हक को जिन्दा किया है। इसीलिए न, कि मुसलमानों की ताकत और असर कम हो जाय। जब आप हमें जेर करने के लिए नये नये हथियार निकाल रहे हैं, तो हमारे लिए इसके सिवा और क्या चारा है कि अपने हथियारों को दूनी ताकत से चलायें।

    यशोदा॰—इसके यह मानी है कि कल आप हमारे द्वारों पर, हमारे मन्दिरों के सामने, कुरबानी करें और हम चुपचाप देखा करें। आप यहाँ हरगिज कुरबानी नहीं कर सकते और करेंगे, तो इसकी जिम्मेदारी आपके सिर होगी।

    यह कहकर यशोदानन्दन फिर ताँगे पर बैठे। दस-पाँच आदमियों ने ताँगे को रोकना चाहा, पर कोचवान ने घोड़ा तेज कर दिया। दम के दम ताँगा उड़ता हुया यशोदानन्दन के द्वार पर पहुँच गया, जहाँ हजारो आदमी खड़े थे। इन्हें देखते हो चारों तरफ हलचल मच गयी। लोगों ने चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। अभी तक फोज का अफसर न था, फौज दुविधे में पड़ी हुई थी, समझ में न आता था कि क्या करें। सेनापति के आते ही सिपाहियों में जान-सी पड़ गयी, जैसे सूखे धान मे पानी पड़ जाय।

    यशोदानन्दन ताँगे से उतर पड़े और ललकारकर बोले—क्यों भाइयो, क्या विचार है? यहाँ कुरबानी होगी? आप जानते हैं, इस मुहल्ले में आज तक कभी कुर वानी नहीं हुई । अगर आज हम यहाँ कुरबानी करने देंगे, तो कौन कह सकता है कि कल को हमारे मन्दिर के सामने गौ-हत्या न होगी!

    कई आवाजें एक साथ आयी- हम मर मिटेंगे, पर यहाँ कुरबानी न होने देंगे।

    यशोदा– खूब सोच लो, क्या करने जा रहे हो। वह लोग सब तरह से लैस.हैं । ऐसा न हो कि तुम लाठियो के पहले ही वार में वहाँ से भाग खडे हो ?

    कई आवाजें एक साथ न्यायी-भाइयो, सुन लो; अगर कोई पीछे कदम हटायेगा,तो उसे गौ-हत्या का पाप लगेगा।

    एक सिक्ख जवान-अजी देखिए, छक्के छुड़ा देगे।

    एक पजाबी हिन्दू-एक एक को गरदन तोड के रख दूंगा।

    आदमियों को यों उत्तेजित करके यशोदानन्दन आगे बढे और जनता 'महावीर'और 'श्रीरामचन्द्र' की जय ध्वनि से वायुमण्डल को कम्पायमान करती हुई उनके पीछे चली। उधर मुसलमानो ने भी डण्डे सँभाले । करीब था कि दोनों दलो मे मुठभेड़ हो जाय कि एकाएक चक्रधर आगे बढ़कर यशोदानन्दन के सामने खड़े हो गये और विनीत, किन्तु दृढ़ भाव से बोले-आप अगर उधर जाते हैं, तो मेरी छाती पर पाँव रखकर जाइए । मेरे देखते यह अनर्थ न होने पायेगा ।

    यशोदानन्दन ने चिढ़कर कहा हट जानो। अगर एक क्षण की भी देर हुई, तो फिर पछताने के सिवा और कुछ हाथ न आयेगा।

    चक्रधर-पाप लोग वहाँ जाकर करेंगे क्या ?

    यशोदा० — हम इन जालिमों से गौ को छीन लेंगे।

    चक्रधर-अहिसा का नियम गौत्री ही के लिए नहीं, मनुष्यों के लिए भी तो है ।

    यशोदा-कैसी बातें करते हो, जी! क्या यहाँ खडे होकर अपनी ऑखो से गो की हत्या होते देखें?

    चक्रधर-अगर आप एक बार दिल थामकर देख लेंगे, तो यकीन है कि फिर.आपको कभी यह दृश्य न देखना पडे । ।

    यशोदा-हम इतने उदार नहीं है ।

    चक्रधर-ऐसे अवसर पर भी ?

    थशोदा०-हम महान्-से-महान् उद्देश्य के लिए भी यह मूल्य नहीं दे सकते । इन दामों स्वर्ग भी महँगा है।

    चक्रधर-मित्रो, जरा विचार से काम लो।

    कई अावाजे-विचार से काम लेना कायरों का काम है।

    एक सिक्ख जवान-जब डण्डे से काम लेने का मौका पाए, तो विचार को बन्द करके रख देना चाहिए।

    चक्रधर-तो फिर जाइए; लेकिन उस गौ को बचाने के लिए आप को अपने एक -भाई का खून करना पड़ेगा। सहसा एक पत्थर किसी तरफ से आकर चक्रवर के सिर मे लगा। खून की धारा बह निकली, लेकिन चक्रधर अपनी जगह से हिले नहीं । सिर थामकर बोले-अगर मेरे रक्त से आपकी क्रोधाग्नि शान्त होती हो, तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। अगर मेरा खून और कई जानों की रक्षा कर सके, तो इससे उत्तम कौन सी मृत्यु होगी।

    फिर दूसरा पत्थर श्राया, पर अव को चक्रधर को चोट न लगी। पत्थर कानों के पास से निकल गया ।

    यशोदानन्दन गरजकर बोले- यह कौन पत्थर फेंक रहा है ? सामने क्यों नहीं याता? क्या वह समझता है कि उसी ने गो रक्षा का ठीका ले लिया है ? अगर वह बड़ा वीर है तो क्यों नहीं चन्द कटम प्रागे श्राफर अपनी वीरता दिखाता ? पीछे खड़ा पत्थर क्यों फेकता है ?

    एक अावाज-धर्म-द्रोहियों को मारना अधर्म नहीं है ?