चन्द्रकांता सन्तति २
कमलिनी––कहो, क्या बात है और कौन-सी जरूरत आ पड़ी?
भूतनाथ––पहले तुम कहो कि मुझसे मिलने की क्या आवश्यकता थी? कमलिनी––नहीं-नहीं, पहले तुम्हारा हाल सुन लूँगी तब कुछ कहूँगी, क्योंकि तुम्हारे चेहरे पर घबराहट और उदासी हद से ज्यादा पाई जाती है।
भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है और मैं तुमसे आखिरी मुलाकात करने आया हूँ, क्योंकि अब जीने की उम्मीद नहीं रही और खुली बदनामी बल्कि कलंक मंजूर नहीं
कमलिनी––क्यों क्यों, ऐसी क्या आफत आ गई, कुछ कहो तो सही!
भूतनाथ––मेरे साथ पहाड़ी के नीचे चलो। मैं एक औरत को बेहोश करके लाद लाया हूँ, जो उसी खोह के अन्दर है, पहले उसे देख लो तब मेरी सुनो।
कमलिनी––खैर ऐसा ही सही, चलो।
भूतनाथ के साथ-ही-साथ कमलिनी पहाड़ी के नीचे उतरी और उस खोह के मुहाने पर आकर बैठ गई जिसके अन्दर भूतनाथ ने उस औरत को रखा था। भूतनाथ उस बेहोश औरत को खोह के बाहर निकाल लाया। कमलिनी उस औरत को देखते ही चौंकी और उठ खड़ी हुई।
भूतनाथ––इसी के मारे मेरी जिन्दगी जवाल हो रही है, मगर तुम इसे देखकर चौंकी क्यों? क्या इस औरत को पहचानती हो?
कमलिनी––हाँ, मैं इसे पहचानती। यह वह काली नागिन है कि जिसके डँसने का मन्त्र ही नहीं! जिसे इसने काटा वह पानी तक नहीं माँगता, तुमने इसके साथ दुश्मनी की सो अच्छा नहीं किया।
भूतनाथ––मैंने जान-बूझकर इसके साथ दुश्मनी नहीं की। तुम खुद जानती हो कि मैं इसके काबू में हूँ किसी तरह इसका हुक्म टाल नहीं सकता, मगर कल इसने जो कुछ काम करने के लिए मुझे कहा वह मैं किसी तरह नहीं कर सकता था और इनकार की भी हिम्मत न थी, लाचार इसी खंजर की मदद से गिरफ्तार कर लाया हूँ। अब कोई ऐसी तरकीब निकालो जिसमें जान बचे और मैं वीरेन्द्रसिंह को मुँह दिखाने लायक हो जाऊँ।
कमलिनी––मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे हो! मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि तुम इसके कब्जे में क्योंकर फँसे हो, न तुमने इसके बारे में कभी मुझसे कुछ कहा ही।
भूतनाथ––बेशक मैं इसका हाल तुमसे कह चुका हूँ और यह भी कह चुका हूँ कि इसी की बदौलत मुझे मरना पड़ा, बल्कि तुमने वादा किया था कि इसके हाथ से तुम्हें छुट्टी दिला दूँगी।
कमलिनी––हाँ, वह बात मुझे याद है, मगर तुमने तो श्यामा का नाम लिया था!
भूतनाथ––ठीक है, वह यही श्यामा है।
कमलिनी––(हँस कर) इसका नाम श्यामा नहीं है मनोरमा है। मैं इसकी सात पुश्तों को जानती हूँ। वेशक इसने अपने नाम में भी तुमको धोखा दिया। खैर, अब मालूम हुआ कि तुम्हें इसी ने सता रखा है, तुम्हारे हाथ की लिखी हुई दस्तावेज इसी के कब्जे में है और इस सबब से तुम इसे जान से मार भी नहीं सकते। इसने मुझे भी कई दफे धोखा देना चाहा था मगर मैं कब इसके पंजे में आने वाली हूँ। हाँ, यह तो कहो कि इसने क्या काम करने के लिए कहा था?
भूतनाथ––इसने कहा था कि तू कमलिनी का सिर काट कर मेरे पास ले आ, यह काम तुझसे बखूबी हो सकेगा क्योंकि वह तुझ पर विश्वास करती है।
कमलिनी––(कुछ देर तक सोचकर) खैर, कोई हर्ज नहीं। पहले तो मुझे इसकी कोई विशेष फिक्र न थी, परन्तु अब इसके साथ चाल चले बिना काम नहीं निकलता। देखो तो, मैं इसे कैसा दुरुस्त करती हूँ और तुम्हारे कागजात भी इसके कब्जे से कैसे निकालती हूँ।
भूतनाथ––मगर इस काम में देर न करनी चाहिए।
कमलिनी––नहीं-नहीं, देर न होगी, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए भी मुझे इसी के मकान पर जाना पड़ेगा। बस, दोनों काम एक साथ ही निकल जायेंगे।
भूतनाथ––अच्छा, तो अब क्या करना चाहिए?
कमलिनी––(हाथ का इशारा करके) तुम इस झाड़ी में छिपे रहो, मैं इसे होश में लाकर कुछ बातचीत करूँगी। आज यह मुझे किसी तरह नहीं पहचान सकती।
भूतनाथ झाड़ी के अन्दर छिपा रहा। कमलिनी ने अपने बटुए में से लखलखे की डिबिया निकाली और सुँघाकर उस औरत को होश में लाई। मनोरमा जब होश में आई, उसने अपने सामने एक भयानक रूपवाली औरत को देखा। वह घबरा कर उठ बैठी और बोली––
मनोरमा––तुम कौन हो और मैं यहाँ क्योंकर आई?
कमलिनी––मैं जंगल की रहने वाली भिल्लिनी हूं। तुम्हें एक लम्बे कद का आदमी पीठ पर लादे लिये जाता था। मैं इस पहाड़ी के नीचे सूअर का शिकार कर रही थी। जब वह मेरे पास पहुँचा मैंने उसे ललकारा और पूछा कि पीठ पर क्या लादे लिये जाता है? जब उसने कुछ न बताया तो लाचार (नेजा दिखा कर) इसी जहरीले नेजे से उसे जख्मी किया। जब वह बेहोश होकर गिर पड़ा तब मैंने गठरी खोली, जब तुम्हारी सूरत नजर आई तो हाल जानने की इच्छा हुई। लाचार इस जगह उठा लाई और होश में लाने का उद्योग करने लगी। अब तुम्हीं बताओ कि वह आदमी कौन था और तुम्हें इस तरह क्यों लिये जाता था?
मनोरमा––मैं अपना हाल तुमसे जरूर कहूँगी, मगर पहले यह बताओ कि वह आदमी तुम्हारे इस जहरीले नेजे के असर से मर गया या जीता है?
कमलिनी––वह मर गया और मेरे साथी लोग उसे जला देने के लिए ले गए।
मनोरमा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, यद्यपि उसने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया तथापि उसकी मुहब्बत मेरे दिल से किसी तरह नहीं जा सकती, क्योंकि वह मेरा प्यारा पति था। अफसोस अफसोस, तुमने उसके हाथ से मुझे व्यर्थ छुड़ाया।
पाठक, झाड़ी के अन्दर छिपा हुआ भूतनाथ भी मनोरमा की बातें सुन रहा था। मनोरमा ने जो कुछ कमलिनी से कहा, न मालूम उसमें क्या तासीर थी कि सुनने के साथ ही भूतनाथ का कलेजा काँपने लगा और उसे चक्कर-सा आ गया। बहुत मुश्किल से उसने अपने को सम्हाला और कान लगाकर फिर दोनों की बातें सुनने लगा।
कमलिनी––(कुछ सोचकर) मैं केसे विश्वास करूँ कि तुमने जो कुछ कहा वह सच है?
मनोरमा––पहले यह सोचो कि मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूँगी?
कमलिनी––इसके कई सबब हो सकते हैं। सब से भारी सबब यह है कि तुम्हारा भेद एक गैर के सामने खुल जायेगा जिससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। मगर मुझे विश्वास नहीं होता कि जो आदमी तुम्हें इतना कष्ट दे और बेहोश करके गठरी में बाँध कर कहीं ले जाने का इरादा रक्खे, उसे तुम प्यार करो और अपना पति कहकर सम्बोधित करो।
मनोरमा––नहीं-नहीं, यों तो शक की कोई दवा नहीं। परन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगी कि उस आदमी के बारे में मैंने जो कुछ कहा, वह सच है।
कमलिनी––खैर, ऐसा ही होगा, मुझे इससे कोई मतलब नहीं चाहे वह आदमी तुम्हारा पति हो अथवा नहीं, अब तो वह मर चुका, किसी तरह जी नहीं सकता। लेकिन यह बताओ कि अब तुम क्या करना चाहती हो और कहाँ जाने की इच्छा रखती हो?
मनोरमा––मुझे गयाजी का रास्ता बता दो। मेरे माँ-बाप उसी शहर में रहते हैं। अब मैं उन्हीं के पास जाऊँगी।
कमलिनी––अच्छा, पहाड़ी के नीचे चलो, मैं तुम्हें गयाजी का रास्ता बता देती हूँ। हाँ, मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गई।
मनोरमा––मेरा नाम इमामन है।
कमलिनी––(जोर से हँस कर) क्या ठगने के लिए मैं ही थी?
मनोरमा––(चौंक कर और कमलिनी को सिर से पैर तक खूब अच्छी तरह देख कर) मुझे तुम पर शक होता है।
कमलिनी––यह कोई ताज्जुब की बात नहीं, मगर शक होने ही से क्या हो सकता है? आज तक तुमने मुझे कभी नहीं देखा और न फिर देखोगी।
मनोरमा––तब मैं अवश्य ही कह सकती हूँ कि तुम कमलिनी हो!
कमलिनी––नहीं-नहीं, मैं कमलिनी नहीं हो सकती, हाँ कमलिनी को पहचानती जरूर हूँ, क्योंकि वह वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान की दोस्त है, इसलिए मेरी दुश्मन!
मनोरमा––अब मैं तुम्हारी बातों का विश्वास नहीं कर सकती।
कमलिनी––तो इसमें मेरा कोई भी हर्ज नहीं। (आहट पाकर और दाहिनी तरफ देख कर) लो देखो, अब तो मैं सच्ची हुई? वह कमलिनी आ रही है!
संयोग से उसी समय तारा भी आ पहुँची जो कमलिनी की सूरत में उसके कहे मुताबिक सब काम किया करती थी। कमलिनी ने गुप्त रीति से तारा को कुछ इशारा किया जिससे वह कमलिनी का मतलब समझ गई। कमलिनी रूपी तारा लपक कर उन दोनों के पास पहुँची और कमर से खंजर निकाल कर और उसे चमका कर बोली, "इस समय तुम दोनों भले मौके पर मुझे मिल गई हो, आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ। अब मैं तुम दोनों से बिना बदला लिये टलने वाली नहीं।"
तारा की यह बात सुन कमलिनी जान-बूझकर काँपने लगी। मालूम होता था कि वह डर से काँप रही है। मनोरमा भी यकायक कमलिनी को मौजूद देख कर घबरा गई, इसके अतिरिक्त उस चमकते हुए खंजर को देखकर उसे विश्वास हो गया कि अब किसी तरह जान नहीं बचती, क्योंकि इसी तरह का खंजर भूतनाथ के हाथ में चुकी थी और उसके प्रबल प्रताप का नमूना उसे मालूम हो चुका था, साथ ही उसे इस बात का भी विश्वास हो गया कि राक्षसी (कमलिनी), जिसने उसे भूतनाथ के हाथ से छुड़ाया, सच्ची और उसकी खैरख्वाह है।
कमलिनी ने तारा को फिर इशारा किया जिसे मनोरमा ने नहीं जाना। पर तारा ने वह खंजर मनोरमा के बदन से लगा दिया और वह बात-की-बात में बेहोश होकर जमीन पर गिर गई। झाड़ी में छिपा हुआ भूतनाथ भी निकल आया और कमलिनी से बोला––
भूतनाथ––जो हो, मगर मेरा काम कुछ भी न हुआ।
कमलिनी––इसमें कोई शक नहीं कि तुम बड़े बुद्धिमान हो, परन्तु कभी-कभी तुम्हारी अक्ल भी हवा खाने चली जाती है। तुम इस बात को नहीं जानते कि तुम्हारा काम पूरा-पूरा हो गया। यकायक तारा के पहुँच जाने से मालूम हुआ कि तुम्हारी किस्मत तेज है, नहीं तो मुझे बहुत-कुछ बखेड़ा करना पड़ता।
भूतनाथ––सो क्या, मुझे साफ समझा दो तो जी ठिकाने हो।
कमलिनी––मेरे पास बैठ जाओ, मैं अच्छी तरह समझा देती हूँ। (तारा की तरफ देख कर) कहो, तुम्हारा आना क्योंकर हुआ?
तारा––मुझे एक ऐसा काम आ पड़ा कि बिना तुमसे मिले कठिनता दूर होने की आशा न रही, लाचार झण्डी टेढ़ी करके तुमसे मिलने की उम्मीद में यहाँ आयी थी।
कमलिनी––अच्छा हुआ कि तुम आईं, इस समय तुम्हारे आने से बड़ा ही काम चला। अच्छा, बैठ जाओ और जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे सुनो।
इसके बाद कमलिनी, तारा और भूतनाथ में देर तक बातचीत होती रही जिसे यहाँ पर लिखना हम मुनासिब नहीं समझते, क्योंकि इन लोगों ने जो कुछ करना विचारा है, वह आगे के बयान में स्वयं खुल जायेगा। जब बातचीत से छुट्टी मिली तो मनोरमा को उठा तीनों आदमी पहाड़ी के नीचे उतरे। मनोरमा एक पेड़ के साथ बाँध दी गई। इस काम से छुट्टी पाकर तारा और भूतनाथ वहाँ से अलग हो गए और किसी झाड़ी में छिप कर दूर से इन दोनों को देखते रहे। थोड़ी ही देर बाद मनोरमा होश में आई और अपने को बेबस पाकर चारों तरफ देखने लगी। पास ही में पेड़ से बँधी हुई कमलिनी पर भी उसकी निगाह पड़ी और वह अफसोस के साथ कमलिनी की तरफ देख कर बोली–– मनोरमा––बेशक तुम सच्ची हो। मेरी भूल थी जो तुम पर शक करती थी।
कमलिनी––खैर, इस समय तो तुम्हारे ही सबब से मुझे भी कष्ट भोगना पड़ा।
मनोरमा––इसमें कोई सन्देह नहीं।
कमलिनी––तुम्हारा छूटना तो मुश्किल है मगर मैं किसी-न-किसी तरह धोखा देकर छूट ही जाऊँगी और तब कमलिनी से समझूँगी। अब बिना उसकी जान लिए मुझे चैन कहाँ?
मनोरमा––तुम्हारी भी तो वह दुश्मन है, फिर तुम्हें क्योंकर छोड़ देगी?
कमलिनी––मेरी-उसकी दुश्मनी भीतर-ही-भीतर की है, इसके अतिरिक्त एक और सबब ऐसा है कि जिससे मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तब तुम्हारे छुड़ाने का भी उद्योग करूँगी।
मनोरमा––वह कौन-सा सबब है?
कमलिनी––सो मैं अभी नहीं कह सकती। तुम्हें वह स्वयं मालूम हो जायगा। (चारों तरफ देख कर) न मालूम वह कम्बख्त कहाँ गई!
मनोरमा––क्या तुम्हें भी नहीं मालूम?
कमलिनी––नहीं, मुझे जब होश आया मैंने अपने को इसी तरह बेबस पाया।
मनोरमा––खैर, कहीं भी हो, आवेगी ही। हाँ तुम्हें यदि अपने छूटने की उम्मीद है तो कब तक?
कमलिनी––उसके आने पर दो-चार बातें करने से ही मुझे छुट्टी मिल जायगी और मैं तुम्हें भी अवश्य छुड़ाऊँगी। हाँ, अकेली होने के कारण विलम्ब जो कुछ हो। यदि तुम्हारा कोई मददगार हो तो बताओ, ताकि छुट्टी मिलने पर मैं तुम्हारे हाल की उसे खबर दूँ।
मनोरमा––(कुछ सोचकर) यदि कष्ट उठाकर तुम मेरे घर तक जाओ और मेरी सखी को मेरा हाल कह सको, तो वह सहज ही में मुझे छुड़ा लेगी।
कमलिनी––इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तुम अपने घर का पता और अपनी सखी का नाम बताओ। मैं जरूर उससे मिलकर तुम्हारा हाल कहूँगी और स्वयं भी जहाँ तक हो सकेगा, तुम्हें छुड़ाने के लिए उसका साथ दूँगी।
मनोरमा––यदि ऐसा करो तो मैं जन्म-भर तुम्हारा अहसान मानूँगी। जब उसके कान तक मेरा हाल पहुँच जायगा तो तुम्हारी मदद की आवश्यकता न रहेगी।
कमलिनी––खैर, अब पता और नाम बताने में विलम्ब न करो। कहीं ऐसा न हो कि कमलिनी आ जाय, तब कुछ न हो सकेगा।
मनोरमा––हाँ ठीक है-काशीजी में त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास लाल रंग का मकान एक छोटे से बाग के अन्दर है। मछली के निशान की स्याह रंग की झण्डी दूर से ही दिखाई पड़ेगी। मेरी सखी का नाम 'नागर' है, समझ गईं?
कमलिनी––मैं खूब समझ गई, मगर उसे मेरी बात का विश्वास कैसे होगा?
मनोरमा––इसमें विश्वास की कोई जरूरत नहीं है। वह मुझ पर आफत आने का हाल सुनते ही बेचैन हो जायगी और किसी तरह न रुकेगी। कमलिनी––तथापि मुझे हर तरह से दुरुस्त रहना चाहिए। शायद वह समझे कि यह मुझे धोखा देने आई है और चाहती है कि मैं घर के बाहर जाऊँ तो कोई मतलब निकाले।
मनोरमा––(कुछ सोचकर) हाँ, ऐसा हो सकता है। अच्छा, मैं तुम्हें एक परिचय बताती हूँ। जब वह बात उसके कान में कहोगी, तब वह तुम्हारा पूरा विश्वास कर लेगी। परन्तु उस परिचय को बड़ी होशियारी से अपने दिल में रखना, खबरदार! दूसरा न जानने पावे, नहीं तो मुश्किल होगी और मेरी जान किसी तरह न बचेगी।
कमलिनी––तुम विश्वास रक्खो कि वह शब्द सिवाय एक दफे के जब मैं तुम्हारी सखी के कान में कहूँगी, दूसरी दफे मेरे मुँह से न निकलेगा। (इधर-उधर देख कर) जन्दी कहो, अब देर न करो।
मनोरमा––(कमलिनी की तरफ झुक कर धीरे से) 'विकट' शब्द कहना। बस, सन्देह न करेगी और तुम्हें मेरा विश्वासपात्र समझेगी।
कमलिनी––ठीक है, अब जहाँ तक जल्द हो सकेगा, मैं तुम्हारी सखी के पास पहुँचूंगी और अपना मतलब निकालूँगी।
मनोरमा––पहले तो मुझे यह देखना है कि कमलिनी तुम्हें क्योंकर छोड़ती है! जब तुम छूट जाओगी तब कहीं जाकर मुझे अपने छूटने की कुछ उम्मीद होगी।
कमलिनी––(हँस कर) मैं उतनी ही देर में छूट जाऊँगी जितनी देर में तुम एक से लेकर निन्यानवै तक गिन सको।
इतना कह कर कमलिनी ने सीटी बजाई। सीटी की आवाज सुनते ही तारा और भूतनाथ जो वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपे हुए थे, कमलिनी के पास आ पहुँचे। कमलिनी ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा और कहा, "मुझे छोड़ दो।"
भूतनाथ ने कमलिनी को, जो पेड़ से बँधी हुई थी, खोल दिया। कमलिनी उठ कर मनोरमा के पास आई और बोली, "क्यों, मैं अपने कहे मुताबिक छूट गयी या नहीं!"
कमलिनी की चालाकी के साथ ही भूतनाथ की सूरत देखकर मनोरमा सन्न हो गई और ताज्जुब के साथ उन तीनों की तरफ देखने लगी। इस समय भूतनाथ के चेहरे पर उदासी के बदले खुशी की निशानी पाई जाती थी। भूतनाथ ने हँस कर मनोरमा की तरफ देखा और कहा, "क्या अब भी भूतनाथ तेरे कब्जे में है? अगर हो तो कह, इसी समय कमलिनी का सिर काट कर तेरे आगे रख दूँ, क्योंकि वह यहाँ मौजूद है।"
मनोरगा ने क्रोध के मारे दाँत पीसे और सिर नीचा कर लिया। थोड़ी देर बाद बोली, "अफसोस, मैं धोखा खा गई!"
कमलिनी––(तारा से) अब समय नष्ट करना ठीक नहीं। इस हरामजादी को तुम ले जाओ और लोहे वाले तहखाने में बन्द करो, फिर देखा जायगा। (अपने हाथ का नेजा देकर) इस नेजे को अपने पास रखो और वह खंजर मुझे दे दो। अब नेजे के बदले खंजर रखना ही मैं उत्तम समझती हूँ। यद्यपि एक खंजर मेरे पास है परन्तु वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह के लिए है। तारा––मैं भी यही कहना चाहती थी, क्योंकि खंजर और नेजे में गुण तो एक ही है फिर बोझ लेकर घूमने से क्या फायदा। यह लो खंजर, अपने पास रखो।
कमलिनी––(भूतनाथ से) तुम भी तारा के साथ जाओ और इस हरामजादी को हमारे घर पहुँचाकर बहुत जल्द लौट जाओ, तब तक मैं इसी जगह रहूँगी और तुम्हारे आते ही तुम्हें साथ लेकर काशीजी जाऊँगी। पहले तुम्हारा काम करके कुँअर इन्द्रजीतसिंह से मिलूँगी और मायारानी की मण्डली को, जिसने दुनिया में अन्धेर मचा रखा है, जहन्नुम में भेजूँगी।
भूतनाथ––(सिर झुकाकर) जो हुक्म!
5
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, कभी-कभी कुत्तों के भोंकने की आवाज के सिवाय और किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे समय में काशी की तंग गलियों में दो आदमी, जिनमें एक औरत और दूसरा मर्द है, घूमते हुए दिखाई देते हैं। ये दोनों कमलिनी और भूतनाथ हैं जो त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास मनोरमा के मकान पर पहुँचने की धुन में कदम बढ़ाये हुए तेजी के साथ जा रहे हैं। जब ये दोनों एक चौमुहानी के पास पहुँचे तो देखा कि दाहिनी तरफ से एक आदमी पीठ पर गट्ठर लादे आया और उसी तरफ को घूमा जिधर ये दोनों जाने वाले थे। कमलिनी ने धीरे से भूतनाथ के कान में कहा, "इस गठरी में जरूर कोई आदमी है।"
भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है। इस आदमी की चाल पर भी मुझे कुछ शक पड़ता है। ताज्जुब नहीं कि यह मनोरमा का नौकर श्यामलाल हो।
कमलिनी––तुम्हारा शक ठीक हो सकता है क्योंकि तुम बहुत दिनों तक मनोरमा के मकान पर रह चुके हो और वहाँ के हर एक आदमी को बखूबी जानते हो।
भूतनाथ––कहो तो इसे रोकू?
कमलिनी––हाँ-हाँ रोको, जाने न पावे।
भूतनाथ लपककर उस आदमी के सामने गया और कमर से खंजर निकालकर उसके सामने चमकाया। उसकी चमक में भूतनाथ और कमलिनी ने उस आदमी को पहचान लिया, मगर वह इन दोनों को अच्छी तरह न देख सका, क्योंकि बिजली की तरह चमकने वाली रोशनी ने उसकी आँखें बन्द कर दी और वह घबराकर बैठ गया। भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से लगाया जिसकी तासीर से वह एक दफे काँपा और बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। भूतनाथ ने उसे उसी तरह छोड़ दिया और गठरी का कोना खोलकर देखा तो उसमें एक कमसिन औरत बँधी पाई। कमलिनी के हुक्म से भूतनाथ ने वह गठरी अपनी पीठ पर लाद ली और मनोरमा के घर का रास्ता छोड़ दोनों आदमी गंगा-किनारे की तरफ रवाना हुए।
बात-की-बात में दोनों गंगा-किनारे जा पहुँचे। इस समय चन्द्रमा की रोशनी अच्छी तरह फैली हुई थी। एक मढ़ी के ऊपर बैठने के बाद भूतनाथ ने बह गठरी खोली। उस बेहोश औरत के चेहर पर चन्द्रमा की रोशनी पड़ते ही भूतनाथ चौंक कर बोला, "ओफ, यह तो कमला है!"
कमला होश में लाई गई। जब उसकी निगाह भूतनाथ के ऊपर पड़ी तो वह एकदम काँप उठी। कमला को उस दिन की बात याद आ गई जिस दिन खँडहर के तहखाने में अपने चाचा शेरसिंह पास भूतनाथ को देखा था, कमला को शक हो गया कि इस समय वह जिसके हुक्म से बेहोश करके लाई गई, वह भूतनाथ ही है। कमला की दूसरी निगाह कमलिनी पर पड़ी मगर वह कमलिनी को पहचान न सकी। यद्यपि कमला कमलिनी को रोहतासगढ़ पहाड़ी पर देख चुकी थी परन्तु इस समय कमलिनी उस भयानक राक्षसी के भेष में न थी, रंग काला जरूर था, परन्तु लम्बे-लम्बे दाँत उसके मुँह में न थे, इसी से वह कमलिनी को नहीं पहचान सकी।
कमलिनी ने जब देखा कि कमला बहुत ही डरी हुई और हैरान मालूम पड़ती है तो उसने कमला का हाथ पकड़ लिया और धीरे से दवाकर कहा, "कमला, तू डर मत। हम लोगों ने इस समय तुझे एक दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है।"
कमला––अब मेरा जी ठिकाने हुआ। मुझे उम्मीद है कि आप लोगों की तरफ से मुझे तकलीफ न पहुँचेगी। परन्तु आप लोगों को जानने के लिए मेरा जी बेचन हो रहा है।
कमलिनी––ठीक है, जरूर तेरा जी चाहता होगा कि हम लोगों का हाल जाने और इसी तरह मैं भी तुझसे बहुत-कुछ पूछना चाहती हूँ मगर इस समय केवल चार-पाँच घण्टे के लिए तुझसे जुदा होती हूँ, तब तक तू (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनके साथ रह। किसी तरह से डर मत, सवेरा होने के पहले ही मैं तुझसे आकर मिलूँगी और बातचीत के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने का उद्योग करूँगी।
कमला––मैं आपके हुक्म के खिलाफ कुछ न करूँगी। मैं आपसे हर तरह पर भलाई की आशा रखती हूँ क्योंकि आपने मुझे एक ऐसे दुश्मन के हाथ से जिसका हाल मैं ही जानती हूँ।
कमलिनी––अच्छा, तो अब बातों में समय नष्ट करना ठीक नहीं है। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, यहाँ छोटी-छोटी बहुत-सी डोंगियाँ बँधी हुई हैं, सन्नाटा और मौका देखकर कोई एक डोंगी खोल लो और कमला को साथ लेकर गंगा-पार चले जाओ। मैं अब मनोरमा के घर जाती हूँ, वहाँ अपना मतलब साधकर सवेरा होने के पहले ही तुमसे आ मिलूँगी।
कमला––(चौंककर) क्या नाम लिया, मनोरमा! हाय-हाय, वह तो बड़ी शैतान है। हम लोगों को तो उसने तबाह कर डाला! क्या तुम उसके …
कमलिनी––डर मत कमला! मनोरमा को मैंने कैद कर लिया है और अब एक
च॰ स॰-2-6
जरूरी काम के लिए उसके घर पर जा रही हूँ। (आसमान की तरफ देखकर) ओफ, बहुत बिलम्ब हुआ, खैर, अब बिदा होती हूँ, पुनः मिलने पर सब हाल कहूँगी।
कमलिनी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी ही देर में उस बाग के फाटक पर जा पहुँची जिसमें मनोरमा का मकान था। फाटक के साथ लोहे की एक जंजीर लगी हुई थी जिसे हिलाने से दरबान ने एक छोटे-से सुराख में से बाहर की तरफ देखा जो इसी काम के लिए बना हुआ था। केवल एक औरत को दरवाजे पर मौजूद पाकर दरबान ने फाटक खोल दिया और जब कमलिनी अन्दर चली आई तो फाटक उसी तरह बन्द कर दिया और तब कमलिनी से पूछा, "तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो?"
कमलिनी––मुझे मनोरमा जी ने पत्र देकर अपनी सखी नागर के पास भेजा है, तुम मुझे नागर के पास बहुत जल्द ले चलो।
दरबान––वह तो यहाँ नहीं हैं, किसी दूसरी जगह गई हैं।
कमलिनी––कब आवेंगी?
दरबान––सो मैं ठीक नहीं कह सकता।
कमलिनी––क्या तुम यह भी नहीं कह सकते कि वे आज या कल तक लौट आवेंगी या नहीं?
दरबान––हाँ, यह तो मैं कह सकता हूँ कि चार-पाँच दिन तक वे न आवेंगी; इसके बाद चाहे जब आवें।
कमलिनी––अफसोस, अब बेचारी मनोरमा नहीं बच सकती।
दरबान––(चौंककर) क्यों-क्यों? उन पर क्या आफत आई?
कमलिनी––यह एक गुप्त बात है जो मैं तुमसे नहीं कह सकती, हाँ, इतना कहने में कोई हर्ज नहीं कि यदि तीन दिन के अन्दर उन्हें बचाने का उद्योग न किया जायगा तो चौथे दिन कुछ नहीं हो सकता, वे अवश्य मार डाली जायेंगी।
दरबान––अफसोस, यदि आप एक दिन तक यहाँ अटकना मंजूर करें तो मैं नागरजी के पास जाकर उन्हें बुला लाऊँ। आपको यहाँ किसी तरह की तकलीफ न होगी!
कमलिनी––(कुछ सोचकर) मुझे एक जरूरी काम है, इसलिए अटक तो नहीं सकती, परन्तु कल शाम तक अपना काम करके लौट आ सकती है।
दरबान––यदि आप ऐसा कर तो भी काम चल सकता है, परन्तु आप अटक न जायँ। यदि आपका काम ऐसा हो जिसे हम लोग कर सकते हों तो आप कहें, उसका बन्दोबस्त कर दिया जायगा।
कालिनी नहीं, बिना मेरे गये वह काम नहीं हो सकता। मगर कोई चिन्ता नहीं, मैं कल शाम तक अवश्य आ जाऊँगी।
दरबान––जैसी मर्जी, आपकी मेहरबानी से यदि हमारे मालिक की जान बच जायगी तो हम लोग जन्म भर के लिए गुलाम रहेंगे।
कमलिनी––मैं अवश्य आऊँगी और उनके लिए हर तरह का उद्योग करूँगी, तुम जाती समय इसका बन्दोबस्त कर जाना कि यदि तुम्हारे लौट आने के पहले ही मैं यहाँ पहुँच जाऊँ तो मुझे यहाँ रहने में किसी तरह का तरद्दुद न हो।
दरबान––इससे आप बेफिक्र रहें, मैं पूरा-पूरा इन्तजाम करके जाऊँगा और नागरजी को लेकर बहुत जल्दी लौटूँगा।
फाटक खोल दिया गया और कमलिनी बाग के बाहर हो गई। वह अभी बीस कदम भी आगे न गई होगी कि एक आदमी बदहवास और दौड़ता हुआ उसी बाग के फाटक पर पहुँचा और दरवाजा खुलवाने का उद्योग करने लगा। कमलिनी जान गई कि यह वही आदमी है जिसके हाथ से अभी थोड़ी ही देर पहले मैंने कमला को छुड़ाया है। कमलिनी उसी जगह आड़ में खड़ी होकर उसे देखने और कुछ सोचने लगी। जब बाग का फाटक खुल गया और वह आदमी अन्दर चला गया तो न मालूम क्या सोचती विचारती कमलिनी भी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी रात बाकी थी, जब कमला और भूतनाथ के पास पहुँची जो गंगा-पार उसके आने की राह देख रहे थे। कमलिनी को बहुत जल्दी लौट आते देख भूतनाथ को ताज्जुब हुआ और उसने कहा––
भूतनाथ––मालूम होता है कि कुछ काम न हुआ और आपको खाली ही लौट आना पड़ा!
कमलिनी––हाँ, इस समय तो खाली ही लौटना पड़ा, मगर काम हो जायगा। नागर घर पर मौजूद न थी, उसका आदमी उसे बुलाने के लिए गया है। मैं कल शाम तक फिर वहाँ पहुँचने का वादा कर आई हूँ। इच्छा तो यही थी कि वहाँ अटक जाऊँ क्योंकि ऐसा करने से और भी कुछ काम निकलने की उम्मीद थी, परन्तु कमला के खयाल से लौट आना पड़ा। मैं चाहती हूँ कि कमला को रोहतासगढ़ रवाना कर दूँ क्योंकि उसकी जुबानी कुछ हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को ढाढ़स होगी और लड़कों के सोच में बहुत व्याकुल न रहेंगे। (कमला की तरफ देख कर) तेरी क्या राय है?
कमला––जो कुछ आप हुक्म दें मैं करने को तैयार हूँ, परन्तु इस समय मैं बहुत सी बातों का असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रही हूँ और सिवाय आपके कोई दूसरा मेरी दिलजमई नहीं कर सकता!
कमलिनी––कोई हर्ज नहीं, मैं हर तरह से तेरी दिलजमई कर दूँगी।
इतना सुनकर कमला भूतनाथ की तरफ देखने लगी। कमलिनी समझ गई कि यह निराले में मुझसे कुछ पूछना चाहती है। अस्तु, उसने भूतनाथ को वहाँ से हट जाने के लिए कहा और जब वह कुछ दूर चला गया तो कमला से बोली, "अब निराला हो गया, जो कुछ पूछना हो पूछो।"
कमला––मुझे आपका कुछ हाल भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ है परन्तु उस से पूरी दिलजमई नहीं होती। मुझे पूरा-पूरा पता लग चुका था कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह आपके यहाँ कैद हैं, फिर न मालूम, उन पर क्या आफत आई और उनके साथ आपने क्या सलूक किया। यद्यपि उस समय हम लोग आपके नाम से डरते थे, परन्तु जब आपने कई दफे हम लोगों के साथ नेकी की जिसका हाल आज मालूम हुआ है तो वह बात अब मेरे दिल से जाती रही, फिर भी कुँअर इन्द्रजीतसिंह के बारे में शक बना ही रहा है। कमलिनी––सुन, मैं तुझसे पूरा-पूरा हाल कहती हूँ। यह तो तुझे मालूम ही हो चुका कि मैं कमलिनी हूँ।
कमला––जी हाँ, यह तो (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनकी कृपा से मालूम हो गया और इन्हीं के जुबानी यह भी जान गई कि रोहतासगढ़ में उस कब्रिस्तान के अन्दर हाथ में चमकता हुआ नेजा लेकर आप ही ने हम लोगों की मदद की थी और बेहोश करके रोहतासगढ़ किले के अन्दर पहुँचा दिया था। दूसरी दफे राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को रोहतासगढ़ के कैदखाने से आप ही ने छुड़ाया था और तीसरी दफे उस खँडहर में यकायक विचित्र रीति से आप ही को पहुँचते हम लोगों ने देखा था।
कमलिनी––यद्यपि कुछ लोगों ने मुझे बदनाम कर रक्खा है, परन्तु वास्तव से मैं वैसी नहीं हूँ। मैं नेकी करने के लिए हरदम तैयार रहती हूँ, इसी तरह दुष्टों को मजा चखाने की भी नीयत रहती है। मैंने कुँअर इन्द्रजीतसिंह के साथ किसी तरह की बुराई नहीं की, बल्कि उनके साथ नेकी की और उन्हें एक बहुत बड़े दुश्मन के हाथ से छुड़ाया। जब वे तुम लोगों से मिलेंगे और हाल कहेंगे, तब मालूम होगा कि कमलिनी ने सच कहा था!
इसके बाद कमलिनी ने इन्द्रजीतसिंह का अपने लश्कर से गायब होना और उन्हें दुश्मन के हाथ से छुड़ाना, कई दिनों तक अपने मकान में रखना, माधवी को गिरफ्तार करना, किशोरी का रोहतासगढ़ के तहखाने से निकलना और धनपति के कब्जे में पड़ना, तारा के खबर पहुँचाने पर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर किशोरी को छुड़ाने के लिए जाना, रास्ते में शेरसिंह और देवीसिंह से मिलना, अग्निदत्त का हाल और अन्त में उस तिलिस्मी मकान के अन्दर सभी लोगों का कूद जाना आदि कमला से पूरा-पूरा बयान किया। कमला ताज्जुब से सब बातें सुनती रही और अब कमलिनी पर उसे पूरा पूरा विश्वास हो गया।
कमला फिर किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस खँडहर वाले तहखाने में क्योंकर पहुँचे?
कमलिनी––वह खँडहर एक छोटे से तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है। एक औरत जो मायारानी के नाम से पुकारी जाती है और जिसका हाल कुछ दिन बाद तुम लोगों को मालूम होगा, उस तिलिस्म पर राज्य करती है। मैं उसकी सगी बहिन हैं। हमारी तिलिस्मी किताब से साबित होता है कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह उस तिलिस्म को तोड़ेंगे क्योंकि तिलिस्म तोड़ने वालों के जो-जो लक्षण उस किताब में लिखे वे सब इन दोनों भाइयों में पाये जाते हैं, परन्तु मायारानी चाहती है कि तिलिस्म टने न पावे और इसीलिए वह दोनों कुमारों को अपनी कैद में रखने अथवा मार डालने का उद्योग कर रही है। मैंने उसे बहुत-कुछ समझाया और कहा कि तिलिस्म बनाने वालों के खिलाफ चलने और इन दोनों भाइयों से दुश्मनी रखने का नतीजा अच्छा न होगा परन्तु उसने न माना बल्कि वह मेरी भी दुश्मन बन बैठी। अन्त में लाचार मुझे उसका साथ छोड़ देना पड़ा। मैंने उस तालाब वाले मकान पर अपना कब्जा कर लिया और उसी में रहने लगी। उस मकान में मैं बेफिक्र रहती हूँ। मायारानी के कई आदमियों ने, जो नेक और ईमानदार थे, मेरा साथ दिया। तिलिस्म का जितना हाल उसे मालूम है, उतना ही मुझे भी मालूम है। यही सबब है कि वह अर्थात् तिलिस्मी महारानी (मायारानी) वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान के साथ दुश्मनी कर रही है और मैं हर तरह से उसकी मदद कर रही हूँ। उस तिलिस्मी मकान के अन्दर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों तथा मेरे नौकरों का हँसते-हँसते कूद जाना उसी तिलिस्मी महारानी की कार्रवाई थी और उस खँडहर वाले तहखाने में जो कुछ तुम लोगों ने देखा, वह सब भी उसी की बदौलत थी। अफसोस, गुप्त राह से महारानी के बहुत से आदमियों के पहुँच जाने के कारण मैं कुछ कर न सकी। खैर, कोई हर्ज नहीं। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी तथा कामिनी वगैरह का मायारानी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि उसकी असल जमा-पूँजी जो थी, वह मेरे हाथ लग चुकी है जिसका खुलासा हाल इस समय मैं नहीं कह सकती। हाँ, इतना प्रतिज्ञापूर्वक कहती हूँ कि उन लोगों को मैं बहुत जल्द कैद से छुड़ाऊँगी।"
कमला––मैं समझती हूँ कि वह मकान भी तिलिस्मी होगा जिसके अन्दर कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद पड़े थे।
कमलिनी––नहीं, उस मकान का तिलिस्म से कोई सम्बन्ध नहीं, वह नया बनाया गया है। मुझे उसकी खबर न थी इसी से मैं धोखे में आ गई, पीछे पता लगाने से मालूम हुआ कि वह भी मायारानी की कार्रवाई थी।
कमला––अब मेरा जी ठिकाने हुआ और आपकी बदौलत अपनी प्यारी सखी किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह के छूटने की उम्मीद हई। अब आशा है कि आपकी कृपा से एक दफे मायारानी को भी देखूँगी।
कमलिनी––इसके लिए जल्दी करना मुनासिब नहीं, मैं आज ही कल में तुझे अपने साथ मायारानी के घर ले चलती, क्योंकि मुझे वहाँ जाने की बहुत जल्दी है परन्तु इस समय तेरा रोहतासगढ़ लौट जाना ही ठीक है क्योंकि राजा वीरेन्द्रसिंह लड़कों की जुदाई में हद से ज्यादे दुःखी होंगे, तेरे लौट जाने से उन्हें ढाढ़स होगा और मेरी जुबानी जो कुछ तूने सुना है जब उनसे बयान करेगी तो उन्हें एक प्रकार की आशा हो जायगी। हाँ, एक बात तुझसे पूछना मैं भूल गई।
कमला––वह क्या?
कमलिनी––तू कहती है कि मैं मायारानी को देखना चाहती हूँ, तो क्या तूने उसे नहीं देखा? उसी के आदमी तो तुझे गिरफ्तार करके ले गए थे, जहाँ तक मैं समझती हूँ, तू उसके पास जरूर पहुँचाई गई होगी।
कमला––हाँ-हाँ, मैं एक जनाने दरबार में पहुँचाई गई थी मगर यह नहीं कह सकती कि वह मायारानी का ही दरवार था या कोई दूसरा, और यदि मायरानी का ही दरवार था तो ……
कमलिनी––पहले तू अपना हाल कह जा कि जब खँडहर के अन्दर तहखाने में घुमी तो क्या हुआ और क्योंकर गिरफ्तार होकर कहाँ गई?
कमला––जब हम लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ कुमार को निकालने के लिए उस खँडहर वाले तहखाने में गये तो वहाँ किसी को न पाया। सीढ़ी के नीचे एक छोटी कोठरी थी, मैं उसमें घुस गई। देखा कि पत्थर की एक सिल्ली दीवार से अलग होकर जमीन पर पड़ी हुई और उस जगह एक आदमी के जाने लायक रास्ता है। उस दरवाजे के दूसरी तरफ एक और कोठरी नजर आई जिसमें चिराग जल रहा था। मैंने आनन्द सिंह और तारासिंह को पुकारा, जब वे आ गए तो तीनों आदमी उस कोठरी के अन्दर घसे। जब दो-तीन कदम आगे गये तो यकायक पीछे से खटके की आवाज आई, घूमकर देखा तो वह रास्ता बन्द पाया जिधर से आये थे। ताज्जुब में आकर हम लोग सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। यकायक कई आदमी एक तरफ से निकलकर आये और उन लोगों ने फुर्ती के साथ एक-एक चादर हम लोगों के ऊपर डाल दी। मुझे उस चादर की तेज महक कभी न भूलेगी। सिर पर पड़ते ही अजब हालत हो गई, एक प्रकार की तेज महक नाक के अन्दर घुसी और उसने तन-बदन की सुध भुला दी। न मालूम उसी दिन या दूसरे या कई दिन के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को रात के समय एक जनाने दरबार में पाया।
कमलिनी––वह दरबार कैसा था?
कमला––वह दरबार एक बारहदरी में था। जड़ाऊ सिंहासन पर एक नौजवान औरत दक्षिणी ढंग की पोशाक पहने बैठी थी। मैं कह सकती हूँ कि सिवाय किशोरी के उसके मुकाबले की खूबसूरत औरत आज तक किसी ने न देखी होगी।
कमलिनी––बस-बस, मैं समझ गई, वही मायारानी थी। हाँ, और क्या देखा?
कमला––उसके दाहिनी तरफ सोने की एक चौकी पर मृगछाला बिछा हुआ था मगर उस पर कोई बैठा न था।
कमलिनी––वह तिलिस्म के दरोगा की जगह थी जो वृद्ध साधु के वेष में रहता है, मगर आज कल उसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने कैद कर लिया है।
कमला––(ताज्जुब से) राजा वीरेन्द्रसिंह ने कब और किस दारोगा को कैद किया है?
कमलिनी––उस तिलिस्मी खँडहर में जब तुम लोग गये तो किसी साधु को बेहोश पाया था या नहीं?
कमला––(कुछ सोचकर) हाँ-हाँ, एक कोठरी के अन्दर जिसमें एक मूरत थी। क्या वही तिलिस्मी दारोगा है?
कमलिनी––हाँ, वही दारोगा है, वही बहुत से आदमियों को साथ लेकर तहखाने में से कुमार को उठा लाने के लिए उस खँडहर में गया था, मगर तारासिंह की चालाकी से अपने साथियों के सहित बेहोश हो गया। उस समय वेष बदले मेरा भी एक आदमी वहाँ मौजूद था, मगर दूर ही से सब-कुछ देख रहा था। हाँ तो उस दरबार में और क्या देखा?
कमला––उस मृगछाला बिछी हुई चौकी के पास अर्धगोलाकार बीस जड़ाऊ कुर्सियाँ और थीं और उसी तरह सिंहासन के बाईं तरफ छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर एक खूबसूरत औरत बैठी हुई थी जिसके बाद फिर बीस या इक्कीस जड़ाऊ कुर्सियाँ थीं, और दोनों तरफ वाली जड़ाऊ कुर्सियों पर नौजवान और खूबसूरत औरतें बड़े ठाठ से बैठी थीं । मैं उस दरबार को कभी न भूलूँगी।
कमलिनी––ठीक है, तो अब तुझे मायारानी को देखने की कोई आवश्यकता नहीं, खैर, मुख्तसिर में कह, फिर क्या हुआ?
कमला––पहले यह बता दीजिये कि मायारानी के बगल में छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर कौन औरत थी, क्योंकि वह भी बड़ी ही खूबसूरत थी?
कमलिनी––वह मेरी छोटी बहिन थी। सब से बड़ी मायारानी, उससे छोटी मैं और मुझसे छोटी वही औरत है, उसका नाम लाड़िली है।
कमल––आपकी और भी कोई बहिन है?
कमलिनी––नही, हम तीनों के सिवाय और कोई बहिन या भाई नहीं है। अब तू अपना हाल कह, फिर क्या हुआ?
कमला––मायारानी के सिंहासन के पीछे मनोरमा खड़ी थी। उन सभी की बातचीत से मुझे मालूम हुआ कि उसका नाम मनोरमा है। वह बड़ी दुष्ट थी!
कमलिनी––थी नहीं, बल्कि है। हाँ, तब क्या हुआ?
कमला––ऐसे दरबार को देख मैं घबरा गई। जिधर निगाह पड़ती थी उधर ही एक से एक बढ़ के जड़ाऊ चीजें नजर आती थीं। मैं हैरान थी कि इतनी दौलत इन लोगों के पास कहाँ से आई और ये लोग कौन हैं। मैं ताज्जब में आकर चारों तरफ देखने लगी। यकायक मेरी निगाह कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह पर पड़ी। कुँअर आनन्दसिंह हथकड़ी और बेड़ी से लाचार मेरे पीछे की तरफ बैठे थे। उनके पास उन्हीं की तरह हथकड़ी-वेड़ी से वेबस तारासिंह भी बैठे थे। फर्क इतना था कि कुँअर आनन्दसिंह जख्मी न थे, मगर तारासिंह बहुत ही जख्मी और खून से तरबतर हो रहे थे। उनकी पोशाक खून से रँगी हुई मालूम पड़ती थी। यद्यपि उनके जख्मों पर पट्टी बँधी हुई थी मगर सुरत देखने से साफ मालूम पड़ता था कि उनके बदन से खून बहुत निकल गया है और इसी से वे सुस्त और कमजोर हो रहे हैं। कुमार की अवस्था देखकर मुझ क्रोध चढ़ आया, मगर क्या कर सकती थी, क्योंकि हथकडी और बेडी ने मुझे भी लाचार कर रक्खा था। हाथ में नंगी तलवारें लिए कई औरतें कुँअर आनन्दसिंह, तारासिंह और मुझको घेरे हुए थीं। यह जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा था कि जब हम लोग बेहोश करके यहाँ लाए गये तो तारासिंह को जख्मी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। मायारानी ने मनोरमा की तरफ देखा और कुछ इशारा किया, मनोरमा तुरत मेरे पास आई। उसके एक हाथ में कोई चिट्ठी थी और दूसरे हाथ में कलम और दावात। मनोरमा ने वह चिट्ठी मेरे आगे रख दी और उस पर हस्ताक्षर कर देने के लिए मुझे कहा, मैंने चिट्ठी पढ़ी और क्रोध के साथ हस्ताक्षर करने से इनकार किया।
कमलिनी––उस चिट्ठी में क्या लिखा हुआ था? कमला-वह चिट्ठी मेरी तरफ से राजा वीरेन्द्रसिंह के नाम लिखी गई थी और उसमें यह लिखा था––
"आप चिट्ठी देखते ही केवल एक ऐयार को लेकर इस आदमी के साथ बेखौफ चले आइए। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी वगैरह इसी जगह कैद हैं। उनको छुड़ाने का पूरा-पूरा उद्योग में कर चुकी हूँ, केवल आपके आने की देर है। यदि आप तीन दिन के अन्दर यहाँ न पहुँचेंगे तो इन लोगों में से एक की भी जान न बचेगी।"
कमलिनी––अच्छा फिर क्या हुआ?
कमला––जब मैंने दस्तखत करने से इनकार किया तो मनोरमा बहुत बिगड़ी और बोली कि "यदि तू हस्ताक्षर न करेगी, तो तेरे सामने ही कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह का सिर काट लिया जायगा और उसके बाद तुझे भी सूली दे दी जायगी।" यह सुनकर मैं घबरा गई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। इतने में ही। तारासिंह ने मुझे पुकारकर कहा, "कमला, उस चिट्ठी में जो कुछ लिखा है मैं अन्दाज से कुछ-कुछ समझ गया। खबरदार, इन लोगों की धमकी में न आना, और चाहे जो हो, उस चिट्ठी पर दस्तखत भी न करना।" तारासिंह की बात सुनकर मायारानी की तो केवल भौंहें ही चढ़कर रह गयीं, परन्तु मनोरमा बहुत ही उछली-कूदी और बकझक करने लगी। उसने मायारानी की तरफ देखकर कहा, "कम्बख्त तारासिंह को अवश्य सूली देनी चाहिए उसने अब यहाँ का रास्ता भी देख लिया है इसलिए उसका मारना आवश्यक हो गया है, और इस नालायक कमला को सरकार मेरे हवाले करें, मैं इसे अपने घर ले जाऊँगी।" मायारानी ने इशारे से मनोरमा की बात मंजूर की। मनोरमा ने एक चोबदार औरत की तरफ देखकर कहा, "कमला को ले जाकर कैद में रखो। चार-पाँच दिन बाद काशीजी में हमारे घर पर भिजवा देना, क्योंकि इस समय मुझे एक जरूरी काम के लिए जाना है जहाँ से तीन-चार दिन के अन्दर शायद न लौट सकूँगी।" हुक्म के साथ ही मुझ पर पुनः चादर डाल दी गई जिसकी तेज महक ने मुझको बेहोश कर दिया और फिर जब मैं होश में आई, तो अपने को एक अँधेरी कोठरी में कैद पाया। कई दिन तक मैं उसी कोठरी में कैद रही और इस बीच में जो कुछ रंज और तकलीफ उठानी पडी, उसका कहना व्यर्थ है। आखिर एक दिन भोजन में मुझे बेहोशी की दवा दी गई और बेहोश होने के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को आपके कब्जे में पाया। अब न मालूम कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, किशोरी और उनके ऐयार लोगों पर क्या मुसीबत आई और वे लोग किस अवस्था में पड़े हुए हैं!
यहाँ तक कहकर कमला चुप हो गई मगर उसकी आँखों से आँसू की बूँदें बराबर जारी थीं। कमलिनी भी बड़े गौर और अफसोस के साथ उसकी बातें सुनती जाती थी और जब वह चुप हो गई तो बोली––
कमलिनी––कमला, सब्र कर, घबरा मत। देख, मैं उन लोगों को कैसा छकाती हूँ। उन लोगों की क्या मजाल जो मेरे हाथ से बचकर निकल जायें। तिलिस्मी मकान के अन्दर जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद गये थे तो उन लोगों के पहले मैंने अपने कई आदमी उस मकान के अन्दर कुदाये थे जिसका हाल थोड़ी देर पहले मैं तुझके कह चुकी हूँ। मैंने उन आदमियों को बेसबब दुश्मनों के हाथ में नहीं फँसाया, कुछ समझ-बूझ के ही ऐसा किया था। वे लोग साधारण मनुष्य न थे, आशा है कि थोड़े दिन में तू सुन लेगी कि उन लोगों ने क्या-क्या कार्रवाई की।
कमला––आज आपके मिलने से और बहुत-सी बातें सुनकर मेरा जी ठिकाने हुआ। आप सरीखा मददगार के पाकर मैं भी अपने जी का हौसला निकालना चाहती हूँ और …
कमलिनी––नहीं-नहीं, इस समय तू और कुछ मत सोच और सीधे रोहतासगढ़ चली जा। तेरे वहाँ जाने से दो काम निकलेंगे, एक तो तेरी जुबानी सब हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को बहुत-कुछ ढाढ़स होगी, दूसरे, तू इस बात से भी होशियार रहना और सबको भी होशियार कर देना कि वह तिलिस्मी दारोगा अर्थात् बूढ़ा साधु कहीं घोखा देकर निकल न जाय। इसमें कोई शक नहीं कि मायारानी ने उसे छुड़ाने के लिए कई आदमी रोहतासगढ़ भेजे होंगे।
कमला––बहुत अच्छा! मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ और उस बुड्ढे कम्बख्त से होशियार रहूँगी। मगर एक भेद बहुत दिनों से मेरे दिल में खटक रहा है, यदि आप चाहें तो मेरे दिल से वह खुटका निकाल सकती हैं।
कमलिनी––वह क्या है?
कमला––(भूतनाथ की तरफ इशारा करके) यह कौन हैं? इनका असल भेद मुझको बता दीजिये।
कमलिनी––(हँसकर) इसमें सन्देह नहीं कि भूतनाथ के बारे में तरह-तरह की बातें तू सोचती होगी, परन्तु लाचार है कि इस समय इनका असल भेद तुझसे नहीं कह सकती। थोड़े ही दिनों में इनका हाल तुझे ही नहीं, सभी को मालूम हो जायगा। हाँ, इतना अवश्य कहूँगी कि तुझे अपने चाचा शेरसिंह की तरह इनसे डरने की कोई जरूरत नहीं। ये तुझे किसी तरह की तकलीफ न देंगे, बल्कि जहाँ तक हो सकेगा, तेरी मदद करेंगे।
कमलिनी से अपने सवाल का पूरा-पूरा जवाब न पाकर कमला चुप हो रही और कमलिनी की आज्ञानुसार उसको उसी समय रोहतासगढ़ चले जाना पड़ा।
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इसी दरबार में रामभोली का आशिक नानक गया था।
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दूसरे दिन कुछ रात बीते कमलिनी फिर मनोरमा के मकान पर पहुँची। बाग के फाटक पर उसी दरबान को टहलते पाया जिससे कल बातचीत कर चुकी थी। इस समय बाग का फाटक खुला हुआ था और उस दरबान के अतिरिक्त और भी कई सिपाही वहाँ मौजद थे। दरबान कमलिनी को देखते ही खुशी से आगे बढ़ा और बोला, "आइये आइये, मैं कब से आपकी राह देख रहा हूँ। नागरजी को आये दो घण्टे से ज्यादा हो गये और वे आपसे मिलने के लिए बेताब हो रही हैं।" दरबान के साथ ही साथ कमलिनी बाग के अन्दर गई और उस आलीशान मकान के सहन में पहुँची जो इस बाग के बीचोंबीच बना हुआ था। इस मकान के कमरों, दालानों, कोठरियों, तहखानों और पेचीले रास्तों का यदि यहाँ पूरा-पूरा बयान किया जाय तो पाठकों का बहुत समय नष्ट होगा, क्योंकि इस हिकमती मकान के हरएक दर्जे और हरएक हिस्से बड़ी कारीगरी और मतलब के साथ बनाये गये हैं। यदि हमारे पाठकों को तीन-चार बार इस मकान के अन्दर जाने और रात भर रहने का मौका मिल जायगा तो उन्हें यहाँ का बहुत भेद मालूम हो जायगा।
कमलिनी ने नागर को सहन में टहलते हए पाया। वह सिर नीचा किये किसी सोच में डूबी हुई टहल रही थी, कमलिनी के पैर की आहट पाकर चौंकी और बोली––
नागर––क्या मेरी सखी मनोरमा का सन्देशा लेकर तुम ही आई हो?
कमलिनी––हाँ।
नागर––तुम कौन और कहाँ की रहने वाली हो? मैंने तुम्हें सिवाय आज के पहले कभी नहीं देखा।
कमलिनी––हाँ, ठीक है, परन्तु मैं अपना परिचय किसी तरह नहीं दे सकती।
नागर––यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारी बातों पर क्योंकर विश्वास करूँगी?
कमलिनी––यदि मेरी बातों पर विश्वास न करोगी तो मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा अगर कुछ बिगड़ेगा तो तुम्हारा या तुम्हारी सखी मनोरमा का। जब मनोरमा ने मुझे तुम्हारे पास भेजा तो मुझे भी इस बात का तरद्दुद हुआ और मैंने उनसे कहा कि तुम मुझे भेजती तो हो, मगर जाने से कोई काम न निकलेगा क्योंकि मैं किसी तरह अपना परिचय किसी को नहीं दे सकती और बिना मुझे अच्छी तरह जाँचे नागर मेरी बात पर विश्वास न करेंगी। इसके जवाब में मनोरमा ने कहा कि मैं लाचार हूँ, सिवाय तेरे यहाँ पर मेरा हित कोई नहीं जिसे नागर के पास भेजूँ। यदि तू न जायेगी तो मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती। खैर, तुम्हें मैं एक शब्द बताती हूँ, मगर खबरदार, वह शब्द सिवाय नागर के किसी दूसरे के सामने जबान से न निकालना। जिस समय नागर तेरी जबान से वह शब्द सुनेगी, उसी समय उसका शक जाता रहेगा और जो कुछ तू उसे कहेगी वह अवश्य करेगी। आखिर मनोरमा ने वह शब्द मुझे बताया और उसी के भरोसे मैं यहाँ तक आई हूँ।
नागर––(कुछ सोचकर) वह शब्द क्या है?
कमलिनी––(चारों तरफ देखकर और किसी को न पाकर) 'विकट'!
नागर––(कुछ देर तक सोचने के बाद) खैर, मुझे तुम पर भरोसा करना पड़ा। अब कहो, मनोरमा किस अवस्था में है और मुझे क्या करना चाहिए?
कमलिनी––मनोरमा भूतनाथ से मिलने के लिए गई थी, मगर उससे मुलाकात होने पर न मालूम कौन-सा ऐसा सबब आ पड़ा कि उसने भूतनाथ का सिर काट लिया।
नागर––(चौंककर) हैं! भूतनाथ को मार ही डाला!
कमलिनी––हाँ, उस समय मैं मनोरमा के साथ, मगर कुछ दूर पर, खड़ी यह हाल देख रही थी।
नागर––अफसोस, मनोरमा ने बहुत ही बुरा किया! आजकल भूतनाथ से बहुत कुछ काम निकलने का जमाना था। खैर, तब क्या हुआ?
कमलिनी––मनोरमा को मालूम न था कि राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार तेजसिंह इस समय थोड़ी ही दूर पर एक पेड़ की आड़ में खड़ा भूतनाथ और मनोरमा की तरफ देख रहा है।
नागर––ओफ, तेजसिंह को भूतनाथ के मरने का सख्त रंज हुआ होगा, क्योंकि इन दिनों भूतनाथ दिलोजान से उन लोगों की मदद कर रहा था, अच्छा तब?
कमलिनी––तेजसिंह बड़ी फुर्ती से उस जगह जा पहुँचा जहाँ मनोरमा खड़ी थी और एक लात मनोरमा की छाती पर ऐसी लगाई कि वह बदहवास हो जमीन पर गिर पड़ी। तेजसिंह ने उसकी मुश्कें बाँध लीं और जफील बजाई, जिसकी आवाज सुन कई आदमी वहाँ आ पहुँचे। उन लोगों ने मनोरमा के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर लिया। उसी समय मनोरमा के कई सवार दूर से आते हुए दिखाई पड़े, मगर उन लोगों के पहुँचने के पहले ही तेजसिंह और उसके साथी हम दोनों को लेकर वहाँ से थोड़ी दूर पर पेड़ों की आड़ में जा छिपे। दूसरे दिन हम दोनों ने अपने को रोहतासगढ़ किले के अन्दर पाया। मनोरमा ने अपने छूटने की बहुत-कुछ कोशिश की, मगर कोई काम न चला। आखिर उसने तेजसिंह से कहा कि "भूतनाथ बड़ा ही शैतान, नालायक और खूनी आदमी था; उसका असल हाल आप लोग नहीं जानते, यदि जानते तो आप लोग खुद भूतनाथ का सिर काट डालते।" इसके जवाब में तेजसिंह ने कहा कि "यदि इस बात को तू साबित कर दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा।" मनोरमा ने मेरी तरफ इशारा करके कहा कि "यदि आप इसे छोड़ दें और पाँच दिन की मोहलत दें तो इसे मैं अपने घर भेजकर भूतनाथ के लिखे थोड़े कागजात ऐसे मँगा दूँ कि जिन्हें पढ़ते ही आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाय और भूतनाथ का वह विचित्र हाल भी, जिसे आप लोग नहीं जानते, मालूम हो। यदि मैं झूठी निकलूं तो जो कुछ चाहें, मुझे सजा दीजियेगा।" तेजसिंह ने कुछ देर सोच-विचार कर कहा कि "हो सकता है मुझसे बहाना करके इसे घर भेजो और किसी तरह की मदद मँगाओ, मगर मुझे इसकी कुछ परवाह नहीं, मैं तुम्हारी बात मंजूर करता हूँ और इसे (मेरी तरफ इशारा करके) छोड़ देता हूँ, जो कुछ चाहो, इसे समझा-बुझाकर अपने घर भेजो।" इसके बाद मुझसे निराले में बातचीत करने के लिए आज्ञा माँगी गई और तेजसिंह ने उसे भी मंजूर किया। आखिर मनोरमा ने मुझे बहुत-कुछ समझा-बुझाकर तुम्हारे पास रवाना किया। अब मैं तो रोहतासगढ़ जाने वाली नहीं, क्योंकि बड़ी मुश्किल से जान बची है, मगर तुम्हें मुनासिब है कि जहाँ तक हो सके, भूतनाथ के कागजात लेकर जल्द रोहतासगढ़ जाओ और अपनी सखी के छुड़ाने का बन्दोवस्त करो।
कमलिनी की बातें सुनकर नागर सोच-सागर में डूब गयी। न मालूम उसके दिल में क्या-क्या बातें पैदा हो रही थीं, मगर लगभग आधी घड़ी के वह चुपचाप बैठी रही। इसके बाद उसने सिर उठाया और कमलिनी की तरफ देखकर कहा, "खैर, अब मुझे रोहतासगढ़ जाना जरूरी हुआ। रात-भर में वे सब इन्तजाम करके सवेरे या कुछ दिन चढ़े रवाना हो जाऊँगी।"
कमलिनी––अच्छा, तो मेरे जिम्मे जो कुछ काम था उसे मैं कर चुकी। अब तुम जो मुनासिब समझो करो और मुझे आज्ञा दो कि जाऊँ और अपना काम देखूँ।
नागर––इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुमने मुझ पर और मनोरमा पर भारी अहसान किया। अब मैं चाहती हैं कि आज की रात यहाँ रह जाओ क्योंकि मनोरमा को छुड़ाने के लिए रात भर में मैं जो कुछ इन्तजाम करूँगी उसका हाल सवेरे तुमसे कहूँगी और उसके बाद तुमसे कुछ सलाह करके तब रोहतासगढ़ जाऊँगी।
कमलिनी––मैं इस योग्य नहीं हूँ कि तुम्हें राय दूँ परन्तु रात भर के लिए अटक जाने में मेरा कोई हर्ज नहीं है, यदि इससे आप लोगों की कुछ भी भलाई हो।
नागर ने कमलिनी के लिए एक कमरा खोल दिया और उसके खाने-पीने के लिए बखूबी इन्तजाम कर दिया।
7
आधी रात जा चुकी है। कमलिनी उस कमरे में, जो उसके सोने के लिए मुकर्रर किया गया था, चारपाई पर लेटी हुई करवटें बदल रही है क्योंकि उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं है। उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होती और मिटती हैं। उसे इस कोठरी की बनावट ने और भी तरदुद में डाल रखा है। यद्यपि इस कोठरी में विशेष सामान नहीं और न किसी तरह की सजावट ही है, केवल एक चारपाई जिस पर कमलिनी सोई है और एक चौकी पड़ी है तथा कोने में एक शमादान जल रहा है परन्त तीन तरफ की दीवारों पर वह ताज्जुब और तरदुद की निगाह डाल रही है। इस कमरे की एक तरफ की दीवार, जिधर से इसमें आने के लिए दरवाजा था, ईंट और चने से बनी हुई थी, परन्तु बाकी तीन तरफ की दीवारें तख्तेबन्दी की थीं, अर्थात लकडी से बनी हई थीं। कमलिनी के दिल में शक पैदा हआ और उसने सोचा कि इन तख्तेबन्दी की दीवारों में कोई भेद जरूर है। इस मकान का कछ-कछ भेद कमलिनी को मालम था, पर यहाँ का पूरा-पूरा हाल वह नहीं जानती थी और जानने की इच्छा रखती थी। आखिर कमलिनी से न रहा न गया, और वह चारपाई से उठी। पहले उसने उस दरवाजे को भीतर की तरफ से बन्द किया जो इस कमरे में आने-जाने के लिए था। इसके बाद कमर से खंजर निकाल लिया और उसके कब्जे से तख्तेबन्दी की दीवारों को जगह-जगह से ठोंककर देखने लगी। एक जगह से उसे दीवार पोली मालूम पड़ी और उस पर वह बखूबी गौर करने लगी। जब कुछ मालूम न हआ तो उसने शमादान उठा लिया और फिर उस जगह को गौर से देखा। थोड़ी ही देर में उसे विश्वास हो गया कि यहाँ पर एक छोटा-सा दरवाजा है, क्योंकि दरवाजे के चारों तरफ की बारीक दरार का निशान बहुत गौर करने पर मालूम होता था। कमलिनी ने दरार में खंजर की नोक चुभोई और उसे अच्छी तरह दो-चार बार हिलाया। दरार बड़ी हो गयी और आधा खंजर उसके अन्दर चला गया। फिर से कोशिश करने पर लकड़ी का एक तख्ता अलग हो गया और दूसरी तरफ जाने लायक रास्ता निकल आया।
हाथ में शमादान लिए हुए कमलिनी अन्दर घुसी और एक बहुत लम्बी-चौड़ी कोठरी में पहुँची। इस कोठरी में चारों तरफ की दीवार भी तख्तेबन्दी की थी इसमें कई चीजें ऐसी पड़ी हुई थीं जिनके देखने से चाहे कैसा ही संगदिल और दिलावर आदमी क्यों न हो, एक दफे जरूर काँप उठे और उसका कलेजा मामूली से चौगुना और अठगुना धड़कने लग जाय।
इस कोठरी में एक घोड़े की लाश थी, मगर वह अजीब ढंग की थी। उसके चारों तरफ चार खूँटियाँ जमीन में गड़ी हुई थीं और उन खूँटियों के सहारे उस घोड़े के चारों पैर बँधे हुए थे। उस घोड़े का पेट चीरा हुआ और आँतें निकाल कर बाहर रक्खी हुई थीं। चारों तरफ खून फैला हुआ था, मालूम होता था कि यह घोड़ा किसी काम के लिए आज ही मारा गया है। उसके पास ही थोड़ी दूर पर फूलों के कई गमले रक्खे हुए थे और उनके पास ही एक सुन्दर बिछौना था जिस पर सफेद चादर बिछी हुई थी तथा उस पर एक आदमी गर्दन तक सफेद ही चादर ओढ़े सो रहा था। घोड़े के पास से लेकर उस बिछावन तक पैर से लगे हुए खून के दाग जमीन पर दिखाई दे रहे थे और बिछावन की चादर तथा उस चादर में भी, जो वह आदमी ओढ़े हुए था, खून के धब्बे लगे हुए थे।
उस आदमी को देखकर कमलिनी इसलिए हिचकी कि कहीं वह जागकर कमलिनी को देख न ले, मगर थोड़ी देर तक खड़े रहने पर भी उसके हिलने-डुलने अथवा उसकी साँस चलने की आहट न मिली। तब कमलिनी हाथ में शमादान लिए हए उस विछावन के पास गई और रोशनी में उस आदमी की सूरत देखने लगी जिसका बिल्कुल चेहरा बखूबी खुला हुआ था। सूरत देखते ही कमलिनी चौंक पड़ी और शमादान जमीन पर रख बेधड़क उस आदमी का बाजू पकड़ के हिलाने और यह कहकर उसको जगाने का उद्योग करने लगी कि "वाह-वाह! तुम यहाँ बेखबर पड़े हुए हो और मुझे इसका हाल जरा भी नहीं मालूम!"
जब बाजू पकड़ के हिलाने से भी वह आदमी न जागा तब कमलिनी को ताज्जुब हआ और गौर से उसकी सूरत देखने लगी, मगर नब्ज पर हाथ रक्खा तो मालूम हो गया कि वह जिन्दा नहीं, बल्कि मुर्दा है। यह जानते ही कमलिनी का जी भर आया और वह मुर्दे के सिर पर हाथ रखकर रोने और गरम-गरम आँसू गिराने लगी। थोड़ी देर तक कमलिनी इसी अवस्था में पड़ी रही, आखिर वह चैतन्य हुई और यह कहकर उठ खड़ी हुई कि "बात तो बहुत ही बुरी हुई, मगर इस समय मुझे सब्र करना चाहिए, नहीं तो कुछ भी न कर सकूँगी। हाय, मेरा दिल और मेरे काबू में न रहे! नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं पूरा-पूरा सब करूँगी और देखूँगी कि क्या कर सकती हूँ। इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि इसकी जान निकले चार पहर से ज्यादा अभी नहीं हुए।" कमलिनी फिर शमादान उठाकर उस कोठरी में घूमने और चारों तरफ देखने लगी। पूरब और दक्खिन के कोने में एक लाश छत से लटकती हुई दिखाई पड़ी जिसके गले में फाँसी लगी थी। वह ताज्जुब के साथ शमादान ऊँचा करके उसकी सूरत देखने लगी, जब अच्छी तरह पहचान चुकी तो नफरत के साथ उस लाश पर थूककर अपना मुँह फेर लिया और दूसरी तरफ चली ही थी कि यह आवाज सुनकर ठहर गई और उस तरफ देखने लगी, जिधर से आवाज आई थी। आवाज यह थी––"हाय, मौत को भी मौत आ गई!" उसे ताज्जुब मालूम हुआ कि यह आवाज किधर से आई! वह यह देखने के लिए उस तरफ बढ़ी, जिधर से आवाज आई थी कि शायद कोई सूराख या खिड़की दिखाई दे और आखिर ऐसा ही हआ। दीवार के पास पहुँचते ही एक सूराख ऐसा दिखा जिसमें आदमी की गर्दन वखूबी जा सकती थी। यह टेढ़ा और नीचे की तरफ झुका हुआ सूराख, जिसे किसी कमरे का रोशनदान कहना चाहिए, दीवार के बिल्कुल नीचे की तरफ था।
कमलिनी ने उस सूराख में से झाँककर देखा तो एक छोटे से मगर सजे हुए कमरे में निगाह गई। यह कमरा उस कोठरी से एक खंड नीचे था जिसमें से कमलिनी झाँक रही थीं। उस कमरे में जो कुछ कमलिनी ने देखा, उससे उसके दिल को बड़ा ही सदमा पहुँचा और जब तक वह देखती रही उसकी आँखों से आँसू बराबर जारी रहे।
कमलिनी ने देखा कि एक पलंग पर, जिसके पास ही शमादान जल रहा है, आफत की मारी बेचारी किशोरी पड़ी हुई है। रंज और गम के मारे सुखकर काँटा हो रही है। चेहरे पर मुर्दनी छायी हुई है और कमजोरी की यह अवस्था है कि साँस भी मुश्किल से आती-जाती है। थोड़ी-थोड़ी देर पर उसके होंठ हिलते हैं और धीरे-धीरे कुछ कहती है, मगर जब कहती है तो उसकी आवाज साफ सुनाई देती है। वह कह रही थी––
"हाय, इससे बढ़कर मेरी दुर्दशा और क्या हो सकती है! इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारी मुहब्बत में मैं यहाँ तक पहुँच चुकी, कुल में कलंकिनी कहाई, लज्जा को तिलांजलि दे बैठी, और वह सब दुःख झेलने को तैयार हुई, यह सब तुम्हारी बदौलत …
"(थोड़ी देर चुप रहकर) यहाँ तक रोई कि अब आँखों में आँसू भी नहीं रहे। खाना-पीना छोड़ देने पर भी निगोड़ी जान नहीं निकलती। हाय, मौत को भी मौत आ गई! नहीं-नहीं, मौत को मौत नहीं आई, वह देखो, मेरे सामने खड़ा हुआ काल मेरी तरफ देख रहा है। अब कुछ दम की मेहमान हूँ। मैं तो जाती हूँ, मगर अफसोस, अपने प्यारे की जुदाई का रंज और उसकी बेवफाई और बेमुरौवती की शिकायत अपने साथ लिए जाती हैं। हाय, इस समय ऐसा कोई भी नहीं जो मेरी हालत देखे और मेरा हाल उनसे जाकर …
"(थोड़ी देर चुप रहकर) जब उनको मेरी परवाह ही नहीं, तो मेरा हाल कोई उनसे कहकर करेगा ही क्या? उन्होंने तो खुद कहला भेजा है कि मुझे कुछ भी परवाह नहीं। हाय, मैं ऐसी बात कैसे सुन सकी! उसी समय मेरी जान क्यों न निकल गई! नहीं-नहीं, यह सब ऐयारी है, उन्होंने ऐसी बात कभी न कही होगी। पर इससे क्या हो सकता है जब कि दम निकलने में कुछ कसर बाकी नहीं है। देखो-देखो वह काल अब मेरी तरफ बढ़ा चला आता है। अच्छा है, किसी तरह वह सायत आए भी तो। हे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर, मैं तुम्हीं को गवाह रखती हूँ क्योंकि तुम खूब जानते हो कि मैं निर्दोष इस दुनिया से उठी जाती हूँ और इन्द्रजीतसिंह की मुहब्बत के सिवाय अपने साथ कुछ भी नहीं लिए जाती, हाँ उस प्यारे की … "
इसके बाद बहुत देर तक राह देखने पर भी कुछ सुनाई न दिया। कमलिनी ने समझा कि या तो इसे कमजोरी से गश आ गया और या इस हसरत की मारी बेचारी का दम ही निकल गया। इस समय कमलिनी ने जो कुछ देखा या सुना, वह उसे बेसुध करने के लिए काफी था। कमलिनी जार-जार रो रही थी, यहाँ तक कि हिचकी बँध गई और उसे इस बात का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा कि मैं यहाँ किस काम के लिए आई हूँ क्या कर रही हूँ और इस समय कैसे खतरे में फँसी हुई हूँ।
कमलिनी के लिए यह समय बड़े ही संकट का था। वह नहीं चाहती थी कि बेचारी किशोरी का पूरा-पूरा हाल जाने या उसे किसी तरह की मदद पहुँचाए बिना यहाँ से चली जाय और साथ ही इसके भूतनाथ के कागजात को भी, जिनके लेने का वह पूरापूरा उद्योग कर चुकी थी, किसी तरह छोड़ नहीं सकती थी, क्योंकि यह मौका निकल जाने पर फिर उनका हाथ लगना बहुत ही कठिन था।
JIM – Assistente
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