चन्द्रकान्ता सन्तति 6
भूतनाथ–निःसन्देह ऐसा ही है, परन्तु मैं हरनामसिंह के सामने भी एक संदूकड़ी देखकर डर रहा हूँ कहीं यह भी मेरे लिए कोई दुःख-दर्द सामान लेकर न आया हो ?
इन्द्रदेव–(हँस कर) भूतनाथ, अब तुम अपने दिल को व्यर्थ के खटकों में न डालो, जो कुछ होना था, सो हो गया । अब तुम पूरे तौर पर महाराज के ऐयार हो गये,किसी की मजाल नहीं कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ दे सके और महाराज भी तुम्हारे बारे में किसी तरह की शिकायत नहीं सुनना चाहते ! हरनामसिंह तो तुम्हारा लड़का ही है, वह तुम्हारे साथ बुराई क्यों करने लगा?
इसी समय महाराज सुरेन्द्र सिंह ने जीतसिंह की तरफ देखकर कुछ इशारा किया और जीतसिंह ने इन्द्रदेव से कहा, "भूतनाथ का मामला तो अब तय हो गया इसके बारे में महाराज किसी तरह की शिकायत सुनना नहीं चाहते। इसके अतिरिक्त भूतनाथ ने वायदा किया है कि अपनी जीवनी लिख कर महाराज के सामने पेश करेगा । अतः अब रह गये दलीपशाह, अर्जुन सिंह और भरतसिंह तथा कमला की मां । इन सभी पर जो कुछ मुसीबतें गुजरी हैं, उसे महाराज सुनना चाहते हैं। परन्तु अभी नहीं, क्योंकि विलम्ब बहुत हो गया। अब महाराज आराम करेंगे । अतः अब दरबार बर्खास्त करना चाहिए जिसमें ये लोग भी आपस में मिल-जुलकर अपने दिल की कुलफत निकाल लें, क्योंकि अब यहाँ तो किसी से मिलने में अथवा आपस का बर्ताव करने में परहेज न होना चाहिए।"
इन्द्रजीतसिंह-(हाथ जोड़ कर) जो आज्ञा !
दरबार बर्खास्त हुआ । इन्द्रदेव की इच्छानुसार महाराज आराम करने के लिए जीतसिंह को साथ लिए एक दूसरे कमरे में चले गये। इसके बाद और सब कोई उठे और और अपने-अपने ठिकाने पर, जैसाकि इन्द्रदेव ने इन्तजाम कर दिया था, चले गये मगर कई आदमी जो आराम नहीं करना चाहते थे, वे बँगले के बाहर निकलकर बगीचे की तरफ रवाना हुए।
5
एक सुन्दर पायों वाली मसहरी पर महाराज सुरेन्द्रसिंह लेटे हुए हैं। ऐयारों के सरताज जीतसिंह उसी मसहरी के पास फर्श पर बैठे तथा दाहिने हाथ से मसहरी पर ढासना लगाये धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं।
महाराज– इन्द्रदेव का स्थान बहुत ही सुन्दर और रमणीक है, यहां से जाने को जी नहीं चाहता।
जीतसिंह–ठीक है, इस स्थान की तरह इन्द्रदेव का बर्ताव भी चित्त को प्रसन्न करता है, परन्तु मेरी राय यही है कि तक जहाँ जल्द हो यहाँ से लौट चलना चाहिए।
महाराज–हम भी यही सोचते हैं। इन लोगों की जीवनी और आश्चर्य-भरी कहानी तो वर्षों तक सुनते ही रहेंगे। परन्तु इन्द्रजीत और आनन्दसिंह की शादी जहाँ तक हो सके जल्द कर देनी चाहिए, जिसमें और किसी तरह के विघ्न पड़ने का फिर डर न रहे।
जीतसिंह–जरूर ऐसा होना चाहिए, इसीलिए मैं चाहता हूँ कि यहाँ से जल्द चलिए । भरतसिंह वगैरह की कहानी वहाँ ही सुन लेंगे या शादी के बाद और लोगों को भी यहाँ ले आवेंगे, जिसमें वे लोग भी तिलिस्म और इस स्थान का आनन्द ले लें।
महाराज–अच्छी बात है, खैर अब यह बताओ कि कमलिनी और लाडिली के विषय में भी तुमने कुछ सोचा ?
जीतसिंह–उन दोनों के लिए जो कुछ आप विचार रहे हैं, वही मेरी भी राय है। उनकी भी शादी दोनों कुमारों के साथ ही कर देनी चाहिए ।
महाराज–है न यही राय
जीतसिंह–जी हाँ, मगर किशोरी और कामिनी की शादी के बाद । क्योंकि किशोरी एक राजा की लड़की है, इसलिए उसी की औलाद को गद्दी का हकदार होना चाहिए। यदि कमलिनी के साथ पहले शादी हो जायगी तो उसी का लड़का गद्दी का मालिक समझा जायगा, इसी से मैं चाहता हूँ कि पटराना किशोरी ही बनाई जाय।
महाराज–यह बात तो ठीक है, अतः ऐसा ही होगा और साथ ही इसके कमला की शादी भैरों के साथ और इन्दिरा की तारा के साथ कर दी जायगी।
जीतसिंह–जो मर्जी।
महाराज–अच्छा तो अब यही निश्चय रहा दलीपशाह और भरतसिंह की बीती यहाँ से चलने के बाद घर पर ही सुननी चाहिए ।
जीतसिंह–जी हाँ, सच तो यों है कि ऐसा करना ही पड़ेगा, क्योंकि इन लोगों की कहानी दारोगा और जयपाल इत्यादि कैदियों से घना सम्बन्ध रखती है, बल्कि यों कहना चाहिए कि इन्हीं लोगों के इजहार पर उन लोगों के मुकदमे का दारोमदार (हेस नेस) है और यही लोग उन कैदियों को लाजवाब करेंगे ।
महाराज–निःसन्देह ऐसा ही है, इसके अतिरिक्त उन कैदियों ने हम लोगों तथा हमारे सहायकों को बड़ा दुःख दिया है और दोनों कुमारों की शादी में भी बड़े-बड़े विघ्न डाले हैं । अतएव उन कम्बख्तों को कुमारों की शादी का जलसा भी दिखा देना चाहिए, जिसमें ये लोग भी अपनी आँखों से देख लें कि जिन बातों को वे बिगाड़ना चाहते थे, वे आज कैसी खूबी और खुशी के साथ हो रही हैं, इसके बाद उन लोगों को सजा दी जानी चाहिए। मगर अफसोस तो यह है कि मायारानी और माधवी जमानिया में ही मार डाली गई, नहीं तो वे दोनों भी देख लेतीं कि…
जीतसिंह–खैर, उनकी किस्मत में यही बदा था ,
महाराज–अच्छा, तो एक बात का और खयाल करना चाहिए।
जीतसिंह–आज्ञा? महाराजा–भूतनाथ वगैरह को मौका देना चाहिए कि वे अपने सम्बन्धियों से बखूबी मिल-जुल कर अपने दिल का खटका निकाल लें, क्योंकि हम लोग तो उनका हाल वहाँ चल कर ही सुनेंगे।
जीतसिंह–बहुत खूब।
इतना कहकर जीतसिंह उठ खड़े हुए और कमरे से बाहर चले गये।
6
इन्द्रदेव के इस स्वर्ग-तुल्य स्थान में बंगले से कुछ दूर हट कर बगीचे के दक्खिन तरफ एक घना जामुन का पेड़ है, जिसे सुन्दर लताओं ने घेर कर देखने योग्य बना रखा है और वहाँ एक कुंज की-सी छटा दिखाई पड़ती है। उसी के नीचे साफ पानी का एक चश्मा भी बह रहा है । अपनी सुरीली बोली से लोगों के दिल लुभा लेने वाली चिड़ियाएँ संध्या का समय निकट जान अपने घोंसलों के चारों तरफ फुदक-फुदक कर अपने चुलबुले बच्चों को चैतन्य करती हुई कह रही हैं, "देखो, मैं बहुत दूर से तुम लोगों के लिए दाना-पानी अपने पेट में भर लाई हूँ, जिससे तुम्हारी सन्तुष्टि हो जायगी।"
यह रमणीक स्थान ऐसा है कि यहाँ दो-चार आदमी छिप कर इस तरह बैठ सकते हैं कि वे चारों तरफ के आदमियों को बखूबी देख लें, पर उन्हें कोई भी न देखे । इस स्थान पर हम इस समय भूतनाथ और उसकी पहली स्त्री, (कमला की माँ) को पत्थर की चट्टानों पर बैठे बातें करते हुए देख रहे हैं। ये दोनों मुद्दत के बिछड़े हुए हैं, और दोनों के दिल में नहीं तो कमला की माँ के दिल में जरूर शिकायतों का खजाना भरा हुआ है जिसे वह इस समय बेतरह उगलने के लिए तैयार है। प्यारे पाठक, आइये हम आप मिलकर जरा इन दोनों की बातें तो सुन लें
भूतनाथ–शान्ता', आज तुमसे मिलकर मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ।
शान्ता–क्यों ? जो चीज किसी कारणवश खो जाती है, उसे यकायक पाने से प्रसन्नता हो सकती है, मगर जो चीज जान-बूझ कर फेंक दी जाती है, उसके पाने की प्रसन्नता कैसी?
भूतनाथ–किसी को कहीं से एक पत्थर का टुकड़ा मिल जाय और वह उसे बेकार या बदसूरत समझ कर फेंक दें तथा कुछ समय के बाद जब उसे यह मालूम हो कि वास्तव में वह हीरा था पत्थर नहीं, तो क्या उसके फेंक देने का उसको दुःख न होगा ? या उसे पुनः पाकर प्रसन्नता न होगी?
शान्ता-–अगर वह आदमी, जिसने हीरे को पत्थर समझकर फेंक दिया है, यह जानकर कि वह वास्तव में हीरा था, उसकी खोज करे, या इस विचार से कि उसे मैंने
1. शान्ता कमला की मां का नाम था। फलां जगह छोड़ा या फेंका है वहां जाने से जरूर मिल जायेगा, उसकी तरफ दौड़ जाय,तो बेशक समझा जायगा कि उसे उसके फेंक देने का रंज हुआ था और उसके मिल जाने से प्रसन्नता होगी, लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो नहीं।
भूतनाथ–ठीक है, मगर वह आदमी उस जगह, जहाँ उसने हीरे को पत्थर समझकर फेंका, था पुनः उसे पाने की आशा में तभी जायगा जब अपना जाना सार्थक समझेगा। परन्तु जब उसे यह निश्चय हो जायगा कि वहां जाने में उस हीरे के साथ तू भी बर्बाद हो जायगा, अर्थात् वह हीरा भी काम का न रहेगा और तेरी भी जान जाती रहेगी, तब वह उसकी खोज में क्यों जायगा ?
शान्ता–ऐसी अवस्था में वह अपने को इस योग्य बनावेगा ही नहीं कि वह उस हीरे की खोज में जाने लायक न रहे, यदि यह बात उसके हाथ में होगी और वह उस हीरे को वास्तव में हीरा समझता होगा।
भूतनाथ-–बेशक, मगर शिकायत की जगह तो ऐसी अवस्था में हो सकती थी जब वह अपने बिगड़े हुए कॅटीले रास्ते की, जिसके सबब से वह उस हीरे तक नहीं पहुंच सकता था, पुनः सुधारने और साफ करने के लिए परले सिरे का उद्योग करता हुआ दिखाई न देता।
शान्ता–ठीक है, लेकिन जब वह हीरा यह देख रहा है कि उसका अधिकारी या मालिक बिगड़ी हुई अवस्था में भी एक मानिक के टुकड़े को कलेजे से लगाए हुए घूम रहा है और यदि वह चाहता तो उस हीरे को भी उसी तरह रख सकता था, मगर अफसोस, उस हीरे की तरफ जो वास्तव में पत्थर ही समझा गया है, कोई भी ध्यान नहीं देता जो बे-हाथ-पैर का होकर भी उसी मालिक की खोज में जगह-जगह की धूल छानता फिर रहा है जिसने जान-बूझकर उसे पैर में गड़ने वाले कंकड़ की तरह अपने आगे से उठाकर फेंक दिया है और जानता है कि उस पत्थर के साथ, जिसे वह व्यर्थ ही में हीरा कह रहा है, वास्तव में छोटी-छोटी हीरे की कनियां भी चिपकी हुई हैं जो छोटी होने के कारण सहज ही मिट्टी में मिल जा सकती हैं, तब क्या शिकायत की जगह नहीं है !
भूतनाथ–परन्तु अदृष्ट भी कोई वस्तु है, प्रारब्ध भी कुछ कहा जाता है और होनहार भी किसी चीज का नाम है !
शान्ता-—यह दूसरी बात है, इन सभी का नाम लेना वास्तव में निरुत्तर (लाजवाब) होना और चलती बहस को जान-बूझकर बंद कर देना ही नहीं है बल्कि उद्योग ऐसे अनमोल पदार्थ की तरफ से मुंह फेर लेना भी है। अतः जाने दीजिए मेरी यह इच्छा भी नहीं है कि आपको परास्त करने की अभिलाषा से मैं विवाद करती ही जाऊँ,यह तो बात-ही-बात में कुछ कहने का मौका मिल गया और छाती पर पत्थर रखकर जी का उबाल निकाल लिया, नहीं तो जरूरत ही क्या थी।
भूतनाथ–मैं कसूरवार हूँ ओर बेशक कसूरवार हूँ, मगर यह उम्मीद भी तो न थी कि ईश्वर की कृपा से तुम्हें इस दुनिया में इस तरह जीती देखेंगा।
शान्ता–अगर यही आशा या अभिलाषा होती तो अपने परलोकगामी होने की खबर मुझ अभागी के कानों तक पहुँचाने की कोशिश क्यों करते और …
भूतनाथ–बस-बस, अब मुझ पर दया करो और इस ढंग की बातें छोड़ दो क्योंकि आज बड़े भाग्य से मेरे लिए यह खुशी का दिन नसीब हुआ है । इसे जली-कटी बातें सुनाकर पुनः कड़वा न करो और यह सुनाओ कि तुम इतने दिनों तक कहाँ छिपी हुई थी और अपनी लड़की कमला को किस तरह धोखा देकर चली गई कि आज तक वह तुमको मरी हुई ही समझती है ?
इस समय शान्ता का खूबसूरत चेहरा नकाब से ढका हुआ नहीं है। यद्यपि वह जमाने के हाथों सताई हुई तथा दुबली-पतली और उदास है और उसका तमाम बदन पीला पड़ गया है मगर फिर भी आज की यह खुशी उसके सुन्दर बादामी चेहरे पर रौनक पैदा कर रही है और इस बात की इजाजत नहीं देती कि कोई उसे ज्यादा उम्रवाली कह कर खूबसूरतों की पंक्ति में बैठने से रोके। हजार गई-गुजरी होने पर भी वह रामदेई (भूतनाथ की दूसरी स्त्री) से बहुत अच्छी मालूम पड़ती है और इस बात को भूतनाथ भी बड़े गौर से देख रहा है । भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर शान्ता ने अपनी डबडबाई हुई बड़ी-बड़ी आँखों को आँचल से साफ किया और एक लम्बी साँस ले कर कहा-
शान्ता–मैं रणधीरसिंह जी के यहाँ से कभी न भागती अगर अपना मुंह किसी को दिखाने लायक समझती। मगर अफसोस, आपके भाई ने इस बात को खूब अच्छी तरह मशहूर किया कि आपके दुश्मन (अर्थात् आप) इस दुनिया से उठ गये । इसके सबूत में उन्होंने बहुत सी बातें पेश कीं, मगर मुझे विश्वास न हुआ, तथापि इस गम में मैं बीमार हो गई और दिन-दिन मेरी बीमारी बढ़ती ही गई। उसी जमाने में मेरी मौसेरी बहिन अर्थात् दलीपशाह की स्त्री मुझे देखने के लिए मेरे घर आई। मैंने अपने दिल का हाल और बीमारी का सबब उससे बयान किया और यह भी कहा कि जिस तरह मेरे पति ने सही-सलामत रह कर भी अपने को मरा मशहूर किया, उसी तरह मुझे तुम कहीं छिपा कर मरा हुआ मशहूर कर दो । अगर ऐसा हो जायगा तो मैं अपने पति को ढूंढ निकालने का उद्योग करूँगी। उन्होंने मेरी बात पसन्द कर ली और लोगों को यह कहकर कि मेरे यहाँ की आबोहवा अच्छी है वहाँ शान्ता को बहुत जल्द ही आराम हो जायगा, मुझे अपने यहाँ उठा ले जाने का बन्दोबस्त किया और रणधीरसिंहजी से इजाजत भी ले ली। मैं दो दिन तक अपनी लड़की कमला को नसीहत करती रही और इसके बाद उसे किशोरी के हवाले करके और अपनी छोटे दूध-पीते बच्चे को गोद में लेकर दलीपशाह के घर चली आई और धीरे-धीरे आराम होने लगी। थोड़े ही दिन बाद दलीपशाह के घर में उस भयानक आधी रात के समय आपका आना हुआ, मगर हाय, उस समय आपकी अवस्था पागलों की सी हो रही थी और आपने धोखे में पड़कर अपने प्यारे लड़के का, जिसे मैं अपने साथ ले गई थी, खून कर डाला।
इतना कहते-कहते शान्ता का जी भर आया और वह हिचकियाँ ले-लेकर रोने
1.दलीपशाह ने बीसवें भाग के तेरहवें बयान में इस घटना की तरफ भूतनाथ से इशारा किया। लगी । भूतनाथ की बुरी अवस्था हो रही थी और इससे ज्यादे वह उस भयानक घटना का हाल नहीं सुनना चाहता था । वह यह कहता हुआ कि 'बस माफ करो, अब इसका जिक्र न करो' अपनी स्त्री शान्ता के पैरों पर गिरा ही चाहता था कि उसने पैर खींचकर भूतनाथ का सिर थाम लिया और कहा-'हाँ-हाँ, यह क्या करते हो ? क्यों मेरे सिर पर पाप चढ़ाते हो? मैं खूब जानती हूँ कि आपने उसे बिलकुल नहीं पहचाना मगर इतना जरूर समझते थे कि वह दलीपशाह का लड़का है, अतः फिर भी आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, खैर अब मैं इस जिक्र को छोड़ देती हूँ।"
इतना कहकर शान्ता ने अपने आँसू पोंछे और फिर इस तरह बयान करना शुरू किया-
"शोक और दुःख से मैं पुनः बीमार पड़ गई, मगर आशा-लता ने धीरे-धीरे कुछ दिन में अपनी तरह मुझे भी (आराम) कर दिया। यह आशा केवल इसी बात की थी कि एक दफे आपसे जरूर मिलूंगी। मुश्किल तो यह थी कि उस घटना ने दलीपशाह को भी आपका दुश्मन बना दिया था, केवल उस घटना ने ही नहीं, इसके अतिरिक्त भी दलीपशाह को बर्बाद करने में आपने कुछ उठा न रक्खा था, यहाँ तक कि आखिर वह दारोगा के हाथ फंस ही गये।"
भूतनाथ—-(बेचैनी के साथ लम्बी साँस लेकर) ओफ ! मैं कह चुका हूँ कि इन बातों को मत छेड़ो, केवल अपना हाल बयान करो, मगर तुम नहीं मानतीं !
शान्ता–नहीं-नहीं, मैं तो अपना ही हाल बयान कर रही हूँ, खैर, मुख्तसिर ही में कहती हूँ।
उस घटना के बाद ही मेरी इच्छानुसार दलीपशाह ने मेरा और बच्चे का मर जाना मशहूर किया जिसे सुनकर हरनामसिंह और कमला भी मेरी तरफ से निश्चिन्त हो गये । जब खुद दलीपशाह भी दारोगा के हाथ में फंस गये, तब मैं बहुत ही परेशान हुई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उस समय दलीपशाह के घर में उनकी स्त्री, एक छोटा सा बच्चा और मैं, केवल ये तीन ही आदमी रह गये थे। दलीपशाह की स्त्री को मैंने धीरज धराया और कहा कि अभी तू अपनी जान मत बर्बाद कर, मैं बराबर तेरा साथ दूंगी और दलीपशाह को खोज निकालने का उद्योग करूँगी मगर अब हमलोगों को यह घर एकदम छोड़ देना चाहिए और ऐसी जगह छिपकर रहना चाहिए जहाँ दुश्मनों को हम लोगों का पता न लगे । आखिर ऐसा ही हुआ, अर्थात् हम लोगों की जो कुछ जमा-पूँजी थी उसे लेकर हमने उस घर को एक दम छोड़ दिया और काशीजी में जाकर एक अँधेरी गली में पुराने और गंदे मकान में डेरा डाला, मगर इस बात की टोह लेते रहे कि दलीपशाह कहाँ हैं अथवा छूटने के बाद अपने घर की तरफ जा कर हम लोगों को ढूंढ़ते हैं या नहीं। इस फिक्र में मैं कई दफे सूरत बदल कर बाहर निकली और इधर-उधर घूमती रही। इत्तिफाक से दिल में यह बात पैदा हुई कि किसी तरह अपने लड़के हरनामसिंह से छिप कर मिलना और उसे अपना साथी बना लेना चाहिए। ईश्वर ने मेरी यह मुराद पूरी की। जब माधवी कुंअर इन्द्रजीतसिंह को फंसा ले गई और उसके बाद उसने किशोरी पर भी कब्जा कर लिया, तब कमला और हरनाम सिंह दोनों आदमी किशोरी की खोज में निकले और वे एक-दूसरे से जुदा हो गये। किशोरी की खोज में हरनामसिंह काशी की गलियों में घूम रहा था जब उस पर मेरी निगाह पड़ी और मैंने इशारे से अलग बुला कर अपना परिचय दिया। उस को मुझसे मिलकर जितनी खुशी हुई उसे मैं बयान नहीं कर सकती। मैं उसे अपने घर में ले गई और सब हाल उससे कह अपने दिल का इरादा जाहिर किया जिसे उसने खुशी से मंजूर कर लिया। उस समय मैं चाहती तो कमला को भी अपने पास बुला लेती, मगर नहीं, उसे किशोरी की मदद के लिए छोड़ दिया क्योंकि किशोरी के नमक को मैं किसी तरह भूल नहीं सकती थी, अतः मैंने केवल हरनामसिंह को अपने पास रख लिया और खुद चुपचाप अपने घर मैं बैठी रहकर आपका और दलीपशाह का पता लगाने का काम लड़के को सुपुर्द किया। बहुत दिनों तक बेचारा लड़का चारों तरफ मारा फिरा और तरह-तरह की खबरें ला कर मुझे सुनाता रहा। जब आप प्रकट होकर कमलिनी के साथी बन गए और उसके काम के लिए चारों तरफ घूमने लगे तब हरनामसिंह ने भी आपको देखा और पहचान कर मुझे इतिला दी। थोड़े दिन बाद यह भी उसी की जुबानी मालूम हुआ कि अब आप नेकनाम होकर दुनिया में अपने को प्रकट किया चाहते हैं । उस समय मैं बहुत प्रसन्न हुई और मैंने हरनाम को राय दी कि तू किसी तरह राजा वीरेन्द्र सिंह के किसी ऐयार की शागिर्दी कर ले । आखिर वह तारासिंह से मिला और उसके साथ रह कर थोड़े ही दिनों में उसका प्यारा शागिर्द बल्कि दोस्त बन गया तब उसने अपना हाल तारासिंह को कह सुनाया और तारासिंह ने भी उसके साथ बहुत अच्छा प्यार का बर्ताव करके उसकी इच्छानुसार उसके भेदों को छिपाया। तब से हरनामसिंह सूरत बदले हुए तारासिंह का काम करता रहा और मुझे भी आपकी पूरी-पूरी खबर मिलती रही। आपको शायद इस बात की खबर न हो कि तारासिंह की माँ चम्पा से और मुझसे बहिन का रिश्ता है, वह मेरे मामा की लड़की है, अत: चम्पा ने अपने लड़के की जुबानी हरनामसिंह का हाल सुना और जब यह मालूम हुआ कि वह रिश्ते में उसका भतीजा होता है, तब उसने भी उस पर दया प्रकट की और तब से उसे बराबर अपने लड़के की तरह मानती रही।
जमानिया के तिलिस्म को खोलते और कैदियों को साथ लिए हुए जब दोनों कुमार उस खोह वाले तिलिस्मी बंगले में पहुँचे तो उन्होंने भैरोंसिंह और तारासिंह को अपने पास बुला लिया और तिलिस्म का पूरा हाल उनसे कह के उन दोनों को अपने पास रक्खा । दलीपशाह को यह हाल भी तारासिंह ही से मालूम हुआ कि उनके बाल-बच्चे ईश्वर की कृपा से अभी तक राजी-खुशी हैं, साथ ही इसके मेरा हाल भी दलीपशाह को मालूम हुआ। उस समय तारासिंह दोनों कुमारों से आज्ञा लेकर हरनामसिंह को उस बँगले में ले आया और दलीपशाह से उसकी मुलाकात कराई। हरनामसिंह को साथ लेकर दलीपशाह काशी गये और वहाँ से मुझको तथा अपनी स्त्री और लड़के को साथ लेकर कुमार के पास चले आये। जब तारासिंह की जबानी चम्पा ने यह हाल सुना तब वह मुझसे मिलने के लिए तारासिंह के साथ यहाँ अर्थात् उस बँगले में आई।
भूतनाथ-जब दोनों कुमार नकाबपोश बन कर भैरोंसिंह और तारासिंह को यहाँ ले आए, उसके पहले तो तारासिंह यहाँ नहीं आए थे ? शान्ता-जी उसके पहले ही से वे दोनों यहां आते जाते रहे, उस दिन तो प्रकट रूप से यहाँ लाए गये थे। क्या इतना हो जाने पर भी आपको अन्दाज से मालूम न हुआ?
भूतनाथ–ठीक है, इसका शक तो मुझे और देवीसिंह को भी होता रहा ।
शान्ता का किस्सा भूतनाथ ने बड़े गौर के साथ ध्यान देकर सुना और तब देर तक आरजू-मिन्नत के साथ शान्ता माफी मांगता रहा और इसके बाद पुनः दोनों में बातचीत होने लगी।
शान्ता–अब तो आपको मालूम हो गया कि चम्पा यहाँ क्यों कर और किस लिए आई ?
भूतनाथ–हाँ, यह भेद तो खुल गया मगर इसका पता न लगा कि नानक और उसकी मां का यहाँ आना कैसे हुआ ?
शान्ता–सो मैं न कहूँगी, यह उसी से पूछ लेना।
भूतनाथ–(ताज्जुब से) सो क्यों ?
शान्ता–मैं उसके बारे में कुछ कहना ही नहीं चाहती !
भूतनाथ–आखिर इसका कोई सबब भी है ?
शान्ता–सबब यही है कि उसकी यहाँ कोई इज्जत नहीं है बल्कि वह बेकदरी की निगाह से देखी जाती है।
भूतनाथ–वह है भी इसी योग्य ! पहले तो मैं उसे प्यार करता था, मगर जब यह सुना कि उसी की बदौलत मैं जैपाल (नकली बलभद्र) का शिकार बन गया और एक भारी आफत में फंस गया, तब से मेरी तबीयत उससे खट्टी हो गई।
शान्ता–सो क्यों?
भूतनाथ–इसीलिए कि वह बेगम की गुप्त सहेली नन्हीं से गहरी मुहब्बत रखती है । और इसी सबब से वह कागज का मुट्ठा जो मैंने अपने फायदे के लिए तैयार किया था, गायब हो के जैपाल के हाथ लग गया और उससे मुझे नुकसान पहुँचा । इस बात का सबूत भी मैंने अपनी आँखों से देख लिया।
शान्ता–सो ठीक है, मैं भी दलीपशाह से यह बात सुन चुकी हूँ।
भूतनाथ–इसी से अब मैं उसे अपनी स्त्री नहीं बल्कि दुश्मन समझता हूँ । केवल नन्हीं से ही नहीं बल्कि कम्बख्त गौहर से भी वह दोस्ती रखती थी और वह दोस्ती पाक न थी । (लम्बी साँस लेकर) अफसोस ! इसी से उस खोटी का लड़का नानक भी खोटा ही निकला।
शान्ता–(मुस्कुराकर) तब आप उसके लिए इतना परेशान क्यों थे? क्योंकि यह बात सुनने बाद ही तो आपने उसे नकाबपोशों के स्थान पर देखा था !
भूतनाथ–वह परेशानी मेरी उसकी मुहब्बत के सबब से न थी बल्कि इस खयाल से थी कि कहीं वह मुझ पर कोई नई आफत लाने के लिए तो नकाबपोशों से नहीं आ
शान्ता–मिली।
1.चन्द्रकान्ता सन्तति, उन्नीसवाँ भाग, बारहवाँ बयान, देखिए नकाबपोश की बातचीत । शान्ता–-ठीक भी है, यह खयाल हो सकता था।
भूतनाथ–फिर इसी बीच में जब उसने मुझे जंगल में गाना सुना के धोखा दिया और गिरफ्तार करके अपने स्थान पर ले गई, जिसका हाल शायद तुम्हें मालूम होगा, तब मेरा रंज और भी बढ़ गया ।
शान्ता–यह हाल मुझे मालूम है मगर यह कार्रवाई उसकी न थी, बल्कि इन्द्र- देव की थी। उन्होंने ही आपके साथ यह ऐयारी की थी और उस दिन जंगल में घोड़े पर सवार जो औरत आपको मिली थी और जिसे आपने अपनी स्त्री समझा था, वह भी इन्द्रदेव का एक ऐयार ही था। यह बात मैं उन्हीं (इन्द्रदेव) की जुबानी सुन चुकी हूँ, शायद आपसे भी वे कहें। हाँ, उस दिन बँगले में जिस औरत को आपने देखा था, वह बेशक नानक की माँ थी। वह तो खुद कैदियों की तरह यहाँ रक्खी गई है, मैदान की हवा क्योंकर खा सकती है ! दोनों कुमार नहीं चाहते थे कि प्रकट होने के पहले ही कोई उन लोगों का पता लगा ले इसीलिए ये सब खेल खेले गये । (कुछ सोचकर) आखिर आपने धीरे-धीरे नानक की माँ का हाल पूछ ही लिया, मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहती थी, अतः अब इससे आगे और कुछ भी न कहूँगी, आप उसके बारे में मुझसे कुछ न पूछे।
भूतनाथ–नहीं-नहीं, जब इतना बता चुकी हो तो कुछ और भी बताओ क्योंकि मैं उससे मिलकर कुछ भी नहीं पूछना चाहता, बल्कि अब तो उसका मुंह देखना भी मुझे पसन्द नहीं है । अच्छा, यह तो बताओ कि वह कम्बख्त यहाँ क्यों लाई गई ?
शान्ता–लाई नहीं गई, बल्कि उसी नन्हीं के यहाँ गिरफ्तार की गई, उस समय नानक भी उसके साथ था ।
भूतनाथ–(आश्चर्य और क्रोध से) फिर भी उसी नन्हीं के यहाँ गई थी?
शान्ता–जी हाँ।
भूतनाथ–(लम्बी साँस लेकर) लोग सच कहते हैं कि ऐयाशी का नतीजा बहुत बुरा निकलता है।
शान्ता-–अतः अब उसके बारे में मुझसे कुछ न पूछिए, इन्द्रदेवजी आपको सब-
भूतनाथ-–हाँ, ठीक है, खैर, अब उसके बारे में कुछ न पूछूगा, जो कुछ पूछूगा वह तुम्हारे और हरनाम ही के बारे में होगा। अच्छा, एक बात और बताओ, आज के दरबार में मैंने हरनाम को हाथ में एक सन्दूकड़ी लिए देखा था । वह सन्दूकड़ी कंसी थी और उसमें क्या था?
शान्ता–उसमें दारोगा के हाथ की लिखी हुई बहुत-सी चिट्ठियाँ हैं जिनके देखने से आपको निश्चय हो जायगा कि आपने दलीपशाह को व्यर्थ ही अपना दुश्मन समझ लिया था। पहले जब दारोगा ने दलीपशाह को लालच दिखा कर लिखा था कि वह आपको गिरफ्तार करा दें, तब दो-चार चिट्ठियों में तो दलीपशाह ने इस नीयत से कि कुछ बता देंगे।
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, बीसवे भाग का अन्त । दारोगा की शैतानियों का सबूत उससे मिलकर ही बटोर लें, दारोगा के मतलब ही का जवाब दिया था जिससे खुश होकर उसने कई चिट्ठियों में दलीपशाह को तरह-तरह के सब्जबाग दिखलाए, मगर जब दारोगा की कई चिट्ठियां दलीपशाह ने बटोर ली तब साफ जवाब दे दिया। उस समय दारोगा बहुत घबराया और उसने सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि दलीपशाह मुझसे दुश्मनी करके मेरा यह भेद खोल दे, अतः किसी तरह उसे गिरफ्तार कर लेना चाहिए। उस समय कम्बख्त दारोगा आपसे मिला और उसने दलीप-शाह की पहली चिट्ठियाँ आपको दिखा कर खुद आप ही को दलीपशाह का दुश्मन बना दिया, बल्कि आप ही के जरिये से दलीपशाह को गिरफ्तार भी करा लिया ।
भूतनाथ-ठीक है, इस विषय में मैंने बहुत बड़ा धोखा खाया।
शान्ता-मगर दलीपशाह को गिरफ्तार कर लेने पर भी वे चिट्ठियाँ दारोगा के हाथ न लगी क्योंकि वे दलीपशाह की स्त्री के कब्जे में थीं। हम लोग उन्हें अपने साथ लाये हैं जिसमें दारोगा के मुकदमे में पेश करें।
भूतनाथ-अब मेरे दिल का पूरा खुटका निकल गया और मुझे निश्चय हो गया कि हरनाम की कोई कार्रवाई मेरे खिलाफ न होगी।
शान्ता-भला वह कोई काम ऐसा क्यों करेगा जिससे आपको तकलीफ हो ? ऐसा खयाल भी आपको न रखना चाहिए। इन दोनों में इस तरह की बातें हो रही थी कि किसी के आने की आहट मालूम हुई। भूतनाथ ने जब घूमकर देखा तो नानक पर निगाह पड़ी। जब वह पास आया तब भूतनाथ ने उससे पूछा, "क्या चाहते हो?"
नानक-मेरी माँ आपसे मिलना चाहती हैं।
भूतनाथ-तो यहाँ पर क्यों न चली आई ? यहाँ कोई गैर तो था नहीं।
नानक-सो तो वही जानें।
भूतनाथ-अच्छा, जाओ, उसे इसी जगह मेरे पास भेज दो।
नानक-बहुत अच्छा।
इतना कहकर नानक चला गया और इसके बाद शान्ता ने भूतनाथ से कहा,"शायद उसे मेरे सामने आपसे बातचीत करना मंजूर न हो, शर्म आती हो या किसी तरह का और कुछ खयाल हो, अतः आज्ञा दीजिए तो मैं चली जाऊँ, फिर…
भूतनाथ-नहीं-नहीं, उसे जो कुछ कहना होगा तुम्हारे सामने ही कहेगी, तुम चुपचाप बैठी रहो।
शान्ता-सम्भव है कि वह मेरे रहते यहाँ न आवे, या उसे इस बात का खवाल हो कि तुम मेरे सामने उसकी बेइज्जती करोगे।
भूतनाथ-हो सकता है, मगर (कुछ सोच के) अच्छा, तुम जाओ।
इतना सुनकर शान्त। वहाँ से उठी और बैंगले की तरफ रवाना हुई। इस समय सूर्य अस्त हो चुका था और चारों तरफ से अंधेरी झुकी आती थी।
7
इन्द्रदेव का यह स्थान बहुत बड़ा था। इस समय यहां जितने आदमी आए हुए हैं उनमें से किसी को किसी तरह की भी तकलीफ नहीं हो सकती थी और इसके लिए प्रबन्ध भी ब अच्छा कर रक्खा गया था। औरतों के लिए एक खास कमरा मुकर्रर किया गया था मगर रामदेई (नानक की माँ) की निगरानी की जाती थी और इस बात का भी बन्दोबस्त कर रक्खा गया था कि कोई किसी के साथ दुश्मनी का बर्ताव न कर सके । महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह और दोनों कुमारों के कमरे के आगे पहरे का पूरा-पूरा इन्तजाम था और हमारे ऐयार लोग भी बराबर चौकन्ने रहा करते ये ।
यद्यपि भूतनाथ एकान्त में बैठा हुआ अपनी स्त्री से बातें कर रहा था, मगर यह बात इन्द्रदेव और देवीसिंह से छि हुई न थी जो इस समय बगीचे में टहलते हुए बातें कर रहे थे । इन दोनों के देखते ही देखते नानक भूतनाथ की तरफ गया और लौट आया इसके बाद भूतनाथ की स्त्री अपने डेरे पर चली गई और फिर रामदेई, अर्थात् नानक की मां, भूतनाथ की तरफ जाती हुई दिखाई पड़ी। उस समय इन्द्रदेव ने देवीसिंह से कहा, "सिंहजी, देखिये भूतनाथ अपनी पहली स्त्री से बातचीत कर चुका है, अब उसने नानक की मां को अपने पास बुलाया है । शान्ता की जुबानी उसकी खुटाई का सारा हाल तो उसे जरूर मालूम हो ही गया होगा, इसलिए ताज्जुब नहीं कि वह गुस्से में आकर रामदेई के हाथ-पैर तोड़ डाले !"
देवीसिंह-ऐसा हो तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है, मगर उस औरत ने भी तो सजा पाने के ही लायक काम किया है।
इन्द्रदेव–ठीक है, मगर इस समय उसे बचाना चाहिए ।
देवीसिंह–तो जाइए वहां छिप कर तमाशा देखिए और मौका पड़ने पर उसकी सहायता कीजिए । (मुस्कुराकर) आप ही आग लगाते हैं फिर आप ही बुझाने दौड़ते हैं ।
इन्द्रदेव–(हंस कर) आप तो दिल्लगी करते हैं ।
देवीसिंह–दिल्लगी काहे की? क्या आपने उसे गिरफ्तार नहीं कराया है और अगर गिरफ्तार कराया है तो क्या इनाम देने के लिए ?
इन्द्रदेव–(मुस्कुराते हुए) तो आपकी राय है कि इसी समय उसकी मरम्मत की जाय !
देवीसिंह–-चाहिए तो ऐसा ही ! जी में आवे तो तमाशा देखने चलिए । कहिए तो मैं आपके साथ चलूं।
इन्द्रदेव–नहीं-नहीं, ऐसा न होना चाहिए । भूतनाथ आपका दोस्त है और अब तो नातेदार भी । आप ऐसे मौके पर उसके सामने जा सकते हैं । जाइए और उसे बचाइए, मेरा जाना मुनासिब न होगा।
देवीसिंह–(हँस कर) तो आप चाहते हैं कि मैं भी भूतनाथ के हाथ से दो-एक घूमे खा लूं ? अच्छा साहब जाता हूँ, आपका हुक्म कैसे टालूं, आज आपने बड़ी-बड़ी बातें मुझे सुनाई हैं इसलिए आपका अहसान भी तो मानना होगा।
इतना कहते हुए देवीसिंह पेड़ों की आड़ लेते हुए भूतनाथ की तरफ रवास हुए और जब ऐसी जगह पहुंचे जहां से उन दोनों की बातें बखूबी सुन सकते थे, तब एक चट्टान पर बैठ गये और सुनने लगे कि वे दोनों क्या बातें करते हैं !
भूतनाथ–खैर, अच्छा ही हुआ जो तुम यहाँ तक आ गईं, मुझसे मुलाकात भी हो गई और मैं 'लामाघाटी' तक जाने से बच गया। मगर अब यह तो बताओ कि अपनी सहेली 'नन्हीं' को यहाँ तक क्यों न लेती आई, मैं भी जरा उससे मिल के अपना कलेजा ठण्डा कर लेता?
रामदेई–नन्हीं बेचारी पर क्यों आक्षेप करते हो, उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? और वह यहाँ आती ही काहे को? क्या तुम्हारी लौंडी थी ! व्यर्थ ही एक आदमी को बदनाम और दिक करने के लिए टूटे पड़ते हैं !
भूतनाथ–(उभड़ते हुए गुस्से को दबा कर) छी-छी, वह बेचारी हमारी लौंडी क्यों होने लगी, लौंडी तो तुम उसकी थीं जो झख मारने के लिए उसके घर गई थीं।
रामदेई–(आंचल से आँसू पोंछती हुई) अगर मैं उसके यहाँ गई तो क्या पाप किया ? मैं पहले ही नानक से कहती कि जाकर पूछ आओ तब मैं नन्हीं के यहाँ जाऊँ नहीं तो कहीं व्यर्थ ही बात का बतंगड़ न बन जाय । मगर लड़के ने न माना और आखिर वही नतीजा निकला। बदमाशों ने वहां पहुंच कर उसे भी बेइज्जत किया और मुझे भी बेइज्जत करके यहाँ तक घसीट लाये । उसके सिर झूठे ही कलंक थोप दिया कि वह बेगम की सहेली है।
इतना कहकर रामदेई नखरे के साथ रोने लगी।
भूतनाथ–तुमने पहले भी कभी उसका जिक्र मुझसे किया था कि वह तुम्हारी नातेदार है, या मुझसे पूछ कर कभी उसके यहाँ गई थीं?
रामदेई–एक दफा गई सो तो यह गति हुई, यदि और जाती तो न मालूम क्या होता!
भूतनाथ–जो लोग तुझे यहाँ ले आये हैं वे बदमाश थे ?
रामदेई–बदमाश तो कहे ही जाएँगे ! जो व्यर्थ दूसरों को दुःख दें वेही बदमाश होते हैं और क्या बदमाशों के सिर पर सींग होते हैं! तुम्हारी अक्ल पर तो पत्थर पड़ गया है कि जो लोग तुम्हारी बेइज्जती किये ही जाते हैं, उन्हीं के लिए तुम जान दे रहे हो । न मालूम तुम्हें ऐसी क्या गरज पड़ी हुई है ?
भूतनाथ-–ठीक है, यही राय लेने के लिए तो मैंने तुम्हें यहाँ एकान्त में बुलाया है । अगर तुम्हारी राय होगी तो मैं बते-देखते इन लोगों से बदला ले लूंगा, क्या मैं कमजोर या दब्बू हूँ !
रामदेई–जरूर बदला लेना चाहिए, अगर तुम ऐसा नहीं करोगे तो मैं समझूगी कि तुमसे बढ़कर कमीना कोई नहीं है ।
इतना सुनकर भूतनाथ को बेहिसाब गुस्सा चढ़ आया मगर फिर भी उसने अपने क्रोध को दबाया और कहा भूतनाथ–अच्छा, तो अब मैं ऐसा ही करूंगा, मगर यह तो बताओ कि शेर की लड़की 'गौहर' से तुमसे क्या नाता है?
रामदेई–उस मुसलमानिन से मुझसे क्या नाता होगा ! मैंने तो उसकी सुरत भी नहीं देखी।
भूतनाथ–लोग तो कहते हैं कि तुम उसके यहाँ भी आती-जाती हो और मेरे बहुत से भेद तुमने उसे बता दिये हैं।
रामदेई–सब झूठ है । ये लोग बात लगाने वाले जैसे ही धूर्त और पाजी हैं वैसे ही तुम सीधे और बेवकूफ हो।
अब भूतनाथ अपने गुस्से को बर्दाश्त न कर सका और उसने एक चपत रामदेई के गाल पर ऐसी जमाई कि वह तिलमिला कर जमीन पर लेट गई, मगर उसे चिल्लाने का साहस न हुआ । कुछ देर बाद वह उठ बैठी और भूतनाथ का मुंह देखने लगी।
भूतनाथ–कमीनी हरामजादी ! जिनके लिए मैं जान तक देने को तैयार हूँ उन्हीं लोगों की शान में तू ऐसी बातें कह रही है जो एक पराये को भी कहना उचित नहीं है और जिसे मैं एक सायत के लिए भी बर्दाश्त नहीं कर सकता ! ले समझ ले और कान खोल कर सुन ले कि तेरे हाथ की लिखी वह चिट्ठी मुझे मिल गई है जो तूने चाँद वाले दिन गौहर के यहाँ मिलने के लिए नन्हीं के पास भेजी थी और जिसमें तूने अपना परिचय 'करौंदा की ये-छैये' दिया था। बस, इसीसे समझ ले कि तेरी सब कलई खुल गई और तेरी बेईमानी लोगों को मालूम हो गई । अब तेरा नखरे के साथ रोना बातें बना कर अपने को बेकसूर साबित करना व्यर्थ है। अब तेरी मुहब्बत, एक रत्ती बराबर मेरे दिल में नहीं रह गई और तुझे उस जहरीली नागिन से भी हजार दर्जे बढ़ के समझने लग गया जिसे खूबसूरत होने पर भी कोई हाथ से छूने तक का साहस नहीं कर सकता । मुझे आज इस बात का सख्त रंज है कि मैंने तुझे इतने दिन तक प्यार किया और इस बात की सरफ कुछ भी ध्यान न दिया कि उस मुहब्बत, ऐयाशी और शौक का नतीजा एक-न- एक दिन जरूर भयानक होता है जिसे छिपाने की जरूरत समझी जाती है और जिसका जाहिर होना मिन्दगी और बेहयाई का सबब समझा जाता है। मुझे इस बात का भारी अफसोस है कि तुझसे अनुचित सम्बन्ध रखकर मैंने उस उचित सम्बन्ध वाली का साथ छोड़ दिया जिसकी जूतियों की बराबरी भी तू नहीं कर सकती या यों कहना चाहिए कि तेरे शरीर का चमड़ा जिसकी जूतियों में भी देखना मैं पसन्द नहीं कर सकता। मुझे इस बात का दुःख है कि नागर या मायारानी के कब्जे से तुझे छुड़ाने के लिए मैंने तरह-तरह के ढोंग रचे और इसका दम भर के लिए भी विचार न किया कि मैं उस क्षयी रोग को अपनी छाती से लगाने का प्रबन्ध कर रहा हूँ जिसे पहली ही अवस्था में ईश्वर की कृपा ने मुझसे अलग कर दिया था। ये बातें तू अपने ही लिए न समझ, बल्कि अपने जाए नानक के लिए भी समझ कर मेरे सामने से उठ जा और उससे भी कह दे कि आज से मेरे सामने आकर मेरी जूतियों का शिकार न बने । यदि मेरे पुराने विचार न बदल गये होते और उन दिनों की तरह आज भी मैं पाप को पाप न समझता होता तो आज तेरी खाल खिचवा कर नमक और मिर्च का उबटन लगवा देता, मगर खैर, अब इतना ही
च०स०-6-6
कहता हूँ कि मेरे सामने से उठ जा और फिर कभी अपना काला मुंह मुझे मत दिखाना।
जिस कुल को तू पहले कलंक लगा चुकी है अब भी उसी कुल की बदनामी का सबब बन कर दुनिया की हवा खा ।
रामदेई के पास भूतनाथ की बातों का जवाब न था । वह अपनी पुरानी चिट्ठी का सच्चा परिचय सुन कर ददहवास हो गई और समझ गई कि उसके अच्छे नसीब के पहिए की धुरी टूट गई जिसे अब किसी तरह भी नहीं बना सकती। वह अपने धड़कते हुए कलेजे और कांपते गए बदन के साथ भूतनाथ की बातें सुनती रही और अन्त में उठने का साहस करने पर भी अपनी जगह से न हिल सकी। मगर भूतनाथ वहाँ से उठ खड़ा हुआ और बँगले की तरफ चल पड़ा। थोड़ी ही दूर गया होगा कि देवीसिंह से मुलाकात हुई जिसने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "भूतनाथ, शाबाश ! शाबाश ! जो कुछ नेक और बहादुर आदमियों को करना चाहिए, इस समय तुमने वही किया। मैं छिप कर तुम्हारी सब बातें सुन रहा था । अगर तुम कुछ बेजा काम करना चाहते तो मैं तुम्हें जरूर रोकता, मगर ऐसा करने का मौका न हुआ, जिससे मैं बहुत ही खुश हूँ। अच्छा जाओ, अपने कमरे में जाकर आराम करो, मैं अब इन्द्रदेव के पास जाता हूँ।"
8
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है, एक सुन्दर सजे हुए कमरे में राजा गोपाल- सिंह और इन्द्रदेव बैठे हैं और उनके सामने नानक हाथ जोड़े बैठा दिखाई देता है।
गोपालसिंह–(नानक से) ठीक है, यद्यपि इन बातों में तुमने अपनी तरफ से कुछ नमक–मिर्च जरूर लगाया होगा, मगर फिर भी मुझे कोई ऐसी बात नहीं जान पड़ती जिससे भूतनाथ को दोषी ठहराऊँ। उसने जो कुछ तुम्हारी माँ से कहा सच कहा और उसके साथ जैसा बर्ताव किया वह उचित ही था। इस विषय में मैं भूतनाथ को कुछ भी नहीं कह सकता और न अब तुम्हारी बातों पर भरोसा ही कर सकता हूँ। बड़े अफसोस की बात है कि मेरी नसीहत ने तुम्हारे दिल पर कुछ भी असर न किया और अगर कुछ किया भी तो वह दो-चार दिन बाद जाता रहा। अगर तुम अपनी मां के साथ नन्हीं के मकान में गिरफ्तार न हुए होते तो कदाचित् मैं तम्हारे धोखे में आ जाता, मगर अब मैं किसी तरह भी तुम्हारा साथ नहीं दे सकता।
नानक–मगर आप मेरा कसूर माफ कर चुके हैं और
इन्द्रदेव–(नानक से) अगर तुम उस माफी को पाकर खुश हुए थे तो फिर पुराने रास्ते पर क्यों गये और पुनः अपनी को लेकर नन्हीं के पास क्यों पहुंचे ? तुम्हें बात करते शर्म नहीं आती!
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, उन्नीसवाँ भाग, तीसरा क्यान।
8
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है, एक सुन्दर सजे हुए कमरे में राजा गोपाल- सिंह और इन्द्रदेव बैठे हैं और उनके सामने नानक हाथ जोड़े बैठा दिखाई देता है।
गोपालसिंह–(नानक से) ठीक है, यद्यपि इन बातों में तुमने अपनी तरफ से कुछ नमक–मिर्च जरूर लगाया होगा, मगर फिर भी मुझे कोई ऐसी बात नहीं जान पड़ती जिससे भूतनाथ को दोषी ठहराऊँ। उसने जो कुछ तुम्हारी माँ से कहा सच कहा और उसके साथ जैसा बर्ताव किया वह उचित ही था। इस विषय में मैं भूतनाथ को कुछ भी नहीं कह सकता और न अब तुम्हारी बातों पर भरोसा ही कर सकता हूँ। बड़े अफसोस की बात है कि मेरी नसीहत ने तुम्हारे दिल पर कुछ भी असर न किया और अगर कुछ किया भी तो वह दो-चार दिन बाद जाता रहा। अगर तुम अपनी मां के साथ नन्हीं के मकान में गिरफ्तार न हुए होते तो कदाचित् मैं तम्हारे धोखे में आ जाता, मगर अब मैं किसी तरह भी तुम्हारा साथ नहीं दे सकता।
नानक–मगर आप मेरा कसूर माफ कर चुके हैं और
इन्द्रदेव–(नानक से) अगर तुम उस माफी को पाकर खुश हुए थे तो फिर पुराने रास्ते पर क्यों गये और पुनः अपनी को लेकर नन्हीं के पास क्यों पहुंचे ? तुम्हें बात करते शर्म नहीं आती!
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, उन्नीसवाँ भाग, तीसरा क्यान। गोपालसिंह–फिर भी मैं अपनी जबान (माफी) का खयाल करूँगा और तुम्हें किसी तरह की तकलीफ न दूंगा, मगर अब भूतनाथ की तरह मैं भी तुम्हारी गूरत देखना पसन्द नहीं करता और न भूतनाथ को इस विषय में कुछ कहना चाहता हूँ । इन्द्रदेव ने तुम्हारे साथ इतनी ही रियायत की सो बहुत किया कि तुमको यहाँ से निकल जाने की आज्ञा दे दी, नहीं तो तुम इस लायक थे कि जन्म-भर कैद में पड़े सड़ा करते।
नानक–जो आज्ञा, मगर मेरे पिता से इतना तो दिला दीजिए कि मेरी माँ जन्म भर खाने-पीने की तरफ से बेफिक्र रहे।
इन्द्रदेव–अबे कमीने, तुझे यह कहते शर्म नहीं मालूम होती ! इतना बड़ा हो के भी तू अपनी मां के लायक दाना-पानी नहीं जुटा सकता ? खैर, अब तुझे आखिरी मर्तबे कहा जाता है कि अब हम लोगों से किसी तरह की उम्मीद न रख और अपनी माँ को साथ लेकर यहाँ से जा। भूतनाथ ने भी मुझे यही कहने के लिए कहला भेजा है।
इतना कहकर इन्द्रदेव ने ताली बजाई और साथ ही अपने ऐयार सरयूसिंह को कमरे के अन्दर आते देखा।
इन्द्रदेव–(सरयू से) भूतनाथ कहाँ है?
सरयू–नम्बर पांच के कमरे में देवीसिंहजी से बातें कर रहे हैं । वे दोनों यहाँ आए भी थे मगर यह सुनकर कि नानक यहां बैठा हुआ है, पिछले पैर लौट गए।
इन्द्रदेव–अच्छा, तुम जाओ और उन्हें यहाँ बुला लाओ।
सरयूसिंह–जो आज्ञा ! परन्तु मुझे आशा नहीं है कि वे लोग नानक के रहते यहाँ आवेंगे।
इन्द्रदेव–अच्छा, तो मैं खुद जाता हूँ।
गोपालसिंह––हाँ तुम्हारा ही जाना ठीक होगा, देवीसिंह को भी बुलाते आना ।
इन्द्रदेव उठकर चले गए और थोड़ी ही देर में भूतनाथ तथा देवीसिंह को साथ लिए हुए आ पहुंचे।
गोपालसिंह—(भूतनाथ से) क्यों साहब, आप यहाँ तक आकर लौट क्यों गए?
भूतनाथ—यों ही, मैंने समझा कि आप लोग किसी खास बात में लगे हुए हैं।
गोपालसिंह—अच्छा, बैठिए और एक बात का जवाब दीजिए।
भूतनाथ—कहिए!
गोपालसिंह—रामदेई और नानक के बारे में आप क्या हुक्म देते हैं?
भूतनाथ—महाराज ने क्या आज्ञा दी है?
गोपालसिंह—उन्होंने इसका फैसला आप ही के ऊपर छोड़ा है।
भूतनाथ—फिर जो राय आप लोगों की हो, मैंने तो इन दोनों के बारे में इसकी माँ को हुक्म सुना ही दिया है।
गोपालसिंह—इनके कसूर तो आप सुन ही चुके होंगे।
भूतनाथ—पिछले कसुरों को तो मैं सुन ही चुका हूँ, हाँ नया कसूर सिर्फ इतना ही मालूम हुआ है कि ये दोनों नन्हीं के यहां गिरफ्तार हुए हैं।
गोपालसिंह—इसके अतिरिक्त एक बात और है । भूतनाथ–वह क्या?
गोपालसिंह–यही कि ये दोनों अगर खाली हाथ न होते तो बेचारी शान्ता को जान से मार डालते।
इतने ही में नानक बोल उठा, "नही-नहीं, यह आपके जासूसों ने हमारे ऊपर झूठा इलजाम लगाया है!"
भूतनाथ–अगर यह बात है तो मैं इसे हथकड़ी से खाली क्यों देखता हूँ?
इन्द्रदेव–इसीलिए कि हमारे हाते के अन्दर ये लोग कुछ कर नहीं सकते । जब ये लोग यहाँ गिरफ्तार होकर आये तो कुछ दिन तक तो भलमनसी के साथ रहे, मगर आज इनकी नीयत बिगड़ी हुई मालूम पड़ी।
भूतनाथ–खैर, अब आप ही इनके लिए हुक्म सुनाइए । मगर इन्द्रदेव, आप यह न समझियेगा कि इन लोगों के बारे में मुझे किसी तरह का रंज है । मैं सच कहता हूँ कि इन दोनों का यहाँ आना मेरे लिए बहुत अच्छा हुआ ! मैं इन लोगों के फेर में बेतरह फंसा हुआ था । आज मालूम हुआ कि ये लोग जहरी हलाहल से भी बढ़े हुए हैं, अतः आज इन लोगों से पीछा छुड़ाकर मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ। मेरे सिर से बोझा उतर गया और अब मेरी जिन्दगी खुशी के साथ बीतेगी। आपका कहना सच निकला अर्थात् इनका यहाँ आना मेरे लिए खुशी का सबब हुआ
इन्द्रदेव–अच्छा यह बताइए कि ये अगर इसी तरह छोड़ दिये जायें तो आपके खजाने को तो किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा सकते जो 'लामाघाटी' के अन्दर है?
भूतन–कुछ भी नहीं, और 'लामाघाटी' के अन्दर जेवरों के अतिरिक्त और कुछ है भी नहीं, सो जेवरों को मैं वहाँ से मँगवा ले सकता हूँ।
इन्द्रदेव–अगर सिर्फ नानक की माँ के जेवरों से आपका मतलब है तो वह अब मेरे कब्जे में हैं क्योंकि नन्हीं के यहां वह बिना जेवरों के नहीं गई थी।
भूतनाथ–बस, तो मैं उस तरफ से बेफिक्र हो गया, यद्यपि उन जेवरों की मुझे कोई परवाह नहीं है मगर उसके पास मैं एक कौड़ी भी नहीं छोड़ना चाहता। इसके अतिरिक्त यह भी जरूर कहूँगा कि अब ये लोग सूखे छोड़ देने लायक नहीं रहे।
इन्द्रदेव–खैर, जैसी राय होगी, वैसा ही किया जायगा।
इतना कहकर इन्द्रदेव ने पुनः सरयूसिंह को बुलाया और जब वह कमरे के अन्दर आ गया तो कहा–"थोड़ी देर के लिए नानक को बाहर ले जाओ।"
नानक को लिए हुए सरयूसिंह कमरे के बाहर चला गया और इसके बाद चारों आदमी विचार करने लगे कि नानक और उसकी मां के साथ क्या बर्ताव करना चाहिए। देर तक सोच-विचार कर यही निश्चय किया कि उन दोनों को देश से निकाल दिया जाय और कह दिया जाय कि जिस दिन हमारे महाराज की अमलदारी में दिखाई दोगे, उसी दिन मार डाले जाओगे।
इस हुक्म पर महाराज से आज्ञा लेने की इन लोगों को कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि उन्होंने सब बातें सुन-सुनाकर पहले ही हुक्म दे दिया था कि भूतनाथ की आज्ञा- नुसार काम किया जाय, अतः नानक कमरे के अन्दर बुलाया गया और इसके बाद राम देई भी बुलाई गई। जब दोनों इकट्ठे हो गए तो उन्हें हुक्म सुना दिया गया।
यह हुक्म यद्यपि साधारण मालूम होता है मगर उन दोनों के लिए ऐसा न था जिन्हें भूतनाथ की बदौलत शाहखर्ची की आदत पड़ गई थी। नानक और रामदेई की आँखों से आँसू जारी थे, जब इन्द्रदेव ने सरयूसिंह को हुक्म दिया कि चार आदमी इन दोनों को ले जायँ और महाराज की सरहद के बाहर कर आवें । सरयूसिंह दोनों को लिए हुए कमरे के बाहर निकल गया।
भूतनाथ–सिर से वोझ उतरा और कम्बख्तों से पीछा छूटा। अच्छा, अब बत- लाइये कि कल क्या-क्या होगा?
गोपालसिंह–-महाराज ने तो यही हुक्म किया है कि कल यहाँ से डेरा कूच किया जाये और तिलिस्म की सैर करते हुए चुनारगढ़ पहुँचें, चम्पा, शान्ता, हरनामसिंह, भरतसिंह और दलीपशाह वगैरह बाहर की राह से चुनार भेज दिये जायें। यदि हमारे किसी ऐयार की भी इच्छा हो तो उनके साथ चला जाये।
भूतनाथ–ऐसा कौन बेवकूफ होगा, जो तिलिस्म की सैर छोड़कर उनके साथ जायेगा!
देवीसिंह–सभी कोई ऐसा ही कहते हैं।
भूतनाथ–-हाँ, यह तो बताइये कि मैंने नानक को जब दरबार में देखा था, तो उसके हाथ में एक लपेटी तस्वीर थी, अब वह तस्वीर कहाँ है और उसमें क्या बात थी?
इन्द्रदेव–वह कागज जिसे आप तस्वीर समझे हुए हैं मेरे पास है, आपको दिखाऊंगा । असल में वह तस्वीर नहीं है, बल्कि नानक ने उसमें एक बहुत बड़ी दर्खास्त लिखकर तैयार की थी, जो दरबार में आकर पेश करना चाहता था, मगर ऐसा कर न सका।
भूतनाथ–उसमें लिखा क्या था?
इन्द्रदेव–जो लोग उसे गिरफ्तार कर लाये हैं, उनकी शिकायत के सिवाय और कुछ भी नहीं। साथ ही इसके उस दर्खास्त में इस बात पर बहुत जोर दिया गया था कि कमला की माँ वास्तव में मर गई है और आज जिस शान्ता को सब कोई देख रहे हैं, वह वास्तव में नकली है।
भूतनाथ–वाह रे शैतान ! (कुछ सोचकर) तो शायद वह दर्खास्त महाराज के हाथ तक नहीं पहुँची?
इन्द्रदेव–क्यों नहीं, मैंने जान-बूझकर उसे ऐसा करने का मौका दिया। वह रात को पहरे वालों से इत्तिला कराकर खुद महाराज के पास पहुँचा और उनके सामने वह दर्खास्त रख दी। उस समय महाराज ने मुझे बुलाया और मुझी को वह दर्खास्त पढ़ने के लिए दी गई। उसे सुनकर महाराज ने मुस्कुरा दिया और इशारा किया कि वह कमरे के बाहर निकाल दिया जाये, क्योंकि इसके पहले मैं शान्ता और हरनामसिंह का पूरा-पूरा हाल महाराज से अर्ज कर चुका था।
भूतनाथ—अच्छा, मुझे भी वह दर्खास्त दिखाइयेगा।
इन्द्रदेव–(उँगली से इशारा करके) वहाँ कारनिस के ऊपर पड़ी हुई है, देख लीजिये।
भूतनाथ ने दर्खास्त उतार कर पढ़ी और उसके बाद कुछ देर तक उन लोगों में बातचीत होती रही।
9
सुबह का सुहावना समय सब जगह एक सा नहीं मालूम होता, घर की खिड़कियों में उसका चेहरा कुछ और ही दिखायी देता है और बाग में उसकी कैफियत कुछ और ही मस्तानी होती है, पहाड़ में उसकी खूबी कुछ और ही ढंग की दिखाई देती है और जंगल में उसकी छटा कुछ निराली ही होती है। आज इन्द्रदेव के इस अनूठे स्थान में इसकी खूबी सबसे चढ़ी-बढ़ी है, क्योंकि यहां जंगल भी हैं, पहाड़ भी, अनूठा बाग तथा सुन्दर बँगला या कोठी भी है, फिर यहाँ के आनन्द का पूछना ही क्या । इसलिए हमारे महाराज, कुंअर साहब और ऐयार लोग भी यहाँ घूम-घूमकर सुबह के सुहावने समय का पूरा आनन्द ले रहे हैं, खास करके इसलिए कि आज ये लोग डेरा कूच करने वाले हैं।
बहुत देर घूमने-फिरने के बाद सब कोई बाग में आकर बैठे और इधर-उधर की बातें होने लगीं।
जीतसिंह–(इन्द्रदेव से) भरतसिंह वगैरह तथा औरतों को आपने चुनार रवाना कर दिया?
इन्द्रदेव–जी हाँ, बड़े सवेरे ही उन लोगों को बाहर की राह से रवाना कर दिया। औरतों के लिए सवारी का इन्तजाम कर देने के अतिरिक्त अपने दस-पन्द्रह मात- बर आदमी भी साथ कर दिये हैं।
जीतसिंह–अब हम लोग कुछ भोजन करके यहां से रवाना हुआ चाहते हैं।
इन्द्रदेव–जैसी मर्जी !
जीतसिंह–भैरों और तारा जो आपके साथ यहाँ आए थे कहाँ चले गये, दिखाई नहीं पड़ते।
इन्द्रदेव–अब भी मैं उन्हें अपने साथ ही ले जाने की आज्ञा चाहता हूँ, क्योंकि उनकी मदद की मुझे जरूरत है।
जीतसिंह–तो त्या आप हम लोगों के साथ न चलेंगे?
इन्द्रदेव–जी हाँ, उस बाग तक जरूर साथ चलूंगा, जहाँ से मैं आप लोगों को यहाँ तक ले आया हूँ, पर उसके बाद गुप्त हो जाऊँगा, क्योंकि मैं आपको कुछ तिलिस्मी तमाशे दिखाना चाहता हूँ और इसके अतिरिक्त उन चीजों को भी तिलिस्म के अन्दर से निकलवा कर चुनार पहुँचाना है, जिनके लिए आज्ञा मिल चुकी है।
सुरेन्द्रसिंह–नहीं-नहीं, गुप्त रीति पर हम तिलिस्म का तमाशा नहीं देखना चाहते, हमारे साथ रहकर जो कुछ दिखा सको, दिखा दो। बाकी रहा उन चीजों को निकलवा कर चुनार पहुंचाना, सो यह काम दो दिन के बाद भी होगा तो कोई हर्ज नहीं।
इन्द्रदेव–जैसी आज्ञा!
इतना कहकर इन्द्रदेव थोड़ी देर के लिए कहीं चले गए और तब भैरोंसिंह तथा तारासिंह को साथ लिए आकर बोले, "भोजन तैयार है।"
सब लोग वहाँ से उठे और भोजन इत्यादि से छुट्टी पाकर तिलिस्म की तरफ रवाना हुए । जिस तरह इन्द्रदेव इन लोगों को अपने स्थान में ले आए थे, उसी तरह पुनः उस तिलिस्मी बाग में ले गए, जिसमें से लाए थे।
जब महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैरह उस बारहदरी में पहुँचे, जिसमें पहले दिन आराम किया था और जहाँ बाजे की आवाज सुनी थी, तब दिन पहर भर से कुछ ज्यादा बाकी था। जीतसिंह ने इन्द्रदेव से पूछा, “अब क्या करना चाहिए?"
इन्द्रदेव–यदि महाराज आज की रात यहाँ रहना पसन्द करें, तो एक दूसरे वाग में चलकर वहाँ की कुछ कैफियत दिखाऊँगा!
जीतसिंह–बहुत अच्छी बात है, चलिए।
इतना सुनकर इन्द्रदेव ने उस बारहदरी की कई आलमारियों में से एक आल- मारी खोली और उसके अन्दर जाकर सभी को अपने पीछे आने का इशारा किया। यहाँ एक गली की तौर पर रास्ता बना हुआ था, जिसमें सब कोई इन्द्रदेव की इच्छानुसार बेखौफ चले गए और थोड़ी दूर जाने के बाद जब इन्द्रदेव ने दूसरा दरवाजा खोला, तब उसके बाहर होकर सभी ने अपने को एक छोटे बाग में पाया, जिसकी बनावट कुछ विचित्र ही ढंग की थी। यह बाग जंगली पौधों की सब्जी से हरा-भरा मा और पानी का चश्मा भी बह रहा था, मगर चारदीवारी के अतिरिक्त और किसी तरह की बड़ी इमारत इसमें न थी, हाँ बीच में एक बहुत बड़ा चबूतरा जरूर था, जिस पर धूप और बरसाती पानी के लिए सिर्फ मोटे-मोटे बारह खम्भों के सहारे पर छत बनी हुई थी और चबूतरे पर चढ़ने के लिए चारों तरफ सीढ़ियाँ थीं।
यह चबूतरा कुछ अजीब ढंग का बना हुआ था। लगभग चालीस हाथ के चौड़ा और इतना ही लम्बा होमा। इसके फर्श में लोहे की बारीक नालियां जाल की तरह जड़ी हुई थीं और बीच में एक चौखूटा स्याह पत्थर इस अन्दाज का रखा था, जिस पर चार आदमी बैठ सकते थे । बस, इसके अतिरिक्त इस चबूतरे में और कुछ भी न था।
थोड़ी देर तक सब कोई उस चबूतरे की बनावट देखते रहे, इसके बाद इन्द्रदेव ने महाराज से कहा, "तिलिस्म बनाने वालों ने यह बगीचा केवल तमाशा देखने के लिए बनाया था । यहाँ की कैफियत आपके साथ रहकर मैं नहीं दिखा सकता । हाँ, यदि आप मुझे दो-तीन पहर की छुट्टी दें तो !"
इन्द्रदेव की बात महाराज ने मंजूर कर ली और तब वह (इन्द्रदेव) सभी के देखते देखते चौखूटे पत्थर के ऊपर चले गए जो चबूतरे के बीच में जड़ा हुआ था । सवार होने साथ ही वह पत्थर हिला और इन्द्रदेव को लिए हुए जमीन के अन्दर चला गया, मगर थोड़ी देर में पुनः ऊपर चला आया और अपने ठिकाने पर ज्यों का त्यों बैठ गया लेकिन इस समय इन्द्रसेन उस पर न थे । इन्द्रदेव के चले जाने के बाद थोड़ी देर तक तो सब कोई उस चबूतरे पर खड़े रहे, इसके बाद धीरे-धीरे वह चबूतरा गरम होने लगा और वह गर्मी यहाँ तक बढ़ी कि लाचार उन सभी को चबूतरा छोड़ देना पड़ा, अर्थात् सब कोई चबूतरे के नीचे उतर आए और बाग में टहलने लगे। इस समय दिन घण्टे भर से कुछ कम बाकी था।
इस खयाल से देखें कि इसकी दीवार किस ढंग की बनी हुई हैं, सब कोई घूमते हुए पूरब की तरफ वाली दीवार के पास जा पहुंचे और गौर से देखने लगे, मगर कोई अनूठी बात दिखाई न दी । इसके बाद उत्तर तरफ वाली और फिर पश्चिम तरफ वाली दीवार को देखते हुए सब कोई दक्खिन की तरफ गए और उधर की दीवार को आश्चर्य के साथ देखने लगे, क्योंकि इसमें कुछ विचित्रता थी।
यह दीवार शीशे की मालूम होती थी और इसमें महाभारत की तस्वीरें बनी हुई थीं। ये तस्वीरें उसी ढंग की थीं, जैसी कि उस तिलिस्मी बंगले में चलती-फिरती तस्वीरें इन लोगों ने देखी थीं। ये लोग तस्वीरों को बड़ी देर तक देखते रहे और सभी को विश्वास हो गया कि जिस तरह उस बंगले वाली तस्वीरों को चलते-फिरते और काम करते हम लोग देख चुके हैं उसी तरह इन तस्वीरों को भी देखेंगे, क्योंकि दीवार पर हाथ फेरने से साफ मालूम होता था कि तस्वीरें शीशे के अन्दर हैं।
इन तस्वीरों को देखने से महाभारत की लड़ाई का जमाना आँखों के सामने फिर जाता था । कौरवों और पाण्डवों की फौज, उसके बड़े-बड़े सेनापति तथा रथ, हाथी, घोड़े इत्यादि जो कुछ बने थे, सभी अच्छे और दिल पर असर पैदा करने वाले थे। 'इस लड़ाई की नकल अपनी आँखों से देखेंगे' इस विचार से सब कोई प्रसन्न थे। बड़ी दिलचस्पी के साथ उन तस्वीरों को देख रहे ये, यहाँ तक कि सूर्य अस्त हो गया और धीरे-धीरे अंधकार ने चारों तरफ अपना दखल जमा लिया। उस समय यकायक दीवार चमकने लगी और तस्वीरों में हरकत पैदा हुई जिससे सभी ने समझा कि नकली लड़ाई शुरू हुआ चाहती है मगर कुछ ही देर बाद लोगों का यह विश्वास ताज्जुब के साथ बदल गया, जब यह देखा कि उसमें की तस्वीरें एक-एक करके गायब हो रही हैं, यहां तक कि घड़ी भर के अन्दर ही सब तस्वीरें गायब हो गई और दीवार साफ दिखाई देने लगी। इसके बाद दीवार की चमक भी बन्द हो गई और फिर अन्धकार दिखाई देने लगा।
थोड़ी देर बाद उस चबूतरे की तरफ रोशनी मालूम हुई । यह देखकर सब कोई उसी तरफ रवाना हुए और जब उसके पास पहुंचे तो देखा कि उस चबूतरे की छत में जड़े हुए शीशों के दस-बारह टुकड़े इस तेजी के साथ चमक रहे हैं कि उनसे केवल चबूतरा ही नहीं बल्कि तमाम बाग में उजाला हो रहा है । इसके अतिरिक्त सैकड़ों मूरतें भी उस चबूतरे पर इधर-उधर चलती-फिरती दिखाई दीं। गौर करने से मालूम हुआ कि ये मूरतें (या तस्वीरें) बेशक वे ही हैं, जिन्हें उस दीवार के अन्दर देख चुके हैं। ताज्जुब नहीं कि वह दीवार इन सभी का खजाना हो और वही यहाँ इस चबूतरे पर आकर तमाशा दिखाती हों।
इस समय जितनी मूरतें उस चबूतरे पर थीं, सब अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की लडाई से सम्बन्ध रखती थीं। जब उन मूरतों ने अपना काम शुरू किया तो ठीक अभि- मन्यु की लड़ाई का तमाशा आँखों के सामने दिखाई देने लगा। जिस तरह कौरवों के रचे हुए व्यूह के अन्दर फंसकर कुमार अभिमन्यु ने वीरता दिखाई थी और अन्त में अधर्म के साथ जिस तरह वह मारा गया था, उसी को आज नाटक स्वरूप में देखकर सब कोई बड़े प्रसन्न हुए और सभी के दिलों पर बहुत देर तक इसका असर रहा।
इस तमाशे का हाल खुलासा तौर पर हम इसलिए नहीं लिखते कि इसकी कथा बहुत प्रसिद्ध है और महाभारत में विस्तार के साथ लिखी है।
यह तमाशा थोड़ी ही देर में खत्म नहीं हुआ बल्कि देखते हुए तमाम रात बीत गई। सवेरा होने के कुछ पहले अंधकार हो गया और उसी अंधकार में सब मूरतें गायव हो गईं। उजाला होने और आँखें ठहरने पर जब सभी ने देखा तो उस चबूतरे पर सिवाय इन्द्रदेव के और कुछ भी दिखाई न दिया।
इन्द्रदेव को देखकर सब कोई प्रसन्न हुए और साहव-सलामत के बाद इस तरह वातचीत होने लगी–
इन्द्रदेव–(चबूतरे से नीचे उतर कर और महाराज के पास आकर) मैं उम्मीद करता हूँ कि इस तमाशे को देखकर महाराज प्रसन्न हुए होंगे।
महाराज–बेशक ! क्या इसके सिवाय और भी कोई तमाशा यहाँ दिखाई दे सकता है?
इन्द्रदेव–जी हाँ, यहाँ पूरा महाभारत दिखाई दे सकता है, अर्थात् महाभारत ग्रन्थ में जो कुछ लिखा है, वह सब इसी ढंग पर और इसी चबूतरे पर आप देख सकते हैं मगर दो-चार दिन में नहीं बल्कि महीनों में ! इसके साथ-साथ बनाने वाले ने इसकी भी तरकब की है कि चाहे शुरू ही से तमाशा दिखाया जाए या बीच ही से कोई टुकड़ा दिखा दिया जाये अर्थात् महाभारत के अन्तर्गत जो कुछ चाहें देख सकते हैं।
महाराज–इच्छा तो बहुत कुछ देखने की थी, मगर इस समय हम लोग यहाँ ज्यादा रुक नहीं सकते, अतः फिर कभी जरूर देखेंगे। हाँ, हमें इस तमाशे के विषय में कुछ समझाओ तो सही कि यह काम क्योंकर हो सकता है और तुमने यहाँ से कहाँ जाकर क्या किया?
इन्द्रदेव ने इस तमाशे का पूरा-पूरा भेद सभी को समझाया और कहा कि ऐसे- ऐसे कई तमाशे इस तिलिस्म में भरे पड़े हैं, अगर आप चाहें तो इस काम में वर्षों बिता सकते हैं, इसके अतिरिक्त यहाँ की दौलत का भी यही हाल है कि वर्षों तक ढोते रहिये फिर भी कमी न हो, सोने-चांदी का तो कहना ही क्या है, जवाहिरात भी आप जितना चाहं ले सकते हैं। सच तो यह है, कि जितनी दौलत यहाँ है, उसके रहने का ठिकाना यहीं हो सकता है । इस बगीचे के आस-पास ही और भी चार बाग हैं, शायद उन सभी में घूमना और वहाँ के तमाशों को देखना इस समय आप पसन्द न करें
महाराज–बेशक इस समय हम इन सब तमाशों में समय बिताना पसन्द नहीं करते । सबसे पहले शादी-ब्याह के काम से छुट्टी पाने की इच्छा लगी हुई है मगर इसके बाद पुनः एक दफे इस तिलिस्म में आकर यहां की सैर जरूर करेंगे।
कुछ देर तक इसी किस्म की बातें होती रही, इसके बाद इन्द्रदेव सभी को पुनः उसी बाग में ले आए, जिसमें उनसे मुलाकात हुई थी या जहाँ से इन्द्रदेव के स्थान में जाने का रास्ता था।
10
इस बाग में पहले दिन जिस बारहदरी में बैठकर सभी ने भोजन किया था, आज पुनः उसी बारहदरी में बैठने और भोजन करने का मौका मिला। खाने की चीजें ऐयार लोग अपने साथ ले आये थे और जल की वहाँ कमी ही न थी, अतः स्नान-सन्ध्योपासन और भोजन इत्यादि से छुट्टी पाकर सब कोई उसी बारहदरी में सो रहे क्योंकि रात के जागे हुए थे और बिना कुछ आराम किये आगे बढ़ने की इच्छा न थी।
जब दिन पहर भर से कुछ कम बाकी रह गया, तब सब कोई उठे और चश्मे के जल से हाथ-मुँह धोकर आगे की तरफ बढ़ने के लिए तैयार हुए ।
JIM – Assistente
Jim IA: pode errar. Não digite dados pessoais. Suas mensagens são processadas por um serviço externo.