चन्द्रकान्ता सन्तति 6
इतना कहकर भूतनाथ ने एक लम्बी साँस ली, और महाराज सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखा।
सुरेन्द्रसिंह-भूतनाथ, यद्यपि हम लोग तुम्हारा कुछ-कुछ हाल जान चुके हैं,मगर फिर भी तुम्हारा पूरा-पूरा हाल तुम्हारे ही मुंह से सुनने की इच्छा रखते हैं। तुम बयान करने में किसी तरह का संकोच न करो। इससे तुम्हारा दिल भी हल्का हो जायेगा, और दिन-रात जो तुम्हें खुटका बना रहता है, वह भी जाता रहेगा।
भूतनाथ-जो आज्ञा !
इतना कहकर भूतनाथ ने महाराज को सलाम किया और अपनी जीवनी इस तरह बयान करने लगा-
भूतनाथ को जीवनी
भूतनाथ-सबके पहले मैं वही बात कहूँगा, जिसे आप लोग अभी नहीं जानते,अर्थात् मैं नौगढ़ के रहने वाले और देवीसिंह के सगे चाचा जीवनसिंहजी का लड़का हूँ ।मेरी सौतेली माँ मुझे देखना पसन्द नहीं । ती थी और मैं उसकी आँखों में काँटे की तरह गड़ा करता था। मेरे ही सबब से मेरी माँ की इज्जत और कदर थी और उस बाँझ को कोई पूछता भी न था, अतएव वह मुझे दुनिया से ही उठा देने की फिक्र में लगी और यह बात मेरे पिता को भी मालूम हो गई, इसलिए जबकि मैं आठ वर्ष का था तो मेरे पिता ने मुझे अपने मित्र देवदत्त ब्रह्मचारी के सुपुर्द कर दिया जो तेजसिंह गुरु थे और महात्माओं की तरह नौगढ़ की उसी तिलिस्मी खोह में रहा करते थे,जिसे राजा वीरेन्द्रसिंहजी ने फतेह किया। मैं नहीं जानता कि मेरे पिता ने मेरे विषय में उन्हें क्या समझाया और क्या कहा, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ब्रह्मचारी मुझे अपने लड़के की तरह मानते, पढ़ाते-लिखाते और साथ-साथ ऐयारी भी सिखाते थे, परन्तु जड़ी-बूटियों के प्रभाव से उन्होंने मेरी सूरत में बहुत बड़ा फर्क डाल दिया था,जिसमें मुझे कोई पहचान न ले । मेरे पिता मुझे देखने के लिए बराबर उनके पास आया करते थे।
इतना कहकर भूतनाथ कुछ देर के लिए चुप रह गया और सबके मुंह की तरफ देखने लगा!
सुरेन्द्रसिंह–(ताज्जुब के साथ) ओफ-ओह ! क्या तुम जीवनसिंह के वही लड़के हो, जिसके बारे में उन्होंने मशहूर कर दिया था कि उसे जंगल में से शेर उठा ले गया ?
भूतनाथ–(हाथ जोड़कर) जी हाँ !
तेजसिंह–और आप वही हैं, जिसे गुरुजी 'फिरकी' कहकर पुकारा करते थे,क्योंकि आप एक जगह ज्यादा देर तक बैठते न थे ।
भूतनाथ–जी हां।
1. चन्द्रकान्ता पहले भाग के छठे बयान में तेजसिंह ने अपने गुरु के बारे में राजा वीरेन्द्रसिंह से कुछ कहा था। देवीसिंह-यद्यपि मैं बहुत दिनों से आपको भाई की तरह मानने लग गया हूँ,परन्तु आज यह जानकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा कि आप वास्तव में मेरे भाई हैं, मगर यह तो बताइए कि ऐसी अवस्था में शेरसिंह आपके भाई क्योंकर हुए? वह कौन हैं ?
भूतनाथ–वास्तव में शेरसिह मेरा सगा भाई नहीं है, बल्कि गुरुभाई और उन्हीं ब्रह्मचारीजी का लड़का है, मगर हाँ, लड़कपन ही से एकसाथ रहने के कारण हम दोनों में भाई-जैसी मुहब्बत हो गई थी।
तेजसिंह-आजकल शेरसिंह कहाँ हैं ?
भूतनाथ-मुझे उनकी कुछ भी खबर नहीं है, मगर मेरा दिल गवाही देता है कि अब वे हम लोगों को दिखाई न देंगे।
वीरेन्द्रसिंह–सो क्यों ?
भूतनाथ—इसीलिए कि वे भी अपने को छिपाये और हम लोगों से मिले-जुले रहते और साथ ही इसके ऐबों से खाली न थे।
सुरेन्द्रसिंह-खैर, कोई चिन्ता नहीं, अच्छा तब ?
भूतनाथ -अतः मैं उन्हीं ब्रह्मचारीजी के पास रहने लगा। कई वर्ष बीत गए।पिताजी मुझसे मिलने के लिए कभी-कभी आया करते थे, और जब मैं बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे अपने से जुदा करने का सबब भी बयान किया और वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए कि मैं ऐयारी के फन में बहुत तेज औरहोशियार हो गया हूँ। उस समय उन्होंने ब्रह्मचारी जी से कहा कि इसे किसी रियासत में नौकर रख देना चाहिए तब इसकी ऐयारी खुलेगी।मुख्तसिर यह कि ब्रह्मचारीजी की ही बदौलत मैं गदाधरसिंह के नाम से रणधीरसिंहजी के यहाँ और शेरसिंह महाराज दिग्विजयसिंह के यहां नौकर हो गये और यह जाहिर किया गया कि शेरसिंह और गदाधरसिंह दोनों भाई हैं, और दोनों आपस में प्रेम भी ऐसा ही रखते थे।
उन दिनों रणधीरसिंहजी की जमींदारी में तरह-तरह के उत्पात मचे हुए थे और बहुत से आदमी उनके जानी दुश्मन हो रहे थे। उनके आपस वालों को तो इस बात का विश्वास हो गया था कि अब रणधीरसिंहजी की जान किसी तरह नहीं बच सकती, क्योंकि उन्हीं दिनों उनका ऐयार श्रीसिंह दुश्मनों के हाथों से मारा जा चुका था, और खूनी का कुछ पता नहीं लगता था । कोई दूसरा ऐयार भी उनके पास नहीं था, इसलिए वे बड़े ही तरदुद में पड़े हुए थे। यद्यपि उन दिनों उनके यहां नौकरी करना अपनी जान खतरे में डालना था, मगर मुझे इन बातों की कुछ भी परवाह न हुई। रणधीरसिंहजी भी मुझे नौकर रखकर बहुत प्रसन्न हुए। मेरी खातिरदारी में कभी किसी तरह की कमी नहीं करते थे। इसके दो सबब थे, एक तो उन दिनों उन्हें ऐयार की सख्त जरूरत थी, दूसरे मेरे पिता से और उनसे कुछ मित्रता भी थी जो कुछ दिन के बाद मुझे मालूम हुई ।
रणधीरसिंहजी ने मेरा ब्याह भी शीघ्र ही करा दिया। सम्भव है कि इसे भी मैं उनकी कृपा और स्नेह के कारण समझू, पर यह भी हो सकता है कि मेरे पैर में गृहस्थी की बेड़ी डालने और कहीं भाग जाने लायक न रखने के लिए उन्होंने ऐसा किया हो, क्योंकि अकेला और बेफिक्र आदमी कहीं पर जन्म भर रहे और काम करे, इसका विश्वास लोगों को कम रहता है । खैर, जो कुछ हो मतलब यह है कि उन्होंने मुझे बड़ी इज्जत और प्यार के साथ अपने यहाँ रखा और मैंने भी थोड़े ही दिनों में ऐसे अनूठे काम कर दिखाए कि उन्हें ताज्जुब होता था। सच तो यह है कि उनके दुश्मनों की हिम्मत टूट गई और वे दुश्मनी की आग में आप ही जलने लगे।
कायदे की बात है कि जब किसी के हाथ से दो-चार काम अच्छे निकल जाते हैं और चारों तरफ उसकी तारीफ होने लगती है, तब वह अपने काम की तरफ से कुछ बेफिक्र हो जाता है । वही हाल मेरा भी हुआ।
आप जानते ही होंगे कि रणधीरसिंहजी का दयाराम नामक एक भतीजा था जिसे वह बहुत प्यार करते थे, और वही उनका वारिस होने वाला था। उसके मां-बाप लड़कपन ही में मर चुके थे, मगर चाचा की मुहब्बत के सबब उसे भी बाप के मरने का दुःख मालूम न हुआ। वह (दयाराम) उम्र में मुझसे कुछ छोटा था, मगर मेरे और उसके बीच में हद दर्जे की दोस्ती और मुहब्बत हो गई थी। जब हम दोनों आदमी घर पर मौजूद रहते तो बिना मिले जी नहीं मानता था। दयाराम का उठना-बैठना मेरे यहाँ ज्यादा होता था, अक्सर रात को मेरे यहाँ खा-पीकर सो जाता था, और उसके घर वाले भी इसमें किसी तरह का रंज नहीं मानते थे।
जो मकान मुझे रहने के लिए मिला था, वह निहायत उम्दा और शानदार था।उसके पीछे की तरफ एक छोटा-सा नजरबाग था, जो दयाराम के शौक की बदौलत हरदम हरा-भरा, गुजान और सुहावना बना रहता था। प्रायः संध्या के समय हम दोनों दोस्त उसी बाग में बैठकर भांग-बूटी छानते और संध्योपासन से निवृत्त हो बहुत रात गये तक गप-शप किया करते।
जेठ का महीना था और गर्मी हद दर्जे की पड़ रही थी। पहर रात बीत जाने पर हम दोनों दोस्त उसी नजरबाग में दो चारपाइयों के ऊपर लेटे आपस में धीरे-धीरे बातें कर रहे थे। मेरा खूबसूरत और प्यारा कुत्ता मेरे पायताने की तरफ एक पत्थर की चौकी पर बैठा हुआ। बात करते-करते हम दोनों को नींद आ गई।
आधी रात से कुछ ज्यादा बीती होगी, जब मेरी आँख कुत्ते के भौंकने की आवाज से खुल गई। मैंने उस पर कुछ विशेष ध्यान न दिया और करवट बदलकर फिर आँखें बन्द कर लीं, क्योंकि वह कुत्ता मुझसे बहुत दूर और नजरबाग के पिछले हिस्से की तरफ था, मगर कुछ ही देर बाद वह मेरी चारपाई के पास आकर भौंकने लगा, और पुनः मेरी आंख खुल गई । मैंने कुत्ते को अपने सामने बेचैनी की हालत में देखा, उस समय वह जुबान निकालते हुए जोर-जोर से हांफ रहा, और दोनों अगले पैरों से जमीन खोद रहा था।
मैं अपने कुत्ते की आदतों को खूब जानता और समझता था, पतः उसकी ऐसी अवस्था देखकर मेरे दिल में खुटका हुआ और मैं घबराकर उठ बैठा। अपने मित्र भी उठाकर होशियार कर देने की नीयत से मैंने उसकी चारपाई की तरफ देखा, मगर चारपाई खाली पाकर मैं बेचैनी के साथ चारों तरफ देखने लगा और उठकर चारपाई के नीचे खड़े होने के साथ ही मैंने अपने सिरहाने के नीचे से खंजर निकाल लिया। उस समय मेरा नमकहलाल कुत्ता मेरी धोती पकड़कर बार-बार खींचने और बाग के पिछले हिस्से तरफ चलने का इशारा करने लगा और जब मैं उसके इशारे के मुताबिक चला तो धोती छोड़कर आगे-आगे दौड़ने लगा। कदम बढ़ाता हुआ मैं उसके पीछे-पीछे चला। समय मालूम हुआ कि मेरा कुत्ता जख्मी है, उसके पिछले पैर में चोट आई है, इसलिए पैर उठाकर दौड़ता था। अतः कुत्ते के पीछे-पीछे चलकर मैं पिछली दीवार के पास पहुँचा जहाँ मालती और मोमियाने की लताओं के सबब घना कुंज और पूरा अन्धक हो रहा था। कुत्ता उस झुरमुर के पास जाकर रुक गया और मेरी तरफ देखक दुम हिलाने लगा। उसी समय मैंने झाड़ी में से तीन आदमियों को निकलते हुए देखा ज बाग की दीवार के पास चले गए और फुर्ती से दीवार लाँघकर पार हो गए। उन तीनों से एक आदमी के हाथ में एक छोटी-सी गठरी थी जो दीवार लाँघते समय उसके हाथ छूटकर बाग के भीतर ही गिर पड़ी। निःसन्देह वह गठरी लेने के लिए भीतर को लौटत मगर उसने मुझे और मेरे कुत्ते को देख लिया था, इसलिए उसकी हिम्मत न पड़ी।
गठरी गिरने के साथ ही मैंने जफील बजाई और खंजर हाथ में लिए हुए ही उस आदमी का पीछा करना चाहा अर्थात् दीवार की तरफ बढ़ा, मगर कुत्ते ने मेरी धोती पकड़ ली और झाड़ी की तरफ हट कर खींचने लगा, जिससे मैं समझ गया कि इस झाड़ी में भी कोई छिपा हुआ है, जिसकी तरफ कुत्ता इशारा कर रहा है। मैं सम्हल कर खड़ा हो गया और गौर के साथ उस झाड़ी की तरफ देखने लगा। उसी समय पत्तों की खड़-खड़ाहाट ने विश्वास दिला दिया कि इसमें कोई और भी है । मैं इस खयाल से कि जिस तरह पहले तीन आदमी दीवार लांघ कर भाग गये हैं, उसी तरह इसको भी भाग जाने न दूंगा, घूमकर दीवार की तरफ चला गया। उस समय मैंने देखा कि एक चार डंडे की सीढ़ी दीवार के साथ लगी हुई है, जिसके सहारे वे तीनों निकल गये थे। मैंने वह सीढ़ी उठाकर उस गठरी के ऊपर फेंक दी जो उसके हाथ से छूट कर गिर पड़ी थी, क्योंकि मैं उस गठरी की हिफाजत का भी खयाल कर रहा था।
सीढ़ी हटाने के साथ ही दो आदमी उस झाड़ी में से निकले और बड़ी बहादुरी के साथ मेरा मुकाबला किया, और मैं भी जी तोड़कर उनके साथ लड़ने लगा । अन्दाज से मालूम हो गया कि गठरी उठा लेने की तरफ ही उन दोनों का विशेष ध्यान है। आप सुन चुके हैं कि मेरे हाथ में केवल खंजर था, मगर उन दोनों के हाथ में लम्बे-लम्बे लट्ठ थे और मुकाबला करने में भी वे दोनों कमजोर न थे । अतः मुझे अपने बचाव का ज्यादा खयाल था और मैं तब तक लड़ाई खतम करना नहीं चाहता था, जब तक मेरे आदमी न आ जायें, जिन्हें जफील देकर मैंने बुलाया था।
आधी घड़ी से ज्यादा देर तक मेरा उनका मुलाबला होता रहा। उसी समय मुझे रोशनी दिखाई दी और मालूम हुआ कि मेरे आदमी चले आ रहे हैं।उनकी तरफ देखकर मेरा ध्यान कुछ बँटा ही था कि एक आदमी के हाथ का लट्ठ मेरे सिर पर बैठा और मैं चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा।
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जब मेरी आँख खुली, मैंने खुद को अपने आदमियों से घिरा हुआ पाया। मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी। जांच करने पर मालूम हुआ कि मैं आधी घड़ी से ज्यादा देर त बेहोश नहीं रहा । जब मैंने दुश्मन के बारे में दरियाफ्त किया, तो मालूम हुआ कि वे दोनों भी भाग गये, मगर मेरे आदमियों के सबब से उस गठरी को नहीं ले जा सके। मैंने अपनी हिम्मत और ताकत पर खयाल किया तो मालूम हुआ कि मैं इस समय उनका पीछा करने लायक नहीं हूँ। आखिर लाचार हो और पहरे का इन्तजाम करके मैं गठरी लिए हुए अपने कमरे में चला आया, मगर अपने मित्र की तरफ से मेरा दिल बड़ा ही बेचैन रहा और तरह-तरह के शक पैदा होते रहे।
मेरे कमरे में रोशनी बखूबी हो रही थी। दरवाजा बन्द करके मैंने गठरी खोली और उसके अन्दर की चीजों को बड़े गौर से देखने लगा।
गठरी में दो जोड़ तो कपड़े निकले जिन्हें मैं पहचानता न था, मगर वे कपड़े पहने हुए और मैले थे। कागजों का एक मुट्ठा निकला, जिसे देखते ही मैं पहचान गया कि यह रणधीरसिंहजी के खास सन्दूक के कागज हैं। मोम का एक सांचा कई कपड़ों की तह में लपेटा हुआ निकला, जो खास रणधीरसिंहजी की मोहर पर से उठाया गया था। इन चीजों के अतिरिक्त मोतियों की एक माला एक कण्ठा और तीन जड़ाऊ अंगूठियाँ निकलीं। ये चीजें मेरे मित्र दयारामसिंह की थीं। इन सब चीजों को पहने हुए ही आज वे मेरे यहाँ से गायब हुए थे।
इन सब चीजों को देखकर मैं बड़ी देर तक सोच-विचार में पड़ा रहा । उसी समय कमरे का वह दरवाजा खुला, जो जनाने मकान में जाने के लिए था और मेरी स्त्री कमला की माँ आती हुई दिखाई पड़ी। उस समय वह एक बच्चे की माँ हो चुकी थी और अपने बच्चे को भी गोद में लिए हुए थी। इसमें कोई शक नहीं कि मेरी वह स्त्री बुद्धिमान थी और छोटे-मोटे कामों में मैं उसकी राय भी लिया करता था ।
उसकी सूरत देखते ही मैं पहचान गया कि तरद्दुद और घबड़ाहाट ने उसे अपना शिकार बना लिया है अतः मैंने उसे बुलाकर अपने पास बैठाया और सब हाल कह सुनाया साथ ही इसके यह भी कहा कि मैं इसी समय अपने दोस्त का पता लगाने के लिए जाना चाहता हूँ । मगर उसने इस आखिरी बात को कबूल न किया और कहा कि मेरी राय में पहले रणधीरसिंहजी से मिल लेना चाहिए।"
कई बातों को सोचकर मैंने उसकी राय कबूल कर ली और उस गठरी को लेकर रणधीरसिंहजी से मिलने के लिए रवाना हुआ। मुझे इस बात का भी धोखा लगा हुआ था कि रास्ते में कहीं दुश्मनों से मुलाकात न हो जाये, जो जरूर इस गठरी को छीन लेने की धुन में लगे हुए होंगे, इसलिए मैंने अपने दो शागिर्दो को भी साथ में ले लिया ।
रणधीरसिंहजी बेफिक्री और आराम की नींद सो रहे थे जब मैंने पहुँचकर उन्हें उठाया। जागने के साथ ही वे मुझे देखकर चौंके और बोले, "क्यों, क्या मामला है जो इस समय ऐसे ढंग से यहाँ आये हो ? दयाराम कुशल से तो है?"
मेरी सूरत देखते ही उन्होंने दयाराम का कुशल पूछा, इससे मुझे बड़ा ही ताज्जुब हुआ । खैर, मैं उनके पास बैठ गया और जो कुछ मामला हुआ था, साफ-साफ कह सुनाया।
मैं इस किस्से को मुख्तसिर ही में बयान करूँगा। रणधीरसिंहजी इस हाल को सुनकर बहुत ही दुःखी और उदास हुए । बहुत कुछ बातचीत करने के बाद अन्त में बोले,"दयाराम मेरा एक ही वारिस है और तुम्हारा दिली दोस्त है, ऐसी अवस्था में उसके लिए क्या करना चाहिए, सो तुम ही सोच लो ! मैं क्या कहूँ ! मैं तो समझ चुका था कि दुश्मनों की तरफ से अब निश्चिन्त हुआ, मगर नहीं।"
इतना कहकर वे कपड़े से अपना मुंह ढांप कर रोने लगे । मैं उन्हें बहुत-कुछ समझा बुझाकर विदां हुआ और अपने घर चला आया । अपनी स्त्री से मिलकर सब हाल कहने और समझाने-बुझाने के बाद मैं अपने शागिों को साथ लेकर घर से बाहर निकला। बस यहीं से मेरी बदकिस्मती का जमाना शुरू हुआ।
इतना कहकर भूतनाथ अटक गया और सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा।सब कोई बेचैनी के साथ उसकी तरफ देख रहे थे और भूतनाथ की अवस्था से मालूम होता था कि वह इस बात को सोच रहा है कि मैं अपना किस्सा आगे बयान करूं या नहीं। उसी समय दो आदमी और कमरे के अन्दर चले आये और महाराज को सलाम करके खड़े हो गये । इनकी सूरत देखते ही भूतनाथ के चेहरे का रंग उड़ गया और वह डरे हुए ढंग से उन दोनों की तरफ देखने लगा।
दोनों आदमी, जो अभी-अभी कमरे में आये, वे ही थे जिन्होंने भूतनाथ को अपना नाम 'दलीपशाह' बतलाया था। इन्द्रदेव की आज्ञा पाकर वे दोनों भूतनाथ के पास ही बैठ गये।
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प्रेमी पाठक भूले न होंगे कि दो आदमियों ने भूतनाथ से अपना नाम दलीपशाह बतलाया, जिनमें से एक को पहला दलीप और दूसरे को दूसरा दलीप समझना चाहिए।
भूतनाथ तो पहले ही सोच में पड़ गया था कि अपना हाल आगे बयान करे या नहीं, अब दोनों दलीपशाह को देखकर वह और भी घबड़ा गया। ऐयार लोग समझ रहे थे कि अब उसमें बात करने की भी ताकत नहीं रही। उसी समय इन्द्रदेव ने भूतनाथ से कहा, "क्यों भूतनाथ, चुप क्यों हो गये ? कहो हाँ, तब आगे क्या हुआ ?"
इसका जवाब भूतनाथ ने कुछ न दिया और सिर झुकाकर जमीन की तरफ देखने लगा। उस समय पहले दलीपशाह ने हाथ जोड़ कर महाराज की तरफ देखा और कहा,"कृपानाथ, भूतनाथ को अपना हाल बयान करने में बड़ा कष्ट हो रहा है, और वास्तव में बात भी ऐसी ही है। कोई भला आदमी अपनी उन बातों को जिन्हें वह ऐब समझता है,
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प्रेमी पाठक भूले न होंगे कि दो आदमियों ने भूतनाथ से अपना नाम दलीपशाह बतलाया, जिनमें से एक को पहला दलीप और दूसरे को दूसरा दलीप समझना चाहिए।
भूतनाथ तो पहले ही सोच में पड़ गया था कि अपना हाल आगे बयान करे या नहीं, अब दोनों दलीपशाह को देखकर वह और भी घबड़ा गया। ऐयार लोग समझ रहे थे कि अब उसमें बात करने की भी ताकत नहीं रही। उसी समय इन्द्रदेव ने भूतनाथ से कहा, "क्यों भूतनाथ, चुप क्यों हो गये ? कहो हाँ, तब आगे क्या हुआ ?"
इसका जवाब भूतनाथ ने कुछ न दिया और सिर झुकाकर जमीन की तरफ देखने लगा। उस समय पहले दलीपशाह ने हाथ जोड़ कर महाराज की तरफ देखा और कहा,"कृपानाथ, भूतनाथ को अपना हाल बयान करने में बड़ा कष्ट हो रहा है, और वास्तव में बात भी ऐसी ही है। कोई भला आदमी अपनी उन बातों को जिन्हें वह ऐब समझता है, अपनी जबान से अच्छी तरह बयान नहीं कर सकता । अतः यदि आज्ञा हो तो मैं इसका हाल पूरा-पूरा बयान कर जाऊँ, क्योंकि मैं भी भूतनाथ का हाल उतना ही जानता हूँ, जितना स्वयं भूतनाथ । भूतनाथ जहाँ तक बयान कर चुके हैं, उसे मैं बाहर खड़ा-खड़ा सुन भी चुका हूँ। जब मैंने समझा कि अब भूतनाथ से अपना हाल नहीं कहा जाता तब मैं यह अर्ज करने के लिए हाजिर हुआ हूँ। (भूतनाथ की तरफ देखकर) मेरे इस कहने से आप यह न समझिएगा कि मैं आपके साथ दुश्मनी कर रहा हूँ। नही, जो काम आपके सुपुर्द किया गया है, उसे आपके बदले में मैं आसानी के साथ कर देना चाहता हूँ।"
इन दोनों आदमियों (दलीपशाह) को महाराज तथा और सब ने भी ताज्जुब के साथ देखा था, मगर यह समझ कर इन्द्रदेव से किसी ने कुछ भी न पूछा कि जो कुछ है, थोड़ी देर में मालूम हो ही जायेगा, मगर जब दलीपशाह ऊपर लिखी बात बोलकर चुप हो गया, तब महाराज ने भेद-भरी निगाहों से इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कुमार ने झुककर धीरे से कुछ कह दिया, जिसे वीरेन्द्रसिंह तथा तेजसिंह ने भी सुना तथा इनके जरिए से हमारे और साथियों को भी मालूम हो गया कि कुमार ने क्या कहा ।
दलीपशाह की बात सुनकर इन्द्रदेव ने महाराज की तरफ देखा और हाथ जोड़कर कहा, "इन्होंने (दलीपशाह ने) जो कुछ कहा, वास्तव में ठीक है, मेरी समझ में अगर भूतनाथ का किस्सा इन्हीं की जवानी सुन लिया जाये तो कोई हर्ज नहीं है !" इसके जवाब में महाराज ने मंजूरी के लिए सिर हिला दिया।
इन्द्रजीतसिंह–(भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, इसमें तुम्हें किसी तरह का उज्र है ?
भूतनाथ–(महाराज की तरफ देखकर और हाथ जोड़कर) जो महाराज की मर्जी, मुझमें 'नहीं' कहने की सामर्थ्य नहीं है । मुझे क्या खबर थी कि कसूर माफ हो जाने पर भी यह दिन देखना नसीब होगा। यद्यपि यह मैं खूब जानता हूँ कि मेरा भेद अब किसी से छिपा नहीं रहा, परन्तु फिर भी अपनी भूल बार-बार कहने या सुनने से लज्जा बढ़ती ही जाती है कम नहीं होती । खैर कोई चिन्ता नहीं, जैसा होगा वैसा अपने कलेजे को मजबूत करूंगा और दलीपशाह की कही हुई बातें सुनूंगा तथा देलूंगा कि ये महाशय कुछ झूठ का भी प्रयोग करते हैं या नहीं।
दलीपशाह–नहीं-नहीं भूतनाथ, मैं झूठ कदापि न बोलूंगा, इससे तुम बेफिक रहो ! (इन्द्रदेव की तरफ देख के) अच्छा तो अब मैं प्रारम्भ करता हूँ। दलीपशाह ने इस तरह कहना शुरू किया-
"महाराज, इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐयारी के फन में भूतनाथ परले सिरे का उस्ताद और तेज आदमी है । अगर यह ऐयाशी के दरिया में गोते लगाकर अपने को बर्बाद न कर दिए होता तो इसके मुकाबले का ऐयार आज दुनिया में दिखाई न देता। मेरी सूरत देख के ये चौंकते और डरते हैं और इनका डरना वाजिब ही है मगर अब मैं इनके साथ किसी तरह का बुरा बर्ताव नहीं कर सकता, क्योंकि मैं ऐसा करने के लिए दोनों कुमारों से प्रतिज्ञा कर चुका हूँ और इनकी आज्ञा मैं किसी तरह टाल नहीं सकता क्योंकि इन्हीं की बदौलत आज मैं दुनिया की हवा खा रहा हूँ। (भूतनाथ की तरफ देख के) भूतनाथ, मैं वास्तव में दलीपशाह हूँ, उस दिन तुमने मुझे नहीं पहचाना तो इसमें तुम्हारी आँखों का कोई कसूर नहीं है, कैद की सख्तियों के साथ-साथ जमाने की चाल ने मेरी सूरत ही बदल दी है, तुम तो अपने हिसाब से मुझे मार हो चुके थे और तुम्हें मुझसे मिलने की कभी उम्मीद भी न थी मगर सुन लो और देख लो कि ईश्वर की कृपा से मैं अभी तक जीता-जागता तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। यह कुंअर साहब के चरणों का प्रताप है । अगर मैं कैद न हो जाता तो तुमसे बदला लिए बिना कभी न रहता, मगर तुम्हारी किस्मत अच्छी थी जो मैं कैद हो रह गया और छूटा भी तो कुंअर साहब के हाथ से, जो तुम्हारे पक्षपाती हैं । तुम्हें इन्द्रदेव से बुरा न मानना चाहिए और न यह सोचना चाहिए कि तुम्हें दुःख देने के लिए इन्द्रदेव तुम्हारा पुराना पचड़ा खुलवा रहे हैं ! तुम्हारा किस्सा तो सब को मालूम हो चुका है, इस समय ज्यों का त्यों चुपचाप रह जाने पर तुम्हारे चित्त को शान्ति नहीं मिल सकती और तुम हम लोगों की सूरत देख-देखकर दिन-रात तरवुद में पड़े रहोगे अतः तुम्हारे पिछले ऐबों को खोलकर इन्द्रदेव तुम्हारे चित्त को शान्ति दिया चाहते हैं और तुम्हारे दुश्मनों को, जिनके साथ तुम ही ने बुराई की है, तुम्हारा दोस्त बना रहे हैं । ये यह भी चाहते हैं कि तुम्हारे साथ-ही-साथ हम लोगों का भेद भी खुल जाय और तुम जान जाओ कि हम लोगों ने तुम्हारा कसूर माफ कर दिया है क्योंकि अगर ऐसा न होगा तो जरूर तुम हम लोगों को मार डालने की फिक्र में पड़े रहोगे और हम लोग इस धोखे में रह जायेंगे कि हमने इनका कसूर तो माफ ही कर दिया,अब ये हमारे साथ बुराई न करेंगे। (जीतसिंह की तरफ देखकर) अब मैं मतलब की तरफ झुकता हूँ और भूतनाथ का किस्सा बयान करता हूँ।
जिस जमाने का हाल भूतनाथ बयान कर रहा है, अर्थात् जिन दिनों भूतनाथ के मकान से दयाराम गायब हो गए थे उन दिनों यही नागर काशी के बाजार में वेश्या बनकर बैठी हुई अमीरों के लड़कों को चौपट कर रही थी। उसकी बढ़ी-चढ़ी खूबसूरती लोगों के लिए जहर हो रही थी और माल के साथ ही विशेष प्राप्ति के लिए यह लोगों की जान पर भी वार करती थी। यही दशा मनोरमा की भी थी परन्तु उसकी बनिस्बत यह बहुत ज्यादा रुपए वाली होने पर भी नागर की-सी खूबसूरत न थी, हाँ, चालाक जरूर ज्यादा थी। और लोगों की तरह भूतनाथ और दयाराम भी नागर के प्रेमी हो रहे थे। भूतनाथ को अपनी ऐयारी का घमण्ड था और नागर को अपनी चालाकी का। भूतनाथ नागर के दिल पर कब्जा करना चाहता था और नागर इसकी तथा दयाराम की दौलत अपने खजाने में मिलाना चाहती थी।
दयाराम की खोज में घर से शागिर्दो को साथ लिए हुए बाहर निकलते ही भूतनाथ ने काशी का रास्ता लिया और तेजी के साथ सफर तय करता हुआ नागर के मकान पर पहुँचा । नागर ने भूतनाथ की बड़ी खातिरदारी और इज्जत की तथा कुशल-मंगल पूछने के बाद यकायक यहाँ आने का सबब भी पूछा।
भूतनाथ ने अपने आने का ठीक-ठीक सबब तो नहीं बताया, मगर नागर समझ गई कि कुछ दाल में काला जरूर है। इसी तरह भूतनाथ को भी इस बात का शक पैदा हो गया कि दयाराम की चोरी में नागर का कुछ लगाव जरूर है अथवा यह उन आद मियों को जरूर जानती है जिन्होंने दयाराम के साथ ऐसी दुश्मनी की है।
भूतनाथ का शक काशी ही वालों पर था इसलिए काशी ही में अड्डा बनाकर इधर-उधर घूमना और दयाराम का पता लगाना आरम्भ किया। जैसे-जैसे दिन बीतता था, भूतनाथ का शक भी नागर के ऊपर बढ़ता जाता था। सुनते हैं कि उसी जमाने में भूतनाथ ने एक औरत के साथ काशीजी में ही शादी भी कर ली थी जिससे कि नानक पैदा हुआ है क्योंकि इस झमेले में भूतनाथ को बहुत दिनों तक काशी में रहना पड़ा था।
यह सच है कि कम्बख्त रंडियाँ रुपये के सिवा और किसी की नहीं होती। जो दयाराम कि नागर को चाहता, मानता और दिल खोलकर रुपया देता था, नागर उसी के खून की प्यासी हो गई क्योंकि ऐसा करने से उसे विशेष प्राप्ति की आशा थी। भूतनाथ ने यद्यपि अपने दिल का हाल नागर से बयान नहीं किया मगर नागर को विश्वास हो गया कि भूतनाथ को उस पर शक है और यह दयाराम ही की खोज में काशी आया हुआ है, अतः नागर ने अपना उचित प्रबन्ध करके काशी छोड़ दी और गुप्त रीति से जमानिया में जा बसी। भूतनाथ भी मिट्टी सूंघता हुआ उसकी खोज में जमानिया जा पहुँचा और एक भाड़े का मकान लेकर वहाँ रहने लगा।
इस खोज-ढूंढ़ में वर्षों बीत गये, मगर दयाराम का पता न लगा। भूतनाथ ने अपने मित्र इन्द्रदेव से भी मदद मांगी और इन्द्रदेव ने मदद दी भी मगर नतीजा कुछ भी न निकला। इन्द्रदेव ही के कहने से मैं उन दिनों भूतनाथ का मददगार बन गया था ।
इस किस्से के सम्बन्ध में रणधीरसिंह के रिश्तेदारों की तथा जमानिया गयाजी और राजगृह इत्यादि की भी बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं परन्तु मैं भी भूतनाथ का मददगार था, मगर अफसोस, भूतनाथ की किस्मत तो कुछ और ही कराना चाहती थी इसलिए हम लोगों की मेहनत का कोई अच्छा नतीजा न निकला, बल्कि एक दिन जब मिलने के लिए मैं भूतनाथ के डेरे पर गया तो मुलाकात होने के साथ ही भूतनाथ ने आँखें बदलकर मुझसे कहा, "दलीपशाह, मैं तो तुम्हें बहुत अच्छा और नेक समझता था मगर तुम बहुत ही बुरे और दगाबाज निकले । मुझे ठीक-ठीक पता लग चुका है कि दयाराम का भेद तुम्हारे दिल के अन्दर है और तुम हमारे दुश्मनों के मददगार हो और भेदिए हो तथा खूब जानते हो कि इस समय दयाराम कहाँ हैं । तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि सीधी तरह उनका (दयाराम का) पता बता दो, नहीं तो मैं तुम्हारे साथ बुरी तरह पेश आऊँगा और तुम्हारी मिट्टी पलीद करके छोडूंगा।"
महाराज, मैं नहीं कह सकता कि उस समय भूतनाथ की इन बेतुकी बातों को सुनकर मुझे कितना क्रोध चढ़ आया। इसके पास बैठा भी नहीं और न इसकी बात का कुछ जवाब ही दिया,T चुपचाप पिछले पैर लौटा और मकान के बाहर निकल आया। मेरा घोड़ा बाहर खड़ा था, मैं उस पर सवार होकर सीधे इन्द्रदेव की तरफ चला गया।(इन्द्रदेव की तरफ हाथ का इशारा करके) दूसरे दिन इनके पास पहुंचा और जो कुछ बीती थी इनसे कह सुनायी। इन्हें भी भूतनाथ की बातें बहुत बुरी मालूम हुई और एक लम्बी साँस लेकर ये मुझसे बोले, "मैं नहीं जानता कि इन दो-चार दिनों में भूतनाथ को कौन-सी नई बात मालूम हो गई और किस बुनियाद पर उसने तुम्हारे साथ ऐसा सलूक किया। खैर कोई चिन्ता नहीं, भूतनाथ अपनी इस बेवकूफी पर अफसोस करेगा और पछतावेगा, तुम इस बात का खयाल न करो और भूतनाथ से मिलना-जुलना छोड़कर दयाराम की खोज में लगे रहो, तुम्हारा अहसान रणधीरसिंह पर और मेरे ऊपर होगा।
इन्द्रदेव ने बहुत कुछ कह-सुनकर मेरा क्रोध शान्त किया और दो दिन तक मुझे अपने यहाँ मेहमान रक्खा। तीसरे दिन मैं इन्द्रदेव से बिदा होने वाला ही था कि तभी इनके एक शागिर्द ने आकर एक विचित्र खबर सुनाई। उसने कहा कि आज रात को बारह बजे के समय मिर्जापुर के एक जमींदार 'राजसिंह' के यहाँ दयाराम के होने का पता मुझे लगा है । खुद मेरे भाई ने यह खबर दी है। उसने यह भी कहा है कि आज कल नागर भी उन्हीं के यहाँ है।
इन्द्रदेव–(शागिर्द से) वह खुद मेरे पास क्यों नहीं आया ?
शागिर्द–वह आप ही के पास आ रहा था, मुझसे रास्ते में मुलाकात हुई और उसके पूछने पर मैंने कहा कि दयाराम जी का पता लगाने के लिए मैं तैनात किया गया हूँ। उसने जवाब दिया कि अब तुम्हारे जाने की कोई जरूरत न रही, मुझे उनका पता लग गया और यही खुशखबरी सुनाने के लिए मैं सरकार के पास जा रहा था, मगर अब तुम मिल गये हो तो मेरे जाने की कोई जरूरत नहीं। जो कुछ मैं कहता हूँ, तुम जाकर उन्हें सुना दो और मदद लेकर बहुत जल्द मेरे पास आओ। मैं फिर उसी जगह जाता हूँ, कहो ऐसा न हो कि दयाराम जी वहाँ से भी निकालकर किसी दूसरी जगह पहुँचा दिये जायँ और हम लोगों को पता न लगे, मैं जाकर इस बात का ध्यान रखूगा। इसके बाद उसने सब कैफियत बयान की और अपने मिलने का पता बताया।
इन्द्रदेव–ठीक है उसने जो कुछ किया बहुत अच्छा किया, अब उसे मदद पहुंचाने का बन्दोबस्त करना चाहिए।
शागिर्द–यदि आज्ञा हो तो भूतनाथ को भी इस बात की इत्तिला दे दी जाय?
इन्द्रदेव-कोई जरूरत नहीं, अब तुम जाकर कुछ आराम करो, तीन घण्टे बाद फिर तुम्हें सफर करना होगा।
इसके बाद इन्द्रदेव का शागिर्द जब अपने डेरे पर चला गया, तब मुझसे और इन्द्रदेव से बातचीत होने लगी। इन्द्रदेव ने मुझसे मदद माँगी और मुझे मिर्जापुर जाने के लिए कहा, मगर मैंने इनकार किया और कहा कि अब मैं न तो भूतनाथ का मुंह देखूगा और न उसके किसी काम में शरीक होऊँगा। इसके जवाब में इन्द्रदेव ने मुझे पुनःसमझाया और कहा कि यह काम भूतनाथ का नहीं है, मैं कह चुका हूँ कि इसका अहसान मुझ पर और रणधीरसिंह जी पर होगा।
इसी तरह की बहुत-सी बातें हुईं, लाचार मुझे इन्द्रदेव की बात माननी पड़ी और कई घण्टे के बाद इन्द्रदेव के उसी शागिर्द 'शम्भू' को साथ लिए हुए मैं मिर्जापुर की तरफ रवाना हुआ। दूसरे दिन हम लोग मिर्जापुर जा पहुँचे और बताये हुए ठिकाने पर पहुँचकर शम्भू के भाई से मुलाकात की। दरियाफ्त करने पर मालूम हुआ कि दयाराम अभी तक मिर्जापुर की सरहद के बाहर नहीं गये हैं, अतः जो कुछ हम लोगों को करना था, आपस में तय करने के बाद सूरत बदलकर बाहर निकलें। दयाराम को ढूंढ़ निकालने के लिए हमने कैसी-कैसी मेहनत की और हम लोगों को किस-किस तरह की तकलीफें उठानी पड़ीं, इसका बयान करना किस्से को व्यर्थ तूल देना और अपने मुंह मियां मिठू बनना है । महाराज के (आपके) नामी ऐयारों ने जैसे-अनूठे काम किये हैं उनके सामने हमारी ऐयारी कुछ भी नहीं है अतएव केवल इतना ही कहना काफी है कि हम लोगों ने अपनी हिम्मत से बढ़कर काम किया और हद दर्जे की तकलीफ उठाकर दयाराम जी को ढूंढ निकाला। केवल दयाराम को नहीं, बल्कि उनके साथ-ही-साथ 'राजसिंह' को भी गिरफ्तार करके हम लोग अपने ठिकाने पर ले आये, मगर अफसोस ! हम लोगों की सब मेहनत पर भूतनाथ ने पानी ही नहीं फेर दिया, बल्कि जन्म भर के लिए अपने माथे पर कलंक का टीका भी लगाया।
कैद की सख्ती उठाने के कारण दयाराम जी बहुत ही कमजोर और बीमार हो रहे थे, उनमें बात करने की भी ताकत न थी, इसलिए हम लोगों ने उसी समय उन्हें उठाकर इन्द्रदेव के पास ले जाना मुनासिब न समझा और दो-तीन दिन तक आराम देने की नीयत से अपने गुप्त स्थान पर, जहाँ हम लोग टिके हुए थे, ले गये। जहाँ तक हो सका, नरम बिछावन का इन्तजाम करके उस पर उन्हें लिटा दिया और उनके शरीर में ताकत लाने का बन्दोबस्त करने लगे। इस बात का भी निश्चय कर लिया कि जब तक इनकी तबीयत ठीक न हो जायगी, इनसे कैद किये जाने का सबब तक न पूछेगे ।
दयाराम जी के आराम का इन्तजाम करने के बाद हम लोगों ने अपने-अपने हर्के खोलकर उनकी चारपाई के नीचे रख दिए, कपड़े उतारे और बातचीत करने तथा दुश्मनी का सबब जानने के लिए राजसिंह को होश में लाये और उसकी मुश्के खोलकर बातचीत करने लगे क्योंकि उस समय इस बात का डर हम लोगों को कुछ भी न था कि वह हम पर हमला करेगा या हम लोगों का कुछ बिगाड़ सकेगा।
जिस मकान में हम लोग टिके हुए थे वह बहुत ही एकान्त और उजाड़ मुहल्ले में था। रात का समय था और मकान की तीसरी मंजिल पर हम लोग बैठे हुए थे, एक मद्धिम चिराग आले पर जल रहा था । दयाराम जी का पलंग हम लोगों के पीछे की तरफ था और राजसिंह सामने बैठा हुआ ताज्जुब के साथ हम लोगों का मुंह देख रहा था। उसी समय यकायक कई धमाके होने की आवाज आई और उसके कुछ ही देर बाद भूतनाथ तथा उसके दो साथियों को हम लोगों ने अपने सामने खड़ा देखा । सामना होने के साथ ही भूतनाथ ने मुझसे कहा, "क्यों वे शैतान के बच्चे, आखिर मेरी बात ठीक निकली न ! तू ही ने राजसिंह के साथ मेल करके हमारे साथ दुश्मनी पैदा की ! खैर, ले अपने किए का फल चख !"
इतना कहकर भूतनाथ ने मेरे ऊपर खंजर का वार किया जिसे बड़ी खूबी के साथ मेरे साथी ने रोका । मैं भी उठकर खड़ा हो गया और भूतनाथ के साथ लड़ाई होने लगी। भूतनाथ ने एक ही हाथ में राजसिंह का काम तमाम कर दिया और थोड़ी ही देर में मुझे भी खूब जख्मी किया यहाँ तक कि मैं जमीन पर गिर पड़ा और मेरे दोनों साथी भी बेकार हो गये। उस समय दयारामजी को, जो पड़े-पड़े सब तमाशा देख रहे थे जोश चढ़ आया और चारपाई पर से उठकर खाली हाथ भूतनाथ के सामने आ खड़े हुए, कुछ बोला ही चाहते थे कि भूतनाथ के हाथ का खंजर उनके कलेजे के पार हो गया और वे बेदम होकर जमीन पर गिर पड़े।
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मैं नहीं कह सकता कि भूतनाथ ने ऐसा क्यों किया। भूतनाथ का कौल तो यही है कि मैंने उनको पहचाना नहीं, और धोखा हुआ। खैर जो हो, दयाराम के गिरते ही मेरे मुंह से 'हाय' की आवाज निकली और मैंने भूतनाथ से कहा, "ऐ कम्बख्त ! तूने बेचारे दयाराम को क्यों मार डाला जिन्हें बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने खोज निकाला था!".
मेरी बात सुनते ही भूतनाथ सन्नाटे में आ गया। इसके बाद उसके दोनों साथी तो न मालूम क्या सोचकर एकदम भाग खड़े हुए, मगर भूतनाथ बड़ी बेचैनी से दयाराम के पास बैठकर उनका मुंह देखने लगा। उस समय भूतनाथ के देखते ही देखते उन्होंने आखिरी हिचकी ली और दम तोड़ दिया । भूतनाथ उनकी लाश के साथ चिपटकर रोने लगा और बड़ी देर तक रोता रहा। तब तक हम तीनों आदमी पुनः मुकाबला करने लायक हो गये और इस बात से हम लोगों का साहस और भी बढ़ गया कि भूतनाथ के दोनों साथी उसे अकेला छोड़कर भाग गये थे। मैंने मुश्किल से भूतनाथ को अलग किया और कहा, "अब रोने और नखरा करने से फायदा ही क्या होगा, उसके साथ ऐसी ही मुहब्बत थी तो उन पर वार न करना था, अब उन्हें मारकर औरतों की तरह नखरा करने बैठे हो !"
इतना सुनकर भूतनाथ ने अपनी आँखें पोंछी और मेरी तरफ देख के कहा, "क्या मैंने जानबूझकर इन्हें मार डाला है ?"
मैं-—बेशक ! क्या यहाँ आने के साथ ही तुमने उन्हें चारपाई पर पड़े नहीं देखा था?
भूतनाथ-–देखा था, मगर मैं नहीं जानता था कि ये दयाराम हैं। इतने मोटे-ताजे आदमी को यकायक ऐसा दुबला-पतला देखकर मैं कैसे पहचान सकता था?
मैं–क्या खूब, ऐसे ही तो तुम अन्धे थे ? खैर, इसका इन्साफ तो रणधीरसिंह के सामने ही होगा, इस समय तुम हमसे फैसला कर लो, क्योंकि अभी तक तुम्हारे दिल में लड़ाई का हौसला जरूर बना होगा।
भूतनाथ — (अपने को संभालकर और मुंह पोंछकर) नहीं-नहीं, मुझं अब लड़ने का हौसला नहीं है, जिसके वास्ते मैं लड़ता था जब वही नहीं रहा तो अब क्या ? मुझे ठीक पता लग चुका था कि दयाराम तुम्हारे फेर में पड़े हुए हैं, और अपनी आँखों से देख भी लिया, मगर अफसोस है कि मैंने पहचाना नहीं और ये इस तरह धोखे में मारे गये । लेकिन इसका कसुर भी तुम्हारे ही सिर लग सकता है। मैं-खैर, अगर तुम्हारे किए हो सके तो तुम बिल्कुल कसूर मेरे ही सिर थोप देना, मैं अपनी सफाई आप कर लंगा, मगर इतना समझ रखो कि लाख कोशिश करने पर भी तुम अपने को बचा नहीं सकते, क्योंकि मैंने इन्हें खोज निकालने में जो कुछ मेहनत की थी, वह इन्द्रदेवजी के कहने से की थी, न तो मैं अपनी प्रशंसा कराना चाहता था और न इनाम ही लेना चाहता था, बल्कि जरूरत पड़ने पर मैं इन्द्रदेव की गवाही दिला सकता हूँ और तुम भी अपने को बेकसूर साबित करने के लिए नागर को पेश कर देना, जिसके कहने और सिखाने में आकर तुमने मेरे साथ दुश्मनी पैदा कर ली।
इतना सुनकर भूतनाथ सन्नाटे में आ गया । सिर झुकाकर देर तक सोचता रहा और इसके बाद लम्बी सांस लेकर उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "बेशक मुझे नागर कम्बख्त ने धोखा दिया ! अब मुझे भी इन्हीं के साथ मर-मिटना चाहिए।" इतना कह-कर भूतनाथ ने खंजर हाथ में ले लिया, मगर कुछ न कर सका, अर्थात् अपनी जान न दे सका।
महाराज, जवामर्दो का कहना बहुत ठीक है कि बहादुरों को अपनी जान प्यारी नहीं होती । वास्तव में जिसे अपनी जान प्यारी होती है, वह कोई हौसले का काम नहीं कर सकता और जो अपनी जान हथेली पर लिए रहता है और समझता है कि दुनिया में मरना एक बार ही है, कोई बार-बार नहीं मरता, वही सब कुछ कर सकता है । भूत-वहादुर होने में सन्देह नहीं, परन्तु इसे अपनी जान प्यारी जरूर थी और इस उल्टी बात का सबब यही था कि वह ऐयाशी के नशे में चूर था। जो आदमी ऐयाश होता है, उसमें ऐयाशी के सबब कई तरह की बुराइयाँ आ जाती हैं और बुराइयों की बुनियाद जम जाने के कारण ही उसे अपनी जान प्यारी हो जाती है, तथा वह कोई भी काम नहीं कर सकता। यही सबब था कि उस समय भूतनाथ जान न दे सका, बल्कि उसकी हिफाजत करने का ढंग जमाने लगा, नहीं तो उस समय मौका ऐसा ही था, इससे जैसी भूल हो गई थी, उसका बदला तभी पूरा होता जब यह भी उसी जगह अपनी जान दे देता और उस मकान से तीनों लाशें एक साथ ही निकाली जाती।
भूतनाथ ने कुछ देर तक सोचने के बाद मुझसे कहा-“मुझे इस समय अपनी जान भारी हो रही है है और मैं मर जाने के लिए तैयार हूँ, मगर मैं देखता हूँ कि ऐसा करने से भी किसी को फायदा नहीं पहुँचेगा। मैं जिसका नमक खा चुका हूँ और खाता हूँ, उसका और भी नुकसान होगा क्योंकि इस समय वह दुश्मनों से घिरा हुआ है । अगर मैं जीता रहूँगा तो उनके दुश्मनों का नामोनिशान मिटाकर उन्हें बेफिक्र कर सकूँगा, अतएव मैं माफी माँगता हूं कि तुम मेहरबानी कर मुझे सिर्फ दो साल के लिए जीता छोड़ दो।"
मै–दो वर्ष के लिए क्या, जिन्दगी-भर के लिए मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ। जब तुम मुझसे लड़ना नहीं चाहते तो मैं क्यों तुम्हें मारने लगा ? बाकी।खामखाह मुझसे दुश्मनी पैदा कर ली है, सो उसका नतीजा तुम्हें आप से आप मिल जायगा जब लोगों को यह मालूम होगा कि भूतनाथ के हाथ से बेचारा दयाराम मारा यह बात कि तुमने गया। भूतनाथ–नहीं-नहीं, मेरा मतलब तुम्हारी पहली बात से नहीं है, बल्कि दूसरी बात से है, अर्थात् अगर तुम चाहोगे तो लोगों को इस बात का पता ही नहीं लगेगा कि दयाराम भूतनाथ के हाथ से मारा गया।
मैं–यह क्योंकर छिप सकता है ?
भूतनाथ–अगर तुम छिपाओ तो सब छिप जायगा।
मुख्तसिर यह कि धीरे-धीरे बातों को बढ़ाता हुआ भूतनाथ मेरे पैरों पर गिर पड़ा और बड़ी खुशामद के साथ कहने लगा कि तुम इस मामले को छिपाकर मेरी जान बचा लो । केवल इतना ही नहीं, इसने मुझे हर तरह के सब्जबाग दिखाए और कसमें दे-देकर मेरी नाक में दम कर दिया। लालच में तो मैं नहीं पड़ा, मगर पिछली मुरौवत के फेर में जरूर पड़ गया और भेद को छिपाये रखने की कसम खाकर अपने साथियों को साथ लिए हुए मैं उस घर के बाहर निकल गया। भूतनाथ तथा दोनों लाशों को उसी तरह छोड़ दिया, फिर मुझे मालूम नहीं कि भूतनाथ ने उन लाशों के साथ क्या बर्ताव किया।"
यहाँ तक भूतनाथ का हाल कहकर कुछ देर के लिए दलीपशाह चुप हो गया और उसने इस नीयत से भूतनाथ की तरफ देखा कि देखें यह कुछ बोलता है या नहीं। इस समय भूतनाथ की आँखों से आँसू की नदी बह रही थी और वह हिचकियाँ ले-लेकर रो रहा था । बड़ी मुश्किल से भूतनाथ ने अपने दिल को सम्हाला और दुपट्टे से मुह पोंछ कर कहा, "ठीक है, ठीक है, जो कुछ दलीपशाह ने कहा, सब सच है । मगर यह बात मैं कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैंने जानबूझकर दयाराम को नहीं मारा । वहाँ राजसिंह को खुले हुए देखकर मेरा शक यकीन के साथ बदल गया और चारपाई पर पड़े हुए देखकर भी मैंने दयाराम को नहीं पहचाना । मैंने समझा कि यह भी कोई दलीपशाह का साथी होगा। बेशक दलीपशाह पर मेरा शक मजबूत हो गया था और मैं समझ बैठा था कि जिन लोगों ने दयाराम के साथ दुश्मनी की है दलीपशाह जरूर उनका साथी है। यह शक यहाँ तक मजबूत हो गया था कि दयाराम के मारे जाने पर भी दलीपशाह की तरफ से मेरा दिल साफ न हुआ। बल्कि मैंने समझा कि इसी (दलीपशाह) ने दयाराम को वहाँ लाकर कैद किया था। जिस नागर पर मुझे शक हुआ था, उसी कम्बख्त की जादू-भरी बातों में मैं फंस गया और उसी ने मुझे विश्वास दिला दिया कि इसका कर्ता-धर्ता दलीप शाह है । यही सबब है कि इतना हो जाने पर भी मैं दलीपशाह का दुश्मन बना ही रहा। हाँ, दलीपशाह ने एक बात नहीं कही, वह यह है कि इस भेद को छिपाये रखने की कसम खाकर भी दलीपशाह ने मुझे सूखा नहीं छोड़ा। इन्होंने कहा कि तुम कागज पर लिखकर माफी मांगो तब मैं तुम्हें माफ करके यह भेद छिपाये रखने की कसम खा सकता हूँ । लाचार होकर मुझे ऐसा करना पड़ा और मैं माफी के लिए चिट्ठी लिख हमेशा के लिए इनके हाथ में फंस गया।
दलीपशाह–बेशक यही बात है, और मै अगर ऐसा न करता तो थोड़े ही दिन बाद भूतनाथ मुझे दोपी ठहरा कर आप सच्चा बन जाता। खैर, अब मैं इसके आगे का हाल बयान करता हूँ जिसमें थोड़ा-मा हाल तो ऐसा ही होगा जो मुझे खास भूतनाथ से मालूम हुआ था।
इतना कहकर दलीपशाह ने फिर अपना बयान शुरू किया-
दलीपशाह–जैसाकि भूतनाथ भी कह चुका है, बहुत मिन्नत और खुशामद से लाचार होकर मैंने कसूरवार होने और माफी मांगने की चिट्ठी लिखाकर इसे छोड़ दिया और इसका ऐब छिपा रखने का वादा करके अपने साथियों को साथ लिए उस घर से बाहर निकल गया और भूतनाथ की इच्छानुसार दयाराम की लाश को और भूतनाथ को उसी मकान में छोड़ दिया। फिर मुझे नहीं मालूम कि क्या हुआ और इसने दयाराम की लाश के साथ कैसा बर्ताव किया।
वहाँ से बाहर होकर मैं इन्द्रदेव की तरफ रवाना हुआ, मगर रास्ते भर सोचता जाता था कि अब मुझे क्या करना चाहिए, दयाराम का सच्चा-सच्चा हाल इन्द्रदेव से बयान करना चाहिए या नहीं । आखिर हम लोगों ने निश्चय कर लिया कि जब भूतनाथ से वादा कर चुके हैं तो इस भेद को इन्द्रदेव से भी छिपा ही रखना चाहिए।
जब हम लोग इन्द्रदेव के मकान में पहुंचे तो उन्होंने कुशल-मंगल पूछने के बाद दयाराम का हाल दरियाफ्त किया जिसके जवाब में मैंने असल मामले को तो छिपा रखा और बात बनाकर यों कह दिया कि कुछ मैंने या आपने सुना था, वह ठीक ही निकला अर्थात् राजसिंह ही ने दयाराम के साथ वह सलूक किया और दयाराम राजसिंह के घर में मौजूद भी थे, मगर अफसोस, बेचारे दयाराम को हम लोग छुड़ा न सके और वे जान से मारे गये !
इन्द्रदेव–(चौंककर) हैं ! जान से मारे गये !
मैं जी हां, और इस बात की खबर भूतनाथ को भी लग चुकी थी। मेरे पहले ही भूतनाथ, राजसिंह के उस मकान में जिसमें दयाराम को कैद कर रखा था, पहुँच गया और उसने अपने सामने दयाराम की लाश देखी जिसे कुछ ही देर पहले राज सह ने मार डाला था, तब भूतनाथ ने उसी समय राजसिंह का सिर काट डाला। सिवाय इसके वह और कर ही क्या सकता था!इसके थोड़ी देर बाद हम लोग भी उस घर जा पहुंचे और दयाराम तथा राजसिंह की लाश और भूतनाथ को वहां मौजूद पाया, दरियाफ्त करने पर भूतनाथ ने सब हाल बयान किया और अफसोस करते हुए हम लोग वहाँ से रवाना हुए।
इन्द्रदेव–अफसोस ! बहुत बुरा हुआ ! खैर, ईश्वर की मर्जी !
मैंने भूतनाथ के ऐब को छिपाकर जो कुछ इन्द्रदेव से कहा, भूतनाथ की इच्छानुसार ही कहा था। भूतनाथ ने भी यही बात मशहूर की और इस तरह अपने ऐब को छिपा रखा।
यहां तक भूतनाथ का किस्सा कहकर जब दलीपशाह कुछ देर के लिए चुप हो गया तब तेजसिंह ने उससे पूछा, "तुमने तो भला भूतनाथ की बात मानकर उस मामले को छिपा रखा, मगर शम्भू वगैरह इन्द्रदेव के शागिर्दो ने अपने मालिक से उस भेद को क्यों छिपाया?"
दलीपशाह–(एक लम्बी साँस लेकर) खुशामद और रुपया बड़ी चीज है । बस, इसी से समझ जाइये और मैं क्या कहूँ !
तेजसिंह-ठीक है, अच्छा तब क्या हुआ? भूतनाथ की कथा इतनी ही है, या और भी कुछ ?
दलीपशाह-जी अभी भूतनाथ की कथा समाप्त नहीं हुई, अभी मुझे बहुत-कुछ कहना बाकी है। और बातों के सिवाय भूतनाथ से एक कसूर ऐसा हुआ है जिसका रंज भूतनाथ को इससे भी ज्यादा होगा।
तेजसिंह–सो क्या?
दलीपशाह–सो भी मैं अर्ज करता हूँ।
इतना कहकर दलीपशाह ने फिर कहना शुरू किया-
इस मामले को वर्षों बीत गये । मैं भूतनाथ की तरफ से कुछ दिनों तक बेफिक रहा, मगर जब यह मालूम हुआ कि भूतनाथ मेरी तरफ से निश्चिन्त नहीं है बल्कि मुझे इस दुनिया से उठा, बेफिक्र हुआ चाहता है तो मैं भी होशियार हो गया और दिन-रात अपने बचाव की फिक्र में डूबा रहने लगा। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, अब मैं वह हाल बयान करूँगा जिसकी तरफ उस दिन मैंने इशारा किया था, जब तुम हमें गिरफ्तार करके एक विचित्र पहाड़ी स्थान में ले गये थे और जिसके विषय में तुमने कहा था कि-"यद्यपि मैंने दलीपशाह की सूरत नहीं देखी है" इत्यादि । मगर क्या तुम इस समय भी…
भूतनाथ–(बात काटकर) भला मैं कैसे कह सकता हूँ कि मैंने दलीपशाह की सुरत नहीं देखी है जिसके साथ ऐसे-ऐसे मामले हो चुके हैं, मगर उस दिन मैंने तुम्हें भी धोखा देने के लिए वे शब्द कहे थे, क्योंकि मैंने तुम्हें पहचाना नहीं था। इस कहने से मेरा मतलब था कि अगर तुम दलीपशाह न होगे तो कुछ न कुछ जरूर बात बनाओगे। खैर, जो कुछ हुआ सो हुआ। मगर तुम वास्तव में अब उस किस्से को बयान करने वाले हो?
दलीपशाह–हां, मैं उसे जरूर बयान करूँगा।
भूतनाथ–मगर उसके सुनने से किसी को कुछ फायदा नहीं पहुंच सकता और न किसी तरह की नसीहत ही हो सकती है। वह तो महज मेरी नादानी और पागलपने की बात थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, उसे छोड़ देने से कोई हर्ज नहीं होगा।
दलीपशाह–नहीं, उसका बयान जरूरी जान पड़ता है। क्या तुम नहीं जानते या भूल गये कि उसी किस्से को सुनने के लिए कमला की भां, अर्थात् तुम्हारी स्त्री यहाँ आई हुई है?
भूतनाथ-ठीक है, मगर हाय ! मैं सच्चा बदनसीब हूँ जो इतना होने पर भी उन्हीं बातों को
इन्द्रदेव–अच्छा-अच्छा, जाने दो भूतनाथ ! अगर तुम्हें इस बात का शक है कि दलीपशाह बातें बनाकर कहेगा या उसके कहने का ढंग लोगों पर बुरा असर डालेगा तो
1. देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति बीसवां भाग, बारहवां बयान । मैं दलीपशाह को वह हाल कहने से भी रोक दूंगा और तुम्हारे ही हाथ की लिखी हुई तुम्हारी अपनी जीवनी पढ़ने के लिए किसी को दूंगा जो इस सन्दूकड़ी में बन्द है ।
इतना कहकर इन्द्रदेव ने वही सन्दूकड़ी निकाली जिसकी सूरत देखने ही से भूत- नाथ का कलेजा काँपता था ।
उस सन्दूकड़ी को देखते ही एक दफे तो भूतनाथ घबराया-सा होकर काँपा, मगर तुरन्त ही उसने अपने को सँभाल लिया और इन्द्रदेव की तरफ देख के बोला, "हाँ हाँ आप कृपा कर इस सन्दूकड़ी को मेरी तरफ बढ़ाइये, क्योंकि यह मेरी चीज है और मैं इसे लेने का हक रखता हूँ । यद्यपि कई ऐसे कारण हो गये हैं जिनसे आप कहेंगे कि यह सन्दूकड़ी तुम्हें नहीं दी जायगी, मगर फिर भी मैं इसी समय इस पर अपना कब्जा कर सकता हूँ, क्योंकि देवीसिंहजी मुझसे प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि सन्दूकड़ी बन्द की बन्द तुम्हें दिला दूंगा, अब देवीसिंहजी की प्रतिज्ञा झूठी नहीं हो सकती !" इतना कहकर भूत- नाथ ने देवीसिंह की तरफ देखा।
देवीसिंह–(महाराज से) निःसन्देह मैं ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।
महाराज–अगर ऐसा है तो तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी नहीं हो सकती। मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।
इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए, उन्होंने इन्द्रदेव के सामने से वह सन्दूकड़ी उठा ली और यह कहते हुए भूतनाथ के हाथ में दे दी, "लो मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता हूँ, तुम महाराज को सलाम करो जिन्होंने मेरी और तुम्हारी इज्जत रख ली।"
भूतनाथ–-(महाराज को सलाम करके) महाराज की कृपा से अब मैं जी उठा।
तेजसिंह–भूतनाथ, तुम यह निश्चय जानो कि यह सन्दूकड़ी अभी तक खोली नहीं गयी है, अगर सहज में खुलने लायक होती तो शायद खुल गयी होती।
भूतनाथ–(सन्दूकड़ी अच्छी तरह देख-भाल कर) बेशक यह अभी तक खुली नहीं है ! मेरे सिवाय कोई दूसरा आदमी इसे बिना तोड़े खोल भी नहीं सकता। यह सन्दूकड़ी मेरी बुराइयों से भरी हुई है, या यों कहिये कि यह मेरे भेदों का खजाना है, यद्यपि इसमें के कई भेद खुल चुके हैं, खुल रहे हैं और खुलते जायेंगे, तथापि इस समय इसे ज्यों का त्यों बन्द पाकर मैं बराबर महाराज को दुआ देता हुआ यही कहूँगा कि मैं जी उठा, जी उठा, जी उठा ! अब मैं खुशी से अपनी जीवनी कहने और सुनने के लिए तैयार हूँ और साथ ही इसके यह भी कह देता हूँ कि अपनी जीवनी के सम्बन्ध में जो कुछ कहूँगा, सच कहूंगा !
इतना कहकर भूतनाथ ने वह सन्दूकड़ी अपने बटुए में रख ली और पुनः हाथ जोड़कर महाराज से बोला, महाराज, मैं वादा कर चुका हूँ कि अपना हाल सच-सच
वयान करूँगा, परन्तु मेरा हाल बहुत बड़ा और शोक, दुःख तथा भयंकर घटनाओं से भरा हुआ है। मेरे प्यारे मित्र इन्द्रदेवजी, जिन्होंने मेरे अपराधों को क्षमा कर दिया है, कहते हैं कि तेरी जीवनी से लोगों का उपकार होगा और वास्तव में बात भी ठीक ही है अतएव कई कठिनाइयों पर ध्यान देकर मैं नियमपूर्वक महाराज से एक महीने की मौह- लत मांगता हूँ। इस बीच मैं अपना पूरा-पूरा हाल लिखकर पुस्तक के रूप में महाराज के सामने पेश करूंगा और सम्भव है कि महाराज उसे सुन-सुनाकर यादगार के तौर पर अपने खजाने में रखने की आज्ञा देंगे । इस एक महीने के बीच में मुझे भी सब बातें याद करके लिख लेने का मौका मिलेगा और मैं अपनी निर्दोष स्त्री तथा उन लोगों से जिन्हें देखने की भी आशा नहीं थी, परन्तु जो बहुत-कुछ दुःख भोगकर भी दोनों कुमारों की बदौलत इस समय यहाँ आ गये हैं और जिन्हें मैं अपना दुश्मन समझता था, मगर अब महाराज की कृपा से जिन्होंने मेरे कसूरों को माफ कर दिया है, मिल-जुलकर कई बातों का पता भी लगा लूंगा, जिससे मेरा किस्सा सिलसिलेवार और कायदे से हो जायगा।"
इतना कहकर भूतनाथ ने इन्द्रदेव, राजा गोपालसिंह, दोनों कुमारों और दलीप- शाह वगैरह की तरफ देखा और तुरन्त ही मालूम कर लिया कि उसकी अर्जी कबूल कर ली जायगी।
महाराज ने कहा, "कोई चिन्ता नहीं, तब तक हम लोग कई जरूरी कामों से छुट्टी पा लेंगे।" राजा गोपालसिंह और इन्द्रदेव ने भी इस बात को पसन्द किया और इसके बाद इन्द्रदेव ने दलीपशाह की तरफ देखकर पूछा, "क्यों दलीपशाह, इसमें तुम लोगों को कोई उज्र तो नहीं है ?"
दलीपशाह–(हाथ जोड़कर) कुछ भी नहीं, क्योंकि अब महाराज की आज्ञा- नुसार हम लोगों को भूतनाथ से किसी तरह की दुश्मनी भी नहीं रही और न यही उम्मीद है कि भूतनाथ हमारे साथ किसी तरह की खुटाई करेगा, परन्तु मैं इतना जरूर कहूँगा कि हम लोगों का किस्सा भी महाराज के सुनने लायक है और हम लोग भूतनाथ बाद अपना किस्सा भी सुनाना चाहते हैं।
महाराज–निःसन्देह तुम लोगों का किस्सा भी सुनने योग्य होगा और हम लोग उसके सुनने की अभिलाषा रखते हैं । यदि सम्भव हुआ तो पहले तुम्हीं लोगों का किस्सा सुनने में आवेगा । मगर सुनो दलीपशाह, यद्यपि भूतनाथ से बड़ी-बड़ी बुराइयाँ हो चुकी हैं और भूतनाथ तुम लोगों का भी कसूरवार है, परन्तु इधर हम लोगों के साथ भूतनाथ ने जो कुछ किया है, उसके लिए हम लोग इसके अहसानमन्द हैं और इसे अपना हितू समझते हैं।
इन्द्रदेव–बेशक-बेशक !
गोपाल सिंह-जरूर हम लोग इसके अहसान के बोझ से दबे हुए हैं।
दलीपशाह–मैं भी ऐसा ही समझता हूँ । भूतनाथ ने इधर जो-जो अनूठे काम किए हैं, उनका हाल कुँअर साहब की जुबानी हम लोग सुन चुके हैं। इसी खयाल से तथा कुंअर साहब की आज्ञा से हम लोगों ने सच्चे दिल से भूतनाथ का अपराध क्षमा ही नहीं कर दिया बल्कि कुअर साहब के सामने इस बात की प्रतिज्ञा भी कर चुके हैं कि भूतनाथ को दुश्मनी की निगाह से कभी न देखेंगे ।
महाराज–बेशक, ऐसा ही होना चाहिए, अतः बहुत-सी बातों को सोचकर और इसकी कार गुजारी पर ध्यान देकर हमने इसके सब कसूर माफ करके इसे अपना ऐयार बना लिया है, आशा है कि तुम लोग भी इसे अपनायत की निगाह से देखोगे और पिछली बातों को बिल्कुल भूल जाओगे । दलीपशाह-महाराज अपनी आज्ञा के विरुद्ध चलते हुए हम लोगों को कदापि न देखेंगे, यह हमारी प्रतिज्ञा है।
महाराज-(अर्जुनसिंह तथा दलीपशाह के दूसरे साथी की तरफ देख कर) तुम गों की जुबान से भी हम ऐसा ही सुनना चाहते हैं ।
दलीपशाह का साथी—मेरी भी यही प्रतिज्ञा है और ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे दिल में दुश्मनी के बदले दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करने वाली भूतनाथ की मुहब्बत पैदा करें।
महाराज-शाबाश ! शाबाश!
अर्जुनसिंह-कुंअरसाहब के सामने मैं जो कुछ प्रतिज्ञा कर चुका हूँ उसे महाराज सुन चुके होंगे। इस समय महाराज के सामने भी शपथ खाकर कहता हूँ कि स्वप्न में भी भूतनाथ के साथ दुश्मनी का ध्यान आने पर मैं अपने को दोषी समझूगा।
इतना कहकर अर्जुनसिंह ने वह तस्वीर जो उसके हाथ में थी, फाड़ डाली और टुकड़े-टुकड़े करके भूतनाथ के आगे फेंक दी और पुनः महाराज की तरफ देखकर कहा, "यदि आज्ञा हो और बेअदबी न समझी जाय तो हम लोग इसी समय भूतनाथ से गले मिलकर अपने उदास दिल को प्रसन्न कर लें।"
महाराज-यह तो हम स्वयं कहने वाले थे।
इतना सुनते ही दोनों दलीपशाह, अर्जुनसिंह और भूतनाथ आपस में गले मिले और इसके बाद महाराज का इशारा पाकर एक साथ बैठ गये ।
भूतनाथ-(दूसरे दलीपशाह और अर्जुनसिंह की तरफ देखकर) अब कृपा करके मेरे दिल का खटका मिटाओ और साफ-साफ बता दो कि तुम दोनों में से असल में अर्जुन- सिंह कौन हैं ? जब मैं दलीपशाह को बेहोश करके उस घाटी में ले गया था, तब तुम दोनों में से कौन महाशय वहाँ पहुँचकर दूसरे दलीपशाह बनने को तैयार हुए थे ?
दूसरा दलीपशाह—(हंसकर) उस दिन मैं ही तुम्हारे पास पहुंचा था। इत्ति- फाक से उस दिन मैं अर्जुनसिंह की सूरत बनकर बाहर घूम रहा था और जब तुम दलीपशाह को धोखा देकर ले चले तब मैंने छिपकर पीछा किया था। आज केवल धोखा देने को ही अर्जुनसिंह के रहते मैं अर्जुनसिंह बन कर दलीपशाह के साथ यहाँ आया हूँ।
इतना कहकर दूसरे दलीपशाह ने पास से गीला गमछा उठाया और अपने चेहरे का रंग पोंछ डाला जो उसने थोड़ी देर के लिए बनाया या लगाया था ।
चेहरा साफ होते ही उसकी सूरत ने राजा गोपालसिंह को चौंका दिया और वह यह कहते हुए उसके पास चले गये कि "क्या आप भरतसिंहजी हैं, जिनके विषय में इन्द्रजीतसिंह ने हमें नकाबपोश बनकर इतिला दी थी ?"2 और इसके जवाब में "जी हाँ" सुनकर वे भरतसिंह के गले से चिपट गये । इसके बाद उनका हाथ थामे हुए गोपाल- सिंह अपनी जगह पर चले आये और भरतसिंह को अपने पास बैठा कर महारज से
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, बीसवाँ भाग, तेरहवां बयान ।
2. देखिए बीसवें भाग के आठवें बयान में कुमार की चिट्ठी । बोले, "इनके मिलने की मुझे हद से ज्यादा खुशी हुई, बहुत देर से मैं चाहता था । इनके विषय में कुछ पूर्वी !"
महाराज–मालूम होता है इन्हें भी दारोगा ही ने अपना शिकार बनाया था?
भरतसिंह–जी हां, आज्ञा होने पर मैं अपना हाल बयान करूंगा।
इन्द्रजीतसिंह–(महाराज से) तिलिस्म के अन्दर मुझे पांच कैदी मिले थे जिनमें से तीन तो यही अर्जुनसिंह, भरतसिंह और दलीपशाह हैं। इसके अतिरिक्त दे और हैं जो यहां बुलाये नही गये।दारोगा, मायारानी तथा उसके पक्ष वालों के सम्बन्ध में इन पांचों ही का किस्सा सुनने योग्य है। जब कैदियों का मुकदमा होगा, तब आप देखियेगा कि इन लोगों की सूरत देखकर कैदियों की क्या हालत होती है ।
महाराज–वे दोनों कहां हैं ?
इन्द्रजीतसिंह–इस समय यहां मौजूद नहीं हैं, छुट्टी लेकर अपने घर की अवस्था देखने गये हैं, दो-चार दिन में आ जायेंगे । भूतनाथ—-(इन्द्रदेव से) यदि आज्ञा हो तो मैं भी कुछ पूछू ?
इन्द्रदेव–आप जो कुछ पूछेगे उसे मैं खूब जानता हूँ । मगर खैर, पूछिये ।
भूतनाथ–कमला की मां आप लोगों को कहाँ से और क्योंकर मिली?
इन्द्रदेव–यह तो उसी की जुबानी सुनने में ठीक होगा । जब वह अपना किस्सा बयान करेगी, कोई बात छिपी न रह जायगी ।
भूतनाथ–और नानक की मां तथा देवीसिंहजी की स्त्री के विषय में कब मालूम होगा?
इन्द्रदेव–वह भी उसी समय मालूम हो जायगा । मगर भूतनाथ, (मुस्कराकर)तुमने और देवीसिंह ने नकाबपोशों का पीछा करके व्यर्थ खटका और तरवुद खरीद लिया। यदि उनका पीछा न करते और पीछे से तुम दोनों को मालूम होता कि तुम्हारी स्त्रियाँ भी इस काम में शरीक हुई थीं, तो तुम दोनों को एक प्रकार की प्रसन्नता होती।प्रसन्नता तो अब भी होगी, मगर खटके और तरदुद से कुछ खून सुखा लेने के बाद !
इतना कहकर इन्द्रदेव हंस पड़े और इसके बाद सभी के चेहरों पर मुस्कराहट दिखाई देने लगी।
तेजसिंह–(मुस्कराते हुए देवीसिंह से) अब तो आपको भी मालूम हो ही गया होगा कि आपका लड़का तारासिंह कई विचित्र भेदों को आपसे क्यों छिपाता था ?
देवीसिंह–जी हाँ, सब कुछ मालूम हो गया। जब अपने को प्रकट करने के पहले ही दोनों कुमारों ने भैरोंसिंह और तारासिंह को अपना साथी बना लिया, तो हम लोग जहां तक आश्चर्य में डाले जाते, थोड़ा था ! देवीसिंह की बात सुनकर पुनः सभी ने मुस्करा दिया और अब दरबार का रंग-ढंग ही कुछ दूसरा हो गया अर्थात् तरदुद के बदले सभी के चेहरे पर हंसी और मुस्कराहट दिखाई देने लगी।
तेजसिंह–(भूतनाथ से) भूतनाथ, आज तुम्हारे लिए बड़ी खुशी का दिन है, क्योंकि और बातों के अतिरिक्त तुम्हारी नेक और सती स्त्री भी तुम्हें मिल गई।जिसे तुम मरी समझते थे और हरनामसिंह तुम्हारा लड़का भी तुम्हारे पास बैठा हुआ दिखाई देता है। जो बहुत दिनों से गायब था और जिसके लिए बेचारी कमला बहुत परेशान थी, जब वह हरनामसिंह का हाल सुनेगी, तो बहुत ही प्रसन्न होगी।
JIM – Assistente
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