चन्द्रकान्ता सन्तति 6
हम ऊपर किसी बयान में लिख आये हैं कि यहाँ तीनों तरफ की दीवारों में कई आलमारियाँ भी थीं, अतः इस समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने उन्हीं आलमारियों में से एक आलमारी खोली, और महाराज की तरफ देखकर कहा, “चुनार के तिलिस्म में जाने का यही रास्ता है, और हम दोनों भाई इसी रास्ते से वहाँ तक गये थे।"
रास्ता बिल्कुल अँधेरा था, इसलिए इन्द्रजीतसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए आगे-आगे रवाना हुए और उनके पीछे महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रदेव वगैरह और ऐयार लोग रवाना हुए। सबसे पीछे कुंअर आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए जाने लगे, क्योंकि सुरंग पतली थी, और केवल आगे की रोशनी से काम नहीं चल सकता था।
ये लोग उस सुरंग में कई धण्टे तक बराबर चलते गये और इस बात का पता न लगा कि कब संध्या या अब कितनी रात बीत चुकी है । जब सुरंग का दूसरा दरवाजा इन लोगों को मिला और उसे खोलकर सब कोई बाहर निकले तो अपने को एक लम्बी-चौड़ी कोठरी में पाया, जिसमें इस दरवाजे के अतिरिक्त तीनों तरफ की दीवारों में और भी तीन दरवाजे थे, जिनकी तरफ इशारा करके कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "अब हम लोग उस चबूतरे वाले तिलिस्म के नीचे आ पहुँचे हैं। इस जगह एक-दूसरे से मिली हुई सैकड़ों कोठरियाँ हैं जो भूल-भुलैये की तरह चक्कर दिलाती हैं और जिनमें फँसा हुआ अनजान आदमी जल्दी निकल ही नहीं सकता। जब पहले-पहल हम दोनों भाई यहाँ आये थे तो सब कोठरियों के दरवाजे बन्द थे जो तिलिस्मी किताब की सहायता से खोले गये और जिनका खुलासा हाल आपको तिलिस्मी किताब के पढ़ने से मालूम होगा, मगर इनके खोलने में कई दिन लगे और तकलीफ भी बहुत हुई। इन कोठरियों के मध्य में एक चौखूटा कमरा आप देखेंगे जो ठीक चबूतरे के नीचे है और उसी में से बाहर निकलने का रास्ता है, बाकी सब कोठरियों में असबाब और खजाना भरा हुआ है। इसके अतिरिक्त छत के ऊपर एक और रास्ता उस चबूतरे में से बाहर निकलने के लिए बना हुआ है, जिसका हाल मुझे पहले मालूम न था, जिस दिन हम दोनों भाई उस चबूतरे की राह निकले हैं, उस दिन देखा कि इसके अतिरिक्त एक रास्ता और भी है।"
इन्द्रदेव–जी हाँ, दूसरा रास्ता भी जरूर है, मगर वह तिलिस्म के दारोगा के लिए बनाया गया था, तिलिस्म तोड़ने वाले के लिए नहीं। मुझे उस रास्ते का हाल बखूबी मालूम है।
गोपालसिंह–मुझे भी उस रास्ते का हाल (इन्द्रदेव की तरफ इशारा करके) इन्हीं की जुबानी मालूम हुआ है, इसके पहले मैं कुछ भी नहीं जानता था और न ही मालूम था कि इस तिलिस्म के दारोगा यही हैं।
इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने सबको तहखाने अथवा कोठरियों और कमरों की सैर कराई, जिसमें लाजवाब और हद दर्जे की फिजूलखर्ची को मात करने वाली दौलत भरी हुई थी, और एक-से-एक बढ़कर अनूठी चीजें लोगों के दिल को अपनी तरफ खींच रही थीं। साथ ही इसके यह भी समझाया कि इन कोठरियों को हम लोगों ने कैसे खोला, और इस काम में कैसी-कैसी कठिनाइयाँ उठानी पड़ी।
घूमते-फिरते और सैर करते हुए सब कोई उस मध्य वाले कमरे में पहुंचे जो ठीक तिलिस्मी चबूतरे के नीचे था। वास्तव में यह कमरा कल-पुर्जी से बिल्कुल भरा हुआ था। जमीन से छत तक बहुत-सी तारों और कल-पुर्जी का सम्बन्ध था और दीवार के अन्दर से ऊपर चढ़ जाने के लिए सीढ़ियां दिखाई दे रही थीं।
दोनों कुमारों ने महाराज को समझाया कि तिलिस्म टूटने के पहले वे कल-पुर्जे किस ढंग पर लगे थे और तोड़ते समय उनके साथ कैसी कार्रवाई की गई। इसके बाद इन्द्रजीतसिंह सीढ़ियों की तरफ इशारा करके कहा, "अब भी इन सीढ़ियों का तिलिस्म कायम है, हर एक की मजाल नहीं कि इन पर पैर रख सके।"
वीरेन्द्रसिंह–यह सब कुछ है, मगर असल तिलिस्मी बुनियाद वही खोह वाला बंगला जान पड़ता है, जिसमें चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा था, और जहाँ से तिलिस्म के अन्दर घुसे थे।
सुरेन्द्रसिंह–-इसमें क्या शक है। वही चुनार, जमानिया और रोहतासगढ़ वगैरह के तिलिस्मों की नकेल है, और वहाँ रहने वाला तरह-तरह के तमाशे देख-दिखा सकता है और सबसे बढ़कर आनन्द ले सकता है।
जीतसिंह–वहाँ की पूरी-पूरी कैफियत अभी देखने में नहीं आई।
इन्द्रजीतसिंह–दो-चार दिन में वहाँ की कैफियत देख भी सकते हैं । जो कुछ आप लोगों ने देखा वह रुपये में एक आना भी न था। मुझे भी अभी पुनः वहाँ जाकर बहुत-कुष्ठ देखना बाकी है।
सुरेन्द्रसिंह–इस समय तो जल्दी में थोड़ा-बहुत देख लिया है, मगर काम से निश्चिन्त होकर पुनः हम लोग वहां चलेंगे, और उसी जगह से रोहतासगढ़ के तहखाने की भी सैर करेंगे। अच्छा, अब यहाँ से बाहर होना चाहिए।
आगे-आगे कुंअर इन्द्रजीतसिंह रवाना हुए। पाँच-सात सीढ़ियाँ चढ़ जाने के बाद एक छोटा-सा लोहे का दरवाजा मिला, जिसे उसी हीरे वाली तिलिस्मी ताली से खोला, और तब सबको लिए हुए दोनों कुमार तिलिस्मी चबूतरे के बाहर हुए।
सब कोई तिलिस्म की सैर करके लौट आये और अपने-अपने काम-धंधे में लगे । कैदियों के मुकदमे को थोड़े दिन तक मुल्तवी रखकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी पर सबने ध्यान दिया और इसी के इन्तजाम की फिक्र करने लगे। महाराज सुरेन्द्रसिंह ने जो काम जिसके लायक समझा, उसके सुपुर्द करके कुल कैदियों को चुनारगढ़ भेजने का हुक्म दिया और यह भी निश्चय कर लिया कि दो-तीन दिन के बाद हम लोग भी चुनारगढ़ चले जायेंगे, क्योंकि बारात चुनारगढ़ ही से निकलकर यहाँ आयेगी।
भरतसिंह और दिलीपशाह वगैरह का डेरा बलभद्रसिंह के पड़ौस ही में पड़ा और दूसरे मेहमानों के साथ-ही-साथ इनकी खातिरदारी का बोझ भी भूतनाथ के ऊपर डाला गया। इस जगह संक्षेप में हम यह भी लिख देना उचित समझते हैं कि कौन काम किसके सुपुर्द किया गया।
(1) इस तिलिस्मी इमारत के इर्द-गिर्द जिन मेहमानों के डेरे पड़े हैं, उन्हें किसी बात की तकलीफ तो नहीं होती, इस बात को बराबर मालूम करते रहने का काम भूतनाथ के सुपुर्द किया गया-
(2) मोदी, बनिए और हलवाई वगैरह किसी से किसी चीज का दाम तो नहीं लेते, इस बात की तहकीकात के लिए रामनारायण ऐयार मुकर्रर किए गए।
(3) रसद वगैरह के काम में कहीं किसी तरह की बेईमानी तो नहीं होती, या चोरी का नाम तो किसी की जुबान से नहीं सुनाई देता, इसको जानने और शिकायतों के करने पर चुन्नीलाल ऐयार तैनात किए गए।
(4) इस तिलिस्मी इमारत से लेकर चुनारगढ़ तक की सड़क और उसकी सजावट का काम पन्नालाल और पण्डित बद्रीनाथ के जिम्मे किया गया।
(5) चुनारगढ़ में बाहर से न्यौते में आए हुए पण्डितों की खातिरदारी और पूजा-पाठ इत्यादि के सामान की दुरुस्ती का बोझ जगन्नाथ ज्योतिषी पर डाला गया।
(6) बारात और महफिल वगैरह की सजावट तथा उसके सम्बन्ध में जो कुछ काम हो, उसके जिम्मेवार तेजसिंह बनाये गये।
(7) आतिशबाजी और अजायबातों के तमाशे तैयार करने के साथ-ही-साथ उसी तरह की एक इमारत के बनवाने का हुक्म इन्द्रदेव को दिया गया, जैसी इमारत के अन्दर हँसते-हँसते इन्द्रजीतसिंह वगैरह एक दफे कूद गये थे, और जिसका भेद अभी तक खोला नहीं गया है।
(8) पन्नालाल वगैरह के बदले में रणधीरसिंहजी के डेरे की हिफाजत तथा किशोरी, कामिनी वगैरह की निगरानी के जिम्मेवार देवीसिंह बनाये गये।
(9) ब्याह-सम्बन्धी खर्च की तह्वील (रोकड़) राजा गोपालसिंह के हवाले की गई।
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, पाँचवाँ भाग, चौथा बयान । (10) कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ रहकर उनके विवाह- सम्बन्धी शान-शौकत और जरूरतों को कायदे के साथ निभाने के लिए भैरोंसिंह और तारासिंह छोड़ दिये गये।
(11) हरनामसिंह को अपनी मातहती में लेकर जीतसिंह ने यह काम अपने जिम्मे ले लिया कि हर एक के कामों की जाँच और निगरानी रखने के अतिरिक्त कुछ कैदियों को भी किसी उचित ढंग से इस विवाहोत्सव के तमाशे दिखा देंगे, ताकि वे लोग भी देख लें, कि जिस शुभ दिन के हम बाधक थे, वह आज किस खुशी और खूबी के साथ बीत रहा है और सर्वसाधारण भी देख लें, कि धन-दौलत और ऐश-आराम के फेर में पड़कर अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारने वाले, छोटे होकर बड़ों के साथ पैर बांध के नतीजा भोगने वाले, मालिक के साथ में नमकहरामी और उग्र पाप करने का कुछ फल इस जन्म में भी भोग लेने वाले, और बदनीयती तथा पाप के साथ ऊंचे दर्जे पर पहुंचकर यकायक रसातल में पहुँच जानेवाले, धर्म और ईश्वर से सदा विमुख रहने वाले ये ही प्रायश्चित्ती लोग हैं।
इन सबके साथ मातहती में काम करने के लिए आदमी भी काफी तौर पर दिए गये।
इनके अतिरिक्त और लोगों को भी तरह-तरह के काम सुपुर्द किए गए और सब कोई बड़ी खूबी के साथ अपना-अपना काम करने लगे।
अब हम थोड़ा-सा हाल कुँअर इन्द्रजीतसिंह का बयान करेंगे, जिन्हें इस बात का बहुत ही रंज है कि कमलिनी की शादी किसी दूसरे के साथ हो गई, और वे उम्मीद ही में बैठे रह गये।
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है और कुँअर इन्द्रजीतसिंह अपने कमरे में बैठे भैरोंसिंह से धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं । इन दोनों के सिवाय कोई तीसरा आदमी इस कमरे में नहीं है और कमरे का दरवाजा भी भिड़वाया हुआ है।
भैरोंसिंह–तो आप साफ-साफ कहते क्यों नहीं कि आपकी उदासी का सबब क्या है ? आपको तो आज खुश होना चाहिए, कि जिस काम के लिए आप बरसों परेशान रहे, जिसकी उम्मीद में तरह-तरह की तकलीफ उठाई, जिसके लिए हथेली पर जान रखकर बड़े-बड़े दुश्मनों से मुकाबला करना पड़ा और जिसके होने या मिलने पर ही तमाम दुनिया की खुशी समझी जाती थी, आज वही काम आपकी इच्छानुसार हो रहा है, और उसी किशोरी के साथ आपकी शादी का इन्तजाम हम अपनी आँखों से देख रहे हैं, फिर भी ऐसी अवस्था में आपको उदास देखकर कौन ऐसा है जो ताज्जुब न करेगा?
इन्द्रजीतसिंह–बेशक, मेरे लिए आज यह बड़ी खुशी का दिन है, और मैं खुश हूँ भी, मगर कमलिनी की तरफ से जो रंज मझे हुआ है, उसे हजार कोशिश करने पर भी मेरा दिल बर्दाश्त नहीं कर पाता।
भैरोंसिंह–(ताज्जुब का चेहरा बनाकर)हैं, कमलिनी की तरफ से और आपको रंज ! जिसके अहसानों के बोझ से आप दबे हुए हैं, उसी कमलिनी से रंज ! यह आप क्या कह रहे हैं? इन्द्रजीतसिंह–-इस बात को तो मैं खुद ही कह रहा हूँ, कि उसके अहसानों के वोझ से मैं जिन्दगी-भर हलका नहीं हो सकता और अब तक उसके जी में मेरी भलाई का ध्यान बंधा ही हुआ है, मगर रंज इस बात का है कि अब मैं उसे उस मुहब्बत की निगाह से नहीं देख सकता जिससे पहले देखता था।
भैरोंसिंह–सो क्यों ? क्या इसलिए कि अब वह अपनी ससुराल चली जायेगी, और फिर उसे आप पर अहसान करने का मौका न मिलेगा?
इन्द्रजीतसिंह–हाँ, करीब-करीब यही बात है।
भैरोंसिंह–मगर अब आपको उसकी मदद की जरूरत भी तो नहीं है। हां, इस बात का खयाल बेशक हो सकता है कि अब आप उसके तिलिस्मी मकान पर कब्जा न कर सकेंगे।
इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, मुझे इस बात की कुछ जरूरत नहीं है, और न इसका कुछ खयाल ही है!
भैरोंसिंह–तो इस बात का खयाल है कि उसने अपनी शादी में आपको न्यौता नहीं दिया ? मगर वह एक हिन्दू लड़की की हैसियत से ऐसा कर भी तो नहीं सकती थी ! हाँ, इस बात की शिकायत आप राजा गोपालसिंहजी से जरूर कर सकते हैं, क्योंकि उस काम के कर्ता-धर्ता वे ही हैं।
इन्द्रजीतसिंह–उनसे तो मुझे बहुत ही शिकायत है, मगर मैं शर्म के मारे कुछ कह नहीं सकता।
भैरोंसिंह–(चौंककर) शर्म तो तब होती, जब आप इस बात की शिकायत करते कि मैं खुद उससे शादी करना चाहता था।
इन्द्रजीतसिंह–हाँ, बात तो ऐसी ही है । (मुस्कराकर) मगर तुम तो पागलों की-सी बातें करते हो।
भैरोंसिंह–(हँसकर) यह कहिए न कि आप दोनों हाथ लड्डू चाहते थे ! तो इस चोर को आप इतने दिनों तक छिपाए क्यों रहे?
इन्द्रजीतसिंह–तो यही कब उम्मीद हो सकती थी कि इस तरह यकायक गुमसुम उसकी शादी हो जायेगी।
भैरोंसिंह–खैर, अब तो जो कुछ होना था सो हो गया, मगर आपको इस बात का खयाल न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त क्या आप समझते हैं, कि किशोरी इस बात को पसन्द करती ? कभी नहीं, बल्कि आये दिन का झगड़ा पैदा हो जाता।
इन्द्रजीतसिंह–नहीं, किशोरी से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं हो सकती । खैर, अब इस विषय पर बहस करना व्यर्थ है, मगर मुझे इसका रंज जरूर है। अच्छा, यह तो बताओ, तुमने उन्हें देखा है जिनके साथ कमलिनी की शादी हुई?
भैरोंसिंह–कई दफे, बातें भी अच्छी तरह कर चुका हूँ।
इन्द्रजीतसिंह–कैरो हैं?
भैरोसिंह–बड़े लायक, पढ़े-लिखे, पण्डित, बहादुर, दिलेर, हँसमुख और सुन्दर। इस अवसर पर आवेंगे ही, आप भी देख लीजिएगा। आपने कमलिनी से इस बारे में कुछ बातचीत नहीं की?
इन्द्रजीतसिंह–इधर तो नहीं, मगर तिलिस्म की सैर को जाने से पहले मुलाकात हुई थी, उसने खुद मुझे बुलाया था, बल्कि उसी की जुबानी उसकी शादी का हाल मुझे मालूम हुआ था। मगर उसने मेरे साथ विचित्र ढंग का बर्ताव किया।
भैरोंसिंह–-सो क्या? इन्द्रजीतसिंह–(जो कुछ कैफियत हो चुकी थी, उसे बयान करने के बाद)तुम इस बर्ताव को कैसा समझते हो?
भैरोंसिंह–बहुत अच्छा और उचित।
इसी तरह की बातचीत हो रही थी कि पहले दिन की तरह बगल वाले कमरे का दरवाजा खुला, और एक लौंडी ने आकर सलाम करने के बाद कहा, "कमलिनीजी आपसे मिलना चाहती हैं, आज्ञा हो तो।"
इन्द्रजीतसिंह–अच्छा, मैं चलता हूं, तू दरवाजा बन्द कर दे।
भैरोंसिंह–-अब मैं भी जाकर आराम करता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह–अच्छा, जाओ, फिर कल देखा जायेगा।
लौंडी–-इनसे (भैरोंसिंह से) भी उन्हें कुछ कहना है।
यह कहती हुई लौंडी ने दरवाजा बद कर दिया, तब तक स्वयं कमलिनी इस कमरे में आ पहुंची, और भैरोंसिंह की तरफ देखकर बोली, (जो उठकर बाहर जाने के लिए तैयार था) "आप कहाँ चले ? आप ही से तो मुझे बहुत-सी शिकायत करनी है।"
भैरोंसिंह–-सो क्या ?
कमलिनी–अब उसी कमरे में चलिये, वहीं बातचीत होगी।
इतना कहकर कमलिनी ने कुमार का हाथ पकड़ लिया, और अपने कमरे की तरफ ले चली, पीछे-पीछे भैरोंसिंह भी गये । लौंडी दरवाजा बन्द करके दूसरी राह से बाहर चली गई और कमलिनी ने इन दोनों को उचित स्थान पर बैठाकर पानदान आगे रख दिया और भैरोंसिंह से कहा, "आप लोग तिलिस्म की सैर कर आये और मुझे पूछा भी नहीं !"
भैरोंसिंह–-महाराज खुद कह चुके हैं कि शादी के बाद औरतों को भी तिलिस्म की सैर करा दी जाये और फिर तुम्हारे लिए तो कहना ही क्या है । तुम तो जब भी चाहो, तभी तिलिस्म की सैर कर सकती हो।
कमलिनी–ठीक है, मानो यह मेरे हाथ की बात है!
भैरोंसिंह–ऐसा ही है।
कमलिनी–(हंसकर) टालने के लिए यह अच्छा ढंग है ! खैर, जाने दीजिये, मुझे कुछ ऐसा शौक भी नहीं है । हाँ, यह बताइए कि वहाँ क्या-क्या कैफियत देखने में आई ? मैंने सुना कि भूतनाथ वहाँ बड़े चक्कर में पड़ गया था और उसकी पहली स्त्री भी वहाँ दिखाई पड़ गई। भैरोंसिंह–बेशक ऐसा ही हुआ।
इतना कहकर भैरोंसिंह ने कुल हाल खुलासा बयान किया और इसके बाद कमलिनी ने इन्द्र जीतसिंह से कहा, "खैर. आप बताइए कि शादी की खुशी में मुझे क्या इनाम मिलेगा?"
इन्द्रजीतसिंह–(हँसकर) गालियों के सिवाय और किसी चीज की तुम्हें कमी ही क्या है जो मैं दूं?
कमलिनी–-(भैरोंसिंह से)सुन लीजिये, मेरे लिए कैसा अच्छा इनाम सोचा गया है ! (कुमार से हँसकर) याद रखियेगा, इस जवाब के बदले मैं आपको ऐसा छकाऊँगी कि खुश हो जाइयेगा!
भैरोंसिंह–-इन्हें तो तुम छका चुकी हो, अब इससे बढ़कर क्या होगा कि चुप- चाप दूसरे के साथ शादी कर ली, और इन्हें अंगठा दिखा दिया । अब तुम्हें ये गालियां न दें तो क्या करें!
कमलिनी–(मुस्कराती हुई) आपकी रा। भी यही है?
भैरोंसिंह–बेशक!
कमलिनी–-तो बेचारी किशोरी के साथ आप यह अच्छा सलूक करते हैं!
भैरोंसिंह–इसका इल्जाम तो कुमार के ऊपर हो सकता है!
कमलिनी–-हाँ, साहब, आज के मर्दो की मुरोवत जो कुछ न कर दिखाए थोड़ा है मैं किशोरी बहिन से इसका जिक्र करूंगी।
भैरोंसिंह–तब तो अहसान पर अहसान करोगी।
इन्द्रजीतसिंह–-(भैरोंसिंह से) तुम भी व्यर्थ की छेड़छाड़ मचा रहे हो, भला इन बातों से क्या फायदा?
भैरोंसिंह–व्याद-शादी में ऐसी बातें हुआ ही करती हैं!
इन्द्रजीतसिंह–तुम्हारा सिर हुआ करता है ! (कमलिनी से)अच्छा, यह बताओ कि इस समय तुमने मुझे क्यों याद किया?
कमलिनी–-हरे राम ! अब क्या मैं ऐसी भारी हो गई कि मुझसे मिलना भी बुरा मालूम होता है?
इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, अगर मिलना बुरा मालूम होता तो मैं यहाँ आता ही क्यों ? पूछता हूँ कि आखिर कोई काम भी है या ?
कमलिनी–-हाँ, है तो सही।
इन्द्रजीतसिंह–कहो!
कमलिनी–आपको शायद मालूम होगा कि मेरे पिता जब से यहाँ आये हैं, उन्होंने अपने खाने-पीने का इन्तजाम अलग रखा है, अर्थात् आपके यहाँ का अन्न नहीं खाते और न कुछ अपने लिए खर्च कराते हैं।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ, मुझे मालूम है।
कमलिनी–अब उन्होंने इस मकान में रहने से भी इनकार किया है। उनके एक मित्र ने खेमे वगैरह का इन्तजाम कर दिया है, और वे उसी में अपना डेरा उठाकर जाने वाले हैं।
इन्द्रजीतसिंह–यह भी मालूम है।
कमलिनी–मेरी इच्छा है कि यदि आप आप आज्ञा दें, तो लाडिली को साथ लेकर मैं भी उसी डेरे में चली जाऊँ।
इन्द्रजीतसिंह–क्यों ? तुम्हें यहाँ रहने में परहेज ही क्या हो सकता है ?
कमलिनी–नहीं-नही, मुझे किस बात का परहेज होगा, मगर यों ही जी चाहता है कि मैं दो-चार दिन अपने बाप के साथ ही रहकर उनकी खिदमत करूं।
इन्द्रजीतसिंह–यह दूसरी बात है, इसकी इजाजत तुम्हें अपने मालिक से लेनी चाहिए । मैं कौन हूँ जो इजाजत दूं?
कमलिनी–इस समय वे तो यहाँ हैं, नहीं अतः उनके बदले में मैं आप ही को अपना मालिक समझती हूँ।
इन्द्रजीतसिंह–(मुस्कराकर) फिर तुमने वही रास्ता पकड़ा ? खैर, मैं इस बात की इजाजत न दूंगा।
कमलिनी–तो मैं आज्ञा के विरुद्ध कुछ न करूंगी।
इन्द्रजीतसिंह–-(भैरोंसिंह इनकी बातचीत का ढंग देखते हो?
भैरोंसिंह–(हँसकर) शादी हो जाने पर भी ये आपको नहीं छोड़ना चाहतीं, तो में क्या करूं?
कमलिनी–अच्छा, मुझे एक बात की इजाजत तो जरूर दीजिए।
इन्द्रजीतसिंह–वह क्या?
कमलिनी–आपकी शादी में मैं आपसे एक विचित्र दिल्लगी करना चाहती हूँ।
इन्द्रजीतसिंह–वह कौन-सी दिल्लगी होगी?
कमलिनी—यह बता दूंगी तो उसमें मजा ही क्या रह जायेगा ? बस, आप इतना कह दीजिए कि उस दिल्लगी से रंज न होंगे, चाहे वह कैसी गहरी क्गों न हो।
इन्द्रजीतसिंह—(कुछ सोचकर) खैर, मैं रंज न करूंगा।
इसके बाद थोड़ी देर तक हँसी की बातें होती रहीं, और फिर सब उठकर अपने-अपने ठिकाने चले गये।
12
ब्याह की तैयारी और हँनी-खुशी में ही कई सप्ताह बीत गये और किसी को कुछ मालूम न हुआ। हाँ; कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को खुशी के साथ ही रंज और उदासी से भी मुकाबला करना पड़ा। यह रंज और उदासी क्यों? शायद कमलिनी और लाड़िली के सबब से हो। जिस तरह कुंअर इन्द्रजीतसिंह कमलिनी से मिलकर और उसकी जुबानी उसके ब्याह का हो जाना सुनकर दुःखी हुए, उसी तरह आनन्दसिंह को भी लाडिली
च० स०-6-7
से मिलकर दुःखी होना पड़ा या नहीं सो हम नहीं कह सकते क्योंकि लाड़िली में और
आनन्दसिंह में जो बातें हुईं, उसमें और कमलिनी की बातों में बड़ा फर्क है। कमलिनी ने तो खुद इन्द्रजीतसिंह को अपने कमरे में बुलवाया था, मगर लाड़िली ने ऐसा नहीं किया। लाडिली का कमरा भी आनन्दसिंह के कमरे के बगल में ही था। जिस रात कमलिनी में और इन्द्रजीतसिंह में दूसरी मुलाकात हुई थी, उसी रात को आनन्दसिंह ने भी अपने बगल वाले कमरे में लाड़िली को देखा था, मगर दूसरे ढंग से । आनन्दसिंह अपने कमरे में.मसहरी पर लेटे हुए तरह-तरह की बातें सोच रहे थे कि उसी समय बगल वाले कमरे में से कुछ खटके की आवाज आई जिससे आनन्दसिंह चौंके और उन्होंने घूमकर देखा तो उस कमरे का दरवाजा कुछ खुला हुआ नजर आया। इन्हें यह जरूर मालूम था कि हमारे बगल ही में लाड़िली का कमरा है, और उससे मिलने की नीयत से इन्होंने कई दफे दरवाजा खोलना भी चाहा था, मगर बन्द पाकर लाचार हो गये थे। अब दरवाजा खुला पाकर बहुत खुश हुए और मसहरी पर से उठकर धीरे-धीरे दरवाजे के पास गये। हाथ के सहारे दरवाजा कुछ विशेष खोला और अन्दर की तरफ झाँककर देखा । लाड़िली पर निगाह पड़ी जो एक शमादान के आगे बैठी हुई कुछ लिख रही थी। शायद उसे इस बात की कुछ खबर ही न थी कि मुझे कोई देख रहा है।
भीतर सन्नाटा पाकर अर्थात् किसी गैर को न देखकर आनन्दसिंह बेधड़क कमरे के अन्दर चले गये। पैर की आहट पाते ही लाड़िली चौंकी तथा आनन्दसिंह को अपनी तरफ आते देख उठ खड़ी हुई और बोली, "आपने दरवाजा कैसे खोल लिया?"
आनन्दसिंह–(मुस्कराते हुए) किसी हिकमत से!
लाड़िली–क्या आज के पहले वह हिकमत मालूम न थी ? शायद सफाई के लिए किसी लौंडी ने दरवाजा खोला हो और बन्द करना भूल गई हो।
आनन्दसिंह–अगर ऐसा ही हो तो क्या कुछ हर्ज है?
लाड़िली–नहीं, हर्ज काहे का है, मैं तो खुद ही आपसे मिलना चाहती थी, मगर लाचारी
आनन्दसिंह–लाचारी कैसी ? क्या किसी ने मना कर दिया था?
लाड़िली–मना ही समझना चाहिए, जबकि मेरी बहिन कमलिनी ने जोर देकर कह दिया कि “या तो तू मेरी इच्छानुसार शादी कर ले या इस बात की कसम खा जा कि किसी गैर मर्द से कभी बातचीत न करेगी।" जिस समय उनकी (कमलिनी की) शादी होने लगी थी, उस समय भी लोगों ने मुझ पर शादी कर लेने के लिए दबाव डाला था, मगर मैं इस समय जैसी हूँ, वैसी ही रहने के लिए कसम खा चुकी हूँ। मतलब यह है कि इसी बखेड़े में मुझमें और उनमें कुछ तकरार भी हो गई है।
आनन्दसिंह–(घबराहट और ताज्जुब के साथ)क्या कमलिनीजी की शादी हो गई?
लाड़िली–जी हाँ।
आनन्दसिंह–किसके साथ?
लाड़िली–सो तो मैं नहीं कह सकती, आपको खुद मालूम हो जायेगा। आनन्दसिंह–यह बहुत बुरा हुआ।
लाड़िली–-बेशक, बहुत बुरा हुआ, मगर क्या किया जाये ! जीजाजी (गोपालसिंह) की मर्जी ही ऐसी थी, क्योंकि किशोरी ने ऐसा करने के लिए उन पर बहुत जोर डाला था, अतः कमलिनी बहिन दबाव में पड़ गईं, मगर मैंने साफ इनकार कर दिया, कि जैसी हूँ वैसी ही रहूँगी।
आनन्दसिंह–तुमने बहुत अच्छा किया।
लाड़िली–और मैं ऐसा करने के लिए सख्त कसम खा चुकी हूँ।
आनन्दसिंह–(ताज्जुब से) क्या तुम्हारे इस कहने का यह मतलब लगाया जाय कि अब तुम शादी करोगी ही नहीं ?
लाडिली-–बेशक !
आनन्दसिंह–यह तो कोई अच्छी बात नहीं !
लाड़िली-जो हो, अब तो मैं कसम खा चुकी हूँ और बहुत जल्द यहाँ से चली जाने वाली भी हूँ, सिर्फ कामिनी बहिन की शादी हो जाने का इन्तजार कर रही हूँ ।
आनन्दसिंह-—(कुछ सोचकर) कहाँ जाओगी?
लाड़िली–आप लोगों की कृपा से अब तो मेरा बाप भी प्रकट हो गया है, अब इसकी चिन्ता ही क्या है ?
आनन्दसिंह–मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ, तुम्हारे बाप तुम्हें शादी करने के लिए जरूर जोर देंगे।
लाड़िली–इस विषय में उनकी कुछ न चलेगी।
लाड़िली की बातों से आनन्द सिंह को ताज्जुब के साथ-ही-साथ रंज भी हुआ और ज्यादा रंज तो इस बात का था कि अब तक लाड़िली ने खड़े-ही-खड़े बातचीत की और कुमार को बैठने तक के लिए नहीं कहा। शायद इसका यह मतलब हो कि 'मैं ज्यादा देर तक आपसे बात नहीं कर सकती।' अतः आनन्दसिंह को क्रोध और दुःख के साथ लज्जा ने भी धर दबाया और वे यह कहकर कि 'अच्छा मैं जाता हूँ' अपने कमरे की तरफ लौट चले।
आनन्दसिंह के दिल में जो बातें घूम रही थीं, उनका अन्दाजा शायद लाडिली को भी मिल गया और जब वे लौटकर जाने लगे तब उसने पुनः इस ढंग पर कहा मानो उसकी आखिरी बात अभी पूरी नहीं हुई थी-"क्योंकि जिनकी मुझ पर कृपा रहती थी, अब वे और ही ढंग के हो गए !'इस बात ने कुमार को तरदुद में डाल दिया। उन्होंने घूमकर एक तिरछी निगाह लाड़िली पर डाली और कहा, "इसका क्या मतलब ?"
लाड़िली–सो कहने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है। हाँ, जब आपकी शादी हो जायगी तब मैं साफ-साफ आपसे कह दूंगी। उस समय जो कुछ आप राय देंगे, उसे मैं कबूल भी कर लूंगी!
इस आखिरी बात से कुमार को कुछ हिम्मत बँध गई, मगर बैठने की या और कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी और 'अच्छा' कहकर वे वे अपने कमरे में चले आये ।
13
विवाह का सब सामान ठीक हो गया, मगर हर तरह की तैयारी हो जाने पर भी लोगों की मेहनत में कमी नहीं हुई। सब कोई उसी तरह दौड़-धूप और काम-काज में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। महाराज सुरेन्द्र सिंह सभी को लिए हुए चुनारगढ़ चले गए। अब इस तिलिस्मी मकान में सिर्फ जरूरत की चीजों के ढेर और इन्तजामकार लोगों के डेरे भर ही दिखाई दे रहे हैं । इस मकान में से उन लोगों के लिए भी रास्ता बनाया गया है जो हँसते-हँसते उस तिलिस्मी इमारत में कूदा करेंगे जिसके बनाने की आज्ञा इन्द्र देव को दी गई थी और जो इस समय बनकर तैयार हो गई है।
यह इमारत बीस गज लम्बी और इतनी ही चौड़ी थी। ऊँचाई इसकी लगभग चालीस हाथ से कुछ ज्यादा होगी। चारों तरफ की दीवार साफ और चिकनी थी तथा किसी तरफ कोई दरवाजे का निशान दिखाई नहीं देता था। पूरब की तरफ ऊपर चढ़ जाने के लिए छोटी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं जिनके दोनों तरफ हिफाजत के लिए लोहे के सींखचे लगा दिए गये थे। उसी पूरब की तरफ वाली दीवार पर दड़े-बड़े हरफों में यह भी लिखा हुआ था–
"जो आदमी इन सीढ़ियों की राह ऊपर जायगा और एक नजर अन्दर की तरफ झांक वहां की कैफियत देखकर इन्हीं सीढ़ियों की राह नीचे उतर आवेगा, उसे एक लाख रुपये इनाम में दिए जायेंगे।"
इस इमारत ने चारों तरफ एक अनूठा रंग पैदा कर दिया था। हजारों आदमी उस इमारत के ऊपर चढ़ जाने के लिए तैयार थे और हर एक आदमी अपनी-अपनी लालसा पूरी करने के लिए जल्दी मचा रहा था, मगर सीढ़ी का दरवाजा बन्द था। पहरेदार लोग किसी को ऊपर जाने की इजाजत नहीं देते थे और यह कह कर सभी को सन्तोष करा देते थे कि बारात वाले दिन यह दरवाजा खुलेगा और पन्द्रह दिन तक बन्द न होगा।
यहां से चुनारगढ़ की सड़क के दोनों तरफ जो सजावट की गई थी, उसमें भी एक अनूठापन था। दोनों तरफ रोशनी के लिए जाफरी बनी हुई थी और उनमें अच्छे- अच्छे नीति के श्लोक दरसाए गये थे। बीच-बीच में थोड़ी-थोड़ी दूर पर नौबतखाने के बगल में एक-एक मचान था जिस पर एक या दो कैदियों के बैठने के लिए जगह बनी हुई थी। जाफरी के दोनों तरफ दस हाथ चौड़ी जमीन में बाग का नमूना तैयार किया गया था और इसके बाद आतिशबाजी लगाई गई थी। आध-आध कोस की दूरी पर सर्व- साधारण और गरीब तमाशबीनों के लिए महफिल तैयार की गई थी और उसके लिए अच्छी-अच्छी गाने वाली रंडियाँ और भाँड़ मुकर्रर किए गए थे । रम्त अंधेरी होने के कारण रोशनी का सामान ज्यादा तैयार किया गया था और वह तिलिस्मी चन्द्रमा जो
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति इक्कीसवाँ भाग, आठवां बगान । दोनों राजकुमारों को तिलिस्म के अन्दर से मिला था, चुनारगढ़ किले के ऊँचे कँगूरे पर लगा दिया गया था जिसकी रोशनी इस तिलिस्मी मकान तक बड़ी खूबी और सफाई के साथ पड़ रही थी।
पाठक, दोनों कुमारों की बारात की सजावट, महफिलों की तैयारी, रोशनी और आतिशबाजी की खूबी, मेहमानदारी की तारीफ और खैरात की बहुतायत इत्यादि का हाल विस्तारपूर्वक लिखकर पढ़ने वालों का समय नष्ट करना हमारी आत्मा और आदत के विरुद्ध है। आप खुद समझ सकते हैं कि दोनों कुमारों की शादी का इन्तजाम किस खूबी के साथ किया गया होगा, नुमाइश की चीजें कैसी अच्छी होंगी, वड़प्पन का कितना बड़ा खयाल किया गया, और बारात किस धूमधाम से निकली होगी। हम आज तक जिस तरह संक्षेप में लिखते आए हैं अब भी उसी तरह लिखेंगे, तथापि हमारी उन लिखावटों से जो ब्याह के सम्बन्ध में ऊपर कई दफे मौके-मौके पर लिखी जा चुकी हैं आपको अन्दाज के साथ-साथ अनुमान करने का हौसला भी मिल जायगा और विशेष सोच-विचार की जरूरत न रहेगी। हम इस जगह पर केवल इतना ही लिखेंगे कि–
बारात बड़े धूम-धाम से चुनारगढ़ के बाहर हुई। आगे-आगे नौबत, निशान और उसके बाद सिलसिले से फौजी सवार, पैदल और तोपखाने वगैरह थे, जिसके बाद ऐसी फुलवारियाँ थीं जिनके देखने से खुशी और लूटने से दौलत हासिल हो । इसके बाद बड़े सजे हुए अम्बारीदार हाथी पर दोनों कुमार हाथी पर ही सवार अपने बड़े बुजुर्गों, रिश्तेदारों और मेहमानों से घिरे हुए धीरे-धीरे दोतर्फी बहार लूटते और दुश्मनों के कलेजों को जलाते हुए जा रहे थे और उनके बाद तरह-तरह की सवारियों और घोड़ों पर बैठे हुए बड़े-बड़े सरदार लोग दिखाई दे रहे थे । अन्त में फिर फौजी सिपाहियों का सिलसिला था। आगे वाले नौबत-निशान से लेकर कुमारों के हाथी तक कई तरह के बाजे वाले अपने मौके से अपना इल्म और हुनर दिखा रहे थे।
कुशलपूर्वक बारात ठिकाने पहुंची और शास्त्रानुसार कर्म तथा रीति होने के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह का विवाह किशोरी से और आनन्दसिंह का कामिनी के साथ हो गया और इस काम में रणधीरसिंह ने भी वित्त के अनुसार दिल खोलकर खर्च किया । दूसरे रोज पहर भर दिन चढ़ने के पहले ही दोनों बहुओं की रुखसती कराके महाराज चुनार की तरफ लौट पड़े।
चुनारगढ़ पहुँचने पर जो कुछ रस्में थीं वे पूरी होने लगी और मेहमान तथा तमाशबीन लोग नरह-तरह के तमाशों और महफिलों का आनन्द लूटने लगे। उधर तिलिस्मी मकान की सीढ़ियों पर लाख रुपया इनाम पाने की लालसा से लोगों ने चढ़ना आरम्भ किया। जो कोई दीवार के ऊपर पहुंचकर अन्दर की तरफ झाँकता, वह अपने दिल को किसी तरह न सम्हाल सकता और एक दफे खिलखिलाकर हँसने के बाद अन्दर की तरफ कूद पड़ता तथा कई घण्टे के बाद उस चबूतरे वाली बहुत बड़ी तिलिरमी इमारत की राह से बाहर निकल जाता।
बस, विवाह का इतना ही हाल संक्षेप में लिखकर अब हम इस बयान को पूरा करते हैं और इसके बाद सोहागरात की एक बहुत ही अनूठी घटना का उल्लेख करके इस बाईसवें भाग को समाप्त करेंगे क्योंकि हम दिलचस्प घटनाओं का लिखना ही पसन्द करते हैं।
14
आज कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है क्योंकि तरह-तरह की तकलीफें उठाकर एक मुद्दत के बाद इन दोनों को दिली मुरादें हासिल हुई हैं।
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है और एक सुन्दर सजे हुए कमरे में ऊँची और मुलायम गद्दी पर किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह बैठे हुए दिखाई देते हैं । यद्यपि कुँअर इन्द्रजीत सिंह की तरह किशोरी के दिल में भी तरह-तरह की उमंगें भरी हुई हैं और वह आज इस ढंग पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह की पहली मुलाकात को सौभाग्य का कारण समझती है मगर उस अनोखी लज्जा के पाले में पड़ी हुई किशोरी का चेहरा चूंघट की ओट से बाहर नहीं होता जिसे प्रकृति अपने हाथों से औरत की बुद्धि में जन्म ही से दे देती है। यद्यपि आज से पहले कुँअर इन्द्र जीतसिंह को कई दफे किशोरी देख चुकी है और उनसे बातें भी कर चुकी है तथापि आज पूरी स्वतन्त्रता मिलने पर भी यकायक सूरत दिखाने की हिम्मत नहीं पड़ती। कुमार तरह-तरह की बातें कहकर और समझाकर उसकी लज्जा दूर किया चाहते हैं मगर कृतकार्य नहीं होते । बहुत-कुछ कहने- सुनने पर कभी-कभी किशोरी दो-एक शब्द बोल देती है मगर वह भी धड़कते हुए कलेजे के साथ । कुमार ने सोच लिया कि यह स्त्रियों की प्रकृति है अतएव उसके विरुद्ध जोर न देना चाहिए, यदि इस समय इसकी हिम्मत नहीं खुलती तो क्या हुआ, घण्टे-दो-घण्टे, पहरदो-पहर या एक-दो दिन में खुल ही जायगी ! आखिर ऐसा ही हुआ।
इसके बाद किस तरह की छेड़छाड़ शुरू हुई या क्या हुआ, सो हम नहीं लिख सकते, हाँ उस समय का हाल जरूर लिखेंगे, जब धीरे-धीरे सुबह की सफेदी आसमान पर फैाने लग गई थी और नियमानुसार प्रातःकाल बजाई जाने वाली नफीरी की आवाज ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह और किशोरी को नींद से जगा दिया था। किशोरी जो कुंअर इन्द्रजीतसिंह के बगल में सोई हुई थी, घबरा कर उठ बैठी और मुंह धोने तथा बिखरे बालों को सुधारने की नीयत से उस सुनहरी चौकी की तरफ बढ़ी, जिस पर सोने के बर्तन में गंगाजल भरा हुआ था और जिसके पास ही जल गिराने के लिए एक बड़ा सा चाँदी का आफताबा भी रखा हुआ था। हाथ में जल लेकर चेहरे पर लगाने और पुनः अपना हाथ देखने के साथ ही किशोरी चौंक पड़ी और घबरा कर बोली, "हैं ! यह क्या मामला है?"
इन शब्दों ने इन्द्रजीतसिंह को चौंका दिया। वे घबड़ा कर किशोरी के पास चले गए और पूछा, "क्यों, क्या हुआ?"
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आज कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है क्योंकि तरह-तरह की तकलीफें उठाकर एक मुद्दत के बाद इन दोनों को दिली मुरादें हासिल हुई हैं।
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है और एक सुन्दर सजे हुए कमरे में ऊँची और मुलायम गद्दी पर किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह बैठे हुए दिखाई देते हैं । यद्यपि कुँअर इन्द्रजीत सिंह की तरह किशोरी के दिल में भी तरह-तरह की उमंगें भरी हुई हैं और वह आज इस ढंग पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह की पहली मुलाकात को सौभाग्य का कारण समझती है मगर उस अनोखी लज्जा के पाले में पड़ी हुई किशोरी का चेहरा चूंघट की ओट से बाहर नहीं होता जिसे प्रकृति अपने हाथों से औरत की बुद्धि में जन्म ही से दे देती है। यद्यपि आज से पहले कुँअर इन्द्र जीतसिंह को कई दफे किशोरी देख चुकी है और उनसे बातें भी कर चुकी है तथापि आज पूरी स्वतन्त्रता मिलने पर भी यकायक सूरत दिखाने की हिम्मत नहीं पड़ती। कुमार तरह-तरह की बातें कहकर और समझाकर उसकी लज्जा दूर किया चाहते हैं मगर कृतकार्य नहीं होते । बहुत-कुछ कहने- सुनने पर कभी-कभी किशोरी दो-एक शब्द बोल देती है मगर वह भी धड़कते हुए कलेजे के साथ । कुमार ने सोच लिया कि यह स्त्रियों की प्रकृति है अतएव उसके विरुद्ध जोर न देना चाहिए, यदि इस समय इसकी हिम्मत नहीं खुलती तो क्या हुआ, घण्टे-दो-घण्टे, पहरदो-पहर या एक-दो दिन में खुल ही जायगी ! आखिर ऐसा ही हुआ।
इसके बाद किस तरह की छेड़छाड़ शुरू हुई या क्या हुआ, सो हम नहीं लिख सकते, हाँ उस समय का हाल जरूर लिखेंगे, जब धीरे-धीरे सुबह की सफेदी आसमान पर फैाने लग गई थी और नियमानुसार प्रातःकाल बजाई जाने वाली नफीरी की आवाज ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह और किशोरी को नींद से जगा दिया था। किशोरी जो कुंअर इन्द्रजीतसिंह के बगल में सोई हुई थी, घबरा कर उठ बैठी और मुंह धोने तथा बिखरे बालों को सुधारने की नीयत से उस सुनहरी चौकी की तरफ बढ़ी, जिस पर सोने के बर्तन में गंगाजल भरा हुआ था और जिसके पास ही जल गिराने के लिए एक बड़ा सा चाँदी का आफताबा भी रखा हुआ था। हाथ में जल लेकर चेहरे पर लगाने और पुनः अपना हाथ देखने के साथ ही किशोरी चौंक पड़ी और घबरा कर बोली, "हैं ! यह क्या मामला है?"
इन शब्दों ने इन्द्रजीतसिंह को चौंका दिया। वे घबड़ा कर किशोरी के पास चले गए और पूछा, "क्यों, क्या हुआ?" किशोरी–मेरे साथ यह क्या दिल्लगी की गई है?"
इन्द्रजीतसिंह–कुछ कहो भी तो क्या हुआ?
किशोरी–(हाथ दिखा कर) देखिए यह रंग कैसा है, जो चेहरे पर से पानी लगने के साथ ही छूट रहा है।
इन्द्रजीतसिंह–(हाथ देख कर) हाँ है तो सही ! मगर मैंने तो कुछ भी नहीं किया, तुम खुद सोच सोच सकती हो कि मैं भला तुम्हारे चेहरे पर रंग क्यों लगाने लगा, मगर तुम्हारे चेहरे पर यह रंग आया ही कहाँ से?
किशोरी–(पुनः चेहरे पर जल लगाकर) यह देखिए, है या नहीं!
इन्द्रजीतसिंह–-सो तो मैं खुद कह रहा हूँ कि रंग जरूर है, मगर जरा मेरी तरफ देखो तो सही!
किशोरी ने जो अब समयानुकूल लज्जा के हाथों से छूट कर ढिठाई का पल्ला पकड़ चुकी थी और जो कई घण्टों की कशमकश और चाल-चलन की बदौलत बातचीत करने लायक समझी जाती थी, कुमार की तरफ देखा और फिर कहा, "देखिए और कहिए, यह किसकी सूरत है?"
इन्द्रजीतसिंह–(और भी हैरान होकर) बड़े ताज्जुब की बात है! और इस रंग छूटने से तुम्हारा चेहरा भी कुछ बदला हुआ सा मालूम पड़ता है ! अच्छा, जरा अच्छी तरह से मुंह धो डालो! किशोरी ने 'अच्छा' कह मुंह धो डाला और रूमाल से पोंछने के बाद कुमार की तरफ देख कर बोली, "बताइए, अब कैसा मालूम पड़ता है ? रंग अब छूट गया या अभी नहीं?"
इन्द्रजीतसिंह–(घबराकर) हैं ! अब तो तुम साफ कमलिनी मालूम पड़ती हो ! यह क्या मामला है?
किशोरी–-मैं कमलिनी तो नहीं हुई हूँ। क्या पहले कोई दूसरी मालूम पड़ती थी?
इन्द्रजीतसिंह–बेशक ! पहले तुम किशोरी मालूम पड़ती थीं, कम रोशनी और कुछ लज्जा के कारण यद्यपि बहुत अच्छी तरह तुम्हारी सूरत रात को देखने में नहीं आई, तथापि मौके-मौके पर कई दफे निगाह पड़ ही गई थी। अतः किशोरी के सिवाय दूसरी औरत होने का गुमान भी नहीं हो सकता था ! मगर सच तो यह है कि तुमने मुझे बड़ा धोखा दिया!
कमलिनी–(जिसे अब इसी नाम से लिखना उचित है) मैंने धोखा नहीं दिया, बल्कि आप मुझे इस बात का जवाब तो दीजिए कि अगर आपने मुझे किशोरी समझा था तो इतनी ढिठाई करने की हिम्मत कैसे पड़ी? क्योंकि किशोरी आपकी स्त्री नहीं थी! इन्द्रजीतसिंह–क्या पागलपने की-सी बातें कर रही हो ! अगर किशोरी मेरी स्त्री नही थी तो क्या तुम मेरी स्त्री थीं?
कमलिनी–अगर आपने मुझे किशोरी समझा था तो आपको मेरे पास से उठ जाना चाहिए था। जब कि आप जानते हैं कि किशोरी कुमार के साथ ब्याही गई है तो आपको उसके पास बैठने या उससे बातचीत करने का क्या हक था?
इन्द्रजीतसिंह–तो क्या मैं इन्द्रजीत नहीं हूँ ? बल्कि उचित तो यह था कि तुम मेरे पास से उठ जातीं । जब तुम कमलिनी थीं तो तुम्हें पराये मर्द के पास बैठना भी न चाहिए था।
कमलिनी–(ताज्जुब और कुछ क्रोध का चेहरा बना कर) फिर आप वही बातें कहे जाते हैं ? आप अपने को समझ ही क्या रहे हैं ? पहले आप आईने में अपनी सूरत देखिए और तब कहिए कि आप किशोरी के पति हैं या कमलिनी के ! (आले पर से आईना उठा और कुमार को दिखाकर) अन बताइये, आप कौन हैं ? और मैं क्यों आपके पास से उठ जाती?
अब तो कुमार के ताज्जुब की कोई हद न रही, क्योंकि आईने में उन्होंने अपनी सूरत में फर्क पाया । यह तो नहीं कह सकते थे कि किस आदमी की सूरत मालूम पड़ती है। क्योंकि ऐसे आदमी को कभी देखा भी न था, मगर इतना जरूर कह सकते थे कि सूरत बदल गई और अब मैं इन्द्रजीतसिंह नहीं मालूम पड़ता। इन्द्रजीत सिंह समझ गए कि किसी ने मेरे और कमलिनी के साथ चालबाजी करके दोनों का धर्म नष्ट किया और इसमें बेचारी कमलिनी का कोई कसूर नहीं है। मगर फिर भी कमलिनी को आज का सामान देख कर चौंकना चाहिए था। हां, ताज्जुब की बात यह है कि इस घर में आने के पहले मुझे किसी ने टोका भी नहीं ! तो क्या इस घर में आने के बाद मेरी सूरत बदली गई ? मगर ऐसा भी क्योंकर हो सकता है ?—इत्यादि बातें सोचते हुए कुमार कमलिनी का मुंह देखने लगे। कमलिनी ने आईना हाथ से रख दिया और पूछा, "अब बताइये, आप कौन हैं ?" इसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "अब मैं भी अपना मुंह धो डालूं तो कहूँ।"
यह कहकर कुमार ने भी जल से अपना चेहरा साफ किया और रूमाल से पोंछने के बाद कमलिनी की तरफ देखकर कहा–'अब तुम ही बताओ कि मैं कौन हूँ?"
कमलिनी–अरे, यह क्या हुआ ! तुम तो बेशक बड़े कुमार हो? मगर तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? तुम्हें जरा भी धर्म का विचार न हुआ ? बताओ, अब मैं किस लायक रह गई और क्या कर सकती हूँ ? लोगों को कैसे अपना मुँह दिखाऊँगी और इस दुनिया में क्योंकर रहूँगी?
इन्द्रजीतसिंह–जिसने ऐसा किया वह बेशक मारे जाने लायक है । मैं उसे कभी न छोडूंगा क्योंकि ऐसा होने से मेरा भी धर्म नष्ट हुआ है। और इस बदमाशी को मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता, मगर यह तो बताओ कि आज का सामान देखकर तुम्हारे दिल में किसी प्रकार का शक पैदा न हुआ?
कमलिनी–क्योंकर शक पैदा हो सकता था, जब कि आप ही की तरह मेरे लिए भी 'सोहाग रात' आज ही तय गई थी ! मैं नहीं कह सकती थी कि दूसरी तरफ का क्या हाल है ! ताज्जुब नहीं कि जिस तरह मैं धोखे में डाली गई, उसी तरह किशोरी के साथ भी बेईमानी की गई हो और आपके बदले में किशोरी मेरे पति के पास पहुंचाई गई हो!
ओ हो ! कमलिनी की इस बात ने तो कुमार की रही-सही अक्ल भी खो दी ! जिस बात का अब तक कुमार के दिल में ध्यान भी न था, उसे समझा कर तो कमलिनी ने अनर्थ कर दिया । ब्याह हो जाने पर भी किशोरी किसी दूसरे मर्द के पास भेजी जाय, क्या इस बात को कुमार बर्दाश्त कर सकते थे ? कभी नहीं ! सुनने के साथ ही मारे क्रोध के उनका शरीर काँपने लगा और वे घबरा कर कमलिनी से बोले, "यह तो तुमने ठीक कहा ! ताज्जुब नहीं कि ऐसा हुआ हो। लेकिन अगर ऐसा हुआ होगा तो मैं उन दोनों को इस दुनिया से उठा दूंगा!"
इतना कहकर कुमार ने अपनी तलवार उठा ली जो गद्दी पर पड़ी हुई थी और कमरे के बाहर जाने लगे। उस समय कमलिनी ने कुमार का हाथ पकड़ लिया और कहा, "कृपानिधान, जरा मेरी एक बात का जवाब दे दीजिये तो यहाँ से जाइये !"
इन्द्रजीतसिंह–कहो।
कमलिनी–आपका धर्म नष्ट हुआ, खैर, कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि धर्मशास्त्र में मर्दो के लिए कोई कड़ी पाबन्दी नहीं लगाई गई है, मगर औरतों को तो किसी लायक नहीं छोड़ा है। आपके लिए तो प्रायश्चित्त है, मगर मेरे लिए तो कोई प्रायश्चित्त भी नहीं जिसे करके मैं सुधार जाऊँगी, इतना जानकर भी मेरा धर्म नष्ट होने पर आपको उतना रंज या क्रोध नहीं हुआ, जितना यह सोच कर हुआ कि किशोरी की भी ऐसी ही दशा हुई होगी ! ऐसा क्यों? क्या मेरा पति कमजोर और नामर्द है ? क्या वह भी आपकी ही तरह क्रोध में न आया होगा? क्या इसी तरह वह भी तलवार लेकर मेरी और आपकी खोज में न निकला होगा? आप जल्दी क्यों करते हैं, वह खुद यहाँ आता होगा क्योंकि वह आपसे ज्यादा क्रोधी है, मैं तो खुद उसके सामने अपनी गर्दन झुका दूंगी!
कुमार को क्रोध-पर-क्रोध, रंज-पर-रंज और अफसोस-पर-अफसोस होता ही जाता था। कमलिनी की इस आखिरी बात ने कुमार के दिल में दूसरा ही रंग पैदा कर दिया। उन्होंने घबरा कर एक लम्बी सांस ली और ऊपर की तरफ मुंह करके कहा, "विधाता ! टूने यह क्या किया? मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके बदले में इस खुशी को ऐसे रंज के साथ तूने बदल दिया ! अब मैं क्या करूँ ? क्या अपने हाथ से अपना गला काटकर निश्चिन्त हो जाऊँ ? मुझ पर आत्मघात का दोष तो नहीं लगाया जायगा!"
इन्द्रजीतसिंह ने इतना ही कहा था कि कमरे का वह दरवाजा, जिसे कुमार बन्द समझते थे, खुला और किशोरी तथा कमला अन्दर आती हुई दिखाई पड़ी। कुमार ने समझा कि बेशक किशोरी इसी ढंग का उलाहना लेकर आई होगी, मगर उन दोनों के चेहरों पर हँसी देख कर कुमार को ताज्जुब हुआ और यह देख कर उनका ताज्जुब और भी बढ़ गया कि किशोरी और कमला को देख कर कमलिनी खिलखिला कर हँस पड़ी और किशोरी से बोली- "लो बहिन, आज मैंने तुम्हारे पति को अपना बना लिया !" इसके जवाब में किशोरी बोली, "तुमने पहले ही अपना बना लिया था, आज की बात ही क्या है!"
चन्द्रकान्ता सन्तति
तेईसवाँ भाग
1
सोहागरात के दिन कुंअर इन्द्रजीतसिंह जैसे तरवुद और फेर में पड़ गये थे, ठीक वैसा तो नहीं मगर करीब उसी ढंग का बखेड़ा कुंअर आनन्दसिंह के साथ भी मचा, अर्थात् उसी दिन रात के समय जब आनन्दसिंह और कामिनी का एक कमरे में मेल हुआ तो आनन्दसिंह छेड़छाड़ करके कामिनी की शर्म को तोड़ने और कुछ बातचीत करने के लिए उद्योग करने लगे मगर लज्जा और संकोच के बोझ से कामिनी हर तरह दबी जाती थी। आखिर थोड़ी देर की मेहनत, चालाकी तथा बुद्धिमानी की बदौलत आनन्द- सिंह ने अपना मतलब निकाल ही लिया और कामिनी भी, जो बहुत दिनों से दिल के खजाने में आनन्दसिंह की मुहब्बत को हिफाजत के साथ छिपाये हुए थी, लज्जा और डर को बिदाई का बीड़ा दे कुमार से बातचीत करने लगी।
जब रात लगभग दो घण्टे के बाकी रह गई तो कामिनी जाग पड़ी और घबराहट के साथ चारों तरफ देख के सोचने लगी कि कहीं सवेरा तो नहीं हो गया क्यों कि कमरे के सभी दरवाजे बन्द रहने के कारण आसमान दिखाई नहीं देता था। उस समय आनन्दसिंह गहरी नींद में सो रहे थे और उनके खर्राटों की आवाज से मालूम होता था कि वे अभी दो-तीन घंटे तक बिना जगाये नहीं जाग सकते अतः कामिनी अपनी जगह से उठी और कमरे की कई छोटी-छोटी खिड़कियों (छोटे दरवाजों) में से, जो मकान के पिछली तरफ पड़ती थीं, एक खिड़की खोलकर आसमान की तरफ देखने लगी। इस तरफ से पतित-पावनी भगवती जाह्नवी की तरल तरंगों की सुन्दर छटा दिखाई देती थी जो उदास उदास और बुझे दिल को एक दफे प्रसन्न करने की सामर्थ्य रखती थी, परन्तु इस समय अंधकार के कारण कामिनी उस छटा को नहीं देख सकती थी और इस सबब से आसमान की तरफ देखकर भी वह इस बात का पता न लगा सकी कि अब रात कितनी बाकी है, मगर सवेरा होने में अभी देर है इतना जान कर उसके दिल को कुछ भरोसा हुआ। उसी समय सरकारी पहरे वाले ने घंटा बजाया जिसे सुनकर कामिनी ने निश्चय कर लिया कि रात अभी दो घंटे से कम बाकी नहीं है। उसने उसी तरफ की एक और खिड़की खोल दी और तब यह उस जगह चली गई जहाँ चौकी के ऊपर गंगा जमुनी लोटे में जल रक्खा हुआ था। उसी चौकी पर से एक रूमाल उठा लिया और उसे गीला करके अपना मुंह अच्छी तरह पोंछने अथवा धोने के बाद रूमाल खिड़की के बाहर फेंक दिया । और तब उस जगह चली आई जहाँ आनन्दसिंह गहरी नींद में सो रहे थे।
कामिनी ने आँचल के कपड़े से एक मामूली बत्ती बनाई और नाक में डाल कर उसके जरिये से दो-तीन छींके मारी, जिनकी आवाज से आनन्दसिंह की आँख खुल गई और उन्होंने अपने पास कामिनी को बैठे हुए देखकर ताज्जुब से कहा, "हैं, तुम बैठी क्यों हो ? खैरियत तो है!"
कामिनी–जी हाँ, मेरी तबीयत तो अच्छी है मगर तरबुद और सोच के मारे नींद नहीं आ रही है । बहुत देर से जाग रही हूँ।
आनन्दसिंह–(उठकर) इस समय भला कौन से तरढुद और सोच ने तुम्हें आ घेरा?
कामिनी–क्या कहूँ, कहते हुए भी शर्म मालूम पड़ती है?
अनान्दसिंह–आखिर कुछ कहो तो सही, शर्म कहाँ तक करोगी?
कामिनी–खैर मैं कहती हूँ, मगर आप बुरा तो न मानेंगे?
आनन्दसिंह–मैं कुछ भी बुरा न मानूंगा, तुम्हें जो कुछ कहना है कहो।
कामिनी-–बात केवल इतनी ही है कि मैं छोटे कुमार से एक दिल्लगी कर बैठी हूँ मगर आज उस दिल्लगी का भेद जरूर खुल गया होगा, इसलिए सोच रही हूँ कि अब क्या करूं? इस समय कामिनी बहिन से भी मुलाकात नहीं हो सकती, जो उनको कुछ समझा-बुझा देती।
आनन्दसिंह–(ताज्जुब में आकर) तुमने कोई भयानक सपना तो नहीं देखा जिसका असर अभी तक तुम्हारे दिमाग में घुसा हुआ है ? यह मामला क्या है ? तुम कैसी बातें कर रही हो!
कामिनी–नहीं-नहीं, कोई विशेष बात नहीं है और मैंने कोई भयानक सपना भी नहीं देखा, बात केवल इतनी ही है कि मैं हँसी-हँसी में छोटे कुमार से कह चुकी हूँ कि 'मेरी शादी अभी तक नहीं हुई है और मैं प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि ब्याह कदापि न करूँगी।' अब आज ताज्जुब नहीं कि कामिनी बहिन ने मेरा सच्चा भेद खोल दिया हो और कह दिया हो कि 'लाड़िली की शादी तो कमलिनी की शादी के साथ-ही-साथ अर्थात् दोनों की एक ही दिन हो चुकी है और आज उसकी भी सोहागरात है।' अगर ऐसा हुआ तो मुझे बड़ी शर्म…
आनन्दसिंह–(ताज्जुब और घबराहट से) तुम तो पागलों की सी बातें कर रही हो । आखिर तुमने अपने को और मुझको समझा ही क्या है ? जरा पूंघट हटा कर बातें करो । तुम्हारा मुँह तो दिखाई ही नहीं देता!
कामिनी–नहीं, मुझे इसी तरह बैठे रहने दीजिए । मगर आपने क्या कहा सो मैं कुछ भी नहीं समझी, इसमें पागलपने की भला कौन सी बात है?
आनन्दसिंह–तुमने जरूर कोई सपना देखा है जिसका असर अभी तक तुम्हारे दिमाग में बसा हुआ है और तुम अपने को लाड़िली समझ रही हो, ताज्जुब नहीं कि लाड़िली ने तुमसे वे बातें कही हों जो उसने मुझसे दिल्लगी के ढंग पर की थीं।
कामिनी-मुझे आपकी बातों पर ताज्जुब मालूम पड़ता है । मैं समझती हूँ कि आप ही ने कोई अनूठा स्वप्न देखा है और शायद यह भी देखा है कि कामिनी आपके बगल में पड़ी हुई है जिसका खयाल अभी तक बना हुआ है और मुझे आप कामिनी समझ रहे हैं । भला सोचिए तो सही कि छोटे कुमार (आनन्दसिंह) को छोड़कर कामिनी आपके पास आने ही क्यों लगी ? कहीं आप मुझसे दिल्लगी तो नहीं कर रहे हैं?
कामिनी की आखिरी बात को सुनकर आनन्दसिंह बहुते बेचैन हो गये और उन्होंने घबरा कर कामिनी के मुंह से घूघट हटा दिया, मगर शमादान की रोशनी में उसका खूबसूरत चेहरा देखते ही वे चौंक पड़े और बोले-"हैं ! यह मामला क्या है ? लाड़िली को मेरे पास आने की क्या जरूरत थी ? बेशक तुम लाड़िली मालूम पड़ती हो ? कहीं तुमने अपना चेहरा रंगा तो नहीं है?"
कामिनी-(घबराहट के ढंग पर) आपकी बातें तो मेरे दिल में हौल पैदा करती हैं ! न मालूम आप क्या कह रहे हैं और इस बात को क्यों नहीं सोचते कि कामिनी को आपके पास आने की जरूरत ही क्या थी!
आनन्दसिंह–(बेचैनी के साथ) पहले तुम अपना चेहरा धो डालो तो मैं तुमसे बातें करूँ ! तुम मुझे जरूर धोखा दे रही हो और अपनी सूरत लाड़िली की सी बनाकर मेरी जान को सांसत में डाल रही हो ! मैं अभी तक तुम्हें कामिनी समझ रहा था और समझता हूँ।
कामिनी–(ताज्जुब से आनन्दसिंह की सूरत देखकर) आपकी बातें तो कुछ विचित्र ढंग की हो रही हैं। जब आप मुझे कामिनी समझते हैं तो अपने को भी जरूर आनन्दसिंह समझते होंगे?
आनन्दसिंह–इसमें शक ही क्या है ? क्या मैं आनन्दसिंह नहीं हूँ?
कामिनी–(अफसोस से हाथ मलकर) हे परमेश्वर ! आज इनको क्या हो गया है!
आनन्द–बस, अब तुम अपना चेहरा धो डालो तब मुझसे बातें करो, तुम नहीं जानतीं कि इस समय मेरे दिल की कैसी अवस्था है! कामिनी–ठहरिये-ठहरिये, मैं बाहर जाकर सभी को इस बात की खबर कर देती हूँ कि आपको कुछ हो गया है । मुझे आपके पास बैठते डर लगता है ! हे परमेश्वर !
आनन्दसिंह–तुम नाहक मेरी जान को दुःख दे रही हो ! पास ही तो पानी पड़ा है, अपना चेहरा क्यों नहीं धो डालतीं? मुझे ऐसी दिल्लगी अच्छी नहीं मालूम होती, खैर, अब बहुत हो गया, तुम उठो!
कामिनी—मेरे चेहरे में क्या लगा है जो धो डालूं? आप ही क्यों नहीं अपना चेहरा धो डालते ! क्या मुंह में पानी लगाकर मैं लाड़िली से कोई दूसरी ही औरत बन जाऊँगी ? या आप मुंह धोकर छोटे कुमार बन जायेंगे ?
आनन्द–(बेचैनी से बिगड़कर) बस-बस, अब मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता और न ज्यादे देर तक ऐसी दिल्लगी सह सकता हूँ। मेरा हुक्म है कि तुम तुरत अपना चेहरा धो डालो, नहीं तो तुम्हारे साथ जबर्दस्ती की जायगी, फिर पीछे दोष न देना!
यह सुनते ही कामिनी घबड़ाकर उठ खड़ी हुई और यह कहती हुई कि 'आज भोर-ही-भोर ऐसी दुर्दशा में फंसी हूँ, न मालूम दिन कैसा बीतेगा, उस चौकी के पास चली गई जिस पर जल से भरा गंगाजमनी लोटा हुआ रक्खा था और पास ही में एक बड़ा सा आफताबा भी था। पानी से अपना चेहरा साफ किया और दो-चार कुल्ला भी करने के बाद रूमाल से मुंह पोंछ आनन्दसिंह से बोली, “कहिये, मैं वही हूँ कि बदल गई?"
कामिनी के साथ-ही-साथ आनन्दसिंह भी बिछावन पर से उठकर वहाँ तक चले आये थे जहाँ पानी और आफताबा रक्खा हुआ था। जब कामिनी ने मुंह धोकर उनकी तरफ देखा तो कुमार के ताज्जुब की कोई हद न रही और वह पत्थर की मूरत बनकर एकटक उसकी तरफ देखते खड़े रह गये । इस समय खिड़कियों में से आसमान पर सुबह की सुफेदी फैली हुई दिखाई दे रही थी और कमरे में भी रोशनी की कमी न थी।
कामिनी–(कुछ चिढ़ी हुई आवाज से) कहिये-कहिये, क्या मैं मुंह धोने से कुछ बदल गई ? आप बोलते क्यों नहीं?
आनन्दसिंह–(एक लम्बी साँस लेकर) अफसोस ! तुम्हारे पूंघट ने मुझे धोखा दिया । अगर मिलाप के पहले तुम्हारी सूरत देख लेता तो धर्म नष्ट क्यों होता!
कामिनी–(जिसे अब हम लाडिली लिखेंगे, क्योंकि यह वास्तव में लाड़िली ही है) फिर भी आप उसी ढंग की बातें कर रहे हैं और अभी तक अपने को छोटे कुमार समझते हैं । इतना हिलने-डोलने पर भी आपके दिमाग से स्वप्न का गुवार न निकला। (कमरे में लटकते हुए एक बड़े आईने की तरफ उँगली से इशारा करके) अब आप उसमें अपना चेहरा देख लीजिये तो मुझसे बातें कीजिये!
कुंअर आनन्दसिंह भी यही चाहते थे, अतः वे उस आईने के सामने चले गये और बड़े गौर से अपनी सूरत देखने लगे । लाडिली भी उनके साथ-ही-साथ उस आईने के पास चली गई और जब वे ताज्जुब के साथ आईने में अपना चेहरा देख रहे थे तो बोली, “कहिये, अब भी आप अपने को छोटे कुमार ही समझते हैं या और कोई?"
क्रोध के साथ-ही-साथ शामिन्दगी ने भी आनन्दसिंह पर अपना कब्जा कर लिया और वे घबड़ा कर अपनी पोशाक पर ध्यान देने लगे, मगर उसमें किसी तरह की खराबी न पाकर उन्होंने पुनः लाडिली की तरफ देखा और कहा, "यह क्या मामला है ? मेरी सूरत किसने बदली?"
लाड़िली–(ताज्जुब और घबराहट के ढंग पर) क्या आप अपनी सूरत बदली हुई समझते हैं?
आनन्दसिंह–बेशक!
लाड़िली–(अफसोस के साथ हाथ मलकर) अफसोस ! अगर यह बात ठीक है तो बड़ा ही गजब हुआ!
आनन्दसिंह–जरूर ऐसा ही है, मैं अभी अपना चेहरा धोता हूँ।
इतना कहकर कुंअर आनन्दसिंह उस चौकी के पास चले गये जिस पर पानी रक्खा हुआ था और अपना चेहरा धोने लगे। पानी पड़ते ही हाथ पर रंग उतर आया जिस पर निगाह पड़ते ही लाड़िली चौंकी और रंज के साथ बोली, "बेशक चेहरा रंगा हुआ है! हाय बड़ा ही गजब हो गया! मैं बेमौत मारी गई! मेरा धर्म नष्ट हुआ! अब मैं अपने पति के सामने किस मुँह से जाऊँगी और अपनी हमजोलियों की बातों का क्या जवाब दूँगी! औरतों के लिए यह बड़े ही शर्म की बात है, नहीं-नहीं, बल्कि औरतों के लिए यह घोर पातक है कि पराये मर्द का संग करें। सच तो यह है कि पराये मर्द का शरीर छू जाने से भी प्रायश्चित्त लगता है, और बात का तो कहना ही क्या है! हाय, मैं बर्बाद हो गई और कहीं की भी न रही। इसमें कोई शक नहीं कि आपने जानबूझकर मुझे मिट्टी में मिला दिया!
आनन्दसिंह––(अच्छी तरह चेहरा धोने के बाद रूमाल से मुँह पोंछकर) क्या कहा? क्या जानबूझकर मैंने तुम्हारा धर्म नष्ट किया?
लाड़िली––वेशक ऐसा ही है, मैं इस बात की दुहाई दूँगी और लोगों से इन्साफ चाहूँगी।
आनन्दसिंह––क्या मेरा धर्म नष्ट नहीं हुआ?
लाड़िली––मर्दो के धर्म का क्या कहना है और उसका बिगड़ना ही क्या, जो दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह ब्याह से भी ज्यादा कर सकते हैं! बर्बादी तो औरतों के लिए है। इसमें कोई शक नहीं कि आपने जान-बूझकर मेरा धर्म नष्ट किया। जब आप छोटे कुमार ही थे तो आपको मेरे पास से उठ जाना चाहिए था या मेरे पास बैठना ही मुनासिब न था।
आनन्दसिंह––मैं कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैंने तुम्हारी सूरत घूँघट के सबब से अच्छी तरह नहीं देखी, एक दफे ऐंचातानी में निगाह पड़ भी गयी थी तो तुम्हें कामिनी ही समझा था, और इसके लिए भी मैं कसम खाता हूँ कि मैंने तुम्हें धोखा देने के लिए जान-बूझकर अपनी सूरत नहीं रंगी है बल्कि मुझे इस बात की खबर भी नहीं कि मेरी सूरत किसने रंगी या क्या हुआ।
लाड़िली––अगर आपका यह कहना ठीक है तो समझ लीजिये कि और भी गजब हो गया! मेरे साथ-ही-साथ कामिनी भी बर्बाद हो गई होगी। जिस धर्मात्मा ने धोखा देकर रा संग आपके साथ करा दिया है, उसने कामिनी को भी, जो आपके साथ ब्याही गई है, जरूर धोखा देकर मेरे पति के पलंग पर सुला दिया होगा!
यह एक ऐसी बात थी जिसे सुनते ही आनन्दसिंह का रंग बदल गया। रंज और अफसोस की जगह क्रोध ने अपना दखल जमा लिया और कुछ सुस्त तथा ठंडी रगों में बेमौके हरारत पैदा हो गई जिससे बदन काँपने लगा और उन्होंने लाल आँखें करके लाड़िली की तरफ देख के कहा––क्या कहा? तुम्हारे पति के पलंग पर कामिनी! यह किसकी मजाल है कि···
लाडिली––ठहरिये-ठहरिये, आप गुस्से में न आ जाइये। जिस तरह आप अपनी और कमलिनी की इज्जत समझते हैं, उसी तरह मेरी और मेरे पति की इज्जत पर भी आपको ध्यान देना चाहिए। मेरी बर्बादी पर तो आपको गुस्सा न आया और कमलिनी का भी मेरा ही सा हाल सुनकर आप जोश में आकर उछल पड़े, अपने आपे से बाहर हो गये और आपको बदला लेने की धुन सवार हो गई! सच है, दुनिया में किसी बिरले ही महात्मा को हमदर्दी और इन्साफ का ध्यान रहता है, दूसरे पर जो कुछ बीती है उसका अन्दाजा किसी को तब तक नहीं लग सकता, जब तक उस पर भी वैसी ही न बीते। जिसने कभी एक उपवास भी नहीं किया है, वह अकाल के मारे भूखे गरीबों पर उचित और सच्ची हमदर्दी नहीं कर सकता, यों उनके उपकार के लिए भले ही बहुत-कुछ जोश दिखाये और कुछ कर भी बैठे। ताज्जुब नहीं कि हमारे बुजुर्ग और बड़े लोग इसी खयाल से बहुत से व्रत चला गये और इससे उनका मतलब यह भी हो कि स्वयं भूखे रहकर देख लो, तब भूखों की कदर कर सकोगे। दूसरे के गले पर छुरी चला देना कोई बड़ी बात नहीं है, मगर अपने गले पर सुई से भी निशान नहीं किया जाता। जो दूसरों की बहू-बेटियों को झाँका करते हैं, वे अपनी बहू-बेटियों का झाँका जाना सहन नहीं कर सकते। बस, इसी से समझ लीजिये कि मेरी बर्बादी पर आपको अगर कुछ खयाल हुआ तो केवल इतना ही कि बस, कसम खाकर अफसोस करने लगे और सोचने लगे कि मेरे दिल से किसी तरह इस बात का रंज निकल जाय, मगर कामिनी का भी मेरे ही ऐसा हाल सुनकर म्यान के बाहर हो गये! क्या यही इन्साफ है और यही हमदर्दी है! इसी दिल को लेकर आप राजा बनेंगे और राज-काज करेंगे!
लाड़िली की जोश-भरी बातें सुनकर आनन्दसिंह सहम गये और शर्म ने उनकी गर्दन झुका दी। वह सोचने लगे कि क्या करूँ और इसकी बातों का क्या जवाब दूँ! इसी समय कमरे का दरवाजा खुला (जो शायद धोखे में खुला रह गया होगा) और इन्द्रदेव की लड़की इन्दिरा को साथ लिए हुए कामिनी आती दिखाई पड़ी।
लाड़िली––लीजिये, कामिनी बहिन भी आ पहुँचीं! कुछ ताज्जुब नहीं कि ये भी अपना हाल कहने के लिए आई हों। (कामिनी से) लो बहिन, आज हम तुम्हारे बराबर हो गये!
कामिनी––बराबर नहीं, बल्कि बढ़ के!
JIM – Assistente
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