चन्द्रकान्ता सन्तति 6
भैरोंसिंह — हाँ, अभी थोड़ी ही देर हुई है कि वे लोग उसी पहाड़ी की तरफ रवाना हो गए।
चपला-(चम्पा से) तो अब तुम्हें भी तैयार हो जाना पड़ेगा।
चम्पा-जरूर, मगर तुम भी क्यों नहीं चलती ?
चपला- जी तो मेरा यही चाहता है मगर मामा साहब की आज्ञा हो तब तो !
चम्पा -जहाँ तक मैं खयाल करती हूँ, वे कभी इनकार न करेंगे।बहिन, जब से मुझे यह मालूम हुआ कि इन्द्रदेव तुम्हारे मामा होते हैं तब से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
चपला–मगर मेरी खुशी का तुम अन्दाजा नहीं कर सकती, खैर, इस समय असल काम की तरफ ध्यान देना चाहिए। (भैरोंसिंह और तारासिंह की तरफ देखकर) कहो, तुम लोग इस समय यहाँ कैसे आये ?तारासिंह-(चपला के हाथ में एक पुर्जा देकर) जो कुछ है, इसी से मालूम हो जायगा।
चपला ने तारासिंह के हाथ से पुर्जा लेकर पढ़ा और फिर चम्पा के हाथ में देकर कहा, "अच्छा, जाओ कह दो कि हम लोगों के लिए किसी तरह का तर दुद न करें, मैं अभी जाकर कमलिनी और लक्ष्मीदेवी से मुलाकात करके सब वातें तय कर लेती हूँ।" "बहुत अच्छा" कहकर भैरोंसिंह और तारासिंह वहाँ से रवाना हुए और इन्द्रदेव डरे की तरफ चले गये ।
जिस समय महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैहर तिलिस्मी कैफियत देखने के लिए रवाना हुए हैं उसके दो या तीन घड़ी बाद घोड़े पर सवार इन्द्रदेव भी अपने चेहरे पर नकाब डाले उसी पहाड़ी की तरफ रवाना हुए मगर वे अकेले न थे, बल्कि और भी तीन नकाबपोश उनके साथ थे। जब ये चारों आदमी उस पहाड़ी के पास पहुंच गए तो कुछ देर के लिए रुके और आपस में यों बातचीत करने लगे-
इन्द्रदेव-ताज्जुब है कि अभी तक हमारे आदमी लोग यहां नहीं पहुंचे। दूसरा-और जब तक वे लोग न आवेंगे तब तक हमें यहाँ अटकना पड़ेगा।
इन्द्रदेव-बेशक !
तीसरा-व्यर्थ यहाँ अटके रहना तो अच्छा न होगा।
इन्द्रदेव-तब क्या किया जाय?
तीसरा-आप लोग जल्दी से वहाँ पहुँचकर अपना काम कीजिये और मुझे अकेले इसी जगह छोड़ दीजिए, मैं आपके आदमियों का इन्तजार करूँगा और जब वे आ जायेंगे तो सब चीजें लिए आपके पास पहुँच जाऊँगा ।
इन्द्रदेव-अच्छी बात है, मगर उन सब चीजों को क्या तुम अकेले उठा लोगे?
तीसरा-उन सब चीजों की क्या हकीकत है, कहिए तो आपके आदमियों को भी उन चीजों के साथ पीठ पर लाद कर लेता आऊँ ।
इन्द्रदेव-शाबाश ! अच्छा रास्ता तो न भूलोगे ?
तीसरा-कदापि नहीं, अगर मेरी आँखों पर पट्टी बाँध कर भी आप वहाँ तक ले गये होते तब भी मैं रास्ता न भूलता और टटोलता हुआ वहाँ तक पहुंच ही जाता ।
इन्द्रदेव-(हँस कर) बेशक तुम्हारी चालाकी के आगे यह कोई कठिन काम नहीं है । अच्छा हम लोग जाते हैं, तुम सब चीजें लेकर हमारे आदमियों को फौरन वापस कर देना।
इतना कह कर इन्द्रदेव ने उस तीसरे नकाबपोश को उसी जगह छोड़ा और दो नकाबपोशों को साथ लिए हुए आगे की तरफ बढ़े।
जिस सुरंग की राह से राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह उस तिलिस्मी बँगले में गये थे उससे लगभग आध कोस उत्तर को हटकर और भी एक सुरंग का छोटा सा मुहाना था जिसका बाहरी हिस्सा जंगली लताओं और बेलों से बहुत ही छिपा हुआ था। इन्द्रदेव दोनों नकाबपोशों को साथ लिए तथा पेड़ों की आड़ देकर चलते हुए इसी दूसरी सुरंग के मुहाने पर पहुंचे और जंगली लताओं को हटा कर बड़ी होशियारी से इस सुरंग के अन्दर घुस गये।
9
देवीसिंह को चम्पा की सचाई पर भरोसा था और वह उसे बहुत ही नेक तथा पतिव्रता भी समझते थे, जिस पर चम्पा ने देवीसिंह के चरणों की कसम खाकर विश्वास दिला दिया था कि वह नकाबपोशों के घर में नहीं गई और कोई सबब न था कि देवीसिंह चम्पा की बात झूठ समझते । इस जगह यद्यपि देवीसिंह पुनः चम्पा को देखकर क्रोध में आ गये थे, मगर तुरन्त ही नीचे लिखी बातें विचार कर ठण्डे हो गये और सोचने लगे-
"क्या मुझे पहचानने में धोखा हुआ ? नहीं-नहीं, मेरी आँखें ऐसी गन्दी नहीं है । तो क्या वास्तव में वह चम्पा ही थी जिसे अभी मैंने देखा या पहले भी देखा था !
9
देवीसिंह को चम्पा की सचाई पर भरोसा था और वह उसे बहुत ही नेक तथा पतिव्रता भी समझते थे, जिस पर चम्पा ने देवीसिंह के चरणों की कसम खाकर विश्वास दिला दिया था कि वह नकाबपोशों के घर में नहीं गई और कोई सबब न था कि देवीसिंह चम्पा की बात झूठ समझते । इस जगह यद्यपि देवीसिंह पुनः चम्पा को देखकर क्रोध में आ गये थे, मगर तुरन्त ही नीचे लिखी बातें विचार कर ठण्डे हो गये और सोचने लगे-
"क्या मुझे पहचानने में धोखा हुआ ? नहीं-नहीं, मेरी आँखें ऐसी गन्दी नहीं है । तो क्या वास्तव में वह चम्पा ही थी जिसे अभी मैंने देखा या पहले भी देखा था ! यह भी नहीं हो सकता ! चम्पा जैसी नेक औरत कसम खाकर मुझसे झूठ भी नहीं बोल सकती। हाँ, उसने क्या कसम खाई थी? यही कि "मैं आपके चरणों की कसम खाकर कहती हूँ कि मुझे कुछ भी याद नहीं कि आप कव की बात कर रहे हैं।" ये ही उसके शब्द हैं, मगर यह कसम तो ठीक नहीं। यहां आने के बारे में उसने कसम नहीं खाई बल्कि अपनी याद के बारे में कसम खाई है, जिसे ठीक नहीं भी कह सकते । तो क्या उसने वास्तव में मुझे भूलभुलैये में डाल रक्खा हैं ? खैर यदि ऐसा भी हो तो मुझे रंज न होना चाहिए क्योंकि वह नेक है । यदि ऐसा किया भी होगा तो किसी अच्छे ही मतलब से किया होगा या फिर कुमारों की आज्ञा से किया होगा।'
ऐसी बातों को सोचकर देवीसिंह ने अपने क्रोध को ठण्डा किया, मगर भूतनाथ की बेचैनी दूर नहीं हुई।
वे दोनों औरतें जब आलमारी के अन्दर घुसकर गायब हो गई तब हमारे दोनों कुमार तथा महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह ने भी उसके अन्दर पैर रक्खा । दरवाजे के साथ दाहिनी तरफ एक तहखाने के अन्दर जाने का रास्ता था जिसके बारे में दरियाफ्त करने पर इन्द्रजीतसिंह ने बयान किया कि “यह जमानिया जाने का रास्ता है, तहखाने में उतर जाने के बाद एक सुरंग मिलेगी जो बराबर जमानिया तक चली गई है।" इन्द्रजीतसिंह की बात सुनकर देवीसिंह और भूतनाथ को विश्वास हो गया कि दोनों औरतें इसी तहखाने में उतर गई हैं जिससे उन्हें भागने के लिए काफी जगह मिल सकती है । भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखकर इशारे से कहा कि "इस तहखाने में चलना चाहिए।" मगर जवाब में देवीसिंह ने इशारे से ही इनकार करके अपनी लापरवाही जाहिर कर दी।
उस दीवार के अन्दर इतनी जगह न थी कि सब कोई एक साथ ही जाकर वहाँ की कैफियत देख सकते, अतएव दो-तीन दफे करके सब कोई उसके अन्दर गये और उन सब पुरजों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए जिनके सहारे वे तस्वीरें चलती-फिरती और काम करती थीं । जब सब लोग उस कैफियत को देख चुके तब उस दीवार का दरवाजा बंद कर दिया गय।।
इस काम से छुट्टी पाकर सब लोग इन्द्रजीत सिंह की इच्छानुसार उस चबूतरे के पास आए जिस पर सुफेद पत्थर की खूबसूरत पुतली बैठी हुई थी। इन्द्रजीतसिंह ने सुरेन्द्र सिंह की तरफ देखकर कहा, "यदि आज्ञा हो तो मैं इस दरवाजे को खोलूं और आपको तिलिस्म के अन्दर ले चलू ।"
सुरेन्द्र सिंह–हम भी यही चाहते हैं कि अब तिलिस्म के अन्दर चलकर वहाँ की कैफियत देखें, मगर यह तो बताओ कि जब इस चबूतरे के अन्दर जाने के बाद हम यह तिलिस्म देखते हुए चुनारगढ़ वाले तिलिस्म की तरफ रवाना होंगे, तो वहां पहुंचने में कितनी देर लगेगी?
इन्द्रजीतसिंह–कम-से-कम बारह घण्टे । तमाशा देखने के सबब से यदि इससे ज्यादा देर हो जाय तो भी कोई ताज्जब नहीं।
सुरेन्द्र सिंह–रात हो जाने के सबब किसी तरह का हर्ज तो न होगा? इन्द्रजीतसिंह-कुछ भी नहीं ! रात-भर बराबर तमाशा देखते हुए हम लोग चले जा सकते हैं।
सुरेन्द्र सिंह-खैर, तब तो कोई हर्ज नहीं।
इन्द्रजीतसिंह ने पुतली वाले चबूतरे का दरवाजा उसी ढंग से खोला जैसे पहले खोल चुके थे और सभी को लिए हुए नीचे वाले तहखाने में पहुंचे, जिसमें बड़े-बड़े हण्डे अफियों और जवाहरात से भरे हुए रखे थे।
इस कमरे में दो दरवाजे भी थे जिनमें से एक तो खुला हुआ था और दूसरा बन्द । खुले हुए दरवाजे के बारे में दरियाफ्त करने पर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने बयान किया कि यह रास्ता जमानिया को गया है और हम दोनों भाई तिलिस्म तोड़ते हुए इसी राह से आये हैं। यहाँ से बहुत दूर पर एक स्थान है जिसका नाम तिलिस्मी किताब में 'ब्रह्म-मण्डल' लिखा हुआ है, उस जगह से भी मुझे एक छोटी-सी किताब मिली थी जिसमें इस विचित्र बँगले का पूरा हाल लिखा हुआ था कि तिलिस्म (चुनारगढ़ वाला) तोड़ने वाले के लिए क्या-क्या जरूरी है । उस किताब को चुनारगढ़ तिलिस्म की चाबी कहें तो अनुचित न होगा। वह किताब इस समय मौजूद नहीं है क्योंकि पढ़ने के बाद वह तिलिस्म तोड़ने के काम में खर्च कर दी गई। उस स्थान (ब्रह्म-मण्डल) में बहुत-सी तस्वीरें देखने योग्य हैं और वहां की सैर करके भी आप बहुत प्रसन्न होंगे।"
सुरेन्द्र सिंह-हम जरूर उस स्थान को देखेंगे, मगर अभी नहीं । हाँ, और यह दूसरा दरवाजा जो बन्द है, कहाँ जाने के लिए है ?
इन्द्रजीतसिंह–यही चुनारगढ़ वाले तिलिस्म में जाने का रास्ता है । इस समय यही दरवाजा खोला जायगा और हम लोग इसी राह से जायंगे।
सुरेन्द्रसिंह-खैर, तो अब इसे खोलना चाहिए ।
पाठक, आपको इस सन्तति के पढ़ने से मालूम होता ही होगा कि अब यह उपन्यास समाप्ति की तरफ चला जा रहा है। हमारे लिखने के लिए अब सिर्फ दो बातें रह गई हैं, एक तो इस चुनारनगढ़ वाले तिलिस्म की कैफियत और दूसरे दुष्ट कैदियों का मुकदमा, जिसके साथ बचे-बचाये भेद भी खुल जायेंगे । हमारे पाठकों में से बहुत से ऐसे हैं जिनकी रुचि अब तिलिस्मी तमाशे की तरफ कम झुकती है परन्तु उन पाठकों की संख्या बहुत ज्यादा है जो तिलिस्म के तमाशे को पसन्द करते हैं और उसकी अवस्था विस्तार के साथ दिखाने अथवा लिखने के लिए बराबर जोर दे रहे हैं। इस उपन्यास में जो कुछ तिलिस्मी बातें लिखी गई हैं यद्यपि वे असम्भव नहीं और विज्ञान-वेत्ता अथवा साइंस जानने वाले जरूर कहेंगे कि 'हाँ ऐसी चीजें तैयार हो सकती हैं।' तथापि बहुत से अनजान आदमी ऐसे भी हैं जो इसे बिल्कुल खेल ही समझते हैं और कई इसकी देखा-देखी अपनी लिखी अनूठी किताबों में असम्भव बातें लिखकर तिलिस्म के नाम को बदनाम भी करने लग गये हैं, इसलिए हमारा ध्यान अब तिलिस्म लिखने की तरफ नहीं झुकता मगर क्या किया जाय लाचारी है, एक तो पाठकों की रुचि की तरफ ध्यान देना पड़ता है दूसरे चुनारगढ़ के चबूतरे वाले तिलिस्म की कैफियत लिखे बिना भीकाम नहीं चलता जिसे इस उपन्यास की बुनियाद ही कहना चाहिए और जिसके लिए चन्द्रकान्ता उपन्यास में वादा कर चुके हैं। अतः इस जगह चुनारगढ़ के चबूतरे वाले तिलिस्म की कैफियत लिखकर इस पक्ष को पूरा करते हैं, तब उसके बाद दोनों कुमारों की शादी और कैदियों के मामले की तरफ ध्यान देकर इस उपन्यास को पूरा करेंगे।
महाराज की आज्ञानुसार इन्द्रजीतसिंह दरवाजा खोलने के लिए तैयार हो गये । इस दरवाजे के ऊपर वाले महराब में किसी धातु के तीन मोर बने हुए थे जो हरदम हिला ही करते थे। कुमार ने उन तीनों मोरों की गर्दन घुमाकर एक में मिला दी, उसी समय दरवाजा भी खुल गया और कुमार ने सभी को अन्दर जाने के लिए कहा। जब सब उसके अन्दर चले गये, तब कुमार ने भी उन मोरों को छोड़ दिया और दरवाजे के अन्दर जाकर महाराज से कहा, "यह दरवाजा इसी ढंग से खुलता है, मगर इसके बन्द करने की कोई तरकीब नहीं है, थोड़ी देर में आप से आप बन्द हो जायगा। देखिए,तरफ भी दरवाजे के ऊपर वाले महराब में उसी तरह के मोर बने हुए हैं अतएव इधर से भी दरवाजा खोलने के समय वही तरकीब करनी होगी।"
दरवाजे के अन्दर जाने के बाद तिलिस्मी खंजर से रोशनी करने की जरूरत न रही क्योंकि यहाँ की छत में कई सूराख ऐसे बने हुए थे जिनमें से रोशनी बखूबी आ रही थी और आगे की तरफ निगाह दौड़ाने से यह भी मालूम होता था कि थोड़ी दूर जाने के बाद हम लोग मैदान में पहुंच जायेंगे जहाँ से खुला आसमान बखूबी दिखाई देगा, अतः तिलिस्मी खंजर की रोशनी बन्द कर दी गई और दोनों कुमारों के पीछे-पीछे सब कोई आगे की तरफ बड़े। लगभग डेढ़ सौ कदम तक जाने के बाद एक खुला हुआ दरवाजा मिला जिसमें चौखट या किवाड़ कुछ भी न था। इस दरवाजे के बाहर होने पर सभी ने अपने को संगमर्मर के छोटे से एक दालान में पाया और आगे की तरफ छोटा-सा बाग देखा जिसकी रविशें निहायत खूबसूरत स्याह और सुफेद पत्थरों से बनी हुई थीं मगर पेड़ों की किस्म में से केवल कुछ जंगली पौधों और लताओं की हरियाली मात्र ही बाग का नाम चरितार्थ करने के लिए दिखाई दे रही थी। इस बाग के चारों तरफ चार दालान चार ढंग के बने हुए थे और बीच में छोटे-छोटे कई चबूतरे और नहर की तौर पर सुन्दर और पतली नालियां बनी हुई थीं जिनमें पहाड़ से गिरते हुए झरने का साफ जल बहकर वहाँ के पेड़ों को तरी पहुंचा रहा था और देखने में भी बहुत भला मालूम होता था। मैदान में से निकलकर और आँख उठाकर देखने पर बाग के चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे हरे-भरे पहाड़ दिखाई दे रहे थे और वे इस बात की गवाही दे रहे थे कि यह बाग पहाड़ी की तराई अथवा घाटी में इस ढंग से बना हुआ है कि बाहर से किसी आदमी की इसके अन्दर आने की हिम्मत नहीं हो सकती और न कोई इसके अन्दर से निकलकर बाहर ही जा सकता है।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने महाराज सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर कहा, "उस चबूतरे वाले तिलिस्म के दो दर्जे हैं, एक तो यही बाग है और दूसरा उस चबूतरे के पास पहुंचने पर मिलेगा। इस बाग में आप जितने खूबसूरत चबूतरे देख रहे हैं सभी के अन्दर बेअन्दाज दौलत भरी पड़ी है । जिस समय हम दोनों यहाँ आये थे इन चबूतरों का छूना बल्कि इनके पास पहुंचना भी कठिन हो रहा था। (एक चबूतरे के पास ले जाकर) देखिये, चबूतरे के बगल में नीचे की तरफ कड़ी लगी हुई है और इसके साथ नथी हुई जो बारीक जंजीर है वह (हाथ का इशारा करके) इस तरफ एक कुएं में गिरी हुई है। इसी तरह हरएक चबूतरे में कड़ी और जंजीर लगी हुई है जो सब उसी कुएँ में जाकर इकट्ठी हुई हैं । मैं नहीं कह सकता कि उस कुएं के अन्दर क्या है, मगर उसकी तासीर यह थी कि इन चबूतरों को कोई छू नहीं सकता था। इसके अतिरिक्त आपको यह सुनकर ताज्चुब होगा कि उस चुनार वाले तिलिस्मी चबूतरे में भी जिस पर पत्थर का (असल में किसी धातु का) आदमी सोया हुआ है, एक जंजीर लगी हुई है और वह जंजीर भी भीतर-ही-भीतर यहाँ तक आकर उसी कुएं में गिरी हुई है जिसमें वे सब जंजीरें इकट्ठी हुई हैं, बस यही और इतना ही यहाँ का तिलिस्म है। इसके अतिरिक्त दरवाजों को छिपाने के सिवाय और कुछ भी नहीं है। हम दोनों भाइयों को तिलिस्मी किताब की बदौलत यह सब हाल मालूम हो चुका था, अतएव जब हम दोनों भाई यहाँ आए थे तो इन चबूतरों से बिल्कुल हटे रहते थे। पहला काम हम लोगों ने जो किया वह यही था कि ये नालियां जो पानी से भरी और बहती हुई आप देख रहे हैं, जिस पहाड़ी झरने की बदौलत लबालब हो रही हैं उसमें से एक नई नाली खोदकर उसका पानी उसी कुएँ में गिरा दिया जिसमें सब जंजीरें इकट्ठी ई हैं क्योंकि वह चश्मा भी उस कुएँ के पास ही है और अभी तक उसका पानी उस कुएँ में बराबर गिर रहा है । जब उस चश्मे का पानी (कई घण्टे तक) कुएं के अन्दर गिरा-तब इन चबूतरों का तिलिस्मी असर जाता रहा और ये छूने के लायक हुए मानो उस कुएँ में बिजली की आग भरी हुई थी जो पानी गिरने से ठंडी हो गई। हम दोनों भाइयों ने तिलिस्मी खंजर से सब जंजीरों को काट-काट इन चबूतरों का और उस चुनारगढ़ वाले तिलिस्मी चबूतरे का भी सम्बन्ध उस कुएँ से छुड़ा दिया, इसके बाद इन चबूतरों को खोलकर देखा और मालूम किया कि इनके अन्दर क्या है। अब आपकी आज्ञा होगी तो ऐयार लोग इस दौलत को चुनारगढ़ या जहाँ आप कहेंगे, वहाँ पहुँचा देंगे।"
इसके बाद इन्द्र जीतसिंह ने महाराज की आज्ञानुसार उन चबूतरों का ऊपरी हिस्सा, जो सन्दूक के पल्ले की तरह खुलता था, खोल-खोलकर दिखाया। महाराज तथा और सब कोई यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए कि उनमें बेहिसाब धन-दौलत और जेवरों के अतिरिक्त बहुत-सी अनमोल चीजें भी भरी हुई हैं जिनमें से दो चीजें महाराज ने बहुत पसन्द कीं। एक तो जड़ाऊ सिंहासन जिसमें अनमोल हीरे और माणिक विचित्र ढंग से जड़े हुए थे और दूसरा किसी धातु का बना हुआ एक चन्द्रमा था । इस चन्द्रमा में दो पल्ले थे, जब दोनों पल्ले एक साथ मिला दिये जाते तो उसमें से चन्द्रमा की तरह साफ और निर्मल तथा बहुत दूर तक फैलने वाली रोशनी पैदा होती थी।
उन चबूतरों के अन्दर की चीजों को देखते-ही-देखते तमाम दिन बीत गया। उस समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने महाराज की तरफ देखकर कहा, "इस बाग में इन चबूतरों के सिवाय और कोई चीज देखने योग्य नहीं है और अब रात भी हो गई है, इस- लिए यद्यपि आगे की तरफ जाने में कोई हर्ज तो नहीं है, मगर आज की रात इसी बाग में ठहर जाते तो अच्छा था।" भूतनाथ–क्या आज की रात भूखे-प्यासे ही बितानी पड़ेगी?
इन्द्रजीतसिंह–(मुस्कुराते हुए) प्यासे तो नहीं कह सकते, क्योंकि पानी का चश्मा बह रहा है जितना चाहो पी सकते हो, मगर खाने के नाम पर तब तक कुछ नहीं मिल सकता जब तक कि हम चुनारगढ़ वाले तिलिस्मी चबूतरे से बाहर न हो जायें ।
जीतसिंह–खैर, कोई चिन्ता नहीं, ऐयारों के बटुए खाली न होंगे, कुछ-न-कुछ खाने की चीजें उनमे जरूर होंगी।
सुरेन्द्र सिंह–अच्छा, अब जरूरी कामों से छुट्टी पाकर किसी दालान में आराम करने का बन्दोबस्त करना चाहिए ।
महाराज की आज्ञानुसार सब कोई जरूरी कामों से निपटने की फिक्र में लगे और इसके बाद एक दालान में आराम करने के लिए बैठ गये। खास-खास लोगों के लिए ऐयारों ने अपने सामान में से बिस्तरे का इन्तजाम कर दिया।
10
यह दालान जिसमें इस समय महाराज सुरेद्रसिंह वगैरह आराम कर रहे हैं,बनिस्बत उस दालान के, जिसमें ये लोग पहले-पहल पहुंचे थे, वड़ा और खूबसूरत बना हुआ था। तीन तरफ दीवार थी और बाग की तरफ तेरह खम्भे और महराब लगे हुए थे जिससे इसे वारहदरी भी कह सकते हैं। इसकी कुर्सी लगभग ढाई हाथ के ऊँची थी और इसके ऊपर चढ़ने के लिए पांच सीढ़ियाँ बनी हुई थी। बारहदरी के आगे की तरफ कुछ सहन छूटा हुआ था जिसकी जमीन (फर्श) संगमर्मर और संगमूसा के चौखूटे पत्थरों से बनी हुई थी। बारहदरी की छत में मीनाकारी का काम किया हुआ था और तीनों तरफ की दीवारों में कई आलमारियाँ भी थीं।
रात पहर भर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। इस बारहदरी में, जिसमें सब कोई आराम कर रहे थे, एक आलमारी की कार्निस के ऊपर मोमबत्ती जल रही थी जो देवी-सिंह ने अपने ऐयारी के बटुए में से निकालकर जलाई थी। किसी को नींद नहीं आयी थी बल्कि सब लग बैठे हुए आपस में बातें कर रहे थे। महाराज सुरेन्द्रसिंह बाग की तरफ मुंह किए बैठे थे और उन्हें सामने की पहाड़ी का आधा हिस्सा भी, जिस पर इस समय अन्धकार की बारीक चादर पड़ी हुई थी, दिखाई दे रहा था। उस पहाड़ी पर यकायक मशाल की रोशनी देखकर महाराज चौके और सभी को उस तरफ देखने का इशारा किया।
सभी ने उस रोशनी की तरफ ध्यान दिया और दोनों कुमार ताज्जुब के साथ सोचने लगे कि यह क्या मामला है ? इस तिलिस्म में हमारे सिवाय किसी गैर आदमी का आना कठिन ही नहीं बल्कि एकदम असम्भव है, तब फिर यह मशाल की रोशनी कैसी ! खाली रोशनी ही नहीं, बल्कि उसके पास चार-पांच आदमी भी दिखाई देते हैं। हाँ, यह नहीं जान पड़ता कि वे सब औरत हैं या मर्द ।
और लोगों के विचार भी दोनों कुमारों की ही तरह के थे और मशाल के साथ कई आदमियों को देखकर सभी ताज्जुब कर रहे थे। यकायक वह रोणनी गायब हो गई और आदमी दिखाई देने से रह गये, मगर थोड़ी ही देर बाद वह रोशनी फिर दिखाई दी। अबकी दफे रोशनी और भी नीचे की तरफ थी और उसके साथ के आदमी साफ-साफ दिखाई देते थे।
गोपालसिंह–(इन्द्रजीतसिंह से) मैं समझता था कि आप दोनों भाइयों के सिवाय कोई गैर आदमी इस तिलिस्म में नहीं आ सकता।
इन्द्रजीतसिंह–मेरा भी यही खयाल था मगर क्या आप भी यहाँ तक नहीं आ सकते ? आप तो तिलिस्म के राजा हैं।
गोपालसिंह–हाँ मैं आ तो सकता हूँ मगर सीधी राह से और अपने को बचाते हुए, वे काम मैं नहीं कर सकता जो आप कर सकते हैं । परन्तु आश्चर्य तो यह है कि वे लोग पहाड़ पर से आते हुए दिखाई दे रहे हैं जहाँ से आने का कोई रास्ता ही नहीं है । तिलिस्म बनाने वालों ने इस बात को जरूर अच्छी तरह विचार लिया होगा।
इन्द्रजीतसिंह–बेशक ऐसा ही है, मगर यहाँ पर क्या समझा जाय? मेरा खयाल है कि थोड़ी ही देर में वे लोग इस बाग में आ पहुँचेंगे ।
गोपालसिंह–बेशक ऐसा ही होगा । (रुककर) देखिए, रोशनी फिर गायब हो ग़ई, शायद वे लोग किसी गुफा में घुस गये । कुछ देर तक सन्नाटा रहा और सब कोई बड़े गौर से उसी तरफ देखते रहे । इसके बाद यकायक बाग के पश्चिम तरफ वाले दालान में रोशनी मालूम होने लगी जो उस दालान के ठीक सामने था जिसमें हमारे महाराज तथा ऐयार लोग टिके हुए थे, मगर पेड़ों के सबब से साफ नहीं दिखाई देता था कि दालान में कितने आदमी आए हैं और क्या कर रहे हैं। जब सभी को निश्चय हो गया कि वे लोग धीरे-धीरे पहाड़ों के नीचे उतरकर बाग के दालान या बारहदरी में आ गए हैं तब महाराज सुरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह को हुक्म दिया कि जाकर देखो और पता लगाओ कि वे लोग कौन हैं और वहाँ क्या कर रहे हैं।
गोपालसिंह–(महाराज से) तेजसिंहजी का वहाँ जाना उचित न होगा क्योंकि यह तिलिस्म का मामला है और यहां की बातों से ये बिल्कुल बेखबर है, यदि आज्ञा हो तो कुंअर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर मैं जाऊँ ।
महाराज–-ठीक है, अच्छा तुम्हीं दोनों आदमी जाकर देखो, क्या मामला है।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह और राजा गोपालसिंह वहाँ से उठे और धीरे-धीरे तथा पेड़ों की आड़ में अपने को छिपाते हुए उस दालान की तरफ रवाना हुए जिसमें रोशनी दिखाई दे रही थी, यहाँ तक कि उस दालान अथवा बारहदरी के बहुत पास पहुंच गये और एक पेड़ की आड़ में खड़े होकर गौर से देखने लगे।
इस दालान में उन्हें पन्द्रह आदमी दिखाई दिए, जिनके विषय में यह जानना कठिन था कि वे मर्द हैं या औरत, क्योंकि सभी की पोशाक एक ही रंग-ढंग की तथा सभी के चेहरे पर नकाब पड़ी हुई थी। इन्हीं पन्द्रह आदमियों में से दो आदमी मशीन का काम दे रहे थे। जिस तरह उनकी पोशाक खूबसूरत और बेशकीमत थी, उसी मशाल भी सुनहरी तथा जड़ाऊ काम की दिखाई दे रही थी और उसके सिरे की त बिजली की तरह रोशनी हो रही थी, इसके अतिरिक्त उनके हाथ में तेल की कुप्पी न थी और इस बात का कुछ पता नहीं लगता था कि इस मशाल की रोशनी का सबब क्या है।
राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह ने देखा कि वे लोग शीघ्रता के साथ उस दालान के सजाने और फर्श वगैरह के ठीक करने का इन्तजाम कर रहे हैं । बारहदरी के दाहिनी तरफ एक खुला हुआ दरवाजा है, जिसके अन्दर वे लोग बार-बार जाते हैं और जिस चीज की जरूरत समझते हैं, ले आते हैं। यद्यपि उन सभी की पोशाक एक ही ढंग की है और इसलिए बड़ाई-छुटाई का पता लगाना कठिन है, तथापि उन सभी में से एक आदमी ऐसा है, जो स्वयं कोई काम नहीं करता और एक किनारे कुर्सी पर बैठा हुआ अपने साथियों से काम ले रहा है। उसके हाथ मे एक विचित्र ढंग की छड़ी दिखाई दे रही है जिसके मुठे पर निहायत खूबसूरत और कुछ बड़ा हिरन बना हुआ है। देखते-ही-देखते थोड़ी देर में बारहदरी सज कर तैयार हो गई और कन्दीलों की रोशनी से जगमगाने लगी। उस समय वह नकाबपोश जो कुर्सी पर बैठा था और जिसे हम उस मण्डली का सरदार भी कह सकते हैं, अपने साथियों से कुछ कह-सुन कर बारहदरी के नीचे उतर आया और धीरे-धीरे उधर रवाना हुआ जिधर महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैरह टिके हुए थे ।
यह कैफियत देख कर राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह जो छिपे सब तमाशा देख रहे थे वहाँ से लौटे और शीघ्र ही महाराज के पास पहुंच कर जो कुछ देखा था,संक्षेप में सब वयान किया । उसी समय एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया। सभी का ध्यान उसी तरफ चला गया और इन्द्रजीतसिंह तथा राजा गोपालसिंह ने समझा कि यहवही नकाबपोशों का सरदार होगा जिसे अभी हम उस बारहदरी में देख आये हैं और जो हमारे देखते-देखते वहाँ से रवाना हो गया था। मगर जब पास आया तो सभी का भ्रम जाता रहा और एकाएक इन्द्रदेव पर निगाह पड़ते ही सब कोई चौंक पड़े । राजा गोपाल-सिंह और इन्द्रजीत सिंह को इस बात का भी शक हुआ कि वह नकाबपोशों का सरदार शायद इन्द्रदेव ही हो, मगर यह देख कर उन्हें ताज्जुब मालूम हुआ कि इन्द्र देव उस (नकाबपोशों की-सी) पोशाक में न था, जैसा कि उस बारहदरी में देखा था, बल्कि वह अपनी मामूली दरबारी पोशाक में था।
इन्द्रदेव ने वहाँ पहुँचकर महाराज सुरेन्द्र सिंह, वीरेन्द्र सिंह, जीतसिंह, तेजसिंह,राजा गोपालसिंह तथा दोनों कुमारों को अदब के साथ झुक कर सलाम किया और इसके बाद बाकी ऐयारों से भी "जय माया की" कहा ।
सुरेन्द्र सिंह–इन्द्रदेव, जब से हमने इन्द्रजीतसिंह की जुबानी यह सुना है कि इस तिलिस्म के दारोगा तुम हो, तब से हम बहुत ही खुश हैं । मगर ताज्जुब होता था कि तुमने इस बात की हमें कुछ भी खबर नहीं की और न हमारे साथ ग्रहां आये हो। अब यकायक इस समय यहाँ पर तुम्हें देख कर हमारी खुशी और भी ज्यादा हो गई । आओ, हमारे पास बैठ जाओ और यह कहो कि हम लोगों के साथ तुम यहाँ क्यों नहीं आये ? इन्द्रदेव–(बैठ कर) आशा है कि महाराज मेरा वह कसूर माफ करेंगे। मुझे कई जरूरी काम करने थे, जिनके लिए अपने ढंग पर अकेले आना पड़ा। बेशक मैं इस तिलिस्म का दरोगा हूँ और इसीलिए अपने को बड़ा ही खुशकिस्मत समझता हूँ कि ईश्वर ने इस तिलिस्म को आप ऐसे प्रतापी राजा के हाथ में सौंपा है। यद्यपि आपके फर्मा-बर्दार और होनहार पोतों ने इस तिलिस्म को फतह किया है और इस सवब से वे इसके मालिक हुए हैं, तथापि इस तिलिस्म का सच्चा आनन्द और तमाशा दिखाना मेरा ही काम है, यह मेरे सिवाय किसी दूसरे के किए नहीं हो सकता जो काम कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का था, उसे ये कर चुके अर्थात् तिलिस्म तोड़ चुके और जो कुछ इन्हें मालूम होना था, हो चुका । परन्तु उन बातों, भेदों और स्थानों का पता इन्हें नहीं लग सकता, जो मेरे हाथ में हैं और जिसके सबब से मैं इस तिलिस्म का दारोगा कहलाता हूँ। तिलिस्म बनाने वालों ने तिलिस्म के सम्बन्ध में दो किताबें लिखी थीं जिनमें से वे एक तो दारोगा के सुपुर्द कर गये और दूसरी तिलिस्म तोड़ने वाले के लिए छिपा कर रख गये जो कि अब दोनों कुमारों के हाथ लगी या कदाचित इनके अतिरिक्त और भी कोई किताब उन्होंने लिखी हो तो उसका हाल मैं नहीं जानता। हाँ, जो किताव दारोगा के सुपुर्द कर गये थे, वह वसीयतनामे के तौर पर पुश्त-दर-पुश्त से हमारे कब्जे में चली आ रही है और आजकल मेरे पास मौजूद है। यह मैं जरूर कहूँगा कि तिलिस्म में बहुत से मुकाम ऐसे हैं जहां दोनों कुमारों का जाना तो असम्भव ही है, परन्तु तिलिस्म टूटने के पहले मैं भी नहीं जा सकता था। हाँ, अब मैं वहाँ बखूबी जा सकता हूँ। आज मैं इसीलिए इस तिलिस्म के अन्दर-ही-अन्दर आपके पास आया हूँ कि इस तिलिस्म का पूरा-पूरा तमाशा आपको दिखाऊँ । जिसे कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह नहीं दिखा सकते । परन्तु इन कामों के पहले मैं महाराज से एक चीज मांगता हूँ जिसके बिना मेरा काम नहीं चल सकता।
महाराज–वह क्या?
इन्द्रदेव–जब तक इस तिलिस्म में आप लोगों के साथ हूँ, तब तक अदब-लिहाज और कायदे की पाबन्दी से माफ रखा जाऊँ !
महाराज–इन्द्रदेव, हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं । जब तक तिलिस्म में हम लोगों के साथ हो, तभी तक के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए हमने इन बातों से तुम्हें छुट्टी दी । तुम विश्वास रखो कि हमारे बाल-बच्चे और सच्चे साथी भी हमारी इस बात का पूरा-पूरा लिहाज रखेंगे।
यह सुनते ही इन्द्रदेव ने उठकर महाराज को सलाम किया और फिर बैठ कर कहा, "अब आज्ञा हो तो खाने-पीने का सामान जो आप लोगों के लिए लाया हूँ, हाजिर करूँ।"
महाराज-अच्छी बात है लाओ, क्योंकि हमारे साथियों में से कई ऐसे हैं जो भूख के मारे बेताब हो रहे होंगे।
तेजसिंह–मगर इन्द्रदेव, तुमने इस बात का परिचय तो दिया ही नहीं कि तुम वास्तव में इन्द्रदेव ही हो या कोई और ? इन्द्रदेव-(मुस्करा कर) मेरे सिवाय कोई गैर यहाँ आ नहीं सकता।
तेजसिंह-तथापि-'चिलेण्डोला'।
इन्द्रदेव-'चक्रधर'।
वीरेन्द्र सिंह-मैं एक बात और पूछना चाहता हूँ।
इन्द्रदेव -आज्ञा !
वीरेन्द्रसिंह-वह स्थान कैसा है, जहाँ तुम रहा करते हो और जहाँ मायारानी अपने दारोगा को लेकर तुम्हारे पास गई थी ?
इन्द्रदेव-वह स्थान तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और यहाँ से थोड़ी ही दूर पर है । मैं स्वयं आप लोगों को ले चल कर वहां की सैर कराऊँगा। इसके अतिरिक्त अभी मुझे बहुत-सी बातें कहनी हैं, पहले आप लोग भोजन इत्यादि से छुट्टी पा लें।
तेजसिंह-हम लोग अभी मशाल की रोशनी में क्या आप ही लोगों को पहाड़ से उतरते देख रहे थे?
इन्द्रदेव–जी हाँ, मैं एक निराले ही रास्ते से यहाँ आया हूँ। आप लोग बेशक ताज्जुब करते होंगे कि पहाड़ से कौन उतर रहा है । परन्तु मैं अकेला ही नहीं आया हूँ। बल्कि कई तमाशे भी अपने साथ लाया हूँ, मगर उनके जिक्र का अभी मौका नहीं है।
इतना कह कर इन्द्रदेव उठ खड़ा हुआ और देखते-देखते दूसरी तरफ चला गया,मगर अपनी इस बात से कि-"कई तमाशे भी अपने साथ लाया हूँ" कइयों को ताज्जुब और घबराहट में डाल गया ।
11
थोड़ी ही देर बाद इन्द्रदेव फिर वहां आया। अबकी दफे उसके साथ कई नकाबपोश भी थे, जो अपने हाथ में तरह-तरह की खाने-पीने की चीजें लिए हुए थे। एक के हाथ में जल था। जल से जमीन धोई गई और खाने-पीने की चीजें वहाँ रख कर वे नकाबपोश लौट गये तथा पुनः कई जरूरी चीजें लेकर आ पहुँचे। इन्तजाम ठीक हो जाने पर इन्द्रदेव ने कायदे के साथ सभी को भोजन कराया और इस काम से छुट्टी मिलने पर उस बारहदरी में चलने के लिए अर्ज किया, जिसे उसने यहां पहुंच कर सजाया था और जिसका हाल ऊपर के बयान में लिख चुके हैं।
वास्तव में यह बारहदरी बड़ी खूबी के साथ सजाई गई थी। यहां सभी के लिए कायदे के साथ बैठने और आराम करने का सामान मौजूद था। जिसे देख कर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और इन्द्रदेव की तरफ देख कर बोले,"क्या यह सब सामान इसी बाग में मौजूद था ?"
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, केवल इतना ही नहीं बल्कि इस बाग में जितनी इमारतें हैं, उन सभी को सजाने और दुरुस्त करने के लिए यहाँ काफी सामान है, इसके अति रिक्त यहाँ से मेरा मकान बहुत नजदीक है। इसलिए जिस चीज की भी जरूरत हो, मैं बहुत जल्द ला सकता हूँ। (कुछ देर सोच कर और हाथ जोड़ कर) मैं एक और भी जरूरी बात अर्ज करना चाहता हूँ।
महाराज–वह क्या ?
इन्द्रजीतसिंह-यह तिलिस्म आप ही के बुजुर्गों की बदौलत बना है और उन्हीं की आज्ञानुसार जब से यह तिलिस्म तैयार हुआ है, तभी से मेरे बुजुर्ग लोग इसके दारोगा होते आये हैं। अब मेरे जमाने में इस तिलिस्म की किस्मत ने पलटा खाया है। यद्यपि कुमार इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने इस तिलिस्म तोड़ा या फतह किया है और इसमें की बेहिसाब दौलत के मालिक हुए हैं तथापि यह तिलिस्म अभी दौलत से खाली नहीं हुआ है और न ऐसा खुल ही गया है कि ऐरे-गैरे जिसका जी चाहे इसमें घुस आयें । हाँ यदि आज्ञा हो तो दोनों कुमारों के हाथ से मैं इसके बचे-बचाये हिस्से को भी तुड़वा सकता हूँ, क्योंकि यह काम इस तिलिस्म के दारोगा का अर्थात् मेरा है, मगर मैं चाहता हूँ कि बड़े लोगों की इस कीर्ति को एकदम से मटियामेट न करके भविष्य के लिए भी कुछ छोड़ देना चाहिए । आज्ञा पाने पर मैं इस तिलिस्म की पूरी सैर कराऊँगा और तब अर्ज करूँगा कि बुजुर्गों की आज्ञानुसार इस दास ने भी जहाँ तक हो सका इस तिलिस्म की खिदमत की, अब महाराज को अख्तियार है कि मुझसे हिसाब-किताब समझ कर आइन्दा के लिए जिसे चाहें, यहाँ का दारोगा मुकर्रर करें।
महाराज–इन्द्रदेव, मैं तुमसे और तुम्हारे कामों से बहुत ही प्रसन्न हूँ। मगर मैं यह नहीं चाहता कि तुम मुझे बातों के जाल में फंसा कर बेवकूफ बनाओ और यह कहो कि "भविष्य के लिए किसी दूसरे को यहाँ का दारोगा मुकर्रर कर लो।" जो कुछ तुमने राय दी है वह बहुत ठीक है अर्थात् इस तिलिस्म के बचे-बचाये स्थानों को छोड़ देना चाहिए जिसमें कि बड़े लोगों का नाम-निशान बना रहे । मगर यहाँ के दारोगा की पदवी सिवाय तुम्हारे खानदान के कोई दूसरा कब पा सकता है ? वस दया करके इस ढंग की बातों को छोड़ दो और जो कुछ खुशी-खुशी कर रहे हो, सो करो।
इन्द्रजीतसिंह-(अदब के साथ सलाम करके) जो आज्ञा ! मैं एक बात और भी निवेदन करना चाहता हूँ।
महाराज–वह क्या?
इन्द्रदेव-वह यह कि इस जगह से आप कृपा करके पहले मेरे स्थान को, जहाँ मै रहता हूँ, पवित्र कीजिये और तब तिलिस्म की सैर करते हुए अपने चुनार गढ़ वाले तिलिस्मी मकान में पहुँचिये। इसके अतिरिक्त इस तिलिस्म के अन्दर जो कुछ कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने पाया है अथवा वहाँ से जिन चीजों को निकाल कर चुनारगढ़ पहुँचाने की आवश्यकता है, उनकी फेहरिस्त मुझे मिल जाय और ठीक तौर पर बता दिया जाय कि कौन चीज कहाँ पर है तो उन्हें वहाँ से बाहर कर के आपके पास भेजने का बदोबस्त करूँ। यद्यपि यह काम भैरोंसिंह और तारासिंह भी कर सकते हैं,परन्तु जिस काम को मैं एक दिन में करूँगा, उसे वे चार दिन में भी पूरा न कर सकेंगे।जिस चीज को जिस राह से निकाल ले जाने में सुभीता देखुंगा, निकाल ले जाऊँगा। महाराज–ठीक है, मैं भी इस बात को पसन्द करता हूँ और यह भी चाहता हूँ कि चुनार पहुँचने के पहले ही तुम्हारे विचित्र स्थान की सैर कर लूं। चीजों की फेहरिस्त और उनका पता इन्द्रजीतसिंह तुमको देंगे।
इतना कह कर महाराज ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कुमार ने उन सब चीजों का पता इन्द्रदेव को बताया जिन्हें बाहर निकाल कर घर पहुंचाने की आवश्यकता थी और साथ-ही-साथ अपना तिलिस्मी किस्सा भी जिसके कहने की जरूरत थी, इन्द्रदेव से बयान किया और बाद में दूसरी बातों का सिलसिला छिड़ा।
वीरेन्द्र सिंह–(इन्द्रदेव से) आपने कहा था कि "मैं कई तमाशे भी साथ लाया हूं" तो क्या वे तमाशे ढंके ही रह जायेंगे।
इन्द्रदेव–जी नहीं ! आज्ञा हो तो अभी उन्हें पेश करूँ, परन्तु यदि आप मेरे मकान पर चल कर उन तमाशों को देखेंगे तो कुछ विशेष आनन्द मिलेगा।महाराज-यही सही, हम लोगअभी तुम्हारे मकान पर चलने के लिए तैयार हैं।
इन्द्रदेव–अब रात बहुत चली गई है, महाराज दो-चार घण्टे आराम कर लें,दिन-भर की हरारत मिट जाय, जब कुछ रात बाकी रह जायेगी, तो मैं जगा दूंगा और अपने मकान की तरफ ले चलूंगा।तब तक मैं अपने साथियों को वहाँ रवाना कर देता हूँ जिसमें आगे चल कर सभी को होशियार कर दें और महाराज के लिए हरएक तरह का सामान दुरुस्त हो जाय। इन्द्रदेव की बात को महाराज ने पसन्द करके सभी को आराम करने की आज्ञा दी और इन्द्रदेव भी वहाँ से बिदा होकर किसी दूसरी जगह चला गया।
इधर–उधर की बातचीत करते-करते महाराज को नींद आ गई । वीरेन्द्रसिंह,दोनों कुमार और राजा गोपालसिंह भी सो गये तथा और ऐयारों ने भी स्वप्न देखना आरम्भ किया। मगर भूतनाथ की आंखों में नींद का नाम-निशान भी न था और वह तमाम रात जागता ही रह गया ।
जब रात घण्टे-भर से ज्यादा बाकी रह गई और सुबह को अठखेलियों के साथ चल कर खुशदिलों तथा नौजवानों के दिलों में गुदगुदी पैदा करने वाली ठंडी-ठंडी हवा ने खुशबूदार जंगली फूलों और लताओं से हाथापाई करके उनकी सम्पत्ति छीनना और अपने को खुशबूदार बनाना शुरू कर दिया तब इन्द्रदेव भी उस बारहदरी में आ पहुंचा और सभी को गहरी नींद में सोते देख जगाने का उद्योग करने लगा। इस बारहदरी के आगे को तरफ एक छोटा-सा सहन था जिसकी जमीन संगमूसा के स्याह और चौखूटे पत्थरों से मढ़ी हुई थी। इस सहन के दाहिने और बाएँ कोनों पर दो-तीन आदमी बखूबी बैठ सकते थे। इन्द्रदेव दाहिने तरफ वाले सिंहासन पर जाकर बैठ गया और उसके पायों को बारी-बारी से किसी हिसाब से घुमाने या उमेठने लगा। उसी समय सिंहासन के अन्दर से सरस और मधुर बाजे की आवाज आने लगी और थोड़ी ही देर बाद गाने की आवाज भी पैदा हुई। मालूम होता था कि कई नौजवान औरतें बड़ी खूबी के साथ गा रही हैं और कई आदमी पखावज-बीन-वंशी-मजीरा इत्यादि बजा कर उन्हें मदद पहुंचा रहे हैं। यह आवाज धीरे-धीरे बढ़ने और फैलने लगी, यहाँ तक कि उस बारहदरी में सोने वाले सभी लोगों को जगा दिया अर्थात् सब कोई चौंक कर उठ बैठे और ताज्जुब के साथ इधर-उधर देखने लगे। केवल इतने ही से बेचैनी दूर न हुई और सब कोई बारहदरी से बाहर निकल कर सहन में चले आये, उसी समय इन्द्रदेव ने सामने आकर महाराज को सलाम किया।
महाराज–यह तो मालूम हो गया कि यह सब तुम्हारी कारीगरी का नतीजा है, मगर बताओ तो सही कि यह गाने-बजाने की आवाज कहाँ से आ रही है ?
इन्द्रदेव–आइये, मैं बताता हूँ। महाराज को जगाने ही के लिए यह तरकीब की गई थी, क्योंकि अब यहाँ से रवाना होने का समय हो गया है, और विलम्ब न करना चाहिए
इतना कहकर इन्द्रदेव सभी को उस सिंहासन के पास ले गया जिसमें से गाने की आवाज आ रही थी । और उसका असल भेद समझाकर बोला, "इसमें मौके पर हर एक रागिनी पैदा हो सकती है ।"
इस अनूठे गाने-बजाने से महाराज बहुत प्रसन्न हुए और इसके बाद सभी को लिए हुए इन्द्रदेव के मकान की तरफ रवाना हुए ।
उस बारहदरी की बगल में ही एक कोठरी थी जिसमें सभी को साथ लिए हुए इन्द्रदेव चला गया ! इस समय इन्द्रदेव के पास तिलिस्मी खंजर था जिससे उसने हलकी रोशनी पैदा की और उसी के सहारे सभी को लिए हुए आगे की तरफ बढ़ा।
उस कोठरी में जाने के बाद पहले सभी को एक छोटे से तहखाने में उतरना पड़ा,वहाँ सभी ने लाल रंग की एक समाधि देखी जिसके बारे में दरियाफ्त करने पर इन्द्रदेव ने कहा कि यह समाधि नहीं है, सुरंग का दरवाजा है। इन्द्रदेव उस समाधि के पास बैठ गया और कोई ऐसी तरकीब की कि जिससे वह बीचोंबीच से खुल गई और नीचे उतरने के लिए चार-पांच सीढ़ियाँ दिखाई दीं। इन्द्रदेव के कहे मुताबिक सब कोई नीचे उतर गये और इसके बाद सीधी सुरंग में चलने लगे । सुरंग की हालत और ऊँची-नीची जमीन से साफ-साफ मालूम होता था कि वह पहाड़ काटकर बनाई हुई है और सब लोग ऊँचे की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। हमारे मुसाफिरों को दो-ढाई घड़ी के लगभग चलना पड़ा और तब इन्द्रदेव ने ठहरने के लिए कहा, क्योंकि यहाँ पर सुरंग खत्म हो चुकी थी और सामने एक बन्द दरवाजा दिखाई दे रहा था । इन्द्रदेव ने ताली लगाकर ताला खोला और सभी को साथ लिए हुए उसके अन्दर गया। सभी ने अपने को एक सुन्दर कमरे में पाया और जब इस कमरे के बाहर हुए तब मालूम हुआ कि सवेरा हो चुका है।
यह इन्द्रदेव का वही मकान है जिसमें बुड्ढे दारोगा के साथ मदद पाने की उम्मीद में मायारानी गई थी। इस सुन्दर और सुहावने स्थान का हाल हम पहले लिख चुके हैं, इसलिए अब पुनः बयान करने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती।
इन्द्रदेव सभी को लिए हुए पुनः अपने छोटे से बगीचे में गया, वहाँ चारों तरफ की सुन्दर छटा दिखाई दे रही थी और खुशबूदार ठण्डी-ठण्डी हवा दिल और दिमाग के साथ दोस्ती का हक अदा कर रही थी।
महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह तथा दोनों कुमारों को यह स्थान बहुब ही पसन्द आया और बार-बार इसकी तारीफ करने लगे। यद्यपि इस बगीचे में सभी के लायक दर्जे-बदर्जे कुर्सियाँ बिछी हुई थीं, मगर किसी का जी बैठने को नहीं चाहता था। सब कोई घूम-घूमकर यहाँ का आनन्द लेना चाहते थे और ले रहे थे, मगर इस बीच में एक ऐसा मामला हो गया जिसने भूतनाथ और देवीसिंह दोनों ही को चौंका दिया। एक आदमी जल से जरा हुआ चाँदी का घड़ा और सोने की झारी लेकर आया और संगमरमर की चौकी पर, जो बगीचे में पड़ी हुई थी, रखकर लौट चला । इसी आदमी को देखकर भूतनाथ और देवीसिंह चौंके थे, क्योंकि यह वही आदमी था जिसे ये दोनों ऐयार नकाबपोशों के मकान में देख चुके थे। इसी आदमी ने नकाबपोशों के सामने एक तस्वीर पेश की की थी और कहा था कि "कृपानाथ, बस मैं इसी का दावा भूतनाथ पर करूँगा।"]
केवल इतना ही नहीं, भूतनाथ ने वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी में अपनी स्त्री को भी फूल तोड़ते देखा और धीरे-से देवीसिंह को छेड़कर कहा, "वह देखिये मेरी स्त्री भी वहाँ मौजूद है, ताज्जुब नहीं कि आपकी चम्मा भी कहीं घूम रही हो।"
12
यद्यपि भूतनाथ को तरवुदों से छुट्टी मिल चुकी थी, यद्यपि उसका कसूर माफ हो चुका था, और वह महाराज के खास ऐयारों में मिला लिया गया था, मगर इस जगह उस आदमी को, जिसने नकाबपोशों के मकान में तस्वीर पेश की और साथ उस पर दावा करना चाहा था, देखकर उसकी अवस्था फिर बिगड़ गई और साथ ही इसके अपनी स्त्री को भी वहाँ काम करते हुए देखकर उसे क्रोध चढ़ आया ।
जब वह आदमी पानी का घड़ा और झारी रखकर लौट चला, तब इन्द्रदेव ने उसे पुकारकर कहा, "अर्जन, जरा वह तस्वीर भी तो ले आओ जिसे बार-बार तुम दिखाया करते हो और जो हमारे दोस्त भूतनाथ को डराने और धमकाने के लिए एक औजार के तौर पर तुम्हारे पास रखी हुई है।"
इस नाम ने भूतनाथ के कलेजे को और भी हिला दिया। वास्तव में उस आदमी का यही नाम था और इस खयाल ने तो उसे और भी बदहवास कर दिया कि अब वह तस्वीर लेकर आयेगा।
इस समय सब कोई बाग में टहल रहे थे और इसलिए एक-दूसरे से कुछ दूर हो रहे थे । भूतनाथ बढ़कर देवीसिंह के पास चला गया और उनका हाथ पकड़कर धीरे से बोला, "देखा, इन्द्रदेव का रंग-ढंग ?"
देवीसिंह –(धीरे-से) मैं सब देख और समझ रहा हुँ, मगर तुम घबराओ नहीं।
भूतनाथ-मालूम होता है कि इन्द्रदेव का दिल अभी तक मेरी तरफ से साफ
1.देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, बीसवाँ भाग, दूसरा बयान । नहीं हुआ।
देवीसिंह–शायद ऐसा ही हो, मगर इन्द्रदेव से ऐसी उम्मीद नहीं हो सकती,मेरा दिल इसे कबूल नहीं करता । मगर भूतनाथ, तुम भी अजीब सिड़ी हो ।
भूतनाथ—-सो क्यों?
देवीसिंह—-यही कि नकाबपोशों का पीछा करके तुमने कैसे-कैसे तमाशे देखे और तुम्हें विश्वास भी हो गया कि इन नकाबपशों से तुम्हारा कोई भेद छिपा नहीं है, फिर अन्त में यह भी मालूम हो गया कि उन नकाबपोशों के सरदार कुंअर इन्दद्रजीतसिंह और आनन्दसिंह थे, फिर इन दोनों से भी अब कोई बात छिपी नहीं रही।
भूतनाथ–बेशक ऐसा ही है ।
देवीसिंह–तो फिर अब क्यों तुम्हारा दम बेकार ही घुटा जाता है ? अब तुम्हें किसका डर रह गया?
भूतनाथ-कहते तो ठीक हो । खैर, कोई चिन्ता नहीं, जो कुछ होगा, सो देखा जायगा।
देवीसिंह–बल्कि तुम्हें यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि दोनों कुमारों को तुम्हारे भेदों का पता कैसे लगा। ताज्जुब नहीं, अब वे सब बातें खुलना चाहती हों।
भूतनाथ–शायद ऐसा ही हो, मगर मेरी स्त्री के बारे में तुम भी क्या खयाल करते हो?
देवीसिंह–इस बारे में मेरा-तुम्हारा मामला एक-सा ही रहा है, अब इस विषय में मैं कुछ भी नहीं कह सकता। वह देखो, इन्द्रदेव, तेजसिंह के पास चला गया है और तुम्हारी स्त्री की तरफ इशारा करके कुछ कह रहा है । तेजसिंह अलग हों तो मैं उनसे कुछ पूछू ! यहाँ की छटा ने तो लोगों का दिल ऐसा लुभा लिया है कि सभी ने एक-दूसरे का साथ ही छोड़ दिया ।(चौंककर) लो देखो, तुम्हारा लड़का नानक भी तो आ पहुँचा, उसके हाथ में भी कोई तस्वीर मालूम पड़ती है, अर्जुन भी उसी के साथ है।
भूतनाथ–(ताज्जुब से) आश्चर्य की बात है ! नानक और अर्जुन का साथ कैसे हुआ? और नानक यहाँ आया ही क्यों? क्या अपनी मां के साथ आया है ? क्या सपूत छोकरे ने भी मेरी तरफ से आँखें फेर ली हैं ? ओफ, यह तिलिस्मी जमीन तो मेरे लिए भयानक सिद्ध हो रही है, अच्छा-खासा तिलिस्म मुझे दिखाई दे रहा है। जिन पर मुझे विश्वास था, जिनका मुझे भरोसा था, जो मेरी इज्जत करते थे, यहाँ उन्हीं को मैं अपना विपक्षी पाता हूँ और कोई मुझसे बात तक करना पसन्द नहीं करते ।
नानक और और अर्जुन भूतनाथ और देवीसिंह ताज्जुब के साथ देख रहे थे,नानक ने भी भूतनाथ को देखा, मगर दूर ही से प्रणाम करके रह गया, पास न आया और और अर्जुन को लिए सीधे इन्द्रदेव की तरफ चला गया जो तेजसिंह से बातें कर रहे थे । इस समय आज्ञानुसार अर्जुन अपने हाथ में एक तस्वीर लिए हुए था और नानक के हाथ में भी एक तस्वीर थी।
नानक और अर्जुन को अपने पास आते देख इन्द्रदेव ने हाथ के इशारे से उन्हें दूर ही खड़े रहने के लिए कहा और उन्होंने भी ऐसा ही किया। कुछ देर तक और भी इन्द्रदेव, तेजसिंह के साथ बातें करता रहा, इसके बाद इशारे से अर्जुन और नानक को अपने पास बुलाया और जर वे दोनों पास आ गये तो कुछ कह-सुनकर बिदा किया ।
भूतनाथ यह सब तमाशा देखकर ताज्जुब कर रहा था। अर्जुन और नानक को बिदा करने के बाद तेजसिंह को साथ लिए हुए इन्द्रदेव महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास गया जो एक सुन्दर चट्टान पर खड़े-खड़े ढलवां जमीन और पहाड़ी पर से नीचे की तरफ गिरते हुए सुन्दर झरने की शोभा देख रहे थे और वीरेन्द्रसिह भी उन्हीं के पास खड़े थे। वहाँ भी कुछ देर तक इन्द्रदेव ने महाराज से बातचीत की और इसके बाद चारों आदमी लौटकर बगीचे में चले आये। महाराज को बगीचे में आते देख और सब लोग भी जो इधर-उधर फैले हुए तमाशा देख रहे थे, बगीचे में आकर इकट्ठे हो गए और अब मानो महाराज का यह एक छोटा-सा दरबार बगीचे में ही लग गया।
वीरेन्द्रसिंह-(इन्द्रदेव से) हाँ, तो अब वे तमाशे कब देखने में आवेंगे जो आप अपने साथ तिलिस्म में लेते गये थे?
इन्द्रदेव–जब आज्ञा हो तभी दिखाये जायें।
वीरेन्द्रसिंह–हम लोग तो देखने के लिए तैयार बैठे हैं।
जीतसिंह–मगर पहले यह मालूम हो जाना चाहिए कि उनके देखने में जितना समय लगेगा, अगर थोड़ी देर का काम हो तो अभी देख लिया जाय ।
इन्द्रदेव–जी, वह थोड़ी देर का काम तो नहीं है। इससे यही बेहतर होगा कि पहले जरूरी कामों से छुट्टी पाकर स्नान-ध्यान तथा भोजन इत्यादि से निवृत्त हो लें।
महाराज–हमारी भी यही राय है।
महाराज का मतलब समझ कर सब कोई उठ खड़े हुए और जरूरी कामों से छुट्टी पाने की फिक्र में लगे। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह तथा और भी सब कोई
इन्द्रदेव के उचित प्रबन्ध को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। किसी को किसी तरह की तकलीफ न हुई और न कोई चीज मांगने की जरूरत ही पड़ी। इन्द्रदेव के ऐयार और कई खिदमतगार आकर मौजूद हो गये और बात की बात में सब सामान ठीक हो गया।
स्नान तथा संध्या-पूजा इत्यादि से छुट्टी पाकर सभी ने भोजन किया और इसके बाद इन्द्रदेव ने (बँगले के अन्दर) एक बहुत बड़े और सजे हुए कमरे में सभी को बैठाया जहाँ सभी के योग्य दर्जे-ब-दर्जे बैठने का इन्तजाम किया गया था। एक ऊंची गद्दी पर महाराज सुरेन्द्रसिंह और उनके दाईं तरफ वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल तथा भूतनाथ वगैरह बैठे।
कुछ देर तक इधर-उधर की बातचीत होती रही। इसके बाद इन्द्रदेव ने हाथ जोड़कर पूछा-"अब यदि आज्ञा हो तो तमाशों को…
महाराज–हाँ-हाँ, अब तो हम लोग हर तरह से निश्चिन्त हैं।
सलाम करके इन्द्रदेव कमरे के बाहर चला गया और घड़ी भर तक लौट के नहीं आया, इसके बाद जब आया तो चुपचाप अपने स्थान पर आकर बैठ गया। सब कोई (भूतनाथ, पन्नालाल वगैरह) ताज्जुब के साथ उसका मुंह देख रहे थे कि इतने में ही सामने वाले दरवाजे का परदा हटा और नानक कमरे के अन्दर आता हुआ दिखाई दिया, नानक ने बड़े अदब के साथ महाराज को सलाम किया और इन्द्रदेव का इशारा पाकर एक किनारे बैठ गया। इस समय नानक के हाथ में एक बहुत बड़ी मगर लपेटी हुई तस्वीर थी जो कि उसने अपने बगल में लगा रखी थी।
नानक के बाद हाथ में तस्वीर लिए अर्जुन भी पहुंचा और महाराज को सलाम कर नानक के पास बैठ गया। उसी समय कमला का भाई अथवा भूतनाथ का लड़का हरनामसिंह दिखाई दिया, वह भी महाराज को प्रणाम करके अर्जुन के बगल में बैठ गया,हरनामसिंह के हाथ में एक छोटी-सी सन्दूकड़ी थी जिसे उसने अपने सामने रख लिया।
इसके बाद नकाब पहने हुए तीन औरतें कमरे के अन्दर आईं और अदब के साथ महाराज को सलाम करती हुई दूसरे दरवाजे से कमरे के बाहर निकल गईं।
इस समय भूतनाथ और देवीसिंह के दिल की क्या हालत थी, सो वे ही जानते होंगे। उन्हें इस बात का तो विश्वास ही था कि इन औरतों में एक तो भूतनाथ की स्त्री और दूसरी चम्पा जरूर है, मगर तीसरी औरत के बारे में कुछ भी नहीं कह सकते थे।
महाराज–(इन्द्रदेव से) इन औरतों में भूतनाथ की स्त्री और चम्पा जरूर होगी?
इन्द्रदेव–(हाथ जोड़कर) जी हाँ कृपानाथ ।
महाराज–और तीसरी औरत कौन है ?
इन्द्रदेव–तीसरी एक बहुत ही गरीब, नेक, सीधी और जमाने की सताई हुई औरत है जिसे देखकर और जिसका हाल सुनकर महाराज को भी बड़ी ही दया आयेगी। यह वह औरत है जिसे मरे हुए एक जमाना हो गया, मगर अब उसे विचित्र ढंग से पैदा होते देख लोगों को बड़ा ही ताज्जुब होगा।
महाराज–आखिर वह औरत है कौन ?
इन्देव–बेचारी दुःखिनी कमला की माँ, यानी भूतनाथ की पहली स्त्री।
यह सुनते ही भूतनाथ चिल्ला उठा और उसने बड़ी मुश्किल से अपने को बेहोश होने से रोका।
चन्द्रकान्ता सन्तति
बाईसवाँ भाग
1
भूतनाथ की अवस्था ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। कुछ देर तक सन्नाटा रहा और इसके बाद इन्द्रदेव ने पुनः महाराज की तरफ देखकर कहा-
"महाराज, ध्यान देने और विचार करने पर सबको मालूम होगा कि आजकल आपका दरबार 'नाट्यशाला' (थियेटर का घर) हो रहा है। नाटक खेलकर जो-जो बातें दिखाई जा सकती हैं, और जिनके देखने से लोगों को नसीहत मिल सकती है तथा मालूम हो सकता है कि दुनिया में जिस दर्जे तक के नेक और बद, दुखिया और सुखिया, गम्भीर और छिछोरे इत्यादि पाये जाते हैं, वे सब इस समय (आजकल) आपके यहाँ प्रत्यक्ष हो रहे हैं। ग्रह-दशा के फेर में जिन्होंने दुःख भोगा वे भी मौजूद हैं और जिन्होंने अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारी, वे भी दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने अपने किए का फल ईश्वरेच्छा से पा लिया है, वे भी आए हुए हैं, और जिन्हें अब सजा दी जायेगी, वे भी गिरफ्तार किए गए हैं। बुद्धिमानों का यह कथन है, कि 'जो बुरी राह चलेगा, उसे बुरा फल अवश्य मिलेगा' ठीक है, परन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अच्छी राह चलने वाले तथा नेक लोग भी दुःख के चंगुल में फंस जाते हैं, और दुर्जन तथा दुष्ट लोग आनन्द के साथ दिन काटते दिखाई देते हैं। इसे लोग ग्रह-दशा के कारण कहते हैं, मगर नहीं,इसके सिवाय कोई और बात भी जरूर है। परमात्मा की दी हुई बुद्धि और विचारशक्ति का अनादर करने वाले ही प्रायः संकट में पड़कर तरह-तरह के दुःख भोगते हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि इस समय अथवा आजकल आपके यहाँ सब तरह के जीव दिखाई देते हैं, दृष्टान्त देने के बदले केवल इशारा करने से काम निकलता है। हाँ, मैं यह कहना इन्हीं में ऐसे भी जीव आए हुए हैं, जो अपने किए का नहीं, बल्कि अपने सम्बन्धियों के किए हुए पापों का फल भोग रहे हैं, और इसी से नाते (रिश्ते) और सम्बन्ध का गूढ़ अर्थ भी निकलता है। बेचारी लक्ष्मीदेवी की तरफ देखिए, जिसने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा, और फिर भी हद दर्जे की तकलीफ उठाकर भी ताज्जुब है कि जीती बच गई । ऐसा क्यों हुआ? इसके जवाब में मैं तो यही कहूँगा कि राजा गोपालसिंह की बदौलत जो बेईमान दारोगा के हाथ की कठपुतली हो रहे थे, और इस बात की कुछ तो भूल गया, भी खबर नहीं रखते थे कि उनके घर में क्या हो रहा है, या उनके कर्मचारियों ने उन्हें कैसे जाल में फंसा रखा है। जिस राजा को अपने घर की खबर न होगी, वह प्रजा का क्या उपकार कर सकता है, और ऐसा राजा अगर संकट में पड़ जाये तो आश्चर्य ही क्या है ! केवल इतना ही नहीं, इनके दुःख भोगने का एक सबब और भी है। बड़ों ने कहा है कि 'स्त्री के आगे अपने भेद की बात प्रकट करना बुद्धिमानों का काम नहीं है' परन्तु राजा गोपालसिंह ने इस बात पर कुछ भी ध्यान न दिया, और दुष्टा मायारानी की मुहब्बत में फंसकर तथा अपने भेदों को बताकर बर्बाद हो गये। सज्जन और सरल स्वभाव होने से ही दुनिया का काम नहीं चलता, कुछ नीति का भी अवलम्बन करना ही पड़ता है। इसी तरह महाराज शिवदत्त को देखिए, जिसे खुशादमियों ने मिल-जुलकर बर्बाद कर दिया। जो लोग खुशामद में पड़कर अपने को सबसे बड़ा समझ बैठते हैं, और दुश्मन को कोई चीज नहीं समझते हैं, उनकी वैसी ही गति होती है, जैसी शिवदत्त की हुई। दुष्टों और दुर्जनों की बात जाने दीजिए, उनके बुरे कामों का तो फल मिलना ही चाहिए, मिला ही है और मिलेगा ही, उनका जिक्रतो मैं पीछे करूँगा, अभी तो मैं उन लोगों की तरफ इशारा करता हूँ जो वास्तव में बुरे नहीं थे, मगर नीति पर न चलने तथा बुरी सोहबत में पड़े रहने के कारण संकट में पड़ गए। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि भूतनाथ ऐसा नेक दयावान और चतुर ऐयार बहुत कम दिखाई देगा, मगर लालच और ऐयाशी के फेर में पड़कर यह ऐसा बर्बाद हुआ कि दुनिया भर में मुंह छिपाने और अपने को मुर्दा मशहूर करने पर भी इसे सुख की नींद नसीब न हुई । अगर यह मेहनत करके ईमानदारी के साथ दौलत पैदा करना चाहता तो आज इसकी दौलत का अन्दाज करना कठिन होता, और अगर ऐयाशी के फेर में न पड़ा होता तो आज नाती-पोतों से इसका घर दूसरों के लिए नजीर गिना जाता। इसने सोचा कि मैं मालदार हूँ, होशियार हूँ, चालाक हूँ, और ऐयार हूँ-कुलटा स्त्रियों और रण्डियों की सोहबत का मजा लेकर सफाई के साथ अलग हो जाऊँगा, मगर इसे अद मालूम हुआ होगा कि रण्डियाँ ऐयारों के भी कान काटती हैं। नागर वगैरह के बर्ताव को जब यह याद करता होगा, तब इसके कलेजे में चोट-सी लगती होगी। मैं इस समय इसकी शिकायत करने पर उतारू नहीं हुआ हूँ, बल्कि इसके दिल पर से पहाड़-सा बोझ हटाकर उसे हल्का करना चाहता हूँ, क्योंकि इसे मैं अपना दोस्त समझता था, और मैं समझता हूँ,हां, इधर कई वर्षों से इसका विश्वास अवश्य उठ गया था और मैं इसकी सोहबत पसन्द नहीं करता था, मगर इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, किसी का चाल-चलन जब खराब हो जाता है, तब बुद्धिमान लोग उसका विश्वास नहीं करते और शास्त्र की भी ऐसी ही आज्ञा है, अतएव मुझे भी वैसा ही करना पड़ा। यद्यपि मैंने इसे किसी तरह की तकलीफ नहीं पहुँचाई परन्तु इसकी दोस्ती को एकदम भूल गया। मुलाकात होने पर उसी तरह बर्ताव करता था जैसा लोग नये मुलाकाती के साथ किया करते हैं। हाँ, अब जबकि यह अपनी चाल-चलन को सुधारकर आदमी बना है, अपनी भूलों को सोच-समझकर पछता चुका है, एक अच्छे ढंग से नेकी के साथ नामवरी पैदा करता हुआ दुनिया में फिर दिखाई देने लगा है और महाराज भी इसकी योग्यता से प्रसन्न होकर इसके अपराधों को (दुनिया के लिए) क्षमा कर चुके हैं, तब मैंने भी इसके अपराधों को दिल-ही-दिल में क्षमा कर इसे अपना मित्र समझ लिया है और फिर उसी निगाह से देखने लगा हूँ, जिस निगाह से पहले देखता था । परन्तु इतना मैं जरूर कहूँगा कि भूतनाथ ही एक ऐसा आदमी है जो दुनिया में नेकचलनी और बदबलनी के नतीजे को दिखाने के लिए नमूना बन रहा है। आज यह अपने भेदों को प्रकट होते देख डरता है और चाहता है कि हमारे भेद छिपे के छिपे रह जायें, मगर यह इसकी भूल है, क्योंकि किसी के ऐब छिपे नहीं रहते। सब नहीं तो बहुत कुछ दोनों कुमारों को मालूम हो ही चुके हैं और महाराज भी जान गए हैं, ऐसी अवस्था में इसे अपना किस्सा पूरा-पूरा बयान करके दुनिया में एक नजीर छोड़ देनी चाहिए और साथ ही इसके (भूतनाथ की तरफ देखते हुए) अपने दिल के बोझ को भी हलका कर देना चाहिए। भूतनाथ, तुम्हारे दो-चार भेद ऐसे हैं जिन्हें सुनकर लोगों की आँखें खुल जायेंगी, और लोग समझेंगे, कि हाँ, आदमी ऐसे-ऐसे काम भी कर गुजरते हैं और उनका नतीजा ऐसा होता है, मगर यह तो कुछ तुम्हारे ही ऐसे बुद्धिमान और अनूठे ऐयार का काम है, कि इतना करने पर भी आज तुम भले-चंगे ही नहीं दिखाई देते हो, बल्कि नेकनामी के साथ महाराज के ऐयार कहलाने की इज्जत भी पा चुके हो। मैं फिर कहता हूँ कि किसी बुरी नीयत से इन बातों का जिक्र मैं नहीं करता, बल्कि तुम्हारे दिल का खुटका दूर करने के साथ-ही-साथ, जिसके नाम से तुम डरते हो, उन्हें तुम्हारा दोस्त बनाना चाहता हूं, अतः तुम्हें बे-खौफ अपना हाल बयान कर देना चाहिए।"
भूतनाथ–ठीक है, मगर क्या करूँ, मेरी जुबान नहीं खुलती, मैंने ऐसे-ऐसे बुरे काम किए हैं कि जिन्हें याद करके आज मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और आत्महत्या करने की इच्छा होती है, मगर नहीं, मैं बदनामी के साथ दुनिया से उठ जाता पसन्द नहीं करता, अतएव जहाँ तक हो सकेगा, एक दफे नेकनामी अवश्य पैदा करूंगा।
इन्द्रजीतसिंह-नेकनामी पैदा करने का ध्यान जहाँ तक बना रहे अच्छा ही है,परन्तु मैं समझता हूं कि तुम नेकनामी उसी दिन पैदा कर चुके जिस दिन हमारे महाराज ने तुम्हें अपना ऐयार बनाया, इसलिए कि तुमने इधर बहुत ही अच्छे काम किये हैं,और वे सब ऐसे थे कि जिन्हें अच्छे-से-अच्छा ऐयार भी कदाचित् नहीं कर सकता था।चाहे तुमने पहले कैसी ही बुराई और कैसे ही खोटे काम क्यों न किये हों, मगर आज हम लोग तुम्हारे देनदार हो रहे हैं, तुम्हारे अहसान के बोझ से दबे हुए हैं, और समझते हैं कि तुम अपने दुष्कर्मों का प्रायश्वित्त कर चुके हो ।
भूतनाथ-आप जो कुछ कहते हैं, वह आपका बड़प्पन है, परन्तु जो मैंने कुछ कुकर्म किए हैं, मैं समझता हूँ कि उनका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है, तथापि अब तो मैं महाराज की शरण में आ ही चुका हूँ, और महाराज ने भी मेरी बुराइयों पर ध्यान न देकर मुझे अपना दासानुदास स्वीकार कर लिया है, इससे मेरी आत्मा सन्तुष्ट है और मैं अपने को दुनिया में मुंह दिखाने योग्य समझने लगा हूँ। मैं यह भी समझता हूँ कि आप जो कुछ आज्ञा कर रहे हैं, यह वास्तव में महाराज की आज्ञा है, जिसे मैं कदापि उल्लंघन नहीं कर सकता, अतः मैं आज अपनी अद्भुत जीवनी सुनाने के लिए तैयार हूँ, परन्तु
JIM – Assistente
Jim IA: pode errar. Não digite dados pessoais. Suas mensagens são processadas por um serviço externo.