चन्द्रकान्ता सन्तति 5
चन्द्रकान्ता सन्तति 5
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सत्रहवाँ भाग
1
हमारे पाठक 'लीला' को भूले न होंगे। तिलिस्मी दारोगा वाले बँगले की बर्बादी के पहले तक इसका नाम आया है जिसके बाद फिर इसका जिक्र नहीं आया ।
लीला को जमानिया की खबरदारी पर मुकर्रर करके मायारानी काशी वाले नागर के मकान में चली गई थी और वहाँ दारोगा के आ जाने पर उसके साथ इन्द्रदेव के यहाँ चली गई। जब इन्द्रदेव के यहाँ से भी वह भाग गई और दारोगा तथा शेरअली खाँ की मदद से रोहतासगढ़ के अन्दर घुसने का प्रबन्ध किया गया, जैसा कि सन्तति के बारहवें भाग के तेरहवें बयान में लिखा गया है उस समय लीला भी मायारानी के साथ थी, मगर रोहतासगढ़ में जाने के पहले मायारानी ने उसे अपनी हिफाजत का जरिया बनाकर पहाड़ के नीचे ही छोड़ दिया था। मायारानी ने अपना तिलिस्मी तमंचा, जिससे बेहोशी बारूद की गोली चलाई जाती थी, लीला को देकर कह दिया था कि मैं शेरअली खाँ की मदद से और उन्हीं के भरोसे पर रोहतासगढ़ के अन्दर जाती हूँ मगर ऐयारों के हाथ मेरा गिरफ्तार हो जाना कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार बड़े ही चालाक हैं। यद्यपि उनसे बचे रहने की पूरी-पूरी तरकीब की गई है मगर फिर भी मैं बेफिक्र नहीं रह सकती, अस्तु, यह तिलिस्मी तमंचा तू अपने पास रख और इस पहाड़ के नीचे ही रहकर हम लोगों के बारे में टोह लेती रह। अगर हम लोग अपना काम करके राजी-खुशी के साथ लौट आये तब तो कोई बात नहीं। ईश्वर न करे यदि मैं गिरफ्तार हो जाऊँ तो तू मुझे छुड़ाने का बन्दोबस्त करना और इस तमंचे से काम निकालना। इसमें चलाने वाली गोलियाँ और वह ताम्र-पत्र भी मैं तुझे दिए जाती हूँ जिसमें गोली बनाने की तरकीब लिखी हुई है।
जब दारोगा और शेरअली खाँ सहित मायारानी गिरफ्तार हुई और वह खबर शेरअली खाँ के लश्कर में पहुँची जो पहाड़ के नीचे था, तो लीला ने भी सब हाल सुना और वह उसी समय वहाँ से टलकर कहीं छिप रही, फिर भी जब तक राजा वीरेन्द्रसिंह वहाँ से चुनारगढ़ की तरफ रवाना न हुए तब तक वह भी उस इलाके के बाहर न गई और इसी से शिवदत्त और कल्याणसिंह (जो बहुत से आदमियों को लेकर रोहतासगढ़ के तहखाने में घुसे थे) वाला मामला भी उसे बखूबी मालूम हो गया था।
माधवी, मनोरमा, और शिवदत्त ने जब ऐयारों की मदद से कल्याणसिंह को छुड़ाया था तो भीमसेन भी उसी के साथ ही छुड़ाया गया, मगर भीमसेन कुछ बीमार था इसलिए शिवदत्त के साथ मिल-जुलकर के रोहतासगढ़ तहखाने में न जा सका था, शिवदत्त ने अपने ऐयारों की हिफाजत में उसे शिवदत्तगढ़ भेज दिया था।
सब बखेड़ों से छुट्टी पाकर जब राजा वीरेन्द्रसिंह कैदियों को लिए हुए चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए तो मायारानी को कैद से छुड़ाने को फिक्र में लीला भी भेष बदले हुए उन्हों के लश्कर के साथ रवाना हुई। लश्कर में नकली किशोरी, कामिनी और कमला के मारे जाने वाला मामला उसके सामने ही हुआ और तब तक उसे अपनी कार्रवाई करने का कोई मौका न मिला मगर जब नकली किशोरी, कामिनी और कमला की दाहक्रिया करके राजा साहब आगे बढ़े और दुश्मनों की तरफ से कुछ बेफिक्र हुए तब लीला को भी अपनी कार्रवाई का मौका मिला और वह उस खेमे के चारों तरफ ज्यादा फेरे लगाने लगी जिसमें मायारानी कैद थी और चालीस आदमी नंगी तलवारे लिए बारी-बारी से उसके चारों तरफ पहरा दिया करते थे। एक दिन इत्तिफाक से आंधी-पानी का जोर हो गया और इसी से उस कम्गख्त को अपने काम का अच्छा मौका मिला।
वीरेन्द्रसिंह का लश्कर एक सुहावने जंगल में पड़ा हुआ था। समय बहुत अच्छा था, संध्या होने के पहले ही से बादलों का शामियाना खड़ा हो गया था, बिजली चमकने लग गई थी, और हवा के झपेटे पेड़-पत्तों के साथ हाथापाई कर रहे थे। पहर रात जाते-जाते पानी अच्छी तरह बरसने लग गया और उसके बाद तो आँधी-पानी ने एक भयानक तूफान का रूप धारण कर लिया। उस समय लश्कर वालों को बहुत ही तकलीफ हुई। हजारों सिपाही, गरीब बनिये, घसियारे और शागिर्द पेशे वाले जो मैदान में सोया करते थे इस तूफान से दुःखी होकर जान बचाने की फिक्र करने लगे। यद्यपि राजा वीरेन्द्रसिंह की रहमदिली और रिआयापरवरी ने बहुतों को आराम दिया और बहुत से आदमी खेमों और शामियानों के अन्दर घुस गये यहां तक कि राजा वीरेन्द्र सिंह और तेजसिंह के खेमों में भी सैकड़ों को पनाह मिल गई मगर फिर भी हजारों आदमी ऐसे रह गये थे जिनकी भौंडी किस्मत में दुःख भोगना बदा था। यह सब-कुछ था मगर लीला को ऐसे समय भी चैन न था और वह दुःख को दुःख नहीं समझती थी, क्योंकि उसे अपना काम साधने के लिए बहुत दिनों बाद आज यही एक मौका अच्छा मालूम हुआ।
जिस खेमे में मायारानी और दारोगा वगैरह कैद थे, उससे चालीस या पचास हाथ की दूरी पर सलई का एक बड़ा और पुराना दरख्त था। इस आँधी-पानी और तूफान का खौफ न करके लीला उसी पेड़ पर चढ़ गई और कैदियों के खेमे की तरफ मुंह करके तिलिस्मी तमंचे का निशाना साधने लगी। जब-जब बिजली चमकती तब-तब वह अपने निशाने को ठीक करने का उद्योग करती। सम्भव था कि बिजली की चमक में कोई उसे पेड़ पर चढ़ा हुआ देख लेता, मगर मगर जिन सिपाहियों के पहरे में वह खेमा था उस (कैदियों वाले) खेमे के पास जो लोग रहते थे, सभी इस तूफान से घबराकर उसी खेमे के अन्दर घुस गये थे जिसमें मायारानी और दारोगा वगैरह कैद थे। खेमे के बाहर या उस पेड़ के पास कोई भी न था जिस पर लीला चढ़ी हुई थी।
लीला जब अपने निशाने को ठीक कर चुकी तब उसने एक गोली (बेहोशी वाली) चलाई। हम पहले के किसी बयान में लिख चुके हैं कि इस तिलिस्मी तमंचे के चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती थी मगर जब गोली जमीन पर गिरती थी तब कुछ हलकी-सी आवाज पटाखे की तरह होती थी।
लीला की चलाई हुई गोली खेमे को छेद के अन्दर चली गई और एक सिपाही के बदन पर गिरकर फूटी। उस सिपाही का कुछ नुकसान नहीं हुआ जिस पर गोली गिरी थी। न तो उसका कोई अंग-भंग हुआ और न कपड़ा जला, केवल हलकी-सी आवाज हुई और बेहोशी का बहुत ज्यादा धुआं चारों तरफ फैलने लगा। मायारानी उस वक्त बैठी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी। पटाखे की आवाज से वह चौंककर उसी तरफ देखने लगी और बहुत जल्द समझ गई कि यह उसी तिलिस्मी तमंचे से चलाई गई गोली है जो मैं लीला के सुपुर्द कर आयी थी।
मायारानी यद्यपि जान से हाथ धो बैठी थी और उसे विश्वास हो गया था कि अब इस कैद से किसी तरह छुटकारा नहीं मिल सकता मगर इस समय तिलिस्मी तमंचे की गोली ने खेमे के अन्दर पहुंचकर उसे विश्वास दिला दिया कि अब भी तेरा एक दोस्त मदद करने लायक मौजूद है जो यहां आ पहुंचा और कैद से छुड़ाया ही चाहता है।
वह मायारानी, जिसकी आँखों के आगे मौत की भयानक सूरत घूम रही थी और हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी, चौंककर सम्हल बैठी। बेहोशी का असर करने वाला धुआँ बच रहने की मुबारकबाद देता हुआ आँखों के सामने फैलने लगा और तरह- तरह की उम्मीदों ने उसका कलेजा ऊँचा कर दिया। यद्यपि वह जानती कि यह धुआँ मुझे भी बेहोश कर देगा, मगर फिर भी वह खुशी की निगाहों से चारों तरफ देखने लगी और इतने में ही एक दूसरी गोली भी उसी ढंग की वहाँ आकर गिरी।
मायारानी और दारोगा को छोड़कर जितने आदमी उस खेमे में थे सभी को उन दोनों गोलियों ने ताज्जुब में डाल दिया। अगर गोली चलाते समय तमंचे में से किसी तरह की आवाज निकलकर उनके कानों तक पहुँचती, तो शायद कुछ पता लगाने की नीयत से दो-चार आदमी खेमे के बाहर निकलते, मगर उस समय सिवाय एक-दूसरे का मुँह देखने के किसी को किसी तरह का गुमान न हुआ और धुएँ ने तेजी के साथ फैलकर अपना असर जमाना शुरू कर दिया। बात की बात में जितने आदमी उस खेमे के अन्दर थे, सभी का सिर घूमने लगा और एक-दूसरे के ऊपर गिरते हुए सब के सब बेहोश हो गए, मायारानी और दारोगा को दीन-दुनिया की सुध न रही।
पेड़ पर चढ़ी हुई लीला ने थोड़ी देर तक इन्तजार किया। जब खेमे के अन्दर से किसी को निकलते न देखा और उसे विश्वास हो गया कि खेमे के अन्दर वाले अब बेहोश हो गये होंगे, तब वह पेड़ से उतरी और खेमे के पास आई। आँधी-पानी का जोर अभी तक वैसा ही था, मगर लीला ने इसे अच्छी तरह सह लिया और कनात के नीचे से झाँककर खेमे के अन्दर देखा तो सभी को बेहोश पाया।
पाठकों को यह मालूम है कि लीला ऐयारी भी जानती थी। कनात काटकर वह खेमे के अन्दर चली गई। आदमी बहुत ज्यादा भरे हुए थे, इसलिए उसे मायारानी के पास तक पहुँचने में बड़ी कठिनाई हुई। आखिर वह उसके पास पहुँची और हाथ-पैर खोलने के बाद लखलखा सुंघाकर होश में लाई। मायारानी ने होश में आकर लीला को देखा और धीरे से कहा, "शाबाश, खूब पहुँची। बस, दारोगा को छुड़ाने की कोई जरूरत नहीं।" इतना कहकर मायारानी उठ खड़ी हुई और लीला के हाथ का सहारा लेती हुई खेमे के बाहर निकल गयी।
लीला ने चाहा कि लश्कर में से दो घोड़े भी सवारी के लिए चुरा लावे मगर मायारानी ने स्वीकार न किया और उसी तूफान में दोनों कम्बख्तों ने एक तरफ का रास्ता लिया।
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देखिए, चन्द्रकान्ता सन्तति, नौवाँ और आठवाँ बयान।
2
पाठकों को मालूम है कि शिवदत्त और कल्याणसिंह ने जब रोहतासगढ़ पर चढ़ाई की थी तब उनके साथ मनोरमा और माधवी मौजूद थीं। भूतनाथ और सरयूसिंह ने शिवदत्त और कल्याणसिंह को डरा-धमकाकर मनोरमा को तो गिरफ्तार कर लिया परन्तु माधवी कहाँ गई या क्या हुई, इसका हाल कुछ लिखा नहीं गया, अस्तु अब हम थोड़ा-सा हाल माधवी का लिखना उचित समझते हैं।
जिस जमाने में माधवी गया और राजगृह की रानी कहलाती थी, उस जमाने उसका राज्य केवल तीन आदमियों के भरोसे पर चलता था। एक दीवान अग्निदत्त, दूसरा कोतवाल धरमसिंह और तीसरा सेनापति कुबेरसिंह। बस यही तीनों उसके राज्य का आनन्द लेते थे और इन्हीं तीनों का माधवी को भरोसा था। यद्यपि ये तीनों ही माधवी की चाह में डूबने वाले थे मगर कुबेरसिंह और धरमसिंह प्यासे ही रह गये जिसका उन दोनों को बराबर बहुत ही रंज बना रहा।
जब राजगृह और गया की किस्मत ने पलटा खाया, तब धर्मसिंह कोतवाल को तो चपला ने माधवी की सूरत बना और धोखा दे गिरफ्तार कर लिया, और दीवान अग्निदत्त बहुत दिनों तक बचा रह कर अन्त में किशोरी के कारण एक खोह के अन्दर मारा गया, परन्तु अभी तक यह न मालूम हुआ कि उसके मर जाने का सबब क्या था। हाँ सेनापति कुबेरसिंह जिसने माधवी के राज्य में सबसे ज्यादा दौलत पैदा की थी, रह गया क्योंकि उसने जमाने को पलटा खाते देख चुपचाप अपने घर (मुर्शिदाबाद) का रास्ता लिया मगर माधवी के हाल-चाल की खबर लेता रहा, क्योंकि यद्यपि उसने माधवी का राज्य छोड़ दिया था, मगर माधवी के इश्क ने उसके दिल में से अपना दखल नहीं उठाया था।
माधवी की बिगड़ी हुई अवस्था देखकर भी उसकी मुहब्बत से हाथ न धोने के दो सबब थे एक तो माधवी वास्तव में खूबसूरत हसीन और नाजुक थी, दूसरे राजगृह और गया के राज्य से खारिज हो जाने पर भी वह माधवी को अमीर और बेहिसाब दौलत की मालिक समझता था और इसलिए वह समय पर ध्यान रखकर माधवी के हाल-चाल की बराबर खबर लेता रहा और वक्त पर काम देने के लिए थोड़ी-सी फौज का मालिक भी बना रहा।
मनोरमा के गिरफ्तार हो जाने के बाद शिवदत्त और कल्याणसिंह के साथ जब माधवी रोहतासगढ़ की तराई में पहुँची तो वहाँ एक आदमी ने गुप्त रीति से उसे एक चिट्ठी दी और जल्द उसका जवाब माँगा। यह चिट्ठी कुवेरसिंह की थी और उसमें यह लिखा हुआ था––
"मुझे आपकी अवस्था पर बहुत रंज और अफसोस है। यद्यपि आपकी हालत बदल गई है और आप मुझसे बहुत दूर हैं, मगर मैं अभी तक आपकी खयाली तस्वीर अपने दिल के अन्दर कायम रखकर दिन-रात उसकी पूजा किया करता हूँ। यही सबब है कि बहुत दिनों तक मेहनत करके मैंने इतनी ताकत पैदा कर ली है कि आपकी मदद कर सकूँ और आपको पुनः राजगृह की गद्दी का मालिक बनाऊँ। आप अपने ही दिल से पूछ देखिये कि अग्निदत्त, जिसके साथ आपने सब-कुछ किया, कैसा बेईमान और बेमुरौवत निकला और मैं, जिसे आपने हद से ज्यादा तरसाया कैसी हालत में आपकी मदद करने को तैयार हूँ! यदि आप मुनासिब समझें तो इस आदमी के साथ मेरे पास चलीं आवें या मुझको अपने पास बुला लें। यह आदमी जो चिट्ठी लेकर जाता है मेरा ऐयार है।
आपका––कुबेर।"
माधवी ने उस चिट्ठी को बड़े गौर से दोहरा कर पढ़ा और देर तक तरह-तरह की बातें सोचती रही। हम नहीं जानते कि उसका दिल किन-किन बातों का फैसला करता रहा या वह किस विचार में देर तक डूबी रही, हाँ थोड़ी देर बाद उसने सिर उठा चिट्ठी लाने वाले की तरफ देखा और कहा, "कुबेरसिंह कहाँ पर है?"
ऐयार––यहाँ से थोड़ी दूर पर
माधवी––फिर वह खुद यहाँ क्यों न आया?
ऐयार––इसीलिए कि आप इस समय दूसरों के साथ हैं जिन्होंने आपको न मालूम किस तरह का भरोसा दिया होगा या आप ही ने शायद उनसे किस तरह का इकरार किया हो, ऐसी अवस्था में आपसे दरियाफ्त किये बिना इस लश्कर में आना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा।
माधवी––ठीक है, अच्छा तुम जाकर उसे बहुत जल्द मेरे पास ले आओ। कितनी देर में आओगे?
ऐयार––(सलाम करके) आधे घंटे के अन्दर। वह ऐयार तेजी के साथ दौड़ता हुआ वहाँ से चला गया और माधवी उसी जगह टहलती हुई उसका इन्तजार करने लगी।
दिन आधे घंटे से कुछ ज्यादा बाकी था और इस समय माधवी कुछ खुश मालूम होती थी। शिवदत्त और कल्याणसिंह का लश्कर एक जंगल में छिपा हुआ था और माधवी अपने डेरे से निकल कर सौ सवा सौ कदम की दूरी पर चली गई थी। माधवी कुबेरसिंह के अक्षर अच्छी तरह पहचानती थी इसलिए उसे किसी तरह का धोखा खाने का शक कुछ भी न हुआ और वह बेखौफ उसके आने का इन्तजार करने लगी।
संध्या होने के पहले ही उसी ऐयार को साथ लिए हुए कुबेरसिंह माधवी की तरफ आता दिखाई दिया जो थोड़ी ही देर पहले उसकी चिट्ठी लेकर आया था। उस समय वह ऐयार भी एक घोड़े पर सवार था और कुबेरसिंह अपनी सूरत-शक्ल तथा हैसियत को अच्छी तरह सजाये हुए था। माधवी के पास पहुँच कर दोनों आदमी घोड़े से नीचे उतर पड़े और कुबेरसिंह ने माधवी को सलाम करके कहा, "आज बहुत दिनों के बाद ईश्वर ने मुझे आपसे मिलाया! मुझे इस बात का बहुत रंज है कि आपने लौंडियों के भड़काने पर चुपचाप घर छोड़कर जंगल का रास्ता ले लिया और अपने खैरख्वाह कुबेरसिंह (हम) को याद तक न किया। मैं खूब जानता हूँ कि आपने दीवान अग्निदत्त से डर कर ऐसा किया था मगर उसके बाद भी तो मुझे याद करने का मौका जरूर मिला होगा।"
माधवी––(मुस्कुराती हुई कुबेरसिंह का हाथ पकड़ के) मैं घर से निकलने के बाद ऐसी मुसीबत में पड़ गयी थी कि अपनी भलाई-बुराई पर कुछ भी ध्यान न दे सकी, और जब मैंने सुना कि गया और राजगृह में वीरेन्द्रसिंह का राज्य हो गया तब और भी हताश हो गई, फिर भी मैं अपने उद्योग की बदौलत बहुत-कुछ कर गुजरती, मगर गयाजी में अग्निदत्त की लड़की कामिनी ने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया और मुझे किसी लायक न रक्खा। (अपनी कटी हुई कलाई दिखाकर) यह उसी की बदौलत है।
कुबेरसिंह––वह खानदान का खानदान ही नमकहराम निकला और इसी फेर में अग्निदत्त मारा भी गया।
माधवी––हाँ, उसके मरने का हाल मायारानी की सखी मनोरमा की जुबानी मैंने सुना था। (पीछे की तरफ देखकर) कौन आ रहा है?
कुबेरसिंह––आप ही के लश्कर का कोई आदमी है, शायद आपको बुलाने आता हो, नहीं वह दूसरी तरफ घूम गया, मगर अब आपको कुछ सोच-विचार करना, किसी से मिलना या इस जगह खड़े-खड़े बातों में समय नष्ट न करना चाहिए और यह मौका भी बातचीत करने का नहीं है। आप (घोड़े की तरफ इशारा करके) इस घोड़े पर शीघ्र सवार होकर मेरे साथ चली चलें, मैं आपका ताबेदार सब लायक और सब कुछ करने के लिए तैयार हूँ, फिर किसी की खुशामद की जरूरत ही क्या है? यदि कल्याणसिंह के लश्कर में आपका कुछ असबाब हो तो उसकी परवाह न कीजिए।
माधवी––नहीं, अब मुझे किसी की परवाह नहीं रही, मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ। इतना कहकर माधवी कुबेरसिंह के घोड़े पर सवार हो गई। कुबेरसिंह अपने ऐयार के घोड़े पर सवार हुआ तथा पैदल ऐयार को साथ लिए हुए दोनों एक तरफ को रवाना हुए।
यही सबब था कि शिवदत्त वगैरह के साथ माधवी रोहतासगढ़ के तहखाने में दाखिल नहीं हुई।
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देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति, चौदहवां भाग, दुसरा बयान।
3
कैद से छुटकारा मिलने के बाद बीमारी के सबब से यद्यपि भीमसेन को घर जाना पड़ा और वहाँ उसकी बीमारी बहुत जल्दी जाती रही, मगर घर में रहने का जो सुख उसको मिलना चाहिए वह न मिला क्यों एक तो माँ के मरने का रंज और गम उसे हद से ज्यादा था और अब वह घर काटने को दौड़ता था, दूसरे थोड़े ही दिन बाद बाप के मरने की खबर भी उसे पहुँची, जिससे वह बहुत ही उदास और बेचैन हो गया। इस समय उसके ऐयार लोग भी वहीं मौजूद थे जो बाहर से यह दुखदायी खबर लेकर लौट आये थे। पहले तो उसके ऐयारों ने उसे बहुत समझाया और राजा वीरेन्द्रसिंह से सुलह कर लेने में बहुत सी भलाइयाँ दिखाईं, मगर उस नालायक के दिल में एक भी न बैठी और वह राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला लेने तथा किशोरी को जान से मार डालने की कसम खाकर घर से बाहर निकल पड़ा। बाकरअली, खुदाबक्श, अजायबसिंह और यारअली इत्यादि उसके लालची ऐयारों ने भी लाचार होकर उसका साथ दिया।
अब की दफा भीमसेन ने अपने ऐयारों के सिवाय और किसी को भी साथ न लिया, हाँ रुपये-अशर्फी या जवाहिरात की किस्म में से जहाँ तक उससे बना या जो कुछ भी उसके पास था, लेकर अपने ऐयारों को लालच भरी उम्मीदों का सब्जबाग दिखाता रवाना हुआ और थोड़ी दूर जाने के बाद ऐयारों के साथ ही उसने भी अपनी सूरत बदल ली।
"राजा वीरेन्द्रसिंह को किस तरह नीचा दिखाना चाहिए और क्या करना चाहिए?" इस विषय पर तीन दिन तक उन लोगों में बहस होती रही और अन्त में यह निश्चय किया गया कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान तथा आपस वालों का मुकाबला करने के पहले उनके दुश्मनों से दोस्ती बढ़ाकर अपना बल खूब पुष्ट कर लेना चाहिए। इस इरादे पर वे लोग बहुत कुछ कायम भी रहे और माधवी, मायारानी तथा तिलिस्मी दारोगा वगैरह से मुलाकात करने की फिक्र करने लगे।
कई दिनों तक सफर करने और घूमने-फिरने के बाद एक दिन ये लोग दोपहर होते-होते एक घने जंगल में पहुँचे। चार-पाँच घण्टे आराम कर लेना इन लोगों को बहुत जरूरी मालूम हुआ क्योंकि गर्मी की चलाचली का जमाना था और धूप बहुत कड़ी और दुःखदायी थी। मुसाफिरों को तो जाने दीजिये, जंगली जानवरों और आकश में उड़ने वाली तथा बात-की-बात में दूर-दूर की खबर लाने वाली चिड़ियाओं को भी पत्तों की आड़ से निकलना बुरा मालूम होता था।
इस जंगल में एक जगह पानी का झरना भी जारी था और उसके दोनों तरफ पेड़ों की घनाहट के सबब और जगहों के बनिस्बत ज्यादा ठंडक थी। ये पाँचों मुसाफिर भी झरने के किनारे पत्थर की साफ चट्टान देखकर बैठ गए और आपस में इधर-उधर की बातें करने लगे। इसी समय बातचीत की आहट पाने और निगाह दौड़ाने पर इन लोगों की निगाह दस-बारह सिपाहियों पर पड़ी जिन्हें देख भीमसेन चौंका और उनका पता लगाने के लिए अजायबसिंह से कहा, क्योंकि दोस्तों और दुश्मनों के खयाल से उसका जो एक पल के लिए भी ठिकाने नहीं रहता था और 'पत्ता खड़का बन्दा भड़का' की कहावत का नमूना बन रहा था।
भीमसेन की आज्ञानुसार अजायबसिंह ने उन आदमियों का पीछा किया और दो घंटे तक लौट कर न आया। तब दूसरे ऐयारों को भी चिन्ता हुई और वे अजायबसिंह की खोज में जाने के लिए तैयार हुए मगर इसकी नौबत न पहुँची, क्योंकि उसी समय अजायबसिंह अपने साथ कई सिपाहियों को लिए भीमसेन की तरफ आता दिखाई दिया। अजायबसिंह के इस तरह आने ने पहले तो सभी को खुटके में डाल दिया मगर जब अजायबसिंह ने दूर ही से खुशी का इशारा किया तब सभी का जी ठिकाने हुआ और उसके आने का इन्तजार करने लगे। पास आने पर अजायबसिंह ने भीमसेन से कहा, "इस जंगल में आकर टिक जाना हम लोगों के लिए बहुत अच्छा हुआ क्योंकि रानी माधवी से मुलाकात हो गई। आज ही उनका डेरा भी इस जंगल में आया है। कुबेरसिंह सेनापति और चार-पाँच सौ सिपाही उनके साथ हैं। जिन लोगों का मैंने पीछा किया था वे भी उन्हीं के सिपाहियों में से थे और ये भी उन्हीं के सिपाही हैं जो मेरे साथ आपको बुलाने के लिए आए हैं।"
माधवी की खबर सुनकर भीमसेन उतना ही खुश हुआ जितना अजायबसिंह की जुबानी भीमसेन के आने की खबर पाकर माधवी खुश हुई थी। अजायबसिंह की बात सुनते ही भीमसेन उठ खड़ा हुआ और अपने ऐयारों को साथ लिए हुए घड़ी भर के अन्दर ही अपनी बेहया बहिन माधवी से जा मिला। ये दोनों एक-दूसरे को देखकर बहुत खुश हुए मगर उन दोनों की मुलाकात कुबेरसिंह को अच्छी न मालूम पड़ी जिसका सबब क्या था सो हमारे पाठक लोग खुद ही समझ सकते हैं।
थोड़ी देर तक भीमसेन और माधवी ने कुशल-मंगल पूछने में बिताया। माधवी ने खाने-पीने की चीजें तैयार करने का हुक्म दिया, क्योंकि उसे अपने अनूठे भाई की खातिरदारी आज मंजूर थी और इसलिए बड़ी मुहब्बत के साथ देर रात तक बातें होती रहीं।
माधवी को इस जंगल में आये आज पाँच दिन हो चुके हैं। पाँचवें दिन दोपहर के समय भीमसेन से मुलकात हुई थी। उसका (कुबेरसिंह का) ऐयार दुश्मनों की खोज खबर लगाने के लिए कहीं गया हुआ था क्योंकि माधवी और कुबेरसिंह ने इस जंगल में पहुँच कर निश्चय कर लिया था कि पहले दुश्मनों का हाल-चाल मालूम करना चाहिए, इसके वाद जो कुछ मुनासिब होगा; किया जायगा।
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कैद से छूटने के बाद लीला को साथ लिए हुए मायारानी ऐसी भागी कि उसने पीछे की तरफ फिर के भी नहीं देखा। आँधी और पानी के कारण उन दोनों को भागने में बड़ी तकलीफ हुई, कई दफा वे दोनों गिरी और चोट भी लगी, मगर प्यारी जान को बचा कर ले भागने के खयाल ने उन्हें किसी तरह दम न लेने दिया। दो घण्टे के बाद आँधी-पानी का जोर जाता रहा, आसमान साफ हो गया और चन्द्रमा भी निकल आया, उस समय उन दोनों को भागने में सुभीता हुआ और सवेरा होने तक ये दोनों बहुत दूर निकल गई।
मायारानी यद्यपि खूबसूरत थी नाजुक थी, और परले सिरे की अमीरी कर चुकी थी मगर इस समय ये सब बातें हवा हो गई। पैरों में छाले पड़ जाने पर भी उसने भागने में कसर न की और सवेरा हो जाने पर भी दम न लिया, बराबर भागती ही चली गई। दूसरा दिन भी उसके लिए बहुत अच्छा था, आसमान पर बदली छाई हुई थी और धूप को जमीन तक पहुँचने का मौका नहीं मिला था। अब मायारानी बातचीत करती हुई और पिछली बातें लीला को सुनाती हुई रुक कर चलने लगी। थोड़ी दूर जाती फिर जरा दम ले लेती, पुनः उठकर चलती और कुछ देर बाद दम लेने के लिए बैठ जाती। इसी तरह दूसरा दिन भी मायारानी ने सफर ही में बिता दिया और खाने-पीने की कुछ विशेष परवाह न की। संध्या होने के कुछ पहले वे दोनों एक पहाड़ी की तराई में पहुंची जहां साफ पानी का सुन्दर चश्मा बह रहा था और जंगली बेर तथा मकोय के पेड़ भी बहुतायत से थे। वहाँ पर लीला ने मायारानी से कहा कि अब डरने तथा चलते-चलते जान देने की कोई जरूरत नहीं। अब हम लोग बहुत दूर निकल आये हैं और ऐसे रास्ते से आये हैं कि जिधर से किसी मुसाफिर की आमद-रफ्त नहीं होती अतः अब हम को बेफिक्री के साथ आराम करना चाहिए। यह जगह इस लायक है कि हम लोग खा पीकर अपनी आत्मा को सन्तोष दे लें और अपनी-अपनी सूरतें भी अच्छी तरह बदल कर पहचाने जाने का खटका मिटा लें!"
लीला की बात मायारानी ने स्वीकार की और चश्मे के पानी से हाथ-मुँह धोने और जरा दम लेने के बाद सबके पहले सूरत बदलने का बन्दोबस्त करने लगी क्योंकि दिन नाममात्र को रह गया था और रात हो जाने पर बिना रोशनी के सहारे यह काम अच्छी तरह नहीं हो सकता था।
सुरत––शक्ल के हेर-फेर से छुट्टी पाने के बाद दोनों ने जंगली बेर और मकोय को अच्छे-से-अच्छा मेवा समझकर भोजन किया और चश्मे का जल पीकर आत्मा को संतोष दिया, तब निश्चिन्त होकर बैठी और यों बातचीत करने लगीं––
मायारानी––अब जरा जी ठिकाने हुआ, मगर शरीर चूर-चूर हो गया है। खैर, किसी तरह तेरी बदौलत जान बच गई, नहीं तो मैं हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी और राह देखती थी कि मेरी जान किस तरह ली जाती है। लीला––चाहे तुम्हारे सारे नौकर-चाकर तुम्हारे अहसानों को भूल जायें और तुम्हारे नमक का खयाल न करें मगर मैं कब ऐसा कर सकती हूँ! मुझे दुनिया में तुम्हारे बिना चैन कब पड़ सकता है, जब तक तुम्हें कैद से छुड़ा न लिया, अन्न का दाना मुँह में न डाला बल्कि अभी तक जंगली बेर और मकोय पर ही गुजारा कर रही हूँ!
मायारानी––शाबाश! मैं तुम्हारे इस अहसान को जन्म भर नहीं भूल सकती, जिस तरह आप रहूँगी उसी तरह तुम्हें भी रक्खूँगी। यह जान तुमने बचाई है इसलिए जब तक इस दुनिया में रहूँगी इस जान का मालिक तुम्हीं को समझेंगी।
लीला––(तिलिस्मी तमंचा और गोली मायारानी के सामने रख कर) यह अपनी अमानत आप लीजिए और अब इसे अपने पास रखिये, इसने बड़ा काम किया।
मायारानी––(तमंचा उठा कर और थोड़ी-सी गोलियाँ लीला को देकर) इन गोलियों को अपने पास रक्खो, बिना तमंचे के भी ये बड़ा काम देंगी। जिस तरफ फेंक दोगी या जहाँ जमीन पर पटकोगी उसी जगह ये अपना गुण दिखलावेंगी।
लीला––(गोलियाँ रख कर) बेशक ये बड़े वक्त पर काम देती हैं। अच्छा, यह कहिये कि अब हम लोगों को क्या करना और कहाँ जाना चाहिए?
मायारानी––इसका जवाब भी तुम्हीं बहुत अच्छा दे सकती हो, मैं केवल इतना ही कहूँगी कि गोपालसिंह और कमलिनी को इस दुनिया से उठा देना सबसे पहला और जरूरी काम समझना चाहिए। किशोरी, कामिनी और कमला को मारकर मनोरमा ने कुछ भी न किया, उतनी ही मेहनत अगर गोपालसिंह और कमलिनी को मारने के लिए करती तो इस समय मैं पुनः तिलिस्म की रानी कहलाने लायक हो सकती थी।
लीला––ठीक है मगर मुझे … (कुछ रुक कर) देखो तो, वह कौन सवार जा रहा है! मुझे तो उस छोकरे रामदीन की छटा मालूम पड़ती है। यह पंचकल्यान मुश्की घोड़ी भी अपने ही अस्तबल की मालूम पड़ती है बल्कि …
मायारानी––(गौर से देखकर) यह वही घोड़ी है जिस पर मैं सवार हुआ करती थी, और बेशक वह सवार भी रामदीन ही है। उसे पकड़ो तो गोपालसिंह का ठीक हाल मालूम हो।
लीला––पकड़ना तो कोई कठिन काम नहीं है क्योंकि तिलिस्मी तमंचा तुम्हारे पास मौजूद है, मगर यह कम्बख्त कुछ बताने वाला नहीं है।
मायारानी––खैर जो हो, मैं गोली चलाती हूँ।
इतना कहकर मायारानी ने फुर्ती से तिलिस्मी तमंचे में गोली भर कर सवार की तरफ चलाई। गोली घोड़ी को गर्दन में लगी और तुरन्त फट गई, घोड़ी भड़की और उछली-कूदी मगर गोली से निकले हुए बेहोशी के धुएँ ने अपना असर करने में उससे भी ज्यादा तेजी और फुर्ती दिखाई। घोड़ी और सवार दोनों ही पर बेहोशी का असर हो गया। सवार जमीन पर गिर पड़ा और दो कदम आगे बढ़कर घोड़ी भी लेट गई। मायारानी और लीला ने दूर से यह तमाशा देखा और दौड़ती हुईं सवार के पास पहुँची।
लीला––पहसे इसकी मुश्कें बाँधनी चाहिए। मायारानी––क्या जरूरत है?
लीला––क्यों, फिर इसे बेहोश किस लिए किया?
मायारानी––तुम खुद ही कह चुकी हो कि यह कुछ बताने वाला नहीं है, फिर मुश्कें बाँधने से मतलब?
लीला––आखिर फिर किया क्या जायगा?
मायारानी––पहले तुम इसकी तलाशी ले लो, फिर जो कुछ करना होगा, मैं तुम्हें बताऊँगी।
लीला––बहुत खूब, यह तुमने ठीक कहा
इस समय संध्या पूरे तौर पर हो चुकी थी, परन्तु चन्द्रदेव के दर्शन हो रहे थे, इसलिए यह नहीं कह सकते कि अन्धकार पल-पल में बढ़ता जाता था। लीला उस सवार की तलाशी लेने लगी और पहली ही दफा जेब में हाथ डालने से उसे दो चीजें मिलीं। एक तो हीरे की कीमती अँगूठी जिस पर राजा गोपालसिंह का नाम खुदा हुआ था और दूसरी चीज एक चिट्ठी थी जो लिफाफे के तौर पर लपेटी हुई थी।
चाहे अन्धकार न हो मगर चिट्ठी और अँगूठी पर खुदे हुए नाम को पढ़ने के लिए रोशनी की जरूरत थी और जब तक चिट्ठी का हाल मालूम न हो जाय तब तक कुछ काम करना या आगे तलाशी लेना उन दोनों को मंजूर न था, अतः लीला ने अपने ऐयारी के बटुए में से सामान निकाल कर रोशनी पैदा की और मायारानी ने सबसे पहले अँगूठी पर निगाह दौड़ाई। अँगूठी पर 'श्रीगोपाल' खुदा हुआ देख उसके रोंगटे खड़े हो गये फिर भी अपनी नबीयत सम्हाल कर वह चिट्ठी पढ़नी पड़ी। चिट्ठी में यह लिखा हुआ था––
"बेनीराम जोग लिखी गोपालसिंह––
आज हमने अपना पर्दा खोल दिया, कृष्ण जिन्न के नाम का अन्त हो गया, जिनके लिए यह स्वांग रचा गया था, उन्हें मालूम हो गया कि गोपालसिंह और कृष्ण जिन्न में कोई भी भेद नहीं है, अतः अब हमने काम-काज के लिए इस छोकरे को अपनी अँगूठी देकर विश्वास का पात्र बनाया है। जब तक यह अँगूठी इसके पास रहेगी तब तक इसका हुक्म हमारे हुक्म के बराबर सभी को मानना होगा। इसका बन्दोबस्त कर देना और दो सौ सवार तथा चार रथ बहुत जल्द पिपलिया घाटी में भेज देना। हम किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को लेकर आ रहे हैं। थोड़ा-सा जलपान का सामान उम्दा अलग भेजना। परसों रविवार की शाम तक हम लोग वहाँ पहुँच जायेंगे।"
इस चिट्ठी ने मायारानी का कलेजा दहला दिया और उसने घबरा कर इसे पढ़ने के लिए लीला के हाथ में दे दिया।
मायारानी––ओफ! मुझे स्वप्न में भी इस बात का गुमान न था कि कि कृष्ण जिन्न वास्तव में गोपालसिंह है! आह, जब मैं पिछली बातें याद करती हूँ तो कलेजा काँप जाता है और मालूम होता है कि गोपालसिंह ने मेरी तरफ से लापरवाही नहीं की बल्कि मुझे बुरी तरह से दुःख देने का इरादा कर लिया था। किशोरी, कामिनी और कमला के बारे में भी … ओफ! बस अब मैं इस जगह दम भर भी नहीं ठहर सकती और ठहरना उचित भी नहीं है।
लीला––बेशक ऐसा ही है, मगर कोई हर्ज नहीं, आज यदि कृष्ण जिन्न का भेद खुल गया है तो यह (अँगूठी और चिट्ठी दिखा कर) चीजें भी बड़ी ही अनूठी मिल गई हैं। तुम बहुत जल्द देखोगी कि इस चिट्ठी और अँगूठी की बदौलत मैं कैसे-कैसे नामी ऐयारों की आँखों में धूल डालती हूँ और गोपालसिंह तथा उसके सहायकों को किस तरह तड़पा कर मारती हूँ। तुम यह भी देखोगी कि तुम्हारे उन लोगों ने जो ऐयारों का बाना पहने हुए थे और नामी ऐयार कहलाते थे, उसका पासंग भी नहीं किया जो मैं अब कर दिखाऊँगी। तो अब यहाँ से चलना चाहिए।
मायारानी––बहुत जल्द ही चलना चाहिए, मगर क्या इस छोकरे को जीता ही छोड़ जाओगी?
लीला––नहीं-नहीं, कदापि नहीं। क्या इसे मैं इसलिए जीता छोड़ जाऊँगी कि यह होश में आकर जमानिया या गोपालसिंह के पास चला जाय और मेरी कार्रवाइयों बट्टा लगाए!
इतना कह कर लीला ने खंजर निकाला और एक ही हाथ में बेचारे रामदीन का सिर काट दिया, तब लाश को उसी तरह छोड़ घोड़ी को होश में लाने का उद्योग करने लगी।
थोड़ी देर में घोड़ी भी चैतन्य हो गयी। उस समय लीला के कहे अनुसार मायारानी उस घोड़ी पर सवार हुई और दोनों ने वहाँ से हटकर एक घने जंगल का रास्ता लिया। लीला घोड़ी की रकाब थामे साथ-साथ बातें करती हुई जाने लगी।
मायारानी––यह मदद मुझे गैब से मिली है। यकायक रामदीन का मिल जाना और उसकी जेब में से अँगूठी तथा चिट्ठी का निकल आना कहे देता है कि मेरे बुरे दिन बहुत जल्द खत्म होना चाहते हैं।
लीला––इसमें क्या शक है! अबकी दफे तो राजा गोपालसिंह सचमुच हमारे कब्जे में आ गये हैं। अफसोस इतना ही है कि हम लोग अकेले हैं, अगर सौ-पचास आदमियों की भी मदद होती तो आज गोपालसिंह तथा किशोरी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को सहज ही में गिरफ्तार कर लेते।
मायारानी––अब उन लोगों को गिरफ्तार करने का खयाल तो बिल्कुल जाने दे और एकदम से उन लोगों को मारकर बखेड़ा निपटा डालने की ही फिक्र कर। इस अँगूठी और चिट्ठी के मिल जाने पर यह काम कोई मुश्किल नहीं है।
लीला––ठीक है, जो कुछ तुम चाहती हो, मैं पहले से समझे बैठी हूँ। मेरा इरादा है कि तुम्हें किसी अच्छी और हिफाजत की जगह पर छोड़कर मैं जमानिया जाऊँ और दीवान साहब से मिलूँ जिनके नाम गोपालसिंह ने यह चिट्ठी लिखी है।
मायारानी––बस, रामदीन छोकरे की सूरत बना ले और इसी घोड़ी पर सवार होकर चिट्ठी लेकर जा। इस चिट्ठी के अलावा भी तू जो कुछ दीवान को कहोगी वह उससे इन्कार न करेगा। गोपालसिंह के लिखे अनुसार जो कुछ खाने-पीने की चीजें तू लेकर उस घाटी की तरफ जायगी, उसमें जहर मिला देना तो तेरे लिए कोई मुश्किल न होगा और इस तरह एक साथ ही कई दुश्मनों को सफाई हो जायगी, मगर इसमें भी मुझे एक बात का खुटका होता है।
लीला––वह क्या?
मायारानी––जिस वक्त से मुझे यह मालूम हुआ है कि गोपालसिंह ही ने कृष्ण जिन्न का रूप धारण किया था, उस वक्त से मैं उसे बहुत ही चालाक और धूर्त ऐयार समझने लग गई हूँ। ताज्जुब नहीं कि वह तेरा भेद मालूम कर ले या वे खाने-पीने की चीजें, जो उसने मँगाई हैं, उनमें से स्वयं कुछ भी न खाय।
लीला––यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है। मेरा दिल भी यही कहता है कि उसने खाने-पीने का बहुत बड़ा ध्यान रखा होगा, सिवाय अपने हाथ के और किसी का बनाया कदापि न खाता होगा, क्योंकि वह तकलीफें उठा चुका है, अब उसे धोखा देना जरा टेढ़ी खीर है, मगर फिर भी तुम देखोगी कि इस अँगूठी की बदौलत मैं उसे कैसा धोखा देती हूँ और किस तरह अपने पंजे में फँसाती हूँ।
मायारानी––खैर, जो मुनासिब समझे, मगर इसमें तो कोई शक नहीं कि रामदीन छोकरे की सूरत बनाकर और घोड़ी पर सवार होकर तू दीवान साहब के पास जायगी।
लीला––मैं जाऊँगी और जरूर जाऊँगी। नहीं तो इस अँगूठी और चिट्ठी के मिलने का फायदा ही क्या हुआ! बस, तुम्हें किसी अच्छे ठिकाने पर रख देने भर की देर है।
मायारानी––मगर मैं एक बात और कहना चाहती हूँ।
लीला––वह क्या!
मायारानी––मैं इस समय बिल्कुल कंगाल हो रही हूँ और ऐसे मौके पर रुपये की बड़ी जरूरत है। इसलिए मैं चाहती हूँ कि दीवान साहब के पास तुझे न भेजकर खुद ही जाऊँ और किसी तरह तिलिस्मी बाग में घुसकर कुछ जवाहरात और सोना जहाँ तक ला सकूँ ले आऊँ, क्योंकि मुझे वहाँ के खजाने का हाल मालूम है और यह काम तेरे किये नहीं हो सकता, जब मुझे रुपये की मदद मिल जायगी, तो कुछ सिपाहियों का भी बन्दोबस्त कर सकूँगी और …
लीला––यह सब कुछ ठीक है, मगर मैं तुम्हें दीवान साहब के पास कदापि न जाने दूँगी। कौन ठिकाना कही तुम गिरफ्तार हो जाओ तो फिर मेरे किए कुछ भी न हो सकेगा। बाकी रही रुपये-पैसे वाली बात, सो इसके लिए तरद्दुद करना वृथा है, क्या यह नहीं हो सकता कि जब मैं दीवान साहब के पास जाऊँ और सवारी इत्यादि तथा खाने-पीने की चीजें लूँ, तो एक रथ पर थोड़ी सी अशर्फियाँ और कुछ जवाहिरात भी रख देने के लिए कहूँ? क्या वह इस अँगूठी के प्रताप से मेरी बात न मानेगा? और अगर अशफियों और जवाहरात का बन्दोबस्त कर देगा तो क्या मैं उन्हें रास्ते में से गुम नहीं कर सकती? इसे भी जाने दो, अगर तुम पता-ठिकाना ठीक-ठीक बताओ तो क्या मैं तिलिस्मी बाग में जाकर जवाहरात और अशफियों को कहीं निकाल ला सकती? मायारानी––निकाल ला सकती है और दीवान साहब से भी जो कुछ माँगेगी, सम्भव है कि बिना कुछ विचारे दे दें, मगर इसमें भी मुझे दो बातों की कठिनाई मालूम पड़ती है।
लीला––वह क्या?
मायारानी––एक तो दीवान साहब के पास अन्दाज से ज्यादा रुपये-अशफियों की तहवील नहीं रहती और जवाहरात तो बिल्कुल ही उसके पास नहीं रहते, शायद आज कल गोपालसिंह के हुक्म से रहता हो, मगर मुझे उम्मीद नहीं है, अब जो चीज तू उससे माँगेगी, वह अगर उसके पास न हुई तो उसे तुझ पर शक करने की जगह मिलेगी और ताज्जुब नहीं कि काम में विघ्न पड़ जाय।
लीला––अगर ऐसा है तो जरूर खुटके की बात है, अच्छा दूसरी बात क्या है?
मायारानी––दूसरे यह कि तिलिस्मी बाग के खजाने में घुसकर वहाँ से कुछ निकाल लाना, नये आदमी का काम नहीं है। खैर, मैं तुझे रास्ता बता दूँगी, फिर जो कुछ करते बने, तू कर लेना।
लीला––खैर, जैसा होगा देखा जायगा, मगर मैं यह रांय कभी नहीं दे सकती कि साहब के सामने या खास बाग में जाओ, ज्यादा नहीं तो थोड़ा-बहुत मैं ले ही आऊँगी।
मायारान––अच्छा, यह बता कि मुझे कहाँ छोड़ जायगी और तेरे जाने मैं क्या करूँगी?
लीला––इतनी जल्दी में कोई अच्छी जगह तो मिलती नहीं, किसी पहाड़ कन्दरा में दो दिन गुजारा करो और चुपचाप बैठी रहो, इसी बीच में मैं अपना काम करके लौट आऊँगी। मुझे जमानिया जाने में अगर देर हो जायगी तो काम चौपट हो जायगा। ताज्जुब नहीं कि देर हो जाने के कारण गोपालसिंह किसी दूसरे को भेज दें और अँगूठी का भेद खुल जाय।
इत्तिफाक अजब चीज है। उसने यहाँ भी एक बेढब सामान खड़ा कर दिया। इत्तिफाक से लीला और मायारानी भी उसी जंगल में जा पहुँची जिसमें माधवी और भीमसेन का मिलाप हुआ था और वे लोग अभी तक वहाँ टिके हुए थे
5
आधी रात का समय था जब लीला और मायारानी उस जंगल में पहुँची जिसमें माधवी और भीमसेन टिके हुए थे। जब ये दोनों उसके पास पहुँची और लीला को वहाँ टिके हुए बहुत से आदमियों की आहट मिली तो वह मायारानी को एक ठिकाने खड़ा करके पता लगाने के लिए उसकी तरफ गई।
हम ऊपर बयान कर चुके है कि सेनापति कुबेरसिंह के साथ थोड़ी-सी फौज भी थी––अब लीला को थोड़ी ही कोशिश से मालूम हो गया कि यहाँ सैकड़ों आदमियों का डेरा पड़ा हुआ है और वे लोग इस ढंग से घने जंगल में आड़ देख टिके हुए हैं जैसे डाकुओं का गिरोह या छिपकर धावा मारने वाले टिकते हैं और हर वक्त होशियार रहते हैं। लीला खूब जानती थी कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी या सम्बन्धी अगर किसी काम के लिए कहीं जाते हैं या लड़ाई करते हैं तो छिपकर या आड़ पकड़कर डेरा नहीं डालते। हाँ, अगर अकेले या ऐयार लोग हों तो शायद ऐसा करें, मगर जब उनके साथ सौ-पचास आदमी या कुछ फौज होगी, तब कदापि ऐसा न करेंगे, इसलिए उसे गुमान हुआ कि ये लोग जरूर कोई गैर हैं, बल्कि ताज्जुब नहीं कि हमारा साथ देने वाले हों, अब बहुत सी बातों को सोच-विचार और अपनी ऐयारी पर भरोसा करके लीला माधवी की फौज में घुस गयी और वहाँ बहुत से सिपाहियों को होशियार तथा पहरा देते हुए देखा।
पहले लिखा जा चुका है कि लीला भेष बदले हुए थी और यह भी दर्शाया गया है कि माधवी और कुबेरसिंह अपनी सुरत में सफर करते थे।
लीला को कई सिपाहियों ने देखा और एक ने टोका कौन है?
लीला––एक मुसाफिर परदेशी औरत।
सिपाही––यहाँ क्यों चली आ रही है?
लीला––अपनी भलाई की आशा से।
सिपाही––क्या चाहती है?
लीला––आपके सरदार से मिलना।
सिपाही––अपना परिचय दे तो सरदार के पास भिजवा दूँ।
लीला––परिचय देने में तो कोई हर्ज नहीं है, मगर डरती हूँ कि आप लोग भी कहीं उन्हीं में से न हों जिन्होंने मुझे लूट लिया है, यद्यपि अब मैं बिल्कुल खाली हो रही हूँ मगर …
इतने में और भी कई सिपाही वहाँ जुट आये और सभी ने लीला को घेरकर सवाल करना शुरू किया और लीला ने भी गौर करके जान लिया कि ये लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के दल वाले नहीं हैं, क्योंकि उनके फौजी सिपाही अक्सर जर्द पोशाक काम में लाते हैं, इसी तरह से जमानिया वाले भी नहीं मालूम हुए, क्योंकि उनकी बातचीत और चाल-ढाल को लीला खूब पहचानती थी, अब कुछ और बातचीत होने पर लीला को विश्वास हो गया कि ये लोग उनमें से नहीं हैं जिसका मुझे डर है।
उन सिपाहियों को भी एक अकेली औरत से डरने की कोई जरूरत न थी, इसलिए उन्होंने अपने मालिक का नाम जाहिर कर दिया और लीला को लिए हुए उस जगह जा पहुँचे जहाँ माधवी और भीमसेन का बिस्तर लगा हुआ था और ये दोनों इस समय भी बैठे बातचीत कर रहे थे। लालटेन जलाया गया और लीला की सूरत अच्छी तरह देखी गयी, लीला ने भी उसी रोशनी में माधवी को पहचान लिया और खुश होकर बोली, "अहा, आप तो गया की रानी माधवीदेवी हैं।"
माधवीदेवी––और तू कौन है? लीला––मैं प्रसिद्ध मायारानी की ऐयारा हूँ और उन्हीं के साथ यहाँ तक आई भी हूँ। यह दुनिया का कायदा है कि एक से दूसरे को मदद पहुँचती है। अब जिस तरह आपको मायारानी से मदद पहुँच सकती है, उसी तरह आप मायारानी की भी मदद कर सकती हैं। वाह-वाह, यह समागम तो बहुत ही अच्छा हुआ। अगर आजकल मायारानी मुसीबत के दिन काट रही हैं तो क्या हुआ, मगर फिर भी वह तिलिस्म की रानी रह चुकी हैं और जो वह कर सकती हैं, किसी दूसरे से नहीं हो सकता। आप लोगों का एक हो जाना बहुत ही मुनासिब होगा, तब आप लोग जो चाहेंगी, कर सकेंगी।"
माधवीदेवी––(खुश होकर) मायारानी कहाँ हैं? उन्हें तो राजा वीरेन्द्रसिंह कैद करके चुनार ले गये थे।
लीला––जी हाँ, मगर मैं अभी कह चुकी हूँ कि मायारानी आखिर तिलिस्म की रानी हैं, इसलिए जो कुछ वह कर सकती हैं, किसी दूसरे के किए नहीं हो सकता। राजा वीरेन्द्रसिंह ने उन्हें कैद किया तो क्या हुआ, उनका छूटना कोई मुश्किल न था!
माधवीदेवी––बेशक-वेशक, अच्छा बताओ, वह कहाँ हैं?
लीला––यहाँ से थोड़ी दूर पर खड़ी हैं। किसी सरदार को भेजिये, उनका इस्तकबाल करके यहाँ ले आवे, दो-तीन सौ कदम से ज्यादा न चलना पड़ेगा।
माधवीदेवी––मैं खुद उन्हें लेने के लिए चलूँगी।
लीला––इससे बढ़कर और क्या हो सकता है? अगर आप उनकी इज्जत करेंगी तो वह भी आपके लिए जान तक देना जरूरी समझेंगी।
लीला ने अपनी लम्बी-चौड़ी बातों में माधवी को खूब उलझाया, यहाँ तक कि माधवी अपने साथ भीमसेन और कुबेरसिंह तथा सिपाहियों को लेकर मायारानी के पास गयी और उसे बड़ी खातिर और इज्जत के साथ अपने डेरे पर ले आई। जल मँगवाकर हाथ-मुँह धुलवाया और फिर बातचीत करने लगी।
माधवीदेवी––(मायारानी से) आपको वीरेन्द्रसिंह की कैद से छूट जाने पर मैं मुबारकबाद देती हूँ यद्यपि आपके लिए यह कोई बड़ी बात न थी।
मायारानी––बेशक, यह कोई बड़ी बात न थी, इस काम को तो अकेली मेरी सखी या ऐयारा लीला ही ने कर दिखाया। इस समय आपसे मिलकर मैं बहुत खुश हुई और इसमें अब शक करने की कोई जगह न रही कि आप पुनः गया की रानी और मैं जमानिया की मालिक बन जाऊँगी। दुनिया में एक का काम दूसरे हुआ ही करता है और जब हम आप एक दिल हो जायेंगे तो वह कौन-सा काम है जिसे नहीं कर सकते! मुझे आपके कैद होने की भी खबर लगी थी और मुझे इस बात का बहुत रंज था कि आपको मेरी छोटी बहिन कमलिनी ने कैदखाने की सूरत दिखाई थी।
माधवीदेवी––इधर तो यह सुनने में आया है कि आपसे और कमलिनी से कोई नाता नहीं है और लक्ष्मीदेवी भी प्रकट हो गई है। तथा उसे राजा वीरेन्द्रसिंह चुनार ले गये हैं।
मायारानी––(मुस्कुराकर) बेशक, ऐसा ही है, मगर जिस जमाने का मैं जिक्र कर रही हूँ, उस जमाने में वह मेरी ही बहिन कहलाती थी। और लक्ष्मीदेवी को राजा
च॰ स॰-5-1
वीरेन्द्रसिंह चुनार नहीं ले गये हैं, वह तो किशोरी, कामिनी, कमलिनी, लाड़िली और कमला के सहित किसी दूसरी ही जगह छिपाई गई हैं, मगर इसमें कोई सन्देह नहीं है कि कल शाम को गोपालसिंह उन सभी को जमानिया की तरफ ले जायेंगे और हम लोग उन्हें गोपालसिंह के सहित रास्ते ही में गिरफ्तार कर लेंगे।
माधवीदेवी––(ताज्जुब से) हाँ! क्या कल मैं दुष्टा किशोरी की नापाक सूरत देख सकूँगी! उस पर मुझे बड़ा ही रंज है, और कमलिनी ने तो मुझे कैद ही किया था।
मायारानी––बेशक, कल किशोरी और कमलिनी इत्यादि तुम्हारे कब्जे में होंगी और गोपालसिंह भी तुम्हारे काबू में होगा जो वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों की बदौलत तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन हो रहा है?
माधवीदेवी––निःसन्देह वह मेरा और तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है, तो क्या उसकी गिरफ्तारी का इन्तजाम हो चुका है?
मायारानी––हाँ, चौदह आना इन्तजाम हो चुका जो दो आना बाकी है सो वह भी हो जायगा।
माधवी––क्या बन्दोबस्त हुआ है? और किस समय तथा किस तरह वे लोग गिरफ्तार किये जायेंगे?
मायारानी––(इधर-उधर देखकर)बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो मैं केवल तुम्हीं से कहूँगी कोई दूसरा उसके सुनने का अधिकारी नहीं है।
माधवी––बहुत अच्छा यह कोई बड़ी बात नहीं है।
इतना कहकर माधवी ने भीमसेन और कुबेरसिंह की तरफ देखा क्योंकि माधवी मायारानी और लीला के सिवाय केवल ये ही दो आदमी वहाँ मौजूद थे। भीमसेन ने कहा, "हम दोनों यहाँ से हट जाते हैं, तुम लोग बेधड़क बातें करो मगर (मायारानी से)मेरे एक सवाब का जवाब पहले मिलना चाहिए।"
मायारानी––वह क्या?
भीमसेन––आप अभी कह चुकी हैं कि कल किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह गिरफ्तार हो जायेंगी मगर मैंने सुना था कि राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में पहुँच कर मनोरमा ने किशोरी, कामिनी और कमला को जान से मार डाला, अब इस समय कोई और ही बात सुनने में आ रही है।
माधवी––हाँ, यह सवाल मैं भी करने वाली थी लेकिन बातों का सिलसिला दूसरी तरफ चला गया और मैं पूछना भूल गई।
मायारानी––हाँ, यह बात अच्छी तरह सुनने में आई थी और मुझे विश्वास भी हो गया था कि वास्तव में ऐसा ही हुआ है मगर आज यह बात खुद गोपालसिंह की लिखावट से खुल गई कि वास्तव में वे तीनों मारी नहीं गई, परन्तु मुझे यह मालूम नहीं है कि इस विषय में किस तरह की चालाकी खेली गई या मनोरमा ने जिन्हें मारा, वे कौन थीं।
भीमसेन––तो निश्चय है कि वे तीनों मारी नहीं गई?
मायारानी––बेशक वे तीनों जीती हैं। (गोपालसिंह वाली चिट्ठी दिखाकर) देखो एक ही सबूत से मैं तुम्हारी दिलजमई कर देती हूँ, इसे पढ़ो और माधवी रानी को सुनाओ। (माधवी से) देखो बहिन, तुम इस बात का खयाल न करना कि मैं तुम्हें आप कहकर सम्बोधन नहीं करती, मेरा तुम्हारा अब दोस्ती और मुहब्बत का नाता हो चुका इसलिए अब इन बातों का खयाल नहीं हो सकता।
माधवी––मैं भी यही पसन्द करती हूँ और इस बारे में अपने लिए भी तुमसे पहले ही माफी माँग लेती हूँ।
भीमसेन ने पत्र पढ़ा और माधवी को सुनाया।
भीमसेन––इस पत्र से तो बड़ा काम निकल सकता है! यह कब का लिखा है और तुम्हारे हाथ क्योंकर लगा तथा जिस अँगूठी का इसमें जिक्र किया गया है वह कहाँ है?
मायारानी––(अँगूठी दिखाकर) अँगूठी भी मुझे मिल गई है और यह चिट्ठी आज ही की लिखी है और आज ही मेरे हाथ लगी है। अभी इसकी कार्रवाई बिल्कुल बाकी है।
भीमसेन––अफसोस इतना ही है कि मेरे ऐयारों में से कोई भी रामदीन को नहीं जानता …
मायारानी––क्या हर्ज है, यह मेरी ऐयारा लीला बखूबी उसकी तरह बनकर काम निकाल सकती है, तुम्हारे ऐयार इसकी मदद पर मुस्तैद रह सकते हैं, और यह जब रामदीन की सूरत बनेगी तो इसे अच्छी तरह देख भी सकते हैं।
भीमसेन––(चिट्ठी मायारानी के हाथ में देकर) अच्छा अब तुम दोनों को जो कुछ गुप्त बातें करनी हैं कर लो पीछे मैं इस विषय में कुछ कहूँ सुनूँगा।
इतना कहकर भीमसेन उठ खड़ा हुआ और कुबेरसिंह को साथ लिए हुए कुछ दूर चला गया और मौका समझकर लीला भी कुछ पीछे हट गई।
मायारानी––जो कुछ पीछे कहोगी-सुनोगी उसे मैं पहले ही निपटा देना चाहती हूँ। सच पूछो तो मेरी और तुम्हारी अवस्था बराबर है, तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूँ, क्योंकि मैं वास्तव में गोपालसिंह की स्त्री नहीं हूँ और यह बात सभी को मालूम हो गई, बल्कि तुम भी सुन चुकी होगी।
माधवी––हाँ, मैं सुन चुकी हूँ, और मैंने यह भी सुना था कि तुमने राजा गोपालसिंह को वर्षों तक कैद कर रखा था पर आखिर कमलिनी ने उन्हें छुड़ा दिया। तो तुमने ऐसा क्यों किया और उन्हें मार ही क्यों न डाला?
मायारानी––यही मुझसे भूल हो गई। तिलिस्म के दो-चार भेद जो मुझे मालूम न थे जानने के लिए मैंने ऐसा किया था, मुझे उम्मीद थी कि वह कैद की तकलीफ उठाकर बता देगा। तब उसे मार डालती तो आज यह दिन देखना नसीब न होता, मैं तिलिस्म की बदौलत अकेली ही राजा वीरेन्द्रसिंह ऐसे दस को जहन्नुम में पहुँचा देने की ताकत रखती थी। अब भी अगर गोपालसिंह को मैं पकड़ पाऊँ और मार सकूँ तो पुनः तिलिस्म की रानी होने से मुझे कोई भी रोक नहीं सकता और तब मैं बात-की-बात में तुम्हें राजगृही और गया की रानी बना सकती हूँ, मगर उस बात का सिलसिला तो टूटा ही जाता है। तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूँ, तुम भी नौजवान और आशिक-मिजाज मैं भी नौजवान और आशिक-मिजाज हूँ, तुम भी इन्द्रजीतसिंह के फेर में पड़कर दुःख भोग रही हो और मैं भी आनन्दसिंह की मुहब्बत में इस दशा तक आ पहुँची हूँ, अब भी मेरी और तुम्हारी किस्मतों का फैसला एक साथ और एक ही ठिकाने हो सकता है क्योंकि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी आजकल जमानिया में तिलिस्म तोड़ रहे हैं, अगर हम तुम एक होकर काम करें तो बहुत जल्द दुश्मनों का नाम-निशान मिटाकर अपने प्यारों के साथ दुनिया का सुख भोग सकती हैं, मगर इस समय तुम्हारे दो कंटक दिखाई देते हैं।
माधवी––हाँ, एक तो मेरा भाई भीमसेन, और दूसरा मेरा सेनापति कुबेरसिंह, मगर तुम इन दोनों का कुछ भी खयाल न करो, इस समय हमें इन दोनों को मिला-जुलाकर काम ले लेना चाहिए फिर तुम जैसा कहोगी वैसा किया जायेगा।
मायारानी––शाबाश-शाबाश! यही मालूम करने के लिए मैं तुमसे निराले में बातचीत किया चाहती थी क्योंकि ये बातें ऐसी हैं कि सिवाय मेरे और तुम्हारे किसी तीसरे का न जानना ही अच्छा है।
माधवी––निःसन्देह ऐसा ही है, हम दोनों के दिल की बातें हवा को भी मालूम न होनी चाहिए। आज बड़ी खुशी का दिन है कि हम दोनों जो एक ही तरह का दिल रखती हैं यहाँ पर आ मिली हैं, अब हम दोनों को हमेशा मेल-मिलाप रखने और समय पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करने के लिए कसम खाकर मजबूत हो जाना चाहिए।
पाठक, मायारानी और माधवी दोनों ही अपना मतलब देख रही हैं। दोनों ही धूर्त, दोनों ही खुदगरज, और दोनों विश्वासघातिनी हैं। इस समय कुछ देर तक दोनों में घुल-घुलकर बातें होती रहीं, वादे भी हुए और कसमें भी खाई गईं। इसके बाद फिर भीमसेन और कुबेरसिंह बुलाए गए तथा लीला भी आ गई और आपस में बातें होने लगीं।
भीमसेन––अच्छा तो अब क्या निश्चय किया जाता है? राजा गोपालसिंह की चिट्ठी लेकर जमानिया कौन जायेगा और क्या होगा?
मायारानी––पहले तुम अपनी राय दो।
भीमसेन––मेरी राय तो यह है कि लीला रामदीन की सूरत बना दीवानसाहब के पास जाये और वहाँ से उनकी फरमाइश लेकर 'पिपलिया घाटी' पहुँचे और हम लोग भी अपनी फौज लेकर वहीं मौजूद रहें। लीला को यह चाहिए कि उन दो सौ सवारों को जिन्हें जमानिया से अपने साथ लायेगी किसी वजह से पीछे टिकवा दे जिसमें गोपालसिंह के पहुँचते ही हम लोग बात-की-बात मे उन सभी को गिरफ्तार कर लें या मार डालें।
मायारानी––मगर यह बात मुझे नापसन्द है क्योंकि एक तो उसके लिखे अनुसार फौज 'पिपलिया घाटी' तक जरूर जायेगी, अगर मान लिया जाये कि नकली रामदीन के हुक्म से फौज पीछे रह भी जाये और तुम लोग उन सभी को गिरफ्तार कर लो तो भी हमारा काम न निकल सकेगा क्योंकि राजा गोपालसिंह के पकड़े या मारे जाने की खबर दीवान को तुरन्त लग जायेगी और वह अपनी फौज को दुरुस्त करके लड़ने के लिए तैयार हो जायेगा और हम लोगों को जमानिया के अन्दर कभी घुसने न देगा। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी जमानिया ही में तिलिस्म के अन्दर हैं, वे दोनों भी लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे और उस समय हम लोग फिर लंडूरे ही रह जायेंगे, इतना बखेड़ा करने का कुछ फायदा न निकलेगा, न तो जमानिया की गद्दी मिलेगी और न गया का राज्य।
भीमसेन––तब आप ही कहिए कि क्या करना चाहिये।
मायारानी––(कुबेरसिंह से) इस वक्त आपके पास कितनी फौज है?
कुबेरसिंह––पाँच सौ।
मायारानी––(माधवी से) ऐसा करना चाहिए कि हम तुम भीमसेन और कुबेरसिंह चारों आदमी जमानिया वाले तिलिस्मी बाग के अन्दर जा घुसे और इन पाँच सौ आदमियों को इस तरह तिलिस्मी बाग के अन्दर ले चलें और छिपा रखें कि किसी को कानों-कान खबर न हो, क्योंकि उस बाग में इतने आदमियों को छिपा रखने की जगह है और वह बाग भी इस लायक है कि अगर मैं उसके अन्दर मौजूद रहूँ तो चाहे कैसा ही जबरदस्त दुश्मन हो और चाहे कितनी ही ज्यादा फौज लेकर क्यों न चढ़ आवे मगर बाग के अन्दर किसी की नजर तक पहुँचने न दूँ।
माधवी––बेशक वह ऐसा ही सुनने आया है और तुम तो वहाँ की रानी ही ठहरी तथा तुम्हें वहाँ के सब भेद मालूम हैं, अच्छा तब?
मायारानी––जब किशोरी और कमलिनी इत्यादि को लेकर गोपालसिंह जमानिया जायेगा तो निःसन्देह सबको लिए उसी बाग में पहुँचेगा। बस उस समय हम लोग जो छिपे हुए रहेंगे, निकल आवेंगे और बात-की-बात में सभी को मार लेंगे। ऐसा से जमानिया में दखल भी बना रहेगा और इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह भी कब्जे में आ जायेंगे।
माधवी––(खुश होकर) बात तो बहुत ठीक है, मगर हम लोग इतने आदमियों को लेकर चुपचाप उस बाग के अन्दर किस तरह पहुँच सकते हैं?
मायारानी––इसका बन्दोबस्त इस तरह हो सकता है कि हम तुम भीमसेन और कुबेरसिंह एक साथ ही भेष बदलकर लीला के साथ जमानिया जायें और लीला दीवान साहब से कहे कि गोपालसिंह ने इन सभी अर्थात् हम लोगों को खास बाग के अन्दर पहुँचा देने का हुक्म दिया है। बस इतना कहकर हम लोगों को उस बाग के अन्दर पहुँचा दे क्योंकि दीवान इस नकली रामदीन की बात अँगूठी की बरकत से टाल न सकेगा और रामदीन पहले भी उस बाग के अन्दर आता-जाता था यह बात दीवान जानता है। जब हम लोग उस बाग के अन्दर जा पहुँचेंगे तो एक गुप्त रास्ते से कुल फौज को बाग के अन्दर ले लेंगे। इन फौजी सिपाहियों को उस सुरंग के मुहाने का पता बता दिया जायेगा जिसकी राह से हम सभी को खास बाग के अन्दर पहुँचावेंगे।
माधवी––यह बात तो तुमने बहुत ही अच्छी सोची! भीमसेन––इससे बढ़कर और कोई तरकीब फतेह पाने के लिए हो ही नहीं सकती!
कुबेरसिंह––और ऐसा करने में कोई टण्टा भी नहीं है।
लीला––बस, अब इसी राय को पक्की रखिए।
इसके बाद फिर सभी में बातचीत और राय होती रही यहाँ तक कि सवेरा हो या। मायारानी, माधवी, भीमसेन और कुबेरसिंह ने सूरतें बदल ली और लीला भी रामदीन बन बैठी। भीमसेन के चारों ऐयारों को सुरंग का पता-ठिकाना अच्छी तरह बता दिया गया और कह दिया गया कि उसी ठिकाने सुरंग के मुहाने पर फौजी सिपाहियों को लेकर इन्तजार करना, इसके बाद मायारानी, माधवी, भीमसेन, कुबेरसिंह और लीला ने घोड़ों पर सवार होकर जमानिया का रास्ता लिया।
6
दिन दो पहर से कुछ ज्यादा ढल चुका था जब जमानिया में दीवान साहब को रामदीन के आने की इत्तिला मिली। दीवान साहब ने रामदीन को अपने पास बुलाया और उसने दीवान साहब के सामने पहुँचकर गोपालसिंह की चिट्ठी उनके हाथ में दी तथा जब वे चिट्ठी पढ़ चुके तो अँगूठी भी दिखाई। दीवान साहब ने नकली रामदीन से कहा, "महाराज का हुक्म हम लोगों के सिर आँखों पर, तुम अँगूठी को पहन लो और हम लोगों को अपने हुक्म का पाबन्द समझो! सवारी और सवारों का इन्तजाम दो घड़ी के अन्दर हो जायेगा। तुम यहां रहोगे या सवारों के साथ जाओगे?" रामदीन ने कहा, "मैं सवारों के साथ ही राजा साहब के पास जाऊँगा मगर इस समय चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुँचाकर उनके खाने-पीने का इन्तजाम कर देना है जैसा कि हमारे राजा साहब का हुक्म है।"
दीवान––(ताज्जुब से) खास बाग के अन्दर?
रामदीन––जी, हाँ।
दीवान–और वे चारों आदमी हैं कहाँ पर?
रामदीन––उन्हें मैं बाहर छोड़ आया हूँ।
दीवान––(कुछ सोचकर) खैर, जो कुछ राजा साहब ने हुक्म दिया हो या जो तुम्हारे जी में आवे वह करो। अब हम लोगों को तो रोकने-टोकने का अधिकार ही नहीं रहा।
रामदीन सलाम करके उठ खड़ा हुआ और अपने चारों साथियों को लेकर तिलिस्मी बाग के अन्दर चला गया जहाँ इस समय बिल्कुल ही सन्नाटा था। अँगूठी के खयाल से उसे किसी ने भी नहीं रोका और मायारानी बे-खटके अपने ठिकाने पहुच गई तथा लुकने-छिपने और दरवाजों को बन्द करने लगी। अब हम रामदीन के साथ राजा गोपालसिंह की तरफ रवाना होते हैं और देखते हैं कि बनी-बनाई बात किस तरह चौपट होती है।
संध्या होने से पहले खाने-पीने का सामान, चार रथ और दो सौ सवारों को लेकर नकली रामदीन पिपलिया घाटी की तरफ रवाना हुआ और दूसरे दिन दोपहर के बाद वहाँ पहुँचा।
आज ही संध्या होने के पहले राजा गोपालसिंह यहाँ पहुँचने वाले थे यह बात रामदीन की जुबानी सभी को मालूम हो चुकी थी और सभी आदमी उनके आने का इन्तजार कर रहे थे।
संध्या हो गई, चिराग जल गया, पहर रात गई, दोपहर रात गुजरी, आखिर तमाम रात बीत गई, मगर राजा गोपालसिंह नहीं आये, इसलिए नकली रामदीन के ताज्जुब का तो कहना ही क्या? उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं, मगर इसके अतिरिक्त जितने फौजी सवार तथा अन्य लोग साथ आये थे उन सबको भी बहुत ताज्जुब हुआ और वे घड़ी-घड़ी राजा साहब के न आने का सबब उससे पूछने लगे, मगर रामदीन क्या जवाब देता? उसे इन बातों की खबर क्या थी!
दूसरे दिन संध्या के समय राजा गोपालसिंह घोड़े पर सवार वहाँ आ पहुँचे मगर अकेले थे, साईस तक साथ न था। सिपाहियाना ठाठ से बेशकीमत कपड़ों के ऊपर तिलिस्मी कवच खंजर और ढाल-तलवार लगाये बहुत ही सुन्दर तथा रोआबदार मालूम होते थे। सभी ने झुककर सलाम किया और नकली रामदीन ने आगे बढ़कर घोड़े की लगाम थाम ली तथा उसकी गर्दन पर चार थपकी देकर कहा, "आश्चर्य है कि आपके आने में पूरे आठ पहर की देर हो गई है और फिर भी अकेले ही हैं!"
यह सुनकर राजा साहब ने कई पल तक रामदीन का मुँह देखा और तब कहा, "हाँ, किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह ने हमारे साथ आने से इनकार किया इसलिये हम अकेले ही आये हैं और हमारे जाने में रात भर की देर है। इस समय हम किसी काम को जाते हैं सवेरे यहाँ आयेंगे, तब तक तुम सभी को इस घाटी में टिके रहना होगा!"
रामदीन––घोड़ों का दाना तो सिर्फ एक ही दिन का आया था, और सवार लोग भी …
गोपालसिंह––खैर, क्या हर्ज है, घोड़े चराई पर गुजर कर लेंगे और सवार लोग रात भर फाका करेंगे।
JIM – Assistente
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