चन्द्रकांता सन्तति 3
आपस में ताज्जुब से भरी बातें करने के बाद और पाँच सिपाही उस कोठरी के अन्दर घुसे जिसमें दोनों नकाबपोश थे और पहले पाँचों की तरह ये पांचों भी चौथाई घड़ी तक उस कोठरी के अन्दर रहे। इसके बाद जब बाहर निकले तो इन पाँचों की भी वही अवस्था थी जैसी उन पाँचों की जो इनके पहले कोठरी के अन्दर से हो कर आए
थे। इसके बाद फिर पांच सिपाही कोठरी के अन्दर घुसे और इनकी भी वही अवस्था हुई, यहाँ तक कि जितने सिपाही वहाँ मौजूद थे पाँच-पाँच करके सभी कोठरी के अन्दर से हो आए और सब ही की वही अवस्था हुई जैसी पहले गये हुए पाँचों सिपाहियों की हुई थी। धनपत ताज्जुब-भरी निगाहों से यह तमाशा देख और असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रहा था मगर इतनी हिम्मत न पड़ती थी कि किसी से कुछ पूछता, क्योंकि नकाबपोशों की आज्ञानुसार सिपाहियों की तरह वह उस कोठरी के अन्दर जाने नहीं पाया था जिसमें दोनों नकाबपोश थे। अन्त में सब सिपाहियों ने आपस में बातें करके इशारे में इस बात का निश्चय कर लिया कि कोठरी के अन्दर उन सभी ने एक ही रंगढंग का तमाशा देखा था।
थोड़ी देर बाद दोनों नकाबपोश उस कोठरी के बाहर निकल आए और उनमें से नाटे नकाबपोश ने सिपाहियों की तरफ देख कर कहा, "धनपत को मेरे हवाले करो।" सिपाहियों ने कुछ भी उज्र न किया बल्कि बहुत अदब के साथ आगे बढ़कर धनपत को नकाबपोश के हवाले कर दिया। दोनों नकाबपोश उसे साथ लिये हुए फिर उस कोठरी के अन्दर घुस गये और आधे घंटे तक वहाँ रहे, इसके बाद जब कोठरी के बाहर निकले तो नाटे नकाबपोश ने सिपाहियों से कहा, "धनपत को हमने ठिकाने पहुंचा दिया है, अब आओ, तुम लोगों को भी इस बाग के बाहर कर दें।" सिपाहियों ने कुछ भी उज्र न किया और दो-तीन झुण्डों में होकर नकाबपोश के साथ-साथ उस कोठरी के अन्दर गए और गायब हो गए। दोनों नकाबपोश भी उसी कोठरी के अन्दर जाकर गायब हो गये और उस कोठरी का दरवाजा भीतर से बन्द हो गया।
इस पचड़े में दो पहर दिन चढ़ आया, लीला दूर से खड़ी यह तमाशा देख रही थी, जब सन्नाटा हो गया तो वह भी लौटी और उसने इन बातों की खबर मायारानी तक पहुंचाई।
6
लीला की जुबानी दोनों नकाबपोशों, सिपाहियों और धनपत का हाल मनकर मायारानी बहुत ही उदास और परेशान हो गई। वह आशा जो तिलिस्मी दरवाजा बन्द करने और बेहोशी का अद्भुत धूरा छिड़ककर पर उसे बंधी थी, बिल्कूल जाती थी। तिलिस्म में जाकर तिलिस्मी दरवाजे को बन्द करना, तिलिस्मी दवा पीना और लीला को पिलाना, बेहोशी की बुकनी फूलों के गमलों में डालना-सब बिल्कुल ही व्यर्थ हो गया। धनपत दोनों नकाबपोशों के कब्जे में पड़ गया और सब सिपाही भी सहज ही में बाग के बाहर हो गये। इस समय उन दोनों नकाबपोशों की कार्रवाइयों ने से ना बदहवास कर दिया कि वह अपने बचाव की कोई अच्छी सूरत सोच नहीं सकती थी। आखिर वह हर तरह से दुःखी होकर फिर उसी तहखाने के अन्दर गई जिसमें पहली
दफा जाकर बाग के दूसरे दर्जे का दरवाजा तिलिस्मी रीति से बन्द किया था। हम ऊपर लिख आये हैं कि वहाँ दीवार में बिना दरवाजे की पाँच आलमारियाँ थीं और एक आलमारी में ताँबे के बहुत से डिब्बे रक्खे थे। इस समय मायारानी ने उन्हीं डिब्बों को खोल-खोल कर देखना शुरू किया। ये डिब्बे छोटे और बड़े हर प्रकार के थे। कई डिब्बे खोल-खोल कर देखने के बाद मायारानी ने एक डिब्बा खोला जिसका पेटा एक हाथ से कम न होगा। उस डिब्बे में एक हाथीदाँत का तमंचा बारह अंगुल का और छोटी-छोटी बहुत-सी गोलियाँ रक्खी हुई थीं। उन गोलियों का रंग लाल था, और उनके अलावा एक ताम्रपत्र भी उस डिब्बे के अन्दर था। मायारानी इस डिब्बे को लेकर वहाँ से रवाना हुई और तहखाने का दरवाजा बन्द करती हुई अपने स्थान पर उस जगह पहुंची जहाँ उसकी लौंडियाँ उसकी राह देख रही थीं। उसने सब लौंडियों के सामने ही उस डिब्बे को खोला और ताम्रपत्र हाथ में लेकर पढ़ने लगी, जब पूरी तरह पढ़ चुकी तो लीला की तरफ देखकर बोली, "तू देखती है कि मैं किस बला में फंस गई हूँ?"
लीला-जी हाँ, मैं बखूबी देख रही हूँ। दोनों नकाबपोशों की तरफ जब ध्यान देती हूँ तो कलेजा काँप जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अब कोई भारी उपद्रव उठने वाला है क्योंकि नकाबपोशों की बदौलत इस बाग के सिपाही भी बागी हो गए हैं।
मायारानी-बेशक ऐसा ही है और ताज्जब नहीं कि वे सिपाही लोग जो इस समय मेरे पंजे से निकल गए हैं मेरे बाकी के फौजी सिपाहियों को भी भड़कावें।
लीला-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं, बल्कि इन सिपाहियों की बदौलत आपकी रिआआ भी बागी हो जायगी और तब जान बचाना मुश्किल हो जायगा। अफसोस, आपने व्यर्थ ही अपने दोनों भेद मुझसे छिपा रक्खे, नहीं तो मैं इस विषय में कुछ राय देती!
मायारानी-(ताज्जुब से) दोनों भेद कौन से? लीला-एक तो यही धनपत वाला। मायारानी–हाँ, ठीक है, और दूसरा कौन?
लीला-(मायारानी के कान की तरफ झुक कर धीरे से) राजा गोपालसिंह वाला, जिन्हें भूतनाथ की मदद से आपने मार डाला!
लीला की बात सुनकर मायारानी चौंक पड़ी, वह अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और लीला का हाथ पकड़ के किनारे ले जाकर धीरे-से बोली, "देख लीला, तू केवल मेरी लौंडियों की सरदार ही नहीं बल्कि बचपन की साथी और मेरी सखी भी है। सच बता, गोपालसिंह वाला भेद तुझे कैसे मालूम हुआ?"
लीला-आप जानती ही हैं कि मुझे कुछ ऐयारी का भी शौक है।
मायारानी– हाँ, मैं खूब जानती हूँ कि तू ऐयारी भी कर सकती है लेकिन इस किस्म का काम मैंने तुझसे कभी लिया नहीं।
लीला—यह मेरी बदकिस्मती थी, नहीं तो मैं अब तक ऐयारा की पदबी पा चुकी होती।
मायारानी-ठीक है, खैर, तो इससे मालूम हुआ कि तूने ऐयारी से गोपालसिंह
वाला भेद मालूम कर लिया?
लीला-जी हाँ, ऐसा ही है। मैंने ऐयारी से और भी बहुत से भेद मालूम कर लिये हैं जिनकी खबर आपको भी नहीं और जिनको इस समय कहना मैं उचित नहीं समझती, मगर शीघ्र ही उस विषय में मैं आपसे बातचीत करुँगी। इस समय तो मुझे केवल इतना ही कहना है कि किसी तरह अपनी जान बचाने की फिक्र कीजिये क्योंकि मुझे भूतनाथ की दोस्ती पर शक है।
मायारानी-क्या तू समझती है कि भूतनाथ ने मुझे धोखा दिया?
लीला-जी हाँ, बल्कि मैं तो यही समझती हूँ कि राजा गोपालसिंह मारे नहीं गये, बल्कि जीते हैं।
मायारानी-अगर ऐसा है तो बड़ा ही गजब हो जायगा। मगर इसका कोई सबूत भी है?
लीला-आज तो नहीं, मगर कल तक मैं इसका सबूत आप को दे सकूँगी।
मायारानी-अफसोस, अफसोस! मैं इस समय किले में जा कर अपने दीवान से राय लेने वाली थी मगर अब तो कुछ और ही सोचना पड़ा।
लीला-(उस डिब्बे की तरफ इशारा करके जो अभी तिलिस्मी तहखाने में से मायारानी लाई थी) पहले यह बताइये कि इस डिब्बे को आप किस नीयत से लाई हैं? यह हाथीदाँत का तमंचा कैसा है और ये गोलियां क्या काम दे सकती हैं?
मायारानी—ये गोलियाँ इसी तमंचे में रख कर चलाई जायँगी। इसके चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती और गोली भी आध कोस तक जा सकती है। जब यह बोली किसी के बदन पर लगेगी या जमीन पर गिरेगी तो एक आवाज देकर फट जायगी और इसके अन्दर से बहुत-सा जहरीला धुआँ निकलेगा। वह धुआं जिसकी नाक में जायगा वह आदमी फौरन ही बेहोश हो जायगा। अगर हजार आदमियों की भीड़ आ रही हो तो उन सभी को बेहोश करने के लिए केवल दस-पांच गोलियाँ काफी हैं।
लीला-बेशक यह बहुत अच्छी चीज है और ऐसे समय में आपको बड़ा काम दे सकती है, मगर मैं समझती हूँ कि उस डिब्बे में पांच सौ से ज्यादा गोलियाँ न होंगी, इसके बाद कदाचित् वह ताम्रपत्र कुछ काम दे सके जो उस डिब्बे में है और जिसे आपने लोगों के सामने पढ़ा था।
मायारानी-वाह तुम बहुत समझदार हो। बेशक ऐसा ही है। इस ताम्रपत्र में उन गोलियों के बनाने की तरकीब लिखी है। इस तिलिस्म में ऐसी हजारों चीजें हैं मगर लाचार हूँ कि तिलिस्म का पूरा हाल मुझे मालूम नहीं है बल्कि चौथे दर्जे के विषय में तो मैं कुछ भी नहीं जानती। फिर भी जो कुछ मैं जानती हैं या जहाँ तक तिलिस्म में मैं जा सकती हूँ वहाँ ऐसी और भी कितनी ही चीजें हैं जो समय पर मेरे काम आ सकती हैं।
लीला-अब यही समय है कि उन चीजों को लेकर आप यहाँ से चल दीजिये क्योंकि इस बाग तथा आपके राज्य पर अब आफत आना ही चाहती है। मैंने सुना है कि
1.ताम्रपत्र-तांबे की तख्ती जिस पर कुछ लिखा या खुदा हुआ हो।
राजा वीरेन्द्रसिंह की बेशुमार फौज जमानिया की तरफ आ रही है, बल्कि यों कहना चाहिए कि आज-कल में पहुँचना ही चाहती है।
मायारानी—हाँ, यह खबर मैंने भी सुनी है। यदि गोपालसिंह का और धनपत का मामला न बिगड़ा होता तो मैं मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाती, परन्तु इस समय तो मुझे अपनी रिआया में से किसी का भी भरोसा नहीं।
लीला-भरोसे के साथ-ही-साथ आप समझ रखिए कि आप अपने किसी नौकर पर हकूमत की लाल आँख भी अब नहीं दिखा सकतीं। मगर इन बातों में वृथा देर हो रही है। इस विषय को बहुत जल्द तय कर लेना चाहिए कि अब क्या करना और कहाँ जाना मुनासिब होगा।
मायारानी–हाँ, ठीक है मगर इसके भी पहले मैं तुमसे यह पूछती हूँ कि तुम इस मुसीबत में मेरा साथ देने के लिए कब तक तैयार रहोगी?
लीला-जब तक मेरी जिन्दगी है या जब तक आप मुझ पर भरोसा करेंगी।
मायारानी—यह जवाब तो साफ नहीं है, बल्कि टेढ़ा है।
लीला-इस पर आप अच्छी तरह गौर कीजिएगा मगर यहाँ से निकल चलने के बाद।
मायारानी-अच्छा, यह तो बताओ कि मेरी और लौंडियों का क्या हाल है?
लीला-आपकी लौंडियाँ केवल चार-पाँच ऐसी हैं जिन पर मैं भरोसा कर सकती हैं, बाकी लौंडियों के विषय में मैं कुछ भी नहीं कह सकती और न उनके दिल का हाल ही जाना जा सकता है।
मायारानी-(ऊँची साँस लेकर) हाय, यहाँ तक नौबत पहुँच गई! यह सब मेरे पापों का फल है। अच्छा जो होगा देखा जायगा। इस अनूठे तमंचे और गोलियों को मैं सम्हालती हूँ और थोड़ी देर के लिए पुनः तिलिस्मी तहखाने में जाकर देखती हूँ कि मेरे काम की ऐसी कौन-सी चीज है जिसे सफर में अपने साथ ले जा सकूँ। जो कुछ हाथ लगे सो ले आती हूँ और बहुत जल्द तुमको और उन लौंडियों को साथ लेकर निकल भागती हैं जिन पर तुम भरोसा रखती हो। कोई हर्ज नहीं, इस गई-गुजरी हालत में भी मैं एक दफा लाखों दुश्मनों को जहन्नुम पहुंचाने की हिम्मत रखती हैं!
इसके जवाब में पीछे की तरफ से किसी गुप्त मनुष्य ने कहा-"बेशक-बेशक, तुम मरते-मरते भी हजारों घर चौपट करोगी!"
7
ऐयारी भाषा की चिट्ठी को पढ़ने और कमलिनी के ढाढ़स दिलाने पर कुँवर इन्द्रजीतसिंह की दिलजमई तो हो गई परन्तु 'टेप' का परिचय पाने के लिए वे बेचैन हो हो रहे थे अस्तु उससे मिलने की आशा में दरवाजे की तरफ ध्यान लगाकर थोड़ी देर तक खड़े हो गए। यकायक उस मकान का दरवाजा खुला और धनपत की कलाई पकड़े
'टेप' महाशय अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए आते दिखाई दिये। दरवाजे के बाहर निकलते ही 'टेप' ने अपने चेहरे पर से नकाब हटा दी, सूरत देखते ही कुँअर इन्द्रजीतसिंह हँस पड़े और लपक के उनकी कलाई पकड़ कर बोले, "अहा, यह किसे आशा थी कि यहाँ पर राजा गोपालसिंह से मुलाकात होगी? (कमलिनी की तरफ देख कर) तो क्या इन्हीं ने अपना नाम 'टेप' रक्खा है?"
कमलिनी-जी हाँ।। इन्द्रजीतसिंह-(गोपालसिंह से) क्या आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर है?
गोपालसिंह-जी हाँ, आप मकान के अन्दर चलिये और उनसे मिलिये।
इन्द्रजीतसिंह-एक औरत के रोने की आवाज हम लोगों ने सुनी थी, शायद वह भी इसी मकान के अन्दर हो।
गोपालसिंह–जी नहीं, वह कम्बख्त औरत (धनपत की तरफ इशारा कर) यही है! न मालूम ईश्वर ने इस हरामजादे को कैसा मर्द बनाया है कि आवाज से भी कोई इसे मर्द नहीं समझ सकता!
कमलिनी-इसे आपने कब पकड़ा?
गोपालसिंह-यह कल से मेरे कब्जे में है और मैं कल ही इसे इस मकान में कैद कर गया था, बल्कि आज छुड़ाने के लिए आया था।
इन्द्रजीतसिंह-तो आप कल भी इस मकान में आ चुके हैं! मगर मुझसे मिलने के लिए शायद कसम खा चुके थे!
गोपालसिंह-(हँसकर) नहीं-नहीं, मेरा वह समय बड़ा ही अनमोल था, एकएक पल की देर बुरी मालूम होती थी; इसी से आपसे मिलने के लिए मैं रुक न सका। इसका खुलासा हाल आप सुनेंगे तो बहुत ही हँसेंगे और खुश होंगे। मगर पहले मकान के अन्दर चलकर आनन्दसिंह से मिल लीजिए, तब यह अनूठा किस्सा आपसे कहूँगा।
इन्द्रजीतसिंह-क्या आनन्द यहाँ तक नहीं आ सकता?
गोपालसिंह-नहीं, वे यहाँ नहीं आ सकते। वे तिलिस्मी कारखाने में फंस चके हैं, इसलिए छूटने का उद्योग नहीं कर सकते, बल्कि वे तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं और उसे तोड़कर निकल आ सकते हैं। मगर अब उनसे मिलने में देर न कीजिए।
इन्द्रजीतसिंह–आप जिस काम के लिए गये थे वह हुआ?
गोपालसिंह-वह काम भी बखूबी हो गया, उसका खुलासा हाल थोड़ी देर में आपसे कहूँगा।
कमलिनी-भूतनाथ को आपने कहाँ छोड़ा?
गोपालसिंह-वह भी आता ही होगा। वास्तव में वह बड़ा ही चालान धूर्त ऐयार है। उसने जो काम किए हैं तुम सुनोगी तो हँसते-हँसते लोटन काबूतर बन जाओगी। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) आप आनन्दसिंह के फंसने से दु:खी क्योंकि आप दोनों भाइयों के लिए इस तिलिस्म का तोड़ना जरूरी हो चुका है।
इन्द्रजीतसिंह-ठीक है, मगर रिक्तगन्थ का पूरा-पूरा मतलब उसकी सारी नहीं आया है और इसके तिलिस्म के काम में उसे तकलीफ होना सम्भव है। उसमें दस
बारह शब्द ऐसे हैं, जिनका अर्थ नहीं लगता और उन शब्दों का अर्थ जाने बिना बहुत-सी बातों का मतलब समझ में नहीं आता।
गोपालसिंह-(हँसकर) आपका यह कहना ठीक है, मगर मैं एक बात आपको ऐसी बताता हूँ कि जिससे आप हर एक तिलिस्मी ग्रन्थ को अच्छी तरह पढ़ और समझ लेंगे और उनमें चाहे कैसे भी टेढ़े शब्द क्यों न हों, मगर मतलब समझने में कठिनता न होगी।
इन्द्रजीतसिंह–वह क्या?
गोपालसिंह केवल एक छोटी-सी बात है।
इन्द्रजीतसिंह-मगर उसके बताने में आप हुज्जत बड़ी कर रहे हैं।
गोपालसिंह ने झुककर इन्द्रजीतसिंह के कान में कुछ कहा, जिसे सुनते ही कुमार हँस पड़े और बोले, "बेशक, बड़ी चतुराई की गई है! जरा-से फेर में मतलब कैसा बिगड़ जाता है! आपका कहना बहुत ठीक है। अब कोई शब्द ऐसा नहीं निकलता जिसका अर्थ मैं न लगा सकूँ! क्यों न हो, आखिर आप तिलिस्म के राजा जो ठहरे।"
कमलिनी से इस समय चुप न रहा गया, वह ताने के तौर पर सिर नीचा करके बोली, "बेशक, राजा ही ठहरे, इसी से तो बेमुरौवती कूट-कूटकर भरी है!" इसके जवाब में गोपालसिंह ने कहा, "नहीं-नहीं, ऐसा मत खयाल करो! तुम्हारा उदास चेहरा कहे देता है कि तुम्हें इस बात का रंज है कि हमने जो कुछ कुमार के कान में कहा, उससे तुमको जानबूझ के वंचित रखा, मगर नहीं (धनपत की तरफ इशारा करके) इस कम्बख्त के खयाल से मैंने ऐसा किया। आखिर वह भेद तुमसे छिपा न रहेगा।"
इस पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने एक विचित्र निगाह कमलिनी पर डाली, जिसे देखते ही वह हँस पड़ी और मकान के अन्दर जाने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी। कुँवर इन्द्रजीतसिंह, कमलिनी, लाडिली और उनके साथ ही धनपत का हाथ पकड़ हुए राजा गोपालसिंह उस मकान के अन्दर चले।
इस मकान की हालत हम ऊपर लिख आये हैं। इसलिए पुनः नहीं लिखते। गोपालसिंह सभी को साथ लिए हुए उस कोठरी में पहँचे, जिसमें कुँवर आनन्दसिंह फंसे हुए थे, मगर इस समय वहाँ की अवस्था वैसी न थी जैसी कि हम ऊपर लिख आये हैं, अर्थात् वह तिलिस्मी सन्दूक, जिसमें आनन्दसिंह का हाथ फंस गया था, वहाँ न था और न आनन्दसिंह वहाँ थे। हाँ, उस कोठरी की जमीन का वह हिस्सा जिस पर सन्दूक था, जमीन के अन्दर धंस गया था और वहाँ एक कुएँ की शक्ल दिखाई दे रही थी। यह देख राजा गोपालसिंह ताज्जुब में आ गये और उस कुएँ की तरफ देखकर कुछ सोचने लगे, आखिर कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने उन्हें टोका और चुप रहने का सबब पूछा।
इन्द्रजीतसिंह-आप अब क्या सोच रहे हैं। शायद आनन्दसिंह को आपने इसी कोठरी में छोड़ा था?
गोपालसिंह-जी हाँ, इस जगह जहाँ आप कुएँ की तरह का गड्ढा देखते हैं, एक सन्दूक था और उसमें एक छेद था, उसी छेद के अन्दर हाथ डालकर कुमार ने अपने को फंसा लिया था। मालूम होता है कि अब वे तिलिस्म के अन्दर चले गये। इसी
खयाल से मैंने आपसे कहा था कि कुँवर आनन्दसिंह अपने को छुड़ा नहीं सकते, बल्कि तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं।
इन्द्रजीतसिंह-अफसोस! खैर, मर्जी परमेश्वर की! इस समय मेरा दिमाग परेशान हो रहा है। धनपत को मैं इस अवस्था में क्यों देख रहा हूँ? यकायक आपका इस बाग में आना कैसे हुआ? आप मुझसे मिले बिना सीधे इस मकान में क्यों आये? आनन्द को इस मकान में आपने ठहरने क्यों दिया अथवा उसे बचाने का उद्योग क्यों न किया? इत्यादि बहुत-सी बातें जानने के लिए मैं इस समय परेशान हो रहा है, मगर इसके पहले मैं इस कुएँ की अवस्था जानने का उद्योग करूँगा। (कमलिनी की तरफ देखकर) जरा तिलिस्मी खंजर मुझे दो, उसके जरिये से इस कुएँ में उजाला करके मैं देखूँगा कि इसके अन्दर क्या है?
कमलिनी-(तिलिस्मी खंजर और अंगूठी कुमार के सामने रखकर) लीजिए, शायद इससे कुछ काम चले!
कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने अँगूठी पहनकर खंजर हाथ में लिया और धीरे-धीरे उस गड्ढे के किनारे गये जो ठीक कुएँ की तरह का हो रहा था। खंजर वाला हाथ कुमार ने कुएं के अन्दर डाला और उसका कब्जा दबाकर उजाला करने के बाद झाँककर देखा कि उसके अन्दर क्या है। न मालूम कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने कुएँ के अन्दर क्या देखा कि वे यकायक बिना किसी से कुछ कहे तिलिस्मी खंजर हाथ में लिए उस कुएँ के अन्दर कूद पड़े। यह देखते ही कमलिनी और लाड़िली परेशान हो गयीं और राजा गोपालसिंह को भी बहुत ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह की तरह राजा गोपालसिंह ने भी अपना तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर कुएँ अन्दर किया और उसका कब्जा दबा रोशनी करने के बाद झाँककर देखा कि क्या बात है मगर कुछ दिखाई न पड़ा।
कमलिनी-कुछ मालूम हुआ कि इस गड्ढे में क्या है?
गोपालसिंह–कुछ भी मालूम नहीं होता, न जाने क्या देखकर कुमार इसमें कूद गये।
कमलिनी-खैर, आप यहाँ से हटिये और सोचिये कि अब क्या करना होगा?
गोपालसिंह-यद्यिप मैं जानता हूँ कि यह तिलिस्म कुमार के ही हाथ से टूटेगा, परन्तु इस रीति से दोनों कुमारों का तिलिस्म के अन्दर जाना ठीक न हुआ। देखना चाहिए, ईश्वर क्या करता है? चलो, अब यहाँ रहना उचित नहीं है और न कुमार से मुलाकात होने की ही कोई आशा है।
कमलिनी-(अफसोस के साथ) चलिये।
गोपालसिंह-(बाहर की तरफ चलते हुए) अफसोस! कुमार से कई बातें कहने की आवश्यकता थी, मगर लाचार!
कमलिनी-(धनपत की तरफ इशारा करके) इसे आप कहाँ-कहाँ लिए फिरेंगे और यहाँ क्यों लाए थे?
गोपालसिंह-इसे मैं कल गिरफ्तार करके इसी मकान के अन्दर छोड़ गया था।
मुझे आशा थी कि यह स्वयं इस मकान से बाहर न निकल सकेगा, मगर आज इस मकान में आकर देखा तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ। इस मकान के तीन दरवाजे यह खोल चुका था और चौथा दरवाजा खोलना ही चाहता था। न मालूम इस मकान का भेद इसे क्योंकर मालूम हुआ।
कमलिनी-इसे आपने किस रीति से गिरफ्तार किया?
गोपालसिंह-पहले इस कम्बख्त का इन्तजाम कर लूं तो इसका अनूठा किस्सा कहूँ।
कमलिनी और लाडिली के साथ धनपत को पकड़े हुए राजा गोपालसिंह उस मकान के बाहर आये और देवमन्दिर की तरफ रवाना होकर उसके पश्चिम की तरफ वाले मकान के पास पहुँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि देवमन्दिर के पश्चिम की तरफ वाले मकान के पास दरवाजे पर हड्डियों का एक ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी हुई थी, जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँ के अन्दर गया हुआ था।
धनपत को घसीटते हुए राजा गोपालसिंह उसी कुएँ पर गये और उस हरामजादे स्त्री-रूपधारी मर्द को जबर्दस्ती उसी कुएँ के अन्दर धकेल दिया। इसके साथ ही उस कुएँ के अन्दर से धनपत के चिल्लाने की आवाज आने लगी। परन्तु राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाड़िली ने उस पर कुछ ध्यान न दिया। तीनों आदमी देवमन्दिर में आकर बैठ गये और बातचीत करने लगे।
कमलिनी-हां, अब आप पहले यह कहिये कि भूतनाथ ने क्या किया? मैंने उसे आपके पास भेजा था। इसलिए पूछती हूँ कि उसने अपना काम ईमानदारी से किया या नहीं?
गोपालसिंह-बेशक, भूतनाथ ने अपना काम हद से ज्यादा ईमानदारी के साथ किया। वह जाहिर में मायारानी के साथ ऐसा मिला कि उसे भूतनाथ पर विश्वास हो गया और वह यह समझने लगी कि भूतनाथ इनाम की लालच से मेरा काम उद्योग के साथ करेगा।
कमलिनी–हाँ, उसने मायारानी के साथ मेल पैदा करने का हाल मुझसे कहा था। (मुस्कराकर) अजीब ढंग से उसने मायारानी को धोखा दिया। हमारी तरफ की मामूली सच्ची बातें कहकर उसने अपना काम पूरा-पूरा निकाला, मगर मैं उसके बाद का हाल पूझती हूँ, जब मैंने उसे आपके पास काशी में भेजा था, क्योंकि उसके बाद अभी तक वह मुझसे नहीं मिला।
गोपालसिंह-उसके बाद तो भतनाथ ने दो-तीन काम बडे अनठे किये, जिनका खुलासा हाल मैं तुमसे कहूँगा। लेकिन उन कामों में एक काम सबसे बढ़-चढ़ के हुआ।
कमलिनी-वह क्या?
गोपालसिंह-उसने मायारानी से कहा कि मैं गोपालसिंह को गिरफ्तार करके दारोगा वाले मकान में कैद कर देता हूँ, तुम उसे अपने हाथ से मारकर निश्चिन्त हो जाओ। यह सुनकर मायारानी बहुत ही खुश हुई और भूतनाथ ने भी वह काम बड़ी खुशी के साथ किया। बल्कि इसके इनाम में अजायबघर की ताली मायारानी से ले ली!
कममिनी—क्या अजायबघर की ताली भूतनाथ ने ले ली?
गोपालसिंह―हाँ।
कमलिनी—यह बड़ा काम हुआ और इस काम के लिए मैंने उसे सख्त ताकीद की थी। अब वह ताली किसके पास है?
गोपाससिंह―ताली मेरे पास है, मुझे आशा न थी कि भूतनाथ मुझे देगा, मगर उसने कोई उज्र न किया।
कमलिनी―वह आपसे किसी तरह उज्र नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने उसे कसम देकर कह दिया था कि जितना मुझे मानते हो, उतना ही राजा गोपालसिंह को मानना। असल बात तो यह है कि भूतनाथ बड़े काम का आदमी है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह राजा वीरेन्द्रसिंह का गुनहगार है और उसने सजा पाने लायक काम किया है, मगर वह कसूर उससे धोखे में हुआ। इश्क का भूत उसके ऊपर सवार था और उसी ने उससे वह काम कराया, पर वास्तव में उसकी नीयत साफ है और उस कसूर का उसे सख्त रंज है, ऐसी अवस्था में जिस तरह हो, उसका कसूर माफ होना ही चाहिए।
गोपालसिंह―बेशक-बेशक, और उसके बाद तुम्हारी बदौलत उसके हाथ से कई ऐसे काम निकले हैं, जिनके आगे वह कसूर कुछ भी नहीं है।
कमलिनी―अच्छा अब खुलासा कहिए कि भूतनाथ ने आपके मारने के विषय में किस तरह महारानी को धोखा दिया और अजायबघर की ताली क्योंकर ली?
राजा गोपालसिंह के विषय में भूतनाथ ने जिस तरह मायारानी को धोखा दिया था, उसका हाल हम ऊपर के बयानों में लिख आये हैं। इस समय वही हाल राजा गोपालसिंह ने अपने तौर पर कमलिनी से बयान किया। ताज्जुब नहीं कि भूतनाथ के विषय में हमारे पाठकों को धोखा हुआ हो और वे समझ बैठे हों कि भूतनाथ वास्तव में मायारानी से मिल गया, मगर नहीं। उन्हें अब मालूम हुआ होगा कि भूतनाथ ने मायारानी से मिलकर केवल अपना काम साधा और मायारानी को हर तरह से नीचा दिखाया।
8
अहा, ईश्वर की महिमा भी कैसी विचित्र है! बुरे कर्मों का बुरा फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। जो मायारानी अपने सामने किसी को कुछ समझती ही न थी, वही आज किसी के सामने जाने या किसी को मुँह दिखाने का साहस नहीं कर सकती। जो मायारानी कभी किसी से डरती ही न थी, वही आज एक पत्ते के खड़खड़ाने से भी डर कर बदहवास हो जाती है। जो मायारानी दिन-रात हँसी-खुशी में बिताया करती थी, वह आज रो-रोकर अपनी आँखें सुजा रही है। संध्या के समय भयानक जंगल में उदास
और दुःखी मायारानी केवल पाँच लौंडियों के साथ सिर झुकाये अपने किये हुए बुरे कर्मों की याद कर करके पछता रही है। रात की अवाई के कारण जैसे-जैसे अँधेरा होता जाता है, तैसे-तैसे उसकी घबराहट भी बढ़ती जाती है। इस समय मायारानी और उसकी लौंडियाँ मर्दाने भेष में हैं। लौंडियों के पास नीमचा तथा तीर-कमान मौजूद हैं। मगर मायारानी केवल तिलिस्मी तमंचा कमर में छिपाये हुए है। वह घबड़ा-घबड़ाकर बारबार पूरब की तरफ देख रही है, जिससे मालूम होता है कि इस समय उधर से कोई उसके पास आने वाला है। थोड़ी ही देर बाद अच्छी तरह अँधेरा हो गया और इसी बीच में पूरब की तरफ से किसी के आने की आहट मालूम हुई। यह लीला थी जो मर्दाने भेष में पीतल की जालदार लालटेन लिए हुए कहीं दूर से चली आ रही थी। जब वह पास आयी, मायारानी ने घबराहट के साथ पूछा, "कहो, क्या हाल है?"
लाली–हाल बहुत ही खराब है, अब तुम्हें जमानिया की गद्दी कदापि नहीं मिल सकती।
मायारानी—यह तो मैं पहले ही से समझे बैठी हूँ। तू दीवान साहब के पास गई थी?
लाली–हाँ, गई थी, उस समय उन सिपाहियों में से कई सिपाही वहां मौजूद जो आपके तिलिस्मी बाग में रहते हैं और जिन्होंने दोनों नकाबपोशों का साथ दिया था। उस समय वे सिपाही दीवान साहब से दोनों नकाबपोशों का हाल बयान कर रहे थे, मगर मुझे देखते ही चुप हो गये।
मायारानी-तब क्या हुआ?
लीला-दीवान साहब ने मुझे एक तरफ बैठने का इशारा किया और पूछा कि 'तू यहाँ क्यों आई है?' इसके जवाब मैं मैंने कहा कि 'मायारानी हम लोगों को छोड़कर न मालूम कहाँ चली गई। जब चारों तरफ ढूंढ़ने पर भी पता न लगा तो इत्तिला के लिए आपके पास आई हूँ।' यह सुनकर दीवान साहब ने कहा कि 'अच्छा ठहर, मैं इन सिपाहियों से बातें कर लूँ, तब तुझसे करूँ।'
मायारानी-अच्छा, तब तूने उन सिपाहियों की बातें सुनीं?
लीला-जी नहीं, सिपाहियों ने मेरे सामने बात करने से इनकार किया और कहा कि "हम लोगों को लीला पर विश्वास नहीं है!" आखिर दीवान साहब ने मुझे बाहर जाने का हुक्म दिया। उस समय मुझे अंदाज से मालूम हुआ कि मामला बेढब हो गया और ताज्जुब नहीं कि मैं गिरफ्तार कर ली जाऊँ, इसलिए पहरे वालों से बात बनाकर मैंने अपना पीछा छुड़ाया और भाग कर मैदान का रास्ता लिया।
मायारानी–संक्षेप में कह कि उन दोनों नकाबपोशों का कुछ भेद मालूम हुआ कि नहीं?
लीला-दोनों नकाबपोशों का असल भेद कुछ भी मालूम न हुआ, हाँ उस आदमी का पता लग गया, जिसने बाग से निकल भागने का विचार करते समय गुप्त रीति से कहा था कि 'बेशक-बेशक, तुम मरते-मरते भी हजारों घर चौपट करोगी!'
मायारानी–हाँ, कैसे पता लगा? वह कौन था? लीला-वह भूतनाथ था। जब मैं दीवान साहब के यहाँ से भागकर शहर के बाहर हो रही थी, यकायक उससे मुलाकात हुई। उसने स्वयं मुझसे कहा कि 'फला बात का कहने वाला मैं हूँ, तू मायारानी से कह दीजियो कि अब तेरे दिन खोटे आए हैं, अपने किए का फल भोगने के लिए तैयार हो रहे, हाँ, यदि मुझे कुछ देने की सामर्थ्य हो तो मैं उसका साथ दे सकता हूँ।'
मायारानी-(ऊँची साँस लेकर हाय! अच्छा और क्या-क्या मालम हआ?
लीला-और क्या कहूँ? राजा वीरेन्द्रसिंह की बीस हजार फौज आ गई है, जिसकी सरदारी नाहरसिंह कर रहा है। दीवान साहब ने एक सरदार को पत्र देकर नाहरसिंह के पास भेजा था, मालूम नहीं उस पत्र में क्या लिखा था, मगर नाहरसिंह ने उसका यह जवाब जबानी कहला भेजा कि हम केवल मायारानी को गिरफ्तार करने के लिए आए हैं। इसके बाद पता चला कि दीवान साहब ने आपकी खोज में कई जासूस रवाना किए हैं।
मायारानी-तो इससे निश्चित होता है कि कम्बख्त दीवान भी मेरा दुश्मन हो गया!
लीला-क्या इस बात में अब भी शक है?
मायारानी-(लम्बी साँस लेकर) अच्छा और क्या मालूम हुआ? लीला-एक बात सबसे ज्यादा ताज्जुब की मालूम हुई।
मायारानी वह क्या?
लीला-रात के समय भेष बदल कर मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में गई थी। घूमते-फिरते ऐसी जगह पहुंची, जहाँ से नाहरसिंह का खेमा सामने दिखाई दे रहा था और उस खेमे के दरवाजे पर मशाल हाथ में लिए हुए पहरा देने वाले सिपाहियों की चाल साफ-साफ दिखाई दे रही थी। मैंने देखा कि खेमे के अन्दर से दो नकाबपोश निकले और जहाँ मैं खड़ी थी उसी तरफ आने लगे।
मैं किनारे हट गयी। जब वे मेरे पास से होकर निकले तो उनकी चाल और उनके कद से मुझे निश्चय हो गया कि वे दोनों नकाबपोश वही हैं जो हमारे बाग में आये थे और जिन्होंने धनपत को पकड़ा था। मायारानी–हाँ! लीला-जी हां!
मायारानी–अफसोस, इसका पता कुछ भी न लगा कि वे दोनों आखिर हैं कौन मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे खास बाग के तिलिस्मी भेदों को जानते हैं और इस समय तेरी जबानी सुनने से यह जाना जाता है कि वे दोनों राजा वीरेन्द्रसिंह के पक्षपाती भी हैं।
लीला-इसका निश्चय नहीं हो सकता कि वे दोनों नकाबपोश राजा वीरेन्द्रसिंह के पक्षपाती हैं, शायद वे नाहरसिंह से मदद लेने गये हों।
मायारानी-ठीक है, यह भी हो सकता है। लेकिन बात तो यह है कि मैं सिवाय गोपालसिंह के और किसी से नहीं डरती, न मुझे रिआया के बिगड़ने का कोई डर है न
च०स०-3-2
सिपाहियों या फौज के बागी होने का खौफ न दीवान-मुत्सद्दियों के बिगड़ने का अन्देशा और न कमलिनी और लाडिली की बेबफाई का रंज-क्योंकि मैं इन सभी को अपनी करामात से नीचा दिखा सकती हैं, हाँ, यदि गोपालसिंह के बारे में कम्बख्त भूतनाथ ने मुझे धोखा दिया है जैसा कि तू कह चुकी है तो बेशक खौफ की बात है। अगर वह जीता है तो मुझे बुरी तरह हलाल करेगा। वह इस बात से कदापि नहीं डरेगा कि मेरा भेद खुलने से उसकी बदनामी होगी, क्योंकि मैंने उसके साथ बहुत बुरा सलूक किया है। जिस समय कम्बख्त कमलिनी और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने गोपालसिंह को कैद से छुड़ाया था, यदि गोपालसिंह चाहती तो उसी समय मुझे जहन्नुम को भेज सकता था। मगर उसका ऐसा न करना मेरा कलेजा और भी दहला रहा है, शायद मौत से भी बढ़कर कोई सजा उसने मेरे लिए सोच ली है, हाय अफसोस! मैंने तिलिस्मी भेद जानने के लिए उसे क्यों इतने दिनों तक कैद में रख छोड़ा! उसी समय उसे मार डाला होता तो यह बुरा दिन क्यों देखना पड़ता? हाय, अब तो मौत से भी कोई भारी सजा मुझे मिलने वाली है। (रोती है)
लीला-अब रोने का समय नहीं है, किसी तरह जान बचाने की फिक्र करनी चाहिए।
मायारानी-(हिचकी लेकर) क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? किससे मदद माँगू? ऐसी अवस्था में कौन मेरी सहायता करेगा? हाय, आज तक मैंने किसी के साथ किसी तरह की नेकी नहीं की, किसी को अपना दोस्त न बनाया और किसी पर अहसान का बोझ न डाला। फिर किसी को क्या गरज पड़ी है, जो ऐसी अवस्था में मेरी मदद करे। वीरेन्द्रसिंह के लड़कों के दुश्मनी करना मेरे लिए और भी जहर हो गया।
लीला-खैर, जो हो गया सो हो गया, अव इस समय इन सब बातों का सोचविचार करना और भी बुरा है। मैं इस मुसीबत में हर तरह तुम्हारा साथ देने के लिए तैयार हूँ और अब भी तुम्हारे पास ऐसी-ऐसी चीजें हैं कि उनसे कठिन से कठिन काम निकल सकता है रुपये-पैसे की तरफ से भी कुछ तकलीफ नहीं हो सकती, क्योंकि सेरों जवाहिरात पास में मौजूद हैं फिर इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो?
मायारानी- चिन्ता क्यों न की जाये? एक मनोरमा का मकान छिपकर रहने योग्य था सो वहाँ भी वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के चरण जा पहुँचे। तू ही कह चुकी है कि किशोरी और कामिनी को ऐयार लोग छुड़ाकर ले गये। नागर को भी उन लोगों ने फंसा लिया होगा। अब सबसे पहला काम तो यह है कि छिपकर रहने के लिए कोई जगह खोजी जाये इसके बाद जो कुछ करना होगा किया जायेगा। हाय, अगर गोपालसिंह की मौत हो गई होती तो न मुझे रिआया के बागी होने का डर था और न राजा वीरेन्द्रसिंह की दुश्मनी का।
लीला—छिपकर रहने के लिए मैं जगह का बन्दोबस्त कर चूकी हूँ। यहाँ से थोड़ी ही दूर पर….
लीला इससे ज्यादा कुछ कहने न पाई थी कि पीछे की तरफ से कई आदमियों के दौड़ते हुए आने की आहट मालूम हुई। बात-की-बात में वे लोग, जो वास्तव में चोर
थे, चोरी का माल लिए हुए उस जगह आ पहुंचे जहाँ मायारानी और उसकी लौंडियाँ बैठी बातें कर रही थीं। ये चोर गिनती में पाँच थे और उनके पीछे-पीछे कई सवार भी उनकी गिरफ्तारी के लिए चले आ रहे थे, जिनके घोड़ों की टापों की आवाज बखूबी आ रही थी। जब वे चोर मायारानी के पास पहुंचे, तो यह सोचकर कि पीछा करने वाले सवारों के हाथ से बचना मुश्किल है, वे चोरी का माल उसी जगह पटक कर आगे की तरफ भाग गये और इसके थोड़ी ही देर बाद वे कई सवार भी उसी जगह पर, जहाँ मायारानी थी, आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि कई आदमी बैठे हुए हैं, बीच में एक लालटेन जल रही है, और चोरी का माल भी उसी जगह पड़ा हुआ है। उन्हें निश्चय हो गया कि ये चोर हैं अतः उन्होंने मायारानी तथा उसकी लौंडियों को चारों तरफ से घेर लिया।
9
आधी रात का समय है, चाँदनी खिली हुई है। मौसम में पूरा-पूरा फर्क पड़ गया है। रात की ठंडी-ठंडी हवा अब प्यारी मालम होती है। ऐसे समय में उस सड़क पर जो काशी से जमानिया की तरफ गई है दो मुसाफिर धीरे-धीरे काशी की तरफ जा रहे हैं। ये दोनों मुसाफिर साधारण नहीं हैं, बल्कि अमीर बहादुर और दिलावर मालूम पड़ते हैं। दोनों की पोशाक बेशकीमत और सिपाहियाना ठाठ की है, तथा दोनों ही की चाल में दिलेरी और लापरवाही मालूम होती है। खंजर, कटार, तलवार, तीर-कमान और कमन्द से दोनों ही सजे हुए हैं और इस समय मस्तानी चाल से धीरे-धीरे टहलत हुए जा रहे हैं। इनके पीछे-पीछे दो आदमी दो घोड़ों की बागडोर थामे हुए जा रहे है। मगर ये दोनों साईस नहीं हैं बल्कि सिपाही और सवार मालूम होते हैं। दोनों मुसाफिर जाते-जाते ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ सड़क से कुछ हटकर पांचसात पेड़ों का एक झुण्ड था। दोनों वहाँ खड़े हो गए और उनमें से एक ने जोर से सीटी बजाई जिसकी आवाज सुनते ही पेड़ों की आड़ में से दस आदमी निकल आए और दूसरी सीटी की आवाज के साथ ही वे उन दोनों आदमियों के पास पहुँच हाथ जोडकर खड़े हो गए। उन सभी की पोशाक उस समय के डाकुओं की-सी थी। जांघिया पहने हुए, बदन में केबल एक मोटे कपड़े की नीमास्तीन, ढाल-तलवार लगाए और हाथों में एकएक गड़ासा लिए हुए थे, और सभी की बगल में एक-एक छोटा बटुआ भी लटक रहा था। इन दसों के आ जाने पर उन दो बहादुरों में से एक ने उनकी तरफ देखा और पूछा, "उसका कुछ पता लगा?"
एक डाकू-(हाथ जोड़ कर) जी हाँ, बल्कि वह काम भी बखूबी कर आये हैं,
1. मायारानी और उसकी लौंडियाँ मर्दाने वेश में थीं।
जो हम लोगों के सुपुर्द किया गया था और जिसका होना कठिन था।
जवान-उसके साथ और कौन-कौन है?
डाकू–लाली के अतिरिक्त केवल पांच लौंडियां और थीं।
जवान–उसे तुमने किस इलाके में पाया और क्या किया, सो खुलासा कहो।
डाकू-उसने जमानिया की सरहद को छोड़ दिया और काशी रहने का विचार करके उसी तरफ का रास्ता लिया। जब काशी जी की सरहद में पहुंची, तो गंगापुर नामक एक स्थान के पास वाले जंगल में एक दिन तक उसे अटकना पड़ा क्यों कि वह लीला को हालचाल लेने और कई भेदों का पता लगाने के लिए पीछे छोड़ आई थी। हम लोगों को उसी समय अपना काम करने का मौका मिला। मैं कई आदमियों को साथ लेकर काशीराज की तहसील में जो गंगापुर में है घुस गया और कुछ असबाब चुराकर इस तरह भागा कि पहरे वालों को पता लग गया और कई सवारों ने हम लोगों का पीछा किया। आखिर हम लोग उन सवारों को धोखा देकर घुमाते हुए उसी जंगल में ले गए, जिसमें मायारानी थी। जब हम लोग मायारानी के पास पहुंचे, तो चोरी का माल उसी के पास पटक कर भाग गये और सवारों ने वहाँ पहुँच और चोरी का माल मायारानी के पास देखकर उन्हीं लोगों को चोर या चोरों का साथी समझा और उन्हें चारों तरफ से घेर लिया।
जवान-बहुत अच्छा हुआ! शाबाश, तुम लोगों ने अपना काम खूबी के साथ पूरा किया। अच्छा इसके बाद क्या हुआ?
डाकू-इसके बाद की हम लोगों को कुछ भी खबर नहीं है क्योंकि आज्ञानुसार आपके पास हाजिर होने का समय बहुत कम बच गया था इसीलिए फिर उन लोगों का पीछा न किया।
जवान-कोई हर्ज नहीं, हमें इतने ही से मतलब था। अच्छा, अब तुम जाओ, जमानिया के पास गंगा के किनारे जो झाडी है उसी में परसों रात को किसी समय हम तुम लोगों से मिलेंगे, कदाचित् कोई काम पड़े। (अपने साथी की तरफ देखकर) कहिए देवीसिंह जी, अब इन दोनों सवारों के लिए क्या आज्ञा होती है जो हम लोगों के साथ आये हैं?
देवीसिंह—अगर ये लोग जासूसी का काम अंजाम दे सकें, तो इन्हें काशी भेजना चाहिए।
जवान-ठीक है, और इसके बाद जहाँ तक जल्द हो सके, कमलिनीजी से मिलना चाहिए, ताज्जुब नहीं वे कहती हों कि भूतनाथ बड़ा ही बेफिकरा है।
पाठक तो समझ ही गये होंगे कि ये दोनों बहादुर देवीसिंह और भूतनाथ हैं। डाकुओं और दोनों सवारों को विदा करने के बाद दोनों ऐयार लौटे और तेजी के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुए। इस जगह से जमानिया केवल चार कोस की दूरी पर था इसलिए ये दोनों ऐयार सवेरा होने के पहले ही उस टीले पर जा पहुंचे, जो दारोगा वाले बंगले के पीछे की तरफ था और जहाँ से दोनों ऐयारों और कुमारों को साथ लिए हुए कमलिनी मायारानी के तिलिस्मी बाग वाले देवमंदिर में गई थी। हम पहले लिख
आये हैं कि इस टीले पर एक कोठरी थी जिसमें पत्थर के चबूतरे पर पत्थर ही का एक शेर बैठा हुआ था। वह चबूतरा और शेर देखने में तो पत्थर का मालूम होता था, मगर वास्तव में किसी मसाले का बना हुआ था। दोनों ऐयार उस शेर के पास जाकर खड़े हो गये और बातचीत करने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह को इस समय इस बात का गुमान भी न था कि उनके पीछे-पीछे दो औरतें कुछ दूर से आ रही हैं और इस समय भी कोठरी के बाहर छिपकर खड़ी उन दोनों की बातें सुनने के लिए तैयार हैं। इन दोनों औरतों में से एक तो मायारानी और दूसरी नागर है। पाठकों को शायद ताज्ज़ब हो कि मायारानी को तो चोरी की इल्जाम में काशिराज के सवारों ने गिरफ्तार कर लिया था, फिर वह यहाँ क्योंकर आई? इसलिए थोड़ा हाल मायारानी का इस जगह लिख देना उचित जान पड़ता है।
जब उन सवारों ने चारों तरफ से मायारानी को घेर लिया तब एक दफे तो वह बहुत ही परेशान हुई मगर तुरन्त ही सम्हल बैठी और फुर्ती के साथ उसने अपने तिलिस्मी तमंचे से काम लिया। उसने तमंचे में तिलिस्मी गोली भर कर उसी जगह जमीन पर मारी जहाँ आप बैठी हुई थी। एक आवाज हुई और गोली में से बहुत-सा धुआँ निकलकर धीरे-धीरे फैलने लगा मगर सवारों ने इस बात पर कुछ ध्यान न दिया और मायारानी तथा उसकी लौंडियों को गिरफ्तार कर लिया। मायारानी के तमंचा चलाने पर सवारों को क्रोध आ गया था इसलिए कई सवारों ने मायारानी की जूतों और लातों से खातिरदारी भी की, यहाँ तक कि वह बेहाल होकर जमीन पर गिर पड़ी, उसके साथही-साथ लीला तथा और लौंडियों ने भी खूब मार खाई, मगर इस बीच में तिलिस्मी गोली का धुआँ हल्का होकर चारों तरफ फैल गया और सभी के आँख-नाक में घुसकर अपना काम कर गया। मायारानी और लीला को छोड़ बाकी जितने वहाँ थे सबके सब बेहोश हो गये थे। न सवारों को दीन-दुनिया की खबर रही और न मायारानी की लौंडियों को तन-बदन की सुध रही। पाठकों को याद होगा कि बेहोशी का असर न होने के लिए मायारानी ने तिलिस्मी अर्क पी लिया था और वही अर्क लीला को पिलाया था। अभी तक इस अर्क का असर बाकी था जिसने मायारानी और लीला को बेहोश होने से बचाया।
मार के सदमे से आधी घड़ी तक तो मायारानी में उठने की सामर्थ्य न रही, इसके बाद जान के खौफ से वह किसी तरह उठी और लीला को साथ लेकर वहाँ से भागी। बेचारी लौंडियों को, जिन्होंने ऐसे दुःख के समय में भी मायारानी का साथ दिया था, मायारानी ने कुछ भी न पूछा, हाँ लीला का ध्यान उस तरफ जा पड़ा। उसने अपने ऐयारी के बटुए में से लखलखा निकाला और लौंडियों को सुंघाकर होश में लाने के बाद सभी को भाग चलने के लिए कहा।
लौंडियों को साथ लिए हुए लीला और मायारानी वहाँ से भागी मगर घबराहट के मारे इस बात को न सोच सकीं कि कहाँ छिपकर अपनी जान बचानी चाहिए, अस्तु वे सब सीधे दारोगा वाले बँगले की तरफ रवाना हुई। उस समय सवेरा होने में कुछ विलम्ब था, वे खौफ के मारे छिपाती-छिपती दिन-भर बराबर चलती गईं और रात को
भी कहीं ठहरने की नौबत न आई। आधी रात से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब वे सब दारोगा वाले बंगले पर जा पहुंचीं। इत्तिफाक से नागर भी रास्ते ही में इन लोगों से मिली जो मायारानी से मिलने के लिए मुश्की घोड़ी पर सवार खास बाग की तरफ जा रही थी। इस नागर ने मायारानी को न पहचाना, मगर लीला ने नागर को पहचान कर आवाज दी। नागर जब मायारानी के पास आई तो उसे ऐसी अवस्था में देखकर ताज्जुब करने लगी। मायारानी ने संक्षेप में अपना हाल नागर से कहा जिसे सुन वह अफसोस करने लगी और बोली, "मुझको भी भूतनाथ पर कुछ-कुछ शक होता है, ताज्जुब नहीं कि उसने धोखा दिया हो, खैर, कोई हर्ज नहीं है मैं बहुत जल्द इस बात का पता लगा लूंगी। आप काशीजी चलकर मेरे मकान में रहिये और देखिये कि मैं भूतनाथ को क्योंकर फंसाती हूँ।"
मायारानी और नागर की बातें पूरी न होने पाई थीं कि सामने से दो आदमियों के आने की आहट मालूम हुई। वे दोनों देवीसिंह और भूतनाथ थे। यद्यपि अँधेरे के कारण मायारानी ने उन दोनों को न पहचाना और पहचानने की उसे कोई आवश्यकता भी न थी, मगर जब वे दोनों टीले की तरफ मुड़े, तब मायारानी को शक पैदा हुआ और उसने धीरे से नागर के कान में कहा—'दोनों टीले पर जा रहे हैं इससे मालूम होता है कि कमलिनी के साथी हैं, क्योंकि उस टीले पर बिना जानकार आदमी के और कोई इस समय कदापि न जायगा।
नागर हाँ, मुझे भी यही शक होता हैं कि ये दोनों कमलिनी के साथी या वीरेन्द्रसिंह के ऐयार हैं और ताज्जुब नहीं कि आपके तिलिस्मी बाग में जाने की नीयत से उस टीले पर जा रहे हों, क्योंकि बावाजी की जुबानी मैं कई दफे सुन चुकी हूँ कि तिलिस्मी बाग में जाने के लिए इस टीले पर से भी एक रास्ता है।
मायारानी–हाँ, यह तो मैं भी जानती हैं कि इस टीले पर से मेरे तिलिस्मी बाग में जाने का रास्ता है मगर इस राह से क्योंकर जाया जा सकता है, इसकी मुझे खबर नहीं है। ताज्जुब नहीं कि खून से लिखी किताब की बदौलत कमलिनी को इन सब रास्तों का हाल मालूम हो गया हो, क्योंकि वह किताब नानक और भूतनाथ की बदौलत कमलिनी के हाथ पहुँची ही होगी।
नागर बेशक ऐसा ही है। खैर, चलिए इन दोनों के पीछे-पीछे चलें। ताज्जुब नहीं कि बहुत-सी बातों का पता लग जाय।
इसके बाद मायारानी केवल नागर को साथ लिए भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे छिपकर टीले पर गई और जब वे दोनों ऐयार कोठरी के अन्दर घुसे तो बाहर छिपकर भूतनाथ तथा देवीसिंह आपस में जो बातें करने लगे, उन्हें सुनने लगी जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं।
उस चबूतरे पर बैठे हुए शेर के पास खड़े होकर भूतनाथ और देवीसिंह नीचे लिखी बातें करने लगे।
भूतनाथ-(शेर के सिर पर हाथ रखकर) तिलिस्म के चौथे दर्जे में जो देवमन्दिर है उसमें जाने का यही रास्ता है।
देवीसिंह-क्या राजा गोपालसिंह से वहाँ मुलाकात होगी?
भूतनाथ-अवश्य, बल्कि कमलिनी, लाड़िली और दोनों कुमार भी वहाँ मौजद होंगे।
देवीसिंह-इस दरवाजे के खोलने की तरकीब राजा गोपालसिंह ने आपको बता दी?
भूतनाथ–हाँ, राजा गोपालसिंह और कमलिनी ने भी दरवाजे के खोलने की तरकीब बताई थी, मगर यह रास्ता बड़ा ही खतरनाक है। अच्छा, अब मैं दरवाजा खोलता हूँ।
इतना कहकर भूतनाथ ने शेर की बाईं आँख में उँगली डाली। आँख अन्दर की तरफ घस गई और इसके साथ ही शेर ने मुँह खोल दिया। भूतनाथ ने दूसरा हाथ शेर शेर के मुँह में डाला और कोई पेंच घुमाया जिससे उस चबूतरे के आगेवाला पत्थर हटकर जमीन के साथ सट गया जिस पर शेर बैठा हुआ था और नीचे उतरने के लिए रास्ता मालूम पड़ने लगा। देवीसिंह ने बत्ती जलाने का इरादा किया मगर भूतनाथ ने मना किया और कहा कि नहीं, तुम चुपचाप मेरे पीछे-पीछे चले आओ, नीचे उतर जाने के बाद बत्ती जलावेंगे। आगे-आगे भूतनाथ और पीछे-पीछे देवीसिंह, दोनों ऐयार नीचे उतरे और वहाँ बटए में से सामान निकालकर भूतनाथ ने मोमबत्ती जलाई। वह एक कोठरी थी जिसमें तीन तरफ तो दीवार थी और एक तरफ की दीवार सुरंग के रास्ते के तौर पर थी अर्थात् उधर से किसी सरंग में जाने का रास्ता था। कोठरी के बीचोंबीच में लोहे का एक-एक खम्भा था और खम्भे के ऊपर एक गरारीदार पहिया था जिसे भूतनाथ ने घुमाया और देवीसिंह के कहा, "जिस राह से हम आये हैं उसे यहाँ से बन्द करने की यही तरकीब है और (हाथ का इशारा करके) यही सुरंग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में गई है!" इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह सुरंग में घुसकर आगे की तरफ बढ़े।
इस सुरंग की चौड़ाई चार हाथ से ज्यादा न होगी। यहां की जमीन स्याह और सफेद पत्थरों से बनी हुई थी अर्थात् एक पत्थर सफेद तो दूसरा स्याह, इसके बाद सफेद और फिर स्याह, इसी तरह दोनों रंग के पत्थर सिलसिलेवार लगे हुए थे। सुरंग के दोनों तरफ की दीवारें लोहे की थीं और थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोहे के बनावटी आदमी दीवार के साथ खड़े थे जो अपने लम्बे हाथ फैलाए हुए थे। भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखकर कहा, "इस राह से जाना और अपनी जान पर खेलना एक बराबर है। देखिए बहुत सम्हल कर मेरे पीछे चले आइए और इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखिए कि स्याह पत्थर पर पैर न पड़ने पावे नहीं तो जान न बचेगी। कमलिनी ने मुझे अच्छी तरह समझा कर कहा था कि सुरंग की दीवार के साथ जो लोहे के आदमी हाथ फैलाये खड़े हैं वे उस समय काम करते हैं जब कोई स्याह पत्थर पर पैर रखता है। स्याह पत्थर पर पैर रखते ही वे उसको अपने दोनों हाथों से ऐसा पकड़ लेते हैं कि फिर किसी तरह उनके कब्जे से निकल नहीं सकता। मैं समझता हूं कि इस सुरंग में कई आदमी धोखे में पड़कर मारे गये होंगे, इसलिए उचित है कि मेरे और तुम्हारे दोनों के हाथ में एक-एक मोमबत्ती रहे।
भूतनाथ की बातें सुनकर देवीसिंह ताज्जुब करने लगे, आखिर लाचार हो कर
एक मोमबत्ती और जलाई और तब बड़ी होशियारी से सफेद पत्थरों पर पैर रखते हुए आगे बढ़े। यह सुरंग एकदम सीधी बनी हुई थी और इसकी जमीन हर तरह से साफ थी, जिसका सबब शायद यह हो कि यहाँ कहीं से गर्द-गबार के आने की जगह नहीं थी। फिर इस सुरंग में ऐसी कारीगरी भी की गई थी कि किसी-किसी जगह दीवार में में से साफ छनी हुई हवा आती और दूसरी राह से निकल जाती थी जिससे सुरंग की हवा हरदम साफ बनी रहती थी और उसमें जहर का असर पैदा नहीं होने पाता था।
लगभग दो सौ कदम जाने के बाद देखा कि दाहिनी तरफ दीवार के साथ वाले लोहे के एक आदमी के दोनों हाथ सिमटे हए हैं और उनके बीच में हडडी का एक ढाँचा फंसा हआ है। वह ढाँचा मनुष्य के शरीर का था जिसे देखते ही भूतनाथ ने देवीसिंह से कहा, "देखिये यह धोखा खाने का नमूना है। कोई अनजान आदमी सुरंग में आकर जान दे बैठा है, अनजान कसे कहें क्योकि यहां तक तो आ हो चुका था शाय धोखा खा गया हो।" दोनों ऐयार ताज्जुब से उस पंजर को देखने लगे, पर इसी समय यकायक देवीसिंह की निगाह पीछे की तरफ (जिधर से ये दोनों आये थे) जा पड़ी और एक रोशनी देख देवीसिंह ने ताज्जब के साथ भतनाथ से कहा, "देखिये तो वह रोशनी कैसी है?"
भूतनाथ-(बत्ती के आगे हाथ रखकर और गौर से रोशनी की तरफ देखकर) कोई आ रहा है!
देवीसिंह-दो औरतें मालूम पड़ती हैं।
भूतनाथ–ठीक है, शायद लाड़िली और कमलिनीजी हों, क्योंकि सिवाय जानकार के और कोई तो इस सुरंग में आ नहीं सकता।
देवीसिंह-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि वे कमलिनी और लाड़िली होंगी। भूतनाथ-शक तो मुझे भी होता है, खैर, चलकर देख ही क्यों न लें।
भतनाथ और देवीसिंह दोनों फिर पीछे की तरफ लौटे अर्थात उस रोशनी की तरफ बढ़े जो यकायक दिखाई दी थी। दो ही कदम बढ़े होंगे कि कोई चीज उनके सामने जमीन पर आकर गिरी और पटाके की सी आवाज हुई, इसके साथ ही उसमें से बेहोशी पैदा करने वाला जहरीला धुआँ निकला। वह तिलिस्मी गोली थी जो मायारानी ने तिलिस्मी तमंचे में भर कर भूतनाथ और देवीसिंह की तरफ चलाई थी। भूतनाथ और देवीसिंह इस गुमान में पीछे की तरफ हटे थे कि शायद वह रोशनी कमलिनी और लाडिली के साथ हो, मगर वास्तव में ये दोनों मायारानी और नागर थीं जिन्होंने छिप कर भूतनाथ और देवीसिंह की बातें सुनी थीं। जब दोनों ऐयार शेर वाला दरवाजा खोलकर तहखाने में उतर गए थे तो चर्खा चलाकर दरवाजा बन्द करने के पहले ही ये दोनों भी दरवाजे के अन्दर घुस कर दो-चार सीढ़ी नीचे उतर आई थीं और इन्होंने वे बातें भी सुन ली थीं जो नीचे उतर जाने के बाद देवीसिंह और भूतनाथ में हुई।
10
राजा गोपालसिंह तथा कमलिनी और लाडिली को हम देवमन्दिर में छोड़ आये हैं। वे तीनों भूतनाथ के आने की उम्मीद में देर तक देवमन्दिर में रहे, मगर जब भूतनाथ न आया तो लाचार होकर कमलिनी ने गोपालसिंह से कहा–
कमलिनी-मालूम होता है कि भूतनाथ किसी काम में फंस गया। खैर, अब हम लोगों को यहाँ व्यर्थ रुकना उचित नहीं क्योंकि अभी बहुत-कुछ काम करना बाकी है।
गोपालसिंह-ठीक है, मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ, तुम्हारे करने योग्य इस समय कोई काम नहीं है क्योंकि दोनों कुमार तिलिस्म के अन्दर जा ही चुके हैं, और बिना तिलिस्म तोड़े अब उनका बाहर निकलना कठिन है, हाँ, कम्बख्त मायारानी के विषय में बहुत कुछ करना है सो उसके लिए मैं अकेला काफी है, इसके अतिरिक्त और जो कुछ काम है उसे ऐयार लोग बखूबी कर सकते हैं।
कमलिनी-आपकी बातों से पाया जाता है तो कि मेरे यहाँ रहने की अब कोई आवश्यकता नहीं। गोपालसिंह-बेशक मेरे कहने का यही मतलब है।
कमलिनी-अच्छा तो मैं लाड़िली को साथ लेकर अपने घर जाती हूँ, उधर ही से रोहतासगढ़ पर ध्यान रक्लूंगी।
गोपालसिंह- हाँ तुम्हें वहाँ अवश्य जाना चाहिए क्योंकि किशोरी और कामिनी भी उसी मकान में पहुँचा दी गई हैं, उनसे जब तक न मिलोगी तब तक वे बेचैन रहेंगी, इसके अतिरिक्त कई कैदियों को भी तुमने वहाँ भिजवाया है, उनकी भी खबर लेनी चाहिए।
कमलिनी अच्छा, थोड़ी-देर तक भूतनाथ की राह और देख लीजिए।
आधी रात बीत जाने के बाद तीनों आदमी वहां से रवाना हुए। वे पहले उस गोल खम्भे के पास आये जो कमरे के बीचोंबीच में था और जिस पर तरह-तरह की मूरतें बनी हुई थीं। राजा गोपालसिह न एक मूरत पर हाथ रख कर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। दोनों सालियों को साथ लिए हुए गोपालसिंह उस खिड़की के अन्दर घुस गये; जहाँ नीचे उतरने के लिए सीढियाँ बनी हई थीं। यद्यपि उसके अन्दर एक दम अँधेरा था. मगर तीनों आदमी अन्दाज से उतरते चले गए, जब नीचे एक कोठरी में पहुँचे तो गोपालसिंह ने मोमबत्ती जलाई। मोमबत्ती जलाने का सामान उसी कोठरी में एक आले पर रक्खा हआ था जिसे अँधेरे में ही गोपालसिंह ने खोज लिया था। वह कोठरी लगभग दस हाथ के चौड़ी और इतनी लम्बी होगी। चारों तरफ दीवार में चार दरवाजे बने हुए थे और छत में जंजीरें लटक रही थीं। गोपालसिंह ने एक जजीर हाथ से पकड़कर खींची जिससे गोल
1. वही तिलिस्मी मकान जो तालाब के अन्दर है।
खम्भे वाला वह दरवाजा बन्द हो गया जिस राह से तीनों नीचे उतरे थे। इसके बाद गोपालसिंह उत्तर तरफ वाली दीवार के पास गये और दरवाजा खोलने का उद्योग करने लगे। उस दरवाजे में ताँबे की सैकड़ों कीलें गड़ी हुई थीं और हर कील के मुंह पर उभड़ा हुआ एक-एक अक्षर बना हुआ था। यह दरवाजा उसी सुरंग में जाने के लिए था जो दारोगा वाले बँगले के पीछे वाले टीले तक पहँची हुई थी या जिस सुरंग के अन्दर भूतनाथ और देवीसिंह का जाना ऊपर के बयान में हम लिख आये हैं। गोपालसिंह ने दरवाजे में लगी हुई कीलों को दबाना शुरू किया। पहले उस कील को दबाया जिसके सिरे पर 'हे' अक्षर बना हुआ था, इसके बाद 'र' अक्षर की कील को दबाया, फिर 'म' और 'ब' अक्षर की कील को दबाया ही था कि दरवाजा खुल गया और दोनों सालियों को साथ लिए हुए गोपालसिंह उसके अन्दर चले गये तथा भीतर जाकर हाथ के जोर से दरवाजा बन्द कर दिया। इस दरवाजे के पिछली तरफ भी वे ही बातें थीं जो बाहर थों अर्थात् भीतर से भी उसमें वैसी ही कीलें जड़ी हुई थीं। भीतर चार-पाँच कदम जाने के बाद सुरंग की जमीन स्याह और सफेद पत्थरों से बनी हई मिली और उसी जगह पहुँचे जहाँ भूतनाथ और देवी सिंह खड़े थे। ये लोग भी ठीक उसी समय वहाँ पहुँचे जब मायारानी की चलाई हुई गोली में से जहरीला धुआँ निकलकर सुरंग में फैल चुका था और दोनों ऐयार बेहोशी के असर से झूम रहे थे। कमलिनी, लाड़िली तथा राजा गोपालसिंह इस धुएँ से बिल्कुल बेखबर थे और उन्हें इस बात का गुमान भी न था कि मायारानी ने इस सुरंग में पहुँच कर तिलिस्मी गोली चलाई है क्योंकि गोली चलाने के बाद तुरन्त ही मायारानी ने अपने हाथ की मोमबत्ती बुझा दी थी।
राजा गोपालसिंह ने वहाँ पहुँचकर भूतनाथ और देवीसिंह को देखा। कमलिनी ने भूतनाथ को पुकारा, मगर बेहोशी का असर हो जाने के कारण उसने कमलिनी की बात का जवाब न दिया बल्कि देखते-देखते भूतनाथ और देवीसिंह वेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। कमलिनी, लाड़िली और गोपालसिंह के भी नाक और मुँह में वह धुआँ गया मगर ये उसे पहचान न सके और भूतनाथ तथा देवीसिंह के बेहोश हो जाने के बाद ही ये तीनों भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े।
आधी घड़ी तक राह देखने के बाद मायारानी और नागर ने मोमबत्ती जलाई। खुशी-खुशी उन दोनों औरतों ने बेहोशी से बचाने वाली दवा अपने मुँह में रक्खी और स्याह पत्थरों से अपने को बचाती हुई वहाँ पहुँची जहाँ कमलिनी, लाड़िली, गोपालसिंह, भूतनाथ और देवीसिंह बेहोश पड़े हुए थे।
अहा, इस समय मायारानी की खुशी का कोई ठिकाना है! इस समय उसकी किस्मत का सितारा फिर से चमक उठा। उसने हँस कर नागर की तरफ देखा और कहा
माया-क्या अब भी मुझे किसी का डर है?
नागर—आज मालूम हुआ कि आपकी किस्मत बड़ी जबरदस्त है। अब दुनिया में कोई भी आपका मुकाबला नहीं कर सकता। (भूतनाथ की तरफ देखकर) देखिए, इस बेईमान की कमर में वही तिलिस्मी खंजर है जो कमलिनी ने इसे दिया था। अहा,
इससे बढ़कर दुनिया में और क्या अनूठी चीज होगी!
मायारानी-इस कम्बख्त ने मुझसे कहा था कि कमलिनी ने गोपालसिंह को भी एक तिलिस्मी खंजर दिया है। (गोपालसिंह को अच्छी तरह देखकर) हाँ, हाँ, इसकी कमर में भी वही खंजर है! ताज्जुब नहीं कि कमलिनी और लाडिली की कमर में भी इसका जोड़ा हो। (कमलिनी, लाड़िली और देवसिंह की तरफ ध्यान देकर) नहीं नहीं, और किसी के पास नहीं है। खैर दो खंजर तो मिले, एक मैं रक्खूगी और एक तुझे दूँगी। इसमें जो-जो गुण हैं भूतनाथ की जुबानी सुन ही चुकी हूँ, अच्छा भूतनाथ का खंजर तू ले-ले और इसका मैं लेती हूँ।
खुशी-खुशी मायारानी ने पहले गोपालसिंह की उँगली से वह अंगूठी उतारी जो तिलिस्मी खंजर के जोड़ की थी और इसके बाद कमर से खंजर निकालकर अपने कब्जे में किया। नागर ने भी पहले भूतनाथ के हाथ से अंगूठी उतार कर पहन ली और तब खंजर पर कब्जा किया। मायारानी ने हँसकर नागर की तरफ देखा और कहा, "अब इसी खंजर से इन पाँचों दुष्टों को इस दुनिया से उठाकर हमेशा के लिए निश्चिन्त होती हूँ!"
11
मायारानी ने गोपालसिंह को मारने के लिए जैसे ही खंजर उठाया, वैसे ही नागर ने फुर्ती से उसकी कलाई पकड़ ली और कहा–
नागर-ठहरो-ठहरो! जल्दी न करो, आखिर ये लोग तुम्हारे कब्जे में तो आ ही चुके हैं और अब किसी तरह छूटकर जा नहीं सकते। फिर बिना अच्छी तरह विचार किए जल्दी करने की क्या आवश्यकता है। क्या जाने, सोचने-विचारने से कुछ विशेष लाभ की सूरत ध्यान में आवे।
मायारानी-(रुक कर) तुम्हारा कहना ठीक है, परन्तु यदि दुश्मन कब्जे में आ जाय तो उसके मारने में विलम्ब करना कदापि उचित नहीं है। इसी (गोपालसिंह) को जब मैंने कैद किया था तो इसके मारने के विषय में सोच-विचार करते-करते वर्षों बिताए और अन्त में इस विलम्ब का क्या नतीजा निकला सो देख ही रही हो उस विलम्ब ही के कारण आज मैं फकीरिन होकर भी (गला भर आने के कारण रुक कर) आज ईश्वर ने मुझ पर कृपा की है और दुश्मनों को मेरे कब्जे में कर दिया है। ताज्जुब नहीं कि इनके मारने में देर तथा सोच-विचार करने का वही नतीजा हो जो पहले हो चुका है।
नागर-ठीक है और मैं भी इसी में प्रसन्न हूँ कि जहाँ तक हो सके ये लोग शीघ्र मार डाले जायँ। अहा, कमलिनी के सहित गोपालसिंह का फँस जाना क्या कम खुशी की बात है, और फिर इन दोनों के साथ ही वेईमान भूतनाथ का भी… मायारानी–(बात काट कर)—आ फंसना, जिसने मेरे साथ सख्त दगा की थी, कम खुशी की बात नहीं है।
नागर–बेशक, परन्तु मैं इन कम्बख्तों की जान ले लेने में विशेष विलम्ब करने के लिए नहीं कहती, हाँ इतनी देर तक रुक जाने के लिए अवश्य कहती हूँ जितनी देर में हम लोग इस बात को बखूबी सोच लें कि इन दुष्टों को मारने के बाद इस सुरंग का भेद मालूम न होने पर भी हम लोग यहाँ से निकल जा सकेंगे या नहीं?
मायारानी-क्यों, क्या हम लोगों को यहाँ से निकल जाने में किसी तरह की रुकावट हो सकती है? क्या हम लोगों ने भूतनाथ और देवीसिंह की बातें उस समय अच्छी तरह नहीं सुनीं जिस समय दोनों ऐयार सुरंग में उतर चुके थे? क्या उसी रीति से सुरंग का दरवाजा न खुल सकेगा जिस रीति से बन्द किया गया है?
नागर-इन बातों का ठीक-ठीक जवाब मैं नहीं दे सकती, बल्कि इन्हीं बातों पर विचार करने के लिए कुछ देर तक ठहरने को कहती हूँ।
मायारानी-(खंजर म्यान में रखकर और कुछ सोचकर) अच्छा-अच्छा, कुछ देर ठहर जाने में कोई हर्ज नहीं है, इन सभी की बेहोशी यकायक दूर नहीं हो सकती, चलो, पहले उस दरवाजे को खोलकर देखें कि वह खुलता है या नहीं। इतना कहकर नागर को साथ लिए हुए मायारानी सुरंग के दरवाजे की तरफ बढ़ी। जब उस लोहे के खम्भे के पास पहुँची जिस पर वह गरारीदार पहिया था जिसे घुमाकर भूतनाथ ने सुरंग का दरवाजा बन्द किया था तो रुकी और नागर की तरफ देखकर बोली, "इसी पहिए को घुमाकर भूतनाथ ने दरवाजा बन्द किया था।"
JIM – Assistente
Jim IA: pode errar. Não digite dados pessoais. Suas mensagens são processadas por um serviço externo.