चन्द्रकान्ता सन्तति 6
दोनों कुमार खुशी-खुशी सबसे मिले। एक-एक करके सबसे कुशल-मंगल पूछा,कमलिनी और लाड़िली से भी चार आँखें हुईं, मगर वहाँ किशोरी और कामिनी की सुरत दिखाई न पड़ी, जिनके बारे में सुन चुके थे कि महल के अन्दर पहुंच चुकी हैं। इस सबब से उनके दिल को जो कुछ तकलीफ हुई उसका अन्दाज औरों को तो नहीं, मगर कुछ-कुछ कमलिनी और लाड़िली को मिल गया और उन्होंने बात-ही-बात में इस भेद को खुलवाकर कुमारों की तसल्ली करवा दी।
थोड़ी देर तक दोनों भाई महल के अन्दर रहे, और इस बीच में बाहर से कई दफे तलबी का सन्देश पहुँचा, अतः पुनः मिलने का वादा करके वहाँ से उठकर वह बाहर की तरफ रवाना हुए और उस आलीशान कमरे में पहुंचे, जिसमें कई खास-खास आदमियों और आपस वालों के साथ महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह उनका इन्तजार कर रहे थे। इस समय इस कमरे में यद्यपि राजा गोपालसिंह, नकाबपोश लोग, जीतसिंह, तेजसिंह, भूतनाथ और ऐयार लोग भी उपस्थित थे, मगर कोई आदमी ऐसा न था, जिसके सामने भेद की बातें करने में किसी तरह का संकोच हो । दोनों कुमार इशारा पाकर अपने दादा साहब के बगल में बैठ गए और धीरे-धीरे बातचीत होने लगी।
सुरेन्द्रसिंह-(दोनों कुमारों की तरफ देखकर) भैरोंसिंह और तारासिंह तुम्हारे पास गये थे, उन दोनों को कहाँ छोड़ा ?
इन्द्रजीतसिंह-(मुस्कराते हुए) जी वे दोनों तो हम लोगों के आने से पहले ही से हजूर में हाजिर हैं !
सुरेन्द्रसिंह-(ताज्जुब से चारों तरफ देखकर) कहाँ ?
महाराज के साथ-ही-साथ और लोगों ने भी ताज्जुब के साथ एक-दूसरे पर निगाह डाली।
इन्द्रजीतसिंह-(दोनों सरदार नकाबपोशों की तरफ बताकर जिनके साथ और भी कई नकाबपोश थे) रामसिंह और लक्ष्मणसिंह का काम आज वे ही दोनों पूरा कर
इतना सुनते ही दोनों नकाबपोशों ने अपने-अपने चेहरे पर से नकाबें हटा दी, और उनके बदले में भैरोंसिंह तथा तारासिंह दिखाई देने लगे। इस जादू के से मामले को देखकर सबकी विचित्र अवस्था हो गई और सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह की तो और ही अवस्था हो रही थी। बड़े जोरों के साथ कलेजा उछलने लगा और वे कुछ बातें उन्हें याद आ गईं जो नकाबपोशों के मकान में जाकर देखी-सुनी थीं और वे दोनों ही ताज्जुब के साथ गौर करने लगे।
सुरेन्द्रसिंह-(दोनों कुमारों से) जब भैरोंसिंह और तारासिंह तुम्हारे पास नहीं गये और यहाँ मौजूद थे, तब भी तो रामसिंह और लक्ष्मणसिंह कई दफे आये थे,उस समय इस विचित्र पर्दे (नकाब)के अन्दर कौन छिपा हुआ था ?
इन्द्रजीतसिंह-(और सब नकाबपोशों की तरफ बताकर) कई दफे इन लोगों में से बारी-बारी से समयानुसार और कई दफे स्वयं हम दोनों भाई इसी पोशाक और नकाब को पहनकर हाजिर हुए थे।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह की इस बात ने इन लोगों को और भी ताज्जुब में डाल दिया और सब कोई हैरानी के साथ उनकी तरफ देखने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह की तो बात ही निराली थी, इनको तो विश्वास हो गया कि नकाबपोशों की टोह में जिस मकान के अन्दर हम लोग गए थे, उस मालिक ये ही दोनों हैं, इन्हीं दोनों की मर्जी से हम लोग गिरफ्तार हुए थे, और इन्हीं दोनों के सामने पेश किए गए थे। देवीसिंह यद्यपि अपने दिल को बार-बार समझा-बुझाकर सम्हालते थे, मगर इस बात का खयाल हो ही जाता था कि अपने ही लोगों ने मेरी बेइज्जती की, और मेरे ही लड़के ने इस काम में शरीक होकर मेरे साथ दगा की। मगर देखना चाहिए, इन सब बातों का भेद, सबब और नतीजा क्या खुलता है।
भूतनाथ इस सोच में घड़ी-घड़ी सिर झुका लेता था कि मेरे पुराने ऐब, जिन्हें मैं बड़ी कोशिश से छिपा रहा था, अब छिपे न रहे, क्योंकि इन नकाबपोशों को मेरा रत्ती-रत्ती हाल मालूम है, और दोनों कुमार इन सबके मालिक और मुखिया हैं, अतः इनसे कोई बात छिपी न रह गई होगी। इसके अतिरिक्त मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ, कि मुझसे बदला लेने की नीयत रखने वाला मेरा दुश्मन उस विचित्र तस्वीर को लिए हुए इनके सामने हाजिर हुआ था और मेरा लड़का हरनामसिंह भी वहां मौजूद था। यद्यपि इस बात की आशा नहीं हो सकती कि ये दोनों कुमार मुझे जलील और बे-आबरू करेंगे, मगर फिर भी शर्मिन्दगी मेरा पल्ला नहीं छोड़ती। इत्तिफाक की बात है कि जिस तरह मेरी स्त्री और लड़के ने इस मामले में शरीक होकर मुझे छकाया है, उसी तरह देवीसिंह की स्त्री-लड़के ने उनके दिल में भी चुटकी ली है।
देवीसिंह और भूतनाथ की तरह हमारे और ऐयारों के दिलों में भी करीब-करीब इसी ढंग की बातें पैदा हो रही थीं, और इन सब भेदों को जानने के लिए वे बनिस्बत पहले के अब और ज्यादा बेचैन हो रहे थे, तथा यही हाल हमारे महाराज सुरेन्द्रसिंह और गोपालसिंह वगैरह का भी था।
कुछ देर तक ताज्जुब के साथ सन्नाटा रहा, और इसके बाद पुनः महाराज ने दोनों कुमारों की तरफ देखकर कहा सुरेन्द्रसिंह-ताज्जुब की बात है कि तुम दोनों भाई यहाँ आकर भी अपने को छिपाये रहे !
इन्द्रजीतसिंह—(हाथ जोड़कर) मैं यहाँ हाजिर होकर पहले ही अर्ज कर चुका था कि "हम लोगों का भेद जानने के लिए उद्योग न किया जाये, हम लोग मौका पाकर स्वयं अपने को प्रकट कर देंगे।" इसके अतिरिक्त तिलिस्मी नियमों के अनुसार तब तक हम दोनों भाई प्रकट नहीं हो सकते थे, जब तक कि अपना सारा काम पूरा करके इसी तिलिस्मी चबूतरे की राह से तिलिस्म के बाहर नहीं निकल आते। साथ ही इसके हम लोगों की यह भी इच्छा थी कि जब तक निश्चिन्त होकर खुले तौर पर यहाँ न आ जायें,तब तक कैदियों के मुकदमे का फैसला न होने पाये, क्योंकि इस तिलिस्म के अन्दर जाने के बाद हम लोगों को बहुत से नए-नए भेद मालूम हुए हैं जो(नकाबपोशों की तरफ इशारा करके)इन लोगों से सम्बन्ध रखते हैं, और जिनका आपसे अर्ज करना बहुत जरूरी था।
सुरेन्द्रसिंह-(मुस्कराते हुए और नकाबपोशों की तरफ देखकर) अब तो इन लोगों को भी अपने चेहरों से नकाबें उतार देनी चाहिए । हम समझते हैं इस समय इन लोगों का चेहरा साफ होगा।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह का इशारा पाकर उन नकाबपोशों ने भी अपने-अपने चेहरे से नकाबें हटा दी, और खड़े होकर अदब के साथ महाराज को सलाम किया । ये नकाबपोश गिनती में पांच थे और इन्हीं पांचों में इस समय वे दोनों सूरतें भी दिखाई पड़ीं,जो यहाँ दरबार में पहले दिखाई पड़ चुकी थी, या जिन्हें देखकर दारोगा और बेगम के छक्के
अब सबका ध्यान उन पांचों नकाबपोशों की तरफ खिंच गया, हाल जानने के लिए लोग पहले ही से बेचैन हो रहे थे, क्योंकि इन्होंने कैदियों के मामले,में कुछ विचित्र ढंग की कैफियत और उलझन पैदा कर दी थी। यद्यपि कह सकते हैं कि यहाँ पर इन पाँचों को पहचानने वाला कोई न था, मगर भूतनाथ और राजा गोपालसिंह बड़े गौर से उनकी तरफ देखकर अपने हाफजे (स्मरणशक्ति)पर जोर दे रहे थे, और उम्मीद करते थे कि इन्हें हम पहचान लेंगे।
सुरेन्द्रसिंह- (गोपालसिंह की तरफ देखकर)केवल हम लोग नहीं बल्कि हजारों आदमी इनका हाल जानने के लिए बेताब हो रहे हैं, अतः ऐसा करना चाहिए कि एक साथ ही इनका हाल मालूम हो जाये ।
गोपालसिंह-मेरी भी यही राय है ।
एक नकाबपोश-कैदियों के सामने ही हम लोगों का किस्सा सुना जाये तो ठीक है, क्योंकि ऐसा होने ही से महाराज का विचार पूरा होगा। इसके अतिरिक्त हम लोगों के किस्से में वही कैदी हामी भरेंगे, और कई अधूरी बातों को पूरा करके महाराज का शक दूर करेंगे, जिन्हें हम लोग भी नहीं जानते, और जिनके लिए महाराज भी छूट गए थे। निका असल उत्सुक होंगे।
इन्द्रजीतसिंह-(सुरेन्द्रसिंह से) बेशक ऐसा ही है । यद्यपि हम दोनों भाई इन लोगों का किस्सा सुन चुके हैं, मगर कई भेदों का पता नहीं लगा, जिनके जाने बिना जी बेचैन हो रहा है, और उनका मालूम होना कैदियों की इच्छा पर निर्भर है ।
सुरेन्द्रसिंह–(कुछ सोचकर) खैर, ऐसा ही किया जायेगा।
इसके बाद उन लोगों में दूसरे तरह की बातचीत होने लगी, जिसके लिखने की कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती । इसके घण्टे भर बाद यह दरबार बर्खास्त हुआ और सब कोई अपने-अपने स्थान पर चले गए।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह का दिल किशोरी को देखने के लिए बेताब हो रहा था। उन्हें विश्वास था कि यहां पहुंचकर उससे अच्छी तरह मुलाकात होगी और बहुत दिनों का अरमान-भरा दिल उसकी सोहबत से तस्कीन पाकर पुनः उसके कब्जे में आ जायेगा मगर ऐसा नहीं हुआ अर्थात् कुमार के आने से पहले ही वह अपने नाना के डेरे में भेज दी गई, और उनका अरमान-भरा दिल उसी तरह तड़पता रह गया । यद्यपि उन्हें इस बात का भी विश्वास था कि अब उनकी शादी किशोरी के साथ बहुत जल्द होने वाली है, मगर फिर भी उनका मनचला दिल जिसे उनके कब्जे के बाहर हुए मुद्दत हो चुकी थी, इन चापलूसियों को कब मानता था ! इसी तरह कमलिनी से भी मीठी-मीठी बातें करने के लिए वे कम बेताब न थे, मगर बड़ों का लिहाज उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देता था कि उससे एकान्त में मुलाकात करें, यद्यपि वे ऐसा करते तो कोई हर्ज की बात न थी। मगर इसलिए कि उसके साथ भी शादी होने की उम्मीद थी, शर्म और लिहाज के फेर में पड़े हुए थे । परन्तु कमलिनी को इस बात का सोच-विचार कुछ भी न था । हम इसका सबब भी बयान नहीं कर सकते, हाँ, इतना कहेंगे कि जिस कमरे में कुंअर इन्द्रजीतसिंह का डेरा था उसी के पीछे वाले कमरे में कमलिनी का डेरा था, और उस कमरे से कुँअर इन्द्रजीतसिंह के कमरे के आने-जाने के लिए एक छोटा-सा दरवाजा भी था जो इस समय भीतर की तरफ से अर्थात् कमलिनी की तरफ से बन्द था और कुमार को इस बात की कुछ भी खबर न थी।
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी थी। कुंअर इन्द्रजीतसिंह अपने पलंग पर लेटे हुए किशोरी और कमलिनी के विषय में तरह-तरह की बातें सोच रहे थे। उनके पास कोई दूसरा आदमी न था और एक तरह पर सन्नाटा छाया हुआ था, यकायक पीछे वाले कमरे का (जिसमें कमलिनी का डेरा था)दरवाजा खुला और अन्दर से एक लौंडी आती हुई दिखाई पड़ी।
कुमार ने चौंककर उसकी तरफ देखा और उसने हाथ जोड़कर अर्ज किया,"कमलिनीजी आपसे मिलना चाहती हैं, आज्ञा हो तो स्वयं यहाँ आवें या आप ही वहाँ
कुमार–वे कहां हैं ?
लौंडी-(पिछले कमरे की तरफ बताकर) इसी कमरे में तो उनका डेरा है ।
कुमार-(ताज्जुब से) इसी कमरे में ! मुझे इस बात की कुछ भी खबर न थी। अच्छा मैं स्वयं चलता हूँ, तू इस कमरे का दरवाजा बन्द कर दे।
आज्ञा पाते ही लौंडी ने कुमार के कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया जिसमें बाहर से कोई यकायक आ न जाय । इसके बाद इशारा पाकर लौंडी कमलिनी के कमरे की तरफ रवाना हुई और कुमार उसके पीछे-पीछे चले। चौखट के अन्दर पैर रखते ही कुमार की निगाह कमलिनी पर पड़ी और वे भौचक्के से होकर उसकी सूरत देखने लगे।
इस समय कमलिनी की सुन्दरता बनिस्बत पहले के बहुत ही बढ़ी-चढ़ी देखने में आई । पहले जिन दिनों कुमार ने कमलिनी की सूरत देखी थी, उन दिनों वह बिल्कुल उदासीन और मामूली ढंग पर रहा करती थी। मायारानी के झगड़े की बदौलत उसकी जान जोखिम में पड़ी हुई थी और इस कारण से दिमाग को एक पल के लिए भी छुट्टी नहीं मिलती थी । इन्हीं सब कारणों से उसके शरीर और चेहरे की रौनक में भी बहुत बड़ा फर्क पड़ गया था, तिस पर भी वह कुमार की सच्ची निगाह में एक ही दिखाई देती थी। फिर आज उसकी खुशी और खूबसूरती का क्या कहना है जब कि ईश्वर की कृपा से वह अपने तमाम दुश्मनों पर फतह पा चुकी है, तर दुदों के बोझ से हलकी हो चुकी है और मनमानी उम्मीदों के साथ अपने को बनाने-सँवारने का भी मुनासिब मौका उसे मिल गया है ! यही सबब है कि इस समय वह रानियों की सी पोशाक और सजावट में दिखाई देती है।
कमलिनी की इस समय की खूबसूरती ने कुमार पर बहुत बड़ा असर किया और बनिस्बत पहले के इस समय बहुत ज्यादा कुमार के दिल पर अपना अधिकार जमा लिया,कुमार को देखते ही कमलिनी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुमार ने आगे बढ़कर बड़े प्रेम से उसका हाथ पकड़कर पूछा, "कहो, अच्छी तो हो?"
"अब भी अच्छी न होऊँगी !" कहकर मुस्कुराती हुई कमलिनी ने कुमार को ले जाकर एक ऊँची गद्दी पर बैठाया और आप भी उनके पास बैठकर यों बातचीत करने लगी।
कमलिनी-कहिये, तिलिस्म के अन्दर आपको किसी तरह की तकलीफ तो नहीं नहीं हुई
इन्द्रजीतसिंह-ईश्वर की कृपा से हम लोग कुशलपूर्वक यहाँ तक चले आये और अब तुम्हें धन्यवाद देते हैं, क्योंकि यह सब बातें हमें तुम्हारी ही बदौलत नसीब हुई हैं । अगर तुम मदद न करतीं तो न मालूम हम लोगों की क्या दशा होती ! हमारे साथ तुमने जो कुछ उपकार किया है, उसका बदला चुकाना मेरी सामर्थ्य के बाहर है, सिवाय इसके मैं क्या कह सकता हूँ कि मेरी (अपनी छाती पर हाथ रख के) यह जान और शरीर तुम्हारा है।
कमलिनी-(मुस्कुरा कर) अब कृपा कर इन सब बातों को तो रहने दीजिए, क्योंकि इस समय मैंने इसलिए आपको तकलीफ नहीं दी है कि अपनी बढ़ाई सुनूं या आप पर अपना अधिकार जमाऊँ।
इन्द्रजीतसिंह–अधिकार तो तुमने उसी दिन मुझ पर जमा लिया जिस दिन ऐयार के हाथ से मेरी जान बचाई और मुझसे तलवार की लड़ाई लड़कर यह भी दिखा दिया कि मैं तुमसे ताकत में कम नहीं हूँ।
कमलिनी- (हँसकर) क्या खूब ! मैं और आपका मुकाबला करूं!आपने मुझे भी क्या कोई पहलवान समझ लिया है ? इन्द्रजीतसिंह-आखिर बात क्या थी जो उस दिन मैं तुमसे हार गया था ?
कमलिनी-आपको उस बेहोशी की दवा ने कमजोर और खराब कर दिया था जो एक अनाड़ी ऐयार की बनाई हुई थी। उस समय केवल आपको चैतन्य करने के लिए मैं लड़ पड़ी थी, नहीं तो कहाँ मैं और कहाँ आप !
इन्द्रजीतसिंह-खैर, ऐसा ही होगा । मगर इसमें तो कोई शक नहीं कि तुमने मेरी जान बचाई, केवल उसी दफे नहीं बल्कि उसके बाद भी कई दफे ।
कमलिनी-छोड़िए भी, अव इन सब बातों को जाने दीजिये, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहती । हाँ, यह बतलाइये कि तिलिस्म के अन्दर आपने क्या-क्या देखा, और क्या-क्या किया?
इन्द्रजीतसिंह- मैं सब हाल तुमसे कहूँगा, बल्कि उन नकाबपोशों की कैफियत भी तुमसे बयान करूंगा जो मुझे तिलिस्म के अन्दर कैद मिले और जिनका हाल अभी तक मैंने किसी से बयान नहीं किया। मगर तुम यह सब हाल अपनी जुबान से किसी से न कहना।
कमलिनी-बहुत खूब ।
इसके बाद कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना कुल हाल कमलिनी से बयान किया।और कमलिनी ने भी अपना पिछला किस्सा और उसी के साथ-साथ भूतनाथ, नानक तथा तारा वगैरह का हाल बयान किया जो कुमार को मालूम न था। इसके बाद पुनः उन।दोनों में यों बातचीत होने लगी-
इन्द्रजीतसिंह-आज तुम्हारी जुबानी बहुत-सी ऐसी बातें मालूम हुई हैं जिनके विषय में मैं कुछ भी नहीं जानता था।
कमलिनी-इसी तरह आपकी जुबानी उन नकाबपोशों का हाल सुनकर मेरी अजीब हालत हो रही है, क्या करूँ, आपने मना कर दिया है कि किसी से इस बात का जिक्र न करना, नहीं तो अपने सुयोग्य पति से उनके विषय में
इन्द्रजीतसिंह-(चौंककर) हैं ! क्या तुम्हारी शादी हो गई ?
कमलिनी—(कुमार के चेहरे का रंग उड़ा हुआ देख मुस्कुराकर) मैं अपने उस तालाब वाले मकान में अर्ज कर चुकी थी कि मेरी शादी बहुत जल्द होने वाली है !
इन्द्रजीतसिंह- (लम्बी सांस लेकर) हाँ, मुझे याद है, मगर यह उम्मीद न थी कि वह इतनी जल्दी हो जायगी।
कमलिनी-तो क्या आप मुझे हमेशा कुँआरी ही देखना पसन्द करते थे ?
इन्द्रजीतसिंह-नहीं, ऐसा तो नहीं है, मगर
कमलिनी -मगर क्या ? कहिए-कहिए, रुके क्यों ?
इन्द्रजीतसिंह-यही कि मुझसे पूछ तो लिया होता।
कमलिनी-क्या खूब ! आपने क्या मुझसे पूछकर इन्द्रानी के साथ शादी की थी जो मैं आपसे पूछ लेती !
इतना कहकर कमलिनी हँस पड़ी और कुमार ने शरमाकर सिर झुका लिया । मगर इस समय कुमार के चेहरे से भी मालूम होता था कि उन्हें हद दर्जे का रंज है और कलेजे में बेहिसाब तकलीफ हो रही है।
कुमार—(कमलिनी के पास से कुछ खिसककर) मुझे विश्वास था कि जन्म-भर तुमसे हँसने-बोलने का मौका मिलेगा।
कमलिनी-मेरे दिल में भी यही बात बैठी हुई थी और यही तय करके मैंने शादी की है कि आपसे कभी अलग होने की नौबत न आवे। मगर आप हट क्यों गये ? आइये-आइये, जिस जगह बैठे थे, वहीं बैठिए ।
कुमार-नहीं-नहीं, पराई स्त्री के साथ एकान्त में बैठना ही धर्म के विरुद्ध है न कि साथ सटकर, मगर आश्चर्य है कि तुम्हें इस बात का कुछ भी खयाल नहीं है ! मुझे विश्वास था कि तुमसे कभी कोई काम धर्म के विरुद्ध न हो सकेगा।
कमलिनी–मुझमें आपने कौन-सी बात धर्म-विरुद्ध पाई ?
कुमार—यही कि तुम इस तरह एकान्त में बैठकर मुझसे बातें कर रही हो इससे भी बढ़कर वह बात जो अभी तुमने अपनी जुबान से कबूल की है कि 'तुमसे कभी अलग न होऊँगी' । क्या यह धर्म-विरुद्ध नहीं है ? क्या तुम्हारा पति इस बात को जानकर भी तुम्हें पतिव्रता कहेगा?
कमलिनी-कहेगा, और जरूर कहेगा । अगर न कहे तो इसमें उसकी भूल है । उसे निश्चय है और आप सच समझिये कि कमलिनी प्राण दे देना स्वीकार करेगी, परन्तु धर्म-विरुद्ध पथ पर चलना कदापि नहीं। आपको मेरी नीयत पर ध्यान देना चाहिए । दिल्लगी की बातों पर नहीं, क्योंकि मैं ऐयार भी हूँ। यदि मेरा पति इस समय यहाँ आ जाय तो आपको मालूम हो जाय कि मुझ पर वह जरा भी शक नहीं करता और मेरा इस तरह बैठना उसे कुछ भी नहीं अखरता ।
कुमार—(कुछ सोचकर) ताज्जुब है !
कमलिनी-अभी क्या, आगे आपको और भी ताज्जुब होगा। इतना कहकर कमलिनी ने कुमार की कलाई पकड़ ली और अपनी तरफ खींचकर कहा, "पहले आप अपनी जगह पर आकर बैठ जाइये तब मुझसे बात कीजिए।"
कुमार-नहीं-नहीं कमलिनी, तुम्हें ऐसा उचित नहीं है । दुनिया में धर्म से बढ़कर और कोई वस्तु नहीं है। अतएव तुम्हें भी धर्म पर ध्यान रखना चाहिए । अब तुम स्वतन्त्र नहीं हो, पराये की स्त्री हो।
कमलिनी-यह सच है, परन्तु मैं आपसे पूछती हूँ कि यदि मेरी शादी आपके साथ होती तो क्या मैं आनन्दसिंह से हँसने-बोलने या दिल्लगी करने लायक न रहती ?
कुमार—बेशक, उस हालत में तुम आनन्द से हँस-बोल और दिल्लगी भी कर सकती थीं, क्योंकि यह बात हम लोगों में लौकिक व्यवहार के ढंग पर प्रचलित है।
कमलिनी–बस, तो मैं आपसे भी उसी तरह हँस-बोल सकती हूँ और ऐसा करने के लिए मेरे पति ने मुझे आज्ञा भी दे दी है, मैं उनका पत्र आपको दिखा सकती हूँ इसलिए कि मेरा-आपका नाता ही ऐसा है, एक नहीं बल्कि तीन-तीन नाते हैं।
इन्द्रजीतसिंह–सो कैसे ?
कमलिनी-सुनिये, मैं कहती हूँ। एक तो मैं किशोरी को अपनी बहिन समझती
हूँ अतएव आप मेरे बहनोई हुए, कहिए कि हाँ ।
कुमार —— यह कोई बात नहीं है, क्योंकि अभी किशोरी की शादी मेरे साथ नहीं हुई है।
कमलिनी –– खैर, जाने दीजिये। मैं दूसरा और तीसरा नाता बताती हूँ। जिनके साथ मेरी शादी हुई है, वे राजा गोपालसिंह के भाई हैं। इसके अतिरिक्त लक्ष्मीदेवी की मैं छोटी बहिन हूं अतएव आपकी साली भी हुई।
कुमार —— (कुछ सोचकर) हां, इस बात से तो मैं कायल हुआ। मगर तुम्हारी नीयत में किसी तरह फर्क न आना चाहिए।
कमलिनी —— इससे आप बेफिक्र रहिये। मैं अपना धर्म किसी तरह नहीं बिगाड़ सकती और न दुनिया में कोई ऐसा पैदा हुआ है जो मेरी नीयत बिगाड़ सके, आइए अब तो अपने ठिकाने पर बैठ जाइए।
लाचार कुंअर इन्द्रजीतसिंह अपने ठिकाने आ बैठे और पुनः बातचीत करने लगे, मगर उदास बहुत थे और यह बात उनके चेहरे से जाहिर हो रही थी।
यकायक कमलिनी ने मसखरेपन के साथ हँस दिया जिससे कुमार को खयाल हो गया कि इसने जो कुछ कहा सब झूठ और केवल दिल्लगी के लिए था। मगर साथ ही इसके उनके दिल का खुटका साफ नहीं हुआ।
कमलिनी — अच्छा आप यह बताइए कि तिलिस्म की कैफियत देखने के लिए राजा साहब तिलिस्म के अन्दर जायेंगे या नहीं ?
कुमार — जरूर जायेंगे।
कमलिनी —— कब ?
कुमार —— सो मैं ठीक नहीं कह सकता, शायद कल या परसों ही जायें। कहते थे कि तिलिस्म के अन्दर चलकर उसे देखने का इरादा है। इसके जवाब में भाई गोपालसिंह ने कहा कि कि जरूर और जल्द चलकर देखना चाहिए।
कमलिनी —— तो क्या हम लोगों को साथ ले जायेंगे?
कुमार —— सो मैं कैसे कहूँ ? तुम गोपाल भाई से कहो, वह इसका बन्दोबस्त जरूर कर देंगे, मुझे तो कुछ शर्म मालूम होगी।
कमलिनी —— सो तो ठीक है, अच्छा, मैं कल उनसे कहूँगी।
कुमार ——- मगर तुम लोगों के साथ किशोरी भी अगर तिलिस्म के अन्दर जाकर वहाँ की कैफियत न देखेगी तो मुझे इस बात का रंज जरूर होगा।
कमलिनी —— बात तो वाजिब है, मगर वह इस मकान में तभी आवेगी जब उनकी शादी आपके साथ हो जायगी और इसीलिए वह अपने नाना के डेरे में भेज दी गई हैं। खैर, तो आप इस मामले को तब तक के लिए टाल दीजिए जब तक आपकी शादी न हो जाय।
कुमार —— मैं भी यही उचित समझता हूँ, अगर महाराज मान जायें तो।
कमलिनी —— या आप हम लोगों को फिर दूसरी दफे ले जायेगा।
कुमार — हाँ, य. भी हो सकता है। अबकी दफे का वहाँ जाना महाराज की
इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिए, वे जिसे चाहें ले जायें।
कमलिनी — बेशक, ऐसा ही ठीक होगा । अब तिलिस्म के अन्दर जाने में आपत्ति ही काहे की है, जब और जितनी दफे आप चाहेंगे हम लोगों को ले जायेंगे ।
कुमार — नहीं, सो बात ठीक नहीं । वहुत सी जगहें ऐसी हैं जहाँ सैकड़ों दफे जाने में भी कोई हर्ज नहीं है, मगर बहुत-सी जगहें तिलिस्म टूट जाने पर भी नाजुक हालत में बनी हुई हैं और जहाँ बार-बार जाना कठिन है, तथापि मैं तुम लोगों को वहाँ की सैर जरूर कराऊँगा।
कमलिनी–मैं समझती हूँ कि मेरे उस तालाब वाले तिलिस्मी मकान के नीचे भी कोई तिलिस्म जरूर है । उस खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब का मजमून पूरी तरह से मेरी समझ में नहीं आता था, तथापि इस ढंग की बातों पर कुछ शक जरूर होता था।
कुमार — तुम्हारा ख्याल बहुत ठीक है, हम दोनों भाइयों को खून ने लिखी उस तिलिस्मी किताब के पढ़ने से बहुत ज्यादा हाल मालूम हुआ है, इसके अतिरिक्त मुझे तुम्हारा वह स्थान भी ज्यादा पसन्द है और पहले भी मैं (जब तुम्हारे पास वहाँ था) यह विचार कर चुका था कि 'सब कामों से निश्चिन्त होकर कुछ दिनों के लिए जरूर यहाँ डेरा जमाऊँगा, परन्तु अब मेरा वह विचार कुछ काम नहीं दे सकता।
कमलिनी — सो क्यों ?
कुमार — इसलिए कि अगर तुम्हारी बातें ठीक हैं, तो अब वह स्थान तुम्हारे पति के अधिकार में होगा।
कमलिनी — (मुस्कुराकर) तो क्या हर्ज है, मैं उनसे कहकर आपको दिला दूंगी।
कुमार — मैं किसी से भीख मांगना पसन्द नहीं करता और न उनसे लड़कर वह स्थान छीन लेना ही मुझे मंजूर होगा। कमलिनी, सच तो ये है कि तुमने मुझे धोखा दिया और बहुत बड़ा धोखा दिया ! मुझे तुमसे यह उम्मीद न थी। (कुछ सोचकर) एक दफे तुम मुझसे फिर कह दो कि सचमुच शादी हो गई।
इसके जवाब में कमलिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली, "हाँ, हो गई।"
कुमार — मेरे सिर पर हाथ रखकर कसम खाओ।
कमलिनी —— (कुमार के पैरों पर हाथ रख के) आपसे मैं कसम खाकर कहती हूं कि मेरी शादी हो गई।
हम लिख नहीं सकते कि इस समय कुमार के दिल की कैसी बुरी हालत थी, रंज और अफसोस से उनका दिल बैठा जाता था और कमलिनी हँस-हँसकर चुटकियाँ लेती थी। बड़ी मुश्किल से कुमार थोड़ी देर तक और उसके पास बैठे और फिर उठकर लम्बी साँसें लेते हुए अपने कमरे में चले गए। रात भर उन्हें नींद न आई ।
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महाराज की आज्ञानुसार कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के विवाह की तैयारी बड़ी धूमधाम से हो रही है। यहां से चुनार तक की सड़कें दोनों तरफ जाफरी वाली टट्टियों से सजाई हैं, जिन पर रोशनी की जायेगी और जिनके बीच में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बड़े फाटक बने हुए हैं और उन पर नौबतखाने का इन्तजाम किया गया है। टट्टियों के दोनों तरफ बाजार बसाया जायेगा, जिसकी तैयारी कारिन्दे लोग बड़ी खूबी और मुस्तैदी के साथ कर रहे हैं। इसी तरह और भी तरह-तरह के तमाशों का इन्तजाम बीच-बीच में हो रहा है, जिसके सबब से बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ होने की उम्मीद है और अभी से तमाशबीनों का जमावड़ा भी हो रहा है। रोशनी के साथ-साथ आतिशबाजी के इन्तजाम में भी बड़ी सरगर्मी दिखाई जा रही है, कोशिश हो रही है कि उम्दा से उम्दा तथा अनूठी आतिशबाजी का तमाशा लोगों को दिखाया जाये। इसी तरह और भी कई तरह के खेल-तमाशे और नाच इत्यादि का बन्दोबस्त हो रहा है, मगर इस समय हम इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है क्योंकि हम अपने पाठकों को उस तिलिस्मी मकान की तरफ ले चलना चाहते हैं, जहां भूतनाथ और देवीसिंह ने नकाबपोशों के फेर में पड़कर शर्मिन्दगी उठाई थी और जहाँ इस समय दोनों कुमार अपने दादा, पिता तथा और सब आपस वालों को तिलिस्मी तमाशा दिखाने के लिए ले जा रहे हैं।
सुबह का सुहावना समय है और ठंडी हवा चल रही है। जंगली फूलों की खुशबू से मस्त सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगी खूबसूरत चिड़ियाएं हमारे सर्वगुण-सम्पन्न मुसाफिरों को मुबारकबाद दे रही हैं, जो तिलिस्म की सैर करने की नीयत से मीठी-मीठी बातें करते हुए जा रहे हैं।
घोड़े पर सवार महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा पैदल तेजसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ, पंडित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल वगैरह अपने ऐयार लोग जा रहे थे। तिलिस्म के अन्दर मिले हुए कैदी अर्थात् नकाबपोश लोग तथा भैरोंसिंह और तारासिंह इस समय साथ न थे।इस समय देवीसिंह से ज्यादा भूतनाथ का कलेजा उछल रहा था और वह अपनी स्त्री का असली भेद जानने के लिए बेताब हो रहा है। जब से उसे इस बात का पता लगा कि वे दोनों सरदार नकाबपोश यही दोनों कुमार हैं तथा उस विचित्र मकान के मालिक भी यही हैं, तब से उसके दिल का खुटका कुछ कम तो हो गया, मगर खुलासा हाल जानने और पूछने का मौका न मिलने के सबब उसकी बेचैनी दूर नहीं हुई थी। वह यह भी जानना चाहता था कि अब उसकी स्त्री तथा लड़का हरनामसिंह किस फिक्र में हैं। इस समय जब वह फिर उसी ठिकाने जा रहा था, जहाँ अपनी स्त्री की बदौलत गिरफ्तार होकर अपने लड़के का विचित्र हाल देखा था, तब उसका दिल और बेचैन हो उठा था मगर साथ ही इसके उसे इस बात की भी उम्मीद हो रही थी कि अब उसे उसकी स्त्री का हाल मालूम हो जायेगा या कुछ पूछने का मौका ही मिलेगा। ये लोग धीरे-धीरे बातचीत करते हुए उसी खोह या सुरंग की तरफ जा रहे थे।दिन पहर भर से ज्यादा न चढ़ा होगा, जब ये लोग उस ठिकाने पहुंच गए। महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह वगैरह घोड़ों पर से नीचे उतर पड़े, साईसों ने घोड़े थाम लिए और इसके बाद उन सभी ने सुरंग के अन्दर पैर रखा । इस सुरंग वाले रास्ते का कुछ खुलासा हाल हम इस सन्तति के उन्नीसवें भाग में लिख आये हैं, जब भूतनाथ यहाँ आया था, अब उसे पुनः दोहराने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। हाँ, इतना लिख देना जरूरी जान पड़ता है कि दोनों कुमारों ने सभी को यह बात समझा दी कि यह रास्ता बन्द क्योंकर हो सकता है। बन्द होने का स्थान वही चबूतरा था जो सुरंग के बीच में पड़ता था।
जिस समय ये लोग सुरंग तय करके मैदान में पहुँचे, सामने वही छोटा बँगला दिखाई दिया, जिसका हाल हम पहले लिख चुके हैं। इस समय उस बँगले के आगे वाले दालान में दो नकाबपोश औरतें हाथ में तीर-कमान लिए टहलती पहरा दे रही थीं जिन्हें देखते ही खास करके भूतनाथ और देवीसिंह को बड़ा ताज्जुब हुआ और उनके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं । भूतनाथ का इशारा पाकर देवीसिंह ने कुंअर इन्द्र-जीतसिंह से पूछा, "ये दोनों नकाबपोश औरतें कौन हैं जो पहरा दे रही हैं?' इसके जवाब में कुमार तो चुप रह गए, मगर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने कहा, "इसके जानने की तुम लोगों को क्या जल्दी पड़ी हुई है? जो कोई होंगी, सब मालूम ही हो जायेगा !"
इस जवाब ने देवीसिंह और भूतनाथ को देर तक के लिए चुप कर दिया और विश्वास दिला दिया कि महाराज को इनका हाल जरूर मालूम है। जब उन औरतों ने इन सभी को पहचाना और अपनी तरफ आते देखा, तो बैंगले के अन्दर घुसकर गायब हो गईं, तब तक ये लोग भी उस दालान में जा पहुँचे। इस जर भी यह बँगला उसी हालत में था जैसा कि भूतनाथ और देवीसिंह ने देखा था।
हम पहले लिख चुके हैं और अब भी लिखते हैं कि यह बंगला जैसा बाहर से सादा और साधारण मालूम होता था वैसा अन्दर से न था और यह बात दालान में पहुंचने के साथ ही सभी को मालूम हो गई । दालान की दीवारों में निहायत खूबसूरत और आलादर्जे की कारीगरी का नमूना दिखाने वाली तस्वीरों को देखकर सब कोई दंग हो गए और मुसौवर के हाथों की तारीफ करने लगे। ये तस्वीरें एक निहायत आलीशान इमारत की थीं और उसके ऊपर बड़े-बड़े हरफों में यह लिखा हुआ था-
"यह तिलिस्म चुनारगढ़ के पास ही एक निहायत खूबसूरत जंगल में कायम किया गया है, जिसे महाराज सुरेन्द्रसिंह के लड़के वीरेन्द्रसिंह तोड़ेंगे।"
इस तस्वीर को देखते ही सभी को विश्वास हो गया कि वह तिलिस्मी खंडहर जिसमें तिलिस्मी बगुला था और जिस पर इस समय निहायत आलीशान इमारत बनी हुई है पहले इसी शक्ल-सूरत में था, जिसे जमाने के हेर-फेर ने अच्छी तरह बर्वाद करके उजाड़ और भयानक बना दिया । इमारत की उस बड़ी और पूरी तस्वीर के नीचे उसके भीतर वाले छोटे-छोटे टुकड़े भी बनाकर दिखलाए गए थे और उस बगुले की तस्वीर भी बनी हुई थी जिसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने बखूबी पहचान लिया और कहा, "बेशक अपने जमाने में वह बहुत अच्छी इमारत थी।"
सुरेन्द्रसिंह-यद्यपि आजकल जो इमारत तिलिस्मी खंडहर पर बनी है और जिसके बनवाने में जीतसिंह ने अपनी तबीयतदारी और कारीगरी का अच्छा नमूना दिखाया है, बुरी नहीं है, मगर हमें इस पहली इमारत का ढंग कुछ अनूठा और सुन्दर मालूम पड़ता है।
जीतसिंह-बेशक ऐसा ही है । यदि इस तस्वीर को मैं पहले देखे हुए होता तो जरूर इसी ढंग की इमारत बनवाता।
वीरेन्द्रसिंह-और ऐसा होने से वह तिलिस्म एक दफे नया मालूम पड़ता।
इन्द्रजीतसिंह–यह नारगढ़ वाला तिलिस्म साधारण नहीं बल्कि बहुत बड़ा है। नौगढ़, विजयगढ़ और जमानिया तक इसकी शाखा फैली हुई है । इस बँगले को इस बहुत बड़े और फैले तिलिस्म का 'केन्द्र' समझना चाहिए, बल्कि ऐसा भी कह सकते हैं कि यह बंगला तिलिस्म का नमूना है ।
थोड़ी देर तक दालान में खड़े इसी किस्म की बातें होती रहीं और इसके बाद सभी को साथ लिए हुए दोनों कुमार बँगले के अन्दर रवाना हुए।
सदर दरवाजे का पर्दा उठाकर अन्दर जाते ही ये लोग एक गोल कमरे में पहुंचे,जो भूतनाथ और देवीसिंह का देखा हुआ था। इस गोल और गुम्बददार खूबसूरत कमरे की दीवारों पर जंगलों, पहाड़ों और रोहतासगढ़ की तस्वीरें बनी हुई थीं। घड़ी-घड़ी तारीफ न करके एक ही दफे लिख देना ठीक होगा कि इस बँगले में जितनी तस्वीरें देखने में आईं, सभी आला दर्जे की कारीगरी का नमूना थीं और यही मालूम होता था कि आज ही बनकर तैयार हुई हैं । इस रोहतासगढ़ की तस्वीर को देखकर सब कोई बड़े प्रसन्न हुए और राजा वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखकर कहा, "रोहतासगढ़ किले और पहाड़ी की बहुत ठीक और साफ तस्वीर बनी हुई है।"
तेजसिंह-जंगल भी उसी ढंग का बना हुआ है, कहीं-कहीं से ही फर्क मालूम पड़ता है, नहीं तो बाज जगहें तो ऐसी बनी हुई हैं जैसी मैंने अपनी आँखों से देखी हैं ।(उँगली का इशारा करके) देखिये यह वही कब्रिस्तान है जिस राह से हम लोग रोहतास- गढ़ के तहखाने में घुसे थे। हाँ, यह देखिए, बारीफ हरफों में लिखा हआ भी है-"तहखाने में जाने का बाहरी फाटक ।"
इन्द्रजीतसिंह–इस तस्वीर को अगर गौर से देखेंगे तो वहाँ का बहुत ज्यादा हाल मालूम होगा। जिस जमाने में यह इमारत तैयार हुई थी, उस जमाने में वहां की और उसके चारों तरफ की जैसी अवस्था थी, वैसी ही इस तस्वीर में दिखाई है,आज चाहे कुछ फर्क पड़ गया हो!
तेजसिंह-बेशक ऐसा ही है।
इन्द्रजीतसिंह-इसके अतिरिक्त एक और ताज्जुब की बात अर्ज करूंगा।
वीरेन्द्रसिंह-वह क्या ?
इन्द्रजीतसिंह-इसी दीवार में से वहाँ (रोहतासगढ़) जाने का रास्ता भी है !
सुरेन्द्रसिंह-वाह-वाह ! क्या तुम इस रास्ते को खोल भी सकते हो? इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, हम लोग इसमें बहुत दूर तक जाकर घूम आये हैं ।
सुरेन्द्रसिंह –यह भेद तुम्हें क्योंकर मालूम हुआ ?
इन्द्रजीतसिंह–उसी 'रिक्तगन्थ' की बदौलत हम दोनों भाइयों को इन सब जगहों का हाल और भेद पूरा-पूरा मालूम हो चुका है। यदि आज्ञा हो तो दरवाजा खोलकर मैं आपको रोहतासगढ़ के तहखाने में ले जा सकता हूँ। वहाँ के तहखाने में भी एक छोटा-सा तिलिस्म है, जो इसी बड़े तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और हम लोग उसे खोल या तोड़ भी सकते हैं परन्तु अभी तक ऐसा करने का इरादा नहीं किया।
सुरेन्द्रसिंह–उस रोहतासगढ़ वाले तिलिस्म के अन्दर क्या चीज है ?
इन्द्रजीतसिंह-उसमें केवल अनूठे अद्भुत आश्चर्य गुण वाले हर्षे रखे हुए हैं,उन्हीं हरबों पर वह तिलिस्म बँधा है। जैसा तिलिस्मी खंजर हम लोगों के पास है या जैसे तिलिस्मी जिरह-बख्तर और हरबों की बदौलत राजा गोपालसिंह ने कृष्ण जिन्न का रूप धरा था, वैसे हरबों और असबाबों का तो वहां ढेर लगा हुआ है, हाँ, खजाना वहाँ कुछ भी नहीं है
सुरेन्द्रसिंह-ऐसे अनूठे हर्के खजाने से क्या कम हैं ?
जीतसिंह–वेशक ! (इन्द्रजीतसिंह से) जिस हिस्से को तुम दोनों भाइयों ने तोड़ा है, उसमें भी तो ऐसे अनूठे हरबे होंगे?
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, मगर बहुत कम हैं।
वीरेन्द्रसिंह–अच्छा यदि ईश्वर की कृपा हुई तो फिर किसी मौके पर इस रास्ते से रोहतासगढ़ जाने का इरादा करेंगे। (मकान की सजावट और परदों की तरफ देखकर) क्या यह सब सामान, कन्दील, पर्दे और बिछावन वगैरह तुम लोग तिलिस्म के अन्दर से लाए थे?
इन्द्रजीतसिंह-जी नहीं, जब हम लोग यहां आए, तो इस बंगले को इसी तरह सजा-सजाया पाया और तीन-चार आदमियों को भी देखा जो इस बंगले की हिफाजत और मेरे आने का इन्तजार कर रहे थे।
सुरेन्द्रसिंह-(ताज्जुब से) वे लोग कौन थे और अब कहां हैं ?
इन्द्रजीतसिंह–दरियाफ्त करने पर मालूम हुआ कि वे लोग इन्द्रदेव के मुलाजिम थे, जो इस समय अपने मालिक के पास चले गए हैं। इस तिलिस्म का दारोगा असल इन्द्रदेव है, और आज के पहले भी इसी के बुजुर्ग लोग दारोगा होते आए हैं।
सुरेन्द्रसिंह-यह तुमने बड़ी खुशी की बात सुनाई, मगर अफसोस यह है कि इन्द्रदेव ने हमें इन बातों की कुछ भी ख़बर न की। आनन्दसिंह-अगर इन्द्रदेव ने इन सब बातों को आपसे छिपाया, तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है, तिलिस्मी कायदे के मुताबिक ऐसा होना ही चाहिए था।
सुरेन्द्रसिंह –ठीक है, तो मालूम होता है कि यह सब सामान तुम्हारी खातिर-दारी के लिए इन्द्रदेव की आज्ञानुसार किया गया है।
आनन्दसिंह-जी हाँ, उसके आदमियों की जबानी मैंने भी यही सुना है ।
इसके बाद बड़ी देर तक ये लोग इन तस्वीरों को देखते और ताज्जुब भरी बातें करते रहे और फिर आगे की तरफ बढ़े । जब पहले भूतनाथ और देवीसिंह यहाँ आये थे, तब हम लिख चुके हैं कि इस कमरे में सदर दरवाजे के अतिरिक्त और भी तीन दरवाजे थे—इत्यादि । अतः उन दोनों ऐयारों की तरह इस समय भी सभी को साथ लिए हुए दोनों कुमार दाहिनी तरफ वाले दरवाजे के अन्दर गए, और घूमते हुए उसी बहुत बड़े और आलीशान कमरे में पहुँचे, जिसमें पहले भूतनाथ और देवी सिंह ने पहुंच कर आश्चर्य-भरा तमाशा देखा था।
इस आलीशान कमरे की तस्वीरें खूबी और खूबसूरती में संब तस्वीरों से बढ़ी-चढ़ी थी तथा दीवारों पर जंगल, मैदान पहाड़, खोह, दरे, झरने, शिकारगाह तथा शहरपनाह, किले, मोर्चे और लड़ाई इत्यादि की बहुत तस्वीरें बनी हुई थीं, जिन्हें सब कोई गौर और ताज्जुब के साथ देखने लगे।
सुरेन्द्रसिंह-(किले की तरफ इशारा करके) यह तो चुनारगढ़ की तस्वीर है।
इन्द्रजीतसिंह—जी हाँ, (उँगली का इशारा करके) और यह जमानिया के किले तथा खास बाग की तस्वीर है । इसी दीवार में से वहाँ जाने का भी रास्ता है । महाराज सूर्यकान्त के जमाने में उनके शिकारगाह और जंगल की यह सूरत थी।
वीरेन्द्रसिंह-और यह लड़ाई की तस्वीर कैसी है ? इसका क्या मतलब है ?
इन्द्रजीतसिंह-इन तस्वीरों में बड़ी कारीगरी खर्च की गई है। महाराज सूर्य-कान्त ने अपनी फौज को जिस तरह की कवायद और व्यूह-रचना इत्यादि का ढंग सिखाया था वे सब बातें इन तस्वीरों में भरी हुई हैं। एक तरकीब करने से ये सब तस्वीरें चलती-फिरती और काम करती नजर आएँगी और साथ ही इसके फौजी बाजा भी बजता हुआ सुनाई देगा अर्थात् इन तस्वीरों में जितने बाजे वाले हैं वे सब भी अपना-अपना काम करते हुए मालूम पड़ेंगे, परन्तु इस फौजी तमाशे का आनन्द रात को मालूम पड़ेगा, दिन को नहीं । इन्हीं तस्वीरों के कारण इस कमरे का नाम 'व्यूह-मण्डल' रक्खा गया है, वह देखिए ऊपर की तरफ बड़े हरफों में लिखा हुआ है।
सुरेन्द्रसिंह–यह बहुत अच्छी कारीगरी है। इस तमाशे को हम जरूर देखेंगे बल्कि और भी कई आदमियों को दिखाएंगे ।
इन्द्रदेव-बहुत अच्छा, रात हो जाने पर मैं इसका बन्दोबस्त करूँगा, तब तक आप और चीजों को देखें।
ये लोग जिस दरवाजे से इस कमरे में आये थे, उसके अतिरिक्त एक दरवाजा और भी था जिस राह से सभी को लिए दोनों कुमार दूसरे कमरे में पहुँचे । इस कमरे की दीवार बिल्कुल साफ थी अर्थात् उस पर किसी तरह की तस्वीर बनी हुई न थी। कमरे के बीचोंबीच दो चबूतरे संगमरमर के बने हुए थे जिसमें एक तो खाली था और दूसरे चबूतरे के ऊपर सफेद पत्थर की एक खूबसूरत पुतली बैठी हुई थी। इस जगह पर ठहर कर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपने दादा और पिता की तरफ देखा और कहा,"नकाबपोशों की जुबानी हम लोगों का तिलिस्मी हाल जो कुछ आपने सुना है, वह तो याद ही होगा, अतः हम लोग पहली दफा तिलिस्म से बाहर निकलकर जिस सुहावनी घाटी में पहुंचे थे वह यही स्थान है ।' इसी चबूतरे के अन्दर से हम लोग बाहर हुए थे ।उस 'रिक्तगंथ' की बदौलत हम दोनों भाई यहाँ तक तो पहुँच गए मगर उसके बाद इस चबूतरे ले तिलिस्म को खोल न सके, हाँ इतना जरूर है कि उस'रिक्तगंथ' की बदौलत इस चबूतरे में से (जिस पर एक पुतली बैठी हुई थी उसकी तरफ इशारा करके) एक दूसरी किताब हाथ लगी जिसकी बदौलत हम लोगों ने उस चबूतरे वाले तिलिस्म को खोला और उसी राह से आपकी सेवा में जा पहुंचे।
"आप सुन चुके हैं कि जब हम दोनों भाई राजा गोपालसिंह को मायारानी की कैद से छुड़ा कर जमानिया के खास बाग वाले देवमन्दिर में गये थे तब वहाँ पहले आनन्द-सिंह तिलिस्म के फन्दे में फंस गये थे, उन्हें छुड़ाने के लिए जब मैं भी उसी गड़हे या कुएँ में कूद पड़ा तो चलता-चलता एक दूसरे बाग में पहुँचा जिसके बीचोंबीच में एक मन्दिर था। उस मन्दिर वाले तिलिस्म को जब मैंने तोड़ा तो वहाँ एक पुतली के अन्दर कोई चमकती हुई चीज मुझे मिली।"2
वीरेन्द्रसिंह–हाँ, हमें याद है, उस मूरत को तुमने उखाड़ कर किसी कोठरी के अन्दर फेंक दिया था और वह फूट कर चूने की कली की तरह हो गई थी। उसी पेट में से…
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ।
सुरेन्द्रसिंह-तो वह चमकती हुई चीज क्या थी और वह कहाँ है ? इन्द्रजीतसिंह-वह हीरे की बनी हुई एक चाबी थी जो अभी तक मेरे पास मौजूद है, (जेब में से निकाल कर और महाराज को दिखा कर) देखिये, यही ताली इस पुतली के पेट में लगती है।
सभी ने उस चाबी को गौर से देखा और इन्द्रजीतसिंह ने सभी के देखते-देखते उस चबूतरे पर बैठी हुई पुतली की नाभि में वह ताली लगाई। उसका पेट छोटी आलमारी के पल्ले की तरह खुल गया।
इन्द्रजीतसिंह -बस इसी में से वह किताब मेरे हाथ लगी जिसकी बदौलत वह चबूतरे वाला तिलिस्म खोला।
सुरेन्द्रसिंह-अब वह किताब कहाँ है ?
इन्द्रजीतसिंह-आनन्दसिंह के पास मौजूद है ।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह की तरफ देखा और उन्होंने एक छोटी-सी किताब, जिसके अक्षर बहुत बारीक थे, महाराज के हाथ में दे दी।यह किताब भोजपत्र की थी जिसे महाराज ने बड़े गौर से देखा और दो-तीन जगहों से कुछ पढ़ कर आनन्दसिंह के हाथ में देते हुए कहा, "इसे निश्चिन्ती में एक दफा पढ़ेंगे।"
इन्द्रजीतसिंह—यह पुतलीवाला चबूतरा उस तिलिस्म में घुसने का दरवाजा है ।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस पुतली के पेट में (जो खुल गया था)
1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, बीसवाँ भाग, नौवां बयान
2,देखिए " "दसवाँ भाग, पहला बयान । डाल के कोई पेंच घुमाया जिससे चबूतरे के दाहिनी तरफ वाली दीवार किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलं कर जमीन के साथ सट गई और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं। इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर हाथ में लिया और उसका कब्जा दबा कर रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे तथा सभी को अपने पीछे आने के लिए कहा। सभी के पीछे आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे । लगभग पन्द्रह-बीस चक्करदार सीढ़ियों के नीचे उतरने के बाद ये लोग एक बहुत बड़े कमरे में पहुंचे जिसमें सोने-चांदी के सैकड़ों बड़े-बड़े हण्डे, अशफियों और जवाहिरात से भरे हुए पड़े थे जिन्हें सभी ने बड़े गौर और ताज्जुब के साथ देखा और महाराज ने कहा, "इस खजाने का अन्दाज करना भी मुश्किल है।"
इन्द्रजीतसिंह-जो कुछ खजाना इस तिलिस्म के अन्दर मैंने देखा और पाया है उसका यह पासंगा भी नहीं है। उसे बहुत जल्द ऐयार लोग आपके पास पहुँचावेंगे । उन्हीं के साथ-साथ कई चीजें दिल्लगी की भी हैं जिसमें एक चीज वह भी है जिसकी बदौलत हम लोग एक दफा हँसते-हँसते दीवार अन्दर कूद पड़े थे और मायारानी के हाथ में गिरफ्तार हो गए थे।
जीतसिंह-(ताज्जुब से) हाँ ! अगर वह चीज शीघ्र बाहर निकाल ली जाय तो (सुरेन्द्रसिंह से) कुमारों की शादी में सर्वसाधारण को भी उसका तमाशा दिखाया जा सकता है।
सुरेन्द्रसिंह-बहुत अच्छी बात है, ऐसा ही होगा।
इन्द्रजीतसिंह-इस तिलिस्म में घुसने के पहले ही मैंने सभी का साथ छोड़ दिया अर्थात् नकाबपोशों को (कैदियों को) बाहर ही छोड़कर केवल हम दोनों भाई ही इसके अन्दर घुसे और काम करते हुए धीरे-धीरे आपकी सेवा में जा पहुंचे।
सुरेन्द्रसिंह-तो शायद उसी तरह हम लोग भी यह सब तमाशा देखते हुए उसी चबूतरे की राह बाहर निकलेंगे ?
जीतसिंह–मगर क्या उन चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा न देखिएगा?
सुरेन्द्रसिंह–हाँ, ठीक है, उस तमाशे को तो जरूर देखेंगे।
इन्द्रजीत सिंह–तो अब यहाँ से लौट चलना चाहिए, क्योंकि इस कमरे के आगे बढ़कर फिर आज ही लौट आना कठिन है, इसके अतिरिक्त अब दिन भी थोड़ा ही रह गया है, संध्या-वन्दन और भोजन इत्यादि के लिए भी कुछ समय चाहिए और फिर उन तस्वीरों का तमाशा भी कम-से-कम चार-पांच घण्टे में पूरा होगा।
सुरेन्द्रसिंह-क्या हर्ज है, लौट चलो।
महाराज की आज्ञानुसार सब कोई वहाँ से लौटे और घूमते हुए बँगले के बाहर निकल आये, देखा तो वास्तव में दिन बहुत कम रह गया था।
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रात आधे घण्टे से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब सब कोई अपने जरूरी कामों से निश्चिन्त हो बंगले के अन्दर घुसे और घूमते-फिरते उसी चलती-फिरती तस्वीरों वाले कमरे में पहुंचे। इस समय बँगले के अन्दर हर एक कमरे में रोशनी बखूबी हो रही थी जिसके विषय में भूतनाथ और देवीसिंह ने ताज्जुब के साथ खयाल किया कि यह काम बेशक उन्हीं लोगों का होगा जिन्हें यहाँ पहुँचने के साथ ही हम लोगों ने पहरा देते देखा था या जो हम लोगों को देखते ही बँगले के अन्दर घुसकर गायब हो गए थे। ताज्जुब है कि महाराज को तथा और लोगों को भी उनके विषय में कुछ खयाल नहीं है और न कोई पूछता ही है कि वे कौन थे और कहां गए, मगर हमारा दिल उनका हाल जाने बिना बेचैन हो रहा है।
चलती-फिरती तस्वीरों वाले कमरे में फर्श बिछा हुआ था और गद्दी लगी हुई थी जिस पर सब कोई कायदे से अपने-अपने ठिकाने पर बैठ गए और इसके बाद इन्द्रजीत-सिंह की आज्ञानुसार रोशनी गुल कर दी गई। कमरे में बिल्कुल अन्धकार छा गया, यह नहीं मालूम होता था कि कौन क्या कर रहा है, खास करके इन्द्रजीतसिंह की तरफ लोगों का ध्यान था जो इस तमाशे को दिखाने वाले थे, मगर कोई कह नहीं सकता था कि वह क्या कर रहे हैं।
थोड़ी ही देर बाद चारों तरफ की दीवारें चमकने लगीं और उन पर की कुल तस्वीरें बहुत साफ और बनिस्वत पहले के अच्छी तरह पर दिखाई देने लगी। पहले तो वे तस्वीरें केवल चित्रकारी ही मालूम पड़ती थीं परन्तु अब सचमुच की बातें दिखाई देने लगीं। मालूम होता था कि जैसे हम बहुत दूर से सच्चे किले, पहाड़, जंगल, मैदान,आदमी, जानवर और फौज इत्यादि को देख रहे हैं। सब कोई बड़े ताज्जुब के साथ इस कैफियत को देख रहे थे कि यकायक बाजे की आवाज कान में आई। उस समय सभी का ध्यान जमानिया के किले की तस्वीर पर जा पड़ा, जिधर से बाजे की आवाज आ रही थी । देखा कि-
एक बहुत बड़े मैदान में बेहिसाब फौज खड़ी है जिसके आमने-सामने दो हिस्से हैं मानो दो फौजें लड़ने के लिए तैयार खड़ी हैं। पैदल और सवार दोनों तरह की फौजें हैं तथा तोप इत्यादि और भी जो कुछ सामान फौज में होना चाहिए, सब मौजूद है । इन दोनों फौजों में एक की पोशाक सुर्ख और दूसरे की आसमानी थी। वाजे की आवज केवल सुर्ख वर्दी वाली फौज में से आ रही थी बल्कि बाजे वाले अपना काम करते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। यकायक सुर्ख वर्दी वाली फौज हिलती हुई दिखाई पड़ी। गौर करने पर मालूम हुआ कि सिपाहियों का मुंह घूम गया है और वे दाहिनी तरफ वाली एक पहाड़ी की तरफ तेजी के साथ बाजे की गत पर पैर रखते हुए जा रहे हैं । जैसे-जैसे फौज दूर होती जाती, वैसे ही वैसे बाजे की आवाज भी दूर होती जाती थी। देखते-ही-देखते वह फौज मानो कोसों दूर निकल गई और एक पहाड़ी के पीछे की तरफ जाकर आँखों की ओट हो गई। अब यह मैदान ज्यादा खुलासा दिखाई देने लगा। जितनी जगह दोनों फौजों से भरी थी, वह एक फौज के हिस्से में रह गई । अब दूसरी अर्थात् आसमानी वर्दी वाली फौज में से बाजे की आवाज आने लगी और सवार तथा पैदल भी चलते हुए दिखाई देने लगे। एक सवार हाथ में झंडा लिए तेजी के साथ घोड़ा दौड़ा कर मैदान में आ खड़ा हुआ और झंडे के इशारे से फौज को कवायद कराने लगा । यह
कवायद घण्टे भर तक होती रही और इस बीच में आला दर्जे की होशियारी, चालाकी,मुस्तैदी, सफाई और बहादुरी दिखाई दी जिससे सब कोई बहुत ही खुश हुए और महाराज बोले, "बेशक फौज को ऐसा ही तैयार करना चाहिए।"कवायद खतम करने के बाद बाजा बन्द हुआ और वह फौज एक तरफ को रवाना हुई, मगर थोड़ी ही दूर गई होगी कि उस लाल वर्दी वाली फौज ने यकायक पहाड़ी के पीछे से निकल कर इस फौज पर धावा मारा। इस कैफियत को देखते ही आसमानी वर्दी वाली फौज के अफसर होशियार हो गए, झंडे का इशारा पाते ही बाजा पुनःबजने लगा, और फौजी सिपाही लड़ने के लिए तैयार हो गये। इस बीच में वह फौज भी आ पहुंची और दोनों में घमासान लड़ाई होने लगी।
इस कैफियत को देखकर महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, जीतसिंह,तेजसिंह वगैरह तथा ऐयार लोग हैरान हो गए और हद से ज्यादा ताज्जुब करने लगे। लड़ाई के फन की ऐसी कोई बात नहीं बच गई थी जो इसमें न दिखाई पड़ी हो। कई तरह की घुसबन्दी और किलेबन्दी के साथ ही साथ घुड़सवारों की कारीगरी ने सभी को सकते में डाल दिया और सभी के मुंह से बार-बार 'वाह-वाह' की आवाज निकलती रही। यह तमाशा कई घण्टे में खत्म हुआ और इसके बाद एकदम से अन्धकार हो गया,उस समय इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी की और देवीसिंह ने इशारा पाकर कमरे में रोणनी कर दी जो पहले बुझा दी गई थी।
इस समय रात थोड़ी-सी बच गई थी जो सभी ने सोकर बिता दी, मगर स्वप्न में भी इसी तरह के खेल-तमाशे देखते रहे । जब सब की आँखें खुली तो दिन घण्टे भर से ज्यादा चढ़ चुका था। घबड़ा कर सब कोई उठ खड़े हुए और कमरे के बाहर निकल कर जरूरी कामों से छुट्टी पाने का बन्दोबस्त करने लगे। इस समय जिन चीजों की सभी को जरूरत पड़ी वे सब चीजें वहाँ मौजूद पाई गईं, मगर उन दोनों स्त्रियों पर किसी की निगाह न पड़ी जिन्हें यहाँ आने के साथ ही सभी ने देखा था।
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जरूरी कामों से छुट्टी पाकर ऐयारों ने रसोई बनाई, क्योंकि इस बंगले में खाने-पीने की सभी चीजें मौजूद थीं और सभी ने खुशी-खुशी भोजन किया। इसके बाद सब कोई उसी कमरे में आ बैठे जिसमें रात को चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा
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जरूरी कामों से छुट्टी पाकर ऐयारों ने रसोई बनाई, क्योंकि इस बंगले में खाने-पीने की सभी चीजें मौजूद थीं और सभी ने खुशी-खुशी भोजन किया। इसके बाद सब कोई उसी कमरे में आ बैठे जिसमें रात को चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा
था। इस समय भी सभी की निगाहें ताज्जुब के साथ उन्हीं तस्वीरों पर पड़ रही थीं।
सुरेन्द्रसिंह — मैं बहुत गौर कर चुका मगर अभी तक समझ में न आया कि इन तस्वीरों में किस तरह की कारीगरी खर्च की गई है जो ऐसा तमाशा दिखाती हैं । अगर मैं अपनी आँखों से इस तमाशे को देखे हुए न होता और कोई गैर आदमी मेरे सामने ऐसे तमाशे का जिक्र करता तो मैं उसे पागल ही समझता, मगर अब स्वयं देख लेने पर भी विश्वास नहीं होता कि दीवार पर लिखी तस्वीरें इस तरह काम करेंगी।
जीतसिंह — बेशक ऐसी ही बात है । इतना देखकर भी किसी के सामने यह कहने का हौसला न होगा कि मैंने ऐसा तमाशा देखा था और सुनने वाला भी कभी विश्वास न करेगा।
ज्योतिषीजी — आखिर यह एक तिलिस्म ही है, इसमें सभी बातें आश्चर्य की ही दिखायी देती हैं।
जीतसिंह –– चाहे यह तिलिस्म हो मगर इसके बनाने वाले तो आदमी ही थे। जो बात मनुष्य के किये नहीं हो सकती वह तिलिस्म में भी नहीं दिखाई दे सकती।
गोपालसिंह — आपका कहना बहुत ठीक है, तिलिस्म की बातें चाहे कैसा ही ताज्जुब पैदा करने वाली क्यों न हों मगर गौर करने से उनकी कारीगरी का पता लग ही जायगा । आपने बहुत ठीक कहा, आखिर तिलिस्म के बनानेवाले भी तो मनुष्य ही थे !
वीरेन्द्रसिंह — जब तक समझ में न आवे तब तक उसे चाहे कोई जादू कहे या करामात कहे मगर हम लोग सिवाय कारीगरी के कुछ भी नहीं कह सकते और पता लगाने तथा भेद मालूम हो जाने पर यह बात सिद्ध हो ही जाती है। इन चित्रों की कारीगरी पर भी अगर गौर किया जायगा तो कुछ न कुछ पता लग ही जायगा। ताज्जुब नहीं कि इन्द्रजीतसिंह को इसका भेद मालूम हो ।
सुरेन्द्रसिंह — बेशक इन्द्रजीत को इसका भेद मालूम होगा ही। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) तुमने किस तरकीब से इन तस्वीरों को चलाया था ?
इन्द्रजीतसिंह — (मुस्कुराते हुए) मैं आपसे अर्ज करूँगा और यह भी बताऊंगा कि इसमें भेद क्या है । मालूम हो जाने पर आप इसे एक साधारण बात ही समझेंगे। पहली दफा जब मैंने इस तमाशे को देखा था, तो मुझे भी बड़ा ही ताज्जुब पैदा हुआ था, मगर तिलिस्मी किताब की मदद से जब मैं इस दीवार के अन्दर पहुँचा तो सब भेद खुल गया।
सुरेन्द्रसिंह — (खुश होकर) तब तो हम लोग बेकार ही परेशान हो रहे हैं और इतना सोच-विचार कर रहे हैं । तुम अब तक चुप क्यों थे ?
गोपालसिंह — ऐयारों की तबीयत देख रहे थे।
सुरेन्द्रसिंह — खैर बताओ तो सही कि इसमें क्या कारीगरी है ?
इतना सुनते ही इन्द्रजीतसिंह उठ कर उस दीवार के पास चले गये और सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर बोले, "आप जरा तकलीफ कीजिए तो मैं इस भेद को भी समझा दूं !"
महाराज सुरेन्द्रसिंह उठकर कुमार के पास चले गये और उनके पीछे-पीछे और लोग भी वहाँ जाकर खड़े हो गये। इन्द्रजीतसिंह ने दीवार पर हाथ फेरकर सुरेन्द्रसिंह
से कहा, "देखिये, असल में इस दीवार पर किसी तरह की चित्रकारी या तस्वीर नहीं है, दीवार साफ है और वास्तव में शीशे की है, तस्वीरें जो दिखाई देती हैं वे इसके अन्दर और दीवार से अलग हैं।"
कुमार की बात सुनकर सभी ने ताज्जुब के साथ उस दीदार पर हाथ फेरा और जीतसिंह ने खुश होकर कहा-"ठीक है, अब हम इस कारीगरी को समझ गए ! ये तस्वीरें अलग-अलग किसी धातु के टुकड़ों पर बनी हुई हैं और ताज्जुब नहीं कि तार या कमानी पर जड़ी हों, किसी तरह की शक्ति पाकर उस तार या कमानी में हरकत होती है और उस समय ये तस्वीरें चलती हुई दिखाई देती हैं।"
इन्द्रजीतसिंह — बेशक यही बात है, देखिये, अब मैं इन्हें फिर चलाकर आपको दिखाता हूँ और इसके बाद दीवार के अन्दर ले चलकर सब भ्रम दूर कर दूंगा।
इस दीवार में जिस जगह जमानिया के किले की तस्वीर बनी थी, उसी जगह किले के तुर्ज के ठिकाने पर कई सूराख भी दिखाये गये थे जिनमें से एक छेद (सूराख) वास्तव में सच्चा था पर वह केवल इतना ही लम्बा-चौड़ा था कि एक मामूली खंजर का कुछ हिस्सा उसके अन्दर जा सकता था इन्द्रजीतसिंह ने कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल कर उसके अन्दर डाल दिया और महाराज सुरेन्द्रसिंह तथा जीतसिंह की तरफ देखकर कहा "इस दीवार के अन्दर जो पुर्जे बने हैं, वे बिजली का असर पहुँचने ही से चलने- फिरने या हिलने लगते हैं। इस तिलिस्मी खंजर में आप जानते ही हैं कि पूरे दर्जे की बिजली भरी हुई है, अस्तु, उन पुों के साथ इनका संयोग होने ही से काम हो जाता है।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह चुपचाप खड़े हो गये और सभी ने बड़े गौर से उन तस्वीरों को देखना शुरू किया बल्कि महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र सिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और राजा गोपालसिंह ने तो कई तस्वीरों के ऊपर हाथ भी रख दिया। इतने ही में दीवार चमकने लगी और इसके बाद तस्वीरों ने वही रंगत पैदा की जो हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं। महाराज और राजा गोपालसिंह वगैरह ने जो अपना हाथ तस्वीरों पर रख दिया था वह ज्यों का त्यों बना रहा और तस्वीरें उनके हाथों के नीचे से निकलकर इधर-उधर आने-जाने लगी जिसका असर उनके हाथों पर कुछ भी नहीं होता था। इस सबब से सभी को निश्चय हो गया कि उन तस्वीरों का इस दीवार के साथ कोई सम्बन्ध नहीं। इस बीच में कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना तिलिस्मी खंजर दीवार के अन्दर से खींच लिया। उसी समय दीवार का चमकना बन्द हो गया और तस्वीरें जहाँ की तहाँ खड़ी हो गई अर्थात् जो जितनी चल चुकी थीं, उतनी ही चलकर रुक गई । दीवार पर गौर करने से मालूम होता था कि तस्वीरें पहले ढंग की नहीं बल्कि दूसरे ही ढंग की बनी हुई हैं ।
जीतसिंह — यह भी बड़े मजे की बात है, लोगों को तस्वीरों के विषय में धोखा देने और ताज्जुब में डालने के लिए इससे बढ़कर कोई खेल नहीं हो सकता।
तेजसिंह — जी हाँ, एक दिन में पचासों तरह की तस्वीरें इस दीवार पर लोगों को दिखा सकते हैं, पता लगना तो दूर रहा गुमान भी नहीं हो सकता कि यह क्या मामला है और ऐसी अनूठी तस्वीरें नित्य क्यों बन जाती हैं। सुरेन्द्रसिंह — बेशक यह खेल मुझे बहुत अच्छा माल्म हुआ। परन्तु अब इन तस्वीरों को ठीक अपने ठिकाने पर पहुँचाकर छोड़ देना चाहिए।
"बहुत अच्छा" कहकर इन्द्रजीतसिंह आगे बढ़ गये और पुनः तिलिस्मी खंजर उसी सूराख में डाल दिया जिससे उसी तरह दीवार चमकने और तस्वीरें चलने लगीं। ताज्जुब के साथ लोग उसका तमाशा देखते रहे । कई घण्टे के बाद जब तस्वीरों की यह लीला समाप्त हुई और एक विचित्र ढंग के खटके की आवाज आई, तब इन्द्रजीतसिंह ने दीवार के अन्दर से तिलिस्मी खंजर निकाल लिया और दीवार का चमकना भी बन्द हो गया।
इस तमाशे से छुट्टी पाकर महाराज सुरेन्द्र सिंह ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कहा, "अब हम लोगों को इस दीवार के अन्दर ले चलो।"
इन्द्रजीतसिंह — जो आज्ञा, पहले बाहर से जांच कर आप अन्दाजा कर लें कि यह दीवार कितनी मोटी है।
सुरेन्द्रसिंह — इसका अन्दाज हमें मिल चुका है, दूसरे कमरे में जाने के लिए इसी दीवार में जो दरवाजा है उसकी मोटाई से पता लग जाता है जिस पर हमने गौर किया है।
इन्द्रजीतसिंह — अच्छा तो अब एक दफे आप पुनः उसी दूसरे कमरे में चलें क्यों कि इस दीवार के अन्दर जाने का रास्ता उधर ही से है।
इन्द्रजीतसिंह की बात सुनकर महाराज सुरेन्द्रसिंह तथा और सब लोग उठ खड़े हुए और कुमार के साथ-साथ पुनः उसी कमरे में गए जिसमें दो चबूतरे बने हुए थे।
इस कमरे में तस्वीर वाले कमरे की तरफ जो दीवार थी, उसमें एक आलमारी का निशान दिखाई दे रहा था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक खूटी गड़ी हुई थी जिसे इन्द्रजीतसिंह ने उमेठना शुरू किया। तीस-पैंतीस दफे उमेठ कर अलग हो गए और दूर खड़े होकर उस निशान की तरफ देखने लगे । थोड़ी देर बाद वह आलमारी हिलती हुई मालूम पड़ी और फिर यकायक उसके दोनों पल्ले दरवाजे की तरह खुल गए। साथ ही उसके अन्दर से दो औरतें निकलती हुई दिखाई पड़ी जिनमें एक तो भूतनाथ की स्त्री थी और दूसरी देवीसिंह की स्त्री चम्पा । दोनों औरतों पर निगाह पड़ते ही भूतनाथ और देवीसिंह चमक उठे और उनके ताज्जुब की कोई हद न रही, साथ ही इसके दोनों ऐयारों को क्रोध भी चढ़ आया और लाल-लाल आँखें करके उन औरतों की तरफ देखने लगे । उन्हीं के साथ-ही-साथ और लोगों ने भी ताज्जुब के साथ उन औरतों को देखा।
इस समय उन दोनों औरतों का चेहरा नकाब से खाली था, मगर भूतनाथ और देवीसिंह के चेहरे पर निगाह पड़ते ही उन दोनों ने आँचल से अपना चेहरा छिपा लिया और पलट कर पुनः उसी आलमारी के अन्दर जा लोगों की निगाह से गायब हो गईं। उनकी इस करतूत ने भूतनाथ और देवीसिंह के क्रोध को और भी बढ़ा दिया।
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अब हम पीछे की तरफ लौटते हैं और पुनः उस दिन का हाल लिखते हैं जिस दिन महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह वगैरह तिलिस्मी तमाशा देखने के लिए रवाना हुए हैं । हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं कि उस समय महाराज और कुमार लोगों के साथ भैरोंसिंह और तारासिंह न थे, अर्थात् वे दोनों घर पर ही रह गए थे, अतः इस समय उन्हीं दोनों का हाल लिखना बहुत जरूरी हो गया है ।
महाराज सुरेन्द्र सिंह, वीरेन्द्रसिंह, कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह वगैरह के पचले जाने के बाद भैरोंसिंह अपनी मां से मिलने के लिए तारासिंह को साथ लिए हुए महल में गये । उस समय चपला अपनी प्यारी सखी चम्पा के कमरे में बैठी हुई धीरे-धीरे कुछ बातें कर रही थी जो भैरोंसिंह और तारासिंह को आते देख चुप हो गई और इन दोनों की तरफ देखकर वोली, "क्या महाराज तिलिस्मी तमाशा देखने के लिए गए ?"
JIM – Assistente
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