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  • तितली

    तितली

    Aproximadamente 116.262 palavras.

    तितली
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    प्रथम खंड

    1.

    क्यों बेटी! मधुवा आज कितने पैसे ले आया?

    नौ आने, बापू!

    कुल नौ आने! और कुछ नहीं?

    पांच सेर आटा भी दे गया है। कहता था, एक रुपए का इतना ही मिला।

    वाह रे समय—कहकर बुड्ढा एक बार चित होकर सांस लेने लगा।

    कुतूहल से लड़की ने पूछा कैसा समय बापू?

    बुड्ढा चुप रहा।

    यौवन के व्यंजन दिखाई देने से क्या हुआ, अब भी उसका मन दूध का धोया है। उसे लड़की कहना ही अधिक संगत होगा।

    उसने फिर पूछा—कैसा समय बापू?

    चिथड़ों से लिपटा हुआ लंबा-चौड़ा, अस्थि-पंजर झनझना उठा खांसकर उसने कहा —जिस भयानक अकाल का स्मरण करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिस पिशाच की अग्नि-क्रीड़ा में खेलती हुई तुझको मैंने पाया था, वही संवत 55 का अकाल आज के सुकाल से भी सदय था—कोमल था। तब भी आठ सेर का अन्न बिकता था। आज पांच सेर की बिक्री में भी कहीं जूं नहीं रेंगती, जैसे—सब धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं। कोई अकाल कहकर चिल्लाता नहीं। ओह! मैं भल रहा हं। कितने ही मनष्य तभी से एक बार भोजन करने के अभ्यासी हो गए हैं। जाने दे, होगा कुछ बंजो! जो सामने आवे, उसे झेलना चाहिए।

    बंजो, मटकी में डेढ़ पाव दूध, चार कंडों पर गरम कर रही थी। उफनाते हुए दूध को उतारकर उसने कुतूहल से पूछा—बापू! उस अकाल में तुमने मुझे पाया था! लो, दूध पीकर मुझे वह पूरी कथा सुनाओ।

    बुड्ढे ने करवट बदलकर, दूध लेते हुए, बंजो की आंखों में खेलते हुए आश्चर्य को देखा। वह कुछ सोचता हुआ दूध पीने लगा।

    थोड़ा-सा पीकर उसने पूछा-अरे तूने दूध अपने लिए रख लिया है?

    बंजो चुप रही। बुड्ढा खड़खड़ा उठा—तू बड़ी पाजी है, रोटी किससे खाएगी रे?

    सिर झुकाए हुए, बंजो ने कहा—नमक और तेल से मुझे रोटी अच्छी लगती है बापू!

    बचा हुआ दूध पीकर बुड्ढा फिर कहने लगा यही समय है, देखती है न! गाएं डेढ पाव दूध देती हैं! मुझे तो आश्चर्य होता है कि उन सूखी ठठरियों में से इतना दूध भी कैसे निकलता है!

    मधुवा दबे पांव आकर उसी झोपड़ी के एक कोने में खड़ा हो गया। बुड्ढे ने उसकी ओर देखकर पूछा–मधुवा, आज तू क्या-क्या ले गया था?

    डेढ़ सेर घुमची, एक बोझा महुआ का पत्ता और एक खांचा कंडा बाबाजी!–मधुवा ने हाथ जोड़कर कहा।

    इन सबका दाम एक रुपया नौ आना ही मिला?

    चार पैसे बंधू को मजूरी में दिए थे।

    अभी दो सेर घुमची और होगी बापू! बहुत-सी फलियां वनबेरी के झुरमुट में हैं, झड़ जाने पर उन्हें बटोर लूंगी। बंजो ने कहा। बुड्ढा मुस्कुराया। फिर उसने कहा मधुवा! तू गायों को अच्छी तरह चराता नहीं बेटा! देख तो, धवली कितनी दुबली हो गई है!

    कहां चरावें, कुछ ऊसर-परती कहीं चरने के लिए बची भी है?—मधुवा ने कहा।

    बंजो अपनी भूरी लटों को हटाते हुए बोली—मधुवा गंगा में घंटों नहाता है बापू! गाएं अपने मन से चरा करती हैं! यह जब बुलाता है,तभी सब चली आती हैं।

    बंजो की बात न सुनते हुए बाबाजी ने कहा-तू ठीक कहता है मधुवा! पशुओं को खाते-खाते मनुष्य, पशुओं के भोजन की जगह भी खाने लगे। ओह! कितना इनका पेट बढ़ गया है! वाह रे समय!!

    मधुवा बीच ही में बोल उठा—बंजो, बनिया ने कहा है कि सरफोंका की पत्ती दे जाना,अब मैं जाता हूं।

    कहकर वह झोपड़ी के बाहर चला गया।

    संध्या गांव की सीमा में धीरे-धीरे आने लगी। अंधकार के साथ ही ठंड बढ़ चली। गंगा की कछार की झाड़ियों में सन्नाटा भरने लगा। नालों के करारों में चरवाहों के गति गूंज रहे थे।

    बंजो दीप जलाने लगी। उस दरिद्र कुटीर के निर्मम अंधकार में दीपक की ज्योति तारा-सी चमकने लगी। बुड्ढे ने पुकारा-बंजो

    आयी—कहती हुई वह बुड्ढे की खाट के पास आ बैठी और उसका सिर सहलाने लगी। कुछ ठहरकर बोली—बापू! उस अकाल का हाल न सुनाओगे?

    तू सुनेगी बंजो क्या करेगी सुनकर बेटी? तू मेरी बेटी है और मैं तेरा बूढ़ा बाप! तेरे लिए इतना जान लेना बहुत है।

    नहीं बापू! सुना दो मुझे वह अकाल की कहानी—बंजो ने मचलते हुए कहा।

    धांय-धांय-धांय…!!!

    गंगा-तट बंदूक के धड़ाके से मुखरित हो गया। बंजो कुतूहल से झोपड़ी के बाहर चली आई।

    वहां एक घिरा हुआ मैदान था। कई बीघा की समतल भूमि—जिसके चारों ओर, दस लढे की चौड़ी, झाड़ियों की दीवार थी जिसमें कितने ही सिरिस, महुआ, नीम और जामुन के वृक्ष थे—जिन पर घुमची, सतावर और करंज, इत्यादि की लतरें झूल रही थीं। नीचे की भूमि में मटेस के चौड़े-चौड़े पत्तों की हरियाली थी। बीच-बीच में वनबेर ने भी अपनी कंटीली डालों को इन्हीं सबों से उलझा लिया था।

    वह एक सघन झुरमुट था—जिसे बाहर से देखकर यह अनुमान करना कठिन था कि इसके भीतर इतना लंबा-चौड़ा मैदान हो सकता है।

    देहात के मुक्त आकाश में अंधकार धीरे-धीरे फैल रहा था। अभी सूर्य की अस्तकालीन लालिमा आकाश के उच्च प्रदेश में स्थित पतले बादलों में गुलाबी आभा दे रही थी।

    बंजो, बंदूक का शब्द सुनकर, बाहर तो आई; परंतु वह एकटक उसी गुलाबी आकाश को देखने लगी। काली रेखाओं-सी भयभीत कराकुल पक्षियों की पंक्तियां 'करररर-करी' करती हुई संध्या की उस शांत चित्रपटी के अनुराग पर कालिमा फेरने लगी थीं।

    हाय राम! इन कांटों में-कहां आ फंसा!

    बंजो कान लगाकर सुनने लगी।

    फिर किसी ने कहा-नीचे करार की ओर उतरने में तो गिर जाने का डर है, इधर ये कांटेदार झाड़ियां! अब किधर जाऊं?

    बंजो समझ गई कि शिकार खेलने वालों में से कोई इधर आ गया है। उसके हृदय में विरक्ति हुई— उंह, शिकारी पर दया दिखाने की क्या आवश्यकता? भटकने दो।

    वह घूमकर उसी मैदान में बैठी हुई एक श्यामा गौ को देखने लगी। बड़ा मधुर शब्द सुन पड़ा-चौबेजी! आप कहां हैं?

    अब बंजो को बाध्य होकर उधर जाना पड़ा। पहले कांटों में फंसने वाले व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा—खड़ी रहिए; इधर नहीं ऊहूं- ऊं! उसी नीम के नीचे ठहरिए, मैं आता हूं! इधर बड़ा ऊंचा-नीचा है।

    चौबेजी, यहां तो मिट्टी काटकर बड़ी अच्छी सीढ़ियां बनी हैं;मैं तो उन्हीं से ऊपर आई हूं।—रमणी के कोमल कंठ से यह सुन पड़ा।

    बंजो को उसकी मिठास ने अपनी ओर आकृष्ट किया। जंगली हिरन के समान कान उठाकर वह सुनने लगी।

    झाड़ियों के रौंदे जाने का शब्द हुआ फिर वही पहिला व्यक्ति बोल उठा लीजिए, मैं तो किसी तरह आ पहुंचा, अब गिरा तब गिरा, राम-राम! कैसी सांसत! सरकार से मैं कह रहा था कि मुझे न ले चलिए। मैं यहीं चूड़ा-मटर की खिचड़ी बनाऊंगा। पर आपने भी जब कहा, तब तो मुझे आना ही पड़ा। भला आप क्यों चली आईं?

    इन्द्रदेव ने कहा कि सुर्खाब इधर बहुत हैं, मैं उनके मुलायम पैरों के लिए आई। सच चौबेजी, लालच में मैं चली आई। किंतु छरों से उनका मरना देखने में मुझे सुख तो न मिला। आह! कितना बेधड़क वे गंगा के किनारे टहलते थे! उन पर विनचेस्टर-रिपीटर के छरों की चोट! बिल्कुल ठीक नहीं। मैं आज ही इन्द्रदेव को शिकार खेलने से रोकूगी—आज ही।

    अब किधर चला जाए?—उत्तर में किसी ने कहा।

    चौबेजी ने डग बढ़ाकर कहा—मेरे पीछे-पीछे चली आइए।

    किंतु मिट्टी बह जाने से मोटी जड़ नीम की उभर आई थी, उसने ऐसी करारी ठोकर लगाई कि चौबेजी मुंह के बल गिरे।

    रमणी चिल्ला उठी। उस धमाके और चिल्लाहट ने बंजो को विचलित कर दिया।वह कंटीली झाड़ी को खींचकर अंधेरे में भी ठीक-ठीक उसी सीढ़ी के पास जाकर खड़ी हो गई, जिसके पास नीम का वृक्ष था।

    उसने देखा कि चौबेजी बुरी तरह गिरे हैं। उनके घुटने में चोट आ गई है। वह स्वयं

    नहीं उठ सकते।

    सुकुमारी सुंदरी के बूते के बाहर की यह बात थी। बंजो ने हाथ लगा दिया। चौबेजी किसी तरह कांखते हुए उठे।

    अंधकार के साथ-साथ सर्दी बढ़ने लगी थी। बंजो की सहायता से सुंदरी, चौबेजी को लिवा ले चली; पर कहां? यह तो बंजो ही जानती थी।

    झोपड़ी में बुड्ढा पुकार रहा था-बंजो! बंजो!! बड़ी पगली है। कहां घूम रही है? बंजो, चली आ! झुरमुट में घुसते हुए चौबेजी तो कराहते थे, पर सुंदरी उस वन-विहंगिनी की ओर आंखें गड़ाकर देख रही थी और अभ्यास के अनुसार धन्यवाद भी दे रही थी।

    दूर से किसी की पुकार सुन पड़ी शैला! शैला!! . ये तीनों, झाड़ियों की दीवार पार करके, मैदान में आ गए थे।

    बंजो के सहारे चौबेजी को छोड़कर शैला फिरहरी की तरह घूम पड़ी। वह नीम के नीचे खड़ी होकर कहने लगी—इसी सीढ़ी से इन्द्रदेव—बहुत ठीक सीढ़ी है। हां, संभालकर चले आओ। चौबेजी का तो घुटना ही टूट गया है! हां, ठीक है, चले आओ! कहीं-कहीं जड़ें बुरी तरह से निकल आई हैं उन्हें बचाकर आना।

    नीचे से इन्द्रदेव ने कहा—सच कहना शैला क्या चौबे का घुटना टूट गया? ओहो, तो कैसे वह इतनी दूर चलेगा! नहीं-नहीं, तुम हंसी करती हो।

    ऊपर आकर देख लो, नहीं भी टूट सकता है! नहीं भी टूट सकता है? वाह! यह एक ही रही। अच्छा, लो, मैं आ ही पहुंचा।

    एक लंबा-सा युवक, कंधे पर बंदूक रखे, ऊपर चढ़ रहा था। शैला, नीम के नीचे खड़ी, गंगा के करारे की ओर झांक रही थी यह इन्द्रदेव को सावधान करती थी ठोकरों ठीक मार्ग से। ___ तब तक उस युवक ने हाथ बढ़ाया—दो हाथ मिले!

    नीम के नीचे खड़े होकर, इन्द्रदेव ने शैला के कोमल हाथों को दबाकर कहा—करारे की मिट्टी काटकर देहातियों ने कामचलाऊ सीढ़ियां अच्छी बना ली हैं। शैला कितना सुंदर दश्य है! नीचे धीरे-धीरे गंगा बह रही है. अंधकार से मिली हई उस पार के वक्षों की श्रेणी शितिज की कोर में गाढ़ी कालिमा की बेल बना रही है, और ऊपर…

    पहले चलकर चौबेजी को देख लो, फिर दृश्य देखना।—बीच ही में रोककर शैला ने कहा।

    अरे हां, यह तो मैं भूल ही गया था? चलो किधर चलूं? यहां तो तुम ही पथ-प्रदर्शक हो।—कहकर इन्द्रदेव हंस पड़े।

    दोनों, झोपड़ियों के भीतर घुसे। एक अपरिचित बालिका के सहारे चौबेजी को कराहते देखकर इन्द्रदेव ने कहा तो क्या सचमुच में यह मान लूं कि तुम्हारा घुटना टूट गया? मैं इस पर कभी विश्वास नहीं कर सकता। चौबे तुम्हारे घुटने 'टूटने वाली हड्डी' के बने ही नहीं!

    सरकार यही तो मैं भी सोचता हुआ चलने का प्रयत्न कर रहा हूँ। परंत..आह! बड़ी पीड़ा है, मोच आ गई होगी। तो भी इस छोकरी के सहारे थोड़ी दूर चल सकूँगा। चलिए ।

    चौबेजी ने कहा।

    अभी तक बंजो से किसी ने न पूछा था कि तू कौन है,कहां रहती है,या हम लोगों को कहां लिए जा रही है।

    बंजो ने स्वयं ही कहा—पास ही झोपड़ी है। आप लोग वहीं तक चलिए; फिर जैसी इच्छा।

    सब बंजो के साथ मैदान के उस छोर पर जलने वाले दीपक के सम्मुख चले, जहां से "बंजो! बंजो!” कहकर कोई पुकार रहा था। बंजो ने कहा—आती हूं!

    झोपड़ी के दूसरे भाग के पास पहुंचकर बंजो क्षण-भर के लिए रुकी। चौबेजी को छप्पर के नीचे पड़ी हुई एक खाट पर बैठने का संकेत करके वह घूमी ही थी कि बुड्ढे ने कहा—बंजो! कहां है रे? अकाल की कहानी और अपनी कथा न सुनेगी? मुझे नींद आ रही हैं।

    आ गई—कहती हुई बंजो भीतर चली गई। बगल के छप्पर के नीचे इन्द्रदेव और शैला खड़े रहे! चौबेजी खाट पर बैठे थे, किंतु कराहने की व्याकुलता दबाकर। एक लड़की के । आश्रय में आकर इन्द्रदेव भी चकित सोच रहे थे—कहीं यह बुड्ढा हम लोगों के यहां आने से चिढेगा तो नहीं।

    सब चुपचाप थे। बुड्ढे ने कहा—कहां रही तू बंजो! एक आदमी को चोट लगी थी, उसी…। तो-तू क्या कर रही थी? वह चल नहीं सकता था, उसी को सहारा देकर

    मरा नहीं, बच गया। गोली चलने का शिकार खेलने का आनंद नहीं मिला! अच्छा, तो तू उनका उपकार करने गई थी। पगली! यह मैं मानता हूं कि मनुष्य को कभीकभी अनिच्छा से भी कोई काम कर लेना पड़ता है; पर…नहीं…जान-बूझकर किसी उपकार-अपकार के चक्र में न पड़ना ही अच्छा है। बंजो पल-भर की भावुकता मनुष्य के जीवन को कहां-से-कहां खींच ले जाती है, तू अभी नहीं जानती। बैठ, ऐसी ही भावुकता को लेकर मुझे जो कुछ भोगना पड़ा है, वही सुनाने के लिए तो मैं तुझे खोज रहा था।

    बापू… क्या है रे! बैठती क्यों नहीं? वे लोग यहां आ गए हैं…

    ओहो तू बड़ी पुण्यात्मा है…तो फिर लिवा ही आई है, तो उन्हें बिठा दे छप्पर में और दसरी जगह ही कौन है? और बंजो! अतिथि को बिठा देने से ही नहीं काम चल जाता। दो-चार टिक्कर सेंकने की भी…समझी? नहीं-नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं कहते हुए इन्द्रदेव बुड्ढे के सामने आ गए। बुड्ढे ने धुंधले प्रकाश में देखा-पूरा साहबी ठाट! उसने कहा—आप साहब यहां…

    तुम घबराओ मत, हम लोगों को छावनी तक पहुंच जाने पर किसी बात की असुविधा न रहेगी। चौबेजी को चोट आ गई है वह सवारी न मिलने पर रात-भर यहां पड़े रहेंगे। सवेरे देखा जाएगा। छावनी की पगडंडी पा जाने पर हम लोग स्वयं चले जाएंगे। कोई… इन्द्रदेव को रोककर बूड्ढे ने कहा–आप धामपुर की छावनी पर जाना चाहते हैं? जमींदार के मेहमान हैं न? बंजो! मधुवा को बुला दे, नहीं तू ही इन लोगों को बनजरिया के बाहर उत्तर वाली पगडंडी पर पहुंचा दे। मधुवा!! ओ रे मधुवा!–चौबेजी को रहने दीजिए, कोई चिंता नहीं।

    बंजो ने कहा-रहने दो बापू। मैं ही जाती हूं।

    शैला ने चौबेजी से कहा-तो आप यहीं रहिए, मैं जाकर सवारी भेजती हूं।

    रात को झंझट बढ़ाने की आवश्यकता नहीं, बटुए में जलपान का सामान है। कंबल भी है। मैं इसी जगह रात-भर में इसे सेंक-सांक कर ठीक कर लूगा। आप लोग जाइए।—चौबे ने कहा।

    इन्द्रदेव ने पुकारा-शैला! आओ, हम लोग चलें।

    शैला उसी झोपड़ी में आई। वहीं से बाहर निकलने का पथ। बंजो के पीछे दोनों झोपड़ी से निकले।

    लेटे हुए बुड्ढे ने देखा—इतनी गोरी, इतनी सुंदर, लक्ष्मी-सी स्त्री इस जंगल-उजाड़ में कहां! फिर सोचने लगा—चलो, दो तो गए। यदि वे भी यहीं रहते, तो खाट-कंबल और सब सामान कहां से जुटता। अच्छा चौबेजी हैं तो ब्राह्मण उनको कुछ अड़चन न होगी; पर इन साहबी ठाट के लोगों के लिए मेरी झोपड़ी में कहां…ऊंह! गए, चलो, अच्छा हुआ। बंजो आ जाए, तो उसकी चोट तेल लगाकर सेंक दे।

    बुड्ढे को फिर खांसी आने लगी। वह खांसता हुआ इधर के विचारों से छुट्टी पाने की चेष्टा करने लगा।

    उधर चौबेजी गोरसी में सुलगते हुए कंडों पर हाथ गरम करके घुटना सेंक रहे थे। इतने में बंजो मधुवा के साथ लौट आई।

    बापू! जो आए थे,जिन्हें मैं पहुंचाने गई थी, वही तो धामपुर के जमींदार हैं। लालटेन लेकर कई नौकर-चाकर उन्हें खोज रहे थे। पगडंडी पर ही उन लोगों से भेंट हुई। मधुवा के साथ मैं लौट आई।

    एक सांस में बंजो कहने को तो कह गई, पर बुड्ढे की समझ में कुछ न आया। उसने कहा—मधुवा! उस शीशी में जो जड़ी का तेल है, उसे लगाकर ब्राह्मण का घुटना सेंक दे, उसे चोट आ गई है।

    मधुवा तेल लेकर घुटना सेंकने चला।

    बंजो पुआल में कंबल लेकर घुसी। कुछ पुआल और कुछ कंबल से गले तक शरीर ढक कर वह सोने का अभिनय करने लगी। पलकों पर ठंड लगने से बीच-बीच में वह आंख खोलने-मुंदने का खिलवाड़ कर रही थी। जब आंखें बंद रहतीं, तब एक गोरा-गोरा मुंहकरुणा की मिठास से भरा हुआ गोल-मटोल नन्हा-सा मुंह-उसके सामने हंसने लगता। उसमें ममता का आकर्षण था। आख खुलने पर वही पुरानी झोपड़ी की छाजन! अत्यंत विरोधी दृश्य!! दोनों ने उसके कुतूहल-पूर्ण हृदय के साथ छेड़छाड़ की, किंतु विजय हुई आंख बंद करने की। शैला के संगीत के समान सुंदर शब्द उसकी हत्तंत्री में झनझना उठे! शैला के समीप होने की—उसके हृदय में स्थान पाने की—बलवती वासना बंजो के मन में जगी। वह सोते-सोते स्वप्न देखने लगी। स्वप्न देखते-देखते शैला के साथ खेलने लगी। मधुवा से तेल मलवाते हुए चौबेजी ने पूछा-क्यों जी! तुम यहां कहां रहते हो? क्या काम करते हो? क्या तुम इस बुड्ढे के यहां नौकर हो? उसके लड़के तो नहीं मालूम पड़ते?

    परंतु मधुवा चुप था।

    चौबेजी ने घबराकर कहा—बस करो, अब दर्द नहीं रहा। वाह-वाह!

    यह तेल है या जादू! जाओ भाई, तुम भी सो रहो। नहीं-नहीं ठहरो तो, मुझे थोड़ा पानी पिला दो।

    मधुवा चुपचाप उठा और पानी के लिए चला। तब चौबेजी ने धीरे-से बटुआ खोलकर मिठाई निकाली, और खाने लगे। मधुवा इतने में न जाने कब लोटे में जल रखकर चला गया था।

    और बंजो सो गई थी। आज उसने नमक और तेल से अपनी रोटी भी नहीं खाई। आज पेट के बदले उसके हृदय में भूख लगी थी। शैला से मित्रता शैला से मधुर परिचय के लिए न-जाने कहां की साध उमड़ पड़ी थी। सपने-पर-सपने देख रही थी। उस स्वप्न की मिठास में उसके मुख पर प्रसन्नता की रेखा उस दरिद्र-कुटीर में नाच रही थी।

    2.

    धामपुर एक बड़ा ताल्लुका है। उसमें चौदह गांव हैं। गंगा के किनारे-किनारे उसका विस्तार दूर तक चला गया है। इन्द्रदेव यहीं के युवक जमींदार थे। पिता को राजा की उपाधि मिली थी।

    बी.ए. पास करके जब इन्द्रदेव ने बैरिस्टरी के लिए विलायत-यात्रा की, तब पिता के मन में बड़ा उत्साह था।

    किंतु इन्द्रदेव धनी के लड़के थे। उन्हें पढ़ने-लिखने की उतनी आवश्यकता न थी, जितनी लंदन का सामाजिक बनने की!

    लंदन नगर में भी उन्हें पूर्व और पश्चिम का प्रत्यक्ष परिचय मिला। पूर्वी भाग में। पश्चिमी जनता का जो साधारण समुदाय है, उतना ही विरोधपूर्ण है, जितना कि विस्तृत पूर्व और पश्चिम का। एक ओर सुगंध जल के फव्वारे छूटते हैं, बिजली से गरम कमरों में जाते ही कपड़े उतार देने की आवश्यकता होती है;दूसरी ओर बरफ और पाले में दूकानों के चबूतरों के नीचे अर्ध-नग्न दरिद्रों का रात्रि-निवास।

    इन्द्रदेव कभी-कभी उस पूर्वी भाग में सैर के लिए चले जाते थे।

    एक शिशिर रजनी थी। इन्द्रदेव मित्रों के निमंत्रण से लौटकर सड़क के किनारे, मुंह पर अत्यंत शीतल पवन का तीखा अनुभव करते हुए, बिजली के प्रकाश में धीरे-धीरे अपने मेस' की ओर लौट रहे थे। पल के नीचे पहंचकर वह रुक गए। उन्होंने देखा-कितने ही अभागे, पुल की कमानी के नीचे अपना रात्रि-निवास बनाए हुए, आपस में लड़-झगडु रहे हैं। एक रोटी पूरी ही खा जाएगा!–इतना बड़ा अत्याचार न सह सकने के कारण जब तक स्त्री उसके हाथ से छीन लेने के लिए अपनी शराब की खुमारी से भरी आखों को चढ़ाती ही रहती है, तब तक लड़का उचककर छीन लेता है। चटपट तमाचों का शब्द होना तुमुल युद्ध के आरंभ होने की सूचना देता है। धौल-धप्पड़, गाली-गलौज, बीच-बीच में फूहड़ हंसी भी सुनाई पड़ जाती है।

    इन्द्रदेव चुपचाप वह दृश्य देख रहे थे सोच रहे थे—इतना अकूत धन विदेशों से ले आकर भी क्या इन साहसी उद्योगियों ने अपने देश की दरिद्रता का नाश किया? अन्य देशों की प्रकृति का रक्त इन लोगों की कितनी प्यास बुझा सका है?

    सहसा एक लंबी-सी पतली-दुबली लड़की ने पास आकर कुछ याचना की। इन्द्रदेव ने गहरी दृष्टि से उस विवर्ण मुख को देखकर पूछा–क्यों, तुम्हारे पिता-माता नहीं हैं?

    पिता जेल में हैं, माता मर गई है।

    और इतने अनाथालय?

    उनमें जगह नहीं!

    तुम्हारे कपड़े से शराब की दुर्गंध आ रही है। क्या तुम…

    'जैक' बहुत ज्यादा पी गया था, उसी ने कै कर दिया है। दूसरा कपड़ा नहीं जो बदलूं; बड़ी सर्दी है। कहकर लड़की ने अपनी छाती के पास का कपड़ा मुट्ठियों में समेट लिया।

    तुम नौकरी क्यों नहीं कर लेती?

    रखता कौन है? हम लोगों को तो वे बदमाश, गिरह-कट, आवारा समझते हैं। पास खड़े होने तो…

    आगे उस लड़की के दांत आपस में लड़कर बजने लगे। वह स्पष्ट कुछ न कह सकी।

    इन्द्रदेव होंठ काटते हुए क्षण-भर विचार करने लगे। एक छोकरे ने आकर लड़की को धक्का देकर कहा—जो पाती, सब शराब पी जाती है। इसको देना–न देना सब बराबर है।

    लड़की ने क्रोध से कहा—जैक! अपनी करनी मुझ पर क्यों लादता है? तू ही मांग ले; मैं जाती हूं।

    वह घूमकर जाने के लिए तैयार थी कि इन्द्रदेव ने कहा—अच्छा सुनो तो, तुम पास के भोजनालय तक चलो, तुमको खाने के लिए, और मिल सका तो कोई भी दिलवादूंगा।

    छोकरा 'हो-हो-हो!' करके हंस पड़ा। बोला—जा न शैला। आज की रात तो गर्मी से बिता ले. फिर कल देखा जाएगा।

    उसका अश्लील व्यंग्य इन्द्रदेव को व्यथित कर रहा था; किंतु शैला ने कहा—चलिए।

    दोनों चल पड़े। इन्द्रदेव आगे थे, पीछे शैला। लंदन का विद्युत-प्रकाश निस्तब्ध होकर उन दोनों का निर्विकार पद-विशेप देख रहा था। सहसा घूमकर इन्द्रदेव ने पूछा-तुम्हारा नाम 'शैला' है न?

    'हां' कहकर फिर वह चुपचाप सिर नीचा किए अनुसरण करने लगी।

    इन्द्रदेव ने फिर ठहरकर पूछा—कहां चलोगी? भोजनालय में या हम लोगों के मेस में?

    'जहां कहिए' कहकर वह चुपचाप चल रही थी। उसकी अविचल धीरता से मन-ही-मन कुढ़ते हुए इन्द्रदेव मेस की ओर ही चले।

    उस मेस में तीन भारतीय छात्र थे। मकान वाली एक बुढ़िया थी। उसके किए सब काम होता न था। इन्द्रदेव ही उन छात्रों के प्रमुख थे। उनकी सम्मत से सब लोगों ने शैला' ________________

    को परिचारिका-रूप में स्वीकार किया। और, जब शैला से पूछा गया, तोउसने अपनी स्वाभाविक उदार दृष्टि इन्द्रदेव के मुंह पर जमाकर कहा यदि आप कहते हैं तो मुझे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। भिखमंगिन होने से यह बुरा तो न होगा। इन्द्रदेव अपने मित्रों के मुस्कुराने पर भी मन-ही-मन सिहर उठे। बालिका के विश्वास पर उन्हें भय मालूम होने लगा। तब भी उन्होंने समस्त साहस बटोरकर कहा-शैला, कोई भय नहीं, तुम यहां स्वयं सुखी रहोगी और हम लोगों की भी सहायता करोगी। मकान वाली बुढिया ने जब यह सुना, तो एक बार झल्लाई। उसने शैला के पास जाकर, उसकी ठोढ़ी पकड़कर, आंखें गड़ाकर, उसके मुंह को और फिर सारे अंग को इस तीखी चितवन से देखा, जैसे कोई सौदागर किसी जानवर को खरीदने से पहले उसे देखता हो। किंतु शैला के मुंह पर तो एक उदासीन धैर्य आसन जमाए था, जिसको कितनी ही कुटिल दृष्टि क्यों न हो, विचलित नहीं कर सकती। बुढिया ने कहा—रह जा बेटी, ये लोग भी अच्छे आदमी हैं। शैला उसी दिन से मेस में रहने लगी। भारतीयों के साथ बैठकर वह प्राय: भारत के देहातों, पहाड़ी तथा प्राकृतिक दृश्यों के संबंध में इन्द्रदेव से कतहलपर्ण प्रश्र किया करती। बैरिस्टरी का डिप्लोमा मिलने के साथ ही इन्द्रदेव को पिता के मरने का शोकसमाचार मिला। उस समय शैला की सांत्वना और स्नेहपूर्ण व्यवहार ने इन्द्रदेव के मन को बहुत-कुछ बहलाया। मकान वाली बुढिया उसे बहुत प्यार करती, इन्द्रदेव के सद्व्यवहार और चारित्र्य पर वह बहुत प्रसन्न थी। इन्द्रदेव ने जब शैला को भारत चलने के लिए व शैला भी भारत चली आई। इन्द्रदेव ने शहर के महल में न रहकर धामपुर के बंगले में ही अभी रहने का प्रबंध किया। अभी धामपुर आए इन्द्रदेव और शैला को दो सप्ताह से अधिक न हुए थे। इंग्लैंड से ही इन्द्रदेव ने शैला को हिंदी से खूब परिचित कराया। वह अच्छी हिंदी बोलने लगी थी। देहाती किसानों के घर जाकर उनके साथ घरेल बातें करने का चसका लग गया था खाट पर बैठकर वह बड़े मजे से उनसे बातें करती, साड़ी पहनने का उसने अभ्यास कर लिया था और उसे फबती भी अच्छी। शैला और इन्द्रदेव दोनों इस मनोविनोद से प्रसन्न थे। वे गंगा के किनारे-किनारे धीरेधीरे बात करते चले जा रहे थे। कृषक-बालिकाएं बरतन मांज रही थीं। मल्लाहों के लड़के अपने डोंगी पर बैठे हुए मछली फंसाने की कटिया तोल रहे थे। दो-एकबड़ी-बड़ी नावें, माल से लदी हुईं, गंगा के प्रशांत जल पर धीरे-धीरे संतरण कर रही थीं। वह प्रभात था! शैला बड़े कुतूहल से भारतीय वातावरण में नीले आकाश, उजली धूप और सहज ग्रामीण शांति का निरीक्षण कर रही थी। वह बातें भी करती जाती थी। गंगा की लहर से सुंदर कटे हुए बालू के नीचे करारों में पक्षियों के एक सुंदर छोटे-से झुंड को विचरते देखकर उसने उनका नाम पूछा! इन्द्रदेव ने कहा ये सुर्खाब हैं, इनके परों का तो तुम लोगों के यहां भी उपयोग होता समर्थन किया। इन्द ________________

    है। देखो, ये कितने कोमल हैं। यह कहकर इन्द्रदेव ने दो-तीन गिरे हुए परों को उठाकर शैला के हाथ में दे दिया। ‘फाइन'!-नहीं-नहीं, माफ करो इन्द्रदेव! अच्छा, इन्हें कहूं कोमल। सुंदर!—कहती हुई, शैला ने हंस दिया। शैला! इनके लिए मेरे देश में एक कहावत है। यहां के कवियों ने अपनी कविता में इनका बड़ा करुण वर्णन किया है। गंभीरता से इन्द्रदेव ने कहा। क्या . इन्हें चक्रवाक कहते हैं। इनके जोड़े दिन-भर तो साथ-साथ घूमते रहते हैं, किंतु संध्या जब होती है, तभी ये अलग हो जाते हैं। फिर ये रात-भर नहीं मिलने पाते। कोई रोक देता है क्या? प्रकृति; कहा जाता है कि इनके लिए यही विधाता का विधान है। ओह। बड़ी कठोरता है।—कहती हुई शैला एक क्षण के लिए अन्यमनस्क हो गई। कुछ दूर चुपचाप चलने पर इन्द्रदेव ने कहा-शैला। हम लोग नीम के पास आ गए। देखो, यही सीढ़ी है; चलो देखें, चौबे क्या कर रहा है। पालना नहीं-नहीं-पालकी तो पहुंच गई होगी इन्द्रदेव। यह भी कोई सवारी है? तुम्हारे यहां रईस लोग इसी पर चढ़ते हैं— आदमियों पर। क्यों? बिना किसी बीमारी के! यह तो अच्छा तमाशा है! —कहकर शैला ने हंस दिया। अब तो बीमारों के बदले डॉक्टर ही यहां पालकी पर चढ़ते हैं शैला! लो, पहले तुम्हीं सीढ़ी पर चढ़ो। ___दोनों सीढ़ी पर चढ़कर बातें करते हुए बनजरिया में पहुंचे। देखते हैं, तो चौबेजी अपने सामान से लैस खड़े हैं। शैला ने हंसकर पूछा-चौबेजी! आप तो पालकी पर जाएंगे? मुझे हुआ क्या है। रामदीन को आज बिना मारे मैं न छोडूंगा। सरकार! उसने बड़ा तंग किया। मुझे गोद में उठाकर पालकी पर बिठाता था। छावनी पर चलकर उस बदमाश छोकरे की खबर लूंगा। बरा क्या करता था? मेरे कहने से वह बेचारा तो तम्हारी सेवा करना चाहता था और तुम चिढ़ते थे। अच्छा, चलो तुम पालकी में बैठो।— इन्द्रदेव ने कहा। फिर वही—पालकी में बैठो! क्या मेरा ब्याह होगा? ठहरो भी, तुम्हारा घुटना तो टूट गया है न। तुम चलोगे कैसे? तेल क्या था, बिल्कुल जादू! मेम साहब ने जो दवा का बॉक्स मेरे बटुए में रख दिया था-वही, जिसमें सागूदाना की-सी गोलियां रहती हैं—मैं खोल डाला। एक शीशी गोली खा डाली। न गुड तीता न मीठा–सच मानिए मेम साहब। आपकी दवा मेरे-जैसे उजड्डों के लिए नहीं। मेरा तो विश्वास है कि उस तेल ने मुझे रातभर में चंगा कर दिया। मैं अब पालकी पर न चढूंगा। गांव-भर में मेरी दिल्लगी राम-राम!! शैला हँस रही थी। इन्द्रदेव ने कहा-चौबे! होमियोपैथी में बीमारी की दवा नहीं होती, दवा की बीमारी होती है। क्यों शैला! इन्द्रदेव! तुमने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। नहीं तो इसकी हंसी न उड़ाते।

    अच्छा, चलो उस लड़की को तो बुलावें। वह कहां है? उसे कल कुछ इनाम नहीं दिया। बड़ी अच्छी लड़की है। झोपड़ी में से लठिया टेकते हुए बुड्ढा निकल आया। उसके पीछे बंजो थी। शैला ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया, और कहने लगी-ओह! तुम रात को चली आईं, मैं तो खोज रही थी। तुम बड़ी नेक,…!

    बंजो आश्चर्य से उसका मुंह देख रही थी। इन्द्रदेव ने कहा-बुड्ढे। तुम बहुत बीमार हो न? हां सरकार! मुझे नहीं मालूम था, रात को आप…

    उसका सोच मत करो। तुम कौन कहानी कह रहे थे—रात को बंजो को क्या सुना रहे थे? मुझको सुनाओगे, चलो छावनी पर।

    सरकार; मैं बीमार हूं। बुड्ढा हूं। बीमार हूं।

    शैला ने कहा ठीक इन्द्रदेव, अच्छा सोची। इस बुड्ढे की कहानी बड़ी अच्छी होगी। लिवा चलो इसे। बंजो तुम्हारी कहानी हम लोग भी सुनेंगे। चलो।

    इन्द्रदेव ने कहा—अच्छा तो होगा।

    चौबेजी ने कहा—अच्छा तो होगा सरकार! मैं भी मधुवा को साथ लिवा चलूंगा। शायद फिर घुटना टूटे, तेल मलवाना पड़े और इन गायों को भी हांक ले चलूं, दूध भी—

    सब हँस पड़े; परंतु बुड्ढा बड़े संकट में पड़ा। कुछ बोला नहीं; वह एकटक शैला का मुंह देख रहा था। एक अपरिचित! किंतु जिससे परिचय बढ़ाने के लिए मन चंचल हो उठे। माया-ममता से भरा-पूरा मुख!

    बुड्ढा डरा नहीं, वह समीप होने की मानसिक चेष्टा करने लगा। साहस बटोरकर उसने कहा—सरकार! जहां कहिए, वहीं चलूं।

    3.

    चारों ओर ऊंचे-ऊंचे खंभों पर लंबे-चौड़े दालान, जिनसे सटे हुए सुंदर कमरों में सुखासन, उजली सेज, सुंदर लैंप, बड़े-बड़े शीशे, टेबिल पर फूलदान, अलमारियों में सुनहरी जिल्दों से मढ़ी हुई पुस्तकें—सभी कुछ उस छावनी में पर्याप्त है। आस-पास, दफ्तर के लिए, नौकरों के लिए तथा और भी कितने ही आवश्यक कामों के लिए छोटे-मोटे घर बने हैं। शहर के मकान में न जाकर, इन्द्रदेव ने विलायत से लौटकर यहीं रहना जो पसंद किया है, उसके कई कारणों में इस कोठी की सुंदर भूमिका और आसपास का रमणीय वातावरण भी है। शैला के लिए तो दूसरी जगह कदापि उपयुक्त न होती। छावनी के उत्तर नाले के किनारे ऊंचे चौतरे की हरी-हरी दूबों से भरी हुई भूमि पर कुर्सी का सिरा पकड़े तन्मयता से वह नाले का गंगा में मिलना देख रही थी। उसका लंबा और ढीला गाउन मधुर पवन से आंदोलित हो रहा था। कुशल शिल्पी के हाथों से बनी हुई संगमरमर की सौंदर्य-प्रतिमा-सी वह बड़ी भली मालूम हो रही थी। दालान में चौबेजी उसके लिए चाय बना रहे थे। सांयकाल का सूर्य अब लाल बिंब ________________

    मात्र रह गया था, सो भी दूर की ऊंची हरियाली के नीचे जाना ही चाहता था। इन्द्रदेव अभी तक नहीं आए थे। चाय ले जाने में चौबेजी और सुस्ती कर रहे थे। उनकी चाय शैला को बड़ी अच्छी लगी। वह चौबेजी के मसाले पर लटू थी। रामदीन ने चाय की टेबिल लाकर रख दी। शैला की तन्मयता भंग हुई। उसने मुस्कुराते हुए, इन्द्रदेव से कुछ मधुर सम्भाषण करने के लिए, मुंह फिराया; किंतु इन्द्रदेव को न देखकर वह रामदीन से बोली—क्या अभी इन्द्रदेव नहीं आए हैं? नटखट रामदीन हँसी छिपाते हुए एक आंख का कोना दबाकर होंठ के कोने को ऊपर चढ़ा देता था। शैला उसे देखकर खूब हँसती, क्योंकि रामदीन का कोई उत्तर बिना इस कुटिल हंसी के मिलना असंभव था! उसने अभ्यास के अनुसार आधा हंसकर कहा—जी, आ रहे हैं सरकार! बड़ी सरकार के आने की… बड़ी सरकार? हां, बड़ी सरकार! वह भी आ रही हैं। कौन है वह? बड़ी सरकारदेखो रामदीन, समझाकर कहो। हंसना पीछे। बड़ी सरकार का अनुवाद करने में उसके सामने बड़ी बाधाएं उपस्थित हुईं; किंतु उन सबको हटाकर उसने कह दिया—सरकार की मां आई हैं। उनके लिए गंगा-किनारे वाली छोटी कोठी साफ़ कराने का प्रबंध देखने गए हैं। वहां से आते ही होंगे। आते ही होंगे? क्या अभी देर है? रामदीन कुछ उत्तर देना चाहता था कि बनारसी साड़ी का आंचल कंधे पर से पीठ की ओर लटकाए: हाथ में छोटा-सा बेग लिये एक संदरी वहां आकर खड़ी हो गई। शैला ने उसकी ओर गंभीरता से देखा। उसने भी अधिक खोजने वाली आंखों से शैला को देखा। दृष्टि-विनियम में एक-दूसरे को पहचानने की चेष्टा होने लगी; किंतु कोई बोलता न था। शैला बड़ी असुविधा में पड़ी। वह अपरिचित से क्या बातचीत करे? उसने पूछाआप क्या चाहती हैं? आने वाली ने नम्र मुस्कान से कहा—मेरा नाम मिस अनवरी है। क्या किया जाए, जब कोई परिचय कराने वाला नहीं तो ऐसा करना ही पड़ता है। मैं कुंवर साहब की मां को देखने के लिए आया करती हूं। आपको मिस शैला समझ लूं? ___जी—कहकर शैला ने कुर्सी बढ़ा दी और शीतल दृष्टि से उसे बैठने का संकेत किया। उधर चौबेजी चाय ले आ रहे थे। शैला ने भी एक कुर्सी पर बैठते हुए कहा-आपके लिए भी… अनवरी और शैला आमने-सामने बैठी हुई एक-दूसरे को परखने लगी। अनवरी की सारी प्रगल्भता धीरे-धीरे लुप्त हो चली। जिस गर्मी से उसने अपना परिचय अपने-आप दे दिया था, वह चाय के गर्म प्याले के सामने ठंडी हो चली थी। शैला ने चाय के छोटे-से पात्र से उठते हुए धुएं को देखते हुए कहा—कुंवर साहब की मां भी सुना, आ गई हैं? ________________

    मुझे तो नहीं मालूम, मैं अपनी मोटर से यहीं उतर पड़ी थी। उनके साथ ही आती; पर क्या करूं, देर हो गई। किसी को पूछ आने के लिए भेजिएगा? मुझे तो आपसे सहायता मिलनी चाहिए मिस अनवरी शैला ने हंसकर कहाआपके कुंवर साहब आ जाएं, तो प्रबंध… अरे शैला! यह कौन… ___ इन्द्रदेव! तुम अब तक क्या कर रहे थे-कहकर शैला ने मिस अनवरी की ओर संकेत करते हुए कहा—आप मिस अनवरी… फिर अपने होठ को गर्म चाय में डुबो दिया, जैसे उन्हें हंसने का दंड मिला हो। इन्द्रदेव ने अभिनंदन करते हुए कहा-मां जब से आईं, तभी से पूछ रही हैं, उनकी रीढ़ में दर्द हो रहा है। आपकी उनसे भेंट नहीं हुई क्या? जी नहीं; मैंने समझा, यहीं होगी। फिर जब यहां चाय मिलने का भरोसा था, तो थोड़ा यहीं ठहरना अच्छा हुआ—कहकर अनवरी मुस्कराने लगी। इन्द्रदेव ने साधारण हंसी हंसते हुए कहा—अच्छी बात है, चाय पी लीजिए। चौबेजी आपको वहां पहुंचा देंगे। ____तीनों चुपचाप चाय पीने लगे। इन्द्रदेव ने कहा—चौबे! आज तुम्हारी गुजराती चाय बड़ी अच्छी रही। एक प्याला ले आओ, और उसके साथ और भी कछ… चौबे सोहन-पापड़ी के टुकड़े और चायदानी लेकर जब आए, तो मिस अनवरी उठकर खड़ी हो गई। इन्द्रदेव ने कहा—वाह, आप तो चली जा रही हैं। इसे भी तो चखिए। शैला ने मुस्कुराते हुए कहा—बैठिए भी, आप तो यहां पर मेरी ही मेहमान होकर रह सकेंगी। हां, इसको तो मैं भूल गई थी—कहकर अनवरी बैठ गई। चौबेजी ने सबको चाय दे दी, और अब वह प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब अनवरी चलेगी। पर अनवरी तो वहां से उठने का नाम ही न लेती थी। वह कभी इन्द्रदेव और कभी शैला को देखती, फिर संध्या की आने वाली कालिमा की प्रतीक्षा करती हुई नीले आकाश में आंख लड़ाने लगती। उधर इन्द्रदेव इस बनावटी सन्नाटे से ऊब चले थे। सहसा चौबेजी ने कहा—सरकार! वह बुड्ढा आया है, उसकी कहानी कब सुनिएगा? मैं लालटेन लेता आऊं? . फिर अनवरी की ओर देखते हुए कहने लगे अभी आपको भी छोटी कोठी में पहुंचाना होगा। अनवरी को जैसे धक्का लगा। वह झटपट उठकर खड़ी हो गई। चौबेजी उसे साथ लेकर चले। इन्द्रदेव ने गहरी सांस लेकर कहा—शैला! क्या इन्द्रदेव? मां से भेंट करोगी? चलूं? अच्छा, कल सवेरे!

    इन्द्रदेव की माता श्यामदुलारी पुराने अभिजात – कुल की विधवा हैं । प्राय : बीमार रहा करती हैं । किंतु मुख -मंडल पर गर्व की दीप्ति , आज्ञा देने की तत्परता और छिपी हुई सरल दया भी अंकित है ? वह सरकार हैं । उनके आस -पास अनावश्यक गृहस्थी के नाम पर जुटाई गई अगणित सामग्री का बिखरा रहना आवश्यक है। आठ से कम दासियों से उनका काम चल ही नहीं सकता । दो पुजारी और ठाकुरजी का संभार अलग । इन सबके आज्ञा- पालन के लिए कहारों का पूरा दल । बहंगी पर गंगाजल और भोजन का सामान ढोते हुए कहारों का आना -जाना श्यामदुलारी की आंखें सदैव देखना चाहती थीं । बेटा विलायत से लौट आया है । एक दिन उनसे मिलकर उनकी चरण – रज लेकर वह छावनी में चला आया और यहीं रहने लगा । लोग कहते हैं कि इन्द्रदेव के कानों में जब यह समाचार किसी मतलब से पहुंचा दिया गया कि चरण छूकर आपके चले आने पर माताजी ने फिर से स्नान किया , तो फिर वह मकान पर न ठहर सके । किंतु श्यामदुलारी की प्रकृति ही ऐसी है। उसने ऐसा किया हो , तो कोई आश्चर्य नहीं । तब भी श्यामदुलारी को तो यही विश्वास दिलाया गया कि — साथ में मेम नहीं आई है! श्यामदुलारी अपने बेटे को संभालना चाहती थीं । बेटी माधुरी से पूछकर यही निश्चित हुआ कि सब लोग छावनी पर ही कुछ दिन चलकर रहें । वहीं इन्द्रदेव को सुधार लिया जाएगा । माधुरी घर की प्रबंधकी है। वह दक्ष, चिड़चिड़े स्वभाव की सुंदरी युवती है। माता श्यामदुलारी भी उसके अनुशासन को मानती हैं और भीतर – ही – भीतर दबती भी हैं । माधुरी का पति उसकी खोज – खबर नहीं लेता । उसे लेने की आवश्यकता ही क्या ? माधुरी धनी घर की लाड़ली बेटी है। इसलिए बाबू श्यामलाल को इस अवसर से लाभ उठाने की पूरी सुविधा है। श्यामदुलारी, बेटी और दामाद दोनों को प्रसन्न रखने की चेष्टा में लगी रहती हैं । बहत बुलाने पर कभी साल- भर में बाबू श्यामलाल कलकत्ता से दो -तीन दिन के लिए चले आते हैं । उनका व्यवसाय न नष्ट हो जाए, इसलिए जल्द चले जाते हैं — अर्थात् रेस की टीप , बगीचों के जुए, स्टीमरों की पार्टियां और भी कितने ही ऐसे काम हैं , जिनमें चूक जाने से बड़ी हानि उठाने की संभावना है । माधुरी शासन करने की क्षमता रखती है । भाई इन्द्रदेव पढ़ते थे; इसलिए माता की रुग्णावस्था में घर – गृहस्थी का बोझ दूसरा कौन संभालता ? ___ माधुरी की अभिभावकता में माता श्यामदुलारी सोती हैं सपना देखती हैं । इसलिए माधुरी भी साथ ही आई हैं । चौकी पर मोटे – से गद्दे पर तकिया सहारे बैठी वह कुछ हिसाब देख रही थी । पेट्रोल -लैंप के तीव्र प्रकाश में उसकी उठी हुई नाक की छाया दीवार पर बहुत लंबी- सी दिखाई पड़ती है। मलिया बड़ी नटखट छोकरी है। वह पान का डिब्बा लिये हुए, उस छाया को देखकर, जोर से हंसना चाहती है; पर माधुरी के डर से अपने होठों को दांत से दबाए चुपचाप खड़ी है । मिस अनवरी की छाया से वह चौंक उठी । उसने चुलबुलेपन से कहा — मेम साहब , सलाम ! माधुरी ने सिर उठाकर देखा और कहा—आइए, हम लोग बड़ी देर से आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मां का दर्द तो बहुत बढ़ गया है। ___ माधुरी के पास ही बैठते हुए अनवरी ने—बीबी, तुमको देखने के लिए जी ललचाया रहता है, मां को तो देगी ही कहकर उसके हाथों को दबा दिया। माधुरी ने झेंपकर कहा-आहा तुम तो मेम और साहब दोनों ही हो न? अच्छा, यह तो बताओ, तुम्हारे ठहरने का क्या प्रबंध करूं? आज रात को तो मोटर से शहर लौट जाने न दूंगी। अभी मां पूजा कर रही हैं, एक घंटे में खाली होगी, फिर घंटों उनको देखने में लग जाएगा। बजेगा दो और जाना है तीस मील! आज रात को तुमको रहना ही होगा। . अनवरी ने मुस्कुराते हुए कहा—सो तो बीबी, तुम्हारी भाभी ने मुझे न्योता ही दिया माधुरी क्षण-भर के लिए चुप हो गई। फिर बोली—अनवरी, ऐसी दिल्लगी न करो, यह बात मुझे ही नहीं, घर भर को खटक रही है। लेकिन भाई साहब तो कहते हैं कि वह हमारी दोस्त है! हां—बीबी, दोस्ती नहीं तो क्या दुश्मनी से कोई इतना बड़ा… माधुरी ने भीतर के कमरे की ओर देखते हुए उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और धीरेधीरे कहने लगी—प्यारी अनवरी! क्या इस चुडैल से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं? हम लोग क्या करें? कोई बस नहीं चलता। धीरे-धीरे सब हो जाएगा। लेकिन तुम्हें बुरा न लगे, तो मैं एक बात पूछ लूं। क्या? कुंवर साहब इससे ब्याह कर लें, तो तुम्हारा क्या? ऐसा न कहो अनवरी! तुम्हारी मां तो फिर तुमको ही… उंह तुम क्या बक रही हो! अच्छा तो मैं कुछ दिन यहां रहूं तो… तो रहो न मेरी रानी।

    हाथ-मुंह धोकर मुलायम तौलिए से हाथ पोंछती हुई अनवरी बड़े-से दर्पण के सामने खड़ी थी। शैला अपने सोफा पर बैठी हुई रेशमी रूमाल पर कोई नाम कसीदे से काढ़ रही थी। अनवरी सहसा चंचलता से पास जाकर उन अक्षरों को पढ़ने लगी। शैला ने अपनी भोली आंखों को एक बार ऊपर उठाया, सामने से सूर्योदय की पीली किरणों ने उन्हें धक्का दिया, वे फिर नीचे झुक गईं। अनवरी ने कहा—मिस शैला! क्या कुंवर साहब का नाम है? जी—नीचा सिर किए हुए शैला ने कहा। क्या आप रोज सवेरे एक रूमाल उनको देती हैं? यह तो अच्छी बोहनी है!—कहकर ________________

    अनवरी खिलखिला उठी। शैला को उसकी यह हंसी अच्छी न लगी। रात-भर उसे अच्छी नींद भी न आई थी। इन्द्रदेव ने अपनी माता से उसे मिलाने की जो उत्सुकता नहीं दिखलाई, उल्टे एक ढिलाई का आभास दिया, वही उसे खटक रहा था। अनवरी ने हंसी करके उसको चौंकाना चाहा; किंतु उसके हृदय में जैसे हंसने की सामग्री न थी? इन्द्रदेव ने कमरे के भीतर प्रवेश करते हुए कहा—शैला! आज तुम टहलने नहीं जा सकी? मुझे तो आज किसानों की बातों से छुट्टी न मिलेगी। दिन भी चढ़ रहा है। क्यों न मिस अनवरी को साथ लेकर घूम आओ! अनवरी ने ठाट से उठकर कहा—आदाबअर्ज है कुंवर साहब! बड़ी खुशी से! चलिए न! आज कुंवर साहब का काम मैं ही करूंगी शैला इस प्रगल्भता से ऊपर न उठ सकी। इन्द्रदेव और अनवरी को आत्म-समर्पण करते हुए उसने कहा—अच्छी बात है, चलिए। इन्द्रदेव बाहर चले गए। खेतों में अंकुरों की हरियाली फैली पड़ी थी। चौखूटे, तिकोने, और भी कितने आकारों के टुकड़े, मिट्टी की पेड़ों से अलगाए हुए, चारों ओर समतल में फैले थे। बीच-बीच में आम, नीम और महुए के दो-एक पेड़ जैसे उनकी रखवाली के लिए खड़े थे। मिट्टी की संकरी पगडंडी पर आगे शैला और पीछे-पीछे अनवरी चल रही थीं। दोनों चुपचाप पैर रखती हुई चली जा रही थीं। पगडंडी से थोड़ी दूर पर एक झोपड़ी थी, जिस पर लौकी और कुंभडे की लतर चढ़ी थी। उसमें से कुछ बात करने का शब्द सुनाई पड़ रहा था। शैला उसी ओर मुड़ी। वह झोंपड़ी के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने देखा, देखा, मधुवा अपनी टूटी खाट पर बैठा हुआ बंजो से कुछ कह रहा है। बंजो ने उत्तर में कहा—तब क्या करोगे मधुबन! अभी एक पानी चाहिए। तुम्हारा आलू सोराकर ऐसा ही रह जाएगा? ढाई रुपए के बिना! महंगू महतो उधार हल नहीं देंगे? मटर भी सूख जाएगी। ___अरे आज मैं मधुबन कहां से बन गया रे बंजो पीट दूंगा जो मुझे मधुवा न कहेगी। मैं तुझे तितली कहकर न पुकारूंगा। सुना न? हल उधार नहीं मिलेगा, महतो ने साफ-साफ कह दिया है। दस विस्से मटर और दस बिस्से आलू के लिए खेत मैंने अपनी जोत में रखकर बाकी दो बीघे जौ-गेहं बोने के लिए उसे साझे में दे दिया है। यह भी खेत नहीं मिला, इसी की उसे चिढ़ है। कहता है कि अभी मेरा हल खाली नहीं है। __ तब तुमने इस एक बीघे को भी क्यों नहीं दे दिया! __मैंने सोचा कि शहर तो मैं जाया की करता हूं। नया आलू और मटर वहां अच्छे दामों पर बेचकर कुछ पैसे भी लूंगा; और बंजो जाड़े में इस झोपड़ी में बैठे-बैठे रात को उन्हें भूनकर खाने में कम सुख तो नहीं! अभी एक कंबल लेना जरूरी है। तो बापू से कहते क्यों नहीं? वह तुम्हें ढाई रुपया दे देंगे। उनसे कुछ मांगा, तो यही समझेंगे कि मधुवा मेरा कुछ काम कर देता है, उसी की मजूरी चाहता है। मुझे जो पढ़ाते हैं, उसकी गुरु-दक्षिणा मैं उन्हें क्या देता हूं? तितली! जो भगवान करेंगे, वही अच्छा होगा। अच्छा तो मधुबन! जाती हूं। अभी बापू छावनी से लौटकर नहीं आए। जी घबराता ________________

    यह कहकर जब वह लौटने लगी, तो मधुबन ने कहा-अच्छा, फिर आज से मैं रहा मधुबन और तुम तितली। यही न? दोनों की आंखें आंखें एक क्षण के लिए मिली—स्नेहपूर्ण आदान-प्रदान करने के लिए। मधुबन उठ खड़ा हुआ, तितली बाहर चली आई। उसने देखा, शैला और अनवरी चुपचाप खड़ी हैं! वह सकुचा गई। शैला ने सहज मुस्कुराहट से कहा—तब तुम्हारा नाम तितली हे क्यों? हां-कहकर तितली ने सिर झुका लिया। आज जैसे उसे अकेले में मधुबन से बातें करते हुए समग्र संसार ने देखकर व्यंग्य से हंस दिया हो। वह संकोच में गड़ी जा रही थी। शैला ने उसकी ठोढ़ी उठाकर कहा—लो, यह पांच रुपए तुम्हारे उस दिन की मजूरी के हैं। मैं, में न लगी। बाप बिगड़ेंगे। वह चंचल हो उठी। किंतु शैला कब मानने वाली थी। उसने कहा—देखो, इसमें ढाई रुपए तो मधुबन को दे दो, वह अपना खेत सींच ले और बाकी अपने पास रख लो। फिर कभी काम देगा। अब मधुबन भी निकल आया था। वह विचार-विमूढ था, क्या कहे! तब तक तितली को रुपया न लेते देखकर शैला ने मधुबन के हाथ में रुपया रख दिया, और कहा—बाकी रुपया जब तितली मांगे तो दे देना। समझा न? मैं तुम लोगों को छावनी पर बुलाऊं, तो चले आना। ___ दोनों चुप थे। अनवरी अब तक चुप थी; किंतु उसके हृदय ने इस सौहार्द को अधिक सहने से अस्वीकार कर दिया। उसने कहा—हो चुका, चलिए भी। धूप निकल आई है। शैला अनवरी के साथ घूम पड़ी। उसके हृदय में एक उल्लास था। जैसे कोई धार्मिक मनुष्य अपना प्रातः-कृत्य समाप्त कर चुका हो। दोनों धीरे-धीरे ग्राम-पथ पर चलने लगीं। अनवरी ने धीरे-से प्रसगं छेड़ दिया मिस शैला! आपको इन देहाती लोगों से बातचीत करने में बड़ा सुख मिलता है। मिस अनवरी! सुख! अरे मुझे तो इनके पास जीवन का सच्चा स्वरूप मिलता है, जिसमें ठोस मेहनत, अटूट विश्वास और संतोष से भरी शांति हंसती-खेलती है। लंदन की भीड़ से दबी हुई मनुष्यता में मैं ऊब उठी थी, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं दुख भी उठा चुकी हूं। दुखी के साथ दुखी की सहानुभूति होना स्वाभाविक है। आपको यदि इस जीवन में सुख-ही-सुख मिला है तो… नहीं-नहीं, हम लोगों को सुख-दुख जीवन से अलग होकर कभी दिखाई नहीं पड़ा। रुपयों की कमी ने मुझे पढ़ाया और मैं नर्स का काम करने लगी। जब अस्पताल का काम छोड़कर अपनी डॉक्टरी का धंधा मैंने फैलाया, तो मुझे रुपयों की कमी न रही। पर मुझे तो यही समझ पड़ता है कि मेहनत-मजूरी करते हुए अपने दिन बिता लेना, किसी के गले पड़ने से अच्छा है। ___ अनवरी यह कहते हुए शैला की ओर गहरी दृष्टि से देखने लगी। वह उसकी बगल में आ गई थी। सीधा व्यंग्य न खल जाए इसलिए उसने और भी कहा हम मसलमानों को तो मालिक की मर्जी पर अपने को छोड़ देना पड़ता है, फिर सुख-दुख की अलग-अलग परख ________________

    करने की किसको पड़ी है। शैला ने जैसे चौंककर कहा तो क्या स्त्रियां अपने लिए कुछ भी नहीं कर सकतीं? उन्हें अपने लिए सोचने का अधिकार भी नहीं है? बहुत करोगी मिस शैला, तो यही कि किसी को अपने काम का बना लोगी। जैसा सब जगह हम लोगों की जाति किया करती है। पर उसमें दुख होगा कि सुख, इसका निपटारा तो वही मालिक कर सकता है। शैला न जाने कितनी बातें सोचती हुई चुप हो गई। वह केवल इस व्यंग्य पर विचार करती हुई चलने लगी। उत्तर देने के लिए उसका मन बेचैन था; पर अनवरी को उत्तर देने में उसे बहुत-सी बातें कहनी पड़ेंगी। वह क्या सब कहने लायक हैं? और यह प्रश्न भी उसके मन में आने लगा कि अनवरी कुछ अभिप्राय रखकर तो बात नहीं कर रही है। उसको भारतीय वायुमंडल का पूरा ज्ञान नहीं था। उसने देखा था केवल इन्द्रदेव को, जिसमें श्रद्धा और स्नेह का ही आभास मिला था। संदेह का विकृत चित्र उसके सामने उपस्थित करके अपने मन में अनवरी क्या सोच रही है, यही धीरे-धीरे विचारती हुई वह छावनी की ओर लौटने लगी। ___ अनवरी ने सौहार्द बढ़ाने के लिए कुछ दूसरा प्रसंग छेड़ना चाहा; किंतु वह सौजन्य के अनुरोध से संक्षिप्त उत्तर मात्र देती हुई छावनी पर पहुंची। अभी इन्द्रदेव का दरबार लगा हआ था। आरामकी पर लेटे हए वह कोई कागज देख रहे थे। एक बड़ी-सी दरी बिछी थी। उस पर कुछ किसान बैठे थे। इन लोगों के जाते ही दो कुर्सियां और आ गईं। पर इन्द्रदेव ने अपने तहसीलदार से कहा—इस पोखरी का झगड़ा बिना पहले का कागज देखे समझ में नहीं आएगा। इसे दूसरे दिन के लिए रखिए। तहसीलदार इन्द्रदेव के बाप के साथ काम कर चुका था। वह इन्द्रदेव से काम लेना चाहता था। उसने कहा—लेकिन दो-एक कागज तो आज ही देख लीजिए, उनकी बेदखली जल्दी होनी चाहिए। __अच्छा, मैं चाय पीकर अभी आता हूं।—कहकर इन्द्रदेव शैला और अनवरी के साथ कमरे में चले गए। बुड्ढे से अब न रहा गया। उसने कहा, तहसीलदार साहब, मैं कल से यहां बैठा हूं। मुझे क्यों तंग किया जा रहा है! तहसीलदार ने चश्मे के भीतर से आंखें तरेरते हुए कहा—रामनाथ हो न? तंग किया जा रहा है! हूं! बैठो अभी। दस बीघे की जोत बिना लगान दिए हड़प किए बैठे हो और कहते हो, मुझे तंग किया जा रहा है। क्या कहा? दस बीघे! अरे तहसीलदार साहब, क्या अब जंगल-परती में भी बैठने न दोगे? और वह तो न जाने कब से कृष्णार्पण लगी हुई बनजरिया है! वही तो बची है, और तो सब आप लोगों के पेट में चला गया। क्या उसे भी छीनना चाहते हो? तहसीलदार चुपचाप उसे घूरने लगा। ___ इन्द्रदेव शैला के साथ बाहर चले आए। अनवरी के लिए देर से माधुरी की भेजी हुई लौंडी खड़ी थी। वह उसके साथ छोटी कोठी में चली गई। इन्द्रदेव ने बुड्ढे को देखकर तहसीलदार को संकेत किया। तहसीलदार अभी बुड्ढे रामनाथ की बात नहीं छेड़ना चाहता था। किंतु इन्द्रदेव के संकेत से उसे कहना ही पड़ा—इसका नाम रामनाथ है। यह ________________

    बनजरिया पर कुछ लगान नहीं देता। एकरेज जो लगा है, वह भी नहीं देना चाहता। कहता है—कृष्णार्पण माफी पर लगान कैसा? इन्द्रदेव ने रामनाथ को देखकर पूछा—क्यों, उस दिन हम लोग तुम्हारी ही झोंपड़ी पर गए थे? हां सरकार! तो एकरेज तो तुमको देना ही चाहिए। सरकारी मालगुजारी तो तुम्हारे लिए हम अपने आप से नहीं दे सकते। तहसीलदार से न रहा गया, बीच ही में बोल उठा—अभी तो यह भी नहीं मालूम कि यह बनजरिया का होता कौन है। पुराने कागजों में वह थी देवनन्दन के नाम। उसके मर जाने पर बनजरिया पड़ी रही। फिर इसने आकर उसमें आसन जमा लिया। बुड्ढा झनझना उठा। उसने कहा हम कौन हैं, इसको बताने के लिए थोड़ा समय चाहिए सरकार! क्या आप सुनेंगे? शैला ने अपने संकेत से उत्सुकता प्रकट की। किंतु इन्द्रदेव ने कहा—चलो, अभी माताजी के पास चलना है। फिर किसी दिन सुनूंगा। रामनाथ आज तुम जाओ; फिर मैं बुलाऊंगा, तब आना। रामनाथ ने उठकर कहा—अच्छा सरकार! चौबेजी बटुआ लिये पान मुंह में दाबे आकर खड़े हो गए। उनके मुख पर एक विचित्र कुतूहल था। वह मन-ही-मन सोच रहे थे—आज शैला बड़ी सरकार के सामने जाएगी। अनवरी भी वहीं है, और वहीं है बीबीरानी माधुरी! हे भगवान्! शैला, इन्द्रदेव और चौबेजी छोटी कोठी की ओर चले। मधबन के हाथ में था रुपया और पैरों में फरती, वह महंग महतो के खेत पर जा रहा था। बीच में छावनी पर से लौटते हुए रामनाथ से भेंट हो गई। मधुबन के प्रणाम करने पर रामनाथ ने अश्विर्वाद देकर पूछा कहां जा रहे हो मधुबन? आज पहला दिन है, बाबाजी ने उसे मधुवा न कहकर मधुबन नाम से पुकारा। वह भीतर-ही-भीतर जैसे प्रसन्न हो उठा। अभी-अभी तितली से उसके हृदय की बातें हो चुकी थीं। उसकी तरी छाती में भरी थी। उसने कहा बाबाजी. रुपया देने जा रहा है। महंग से पुरवट के लिए कहा था—आलू और मटर सींचने के लिए। वह बहाना करता था, और हल भी उधार देने से मुकर गया। मेरा खेत भी जोतता है और मुझी से बढ़-बढ़कर बातें करता रामनाथ ने कहा—भला रे, तू पुरवट के लिए तो रुपया देने जाता है—सिंचाई होगी; पर हल क्या करेगा? आज-कल कौन-सा नया खेत जोतेगा? मधुबन ने क्षण-भर सोचकर कहा-बाबाजी, तितली ने मुझसे चार पहर के लिए कहीं से हल उधार मांगा था। सिरिस के पेड़ के पास बनजरिया में बहुत दिनों से थोड़ा खेत बनाने का वह विचार कर रही है, जहां बरसात में बहुत-सी खाद भी हम लोगों ने डाल रखी थी। पिछाड़ होगी तो क्या, गोभी बोने का… ___ दुत पागल! तो इसके लिए इतने दिनों तक कानाफूसी करने की कौन-सी बात थी? मुझसे कहती! अच्छा, तो रुपया तुझे मिला? हां बाबाजी, मेम साहब ने तितली को पांच रुपया दिया था, वही तो मेरे पास है। मेम साहब ने रुपया दिया था! बंजो को? तू कहता क्या है?

    हां, मेरे ही हाथ में तो दिया। वह तो लेती न थी। कहती थी, बापू बिगड़ेंगे! किसी दिन मेम साहब का उसने कोई काम कर दिया था, उसी की मजूरी बाबाजी! मेम साहब बड़ी अच्छी हैं।

    रामनाथ चुप होकर सोचने लगा। उधर मधुबन चाहता था, बुड्ढा उसे छुट्टी दे। वह खड़ा-खड़ा ऊबने लगा। उत्साह उसे उकसाता था कि महंगू के पास पहुंचकर उसके आगे रुपए फेंक दे और अभी हल लाकर बंजो का छोटा-सा गोभी का खेत बना दे। बुड्ढा न जाने कहां से छींक की तरह उसके मार्ग में बाधा-सा आ पहुंचा।

    रामनाथ सोच रहा था छावनी की बात! अभी-अभी तहसीलदार ने जो रूप दिखलाया था. वही उसके सामने नाचने लगा था। उसे जैसे बनजरिया की काया-पलट होने के साथ ही अपना भविष्य उत्पातपूर्ण दिखाई देने लगा। तितली उसमें नया खेत बनाने जा रही है। तब भी न जाने क्या सोचकर उसने कहा-जाओ मधुबन, हल ले जाओ।

    मधुबन तो उछलता हुआ चला जा रहा था। किंतु रामनाथ धीरे-धीरे बनजरिया की ओर चला।

    तितली गायों को चराकर लौटा ले जा रही थी। मधुबन तो हल ले जाने गया था। वह उनको अकेली कैसे छोड़ देती। धूप कड़ी हो चली थी। रामनाथ ने उसे दूर से देखा। तितली अब दूर से पूरी स्त्री-सी दिखाई पड़ती थी।

    रामनाथ एक दूसरी बात सोचने लगा। बनजरिया के पास पहुंचकर उसने पुकारातितली!

    उसने लौटकर प्रफुल्ल बदन से उत्तर दिया- 'बापू!'

    श्यामदुलारी आज न जाने कितनी बातें सोचकर बैठी थीं-लड़का ही तो है, उसे दो बात खरी-खोटी सुनाकर डांट-डपटकर न रखने से काम नहीं चलेगा-पर विलायत हो आया है। बैरिस्टरी पास कर चुका है। कहीं जवाब दे बैठा तो! अच्छा…आज वह मेम की छोकरी भी साथ आएगी। इस निर्लज्जता का कोई ठिकाना है! कहीं ऐसा न हो कि साहब की वह कोई निकल आवे! तब उसे कुछ कहना तो ठीक न होगा। अभी दो महीने पहले कलेक्टर साहब जब मिलने आए थे, तो उन्होंने कहा था- ‘रानी साहब, आपके ताल्लुके में नमूने के गांव बसाने का बंदोबस्त किया जाएगा। इसमें बड़ी-बड़ी खेतियां, किसानों के बैंक और सहकार की संस्थाएं खुलेंगी। सरकार भी मदद देगी।' तब उसको कुछ कहना ठीक न होगा। माधुरी की क्या राय है? वह तो कहती है- 'मां, जाने दो, भाई साहब को कुछ मत कहो?' तो क्या वह अपने मन से बिगड़ता चला जाएगा। सो नहीं हो सकता। अच्छा, जाने दो। माधुरी के मन में अनवरी की बात रह-रहकर मरोर उठती थी। इन्द्रदेव क्या यह घर ________________

    संभाल सकेंगे? यदि नहीं, तो मैं क्यों बनाने की चेष्टा करूं। उसके मन में तेरह बरस के कृष्णमोहन का ध्यान आ गया। थियासोफिकल स्कूल में वह पढ़ता है। पिता बाबू श्यामलाल उसकी ओर से निश्चित थे। हां, उसके भविष्य की चिंता तो उसकी माता माधुरी को ही थी। तब भी वह जैसे अपने को धोखे में डालने के लिए कह बैठती-जैसा जिसके भाग्य में होगा, वही होकर रहेगा। अनवरी इस कुटुंब की मानसिक हलचल में दत्तचित्त होकर उसका अध्ययन कर रही थी। न जाने क्यों, तीनों चुप होकर मन-ही-मन सोच रही थीं। पलंग पर श्यामदुलारी मोटी-सी तकिया के सहारे बैठी थीं। चौकी पर चांदनी बिछी थी। माधुरी और अनवरी वहीं बैठी हुई एक-दूसरे का मुंह देख रही थीं। तीन-चार कुर्सियां पड़ी थीं। छोटी कोठी का यह बाहरी कमरा था। श्यामदुलारी यहीं पर सबसे बात करती, मिलती-जुलती थीं; क्योंकि उनका निज का प्रकोष्ठ तो देव-मंदिर के समान पवित्र, अस्पृश्य और दुर्गम्य था? बिना स्नान किए-कपड़ा बदले, वहां कौन जा सकता था! बाहर पैरों का शब्द सुनाई पड़ा। तीनों स्त्रियां सजग हो गईं, माधुरी अपनी साड़ी का किनारा संवारने लगी। अनवरी एक उंगली से कान के पास के बालों को ऊपर उठाने लगी और, श्यामदुलारी थोड़ा खांसने लगी। इन्द्रदेव शैला और चौबेजी के साथ, भीतर आए। माता को प्रणाम किया। श्यामदुलराि ने 'सुखी रहो' कहते हुए देखा कि वह गोरी मेम भी दोनों हाथों की पतली उंगलियों में बनारसी साड़ी का सुनहला अंचल दबाए नमस्कार कर रही है। अनवरी उठकर खड़ी हो गई। माधुरी चौकी पर ही थोड़ा खिसक गई। माता ने बैठने का संकेत किया। पर वह भीतर से शैला से बोलने के लिए उत्सुक थी। इन्द्रदेव ने कहा-मिस अनवरी! मां का दर्द अभी अच्छा नहीं हुआ। इसके लिए आप क्या कर रही हैं। क्यों मां, अभी दर्द में कमी तो नहीं है? है क्यों नहीं बेटा! तुमको देखकर दर्द दूर भाग जाता है। श्यामदुलारी ने मधुरता से कहा। – तब तो भाई साहब, आप यहीं मां के पास रहिए। दर्द पास न आवेगा। -माधुरी ने कहा। लेकिन बबिरिनिा! और लोग क्या करेंगे? कुंवर साहब यहीं घर में बैठे रहेंगे, तो जो लोग मिलने-जुलने वाले हैं, वे कहां जाएंगे! ____ -अनवरी ने व्यंग्य से कहा। यह बात श्यामदलारी को अच्छी न लगी। उन्होंने कहा-मैं तो चाहती हैं कि इन्द्र मेरी आखों से ओझल न हो। वह करता ही क्या है मिस अनवरी! शिकार खेलने में ज्यादा मन लगाता है। क्यों, विलायत में इसकी बड़ी चाल है न! अच्छा बेटा! यह मेम साहब कौन है? इनका तो तुमने परिचय ही नहीं दिया। मां, इंग्लैंड में यही मेरा सब प्रबंध करती थी। मेरे खाने-पीने का, पढ़ने-लिखने का, कभी जब अस्वस्थ हो जाता तो डॉक्टरों का, और रात-रात-भर जागकर नियमपूर्वक दवा देने का काम यही करती थी। इनका मैं चिर-ऋणी हूं। इनकी इच्छा हुई कि मैं भारतवर्ष ________________

    देलूंगी।

    इसी से चली आई हैं न! अच्छा बेटा! इनको कोई कष्ट तो नहीं? हम लोग इनके शिष्टाचार से अपरिचित हैं। चौबेजी! आप ही न मेम साहब के लिए…ओ इनका नाम क्या है, यह पूछना तो मैं भूल ही गई।

    मेरा नाम 'शैला' है मां जी! शैला की बोली घंटी की तरह गूंज उठी! श्यामदुलारी के मन में ममता उमड़ आई। उन्होंने कहा-चौबेजी! देखिए, इनको कोई कष्ट न होने पावे। इन्द्रदेव तो लड़का है, वह कभी काहे को इनकी सुविधा की खोज-खबर लेता होगा। जी सरकार! मेम साहब बड़ी चतुर हैं। वह तो कुंवर साहब का प्रबंध स्वयं आदेश देकर कराती रहती हैं। हम लोग तो अभी सीख रहे हैं। बड़े सरकार के समय में जो व्यवस्था थी, उसी से तो अब काम नहीं चल सकता! इन्द्रदेव घबरा गए थे। उन्हें कभी चौबे, कभी अनवरी पर क्रोध आता; पर वह बहाली देते रहे। __ माधुरी ने कहा-अच्छा तो भाई साहब! अभी शहर चलने की इच्छा नहीं है क्या? अब तो यहां कड़ी देहाती सर्दी पड़ेगी। नहीं, अभी तो यहीं रहूंगा। क्यों मां, यहां कोई कष्ट तो नहीं है?—इन्द्रदेव ने पूछा। अनवरी ने कहा-इस छोटी कोठी में साफ हवा कम आती है। और तो कोई…हां, बीबीरानी, मैं यह तो कहना भूल ही गई थी कि मुझे आज शहर चले जाना चाहिए। कई रोगियों को आज ही तक के लिए दवा दे आई हूं। मोटर तो मिल जाएगी न? ठहरिए, आप तो न जाने क्यों घबराई हैं। अभी तो मां की दवा…माधुरी की बात पूरी न होने पाई कि अनवरी ने कहा-दवा खाएगी तो नहीं, यही लगाने की दवा है। लगाते रहिए, मुझे रोक कर क्या कीजिएगा। हां, यहां साफ हवा मिलनी चाहिए, इसके लिए आप सोचिए। __चौबेजी बीच में बोल उठे-तो बड़ी सरकार उस कोठी में रहें, खुले हुए कमरे और दालान उसमें तो हैं ही। बोलने के लिए तो बोल गए; पर चौबेजी कई बातें सोचकर दांत से अपनी जीभ दबाने लगे। उनकी इच्छा तो हुई कि अपने कान भी पकड़ लें; पर साहस न हुआ। इन्द्रदेव चुप रहे। शैला ने कहा-मां जी! बड़ी कोठी में चलिए। यहां न रहिए। -वह बेचारी मूल गई कि श्यामदुलारी उसके साथ कैसे रहेंगी! श्यामदुलारी ने इन्द्रदेव का चेहरा देखा। वह उतरा हुआ तो नहीं था; किंतु उस पर उत्साह भी न था। माधुरी ने शैला को स्वयं कहते हुए जब सुना, तो वह बोली-अच्छा तो है मां! मेम साहब और अनवरी बीबी इसमें आ जाएंगी। हम लोग वहीं चलकर रहें। अनवरी ने कहा-मुझे एक दिन में लौट आने दीजिए। श्यामदुलारी ने देखा कि काम तो हो चला है, अब इस बात को यहीं रोक देना चाहिए। वह बोली-बेटा! कलेक्टर साहब ने नमूने का गांव बसाने का जो नक्शा भेजा था, उसे तुमने देखा? नहीं मां, अभी तो नहीं-शैला के पास वह है। इन्हें गांवों से बड़ा प्रेम है। मैंने इन्हीं के ऊपर यह भार छोड़ दिया है। इसके लिए यही एक योजना तैयार करने में लगी हैं। श्यामदुलरि सावधान हो गईं। शैला ने कहा-मां जी, अभी तो मैं गांवों में जाकर यहां की बातें समझने लगी हूं। फिर भी बहुत-सी बातें अभी नहीं समझ सकी हूं। किसी दिन आपको अवकाश रहे, तो मैं नक्शा ले आऊं?

  • चाँदी की डिबिया

    चाँदी की डिबिया

    Aproximadamente 33.905 palavras.

    चाँदी की डिबिया
    https://hi.wikisource.org/wiki/चाँदी_की_डिबिया

    अंक १

    दृश्य १

    परदा उठता है, और वार्थिविक का नए ढंग से सजा हुआ बड़ा खाने का कमरा दिखाई देता है। खिड़की के परदे खिचे हुए हैं। बिजली की रौशनी हो रही है। एक बड़ी गोल खाने की मेज़ पर एक तश्तरी रक्खी हुई है, जिसमें व्हिस्की, एक नलकी और एक चाँदी की सिगरेट की डिबिया है। आधी रात गुज़र चुकी है।

    वज़ार दकेबाहर कुछ हल चल सुनाई देती है। दरवाज़ा झोंके से खुलता है; जैक वार्थिविक कमरे में इस तरह आता है, मानो गिर पड़ा है।। वह दरवाज़े का कुण्डा पकड़कर खड़ा सामने देख रहा है और आनन्द से मुसकुरा रहा है। वह शाम के कपड़े पहिने हुए है, और वह हैट लगाए हुए है जो तमाशा देखते वक्त लगाई जाती है। उसके हाथ में एक नीले रंग का मख़मल का ज़नाना बटुआ है। उसके लड़कोंधे चेहरे पर ताज़गी झलक रही है। डाढ़ी और मूँछ मुड़ी हुई है। उसके वाजू पर एक ओवरकोट लटक रहा है।

    जैक

    अहा! मैं मज़े से घर पहुँच गया–

    [विवाद के भाव से]

    कौन कहता है, कि मैं बिना मदद के दरवाजा नहीं खोल सकता था?

    [वह लड़खड़ाता है, बटुए को झुलाता हुआ अन्दर आता है। एक ज़नाना रूमाल और लाल रेशम की थैली गिर पड़ती है।]

    खूब झाँसा दिया–सभी चीज़ गिरी पड़ती हैं। कैसा चकमा दिया है चुड़ैल को, उसका बेग साफ़ उड़ा लाया,

    [बटुए को झुलाता है।]

    खूब झाँसा दिया,

    [चाँदी की डिबिया से एक सिगरेट निकाल कर मुँह में रख लेता है।]

    उस गधे को कभी कुछ नहीं दिया!

    [अपनी जेब टटोलता है और एक शिलिङ्ग बाहर निकालता है। वह उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है, और लुढ़क जाती है। वह उसे खोजता है।]

    इस शिलिंग का बुरा हो!

    [फिर खोजता है।]

    एहसान को भूलना नीचता है ! मगर कुछ भी नहीं,

    [वह हँसता है।]

    मैं उससे कह दूँगा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है।

    [वह दरवाज़े से रगड़ता हुआ निकलता है, और दालान से होता दुआ , ज़रा देर लौट आता है। उसके पीछे-पीछे जोन्स आता है, जो नशे में चूर है। जोन्स की उम्र लगभग तीस साल है। गाल पिचके हुए, आँखों के गिर्द गड्ढे पड़े हुए, कपड़े फटे हुए हैं, वह इस तरह ताकता है जैसे बेकार हो और पिछलगुए की भाँति कमरे में आता है।]

    जैक

    शिः और चाहे जो कुछ करो मगर शोर मत करना। दरवाज़ा बन्द कर दो और थोड़ी-सी पियो।

    [बड़ी गंभीरता से।]

    तुमने मुझे दरवाज़ा खोलने मैं मदद दी–मगर मेरे पास कुछ है नहीं। यह मेरा घर है, मेरे बाप का नाम वार्थिविक है–वह पार्लिमेंट का मेम्बर हैं उदार–मेम्बर है। यह मैं तुमसे पहिले ही बता चुका। थोड़ी–सी पियो

    [वह शराब ढालता है, और पी जाता है।]

    मुझे नशा नहीं है,

    [सोफा पर लेटकर।]

    कोई हर्ज नहीं। तुम्हारा क्या नाम है? मेरा नाम वार्थिविक है, मेरे बाप का भी यही नाम है; मैं भी लिबरल हूँ।–तुम क्या हो?

    जोन्स

    [भारी तेज़ आवाज़ में।]

    मैं तो पक्का 'अनुदार' हूँ। मेरा नाम है जोन्स। मेरी बीबी यहाँ काम करती है; वह मज़दूरनी है, यहाँ काम करती है।

    जैक

    जोन्स?

    [हँसता है।]

    एक दूसरा जोन्स मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता है। मैं खुद साम्यवादी नहीं हूँ। मैं लिबरल हूँ।–दोनों में बहुत कम अन्तर है। क्योंकि लिबरल दल के सिद्धान्त ही ये हैं। हम सब क़ानून के सामने बराबर हैं–बेहूदी बात है, बिलकुल वाहियात,

    [हँसता है।]

    मैं क्या कहने जा रहा था। मुझे थोड़ी सी व्हिस्की दो।

    [जोन्स उसे व्हिस्की देता है, और नलकी से पानी का छींटा मारता है।]

    मैं तुमसे यह कहने जा रहा था, कि मेरी उससे तकरार हो गई।

    [बटुए को झुलाता है।]

    थोड़ी सी पीलो जोन्स–तुम्हारे बग़ैर यह काम ही न हो सकता–इसी से मैं तुम्हें पिला रहा हूँ। अगर कोई जान भी जाय, कि मैंने उसके रुपये उड़ा दिए, तो क्या परवा। चुडैल!

    [सोफ़ा पर पैर रख लेता है। ]

    शोर मत करो और जो चाहे सो करो। शराब उंडेलो और ख़ूब डटकर पियो। सिगरेट लो, जो चाहे सो लो। तुम्हारे बग़ैर वह हरगिज़ न फँसती।

    [ आँखे बन्द करके। ]

    तुम टोरी हो, मैं ख़ुद लिबरल हूं, थोड़ी-सी पियो।-मैं बड़ा बाँका आदमी हूँ।

    [उसका सिर पीछे की तरफ़ लटक जाता है, वह मुसकुराता हुआ सो जाता है, और जोन्स खड़ा होकर उसकी तरफ़ ताकता है; तब जैक के हाथ से गिलास छीनकर पी जाता है। वह बटुए को जैक की कमीज़ के सामने से उठा लेता है। उसे रोशनी में देखता है और सूँघता है।]

    जोन्स

    जआ किसी अच्छे आदमी का मुँह देखकर उठा था। [ जैक के सामने की जेब में उसे ठूस देता है ]

    जैक

    [ बड़बड़ाता हुआ। ]

    चुडैल! कैसा चकमा दिया।

    [ जैक चारों तरफ़ कनखियों से देखता है, वह व्हिस्की उँडेलकर पी जाता है तब चाँदी की डिबिया से एक सिगरेट निकाल कर दो एक दम लगाता है, और व्हिस्की पीता है फिर उसे बिलकुल होश नहीं रहता।]

    जोन्स

    बड़ी अच्छी-अच्छी चीज़ें जमा की हैं,

    [ वह ज़मीन पर पड़ी हुई लाल थैली को देखता है। ]

    है माल बढ़िया।

    [ वह उसे ऊँगली से छूता है, किश्ती में रख देता है और जैक की तरफ ताकता है। ]

    है मोटा आसामी।

    [ वह आईने में अपनी सूरत देखता है। अपने हाथ उठाकर और उंगलियों को फैलाकर वह उसकी तरफ़ झुकता है; तब फिर मुट्ठी बांँधकर जैक की तरफ ताकता है, मानो नींद में उसके मुसकुराते हुए चेहरे पर घूंसा मारना चाहता है। एकाएक वह बाक़ी बची हुई ह्विस्की ग्लास में उँडेलता है और पी जाता है। तब कपटमय हर्ष के साथ वह चाँदी की डिबिया और थैली उठाकर जेब में रख लेता है। ]

    बचा मैं तुम्हें चरका दूंँगा। इस फेर में न रहना।

    [ गुरगुराती हुई हँसी के साथ वह दरवाज़े की ओर लड़खाता हुआ जाता है। उसका कंधा स्विच से टकरा जाता है, रोशनी बुझ जाती है। किसी बन्द होते हुए दरवाज़े की आवाज़ सुनाई देती है। ]

    परदा गिरता है।

    परदा फिर तुरन्त उठता है।

    दृश्य २

    [ वार्थिविक का खाने का कमरा। जैक अभी तक सोया हुआ है। सुबह की रौशनी परदों से होकर आ रही हैं। सुबह की रोशनी परदों से होकर आ रही है। समय साढ़े आठ बजे का है। ह्वीलर जो एक फुर्तीली औरत है, कूड़े की टोकरी लिये आती है। और मिसेज़ जोन्स आहिस्ता-आहिस्ता कोयले की टोकरी लिए दाख़िल होती है। ]

    ह्वीलर

    [ परदा उठाकर ]

    जब तुम कल चली गईं, तो वह तुम्हारा निखट्ट शौहर तुम्हारी टोह में चक्कर लगा रहा था। मैं समझती हूँ, शराब के लिए तुमसे रुपया मांँग रहा था। वह आध घंटे तक यहाँ कोने में पड़ा रहा। जब मैं कल रात को डाक लेने गई तो मैंने उसे होटल के बाहर खड़े देखा। अगर तुम्हारी जगह में होती, तो कभी उसके साथ ने रहती। मैं कभी ऐसे आदमी के साथ न रहती, जो मुझ पर हाथ साफ़ करता। मुझसे यह बरदाश्त ही न होता। तुम लड़कों को लेकर क्यों नहीं उसे छोड़ देती हो? अगर तुम यह बरदाश्त करती रहोगी, तो वह और भी सिर चढ़ जायगा। मेरी समझ में नहीं अाता, कि महज़ शादी कर लेने से कोई आदमी क्यों तुम्हें दिक़ करे।

    मिसेज़ जोन्स

    [ काली आँखें और काले बाल, चेहरा अण्डाकार, आवाज़ चिकनी, नर्म और मीठी। सूरत से सहनशील मालूम होती है। उदासी से बातें करती है। वह नीले रंग का कपड़ा पहिने हुए है और उसके जूते में सूराख़ हैं। ]

    वह आधी रात को घर आया और अपने होश में न था। उसने मुझे जगाया और पीटने लगा। उसे सिर पैर की कुछ ख़बर ही नहीं मालूम होती थी। मैं उसे छोड़ना तो चाहती हूँ, मगर डरती हूँ, न मालूम मेरे साथ क्या करे। जब वह नशे में होता है, तो उसके क्रोध का वारापार नहीं रहता।

    ह्वीलर

    तुम उसे क़ैद क्यों नहीं करा देतीं? जब तक तुम उसे बड़े घर न पहुँचा दोगी, तुम्हें चैन न मिलेगा। अगर मैं तुम्हारी जगह होती, तो कल ही पुलीस में इत्तला कर देती। वह भी समझता कि किसी से पाला पड़ा था।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ मुझे जाना तो चाहिए, क्योंकि जब वह नशे में होता है तो मेरे साथ बुरी तरह पेश आता है। लेकिन बहिन! बात यह है कि उन्हें आजकल बड़ा कष्ट है।—दो महीने से घर बैठे हुए हैं। और यही फ़िक्र उन्हें सता रही है। जब कहीं मजूरी लग जाती है, तब वह इतना उजडुपन नहीं करते। जब ठाले बैठते हैं तभी उनके सिर भूत सवार होता है।

    ह्वीलर

    अगर तुम हाथ पैर न हिलाओगी, तो उससे गला न छूटेगा।

    मिसेज़ जोन्स

    अब यह दुर्गति नहीं सही जाती; मुझे रात-रात भर जागते गुज़र जाती है। और यह भी नहीं है कि कुछ कमाकर लाता हो क्योंकि घर का सारा बोझ मेरे सिर है। ऐसी-ऐसी गालियाँ देता है, क्या कहूँ। कहता है कि तू शुहदों को साथ लिये फिरती है। बिलकुल झूठी बात है, मुझसे कोई आदमी नहीं बोलता, हाँ, वह ख़ुद औरतो के पीछे पड़ा रहता है। उसकी इन्हीं सब बातों से मेरा जी जला करता है। मुझे धमकाता है, कि अगर तुमने मुझे छोड़ा तो सिर काट लूँगा। यह सब शराब और चिंता का फल है। हाँ, यों आदमी वह बुरा नहीं है। कभी-कभी वह मुझसे मीठी-मीठी बातें करता है, लेकिन मैंने उसके हाथों इतने दुःख भोगे हैं कि उसकी मीठी बातें भी बुरी लगती हैं। मैं तो उसकी बातों का जबाब तक नहीं देती। जब नशे में नहीं होता, तो लड़कों से भी प्रेम करता है।

    ह्वीलर

    तुम्हारा मतलब है, जब वह नशे में होता है?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ

    [उसी स्वर में।]

    वह छोटे साहब सोफ़ा पर सोए हुए हैं।

    [ दोनों चुपचाप जैक की तरफ़ ताकती हैं।]

    मिसेज जोन्स

    [ नर्म आवाज़ में। ]

    मालूम होता है, नशे में हैं।

    ह्वीलर

    शुहदा है, शुहदा, मुझे विश्वास है, कि तुम्हारे शौहर की तरह इसने भी रात को पी थी। इसकी बेकारी एक दूसरी ही तरह की है, जिसमें पीने ही की सूझती है। जाकर मारलो से कह आऊँ, यह उसका काम है।

    [ वह चली जाती है ]

    [ मिसेज़ जोन्स झुककर धीरे-धीरे झाड़ू देने लगती है।]

    जैक

    [ जाग कर। ]

    कौन है? क्या बात है?

    मिसेज़ जोन्स

    मैं हूँ सरकार, मिसेज़ जोन्स।

    जैक

    [ ठउ बैठता है, और चारों तरफ़ ताकता है। ]

    मै कहाँ हूं? क्या वक्त है?

    मिसेज़ जोन्स

    नौ का अमल होगा हुज़ूर। नौ

    जैक

    नौ! क्यों? क्या?

    [ उठकर ज़बान चलाता है और सिर पर हाथ फेरकर मिसेज़ जोन्स की तरफ़ घूरकर देखता है। ]

    देखो तुम मिसेज़ जोन्स, यह न कहना कि तुमने मुझे यहाँ सोते पाया।

    मिसेज़ जोन्स

    न कहूँगी, न कहूँगी सरकार।

    जैक

    इत्तफ़ाक की बात है! मुझे याद नहीं आता कि मैं यहाँ कैसे सो गया। शायद मैं चारपाई पर जाना भूल गया। अजीब बात है। मारे दर्द के सिर फटा जाता है। देखो मिसेज़ जोन्स, किसी से कुछ कहना मत।

    [ बाहर जाता है ड्योढ़ी में मारलो से मुठभेड़ होती है। मारलो जवान और गंभीर है। उसकी डाढ़ी मूँछ साफ़ है, और बाल माथे की तरफ़ से कंघी करके मुरगे की कलगी की तरह ऊपर उठा दिए गए हैं। है तो वह ख़ानसामा, लेकिन अच्छे चाल चलन का आदमी है। वह मिसेज़ जोन्स को देखता है, और ओंठ दबाकर मुसकुराता है। ]

    मारलो

    पहिली बार नहीं पी है, और न अंतिम बार ही है। ज़रा कुछ बौखलाया हुआ मालूम होता था क्यों मिसेज़ जोन्स?

    मिसेज़ जोन्स

    अपने होश में न थे, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया।

    मारलो

    तुम्हारी तो आदत पड़ी हुई है। तुम्हारे शौहर का क्या हाल है?

    मिसेज़ जोन्स

    [ नर्म आवाज़ से ]

    कल रात को तो उन की हालत अच्छी न थी। कुछ सिर पैर की ख़बर ही न थी। बहुत रात गए आए, और गालियाँ बकते रहे। लेकिन इस वक़्त सो रहे हैं।

    मारलो

    इसी तरह मज़दूरी ढूॅंढ़ी जाती है, क्यों?

    मिसेज जोन्स

    उनकी आदत तो यह है, कि रोज़ सवेरे काम की तलाश में निकल जाते हैं। और कभी-कभी इतने थक जाते हैं कि घर आते ही गिर पड़ते हैं। भला यह कैसे कहूँ कि वह काम नहीं खोजते। ज़रूर खोजते हैं। रोजगार मंदा है।

    [ वह टोकरी और झाड़ू सामने रक्खे चुप चाप खड़ी हो जाती है। ज़िन्दगी की अगली पिछली बातें किसी वन्य दृश्य की भाँति उसकी आखों के सामने आने लगती है, और वह उन्हें स्थिर, उदासीन नेत्रों से देखती है। ]

    लेकिन मेरे साथ वह बुरी तरह पेश आते हैं। कल रात उन्हों ने मुझे पीटा और ऐसी ऐसी गालियां दीं कि रोंगटे खड़े होते हैं।

    मारलो

    बैंक की छुट्टी थी, क्यों? उसे होटल का चस्का पड़ गया है। यही बात है। मैं उसे रोज़ बड़ी रात तक कोने में बैठे देखता हूँ। वहीं

    फिरा करता है।

    मिसेज़ जोन्स

    काम की खोज में दिन भर दौड़ते-दौड़ते बहुत थक जाते हैं। और कहीं कोई दूसरा रोज़गार भी नहीं मिलता, इसलिए अगर एक घूँट भी पी लेते हैं, तो सीधे दिमाग़ पर चढ़ जाती है। लेकिन जिस तरह वह मेरे साथ पेश आते हैं, उस तरह अपनी बीबी के साथ न पेश आना चाहिए। कभी-कभी तो वह मुझे घर से निकाल देते हैं। और मैं सारी रात मारी-मारी फिरती हूँ। वह मुझे घर में घुसने भी नहीं देते। पीछे से पछताते हैं। और वह मेरे पीछे-पीछे लगे रहते हैं, गलियों में मुझ पर ताक लगाए रहते हैं, उन्हें ऐसा न चाहिए, क्योंकि मैंने कभी उनके साथ दगा नहीं की। और मैं उन से कहती हूँ, कि मिसेज़ बार्थिविक को तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता। लेकिन इस पर उन्हें क्रोध आ जाता है, और वह अमीरों को गालियाँ देने लगते हैं। उनकी नौकरी भी इसी वजह से छूटी, कि वह मुझे बुरी तरह सताते थे। तबसे वह अमीरों के जानी दुशमन हो गये हैं। उन्हें देहात में सईसी की अच्छी जगह मिल गई थी। लेकिन जब मुझे मारने-पीटने लगे, तो बदनाम हो गए।

    मारलो

    सज़ा हो गई?

    मिसेज़ जोन्स

    हां; मालिक ने कहा, मैं ऐसे आदमी को नहीं रक्खूँगा, जिसकी लोग इतनी निन्दा करते हैं। उसने यह भी कहा कि इसकी देखादेखी और लोग भी ऐसा ही करेंगे। लेकिन यहाँ का काम

    छोड़ दूँ तो मेरा निबाह न हो। मेरे तीन बच्चे हैं। और मैं नहीं चाहती कि वह मेरे पीछे-पीछे गलियों में घूमें और शोर ग़ुल मचाएँ।

    मारलो

    [ खाली बोतल को ऊपर उठाकर ]

    एक बूंद भी नहीं! अगर अबको तुम्हें मारे, तो एक गवाह लेकर सीधे कचहरी चली जाना।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ मैंने ठान लिया है। ज़रूर जाऊँगी।

    मारलो

    हूँ! सिगरेट की डिबिया कहाँ है ?

    [ वह चांदी की डिबिया ढूंढता है । मिसेज़ जोन्स की तरफ देखता है, जो हाथों और घुटनों के बल झाडू दे रही है, वह रुक जाता है, और खड़ा-खड़ा कुछ सोचने लगता है। वह तश्तरी में से दो अधजले सिगरेट उठा लेता है, और उनके नाम पढ़ता है। ]

    नेस्टर—डिबिया कहाँ चली गई?

    [ वह विचारपूर्ण भाव से फिर मिसेज़ जोन्स को देखता है, और जैक का ओवरकोट लेकर जेबें टटोलता है। ह्वीलर नाश्ते की तश्तरी लिए आती है। ]

    मारलो

    [ ह्वीलर से अलग ]

    तुमने सिगरेट की डिबिया देखी है?

    हीलर

    नहीं।

    मारलो

    तो वह गा़यब हो गई। मैंने रात उसे तश्तरी में रख दिया था, और उन्होंने सिगरेट पिया भी।

    [ सिगरेट के जले हुए टुकड़े दिखाकर ]

    इन जेबों में नहीं है। आज ऊपर कब ले गए? जब वह नीचे आयें तो उनके कमरे में खूब तलाश करना। यहाँ कौन-कौन आया था?

    हीलर

    अकेली मैं और मिसेज़ जोन्स।

    मिसेज जोन्स

    यह कमरा तो हो गया, क्या बैठक भी साफ़ कर लूँ?

    ह्वीलर

    [ उसे सन्देह से देखकर ]

    तुमने देखा है? पहिले इस छोटी कोठरी को साफ़ कर दो।

    [ मिसेज़ जोन्स टोकरी और ब्रुश लिए बाहर चली जाती है, मारलो और ह्वीलर एक दूसरे के मुँह की ओर ताकते हैं ]

    मारलो

    पता तो चल ही जायगा।

    ह्वीलर

    [ हिचकिचाकर ]

    ऐसा तो नहीं हुआ है कि उसने—

    [ द्वार की ओर देखकर सिर हिलाती है। ]

    मारलो

    [ दृढ़ता से ]

    नहीं, मैं किसी पर संदेह नहीं करता।

    हीलर

    लेकिन मालिक से तो कहना ही पड़ेगा।

    मारलो

    जरा ठहरो, शायद मिल ही जाय, हमें किसी पर संदेह न करना चाहिए। यह बात मुझे पसन्द नहीं।

    परदा गिरता है।

    तुरन्त ही फिर परदा उठता है।

    दृश्य ३

    [ बार्थिविक और मिसेज़ बार्थिविक मेज़ पर बैठे नाश्ता कर रहे हैं, पति की उम्र ५० और ६० के बीच में है। चेहरे से ऐसा मालूम होता है, कि अपने को कुछ समझता है। सिर गंजा है, आँखों पर ऐनक है, और हाथ में टाइम्स पत्र है। स्त्री की उम्र ५० के लगभग होगी। अच्छे कपड़े पहिने हुए हैं। बाल खिचड़ी हो गए हैं। चेहरा सुन्दर है, मुद्रा दृढ़ है। दोनों आमने-सामने बैठे हैं। ]

    बार्थिविक

    [ पत्र के पीछे से ]

    बार्नसाइड के बाई इलेक्शन में मजूर दल का आदमी आ गया प्रिये।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मजूर दल का दूसरा आदमी आ गया! समझ में नहीं आता लोग क्या करने पर तुले हुए हैं।

    बार्थिविक

    मैंने तो पहिले ही कहा था। मगर इससे होता क्या है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    वाह! तुम इन बातों को इतनी तुच्छ क्यों समझते हो। मेरे लिए तो यह आफ़त से कम नहीं। और तुम और तुम्हारे लिबरल भाई इन आदमियों को और शह देते हैं।

    बार्थिविक

    [ भौहें चढ़ाकर ]

    सब दलों के प्रतिनिधियों का होना उचित सुधार के लिए ज़रूरी है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम्हारे सुधार की बात सुनकर मेरा जी जल उठता है। समाज सुधार की सारी बातें पागलों का सी हैं। हम खूब जानते हैं कि उनका क्या मंशा है। वे सब कुछ अपने लिए चाहते हैं। ये साम्यवादी और मजूर दल के लोग परले सिरे के मतलबी हैं; न उनमें देशभक्ति है। ये सब ऊँचे दरजे के लोग हैं। वे भी वही चाहते हैं, जो हमारे पास मौजूद है।

    बार्थिविक

    जो हमारे पास है वह चाहते हैं!

    [ आकाश की ओर देखता है ]

    तुम क्या कहती हो प्रिये?

    [ मुँह बनाकर ]

    मैं कान के लिये कौवे के पीछे दौड़नेवालों में नहीं हूं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मलाई दूँ? सबके सब बौखल हैं। देखते जाव थोड़े दिनों में हमारी पूंजी पर टैक्स लगेगा। मुझे तो विश्वास है, कि वह हर एक चीज पर कर लगा देंगे। उन्हें देश का तो कोई ख़याल ही नहीं। तुम लिबरल और कंज़रवेटिव सब एक से हो। तुम्हें नाक के आगे तो कुछ दिखाई ही नहीं देता। तुममें ज़रा भी विचार नहीं है। तुम्हें चाहिए कि आपस में मिल जाव, और इस अँखुए को ही उखाड़ दो।

    बार्थिविक

    बिलकुल वाहियात बक रही हो। यह कैसे हो सकता है कि लिबरल और कंजरवेटिव मिल जाँय। इससे मालूम होता है कि औरतों के लिए यह कितनी—लिबरलों का सिद्धांत ही यह है, कि जनता पर विश्वास किया जाय।

    मिसेज़ बार्थिविक

    चुपके से नाश्ता करो जॉन, मानो तुममें और कंज़रवेटिवों में बड़ा भारी फर्क है। सभी बड़े आदमियों के एक ही सिद्धांत और एकही स्वार्थ होते हैं।

    शांत होकर

    उफ़! तुम ज्वालामुखी पर बैठे हो जोन ।

    बार्थिविक

    क्या!

    मिसेज़ बार्थिविक

    मैं ने कल पत्र में एक चिट्ठी पढ़ी थी, उस आदमी का नाम भूलती हूँ, लेकिन उसने सारी बातें खोलकर रख दी थीं। तुम लोग किसी बात की असलियत नहीं समझते।

    बार्थिविक

    हूँ! ठीक।

    [ भारी स्वर से ]

    मैं लिबरल हूँ, इस विषय को छोड़ो।

    ' मिसेज़ बार्थिविक

    टोस्ट दूँ? मैं इस आदमी के विचारों से सहमत हूँ! शिक्षा, नीची श्रेणी के आदमियों को चौपट कर रही है। इस से उनका सिर फिर जाता है, और यह सभी के लिये हानिकर है। मैं नौकरों के रंग ढंग में अब वह बात ही नहीं पाती।

    बार्थिविक

    [ कुछ संदेह के साथ ]

    अगर तबदीली से कोई अच्छी बात पैदा हो जाय, तो मैं उसका स्वागत करने को तैयार हूँ।

    [ एक ख़त खोलता है ]

    अच्छा, मास्टर जैक का कोई नया मामला है, "हाई स्ट्रीट आक्सफ़ोर्ड। महाशय, हमारे पास मि०। जान बार्थिविक की ४० पौंड की हुन्डी आयी है।" अच्छा यह ख़त उसके नाम है! "हम अब इस चेक को भेजते हैं, जो आपने हमारे यहां भुनाया था, पर जैसा मैं अपने पहले पत्र में लिख चुका हूँ, जब वह आपके बैंक में भेजा गया तो उन लोगों ने उसे नहीं सकारा। भवदीय मास एंड सन्स, टेलर्स।" ख़ूब!

    [ चेक को ध्यान से देखकर ]

    है मज़ेदार बात! इस लौंडे पर तो मुक़दमा चल सकता है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    जाने भी दो जान, जैक की नीयत बुरी न थी। उसने यही समझा होगा कि मैं कुछ रुपए ऊपर ले रहा हूँ। मेरा अब भी यही ख़याल है कि बैंक को वह चेक भुना देना चाहिए था। उन लोगों को मालूम होगा कि तुम्हारी कितनी साख है।

    बार्थिविक

    [ पत्र और चेक को फिर लिफ़ाफ़े में रखकर ]

    अदालत में लाला की आँखें खुल जातीं।

    [ जैक आ जाता है। उसे देखते ही वह चुप हो जाता है, वास्केट के बटन बंद कर लेता है। ठुड्डी पर अस्तुरा लग गया है। उसे दबा लेता है।]

    जैक

    [ उन दोनों के बीच में बैठकर और प्रसन्न मुख बनने की इच्छा करके ] खेद है मुझे देर हो गई

    [ प्यालों को अरुचि से देखकर ]

    अम्मा, मुझे तो चाय दीजिए। मेरे नाम का कोई ख़त है?

    [ बार्थिविक उसे ख़त दे देता है ]

    यह क्या बात है, इसे खोल किसने डाला? मैं आप से कह चुका मेरे ख़तो

    बार्थिविक

    [ लिफ़ाफ़े को छूकर ]

    मेरा ख़याल है कि यह मेरा ही नाम है।

    जैक

    [ खिन्न होकर ]

    आप ही का नाम तो मेरा भी नाम है। इसे मैं क्या करूँ।

    [‌ ख़त पढ़ता है और बड़बड़ाता है ]

    बदमाश!

    वार्थिविक

    [ उसे देखकर ]

    तुम इतने सस्ते छूटने के लायक़ नहीं हो।

    जैक

    क्या अभी आप मुझे काफ़ी नहीं कोस चुके!

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्यों उसे दिक़ करते हो जॉन? कुछ नाश्ता कर लेने दो।

    बार्थिविक

    अगर मैं न होता तो जानते हो तुम्हारी क्या दशा होती? यह संयोग की बात है—-मान लो तुम किसी ग़रीब आदमी या क्लर्क के बेटे होते। ऐसा चेक भुनाना जिसे तुम जानते हो कि चल न सकेगा, क्या कोई मामूली बात है! तुम्हारी सारी ज़िंदगी बिगड़

    ३

    जाती। अगर तुम्हारे यही ढंग हैं, तो ईश्वर ही

    मालिक है। मैं तो ऐसी बातों से हमेशा दूर रहा।

    जैक

    आपके हाथ में हमेशा रुपए रहते होंगे। अगर आपके पास रुपए का ढेर हो तो फिर इसकी ज़रूरत —

    जॉन

    मेरी हालत ठीक इसकी उलटी थी। मेरा बाप कभी मुझे काफ़ी रुपए न देता था।

    जैक

    आपको कितना मिलता था?

    जॉन

    इसमें कोई सार नहीं। सवाल है, क्या तुम अनुभव करते हो कि तुमने कितना बड़ा अपराध किया है।

    जैक

    यह सब मैं कुछ नहीं जानता। हाँ अगर आपका

    खयाल है कि मैंने बेजा किया तो मुझे दुःख है। मैं तो यह पहले ही कह चुका। अगर मैं पैसे पैसे को मुहताज न होता तो कभी ऐसा काम न करता।

    बार्थिविक

    चालीस पौंड में से अब कितने बच रहे?

    जैक

    १ ॥ [हिचकता हुआ]

    ठीक याद नहीं, मगर ज़्यादा नहीं है।

    बार्थिविक

    आख़िर कितना?

    जैक

    [उद्दंडता से]

    एक पैसा भी नहीं बचा।

    बार्थिविक

    क्या?

    जैक

    मारे दर्द के सिर फटा जाता है

    [अपने हाथ पर सिर झुका लेता है]

    मिसेज बार्थिविक

    सिर में दर्द कब से होने लगा बेटा? कुछ नाश्ता तो कर लो।

    जैक

    [सांस खींचकर]

    बड़ा दर्द हो रहा है!

    मिसेज बार्थिविक

    क्या उपाय करूँ? मेरे साथ आओ बेटा! मैं तुम्हें ऐसी चीज़ खिला दूंगी कि सारा दर्द तुरन्त जाता रहेगा।

    [दोनों कमरे से चले जाते हैं; और बार्थिविक ख़त को फाड़कर अँगेठी में डाल देता है। इतने में मारलो आ जाता है और चारों ओर आँखें दौड़ा कर जाना चाहता है।]

    बार्थिविक

    क्या है मारलो? क्या खोज रहे हो?

    मारलो

    मि० जॉन को देख रहा था।

    बार्थिविक

    मि० जॉन से क्या काम है?

    मारलो

    मैंने समझा शायद यहां हों।

    बार्थिविक

    [सन्देह के भाव से ]

    हाँ, लेकिन उनसे तुम्हें काम क्या है?

    मारलो

    [ लापरवाई से ]

    एक औरत आई है। कहती है उनसे कुछ कहना चाहती हूँ।

    बार्थिविक

    औरत! इतने सवेरे! कैसी औरत है?

    मारलो

    [ स्वर से बिना कोई भाव प्रकट किए हुए ]

    कह नहीं सकता हज़ूर। कोई खास बात नहीं। मुमकिन है कुछ मांगने आई हो। मेरा ख़याल है कोई ख़ैरात मांगनेवाली है।

    बार्थिविक

    क्या उन औरतों के से कपड़े पहने है?

    मारलो

    जी नहीं, मामूली कपड़े पहने है।

    बार्थिविक

    कुछ मांगना चाहती है?

    मारलो

    जी नहीं।

    वार्थिविक

    तुम उसे कहाँ छोड़ आए हो?

    मारलो

    बड़े कमरे में हुजूर!

    बार्थिविक

    बड़े कमरे में! तुम कैसे जानते हो कि वह चोरनी नहीं है? घर की कुछ टोह लेने आई हो?

    मारलो

    मुझे ऐसी तो नहीं मालूम होती।

    वार्थिविक

    ख़ैर, यहां लाओ। मैं खुद उससे मिलूँगा। मारलो चुपके से सिर हिलाकर भय प्रकट करता चला जाता है। ज़रा देर में एक पीले मुख की युवती को साथ लिए लौटता है। उसकी आँखें काली हैं, चेहरा सुन्दर, कपड़े तरहदार हैं, और काले रंग के। लेकिन कुछ फूहड़ है। सिर पर एक काली टोपी है जिस पर सुफेद किनारी है। उस पर परमा के बैंजनी फूलों का एक गुच्छा बेढंगेपन से लगा हुआ है। मि० बार्थिविक को देखकर वह हक्काबक्का हो जाती है। मारलो चला जाता है। ]

    अपरिचित स्त्री

    अरे! क्षमा कीजिएगा। कुछ भूल हो गई है।

    [ वह जाने के लिए घूमती है ]

    बार्थिविक

    आप किससे मिलना चाहती हैं श्री मती जी?

    अपरिचित

    [ रुककर और पीछे की ओर देखकर ]

    मैं मि० जान बार्थिविक से मिलना चाहती थी।

    बार्थिविक

    जान बार्थिविक तो मेरा ही नाम है श्रीमती जी। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?

    अपरिचित

    जी—मैं यह नहीं—

    [ आँखें झुका लेती है बार्थिविक उसे ध्यान से देखता है और ओठों को सिकोड़ता है। ]

    बार्थिविक

    शायद आप मेरे बेटे से मिलना चाहती हैं?

    अपरिचित

    [ जल्दी से]

    हाँ हाँ, यही बात है।

    बार्थिविक

    पूछ सकता हूँ कि मुझे किससे बातें करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है?

    अपरिचित

    [ उसके मुख पर विनय और आग्रह का भाव दिखाई देता है ]

    मेरा नाम है—मगर ज़रूरत ही क्या है। मैं झमेला नहीं करना चाहती। मैं ज़रा एक मिनट के लिये आपके बेटे से मिलना चाहती हूँ।

    [ साहस से ]

    सच तो यह है कि मेरा उनसे मिलना बहुत ज़रूरी है।

    बार्थिविक

    [ अपनी बेचैनी को दबाकर ]

    मेरे बेटे की तो आज तबीयत कुछ ख़राब है। अगर ज़रूरत हो तो मैं आपका काम कर सकता हूँ। आप अपनी ज़रूरत बयान करें।

    अपरिचित

    जी—लेकिन मेरा उनसे मिलना ज़रूरी है। मैं इसी इरादे से आई हूँ। मैं कोई झमेला नहीं करना चाहती, लेकिन बात यह है—रात को—आपके बेटे ने उड़ादी—उन्होंने मेरी—

    [ रुक जाती है ]

    बार्थिविक

    [ कठोर स्वर में ]

    हाँ हाँ कहिए, क्या?

    अपरिचित

    वह मेरा—बटुआ उठा ले गए।

    बार्थिविक

    आपका बटु…..

    अपरिचित

    मुझे बटुए की चिन्ता नहीं है। उसकी मुझे ज़रूरत नहीं। मैं सच कहती हूँ मेरा इरादा बिलकुल नहीं है कि कोई झमेला हो।

    [ उसका चेहरा काँपने लगता है ]

    लेकिन—लेकिन—मेरे सब रुपए उसी बटुए में थे।

    बार्थिविक

    किस चीज़ में—किस चीज़ में?

    अपरिचित

    मेरे बटुए में एक छोटी सी थैली में रखे हुए थे। लाल रंग की रेशमी थैली थी। सच कहती हूँ, मैं न आती—मैं कोई झमेला नहीं करना चाहती। लेकिन मुझे रुपए मिलने चाहिए, कि नहीं?

    बार्थिविक

    क्या आपका यह मतलब है कि मेरे बेटे ने—?

    अपरिचित

    जी समझ लीजिए, वह अपने……..मेरा यह मतलब कि वह–

    बार्थिविक

    मैं आपका मतलब नहीं समझा।

    अपरिचित

    [ अपने पैर पटककर मोहक भाव से मुसकुराती है ]

    ओह! आप समझते नहीं—वह पिए हुए थे। मुझसे तकरार हो गई।

    बार्थिविक

    [ इसे बेशर्मी की बात समझकर ]

    कैसे? कहाँ?

    अपरिचित

    [ निःशंक भाव से ]

    मेरे घर पर। वहां एक दावत थी, और आपके सुपुत्र—

    बार्थिविक

    [ घंटी बजाकर ]

    मैं पूछ सकता हूँ कि आपको यह घर कैसे मालूम हुआ? क्या उसने अपना नाम और पता बतला दिया था?

    अपरिचित

    [ नज़र फेरकर ]

    मैंने उनके ओवर कोट से निकाल लिया।

    बार्थिविक

    [ ताने की मुसकुराहट के साथ ]

    अच्छा! आपने उसके ओवरकोट से निकाल लिया। वह इस वक्त इस प्रकाश में आपको पहचान जायगा?

    अपरिचित

    पहचान जायगा? क्या इसमें भी कोई शक है।

    [ मारलो आता है। ]

    बार्थिविक

    मि० जॉन से कहो नीचे आवें।

    [ मारलो चला जाता है और बार्थिविक बेचैन होकर कमरे में टहलने लगता है ]

    आपकी और उसकी जान पहचान कितने दिन से है?

    अपरिचित

    केवल—केवल गुडफ्रा़इडे से।

    बार्थिविक

    मेरी समझ में नहीं आता, मैं फिर कहता हूँ, मेरी समझ में नहीं आता—-

    [ वह अपरिचित स्त्री को कनखियों से देखता है, जो आँखें नीची किए खड़ी हाथ मल रही है। इतने में जैक आ जाता है। उसे देखकर वह ठिठक जाता है और अपरिचित स्त्री सनकियों की भांति खिलखिला पड़ती है। सन्नाटा छा जाता है ]

    बार्थिविक

    [ गंभीरता से ]

    यह युवती––महिला कहती हैं कि गई रात को—क्यों श्रीमती जी, गई रात को ही न—तुमने इनकी कोई चीज़ उठाली—

    अपरिचित

    [ आतुरता से ]

    मेरा बटुआ ओर मेरे सब रुपए उसी लाल रेशमी थैली में थे।

    जैक

    बटुआ?

    [ इधर उधर ताकता है कि निकल भागने का मौक़ा कहीं है ]

    मैं बटुआ क्या जानूँ।

    बार्थिविक

    [ तेज़ आवाज़ में ]

    घबड़ाओ मत। तुम्हें गई रात को इन श्रीमती जी से मिलने से इनकार है?

    जैक

    इनकार! इनकार क्यों होने लगा?

    [ स्त्री से धीमे स्वर में ]

    तुमने मेरा नाम क्यों बतला दिया? तुम्हारे यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी?

    अपरिचित

    [ आँखों में आँसू भर लाकर ]

    मैं सच कहती हूँ मैं नहीं चाहती थी—तुमने उसे मेरे हाथ से छीन लिया था। तुम्हें ख़ूब याद होगा—और उस थैली में मेरे सब रुपए थे। मैं रात ही

    ४

    तुम्हारे पीछे पाती, लेकिन मैं भम्भड़ नहीं मचाना चाहती थी, और देर भी बहुत हो गई थी—फिर तुम बिलकुल—

    बार्थिविक

    जाते कहाँ हो, बतलाओ क्या माजरा है?

    जैक

    [ चिढ़कर ]

    मुझे कुछ याद नहीं।

    [ स्त्री से धीमी आवाज़ में ]

    तुमने ख़त क्यों न लिख दिया?

    अपरिचित

    [ नाराज़ होकर ]

    मुझे रुपयों की अभी इस वक्त ज़रूरत है—मुझे आज मकान का किराया देना है।

    [ बार्थिविक की तरफ़ देखती है ]

    ग़रीबों पर सभी दाँत लगाए रहते हैं।

    जैक

    सचमुच मुझे तो कुछ याद नहीं। रात की कोई बात मुझे याद नहीं है।

    [ सिर पर हाथ रखता है ]

    बादल-सा छा गया है। और सिर में दर्द भी ज़ोर का हो रहा है।

    अपरिचित

    लेकिन आपने रुपये तो लिये थे। यह आप नहीं भूल सकते। आपने कहा भी था कि कैसा चरका दिया।

    जैक

    खै़र तो यहाँ होगा। हाँ अब मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है। मगर मैंने उसे लिया ही क्यों था?

    बार्थिविक

    हाँ तुमने लिया ही क्यों, यही तो मैं पूछता हूँ?

    [ वह तेज़ी से खिड़की की तरफ घूम जाता है ]

    अपरिचित

    [ मुसकुरा कर ]

    तुम अपने होश में न थे, ठीक है न?

    जैक

    [ शर्म से मुसकुराकर ]

    मुझे बहुत खेद है। लेकिन अब मैं क्या कर सकता हूँ?

    बार्थिविक

    हाँ कर सकते हो, तुम उसका रुपया लौटा सकते हो।

    जैक

    मैं जाकर तलाश करता हूँ, लेकिन सचमुच मेरे पास रुपए हैं नहीं।

    [ वह जल्दी से चला जाता है, और बार्थिविक एक कुर्सी रखकर उस स्त्री को बैठने का इशारा करता है। तब ओठ सिकोड़े हुए वह खड़ा हो जाता है और उसे ध्यान से देखता है। वह बैठ जाती है और उसकी तरफ़ दबी हुई आँख से देखती है। तब वह घूम जाती है और नक़ाब खींचकर चोरी से अपनी आँखें पोंछती है। इतने में जैक आ जाता है। ]

    जैक

    [ ख़ाली बटुए को दिखाता हुश्रा खिन्न भाव से ]

    यही है न? मैंने चारों तरफ़ छान डाला थैली कहीं नहीं मिलती। तुम्हें ठीक याद है, वह इस बटुए में थी?

    अपरिचित

    [ आँखों में आँसू भर कर ]

    याद? हाँ ख़ूब याद है। लाल रंग की रेशमी थैली थी। मेरे पास जो कुछ था सब उसी में था।

    जैक

    मुझ सच मुच बड़ा दुःख है। सिर में बड़ा दर्द हो रहा है। मैंने ख़िदमतगार से पूछा, लेकिन वह कहता है मैंने नहीं पाया।

    अपरिचित

    मेरे रुपए आपको देने पड़ेंगे।

    जैक

    ओह! सब तय हो जायगा, मैं सब ठीक कर दूंँगा। कितने रुपए थे?

    अपरिचित

    [ खिन्न होकर ]

    सात पौंड थे और १२ शिलिंग। वही मेरी कुल संपत्ति थी।

    जैक

    सब ठीक हो जायगा। मैं तुम्हें एक चेक भेज दूँगा।

    अपरिचित

    [ उत्सुकता से ]

    नहीं साहब, मुझे अभी दे दीजिए, जो कुछ मेरी थैली में था, वह सब दे दीजिए। मुझे आज किराया देना है, वे सब एक दिन के लिए भी न मानेंगे। मैं पहिले ही पन्द्रह दिन पिछड़ गई हूँ।

    जैक

    मुझे बहुत दुःख है, मैं सच कहता हूँ मेरे जेब में एक कौड़ी भी नहीं है।

    [ वह दबी आँखों से बार्थिविक को देखता है ]

    अपरिचित

    [ उत्तेजित होकर ]

    चलिए चलिए, मैं न मानूँगी ये मेरे रुपये हैं और आपने ले लिए हैं। मैं बगैर रुपया लिए घर न जाऊँगी। सब मुझे निकाल दगे ।

    जैक

    [ सिर पकड़कर ]

    लेकिन जब मेरे पास कुछ है ही नहीं तो दूँ क्या? मैं कह नहीं रहा हूँ कि मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है?

    अपरिचित

    [ अपना रूमाल नोचकर ]

    देखिए मुझे टालिए नहीं।

    [ विनय से दोनों हाथ जोड़ लेती है, तब एकाएक सरोष होकर कहती है ]

    अगर तुम न दोगे, तो मैं दावा कर दूंँगी, यह साफ़ चोरी है—-चोरी।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से]

    ज़रा ठहर जाइए। न्याय तो यही है कि आपके रुपए दिए जाँय और मैं इस मामले को तय किए देता हूँ।

    [ रुपए निकालकर ]

    यह आठ पौंड हैं, फ़ाज़िल पैसे थैली की क़ीमत और गाड़ी का किराया समझ लीजिए। मुझे और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। धन्यवाद देने की भी कोई ज़रूरत नहीं।

    [ घंटी बजाकर वह चुपचाप दरवाज़ा खोल देता है, अपरिचित स्त्री रुपए को बटुए में रख लेती है और जैक की तरफ़ से बार्थिविक को देखती है। उसका मुख पुलकित हो उठता है, वह मुंह अपने हाथ से छिपा लेती है और चुपके से चली जाती है। बार्थिविक दरवाज़ा बन्द कर देता है ]

    बार्थिविक

    [ गम्भीर भाव से ]

    क्यो, कैसी दिल्लगी रही!

    जैक

    [ विरक्त भाव से ]

    संयोग की बात।

    बार्थिविक

    इस तरह वह चालीस पौंड उड़ गए! पहिले एक बात फिर दूसरी बात। मैं एक बार फिर पूछता हूँ कि अगर मैं न होता, तो तुम्हारी क्या दशा होती? मालूम होता है, तुमने ईमान को ताक़ पर रख दिया। तुम उन लोगों में हो जो समाज के लिए कलंक हैं। तुम जो कुछ न कर गुज़रो वह थोड़ा है। नहीं मालूम तुम्हारी माँ क्या कहेंगी। जहाँ तक—मैं समझता हूँ तुम्हारे इस चलन के लिए कोई उज्र नहीं हो सकता। यह चित्त की दुर्बलता है। अगर किसी ग़रीब आदमी ने यह काम किया होता तो क्या तुम समझते हो, उसके साथ लेशमात्र भी दया की जाती? तुम्हें इसका सबक़ मिलना चाहिए। तुम और तुम्हारी तरह के और आदमी समाज के लिए विष फैलानेवाले हैं।

    [ क्रोध से ]

    अब फिर कभी मेरे पास मदद के लिए मत आना। तुम इस योग्य नहीं हो कि तुम्हारी मदद की जाय।

    जैक

    [ अपने पिता की ओर क्रोध से देखता है, उसके मुंह पर लज्जा या पश्चात्ताप का कोई भाव नहीं है। ] अच्छी बात है, न आऊँगा। देखूँ आप इसे कहाँ तक पसन्द करते हैं। इस वक्त भी आप ने मेरी मदद न की होती, अगर आपके प्राण इस भय से न सूख जाते कि यह बात पत्रों में छप जायगी। सिगरेट कहाँ है।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से उसे देखकर ]

    ख़ैर, अब मैं इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता।

    [ घंटी बजाता है ]

    इस बार मैं और छोड़े देता हूँ।

    [ मारलो आता है ]

    जाओ।

    [ टाइम्स के पीछे अपना मुंह छिपा लेता है। ]

    जैक

    [ प्रसन्न होकर ]

    सिगरेट कहाँ है, मारलो?

    मारलो

    मैंने रात ह्विस्की के साथ सिगरेट का बक्स भी रख दिया था। फिर इस वक्त उसका कहीं पता नहीं।

    जैक

    मेरे कमरे में देखा?

    मारलो

    जी हाँ मैं ने सारा घर छान डाला, मैंने नेस्टर सिगरेट के दो टुकड़े तश्तरी में पाए। इससे मालूम होता है, कि आपने रात को पिया होगा।

    [ हिचकता हुआ ]

    मेरा तो ख़याल है, कि कोई डिबिया को उड़ा ले गया।

    जैक

    [ बैचैनी से ]

    चुरा ले गया?

    बार्थिविक

    क्या चीज़ है। सिगरेट की डिबिया? और तो कोई चीज़ नहीं ग़ायब हुई?

    मारलो

    जी नहीं, मैंने प्लेट देख लिया।

    बार्थिविक

    आज सवेरे घर में तो कुछ गड़बड़ न थी, कोई खिड़की खुली तो न थी।

    मारलो

    जी नहीं—-

    [ जैक से आहिस्ता ]

    रात आप अपनी कुंजी दरवाज़े में छोड़ गए थे।

    [ बार्थिविक की नज़र बचाकर कुंजी दे देता है ]

    जैक

    ठीक है।

    बार्थिविक

    आज सुबह कौन कौन कमरे में आया था?

    मारलो

    मैं, ह्वीलर और मिसेज़ जोन्स, बस। और तो कोई नहीं आया।

    बार्थिविक

    तुम ने मिसेज़ बार्थिविक से पूछा?

    [ जैक से ]

    जाकर अपनी माँ से पूछो उनके पास तो नहीं है। यह भी कह दो कि ख़ूब देख लें, कोई और चीज़ तो गुम नहीं हुई।

    [ जैक अपनी मां के पास जाता है ]

    ऐसी बातों से ख़ाहम ख़ाह चिन्ता हो जाती है।

    मारलो

    जी हाँ हुज़ूर।

    बार्थिविक

    तुम्हारा किसी पर संदेह है?

    मारलो

    जी नहीं।

    बार्थिविक

    यह मिसेज़ जोन्स? वह यहाँ कितने दिनों से काम कर रही है?

    मारलो

    इसी महीने से तो आई है।

    बार्थिविक

    कैसी औरत है?

    मारलो

    मुझे उस से अधिक परिचय नहीं। देखने में तो सीधी सादी शरीफ़ औरत मालूम होती है।

    बार्थिविक

    कमरे में आज झाड़ू किसने लगाई?

    मारलो

    ह्वीलर और मिसेज़ जोन्स ने।

    बार्थिविक

    [ अपनी पहली उँगली उठाकर ]

    अच्छा मिसेज़ जोन्स किसी वक्त कमरे में अकेली भी आई थी?

    मारलो

    [ उसका चेहरा मद्धिम पड़ जाता है ]

    जी हाँ।

    बार्थिविक

    तुम्हें कैसे मालूम?

    मारलो

    [ अनिच्छा के भाव से ]

    मैंने उसे यहाँ देखा।

    बार्थिविक

    ह्वीलर भी अकेली इस कमरे में आई थी?

    मारलो

    जी नहीं। लेकिन जहाँ तक मैं समझता हूँ मिसेज़ जोन्स बहुत ईमानदार—

    बार्थिविक

    [ हाथ उठाकर ]

    मैं यह जानना चाहता हूँ कि मिसेज़ जोन्स दोपहर तक यहाँ रही?

    मारलो

    जी हाँ—नहीं नहीं,वह बावर्ची को तलाश करने तरकारी-

    ५

    वाले की दुकान पर गई थी।

    बार्थिविक

    ठीक! वह इस समय घर में है?

    मारलो

    जी हाँ है।

    बार्थिविक

    बहुत अच्छा। मैं इस मामले को साफ़ करके ही दम लूँगा। सिद्धान्त के विचार से यह ज़रूरी है कि असली चोर का पता लगाया जाय। यह तो समाज सङ्गठन की जड़ को हिलानेवाली बात है?

    मारलो

    जी हाँ।

    बार्थिविक

    इस मिसेज़ जोन्स की दशा कैसी है? इसका शौहर कहीं काम करता है?

    मारलो

    काम तो शायद कहीं नहीं करता।

    बार्थिविक

    बहुत अच्छी बात है। इस विषय में किसी से कुछ मत कहना ह्वीलर से कहो ज़बान न खोले और मिसेज़ जोन्स को यहाँ भेजो।

    मारलो

    बहुत अच्छा।

    [ मारलो चला जाता है। उसका चेहरा बहुत चिंतित है। बार्थिविक वहीं रहता है। उसका चेहरा न्यायगंभीर और कुछ प्रसन्न है, जैसा जाँच करने वाले मनुष्यों का हो जाता है। मिसेज़ बार्थिविक और जैक आते हैं ]

    बार्थिविक

    क्यों प्रिये, तुमने तो डिबिया नहीं देखी?

    मिसेज़ बार्थिविक

    ना! लेकिन कैसी विचित्र बात है जान! मारलो की तो कोई बात ही नहीं। ख़िदमतगारिनों में भी मुझे विश्वास है कोई नहीं—हाँ बावर्ची।

    बार्थिविक

    अच्छा बावर्ची?

    मिसेज़ बार्थिविक

    हाँ! मुझे किसी पर संदेह करने से घृणा है।

    बार्थिविक

    इस समय मनोभावों का प्रश्न नहीं, न्याय का प्रश्न है। नीति की रक्षा……

    मिसेज़ बार्थिविक

    अगर मज़दूरिनी इसके विषय में कुछ जानती हो,तो मुझे आश्चर्य न होगा। लोरा ने उसकी सिफ़ारिश की थी।

    बार्थिविक

    [ न्याय के भाव से ]

    मैंने मिसेज़ जोन्स को बुलाया है। यह मुझ पर छोड़ दो, और याद रक्खो जब तक अपराध साबित न हो जाय कोई अपराधी नहीं है। मैं इसका ख़याल रक्खूँगा। मैं उसे डराना नहीं चाहता, मैं उसके साथ हर तरह की रिआयत करूँगा। मैंने सुना है बहुत बहुत फ़टेहालों रहती हैं। अगर हम गरीबों के साथ और कुछ न कर सकें तो उनके साथ जहाँ तक हो सके हमदर्दी तो करनी ही चाहिए।

    [ मिसेज़ जोन्स आती है प्रसन्न मुख होकर ]

    ओ, गुडमार्निग मिसेज़ जोन्स।

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमी और रूखी आवाज में ]

    गुडमार्निंग सर, गुडमार्निङ्ग मैडेम।

    बार्थिविक

    मैंने सुना है तुम्हारे पति आजकल खाली बैठे हुए हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, आजकल उनके पास कोई काम नहीं है।

    बार्थिविक

    तब तो मेरे ख़याल में वह कुछ कमाते ही न होंगे।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुजूर, आजकल वह कुछ नहीं कमाते

    बार्थिविक

    और तुम्हारे कितने बच्चे हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    तीन बच्चे हैं हुज़ूर, लेकिन बच्चे बहुत नहीं खाते।

    बार्थिविक

    सबसे बड़े की क्या उम्र?

    मिसेज़ जोन्स

    नौ साल की हुज़ूर।

    बार्थिविक

    स्कूल जाते हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, तीनों बिला नागा मदरसे जाते हैं।

    बार्थिविक

    [ कठोरता से ]

    तो जब तुम दोनों मिया बीवी काम पर चले जाते हो तो बच्चे खाते क्या हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    हुज़ूर, मैं उन्हें खाना देकर भेजती हूँ। लेकिन रोज़ कहाँ खाना मयस्सर होता है हुज़ूर, कभी-कभी बेचारों को बिना कुछ भोजन दिए ही भेज देती हूँ। हाँ जब मेरा मियाँ कहीं काम से लगा रहता है, तो बच्चों पर बड़ा प्रेम करता है। लेकिन जब ख़ाली होता है तो उसकी मति ही बदल जाती है।

    बार्थिविक

    शायद पीता भी है?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ हुजूर। जब पीता है तो कैसे कहदूँ कि नहीं पीता।

    बार्थिविक

    तब तो शायद तुम्हारे सब रुपए पीने ही में उड़ा देता होगा?

    मिसेज़ जोन्स

    जी नहीं, वह मेरे रुपए पैसे नहीं छूते। हाँ जब अपने होश म नहीं रहते तब उनका मन बदल जाता है। तब वह मुझे बुरी तरह पीटते हैं।

    बार्थिविक

    वह है क्या? कौन पेशा करता है?

    मिसेज़ जोन्स

    पेशा! साईस है हुज़ूर।

    बार्थिविक

    साईस! उनकी नौकरी छूट कब से गई?

    मिसेज़ जोन्स

    उनकी नौकरी छूटे कई महीने होगए हुज़ूर! तब से कोई टिकाऊ काम नहीं मिला हुज़ूर अब तो मोटरों का ज़माना है। उन्हें कौन पूछता है।

    बार्थिविक

    तुम्हारी शादी उनसे कब हुई थी मिसेज़ जोन्स?

    मिसेज़ जोन्स

    आठ साल हुए हुज़ूर—वही साल–

    मिसेज बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर से ]

    आठ! तुमने तो बड़े लड़के की उम्र नौ साल बतलाई थी।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, इसीलिये तो उनकी नौकरी छूटी। मेरे साथ हरमजदगी की और मालिक ने कहा ऐसे आदमी को रखने से दूसरे आदमी भी बिगड़ेंगे। निकाल दिया।

    बार्थिविक

    तुम्हारा मतलब………..कुछ ठीक………

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर, जब नौकरी छूट गई तो मुझसे शादी करली।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तो शादी के पहिले ही तुम—'

    बार्थिविक

    जाने भी दो प्रिये।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ क्रोध से ]

    कितनी बेहयाई की बात है!

    बार्थिविक

    [ जल्दी से ]

    तुम आज कल कहां रहती हो मिसेज़ जोन्स?

    मिसेज़ जोन्स

    हमारे घर नहीं है हुज़ूर। हमें अपनी बहुत सी चीज़ अलग कर देनी पड़ीं हुज़ूर।

    बार्थिविक

    अलग कर देनी पड़ीं! क्या मतलब? क्या गिरवी रखदीं?

    मिसेज जोन्स

    हां हुज़ूर, अलग कर दीं। आजकल मरथर स्ट्रीट में रहते हैं हुज़ूर, यहां से बिलकुल पास है। नं० ३४, बस एक कोठरी है।

    बार्थिविक

    किराया क्या है ?

    मिसेज जोन्स

    सजे हुए कमरे के ६ शिलिङ्ग हफ़ते के पड़ते हैं हुजूर।

    बार्थिविक

    तो तुम्हारे ज़िम्मे केराया बाक़ी भी पड़ा होगा?

    मिसेज, जोन्स

    जी हाँ, कुछ बाक़ी है हुज़ूर।

    बार्थिविक

    लेकिन तुम्हें तो अच्छी मज़दूरी मिलती है। क्यों?

    मिसेज जोन्स

    बीफे को एक दिन स्टैमफोर्ड प्लेस में काम करती हूँ। सोम, बुद्ध, और सुक्कर को यहाँ आती हूँ। आज तो आधी छुट्टी है हुज़ूर, कल बैकं बन्द न था।

    बार्थिविक

    समझ गया। हफ्त़े में चार दिन। आधा क्राउन रोज़ पाती हो न? क्यों?

    मिसेज जोन्स

    हाँ हुज़ूर और मेरा खाना भी मिलता है। लेकिन जिस दिन आधी छुट्टी होती है उस दिन अठारह पेंस ही मिलते हैं।

    बार्थिविक

    और तुम्हारा शौहर तो जो कुछ पाता होगा, पीने में उड़ा देता होगा।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ साहब, कभी कभी उड़ा देते हैं, कभी कभी मुझे दे देते हैं। अगर उन्हें काम मिले तो करने को तैयार हैं हुज़ूर, लेकिन मालूम होता है बहुत से आदमी खाली बैठे हुए हैं।

    बार्थिविक

    उँह! इन बातों में पड़ने से क्या फ़ायदा

    [ सहानुभूति दिखाकर ]

    यहाँ तुम्हारा काम बहुत कड़ा तो नहीं है? क्यों?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हुज़ूर, ऐसा कुछ कड़ा तो नहीं है, हां जब रात को सोने नहीं पाती तब कुछ अखरता है।

    बार्थिविक

    हूँ! और तुम सब कमरों में झाड़ू लगवाती हो! कभी कभी बार्वची को बुलाने भी जाना पड़ता है? क्यों न?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुज़ूर!

    बार्थिविक

    आज भी तुम्हें जाना पड़ा था?

    मिसेज़ जोन्स

    हां हुज़ूर भाजी वाले की दूकान तक गई थी।

    बार्थिविक

    ठीक! तो तुम्हारा शौहर कुछ कमाता नहीं और बदमाश है?

    मिसेज़ जोन्स

    जी नहीं, बदमाश नहीं है। मैं समझती हूँ वह बहुत अच्छा आदमी है, हां कभी कभी मुझे पीटता है। मैं उसे छोड़ना नहीं चाहती हालांकि मेरे मन में आता है कि उसके पास से चली जाऊं क्योंकि मेरी समझ में ही नहीं आता उसके साथ रहूँ कैसे। वह आए दिन मुझे मारा करता है। थोड़े दिन हुए, उसने मुझे यहाँ एक घूसा मारा था

    [ अपनी छाती को छूती है ]

    अभी तक दर्द हो रहा है। मैं तो समझती हूं उसे छोड़ दूं, आप क्या कहते हैं हुज़ूर?

    बार्थिविक

    वाह! मैं इस बारे में क्या कह सकता हूँ? अपने शौहर को छोड़ देना बुरी बात है, बहुत बुरी बात।

    मिसेज़ जोन्स

    जी हां! मुझे यही डर लगता है कि उसे छोड़ दूँ तो न जाने मेरी क्या गति करे। बड़ा गुस्सैल है, हुजूर।

    बार्थिविक

    इस मामले में मैं कुछ नहीं कह सकता। मैं तो नीति की बात कहता हूँ।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हुजूर; मैं जानती हूँ इन मामलों में कोई मेरी मदद न करेगा। मुझे आपही कोई सह निकालनी पड़ेगी। उन्हें भी तो ठोकरें खानी पड़ती हैं। लड़कों को बहुत चाहते हैं हुजूर, और उन्हें भूखे मदरसे जाते देखकर उनके दिल पर चोट लगती है।

    बार्थिविक

    [ जल्दी से

    ⁠ ⁠ ६

    खैर-धन्यवाद। मेरे जी में पाया कुछ तुम्हारा हाल चाल पूँछू। अब मैं तुम्हें और न रोकूंगा।

    मिसेज़ जोन्स

    आप को धन्यवाद देती हूं, हुजूर।

    बार्थिविक

    अच्छा गुडमार्निङ्ग!

    मिसेज़ जोन्स

    गुडमार्निङ्ग हुजूर, गुडमार्निङ्ग बीबी।

    बार्थिविक

    [ अपनी पत्नी से आंखें मिलाकर ]

    जरा सुन लो मिसेज़ जोन्स, मैं समझता हूँ तुमको बतला देना

    उचित है, एक चाँदी की सिगरेट की डिबिया ग़ायब हो गई है।

    मिसेज़ जोन्स

    [ कभी इसका मुंह देखती है, कभी उसका ]

    मुझे यह सुनकर बहुत दुख हुआ, हुजूर।

    बार्थिविक

    तुमने तो शायद उसे नहीं देखा। क्यों?

    मिसेज़ जोन्स

    [ समझ जाती है कि मेरे ऊपर संदेह किया जा रहा है; घबड़ा कर ]

    कहाँ थी हुज़ूर? बतला दीजिए।

    बार्थिविक

    [ बात बनाकर ]

    मारलो कहां कहता था? इस कमरे में? हाँ इसी कमरे में!

    मिसेज जोन्स

    जी नहीं, मैंने नहीं देखी। अगर मैं देखती तो कह देती।

    बार्थिविक

    [ उसे उड़ती हुई निगाह से देखकर ]

    भूल तो नहीं रही हो? खूब याद कर लो।

    मिसेज़ जोन्स

    [अविचलित होकर ]

    खूब याद कर लिया।

    [ धीरे से सिर हिलाकर ]

    मैंने नहीं देखा और न जानती हूँ कि कहां है।

    [ चुप चाप चली जाती है ]

    [ बार्थिविक, उसका बेटा, और पत्नी एक दूसरे की ओर कनखियों से देखते हैं ]

    परदा गिरता है

    अंक २

    दृश्य १

    [ जोन्स का घर ]

    मरथर स्ट्रीट। समय २॥ ०बजे। कमरे में कोई सामान नहीं है, फटे हुए चिकट कपड़े हैं, और रंगी हुई दीवारें। साफ़ सुथरी दरिद्रता झलक रही है। जोन्स आधे कपड़े पहिने चारपाई पर लेटा हुआ है। उसका कोट उसके पैरों पर पड़ा हुआ है और कीचड़ से भरे हुए बूट पास ही ज़मीन पर रक्खे हैं। वह सो रहा है। दरवाज़ा खुलता है, और मिसेज़ जोन्स आती है। वह फटा हुआ काला जाकिट पहिने हुए है। सिर पर काली मल्लाहों की सी टोपी है। वह टाइम्स पत्र में लिपटा हुआ एक पारसल लिए हुए हैं। पारसल नीचे रख देती है, और उसमें से एक एपरन (वह कपड़ा जो काम करने वाली स्त्रियां गाउन के ऊपर लपेट लेती हैं), आधी रोटी, दो प्याज़, तीन आलू, और मांस का एक छोटा सा टुकड़ा निकालती है। ताक पर से एक चायदान उतार कर उसको धोती है, और एक चाय की पुड़िया में से थोड़ी सी बारीक चाय डालती है। उसे अंगीठी पर रखती है, और पास ही एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठ कर रोने लगती है।

    जोन्स

    [ जागकर जमुहाई लेता हुआ ]

    ओह तुम हो! क्या वक्त है?

    मिसेज़ जोन्स

    [ आँखें पोछकर और मामूली आवाज में ]

    ढाई बजे हैं।

    जोन्स

    तुम इतनी जल्द क्यों लौट आई?

    मिसेज़ जोन्स

    आज आधे दिन काम था, जेम।

    जोन्स

    [ चित्त लेटा हुआ और नींद भरी आवाज़ में ]

    कुछ खाने के लिये है?

    मिसेज़ जोन्स

    मिसेज बार्थिविक के वावर्ची ने मुझे थोड़ा सा मांस दिया है। मैं उसको उबालने जा रही हूँ।

    [ पकाने की तैयारी करती है ]

    किराये के १४ शिलिंग बाकी हैं जेम, और मेरे पास कुल २ शिलिंग और चार पेन्स रह गए हैं। आजही मांगने आते होंगे।

    जोन्स

    [ उसकी तरफ़ फिर कर, कुहनियों के बल लेटा हुआ ]

    आएँ और थैली उठा ले जायें! काम खोजते खोजते तो मैं तंग आ गया हूँ। मैं क्यों काम के लिए चक्कर लगाता हूँ? जैसे गिलहरी पिंजरे में नाचती है! "हुज़ूर मुझे काम दीजिये"— हुज़ूर एक आदमी रखलें"—"मेरी बीबी और तीन बच्चे हैं," इन बातों से मेरा जी ऊब गया। इससे तो अच्छा यही है, कि यहीं पड़े पड़े मर जाऊँ। लोग मुझसे कहते हैं "जोन्स, कल जुलूस में शरीक हो जाव, एक झंडा उठा लो, और लालमुंह वाले नेताओं की बातें सुनो। फिर अपना सा मुंह लिए घर लौट जाव"। कुछ लोगों को यह पसंद होगा। जब मैं काम की टोह में जाता हूँ और उन बदमाशों को अपनी ओर सिर से पैर तक ताकते देखता हूँ, तो जान पड़ता है मेरे हजारों साँप काट रहे हैं। मैं किसी से कोई रियायत नहीं चाहता। एक आदमी पसीने की कमाई खाना चाहता है, पर उसे काम नहीं मिलता। कैसी दिल्लगी है! एक आदमी छाती फाड़ कर काम करना चाहता है, कि किसी तरह प्राण बचें ओर उसे कोई नहीं पूछता! यह न्याय है!—यह स्वाधीनता है! और न जाने क्या-क्या है।

    [ दीवार की तरफ़ मुँह फेर लेता है। ]

    तुम इतनी सीधी सादी हो, तुम नहीं जानतीं कि मेरे भीतर कितनी हलचल मची हुई है। मैं इन बच्चों के खेल से तंग आ गया हूँ। अगर कोई उन्हें चाहता है, तो मेरे पास आए,

    [ मिसेज़ जोन्स पकाना बद कर देती है, और मेज़ के पास चुपचाप खड़ी हो जाती है। ]

    मैं सब कुछ करके हार गया। जो कुछ होनेवाला है, उससे नहीं डरता। मेरी बातों को गिरह बांध लो। अगर तुम समझती हो, कि मैं उनके पैरों पर गिरूंगा, तो तुम्हारी भूल है। मैं किसी से काम न मागूंगा चाहे जान ही क्यों न जाती रहे। तुम इस तरह क्यों खड़ी हो जैसी कोई दुखियारी, असहाय मूरत हो? इसी से मैं तुम्हें छोड़ता नहीं। अब तुम्हें काम करने का ढंग आ गया। लेकिन इतना सीधापन भी किस काम का। तुम्हारे मुंह में तो जैसे जीभ ही नहीं है।

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीरे से ]

    जब तुम अपने होश में रहते हो, तो ऐसी पटाँग बातें करते हो, जैसी नशे में नहीं करते। अगर तुन्हें काम न मिला हमारी गुजर कैसे होगी? मालिक मकान यहां रहने न देगा। वह तो आज रुपए के लिए आता होगा।

    जोन्स

    तुम्हारे इस बार्थिविक को देखता हूँ, रोज़ की बंसी बजाता हुआ पार्लिमेंट में जात और वहां गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाता

    और उसके छोकरे को भी देखता हूं, जो से इधर-उधर ऐंठता फिरता है। उन्होंने कौन सा काम किया है, कि वे यों गुत उड़ायें। अपनी ज़िन्दगी में कभी एक दिन भी उ काम नहीं किया। मैं उन्हें हर रोज देखता ।

    मिसेज़ जोन्स

    मैं यह चाहती हूँ, कि तुम इस तरह मेरे पीछे पीछे न लगे रहा करो। न जाने तुम क्यों मेरे पीछे लगे रहते हो। तुम्हारा वहां घूमना उन्हें अच्छा नहीं लगता। उन लोगों को भी शक होता है।

    जोन्स

    मेरा जहां जी चाहेगा, वहां जाऊँगा। आखिर कहां जाऊँ। उस दिन एजुवेयर रोड पर एक जगह गया। मैनेजर से बोला—-"हुजूर मुझे रख लीजिये; मुझे दो महीने से कोई काम नहीं मिला; बिना काम किए अब रहा नहीं जाता। मैं काम करनेवाला आदमी हूं। आप जो काम चाहें मुझे दें। मैं किसी काम से नहीं डरता।" उसने कहा,‌ "भले आदमी, सुबह से इस वक्त तक ३० आदमी आ चुके हैं। मैंने पहले दो आदमी ले लिये। इससे ज़्यादा की मुझे ज़रूरत नहीं।" मैं बोला—"आपको धन्यवाद देता हूँ साहब, संसार में आग ही लग जाय तो अच्छा।" उसने कहा— "यों गाली बकने से काम नहीं मिलेगा, अब चल दो।"

    [ हँसता है ]

    चाहे तुम भूखों मर रहे हो, पर तुम्हें मुँह खोलने का हुक्म नहीं। इसका ख़याल भी मत करो। चुप चाप सहते जाव। यही समझदार आदमियों का दस्तूर है। ज़रा दूर और आगे चला, तो एक लेडी ने मुझसे कहा—

    [ आवाज़ नीची करके ]

    क्यों जी कुछ काम करके दो चार पैसे कमाना चाहते हो?" और मुझे कुत्ता दिया कि उसे दुकान के बाहर पकड़े खड़ा रहूं। खानसामे की तरह मोटा था। — मनों मांस खा गया होगा। उसको पालने में ढ़ेरों मांस लग गया होगा। वह यह समझ कर दिल में खुश हो रही थी, कि मैंने एक ग़रीब आदमी का उपकार किया। लेकिन मैं देख रहा था कि यह तांबे के ज़ीने पर खड़ी मुझे ताक रही थी, कि मैं उसका मोटा ताज़ा कुत्ता लेकर कहीं रफू चक्कर न हो जाऊँ।

    [ वह चार पाई की पट्टी पर बैठ जाता है, और बूट पहिनता है। तब ऊपर ताक कर ]

    तुम सोच क्या रही हो?

    [ मिन्नत करके ]

    क्या तुम्हारे मुंह में ज़बान नहीं है?

    [ कुण्डी खटकती है, और घर की मालकिन मिसेज़ सेडन आती है। वह एक चिंतित, फूहड़ और जल्दबाज औरत है। मज़दूरों के से कपड़े पहिने हुए। ]

    मिसेज़ जोन्स, जब तुम आई तब हमें तुम्हारी आहट मिल गई थी। मैंने अपने शौहर से कहा लेकिन वह कहते हैं कि मैं एक दिन के लिए भी नहीं मान सकता।

    जोन्स

    [ त्योरियां चढ़ाकर मसख़रेपन से ]

    शौहर को बकने दो, तुम स्वाधीन स्त्रियों की तरह अपनी मरज़ी पर चलो। यह लो जेनी, यह उन्हें दे दो।

    [ अपने पाजामे की जेब से एक सावरेन निकाल कर वह अपनी स्त्री की ओर फेंकता है। स्त्री हाँपकर उसे अपने एपरन में ले लेती है। जोन्स फिर जूते का फीता बांधने लगता है। ]

    मिसेज़ जोन्स

    [ सावरेन को छिपाकर मलती हुई ]

    मुझे खेद है कि अबकी इतनी देर हो गई। तुम्हारे चौदह शिलिग आते हैं। यह सावरेन लो। मुझे ६ शिलिंग लौटा दो। [ मिसेज़ सेडन सावरेन ले लेती है और इधर उधर घुमाती है। ]

    जोन्स

    [ जूते की तरफ़ आँखे किये हुए ]

    तुम्हें अचरज हो रहा होगा, क्यों?

    मिसेज़ सेडन

    तुमको बहुत बहुत धन्यवाद! तुमने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की।

    [ वह सचमुच विस्मित हो जाती है ]

    मैं रेज़गी लाए देती हूँ।

    जोन्स

    [ मुंह बनाकर ]

    इसकी क्या जरूरत है?

    मिसेज़ सेडन

    तुमको बहुत बहुत धन्यवाद! तुमने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की।

    [चली जाती है]

    [मिसेज़ जोन्स जोन्स की ओर ताकती है जो अभी तक फीते बाँध रहा है]

    जोन्स

    आज ज़रा तकदीर खुल गई।

    [लाल थैली और कुछ फुटकल रेज़गियाँ निकाल कर]

    एक थैली पड़ी मिल गई। सात पौंड से कुछ ज्यादा हैं।

    मिसेज़ जोन्स

    यह क्या किया, जेम्स?

    जोन्स

    यह क्या किया, जेम्स? किया क्या। पड़ी मिली उठा ली। खोई हुई चीज़ है। और क्या!

    मिसेज़ जोन्स

    लेकिन उस पर किसी का नाम तो होगा! या कुछ और!

    जोन्स

    नाम? नहीं किसी का नाम नहीं है। यह उन लोगों की नहीं है जो मुलाकाती कार्ड लेकर चलते हैं। यह किसी पक्की लेडी का है। ज़रा सूंघो तो।

    [वह थैली को उसकी तरफ फेंकता है। वह उसे धीरे से नाक के पास ले जाती है।]

    अब तुम्हीं बतलाओ मुझे क्या करना चाहिये था। तुम्हीं बतलाओ।

    मिसेज़ जोन्स

    [थैली को रखकर]

    यह तो मैं नहीं बता सकती, जेम्स, कि तुम्हें क्या

    करना चाहिये था। लेकिन रुपए तुम्हारे न थे। तुमने किसी दूसरे के रुपए ले लिए।

    जोन्स

    जिसने पाया उसका हो गया। मैं इसे उन दिनों की मजूरी समझूंगा जब मैं गलियों में उस चीज के लिये ठोकर खाता फिरा जो मेरा हक़ है। मैं इसे पिछली मजूरी समझ कर ले रहा हूँ।

    [विचित्र गर्व से]

    रुपए मेरी जेब में हैं, जानी।

    [मिसेज जोन्स फिर भोजन बनाने की तैयारी करने लगती है। जोन्स उसकी ओर कनखियों से देख रहा हैं]

    हाँ, मेरी जेब में रुपए हैं। और अबकी मैं इसे उड़ाऊँगा नहीं, इसीसे कैनाडा चला जाऊँगा। तुम्हें भी एक पौंड दे दूँगा।

    [चुप]

    तुम मुझे छोड़ने की कई बार धमकी दे चुकी हो, तुमने बारहा मुझसे कहा है कि मैं तुम्हारे ऊपर बड़ी सख्ती करता हूं। मैं यहाँ से चला जाऊंगा तब तो तुम चैन से रहोगी।

    मिसेज़ जोन्स

    [ शिथिलतासे ]

    सख़्ती तो तुमने मेरे साथ की है, जोन्स, और मैं तुम्हें जाने से रोक भी नहीं सकती। लेकिन तुम्हारे जाने की मुझे खुशी होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानती।

    जोन्स

    इससे मेरी तकदीर पलट जायगी। जब से तुम्हारे साथ ब्याह हुआ तब से कभी भले दिन न देखे।

    [ कुछ नर्मी से ]

    और न तुम्हें कभी पिकनिक ही मिला।

    मिसेज़ जोन्स

    अगर हमारी तुम्हारी मुलाकात न हुई होती तो बहुत अच्छा होता। हम लोग एक दूसरे के लिये बनाए ही नहीं गए। लेकिन तुम हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए, और अब तक पड़े हुए हो। और तुम मेरे साथ कितनी बुरी तरह पेश आते हो। जेम्स—उस छोकरी रायस के फेरे में पड़े रहते हो? तुम्हें शायद इन लड़कों का कभी ख़याल भी नहीं आता जिन्हें हमने पैदा किया है। तुम नहीं समझते कि उनके पालने में मुझे कितनी कठिनाई पड़ती है, और तुम्हारे चले जाने पर उन पर क्या पड़ेगी।

    जोन्स

    [ खिन्न मन से कमरे में टहलता हुआ ]

    अगर तुम समझ रही हो कि मैं लड़कों को छोड़ दूंगा तो तुम भूल कर रही हो।

    मिसेज़ जोन्स

    यह तो मैं जानती है कि तुम उन्हें प्यार करते हो।

    जोन्स

    [ थैली को उंगलियों पर फिराता हुआ, कुछ क्रोध से ]

    अभी तो यों ही चलने दो। में न रहूंगा तो छोकरे तुम्हारे साथ बड़े मज़े में रहेंगे। अगर मैं जानता कि यह हाल होगा तो मैं एक को भी न पैदा करता। क्या फायदा है इससे कि लड़कों को पैदा करके इस विपत्ति में डाल दिया जाय?यह पाप है, और कुछ नहीं। लेकिन हमारी आखं बहुत देर में खुलती हैं। संसार का यही ढंग है।

    [ थैली को फिर जेब में रख लेता है।

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ, यह इन बेचारों के हक़ में बहुत अच्छा होता। लेकिन हैं तो यह तुम्हारे ही लड़के, और मुझे तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें सुनकर अचरज होता है। अगर मेरे पास यह न रहें तो मेरा तो ज़रा भी जी न लगे।

    जोन्स

    [ घुन्नाया हुआ ]

    यही सब का हाल है। अगर मैं वहाँ कुछ कमा सका—

    [ उसे अपना कोट हिलाते देखकर, कठोर स्वर में ]

    कोट मत छुओ।

    [ चांदी की डिबिया जेब से गिर पड़ती है और सिगरेट चारपाई पर बिखर जाते हैं। डिबिया को वह उड़ा लेती है और उसे ध्यान से देखती है। वह झपटकर उसके हाथ से डिबिया छीन लेता है। ]

    मिसेज़ जोन्स

    [ चारपाई को टेककर झुकी हुई ]

    ओ जेम! ओ जेम!

    जोन्स

    [ डिबिया को मेज़ पर पटक कर ]

    फिजूल बक मत करो। जब मैं यहाँ से चलूंगा तो इस डिबिया को उसी थैली के साथ पानी में डाल दूंगा। मैंने इसे उस वक्त उठा लिया जब मैं नशे में था; और नशे में जो काम किए जाते हैं उनका ज़िम्मेदार कोई नहीं होता, ब्रह्मवाक्य है। मुझे इसकी क्या ज़रूरत है, मैं इसे लेकर करूंगा क्या? मैंने जलकर दम्भ इसे निकाल लिया था। मैं तुमसे कह चुका मैं चोर नहीं हूँ, और अगर तुमने मुझे चोर कहा तो बुरा होगा।

    मिसेज़ जोन्स

    [ एपरन की डोरी को ऐंठती हुई ]

    यह मिसेज बार्थिविक की है। तुमने मेरे नाम में बट्टा लगा दिया। अरे जेम, तुम्हें यह सूझी क्या?

    जोन्स

    क्या मतलब?

    मिसेज़ जोन्स

    वहाँ इसकी तलाश हो रही है लोगों का मुझ पर शुभा है। तुम्हें यह सूझी क्या, जेम?

    जोन्स

    मैं तुमसे कह चुका मैं नशे में था। मुझे इसकी चाह नहीं है। यह मेरे किस काम की है। अगर मैं इसे गिरो रखने जाऊ तो पकड़ जाऊं मैं चोर नहीं हूं। अगर मैं चोर हूँ तो लौंडा बार्थिविक मुझसे कहीं बड़ा चोर है। यह थैली जो मैंने पड़ी पाई, वही एक लेडी के घर से उठा लाया था। लेडी से कुछ झगड़ा हो गया बस उसने उस बेचारी की थैली उड़ा ली। बराबर कहता रहा कैसा चरका दिया। उसने लेडी को चरका दिया। मैंने लौंडे को चरका दिया। पल्ले सिरे का मक्खीचूस है। और देख लेना उसका बाल भी बांका न होगा।

    मिसेज़ जोन्स

    [ मानो आपही आप बातें कर रही हो ]

    ओ जेम! हमारी लगी लगाई रोजी चली जायगी!

    जोन्स

    अगर ऐसा हुआ तो मैं भी उनकी ख़बर लूंगा।

    न थैली कहीं गई है, न लौडा बार्थिविक कहीं गया है।

    [ मिसेज़ जोन्स मेज़ के पास आती है और डिबिया को उठा लेना चाहती है, जोन्स उसका हाथ पकड़ लेता है। ]

    तुम्हें उससे क्या मतलब है? मैं कहता हूं सीधे से रखदो।

    मिसेज़ जोन्स

    मैं इसे लौटा दूंगी और जो जो हुअा है सब साफ़ साफ़ कह दू़ंगी।

    [ वह उसके हाथ से डिबिया छीन लेना चाहती है ]

    जोन्स

    न मानोगी तुम?

    [ वह डिबिया को छोड़ देता है और गुर्राकर उस पर झपटता है वह चारपाई के उस पार चली जाती हैं। वह उसके पीछे लपकता है। एक कुरसी उलट जाती है। दरवाजा खुलता है और स्नो अन्दर आता है। वह खुफ़िया पुलीस का आदमी है इस वक्त सादे कपड़े पहने हुए है। उसकी मूछें कतरी हुई हैं। जोन्स हाथ गिरा देता है मिसेज़ जोन्स हाँकती हुई खिड़की के पास खड़ी हो जाती है। स्नो तेजी से मेज़ की तरफ जाता है और डिबिया उठा लेता है। ]

    स्नो

    अच्छा यहाँ तो चुहल हो रही है। जिस चीज़ को तलाश में था वही मिल गई । जे० बी० ठीक वही है।

    [ वह दरवाजे के पास जाता है और डिबिया के अक्षरों को गौर से देखता है मिसेज़ जोन्स से] मैं पुलीस का अफसर हूँ। तुम्हीं मिसेज़ जोन्स हो?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हां।

    स्नो

    मुझे हुक्म है कि तुम्हें जे० बार्थिविक, मेम्बर पार्लेमेण्ट नं० ६ राकिंघम गेट की यह डिबिया चुरा लेने के अपराध में पकड़ लूं। तुम्हारा बयान ठीक न हुआ तो तुम फंस जावगी क्या कहती हो?

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमे स्वर में। वह अभी तक हांफ रही है और छाती पर हाथ रखे हुये है ]

    मैं सच कहती हूँ, साहब, मैंने इसे नहीं लिया।

    मैं पराई चीज कभी छूती ही नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती।

    स्नो

    'तुम आज सवेरे वहाँ गई थीं, जिस कमरे में यह डिबिया थी उसमें तुमने झाड़ू लगाई, तुम कमरे में अकेली थीं। डिबिया यहां तुम्हारे घर में रखी हुई है। फिर भी तुम कहती हो मैंने नहीं लिया?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ। जो चीज़ नहीं ली, उसे कैसे कह दूँ कि ली है।

    स्नो

    तब वह डिबिया यहाँ कैसे आ गई?

    मिसेज़ जोन्स

    मैं इस विषय में कुछ न कहना ही उचित समझती हूँ।

    स्नो

    यह तुम्हारे पति हैं?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ, यह मेरे पति हैं।

    स्नो

    मैं इन्हें गिरफ़तार करने जा रहा हूँ। तुम्हें कुछ कहना तो नहीं है?

    [ जोन्स सिर झुकाए मौन बैठा रहता है ]

    तो ठीक है। चलो मिसेज़ जोन्स। मैं तुमको इतना ही कष्ट दूँगा कि चुप चाप मेरे साथ चली आओ।

    मिसेज़ जोन्स

    [ हाथ मलते हुए ]

    अगर मैंने लिया होता तो मैं यह कभी न कहती कि मैंने नहीं लिया—मैंने नहीं लिया, आप से सच कहती हूँ। यह मैं जानती है कि देखने में मैं ही अपराधिन है, लेकिन असली तबा मैं नहीं बता सकती। मेरे बच्चे मदरसे गए हैं, थोड़ी देर में आते होंगे। मुझ न पावेंगे तो उन बेचारों का न जाने क्या हाल होगा।

    स्नो

    तुम्हारा पति उनकी देख भाल कर लेगा, घबराने की कोई बात नहीं।

    [ वह उसका हाथ आहिस्ता से पकड़ता है ]

    जोन्स

    तुम उसका हाथ छोड़ दो वह ठीक कहती हैं। डिबिया मैंने ली।

    स्नो

    [ उसकी तरफ आँखें उठाकर ]

    शाबाश! शाबाश! बहादुर आदमी हो। चलो मिसेज जोन्स।

    जोन्स

    [ क्रोध से ]

    उसे छोड़ दे, सुअर। वह मेरी बीबी है। वह शरीफ़ औरत है। अगर उसे पकड़ा तो तुम जानोगे।

    स्नो

    ज़रा होश में आओ। इन बातों से क्या फ़ायदा ज़बान सँभाल कर बात करो—-खैरियत इसी में है।

    [ वह मुंह में सीटी लगाता है और स्त्री को द्वार की ओर खींचता है ]

    जोन्स

    [ झपट कर ]

    उसे छोड़ दो और हाथ हटालो, नहीं हड्डी तोड़ दूंगा उसे क्यों नहीं छोड़ता। मैं तो कह रहा हूँ कि मैंने ली है।

    स्नो

    [ सीटी बजाकर ]

    हाथ हटालो, नहीं मैं तुम्हें भी पकड़ लूँगा। अच्छा न मानोगे? [ जोन्स उससे लिपट जाता है और उसे एक घूंसा मारता है। एक पुलिसमैन वर्दी पहने हुए आता है। ज़रा देर हाथापाई होती है, और जोन्स पकड़ लिया जाता है। मिसेज़ जोन्स अपने हाथ उठाती है और उनके ऊपर सिर झुका देती है। ]

    पर्दा गिरता है।

    दृश्य २

    [ बार्थिविक का भोजनालय, वही शाम है। बार्थिविक-परिवार फल और मिठाइयाँ खा रहा है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    जाँन।

    [ अख़रोटों के छिलकों के टूटने की आवाज़ आती है ]

    बार्थिविक

    तुम इन अखरोटों का हाल उनसे क्यों नहीं कहती खाए नहीं जाते।

    [ एक गरी मुंह में रख लेता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    यह इस चीज़ का मौसिम नहीं है। मैंने होली-रूड से कहा था।

    [ बार्थिविक अपना गिलास पोर्ट से भरता है ]

    जैक

    दादा, ज़रा सरौता बढ़ाइएगा।

    [ बार्थिविक सरौता बढ़ा देता है। वह किसी विचार में डूबा हुआ मालूम होता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    लेडी होलीरूड बहुत मोटी हो गई हैं। मैं यह बहुत दिनों से देख रही हूँ।

    बार्थिविक

    [ अनमने भाव से ]

    मोटी?

    [ वह सरौता उठा लेता है—चेहरे पर लापर्वाही झलकने लगती है ]

    होलीरूड परिवार का नौकरों से कुछ झगड़ा हो गया था, क्यों?

    जैक

    दादा, ज़रा सरौता।

    ८

    बार्थिविक

    [ सरौता बढ़ाते हुए ]

    समाचार पत्रों में निकला था। रसोइयादारिन थी न?

    मिसेज़ बार्थिविक

    नहीं, खिदमतगारिन थी। मैंने लेडी होलीरूड से बातचीत की थी। वह लड़की अपने प्रेमी को मिलने के लिए बुलाया करती थी।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से ]

    मेरी समझ में उन्हें—

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम क्या कहते हो जॉन, और दूसरा रास्ता ही क्या था? सोचो, दूसरे नौकरों पर क्या असर पड़ता।

    बार्थिविक

    हाँ बात तो ठीक थी—लेकिन मैं यह नहीं सोच रहा था।

    जैक

    [ छेड़ने के लिए ]

    दादा, सरौता।

    [ बार्थिविक सरौता बढ़ा देता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    लेडी होलीरूड ने मुझसे कहा—"मैंने उसे बुलाया और उससे कहा, फ़ौरन मेरे घर से निकल जा। मैं तुम्हारे चालचलन को निंदनीय समझती हूँ। मैं कह नहीं सकती। मैं नहीं जानती, और न में जानना चाहती है कि तुम क्या कर रही थीं। मैं सिद्धांत की रक्षा के लिए तुम्हें अलग कर रही हूं। मेरे पास सिफ़ारिश के लिए मत आना।" इस पर उस लड़की ने कहा– "अगर आप मुझे नोटिस नहीं देंगी तो मुझे एक महीने की तनख़्वाह दे दीजिए। मैंने अपनी इज्ज़त में दाग़ नहीं लगाया। मैंने कुछ नहीं किया।"—कुछ नहीं किया!

    बार्थिविक

    अच्छा।

    मिसेज़ बार्थिविक

    नौकर अब बहुत सिर चढ़ गए हैं, वह सब इस बुरी तरह मिले रहते हैं, कि कुछ मालूम ही नहीं होता कि उनके मन में क्या है। ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हें न मालूम हो इस लिए सबों ने गुट कर लिया हो। यहां तक कि मार्लो का भी यही हाल है। ऐसा मालूम होता है, कि वह अपने मन की असली बात किसी पर खुलने ही नहीं देता। मुझे इस छिपा चोरी से चिढ़ है। इससे फिर किसी पर भरोसा नहीं रहता। कभी कभी मेरा ऐसा जी चाहता है, कि उसका कान पकड़ कर हिलाऊं।

    ' जेक

    मार्लो बहुत भलामानुस है। यह कोई अच्छी बात नहीं है, कि हमारी बातें हर एक आदमी जान ले।

    बार्थिविक

    इसकी तो चरचा न करना ही अच्छा है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    सब नीच जातों का यही हाल है, तुम यह नहीं बतला सकते कि वह कब सच बोल रहे हैं। आज जब मैं होलीरूड के घर से चलने के बाद बाज़ार गई, तो इन बेकार आदमियों में से एक आकर मुझसे बात करने लगा। मैं समझती हूँ मुझमें और गाड़ी में केवल बीस गज़ का अंतर था। लेकिन ऐसा मालूम हुआ कि वह

    सड़क फाड़कर निकल आया।

    बार्थिविक

    अच्छा! आज कल किसी से बातचीत करने में बहुत होशियार रहना चाहिए। न जाने कैसा आदमी हो।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मैंने उसे कुछ जवाब थोड़े ही दिया, लेकिन मुझे तुरंत मालूम हो गया, कि वह झूठ बोल रहा है।

    बार्थिविक

    [ एक अख़रोट तोड़कर ]

    यह बड़ा अच्छा नियम है। उनकी आंखों को देखना चाहिए।

    जेक

    दादा, ज़रा सरौता।

    ' बार्थिविक

    [ सरौता बढाकर ]

    अगर उनकी निगाह सीधी होती हैं तो कभी कभी मैं छः पैंस दे देता है। यह मेरे नियम के विरुद्ध है, लेकिन इनकार करते तो नहीं बनता। अगर तुम्हें यह दिखाई दे कि वे सुस्त, काहिल, और कामचोर हैं; तो समझ लो कि शराबी या कुछ ऐसे ही हैं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    इस आदमी की आंखें बड़ी डरावनी थीं वह ऐसे ताकता था, मानो किसी की ख़ून कर डालेगा। उसने कहा—मेरे पास आज खाने को कुछ नहीं है। ठीक इसी तरह।

    बार्थिविक

    विलियम क्या कर रहा था? उसे वहां खड़ा रहना चाहिए था।

    जेक

    [ अपनी गिलास नाक के पास लेजाकर ]

    क्यों दादा! क्या यही सन् ६३ की है?

    [ बार्थिविक गिलास को आंखों के पास किए हुए है। वह उसे नीचे करके नाक के पास ले जाता है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    मुझे उन लोगों से घृणा है जो सच नहीं बोलते।

    [ बाप और बेटे ग्लास के पीछे से आंखें मिलाते हैं ]

    सच बोलने में लगता ही क्या है, मुझे तो यह बड़ा अासान मालूम पड़ता है। असली बात क्या है, इसका पता ही नहीं चलता। ऐसा मालूम होता है, जैसे कोई हमें बना रहा हो।

    बार्थिविक

    [ मानो फ़ैसला सुना रहा हो ]

    नीची ज़ातें अपने पैरों में आप कुल्हाड़ी मारती हैं, अगर हमारे ऊपर भरोसा रक्खें तो उनकी दशा इतनी बुरी न हो।

    मिसेज़ बार्थिविक

    लेकिन उस पर भी उन्हें संभालना मुश्किल है। अाज मिसेज़ जोन्स ही को देखो।

    बार्थिविक

    इस विषय में मैं वही करूंगा जो न्याय संगत है। अभी तीसरे पहर मैं रोपर से मिला था। मैंने यह माजरा उससे कहा, वह आ रहा होगा, यह सब खुफ़िया पुलीस के बयान पर है। मुझे तो बहुत संदेह है। मैंने इस पर बहुत विचार किया है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    वह औरत मेरी आंखों में ज़रा भी नहीं जँची उसे किसी बात की शर्म ही नहीं मालूम होती थी। देखो वही मामला जिस की वह चर्चा कर रही थी। जब वह और उसका मर्द जवान थे। कैसी बेहयाई की बात थी और वह भी तुम्हारे और जैक के सामने। मेरा जी चाहता था कि उसे कमरे से निकाल दूं।

    बार्थिविक

    ओह! वह तो जैसे हैं—-सब जानते हैं पर ऐसी बातों पर

    ग़ौर करते समय हमें तो सोच लेना चाहिये–

    मिसेज़ बार्थिविक

    शायद तुम कहोगे कि उस आदमी के मालिक ने उसे निकाल देने में ग़लती की?

    बार्थिविक

    बिलकुल नहीं। इस विषय में मुझे कोई संदेह नहीं है। मैं अपने दिल से यह पूछता हूं—-

    जैक

    दादा, थोड़ी सी पोर्ट!

    बार्थिविक

    [ सूर्य के उदय और अस्त की ठीक ठीक नक़ल में बोतल को घुमाते हुए ]

    मैं अपने दिल से यह पूछता हूं कि हम किसी को नौकर रखने के पहिले उसके बारे में काफ़ी तौर से जाँच भी कर लिया करते हैं करते हैं या नहीं, ख़ासकर उसके चालचलन के बारे में।

    जैक

    अम्मा, शराब को ज़रा इधर दे दो।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ बोतल बढ़ाकर ]

    क्यों बेटे, तुम बहुत ज़्यादा तो नहीं पी रहे हो?

    [ जैक अपना गिलास भरता है ]

    मार्लो

    [ कमरे में आकर ]

    जासूस स्नो आपसे मिलना चाहता है।

    बार्थिविक

    [ बेचैनी से ]

    अच्छा, कहो अभी एक मिनट में आता हूँ।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ बग़ैर सिर घुमाए हुए ]

    उसे यहीं बुला लो, मर्लो।

    [ स्नो ओवर कोट पहिने अपनी बोलर हैट हाथ में लिए आता है ]

    बार्थिविक

    [ कुछ उठकर ]

    आइये, बन्दगी।

    स्नो

    बन्दगी साहब! बन्दगी मेम साहब! मैं यह बतलाने आया हूं कि उस मामले में मैंने क्या किया। मुझे डर है, कि मुझे कुछ देर हो गई है मैं एक दूसरे मुक़दमे में चला गया था।

    [ चाँदी की डिबिया जेब से निकालता है। बार्थिविक परिवार में सनसनी फैल जाती है ]

    मैं समझता हूं यह ठीक वही चीज़ है।

    बार्थिविक

    ठीक वही, ठीक वही।

    स्नो

    निशान और अंक वैसे ही हैं, जैसे आपने बतलाए थे। मुझे तो इस मामले में ज़रा भी हिचिक नहीं हुई।

    बार्थिविक

    शाबाश। आप भी एक गिलास पीजिये—

    [ पोर्ट की बोतल को देखकर ]

    शेरी की।

    [ शेरी उंडेलता है,]

    जैक, यह मिस्टर स्नो को दे दो।

    [ जैक उठकर गिलास स्नो को दे देता है, तब अपनी कुर्सी पर पड़कर उसे आलस्य से देखता है। ]

    स्नो

    [ शराब पीकर और गिलास को नीचे रखकर ]

    आपसे मिलने के बाद मैं उस औरत के डेरे पर गया। नीचों की बस्ती है। और मैंने सोचा कि ड्यौढ़ी के नीचे ही कानिस्टेबुल खड़ा

    कर दूं। शायद ज़रूरत पड़े और मेरा विचार बिलकुल ठीक निकला।

    बार्थिविक

    सच?

    स्नो

    जी हां। कुछ झमेला करना पड़ा। मैंने उससे पूछा कि तुम्हारे घर में यह चीज़ कैसे आई। वह मुझे कुछ जवाब न दे सकी। हां बराबर चोरी से इनकार करती रही। इस लिये मैंने उसे गिरफ़्तार कर लिया। तब उसका शौहर मुझसे उलझ पड़ा। आख़िर मैंने हमला करने के अपराध में उसे भी गिरफ़्तार कर लिया। घर से पुलीस स्टेशन तक जाने में वह बहुत गर्म होता रहा—बिल्कुल जामे से बाहर—बार बार आप को और आपके लड़के को धमकी देता था कि समझ लूँगा। सच पूछिये तो बड़ा फ़ितना निकला।

    मिसेज़ बार्थिविक

    बड़ा भारी बदमाश है।

    स्नो

    हां, मेम साहब, बड़ा ही उजड्ड असामी!

    जैक

    [ शराब की चुस्की लेता हुआ, मज़े में आकर ]

    पाजी का सिर तोड़ दे।

    स्नो

    मैंने पता लगाया, पक्का शराबी है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मैं तो चाहती हूँ, बचा को कड़ी सज़ा मिले।

    स्नो

    दिल्लगी तो यह कि वह अभी तक यही कहे जाता है कि डिबिया मैंने ख़ुद चुराई।

    बार्थिविक

    डिबिया उसने चुराई।

    [ मुसकिराता है ]

    इसमें उसने क्या फ़ायदा सोचा है?

    स्नो

    वह कहता है कि छोटे साहब पिछली रात को नशे में थे।

    [ जैक अखरोट तोड़ना बन्द करदेता है और स्नो की ओर ताकने लगता है। बार्थिविक की मुसकिराहट ग़ायब हो जाती है, गिलास रख देता है। सन्नाटा छा जाता है—स्नो बारी बारी से हरेक का चेहरा देखता है, और कहता है ]

    वह मुझे अपने घर लाए और ख़ूब ह्विस्की पिलाई, मैंने कुछ खाया न था, नशा ज़ोर कर गया और उसी नशे में मैंने डिबिया उठा ली।

    मिसेज़ बार्थिविक

    गुस्ताख़, पाजी कहीं का!

    बार्थिविक

    आप का ख़्याल है कि वह कल अपने बयान में भी यही कहेगा।

    स्नो

    यही उसको सफ़ाई होगी। कह नहीं सकता बीबी को बचाने के लिए ऐसा कह रहा है, या

    [ जैक की तरफ़ देखकर ]

    इसमें कुछ तत्व भी है। इसका फ़ैसला तो मैजिस्ट्रेट के हाथ में है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ गर्व से ]

    तत्व भी है? किसमें क्या? आपका मतलब समझ में नहीं आता। आप समझते हैं मेरा लड़का ऐसे आदमी को कभी अपने घर नहीं लायेगा!

    बार्थिविक

    [ अंगीठी के पास से, शांत रहने की चेष्टा करके ]

    मेरा लड़का अपनी सफ़ाई कर लेगा। अच्छा जैक, तुम क्या कहते हो?

    ९

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में ]

    वह क्या कहेगा? यही और क्या है कि सब मनगढ़ंत है।

    जैक

    [ दबसट में पड़ कर ]

    बात यह है, बात यह है, कि मुझे इसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं

    मिसेज़ बार्थिविक

    वह तो मैं पहिले ही कहती थी।

    [ स्नो से ]

    वह आदमी दीदा दिलेर बदमाश है।

    बार्थिविक

    [ अपने मन को दबाते हुए ]

    लेकिन जब मेरा लड़का कह रहा है कि इस मामले में कोई तत्त्व नहीं है तो क्या ऐसी दशा में उस आदमी पर मुकदमा चलाना ज़रूरी है।

    स्नो

    पर तो हमले का जुर्म लगाना होगा। मिस्टर जैक बार्थिविक भी पुलीस कचहरी चले आयें तो बड़ा अच्छा हो। बचा जेल जायँगे, यह तो मानी हुई बात है। विचित्र बात यह है कि उसके पास कुछ रुपये भी निकले और एक लाल रेशमी थैली भी थी।

    [ बार्थिविक चौंक पड़ता है; जैक उठता है, फिर बैठ जाता है। ]

    मेम साहब की थैली तो नहीं ग़ायब हो गई?

    बार्थिविक

    [ जल्दी से ]

    नहीं, नहीं, उनकी थैली नहीं खोई।

    जैक

    नहीं, थैली तो नहीं गई।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ मानो स्वप्न देखते हुए ]

    नहीं!

    [ स्नो से ]

    मैं नौकरों से पता लगा रही थी। यह आदमी घर के आस पास चक्कर लगाया करता है। अगर लंबी सज़ा मिल जाय तो खटका निकल जाय। ऐसे बदमाशों से हमारी रक्षा तो होनी ही चाहिये।

    बार्थिविक

    हां, हां, ज़रूर। यह तो सिद्धान्त की बात है। लेकिन इस मामले में हमें कई बातों पर विचार करना है।

    [ स्नो से ]

    इस आदमी पर तो मुक़दमा चलाना ही चाहिये, क्यों, आप भी तो यही कहते हैं?

    स्नो

    अवश्य, इसमें क्या सोचना है।

    बार्थिविक

    [ जैक की ओर उदास भाव से ताकते हुए ]

    मेरी इच्छा नहीं होती कि यह मुक़दमा चलाया जाय। ग़रीबों पर मुझे बड़ी दया आती है। अपने पद का विचार करते हुए यह मानना मेरा कर्तव्य है कि ग़रीबों की हालत बहुत ख़राब है। इनकी दशा में बहुत कुछ सुधार की ज़रूरत है। आप मेरा मतलब समझ रहे होंगे। अगर कोई ऐसी राह निकल आती कि मुक़दमा न चलाना पड़ता तो बड़ी अच्छी बात होती।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में]

    यह क्या कहते हो जाँन? तुम दूसरों के साथ अन्याय कर रहे हो। इसका आशय तो यह है कि हम जायदाद को लोगों की दया पर

    छोड़ दें। जिसका जी चाहे ले ले।

    बार्थिविक

    [ उसे इशारा करने की चेष्टा करके ]

    मैं यह नहीं कहता कि उसने अपराध नहीं किया। मैं इसके सब पहलुओं पर सोच रहा हूँ।

    मिसेज़ बार्थिविक

    यह सब फजूल, हर काम का वक्त होता है।

    स्नो

    [ छकु बनावटी आवाज़ में ]

    मैं यह बता देना चाहता हूँ जनाब, कि चोरी का इलज़ाम उठा लेने से कोई फ़ायदा न होगा, क्योंकि हमले के मुक़दमें में सभी बातें खुल ही जायँगी।

    [ जैक की ओर मार्मिक दृष्टि से देखता है ]

    और जैक, मैं पहले अर्ज़ कर चुका हूं, वह मुक़दमा ज़रूर चलाया जायगा।

    बार्थिविक

    [ जल्दी से ]

    हाँ, हाँ, यह तो होगा ही। उस स्त्री के विचार से मैं कह रहा हूं, यह तो मेरा अपना ख्याल है।

    स्नो

    अगर मैं आप की जगह होता तो इस मामले में ज़रा भी दखल न देता। इस में कोई बाधा पड़ने का भय नहीं है। ऐसे मामले में चट पट तय हो जाते हैं।

    बार्थिविक

    [ संदेह के भाव से ]

    अच्छा, यह बात? अच्छा, यह बात है?

    जैक

    [ सचेत होकर ]

    अच्छा! मुझे अपने बयान में क्या कहना पड़ेगा?

    स्नो

    यह तो आप ख़ुद जान सकते हैं।

    [ दरवाजे तक जाकर ]

    शायद कोई नई बात खड़ी हो जाय। अच्छा यह है कि आप एक वकील कर लीजिये। हम ख़ानसामा को यह साबित करने के लिए तलब करेंगे कि चीज़ वास्तव में चोरी गई। अब मुझे आज्ञा दीजिये, मुझे आज बहुत काम है। ग्यारह बजे के बाद किसी समय मुक़दमा पेश होगा। बंदगी हुजूर, बंदगी मेम साहब! मुझे कल यह डिबिया अदालत में पेश करनी पड़ेगी, इस लिए यदि आपको कोई आपत्ति न हो तो मैं इसे अपने साथ लेता जाऊं।

    [ वह डिबिया उठा लेता और सलाम करले चला जाता। बार्थिविक उसके साथ जाने के लिए उठता है, और अपने हाथों को कोट के पीछे रखकर निराश होकर बोलता है ]

    मैं चाहता हूँ कि तुम इन बातों में दखल न दिया करो। मगर तुम्हारी ऐसी आदत है कि समझो या न समझो दख़ल हरेक बात

    में दोगी। मारा–सब मामला चौपट कर दिया।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ रुखाई से ]

    मेरी समझ में नहीं आता तुमहारा मतलब क्या है। अगर तुम अपने हक़ के लिए नहीं खड़े हो सकते, तो मैं तो खड़ी हो सकती हूँ। मुझे तुम्हारे सिद्धान्त ज़रा भी नहीं भाते। उन्हें लेकर तुम चाटा करो।

    बार्थिविक

    सिद्धान्त! तुम हो किस फेर में। सिद्धान्तों की यहाँ चर्चा ही क्या? क्या तुम्हें मालूम नहीं कि पिछली रात को जैक नशे में चूर था?

    जैक

    अब्बा जान!

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ भयभीत होकर खड़ी हो जाती है ]

    जैक, यह क्या बात है?

    जैक

    कोई बात नहीं है, अम्मा। मैंने केवल भोजन किया था। सभी खाते हैं। मेरा मतलब है, यानी मेरा मतलब है—आप मेरा मतलब समझ गई होंगी। इसे नशे में चूर होना नहीं कहते। आक्सफ़ोर्ड में तो सभी मुँह का मज़ा बदल लिया करते हैं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    यह बड़ी बेहूदा बात है। अगर तुम लोग आक्सफ़ोर्ड में यही सब किया करते हो—

    जैक

    [ क्रोध से ]

    तो फिर आप लोगों ने मुझे वहाँ भेजा क्यों? जैसे और सब रहते हैं वैसेही तो मुझे भी रहना पड़ेगा। इतनी सी बात को नशे में चूर कहना हिमाकत। हाँ, मुझे खेद अवश्य है। आज दिन भर सिर में बड़ा दर्द रहा।

    बार्थिविक

    छी! अगर तुम्हें मामूली सी तमीज़ भी होती और तुम्हें इतना सा भी याद होता कि जब तुम यहाँ आए तो क्या क्या बातें हुईं तो हमें मालूम हो जाता कि इस बदमाश की बातों में कितना सच है। मगर अब तो कुछ समझ में ही नहीं आता। गोरख धंधा सा होकर रह गया!

    जैक

    [ घूरता हुआ मानो अधूरी बातें याद आ रही हैं ]

    कुछ कुछ याद आता है—फिर सब भूल जाता हूँ।

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्या कहते हो जैक? क्या तुम्हें इतना नशा था कि तुम्हें इतना भी याद नहीं?–

    जैक

    यह बात नहीं है, अम्मा। मुझे यहा आने की ख़ूब याद है—मैं ज़रूर आया हूंगा—

    बार्थिविक

    [ गुरसे से बेक़ाबू होकर, इधर से उधर तक टहलता हुआ ]

    ख़ूब!और वह मनहूस थैली कहां से आगई! खुदा खैर करे! ज़रा सोचो तो जैक! यह सारी बातें पत्रों में निकल जायँगी। किसी को मालूम था कि मामला यहां तक पहुँचेगा। इससे तो यह कहीं अच्छा होता कि एक दर्जन डिबिये खो जातीं और हम लोग ज़बान न खोलते!

    [ पत्नी से ]

    यह सब तुम्हारी करतूत है। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था। अच्छा हो कहीं रोपर आ जाता।

    मिसेज़ बार्थिविक

    ( तीव्र स्वर से )

    मेरी समझ में नहीं आता तुम क्या बक रहे हो, जाँन।

    बार्थिविक

    [ उसकी तरफ़ मुड़ कर ]

    नहीं तुम! अजी—तुम—तुम कुछ जानती नहीं।

    [ तेज़ आवाज़ से ]

    आखिर! वह रोपर कहां मर गया! अगर वह इस दलदल से निकलने की कोई राह निकाल दे, तो मैं जानूँ कि वह किसी काम का आदमी है! मैं बदकर कहता हूँ कि इससे निकलने का अब कोई रास्ता नहीं है। मुझे तो कुछ सूझता नहीं।

    जैक

    इधर सुनिये, अब्बाजान को क्यों दिक करती हो? मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि मैं थक कर बेदम हो गया था, और मुझे इसके सिवा कुछ याद नहीं है कि मैं घर आया।

    [ बहुत मंद स्वर में ]

    और रोज़ की तरह पलंग पर जाकर सो रहा।

    बार्थिविक

    पलंग पर चले गये? कौन जानता है तुम कहां चले गये मुझे तुम्हारे ऊपर अब विश्वास नहीं रहा। मुझे क्या पता कि तुम ज़मीन पर पड़ रहे होगे।

    जैक

    [ बिगड़ कर ]

    ज़मीन पर नहीं, मैं—-

    बार्थिविक

    [ सोफ़ा पर बैठ कर ]

    इसकी किसे परवाह है कि तुम कहां सोये थे? उस वक्त क्या होगा जब वह कह देगा……डूब मरने की बात होगी!

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्या?

    [ सन्नाटा ]

    बात क्या हुई, बोलते क्यों नहीं?

    जैक

    कुछ नहीं—-

    मिसेज़ बार्थिविक

    कुछ नहीं। कुछ नहीं इससे तुम्हारा क्या मतलब है, जैक? तुम्हारे दादा इसके लिए आसमान सिर पर उठा रहे हैं—

    जैक

    वह थैली मेरी है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम्हारी थैली? तुम्हारे पास थैली कब थी? तुम ख़ूब जानते हो तुम्हारे पास थैली न थी।

    जैक

    ख़ैर, दूसरे ही की सही—मगर यह केवल दिल्लगी थी। मुझे उस सड़ी सी थैली को लेकर क्या करना था?

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुम्हारा मतलब है कि क्या किसी दूसरे की थेली थी और उसे इस बदमाश ने उड़ा ली?

    बार्थिविक

    जी हां! थैली उसने उड़ा ली। जोन्स वह आदमी नहीं है कि इस बात पर परदा डाल दे। वह इसे ख़ूब नमक मिर्च लगाकर बयान करेगा। समाचारपत्रों में इसकी चर्चा होगी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। किस बात का यह सब क़िस्सा है?

    [ जैक के ऊपर झुककर प्यार से ]

    जैक, बेटा, बताओ तो क्या बात है। डरो मत। साफ़ साफ़ बतादो, बात क्या है?

    जैक

    अम्मा, ऐसी बातें न करो!

    मिसेज़ बार्थिविक

    कैसी बात, बेटा?

    जैक

    कुछ नहीं, यों ही। मुझे कुछ याद नहीं कि वह चीज़ मेरे पास कैसे आगई। मुझसे और उससे एक पकड़ हो गई—मुझे कुछ ख़बर न थी कि मैं क्या कर रहा हूँ—मैंने-मैंने—शायद मैंने—तुम समझ गई होगी—शायद मैंने थैली उसके हाथ से छीन ली।

    मिसेज़ बार्थिविक

    उसके हाथ से? किसके हाथ से? कैसी थैली? किसकी थैली?

    जैक

    अजी, मुझे कुछ याद नहीं—-

    [ निराश और ऊंची आवाज़ में ]

    किसी औरत की थैली थी।

    १७

    मिसेज़ बार्थिविक

    किसी औरत की? नहीं! नहीं! जैक! ऐसा न कहो।

    जैक

    [ उछल कर ]

    तुम मानती ही नहीं थी तो मैं क्या करता। मैं तो नहीं बताना चाहता था। मेरा क्या क़सूर है?

    [ द्वार खुलता है और मारलो एक आदमी को अंदर लाता है अधेड़, कुछ मोटा आदमी है। शाम के कपड़े पहने हुए है। मूछें लाल और पतली हैं, आंखें काली और तेज़। उसकी भवें चीनियों की सी हैं। ]

    मारलो

    रोपर साहब आये हैं हुज़ूर!

    [ वह कमरे से चला जाता है ]

    रोपर

    [ तेज़ आँखों से चारों ओर देख कर ]

    कैसे मिज़ाज हैं?

    [ जैक और मिसेज़ बार्थिविक दोनों चुप बैठे रहते हैं ]

    बार्थिविक

    [ जल्दी से आकर ]

    शुक्र है आप आ तो गए! आप को याद है मैंने आज शाम को आप से क्या कहा था; जासूस अभी यहां आया था।

    रोपर

    डिबिया मिल गई?

    बार्थिविक

    हाँ, डिबिया तो मिल गई, पर एक बात है। यह मज़दूरनी का काम न था। उसके शराबी और ठलुये शौहर ने वे चीज़ें चुराई थीं। वह कहता है कि यही रात को उसे घर में लाया था

    [ वह जैक की तरफ़ हाथ उठाता है, जो ऐसा दबक जाता है मानों वार बचाता हो ]

    आप को कभी इसका विश्वास होगा।

    [ रोपर हंसता है और उत्तेजित हो कर शब्दों पर ज़ोर देता हुआ ]

    यह हँसी की बात नहीं है मैंने जैक का क़िस्सा भी आप से कहा था। आप समझ गए होंगे—बदमाश दोनों चीजें उठा ले गया—वह सत्यानासी थैली भी लेगया। अखबारों में इसकी चर्चा होगी।

    रोपर

    [ भवें चढ़ाकर ]

    हूँ! थैली! बड़े लोगों की दशा? आपके साहबज़ादे क्या कहते हैं?

    बार्थिविक

    उसे कुछ याद नहीं। ऐसा अंधेर कभी देखा था? पत्रों तक यह बात पहुँचेंगी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ हाथों से आंखों को छिपाकर ]

    नहीं! नहीं! यह बात तो नहीं हैं—

    [ बार्थिविक और रोपर घूम कर उसकी ओर देखने हैं ]

    बार्थिविक

    उस औरत पर कह रही हैं। वह बात अभी अभी इनके कानों में पड़ी है।

    [ रोपर सिर हिलाता है और मिसेज़ बार्थिविक अपने होंठों को दबाकर मन्द दृष्टि से जैक को देखती है और मेज़ के सामने बैठ जाती है ]

    आखिर, क्या करना चाहिए रोपर? वह लुच्चा जोन्स इस थैली वाले मामले को खूब बढ़ावेगा, बात का बतंगड़ बनादेगा।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मुझे विश्वास नहीं आता कि जैक ने थेली ली।

    बार्थिविक

    क्या अब भी कोई संदेह है? वह औरत अाज सवेरे अपनी थैली माँगने आई थी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    यहां? इतनी बेहया है। मुझे क्यों नहीं बताया?

    [ वह एक दूसरे के चेहरे की तरफ़ ताकती है, कोई उसे जवाब नहीं देता। सन्नाटा हो जाता है। ]

    बार्थिविक

    [ चौंककर ]

    क्या करना होगा, रोपर?

    रोपर

    [ धीरे से जैक से ]

    तुमने कुंजी तो दरवाज़े में नहीं छोड़ दी थी?

    जैक

    [ रुखाई से ]

    हां, छोड़ तो दी थी।

    बार्थिविक

    या ईश्वर! अभी और आगे न जाने क्या क्या होगा?

    मिसेज़ बार्थिविक

    मुझे विश्वास है कि तुम उसे घर में नहीं लाए,थे। जैक। यह सरासर झूठी बात है मैं जानती हूँ इसमें सचाई की गंध तक नहीं है, मिस्टर रोपर।

    रोपर

    ( यकायक )

    तुम रात कहां सोए थे?

    जैक

    ( तुरन्त )

    सोफ़ा पर—वहां–

    ( कुछ हिचिक कर )

    यानी—मैं—

    बार्थिविक

    सोफ़ा पर! क्या तुम्हारा मतलब यह है कि चारपाई पर गए ही नहीं।

    जैक

    ( मुँह लटका कर )

    नहीं।

    बार्थिविक

    अगर तुम्हें कुछ भी याद नहीं है तो यह इतना कैसे याद रहा?

    जैक

    क्यों कि आज सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने अपने को वहीं पाया।

    मिसेज़ बार्थिविक

    क्या कहा?

    बार्थिविक

    या खुदा!

    जैक

    और मिसेज़ जोन्स ने मुझे देखा! मैं चाहता हूँ कि आप लोग मुझे यों दिक़ न करें।

    रोपर

    आपको याद है कि आपने किसी को शराब पिलाई थी?

    जैक

    हाँ, मैं क़सम खाकर कहता हूँ कि मुझे एक आदमी की याद आ रही है—उस आदमी के—

    [ रोपर की तरफ़ देखता है ]

    क्या आप मुझसे चाहते हैं कि—

    रोपर

    [ बिजली की तेज़ी से ]

    जिसका चेहरा गंदा है!

    जैक

    [ प्रसन्न होकर ]

    हाँ, वही वही! मुझे साफ़ याद आ रहा है—

    [ बार्थिविक अचानक खिसक जाता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक क्रोध से रोपर की तरफ़ देखती है और अपने बेटे की बाँह छूती है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुमको बिलकुल याद नहीं ह! यह कितनी हँसी की बात है। मुझे उस आदमी के यहाँ आने का बिलकुल विश्वास नहीं है।

    बार्थिविक

    तुम्हें सच बोलना चाहिए। चाहे यही सच क्यों न हो? लेकिन अगर तुम्हें याद आता है कि तुमने ऐसी बेहूदगी की तो तुम फिर मुझसे कोई अाशा न रक्खो।

    जैक

    [ उनकी तरफ़ घूर कर ]

    आख़िर आप लोग मुझसे चाहते क्या हैं?

    मिसेज़ बार्थिविक

    जैक!

    जैक

    जी हाँ, मेरी समझ में बिलकुल नहीं आता कि आप लोगों की इच्छा क्या है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    हम लोग यही चाहते हैं कि तुम सच बोलो और कह दो कि तुमने उस नीच को घर में नहीं बुलाया।

    बार्थिविक

    बेशक, अगर तुम ख़याल करते हो, कि तुमने इस बेशरमी से उसे ह्विस्की मिलाई और अपनी कर तूत उसे दिखाई और तुम्हारी दशा इतनी ख़राब थी कि तुम्हें वें बातें बिलकुल याद नहीं, तो—

    रोपर

    [ जल्दी से ]

    मुझे ख़ुद कोई बात याद नहीं रहती। याददाश्त इतनी कमज़ोर है।

    बार्थिविक

    [ निराशा भाव से ]

    तो मैं नहीं जानता कि तुम्हें क्या कहना पड़ेगा!

    रोपर

    [ जैक से ]

    तुम्हें कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। अपने को इस झमेले में मत डालो। औरत ने चीज़ें चुराई या मर्द ने चीज़ें चुराईं आपको इससे कुछ मतलब नहीं। आप तो सोफ़ा पर सो रहे थे।

    मिसेज़ बार्थिविक

    तुमने दरवाज़े में कुंजी लगी हुई छोड़ दो, यही क्या कम है? अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।

    [ उसके माथे को प्यार से छुकर ]

    तुम्हारा सिर आज कितना गर्म है?

    जैक

    लेकिन मुझे यह तो बतलाइए कि मुझे करना क्या होगा?

    [ क्रोध से ]

    मैं नहीं चाहता, कि इस तरह चारों ओर से मुझे दिक़ करें।

    [ मिसेज़ बार्थिविक उसके पास से हट जाती है। ]

    रोपर

    [ जल्दी से ]

    आप यह सब कुछ भूल जायँ। आप तो सोये थे।

    जैक

    क्या कल मेरा कचहरी जाना जरूरी है?

    रोपर

    [ सिर हिला कर ]

    नहीं।

    बार्थिविक

    [ ज़रा शान्तचित्त होकर ]

    सचमुच!

    रोपर

    जी हाँ!

    बार्थिविक

    लेकिन आप तो जायँगे?

    रोपर

    जी हाँ!

    जैक

    [ बनावटी प्रसन्नता से ]

    बड़ी इनायत है! में यही चाहता हूँ कि मुझे वहाँ जाना न पड़े।

    [ सिर पर हाथ रखकर ]

    मुझे क्षमा कीजिएगा। अाज सिर में ज़ोरों का दर्द है।

    [ बाप की तरफ़ से माँ की तरफ़ देखता है ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ जल्दी से घूम कर ]

    अच्छा, जाओ बेटा!

    जैक

    अच्छा, अम्माँ!

    [ वह चला जाता है। मिसेज़ बार्थिविक लम्बी सांस खींचती है। सन्नाटा हो जाता है। ]

    बार्थिविक

    यह बहुत सस्ते छूट गए! अगर मैंने उस औरत को रुपए न दिए होते, तो उसने ज़रूर दावा किया होता।

    रोपर

    अब आपको मालूम हुआ कि धन कितना उपयोगी है।

    बार्थिविक

    मुझे अब भी सन्देह है कि हमें सच को छिपा देना चाहिए या नहीं।

    रोपर

    चालान होगा।

    बार्थिविक

    क्या? आपका मनशा है कि इन्हें अदालत में जाना पड़ेगा?

    रोपर

    हाँ?

    बार्थिविक

    अच्छा! मैंने समझा था कि आप—देखिए मिस्टर रोपर! उस थैली का ज़िक्र मिस्टर काग़ज़ों में न आने दीजिएगा।

    [ रोपर अपनी छोटी आँखें उसके चेहरे पर जमा देता है और सिर हिलाता है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    मिस्टर रोपर, क्या आपके ख़याल में यह मुनासिब नहीं है कि जोन्स परिवार का हाल मैजिस्ट्रेट से कह दिया जाय। मेरा मतलब यह है कि शादी के पहले उनका आपस में कितना अनुचित सम्बन्ध था। शायद जॉन ने आप से नहीं कहा।

    रोपर

    यह तो कोई मार्के की बात नहीं।

    ११

    मिसेज़ बार्थिविक

    मार्के की बात नहीं।

    रोपर

    निजी बात है। शायद मैजिस्ट्रेट पर भी यही बीत चुकी हो।

    बार्थिविक

    [ पहलू बदल कर, मानो बोझ खिसका रहा है ]

    तो अब आप इस मामले को अपने हाथ में रखेंगे?

    रोपर

    अगर ईश्वर की कृपा हुई!

    [ हाथ बढ़ाता है ]

    बार्थिविक

    [ विरक्त भाव से हाथ हिलाकर ]

    ईश्वर की इच्छा? क्या? आप चले?

    रोपर

    जी हाँ! ऐसा ही मेरे पास एक दूसरा मुक़दमा भी है।

    [ मिसेज़ बार्थिविक का झुककर सलाम करता है और चला जाता है। बार्थिविक उसके पीछे-पीछे अन्त तक बातें करता जाता है। मिसेज़ बार्थिविक मेज़ पर बैठी हुई सिसक-सिसक कर रोने लगती है; बार्थिविक लौटता है। ]

    बार्थिविक

    [ आप ही आप ]

    बदनामी होगी।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तुरत अपने रंज को छिपाकर ]

    मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि रोपर ने ऐसी बात को हँसी में क्यों उड़ा दिया?

    बार्थिविक

    [ विचित्रभाव से ताक कर ]

    तुम—तुम्हारी समझ में कोई बात नहीं आती। तुम्हें रत्ती भर भी समझ नहीं है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ क्रोध से ]

    तुम मुझसे कहते हो कि मुझ में समझ नहीं है?

    बार्थिविक

    [ घबड़ा कर ]

    मैं—बहुत परेशान हूं। सारी बात आदि से अन्त तक मेरे सिद्धान्त के विरुद्ध हैं।

    मिसेज़ बार्थिविक

    मत बको। तुम्हारा कोई सिद्धान्त भी है। तुम्हारे लिए दुनिया में डरने के सिवा और कोई सिद्धान्त नहीं है।

    बार्थिविक

    [ खिड़की के पास जाकर ]

    मैं अपनी ज़िन्दगी में कभी न डरा। तुमने सुना है, रोपर क्या कहता था? जिस आदमी के घर में ऐसी वारदात हो गई हो, उसके होश उड़ा देने को इतनी बात काफ़ी है। हम जो कुछ कहते या करते हैं, वह हमारे मुँह से निकल ही पड़ता है। भूत-सा सिर पर सवार रहता है। मैं इन बातों का आदी नहीं हूँ।

    [ वह खिड़की को खोल देता है मानो उसका दम घुट रहा हो। किसी लड़के के सिसकने की धीमी आवाज़ सुनाई देती है। ]

    यह कैसी आवाज़ है?

    [ वे सब कान लगा कर सुनते हैं। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में ]

    मुझसे रोना नहीं सुना जाता। मैं मार्लो को भेजती हूँ कि इसे रोक दे। मेरे सारे रोएँ खड़े हो गए।

    [ घंटी बजाती है ]

    बार्थिविक

    मैं खिड़की बन्द किए देता हूँ, फिर तुम्हें कुछ न सुनाई देगा।

    [ वह खिड़की बन्द कर देता है और सन्नाटा हो जाता है। ]

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ तीव्र स्वर में ]

    इससे कोई फ़ायदा नहीं। मेरा दिल धड़क रहा है। मुझे किसी बात से इतनी घबड़ाहट नहीं होती, जितनी किसी बालक के रोने से।

    [ मार्लो आता है ]

    यह कैसा रोने का शोर है मार्लो? किसी बच्चे की अावाज़ मालूम होती है।

    बार्थिविक

    बच्चा है। उस मुँडेर से चिपटा हुआ दिखाई तो पड़ता है।

    मार्लो

    [ खिड़की खोलकर और बाहर देखकर ]

    यह मिसेज़ जोन्स का छोटा लड़का है, हज़ूर! अपनी माँ को खोजता हुअा यहाँ आया है।

    मिसेज़ बार्थिविक

    [ जल्दी से खिड़की के पास जाकर ]

    कैसा गरीब लड़का है! जॉन, हमें यह मुकदमा न चलाना चाहिए।

    बार्थिविक

    [ एक कुर्सी पर धम से बैठकर ]

    लेकिन अब तो बात हमारे हाथ से निकल गई!

    [ मिसेज़ बार्थिविक खिड़की की तरफ़ पीठ कर लेती है, उसके चेहरे पर बेचैनी का भाव दिखाई देता है, वह अपने ओंठ दबाए खड़ी होती है। रोना फिर शुरू हो जाता है। बार्थिविक हाथों से अपने कान बन्द कर लेता है। और मार्लो खिड़की बन्द कर देता है। रोना बन्द हो जाता है। ]

    पर्दा गिरता है।

    अंक ३

    दृश्य १

    आठ दिन गुज़र गए हैं। लन्दन के पुलिसकोर्ट का दृश्य है। एक

    बजा है। एक चँदवे के नीचे न्याय का आसन है। इस चँदवे के ऊपर शेर और गैंडे की प्रतिमा बनी हुई है। आँख के सामने एक मुरझाई हुई सूरत का न्यायाधीश अपने कोट के पिछले भाग को गर्म कर रहा है। और दो छोटी छोटी लड़कियों को घूर रहा है। जो नीले और नारंगी चीथड़े पहने हुए हैं। कपड़ों का रंग बिलकुल उड़ गया है। ये लड़कियां कठघरे में लाई जाती हैं। गवाहों के कठघरे के पास एक अफ़सर अोवर कोट पहने खड़ा है। उसकी दाढ़ी छोटी और भूरी है। छोटी लड़कियों के बग़ल में एक गंजा पुलिस कांस्टेबिल खड़ा है। अगली बेंच पर बार्थिविक और रोपर बैठे हुए हैं। जैक उनके पीछे बैठा है। जंगलेदार कटघरे में कुछ फटेहाल मर्द और औरतें पीछे खड़ी हैं। कई मोटे ताज़े कांस्टेबिल इधर उधर खड़े या बैठे हैं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ पिता-भाव दिखाता हुअा कठोर स्वर में ]

    अब हमें इन लड़कियों का झगड़ा तय कर देना चाहिए।

    अहलमद

    थेरसा लिवेंस! माड लिवेंस!

    [ गंजा कांस्टेबिल छोटी लड़कियों को दिखाता है जो चुप-चाप, स्थिति को समझती हुई विरक्त भाव से खड़ी हैं। ]

    दारोग़ा!

    [ दारोग़ा गवाहों के कठघरे में आता है। ]

    तुम अदालत के सामने जो बयान दोगे, वह बिलकुल सच, पूरा पूरा सच और सच के सिवा और कुछ न होगा। ईश्वर तुम्हारी मदद करे! इस किताब को चूमो।

    [ दारोग़ा किताब चूमता है ]

    दारोग़ा

    [ एक ही आवाज़ में, हर एक अवाज़ के अन्त में रुकता हुआ ताकि उसका बयान लिखा जा सके। ]

    आज सबेरे क़रीब दस बजे मैंने इन दोनों लड़कियों को ब्ल्यूस्ष्ट्रीट में एक सराय के बाहर रोते हुए पाया। जब मैंने पूछा कि तुम्हारा घर कहां है तो उन्होंने कहा कि हमारा घर नहीं है। माँ कहीं चली गई है। बाप के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उसके पास कोई काम नहीं है। जब पूछा कि तुम लोग रात कहां साईं थीं, तो उन्होंने अपनी फूफू का नाम लिया। हज़ूर, मैंने तहक़ीक़ात की है। औरत घर से निकल गई है और मारी मारी फिरती है। बाप बेकार है और मामूली सराय में रहता है। उसकी बहन के अपने ही आठ लड़के हैं वह कहती है कि मैं इन लड़कियों का अब पालन नहीं कर सकती।

    मैजिस्ट्रेट

    [ चंदवे के नीचे अपनी जगह पर आकर ]

    तुम कहते हो कि माँ मारी मारी फिरती है। तुम्हारे पास क्या सबूत है?

    दारोग़ा

    हज़ूर, उसका शौहर यहां मौजूद है।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। उसे पेश करो।

    [ लिवेंस का नाम पुकारा जाता है। मैजिस्ट्रेट आगे झुक जाता है और कठोर दया से लड़कियों की ओर देखता है। लिवेंस अंदर आता है। उसके बाल खिचड़ी हो गए हैं। कालर की जगह गुलूबन्द लगाए हुए है। वह गवाहों के कठघरे के पास खड़ा होजाता है। ]

    अच्छा, तुम इनके बाप हो? तो तुम इन लड़कियों को घर में क्यों नहीं रखते? यह क्या बात है कि तुम इनको इस तरह सड़कों पर फिरने के लिए छोड़ देते हो?

    लिवेंस

    हज़ूर, मेरे कोई घर नहीं है। मेरे खाने का तो ठिकाना नहीं है। मैं बिलकुल बेकार हूं और न मेरे पास कुछ है जिससे इनका पालन कर सकूँ।

    मैजिस्ट्रेट

    यह कैसे?

    लिवेंस

    [ शर्मा कर ]

    मेरी बीबी निकल गई और सारी चीज़ें गिरों रखदीं।

    मैजिस्ट्रेट

    लेकिन तुमने उसे ऐसा करने क्यों दिया?

    लिवेंस

    मैं उसे रोक नहीं सका। उधर में काम की तलाश में गया, इधर यह निकल भागी।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तुम उसे मारते पीटते थे?

    लिवेंस

    [ ज़ोर देकर ]

    हज़ूर, मैंने कभी उसे तिनके से भी न मारा?

    मैजिस्ट्रेट

    तब क्या बात थी, क्या वह शराब पीती थी?

    लिवेंस

    [ धीमी अवाज़ में ]

    हाँ, हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    उसका चाल चलन अच्छा न था?

    लिवेंस

    [ धीमी आवाज़ में ]

    हाँ, हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    अब कहां है?

    लिवेंस

    नहीं मालूम, हज़ूर! वह एक आदमी के साथ निकल गई और तब मैं—

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां, ठीक है! यहां कोई उसे जानता थोड़े ही है?

    [ गंजे कांस्टेबिल से]

    क्या यहां कोई जानता है उसे?

    दारोग़ा

    इस इलाके में तो कोई नहीं जानता, हज़ूर! लेकिन मैंने पता लगाया है कि—-

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां, ठीक है! इतना ही काफ़ी है।

    [ बाप से ]

    तुम कहते हो कि वह घर से निकल गई और इन लड़कियों को छोड़ गई। तुम इनके लिए क्या इन्तजाम कर सकते हो? तुम देखने में तो हट्टे-कट्टे आदमी हो!

    लिवेंस

    हाँ, हज़ूर, हट्टा-कट्टा तो हूं, और काम भी करना चाहता हूँ, लेकिन अपना कोई बस नहीं। कहीं मज़दूरी मिले तब तो?

    मैजिस्ट्रेट

    लेकिन तुमने कोशिश की थी?

    लिवेंस

    हज़ूर, सब कुछ करके हार गया! कोशिश करने में कोई कसर नहीं उठा रखी।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा–

    दारोग़ा

    [ सन्नाटा हो जाता है ]

    अगर हज़ूर का ख़याल हो कि ये बच्चे अनाथ हैं तो हम उनको लेने को तैयार हैं।

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां, मैं जानता हूँ! लेकिन मेरे पास कोई ऐसी शहादत नहीं है कि यह आदमी अपने बच्चों की ठीक तौर से देख रेख नहीं कर सकता।

    [ वह उठता है और आग के आग चला जाता है। ]

    दारोग़ा

    हज़ूर, इनकी माँ इनके पास आती जाती है।

    मैजिस्ट्रेट

    हां, हां! माँ इस योग्य नहीं है कि बच्चे उसे दिए जायँ।

    [ बाप से ]

    तुम क्या कहते हो?

    लिवेंस

    हज़ूर, मैं इतना ही कहता हूँ कि अगर मुझे काम मिल जाय तो मैं बड़ी ख़ुशी से उनकी परवरिश करूँगा। लेकिन मैं क्या करूँ हज़ूर, मेरे तो भोजन का ठिकाना नहीं। सराय में पड़ा रहता हूँ। मैं मज़बूत आदमी हूँ, काम करना चाहता हूँ। दूसरों से दूनी हिम्मत रखता हूं लेकिन हज़ूर देखते हैं कि मेरे बाल पक गए हैं ब़ुखार के सबब से।

    [ अपने बाल छूता है ]

    इस लिए मैं जँचता नहीं। शायद इसी लिए मुझे कोई नौकर नहीं रखता।

    मैजिस्ट्रेट

    [ आहिस्ता से ]

    हाँ, हाँ! मैं समझता हूँ कि यह एक मामला है।

    [ लड़कियों की तरफ़ कड़ी आँखों से देख कर ]

    १२

    तुम चाहते हो कि ये लड़कियाँ अनाथालय में भेज दी जायँ!

    लिवेंस

    हाँ हज़ूर, मेरी तो यही इच्छा है।

    मैजिस्ट्रेट

    मैं एक हफ़्ते की मुहलत देता हूँ। आज ही के दिन फिर लाना। अगर उसवक्त उचित हुआ तो मैं हुक्म दे दूँगा।

    दारोग़ा

    आज के दिन हज़ूर!

    [ गंजा कांस्टेबिल लड़कियों का कंधा पकड़े ले जाता है। बाप उनके पीछे पीछे जाता है। मैजिस्ट्रेट अपनी जगह पर लौट आता है और झुक कर क्लर्क से सायँ सायँ बातें करता हैं। ]

    बार्थिविक

    [ हाथ की आड़ से ]

    बड़ा करुण दृश्य है रोपर मुझे तो उनपर बड़ी दया आ रही है।

    रोपर

    पुलिस कोर्ट में ऐसे सैकड़ों आया करते हैं।

    बार्थिविक

    बड़ी दिल दुखानेवाली बात है। लोगों की दशा जितना ही देखता हूं, उतना ही मेरे दिल पर असर होता है। मैं पार्लमेंट में उनका पक्ष लेकर अवश्य खड़ा होऊँगा। मैं एक प्रस्ताव—-

    [ मैजिस्ट्रेट क्लार्क से बोलना बन्द कर देता है। ]

    क्लार्क

    हिरासतवालो!

    [ बार्थिविक एकाएक रुक जाता है। कुछ हलचल होती है और मिसेज़ जोन्स सदर दरवाज़े से अन्दर आती है। जोन्स पुलिस वालों के साथ कैदियों के दरवाज़े से आता है। वे कठघरे के अन्दर एक कतार में खड़े होते हैं। ]

    क्लार्क

    जेम्स जोन्स! जेन जोन्स!

    अर्दली

    जेन जोन्स?

    बार्थिविक

    [ धीरे से ]

    देखो रोपर, उस थैली का ज़िक्र न आने पाए। चाहे जो कुछ हो तुम उसे समाचार पत्रों में न आने देना।

    [ रोपर सिर हिलाता है। ]

    गंजा कांस्टेबिल

    चुप रहो।

    [ मिसेज़ जोन्स काले पतले फटे हुए कपड़े पहने हुए है। उसकी टोपी काली है। वह कठघरे के सामने की दीवार पर हाथ रक्खे चुप चाप खड़ी हो जाती है। जोन्स कठघरे की पिछली दीवार टेक कर खड़ा हो जाता है। और इधर उधर साहस भरी दृष्टि से ताकता है। उसका चेहरा उतरा हुआ है और बाल बढ़े हुए हैं। ]

    क्लार्क

    [ अपने काग़ज़ देखकर ]

    हज़ूर, यह वही मुक़दमा है जो पिछले बुधवार को ज़ेर तजवीज़ था। एक चाँदी की सिगरेट की डिबिया की चोरी और पुलिस पर हमला—दोनों मुलज़िमों का साथ साथ विचार हो रहा था। जेम्स जोन्स जेन जोन्स।

    मैजिस्ट्रेट

    [ घूरकर ]

    हाँ, हाँ, मुझे याद है।

    क्लार्क

    जेन जोन्स!

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ, हज़ूर।

    क्लार्क

    क्या तुम स्वीकार करती हो कि तुमने एक चांदी की सिग्रेट की डिबिया जिसकी क़ीमत ५ पौं० १० शिलिंग है, जान बार्थिविक मेंबर पार्लमेंट के मकान से, इस्टर मंडे के दिन ग्यारह बजे रात और ईस्टर ट्यूसडे आठ बजे दिन के बीच में चुराई थी। बोलो हाँ या नहीं?

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमे स्वर में ]

    नहीं हज़ूर, मैने नहीं—

    क्लार्क

    जेम्स जोन्स, क्या तुम स्वीकार करते हो, कि तुमने एक चाँदी की सिग्रेट की डिबिया जिसकी क़ीमत ५ पौं० १० शिलिंग है, जान बार्थिविक मेंबर पार्लमेंट के मकान से इस्टर मंडे को ११ बजे रात और ईस्टर ट्यूसडे के ८ बजे दिन के बीच में चुराई? और जब पुलीस ईस्टर टयूसडे को तीन बजे शाम के वक्त अपना काम करना चाहती थी, तो तुमने उसपर हमला किया? बोलो हाँ या नहीं।

    जोन्स

    [ रुखाई से ]

    हाँ, लेकिन इसके बारे में मुझे बहुत सी बातें कहनी हैं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ क्लार्क से ]

    हाँ, हाँ! लेकिन यह क्या बात है कि इन दोनों पर एक ही जुर्म लगाया गया है? क्या वे मियां बीबी हैं?

    क्लार्क

    हाँ हज़ूर! आपको याद है; कि आपने मुजरिम को हिरासत में रक्खा था कि शौहर के बयान पर और भी शहादत ली जा सके।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तभी से ये दोनों हवालात में हैं?

    क्लार्क

    आपने औरत को उसीकी ज़मानत पर छोड़ दिया था।

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ, हाँ! यह चाँदी की डिबियावाला मामला है। मुझे अब याद आया। अच्छा।

    क्लार्क

    टामस मार्लो?

    {{c|[ टामस मार्लो की पुकार होती है। मार्लो अन्दर आता है और गवाहों के कठघरे में जाता है। वहां उसे हलफ़ दी जाती है। चाँदी की डिबिया पेश की जाती है और कठघरे की दीवार पर रखी जाती है। ]

    क्लार्क

    [ मिसिल पढ़ता हआ ]

    तुम्हारा नाम टामस मार्लो है? तुम जान बार्थिविक न० ६ राकिंघम गेट के यहां खानसामा हो?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    क्या तुमने पिछले ईस्टरडे को रात को चांदी की एक डिबिया नं० ६ राकिंघम गेट के खाने के कमरे में एक तश्तरी में रक्खी! क्या यही वह डिबिया है?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    और जब तुम सुबह को पौने नौ बजे तश्तरी को उठाने गए तो तुम्हें डिबिया नहीं मिली?

    मार्लो

    हाँ, हज़ूर!

    क्लार्क

    तुम इस मुजरिम औरत को जानते हो?

    [ मार्लो सिर हिलाता है ]

    क्या वह नं० ६ राकिंघम गेट में मज़दूरी का कार्य करती है?

    [ मार्लो फिर सिर हिलाता है ]

    जब तुमने डिबिया पाई तो उस वक्त मिसेज़ जोन्स उस कमरे में थी?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    फिर तुमने इस चोरी का हाल जाकर अपने मालिक से कहा और उसने तुम्हें थाने भेजा?

    मार्लो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    [ मिसेज़ जोन्स से ]

    तुम्हें इनसे कुछ पूछना है?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर! कुछ नहीं।

    क्लार्क

    [ जोन्स से ]

    जेम्स जोन्स क्या तुम्हें इस गवाह से कुछ पूछना है?

    जोन्स

    मैं तो उसे जानता भी नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तुमको ठीक याद है कि तुमने उसी वक्त डिबिया रक्खी थी जिस वक्त की तुम कह रहे हो?

    मार्लो

    हां, हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। अब अफसर ( ख़ुफ़िया पुलीस) को बुलाओ।

    [ मार्लो चला जाता है और स्नो कठघरे में आता है ]

    अर्दली

    तुम अदालत के सामने जो बयान दोगे वह सच होगा, बिलकुल सच होगा। और सच के सिवा कुछ न होगा, ईश्वर तुम्हारी मदद करे।

    [ स्नो किताब चूमता है ]

    क्लार्क

    [ मिसिल चूमते हुये ]

    तुम्हारा नाम राबर्ट स्नो है? तुम मिट्रा पुलीटन पुलीस दल के नं० १० बी० विभाग के जासूस हो? आज्ञानुसार ईस्टर ट्यूसडे को तुम क़ैदी के मकान नं० ३४ मरथर स्ट्रीट में गए थे? और क्या तुमने अंदर, जाने पर इस डिबिया को मेज़ पर पड़ी पाया?

    स्नो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    क्या यही डिबिया है?

    स्नो

    [ डिबिया को उँगली से छूकर ]

    जी हाँ!

    क्लार्क

    तब क्या तुमने डिबिया को अपने क़ब्जे में कर लिया और इस क़ैदी औरत पर उस डिबिया के चोरी का इलज़ाम लगाया? और क्या उसने चोरी से इनकार किया?

    स्नो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    क्या तुमने उसे हिरासत में ले लिया?

    स्नो

    जी हाँ!

    मैजिस्ट्रेट

    उसका बर्ताव कैसा था?

    स्नो

    उसने ज़रा भी हुज्जत न की। हाँ, बराबर इनकार करती रही।

    मैजिस्ट्रेट

    तुम उसे जानते हो?

    स्नो

    नहीं हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    यहां और कोई उसे जानता है?

    गंजा कांस्टेबिल

    नहीं हज़ूर! दो में से एक को भी कोई नहीं जानता? हमारे पास उनके ख़िलाफ़ कोई शिकायत नहीं है।

    क्लार्क

    [ मिसेज़ जोन्स से ]

    तुम्हें इस अफ़सर से कुछ पूछना है?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर, मुझे कुछ नहीं पूछना है।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है, आगे चलो।

    क्लार्क

    [ मिसिल पढ़ता हुआ ]

    और जब तुम इस औरत को गिरफ़्तार कर रहे थे, क्या मर्द क़ैदी ने मुदाख़लत की और तुम्हें अपना काम करने से रोका? और क्या तुमको एक घूँसा मारा?

    स्नो

    जी हाँ।

    क्लार्क

    क्या उसने कहा इसे छोड़ दो, डिबिया मैंने ली है।

    स्नो

    जी हाँ!

    क्लार्क

    और तब तुमने सीटी बजाई और दूसरे कांस्टेबिल की मदद से उसे हिरासत में ले लिया?

    स्नो

    जी हाँ।

    क्लार्क

    क्या थाने पर जाते हुए वह बहुत ग़ुस्से में था और तुम्हें गालियाँ दीं? और बार बार कहता रहा कि डिबिया मैंने ली है?

    [ स्नो सिर हिलाता है ]

    क्या इसपर तुमने उससे पूछा कि डिबिया तुमने कैसे चुराई? और क्या उसने कहा कि मैं छोटे मिस्टर बार्थिविक के बुलाने पर मकान में गया?

    [ बार्थिविक अपनी जगह पर घूमकर रोपर की तरफ़ कड़ी दृष्टि से देखता है ]

    क्या उस दिन इस्टर मंडे की आधी रात थी? और मैंने ह्विस्की पी और उसीके नशे में डिबिया उठाली?

    स्नो

    जी हाँ।

    क्लार्क

    क्या वह बराबर इसी तरह झल्लाता रहा?

    १३

    स्नो

    जी हाँ!

    जोन्स

    [ बीच में बोलकर ]

    ज़रूर झल्लाता रहा। जब मैं तुमसे कह रहा था कि डिबिया मैंने ली है तो तुमने मेरी बीबी पर क्यों हाथ डाला?

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन बढ़ाकर हिश करके डाटता हुआ ]

    तुम जो कुछ कहना चाहोगे, उसे कहने का मौक़ा तुझे अभी मिलेगा। इस अफ़सर से तुम्हें कुछ पूछना है।

    जोन्स

    [ चिढ़कर ]

    नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। हम पहले मुजरिम औरत का बयान लेंगे।

    मिसेज़ जोन्स

    हज़ूर, मैं तो अब भी वही कहती हूं जो अब तक बराबर कहती आ रही हूँ कि मैंने डिबिया नहीं चुराई।

    मैजिस्ट्रेट

    ठीक है, लेकिन क्या तुमको मालूम था कि किसी ने उसे चुराया?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर, और मेरे शौहर ने जो कुछ कहा है उसके बारे में मैं कुछ नहीं जानती। हाँ इतना ज़रूर जानती हूँ कि वह सोमवार को बहुत रात गए घर आये। उस वक्त एक बज चुका था। और वह

    अपने आपे में न थे।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या वह शराब पीये था?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हज़ूर!

    मैजिस्ट्रेट

    और वह नशे में था?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ हज़ूर, बिलकुल बे ख़बर था।

    मैजिस्ट्रेट

    और उसने तुमसे कुछ कहा?

    मिसेज़ जोन्स

    नहीं हज़ूर, खाली मुझे गालियाँ देता रहा। और सुबह को जब मैं उठी और काम करने चली गई तो वह सोता रहा। फिर मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती। हाँ, मिस्टर बार्थिविक ने जो मेरे मालिक हैं, मुझसे कहा कि डिबिया ग़ायब हो गई है।

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ! हाँ!

    मिसेज़ जोन्स

    तो जब मैं अपने शौहर का कोट हिलाने लगी तो सिग्रेट की डिबिया उस में से गिर पड़ी। और सारे सिग्रेट चारपाई पर बिखर गए।

    मैजिस्ट्रेट

    [ स्नो से ]

    तुम कहते हो कि सिग्रेट चारपाई पर बिखर गए? तुमने सिग्रेट चारपाई पर बिखरे देखे थे?

    स्नो

    नहीं हज़ूर, मैंने नहीं देखा।

    मैजिस्ट्रेट

    यह तो कहते हैं कि मैंने उन्हें बिखरे नहीं देखा!

    जोन्स

    न देखा हो, लेकिन बिखरे थे।

    स्नो

    हज़ूर, मैने कमरे की सब चीज़ों के देखने का मौक़ा ही नहीं पाया। इस मर्द ने मेरा काम ही हलका कर दिया।

    मैजिस्ट्रेट

    [ मिसेज़ जोन्स से ]

    अच्छा तुम्हें और क्या कहना है?

    मिसेज़ जोन्स

    तो हज़ूर, जब डिबिया देखी, तो मेरे होश उड़ गए। और मेरी समझ में न आया कि उन्होंने क्यों ऐसा काम किया। जब जासूस अफ़सर आया तो हम लोगों में इसीके बारे में कहा सुनी हो रही थी। क्योंकि हज़ूर, इसने मुझे तबाह कर दिया। अब मुझे कौन नौकर रक्खेगा। मेरे तीन तीन बच्चे हैं हज़ूर।

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन बढ़ाकर ]

    हाँ, हाँ! लेकिन उसने तुमसे कहा क्या?

    मिसेज़ जोन्स

    मैंने उससे पूछा कि तुम्हारे ऊपर ऐसी क्या अाफ़त आई कि तुमने ऐसा काम कर डाला। उसने कहा कि यह नशे के कारण हुआ। मैंने बहुत शराब पी ली थी और न जाने मुझपर क्या सनक सवार हो गई थी। और बात यह है हज़ूर, कि उन्होंने दिन भर कुछ नहीं खाया था। और जब ख़ाली पेट कोई शराब पीता है, तो चट दिमाग़ पर असर हो जाता है। हज़ूर, न जानते हों लेकिन यह बात सच है। और मैं क़सम खाकर कहती हूँ कि जबसे हमारा ब्याह हुआ, उसने कभी ऐसा काम नहीं किया। हालाँकि हम लोगों को बड़ी बड़ी आफ़तें झेलनी पड़ी।

    [ कुछ ज़ोर देकर बात करती हुई ]

    मुझे विश्वास है कि अगर वह अपने आप में होते तो ऐसा काम कभी न करते।

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ, हाँ! लेकिन क्या तुम नहीं जानती कि यह कोई उज्र नहीं है?

    मिसेज़ जोन्स

    हाँ जानती हूँ, हज़ूर।

    [ मैजिस्ट्रेट आगे झुक जाता है और क्लार्क से बातें करता है। ]

    जैक

    [ पीछे की जगह से आगे को झुककर ]

    दादा, मैं कहता हूँ।

    बार्थिविक

    चुप रहो।

    [ रोपर से बातें करते हुए मुंह छिपाकर ]

    रोपर, अच्छा हो कि तुम अब खड़े हो जाओ और कह दो कि और सब बातों और क़ैदियों की ग़रीबी का ख़याल करके हम इस मुक़दमे को और आगे नहीं बढ़ाना चाहते। और अगर मैजिस्ट्रेट साहब इसे उस आदमी का फ़िसाद समझ कर काररवाई करें—

    गंजा कांस्टेबिल

    खामोश!

    [ रोपर सिर हिलाता है ]

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा, अब अगर यह मान लिया जाय कि जो कुछ तुम कहती हो वह सच है और जो कुछ तुम्हारा शौहर कहता है वह भी सच है तो मुझे यह विचार करना पड़ेगा कि वह कैसे घर के अन्दर पहुँचा। और क्या तुमने अन्दर पहुँचने में उसकी कुछ मदद की? तुम उस मकान में मज़दूरनी का काम करती हो न?

    मिसेज़ जोन्स

    जी हाँ, हज़ूर, लेकिन अगर मैं उसको मकान के अन्दर घुसने में मदद देती तो मेरे लिए यह बहुत बुरा काम होता। और मैंने जहाँ जहाँ काम किया कभी ऐसा न किया।

    मैजिस्ट्रेट

    ख़ैर, यह तो तुम कहती हो। अब देखें तुम्हारा शौहर क्या बयान देता है।

    जोन्स

    [ जो पीछे के कठघरे में हाथ टेके हुए धीमी रूखी आवाज़ से बोलता है ]

    मैं वही कहता हूं जो कुछ मेरी बीबी कहती है। मैं कभी पुलीस कोर्ट में नहीं लाया गया। और मैं साबित कर सकता हूँ कि मैंने यह काम नशे में किया। मैंने अपनी बीबी से कह दिया और वह भी यही कहेगी कि मैं उस चीज़ को पानी में फेंकने जा रहा था। यह इससे कहीं अच्छा था कि मैं उसके पीछे परेशान होता।

    मैजिस्ट्रेट

    लेकिन तुम मकान के अन्दर घुसे कैसे?

    जोन्स

    मैं उधर से गुजर रहा था। मैं "गोट और बेल्स" सराय से घर जा रहा था।

    मैजिस्ट्रेट

    गोट और बेल्स क्या चीज़ है? क्या सराय है?

    जोन्स

    हाँ, उस कोने पर। उस दिन बैंक की छुट्टी थी और मैंने दो घूँट पी ली थी। मैंने छोटे मिस्टर बार्थिविक को ग़लत जगह दरवाज़े पर कुंजी लगाते हुए देखा।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा!

    जोन्स

    [ आहिस्ता से और कई बार रुककर ]

    तो मैंने उन्हें कुंजी का सुराख़ दिखा दिया। वह नवाबों की तरह शराब में चूर था। तब वह चला गया लेकिन थोड़ी देर के बाद लौटकर बोला, मेरे पास तुम्हें देने को कुछ नहीं है। लेकिन अन्दर आकर थोड़ी सी पी लो। तब मैं अन्दर चला गया। आप भी ऐसा ही करते। तब हमने थोड़ी सी ह्विस्की पी। आप भी इसी तरह पीते। तब छोटे मिस्टर बार्थिविक ने मुझसे कहा, थोड़ी सी शराब पी लो। और तम्बाक़ू भी पियो। तुम जो चीज़ चाहो ले लो। यह कह कर वह सोफ़ा पर सो गया। तब मैंने थोड़ी सी और शराब पी। और सिग्रेट भी पिया। फिर मैं आपसे नहीं कह सकता कि इसके बाद क्या हुआ।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या तुम्हारा मतलब है कि तुम नशे में इतने चूर थे कि कुछ भी याद नहीं रहा?

    जैक

    [ बाप से नरमी के साथ ]

    ठीक यही बात है—जो—

    बार्थिविक

    चुप!

    जोन्स

    हाँ, मेरा यही मतलब है।

    मैजिस्ट्रेट

    फिर भी तुम कहते हो कि तुमने डिबिया चुराई?

    जोन्स

    मैंने डिबिया चुराई! हरगिज़ नहीं। मैंने सिर्फ ले ली थी

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन आगे बढ़ाकर ]

    तुमने इसे चुराया नहीं? तुमने इसे सिर्फ़ ले लिया? क्या तुम्हारी थी? यह चोरी नहीं तो और है क्या?

    जोन्स

    मैंने इसे ले लिया।

    मैजिस्ट्रेट

    तुमने इसे ले लिया! तुम इसे उनके घर से अपने घर ले गए—

    जोन्स

    [ ग़ुस्से से बात काट कर ]

    मेरे कोई घर नहीं है।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। देखें नवयुवक मिस्टर बार्थिविक तुम्हारे बयान के बारे में क्या कहते हैं?

    [ स्नो गवाहों के कठघरे से चला जाता है। गंजा कांस्टेबिल जैक को इशारे से बुलाता है और वह अपनी टोपी लिए गवाहों के कठघरे में आता है। रोपर मेज़ के पास चला पाता है जो वकीलों के लिए अलग की हुई है। ]

    हलफ़ देनेवाला क्लार्क

    तुम अदालत के सामने जो बयान दोगे उसे सच होना चाहिए बिलकुल सच होना चाहिए और सिवा सच के कुछ न होना चाहिए। ईश्वर तुम्हारी मदद करे। इस किताब को चूमो।

    [ जैक किताब चूमता है। ]

    रोपर

    [ जिरह करते हुए ]

    तुम्हारा क्या नाम है?

    जैक

    [ धीमी आवाज़ में ]

    जॉन बार्थिविक जूनियर।

    [ क्लार्क इसे लिख लेता है ]

    रोपर

    कहाँ रहते हो?

    जैक

    नं० ६ राकिंघम गेट।

    [ उसके सब जवाबों को क्लार्क लिखता जाता है ]

    रोपर

    तुम मालिक के लड़के हो?

    जैक

    [ बहुत धीमी आवाज़ में ]

    हाँ।

    रोपर

    ज़रा ज़ोर से बोलो। क्या तुम मुजरिम को जानते हो?

    जैक

    [ जोन्स स्त्री पुरुष की ओर देखकर धीमी आवाज़ में ]

    मैं मिसेज़ जोन्स को जानता हूँ। मैं—

    [ ऊंची आवाज़ में ]

    मर्द को नहीं जानता।

    जोन्स

    लेकिन मैं तुमको जानता हूँ।

    गंजा कांस्टेबिल

    चुप रहो।

    रोपर

    अच्छा क्या तुम ईस्टर-मंडे की रात को बहुत देर में घर आए थे?

    जैक

    हाँ!

    रोपर

    क्या तुमने ग़लती से दरवाज़े की कुंजी दरवाज़े में लगी हुई छोड़ दी?

    १४

    जैक

    हाँ।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा, तुमने कुंजी दरवाज़े में ही लगी छोड़ दी?

    रोपर

    और अपने आने के विषय में तुम्हें सिर्फ़ इतना ही याद है?

    जैक

    [ धीमी आवाज़ में ]

    हाँ, इतना ही।

    मैजिस्ट्रेट

    तुमने इस मर्द मुजरिम का बयान सुना है। उसके बारे में तुम क्या कहते हो?

    [ मैजिस्ट्रेट की तरफ़ मुड़ कर दृढ़ता के साथ ]

    बात यह है हज़ूर, कि मैं रात को थिएटर देखने चला गया था। वहाँ खाना खाया और बहुत रात गए घर पहुँचा।

    मैजिस्ट्रेट

    तुम्हें याद है कि जब तुम आए तो यह आदमी बाहर खड़ा था?

    जैक

    जी नहीं।

    [ वह हिचकता है ]

    मुझे तो यह याद नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ कुछ गड़बड़ा कर ]

    क्या इस आदमी ने तुम्हें दरवाज़ा खोलने में मदद दी? जैसा इसने अभी कहा है। किसी ने दरवाज़ा खोलने में तुम्हें मदद दी?

    जैक

    जी नहीं! मैं तो ऐसा नहीं समझता। मुझे याद नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    तुम्हें याद नहीं? लेकिन याद करना पड़ेगा। तुम्हारे लिए यह कोई मामूली बात तो नहीं है कि जब तुम आओ तो दूसरा आदमी दरवाज़ा खोल दे! क्यों?

    जैक

    [ लज्जा से मुसकिराकर ]

    नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छा तब?

    जैक

    [ असमंजस में पड़कर ]

    बात यह है कि शायद मैंने उस रात को बहुत ज़्यादा शामपेन पी ली थी।

    मैजिस्ट्रेट

    [ मुसकिराकर ]

    अच्छा, तुमने बहुत ज़्यादा शामपेन पी ली थी?

    जोन्स

    मैं इन महाशय से एक सवाल पूछ सकता हूँ?

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ, हाँ! तुम जो कुछ पूछना चाहो पूछ सकते हो।

    जोन्स

    क्या आपको याद नहीं है कि आपने कहा था कि मैं अपने बाप की तरह लिबरल हूँ और मुझ से पूछा था कि तुम क्या हो?

    जैक

    [ माथे पर हाथ रखकर ]

    मुझे कुछ याद आता है—-

    जोन्स

    और मैंने आपसे कहा था कि मैं पक्का कंसर्वेटिव हूँ। तब आपने मुझसे कहा, तुम तो साम्यवादी से मालूम पड़ते हो। जो कुछ चाहो ले लो।

    जैक

    [ दृढ़ता के साथ ]

    नहीं मुझे इस तरह की कोई बात याद नहीं है।

    जोन्स

    लेकिन मुझे याद है। और मैं उतना ही सच बोलता हूँ जितना आप। मैं इसके पहले कभी पुलीस कोर्ट में नहीं लाया गया। ज़रा इधर देखिए, क्या आपको याद नहीं है कि आपके हाथ में एक नीले रंग की थैली थी? और—

    [ बार्थिविक उछल पड़ता है ]

    रोपर

    मैं हज़ूर से अर्ज़ करना चाहता हूँ कि यह प्रश्न फ़जूल है। क्योंकि क़ैदी ने ख़ुद इक़बाल कर लिया है कि उसे कुछ याद नहीं।

    [ मैजिस्ट्रेट के चेहरे पर मुसकराहट दिखाई पड़ती है ]

    अन्धा अन्धे को क्या रास्ता दिखा रहा है।

    जोन्स

    [ बिगड़ कर ]

    मैंने इनसे ज़्यादा ख़राब काम नहीं किया है। मैं ग़रीब आदमी हूँ, मेरे पास न रुपए हैं न दोस्त हैं। वह धनी है, वह जो कुछ चाहे कर सकता है।

    मैजिस्ट्रेट

    बस बस, इन बातों से कोई फ़ायदा नहीं। तुम्हें शान्त रहना चाहिए। तुम कहते हो, यह डिबिया मैंने लेली। तुमने क्यों उसे ले लिया? क्या तुम्हें रुपए की बहुत ज़रूरत थी?

    जोन्स

    रुपए की तो मुझे हमेशा ज़रूरत रहती है।

    मैजिस्ट्रेट

    क्या इसी लिए तुमने उसे ले लिया?

    जोन्स

    नहीं।

    मैजिस्ट्रेट

    [ स्नो से ]

    उसके पास कोई चीज़ बरामद हुई?

    स्नो

    जी हाँ, हज़ूर। इसके पास ६ पौं० १२ शिलिंग निकले। और यह थैली।

    [ लाल रेशमी थैली मैजिस्ट्रेट के हाथ में रख दी जाती है। बार्थिविक अपनी जगह से उचक पड़ता है लेकिन फिर बैठ जाता है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    [ थैली की तरफ़ देख कर ]

    हाँ, हाँ! लाओ, इसे देखूँ।

    [ सब चुप हो जाते हैं ]

    नहीं, थैली के बारे में कोई बयान नहीं है। तुम्हें वे सब रुपए कहाँ मिले?

    जोन्स

    [ कुछ देर चुप रह कर एकाएक बोल उठता है ]

    मैं इस सवाल का जवाब देने से इनकार करता हूं।

    मैजिस्ट्रेट

    अगर तुम्हारे पास इतने रुपए थे तो तुम ने डिबिया क्यों ली?

    जोन्स

    मैंने इसे जलन की वजह से ली।

    मैजिस्ट्रेट

    [ गर्दन बढ़ा कर ]

    तुमने इसे जलन की वजह से लिया? ख़ैर, यह एक बात है। लेकिन क्या तुम ख़याल करते हो कि तुम जलन की वजह से दूसरों की चीज़ें लेकर शहर में रह सकते हो?

    जोन्स

    अगर आपकी हालत मेरी सी होती, अगर आप भी बेकार होते—-

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ हाँ, मैं जानता हूं। चूँकि तुम बेकार हो, तुम समझते हो कि चाहे तुम जो कुछ करो, माफ़ हो जायगा।

    जोन्स

    [ जैक की तरफ़ उँगली दिखला कर ]

    आप उनसे पूछिए। उन्हों ने क्यों उसकी थैली—-

    रोपर

    [ आहिस्ता से ]

    क्या हज़ूर को अभी इस गवाह को और ज़रूरत है?

    मैजिस्ट्रेट

    [ व्यंग से ]

    नहीं! कोई फायदा नहीं।

    [ जैक कठघरे से चला जाता है, और सिर झुकाए हुए अपनी जगह पर बैठ जाता है। ]

    जोन्स

    आप इनसे पूछिए कि इन्होंने क्यों उस औरत की—

    [ लेकिन गंजा कांस्टेबिल उसकी आस्तीन पकड़ लेता है। ]

    गंजा कान्स्टेबिल

    चुप!

    मैजिस्ट्रेट

    [ ज़ोर दे कर ]

    मेरी बात सुनो! मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि इन्होंने क्या लिया और क्या नहीं लिया? तुमने पुलिस के काम में मदाख़िलत क्यों की?

    जोन्स

    उनका काम यह नहीं था कि मेरी बीबी को गिरफ्तार करते! वह एक शरीफ़ औरत है और उसने कुछ, नहीं किया है।

    मैजिस्ट्रेट

    नहीं, पुलिस का यही काम था तुमने अफ़सर को घूँसा क्यों मारा?

    जोन्स

    ऐसी हालत में दूसरा आदमी भी मारता? अगर मेरा बस चलता तो फिर मारता।

    मैजिस्ट्रेट

    इस प्रकार बिगड़ कर तुम अपने मुक़दमे को कुछ मदद नहीं पहुँचा रहे हो। अगर सभी तुम्हारी तरह करने लगें तो हमारा काम ही न चले।

    जोन्स

    [ आगे झुककर, चिन्तित स्वर में ]

    लेकिन उसकी क्या दशा होगी? इस बदनामी से उसे जो नुक़सान हुआ, वह कोन भरेगा।

    मिसेज़ जोन्स

    हज़ूर, बच्चों की फ़िक्र इन्हें सता रही है। क्योंकि मेरी नौकरी जाती रही। और इस बदनामी की वजह से मुझे दूसरा मकान लेना पड़ा।

    मैजिस्ट्रेट

    हां हां, मैं जानता हूं। लेकिन इसने अगर ऐसा काम न किया होता, तो किसी का कुछ न होता।

    जोन्स

    [ घूम कर जैक की तरफ़ देखते हुए ]

    मेरा काम इतना बुरा नहीं है, कि जितना इनका। पूछता हूँ इनका क्या होगा?

    [ गंजा काँस्टेबिल फिर कहता है—-चुप ]

    रोपर

    मिस्टर बार्थिविक, यह अर्ज़ कर रहे हैं कि क़ैदी ग़रीबी का ख़याल करके वह डिबिए के मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। शायद हज़ूर। दंगे कर काररवाई करेंगे।

    जोन्स

    मैं इसको दबने न दूँगा। मैं चाहता हूं, कि सब कुछ इंसाफ़ के साथ किया जाय–मैं अपना हक़ चाहता हूँ।

    मैजिस्ट्रेट

    [ डेस्क को पीट कर ]

    तुमको जो कुछ कहना था, कह चुके। अब चुप रहो।

    [ सन्नाटा हो जाता है। मैजिस्ट्रेट झुक कर क्लार्क से बातें करता है। ]

    हां, मेरा ख़याल है कि इस औरत को बरी कर दूं।

    वह दया भाव से मिसेज़ जोन्स से कहता है जो अभी तक कठघरे पर हाथ धरे अनिश्चल खड़ी है ]

    मेरे लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि इस आदमी ने ऐसा काम किया। इसका फल उसको नहीं भोगना पड़ा बलिक तुमको भोगना पड़ा। तुम्हें यहाँ दो बार आना पड़ा, तुम्हारी नौकरी छूट गई।

    [ जोन्स की तरफ़ ताकता है ]

    और यही हमेशा होता है। तुम अब जाओ। मुझे दुःख है कि तुमको यहां व्यर्थ बुलाना पड़ा।

    मिसेज़ जोन्स

    [ धीमी आवाज़ से ]

    हज़ूर! अनेक धन्यवाद।

    [ वह कठघरे से चली जाती है और पीछे फिर कर जोन्स की तरफ़ देखती हुई अपने हाथों को मलती है। और खड़ी हो जाती है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    हाँ हाँ, मेरे बस की बात नहीं। अब जानो, तुम ख़ूब समझदार हो।

    [ मिसेज़ जोन्स पीछे खड़ी होती है, मैजिस्ट्रेट अपने हाथ पर झुका लेता है तब सिर उठा कर जोन्स से कहता है। ]

    मेरी बात सुनो। क्या तुम चाहते हो कि यह यहीं तय कर दिया जाय या जूरी

    [ पंचायत ]

    के पास भेज दिया जाय।

    जोन्स

    [ बड़ बड़ाता हुआ ]

    मैं जूरी नहीं चाहता।

    मैजिस्ट्रेट

    अच्छी बात है। मैं यहीं तय कर दूँगा।

    [ ज़रा रुक कर ]

    तुमने डिबिया चुराना स्वीकार कर लिया है–

    जोन्स

    राना नहीं—

    गंजा कान्स्टेबिल

    मैजिस्ट्रेट

    पुलीस पर हमला करना–

    जोन्स

    कोई भी आदमी ऐसी बेजा—

    मैजिस्ट्रेट

    यहाँ तुम्हारा व्यवहार बहुत बुरा था। तुम यह सफ़ाई देते हो कि जब तुमने डिबिया चुराई तब तुम नशे में थे। यह कोई सफ़ाई नहीं है। अगर तुम शराब पीकर क़ानून को तोड़ोगे तो तुम्हें उसका फल भोगना पड़ेगा। और मैं तुमसे साफ़ साफ़ कहता हूँ कि तुम जैसे आदमी जो नशे में चूर हो जाते हैं, और जलन या उसे जो कुछ तुम कहना चाहो, उसके फेर में पड़ कर दूसरों की बुराई करते हैं वे समाज के शत्रु हैं।

    जैक

    [ अपनी जगह पर झुक कर ]

    दादा! यही तो आपने मुझसे भी कहा था।

    बार्थिविक

    चुप!

    [ सब चुप हो जाते हैं। मैजिस्ट्रेट क्लार्क से राय लेता है। जो आगे झुका हुआ प्रतीक्षा करता है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    यह तुम्हारा पहला क़सूर है और मैं तुम्हें हल्की से देना चाहता हूँ।

    [ तीव्र स्वर में लेकिन बिना कोई भाव प्रकट किए हुए ]

    एक महीने की कड़ी क़ैद।

    [ वह झुक कर क्लार्क से बातें करता है। गंजा कांस्टेबिल और एक दूसरा सिपाही मिल कर जोन्स को कठघरे से ले जाते हैं ]

    जोन्स

    [ रुककर और पीछे हट कर ]

    १५

    तुम इसे न्याय कहते हो? जैक का तो कुछ भी नहीं बिगड़ा? उसने शाराब पी, उसने थैली ली—उसी ने थैली ली लेकिन।

    [ ज़बान दबा कर ]

    रुपया उसे बचा ले गया। वाह रे इंसाफ!

    गठरी में बन्द कर दिया जाता है और स्त्री पुरुषों के मुँह से एक सूखी धीमी आह निकलती है। ]

    मैजिस्ट्रेट

    अब हम नाशता करने जाते हैं।

    [ वह अपनी जगह से उठता है ]

    अदालत में हलचल मच जाती है, रोपर उठता है और समाचार के सम्वाददाता से बातें करता है। जैक सिर उठा कर अकड़ता हुआ बरामदे में चला जाता है। बार्थिविक भी उसके पीछे पीछे जाता है। ]

    मिसेज़ जोन्स

    [ विनीत भाव से उसकी तरफ़ फिर कर ]

    हज़ूर!

    [बार्थिविक असमंजस में पड़ जाता है। फिर हिम्मत हारकर अत्यंत लज्जित भाव से इंकार का संकेत करता है और जल्दी से कचहरी से चला जाता है। मिसेज़ जोन्स उसकी तरफ देखती खड़ीरह जाती है।]

    परदा गिरता है।

  • चन्द्रकान्ता सन्तति 6

    चन्द्रकान्ता सन्तति 6

    Aproximadamente 179.146 palavras.

    चन्द्रकान्ता सन्तति 6
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकान्ता_सन्तति_6

    स्त्री-तो यह कौन कहता है कि मैं तुम्हारी स्त्री हूँ ?

    मैं-अभी इसके पहले तूने क्या कहा था ?

    स्त्री-(हँस कर) मालूम होता है कि तुम अपने होश में नहीं हो।

    इतना सुनते ही मुझे क्रोध चढ़ आया और मैं अपनी हथकड़ी-बेड़ी तोड़ने का उद्योग करने लगा । यह हाल देखकर उस औरत को भी क्रोध आ गया और उसने अपनी एक सखी या लौंडी की तरफ देखकर कुछ इशारा किया। वह लौंडी इशारा पाते ही उठी और उसी जगह आले पर से एक बोतल उठा लाई जिसमें किसी प्रकार का अर्क था । उस से चुल्लू भर उसने दो-तीन छींटे मेरे मुंह पर दिये जिस से मैं बेहोश हो गया और मुझे तनो-बदन की सुध न रही। मैं नहीं बता सकता कि इसके बाद कितने घण्टे तक मैं उसके कब्जे में रहा, परन्तु जब होश में आया तो मैंने अपने को जंगल में एक पेड़ के नीचे पाया। घण्टों तक ताज्जुब के साथ चारों तरफ देखता रहा, इसके बाद एक चश्मे के किनारे जाकर हाथ-मुँह धोने के बाद इस तरफ रवाना हुआ। बस, यही सबब था कि मुझे हाजिर होने में देर हो गई।

    भूतनाथ की बातें सुनकर सभी को ताज्जुब हुआ, मगर वे दोनों नकाबपोश एक दम खिलखिलाकर हँस पड़े और उनमें से एक ने भूतनाथ की तरफ देखकर कहा-

    नकाबपोश-भूतनाथ, निःसन्देह तुम धोखे में पड़ गये । उस औरत ने जो कुछ तुमसे कहा, उसमें शायद ही दो तीन बातें सच हों। भूतनाथ–(ताज्जुब से) सो क्या ? उसने कौन सी बातें सच-सच कही थीं और कौन सी नकाबपोश-सो मैं नहीं कह सकता मगर आशा है कि शीघ्र ही तुम्हें सच-झूठ का पता लग जायगा।

    भूतनाथ ने बहुत-कुछ चाहा मगर नकाबपोश ने उसके मतलब की कोई बात न कही । थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें करके नकाबपोश बिदा हुए और जाते समय एक सवाल के जवाब में कह गये कि "आप लोग दो दिन और सब्र करें, इसके बाद कुंअर उन्हें इस बातों के जानने का बड़ा शौक है।"

    2

    रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है । महाराज सुरेन्द्रसिंह अपने कमरे में पलंग पर लेते हुए जीतसिंग से कुछ धिरे-धीरे बाते कर रहें हैं जो चारपाई के नीचे उनके पास ही बैठे है।केवल जीतसिंग ही नहीं बल्कि उनके पास वे दोनो नकापपोश भी बैठे हुए है जो रोज दरबार में आकर लोगों को ताज्जुब में डाला करते है और जिनका नाम है रामसिंह और लक्ष्मणसिंह है । हम नहीं कह सकते कि ये लोग कब से इस कमरे में बैठे हैं या इसके पहले इन लोगों में क्या-क्या बातें हो चुकी हैं, मगर इस समय तो ये सब लोग कई ऐसे मामलों पर बातचीत कर रहे हैं जिनका पूरा होना बहुत जरूरी समझा जाता है।

    बात करते-करते एक दफे कुछ रुक कर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने जीतसिंह से कहा,"इस राय में गोपाल सिंह का भी शरीक होना उचित जान पड़ता है, किसी को भेजकर उन्हें बुलाना चाहिए।"

    "जो आज्ञा" कहकर जीतसिंह उठे और कमरे के बाहर जाकर राजा गोपालसिंह को बुलाने के लिए चोबदार को हुक्म देने के बाद पुनः अपने ठिकाने बैठ कर बातचीत करने लगे।

    जीतसिंह–इसमें तो कोई शक नहीं कि भूतनाथ आदमी चालाक और पूरे दर्जेबका ऐयार है मगर उसके दुश्मन लोग उस पर बेतरह टूट पड़े हैं और चाहते हैं कि जिस तरह बने उसे बर्बाद कर दें और इसीलिए उसके पुराने ऐबों को उधेड़ कर तरह-तरह की तकलीफ दे रहे हैं।

    सुरेन्द्रसिंह–ठीक है, मगर हमारे साथ भूतनाथ ने सिवाय एक दफे चोरी करने के और कौन-सी बुराई की है जिसके लिए उसे हम सजा दें या बुरा कहें ?

    जीतसिंह-कुछ भी नहीं, और वह चोरी भी उसने किसी बुरी नीयत से नहीं की थी। इस विषय में नानक ने जो कुछ कहा था, महाराज सुन ही चुके हैं

    सुरेन्द्रसिंह-हाँ मुझे याद है, और उसने हम लोगों पर अहसान भी बहुत किये हैं बल्कि यों कहना चाहिए कि उसी की बदौलत कमलिनी, किशोरी, लक्ष्मीदेवी और इन्दिरा वगैरह की जानें बची और गोपालसिंह को भी उसकी मदद से बहुत फायदा पहुंचा है। इन्हीं सब बातों को सोच के तो देवीसिंह ने उसे अपना दोस्त बना लिया है, मगर साथ ही इसके इस बात भी समझ रखना चाहिए कि जब तक भूतनाथ का मामला तय नहीं हो जायगा तब तक लोग उसके ऐबों को खोद-खोद कर निकाला ही करेंगे और तरह-तरह की बातें गढ़ते रहेंगे।

    एक नकाबपोश-सो तो ठीक ही है, मगर सच पूछिए तो भूतनाथ का मुकदमा ही कसा और मामला ही क्या ? मुकदमा तो असल में नकली बलभद्रसिंह का है जिसने इतना बड़ा कसूर करने पर भी भूतनाथ पर इल्जाम लगाया है। उस पीतल वाली सन्दूकड़ी से तो हम लोगों को कोई मतलब ही नहीं, हाँ, बाकी रह गया चिट्ठियों वाला मुट्ठा जिसके पढ़ने से भूतनाथ लक्ष्मीदेवी का कसूरवार मालूम होता है, सो उसका।जवाब भूतनाथ काफी तौर पर दे देगा और साबित कर देगा कि वे चिट्ठियां उसके हाथ की लिखी हुई होने पर भी वह कसूरवार नहीं है और वास्तव में वह बलभद्रसिंह का दोस्त है, दुश्मन नहीं।

    सुरेन्द्रसिंह-(लम्बी सांस लेकर) ओफ-ओह, इस थोड़े से जमाने में कैसे-कैसे उलटफेर हो गए ! बेचारे गोपालसिंह के साथ कैसी-कैसी धोखेबाजी की गई!इन बातों पर जब हमारा ध्यान जाता है तो मारे क्रोध के बुरा हाल हो जाता है।

    जीतसिंह-ठीक है, मगर खैर अब इन बातों पर क्रोध करने की जगह नहीं रही क्योंकि जो कुछ होना था हो गया। ईश्वर की कृपा से गोपालसिंह भी मौत की तकलीफ उठा र बच गए और अब हर तरह से प्रसन्न हैं, इसके अतिरिक्त उनके दुश्मन लोग भी गिरफ्तार होकर अपने पंजे में आये हुए हैं।

    सुरेन्द्रसिंह–बेशक ऐसा ही है मगर हमें कोई ऐसी सजा नहीं सूझती जो उनके दुश्मनों को देकर कलेजा ठंडा किया जाय और समझा जाय कि अब गोपालसिंह के साथ बुराई करने का बदला ले लिया गया।

    महाराज सुरेन्द्रसिंह इतना कह ही रहे थे कि राजा गोपालसिंह कमरे के अन्दर आते हुए दिखाई पड़े क्योंकि उनका डेरा इस कमरे से बहुत दूर न था।

    राजा गोपालसिंह सलाम करके पलंग के पास बैठ गए और इसके बाद दोनों नकाबपोशों से भी साहब-सलामत करके मुस्कुराते हुए बोले-आप लोग कब से बैठे हैं ?

    एक नकाबपोश–हम लोगों को आये बहुत देर हो गई।

    सुरेन्द्रसिंह–ये बेचारे कई घण्टे से बैठे हुए हमारी तबीयत बहला रहे हैं और कई जरूरी बातों पर विचार कर रहे हैं। गोपालसिंह-वे कौन सी जरूरी बातें हैं ?

    सुरेन्द्रसिंह– यही लड़कों की शादी, भूतनाथ का फैसला, कैदियों का मुकदमा,कमलिनी और लाड़िली के साथ उचित बर्ताव इत्यादि विषयों पर बातचीत हो रही है और सोच रहे हैं कि किस तरह क्या किया जाय तथा पहले क्या काम हो ?

    गोपालसिंह–इस समय मैं भी इसी उलझन में पड़ा हुआ था। सोया नहीं था बल्कि जागता हुआ इन्हीं बातों को सोच रहा था कि आपका सन्देशा पहुँच गया और तुरन्त उठकर इस तरफ चला आया। (नकाबपोशों की तरफ बता कर) आप लोग तो अव हमारे घर के व्यक्ति हो रहे हैं अतः ऐसे विचारों में आप लोगों को शरीक होना ही चाहिए।

    सुरेन्द्रसिंह–जीतसिंह कहते हैं कि कैदियों का मुकदमा होने और उनको सजा देने के पहले ही दोनों लड़कों की शादी हो जानी चाहिए जिसमें कैदी लोग भी इस उत्सव को देखकर अपना जी जला लें और समझ लें कि उनकी बेईमानी, हरामजदगी और दुश्मनी का नतीजा क्या निकला। साथ ही इसके एक बात का फायदा और भी होगा,अर्थात् कैदियों के पक्षपाती लोग भी, जो ताज्जुब नहीं कि इस समय भी कहीं इधर-उधर छिपे मन के लड्डू बना रहे हों, समझ जायँगे कि अब उन्हें दुश्मनी करने की कोई जरूरत नहीं रही और न ऐसा करने से कोई फायदा ही है।

    गोपालसिंह- ठीक है, जब तक दोनों कुमारों की शादी न हो जायगी तब तक तरह-तरह के खुटके बने ही रहेंगे । शादी हो जाने के बाद मेहमानों के सामने ही कैदियों को जहन्नुम में पहुंचाकर दुनिया को दिखा दिया जायगा कि बुरे कर्मों का नतीजा यह होता है।

    सुरेन्द्र सिंह-खैर, तो आपकी भी यही राय होती है ?

    गोपालसिंह-बेशक !

    सुरेन्द्रसिंह–(जीतसिंह की तरफ देखकर) तो अब हमें और किसी से राय मिलाने की जरूरत नहीं रही। आप हर तरह का बन्दोबस्त शुरू कर दें और जहाँ-जहाँ न्यौता भेजना हो भिजवा दें।

    जीतसिंह-जो आज्ञा । अच्छा, अब भूतनाथ के विषय में कुछ तय हो जाना चाहिए।

    गोपालहिं-हम लोगों में से कौन सा आदमी ऐसा है जो भूतनाथ के अहसानों के बोझ से दबा हुआ न हो ? बाकी रही यह बात कि जयपाल ने भूतनाथ के हार की चिट्ठियाँ कमलिनी और लक्ष्मीदेवी को दिखाकर भूतनाथ को दोषी ठहराया है, सो वास्तव में भूतनाथ दोषी नहीं है और इस बात का सबूत भी वह दे देगा।

    सुरेन्द्रसिंह हाँ, तुमको तो इन सब बातों का सच्चा हाल जरूर ही मालूम होगा क्योंकि तुम्हीं ने कृष्ण जिन्न बनकर उसकी सहायता की थी। अगर वास्तव में वह दोषी होता तो तुम ऐसा करते ही क्यों? गोपालसिंह-बेशक यही बात है । इन्दिरा का किस्सा आपको मालूम ही है क्यों कि मैंने आपको लिख भेजा था और आशा है कि आपको वे बातें याद होंगी ?

    सुरेन्द्रसिंह-हाँ मुझे बखूबी याद है, बेशक उस जमाने में भूतनाथ ने तुम लोगों की बड़ी सहायता की थी बल्कि इसी सबब से उसमें और दरोगा में दुश्मनी हो गई थी,अतः कब हो सकता है कि भूतनाथ लक्ष्मीदेवी के साथ दगा करता जो कि दरोगा से दोस्ती और बलभद्र सिंह से दुश्मनी किए बिना हो ही नहीं सकता था ! लेकिन आखिर यह बात क्या हैं, वे चिट्ठियाँ भूतनाथ की लिखी हैं या नहीं? फिर, इस जगह एक बात का और भी खयाल होता है वह यह कि उस मुट्ठ में दोनों तरफ की चिट्ठियाँ मिली हुई हैं अर्थात् जो रघुबरसिंह ने भेजी वे भी हैं और जो रघुबर के नाम आई थीं वे भी हैं।

    गोपालसिंह-जी हाँ और यह बात भी बहुत से शकों को दूर करती है। असल यह है कि वे सब चिट्ठियां भूतनाथ के हाथ की नकल की हुई हैं ! वह रघुबरसिंह,जो दारोगा का दोस्त था और जमानिया में रहता था, उसी की यह सब कार्रवाई है और यह सब विष उसी के बोये हुए हैं। वह बहुत जगह इशारे के तौर पर अपना नाम भूतनाथ लिखा करता थ। आपने इन्दिरा के हाल में पढ़ा होगा कि भूतनाथ बेनीसिंह बनकर बहुत दिनों तक रघुबरसिंह के यहाँ रह चुका है और उन दिनों यही भूतनाथ हेलासिंह के यहाँ रघुबरसिंह का खत लेकर आया-जाया करता था।

    सुरेन्द्र सिंह-ठीक है, मुझे याद है ।

    गोपालसिंह-बस ये सब चिट्ठियाँ उन्हीं चिट्ठियों की नकलें हैं । भूतनाथ ने मौके पर दुश्मनों को कायल करने के लिए उन चिट्ठियों की नकल कर ली थी और कुछ उनके घर से भी चुराई थीं। बस, भूतनाथ की गलती या बेईमानी जो कुछ समझिए यही हुई कि उस समय कुछ नगदी फायदे के लिए उसने इस मामले को दबाये रक्खा और उसी वक्त मुझ पर प्रकट न कर दिया। रिश्वत लेकर दारोगा को छोड़ देना और कलमदान के भेद को छिपा रखना भी भूतनाथ के ऊपर धब्बा लगाता है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो मुझे यह बुरा दिन देखना नसीब न होता और इन्हीं भूलों पर आज भूतनाथ पछताता और अफसोस करता है। मगर आखिर में भूतनाथ ने इन बातों का बदला भी ऐसा अदा किया कि वे सब कसूर माफ कर देने के लायक हो गए।

    सुरेन्द्रसिंह-उस कलमदान में क्या चीज थी ?

    गोपालसिंह-उस कलमदान को दारोगा की गुप्त सभा का दफ्तर ही समझिए ।सब सभासदों के नाम और सभा के मुख्य भेद उसी में बन्द रहते थे, इसके अतिरिक्त दामोदरसिंह ने जो वसीयतनामा इन्दिरा के नाम लिखा था वह भी उसी में बन्द था।

    सुरेन्द्रसिंह-ठीक है, ठीक है, इन्दिरा के किस्से में यह बात भी तुमने लिखी थी, हमें याद आया। मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि उन दिनों लालच में पड़कर भूतनाथ ने बहुत बुरा किया और उसी सबब से तुम लोगों को तकलीफ उठानी पड़ी।

    एक नकाबपोश-शायद भूतनाथ को इस बात की खबर न थी कि इस लालच का नतीजा कहाँ तक बुरा निकलेगा।

    सुरेन्द्रसिंह-जो हो मगर उस समय की बातों पर ध्यान देने से यह भी कहना पड़ता है कि उन दिनों भूतनाथ एक हाथ से भलाई के नाम कर रहा था और दूसरे हाथ से बुराई के।

    गोपालसिंह-ठीक है, बेशक ऐसी ही बात थी।

    सुरेन्द्रसिंह-(जीतसिंह की तरफ देख के) भूतनाथ और इन्द्रदेव को भी इसी समय यहाँ बुलाकर इस मामले को तय कर देना चाहिए।

    "जो आज्ञा” कहकर जीतसिंह उठे और कमरे के बाहर जाकर चोबदार को हुक्म देने के बाद लौट आये, इसके बाद कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर गोपालसिंह ने कहा-

    गोपालसिंह-अपने खयाल में तो भूतनाथ ने कोई बुराई नहीं की थी क्योंकि बीस हजार अशर्फी दारोगा से वसूल करके उसे छोड़ देने पर भी उसने एक इकरार-नामा लिखा लिया था कि वह (दारोगा) ऐसे किसी काम में शरीक न होगा और न खुद ऐसा कोई काम करेगा जिसमें इन्द्रदेव, सरयू, इन्दिरा और मुझ (गोपालसिंह) को किसी तरह का नुकसान पहुँचे मगर दारोगा फिर भी बेईमानी कर ही गया और भूतनाथ इकरारनामे के भरोसे बैठा रह गया। इससे खयाल होता है कि शायद भूतनाथ को भी इन मामलों की ठीक खबर न हो अर्थात मुन्दर का हाल मालूम न हुआ हो, और वह लक्ष्मीदेवी के बारे में धोखा खा गया हो तो भी ताज्जुब नहीं।

    सुरेन्द्रसिंह-हो सकता है, (कुछ देर तक चुप रहने के बाद) मगर यह तो बताओ कि इन सब मामलों की खबर तुम्हें कब और क्योंकर लगी?

    गोपालसिंह-इन सब बातों का पता मुझे भूतनाथ के गुरुभाई शेरसिंह की जुबानी लगा जो भूतनाथ को भाई की तरह प्यार करता है मगर उसकी इन सब लालच भरी कार्रवाइयों के बुरे नतीजे को सोच और उसे पूरा कसूरवार समझकर उससे डरता और नफरत करता है। जिन दिनों रोहतासगढ़ का राजा दिग्विजयसिंह किशोरी को।अपने किले में ले गया था और इस सबब से शेरसिंह ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी, उन दिनों भूतनाथ छिपा-छिपा फिरता था। मगर जब शेरसिंह ने उस तिलिस्मी तहखाने

    1. इन्दिरा का किस्सा (चन्द्रकान्ता सन्तति, पन्द्रहवां भाग, पहला वयान)। में जाकर डेरा डाला, और छिपे-छिपे कमला और कामिनी की मदद करने लगा तो उन्हीं दिनों उस तिलिस्मी तहखाने में जाकर भूतनाथ ने शेरसिंह से एक तौर पर (बहुत दिनों तक गायब रहने के बाद) नई मुलाकात की, मगर धर्मात्मा शेरसिंह को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई।

    गोपालसिंह इतना कह ही रहे थे कि भूतनाथ और इन्द्रदेव कमरे के अन्दर आ पहुँचे और सलाम करके आज्ञानुसार जीतसिंह के पास बैठ गये।

    जीतसिंह-(भूतनाथ और इन्द्रदेव से) आप लोग बहुत जल्द आ गये।

    इन्द्रदेव-हम दोनों इसी जगह बरामदे के नीचे बाग में टहल रहे थे, इसलिए चोबदार नीचे उतरने के साथ ही हम लोगों से जा मिला।

    जीतसिंह-खैर, (गोपालसिंह से) हाँ तब ?

    गोपालसिंह-अपनी नेकनामी में धब्बा लगने और बदनाम होने के डर से भूतनाथ की सूरत देखना भी शेरसिंह पसन्द नहीं करता था, बल्कि उसका तो यही बयान है कि 'मुझे भूतनाथ से मिलने की आशा ही न थी और मैं समझे हुए था कि अपने दोषों से लज्जित होकर भूतनाथ ने जान दे दी।' मगर जिस दिन उसने उस तहखाने में भूतनाथ की सूरत देखी तो काँप उठा। उसने भूतनाथ की बहुत लानत-मलामत करने के बाद कहा कि "अब तुम हम लोगों को अपना मुंह मत दिखाओ और हमारी जान और आबरू पर दया करके किसी दूसरे देश में चले जाओ।" मगर मूतनाथ ने इस बात को मंजूर न किया और यह कहकर अपने भाई से बिदा हुआ कि चुपचाप बैठे देखते रहो कि मैं किस तरह अपने पुराने परिचितों में प्रकट होकर खास राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार बनता हूं। बस इसके बाद भूतनाथ कमलिनी से जा मिला और जी-जान से उसकी मदद करने लगा। मगर शेरसिंह को यह बात पसन्द न आई। यद्यपि कुछ दिनों तक शेरसिंह ने कमलिनी तथा हम लोगों का साथ दिया, मगर डरते-डरते । आखिर एक दिन शेरसिंह ने एकान्त में मुझसे मुलाकात की और अपने दिल का हाल तथा मेरे विषय में जो कुछ जानता था, कहने के बाद बोला, “यह सब हाल कुछ तो मुझे अपने भाई भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ और कुछ रोहतासगढ़ को इस्तीफा देने के बाद तहकीकात करने से मालूम हुआ, मगर इस बात की खबर हम दोनों भाइयों में से किसी को भी न थी कि आपको मायारानी ने कैद कर रक्खा है । खैर, अब ईश्वर की कृपा से आप छूट गये हैं इसलिए आपके सम्बन्ध जो कुछ मुझे मालूम है आपसे कह दिया, जिसमें आप दुश्मनों से अच्छी तरह बदला ले सकें। अब मैं आगे अपना मुंह किसी को दिखाना नहीं चाहता क्योंकि मेरा भाई भूतनाथ जिसे मैं मरा हुआ समझता था प्रकट हो गया और न मालूम क्या-क्या किया चाहता है । कहीं ऐसा न हो कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाय,अतः अब मैं जहाँ भागते बनेगा भाग जाऊँगा। हाँ, अगर भूतनाथ जो कि बड़ा जिद्दी और उत्साही है किसी तरह नेकनामी के साथ राजा वीरेन्द्र सिंह का ऐयार बन गया तो पुनः प्रकट हो जाऊँगा।" इतना कहकर शेरसिंह न मालूम कहाँ चला गया । मैंने बहुत

    1. देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, तीसरा भाग, तेरहवां बयान । कुछ समझाया मगर उसने एक न मानी। (कुछ रुककर) यही सब है कि मुझे इन सब बातों से आगाही हो गई और मैं भूतनाथ के भी बहुत से भेदों को जान गया।

    जीतसिंह-ठीक है । (भूतनाथ की तरफ देख के) भूतनाथ, इस समय तुम्हारा ही मामला पेश है ! इस जगह हम जितने भी आदमी हैं, सभी कोई तुमसे हमदर्दी रखते हैं; महाराज भी तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। ताज्जुब नहीं कि वह दिन आज ही हो कि तुम्हारे कसूर माफ किए जायं और तुम महाराज के ऐयार बन जाओ, मगर तुम्हें अपना हाल या जो कुछ तुमसे पूछा जाय उसका जवाब सच-सच कहना और देना चाहिए । इस समय तुम्हारा ही किस्सा हो रहा है ।

    भूतनाथ-(खड़े होकर सलाम करने के बाद) आज्ञा के विरुद्ध कुछ भी न करूंगा और कोई बात छिपा न रक्खूगा।

    जीतसिंह–तुम्हें यह तो मालूम हो गया कि सरयू और इन्दिरा भी यहाँ आ गई हैं जो जमानिया के तिलिस्म में फंस गई थी और उन्होंने अपना अनूठा किस्सा बड़े दर्द के साथ बयान किया था।

    भूतनाथ-(हाथ जोड़ के) जी हाँ, मुझ कम्बख्त की बदौलत उन्हें उस कैद की तकलीफ भोगनी पड़ी। उन दिनों बदकिस्मती ने मुझे हद से ज्यादा लालची बना दिया था। अगर मैं लालच में पड़कर दारोगा को न छोड़ देता तो यह बात कभी न होती। आपने सुना ही होगा कि उन दिनों हथेली पर जान लेकर मैंने कैसे-कैसे काम किये थे, मगर दौलत की लालच ने मेरे सब कामों पर मिट्टी डोल दी। अफसोस, मुझे इस बात की कुछ भी खबर न हुई कि दारोगा ने अपनी प्रतिज्ञा के विरुद्ध सारे काम किये,अगर मुझे खबर लग जाती तो उससे समझ लेता।

    जीतसिंह-अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा भाई शेरसिंह कहाँ है ?

    भूतनाथ-मेरे यहाँ होने के सबब से न मालूम वह कहाँ जाकर छिपा बैठा है । उसे विश्वास है कि भूतनाथ जिसने बड़े-बड़े कसूर किए हैं, कभी निर्दोष छूट नहीं सकता। बल्कि ताज्जुब नहीं कि उसके सबंब से मुझ पर भी किसी तरह का इलजाम लगे। हाँ, अगर वह मुझे बेकसूर छूटा हुआ देखेगा या सुनेगा तो तुरन्त प्रकट हो जायगा।

    जीतसिंह–वह चिट्ठयों वाला मुट्ठा तुम्हारे ही हाथ का लिखा हुआ है या नहीं?

    भूतसिंह-जी वे सब चिट्ठियाँ है तो मेरे ही हाथ की लिखी हुई, मगर वे असल नहीं बल्कि उन असली चिट्ठियों की नकलें हैं जो कि मैंने जयपाल (रघुवरसिंह) के यहाँ से चोरी की थीं । असल में इन चिट्ठियों का लिखने वाला मैं नहीं, बल्कि जयपाल है।

    जीतसिंह-खैर, तो जब तुमने जयमाल के यहाँ से असल चिट्ठियों की नकल की थी तो तुम्हें उसी समय मालूम हुआ होगा कि लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह पर क्या आफत आने वाली है ?

    भूतनाथ-क्यों न मालूम होता ! परन्तु रुपये की लालच में पड़कर अर्थात् कुछ लेकर मैंने जयपाल को छोड़ दिया। मगर बलभद्र सिंह से मैंने इस होनहार के बारे में इशारा जरूर कर दिया था, हाँ जयपाल का नाम नहीं बताया क्योंकि उससे रुपया वसूल कर चुका था। ओ यह कहना भी मैं भूल ही गया कि रुपये वसूल करने के साथ ही मैंने जयपाल को इस बात की कसम भी खिला दी थी कि अब वह लक्ष्मीदेवी और बल-भद्रसिंह से किसी तरह की बुराई न करेगा। मगर अफसोस, उसने (जयपाल ने) मेरे साथ दगा करके मुझे धोखे में डाल दिया और वह काम कर गुजरा जो किया चाहता था। इसी तरह मुझे वलभद्र सिंह के बारे में भी धोखा हुआ। दुश्मनों ने उन्हें कैद कर लिया और मुझे हर तरह से विश्वास दिला दिया कि बलभद्र सिंह मर गए । लक्ष्मीदेवी के बारे में जो कुछ चालाकी दारोगा ने की, उसका भी मुझे कुछ पता न लगा और न मैं कई वर्षों तक लक्ष्मीदेवी की सूरत ही देख सका कि पहचान लेता। बहुत दिनों के बाद जब मैंने नकली लक्ष्मी देवी को देखा भी तो मुझे किसी भी तरह का शक न हुआ, क्योंकि लड़कपन की सूरत और अधेड़पन की सूरत में बहुत बड़ा फर्क पड़ जाता है। इसके अतिरिक्त जिन दिनों मैंने नकली लक्ष्मीदेवी को देखा था, उस समय उनकी दोनों बहिनें अर्थात् श्यामा (कमलिनी) और लाडिली भी उसके साथ ही रहती थीं, जब वे ही दोनों उसकी बहन होकर धोखे में पड़ गईं तो मेरी कौन गिनती है ?

    बहुत दिनों के बाद जब यह कागज का मुट्ठा मेरे यहाँ से चोरी हो गया, तब मैं घबराया और डरा कि समय पर चोरी गया हुआ वह मुट्ठा मुझको मुजरिम बना देगा, और आखिर ऐसा ही हुआ । दुष्टों ने वही कागजों का मुट्ठा कैदखाने में बलभद्रसिंह को दिखाकर मेरी तरफ से उनका दिल फेर दिया और तमाम दोष मेरे ही सिर पर थोपा । इसके बाद और भी कई वर्ष बीत जाने पर जब राजा गोपालसिंह के मरने की खबर उड़ी और इस बात में किसी को किसी तरह का शक न रहा, तब धीरे-धीरे मुझे दारोगा और जयपाल की शैतानी का कुछ पता लगा, मगर फिर मैंने जान-बूझकर तरह दे दिया और सोचा कि अब उन बातों को खोदने से फायदा ही क्या, जब कि खुद राजा गोपालसिंह ही इस दुनिया से उठ गये तो मैं किसके लिए इन बखेड़ों को उठाऊँ ? (हाथ जोड़कर) बेशक यही मेरा कसूर है और इसीलिए मेरा भाई भी रंज है। हाँ इधर जब कि मैंने देखा कि अब श्रीमान् राजा वीरेन्द्रसिंह का दौरा-दौरा है और कमलिनी भी उस घर से निकल खड़ी हुई तब मैंने भी सिर उठाया और अबकी दफे नेकनामी के साथ नाम पैदा करने का इरादा कर लिया। इस बीच में मुझ पर बड़ी आफतें आई, मेरे मालिक रणधीरसिंह भी मुझसे बिगड़ गये और मैं अपना काला मुंह लेकर दुनिया से किनारे हो बैठा तथा अपने को मरा हुआ मशहूर कर दिया अब कहाँ तक बयान करूँ, बात तो यह है कि मैं सिर से पैर तक अपने को कसूरवार समझकर ही महाराजा की शरण में

    जीतसिंह-तुम्हारी पिछली कार्रवाई का बहुत-सा हाल महाराज को मालूम हो चुका है, उस जमाने में इन्दिरा को बचाने के लिए जो कार्रवाइयाँ तुमने की थीं उनसे महाराज प्रसन्न हैं, खास करके इसलिए कि तुम्हारे हरएक काम में दबंगता का हिस्सा ज्यादा था और तुम सच्चे दिल से इन्द्रदेव के साथ दोस्ती का हक अदा कर रहे थे,इस जगह एक बात का बड़ा ताज्जुब है।

    भूतनाथ-वह क्या ?

    जीतसिंह-इन्दिरा के बारे में जो-जो काम तुमने किये थे वे इन्द्रदेव से तो तुमने जरूर ही कहे होंगे?

    भूतनाथ-बेशक जो कुछ काम मैं करता था वह हमेशा ही इन्द्रदेव से पूरा-पूरा कह देता था।

    जीतसिंह-तो फिर इन्द्रदेव ने दारोगा को क्यों छोड़ दिया? सजा देना तो दूर रहा, इन्होंने गुरुभाई का नाता तक नहीं तोड़ा।

    भूतनाथ-(एक लम्बी साँस लेकर और उँगली से इन्द्रदेव की तरफ इशारा करके) इनके ऐसा भी बहादुर और मुरौवत का आदमी मैंने दुनिया में नहीं देखा । इनके साथ जो कुछ सलूक मैंने किया था उसका बदला भी अपने एक ही काम से इन्होंने ऐसा अदा किया कि जो इनके सिवाय दूसरा कर ही नहीं सकता था और जिससे मैं जन्म भर इनके सामने सिर उठाने लायक न रहा, अर्थात् जब मैंने रिश्वत लेकर दारोगा को छोड़ देने और कलमदान दे देने का हाल इनसे कहा, तो सुनते ही इनकी आँखों में आंसू भर आये और एक लम्बी साँस लेकर इन्होंने मुझसे कहा, "भूतनाथ, तुमने यह काम बहुत ही बुरा किया। किसी दिन इसका नतीजा बहुत ही खराब निकलेगा ! खैर, अब तो जो कुछ होना था हो गया, तुम मेरे दोस्त हो अतः जो कुछ तुम कर आये, उसे मैं भी मंजूर करता हूँ और दारोगा को एक दम भूल जाता हूँ । अब मेरी लड़की और स्त्री पर चाहे कैसी आफत क्यों न आये और मुझे भी चाहे कितना ही कष्ट क्यों न भोगना पड़े, मगर आज से दारोगा का नाम भी न लूंगा और न अपनी स्त्री के विषय में ही किसी से कुछ जिक्र करूँगा, जो कुछ तुम्हें करना हो करो और उस कम्बख्त दारोगा से भले ही कह दो कि 'इन बातों की खबर इन्द्रदेव को नहीं दी गई।' मैं भी अपने को ऐसा ही बनाऊँगा कि दारोगा को किसी तरह का खुटका न होगा और वह मुझे निरा उल्लू ही समझता रहेगा।" इन्द्रदेव की बात मेरे कलेजे में तीर की तरह लगी और मैं यह कहकर उठ खड़ा हुआ कि "दोस्त, मुझे माफ करो, बेशक मुझसे बड़ी भूल हुई है । अब मैं दारोगा को कभी न छोडूंगा और जो कुछ उससे लिया है उसे वापस कर दूंगा।" मगर इतना कहते ही इन्द्रदेव ने मेरी कलाई पकड़ ली और जोर के साथ मुझे बैठाकर कहा, “भूत-मैंने यह बात तुमसे ताने के ढंग पर नहीं कही है कि सुनने के साथ ही तुम उठ खड़े हुए। नहीं-नहीं, ऐसा कभी न होने पायेगा, हमने और तुमने जो कुछ किया और जो कहा सो कहा, अब उसके विपरीत हम दोनों में से कोई भी न जा सकेगा!"

    सुरेन्द्र सिंह-शाबाश !

    इतना कहकर सुरेन्द्र सिंह ने गहरी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रदेव की तरफ देखा और भूतनाथ ने फिर इस तरह कहना शुरू किया-

    भूतनाथ-मैंने बहुत कुछ कहा मगर इन्द्रदेव ने एक न माना और एक बहुत बड़ी कसम देकर मेरा मुंह बन्द कर दिया, मगर इस बात का नतीजा यह निकला कि उसी दिन से हम दोनों दोस्त दुनिया से उदासीन हो गये । मेरी उदासीनता में तो कुछ कसर न रह गई मगर इन्द्रदेव की उदासीनता में किसी तरह की कसर न रही। यही सबब था कि इन्द्रदेव के हाथ से दारोगा बच गया और दारोगा इन्द्रदेव की तरफ से (मेरे कहे मुताबिक) बेफिक्र रहा। सुरेन्द्रसिंह —— बेशक इन्द्रदेव ने यह बड़े हौसले और सब्र का काम किया !

    गोपालसिंह —— दोस्ती का हक अदा करना इसे कहते हैं, जितने अहसान भूतनाथ ने इन पर किये थे, सभी का बदला एक ही बात से चुका दिया ! भूतनाथ —– (गोपालसिंह की तरफ देख के) कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह से इन्दिरा ने अपना हाल किस तरह पर बयान किया था सो मुझे मालूम न हुआ । अगर यह मालूम हो जाता तो अच्छा होता कि इन्दिरा ने जो कुछ बयान किया था वह ठीक है अथवा उसने जो कुछ सुना था वह सच था ?

    गोपालसिंह —— जहाँ तक मेरा खयाल है, मैं कह सकता हूँ कि इन्दिरा ने अपने विषय में कोई बात ज्यादा नहीं कही, बल्कि ताज्जुब नहीं कि वह कई बातें मालूम न होने के कारण छोड़ गई हो। मैंने उसका पूरा-पूरा किस्सा महाराज को लिख भेजा था। (जीतसिंह की तरफ देखकर) अगर मेरी वह चिट्ठी यहाँ मौजूद हो, तो भूतनाथ को दे दीजिये, उसमें से इन्दिरा का किस्सा पढ़कर ये अपना शक मिटा लें।

    "हां वह चिट्ठी मौजूद है" इतना कह कर जीतसिंह उठे और आलमारी से वह किताबनुमा चिट्ठी निकाल कर और इन्दिरा का किस्सा बता कर भूतनाथ को दे दी। भूतनाथ उसे तेजी के साथ पढ़ गया और अन्त में बोला, "हाँ ठीक है, करीब-करीब सभी बातें उसे मालूम हो गई थी और आज मुझे भी एक बात नई मालूम हुई अर्थात् आखिरी मर्तबे जब मैं इन्दिरा को दारोगा के कब्जे से निकालकर ले गया था और अपने एक अड्डे पर हिफाजत के.साथ रख गया था तो वहाँ से एकाएक उसका गायब हो जाना मुझे बड़ा ही दुःखदायी हुआ। मैं ताज्जुब करता था कि इन्दिरा वहाँ से क्योंकर चली गई। जब मैंने अपने आदमियों से पूछा तो उन्होंने कहा कि 'हम लोगों को कुछ भी नहीं मालूम कि वह कब निकल कर भाग गई, क्योंकि हम लोग कैदियों की तरह उस पर निगाह नहीं रखते थे बल्कि घर का आदमी समझ कर कुछ बेफिक्र थे ।' परन्तु मुझे अपने आदमियों की बात पसन्द न आई और मैंने उन लोगों को सख्त सजा दी। आज मालूम हुआ कि वह कांटा मायाप्रसाद का बोया हुआ था। मैं उसे अपना दोस्त समझता था मगर अफसोस, उसने मेरे साथ बड़ी दगा की !"

    गोपालसिंह —— इन्दिरा की जुबानी यह किस्सा सुन कर मुझे भी निश्चय हो गया कि मायाप्रसाद दारोगा का हितू है अतः मैंने उसे तिलिस्म में कैद कर दिया है । अच्छा, यह तो बताओ कि उस समय जब तुम आखिरी मर्तबे इन्दिरा को दारोगा के यहाँ से निकाल कर अपने अड्डे पर रख आये और लौट कर पुनः जमानिया गये, तो फिर क्या हुआ, दारोगा से कैसे निपटे, और सरयू का पता क्यों न लगा सके ?

    भूतनाथ — इन्दिरा को उस ठिकाने रख कर जब मैं लौटा तो पुनः जमानिया गया परन्तु अपनी हिफाजत के लिए पाँच आदमिमों को अपने साथ लेता गया और उन्हें (अपने आदमियों को) कब क्या करना चाहिए इस बात को भी अच्छी तरह समझा दिया क्योंकि वे पांचों आदमी मेरे शागिर्द थे और कुछ ऐयारी भी जानते थे । मुझे सरयू के लिए दारोगा से फिर मुलाकात करने की जरूरत थी मगर उसके घर में जाकर भुलाकात करने का इरादा न था क्योंकि मैं खूब समझता था कि वह 'दूध का जला छाछ फूंक के

    पीता होगा' और मेरे लिए अपने घर में कुछ-न-कुछ बन्दोबस्त जरूर कर रक्खा होगा ! अगर अबकी दिलेरी के साथ उसके घर में जाऊँगा तो बेशक फंस जाऊँगा, इसलिए बाहर ही उससे मुलाकात करने का बन्दोबस्त करने लगा। खैर, इसी फेर में दस-बारह दिन बीत गए और इस बीच में मुलाकात करने का कोई अच्छा मौका न मिला। पता लगाने से मालूम हुआ कि वह बीमार है और घर से बाहर नहीं निकलता । यह बात मुझे मायाप्रसाद ने कही थी मगर मैंने मायाप्रसाद से इन्दिरा के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न राजा साहब (गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) ही से कुछ कहा, क्योंकि दारोगा को बेदाग छोड़ देने के लिए मेरे दोस्त इन्द्रदेव ने पहले ही से तय कर लिया था, अब अगर राजा साहब से मैं कुछ कहता तो दारोगा जरूर सजा पा जाता। लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मायाप्रसाद और दारोगा को इस बात का पता क्योंकर लग गया कि इन्दिरा फलां जगह है । खैर, मुख्जसिर यह है कि एक दिन स्वयं मायाप्रसाद ने मुझसे कहा-“गदाधरसिंह, मैं तुम्हें इसकी इत्तिला देता हूँ कि सरयू निःसन्देह दारोगा की कैद में है मगर बीमार है, अगर तुम किसी तरह दारोगा के मकान में चले जाओ तो उसे जरूर अपनी आँखों से देख सकोगे। मेरी इस बात में तुम किसी तरह का शक न करो, मैं बहुत पक्की बात तुमसे कह रहा हूँ ।” मायाप्रसाद की बात सुनकर मुझे एक दफे जोश चढ़ आया और मैं दारोगा के मकान में जाने के लिए तैयार भी हो गया। मैं क्या जानता था कि मायाप्रसाद दारोगा से मिला हुआ है । खैर, मैं अपनी हिफाजत के लिए कई तरह का बन्दोबस्त करके आधी रात के समय कमन्द के जरिये दारोगा के लम्बे- चौड़े और शैतान की आंत की सूरत वाले मकान में घुस गया और चोरों की तरह टोह लेता हुआ उस कमरे में जा पहुंचा जिसमें दारोगा एक गद्दी के ऊपर उदास बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। उस समय उसके बदन पर कई जगह पट्टी बंधी हुई थी जिससे वह चुटीला मालूम पड़ता था और उसके सिर का भी यही हाल था। दारोगा मुझे देखते ही चौंक उठा और आँखें चार होने के साथ ही मैंने उससे कहा, "दारोगा साहब, मैं आपके मकान में कैद होने के लिए नहीं आया हूँ बल्कि सरयू को देखने के लिए आया हूँ जिसके इस मकान में होने का पता मुझे लग चुका है। अतः इस समय मुझसे किसी तरह बुराई करने की उम्मीद न रखिए क्योंकि मैं अगर आधे घंटे के अन्दर इस मकान के बाहर होकर अपने साथियों के पास न चला जाऊँगा तो उन्हें विश्वास हो जायगा कि गदाधर- सिंह फंस गया और तब वे लोग आपको हर तरह से बर्बाद कर डालेगे, जिसका कि मैं पूरा-पूरा बन्दोबस्त कर आया हूँ।"

    इतना सुनते ही दारोगा खड़ा हो गया और उसने हँस कर जवाब दिया, "मेरे लिए आपको इस कड़े प्रबन्ध की कोई आवश्यकता न थी और न मुझमें इतनी सामर्थ्य ही है कि आप जैसे ऐयार का मुकाबला करूँ, मैं तो खुद आपकी तलाश में ही था कि किसी तरह आपको पाऊँ और अपना कसूर माफ कराऊँ । मुझे तो विश्वास है कि जब आप एक बड़ा कसुर माफ कर चुके हैं तो इसको भी माफ कर देंगे । गुस्से को दूर कीजिए, फिर भी आपके लिए हाजिर हूँ।"

    मैं-(बैठकर और दारोगा को बैठा कर) कसूर माफ कर देने के लिए तो कोई

    हर्ज नहीं है मगर आइन्दा के लिए कसूर न करने का वादा करके भी आपने मेरे साथ दगा की, इसका मुझे जरूर बड़ा रंज है !

    दारोगा —— (हाथ जोड़कर) खैर, जो हो गया सो हो गया, अब अगर फिर कोई कसूर मुझसे हो तो जो चाहे सजा दीजियेगा, मैं उफ भी न करूंगा।

    मैं —— खैर, एक दफा और सही, मगर इस कसूर के लिए आपको कुछ जुर्माना जरूर देना पड़ेगा।

    दारोगा —— यद्यपि आप मुझे पहले ही पूरी तरह कंगाल कर चुके हैं मगर फिर भी मैं आपकी आज्ञा-पालन के लिए हाजिर हूँ।

    मैं —— दो हजार अशर्फी।

    दारोगा —— (आलमारी में से एक थैली निकाल कर और मेरे सामने रखकर) बस, एक हजार अशर्फी को कबूल कीजिए और..

    मैं —— (मुस्कुराकर) मैं कबूल करता हूँ और अपनी तरफ से यह थैली आपको देकर इसके बदले में सरयू को मांगता हूँ जो इस समय आपके घर में है।

    दारोगा -– बेशक सरयू मेरे घर में है और मैं उसे अभी आपके हवाले करूँगा मगर इस थैली को आप कबूल कर लीजिए, नहीं तो मैं समझूगा कि आपने मेरा कसूर माफ नहीं किया।

    मैं —— नहीं-नहीं, मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने आपका कसूर माफ कर दिया और खुशी से यह थैली आपको वापस करता हूँ, अब मुझे सिवाय सरयू के और कुछ नहीं चाहिए।

    हम दोनों में देर तक इसी तरह की बातें हुईं और और इसके बाद मेरी आखिरी बात सुनकर दारोगा उठ खड़ा हुआ और मेरा हाथ पकड़ दूसरे कमरे की तरफ यह कहता हुआ ले चला कि “आओ मैं तुमको सरयू के पास ले चलूं, मगर अफसोस की बात है कि इस समय वह हद दर्जे की बीमार हो रही है !' खैर, वह मुझे घुमाता-फिराता एक दूसरे कमरे में ले गया और वहाँ मैंने एक पलंग पर सरयू को बीमार पड़े देखा। एक मामूली चिराग उससे थोड़ी ही दूर पर जल रहा था। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस, मैंने देखा कि बीमारी ने उसे आखिरी मंजिल के करीब पहुंचा दिया है और वह इतनी कमजोर हो रही है कि बात करना भी उसके लिए कठिन हो रहा है। मुझे देखते ही उसकी आँखें डबडबा आईं और मुझे भी रुलाई आने लगी। उस समय मैं उसके पास बैठ गया और अफसोस के साथ उसका मुंह देखने लगा। उस वक्त दो लौंडियाँ उसकी खिदमत के लिए हाजिर थीं जिनमें से एक ने आगे बढ़कर रूमाल से उसके आँसू पोंछे और पीछे हट गई ! मैंने अफसोस के साथ पूछा- “सरयू, यह तेरा क्या हाल है ?"

    इसके जवाब में सरयू ने बहुत बारीक आवाज में रुककर कहा, "भैया, (क्योंकि वह प्रायः मुझे भैया कह कर ही पुकारा करती थी) मेरी बुरी अवस्था हो रही है। अब मेरे बचने की आशा न करनी चाहिए । यद्यपि दारोगा साहब ने मुझे कैद किया था मगर मैं इनका अहसान मानती हूँ कि इन्होंने मुझे किसी तरह की तकलीफ नहीं दी बल्कि इस बीमारी में मेरी बड़ी हिफाजत की, दवा इत्यादि का भी पूरा प्रबन्ध रखा, मगर यह न

    बताया कि मुझे कैद क्यों किया था। खैर, जो भी हो, इस समय तो मैं आखिरी दम का इन्तजार कर रही हूँ और सब तरफ से मोह-माया को छोड़ ईश्वर से लौ लगाने का उद्योग कर रही हूँ। मैं समझ गई हूँ कि तुम मुझे लेने के लिए आये हो । मगर दया करके मुझे इसी जगह रहने दो और इधर-उधर कहीं मत ले जाओ, क्योंकि इस समय मैं किसी अपने को देख मायामोह में आत्मा को फंसाना नहीं चाहती और न गंगाजी का सम्बन्ध छोड़ कर दूसरी किसी जगह मरना ही पसन्द करती हूं, यहाँ यों भी अगर गंगाजी में फेंक दी जाऊँगी, तो मेरी सद्गति हो जायगी, बस यही आखिरी प्रार्थना है। एक बात और भी है कि मेरे लिए दारोगा साहब को किसी तरह की तकलीफ न देना और ऐसा करना जिसमें इनकी जरा बेइज्जती न हो, यह मेरी वसीयत है और यही मेरी आरजू है । अब श्रीगंगाजी को छुड़ाकर मुझे नरक में मत डालो।" इतना कह सरयू कुछ देर को चुप हो गई और मुझे उसकी अवस्था पर रुलाई आने लगी। मैं और भी कुछ देर तक उसके पास बैठा रहा और धीरे-धीरे बातें भी होती रहीं। मगर जो कुछ उसने कहा उसका तत्त्व यही था कि मुझे यहाँ से मत हटाओ और दारोगा को कुछ तकलीफ मत दो। उस समय मेरे दिल में यही बात आई कि इन्द्रदेव को इस बात की इत्तिला दे देनी चाहिए। वह जैसी आज्ञा देंगे किया जायगा। मगर अपना यह विचार मैंने दारोगा से नहीं कहा क्योंकि उसे मैं इन्द्रदेव की तरफ से बेफिक्र कर चुका था और कह चुका था कि सरयू और इन्दिरा के साथ जो कुछ बर्ताव तुमने किया है, उसकी इत्तिला मैं इन्द्रदेव को न दूंगा, दूसरे को कसूरवार ठहराकर तुम्हारा नाम बचा जाऊँगा । अतः मैं सरयू से दूसरे दिन मिलने का वायदा करके वहाँ से उठा और अपने डेरे पर चला आया । यद्यपि रात बहुत कम बाकी रह गई थी, परन्तु मैंने उसी समय अपने एक खास आदमी को पत्र देकर इन्द्रदेव के पास रवाना कर दिया और ताकीद कर दी कि एक घोड़ा किराये का लेकर दौड़ा-दौड़ चला जाय और जहाँ तक हो सके पत्र का जवाब लेकर जल्द ही लौट आवे । दूसरे दिन आधी रात जाते-जाते तक वह आदमी लौट आया और उसने इन्द्रदेव का पत्र मेरे हाथ में दिया, लिफाफा खोल कर मैंने पढ़ा । उसमें यह लिखा हुआ था ——

    "तुम्हारा पत्र पढ़ने से कलेजा हिल गया । सच तो यह है कि दुनिया में मुझ-सा बदनसीब भी कोई न होगा ! खैर, परमेश्वर की मर्जी ही ऐसी है तो मैं क्या कर सकता हूँ। दारोगा के बारे में मैंने जो प्रतिज्ञा तुमसे की है, उसे झूठ न होने दूंगा। मैं अपने कलेजे पर पत्थर रख कर सब कुछ सहूँगा। मगर वहाँ जाकर बेचारी सरयू को अपना मुंह न दिखाऊँगा और न दारोगा से मिलकर उसके दिल में किसी तरह का शक ही आने दूंगा। हाँ, अगर सरयू की जान बचती नजर आवे या इस बीमारी से बच जाय तो उसे जिस तरह मुनासिब समझना मेरे पास पहुंचा देना और अगर वह मर जाय तो मेरी जगह तुम बैठे ही हो, उसकी अन्त्येष्टि क्रिया अपनी हिम्मत के मुताबिक करके मेरे पास आना। मेरी तबीयत अब दुनिया से हट गई, बस, इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता । हाँ, यदि कुछ कहना होगा तो तुमसे मुलाकात होने पर कहूँगा। आगे जो ईश्वर की मर्जी ।

    तुम्हारा वही-इन्द्रदेव !"

    इस चिट्ठी को पढ़कर मैं बहुत देर तक रोता और अफसोस करता रहा। इसके

    बाद उठकर दारोगा के मकान की तरफ रवाना हुआ। मगर आज भी अपने बचाव का पूरा-पूरा इन्तजाम करता गया। मुलाकात होने पर दारोगा ने कल से ज्यादा खातिर- दारी के साथ मुझे बैठाया और देर तक बातचीत करता रहा । मगर जब मैं सरयू के पास गया तो उसकी हालत कल से ज्यादा खराब देखने में आई, अर्थात् आज उसमें बोलने की भी ताकत न थी। मुख्तसिर यह है कि तीसरे दिन बेहोश और चौथे दिन आधी रात के समय मैंने सरयू को मुर्दा पाया । उस समय मेरी क्या हालत थी, सो मैं बयान नहीं कर सकता। अस्तु, उस समय जो कुछ करना उचित था और मैं कर सकता था, उसे सवेरा होने के पहले ही करके छुट्टी किया, अपने खयाल से सरयू के शरीर की दाह-क्रिया इत्यादि करके पंचतत्व में मिला दिया और इस बात की इत्तिला इन्द्रदेव को दे दी। इसके बाद इन्दिरा के लिए अपने अड्डे पर गया और वहाँ उसे न पाकर बड़ा ताज्जुब हुआ। पूछने पर मेरे आदमियों ने जवाब दिया कि "हम लोगों को कुछ भी खबर नहीं कि वह कब और कहाँ भाग गई।" इस बात से मुझे सन्तोष न हुआ। मैंने अपने आद- मियों को सख्त सजा दी और बराबर इन्दिरा का पता लगाता रहा। अब सरयू के मिल जाने से मालूम हुआ कि उस दिन मेरी कम्बख्त आँखों ने मेरे साथ दगा की और दारोगा के मकान में बीमार सरयू को मैं पहचान न सका। मेरी आँखों के सामने सरयू मर चुकी थी और मैंने खुद अपने हाथ से इन्द्रदेव को यह समाचार लिखा था, इसलिए उन्हें किसी तरह का शक न हुआ और सरयू तथा इन्दिरा के गम में ये दीवाने से हो गये, हर तरह के चैन और आराम को इन्होंने इस्तीफा दे दिया और उदासीन हो एक प्रकार से साधू ही बन बैठे। मुझसे भी मुहब्बत कम कर दी और शहर का रहना छोड़ अपने तिलिस्म के अन्दर चले गये और उसी में रहने लगे, मगर न मालूम क्या सोचकर इन्होंने मुझे वहाँ का रास्ता न बताया। मुझ पर भी इस मामले का बड़ा असर पड़ा क्योंकि ये सब बातें मेरी ही नालायकी के सबब से हुई थीं। अतएव मैंने उदासीन हो रणधीरसिंहजी की नौकरी छोड़ दी और अपने बाल-बच्चों तथा स्त्री को भी उन्हीं के यहां छोड़, बिना किसी को कुछ कहे जंगल और पहाड़ का रास्ता लिया। उधर एक और स्त्री से मैंने शादी कर ली थी जिससे नानक पैदा हुआ है। उधर भी कई ऐसे मामले हो गये जिनसे मैं बहुत उदास और परेशान हो रहा था, उसका हाल नानक की जुबानी तेजसिंह को मालूम ही हो चुका है। बल्कि आप लोगों ने भी तो सुना ही होगा। अस्तु, हर तरह से अपने को नालायक समझकर मैं निकल भागा और फिर मुद्दत तक अपना मुंह किसी को न दिखाया। इधर जब जमाने ने पलटा खाया तब मैं कमलिनीजी से जा मिला। उन दिनों मेरे दिल में विश्वास हो गया था कि इन्द्रदेव मुझसे रंज हैं। अतः मैंने इनसे भी मिलना-जुलना छोड़ दिया, बल्कि यों कहना चाहिए कि हमारी इतनी पुरानी दोस्ती का उन दिनों अन्त हो गया था।

    इन्द्रदेव —— बेशक, यही बात थी। स्त्री के मरने की खबर सुन कर मुझे बड़ा ही रंज हुआ। मुझे कुछ तो भूतनाथ की जुबानी और कुछ तहकीकात करने पर मालूम ही हो चुका था कि मेरी लड़की और स्त्री इसी की बदौलत जहन्नुम चली गई। अस्तु, मैंने भूतनाथ की दोस्ती को तिलांजलि दे दी और मिलना-जुलना बिल्कुल बन्द कर दिया मगर इससे कहा कुछ भी नहीं क्योंकि मैं अपनी जुबान से दारोगा को माफ कर चुका था। इसके अतिरिक्त इसने मुझ पर कुछ अहसान भी जरूर ही किये थे, उनका भी मुझे खयाल था। अस्तु मैंने कुछ कहा तो नहीं, मगर इसकी तरफ से दिल हटा लिया और फिर अपना कोई भेद भी इसको नहीं बताया। कभी-कभी इसके साथ इधर-उधर की मुलाकात हो जाती थी, क्योंकि इसे मैंने अपने मकान का तिलिस्मी रास्ता नहीं दिखाया था । अगर यह कभी मेरे मकान पर आया भी तो अपनी आँखों पर पट्टी बांध कर । यही सबब था कि इसे लक्ष्मीदेवी का हाल मालूम न हुआ। लक्ष्मीदेवी के बारे में भी मैं इसे कसूरवार समझता था और मुझे यह भी विश्वास था कि यह अपना बहुत-सा भेद मुझसे छिपाता है और वास्तव में छिपाता भी था।

    भूतनाथ—(इन्द्रदेव से) नहीं, सो बात तो नहीं है, मेरे कृपालु मित्र!.

    इन्द्रजीतसिंह -अगर यह बात नहीं है तो कलमदान, जिसे तुम आखिरी मर्तबे इन्दिरा के साथ दारोगा के यहाँ से उठा लाये और मुझे दे गये थे, मेरे यहाँ से कैसे गायब हो गया?

    भूतनाथ-(मुस्करा कर) आपके किस मकान में से वह कलमदान गायव हो गया था?

    इन्द्रजीतसिंह-काशीजी वाले मकान में से । उसी दिन तुम मुझसे मिलने के लिए वहाँ आये थे और उसी दिन वह कलमदान गायब हो गया।

    भूतनाथ-ठीक है, तो उस कलमदान को चुराने वाला मैं नहीं हूं, बल्कि मेरा लड़का नानक है । मैं तो यों भी अगर जरूरत होती तो आपसे वह कलमदान मांग सकता था । दारोगा की आज्ञानुसार लाड़िली ने रामभोली बनकर नानक को धोखा दिया और अ के यहाँ से कलमदान चुरवा मंगवाया।

    गोपालसिंह-हाँ ठीक है, इस बात को तो मैं भी सकारूँगा क्योंकि मुझे इसका असल हाल मालूम है । बेशक इसी ढंग से वह कलमदान वहाँ पहुंचा था और अन्त में बड़ी मुश्किल से वह उस समय मेरे हाथ लगा, जब मैं कृष्ण जिन्न बन कर रोहतासगढ़ पहुंचा था। नानक को विश्वास है कि लाड़िली ने रामभोली बनकर उसे धोखा दिया था,मगर वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। वह एक दूसरी ही ऐयारा थी जो रामभोली बनी थी,लाड़िली ने तो केवल एक ही दिन या दो दिन रामभोली का रूप धरा था।

    जीतसिंह-(राजा गोपालसिंह से) वह कलमदान आपको कहाँ से मिल गया ? दारोगा ने तो उसे बड़ी ही हिफाजत से रखा होगा!

    गोपालसिंह-बेशक ऐसा ही है । मगर भूतनाथ की बदौलत वह मुझे सहज ही में मिल गया। ऐसी-ऐसी चीजों को दारोगा बहुत गुप्त रीति से अपने अजायबघर में रखता था, जिसकी ताली मायारानी से लेकर भूतनाथ ने मुझे दी थी । उस अजायबघर का भेद मेरे पिता और उस दारोगा के सिवाय कोई नहीं जानता था। मेरे पिता ही ने

    1.देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, चौथा भाग छठवां बयान । दारोगा को वहाँ का मालिक बना दिया था। जब भूतनाथ ने उसकी ताली मुझे दी, तब मुझे भी वहां का पूरा-पूरा हाल मालूम हुआ।

    जीतसिंह-(भूतनाथ से) खैर, यह बताओ कि मनोरमा और नागर का तुमसे क्या सम्बन्ध था?

    यह सवाल सुनकर भूतनाथ सन्न हो गया और सिर झुकाकर कुछ सोचने लगा। उस समय गोपालसिंह ने उसकी मदद की और जीतसिंह की तरफ देख कर कहा, “इस सवाल को छोड़ दीजिए, क्योंकि वह जमाना भूतनाथ का बहुत ही बुरा तथा ऐयाशी का था। इसके अतिरिक्त जिस तरह राजा वीरेन्द्रसिंहजी ने रोहतासगढ़ के तहखाने में भूतनाथ का कसूर माफ किया था, उसी तरह कमलिनी ने भी इसका वह कसूर कसम खिलाकर माफ किया और साथ ही उन ऐबों को छिपाने का बन्दोबस्त कर दिया है।"

    इसके जवाब में जीतसिंह ने कहा, "खैर, जाने दो, देखा जायेगा।"

    गोपालसिंह-जब से भूतनाथ ने कमलिनी का साथ किया है, तब से इसने (भूतनाथ ने) जो-जो काम किये हैं, उन पर ध्यान देने से आश्चर्य होता है।वास्तव में इसने ऐसे काम किये हैं, जिनकी ऐसे समय हमें सख्त जरूरत थी। मगर इसका लड़का नानक तो बिल्कुल ही बोदा और खुदगर्ज निकला। न तो कमलिनी के साथ मिल कर उसने कोई तारीफ का काम किया और न अपने बाप ही को किसी तरह की मदद दी।

    भूतनाथ-बेशक ऐसा ही है, मैंने कई दफा उसे समझाया, मगर

    सुरेन्द्र सिंह- (गोपाल से) अच्छा, अजायबघर में क्या बात है जिससे ऐसा अनूठा नाम उसका रखा गया ? अब तो तुम्हें उसका पूरा-पूरा हाल मालूम हो ही गया होगा।

    गोपालसिंह-जी हाँ। एक किताब है जिसे 'ताली' के नाम से सम्बोधित करते हैं। उसके पढ़ने से वहां का कुल हाल मालूम होता है । वह बड़ी हिफाजत और तमाशे की जगह थी और कुछ है भी, क्योंकि अब उसका काफी हिस्सा मायारानी की बदौलत बर्बाद हो गया।

    जीतसिंह-उस किताब (ताली) की बदौलत मायारानी को भी वहां का हाल मालूम हो गया होगा?

    गोपालसिंह-कुछ-कुछ, क्योंकि उस किताब की भाषा वह अच्छी तरह समझ नहीं सकती थी। इसके अतिरिक्त उस अजायबघर का जमानिया के तिलिस्म से भी सम्बन्ध है। इसलिए कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहां का हाल मुझसे भी ज्यादा मालूम हुआ होगा।

    जीतसिंह-ठीक है, (सुरेन्द्र सिंह की तरफ देख कर) आज यद्यपि बहुत-सी नई बातें मालूम हुई हैं । परन्तु फिर भी जब तक दोनों कुमार यहाँ न आ जायेंगे तत्र तक बहुत-सी बातों का पता न लगेगा।

    सुरेन्द्र सिंह–सो तो होगा ही, परन्तु इस समय हम केवल भूतनाथ के मामले को तय करना चाहते हैं । जहाँ तक मालूम हुआ है भूतनाथ ने हम लोगों के साथ सिवाय भलाई के बुराई कुछ भी नहीं की। अगर उसने बुराई की तो इन्द्रदेव के साथ या कुछ गोपालसिंह के साथ, सो भी उस जमाने में जब इनसे और हमसे कुछ सम्बन्ध नहीं था। आज ईश्वर की कृपा से ये लोग हमारे साथ हैं, बल्कि हमारे अंग हैं । इससे कहा भी जा सकता है कि भूतनाथ हमारा ही कसूरवार है। मगर फिर भी हम इसके कसूरों की माफी का अख्तियार इन्हीं दोनों अर्थात् गोपालसिंह और इन्द्रदेव को देते हैं। ये दोनों अगर भूतनाथ का कसूर माफ कर दें तो हम इस बात को खुशी से मंजूर कर लेंगे । हाँ,लोग यह कह सकते हैं कि इस माफी देने में बलभद्रसिंह को भी शरीक करना चाहिए था। मगर हम इस बात को जरूरी नहीं समझते, क्योंकि इस समय बलभद्रसिंह को कैद से छुड़ा कर भूतनाथ ने उन पर बल्कि सच तो ये है कि हम लोगों पर भी बहुत बड़ा अहसान किया है, इसलिए अगर बलभद्र सिंह को इससे कुछ रंज हो तो भी माफी देने में वे कुछ उज्र नहीं कर सकते।

    गोपालसिंह-इसी तरह हम दोनों को भी माफी देने में किसी तरह का उज्र न होना चाहिए। इस समय भूतनाथ ने मेरी बहुत बड़ी मदद की है और मेरे साथ मिल कर ऐसे अनूठे काम किये हैं कि जिनकी तारीफ सहज में नहीं हो सकती । इस हमदर्दी और मदद के सामने उन कसूरों की कुछ भी हकीकत नहीं, अतः मैं इससे बहुत प्रसन्न हूँ और सच्चे दिल से इसे माफी देता हूं।

    इन्द्रदेव-माफी देनी ही चाहिए ! जब आप माफी दे चुके तो मैं भी दे चुका!ईश्वर भूतनाथ पर कृपा करें, जिससे अपनी नेकनामी बढ़ाने का शौक इसके दिल में दिन-दिन तरक्की करता रहे। सच बात तो यह है कि कमलिनी की बदौलत इस समय हम लोगों को यह शुभ दिन देखने में आया और जब कमलिनी ने इससे प्रसन्न हो इसके कसूर माफ कर दिए तो हम लोगों को बाल-बराबर भी उज्र नहीं हो सकता।

    जीतसिंह-बेशक, बेशक !

    सुरेन्द्रसिंह-इसमें कुछ भी शक नहीं ! (भूतनाथ की तरफ देख कर) अच्छा, भूतनाथ, तुम्हारा सब कसूर माफ किया जाता है। इन दिनों हम लोगों के साथ तुमने जो-जो नेकियां की हैं उनके बदले में हम तुम पर भरोसा करके तुम्हें अपना ऐयार बनाते हैं ।

    इतना कहकर सुरेन्द्र सिंह उठ बैठे और अपने सिरहाने के नीचे से अपना खास बेशकीमत खंजर निकालकर भूतनाथ की तरफ बढ़ाया। भूतनाथ खड़ा हो गया और झुककर सलाम करने के बाद खंजर ले लिया और इसके बाद जीतसिंह, गोपालसिंह और इन्द्रदेव को भी सलाम किया। जीतसिंह ने अपना खास ऐयारी का बटुआ भूतनाथ को दिया। गोपालसिंह ने वह तिलिस्मी तमंचा, जिससे आखिरी वक्त मायारानी ने काम लिया था और जो इस समय उनके पास था, गोली बनाने की तरकीब सहित भूतनाथ को दिया और इन्द्रदेव ने यह कहकर उसे गले से लगा लिया कि “मुझ फकीर के पास इससे बढ़कर और कोई चीज नहीं है कि मैं फिर तुम्हें अपना भाई बना कर ईश्वर से प्रार्थना करूं कि अब इस नाते में किसी तरह का फर्क न पड़ने पावे।"

    इसके बाद दोनों आदमी अपनी-अपनी जगह पर बैठ गये और भूतनाथ ने हाथ जोड़कर सुरेन्द्रसिंह से कहा, "आज मैं समझता हूँ कि मुझ-सा खुशनसीब इस दुनिया में दूसरा कोई भी नहीं है। बदनसीबी के चक्कर में पड़कर मैं वर्षों परेशान रहा, तरह-तरह की तकलीफें उठाई, पहाड़-पहाड़ और जंगल-जंगल मारा फिरा, साथ ही इसके पैदा भी बहुत किया और बिगाड़ा भी बहुत, परन्तु सच्चा सुख नाम मात्र के लिए एक दिन भी न मिला और न किसी को मुंह दिखाने की अभिलाषा ही रह गई। अन्त में न मालूम किस जन्म का पुण्य सहायक हुआ जिसने मेरे रास्ते को बदल दिया और जिसकी बदौलत आज मैं इस दर्जे को पहुँचा। अब मुझे किसी बात की परवाह न रही। आज तक जो मुझसे दुश्मनी रखते थे, कल से वे मेरी खुशामद करेंगे, क्योंकि दुनिया का कायदा ही ऐसा है। महाराज इस बात का भी निश्चय रखें कि उस पीतल की सन्दूकड़ी से महाराज या महाराज के पक्षपातियों का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, जो नकली बलभद्रसिंह की गठरी में से निकली है और जिसके बयान ही से मेरे रोंगटे खड़े होते हैं । मैं उस भेद को भी महाराज से छिपाना नहीं चाहता, हाँ, यह अच्छा है कि सर्वसाधारण में वह भेद न फैलने पाये। मैंने उसका कुछ हाल देवी सिंह से कह दिया है, आशा है कि वे महाराज से जरूर अर्ज करेंगे।

    जीतसिंह–खैर, उसके लिए तुम चिन्ता न करो, जैसा होगा देखा जायेगा। अब अपने डेरे पर जाकर आराम करो, महाराज भी आज रात भर जागते ही रहे हैं।

    गोपालसिंह–जी हाँ, अब तो नाममात्र को रात बच गई होगी।

    इतना कहकर राजा गोपालसिंह उठ खड़े हुए और सबको साथ लिए हुए कमरे के बाहर चले गये।

    3

    इस समय रात बहुत कम बाकी थी और सुबह की सफेदी आसमान पर फैलना ही चाहती थी। और लोग तो अपने-अपने ठिकाने चले गए और दोनों नकाबपोशों ने भी अपने घर का रास्ता लिया, मगर भूतनाथ सीधे देवीसिंह के डेरे पर चला गया। दरवाजे पर ही पहरेवाले की जुबानी मालूम हुआ कि वे सोये हैं परन्तु देवीसिंह को न मालूम किस तरह भूतनाथ के आने की आहट मिल गई (शायद जागते हों)अतः वे तुरन्त बाहर निकल आए और भूतनाथ का हाथ पकड़कर कमरे के अन्दर ले गए। इस समय वहाँ केवल एक शमादान की मद्धिम रोशनी हो रही थी, दोनों आदमी फर्श पर बैठ गए और यों बातचीत होने लगी-

    देवीसिंह–कहो, इस समय तुम्हारा आना कैसे हुआ? क्या कोई नई बात हुई?

    भूतनाथ-बेशक नई बात हुई और वह इतनी खुशी की हुई है जिसके योग्य मैं नहीं था।

    देवीसिंह—(ताज्जुब से) वह क्या ?

    भूतनाथ-आज महाराज ने मुझे अपना ऐयार बना लिया और इस इज्जत के लिए मुझ अपना खंजर भी बख्शा है ।

    इतना कहकर भूतनाथ ने महाराज का दिया हुआ बंजर और जीतसिंह तथा गोपालसिंह का दिया हुआ बटुआ और तमंचा देवीसिंह को दिखाया और कहा, "इसी बात की मुबारकबाद देने के लिए मैं आया हूँ कि तुम्हारा एक नालायक दोस्त इस दर्जे को पहुँच गया।"

    देवीसिंह-(प्रसन्न होकर और भूतनाथ को गले से लगाकर) बेशक यह बड़ी खुशी की बात है, ऐसी अवस्था में तुम्हें अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह को भी सलाम करने के लिए जाना चाहिए।

    भूतनाथ-जरूर जाऊँगा !

    देवीसिंह-यह कार्रवाई कब हुई ?

    भूतनाध-अभी थोड़ी ही देर पहले हुई । मैं इस समय महाराज के पास से ही चला आ रहा हूँ। इतना कहकर भूतनाथ ने आज की रात का कुल हाल देवीसिंह से बयान किया ।इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह में देर तक बातचीत होती रही, और जब दिन अच्छी तरह निकल आया, तब दोनों ऐयार वहाँ से उठे और स्नान-संध्या की फिक्र में लगे ।

    जरूरी कामों से निश्चिन्ती पा और स्नान-पूजा से निवृत्त होकर भूतनाथ अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह के पास चला गया। बेशक उसके दिल में इस बात का खुटका लगा हुआ था कि उसका पुराना मालिक उसे देखकर प्रसन्न न होगा, बल्कि सामना होने पर भी कुछ देर तक उसके दिल में इस बात का गुमान बना रहा, मगर जिस समय भूतनाथ ने अपना खुलासा हाल बयान किया, उस समय बहुत परेशान रणधीरसिंह को और प्रसन्न पाया। रणधीरसिंह ने उसको खिलअत और इनाम भी दिया और बहुत देर तक उससे तरह-तरह की बातें करते रहे।

    4

    यह बात तो तय पा चुकी थी कि सब कामों के पहले कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी हो जानी चाहिए, अतः इसी खयाल से जीतसिंह शादी के इन्तजाम में जी-जान से कोशिश कर रहे हैं और इस बात की खबर पाकर सभी प्रसन्न हो रहे हैं कि आज दोनों कुमार आ जायेंगे और शीघ्र ही उनकी शादी भी हो जायेगी। महाराज की आज्ञानुसार जीतसिंह मुलाकात करने के बाद इस बात का फैसला भी कर आये कि किशोरी के साथ-ही-साथ कामिनी का भी कन्यादान रणधीरसिंह ही करेंगे। साथ ही इसके रणधीरसिंह की यह बात भी जीतसिंह ने मंजूर कर ली कि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आने के पहले किशोरी और कामिनी उनके (रणधीरसिंह के) खेमे में पहुंचा दी जायेंगी। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् किशोरी और कामिनी बड़ी हिफाजत के साथ रणधीरसिंह के खेमे में पहुँचा दी गई और बहुत से फौजी सिपाहियों के साथ पन्नालाल, रामनारायण, चुन्नीलाल और पण्डित बद्रीनाथ ऐयार खास उनकी हिफाजत के लिए छोड़ दिए गए। आज कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आने की उम्मीद में लोग खुशी-खुशी तरह-तरह के चर्चे कर रहे हैं । आज ही के दिन आने के लिए दोनों कुमारों ने चिट्ठी लिखी थी, इसलिए आज उनके दादा-दादी, मां-बाप, दोस्तों और प्रेमियों को भी उम्मीद हो रही है कि उनकी तरसती हुई आँखें ठण्डी होंगी, और जुदाई के सदमों से मुरझाया हुआ दिल हरा होगा। अलहकार और खैरख्वाह लोग जरूरी कामों को भी छोड़कर तिलिस्मी इमारत में इकट्ठे हो रहे हैं। इसी तरह हर एक अदना और आला दोनों कुमारों के आने की उम्मीद में खुश हो रहा है । गरीबों और मोहताजों की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं, उन्हें इस बात का पूरा विश्वास हो रहा है कि अब उनका दारिद्र्य दूर हो जायगा !

    दो पहर दिन ढलने के बाद दोनों नकाबपोश भी आकर हाजिर हो गए हैं, केवल वे ही नहीं, बल्कि उनके साथ और भी कई नकाबपोश हैं, जिनके बारे में लोग तरह-तरह के चर्चे कर रहे हैं और साथ ही यह भी कह रहे हैं कि "जिस समय ये नकाबपोश लोग अपने चेहरों से नकाबें हटायेंगे, उस समय जरूर कोई-न-कोई अनूठी घटना देखने-सुनने में आयेगी।"

    नकाबपोशों की जुबानी यह तो मालूम हो ही चुका था कि दोनों कुमार उसी पत्थर वाले तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से प्रकट होंगे जिस पर पत्थर का आदमी सोया हुआ है, इसलिए इस समय महाराज, राजासाहब और सलाहकार लोग उसी दालान में इकट्ठे हो रहे हैं, और वह दालान भी सज-सजाकर लोगों के बैठने के लायक बना दिया गया है।

    तीन पहर दिन बीत जाने पर तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से कुछ विचित्र ही ढंग के बाजे की आवाज आने लगी जोकि भारी मगर सुरीली थी और जिसके सबब से लोगों का ध्यान उसकी तरफ खिंचा। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और गोपालसिंह तथा दोनों नकाबपोश उठकर उस चबूतरे के पास गये। ये लोग बड़े गौर से उस चबूतरे की अवस्था पर ध्यान देते रहे, क्योंकि इस बात का पूरा गुमान था कि पहले की तरह आज भी उस चबूतरे का अगला हिस्सा किवाड़ के पल्ले की तरह खुलकर जमीन के साथ लग जायेगा। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् जिस तरह बलभद्रसिंह के आने और जाने के वक्त उस चबूतरे का अगला हिस्सा खुल गया था, उसी तरह इस समय भी वह किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलकर जमीन के साथ लग गया और उसके अन्दर से कुंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह बाहर निकलकर महाराज सुरेन्द्रसिंह के पैरों पर गिर पड़े। उन्होंने बड़े प्रेम से उठाकर छाती से लगा लिया। इसके बाद दोनों कुमारों ने अपने पिता के चरण छूए, फिर जीतसिंहजी और तेजसिंह को प्रणाम करने के बाद राजा लसिंह से मिले । इसके बाद नकाबपोशों, ऐयारों व दोस्तों से भी मुलाकात की।

    बन्दोबस्त पहले से हो चुका था और इशारा भी बंधा हुआ था, अतएव जिस समय दोनों कुमार महाराज के चरणों पर गिरे उसी समय फाटक पर से बाजों की आवाज आने लगी जिससे बाहर वालों को भी मालूम हो गया कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह आ गये।

    इस समय की खुशी का हाल लिखना हमारी ताकतसे बाहर है। हाँ, इसका अन्दाज पाठक स्वयं कर सकते हैं कि जब दोनों कुमार मिलने के लिए महल के अन्दर गए तो औरतों में खुशी का दरिया कितने जोश के साथ उमड़ा होगा। महल के अन्दर दोनों कुमारों का इन्तजार बनिस्बत बाहर से ज्यादा होगा, यह सोचकर ही महाराज ने दोनों कुमारों को ज्यादा देर तक बाहर रोकना मुनासिब न समझकर शीघ्र ही महल में जाने की आज्ञा दी, और दोनों कुमार भी खुशी-खुशी महल के अन्दर जाकर सबसे मिले । उनकी माँ और दादी की बढ़ती हुई खुशी का तो आज अन्दाज करना ही कठिन है, जिन्होंने लड़कों की जुदाई तथा रंज और नाउम्मीदी के साथ-ही-साथ तरह-तरह की खबरों से पहुंची हुई चोटों को अपने नाजुक कलेजों पर झेलकर और देवताओं की मिन्नतें मान-मानकर आज का दिन देखने के लिए अपनी नन्ही-सी जान को बचाकर रखा था। अगर उन्हें समय और नीति पर विशेष ध्वान न रहता तो आज घण्टों तक अपने बच्चों को कलेजे से अलग करके बातचीत करने और महल के बाहर जाने का मौका न देतीं।

  • चन्द्रकान्ता सन्तति 5

    चन्द्रकान्ता सन्तति 5

    Aproximadamente 178.942 palavras.

    इतना कहकर राजा गोपालसिंह ने घोड़े की बाग मोड़ी और जिधर से आये थे उसी तरफ तेजी के साथ रवाना हो गये। रामदीन चुपचाप ज्यों-का-त्यों खड़ा उनकी तरफ देखता ही रह गया और जब वे नजरों की ओट हो गये तब उसने सभी को राजा साहब का हुक्म सुनाया और इसके बाद अपने बिछावन पर जाकर सोचने लगा––

    गोपालसिंह की बातें कुछ समझ में नहीं आतीं और न उनके इरादे का ही पता लगता है! लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को न मालूम क्यों छोड़ आये और जब उन्होंने इनके साथ आने से इनकार किया तो इन्होंने मान क्यों लिया? क्या अब लक्ष्मीदेवी का और इनका साथ न होगा? अगर ये अकेले जमानिया गए तो क्या केवल इन्हीं के साथ वह सलूक किया जायेगा जो हम सोच चुके हैं? मगर कमलिनी वगैरह का बचे रह जाना तो अच्छा नहीं होगा। लेकिन फिर क्या किया जाये लाचारी है, हाँ, एक बात का इन्तजाम तो कुछ किया ही नहीं गया और न पहले इस बात का विचार ही हुआ। जमानिया पहुँचने पर जब दीवान साहब की जुबानी गोपालसिंह को यह मालूम होगा कि रामदीन ने चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुँचाया है तब वह क्या सोचेंगे और पूछने पर मुझसे क्या जवाब पावेंगे? कुछ भी नहीं। इस बात का जवाब देना मेरे लिए कठिन हो जायेगा। तब फिर खास बाग पहुँचने के पहले ही मेरा भाग जाना उचित होगा? ओफ, बड़ी भूल हो गई, यह बात पहले न सोच ली! दीवान साहब को बिना कुछ कहे ही उन सभी को खास बाग में पहुँचा देना मुनासिब होता। मगर ऐसा करने पर भी तो काम नहीं चलता। अगर दीवान साहब को नहीं तो खास बाग के पहरेदारों को तो मालूम ही हो जाता कि रामदीन चार आदमियों को बाग के अन्दर छोड़ गया है और उन्हीं की जुबानी यह बात राजा साहब को भी मालूम हो जाती। बात एक ही थी, सबसे अच्छा तो तब होता जब वे लोग किसी गुप्त राह से बाग के अन्दर जाते, मगर यह सम्भव न था क्योंकि जरूर भीतर से सभी रास्ते गोपालसिंह ने बन्द कर रखे होंगे। तब क्या करना चाहिये? हाँ, भाग ही जाना सबसे अच्छा होगा। मगर मायारानी को भी तो इस बात की खबर कर देनी चाहिए। अच्छा तब जमानिया होकर और मायारानी को कह-सुनकर भागना चाहिए। नहीं अब तो यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि मायारानी फौजी सिपाहियों को बाग के अन्दर करके साथियों समेत कहीं छिप गई होगी और मैं उस भाग के गुप्त भेदों को न जानने के कारण इस लायक नहीं हूँ कि मायारानी को खोज निकालूँ और अपने दिल का हाल उनसे कहूँ या उन्हीं के साथ आने भी छिप रहूँ। ओफ! वह तो मजे में अपने ठिकाने पहुँच गई मगर मुझे आफत में डाल गईं। खैर, अभी तो नहीं मगर गोपालसिंह को जमानिया की हद में पहुँचाकर जरूर भाग जाना पड़ेगा। फिर जब मायारानी उन्हें मारकर अपना दखल जमा लेंगी तब फिर उनसे मुलाकात होती रहेगी। इन्हीं विचारों में लीला (नकली रामदीन) ने तमाम रात आँखों में बिता दी। सवेरा होने के पहले ही वह जरूरी कामों से छुट्टी पाने के लिए घोड़े पर सवार होकर दूर चली गई और घण्टे भर बाद लौट आई।

    7

    दिन अनुमान दो घड़ी के चढ़ चुका होगा जब राजा गोपालसिंह दो आदमियों को साथ लिए हुए धीरे-धीरे आते दिखाई पड़े। वे दोनों भैरोंसिंह और इन्द्रदेव थे और पैदल थे। जब तीनों उस ठिकाने पर पहुँच गये जहाँ राजा साहब के रथ और सवार लोग थे तब राजा साहब ने अपना घोड़ा छोड़ दिया और उस पर भैरोंसिंह को सवार होने के लिए कहा तथा और सवारों को भी घोड़ों पर सवार हो जाने के लिए इशारा किया, इसके बाद स्वयं एक रथ पर सवार हो और इन्द्रदेव को भी उसी पर अपने साथ बैठा लिया, बाकी तीन रथ खाली ही रह गये। सवारी धीरे-धीरे जमानिया की तरफ रवाना हुई और फौजी सवार खूबसूरती के साथ राजा साहब को घेरे हुए धीरे-धीरे जैसा कि रथ जा रहा था जाने लगे। भैरोंसिंह अपना घोड़ा बढ़ाकर नकली रामदीन के पास चला गया जो उसी पंचकल्यान घोड़ी पर सवार था और उसके साथ-साथ जाने लगा। यह बात लीला को बहुत बुरी मालूम हुई क्योंकि वह राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों से बहुत डरती थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद वह बोली––

    लीला––(भैरों से)आपने राजा साहब का साथ क्यों छोड़ दिया?

    भैरोंसिंह––(हँसकर)तुम्हारा साथ करने के लिये, क्योंकि मैं अपने दोस्त रामदीन को अकेला नहीं छोड़ सकता।

    लीला––और जब मुझे राजा साहब ने अकेले जमानिया भेजा था तब आप कहाँ डूब गये थे?

    भैरोंसिंह––तब भी तुम्हारे साथ था मगर तुम्हारी नजरों में छिपा हुआ था।

    लीला––(डरकर, मगर अपने को सम्हालकर) परसों तुम कहाँ थे? कल कहाँ थे और आज सवेरा होने के पहले तक कहाँ गायब थे? क्यों झूठी बातें बना रहे हो?

    भैरोंसिंह––परसों भी कल भी और आज तक भी मैं तुम्हारे साथ ही था मगर तुम्हारी नजरों से छिपा हुआ था, हाँ, जब दो घण्टे रात बाकी थीं तब मैंने तुम्हारा साथ छोड़ दिया और राजा साहब से जा मिला। अब मैं फिर तुम्हारे साथ जा रहा हूँ क्योंकि राजा साहब का ऐसा ही हुक्म है। (हँसकर) क्योंकि राजा साहब ने सुना है कि तुम्हारा इरादा जमानिया पहुँचने के पहले ही भाग जाने का है।

    लीला––(अपने उछलते कलेजे को रोककर) यह उनसे किसने कहा?

    भैरोंसिंह––मैंने?

    लीला––और तुम्हें किसने खबर दी?

    भैरोंसिंह––तुम्हारे दिल ने।

    लीला––मानो मेरे दिल के आप भेदिया ठहरे!

    भैरोंसिंह––बेशक ऐसा ही है। अगर तुम्हें ऐयारी का ढंग पूरा-पूरा मालूम होता तब तुम्हारा दिल मजबूत होता मगर तुम्हारी ऐयारी अभी बिल्कुल कच्ची है। आह, एक बात तुमसे कहना तो मैं भूल ही गया, जिस रात मायारानी राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर से भाग गई थी उसी रोज सवेरा होने के पहले ही खबर राजा गोपालसिंह को मालूम हो गई थी।

    लीला––(काँपती हुई और लड़खड़ाती आवाज में) यह तो मुझे मालूम है, मगर तुम्हारे इस कहने का मतलब क्या है सो समझ में नहीं आता।

    भैरोंसिंह––मतलब यही है कि तुम अपनी सूरत साफ करो और मेरे साथ राजा साहब के पास चलो क्योंकि अब असली रामदीन के सामने तुम्हारा रामदीन बने रहना मुनासिब नहीं है

    लीला––असली रामदीन अब कहाँ …

    जल्दी में लीला इतना कह तो गई मगर फिर उसने जुबान बन्द कर ली। भैरोंसिंह की चलती-फिरती बातों ने उसका कलेजा हिला दिया और वह समझ गई कि अब मेरा नसीब मुझे धोखा दिया चाहता है, मेरा भेद खुल गया, और अब मेरे कैद होने में ज्यादा देर नहीं है। अब उसके दिल ने भी कहा कि वास्तव में कल ही राजा साहब को तुझ पर शक हो गया था, अगर तू कल ही भाग जाती तो अच्छा था, मगर अब तेरा भागना भी कठिन है। लीला ने कुछ और सोच-विचार के भैरोंसिंह से कहा, "तुम जरा निराले में चलकर मेरी एक बात सुन लो, बेहतर होगा कि हम दोनों आदमी घोड़ा बढ़ाकर जरा आगे निकल चलें, मैं जो बात कहना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम बहुत खुश होओगे।"

    भैरोंसिंह––न तो मैं तुम्हारी कुछ सुन सकता हूँ और न तुम्हें छोड़ सकता हूँ, हाँ, एक बात तुम्हें और भी कहे देता हूँ, जिसे सुनकर तुम्हारे दिल का खुटका निकल जायेगा, वह यह है कि जब राजा साहब ने दीवान साहब के नाम की चिट्ठी देकर असली रामदीन को जमानिया भेजा था तो जुबानी कह दिया था कि "इस चिट्ठी में हमने दो सौ सवार भेजने के लिए लिखा है, मगर तुम केवल बीस सवार अपने साथ लाना और जिस दिन हमने माँगा है उसके एक दिन बाद आना।" कहो अब तो बहुत-सी बातें तुम्हारी समझ में आ गई होंगी?

    इतना कहकर भैरोंसिंह ने लीला का हाथ पकड़ लिया और राजा साहब की तरफ चलने के लिए कहा मगर लीला को उधर जाना मंजूर न था इसलिए उसने अपनी घोड़ी को न रोका और झटका देकर हाथ छुड़ाना चाहा मगर ऐसा न कर सकी, भैरोंसिंह ने उसे खींचकर जमीन पर गिरा दिया। उसी समय भैरोंसिंह को मालूम हुआ कि यह मर्द नहीं, औरत है।

    भैरोंसिंह की यह कार्रवाई देखकर सभी के कान खड़े हो गये। सवारों ने घोड़ा रोक दिया, राजा साहब की सवारी (रथ) खड़ी हो गई, कई सवार अपने घोड़े पर से कूद कर भैरोंसिंह के पास चले आये और इन्द्रदेव भी रथ पर से उतरकर उसके पास जा पहुँचे। आज्ञानुसार लीला की मुश्कें बाँध ली गयीं और पानी मँगा कर उसका चेहरा साफ किया गया और तब लीला को सभी ने पहचान लिया। लीला राजा गोपालसिंह के पास लाई गई और भैरोंसिंह ने सब हाल कहा, जिसे सुन राजा साहब हँस पड़े और बोले, "अब इन्द्रदेव जैसा कहें वैसा करो।"

    इन्द्रदेव की आज्ञानुसार लीला रस्सियों से जकड़कर एक खाली रथ पर बैठा दी गई और कई सवार उसकी निगरानी पर मुस्तैद किये गये।

    अब सवारी तेजी के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुई। दोपहर के बाद जब सवारी जमानिया के पास पहुँची तब इन्द्रदेव ने राजा साहब से धीरे-धीरे कुछ कहा और रथ से उतरकर पैदल ही मैदान का रास्ता लिया और देखते-देखते न मालूम कहाँ चले गये। सवारी खास बाग के दरवाजे पर पहुंची और राजा साहब रथ से उतर कर भैरोंसिंह को साथ लिए हुए बाग के अन्दर चले गये।

    8

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तिलिस्म तोड़ने की धुन में लगे थे। मगर उनके दिल से किशोरी और कमलिनी तथा कामिनी और लाड़िली की मुहब्बत एक सायत के लिए भी बाहर नहीं होती थी। जब दोनों कुमारों ने बाग के उत्तर की तरफ वाले मकान की खिड़की (छोटे दरवाजे) में से झाँकते हुए राजा गोपालसिंह की जुबानी किशोरी, कमलिनी, कामिनी और लाड़िली का सब हाल सुना और यह भी सुना कि अब वे सब बहुत जल्द जमानिया में लाई जायेंगी, तब बहुत खुश हुए और उन लोगों से जल्द मिलने के लिए तिलिस्म तोड़ने की फिक्र उन्हें बहुत ज्यादा हो गई। जब गोपालसिंह, इन्दिरा और इन्द्रदेव बातचीत करके चले गये, तब बड़े कुमार ने सरयू से कहा, "सरयू, हम लोग अब बहुत जल्द तुम्हें अपने साथ लिए हुए इस तिलिस्म के बाहर होंगे। हम लोगों को तिलिस्म तोड़ने और दौलत पाने का उतना खयाल नहीं है जितना तिलिस्म से बाहर निकलने का ध्यान है। इस तिलिस्म से हम लोगों को एक किताब मिलने वाली है जिसके लिए हम लोग जरूर उद्योग करेंगे, क्योंकि उसी किताब की बदौलत हम लोग चुनारगढ़ का वह भारी तिलिस्म तोड़ सकेंगे जिसे हमारे पिता ने हमारे लिए छोड़ रखा है और जिसका तोड़ना हम दोनों भाइयों को आवश्यक कहा जाता है।"

    सरयू––मेरे दिल ने उम्मीदों से भरकर उसी समय विश्वास करा दिया कि अब तेरा दुर्दैव सदैव के लिए तेरा पीछा छोड़ देगा जब आप दोनों भाइयों के दर्शन हुए तथा आप लोगों का परिचय मिला। अब मैं अपना दुःख भूलकर बिल्कुल बेफिक्र हो रही हूँ और सिवाय आपकी आज्ञा मानने के कोई दूसरा खयाल मेरे दिल में नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह––अच्छा, तो अब तुम हम लोगों के लिए फल तोड़ो और तब तक हम लोग इस बाग में घूम कर कोई दरवाजा ढूँढ़ते हैं। ताज्जुब नहीं कि हम दोनों को इस बाग में कई दिन रहना पड़े।

    सरयू––जो आज्ञा।

    इतना कहकर सरयू फल तोड़ने और नहर के किनारे छाया देखकर कुछ जमीन साफ करने के खयाल में पड़ी और दोनों कुमार बाग में इधर-उधर घूमकर दरवाजा खोजने का उद्योग करने लगे।

    पहरभर से ज्यादा देर तक घूमने और पता लगाने के बाद जब कुमार उत्तर की तरफ वाली दीवार के नीचे पहुँचे, जिधर मकान था, तब उन्हें पूरब की तरफ के कोने की तरफ हटकर जमीन में एक हौज का निशान मालूम हुआ। उसी के पास दीवार में एक छोटे-से दरवाजे का भी चिन्ह भी दिखा जिससे निश्चय हो गया कि उन लोगों का काम इन्हीं दोनों निशानों से चलेगा। इतना सोचकर वे दोनों भाई वहाँ चले आये जहाँ सरयू फल तोड़ और जमीन साफ करके बैठी हुई दोनों भाइयों के आने का इन्तजार कर रही थी। सरयू ने अच्छे-अच्छे और पके फल दोनों भाइयों के लिए तोड़े और जल से धोकर साफ पत्थर की चट्टान पर रखे थे। दोनों भाइयों ने उन्हें खाकर नहर का जल पिया और इसके बाद सरयू को भी खाने के लिए कह के उसी ठिकाने चले गये जहाँ हौज और दरवाजे का निशान पाया था। हौज में मिट्टी भरी हुई थी जिसे दोनों भाइयों ने खंजर से खोद-खोद के निकालना शुरू किया और थोड़ी देर में सरयू भी उनके पास पहुँच कर मिट्टी फेंकने में मदद करने लगी। संध्या हो जाने पर इन सभी ने उस काम से हाथ खींचा और नहर के किनारे जाकर आराम किया। उस हौज की सफाई में इन लोगों को चार दिन लग गये, पाँचवें दिन दोपहर होते-होते वह हौज साफ हुआ और मालूम होने लगा कि यह वास्तव में एक फव्वारा। वह हौज बढ़िया संगमरमर का बन हुआ था और फव्वारा सोने का। अब दोनों कुमारों ने खंजर के सहारे उस हौज की जमीन का पत्थर उखाड़ना शुरू किया और जब दो-तीन दिन की मेहनत में सब पत्थर उखड़ गये तब वह फव्वारा भी सहज ही में निकल गया और उसके नीचे एक दरवाजे का निशान दिखाई दिया। दरवाजे में पल्ला हटाने के लिए कड़ी एक लगी हुई थी और जिस जगह ताला लगा हुआ था। उसके मुँह पर लोहे की एक पतली चादर रखी हुई थी जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने हटा दिया और उसी तिलिस्मी ताली से ताला खोला जो पुतली के हाथ से उन्हें मिली थी।

    दरवाजा हटाने पर नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ दिखाई पड़ी। आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर रोशनी करते हुए नीचे उतरे और उनके पीछे-पीछे इन्द्रजीतसिंह और सरयू भी गये। नीचे पहुँचकर उन्होंने अपने को एक छोटी-सी कोठरी में पाया जिसके बीचोंबीच में एक हौज बना हुआ था। उस हौज के चारों तरफ वाली दीवार कई तरह की धातुओं से बनी हुई थी और हौज के बीच में किसी तरह की राख भरी हुई थी। कोठरी के चारों तरफ की दीवारों में से ताँबे की बहुत-सी तारें आई थीं और वे सब एक साथ होकर उसी हौज के बीच में चली गई थीं। इन्द्रजीतसिंह ने सरयू से कहा, "जब ये सब तारें काट दी जायेंगी, तब बाग के चारों तरफ की दीवार करामात से खाली हो जायगी अर्थात् उसमें यह गुण न रहेगा कि उसके छूने से किसी को किसी तरह की तकलीफ हो, इसके बाद हम लोग उस दीवार वाले दरवाजे को साफ करके रास्ता निकालेंगे और इस बाग से निकलकर किसी दूसरी ही जगह जायेंगे। अस्तु तुम यहाँ से निकलकर ऊपर चली जाओ तब हम लोग तार काटने में हाथ लगावें।"

    इन्द्रजीतसिंह की आज्ञानुसार सरयू उस कोठरी से बाहर निकल गई और तीनों कुमारों ने तिलिस्मी खंजर से शीघ्र ही उन तारों को काट डाला और बाहर निकल आये, दरवाजा पहले की तरह बन्द कर दिया और ऊपर से मिट्टी डाल दी। फिर नहर के किनारे आकर तीनों आदमी बैठ गये और बातचीत करने लगे।

    सरयू––अब दीवार छूने से किसी तरह की तकलीफ नहीं नहीं सकती?

    इन्द्रजीतसिंह––अभी नहीं। धीरे-धीरे दो पहर में उसका गुण जायगा और तब तक हम लोगों को व्यर्थ बैठे रहना पड़ेगा।

    आनन्दसिंह––तब तक (सरयू की तरफ बताकर) इनका बचा हुआ किस्सा सुन लिया जाता तो अच्छा होता।

    इन्द्रजीतसिंह––नहीं, अब इनका किस्सा पिताजी के सामने सुनेंगे। सरयू––अब तो मैं आपके साथ ही रहूँगी, इसलिए तिलिस्म तोड़ते समय जो कुछ कार्रवाई आप करेंगे या जो तमाशा दिखाई देगा देखूँगी, मगर यदि आज के पहले का हाल भी जब से आप इस तिलिस्म में आये हैं, सुना देते तो बड़ी कृपा होती। मैं भी समझती कि आपकी बदौलत इस तिलिस्म का पूरा-पूरा तमाशा देख लिया।

    इन्द्रजीतसिह––अच्छी बात है, (आनन्दसिंह से) तुम इस तिलिस्म का हाल इन्हें सुना दो।

    थोड़ी देर आराम करने तथा जरूरी कामों से छुट्टी पाने के बाद भाई की आज्ञानुसार आनन्दसिंह ने अपना तिलिस्म का हाल तथा जिस ढंग से इन्दिरा से मुलाकात हुई थी, वह सब सरयू को कह सुनाया, इसके साथ ही साथ तिलिस्म के बाहर आजकल का जैसा जमाना हो रहा था, वह सब भी बयान किया। वह सब हाल कहते-सुनते रात आधी से कुछ ज्यादा चली गई और उस समय इन लोगों ने एक विचित्र तमाशा देखा।

    इस बाग के उत्तर की तरफ जो सटा हुआ मकान बना था और जिसमें राजा गोपालसिंह और कुमार में बातचीत हुई थी, हम पहले लिख आये हैं कि उसमें आगे की तरफ सात खिड़कियाँ थीं। इस समय यकायक एक आवाज आने से दोनों कुमारों और सरयू की निगाह उस तरफ गई। देखा कि बीच वाली बड़ी खिड़की (दरवाजा) खुली है और अन्दर रोशनी मालूम होती है। इन लोगों को ताज्जुब हुआ और इन्होंने सोचा कि शायद राजा गोपालसिंह आये हैं और हम लोगों से बातचीत करने का इरादा है मगर ऐसा न था, थोड़ी ही देर बाद उसके अन्दर दो-तीन नकाबपोश चलते-फिरते दिखाई दिये और इसके बाद एक नकाबपोश खिड़की में कमन्द अड़ाकर नीचे उतरने लगा, पहले तो दोनों कुमारों ओर सरयू को गुमान हुआ कि खिड़ की में राजा गोपालसिंह या इन्द्रदेव दिखाई देंगे या होंगे, मगर जब एक नकाबपोश कमन्द के सहारे नीचे उतरने लगा, तब उनका खयाल बदल गया और और वे सोचने लगे कि यह काम इन्द्रदेव या गोपालसिंह का नहीं है बल्कि किसी ऐसे आदमी का है जो इस तिलिस्म का हाल नहीं जानता, क्योंकि गोपालसिंह और इन्द्रदेव तथा इन्दिरा को यह भी मालूम है कि इस बाग की दीवार छूने या बदन के साथ लगाने लायक नहीं है, तभी तो इन्दिरा अपनी माँ के पास नहीं पहुंच सकी थी और सरयू ने यह बात इन्दिरा से कही होगी।

    इन्द्रजीतसिंह ने इसी समय सरयू से पूछा कि "इस बाग की दीवार का हाल इन्दिरा को मालूम है?" इसके जवाब सरयू ने कहा, "जरूर मालूम है। मैंने खुद इन्दिरा से कहा था और इसी सबब से तो वह मेरे पास आज तक न आ सकी। निःसन्देह इन्दिरा ने यह बात राजा गोपालसिंह से कही होगी, बल्कि वह खुद जानते होंगे। इसी से मैं सोचती हूँ कि ये लोग कोई दूसरे ही हैं जो इस भेद को नहीं जानते, मगर अब तो इस दीवार का गुण जाता ही रहा।"

    तीनों को ताज्जुब हुआ और तीनों आदमी टकटकी लगाकर उस तरफ देखने लगे। जब वह नकाबपोश कमन्द के सहारे नीचे उतर आया, तब दूसरे नकाबपोश ने वह कमन्द ऊपर खींच ली और उसी कमन्द में एक गठरी और बाँधकर नीचे लटकाई। दोनों कुमारों और सरयू की विश्वास हो गया कि इस गठरी में जरूर कोई आदमी है। जो नकाबपोश नीचे आ चुका था, उसने गठरी थाम ली और खोलकर कमन्द खाली कर दी, मगर जिस कम्बल में वह गठरी बँधी थी, उसे इसी के साथ बाँध दिया और ऊपर वाले नकाबपोश ने खींच लिया। थोड़ी देर बाद ही दूसरी गठरी लटकाई गई और नीचे वाले नकाबपोश ने पहले की तरह उसे भी थाम लिया और खोलकर फिर कमन्द के साथ बाँध दिया।

    इसी तरह बारी-बारी से सात गठरियाँ नीचे उतारी गयीं, इसके बाद वह नकाबपोश, जो सबसे पहले नीचे उतरा था, उसी कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गया और खिड़की बन्द हो गई।

    9

    जिस समय राजा गोपालसिंह खास बाग के दरवाजे पर पहुँचे, उस समय उनके दीवान साहब भी वहाँ हाजिर थे। नकली रामदीन अर्थात् लीला उनके हवाले कर दी गई। भैरोंसिंह के सवाल करने पर उन्होंने कहा कि "इस लीला ने चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुँचाया है, मगर हम नहीं कह सकते कि वास्तव में वे कौन थे।" अब राजा साहब और भैरोंसिंह को यह तो मालूम हो गया कि चार आदमी भी इस बाग के अन्दर घुसे हैं जो हमारे दुश्मन ही होंगे, मगर उन्हें उन पाँच सौ फौजी सिपाहियों की शायद ही खबर हो जिन्हें मायारानी ने गुप्त रीति से बाग के अन्दर कर लिया था। पहली दफे जब मायारानी को गोपालसिंह ने छकाया था, तब वह खुले तौर पर बाग में रहती थी, मगर अबकी दफे तो वह उस भूलभूलैया बाग में जाकर ऐसा गायब हुई है कि उसका पता लगाना भी कठिन होगा। दीवान साहब ने पूछा भी कि "अगर हुक्म हो तो बाग में तलाशी ली जाय और उन आदमियों का पता लगाया जाय जिन्हें लीला ने इस बाग में पहुँचाया है।" मगर राजा साहब ने इसके जवाब में सिर हिलाकर जाहिर कर दिया कि यह बात उन्हें स्वीकार नहीं है।

    कुछ दिन रहते ही राजा गोपालसिंह बाग के दूसरे दर्जे में केवल भैरोंसिंह को साथ लेकर गये और बाग के अन्दर चारों तरफ सन्नाटा पाया। इस समय भैरोंसिंह और राजा गोपालसिंह दोनों के ही हाथ में तिलिस्मी खंजर मौजूद थे।

    खास बाग के दूसरे दर्जे में दो कुएँ थे जिनमें पानी बहुत ज्यादा रहता था, यहाँ तक कि इस बाग के पेड़-पत्तों को सींचने और छिड़काव का काम इन दोनों में से किसी एक कुएँ ही से चल सकता था, मगर सींचने के समय दूर और नजदीक का खयाल करके या शायद और किसी सबब से बनवाने वाले ने दो बड़े-बड़े जंगी कुएँ बनवाये थे, परन्तु ये दोनों कुएँ भी कारीगरी और ऐयारी से खाली न थे।

    भैरोंसिंह और गोपालसिंह छिपते और घूमते हुए पूरब की तरफ वाले कुएँ पर पहुँचे जिसका घेरा बहुत बड़ा था और नीचे उतरने तथा चढ़ने के लिए कुएँ की दीवार

    9

    जिस समय राजा गोपालसिंह खास बाग के दरवाजे पर पहुँचे, उस समय उनके दीवान साहब भी वहाँ हाजिर थे। नकली रामदीन अर्थात् लीला उनके हवाले कर दी गई। भैरोंसिंह के सवाल करने पर उन्होंने कहा कि "इस लीला ने चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुँचाया है, मगर हम नहीं कह सकते कि वास्तव में वे कौन थे।" अब राजा साहब और भैरोंसिंह को यह तो मालूम हो गया कि चार आदमी भी इस बाग के अन्दर घुसे हैं जो हमारे दुश्मन ही होंगे, मगर उन्हें उन पाँच सौ फौजी सिपाहियों की शायद ही खबर हो जिन्हें मायारानी ने गुप्त रीति से बाग के अन्दर कर लिया था। पहली दफे जब मायारानी को गोपालसिंह ने छकाया था, तब वह खुले तौर पर बाग में रहती थी, मगर अबकी दफे तो वह उस भूलभूलैया बाग में जाकर ऐसा गायब हुई है कि उसका पता लगाना भी कठिन होगा। दीवान साहब ने पूछा भी कि "अगर हुक्म हो तो बाग में तलाशी ली जाय और उन आदमियों का पता लगाया जाय जिन्हें लीला ने इस बाग में पहुँचाया है।" मगर राजा साहब ने इसके जवाब में सिर हिलाकर जाहिर कर दिया कि यह बात उन्हें स्वीकार नहीं है।

    कुछ दिन रहते ही राजा गोपालसिंह बाग के दूसरे दर्जे में केवल भैरोंसिंह को साथ लेकर गये और बाग के अन्दर चारों तरफ सन्नाटा पाया। इस समय भैरोंसिंह और राजा गोपालसिंह दोनों के ही हाथ में तिलिस्मी खंजर मौजूद थे।

    खास बाग के दूसरे दर्जे में दो कुएँ थे जिनमें पानी बहुत ज्यादा रहता था, यहाँ तक कि इस बाग के पेड़-पत्तों को सींचने और छिड़काव का काम इन दोनों में से किसी एक कुएँ ही से चल सकता था, मगर सींचने के समय दूर और नजदीक का खयाल करके या शायद और किसी सबब से बनवाने वाले ने दो बड़े-बड़े जंगी कुएँ बनवाये थे, परन्तु ये दोनों कुएँ भी कारीगरी और ऐयारी से खाली न थे।

    भैरोंसिंह और गोपालसिंह छिपते और घूमते हुए पूरब की तरफ वाले कुएँ पर पहुँचे जिसका घेरा बहुत बड़ा था और नीचे उतरने तथा चढ़ने के लिए कुएँ की दीवार में लोहे की कड़ियाँ लगी हुई थीं। भैरोंसिंह और गोपालसिंह दोनों आदमी कड़ियों के सहारे इस कुएँ में उतर गये।

    किसी ठिकाने पर छिपी हुई मायारानी इस तमाशे को देख रही थी। गोपालसिंह और भैरोंसिंह को आते देख वह बहुत खुश हुई और उसे निश्चय हो गया कि अब हम लोग गोपालसिंह को मार लेंगे। जिस जगह वह बैठी हुई थी। वहाँ पर माधवी कुबेरसिंह, भीमसेन और ऐयारों के अतिरिक्त बीस आदमी फौजी सिपाहियों में से भी मौजूद थे और बाकी फौजी सिपाही तहखानों में छिपाये हुए थे। पहले तो मायारानी ने चाहा कि केवल हम ही लोग बीस सिपाहियों के साथ जाकर गोपालसिंह को गिरफ्तार कर लें, मगर जब उसे कृष्ण जिन्न वाली बात याद आई और यह खयाल हुआ कि गोपालसिंह के पास वह तिलिस्मी खंजर और कवच जरूर होगा जो रोहतासगढ़ में उनके पास उस समय मौजूद था जब शेरअली और दारोगा के साथ हम लोग वहाँ गये थे, तब उसकी हिम्मत टूट गई और बिना कुछ फौजी सिपाहियों को साथ लिए गोपालसिंह के पास जाना उचित न जाना। इसी बीच में उसके देखते-देखते गोपालसिंह कुएँ के भीतर चले गये।

    इस तिलिस्मी बाग के अन्दर आने तथा यहाँ से बाहर जाने वाला दरवाजा जिस तरह बन्द होता है, इसका हाल उस समय लिखा जा चुका है जब पहली दफा इस बाग में मायारानी के ऊपर आफत आई थी और मायारानी ने सिपाहियों के बागी हो जाने पर बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया था, अब इस समय भी उसी ढंग से मायायानी ने बाग का दरवाजा बन्द कर दिया और इसके बाद कुल सिपाहियों को तहखाने में से निकालकर माधवी, भीमसेन और कुबेरसिंह तथा ऐयारों को साथ लिए उस कुएँ पर पहुँची जिसके अन्दर भैरोंसिंह को साथ लिए हुए राजा गोपालसिंह उतर गये थे।

    मायारानी ने सोचा था कि आखिर गोपालसिंह उस कुएँ के बाहर निकलेंगे ही, उस समय हम लोग उन्हें सहज ही में मार लेंगे, बल्कि कुएँ से बाहर निकलने की मोहलत ही न देंगे––इत्यादि, मगर जब बहुत देर हो गई और रात हो जाने पर भी गोपालसिंह कुएँ के बाहर न निकले, तो उसे बड़ा ही ताज्जुब हुआ। वह खुद कुएँ के अन्दर झाँककर देखने लगी और उसी समय चौंक कर माधवी से बोली––

    मायारानी––क्यों बहिन, आज ही तुमने भी देखा था कि इस कुएँ में पानी कितना ज्यादा था!

    माधवी––बेशक मैंने देखा था कि बीस हाथ से ज्यादा दूरी पर पानी नहीं है, तो क्या इस समय पानी कम जान पड़ता है?

    मायारानी––कम क्या मैं तो समझती हूँ कि इस समय इसमें कुछ भी पानी नहीं है और कुआँ सूखा पड़ा है।

    माधवी––(ताज्जुब से) ऐसा नहीं हो सकता। एक पत्थर इसमें फेंक कर देखो।

    मायारानी––आओ, तुम ही देखो।

    माधवी ने अपने हाथ से ईंट का टुकड़ा कुएँ के अन्दर फेंका और उसकी आवाज पर गौर करके बोली–– माधवी––बेशक इसमें पानी कुछ भी नहीं है, केवल कीचड़ मात्र है। तो क्या तुम नहीं जानतीं कि इसके अन्दर पानी के निकास का कोई रास्ता तथा आदमियों के आने जाने के लिए कोई सुरंग या दरवाजा है या नहीं?

    मायारानी––मुझे एक दफे गोपालसिंह ने कहा था कि इस कुएँ के नीचे एक तहखाना है, जिसमें तरह-तरह के तिलिस्मी हर्वे और ऐयारों के काम की अपूर्व चीजें हैं।

    माधवी––बेशक, यही बात ठीक होगी और उन्हीं चीजों में से कुछ लाने के लिए गोपालसिंह गये होंगे।

    मायारानी––शायद ऐसा ही हो!

    माधवी––तो बस इससे बढ़कर और कोई तरकीब नहीं हो सकती कि यह कुआँ पाट दिया जाये, जिसमें गोपालसिंह को फिर दुनिया का मुँह देखना नसीब न हो।

    मायारानी––निःसन्देह यह बहुत अच्छी राय है, अतः जहाँ तक हो सके इसे कर ही देना चाहिए।

    इस समय कुबेरसिंह की फौज टिड्डियों की तरह इस बाग में सब तरफ फैली हुई हुक्म का इन्तजार कर रही थी। माधवी ने अपनी राय भीमसेन और कुबेरसिंह से कही और उनकी आज्ञानुसार फौजी आदमियों ने जमीन खोद कर मिट्टी निकालने और कुआँ पाटने में हाथ लगा दिया।

    पहर रात जाते तक कुआँ बखूबी पट गया और उस समय मायारानी के दिल में यह बात पैदा हुई कि अब मुझे गोपालसिंह का कुछ भी डर न रहा।

    फौजी सिपाहियों को खुले मैदान या बाग में पड़े रहने की आज्ञा देकर भीमसेन, कुबेरसिंह और माधवी तथा ऐयारों को साथ लिए हुए मायारानी अपने उस खास कमरे की छत पर बेफिक्री और खुशी के साथ चली गई, जिसमें आज के कुछ दिन पहले मालिकाना ढंग से रहती थी।

    10

    रात अनुमान दो पहर के जा चुकी है। खाप्त बाग के दूसरे दर्जे में दीवानखाने की छत पर कुबेरसिंह; भीमसेन और उसके चारों तरफ ऐयार तथा माधवी के पास बैठी हुई मायारानी बड़ी प्रसन्नता से बातें कर रही है। चाँदनी खूब छिटकी हुई है और बाग की हर एक चीज जहाँ तक निगाह बिना ठोकर खाये जा सकती है, साफ दिखाई दे रही है। बातचीत का विषय अब यह था कि "राजा गोपालसिंह से तो छुट्टी मिल गई, अब राज्य तथा राजकर्मचारियों के लिए क्या प्रबन्ध करना चाहिए?"

    जिस छत पर ये लोग बैठे हुए थे, उसके दाहिनी तरफ वाली पट्टी में भी एक सुन्दर इमारत और उसके पीछे ऊँची दीवार के बाद तिलिस्मी बाग का तीसरा दर्जा पड़ता था। इस समय मायारानी का मुँह ठीक उसी इमारत और दीवार की तरफ था, और उस तरफ की चाँदनी दरवाजों के अन्दर घुसकर बड़ी बहार दिखा रही थी। बात करते-करते मायारानी चौंकी और उस तरफ हाथ का इशारा करके बोली––"हैं! उस छत पर कौन जा पहुँचा है?"

    माधवी––हाँ, एक आदमी हाथ में नंगी तलवार लेकर टहल तो रहा है।

    भीमसेन––चेहरे पर नकाब डाले हुए है।

    कुबेरसिंह––हमारे फौजी सिपाहियों में से शायद कोई ऊपर चला गया होगा, मगर उन्हें बिना हुक्म ऐसा नहीं करना चाहिए!

    मायारानी––नहीं-नहीं, उस मकान में सिवा मेरे और कोई नहीं जा सकता।

    माधवी––तो फिर वहाँ गया कौन?

    मायारानी––यही तो ताज्जुब है! देखिए, एक और भी आ पहुँचा, यह तीसरा आया, मामला क्या है?

    अजायबसिंह––कहीं राजा गोपालसिंह कुएँ में घुसकर वहाँ न जा पहुँचे हों! मगर वे तो केवल दो ही आदमी थे!

    मायारानी––और ये तीन हैं! (कुछ रुककर) लीजिए, अब पाँच हो गये।

    मायारानी और उसके संगी-साथियों के देखते-देखते उस छत पर पचीस आदमी हो गये। उन सभी के हाथों में नंगी तलवारें थीं। जिस छत पर वे सब थे, वहाँ पर से ऊपर मायारानी के पास तक आने में यद्यपि कई तरह की रुकावटें थीं, मगर ऐयारों के लिए यह कोई मुश्किल बात न थी इसीलिए मायारानी के पक्ष वालों को भय हुआ और उन्होंने चाहा कि अपने फौजी आदमियों में से कुछ को ऊपर बुला लें और ऐसा करने के लिए अजायबसिंह को कहा गया।

    अजायबसिंह फौजी सिपाहियों को लाने के लिए चला गया, मगर मकान के नीचे न जा सका और तुरन्त लौट आकर बोला, "जाने का हर दरवाजा बन्द है, कोई तरकीब मायारानी करें तो शायद वहां तक पहुँचने की नौबत आवे?"

    अजायबसिंह की इस बात ने सभी को चौंका दिया और साथ ही इसके सभी को अपनी-अपनी जान की फिक्र पड़ गई। मायारानी के दिलाये हुए भरोसे से जो कुछ उम्मीद की जड़ इन लोगों के दिलों में जमी थी, वह हिल गई और अब अपने किए पर पछताने की नौबत आई, मगर मायारानी अब भी बात बनाने से न चूकी, यह कहती हुई अपनी जगह से उठी कि "कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह इस तिलिस्म को तोड़ रहे हैं, इस- लिए ताज्जुब नहीं कि ये सब बातें कुछ उन्हीं से सम्बन्ध रखती हों।"

    मायारानी स्वयं नीचे उतरी थी, मगर जा न सकी और अजायबसिंह की तरह लाचार होकर बैरग लौट आई। उस समय उसके दिल में भी तरह-तरह के खुटके पैदा और वह ताज्जुब की निगाह से उन लोगों की तरफ देखने लगी, जो उसके मुकाबले में एकाएक आकर अब गिनती में पचीस हो गये थे।

    थोड़ी देर बाद वे ऊपर से कूदते-फाँदते मायारानी की तरफ आते हुए दिखाई दिए। उस समय मायारानी और उसके संगी-साथी सभी उठ खड़े हुए और अपनी-अपनी जान बचाने की नीयत से तलवारें खींच मुस्तैद हो गये।

    बात-की-बात में वे पचीसों आदमी उस छत पर चले आये, जिस पर मायारानी

    च॰ स॰-5-2

    थी, मगर मायारानी या उसके साथियों से किसी ने कुछ भी न कहा, बल्कि उनकी तरफ आँख उठाकर देखा भी नहीं और मस्तानी चाल से चलते हुए छत के नीचे उतर गए। इन लोगों ने भी यह सोचकर कि वे लोग गिनती में हमसे ज्यादा हैं, रोक-टोक नहीं की, मगर इस बात का खयाल जरूर रहा कि नीचे जाने के रास्ते तो सब बन्द हैं, खुद मायारानी भी न जा सकी और लौट आई, इन सभी को भी निःसन्देह लौट आना पड़ेगा, मगर थोड़ी देर में यह गुमान जाता रहा जब कि पचीसों नीचे उतर कर बाग के बीच में चलते हुए दिखाई दिए।

    माधवी ने समझा कि हमारे फौजी सिपाही उन लोगों को जरूर टोकेंगे और वास्तव में बात ऐसी ही थी। उन पचीसों को बाग में देख फौजी सिपाहियों में खलबली मच गई और बहुतों ने उठकर उन लोगों को रोकना चाहा, मगर वे लोग देखते-ही-देखते पेड़ों की झुरमुट में घुसकर ऐसा गायब हुए कि किसी का पता भी न लगा और सब लोग आश्चर्य से देखते रह गए। उस समय माधवी ने मायारानी से कहा, "बहिन, यहाँ तो मामला बेढब नजर आता है!"

    मायारानी––कुछ समझ में नहीं आता कि ये लोग कौन थे, यहाँ क्यों आये और हम लोगों को बिना रोके-टोके इस तरह क्यों और कहाँ गायब हो गये!

    माधवी––यह तो ठीक ही है मगर मैं पूछती हूँ कि आप तिलिस्म की रानी कहलाकर भी इस बाग का हाल क्या जानती हैं? मैं तो समझती हूँ कि कुछ भी नहीं जानतीं। खास अपने कमरे का मामूली दरवाजा भी आपसे नहीं खुलता और हम लोगों की जान मुफ्त में जाना चाहती है!

    भीमसेन––अब आपकी कोई कार्रवाई हम लोगों को भरोसा नहीं दिला सकती।

    मायारानी––इस समय मैं मजबूर हो रही हूँ इसलिए टेढ़ी-सीधी जो जी में आवे सुनाओ, लेकिन अगर इस मकान के नीचे उतरने की नौबत आयेगी, तो दिखा दूँगी कि मैं क्या कर सकती हूँ।

    कुबेरसिंह––नोचे जाने की नौबत ही क्यों आवेगी! गैर लोग आवें, और चले जायें, मगर यहाँ की रानी होकर तुम कुछ न कर सको, यह बड़े शर्म की बात है।

    मायारानी इसका जवाब कुछ देना ही चाहती थी कि सीढ़ी की तरफ से आवाज आई, "तुम लोगों के कलपने पर मुझे दया आती है, अच्छा आओ हम दरवाजा खोल देते हैं, तुम लोग नीचे उतर आओ और अपनी जान बचाओ!" इसके बाद सीढ़ी वाले दरवाजे के खुलने की आवाज आई।

    सभी को ताज्जुब हुआ और सीढ़ी की तरफ जाते डर मालूम हुआ, मगर यह सोचकर कि यहाँ पड़े रहने से भी जान बचने की आशा नहीं है, सभी ने जी कड़ा करके नीचे उतरने का इरादा किया।

    वास्तव में दरवाजे जो बन्द हो गये थे खुले हुए दिखाई दिये और सब कोई जल्दी के साथ नीचे उतर गये, उस समय मायारानी ने एक लम्बी साँस लेकर कहा, "अब कोई चिन्ता नहीं।"

    बाकरअली––मगर यह न मालूम हुआ कि दरवाजा खोलने वाला कौन था? यारअली––अब उसने हम लोगों के साथ यह नेकी का बर्ताव क्यों किया?

    इतने ही में ऊपर से आवाज आई, "दरवाजा खोलने वाला मैं हूँ।"

    सभी ने घबराकर ऊपर की तरफ देखा। एक आदमी मुँह पर नकाब डाले बरामदे से झाँकता हुआ दिखाई दिया। कुबेरसिंह ने उससे पूछा, "तुम कौन हो?"

    नकाबपोश––मैं इस तिलिस्म का दारोगा हूँ।

    मायारानी––इस तिलिस्म का दारोगा तो राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे में है।

    नकाबपोश––वह तुम्हारा दारोगा था और मैं राजा गोपालसिंह का दारोगा हूँ,

    आज कल यह बाग मेरे ही कब्जे में है।

    मायारानी––जिस समय हम लोग यहाँ आये, तुम कहाँ थे?

    नकाबपोश––इसी बाग में।

    मायारानी––फिर हम लोगों को रोका क्यों नहीं?

    नकाबपोश––रोकने की जरूरत ही क्या थी? मैं जानता ही था कि तुम लोग अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार रहे हो। तुम लोगों की बेबकूफी पर मुझे हँसी आती है।

    मायारानी––बेबकूफी काहे की?

    नकाबसिंह––एक तो यही कि तुम लोगों ने इतनी फौज को बाग के अन्दर घुसेड़ तो लिया, मगर यह न सोचा कि इतने आदमी यहाँ आकर खायेंगे क्या? अगर घास और पेड़-पत्तों को भी खाकर गुजारा किया, चाहें तो भी दो-एक दिन से ज्यादा का काम नहीं चल सकता। क्या तुम लोगों ने समझा था कि बाग में पहुँचते ही राजा गोपालसिंह को मार लेंगे?

    मायारानी––गोपालसिंह को तो हम लोगों ने मार ही लिया, इसमें शक ही क्या है? बाकी रही हमारी फौज, सो एक दिन का खाना अपने साथ रखती है, कल तो हम लोग इस बाग के बाहर हो ही जायेंगे।

    नकाबपोश––दोनों बातें शेखचिल्ली की-सी हैं। न तो राजा गोपालसिंह का तुम लोग कुछ बिगाड़ सकते हो और न इस बाग के बाहर की हवा ही खा सकते हो।

    मायारानी––तो क्या गोपालसिंह किसी दूसरी राह से निकल जायेंगे?

    नकाबपोश––बेशक।

    मायारानी––और हम लोग बाहर न जा सकेंगे?

    नकाबपोश––कदापि नहीं, क्योंकि मैंने सब दरवाजे अच्छी तरह बन्द कर दिए हैं। तुम तो तिलिस्म की रानी बनने का दावा व्यर्थ ही कर रही हो! तुम्हें तो यहाँ का हाल रुपये में एक पैसा भी नहीं मालूम है। अभी मैंने तुम लोगों के उतरने की राह रोक दी थी, सो तुम्हारे किये कुछ भी न बन पड़ा! जब तुम लोग छत पर थे, पचीस आदमी तुम्हारे सामने से होकर नीचे चले आये, अगर तुम्हें तिलिस्म की रानी होने का दावा था तो उन्हें रोक लेती! मगर राजा साहब के हौसले को देखो कि तुम लोगों के यहाँ आने की खबर पाकर भी अकेले सिर्फ भैरोंसिंह को साथ लेकर इस बाग में चले आए?

    मायारानी––उन्हें हमारे आने की खबर कैसे मिली?

    नकाबपोश––(जोर से हँसकर) इसके जवाब में तो इतना ही कहना काफी है कि तुम्हारी लीला इस बाग में आने के पहले ही गिरफ्तार कर ली गई।

    माधवी––तो क्या हम लोग किसी तरह अब इस बाग के बाहर नहीं जा सकते?

    नकाबपोश––जीते जी तो नहीं जा सकते, मगर जब तुम लोग मर जाओगे, तब सभी की लाशें जरूर फेंक दी जायेंगी!

    जिस मकान में मायारानी उतरी थी, उसी के बरामदे में वह नकाबपोश टहल रहा था। बरामदे के आगे किसी तरह की आड़ या रुकावट न थी। मायारानी उससे बातें करती जाती और छिपे ढंग से अपने तिलिस्मी तमंचे को भी दुरुस्त करती जाती थी तथा रात होने के सबब यह बात उस नकाबपोश को मालूम न हुई। जब वह माधवी से बातें करने लगा, उस समय मौका पाकर मायारानी ने तिलिस्मी तमंचा उस पर चलाया। गोली उसकी छाती में लगकर फट गई और बेहोशी का धुआँ बहुत जल्द उसके दिमाग में चढ़ गया, साथ ही वह आदमी बेहोश होकर जमीन पर लुढ़कता हुआ मायारानी के आगे आ पड़ा। भीमसेन ने झपट कर उसकी नकाब हटा दी और चौंककर बोल उठा, "वाह-वाह! यह तो राजा गोपालसिंह हैं।"

    11

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और सरयू को बड़ा तब ही ताज्जुब हुआ जब उन्होंने एक-एक करके सात आदमियों को तिलिस्मी बाग में पहुँचाये जाते देखा। जब उस मकान की खिड़की बन्द हो गई और चारों तरफ सन्नाटा छा गया तब इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "उस तरफ चल कर देखना चाहिए कि ये लोग कौन हैं।"

    आनन्दसिंह––जरूर चलना चाहिए।

    सरयू––कहीं हम लोगों के दुश्मन न हों।

    आनन्दसिंह––अगर दुश्मन भी होंगे तो हमें कुछ परवाह न करनी चाहिए, हम लोग हजारों में लड़ने वाले हैं।

    इन्द्रजीत––अगर हम दस-बीस आदमियों से डरकर चलेंगे तो कुछ भी न कर सकेंगे।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस तरफ कदम बढ़ाया। आनन्दसिंह उनके पीछे-पीछे रवाना हुए, मगर सरयू को साथ आने की आज्ञा नहीं दी और वह उसी जगह रह गई।

    पास पहुँचकर कुमारों ने देखा कि सात आदमी जमीन पर बेहोश पड़े हैं। सभी के बदन पर स्याह लबादा और चेहरों पर स्याह नकाब था। थोड़ी देर तक दोनों ताज्जुब की निगाह से उन सभी की ओर देखते रहे और इसके बाद एक के चेहरे पर से नकाब हटाने का इरादा किया, मगर उसी समय ऊपर से पुनः दरवाजा या खिड़की खुलने की आवाज आई। आनन्दसिंह––मालूम होता है कि और भी दो-चार आदमी यहाँ उतारे जायेंगे।

    इन्द्रजीतसिंह––शायद ऐसा ही हो, यहाँ से हटकर और आड़ में होकर देखना चाहिए।

    आनन्दसिंह––(सोतों बेहोशों की तरफ इशारा करके) यदि इन लोगों को इनके किसी दुश्मन ने यहाँ पहुँचाया हो और अबकी दफे कोई आकर इनकी जान …

    इन्द्रजीतसिंह––नहीं-नहीं, अगर ये सब लोग मारे जाने लायक होते और जिन लोगों ने इन्हें नीचे उतारा है वे इनके जानी दुश्मन होते, तो धीरे से उतारने के बदले ऊपर से धक्का देकर नीचे गिरा देते। खैर ज्यादा बातचीत का मौका नहीं है, इस पेड़ की आड़ में हो जाओ, फिर देखो हम सब पता लगा लेते हैं। बस, हटो जल्दी करो

    बेचारे आनन्दसिंह कुछ जवाब न दे सके और वहाँ से थोड़ी दूर हटकर एक पेड़ की आड़ में हो गए। इस समय चन्द्रदेव अपनी छावनी की तरफ जा रहे थे और पेड़ों की आड़ पड़ जाने के कारण उस जगह कुछ अन्धकार-सा छा गया था, जहाँ वे सातों बेहोश पड़े हुए थे और इन्द्रजीत खड़े थे।

    इन्द्रजीतसिंह हाथ में तिलिस्मी खंजर लेकर फुर्ती से इन सातों के बीच में छिपकर लेट रहे, दोनों तरफ से दो आदमियों के लबादे को भी अपने बदन पर ले लिया और पड़े-पड़े ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी कमन्द के सहारे नीचे उतरता हुआ दिखाई दिया। जब वह जमीन पर उतरकर उन सातों आदमियों की तरफ आया तो इन्द्रजीतसिंह ने फुर्ती से हाथ बढ़ाकर तिलिस्मी खंजर उसके पैर से लगा दिया, साथ ही वह आदमी काँपा और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। इन्द्रजीतसिंह पुनः उसी तरह लेट ऊपर की तरफ देखने लगे। थोड़ी देर बाद के और एक आदमी उसी कमन्द के सहारे नीचे उतरा जो घूम-घूम के गौर से उन सातों को देखने लगा। जब वह कुमार के पास आया, कुमार ने उसके पैर से भी तिलिस्मी खंजर लगा दिया और वह भी पहले की तरह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। कुँअर इन्द्रजीत लेटे-लेटे और भी किसी के आने का इन्तजार करने लगे मगर कुछ देर हो जाने पर भी कोई तीसरा दिखाई न पड़ा। कुमार उठ खड़े हुए और आनन्दसिंह भी उनके पास चले आये।

    इन्द्रजीतसिंह––तुम इसी जगह मुस्तैद रहकर इन सभी की निगहबानी करो, हम इसी कमन्द के सहारे ऊपर जाकर देखते हैं कि वहाँ क्या है।

    आनन्दसिंह––आपका अकेले ऊपर जाना तो ठीक न होगा। कौन ठिकाना, वहाँ दुश्मनों की बारात लगी हो!

    इन्द्रजीतसिंह––कोई हर्ज नहीं, जो कुछ होगा देखा जायगा मगर तुम यहाँ से मत हिलना।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह उसी कमन्द के सहारे बहुत जल्द ऊपर चढ़ गये और खिड़की के अन्दर जाकर एक लम्बे-चौड़े कमरे में पहुँचे जहाँ यद्यपि बिल्कुल सन्नाटा था मगर एक चिराग जल रहा था। इस कमरे में दूसरी तरफ बाहर निकल जाने के लिए एक बड़ा-सा दरवाजा था, कुमार वहाँ चले गये और एक पैर दरवाजे के बाहर रख झाँकने लगे। एक दूसरा कमरा नजर पड़ा जिसमें चारों तरफ छोटे-छोटे कई दरवाजे थे मगर सब बन्द थे और सामने की तरफ एक बड़ा-सा खुला हुआ दरवाजा था। कुमार उस खुले हुए दरवाजे में चले गये और झाँककर देखने लगे। एक छोटा-सा नजर बाग दिखाई दिया जिसके चारों तरफ ऊँची-ऊँची इमारतें और बीच में एक छोटी-सी बावली थी। बाग में दो बीघे से ज्यादा जमीन न थी और फूल-पत्तों के पेड़ भी कम थे। बावली के पूरब तरफ एक आदमी हाथ में मशाल लिए खड़ा था और उस मशाल में से बिजली की तरह बहुत ही तेज रोशनी निकल रही थी। वह रोशनी एकदम स्थिर थी अर्थात् हवा लगने से हिलती न थी और उस एक ही रोशनी से तमाम बाग में ऐसा उजाला हो रहा था कि वहाँ का एक-एक पत्ता साफ-साफ दिखाई दे रहा था। कुँअर इन्द्रजीत ने बड़े गौर से उस आदमी को देखा जिसके हाथ में मशाल थी और उनको निश्चय हो गया कि यह आदमी असली नहीं है बनावटी है। अस्तु ताज्जुब से कुछ देर तक वे उसकी तरफ देखते रहे, इसी बीच में बाग के उत्तर वाले दालान में से एक आदमी निकलकर बावली की तरफ आता हुआ दिखाई पड़ा और कुमार ने उसे देखते ही पहचान लिया कि यह राजा गोपालसिंह हैं। कुमार ने उन्हें पुकारने का इरादा किया ही था कि उसी दालान में से और चार आदमी आते हुए दिखाई दिए और इनकी सूरत-शक्ल भी पहले आदमी के समान ही थी अर्थात् ये चारों भी राजा गोपाल सिंह ही मालूम पड़ते थे जिससे कुँअर इन्द्रजीतसिंह को बहुत आश्चर्य हुआ और वे बड़े गौर से इनकी तरफ देखने लगे।

    वे चारों आदमी जो पीछे आये थे खाली हाथ न थे बल्कि दो आदमियों की लाशें उठाए हुए थे। धीरे-धीरे चलकर वे चारों आदमी उस बनावटी मूरत के पास पहुँचे जिसके हाथ में मशाल थी, वे दोनों लाशें उसी के पास जमीन पर रख दी और तब पाँचों गोपालसिंह मिलकर बड़े धीरे-धीरे कुछ बातें करने लगे जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह किसी तरह सुन नहीं सकते थे।

    पहले आदमी को देखकर और गोपालसिंह समझकर कुमार ने आवाज देना चाहा था मगर जब और भी चार गोपालसिंह निकल आए तब उन्हें ताज्जुब मालूम हुआ और यह समझकर कि कदाचित इन पाँचों में से एक भी गोपालसिंह न हो, वे चुप रह गये। उन पाँचों गोपालसिंह की पोशाकें एक ही रंग-ढंग की थीं, बल्कि उन दोनों लाशों की पोशाक भी ठीक उन्हीं की तरह थी। यद्यपि उन लाशों का सिर कटा हुआ और वहाँ मौजूद न था मगर उन पाँचों गोपालसिंह की तरफ खयाल करके देखने वाला उन लाशों को भी गोपालसिंह बता सकता था।

    कुमार को चाहे इस बात का खयाल हो गया हो कि इन सभी में से कोई भी असली गोपालसिंह न होंगे मगर फिर भी वे उन सभी को बड़े ताज्जुब और गौर की निगाह से देखते हुए सोच रहे थे कि कि इतने गोपालसिंह बनने की क्या जरूरत पड़ी और उन दोनों लाशों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया गया या किसने किया!

    जिस दरवाजे में कुँअर इन्द्रजीत सिंह खड़े थे उसी के आगे बाईं तरफ घूमती हुई छोटी सीढ़ियाँ नीचे उतर जाने के लिए थीं। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने कुछ सोच-विचार कर चाहा कि इन सीढ़ियों की राह नीचे उतरकर पाँचों गोपालसिंह के पास जायँ और उन्हें जबर्दस्ती रोककर असल बात का पता लगावें मगर इसके पहले किसी के आने की आहट मालूम हुई और पीछे घूमकर देखने से कुँअर आनन्दसिंह पर निगाह पड़ी।

    इन्द्रजीतसिंह––तुम क्यों चले आये?

    आनन्दसिंह––आपको मैंने कई दफे नीचे से पुकारा, मगर आपने कुछ जवाब न दिया तो लाचार यहाँ आना पड़ा।

    इन्द्रजीत––क्यों?

    आनन्दसिंह––राजा गोपालसिंह की आज्ञा से।

    इन्द्रजीतसिंह––राजा गोपालसिंह कहाँ हैं?

    आनन्दसिंह––उन दोनों आदमियों में से जो नीचे उतरे थे और जिन्हें आपने बेहोश कर दिया था, एक राजा गोपालसिंह थे। जब आप ऊपर चढ़ आए तब मैंने एक का नकाब हटाया और तिलिस्मी खंजर की रोशनी में चेहरा देखा तो मालूम हुआ कि गोपालसिंह हैं। उस समय मुझे इस बात का अफसोस हुआ कि बेहोश करने के बाद आपने उनकी सूरत नहीं देखी, अगर देखते तो उन्हें छोड़कर यहाँ न आते। खैर जब मैंने उन्हें पहचाना तो होश में लाने के लिए उद्योग करना उचित जाना अस्तु तिलिस्मी खंजर के जोड़ की अँगूठी उनके बदन में लगाई जिसके थोड़ी ही देर बाद वह होश में आये और उठ बैठे। होश में आने के बाद पहले-पहले जो कुछ उनके मुँह से निकला, वह यह था कि "कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने धोखा खाया, मुझे बेहोश करने की क्या जरूरत थी? मैं तो खुद उनसे मिलने के लिए यहाँ आया था!" इतना कहकर उन्होंने मेरी तरफ देखा यद्यपि उस समय चाँदनी वहाँ से हट गई थी मगर उन्होंने मुझे बहुत जल्द पहचान लिया और पूछा कि 'तुम्हारे बड़े भाई कहाँ हैं?' मैंने उनसे कुछ छिपाना उचित न जाना और कह दिया कि 'इसी कमन्द के सहारे ऊपर चले गए हैं।' सुन कर वे बहुत रंज हुए और क्रोध से बोले कि 'सब काम लड़कपन और नादानी का किया करते हैं। उन्हें बहुत जल्द ऊपर से बुला लो।' मैंने आपको कई दफे पुकारा मगर आप न बोले तब उन्होंने घुड़क के कहा कि 'क्यों व्यर्थ देर कर रहो हो, तुम खुद ऊपर जाओ और जल्द बुला लाओ।' मैंने कहा कि मुझे यहाँ से हटने की आज्ञा नहीं है आप खुद जाइये और बुला लाइये, मगर इतना सुनकर वे और भी रंज हुए और बोले, "अगर मुझमें ऊपर जाने की ताकत होती तो मैं तुम्हें इतना कहता ही नहीं! बेहोशी के कारण मेरी रग-रग कमजोर हो रही है, तुम अगर उनको बुला लाने में विलम्ब करोगे तो पछताओगे, बस अब मैं इससे ज्यादा और कुछ न कहूँगा, जो ईश्वर की मर्जी होगी और जो कुछ तुम लोगों के भाग्य में लिखा होगा सो होगा।" उनकी बातें ऐसी न थीं कि मैं सुनता और चुपचाप खड़ा रह जाता, आखिर लाचार होकर आपको बुलाने के लिए आना पड़ा। अब आप जल्द चलिए देर न कीजिए।

    आनन्दसिंह की बातें सुनकर इन्द्रजीतसिंह को बहुत रंज हुआ और उन्होंने क्रोध भरी आवाज में कहा––

    इन्द्रजीतसिंह––आखिर तुमसे नादानी हो ही गई?

    आनन्दसिंह––(आश्चर्य से) सो क्या?

    इन्द्रजीतसिंह––तुमने उस दूसरे के चेहरे पर की भी नकाब हटाकर देखा कि वह कौन था?

    आनन्दसिंह––जी नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह––तब तुम्हें कैसे विश्वास हुआ कि यह राजा गोपालसिंह ही हैं? जब चेहरे पर से नकाब हटाकर देखा ही था तो पानी से मुँह धोकर भी देख लेना था? क्या तुम भूल गये कि राजा गोपालसिंह के पास भी इसी तरह का तिलिस्मी खंजर मौजूद है अतः उनके ऊपर इस खंजर का असर क्यों होने लगी थी?

    आनन्दसिंह––(सिर नीचा करके) बेशक मुझसे भूल हुई!

    इन्द्रजीतसिंह––भारी भूल हुई! (छोटे बाग की तरफ बताकर) देखो, यहाँ पाँच राजा गोपालसिंह हैं! क्या तुम कह सकते हो कि ये पाँचों राजा गोपालसिंह हैं?

    आनन्दसिंह ने उस छोटे बगीचे की तरफ झाँककर देखा और‌ कहा, "बेशक मामला गड़बड़ है!

    इन्द्रजीतसिंह––खैर, अब तो हमें लौटना ही पड़ेगा, हम चाहते थे इन सभी का कुछ भेद मालूम करें, मगर खैर।

    इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह लौट पड़े और उस कमरे को लाँघकर दूसरे कमरे में पहुँचे जिसमें वे सातों खिड़कियाँ थीं। यकायक इन्द्रजीतसिंह की निगाह एक लिफाफे पर पड़ी जिसे उन्होंने उठा लिया और चिराग के पास ले जाकर पढ़ा। लिफाफा बन्द था और उस पर यह लिखा हुआ था––"इन्द्रजीतसिंह आनन्दसिंह जोग लिखी गोपालसिंह ।"

    कुमार ने लिफाफा फाड़कर चिट्ठी निकाली और देखते ही कहा, "इस चिट्ठी पर किसी तरह का शक नहीं हो सकता, बेशक यह भाई साहब के हाथ की लिखी है और मामूली निशान भी है।" इसके बाद वे चिट्ठी पढ़ने लगे।

    आनन्दसिंह ने देखा कि चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते इन्द्रजीतसिंह के चेहरे का रंग कई दफे बदला और जैसे-जैसे पढ़ते जाते थे रंज की निशानी बढ़ती जाती थी। वे जब कुल चिट्ठी पढ़ चुके तो एक लम्बी साँस लेकर बोले, "अफसोस, बहुत बड़ी भूल हुई।" और वह चिट्ठी पढ़ने के लिए आनन्दसिंह के हाथ में दे दी।

    आनन्दसिंह ने चिट्ठी पढ़ी, यह लिखा हुआ था––

    "किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी, कमला, लाड़िली और इन्दिरा को आपके पास तिलिस्म में भेजते हैं। देखिये इन्हें सम्हालिए और एक क्षण के लिए भी इनसे अलग न होइए। मुन्दर हमारे तिलिस्मी बाग में घुसी हुई है, हम आठ आना उसके कब्जे में आ गये हैं। लीला ने धोखा देकर हमारे कुछ भेद मालूम कर लिए जिसका सबब और पूरा-पूरा हाल लक्ष्मीदेवी या कमलिनी की जुबानी आपको मालूम होगा जिन्हें हमने सब-कुछ बता और समझा दिया है। कई बातों के खयाल से सभी को बेहोश करके कमन्द द्वारा आपके पास पहुँचाते हैं, खबरदार, एक क्षण के लिए भी इन लोगों से अलग न हों और किसी बनावटी गोपालसिंह का विश्वास न करें। आज कम-से-कम बीस पच्चीस आदमी गोपालसिंह बने हुए कार्रवाई कर रहे हैं। हम जरा तर दुद में पड़े हुए हैं मगर कोई चिन्ता नहीं, भैरोंसिंह हमारे साथ हैं। आप बाग के इस दर्जे को तोड़कर दूसरी जगह पहुँचिए और यह काम रात-भर के अन्दर होना चाहिए।

    ––"शिवरामे गोपाल मेरावशि शुलेख।"

    चिट्ठी पढ़कर आनन्दसिंह को भी बड़ा अफसोस हुआ और अपने किए पर पछताने लगे। सच तो यों है कि दोनों ही भाइयों को इस बात का अफसोस हुआ कि किशोरी, कामिनी इत्यादि को अपने पास आ जाने पर भी देखे और होश में लाये बिना छोड़कर इधर चले आये और व्यर्थ की झंझट में पड़े, क्योंकि दोनों कुमार किशोरी और कामिनी की मुलाकात से बढ़कर दुनिया में किसी चीज को पसन्द नहीं करते थे।

    दोनों कुमार जल्दी-जल्दी उस कमरे के बाहर हुए और उस खिड़की में पहुँचे जिसमें कमन्द लगा हुआ छोड़ आये थे मगर आश्चर्य और अफसोस की बात थी कि अब उन्होंने उस कमन्द को खिड़की में लगा हुआ न पाया जिसके सहारे वे नीचे उतर जाते, शायद किसी नीचे वाले ने उस कमन्द को हटा लिया था।

    12

    राजा गोपालसिंह ने जब रामदीन को चिट्ठी और अँगूठी देकर जमानिया भेजा था तो यद्यपि चिट्ठी में लिख दिया था कि परसों रविवार को शाम तक हम लोग वहाँ (पिपलिया घाटी) पहुँच जाएँगे, मगर रामदीन को समझा दिया था कि रविवार को पिपलिया घाटी पहुँचना हमने यों ही लिख दिया है, वास्तव में हम वहाँ सोमवार को पहुँचेंगे अस्तु तुम भी सोमवार को पिपलिया घाटी पहुँचना, जिसमें ज्यादा देर तक हमारे आदमियों को वहाँ ठहर कर तकलीफ न उठानी पड़े, और दो सौ सवारों की जगह केवल बीस सवार लाना। यह वात असली रामदीन को तो मालूम थी और वह मारा न जाता तो बेशक रथ और सवारों को लेकर राजा साहब की आज्ञानुसार सोमवार को ही पिपलिया घाटी पहुँचता, मगर नकली रामदीन अर्थात् लीला तो उन्हीं बातों को जान सकती थी जो चिट्ठी में लिखी हुई थीं। अस्तु वह रविवार ही को रथ और दो सौ फौज लेकर पिपलिया घाटी जा पहुँची और जब सोमवार को राजा साहब वहाँ पहुँचे, तो बोली, "आश्चर्य है कि आपके आने में पूरे आठ पहर की देर हुई!"

    यह सुनते ही राजा साहब समझ गये कि यह असली रामदीन नहीं है, उसी समय से उन्होंने अपनी कार्रवाई का ढंग बदल दिया और लीला तथा मायारानी का सब बन्दोबस्त मिट्टी में मिल गया। वे उसी समय दो-चार बातें करके पीछे लौट गए और दूसरे दिन औरतों को अपने साथ न लाकर केवल भैरोंसिंह और इन्द्रदेव को साथ लिए हुए पिपलिया घाटी में आए।

    इस जगह यह भी लिख देना उचित जान पड़ता है कि दूसरे दिन पिपलिया घाटी में पहुँच कर लीला के लाए हुए सवारों के साथ रथ पर चढ़ कर जमानिया पहुँचने वाले गोपालसिंह असली न थे बल्कि नकली थे और भैरोंसिंह ने लीला के साथ जो सलूक किया वह असली राजा गोपालसिंह के इशारे से था। अब हमारे पाठक यह जानना चाहते होंगे कि यदि वह राजा गोपालसिंह नकली थे तो असली गोपालसिंह कहाँ गये, या वह किस सूरत में गये? तो इसके जवाब में केवल इतना ही कह देना काफी होगा कि असली गोपालसिंह नकली गोपालसिंह के साथ इन्द्रदेव की सूरत बना कर रथ पर सवार हुए थे और जमानिया पहुँचने के पहले ही नकली गोपालसिंह को समझा-बुझा कर रथ से उतर किसी तरफ चले गये थे। यह सब हाल यद्यपि बयानों से पाठकों को मालूम हो गया होगा, परन्तु शक मिटाने के लिए यहाँ पुनः लिख दिया गया।

    राजा गोपालसिंह के होशियार हो जाने के कारण मायारानी ने तिलिस्मी बाग में तरह-तरह के तमाशे देखे जिसका कुछ हाल तो लिखा जा चुका है और बाकी आगे चल कर लिखा जायगा क्योंकि इस समय हम इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल लिखना उचित समझते हैं।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने जब खिड़की में कमन्द लगा हुआ न पाया तो उन्हें ताज्जुब और रंज हुआ। थोड़ी देर तक खड़े उसी बाग की तरफ देखते रहे और तब आनन्दसिंह से बोले, "क्या हम लोगों यहाँ से कूद नहीं सकते?"

    आनन्दसिंह––क्यों नहीं कूद सकते! अगर इस बात का खयाल हो कि नीचा बहुत है तो कमरबन्द खोल कर इस दरवाजे के सींकचे में बाँध और उसके सहारे कुछ नीचे लटक कर कूदने में मालूम भी न पड़ेगा।

    इन्द्रजीतसिंह––हाँ, तुमने यह बहुत ठीक कहा। कमरबन्दों के सहारे हम लोग आधी दूर तक तो जरूर ही लटक सकते हैं, मगर खराबी यह है कि दोनों कमरबन्दों से हाथ धोना पड़ेगा और इस तिलिस्म में नहाने-धोने की सुविधा इन्हीं की बदौलत है। खैर कोई चिन्ता नहीं लँगोटे से भी काम चल सकता है, अच्छा लाओ कमरबन्द खोलो।

    दोनों भाइयों ने कमरबन्द खोलने के बाद दोनों को एक साथ जोड़ा और उसका एक सिरा दरवाजे से लगे हुए सींकचे के साथ बाँध कर दोनों भाई बारी-बारी से नीचे लटक गये।

    कमरबन्द ने आधी दूर तक दोनों भाइयों को पहुँचा दिया। इसके बाद दोनों भाइयों को कूद जाना पड़ा। कूदने के साथ ही नीचे एक झाड़ी के अन्दर से आवाज आई, "शाबाश! इतनी ऊँचाई से कूद पड़ना आप ही लोगों का काम है! मगर अब किशोरी, कामिनी इत्यादि से मुलाकात नहीं हो सकती।"

    जितने आदमी कमन्द के सहारे इस बाग में लटकाये गए थे और जिन सभी को यहाँ छोड़ आनन्दसिंह अपने भाई को बुलाने के लिए ऊपर गये थे, उन सभी को मौजूद न पाकर और इस शाबाशी देने वाली आवाज को सुन कर दोनों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। दोनों भाई चारों तरफ घूम-घूम कर देखने लगे। मगर किसी की सूरत नजर न पड़ी, हाँ, एक पेड़ के नीचे सरयू को बेहोश पड़ी हुई जरूर देखा जिससे उन दोनों का ताज्जुब और भी ज्यादा हो गया।

    इन्द्रजीतसिंह––(आनन्दसिंह से) यह सब खरावी तुम्हारी जरा-सी भूल के सबब से हुई!

    आनन्दसिंह––निःसन्देह ऐसा ही है।

    इन्द्रजीतसिंह––पहले सरयू को होश में की लाने फिक्र करो, शायद हमें इसकी जुबानी कुछ मालूम हो।

    आनन्दसिंह––जो आज्ञा।

    इतना कहकर आनन्दसिंह सरयू को होश में लाने का उद्योग करने लगे। थोड़ी देर में सरयू की बेहोशी जाती रही और इतने ही में सुबह की सफेदी ने भी अपनी सूरत दिखाई।

    इन्द्रजीतसिंह––(सरयू से) तुम्हें किसने बेहोश किया?

    सरयू––एक नकाबपोश ने आकर एक चादर जबर्दस्ती मेरे ऊपर डाल दी जिससे मैं बेहोश हो गई। मैं दूर से सब तमाशा देख रही थी। जब आप कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गये और उसके कुछ देर बाद छोटे कुमार भी आपको कई दफे पुकारने के बाद उसी कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गये, तब उन्हीं में से एक नकाबपोश ने उन सभी को सचेत किया जो (हाथ का इशारा करके) उस जगह बेहोश पड़े हुए थे या जो ऊपर से लटकाए गए थे। इसके बाद सब कोई मिल कर उस (हाथ से बता कर) दीवार की तरफ गए और कुछ देर तक आपस में बातें करते रहे। इसी बीच में छिपकर उनकी बातें सुनने की नीयत से मैं भी धीरे-धीरे अपने को छिपाती हुई उस तरफ बढ़ी मगर अफसोस वहाँ तक पहुँचने भी न पाई थी कि एक नकाबपोश मेरे सामने आ पहुँचा और उसने उसी ढंग से मुझे बेहोश कर दिया जैसा कि मैं अभी कह चुकी हूँ। शायद उसी बेहोशी की अवस्था में मैं इस जगह पहुँचाई गई।

    सरयू की बातें सुन कर दोनों कुमार कुछ देर तक सोचते रहे। इसके बाद सरयू को साथ लिए उसी दीवार की तरफ गये जिधर उन लोगों का जाना सरयू ने बताया था जो कमन्द के सहारे इस बाग में उतरे या उतारे गये थे। जब वहाँ पहुँचे तो देखा कि दीवार की लम्बाई के बीचोंबीच में एक दरवाजे का निशान बना हुआ है और उसके पास ही में नीचे की जमीन कुछ खुदी हुई है।

    आनन्दसिंह––(इन्द्रजीतसिंह से) देखिए यहाँ की जमीन उन लोगों ने खोदी और तिलिस्म के अन्दर जाने का दरवाजा निकाला है, क्योंकि दीवार में अब वह गुण तो रहा नहीं जो उन लोगों को ऐसा करने से रोकता।

    इन्द्रजीतसिंह––बेशक यह वही दरवाजा है जिस राह से हम लोग तिलिस्म के दूसरे दर्जे में जाने वाले थे! मगर इससे तो यह जाना जाता है कि वे लोग तिलिस्म के अन्दर घुस गये?

    आनन्दसिंह––जरूर ऐसा ही है और यह काम सिवाय गोपाल भाई के दूसरा कोई नहीं कर सकता। अस्तु अब मैं जरूर यह कहने की हिम्मत करूँगा कि वह कोई दूसरा नहीं था, जिसके कहे मुताबिक मैं आपको बुलाने के लिए मकान के ऊपर चला गया था।

    इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारी बात मान लेने की इच्छा तो होती है। मगर क्या तुम उस खास निशान को देख कर भी कह सकते हो कि वह चिट्ठी गोपाल भाई की नहीं थी जो मुझे उस मकान में कमरे के अन्दर मिली थी?

    आनन्दसिंह––जी नहीं, यह तो मैं कदापि नहीं कह सकता कि वह चिट्ठी किसी दूसरे की लिखी हुई थी, मगर यह खयाल भी मेरे दिल से दूर नहीं हो सकता कि उन्हीं (गोपालसिंह) की आज्ञा से आपको बुलाने गया था।

    इन्द्रजीतसिंह––हो सकता है, तो क्या उन्होंने हम लोगों के साथ चालाकी की?

    आनन्दसिंह––जो हो।

    इन्द्रजीतसिंह––यदि ऐसा ही है तो उनकी लिखावट पर भरोसा करके यही हम कैसे कह सकते हैं कि किशोरी, कामिनी इत्यादि इस बाग में पहुँच गई थीं।

  • चन्द्रकांता सन्तति 4

    चन्द्रकांता सन्तति 4

    Aproximadamente 365.067 palavras.

    चन्द्रकांता सन्तति 4
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकांता_सन्तति_4

    तेरहवाँ भाग

    1

    अब हम अपने पाठकों का ध्यान जमानिया के तिलिस्म की तरफ फेरते हैं क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहाँ छोड़े बहुत दिन हो गये और अब बीच में उनका हाल लिखे बिना किस्से का सिलसिला ठीक नहीं होता।

    हम लिख आये हैं कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताब को पढ़कर समझने का भेद आनन्दसिंह को बताया और इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ से चिल्लाने की आवाज आई। दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और फिर यह आवाज सुनाई पड़ी, "अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले, मैं भी यही चाहती हूँ कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूँ। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी खबर कुछ भी न होगी!" इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन और बेताब हो गये और आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि 'कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है' मन्दिर के पीछे की तरफ लपके। आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले गये।

    जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह मन्दिर के पीछे की तरफ पहुँचे तो एक विचित्र वेषधारी मनुष्य पर उनकी निगाह पड़ी। उस आदमी की उम्र अस्सी वर्ष से कम न होगी। उसके सिर, मूँछ-दाढ़ी और भौं इत्यादि के तमाम बाल बर्फ की तरफ सफेद हो रहे थे मगर गर्दन और कमर पर बुढ़ापे ने अपना दखल जमाने से परहेज कर रक्खा था; अर्थात् न तो उसकी गर्दन हिलती थी और न कमर झुकी हुई थी। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ (बहुत कम) पड़ी हुई थीं मगर फिर भी उसका गोरा चेहरा रौनकदार और रौबीला दिखाई पड़ता था और दोनों तरफ के गालों पर अब भी सुर्खी मौजूद थी। एक नहीं बल्कि सारे ही अंगों की किसी-न-किसी हालत से वह अस्सी बरस का बुड्ढा जान पड़ता था परन्तु कमजोरी, पस्त हिम्मती, बुजदिली और आलस्य इत्यादि के धावे से अभी तक उसका शरीर बचा हुआ था।

    उसकी पोशाक राजों-महाराजों की पोशाकों की तरह बेशकीमती तो न थी मगर इस योग्य भी न थी कि उससे गरीबी और कमलियाकत जाहिर होती। रेशमी तथा मोटे कपड़े की पोशाक हर जगह से चुस्त और फौजी अफसरों के ढंग की मगर सादी थी। कमर में एक भुजाली, लगी हुई थी और बाएँ हाथ में सोने की एक बड़ी-सी डलिया या चँगेर लटकाए हुए था। जिस समय वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ देख कर हँसा, उस समय यह भी मालूम हो गया कि उसके मुँह में जवानों की तरह कुल दाँत अभी तक मौजूद हैं और मोती की तरह चमक रहे हैं।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को आशा थी कि वे इस जगह कमलिनी को नहीं तो किसी-न-किसी औरत को अवश्य देखेंगे, मगर आशा के विपरीत एक ऐसे आदमी को देख उन्हें बड़ा ही ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह ने वह तिलिस्मी खंजर, जो मन्दिर के नीचे वाले तहखाने में पाया था, आनन्दसिंह के हाथों में दे दिया और आगे बढ़कर उस आदमी से पूछा, "यहाँ से एक औरत के चिल्लाने की आवाज आई थी, वह कहाँ है?"

    बुड्ढा—(इधर-उधर देख के) यहाँ तो कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—अभी-अभी हम दोनों ने उसकी आवाज सुनी थी।

    बुड्ढा—बेशक सुनी होगी, मगर मैं ठीक कहता हूँ कि यहाँ पर कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर वह आवाज किसकी थी ?

    बुड्ढा—वह आवाज मेरी ही थी।

    आनन्दसिंह—(सिर हिला कर) कदापि नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह—मुझे इस बात का विश्वास नहीं हो सकता। आपकी आवाज वैसी नहीं है जैसी वह आवाज थी।

    बुड्ढा—जो मैं कहता हूँ उसे आप विश्वास करें या यह बतावें कि आपको मेरी बात का विश्वास क्योंकर होगा? क्या मैं फिर उसी तरह से बोलूँ?

    इन्द्रजीतसिंह—हाँ यदि ऐसा हो तो हम लोग आपकी बात मान सकते हैं।

    बुड्ढा—(उसी तरह से और वे ही शब्द अर्थात्—'अच्छा-अच्छा तू मेरा सिर काट ले'—इत्यादि बोल कर) देखिये वे ही शब्द और उसी ढंग की आवाज है या नहीं?

    आनन्दसिंह—(ताज्जुब से) बेशक वही शब्द और ठीक वैसी ही आवाज है।

    इन्द्रजीतसिंह—मगर इस ढंग से बोलने की आपको क्या आवश्यकता थी?

    बुड्ढा—मैं इस तिलिस्म में कल से चारों तरफ घूम-घूमकर आपको खोज रहा हूँ। सैकड़ों आवाजें दीं और बहुत उद्योग किया मगर आप लोगों से मुलाकात न हुई। तब मैंने सोचा कदाचित् आप लोगों ने यह सोच लिया हो कि इस तिलिस्म के कारखाने की आवाज का उत्तर देना उचित नहीं है और इसी से आप मेरी आवाज पर ध्यान नहीं देते। आखिर मैंने यह तरकीब निकाली और इस ढंग से बोला जिसमें सुनने के साथ ही आप बेताब हो जायँ और स्वयं ढूँढ़ कर मुझसे मिलें, और आखिर जो कुछ मैंने सोचा था वही हुआ।

    इन्द्रजीतसिंह—आप कौन हैं और मुझे यों बुला रहे थे? आनन्दसिंह—और इस तिलिस्म के अन्दर आप कैसे आए?

    बुड्ढा—मैं एक मामूली आदमी हूँ और आपका एक अदना गुलाम हूँ। इसी तिलिस्म में रहता हूँ और यही तिलिस्म मेरा घर है। आप लोग इस तिलिस्म में आए हैं तो मेरे घर में आए हैं अतएव आप लोगों की मेहमानी और खातिरदारी करना मेरा धर्म है इसीलिए मैं आप लोगों को ढूँढ़ रहा था।

    इन्द्रजीतसिंह—अगर आप इसी तिलिस्म में रहते हैं और यह तिलिस्म आपका घर है तो हम लोगों को आप दोस्ती की निगाह से नहीं देख सकते, क्योंकि हम लोग आपका घर अर्थात् यह तिलिस्म तोड़ने के लिए यहाँ आए हैं। और कोई आदमी किसी ऐसे की खातिर नहीं कर सकता जो उसका मकान तोड़ने आया हो, तब हम क्योंकर विश्वास कर सकते हैं कि आप हमें अच्छी निगाह से देखते होंगे या हमारे साथ दगा या फरेब न करेंगे?

    बुड्ढा—आपका खयाल बहुत ठीक है, ऐसे समय पर इन सब बातों को सोचना और विचार करना बुद्धिमानी का काम है, परन्तु इस बात का आप दोनों भाइयों को विश्वास करना ही होगा कि मैं आपका दोस्त हूँ। भला सोचिए तो सही कि मैं दुश्मनी करके आपका क्या बिगाड़ सकता हूँ? हाँ, आपकी मेहरबानी से अवश्य फायदा उठा सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—हमारी मेहरबानी से आपका क्या फायदा होगा और आप इस तिलिस्म के अन्दर हमारी क्या खातिर करेंगे? इसके अतिरिक्त यह भी बतलाइए कि क्या सबूत पाकर हम लोग आप को अपना दोस्त समझ लेंगे और आपकी बात पर विश्वास कर लेंगे?

    बुड्ढा—आपकी मेहरबानी से मुझे बहुत-कुछ फायदा हो सकता है। यदि आप चाहेंगे तो मेरे घर को अर्थात् इस तिलिस्म को बिल्कुल चौपट न करेंगे। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप इस तिलिस्म को न तोड़ें और इससे फायदा न उठाएँ, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि इस तिलिस्म को उतना ही तोड़िए जितने से आपको गहरा फायदा पहुँचे और कम फायदे के लिए व्यर्थ उन मजेदार चीजों को चौपट न कीजिए जिनके बनाने में बड़े-बड़े बुद्धिमानों ने वर्षों मेहनत की है और जिसका तमाशा देखकर बड़े-बड़े होशियारों की अक्ल भी चकरा सकती है। अगर इसका थोड़ा-सा हिस्सा आप छोड़ दें तो मेरा खेल-तमाशा बना रहेगा और इसके साथ ही साथ आपके दोस्त गोपालसिंह की इज्जत और नामवरी में भी फर्क न पड़ेगा और वह तिलिस्म के राजा कहलाने लायक बने रहेंगे। मैं इस तिलिस्म में आपकी खातिरदारी अच्छी तरह कर सकता हूँ तथा ऐसे-ऐसे तमाशे दिखा सकता हूँ जो आप तिलिस्म तोड़ने की ताकत रखने पर भी बिना मेरी मदद के नहीं देख सकते, हाँ उसका आनन्द लिए बिना उसको चौपट अवश्य कर सकते हैं। बाकी रही यह बात कि आप मुझ पर भरोसा किस तरह कर सकते हैं, इसका जवाब देना अवश्य ही जरा कठिन है।

    इन्द्रजीतसिंह—(कुछ सोचकर) तुम्हारी राजा गोपालसिंह से जान-पहचान है?

    बुड्ढा—अच्छी तरह जान-पहचान है बल्कि हम दोनों में मित्रता है। इन्द्रजीतसिंह—(सिर हिलाकर) यह बात तो मेरे जी में नहीं बैठती।

    बुड्ढा—सो क्यों?

    इन्द्रजीतसिंह—इसलिए कि एक तो यह तिलिस्म तुम्हारा घर है, कहो, हाँ।

    बुड्ढा—जी हाँ।

    इन्द्रजीतसिंह—जब यह तिलिस्म तुम्हारा घर है तो यहाँ का एक-एक कोना तुम्हारा देखा हुआ होगा, बल्कि आश्चर्य नहीं कि राजा गोपालसिंह की बनिस्बत इस तिलिस्म का हाल तुमको ज्यादा मालूम हो।

    बुड्ढा—जी हाँ, बेशक ऐसा ही है।

    इन्द्रजीतसिंह—(मुस्कुराकर) तिस पर राजा गोपालसिंह से तुम्हारी मित्रता है!

    बुड्ढा—अवश्य।

    इन्द्रजीतसिंह—तो तुमने इतने दिनों तक राजा गोपालसिंह को मायारानी के कैदखाने में क्यों सड़ने दिया? इसके जवाब में तुम यह नहीं कह सकते कि मुझे गोपाल सिंह के कैद होने का हाल मालूम न था, या मैं उस सींखचे वाली कोठरी तक नहीं जा सकता था जिसमें वे कैद थे।

    इन्द्रजीतसिंह के इस सवाल ने बुड्ढे को लाजवाब कर दिया और वह सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने समझ लिया कि यह झूठा है और हम लोगों को धोखा देना चाहता है। बहुत थोड़ी देर तक सोचने के बाद बुड्ढे ने सिर उठाया और मुस्कराकर कहा, "वास्तव में आप बड़े होशियार हैं, बातों की उलझन में भुलावा देकर मेरा हाल जानना चाहते हैं, मगर ऐसा नहीं हो सकता, हाँ, जब आप तिलिस्म तोड़ लेंगे तो मेरा परिचय भी आपको मिल जायगा, लेकिन यह बात झूठी नहीं हो सकती कि राजा गोपालसिंह मेरे दोस्त हैं और यह तिलिस्म मेरा घर है।"

    इन्द्रजीतसिंह—आप स्वयं अपने मुँह से झूठे बन रहे हैं, इसमें मेरा क्या कसूर है? यदि गोपालसिंह आपके दोस्त हैं तो आप मेरी बात का पूरा-पूरा जवाब देकर मेरा दिल क्यों नहीं भर देते हैं?

    बुड्ढा—नहीं, आपकी इस बात का जवाब मैं नहीं दे सकता कि गोपालसिंह को मैंने मायारानी के कैदखाने से क्यों नहीं छुड़ाया।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर मेरा दिल कैसे भरेगा और मैं कैसे आप पर विश्वास करूँगा?

    बुड्ढा—इसके लिए मैं दूसरा उपाय कर सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—चाहे कोई भी उपाय कीजिए, परन्तु इस बात का निश्चय होना चाहिए कि यह तिलिस्म आपका घर है और गोपालसिंह आपके मित्र हैं।

    बुड्ढा—आपको तो केवल इसी बात का विश्वास होना चाहिए कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ।

    आनन्दसिंह—नहीं-नहीं, हम लोग और किसी बात का सबूत नहीं चाहते, केवल ये दो बात आप साबित कर दें, जो भाईजी चाहते हैं।

    बुड्ढा—तो इस समय मेरा यहाँ आना व्यर्थ ही हुआ!(चंगेर की तरफ इशारा करके) देखिए आप लोगों के खाने के लिए मैं तरह-तरह की चीजें लेता आया था, मगर अब लौटा ले जाना पड़ा, क्योंकि जब आपको मुझ पर विश्वास ही नहीं है को कब स्वीकार करेंगे।

    इन्द्रजीतसिंह–बेशक, मैं इन चीजों को स्वीकार नहीं कर सकता, जब तक कि मुझे आपकी बातों का विश्वास न हो जाय ।

    आनन्दसिंह–(मुस्कुराकर) क्या आपके लड़के-बाले भी इसी तिलिस्म में रहते हैं ? ये सब चीजें आपके घर की बनी हुई हैं या बाजार से लाये हैं ?

    बुड्ढा–जी मेरे लड़के वाले नहीं हैं न मैं दुनियादार ही हूँ। यहाँ तक कि कोई नौकर भी मेरे पास नहीं है–ये चीजें तो बाहर से खरीद लाया हूँ।

    आनन्दसिंह–तो इससे यह भी जाना जाता है कि आप दिन-रात इस तिलिस्म में नहीं रहते, जब कभी खेल-तमाशा देखने की इच्छा होती होगी तो चले आते होंगे ।

    इन्द्रजीतसिंह–खैर, जो हो । हमें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं, हमारे सामने जब ये अपने सच्चे होने का सबूत लाकर रखेंगे, तब हम इनसे बातें करेंगे और इनके साथ चलकर इनका घर भी देखेंगे।

    इस बात का जवाब उस बुड्ढे ने कुछ न दिया और सिर झुकाये वहाँ से चला गया । इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी यह देखने के लिए कि वह कहां जाता है और क्या करता है, उसके पीछे चले। बुड्ढे ने घूमकर इन दोनों भाइयों को अपने पीछे-पीछे आते देखा, मगर इस बात की उसने कुछ परवाह न की और बराबर चलता गया ।

    हम पहले के किसी बयान में लिख आये हैं कि इस बाग में पश्चिम की तरफ की दीवार के पास एक कुआं था । वह बुड्ढा उसी कुएँ की तरफ चला गया और जब उसके पास पहुँचा तो बिना कुछ रुके एकदम उसके अन्दर कूद पड़ा, इन्द्रजीतसिंह और आनन्द-सिंह भी उस कुएँ के पास पहुँचे और झाँककर देखने लगे, मगर सिवाय अंधकार के और कुछ भी दिखाई न दिया।

    आनन्दसिंह–जब वह बुड्ढा बेधड़क इसके अन्दर कूद गया तो यह कुआँ जरूर किसी तरफ निकल जाने का रास्ता होगा !

    इन्द्रजीतसिंह–मैं भी यही समझता हूँ ।

    आनन्दसिंह–यदि कहिए तो मैं इसके अन्दर जाऊँ ?

    इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, ऐसा करना बड़ी नादानी होगी । तुम इस तिलिस्म का हाल कुछ भी नहीं जानते, हाँ, मैं इसके अन्दर बेखटके जा सकता हूँ क्योंकि तिलिस्मी किताब को पढ़ चुका हूँ और वह मुझे अच्छी तरह याद भी है, मगर मैं नहीं चाहता कि तुम्हें इस जगह अकेला छोड़कर जाऊँ।

    आनन्दसिंह–तो फिर अब क्या करना चाहिए?

    इन्द्रजीतसिंह–बस सबसे पहले तुम इस तिलिस्मी किताब को पढ़ जाओ और इस तरह याद कर जाओ कि पुन: इसके देखने की आवश्यकता न रहे, फिर जो कुछ करना होगा किया जायगा। इस समय इस बुड्ढे का पीछा करना हमें स्वीकार नहीं है।जहाँ तक मैं समझता हूं यह दगाबाज बुड्ढा खुद हम लोगों का पीछा करेगा और फिर हमारे पास आएगा, बल्कि ताज्जुब नहीं कि अबकी दफे कोई नया रंग लावे।

    आनन्दसिंह-जैसी आज्ञा, अच्छा तो वह किताब मुझे दीजिए, मैं भी पढ़ जाऊँ।

    दोनों भाई लौटकर फिर उसी मन्दिर के पास आए और आनन्दसिंह तिलिस्मी किताब को पढ़ने में लौलीन हुए।

    दोनों भाई चार दिन तक उसी बाग में रहे। इस बीच में उन्होंने न तो कोई कार्रवाई की और न कोई तमाशा देखा। हाँ, आनन्दसिंह ने उस किताब को अच्छी तरह पढ़ डाला और सब बातें दिल में बैठा लीं। वह खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब बहुत बड़ी न थी और उसके अन्त में यह बात लिखी हुई थी-

    "निःसन्देह तिलिस्म खोलने वाले का जेहन तेज होगा। उसे चाहिए कि इस किताब को पढ़कर अच्छी तरह याद कर ले क्योंकि इसके पढ़ने से ही मालूम हो जायगा कि यह तिलिस्म खोलने वाले के पास बची न रहेगी, किसी दूसरे काम में लग जायगी,ऐसी अवस्था में अगर इसके अन्दर लिखी हुई कोई बात भूल जायगी तो तिलिस्म खोलने वाले की जान पर आ बनेगी। जो आदमी इस किताब को आदि से अन्त तक याद न कर सके, वह तिलिस्म के काम में कदापि हाथ न लगावे, नहीं तो धोखा खायेगा।"

    तेरहवाँ भाग

    1

    अब हम अपने पाठकों का ध्यान जमानिया के तिलिस्म की तरफ फेरते हैं क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहाँ छोड़े बहुत दिन हो गये और अब बीच में उनका हाल लिखे बिना किस्से का सिलसिला ठीक नहीं होता।

    हम लिख आये हैं कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताब को पढ़कर समझने का भेद आनन्दसिंह को बताया और इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ से चिल्लाने की आवाज आई। दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और फिर यह आवाज सुनाई पड़ी, "अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले, मैं भी यही चाहती हूँ कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूँ। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी खबर कुछ भी न होगी!" इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन और बेताब हो गये और आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि 'कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है' मन्दिर के पीछे की तरफ लपके। आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले गये।

    जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह मन्दिर के पीछे की तरफ पहुँचे तो एक विचित्र वेषधारी मनुष्य पर उनकी निगाह पड़ी। उस आदमी की उम्र अस्सी वर्ष से कम न होगी। उसके सिर, मूँछ-दाढ़ी और भौं इत्यादि के तमाम बाल बर्फ की तरफ सफेद हो रहे थे मगर गर्दन और कमर पर बुढ़ापे ने अपना दखल जमाने से परहेज कर रक्खा था; अर्थात् न तो उसकी गर्दन हिलती थी और न कमर झुकी हुई थी। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ (बहुत कम) पड़ी हुई थीं मगर फिर भी उसका गोरा चेहरा रौनकदार और रौबीला दिखाई पड़ता था और दोनों तरफ के गालों पर अब भी सुर्खी मौजूद थी। एक नहीं बल्कि सारे ही अंगों की किसी-न-किसी हालत से वह अस्सी बरस का बुड्ढा जान पड़ता था परन्तु कमजोरी, पस्त हिम्मती, बुजदिली और आलस्य इत्यादि के धावे से अभी तक उसका शरीर बचा हुआ था।

    उसकी पोशाक राजों-महाराजों की पोशाकों की तरह बेशकीमती तो न थी मगर इस योग्य भी न थी कि उससे गरीबी और कमलियाकत जाहिर होती। रेशमी तथा मोटे कपड़े की पोशाक हर जगह से चुस्त और फौजी अफसरों के ढंग की मगर सादी थी। कमर में एक भुजाली, लगी हुई थी और बाएँ हाथ में सोने की एक बड़ी-सी डलिया या चँगेर लटकाए हुए था। जिस समय वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ देख कर हँसा, उस समय यह भी मालूम हो गया कि उसके मुँह में जवानों की तरह कुल दाँत अभी तक मौजूद हैं और मोती की तरह चमक रहे हैं।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को आशा थी कि वे इस जगह कमलिनी को नहीं तो किसी-न-किसी औरत को अवश्य देखेंगे, मगर आशा के विपरीत एक ऐसे आदमी को देख उन्हें बड़ा ही ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह ने वह तिलिस्मी खंजर, जो मन्दिर के नीचे वाले तहखाने में पाया था, आनन्दसिंह के हाथों में दे दिया और आगे बढ़कर उस आदमी से पूछा, "यहाँ से एक औरत के चिल्लाने की आवाज आई थी, वह कहाँ है?"

    बुड्ढा—(इधर-उधर देख के) यहाँ तो कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—अभी-अभी हम दोनों ने उसकी आवाज सुनी थी।

    बुड्ढा—बेशक सुनी होगी, मगर मैं ठीक कहता हूँ कि यहाँ पर कोई औरत नहीं है।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर वह आवाज किसकी थी ?

    बुड्ढा—वह आवाज मेरी ही थी।

    आनन्दसिंह—(सिर हिला कर) कदापि नहीं।

    इन्द्रजीतसिंह—मुझे इस बात का विश्वास नहीं हो सकता। आपकी आवाज वैसी नहीं है जैसी वह आवाज थी।

    बुड्ढा—जो मैं कहता हूँ उसे आप विश्वास करें या यह बतावें कि आपको मेरी बात का विश्वास क्योंकर होगा? क्या मैं फिर उसी तरह से बोलूँ?

    इन्द्रजीतसिंह—हाँ यदि ऐसा हो तो हम लोग आपकी बात मान सकते हैं।

    बुड्ढा—(उसी तरह से और वे ही शब्द अर्थात्—'अच्छा-अच्छा तू मेरा सिर काट ले'—इत्यादि बोल कर) देखिये वे ही शब्द और उसी ढंग की आवाज है या नहीं?

    आनन्दसिंह—(ताज्जुब से) बेशक वही शब्द और ठीक वैसी ही आवाज है।

    इन्द्रजीतसिंह—मगर इस ढंग से बोलने की आपको क्या आवश्यकता थी?

    बुड्ढा—मैं इस तिलिस्म में कल से चारों तरफ घूम-घूमकर आपको खोज रहा हूँ। सैकड़ों आवाजें दीं और बहुत उद्योग किया मगर आप लोगों से मुलाकात न हुई। तब मैंने सोचा कदाचित् आप लोगों ने यह सोच लिया हो कि इस तिलिस्म के कारखाने की आवाज का उत्तर देना उचित नहीं है और इसी से आप मेरी आवाज पर ध्यान नहीं देते। आखिर मैंने यह तरकीब निकाली और इस ढंग से बोला जिसमें सुनने के साथ ही आप बेताब हो जायँ और स्वयं ढूँढ़ कर मुझसे मिलें, और आखिर जो कुछ मैंने सोचा था वही हुआ।

    इन्द्रजीतसिंह—आप कौन हैं और मुझे यों बुला रहे थे? आनन्दसिंह—और इस तिलिस्म के अन्दर आप कैसे आए?

    बुड्ढा—मैं एक मामूली आदमी हूँ और आपका एक अदना गुलाम हूँ। इसी तिलिस्म में रहता हूँ और यही तिलिस्म मेरा घर है। आप लोग इस तिलिस्म में आए हैं तो मेरे घर में आए हैं अतएव आप लोगों की मेहमानी और खातिरदारी करना मेरा धर्म है इसीलिए मैं आप लोगों को ढूँढ़ रहा था।

    इन्द्रजीतसिंह—अगर आप इसी तिलिस्म में रहते हैं और यह तिलिस्म आपका घर है तो हम लोगों को आप दोस्ती की निगाह से नहीं देख सकते, क्योंकि हम लोग आपका घर अर्थात् यह तिलिस्म तोड़ने के लिए यहाँ आए हैं। और कोई आदमी किसी ऐसे की खातिर नहीं कर सकता जो उसका मकान तोड़ने आया हो, तब हम क्योंकर विश्वास कर सकते हैं कि आप हमें अच्छी निगाह से देखते होंगे या हमारे साथ दगा या फरेब न करेंगे?

    बुड्ढा—आपका खयाल बहुत ठीक है, ऐसे समय पर इन सब बातों को सोचना और विचार करना बुद्धिमानी का काम है, परन्तु इस बात का आप दोनों भाइयों को विश्वास करना ही होगा कि मैं आपका दोस्त हूँ। भला सोचिए तो सही कि मैं दुश्मनी करके आपका क्या बिगाड़ सकता हूँ? हाँ, आपकी मेहरबानी से अवश्य फायदा उठा सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—हमारी मेहरबानी से आपका क्या फायदा होगा और आप इस तिलिस्म के अन्दर हमारी क्या खातिर करेंगे? इसके अतिरिक्त यह भी बतलाइए कि क्या सबूत पाकर हम लोग आप को अपना दोस्त समझ लेंगे और आपकी बात पर विश्वास कर लेंगे?

    बुड्ढा—आपकी मेहरबानी से मुझे बहुत-कुछ फायदा हो सकता है। यदि आप चाहेंगे तो मेरे घर को अर्थात् इस तिलिस्म को बिल्कुल चौपट न करेंगे। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप इस तिलिस्म को न तोड़ें और इससे फायदा न उठाएँ, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि इस तिलिस्म को उतना ही तोड़िए जितने से आपको गहरा फायदा पहुँचे और कम फायदे के लिए व्यर्थ उन मजेदार चीजों को चौपट न कीजिए जिनके बनाने में बड़े-बड़े बुद्धिमानों ने वर्षों मेहनत की है और जिसका तमाशा देखकर बड़े-बड़े होशियारों की अक्ल भी चकरा सकती है। अगर इसका थोड़ा-सा हिस्सा आप छोड़ दें तो मेरा खेल-तमाशा बना रहेगा और इसके साथ ही साथ आपके दोस्त गोपालसिंह की इज्जत और नामवरी में भी फर्क न पड़ेगा और वह तिलिस्म के राजा कहलाने लायक बने रहेंगे। मैं इस तिलिस्म में आपकी खातिरदारी अच्छी तरह कर सकता हूँ तथा ऐसे-ऐसे तमाशे दिखा सकता हूँ जो आप तिलिस्म तोड़ने की ताकत रखने पर भी बिना मेरी मदद के नहीं देख सकते, हाँ उसका आनन्द लिए बिना उसको चौपट अवश्य कर सकते हैं। बाकी रही यह बात कि आप मुझ पर भरोसा किस तरह कर सकते हैं, इसका जवाब देना अवश्य ही जरा कठिन है।

    इन्द्रजीतसिंह—(कुछ सोचकर) तुम्हारी राजा गोपालसिंह से जान-पहचान है?

    बुड्ढा—अच्छी तरह जान-पहचान है बल्कि हम दोनों में मित्रता है। इन्द्रजीतसिंह—(सिर हिलाकर) यह बात तो मेरे जी में नहीं बैठती।

    बुड्ढा—सो क्यों?

    इन्द्रजीतसिंह—इसलिए कि एक तो यह तिलिस्म तुम्हारा घर है, कहो, हाँ।

    बुड्ढा—जी हाँ।

    इन्द्रजीतसिंह—जब यह तिलिस्म तुम्हारा घर है तो यहाँ का एक-एक कोना तुम्हारा देखा हुआ होगा, बल्कि आश्चर्य नहीं कि राजा गोपालसिंह की बनिस्बत इस तिलिस्म का हाल तुमको ज्यादा मालूम हो।

    बुड्ढा—जी हाँ, बेशक ऐसा ही है।

    इन्द्रजीतसिंह—(मुस्कुराकर) तिस पर राजा गोपालसिंह से तुम्हारी मित्रता है!

    बुड्ढा—अवश्य।

    इन्द्रजीतसिंह—तो तुमने इतने दिनों तक राजा गोपालसिंह को मायारानी के कैदखाने में क्यों सड़ने दिया? इसके जवाब में तुम यह नहीं कह सकते कि मुझे गोपाल सिंह के कैद होने का हाल मालूम न था, या मैं उस सींखचे वाली कोठरी तक नहीं जा सकता था जिसमें वे कैद थे।

    इन्द्रजीतसिंह के इस सवाल ने बुड्ढे को लाजवाब कर दिया और वह सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने समझ लिया कि यह झूठा है और हम लोगों को धोखा देना चाहता है। बहुत थोड़ी देर तक सोचने के बाद बुड्ढे ने सिर उठाया और मुस्कराकर कहा, "वास्तव में आप बड़े होशियार हैं, बातों की उलझन में भुलावा देकर मेरा हाल जानना चाहते हैं, मगर ऐसा नहीं हो सकता, हाँ, जब आप तिलिस्म तोड़ लेंगे तो मेरा परिचय भी आपको मिल जायगा, लेकिन यह बात झूठी नहीं हो सकती कि राजा गोपालसिंह मेरे दोस्त हैं और यह तिलिस्म मेरा घर है।"

    इन्द्रजीतसिंह—आप स्वयं अपने मुँह से झूठे बन रहे हैं, इसमें मेरा क्या कसूर है? यदि गोपालसिंह आपके दोस्त हैं तो आप मेरी बात का पूरा-पूरा जवाब देकर मेरा दिल क्यों नहीं भर देते हैं?

    बुड्ढा—नहीं, आपकी इस बात का जवाब मैं नहीं दे सकता कि गोपालसिंह को मैंने मायारानी के कैदखाने से क्यों नहीं छुड़ाया।

    इन्द्रजीतसिंह—तो फिर मेरा दिल कैसे भरेगा और मैं कैसे आप पर विश्वास करूँगा?

    बुड्ढा—इसके लिए मैं दूसरा उपाय कर सकता हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह—चाहे कोई भी उपाय कीजिए, परन्तु इस बात का निश्चय होना चाहिए कि यह तिलिस्म आपका घर है और गोपालसिंह आपके मित्र हैं।

    बुड्ढा—आपको तो केवल इसी बात का विश्वास होना चाहिए कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ।

    आनन्दसिंह—नहीं-नहीं, हम लोग और किसी बात का सबूत नहीं चाहते, केवल ये दो बात आप साबित कर दें, जो भाईजी चाहते हैं।

    बुड्ढा—तो इस समय मेरा यहाँ आना व्यर्थ ही हुआ!(चंगेर की तरफ इशारा करके) देखिए आप लोगों के खाने के लिए मैं तरह-तरह की चीजें लेता आया था, मगर अब लौटा ले जाना पड़ा, क्योंकि जब आपको मुझ पर विश्वास ही नहीं है को कब स्वीकार करेंगे।

    इन्द्रजीतसिंह–बेशक, मैं इन चीजों को स्वीकार नहीं कर सकता, जब तक कि मुझे आपकी बातों का विश्वास न हो जाय ।

    आनन्दसिंह–(मुस्कुराकर) क्या आपके लड़के-बाले भी इसी तिलिस्म में रहते हैं ? ये सब चीजें आपके घर की बनी हुई हैं या बाजार से लाये हैं ?

    बुड्ढा–जी मेरे लड़के वाले नहीं हैं न मैं दुनियादार ही हूँ। यहाँ तक कि कोई नौकर भी मेरे पास नहीं है–ये चीजें तो बाहर से खरीद लाया हूँ।

    आनन्दसिंह–तो इससे यह भी जाना जाता है कि आप दिन-रात इस तिलिस्म में नहीं रहते, जब कभी खेल-तमाशा देखने की इच्छा होती होगी तो चले आते होंगे ।

    इन्द्रजीतसिंह–खैर, जो हो । हमें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं, हमारे सामने जब ये अपने सच्चे होने का सबूत लाकर रखेंगे, तब हम इनसे बातें करेंगे और इनके साथ चलकर इनका घर भी देखेंगे।

    इस बात का जवाब उस बुड्ढे ने कुछ न दिया और सिर झुकाये वहाँ से चला गया । इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी यह देखने के लिए कि वह कहां जाता है और क्या करता है, उसके पीछे चले। बुड्ढे ने घूमकर इन दोनों भाइयों को अपने पीछे-पीछे आते देखा, मगर इस बात की उसने कुछ परवाह न की और बराबर चलता गया ।

    हम पहले के किसी बयान में लिख आये हैं कि इस बाग में पश्चिम की तरफ की दीवार के पास एक कुआं था । वह बुड्ढा उसी कुएँ की तरफ चला गया और जब उसके पास पहुँचा तो बिना कुछ रुके एकदम उसके अन्दर कूद पड़ा, इन्द्रजीतसिंह और आनन्द-सिंह भी उस कुएँ के पास पहुँचे और झाँककर देखने लगे, मगर सिवाय अंधकार के और कुछ भी दिखाई न दिया।

    आनन्दसिंह–जब वह बुड्ढा बेधड़क इसके अन्दर कूद गया तो यह कुआँ जरूर किसी तरफ निकल जाने का रास्ता होगा !

    इन्द्रजीतसिंह–मैं भी यही समझता हूँ ।

    आनन्दसिंह–यदि कहिए तो मैं इसके अन्दर जाऊँ ?

    इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, ऐसा करना बड़ी नादानी होगी । तुम इस तिलिस्म का हाल कुछ भी नहीं जानते, हाँ, मैं इसके अन्दर बेखटके जा सकता हूँ क्योंकि तिलिस्मी किताब को पढ़ चुका हूँ और वह मुझे अच्छी तरह याद भी है, मगर मैं नहीं चाहता कि तुम्हें इस जगह अकेला छोड़कर जाऊँ।

    आनन्दसिंह–तो फिर अब क्या करना चाहिए?

    इन्द्रजीतसिंह–बस सबसे पहले तुम इस तिलिस्मी किताब को पढ़ जाओ और इस तरह याद कर जाओ कि पुन: इसके देखने की आवश्यकता न रहे, फिर जो कुछ करना होगा किया जायगा। इस समय इस बुड्ढे का पीछा करना हमें स्वीकार नहीं है।जहाँ तक मैं समझता हूं यह दगाबाज बुड्ढा खुद हम लोगों का पीछा करेगा और फिर हमारे पास आएगा, बल्कि ताज्जुब नहीं कि अबकी दफे कोई नया रंग लावे।

    आनन्दसिंह-जैसी आज्ञा, अच्छा तो वह किताब मुझे दीजिए, मैं भी पढ़ जाऊँ।

    दोनों भाई लौटकर फिर उसी मन्दिर के पास आए और आनन्दसिंह तिलिस्मी किताब को पढ़ने में लौलीन हुए।

    दोनों भाई चार दिन तक उसी बाग में रहे। इस बीच में उन्होंने न तो कोई कार्रवाई की और न कोई तमाशा देखा। हाँ, आनन्दसिंह ने उस किताब को अच्छी तरह पढ़ डाला और सब बातें दिल में बैठा लीं। वह खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब बहुत बड़ी न थी और उसके अन्त में यह बात लिखी हुई थी-

    "निःसन्देह तिलिस्म खोलने वाले का जेहन तेज होगा। उसे चाहिए कि इस किताब को पढ़कर अच्छी तरह याद कर ले क्योंकि इसके पढ़ने से ही मालूम हो जायगा कि यह तिलिस्म खोलने वाले के पास बची न रहेगी, किसी दूसरे काम में लग जायगी,ऐसी अवस्था में अगर इसके अन्दर लिखी हुई कोई बात भूल जायगी तो तिलिस्म खोलने वाले की जान पर आ बनेगी। जो आदमी इस किताब को आदि से अन्त तक याद न कर सके, वह तिलिस्म के काम में कदापि हाथ न लगावे, नहीं तो धोखा खायेगा।"

    2

    दिन लगभग पहर भर के चढ़ चुका है। दोनों कुमार स्नान-ध्यान-पूजा से छुट्टी पाकर तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाने के लिए जा ही रहे थे कि रास्ते में फिर उसी बुड्ढे से मुलाकात हुई। बुड्ढे ने झुककर दोनों कुमारों को सलाम किया और अपनी जेब में से एक चिट्ठी निकालकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथ में देकर बोला, "देखिए राजा गोपालसिंह के हाथ को सिफारिशी चिट्ठी ले आया हूँ, इसे पढ़कर तब कहिए कि मुझ पर भरोसा करने में अब आपको क्या उज्र है ?" कुमार ने चिट्ठी पढ़ी और आनन्दसिंह को दिखाने के बाद हँसकर उस बुड्ढे की तरफ देखा।

    बुड्ढा—(मुस्कुराकर) कहिए, अब आप क्या कहते हैं ? क्या इस पत्र को आप जाली या बनावटी समझते हैं ?

    इन्द्रजीतसिंह–नहीं-नहीं, यह चिट्ठी जाली नहीं हो सकती, मगर देखो तो सही

    –इस (आनन्दसिंह के हाथ से चिट्ठी लेकर और चिट्ठी में लिखे हुए एक निशान को दिखाकर) इस निशान को तुम पहचानते हो या इसका मतलब तुम जानते हो?

    वुड्ढा—(निशान देखकर) इसका मतलव तो आप जानिए या गोपालसिंह जानें मुझे क्या मालूम,यदि आप बतलाइए तो…

    इन्द्रजीतसिंह–इसका मतलब यही है कि यह चिट्ठी बेशक सच्ची है, मगर इसमें लिखा है उस पर ध्यान न देना!

    बुड्ढा–क्या गोपालसिंह ने आपसे कहा था कि हमारी लिखी जिस चिट्ठी पर ऐसा निशान हो, उसकी लिखावट पर ध्यान न देना ?

    इन्द्रजीतसिंह–हाँ, मुझसे उन्होंने ऐसा ही कहा था, इसलिए जाना जाता है कि यह चिट्ठी उन्होंने अपनी इच्छा से नहीं लिखी, बल्कि जबर्दस्ती किये जाने के सबब से लिखी है।

    बुड्ढा–नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता, आप भूलते हैं, उन्होंने आपसे इस निशान के बारे में कोई दूसरी बात कही होगी।

    कुमार-नहीं-नहीं, मैं ऐसा भुलक्कड़ नहीं हूँ। अच्छा आप ही बताइये, यह निशान उन्होंने क्यों बनाया ?

    बुड्ढा–यह निशान उन्होंने इसलिए स्थिर किया है कि कोई ऐयार उनके दोस्तों को उनकी लिखावट का धोखा न दे सके। (कुछ सोचकर और हँसकर) मगर कुमार,तुम भी बड़े बुद्धिमान और मसखरे हो !

    कुमार–कहो, अब मैं तुम्हारी दाढ़ी नोंच लूं ?

    आनन्द्रसिंह–(हंसकर और ताली बजाकर) या मैं नोंच लूं ?

    बुड्ढा–(हँसते हुए) अब आप लोग तकलीफ न कीजिए मैं स्वयं इस दाढ़ी को नोंचकर अलग फेंक देता हूँ !

    'इतना कह उस बुड्ढे ने अपने चेहरे से दाढ़ी अलग कर दी और इन्द्रजीतसिंह के गले से लिपट गया।

    पाठक, यह बुड्ढा वास्तव में राजा गोपाल सिंह थे जो चाहते थे कि सूरत बदल-कर इस तिलिस्म में कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की मदद करें, मगर कुमार की चालाकियों ने उनकी हिम्मत लडने न दी और लाचार होकर उन्हें प्रकट होना ही पड़ा।

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह-आनन्द सिंह दोनों भाई राजा गोपालसिंह से गले मिले और उनका हाथ पकड़े हुए नहर के किनारे गये जहाँ पत्थर की एक चट्टान पर बैठकर तीनों आदमी बातचीत करने लगे।

    3

    अब हम रोहतासगढ़ का हाल लिखते हैं। जिस समय बाहर यह खबर आई कि लक्ष्मीदेवी की तबीयत ठीक हो गई और वे सब पर्दे के पास आकर बैठ गईं उस समय राजा वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखा और कहा, "लक्ष्मीदेवी से पूछना चाहिए कि उसकी तबीयत यह कलमदान देखने के साथ ही क्यों खराब हो गई ?"

    इसके पहले कि तेजसिंह राजा वीरेन्द्रसिंह की बात का जवाब दें या उठने का इरादा करें, जिन्न ने कहा, "आश्चर्य है कि आप इसके लिए जल्दी करते हैं।"

    जिन्न की बात सुन राजा वीरेन्द्रसिंह मुस्कुराकर चुप हो रहे और भूतनाथ का कागज पढ़ने के लिए तेजसिंह को इशारा किया। आज भूतनाथ का मुकदमा फैसला होने वाला है इसलिए भूतनाथ और कमला का रंज और तरदुद तो वाजिब ही है मगर इस समय भूतनाथ से सौगुनी बुरी हालत बलभद्रसिंह की हो रही है। चाहे सभी का ध्यान उस कागज के मुछे की तरफ लगा हो जिसे अब तेजसिंह पढ़ना चाहते हैं मगर बलभद्र सिंह का खयाल किसी दूसरी तरफ है। उसके चेहरे पर बदहवासी और परेशानी छाई है और वह छिपी निगाहों से चारों तरफ इस तरह देख रहा है जैसे कोई मुजरिम निकल भागने के लिए रास्ता ढूंढ़ता हो, मगर भैरोंसिंह को मुस्तैदी के साथ अपने ऊपर तैनात पाकर सिर नीचा कर लेता है।

    हम यह लिख चुके हैं कि तेजसिंह पहले उन चिट्ठियों को पढ़ गये जिनका हाल हमारे पाठकों को मालूम हो चुका है, अब तेजसिंह ने उसके आगे वाला पत्र पढ़ना आरंभ किया जिसमें यह लिखा हुआ था-

    "मेरे प्यारे दोस्त,

    आज मैं बलभद्रसिंह की जान ले ही चुका था मगर दारोगा साहब ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया। मैंने सोचा था कि बलभद्रसिंह के खतम हो जाने पर लक्ष्मीदेवी की शादी रुक जायगी और उसके बदले में मुन्दर को भरती कर देने का अच्छा मौका मिलेगा मगर दारोगा साहब की यह राय न ठहरी। उन्होंने कहा कि गोपालसिंह को भी लक्ष्मी- देवी के साथ शादी करने की जिद हो गई है ऐसी अवस्था में यदि बलभद्रसिंह को तुम मार डालोगे तो राजा गोपालसिंह दूसरी जगह शादी करने के बदले कुछ दिन अटक जाना मुनासिब समझेंगे और शादी का दिन टल जाना अच्छा नहीं है, इससे यही उचित होगा कि बलभद्रसिंह को कुछ न कहा जाय, लक्ष्मीदेवी की माँ को मरे ग्यारह महीने हो ही चुके हैं, महीना-भर और बीत जाने दो, जो कुछ करना होगा शादी वाले दिन किया जायगा। शादी वाले दिन जो कुछ किया जायगा उसका बन्दोबस्त भी हो चुका है। उस दिन मौके पर लक्ष्मीदेवी गायब कर दी जायगी और उसकी जगह मुन्दर बैठा दी जायगी और उसके कुछ देर पहले ही बलभद्रसिंह ऐसी जगह पहुँचा दिया जायगा जहाँ से पुनः लौट आने की आशा नहीं है, बस, फिर किसी तरह का खटका न रहेगा। यह सब तो हुआ मगर आपने अभी तक फुटकर खर्च के लिए रुपए न भेजे। जिस तरह हो सके उस तरह बन्दोबस्त कीजिए और रुपए भेजिये, नहीं तो सब काम चौपट हो जायेगा, आगे आपको अख्तियार है।

    वही भूतनाथ"

    वीरेन्द्रसिंह–(भूतनाथ की तरफ देख के) क्यों भूतनाथ, यह चिट्ठी तुम्हारे हाथ की लिखी हुई है ?

    भूतनाथ–(हाथ जोड़कर) जी हाँ महाराज, यह कागज मेरे हाथ का लिखा हुआ है।

    वीरेन्द्रसिंह–तुमने यह पत्र हेलासिंह के पास भेजा था? भूतनाथ–जी नहीं।

    वीरेन्द्रसिंह–तुम अभी कह चुके हो कि यह पत्र मेरे हाथ का लिखा है और फिर कहते हो कि नहीं!

    भूतनाथ–जी मैं यह नहीं कहता कि यह कागज मेरे हाथ का लिखा हुआ नहीं है बल्कि मैं यह कहता हूँ कि यह पत्र हेलासिंह के पास मैंने नहीं भेजा था।

    वीरेन्द्रसिंह-तब किसने भेजा था?

    भूतनाथ–(बलभद्रसिंह की तरफ इशारा करके) इसने भेजा था और इसी ने अपना नाग भूतनाथ रक्खा था क्योंकि यह वास्तव में लक्ष्मीदेवी का बाप बलभद्रसिंह नहीं है।

    वीरेन्द्रसिंह–अगर यह चिट्ठी (बलभद्रसिंह की तरफ इशारा करके) इन्होंने हेलासिंह पास भेजी थी तो फिर तुमने इसे अपने हाथ से क्यों लिखा? क्या तुम इनके नौकर या मुहर्रिर थे ?

    भूतनाथ–जी नहीं, इसका कुछ दूसरा ही सबब है, मगर इसके पहले कि मैं आपकी बातों का पूरा-पूरा जवाब दूं, इस नकली बलभद्रसिंह से दो-चार बातें पूछने की आज्ञा चाहता हूँ।

    वीरेन्द्रसिंह–क्या हर्ज है, जो कुछ पूछना चाहते हो, पूछो।

    भूतनाथ—(बलभद्रसिंह की तरफ देख के) इस कागज के मुझे को तुम शुरू से आखिर तक पढ़ चुके हो या नहीं?

    बलभद्रसिंह–हाँ, पढ़ चुका हूँ।

    भूतनाथ–जो चिट्ठी अभी पढ़ी गई है इसके आगे वाली चिट्ठियाँ जो अभी पढ़ी नहीं गईं, तुम्हारे इस मुकदमे से कुछ सम्बन्ध रखती हैं?

    बलभद्र–नहीं।

    भूतनाथ–सो क्यों?

    बलभद्र–आगे की चिट्ठियों का मतलब हमारी समझ में नहीं आता।

    भूतनाथ–तो अब आगे वाली चिट्ठियों को पढ़ने की कोई आवश्यकता न रही।

    बलभद्र–तेरा कसूर साबित करने के लिए क्या इतनी चिट्ठियाँ कम हैं जो पढ़ी जा चुकी हैं?

    भूतनाथ–बहुत हैं बहुत हैं, अच्छा तो अब मैं यह पूछता हूँ कि लक्ष्मीदेवी के शादी के दिन तुम कैद कर लिए गए थे?

    बलभद्रसिंह–हाँ।

    भूतनाथ–उस समय बालासिंह कहाँ था और अब बालासिंह कहाँ है?

    भूतनाथ के इस सवाल ने बलभद्रसिंह की अवस्था फिर बदल दी। वह और भी घबराया-सा होकर वोला, "इन सब बातों के पूछने से क्या फायदा निकलेगा?" इतना कहकर उसने दारोगा और मायारानी की तरफ देखा। मालूम होता था कि बालासिंह के नाम ने मायारानी और दारोगा पर भी अपना असर किया जो मायारानी के बगल ही में एक खम्भे के साथ बँधा हुआ था। वीरेन्द्रसिंह और उनके बुद्धिमान ऐयारों ने भी बलभद्र और दारोगा तथा मायारानी के चेहरे और उन तीनों की इस देखा-देखी पर गौर किया और वीरेन्द्रसिंह ने मुस्कुराकर जिन्न की तरफ देखा।

    जिन्न–मैं समझता हूँ कि इस बलभद्रसिंह के साथ अब आपको बेमुरोवती करनी होगी।

    वीरेन्द्रसिंह–बेशक ! मगर क्या आप कह सकते हैं कि यह मुकदमा आज फैसला हो जायगा?

    जिन्न–नहीं, यह मुकदमा इस लायक नहीं है कि फैसला हो जाय। यदि आप इस मुकदमे की कलई अच्छी तरह खोलना चाहते हैं तो इस समय इसे रोक दीजिए और भूतनाथ को छोड़कर आज्ञा दीजिए कि महीने-भर के अन्दर जहाँ से हो सके वहाँ से असली बलभद्रसिंह को खोज लावे नहीं तो उसके लिए बेहतर न होगा।

    वीरेन्द्रसिंह–भूतनाथ को किसकी जमानत पर छोड़ दिया जाय?

    जिन्न–मेरी जमानत पर।

    वीरेन्द्रसिंह–जब आप ऐसा कहते हैं तो हमें कोई उज्र नहीं है यदि लक्ष्मीदेवी और लाड़िली तथा कमलिनी भी इसे स्वीकार करें।

    जिन्न–उन सब को भी कोई उज्र नहीं होना चाहिए।

    इतने में पर्दे के अन्दर से कमलिनी ने कहा, "हम लोगों को कोई उज्र न होगा, हमारे महाराज को अधिकार है जो चाहें करें !"

    वीरेन्द्रसिंह–(जिन्न की तरफ देख के) तो फिर कोई चिन्ता नहीं, हम आपकी बात मान सकते हैं। (भूतनाथ से) अच्छा तुम यह तो बताओ कि जब वह चिट्ठी तुम्हारे ही हाथ की लिखी हुई है तो तुम इसे हेलासिंह के पास भेजने से क्यों इनकार करते हो?

    भूतनाथ–इसका हाल भी उसी समय मालूम हो जायगा जब मैं असली बलभद्रसिंह को छुड़ाकर ले आऊँगा।

    जिन्न–आप इस समय इस मुकदमे को रोक ही दीजिए, जल्दी न कीजिए, क्योंकि इसमें अभी तरह-तरह के गुल खिलने वाले हैं।

    बलभद्र–नहीं-नहीं, भूतनाथ को छोड़ना उचित नहीं होगा, यह बड़ा भारी बेईमान जालियांँ धूर्त और बदमाश है। यदि इस समय यह छूटकर चल देगा, तो फिर कदापि न आवेगा।

    तेजसिंह–(घुड़ककर बलभद्र से) बस, चुप रहो, तुमसे इस बारे में राय नहीं मांगी जाती।

    बलभद्रसिंह–(खड़े होकर) तो फिर मैं जाता हूँ, जिस जगह ऐसा अन्याय हो वहाँ ठहरना भले आदमियों का काम नहीं।

    बलभद्रसिंह उठकर खड़ा हुआ ही था कि भैरोंसिंह ने उसकी कलाई पकड़ ली और कहा, "ठहरिये, आप भले आदमी हैं, आपको क्रोध न करना चाहिए, अगर ऐसा कीजिएगा तो भलमनसी में बट्टा लग जायगा। यदि आपको हम लोगों की सोहबत अच्छी नहीं मालूम पड़ती तो आप मायारानी और दारोगा की सोहबत में रक्खे जायेंगे, जिसमें आप खुश रहें हम लोग वही करेंगे।"

    भैरोंसिंह ने बलभद्रसिंह की कलाई पकड़ के कोई नस ऐसी दबाई कि वह बेताब हो गया, उसे ऐसा मालूम हुआ मानो उसके तमाम बदन की ताकत किसी ने खींच ली हो, और वह बिना कुछ बोले इस तरह बैठ गया जैसे कोई गिर पड़ता है। उसकी यह अवस्था देख सभी ने मुस्करा दिया।

    जिन्न–(वीरेन्द्रसिंह से) अब मैं आपसे और तेजसिंहजी से दो-चार बातें एकान्त में कहना चाहता हूँ।

    वीरेन्द्रसिंह–हमारी भी यही इच्छा है।

    इतना कहकर वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह देवीसिंह से कुछ इशारा करके उठ खड़े हुए और दूसरे कमर की ओर चले गये।

    राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और जिन्न आधे घण्टे तक एकान्त में बैठकर बातचीत करते रहे। सभी को जिन्न के विषय में जितना आश्चर्य था उतना ही इस बात का निश्चय भी हो गया था कि जिन्न का हाल राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और भैरोंसिंह को मालूम हो गया है परन्तु किसी से न कहेंगे और न कोई उनसे पूछ सकेगा।

    आधे घण्टे के बाद तीनों आदमी कमरे के बाहर निकलकर अपने-अपने ठिकाने आ पहुंचे और तेजसिंह ने देवीसिंह की तरफ देख के कहा, "भूतनाथ को छोड़ देने की आज्ञा हुई है। तुम भूतनाथ और जिन्न के साथ जाओ और हिफाजत के साथ पहाड़ के नीचे पहुँचाकर लौट आओ।"

    इतना सुनते ही देवीसिंह ने भूतनाथ की हथकड़ी-बेड़ी खोल दी और उसको तथा जिन्न को साथ लिये वहाँ से बाहर चले गये। इसके बाद तेजसिंह पर्दे के अन्दर गये और लक्ष्मीदेवी, कमलिनी तथा लाडिली को कुछ समझा-बुझाकर बाहर निकल आए। बलभद्र- सिंह को खातिरदारी और चौकसी के साथ हिफाजत में रखने के लिए भैरोंसिंह के हवाले किया गया होगा और बाकी कैदियों को कैदखाने में पहुँचाने की आज्ञा लेकर राजा वीरेन्द्रसिंह बाहर चले आए तथा अदालत बरखास्त कर दी गई।

    4

    जब जिन्न और भूतनाथ को पहाड़ के नीचे पहुँचाकर देवीसिंह चले गए तो वे दोनों आपस में नीचे लिखी बातें करते हुए पूरब की तरफ रवाना हुए–

    भूतनाथ–निःसन्देह आपने मुझ पर बड़ी कृपा की, यदि आज आप मेरे सहायक न होते तो मैं तबाह हो चुका था।

    जिन्न–सो सब तो ठीक है, मगर देखो, आज हमने तुमको अपनी जमानत पर इसलिए छुड़ा दिया है कि तुम जिस तरह हो, असली बलभद्रसिंह को खोज निकालो और उन्हें अपने साथ लेकर राजा वीरेन्द्रसिंह के पास हाजिर हो जाओ, लेकिन ऐसा न करना कि बलभद्रसिंह का पता लगाने के बदले तुम स्वयं अन्तर्धान हो जाओ और हमको राजा वीरेन्द्रसिंह के आगे झूठा करो।

    भूतनाथ–नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। यदि मुझे नेकनामी के साथ राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार बनने का शौक न होता तो मैं इन बखेड़ों में क्यों पड़ता ? बिना कुछ पाये उनका इतना काम क्यों करता? रुपये की मुझे कुछ परवाह न थी, मैं किसी दूसरे देश में चला जाता और खुशी के साथ जिन्दगी बिताता। मगर नहीं, मुझे राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ रहने का बड़ा उत्साह है और जिस दिन से राजा गोपालसिंह का पता लगा है, उसी दिन से मैं उनके दुश्मनों की खोज में लगा हूँ और बहुत सी बातों का पता लगा भी चुका हूँ।

    जिन्न–(बात काटकर)तो क्या तुमको इस बात की खबर न थी कि मायारानी ने गोपालसिंह को कैद करके किसी गुप्त स्थान में रख दिया है ?

    भूतनाथ–नहीं, बिल्कुल नहीं।

    जिन्न–और इस बात की भी खबर न थी कि मायारानी वास्तव में लक्ष्मीदेवी नहीं है ?

    भूतनाथ–इस बात को मैं अच्छी तरह जानता था।

    जिन्न–-तो तुमने गोपालसिंह के आदमियों को इसकी खबर क्यों नहीं की ?

    भूतनाथ–-मैंने इसलिए मायारानी का असल हाल किसी से नहीं कहा कि मुझे राजा गोपालसिंह के मरने का पूरा-पूरा विश्वास हो चुका था और उसके पहले मैं रणधीर- सिंहजी के यहाँ नौकर था, तब मुझे दूसरे राज्य के भले-बुरे कामों से मतलब ही क्या था?

    जिन्न–तुमसे और हेलासिंह से जब दोस्ती थी तब तुम किसके नौकर थे?

    भूतनाथ–-मुझसे और हेलासिंह से कभी दोस्ती थी ही नहीं ! मैं तो आपसे कंद- खाने के अन्दर ही कह चुका हूं कि राजा गोपालसिंह के छूटने के बाद मैंने उन कागजों का पता लगाया है जो इस समय मेरे ही साथ दुश्मनी कर रहे हैं और

    जिन्न–हाँ-हाँ, जो कुछ तुमने कहा था मुझे बखूबी याद है। अच्छा, अब यह बताओ कि इस समय तुम कहाँ जाओगे और क्या करोगे?

    भूतनाथ–मैं खुद नहीं जानता कि कहाँ जाऊँगा और क्या करूँगा, बल्कि यह बात मैं आप ही से पूछने वाला था।

    जिन्न–(ताज्जुब से) क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि बलभद्रसिंह को किसने कैद कैद किया और अब वह कहाँ है ?

    भूतनाथ-–इतना तो मैं जानता हूँ कि बलभद्रसिंह को मायारानी के दारोगा ने किया था मगर यह नहीं मालूम कि इस समय वह कहाँ है।

    जिन्न-–अगर ऐसा ही है तो कमलिनी के तिलिस्मी मकान के बाहर तुमने तेजसिंह से क्यों कहा था कि मेरे साथ कोई चले तो मैं असली बलभद्रसिंह को दिखा दूंगा? इस बात से तो तुम खुद झूठे साबित होते हो!

    भूतनाथ–जी हाँ, बेशक मैंने नादानी की जो ऐसा कहा, मगर मुझे इस बात का निश्चय हो चुका है कि बलभद्रसिंह अभी तक जीता है और उसे तिलिस्मी दारोगा ने

    च० स०-4-1

    कैद कर लिया था।

    जिन्न–इसी से तो मैं पूछता हूँ कि अब तुम कहाँ जाओगे और क्या करोगे?

    भूतनाथ–अगर वह दारोगा मेरे काबू में होता तब तो मैं सहज ही में पता लगा लेता मगर अब मुझे इसके लिए बहुत कुछ उद्योग करना होगा, तथापि इस समय मैं जमानिया में राजा गोपालसिंह के पास जाता हूँ, यदि उन्होंने मेरी मदद की तो अपना काम बहुत जल्द कर सकूँगा, मगर आशा नहीं कि वे मेरी मदद करेंगे, क्योंकि जब वे मेरे मुकदमे का हाल सुनेंगे तो जरूर मुझको नालायक बनायेंगे, (कुछ सोचकर) अभी तक यह भी मुझे मालूम नहीं हुआ कि आप कौन हैं, अगर जानता तो कहता कि राजा गोपालसिंह के नाम की आप एक चिट्ठी लिख दें।

    जिन्न–मेरा परिचय तुम्हें सिवाय इसके और कुछ नहीं मिल सकता कि मैं जिन्न हूँ और हर जगह पहुँचने की ताकत रखता हूँ। खैर, तुम राजा गोपालसिंह के पास जाओ और उनसे मदद मांगो, मैं तुम्हें एक सिफारिशी चिट्ठी देता हूँ, तुम्हारे पास कागज- कलम-दवात है ?

    भूतनाथ–जी हां, आपकी कृपा से मुझे मेरी ऐयारी का बटुआ मिल गया है और उसमें सव सामान मौजूद है।

    इतना कहकर भूतनाथ रुक गया और एक पेड़ के नीचे बैठने के लिए जिन्न को कहा मगर जिन्न ने ऐसा करने से इनकार किया और आगे की तरफ इशारा करके कहा, "उस पेड़ के नीचे चलकर हम ठहरेंगे क्योंकि वहाँ हमारा घोड़ा मौजूद है।"

    थोड़ी ही देर में दोनों आदमी उस पेड़ के नीचे जा पहुँचे। भूतनाथ ने देखा कि कसे-कसाए दो उम्दा घोड़े उस पेड़ की जड़ के साथ बागडोर के सहारे बँधे हैं और जिन्न ही की सूरत-शक्ल, चाल-ढाल का एक आदमी उनके पास टहल रहा है जो जिन्न के वहाँ पहुँचते ही सलाम करके एक किनारे खड़ा हो गया। जिन्न ने भूतनाथ से कलम-दवात और कागज लेकर कुछ लिखा और भूतनाथ को देकर कहा, "यह चिट्ठी राजा गोपालसिंह को देना, बस अब तुम जाओ।" इतना कहकर जिन्न एक घोड़े पर सवार हो गया, जिन्न ही की सूरत का दूसरा आदमी जो वहाँ मौजूद था, दूसरे घोड़े पर सवार हो गया और भूतनाथ के देखते-ही-देखते दूर जाकर वे दोनों उसकी नजरों से गायब हो गये। भूतनाथ तरदुद और परेशानी के सबब से उदास और सुस्त हो गया था, इसलिए थोड़ी देर तक आराम करने की नीयत से उसी पेड़ के नीचे बैठ जाने के बाद उस पत्र को पढ़ने लगा जो जिन्न ने राजा के लिए लिख दिया था मगर हजार कोशिश करने पर भी उससे वह चिट्ठी पढ़ी न गई क्योंकि सिवाय टेढ़ी-मेढ़ी और पेचीली लकीरों के किसी साफ अक्षर का उसके अन्दर भूतनाथ को पता ही न लगा।

    आधे घण्टे तक आराम करने के बाद भूतनाथ उठ खड़ा हुआ और 'लामा घाटी' की तरफ रवाना हुआ।

    5

    भूतनाथ अब बिल्कुल आजाद हो गया। इस समय उसकी ताकत उतनी ही है जितनी आज के दस दिन पहले थी और जितने आज के दस दिन पहले उसके ताबेदार थे उतने ही आज भी हैं। पाठक जानते ही हैं कि भूतनाथ अकेला है बल्कि बहुत से आदमी उसके नौकर भी हैं जो इधर-उधर घूम-फिरकर उसका काम किया करते हैं। भूतनाथ ने जब से नकली बलभद्रसिंह से यह सुना कि 'उसकी बहुत ही प्यारी चीज मेरे कब्जे में है जिसे वह लामा घाटी में छोड़ आया था' तब से वह और भी परेशान हो गया था। वह बहुत प्यारी चीज क्या थी ? बस, वही उसकी स्त्री जिसके पेट से नानक पैदा हुआ था और जिसे उसने नागर की मेहरबानी से पुनः पा लिया था। वास्तव में भूतनाथ अपनी प्यारी स्त्री को लामाघाटी में ही छोड़ आया था।

    भूतनाथ इस समय जमानिया जाने के बदले लामाघाटी ही की तरफ रवाना हुआ और तीसरे दिन संध्या के समय उस घाटी में जा पहुँचा जिसे वह अपना घर समझता था।

    यहाँ पर हम पाठकों के दिल में लामाघाटी की तस्वीर खींचकर भूतनाथ की ताकत और उसके स्वभाव या खयाल का कुछ अन्दाज करा देना मुनासिब समझते हैं। लामाघाटी में किसी अनजान आदमी का जाना बहुत कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। ध्यानशक्ति की सहायता से यदि आप वहाँ जायें तो सबके पहले एक छोटी-सी पहाड़ी मिलेगी जिस पर चढ़ने के एक बारीक पगडण्डी दिखाई देगी। जब उस पगडण्डी की राह से पहाड़ी के ऊपर चढ़ जायेंगे तो तीन तरफ मैदान और पश्चिम तरफ केवल आधा कोस की दूरी पर एक बहुत ऊँचा पहाड़ मिलेगा। उसके पास जाने पर मालूम होगा कि ऊपर चढ़ने के लिए कोई रास्ता या पगडण्डी नहीं है और न पहाड़ के दूसरी तरफ जाने का ही मौका है। परन्तु खोजने की कोई आवश्यकता नहीं, आप उस पहाड़ी के नीचे पहुंचकर दाहिनी तरफ घूम जाइये और जब तक एक छोटा-सा झरना आपको न मिले बराबर चले ही जाइये। वह दो-तीन हाथ चौड़ा झरना आपका रास्ता काट के बहता होगा, उसे लांघने की कोई आवश्यकता नहीं। आप बाईं तरफ आँख उठाकर देखेंगे तो बीस-पच्चीस हाथ की ऊंचाई पर एक छोटी-सी गुफा दिखाई देगी, आप बेधड़क उस गुफा में चले जाइये जिसके अन्दर बिल्कुल अँधेरा होगा और बनिस्बत बाहर के अन्दर गर्मी कुछ ज्यादा होगी। कोस भर तक बराबर उस गुफा के अन्दर-ही-अन्दर चलने के बाद जब आप बाहर निकलेंगे तो एक हरा-भरा छोटा-सा मैदान नजर आएगा। वह मैदान छोटे-छोटे जंगली फलों और लताओं से ऐसा भरा होगा कि दूर से देखने वालों को तो आनन्द मगर उसके अन्दर जाने वाले के लिए आफत समझिये। उसमें जाने वाला तीस-चालीस कदम मुश्किल से जाने के बाद इस तरह फंस जायगा कि निकलना कठिन होगा। उस मैदान के किनारे- किनारे दाहिनी तरफ और फिर बाईं तरफ घूम जाना होगा और जब आप बाहर पश्चिम

    1. 'लामा घाटी' एक पहाड़ी स्थान का नाम है। और उत्तर के कोने में पहुँचेंगे तो एक गुफा मिलेगी। आप उस गुफा के अंदर चले जाइये। लगभग दो-सौ कदम जाने के बाद जब आप बाहर निकलेंगे तो अनपढ़ और मोटे-मोटे पत्थर के ढोकों से बनी हुई दीवारें मिलेंगी जिसके बीचोबीच में एक बहुत बड़ा लकड़ी का दरवाजा लगा है। यदि दरवाजा खुला है तो आप दीवार के उस पार चले जाइये और एक पुरानी मगर बहुत बड़ी इमारत पर नजर डालिए। यद्यपि यह मकान बहुत पुराना है और कई जगह से टूट भी गया है तथापि जो कुछ बचा है बहुत मजबूत और पचासों बरसात सहने योग्य है, जिसमें अब भी कई बड़े-बड़े दालान और कोठरियां मौजूद हैं और उसी मकान या स्थान का नाम 'लामाघाटी' है। भूतनाथ के आदमी या नौकर-चाकर इसी मकान में रहते हैं और अपनी स्त्री को भी वह इसी जगह छोड़ गया था। उसके सिपाही जो बड़े ही दिमागदार, बहुत कट्टर और साथ ही इसके ईमानदार भी थे, गिनती में पचास से कम न थे और भूतनाथ के खजाने को हिफाजत बड़ी मुस्तैदी और नेकनीयती के साथ करते थे तथा बड़े-बड़े कठिन कामों को पूरा करने के लिए भूतनाथ की आज्ञा पाते ही मुस्तैद हो जाते थे। उस मकान के चारों तरफ बहुत बड़ा मैदान छोटे-छोटे जंगली खूब- सूरत पौधों से हरा-भरा बहुत ही खूबसूरत मालूम पड़ता था और उसके बाद भी चारों तरफ की पहाड़ियों के ऊपर जहाँ तक निगाह काम कर सकती थी छोटे-छोटे खूबसूरत पेड़- पौधे दिखाई पड़ते थे।

    भूतनाथ इसी लामाघाटी में पहुँचा। पहुँचने के साथ ही चारों तरफ से उसके आदमियों ने खुशी-खुशी उसे घेर लिया और कुशल-मंगल पूछने लगे। भूतनाथ सभी से हँसकर मिला और 'हाँ, सब ठीक है, मेरा आना जिस लिये हुआ उसका हाल जरा ठहरकर कहूँगा' इत्यादि कहता हुआ अपनी स्त्री के पास चला गया जो बहुत दिनों से उसे देखे बिना बेताव हो रही थी। हँसी-खुशी से मिलने के बाद दोनों में यों बातचीत होने लगी-

    स्त्री–तुम बहुत दुबले और उदास मालूम पड़ते हो!

    भूतनाथ–हाँ, इधर कई दिन मुसीबत ही में कटे हैं।

    स्त्री–(चौंककर) सो क्यों, कुशल तो है?

    भूतनाथ–कुशल क्या, जान बच गई यही गनीमत है।

    स्त्री–सो क्यों ? तुम्हारा भेद खुल गया?

    भूतनाथ–(ऊँची सांस लेकर) हां, कुछ खुल ही गया।

    स्त्री–(हाथ मलकर) हाय-हाय, यह तो बड़ा ही गजब हुआ!

    भूतनाथ–बेशक गजब हो गया।

    स्त्री–फिर तुम बचकर कैसे निकल आये?

    भूतनाथ–ईश्वर ने एक सहायक भेज दिया जिसने अपनी जमानत पर महीने भर के लिए मुझे छोड़ दिया।

    स्त्री–तो क्या महीने भर के बाद तुम्हें फिर हाजिर होना पड़ेगा?

    भूतनाथ–हाँ।

    स्त्री–किसके आगे ?

    भूतनाथ–राजा वीरेन्द्रसिंह के आगे। स्त्री–राजा वीरेन्द्रसिंह से क्या सरोकार ? तुमने उनका तो कभी कुछ बिगाड़ा नहीं था।

    भूतनाथ–इतनी ही तो कुशल है कि वह दूसरी जगह जाने के बदले सीधा लक्ष्मीदेवी के पास चला गया।

    स्त्री–(चौंककर) हैं, क्या लक्ष्मीदेवी जीती है?

    भूतनाथ–-हाँ जीती है। मुझे इस बात की खबर कुछ भी न थी कि कमलिनी के साथ जो तारा रहती है, वह वास्तव में लक्ष्मीदेवी है और बालासिंह को यह बात मालूम हो गई थी, इसलिए वह सीधा लक्ष्मीदेवी के पास चला गया। यदि मुझे पहले लक्ष्मीदेवी की खबर लग गई होती तो आज मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के आगे अपनी तारीफ सुनता होता।

    स्त्री–तुम तो कहते थे कि बालासिंह मर गया।

    भूतनाथ–-हाँ, मैं ऐसा जानता था।

    स्त्री–उसी ने तुम्हारी सन्दूकड़ी चुराई थी?

    भूतनाथ–-हाँ, जब सन्दूकड़ी उसने चुराई थी, तभी मैं अधमरा हो चुका था। मगर यह सुनकर कि वह मर गया मैं निश्चिन्त भी हो गया था, परन्तु जिस समय वह यकायक मेरे सामने आ खड़ा हुआ मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ। उसके हाथ में वह गठरी उसी कपड़े में बंधी उसी तरह लटक रही थी जैसी तुम्हारे सन्दुक से चोरी की गई थी और जिसे देखने के साथ ही मैं पहवान गया। ओफ, मैं नहीं कह सकता कि उस समय मेरी क्या हालत थी। मेरे होश-हवास दुरुस्त न थे और मैं अपने को जिन्दा नहीं समझता था। इस बात के दो-चार दिन पहले जब मैं राजा गोपालसिंह के साथ किशोरी और कामिनी को कमलिनी के मकान में पहुँचाने गया था तो उसी समय तारा पर मुझे शक हो गया मगर अपनी भलाई का कोई दूसरा ही रास्ता सोचकर मैं उस समय चुप रहा परन्तु जिस समय बालासिंह से यकायक मुलाकात हो गई और उसने उस गठरी की तरफ इशारा करके मुझसे कहा कि इसमें सुहागिन तारा की किस्मत बन्द है उसी समय मुझे विश्वास हो गया कि तारा वास्तय में लक्ष्मीदेवी है और वह कागज का मुट्ठा भी इसी ने चुरा लिया है जिसे मैंने बड़ी मेहनत से बटोरकर नकल करके रखा था। मैं उस समय बदहवास हो गया और अफसोस करने लगा कि जिन कागजों से मैं फायदा उठाने वाला था वही अब मुझे चौपट करेंगे क्योंकि वह उन्हीं कागजों से मुझी को दोषी ठहराने का उद्योग करेगा। यदि वह सन्दूकड़ी उसके पास न होती तो मैं हताश न होकर और कोई बन्दोबस्त करता परन्तु उस सन्दूकड़ी के खयाल ही से मैं पागल हो गया और उस समय तो मैं बिलकुल ही मुर्दा हो गया जब उसकी बेगम पर मेरी निगाह पड़ी।

    स्त्री–(चौंककर) क्या बेगम भी जीती है?

    भूतनाथ–हां, उस समय वह उसके साथथी और थोड़ी ही दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपी हुई थी।

    स्त्री–यह बड़ा ही अंधेर हुआ, अगर तुम्हें मालूम होता कि वह जीती है तो तुम अपना नाम भूतनाथ काहे को रखते ! भूतनाथ–नहीं, अगर मुझे उसके मरने में कुछ भी शक होता तो मैं अपना नाम भूतनाथ न रखता। केवल इतना ही नहीं, उसने तो मुझे उस समय एक ऐसी बात कही जिससे मेरी बची-बचाई जान भी निकल गई और मैं ऐसा कमजोर हो गया कि उसके साथ लड़ने योग्य भी न रहा।

    स्त्री–सो क्या?

    भूतनाथ–उसने तुम्हारी तरफ इशारा करके मुझसे कहा कि 'तुम्हारी बहुत ही प्यारी चीज मेरे कब्जे में है जो तुम्हारे बाद बड़ी तकलीफ में पड़ जायेगी और जिसे तुम लामाघाटी में छोड़ आये हो' और यही सबब है कि छूटने के साथ ही सबसे पहले मैं इस तरफ आया, मगर ईश्वर को धन्यवाद है कि तुम उस शैतान के हाथ से बची रहीं और तुम्हें मैं इस समय राजी-खुशी देख रहा हूँ।

    स्त्री–उसकी क्या मजाल कि यहाँ आ सके, उसे स्वप्न में भी यहाँ का रास्ता मालूम नहीं हो सकता।

    भूतनाथ–सो तो मैं समझता हूँ। परन्तु 'लामाघाटी' का नाम लेने से मुझे उसकी बात पर विश्वास हो गया, मैंने सोचा, यदि वह लामाघाटी तक न गया होता तो लामा- घाटी का नाम भी उसे मालूम न होता और..

    स्त्री–नहीं-नहीं, लामाघाटी का नाम किसी दूसरे सबब से उसे मालूम हुआ होगा।

    भूतनाथ-–बेशक ऐसा ही है, खैर तुम्हारी तरफ से तो मैं निश्चित हो गया मगर अब अपनी जान बचाने के लिए मुझे असली बलभद्रसिंह का पता लगाना चाहिए।

    स्त्री–अब तुम अपना खुलासा हाल उस दिन से कह जाओ जिस दिन से तुम मुझसे जुदा हुए हो।

    भूतनाथ ने अपना कुल हाल अपनी स्त्री को कह सुनाया और इसके बाद थोड़ी देर तक बातचीत करके बाहर निकल आया। एक दालान में जिसमें सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था और रोशनी बखूबी हो रही थी उसके सब संगी-साथी या सिपाही बैठे उसके आने की राह देख रहे थे। भूतनाथ के आते ही वे सब अदब के तौर पर उठ खड़े हुए तथा वैठने के बाद उसकी आज्ञा पाकर बैठ गये और बातचीत होने लगी।

    भूतनाथ–कहो, तुम लोग अच्छे तो हो?

    सब–जी,आपके अनुग्रह से हम लोग अच्छे हैं।

    भूतनाथ–ऐसा ही चाहिए।

    एक–आप इतने दुबले और उदास क्यों हो रहे हैं?

    भूतनाथ–मैं एक भारी आफत में फंस गया था बल्कि अभी भी उसमें फंसा ही हुआ हूँ।

    सब–सो क्या, सो क्या?

    भूतनाथ–मैं तुमसे सब-कुछ कहता हूँ क्योंकि तुम लोग मेरे खैरख्वाह हो और मुझे तुम लोगों का बहुत सहारा रहता है

    सब–हम लोग आपके ताबेदार हैं और एक अपने इशारे पर जान देने के लिए तैयार हैं, औरों की बात दूर, खास राजा वीरेन्द्रसिंह से भिड़ जाने की हिम्मत रखते हैं।

    भूतनाथ–बेशक ऐसा ही है और इसीलिए मैं कोई बात तुम लोगों से नहीं छिपाता।

    इतना कह कर भूतनाथ ने अपना हाल कहना आरम्भ किया। जो कुछ अपनी स्त्री से कह चुका था वह तथा और भी बहुत-सी बातें उसने उन लोगों से कहीं और इसके बाद कई बहादुरों को कई तरह के काम करने की आज्ञा दे फिर अपनी स्त्री के पास चला गया।

    दूसरे दिन सवेरे जब भूतनाथ बाहर आया तब मालूम हुआ कि उसके बहादुर सिपाहियों में से चालीस आदमी उसकी आज्ञानुसार 'लामाघाटी' के बाहर जा चुके हैं।

    भूतनाथ भी वहाँ से रवाना होने के लिए तैयार ही था और अपनी स्त्री से बिदा होकर बाहर निकला था, अस्तु वह भी एक आदमी को लेकर चल पड़ा और दो ही घण्टे बाद 'लामाघाटी' के बाहर मैदान में जमानिया की तरफ जाता हुआ दिखलाई देने लगा।

  • चन्द्रकांता सन्तति 3

    चन्द्रकांता सन्तति 3

    Aproximadamente 180.094 palavras.

    चन्द्रकांता सन्तति 3
    https://hi.wikisource.org/wiki/चन्द्रकांता_सन्तति_3

    चन्द्रकान्ता सन्तति

    नौवाँ भाग

    1

    अब वह मौका आ गया है कि हम अपने पाठकों को तिलिस्म के अन्दर ले चलें और वहाँ की सैर करावें, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा मायारानी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा विराजे हैं जिसे एक तरह तिलिस्म का दरवाजा कहना चाहिए। ऊपर के भाग में यह लिखा जा चुका है कि भैरोंसिंह को रोहतासगढ़ की तरफ और राजा गोपालसिंह और देवीसिंह को काशी की तरफ रवाना करने के बाद इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, तारासिंह, शेरसिंह और लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुँची और उसने राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार देवमन्दिर में, जिसका हाल आगे चलकर खुलेगा, डेरा डाला। हमने कमलिनी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह को दारोगा वाले मकान के पास के एक टीले पर ही पहुँचा कर छोड़ दिया था और यह नहीं लिखा कि वे लोग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में किस राह से पहुँचे या वह रास्ता किस प्रकार का था। खैर, हमारे पाठक महाशय ऐयारों के साथ कई दफा उस तिलिस्मी बाग में जायँगे इसलिए वहाँ के रास्ते का हाल उनसे छिपा न रह जायगा।

    तिलिस्मी बाग का चौथा दर्जा अद्भुत और भयानक रस का खजाना था। वहाँ का पूरा हाल तो तब मालूम होगा जब तिलिस्म बखूबी टूट जायगा मगर जाहिरा हाल जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों ने वहाँ पहुँचने के साथ ही देखा, हम इस जगह लिख देते हैं।

    उस हिस्से में फूल-फल और पत्तों की किस्म में से ऐसा कुछ विशेष न था जिससे हम उसे बाग कहते, हाँ चारों तरफ तरह-तरह की इमारतें जरूर बहुतायत से बनी हुई थीं जिनका हाल हम उस देवमन्दिर को मध्य मान कर लिखते हैं जिसमें इस समय हमारे दोनों कुमार और दोनों नेक दिल खैरख्वाह और मुहब्बत का नायाब नमूना दिखानेवाली नायिकाएँ तथा उनके साथी लोग विराज रहे हैं। जैसा कि नाम से समझा जाता है वह देवमन्दिर वास्तव में कोई मन्दिर या शिवालय नहीं था, वह केवल सुर्ख पत्थर का बना हुआ एक मकान था जिसमें दस हाथ की कुर्सी के ऊपर चालीस खम्भों का केवल एक अपूर्व कमरा था जिसके बीचोंबीच में दस हाथ के घेरे का एक गोल खम्भा था और उस पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। बस, इसके अतिरिक्त देवमन्दिर में और कोई बात न थी। उस देवमन्दिर वाले कमरे में जाने के लिए जाहिर में कोई रास्ता न था, इसके सिवाय एक बात यह और थी कि कमरा चारों तरफ से परदेनुमा ऊँची दीवारों से ऐसा घिरा हुआ था कि उसके अन्दर रहने वाले आदमियों को बाहर से कोई देख नहीं सकता था। उस देवमन्दिर के चारों तरफ थोड़ी-सी जमीन में बाग की पक्की क्यारियाँ बनी हुई थीं और उनमें तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे, मगर ये पेड़ भी सच्चे न थे, बल्कि एक प्रकार की धातु के बने थे और असली मालूम होने के लिए उन पर तरह-तरह के रंग चढ़े हुए थे, यदि इस खयाल से उसे हम बाग कहें तो हो सकता है और ताज्जुब नहीं कि इन्हीं पेड़ों की वजह से वह हिस्सा वाग के नाम से पुकारा भी जाता हो। उस नकली बाग में दो-दो आदमियों के बैठने लायक कई कुर्सियाँ भी जगह-जगह बनी हुई थीं।

    उन क्यारियों के चारों तरफ छोटी-छोटी कई कोठरियाँ और मकान भी बने थे जिनका अलग-अलग हाल लिखना इस समय आवश्यक नहीं, मगर उन चार मकानों का हाल लिखे बिना काम न चलेगा जो कि देवमन्दिर या यों कहिए कि इस नकली बाग के चारों तरफ एक-दूसरे के मुकाबले में बने हुए थे और जिन चारों ही मकानों के बगल में एक-एक कोठरी और कोठरी से थोड़ी दूर के फासले पर एक-एक कुआँ भी बना हुआ था।

    पूरब की तरफ वाले मकान के चारों तरफ पीतल की ऊँँची दीवार थी इसलिए उस मकान का केवल ऊपर वाला हिस्सा दिखाई देता था और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हाँ छत के ऊपर एक लोहे का पतला महराबदार खम्भ निकला हुआ जरूर दिखाई दे रहा था जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया हुआ था। उस मकान के चारों तरफ जो पीतल की दीवार थी उसी में एक बन्द दरवाजा भी दिखाई देता था जिसके दोनों तरफ पीतल के दो-दो आदमी हाथ में नंगी तलवारें लिए खड़े थे।

    पश्चिम तरफ वाले मकान के दरवाजे पर हड्डियों का एक बड़ा-सा ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी थी जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया था।

    उत्तर तरफ वाला मकान गोलाकार स्याह पत्थरों का बना हुआ था और उसके चारों तरफ चखियाँँ और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। इसी मकान के पास वाले कुएँ के अन्दर मायारानी अपने पति का काम तमाम करने के लिए गई थी।

    दक्खिन की तरफ वाले मकान के ऊपर चारों कोनों पर चार बुर्जियाँ थीं और उनके ऊपर लोहे का जाल पड़ा था। उन चारों बुर्जियों पर (जाल के अन्दर) चार मोर न मालूम किस चीज के बने हुए थे जो हर वक्त नाचा करते थे।

    आज उसी देवमन्दिर के कमरे में दोनों कुमार, कमलिनी, लाड़िली और ऐयार लोग बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। रिक्तगन्थ अर्थात् किसी के खून से लिखी हुई किताब कुँँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथों में है और वह बड़े प्रेम से उसकी जिल्द को देख रहे हैं, मगर अभी तक उस किताब को पढ़ने की नौबत नहीं आई है। कमलिनी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रजीतसिंह को देख रही है और उसी तरह लाड़िली भी छिपी निगाहें कुँँअर आनन्दसिंह पर डाल रही है।

    कमलिनी―(इन्द्रजीतसिंह से) अब आपको चाहिए कि जहाँ तक जल्द हो सके यह रिक्तगंथ पढ़ जायँ।

    इन्द्रजीतसिंह―हाँ, मैं भी यही चाहता हूँ, परन्तु पहले उन कामों से छुट्टी पा लेनी चाहिए जिनके लिए तेजसिंह चाचा को और ऐयारों को हम लोग यहाँ तक साथ लाए हैं।

    कमलिनी—मैं इन लोगों को केवल रास्ता दिखाने के लिए यहाँ तक लाई थी सो काम तो हो ही चुका, अब इन लोगों को यहाँ से जाना और कोई नया काम करना चाहिए और आपको भी रिक्तग्रंथ पढ़ने के बाद तिलिस्म तोड़ने में लग जाना चाहिए।

    इन्द्रजीतसिंह―राजा गोपालसिंह ने कहा था कि किशोरी और कामिनी को छुड़ा कर जब हम आ जायँ तब तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाना। इसके अतिरिक्त तेजसिंह चाचा से मुझे राजा गोपालसिंह के छुड़ाने का हाल सुनना भी बाकी है।

    तेजसिंह―उस बारे में कुछ हाल तो मैं आपसे कह भी चुका हूँ!

    आनन्दसिंह―जी हाँ, आप वहाँ तक कह चुके हैं जब (कमलिनी की तरफ देख कर) ये चंडूल की सूरत बनाकर आपके पास आई थीं, मगर हमें यह न मालूम हुआ कि इन्होंने हरनामसिंह, बिंहारीसिंह और मायारानी के कान में क्या कहा जिसे सुन सभी की अवस्था बदल गई थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, शायद इन्होंने राजा गोपालसिंह के ही बारे में कोई इशारा किया होगा।

    कमलिनी–जी हाँँ, यही बात है। राजा गोपालसिंह को कैद करने में हरनामसिंह और बिहारीसिंह ने भी मायारानी का साथ दिया था और धनपत इस काम की जड़ है।

    इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) धनपत इस काम की जड़ है!

    कमलिनी―जी हाँ, मैं बोलने में भूलती नहीं, धनपत वास्तव में औरत नहीं है बल्कि मर्द है। उसकी खूबसूरती ने मायारानी को फँसा लिया और उसी की मुहब्बत में पड़ कर उसने यह अनर्थ किया था। ईश्वर ने धनपत का चेहरा ऐसा बनाया है कि वह मुद्दत तक औरत बन कर रह सकता है। एक तो वह नाटा है। दूसरे अठारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी दाढ़ी-मूँँछ की निशानी नहीं आई। लेकिन जनानी सूरत होने पर भी उसमें ताकत बहुत है।

    इन्द्रजीतसिंह―(ताज्जुब से) यह तो एक नई बात तुमने सुनाई। अच्छा तब?

    लाड़िली―क्या धनपत मर्द है?

    कमलिनी―हाँ, और यह हाल मायारानी, बिहारीसिंह और हरनामसिंह के सिवाय और किसी को मालूम नहीं है। कुछ दिन बाद मुझे मालूम हो गया था, मगर आज के पहले यह हाल मैंने भी किसी से नहीं कहा था। इसी तरह राजा गोपालसिंह का हाल भी उन चारों के सिवाय और कोई नहीं जानता था और जब कोई पाँँचवाँँ आदमी उस भेद को जानेगा तो बेशक हम चारों की जान जायगी और यही सबब उस समय उन लोगों की बदहवासी का था जब मैंने चंडूल बन कर उन तीनों के कानों में पते की बात कही थी, मगर उस समय इसके साथ-साथ ही मैंने यह भी कह दिया था कि राजा गोपालसिंह का हाल हजारों आदमी जान गए हैं और राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में भी यह बात मशहूर हो गई है।

    आनन्दसिंह―ठीक है, मगर बिहारीसिंह ने मायारानी से यह हाल क्यों नहीं कहा?

    कमलिनी―इसका एक खास सबब है।

    इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?

    कमलिनी―बिहारी और हरनाम ने मायारानी के दो प्रेमी पात्रों का खून किया है जिसका हाल मायारानी को भी मालूम नहीं है, उसका भी इशारा मैंने उन दोनों के कानों में किया था।

    इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) तुम्हारी बहिन बड़ी ही शैतान है! मगर देखना चाहिए तुम कैसी निकलती हो, खून का साथ देती हो या नहीं!

    कमलिनी―(हाथ जोड़ कर) बस, माफ कीजिए, ऐसा कहना हम दोनों बहिनों (लाड़िली की तरफ इशारा करके) के लिए उचित नहीं! इसका एक सबब भी है।

    इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?

    कमलिनी—मेरे पिता की दो शादियाँँ हुई थीं। मैं और लाड़िली एक माँ के पेट से हुईं और कम्बख्त मायारानी दूसरी माँ के पेट से, इसलिए हम दोनों का खून उसके संग नहीं मिल सकता।

    इन्द्रजीतसिंह—(हँस कर) शुक्र है, खैर यह कहो कि चंडूल बनने के बाद तुमने क्या किया?

    कमलिनी―चंडूल बनने के बाद मैंने नानक को बाग के बाहर कर दिया और तेजसिंह जी को राजा गोपालसिंह के पास ले जाकर दोनों की मुलाकात कराई, इसके बाद वहाँँ रहने का स्थान, राजा गोपालसिंह के छुड़ाने की तरकीब, और फिर उन्हें साथ लेकर बाग के बाहर हो जाने का रास्ता बताकर मैं तेजसिंह जी से बिदा हुई और आप लोगों को कैद से छुड़ाने का उद्योग करने लगी। इसके बाद जो कुछ हुआ आप जान ही चुके हैं। हाँ, राजा गोपालसिंह को छुड़ाने के समय तेजसिंहजी ने क्या-क्या किया सो आप इन्हीं से पूछिए।

    अब पाठक समझ ही गये होंगे कि राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ाने वाले तेजसिंह थे और जब राजा गोपालसिंह को मारने के लिए मायारानी कैदखाने में गई थी तो तेजसिंह ही ने आवाज देकर उसे परेशान कर दिया था। दोनों कुमारों के पूछने पर तेजसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल बयान किया जिसे सुनकर कुमार बहुत प्रसन्न हुए।

    2

    ऐयारों को जो कुँँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ थे, बाग के चौथे दर्जे के देवमन्दिर में आने-जाने का रास्ता बताकर कमलिनी ने तेजसिंह को रोहतासगढ़ जाने के लिए कहा और बाकी ऐयारों को अलग-अलग काम सुपुर्द करके दूसरी तरफ बिदा किया।

    इस बाग के चौथे दर्जे की इमारत का हाल हम ऊपर लिख आए हैं और यह भी लिख आये हैं कि वहाँ असली फूल-पत्तों का नाम-निशान भी न था। यहाँ की ऐसी अवस्था देखकर कुँँअर इन्द्रजीतसिंह ने कमलिनी से पूछा, “राजा गोपालसिंह ने कहा था कि ‘चौथे दर्जे में मेवे बहुतायत से हैं खाने-पीने की तकलीफ न होगी’, मगर यहाँ तो कुछ भी दिखाई नहीं देता! हम लोगों को यहाँ कई दिनों तक रहना होगा, कैसे काम चलेगा?” इसके जवाब में कमलिनी ने कहा, “आपका कहना ठीक है और राजा गोपालसिंह ने भी गलत नहीं कहा। यहाँ मेवों के पेड़ नहीं हैं मगर (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोड़ी-सी जमीन मजबूत चहारदीवारी से घिरी हुई है जिसे आप मेवों का बाग कह सकते हैं। उसको कोई सींचता या दुरुस्त नहीं करता है, बाहर से एक नहर दीवार तोड़ कर उसके अन्दर पहुँँचाई गई है और उसी की तरावट से वह बाग सूखने नहीं पाता। कई पेड़ पुराने होकर मर जाते है और कई नये पैदा होते रहते हैं। इस तिलिस्मी बाग का राजा दस-पन्द्रह वर्ष पीछे कभी उसकी सफाई करा दिया करता है। मैं वहाँ जाने का रास्ता आपको बता दूँँगी!”

    ऐयारों को बिदा करने के बाद ही कमलिनी भी लाड़िली को लेकर दोनों कुमारों से यह कह कर बिदा हुई—“कई जरूरी कामों को पूरा करने के लिए मैं जाती हूँ, परसों यहाँ आऊँगी।”

    तीन दिन तक कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह देवमन्दिर में रहे। जब आवश्यकता होती मेवों वाले बाग में चले जाते और पेट भर कर फिर उस देवमन्दिर में चले आते। इस बीच में दोनों भाइयों ने मिल कर 'रिक्तगंथ' (खून से लिखी किताब) भी पढ़ डाली, मगर रिक्तगंथ में जो भी बातें लिखी थीं, वे सब-की-सब बखूबी समझ में न आई क्योंकि उसमें बहुत से शब्द इशारे के तौर पर लिखे थे जिनका भेद जाने बिना असल बात का पता लगाना बहुत ही कठिन था, तथापि तिलिस्म के कई भेदों और रास्तों का पता उन दोनों को मालूम हो गया और बाकी के विषय में निश्चय किया कि कमलिनी से मुलाकात होने पर उन शब्दों का अर्थ पूछेंगे जिनके जाने बिना कोई काम नहीं चलता।

    यद्यपि कुँअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी के लिए और आनन्दसिंह कामिनी के लिए बेचैन हो रहे थे, मगर कमलिनी और लाड़िली की भोली सूरत के साथ-साथ उनके अहसानों ने भी दोनों कुमारों के दिलों को पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था फिर भी किशोरी और कामिनी की मुहब्बत के खयाल से दोनों कुमार अपने दिलों को कोशिश के साथ दबाए जाते थे।

    दोनों कुमारों को देवमन्दिर में टिके हुए आज तीसरा दिन है। ओढ़ने और बिछाने का कोई सामान न होने पर भी उन दोनों को किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे से होती और वहाँ के खुशबूदार फूलों से बसी हुई मन्द चलने वाली हवा ने नर्म थपकियाँ लगा-लगाकर दोनों नौजवान, सुन्दर और सुकुमार कुमारों को सुला दिया है। ताज्जुब नहीं कि दिन-रात ध्यान बने रहने के कारण दोनों कुमार इस समय स्वप्न में भी अपनी-अपनी माशूकाओं से लाड़-प्यार की बातें कर रहे हों, और उन्हें इस बात का गुमान भी न हो कि पलक उठते ही रंग बदल जायगा और नर्म कलाइयों का आनन्द लेने वाला हाथ सिर तक पहुँचने का उद्योग करेगा।

    यकायक घड़घड़ाहट की आवाज ने दोनों को जगा दिया। वे चौंक कर उठ बैठे और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। ज्यादा ध्यान देने पर भी यह निश्चय न हो सका कि आवाज किस चीज की है, हाँ, इतनी बात मालूम हो गई कि देवमन्दिर के पूरब तरफ वाले मकान के अन्दर से यह आवाज आ रही है। दोनों राजकुमारों को देवमन्दिर से नीचे उतर कर उस मकान के पास जाना उचित न मालूम न हुआ, इसलिए वे देवमन्दिर की छत पर चढ़ गये और गौर से उस तरफ देखने लगे।

    आधे घंटे तक वह आवाज एक रंग से बराबर आती रही और इसके बाद धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गई। उस समय दरवाजा खोलकर अन्दर से आता हुआ एक आदमी उन्हें दिखाई पड़ा। वह आदमी धीरे-धीरे देवमन्दिर के पास आया और थोड़ी देर तक खड़ा रहकर उस कुएँ की तरफ लौटा जो पूरव की तरफ वाले मकान के साथ और उससे थोड़ी ही दूर पर था। कुएँ के पास पहुँचकर थोड़ी देर तक वहाँ भी खड़ा रहा और फिर आगे बढ़ा, यहाँ तक कि घूमता-फिरता छोटे-छोटे मकानों की आड़ में जाकर वह न जाने कहाँ नज़रों से ओझल हो गया और इसके थोड़ी ही देर बाद उस तरफ एक कमसिन औरत के रोने की आवाज आई।

    इन्द्रजीतसिंह―जिस तौर से यह आदमी इस चौथे दर्जे में आया है, वह बेशक ताज्जुब की बात है।

    आनन्दसिंह―तिस पर इस रोने की आवाज ने और भी ताज्जुब में डाल दिया है। मुझे आज्ञा हो तो जाकर देखूँँ कि क्या मामला है?

    इन्द्रजीतसिंह―जाने में कोई हर्ज नहीं है, मगर…खैर, तुम इसी जगह ठहरो, मैं जाता हूँ।

    आनन्दसिंह―यदि ऐसा ही है तो चलिये हम दोनों आदमी चलें।

    इन्द्रजीतसिंह―नहीं, एक आदमी का यहाँ रहना बहुत जरूरी है। खैर, तुम ही जाओ, कोई हर्ज नहीं, मगर तलवार लेते जाओ।

    दोनों भाई छत के नीचे उतर आये। आनन्दसिंह ने खूँँटी से लटकती हुई अपनी तलवार ले ली और कमरे के बीचोंबीच वाले गोल खम्भे के पास पहुँँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि उस खम्भे में तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। आनन्दसिंह ने एक मूरत पर हाथ रख कर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। छोटे कुमार उसी खिड़की की राह उस गोल खम्भे के अन्दर घुस गये, और थोड़ी ही देर बाद उस नकली बाग में दिखाई देने लगे। खम्भे के अन्दर रास्ता कैसा था और वह नकली बाग के पास क्योंकर पहुँँचे, इसका हाल आगे चलकर दूसरी दफे किसी और के आने या जाने के समय बयान करेंगे, यहाँ मुख्तसिर ही में लिखकर मतलब पूरा करते हैं।

    आनन्दसिंह भी उस तरफ गये, जिधर वह आदमी गया था या जिधर से किसी औरत के रोने की आवाज आई थी। घूमते-फिरते एक छोटे मकान के आगे पहुँँचे जिस का दरवाजा खुला हुआ था। वहाँ औरत तो कोई दिखाई न दी, मगर उस आदमी को दरवाजे पर खड़े हुए जरूर पाया।

    आनन्दसिंह को देखते ही वह आदमी झट मकान के अन्दर घुस गया और कुमार भी तेजी के साथ उसका पीछा किए बेखौफ मकान के अन्दर चले गये। वह मकान दो मंजिल का था, उसके अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियाँ थीं और हर एक कोठरी में दो-दो दरवाजे थे, जिससे आदमी एक कोठरी के अन्दर जाकर कुल कोठरियों की सैर कर सकता था।

    यद्यपि कुमार तेजी के साथ पीछा किए हुए चले गये, मगर वह आदमी एक कोठरी के अन्दर जाने के बाद कई कोठरियों में घूम-फिर कर कहीं गायब हो गया। रात का समय था और मकान के अन्दर तथा कोठरियों में बिल्कुल अन्धकार छाया हुआ था, ऐसी अवस्था में कोठरियों के अन्दर घूम-घूम कर उस आदमी का पता लगाना बहुत ही मुश्किल था, दूसरे, इसका भी शक था कि वह कहीं हमारा दुश्मन न हो, लाचार होकर कुमार वहाँ से लौटे, मगर मकान के बाहर न निकल सके, क्योंकि वह दरवाजा बन्द हो गया था जिसकी राह से कुमार मकान अन्दर घुसे थे। कुमार ने दरवाजा उतारने का भी उद्योग किया मगर उसकी मजबूती के आगे कुछ बस न चला। आखिर दुखी होकर फिर मकान के अन्दर घुसे और एक कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये। थोड़ी देर के बाद ऊपर की छत पर से फिर किसी औरत के रोने की आवाज आई, गौर करने से कुमार को मालूम हुआ कि यह बेशक उसी औरत की आवाज है जिसे सुनकर यहाँ तक आए थे। उस आवाज की सीध पर कुमार ने ऊपर की दूसरी मंजिल पर जाने का इरादा किया, मगर सीढ़ियों का पता न लगा।

    इस समय कुमार का दिल कैसा बेचैन था, यह वही जानते होंगे। हमारे पाठकों में भी जो दिलेर और बहादुर होंगे, वह उनके दिल की हालत कुछ समझ सकेंगे। बेचारे आनन्दसिंह हर तरह से उद्योग करके रह गए, पर कुछ भी न बन पड़ा। न तो वे उस आदमी का पता लगा सकते थे, जिसके पीछे-पीछे मकान के अन्दर घुसे थे, न उस औरत का हाल मालूम कर सकते थे, जिसके रोने की आवाज से दिल बेताब हो रहा था, और न उस मकान ही से बाहर होकर अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को इन सब बातों की खबर कर सकते थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि सिवाय चुपचाप खड़े रहने या बैठ

    जाने के और कुछ भी नहीं कर सकते थे।

    जो कुछ रात थी खड़े-खड़े बीत गई। सुबह की सुफेदी ने जिधर से रास्ता पाया मकान के अन्दर घुसकर उजाला कर दिया, जिससे कुंअर आनन्दसिंह को वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यकायक पीछे की तरफ से दरवाजा खुलने की आवाज कुमार के कान में पड़ी। कुमार ने घूमकर देखा तो एक कोठरी का दरवाजा, जो इसके पहले बन्द था, खुला हुआ पाया। वे बेधड़क उसके अन्दर घुस गए और वहां ऊपर की तरफ गई हुई छोटी-छोटी खूबसूरत सीढ़ियाँ देखीं। धडधडाते हए दूसरी मंजिल पर चढ़ गए और हर तरफ गौर करके देखने लगे। इस मंजिल में बारह कोठरियाँ एक ही रंग-ढंग की देखने में आईं। हर एक कोठरी में दो दरवाजे थे। एक दरवाजा कोठरी के अन्दर घुसने के लिए और दूसरा अन्दर की तरफ से दूसरी कोठरी में जाने के लिए था। इस तरह पर किसी एक कोठरी के अन्दर घुसकर कुल कोठरियों में आदमी घूम आ सकता था। धीरे-धीरे अच्छी तरह उजाला हो गया और वहां की हर एक चीज बखूबी देखने का मौका कुमार को मिला। छोटे कुमार एक कोठरी के अन्दर घुसे और देखा कि वहां सिवाय एक चबूतरे के और कुछ भी नहीं है। यह चबूतरा स्याह पत्थर का बना हआ था और उसके ऊपर एक कमान और पाँच तीर रखे हए थे। कूमार ने तीर और कमान पर हाथ रखा, मालूम हुआ कि सब पत्थर का बना हआ है और किसी काम में आने योग्य नहीं है। दूसरे दरवाजे से दूसरी कोठरी में घुसे तो वहाँ एक लाश पड़ी देखी जिसका कटा हुआ सिर पास ही पड़ा हुआ था और वह लाश भी पत्थर ही की थी। उसे अच्छी तरह देखभाल कर तीसरी कोठरी में पहुँचे।

    इसके चारों तरफ दीवार में कई खूटियाँ थीं और हर एक खंटी से एक-एक नंगी तलवार लटक रही थी। ये तलवारें नकली न थीं, बल्कि असली लोहे की थीं मगर हर एक पर जंग चढा हआ था। जब चौथा कोठरी में पहुंचे तो वहाँ चाँदी के सिंहासन पर बैठी हई एक मूरत दिखाई पड़ी। वह मूरत किसी प्रकार की धातु की बहुत ही खूबसूरत और ठीक-ठीक बनी हई थी, जिसे देखने के साथ ही कुमार ने पहचान लिया कि यह मायारानी की छोटी बहन लाडिला का मूरत है। कुमार मुहब्बत भरी निगाहें उस मूरत पर डालने लगे। निराली जगह अपन माशूक को देखने का उन्हें अच्छा मौका मिला, यदापि वर माशक असली नहीं, बल्कि कवल उसका एक छवि मात्र थी तथापि इस सबब से कि यहां पर कोई ऐसा आदमी न था जिसका लिहाज या खयाल होता, उन्हें एक निराले ढंग की खुशी हुई और वे देर तक उसक हर एक अंग की खूबसूरती को देखते रहे। इसी बीच बगल वाली कोठरी में से यकायक एक, एक खटके की आवाज आई। कुमार चौंकपड़े और यह सोचते हुए उस कोठारी का तरफ बढ़े कि शायद वर आदमी उसमें मिले जिसके पीछे-पीछे इस मकान के अन्दर आए हैं, मगर इस कोठरी में भी किसी की सूरत दिखाई न दी।

    इस कोठरी में, जिसमें कुमार पहुँचे हैं, चाँदी का का केवल एक सन्दूक था, जिसके बीच में हाथ डालने के लायक एक छेद भी बना हुआ था हुआ था और छेद के ऊपर सुनहले हर्को में यह लिखा हुआ था-

    "इस छेद में हाथ डाल के देखो, क्या अनूठी चीज है।"

    कुँवर आनन्दसिंह ने बिना सोचे-विचारे उस छेद में हाथ डाल दिया, मगर फिर हा निकाल न सके। सन्दूक के अन्दर हाथ जाते ही मानो लोहे की हथकड़ी पड़ गई जो किसी तरह हाथ बाहर निकालने की इजाजत नहीं देती थी। कुमार ने झक कर सन्दूक नीचे की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि सन्दूक जमीन से अलग नहीं है और इसलिए उसे किसी तरह खिसका भी नहीं सकते थे।

    3

    कुँवर आनन्दसिंह के जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह देर तक उनके आने की राह देखते रहे। जैसे-जैसे देर होती थी, जी बेचैन होता जाता था। यहाँ तक कि तमाम बीत गई, सवेरा हो गया, और पूरब तरफ से सूर्य भगवान दर्शन देकर धीरे-धीरे आसमान पर चढ़ने लगे। जब पहर भर से ज्यादा दिन चढ़ गया, तब इन्द्रजीतसिंह नदी बेताब हुए और उन्हें निश्चय हो गया कि आनन्दसिंह जरूर किसी आफत में फंस गये।

    कुँवर इन्द्रजीतसिंह सोच ही रहे थे कि स्वयं चल के आनन्दसिंह का पता लगाना कि इतने ही में लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी वहाँ आ पहुँची। इन्हें देख की बेचैनी कुछ कम हुई और आशा की सूरत दिखाई देने लगी। कमलिनी ने जब कुमार को उस जगह अकेले और उदास देखा तो उसे ताज्जुब हुआ, मगर वह बुध्दिमान औरत तुरत ही समझ गई कि इनके छोटे भाई आनन्दसिंह इनके साथ नहीं दिखाई देते जरूर वे किसी मुसीबत में पड़ गए हैं, और ऐसा होना कोई ताज्जुब की बात क्योंकि यह तिलिस्म का मौका है, और यहाँ का रहने वाला थोड़ी भूल में तकलीफ उठा सकता है।

    कमलिनी ने कुँवर इन्द्रजीतसिंह से उदासी का कारण और कुंअर आनन्दसिंह के का सबब पूछा, जिसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ हुआ था, बयान करके कहा कि "आनन्द को गए हुए नौ घंटे के लगभग हो गये।"

    समय कोई लाड़िली की सूरत गौर से देखता तो बेशक समझ जाता कि आनन्दसिंह का हाल सुनकर उसको हद से ज्यादा रंज हुआ है। ताज्जुब नहीं कि कम और इन्द्रजीतसिंह भी उसके दिल की हालत जान गये हों, क्योंकि वह अपनी आंखों को डबडबाने और आंसू के निकलने को बड़े परिश्रमपूर्वक रोक रही थी। यद्यपि उसे निश्चय था कि दोनों कुमार इस तिलिस्म को अवश्य तोड़ेंगे, तथापि उसका दिल दख गया था। कौन ऐसा है जो अपने प्यारे पर आई हुई मुसीबत का हाल सुनकर बेचैन न हो?

    कमलिनी-(सब बातें सुनकर) किसी का आना ताज्जुब नहीं है, हाँ, किसी

    औरत का आना बेशक ताज्जुब है, क्योंकि (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप कहते हैं कि एक औरत के रोने की आवाज आई थी।

    लाड़ली-ठीक है, जहाँ तक मैं समझती हूँ सिवाय तुम्हारे, मायारानी के और मेरे किसी चौथी औरत को यहां आने का रास्ता मालूम नहीं है, हाँ, मर्दो में कई जरूर ऐसे हैं, जो यहाँ आ सकते हैं।

    कमलिनी-मगर इस देवमन्दिर के अन्दर हम लोगों के अतिरिक्त राजा गोपालसिंह के सिवाय और कोई भी नहीं आ सकता। खैर, इन सब बातों को जाने दो, अब यहाँ से चलकर कुँवर साहब का पता लगाना बहुत जरूरी है। यद्यपि यहाँ किसी दुश्मन का आना बहुत कठिन है, तथापि खुटका लगा ही रहता है। जब दोनों कुमारों को मायारानी के कैदखाने से छुड़ाकर हम लोग सुरंग ही सुरंग तिलिस्मी बाग से बाहर हो रहे थे, तो उस हरामजादे के आ पहुँचने की कौन उम्मीद थी, जिसने कुमार को जख्मी किया था! इसी तरह कौन ठिकाना यहाँ भी कोई दुष्ट आ पहुँचा हो!

    आखिर कुँवर आनन्दसिंह को खोजने के लिए तीनों वहाँ से रवाना हुए और देवमन्दिर के नीचे उतर उसी तरफ चले जिधर आनन्दसिंह गये थे। जब एक मकान के दरवाजे पर पहुँचे तो कमलिनी रुकी और बड़े गौर से उस दरवाजे को जो बन्द था, देखने लगी। इसके बाद फिर आगे बढ़ी, दूसरे मकान के दरवाजे पर पहुँच कर उसे भी गौर से देखा और सिर हिलाती हुई फिर आगे बढ़ी। इसी तरह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और लाड़िली को साथ लिए हए, कमलिनी सात-आठ मकानों के दरवाजे पर गई। हर एक मकान का दरवाजा बन्द था और हर एक दरवाजे को कमलिनी ने गौर से देखा लेकिन कुछ काम न चला, मगर जब उस मकान के दरवाजे पर पहुँची, जिसमें कुँवर आनन्दसिंह गये थे तो रुककर मामूली तौर पर उसके दरवाजे को भी बड़े गौर से देखने लगी और थोड़ी ही देर में बोल उठी, "वेशक कुँवर आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं। (उँगली से दरवाजे के ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) देखिये, यह स्याह पत्थर की तीन खूटियाँ नीचे की तरफ झुक गई हैं।"

    कुमार-इन खूटियों से क्या मतलब है?

    कमलिनी-इस मकान के अन्दर जितने आदमी जायेंगे, उतनी खूटियाँ नीचे की तरफ झुक जायँगी।

    कुमार-(ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) ऊपर कुल बारह खूटियाँ हैं, मान लिया जाय कि बारहों खंटियाँ उस समय झुक जायेंगी, जब बारह आदमी इस मकान के अन्दर जा पहुँचेंगे, मगर जब बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जायेंगे, तब क्या होगा?

    कमलिनी-बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जा ही नहीं सकते! तिलिस्मी बातों में किसी की जबर्दस्ती नहीं चल सकती।

    कुमार-ठीक है, मगर तुमने यह कैसे जाना कि आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं?

    कमलिनी–सिर्फ अन्दाज से समझती हूँ कि आनन्दसिंह इसी मकान में होंगे,

    क्योंकि इस बाग में एक आदमी का का आना आपने बयान किया था, इसके बाद कहा था किसी औरत के रोने की आवाज आई थी, दो हो तो चुके, तीसरे आनन्दसिंह भी पीछा किये हुए इधर ही आये हैं और इस तरह इस मकान के अन्दर तीन आदमियों का होना साबित होता है। इन्हीं सब बातों से मुझे विश्वास होता है कि वे ही तीन आदमी इस मकान के अन्दर हैं।

    कुमार—तुम्हारा सोचना बहुत ठीक है, मगर जहाँ तक जल्द हो सके, इस बात का निश्चय करके आनन्द को छुड़ाना चाहिए, न मालूम वह किस आफत में फंस गया है।

    कमलिनी–देखिये, मैं बहुत जल्द इसका बन्दोबस्त करती हूँ।

    इसके बाद कमलिनी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "इस मकान का दरवाजा खोलना तो जरा मुश्किल है, मगर चौखट के ऊपर जो बारह खूटियाँ हैं उनमें से तीन नीचे की तरफ झुक गई हैं, और बाकी नौ ऊपर की तरफ उठी हुई हैं, उनमें से किसी एक को आप उछल कर थाम लीजिए और जोर करके नीचे की तरफ झुकाइए, देखिये, क्या होता है।" कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछल कर एक खूटी को थाम लिया और झटका देकर उसे नीचे की तरफ झुकाया तथा जब वह नीचे को झुक गई तो उसे छोड़कर अलग हो गये। यकायक मकान के अन्दर से इस तरह की आवाज आने लगी, जैसे बड़े-बड़े कल पुर्जे और चरखे घूमते हों, या कई गाड़ियाँ मकान के अन्दर दौड़ रही हों। तीनों आदमी दरवाजे से हटकर खड़े हो गये और राह देखने लगे कि अब क्या होता है।

    थोड़ी ही देर बाद मकान की छत पर से एक आवाज आई-"इधर देखो" जिसे सुनते ही तीनों आदमी चौंके और ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी, जो अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था, छत से नीचे की तरफ झाँकता हुआ दिखाई दिया। उसने कमलिनी, लाड़िली और कुँवर इन्द्रजीतसिंह को अपनी तरफ देखते देख एक लपेटा हुआ कागज नीचे गिरा दिया, जिसे झट कमलिनी ने उठा लिया और बढ़कर कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "बस अब जिस तरह हो सके आप इस खूटी को, जिसे झुकाया है, ज्यों-की-त्यों सीधी कर दीजिए।"

    इन्द्रजीतसिंह-आखिर इसका क्या सबब है? इस पुर्जे में क्या लिखा हुआ है?

    कमलिनी-पहले आप उसे कीजिए, जो मैं कह चुकी हूँ। देर करने में हमारा ही हर्ज होगा।

    लाचार कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछलकर नीचे की तरफ से एक झटका ऐसा दिया कि वह खूटी सीधी हो गई और इसके साथ ही मकान के अन्दर सन्नाटा छा गया, अर्थात् वह जोर-शोर की आवाज, जो खूटी झुकने के साथ ही आने लगी थी, एकदम बन्द हो गई। इसके बाद कमलिनी ने वह कागज का पुर्जा जो मकान की छत पर से गिराया गया था, कुमार के हाथ में दे दिया। कुमार ने उसे देखा, यह लिखा हुआ था-

    1

    2

    3

    4

    5

    6

    एच

    मेमचे

    काटनो

    केआरेयाँ

    डेह

    नेपो

    7

    8

    9

    10

    11

    12

    किमटू

    च्वाला

    मेम

    कुम

    नीपो

    इच्चो

    13

    लव

    14

    कचीचा

    15

    टेप

    इस चिट्ठी का मतलब तो कुमार तुरत समझ गए, क्योंकि यह ऐयारी भाषा में लिखी हुई थी और कुमार ऐयारी भाषा बखूबी जानते थे, मगर यह उनकी समझ में न आया कि चिट्ठी लिखने वाला कौन है, क्योंकि उसने अपना नाम टेप लिखा था। कुमार ने कमलिनी से 'टेप' का अर्थ पूछा, जिसके जवाब में उसने कहा, "थोड़ी देर सब्र कीजिए, आप-से-आप उस आदमी का पता लग जायगा।" कुमार चुप हो रहे और दरवाजे की तरफ देखने लगे। हमारे पाठक महाशय ऐयारी भाषा शायद न जानते होंगे, अस्तु उन्हें समझाने के लिए उस चिट्ठी का अर्थ हम नीच लिखे देते हैं––

    1

    2

    3

    4

    5

    6

    यहाँ

    मैं हूँ

    डरो मत

    कुमार को

    तकलीफ

    न होगी

    7

    8

    9

    10

    11

    12

    थोड़ी देर

    सब्र करो

    मैं

    स्वयं

    नीचे

    आता हूँ

    13

    वही

    14

    दिलजला

    15

    टेप

    4

    मायारानी आज यह विचार कर बहुत खुश है कि आधी रात के समय कमलिनी इस बाग में आयेगी और मैं उसे अवश्य गिरफ्तार करूँगी, मगर इस बात को जानने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा कि उसके सोने वाले कमरे में रात को कौन आया था। वह चारों तरफ खयाल दौड़ाती थी, मगर कुछ समझ में न आता था और आखिर दिल में यही कहती थी कि आने वाला चाहे कोई हो, मगर काम कमलिनी ही का है। आज अगर कमलिनी गिरफ्तार हो जायगी तो सब टण्टा मिट जायगा। जितनी बेफिक्री राजा गोपालसिंह के मरने से मिली है, उतनी ही कमलिनी के भी मारने से मिलेगी, क्योंकि उसके मरने के बाद मेरे साथ दुश्मनी करने का साहस फिर कोई भी नहीं कर सकता।

    आधी रात जाने के पहले ही मायारानी धनपत को साथ लिए हुए उस दरवाजे के पास आ पहुँची जिधर से कमलिनी के आने की खबर सुनी थी। मायारानी के कहे

    मताबिक पहरा देने वाली कई औरतें भी नंगी तलवारें लिए उस चोर दरवाजे के पास पहुँच कर इधर-उधर पेड़ों और झाड़ियों की आड़ में दुबक रही थीं और धनपत भी उस चोरदरवाजे के बगल ही में एक झाड़ी के अन्दर घुस गई थी। मायारानी अपने को हर बला से बचाये रहने की नीयत से कुछ दूर पर छिप कर बैठ रही।

    अब वह समय आ गया कि चोर-दरवाजे की राह से कमलिनी बाग के अन्दर आवे, इसलिए धनपत अपने छिपे रहने वाले स्थान से उठ कर चोर दरवाजे के पास आई और यह विचार कर बैठ गई कि बाहर से कोई आदमी दरवाजा खोलने का इशारा करे तो मैं झट से दरवाजा खोल दूं। इस समय धनपत अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थी और हाथ में खंजर लिए मौका पड़ने पर लड़ने के लिए भी तैयार थी। थोड़ी देर के बाद बाहर से किसी ने चोरदरवाजे पर थपकी मारी। धनपत खुश होकर उठी और झट से दरवाजा खोल कर एक किनारे हो गई। दो आदमी बाग के अन्दर दाखिल हुए। इन दोनों ही का बदन स्याह कपड़ों से ढंका हुआ था और दोनों ही के चेहरों पर नकाब पड़ी हुई थी जिससे रात के समय यह जानना बहुत ही कठिन था कि ये औरतें हैं या मर्द, हाँ लिए उस पर मर्द होने का गुमान हो सकता था।

    जब दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर आ गए तो धनपत ने चोर-दरवाजा बन्द कर दिया और उन दोनों को अपने पीछे-पीछे आने का इशारा किया। मालूम होता था कि वे दोनों नकाबपोश बेफिक्र हैं और उन्हें इस बात की जरा भी खबर नहीं कि यहां का रंग बदला हुआ है। उन दोनों को साथ लिए धनपत जब उस जगह पहुंची जहाँ पहरा देने वाली लौंडियाँ नंगी तलवारें लिए हुए छिपी हुई थीं, तो खड़ी हो गई और उन दोनों की तरफ देख कर बोली, "आपकी आज्ञानुसार मैंने अपना काम पूरा कर दिया अब मुझे इनाम मिलना चाहिए!" इसके जवाब में उस नकाबपोश ने, जिसका कद बनिस्बत दूसरे के छोटा था, जवाब दिया, "धनपत को जो मर्द होकर औरत की सूरत में मायारानी के साथ रहता है, किसी से इनाम लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं मालदार है, मगर मैं समझता हूँ कि कम्बख्त मायारानी भी लोगों को गिरफ्तार करने की नीयत से इसी जगह आकर कहीं छिपी होगी, उसे जल्द बुला, क्योंकि खास उसी को इनाम देने के लिए हम लोग यहाँ आये हैं।"

    धनपत वास्तव में मर्द था, मगर यह हाल किसी को मालूम न था, इसलिए हम भी उसे अभी तक औरत ही लिखते चले आए मगर अब पूरी तरह से निश्चय हो गया कि वह मर्द है और हमारे पाठकों को भी यह बात मालूम हो गई इसलिए अब हम उसके लिए उन्हीं शब्दों का बर्ताव करेंगे, जो मर्दो के लिए उचित हैं।

    उस आदमी की बात सुन कर धनपत परेशान हो गया, उसे यह फिक्र पैदा हुई कि अब हमारा भेद खुल गया और इसलिए जान बचना मुश्किल है। केवल धनपत ही नहीं बल्कि मायारानी और उन लौंडियों ने भी उस आदमी की बातें सुन ली जो उसी के आसपास पेड़ों के नीचे छिपी हुई थीं। मायारानी के दिल में भी तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। उसने पहचानने की नीयत से उस नकाबपोश की आवाज पर ध्यान दिया, मगर कुछ काम न चला क्योंकि उसकी आवाज फंसी हुई थी और इस समय हर

    एक आदमी जो उसकी बात सुनता कह सकता था कि वह अपनी आवाज को बिगाड़ कर बातें कर रहा है।

    धनपत यद्यपि इस फिक्र में था कि दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करना चाहिए मगर इस नकाबपोश की गहरी और भेद से भरी हुई बात ने उसका कलेजा यहाँ तक दहला दिया कि उसके लिए बात का जवाब देना भी कठिन हो गया, मगर वे लौंडियाँ जो उस जगह छिपी हुई थीं चारों तरफ से आकर जरूर वहाँ जुट गईं और उन्होंने दोनों नकाबपोशों को घेर लिया। धनपत सोच रहा था कि मायारानी भी इसी जगह आ पहुँचेगी लेकिन यह आशा उसकी वृथा ही हुई, क्योंकि उस नकाबपोश की आवाज का सबसे ज्यादा असर मायारानी पर ही हुआ। वह घबरा कर वहाँ से भागी और अपने दवानखाने में जाकर बैठ रही, जहाँ कई लौंडियां पहरा दे रही थीं। आते ही उसने एक लौंडी की जुबानी अपने सिपाहियों को जो बाग के पहले दर्जे में रहा में रहा करते थे, कहला भेजा कि 'खास बाग में फलां जगह पर दो दुश्मन घुस आये हैं, उन्हें जाकर फौरन गिरफ्तार करो और उनका सिर काट कर मेरे पास भेजो।" इधर धनपत ने देखा कि बहुत-सी लौंडियाँ हमारी मदद पर आ पहुंची हैं तो उसे भी कुछ हिम्मत हुई और वह उस नकाबपोश की तरफ देख कर बोला

    धनपत-तुम लोग यहाँ किस काम के लिए आये हो?

    नकाब–इसका जवाब हम तुझ कम्बख्त को क्यों दें? धनपत-मालम होता है कि मौत तम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।

    नकाब-(हँस कर) हाँ, मैं भी यही समझता हूँ कि तेरी मौत हम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।

    इतना सुनते ही धनपत ने नकाबपोश पर खंजर का वार किया। मगर उसने फुर्ती से पैतरा बदल कर वार खाली कर दिया, मगर दूसरे नकाबपोश ने चालाकी से धनपत के पीछे जाकर एक लात उसकी कमर में ऐसे जोर से मारी कि वह औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा। मगर तुरन्त ही सम्हल कर उठ बैठा और दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए लौंडियों को ललकारा। लौंडियां दोनों नकाबपोशों की अवस्था देख परेशान हो रही थीं। एक तो उन्हें विश्वास हो गया कि ये दोनों नकाबपोश मर्द हैं, दूसरे धनपत की ताकत पर उन सभी को बहुत-कुछ भरोसा था सो उसकी भी दुर्दशा आँखों के सामने देखने में आई। तीसरे, नकाबपोश की जुबानी यह सुनकर कि धनपत मर्द है और उसके जवाब में धनपत को चुप पाकर लौंडियों का खयाल बिल्कुल ही बदल गया था, तिस पर भी, वे सब दोनों नकाबपोशों को घेर कर खड़ी हो गई। धनपत ने फिर ललकार कर कहा, "देखो, ये दोनों चोर हैं, भागने न पावें।"

    लम्बे नकाबपोश ने लपक कर बहादुरी के साथ धनपत की दाहिनी कलाई जिसमें खंजर था, पकड़ ली और कहा, "हम लोग भागने के लिए नहीं आये हैं, बल्कि गिरफ्तार होकर एक अनूठा तमाशा दिखाने के लिए आये हैं। मगर तुमको भाग जाने का मौका न देंगे। (लौंडियों की तरफ देख कर) हम लोग स्वयं यहाँ से टलने वाले नहीं हैं और जहाँ कहो चलने के लिए तैयार हैं।"

    धनपत को मालूम हो गया कि ये दोनों नकाबपोश कोई साधारण आदमी नहीं हैं और इनके सामने ताकत का घमंड करना वृथा है। वह सोचने लगा–"अफसोस, अब भारी मुसीबत का सामना हुआ चाहता है।"

    इतने ही में 'चोर-चोर' का गुल मचा और कई मशालों की रोशनी दिखाई दी। यह रोशनी उन सिपाहियों के साथ थी जो बाग के पहले दर्जे में रहने वाले सिपाहियों में से थे और इस समय वे सब मायारानी की आज्ञानुसार दोनों चोरों को अर्थात् इन नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए यहाँ आये थे। बात की बात में वे सब वहाँ पहुंच गये और उन्होंने देखा कि लौंडियों के घेरे में दो नकाबपोश छाती ऊँची किये खड़े हैं और उनमें से एक धनपत की कलाई पकड़े हुए है।

    इसके पहले कि सिपाहियों को दोनों नकाबपोशों के साथ किसी तरह के बर्ताव की नौबत आवे, छोटे नकाबपोश ने ऊंची आवाज में ललकार कर कहा, "भाइयो, तुम लोग यह न समझो कि हम लोग भाग जायेंगे, मैं भागने के लिए नही आया हूँ, मैं तुम लोगों का दुश्मन नहीं हूँ और न तुम लोगों के दुश्मनों का साथी हूँ, बल्कि तुम्हारा सच्चा दोस्त और खैरखाह हूँ। जिस समय सूर्य भगवान के दर्शन होंगे और मैं अपने चेहरे पर से नकाब उठाऊँगा, तुम लोगों को मालूम हो जायगा कि मैं तुम्हारा पुराना साथी हूँ। इस समय मैं तुम लोगों की वह बेवकूफी जाहिर करने आया हूँ, जिसे तुम लोग खुद नहीं जानते हो। हाय, तुम्हारे प्यारे मालिक राजा गोपालसिंह के गले पर छुरी फिर जाय और तुम लोगों को खबर तक न हो? इससे भी बढ़ कर अफसोस की बात तो यह है कि राजा गोपालसिंह को मारने वाला, उनकी उम्मीदों का खून करने वाला, उनकी रिआया के दिल पर सदमा पहुँचाने वाला, उनकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला, उनके धर्म और अर्थ का सत्यानाश करने वाला, दिन-रात तुम्हारे पास रहे, तुम पर हुकूमत करे, तुम्हें बेवकूफ बनावे, और तुम उसका कुछ भी न कर सको! यह मत समझो कि राजा गोपाल सिंह को मरे हुए कई वर्ष हो गये, मैं साबित कर दूंगा कि उनके खून से गीली हुई जमीन भी अभी तक सूखी नहीं है और अगर तुम मुझ से पूछने और यह जानने की इच्छा करोगे कि तुम्हारे राजा गोपालसिंह को किसने मारा या उनका कातिल कौन है तो मैं जरूर उसका भी पता दूंगा और वास्तव में मैं इसी काम के लिए यहां आया भी हूँ।"

    छोटे नकाबपोश की इस बात ने सिपाहियों और पहरा देने वाली लौंडियों का दिल हिला दिया। राजा गोपालसिंह की याद ने और इस खबर ने कि-'उन्हें मरे बहुत दिन नहीं हुए और उनका कातिल इसी जगह रह कर उन पर हुकूमत करता है' उनके दिलों को बेचैन कर दिया। सभी की आँखों से आंसू की बूंदें जारी हो गई और हर तरफ से आवाज आने लगी-'कहो-कहो, जल्द कहो, नेक दिल गरीबपरवर और हमारे हितैषी राजा को मारने वाला दुष्ट कौन है और कहाँ है?" इसके जवाब में छोटे नकाबपोश ने पुनः कहा, 'यही कम्बख्त, जिसे इस समय मेरे साथी ने पकड़ रखा है, तुम्हारे राजा का कातिल तथा उसकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला है। इस बात से मत डरो कि इसकी इज्जत मायारानी के दरबार में बहुत है बल्कि आजमाओ और देखो कि यह मर्द है या औरत! मैं सच कहता हूँ कि यह कई वर्ष से तुम लोगों की आँखों में धूल डाल कर अर्थात् औरत बन कर तुम्हारे घर में रहता है और इस राज्य को चौपट कर रहा है, मगर तुम लोगों को इसकी कुछ भी खबर नहीं है। इतना ही नहीं, मैं तुम लोगों से एक बात और कहूँगा, मगर अभी नहीं, जरा ठहरो, घंटे भर और गम खाओ, सवेरा होने दो और हम दोनों को इसी जगह रहने देकर और कहीं ले जाने का उद्योग मत करो!”

    छोटे नकाबपोश की इस दूसरी बात ने रंग और भी चोखा कर दिया। चारों तरफ सिपाहियों और लौंडियों में गुरचूँ-गुरचूँ और काना-फूसी होने लगी। किसी की आँखों से आँसू जारी था, किसी भी गर्दन शर्म से नीची हो रही थी, किसी ने अफसोस से अपना हाथ अपने कलेजे पर रख लिया, कोई ठुड्डी पकड़ कर सोच रहा था, और कोई दाँत पीस-पीस कर धनपत की तरफ देख रहा था। यद्यपि रात का समय था मगर उन मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी, जो मायारानी के सिपाहियों के हाथ में थे और इस सबब से वहाँ की हर एक चीज साफ दिखाई दे रही थी। सिपाहियों ने धनपत का चेहरा गौर से देखा और उसमें बहुत फर्क पाया। खौफ और तरद्दुद ने धनपत को अधमरा कर दिया था और उसका रंग जर्द हो रहा था। दोनों नकाबपोशों ने जब देखा कि इस समय सिपाहियों के दिलों में जोश बखूबी पैदा हो गया है और वे लोग अब सब्र करना पसन्द न हीं करेंगे तो आपस में कुछ इशारा करने के बाद छोटे नकाबपोश ने धनपत की साड़ी का ऊपरी भाग फुर्ती से खींच लिया और उसकी चोली भी फाड़ डाली, इसके साथ ही दो बनावटी गेंद बाहर गिर पड़े और उसकी सूरत से मर्दानापन झलकने लगा। अब तो मायारानी के सिपाहियों को पूरे दर्जे पर क्रोध चढ़ आया और उन्हें निश्चय हो गया कि उनके मालिक राजा गोपालसिंह इसी कम्बख्त के सबब से मारे गए हैं। पहरा देने वाली जितनी औरतें थीं, सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे की सूरत देखने लगी और उधर सिपाहियों ने पास पहुँच कर धनपत को घेर लिया तथा उसकी दुर्गत करने लगे। ऐसी अवस्था में दोनों नकाबपोश धनपत को छोड़कर अलग जा खड़े हुए। सिपाहियों ने बारी-बारी से धनपत से प्रश्न करना शुरू किया, मगर उसकी अवस्था इस लायक न थी कि किसी के प्रश्न का उत्तर देता। बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद यह राय पक्की हुई कि धनपत को राजदीवान के पास ले चलना चाहिए और इसी के साथ-साथ इन दोनों नकाबपोशों को भी उन्हीं के सामने पेश करना उचित होगा।

    सिपाही लोग जिस समय धनपत के विषय में सोच-विचार कर रहे और क्रोध में भरे हुए थे। दोनों नकाबपोशों से जो धनपत को छोड़ अलग हो गये थे, थोड़ी देर के लिए बिल्कुल बेफिक्र और लापरवाह हो गए थे, मगर इस समय जब यह राय पक्की हुई कि धनपत के साथ ही साथ उन दोनों को भी दीवान साहब के पास ले चलना चाहिए तो उन दोनों की खोज करने लगे, मगर वे, दोनों नकाबपोश मौका पाकर ऐसा गायब हुए कि उनकी झलक तक दिखाई न दी। एक बोला, “अभी इसी जगह तो थे!” दूसरे ने कहा, “यह तो हम भी जानते हैं। मगर यह बताओ कि वे चले कहाँ गए?” तीसरे ने कहा, “भाई वे दोनों भागने वाले तो हैं नहीं, इसी जगह कहीं छिप कर हम लोगों का तमाशा देखते होंगे!” इत्यादि तरह-तरह की बातें सब लोग आपस में करने और दोनों नकाबपोशों को चारों तरफ ढूँढ़ने लगे, लेकिन दोनों वहाँ थे कहाँ, जो पता लगता! आखिर खोजते-ढूँढ़ते सुबह हो गई और इतनी ही देर में इस आश्चर्यजनक घटना की खबर जादू की तरह हवा के साथ मिल कर दूर-दूर तक फैल गई। इस समय मायारानी के सिपाही बिल्कुल ही स्वतन्त्र और खुदराय बल्कि बागियों की तरह हो रहे थे खोजने और ढूँढ़ने पर भी उन्हें जब दोनों नकाबपोशों का पता न लगा तब लाचार होकर कम्बख्त धनपत को घसीटते हुए, वे बाग के बाहर की तरफ रवाना हुए।

    जब इन बातों की खबर मायारानी को पहुँची तो वह बहुत ही घबराई। अपनी तथा धनपत की जान से नाउम्मीद होकर सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए? इस समय उसकी सुरत से उसके दिल का बहुत-कुछ पता लगता था। उसका चेहरा जर्द और पलकें नीचे की तरफ झुकी हुई थीं। कभी-कभी उसके बदन में कंप हो जाता और कभी आँखें चंचल होकर सुर्ख हो जातीं। मगर थोड़ी ही देर बाद उसके होंठ काँपने लगे और आँखों की सुर्थी बढ़ जाने के साथ ही उसका चेहरा भी लाल हो गया जिसे देखते ही वे लौंडियाँ जो उसके सामने मौजूद थीं समझ गई कि अब उसे हद दर्जे का क्रोध चढ़ आया है। कुछ सोच-विचार कर मायारानी बोल उठी, “इस समय उन कम्बख्तों को समझाने-बुझाने का उद्योग करना वृथा समय नष्ट करना है, दूसरे, मैं तिलिस्म की रानी ही क्या ठहरी, जो इन थोड़े-से कम्बख्तों को काबू में न कर सकी या इन थोड़े सिपाहियों को आज्ञा भंग करने की सजा न दे सकी!” इतना कहते ही मायारानी अपने स्थान से उठी और दीवानखाने में से होती हुई उस कोठरी में जा पहुँची, जहाँ से बाग के तीसरे दर्जे में जाने का वह रास्ता था जिसका जिक्र हम उस समय कर आये हैं जब पागल बने तेजसिंह मायारानी की आज्ञानुसार हरनामसिंह द्वारा बाग के तीसरे दर्जे में पहुँचाए गये थे।

    मायारानी कोठरी के अन्दर गई। वहाँ एक दूसरी कोठरी में जाने के लिए दरवाजा था, उस दरवाजे को खोल कर दूसरी कोठरी में गई। वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था, जिसमें उतरने के लिए जंजीर लगी हुई थी। वह इस कुएँ के अन्दर उतर गई और एक लम्बे-चौड़े स्थान में पहुँची, जहाँ बिल्कुल ही अंधकार था। मायारानी टटोलती हुई एक कोने की तरफ चली गई और वहाँ उसने कोई पेंच घुमाया, जिसके साथ ही उस स्थान में बखूबी रोशनी हो गई और वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यह रोशनी शीशे के एक गोले में से निकल रही थी, जो छत के साथ लटक रहा था। यह स्थान, जिसे एक लम्बा-चौड़ा दालान या चारों तरफ दीवार होने के कारण कमरा कहना चाहिए, अद्भुत चीजों और तरह-तरह के कल-पुर्जों से भरा हुआ था। बीच में कतार बाँध कर चौबीस खम्भे संगमरमर के खड़े थे और हर दो खम्भों के ऊपर एक-एक महरादार पत्थर चढ़ा हुआ था, जिसे मामूली तौर पर आप बिना दरवाजे का फाटक कह सकते हैं। इन महराबी पत्थरों के बीचोंबीच बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे और हर एक घण्टे के नीचे एक गरारीदार पहिया था।

    मायारानी ने हर एक महाराब को, जिस पर मोटे-मोटे अक्षर लिखे थे,

    गौर से देखना शुरू किया और एक महाराब के नीचे पहुँच कर खड़ी हो गई जिस पर यह लिखा हुआ था- "दूसरे दर्जे का तिलिस्मी दरवाजा।" मायारानी ने उस पहिये, को घुमाना शुरू किया जो उस महराब में लटकते हुए घण्टे के नीचे था। पहिया चारपाँच दफे घूम कर रुक गया, तब मायारानी वहाँ से हटी और यह कहती हुई घूम कर सामने वाली दीवार के पास गई कि 'देखें अब वे कम्बख्त क्योंकर बाग के बाहर जाते हैं!' दीवार में नम्बरवार बिना पल्ले की पाँच गालमारियाँ थीं और हर एक आलमारी में चार दर्जे बने हुए थे। पहिली आलमारी में शीशे की सुराहियाँ थीं, दूसरी में तांबे के बहुत से डिब्बे थे, तीसरी कागज के मुट्ठों से भरी थी, जिन्हें दीमकों ने बर्बाद कर डाला था, चौथी अष्ट धातु की छोटी-छोटी बहुत-सी मूरतें थीं और पांचवीं आलमारी में केवल चार ताम्रपत्र थे जिनमें खूबसुरत उभरे हुए अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।

    मायारानी उस आलमारी के पास गई जिसमें शीशे की सुराहियाँ थीं और एक सुराही उठा ली। शायद उसमें किसी तरह का अर्क था, जिसे थोड़ा-सा पीने के बाद सुराही हाथ में लिए हए, वहाँ से हटी और दूसरी आलमारी के पास गई, जिसमें तांबे के डिब्बे थे। एक डिब्बा उठा लिया और वहाँ से रवाना हुई। जिस तरह उसका जाना हम लिख आये हैं, उसी तरह घूमती हई वह अपने दीवानखाने में पहुँची। जिसके आगे तरह-तरह के खुशनुमा पत्तों वाले खूबसूरत गमले सजाये हुए थे। वहाँ पहुँच कर उसने वह डिब्बा खोला। उसके अन्दर एक प्रकार की बुकनी भरी हुई थी। उसमें से आधी बुकनी अपने हाथ से खूबसूरत गमलों में छिड़कने के बाद बची हुई आधी बुकनी डिब्बे में लिए हुए वह दीवानखाने की छत पर चढ़ गई और अपने साथ केवल एक लौंडी को जिसका नाम लीला था और जो उसकी सब लौंडियों की सरदार थी, लेती गई। यह सब काम, जो हम ऊपर लिख आये हैं, मायारानी ने बड़ी फुर्ती से उसके पहले-पहले ही कर लिया जब तक कि उसके बागी सिपाही धनपत को लिए हुए बाग के दूसरे दर्जे के बाहर जायें।

    जब मायारानी लीला को साथ लिये हए दीवानखाने की छत पर चढ़ गई तब उसने एक सुराही दिखाकर लीला से कहा, "चल्लू कर, इसमें से थोड़ा सा अर्क तुझे देती हूँ उसे पी जा और आफत से बची रह, जो थोड़ी ही देर में यहाँ के रहने वालों पर आने वाली है।"

    लीला—(हाथ फैला कर) मैं खूब जानती हूँ कि आपकी मेहरबानी जितनी मुझ पर रहती है उतनी और किसी पर नहीं।

    मायारानी—(लीला की अंजुली में अर्क डाल कर) इसे जल्दी पी जा और जो कुछ मैं कहती हूँ उसे गौर से सुन।

    लीला-बेशक मैं पूरा ध्यान देकर सुनंगी, क्योंकि इस समय आपकी अवस्था बिल्कुल ही बदल रही है और यह जानने के लिए मेरा जी बहुत बेचैन है कि अब क्या किया जायगा?

    मायारानी—मैं अपने भेद तुझसे छिपा नहीं रखती। जो कुछ मैं कर चुकी हूँ तुझे सब मालूम है। केवल दो भेद मैंने तझसे छिपाए, जिनमें से एक तो आज खुल ही

    गया और एक का हाल मैं तुझसे फिर किसी समय कहूँगी। इन भेदों के विषय में मेरा विश्वास था कि यदि किसी को मालूम हो जायगा तो मेरी जान आफत में फंस जायगी और आखिर वैसा ही हुआ। तू देख ही चुकी है कि दो कम्बख्त नकाबपोशों ने यहाँ पहुँच कर क्या गजब मचा रखा है। अब जहाँ तक मैं समझती हूं, धनपत का भेद छिपा रहना बहुत मुश्किल है और साथ ही इसके कम्बख्त फौजी सिपाहियों का भी मिजाज बिगड़ गया है। मान लिया जाय कि अगर मैंने किसी तरह की बुराई की भी तो उनको मेरे खिलाफ होना मुनासिब न था। खैर, सिपाही लोग तो उजड्ड हुआ ही करते हैं, मगर मुझसे बुराई करने का नतीजा कदापि अच्छा न होगा। अफसोस, उन लोगों ने इस बात पर ध्यान न दिया कि आखिर मायारानी तिलिस्म की रानी है! देख, मैंने इस बाग के बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया, अब उन लोगों की मजाल नहीं कि यहां से बाहर जा सकें, बल्कि थोड़ी ही देर में तू देखेगी कि उन लोगों को मैं कैसे हलाल करती हूँ। यह दवा जो मैंने गमलों में छिड़की है, बहुत ही तेज और अपनी महक दूर-दूर तक फैलाने वाली है, इससे बढ़कर बेहोशी की कोई दवा दुनिया में न होगी, और यही उन बदमाशों के साथ जहर का काम करेगी। तू उन सभी के पास जा और उन्हें ऊंच-नीच समझा कर मेरे पास ले आ–या-नहीं, अच्छा देख-खैर जाने दे—मैं तुझसे एक बात और कहती हूँ-यह तो मैं समझ ही चुकी कि अब मेरी जान जाना चाहती है मगर तो भी हजारों को मारे बिना मैं न छोडूंगी। अफसोस, वे दोनों कम्बख्त नकाबपोश न मालूम कहाँ चले गए। खैर, देखा जायगा-ओफ, (अपनी ठुड्डी पकड़ के) मुझे शक है-एक तो उनमें से जरूर–हाँ जरूर-जरूर-बेशक वही है और होगा, दूसरा भी-मैं समझ गई, मगर ओफ, उस चीज का जाना ही बुरा हुआ। अच्छा अब मैं दूसरे काम की फिक्र करती हूँ, अब तो जान पर खेलना ही पड़ा, एक दफे तो मुझे तुझे छोड़ हाँ, तू मेरा मतलब तो समझ गई न? इस समय मेरी तबीयत-अच्छा, तू जा, देख मान जाय तो ठीक है, नहीं तो आज इस बाग को मैं उन्हीं के खून से तर करुँगी!

    इस समय मायारानी की बातें यद्यपि बिल्कुल बेढंगी और बेतुकी थों तथापि चालाक और धूर्त लीला उसका मतलब समझ गई और यह कहती हुई वहाँ से रवाना हुई, "आप चिन्ता न कीजिए, मैं अभी जाकर उन सभी को ठीक करती हूँ। जरा आप अपना मिजाज ठिकाने कीजिए और तिलिस्मी कवच को भी झटपट…"

    5

    मायारानी के सिपाही जो दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने आए थे, धनपत को लिए हुए बाग के पहले दर्जे की तरफ रवाना हुए जहाँ वे रहा करते थे, मगर वे इच्छानुसार अपने ठिकाने न पहुँच सके, क्योंकि बाग के दूसरे दर्जे के बाहर निकलने का रास्ता मायारानी की कारीगरी से बन्द हो गया था। ये दरवाजे तिलिस्मी और बहुत

    ही मजबूत थे और इनका खोलना या तोड़ना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। पाठकों को याद होगा कि बाग के दूसरे दर्जे और पहले दर्जे के बीच में एक बहुत लम्बी-चौड़ी दीवार थी जिस पर कमन्द लगा कर चढ़ना भी असम्भव था और सीढ़ियों के जरिए उस दीवार पर चढ़ और उसे लाँघ कर ही एक दर्जे से दूसरे दर्जे में जाना होता था। इस समय जो दरवाजा मायारानी ने तिलिस्मी रीति से बन्द किया है इसी के बाद वह दीवार पड़ती थी जिसे लाँघ कर सिपाही लोग पहले दर्जे में जाते थे। उस दीवार पर चढ़ने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं वे लोहे की थीं और इस समय दोनों तरफ की सीढ़ियाँ दीवार के अन्दर घुस गई थीं इसलिए दीवार पर चढ़ना एकदम असम्भव हो गया था।

    दरवाजे को तिलिस्मी रीति से बन्द देखकर सिपाही लोग समझ गए कि यह मायारानी की कार्रवाई है। इसलिए उन लोगों के दिल में डर पैदा हुआ और वे सोचने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि मायारानी हम लोगों को इसी बाग में फँसा कर मार डाले, क्योंकि आखिर वह तिलिस्म की रानी है, मगर यह विचार उन लोगों के दिल में ज्यादा देर तक न रहा क्योंकि राजा गोपालसिंह के साथ दगा किये जाने का जो हाल नकाबपोशों की जुबानी सुना था उस पर उन लोगों को पूरा-पूरा विश्वास हो गया था और इसी सबब से गुस्से के मारे उन सब की अवस्था ही बदली हुई थी।

    आखिर धनपत को साथ लिए हुए वे सिपाही यह सोच कर पीछे की तरफ लौटे कि उस चोरदरवाजे की राह से बाहर निकल जायँगे जिस राह से दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर घुसे थे, मगर उस ठिकाने पर पहुँचकर भी वे लोग बहुत ही घबराये और ताज्जुब करने लगे क्योंकि उन्हें वह खिड़की कहीं नजर न आई। हाँ एक निशान दीवार में जरूर पाया जाता था, जिससे यह कहा जा सकता था कि शायद इसी जगह वह खिड़की रही होगी। यह निशान भी मामूली न था बल्कि ऐसा मालूम होता था कि दीवार वाले चोरदरवाजे पर फौलादी चादर जड़ दी गई है। अब उन सिपाहियों को पहले से भी ज्यादा तरदुद्द हुआ क्योंकि सिवाय उन दोनों रास्तों के बाहर निकलने का कोई और जरिया न था। एक बार उन सिपाहियों के दिल में यह भी आया कि मायारानी की तरफ चलना चाहिए, मगर खौफ से ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी।

    उस समय दिन घण्टे भर से कुछ ज्यादा चढ़ चुका था। सिपाही लोग क्रोध की अवस्था में भी तरदुद्द और घबराहट से खाली न थे और खड़े-खड़े सोच ही रहे थे कि किधर जाना और क्या करना चाहिए कि इतने ही में सामने से लीला आती हुई दिखाई पड़ी। जब वह पास पहुंची तो सिपाहियों की तरफ देख कर ऊँची आवाज में बोली, "तुम लोग अपनी जान के दुश्मन क्यों हो रहे हो? क्या तुम जमानिया राज्य के नौकर हो कर भी इस बात को भूल गए कि मायारानी एक भारी तिलिस्म की रानी है और जो चाहे कर सकती है? दो-चार सौ आदमियों को बरबाद कर डालना उसके लिए एक अदना काम है। अफसोस, ऐसे मालिक के खिलाफ होकर तुम अपनी जान बचाना चाहते हो? याद रक्खो कि इस बाग में भूखे-प्यासे मर जाओगे, तुम्हारे किए कुछ भा न होगा। मैं तुम लोगों को समझाती हूँ और कहती हैं कि अपने मालिक के पास चलो और उससे माफी मांग कर अपनी जान बचाओ।" इसी तरह की ऊँच-नीच की बहुत-सी बातें लीला उन सिपाहियों से देर तक कहती रही और सिपाही लोग भी लीला की बात पर गौर कर ही रहे थे कि यकायक बाईं तरफ से एक शंख के बजने की आवाज आई, घूम कर देखा तो वे ही दोनों नकाबपोश दिखाई पड़े जो हाथ के इशारे से उन सिपाहियों को अपनी तरफ बुला रहे थे। उन्हें देखते ही सिपाहियों की अवस्था बदल गई और उनके दिल के अन्दर उम्मीद, रंज, डर और तरदुद्द का चर्खा तेजी के साथ घूमने लगा। लीला की बातों पर जो कुछ सोच कर रहे थे उसे छोड़ दिया और धनपत को साथ लिए हुए इस तरह दोनों नकाबपोशों की तरफ बढ़े जैसे प्यासे पंसाले (पौसारे) की तरफ लपकते हैं।

    जब उन दोनों नकाबपोशों के पास पहुंचे तो एक नकाबपोश ने पुकार कर कहा, "इस बात से मत घबराओ कि मायारानी ने तुम लोगों को मजबूर कर दिया और इस बाग से बाहर जाने लायक नहीं रक्खा। आओ हम तुम सभी को इस बाग से बाहर कर देते हैं मगर इसके पहले तुम्हें एक ऐसा तमाशा दिखाना चाहते हैं जिसे देख कर तुम बहुत ही खुश हो जाओगे और हद से ज्यादा बेफिक्री तुम लोगों के भाग में पड़ेगी, मगर वह तमाशा हम एकदम से सभी को नहीं दिखाना चाहते। मैं एक कोठरी में (हाथ का इशारा करके) जाता हूँ, तुम लोग बारी-बारी से पांच-पाँच आदमी आओ और अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा तथा आश्चर्यजनक तमाशा देखो।"

    इस समय दोनों नकाबपोश जिस जगह खड़े थे, उसके पीछे की तरफ एक दीवार थी जो बाग के दूसरे और तीसरे दर्जे की हद को अलग कर रही थी और उसी जगह पर एक मामूली कोठरी भी थी। बात पूरी होते ही दोनों नकाबपोश पाँच सिपाहियों को अपने साथ आने के लिए कहकर उस कोठरी के अन्दर घुस गए। इस समय इन सिपाहियों की अवस्था कैसी थी, इसे दिखाना जरा कठिन है। न तो इन लोगों का दिल उन दोनों नकाबपोशों के साथ दुश्मनी करने की आज्ञा देता था और न यही कहता था कि उन दोनों को छोड़ दो और जिधर जाएँ जाने दो।

    जब दोनों नकाबपोश कोठरी के अन्दर घुस गए तो उसके बाद पाँच सिपाही जो दिलावर और ताकतवर थे कोठरी में घुसे और चौथाई घड़ी तक उसके अन्दर रहे। इसके बाद जब वे उस कोठरी के बाहर निकले तो उनके साथियों ने देखा कि उन पाँचों के चेहरे से उदासी झलक रही है, आँखों से आँसू की बूंदें टपक रही हैं और वे सिर झुकाए अपने साथियों की तरफ आ रहे हैं। जब पास आए तो उन पाँचों की अवस्था एकदम बदल जाने का सबब सिपाहियों ने पूछा जिसके जवाब में उन पांचों ने कहा, "पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम लोग पाँच-पाँच आदमी बारी-बारी से जाओ और जो कुछ है अपनी आँखों से देख लो, हम लोगों से पूछोगे तो कुछ भी न बतायेंगे, हां इतना अवश्य कहेंगे कि वहाँ जाने में किसी तरह का हर्ज नहीं है।"

  • चन्द्रकांता सन्तति २

    चन्द्रकांता सन्तति २

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    चन्द्रकांता सन्तति २
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    पाँचवाँ भाग

    1

    बेचारी किशोरी को चिता पर बैठाकर जिस समय दुष्टा धनपति ने आग लगाई, उसी समय बहुत-से आदमी, जो उसी जंगल में किसी जगह छिपे हुए थे, हाथों में नंगी तलवारें लिये 'मारो! मारो!' कहते हुए उन लोगों पर आ टूटे। उन लोगों ने सबसे पहले किशोरी को चिता पर से खींच लिया और इसके बाद धनपति के साथियों को पकड़ने लगे।

    पाठक समझते होंगे कि ऐसे समय में इन लोगों के आ पहुँचने और जान बचने से किशोरी खुश हुई होगी और इन्द्रजीतसिंह से मिलने की कुछ उम्मीद भी उसे हो गई होगी। मगर नहीं, अपने बचानेवालों को देखते ही किशोरी चिल्ला उठी और उसके दिल का दर्द पहले से भी ज्यादा बढ़ गया। किशोरी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, "मुझे तो विश्वास हो गया था कि इस चिता में जलकर ठंडे-ठंडे बैकुण्ठ चली जाऊँगी, क्योंकि इसकी आँच कुँअर इन्द्रजीतसिंह की जुदाई की आँच से ज्यादा गर्म न होगी, मगर हाय, इस बात का गुमान भी न था कि यह दुष्ट आ पहुँचेगा और मैं एक सचमुच की तपती हुई भट्ठी में झोंक दी जाऊँगी। मौत, तू कहाँ है? तू कोई वस्तु है भी या नहीं, मुझे तो इसी में शक है!"

    वह आदमी, जिसने ऐसे समय में पहुँचकर किशोरी को बचाया, माधवी का दीवान अग्निदत्त था, जिसके चंगुल में फँसकर किशोरी ने राजगृह में बहुत दुःख उठाया था और कामिनी की मदद से, जिसका नाम कुछ दिनों तक किन्नरी था, छुट्टी मिली थी। किशोरी को अपने मरने की कुछ भी परवाह न थी और वह अग्निदत्त की सूरत देखने की बनिस्बत मौत को लाख दर्जे उत्तम समझती थी, यही सबब था कि इस समय उसे अपनी जान बचने का रंज हुआ।

    अग्निदत्त और उसके आदमियों ने किशोरी को तो बचा लिया, मगर जब उसके दुश्मनों को, अर्थात् धनपति और उसके साथियों को, पकड़ने का इरादा किया तो लड़ाई गहरी हो पड़ी। मौका पाकर धनपति भाग गई और गहन वन में किसी झाड़ी के अन्दर छिपकर उसने अपनी जान बचाई। उसके साथियों में से एक भी न बचा, सब मारे गये। अग्निदत्त के भी केवल दो ही आदमी जीवित बचे। उस संगदिल ने रोती और चिल्लाती हुई बेचारी किशोरी को जबर्दस्ती उठा लिया और एक तरफ का रास्ता लिया।

    पाठक आश्चर्य करते होंगे कि अग्निदत्त को तो राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने राजगृह में गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया था, वह यकायक यहाँ कैसे आ पहुँचा? इसलिए अग्निदत्त का थोड़ा-सा हाल इस जगह लिख देना हम मुनासिब समझते हैं।

    राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने दीवान अग्निदत्त को गिरफ्तार करके अपने बीस सवारों के पहरे में चुनारगढ़ रवाना कर दिया और एक चिट्ठी भी सब हाल की महाराज सुरेन्द्रसिंह को लिखकर उन्हीं लोगों की मार्फत भेजी। अग्निदत्त को हथकड़ी डाल घोड़े पर सवार कराया गया और उसके पैर रस्सी से घोड़े की जीन के साथ बाँध दिये गए। घोड़े की लम्बी बागडोर दोनों तरफ से दो सवारों ने पकड़ ली और सफर शुरू किया। तीसरे दिन जब वे लोग सोन नदी के पास पहुँचे, अर्थात् जब वह नदी दो कोस दूर रह गई, तब उन लोगों पर डाका पड़ा। पचास आदमियों ने चारों तरफ से घेर लिया। घण्टे भर की लड़ाई में राजा वीरेन्द्रसिंह के सब आदमी मारे गये। खबर पहुँचाने के लिए भी एक आदमी न बचा और अग्निदत्त को उन लोगों के हाथों से छुट्टी मिली। वे डाकू सब अग्निदत्त के तरफदार और उन लोगों में से थे जो गयाजी में फसाद मचाया करते और उन लोगों की जानें लेते और घर लूटते थे जो दीवान अग्निदत्त के विरुद्ध जाने जाते। इस तरह अग्निदत्त को छुट्टी मिली और बहुत दिन तक इस डाके की खबर राजा वीरेन्द्रसिंह या उनके आदमियों को न मिली।

    यद्यपि दीवान अग्निदत्त के हाथ से गया की दीवानी जाती रही और वह एक साधारण आदमी की तरह मारा-मारा फिरने लगा, तथापि वह अपने साथी डाकुओं में मालदार गिना जाता था क्योंकि उसके पास जुल्म की कमाई हुई दौलत बहुत थी और वह उस दौलत को राजगृह से थोड़ी दूर पर एक मढ़ी में, जो पहाड़ी के ऊपर थी, रखता था। इस मढ़ी का हाल दस-बारह आदमियों के सिवाय और किसी को भी मालूम न था। उस दौलत को निकालने में अग्निदत्त ने विलम्ब न किया और उसे अपने कब्जे में लेकर साथी डाकुओं के साथ अपनी धुन में चारों तरफ घूमने तथा इस बात की टोह लेने लगा कि राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ क्या होता है।

    थोड़े ही दिन बाद मौका समझकर वह रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमने लगा और जिस तरह किशोरी से मिला, उसका हाल आप ऊपर पढ़ चुके हैं।

    जिस जगह अग्निदत्त किशोरी से मिला था, उससे थोड़ी ही दूर पर एक पहाड़ी थी जिसमें कई खोह और गार थे। वह किशोरी को उठाकर उसी पहाड़ी पर ले गया। रोते और चिल्लाते-चिल्लाते किशोरी बेहोश हो गई थी। अग्निदत्त ने उसे खोह के अन्दर ले जाकर लिटा दिया और आप बाहर चला आया।

    पहर रात जाते-जाते जब किशोरी होश में आई, तो उसने अपने को अजब हालत में पाया। ऊपर-नीचे चारों तरफ पत्थर देखकर वह समझ गई कि मैं किसी खोह में हूँ। एक तरफ चिराग जल रहा था‌। गुलाब की फूल-सी नाजुक किशोरी की अवस्था इस समय बहुत ही नाजुक थी। अग्निदत्त की याद से उसे घड़ी-घड़ी में रोमांच होता था। उसके धड़कते हुए कलेजे में अजब तरह का दर्द था। और इस सोच ने उसे बिल्कुल ही निकम्मा कर रखा था कि देखें चाण्डाल अग्निदत्त के पहुँचने पर मेरी क्या दुर्दशा होती है। घण्टों की मेहनत में बड़ी कोशिश करके उसने अपने होश-हवास दुरुस्त किए और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उसने इस इरादे को तो पक्का कर ही लिया था कि अगर अग्निदत्त मेरे पास आवेगा, तो पत्थर पर सिर पटक कर अपनी जान दे दूँगी, मगर यह भी सोचती थी कि पत्थर पर सिर पटकने से जान नहीं जा सकती, किसी तरह खोह के बाहर निकल कर ऐसा मौका ढूँढ़ना चाहिए कि अपने को इस पहाड़ के नीचे गिराकर बखेड़ा खत्म कर दिया जाय, जिसमें हमेशा के लिए इस खिंचाखिंची से छुट्टी मिले।

    किशोरी चिराग बुझाने के लिए उठी ही थी कि सामने से किसी के पैरों की चाप मालूम हुई। वह डर कर उसी तरफ देखने लगी कि यकायक अग्निदत्त पर नजर पड़ी। देखते ही वह काँप गई, ऐसा मालूम हुआ कि रगों में खून की जगह पारा भर गया। वह अपने को किसी तरह सम्हाल न सकी और जमीन पर बैठ कर रोने लगी। अग्निदत्त सामने आकर खड़ा हो गया और बोला––

    अग्निदत्त––तुमने मुझको बड़ा ही धोखा दिया। अपने साथ मेरी लड़की को भी मुझसे जुदा कर दिया। अभी तक मुझे इस बात का पता न लगा कि मेरी स्त्री पर क्या बीती और वीरेन्द्रसिंह ने उसके साथ क्या सलूक किया, और यह सब तुम्हारी बदौलत हुआ।

    किशोरी––फिर भी मैं कहती हूँ कि यदि मुझे छोड़ दोगे, तो मैं राजा वीरेन्द्रसिंह से कहकर तुम्हारा कसूर माफ करा दूँगी और तुम्हारी जीविका-निर्वाह के लिए भी बन्दोबस्त हो जायगा। नहीं तो याद रखना, तुम्हारी स्त्री भी…

    अग्निदत्त––जो तुम कहोगी, सो मैं समझ गया। मेरी स्त्री पर चाहे जो बीते इसकी परवाह नहीं, न मुझे वीरेन्द्रसिंह का डर है। मुझे दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई चीज नहीं दिखाई देती। देखो, तुम्हारे लिए मैंने कितना दुख भोगा और भोगने को तैयार हूँ, क्या अब भी तुमको मुझ पर तरस नहीं आता! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हें अपनी जान से ज्यादा प्यार करूँगा, यदि मेरी होकर रहोगी।

    किशोरी––अरे दुष्ट चाण्डाल, खबरदार, फिर ऐसी बात मुँह से न निकालना!

    अग्निदत्त––चाहे जो हो, मैं तुम्हें किसी तरह नहीं छोड़ सकता!

    किशोरी––जान जाय तो जाय, मगर तेरी हवा अपने बदन से नहीं लगने दूँगी।

    अग्निदत्त––(हँस कर) देखूँ, तू अपने को मुझसे कैसे बचाती है!

    इतना कहकर अग्निदत्त किशोरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। किशोरी घबराकर उठ खड़ी हुई और दूर हट गई। थोड़ी देर तक तो इस तंग जगह में दौड़-धूप कर किशोरी ने अपने को बचाया, मगर कहाँ तक? आखिर मर्द के सामने औरत की क्या पेश आ सकती थी! अग्निदत्त को क्रोध आ गया। उसने किशोरी को पकड़ लिया और जमीन पर पटक दिया।

    2

    पाठक अभी भूले न होंगे कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह कहाँ हैं। हम ऊपर लिख आए हैं कि उस मकान में जो तालाब के अन्दर बना हुआ था, कुँअर इन्द्रजीतसिंह दो औरतों को देखकर ताज्जुब में आ गए। कुमार उन औरतों का नाम नहीं जानते थे मगर पहचानते जरूर थे, क्योंकि उन्हें राजगृह में माधवी के यहाँ देख चुके थे और जानते थे कि ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं। परन्तु यह जानने के लिए कुमार व्याकुल हो रहे थे कि ये दोनों ‌यहाँ कैसे आई। क्या इस औरत से, जो इस मकान की मालिक है, और उस माधवी से कोई सम्बन्ध है? इसी समय उन दोनों औरतों के पीछे-पीछे वह औरत भी आ पहुँची जिसने इन्द्रजीतसिंह के ऊपर अहसान किया था और जो उस मकान की मालिक थी। अभी तक इस औरत का नाम मालूम नहीं हुआ, मगर आगे इससे काम बहुत पड़ेगा, इसलिए जब तक इसका असल नाम मालूम न हो कोई बनावटी नाम रख दिया जाय तो उत्तम होगा, मेरी समझ में तो कमलिनी नाम कुछ बुरा न होगा।

    जिस समय कुँअर इन्द्रजीतसिंह की निगाह उन दोनों औरतों पर पड़ी, वे हैरान होकर उनकी तरफ देखने लगे। उसी समय दौड़ती हुई कमलिनी भी आई और दूर ही से बोली––

    कमलिनी––कुमार, इन दोनों हरामजादियों का कोई मुलाहिजा न कीजिएगा और न किसी तरह की जुबान ही दीजिएगा। अपनी जान बचाने के लिए ही दोनों आपके पास आई हैं।

    इन्द्रजीतसिंह––क्या मामला है? ये दोनों कौन हैं?

    कमलिनी––ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं और आपकी जान लेने आई थीं। मेरे आदमियों के हाथ गिरफ्तार हो गईं।

    इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारे आदमी कहाँ हैं? मैंने तो इस मकान में सिवाय तुम्हारे किसी को भी नहीं देखा!

    कमलिनी––बाहर निकलकर देखिये, मेरे वे सिपाही यहीं मौजूद हैं जिन्होंने इन्हें गिरफ्तार किया।

    इन्द्रजीतसिंह––अगर ये गिरफ्तार होकर आई हैं तो इनके हाथ-पैर खुले क्यों हैं?

    कमलिनी––इसके लिए कोई हर्ज नहीं। ये मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, जब तक कि मैं जागती हूँ या अपने होश में हूँ।

    इन्द्रजीतसिंह––(उन दोनों की तरफ देखकर) तुम क्या कहती हो?

    एक––(कमलिनी की तरफ इशारा करके) ये जो कुछ कहती हैं, ठीक है। परन्तु आप वीर पुरुष हैं, आशा है कि हम लोगों का अपराध क्षमा करेंगे!

    कुँअर इन्द्रजीतसिंह इन बातों को सुनकर सोच में पड़ गये। उन्हें उन दोनों औरतों की और कमलिनी की बातों का विश्वास न हुआ, बल्कि यकीन हो गया कि ये लोग किसी तरह का धोखा देना चाहती हैं। आधी घड़ी तक सोचने के बाद कुमार बँगले के बाहर निकले तो देखा कि तालाब के बाहर लगभग बीस सिपाही खड़े आपस में कुछ बातें कर रहे और घड़ी-घड़ी इसी तरफ देख रहे हैं। कुमार वहाँ से लौट आये और कमलिनी की तरफ देखकर बोले––

    इन्द्रजीतसिंह––खैर, जो तुम्हारे जी में आये करो, हम इस बारे में कुछ नहीं कह सकते।

    कमलिनी––करना क्या है, इन दोनों का सिर काटा जायगा।

    इन्द्रजीतसिंह––खुशी तुम्हारी। मैं जरा इस तालाब के बाहर जाना चाहता। हूँ।

    कमलिनी––क्यों?

    इन्द्रजीतसिंह––यह समय मजेदार है। जरा मैदान की हवा खाऊँगा और उस घोड़े की भी खबर लूँगा जिस पर सवार होकर आया था।

    कमलिनी––इस मकान की छत पर चढ़ने से अच्छी और साफ हवा आपको मिल सकती है। घोड़े के लिए चिन्ता न करें, या फिर ऐसा ही है तो सवेरे जाइयेगा!

    न मालूम, क्या सोचकर इन्द्रजीतसिंह चुप हो रहे। कमलिनी ने उन दोनों औरतों का हाथ पकड़ा और धमकाती हुई न जाने कहाँ ले गई, इसका हाल कुमार को न मालूम हुआ और न उन्होंने जानने का उद्योग ही किया।

    यद्यपि इस औरत अर्थात् कमलिनी ने कुमार की जान बचाई थी, तथापि उन्हें विश्वास हो गया कि कमलिनी ने दोस्ती की राह पर यह काम नहीं किया, बल्कि किसी मतलब से किया है। उस मकान में गुलदस्ते के नीचे से जो चिट्ठी कुमार ने पाई थी, उसके पढ़ने से कुमार होशियार हो गये थे तथा समझ गये थे कि यह मुझे किसी फरेब में फँसाना चाहती है और किशोरी के साथ भी किसी तरह की बुराई किया चाहती है। इसमें कोई शक नहीं कि कुमार इसे चाहने लगे थे और जान बचाने का बदला चुकाने की फिक्र में थे, मगर उस चिट्ठी के पढ़ते ही उनका रंग बदल गया और वे किसी दूसरी ही धुन में लग गए।

    कुमार चाहते तो शायद यहाँ से निकल भागते, क्योंकि उस औरत की तरफ से होशियार हो चुके थे, मगर इस काम में उन्होंने यह समझकर जल्दी न की कि इस औरत का कुछ हाल मालूम करना चाहिए और जानना चाहिए कि यह कौन है। पर कमलिनी को कुमार के दिल की क्या खबर थी, उसने तो सोच रखा था कि मैंने कुमार पर अहसान किया है और वे किसी तौर पर मुझसे बदगुमान न होंगे।

    कुमार के पास इस समय सिवाय कपड़ों के कोई चीज ऐसी न थी जिससे वे अपनी हिफाजत करते या समय पड़ने पर मतलब निकाल सकते।

    कुछ दिन बाकी था जब कुमार उस मकान की छत पर चढ़ गए और चारों तरफ के पहाड़, जंगल तथा मैदान के बाहर देखने लगे। कुमार को यह जगह बहुत ही पसन्द आई और उन्होंने दिल में कहा कि यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो सब बखेड़ों से छुट्टी पा कर किशोरी के साथ कुछ दिनों तक इस मकान में जरूर रहेंगे। थोड़ी देर तक प्रकृति की शोभा देखकर दिल बहलाते रहे, जब सूर्य अस्त हो गया तो कमलिनी भी वहाँ पहुँची और कुमार के पास खड़ी होकर बातचीत करने लगी।

    कमलिनी––यहाँ से अच्छी बहार दिखाई देती है।

    कुमार––ठीक है मगर यह छटा मेरे दिल को किसी तरह नहीं बहला सकती।

    कमलिनी––सो क्यों?

    कुमार––तरह-तरह की फिक्रों और तरद्दुदों ने मुझे दुखी कर रखा है, बल्कि यहाँ आने और तुम्हारे मिलने से तरद्दुद और भी ज्यादा हो गया।

    कमलिनी––यहाँ आकर कौन सी फिक्र बढ़ गई?

    कुमार––यह तो तब कह सकता हूँ जब कुछ तुम्हारा हाल मुझे मालूम हो। अभी तो मैं यह भी नहीं जानता कि तुम कौन हो और कहाँ की रहने वाली हो और इस मकान में आके रहने का सबब क्या है।

    कमलिनी––कुमार, मुझे आपसे बहुत बातें कहनी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मेरे बारे में आप तरह-तरह की बातें सोचते होंगे, कभी मुझे खैर-ख्वाह तो कभी बदख्वाह समझते होंगे, बल्कि बदख्वाह समझने का मौका ही ज्यादा मिलता होगा। अक्सर उन लोगों ने जो मुझे जानते हैं, मुझे शैतान और खूनी समझ रखा है, और इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। मैं उन लोगों का जिक्र इस समय केवल इसीलिए करती हूँ कि शायद उन लोगों ने, जो केवल दो-तीन ऐयार लोग हैं, कुछ चर्चा आपसे की हो।

    कुमार––नहीं, मैंने किसी से कभी तुम्हारा जिक्र नहीं सुना।

    कमलिनी––खैर, ऐसा मौका न पड़ा होगा। पर मेरा मतलब यह है कि जब तक मैं अपने मुँह से कुछ न कहूँगी, मेरे बारे में कोई भी अपनी राय ठीक नहीं कह सकता और …

    इतने ही में सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आवाज मालूम हुई जिसे सुनकर दोनों चौंके और उसी तरफ देखने लगे।

    कुमार––इस मकान में तो केवल तुम्हीं रहती हो?

    कमलिनी––नहीं, और भी कई आदमी रहते हैं, मगर वे लोग उस समय नहीं थे जब आप आए थे।

    दो लौंडियाँ आती हुई दिखाई पड़ीं। एक के हाथ में छोटा-सा गलोचा था, दूसरी के हाथ में शमादान और तीसरी पानदान लिये हुए थी। गलीचा बिछा दिया गया, शमादान और पानदान रखकर लौंडियाँ हाथ जोड़े सामने खड़ी हो गई। कमलिनी के कहने से कुमार गलीचे पर बैठ गए और कमलिनी भी पास बैठ गई। इस समय इन तीनों लौंडियों का वहाँ पहुँचकर बातचीत में बाधा डालना कुमार को बहुत बुरा मालूम हुआ, क्योंकि वे बड़े ही गौर से कमलिनी की बातें सुन रहे थे और इस बीच में उनके दिल की अजीब हालत थी। कुमार ने कमलिनी की तरफ देख के कहा, "हाँ, तुम अपनी बातों का सिलसिला मत तोड़ो।"

    कमलिनी––(लौंडियों की तरफ देखकर) अच्छा, तुम लोग जाओ! बहुत जल्दी खाने का बन्दोबस्त करो। कुमार––अभी खाने के लिए जल्दी न करो।

    कमलिनी––खैर, ये लोग अपना काम पूरा कर रखें, आप जब चाहें, भोजन करें।

    कुमार––अच्छा हाँ, तब?

    कमलिनी––(डिब्बे से पान निकालकर) लीजिए, पान खाइए।

    कुमार ने पान हाथ में रख लिया और पूछा, "हाँ, तब?"

    कमलिनी––पान खाइए, आप डरिए मत, इसमें बेहोशी की दवा नहीं मिली है। हाँ, अगर आप ऐसा खयाल करें भी तो कोई बेमौका नहीं!

    कुमार––(हँस कर) इसमें कोई शक नहीं कि इतनी खैरख्वाही करने पर भी मैं तुम्हारी तरफ से बदगुमान हूँ। मगर तुम्हारी बातें अजब ढंग पर चल रही हैं। (पान खाकर) अब जो हो, जब तुमने मेरी जान बचाई है तो कब हो सकता है कि तुम अपने हाथ से मुझे जहर दो।

    कमलिनी––(हँसकर) कुमार, यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि आप मुझ पर शक करें। माधवी की दोनों लौंडियों का मामला, जो अभी थोड़ी देर हुआ, आप देख चुके हैं, मुझ पर शक करने का मौका आपको देगा। मगर नहीं, आप पूरा विश्वास रखिए कि मैं आपके साथ कभी बुराई न करूँगी। कई आदमी मेरी शिकायत आपसे करेंगे, आप ही के कई ऐयार असल हाल न जानने के कारण मेरे दुश्मन हो जायँगे, मगर सिवाय कसम खाकर कहने के और किस तरह आपको विश्वास दिलाऊँ कि मैं आपकी खैरख्वाह हूँ। आप यह भी सोच सकते हैं कि मैं आपके साथ इतनी खैरख्वाह क्यों हो रही हूँ! दुनिया का कायदा है कि बिना मतलब कोई किसी का काम नहीं करता और मैं भी दुनिया के बाहर नहीं हूँ, अस्तु मैं भी आपसे बहुत-कुछ उम्मीद करती हूँ मगर उसे जुवान से कह नहीं सकती। अभी आपको मुझसे वर्षों तक काम पड़ेगा, जब आप हर तरह से निश्चिन्त हो जायँगे, आपकी किशोरी, जो इस समय रोहतासगढ़ में कैद है, आपको मिल जायगी। इसके अतिरिक्त एक और भी भारी काम आपके हाथ से हो लेगा, तब कहीं मेरी मुराद पूरी होगी, अर्थात् उस समय मुझे जो कुछ आपसे माँगना होगा, माँगूंगी। आप मेरी बात याद रखिएगा कि आप ही के ऐयार मेरे दुश्मन होंगे और अन्त में झख मार के मुझ ही से दोस्ती के तौर पर सलाह लेनी पड़ेगी। आप यह भी न समझिए कि मैं आज या कल से आपकी तरफदार बनी हूँ, नहीं, बल्कि मैं महीनों से आपका काम कर रही हूँ और इस सबब से सैकड़ों आदमी मेरे दुश्मन हो रहे हैं। दुश्मनों ही के डर से मैं इस तालाब में छिपकर बैठी रहती हूँ क्योंकि जिन्हें इसका भेद मालूम नहीं है वे इस मकान के अन्दर पैर नहीं रख सकते। आप मुझे अकेली समझते होंगे, मगर मैं अकेली नहीं हूँ, लौंडियाँ, सिपाही और ऐयार मिलाकर इस गई-गुजरी हालत में भी पचास आदमी मेरी तावेदारी कर रहे हैं।

    कुमार––वे लोग कहाँ हैं?

    कमलिनी––उनमें से कई आदमियों को तो आप इसी जगह बैठे देखेंगे, बाकी सब को मैंने काम पर भेजा है। जब मैं आपकी खैरख्वाह हूँ तो किशोरी की मदद भी जरूर ही करनी पड़ेगी, इसलिए मेरी एक ऐयार रोहतासगढ़ किले के अन्दर भी घुस कर बैठी है और किशोरी के हाल-चाल की खबर दिया करती है। अभी कल ही उसने एक चिट्ठी भेजी थी, (कमर से चिट्ठी निकाल कर और कुमार के हाथ में देकर) लीजिए यही चिट्ठी है, पहले आप इसे पढ़ लीजिए फिर और कुछ कहूँगी।

    कुमार हाथ में चिट्ठी लेकर गौर से पढ़ने लगे। यह वही चिट्ठी थी जिस पर पहले कुमार की निगाह पड़ चुकी थी और जिसे एक गुलदस्ते के नीचे से निकाल कर कुमार पढ़ चुके थे। कुमार ने चोरी से उस चिट्ठी को पढ़ने का हाल कमलिनी से कहना मुनासिब न समझा और उसे इस तौर पर पढ़ गए जैसे पहली दफे वह चिट्ठी उनके हाथ में पड़ी हो। परन्तु इस समय इस तरह कमलिनी उनकी दुश्मन नहीं है इस बात को वे अच्छी तरह समझ गए। मगर साथ-ही-साथ उनके दिल में एक दूसरी ही तरह की उत्कण्ठा बढ़ गई और वे यह जानने के लिए व्याकुल हो गए कि कमलिनी और इसकी ऐयारा ने रोहतासगढ़ किले में पहुँच कर क्या किया!

    पाठक, शायद आप इस चिट्ठी का मजमून भूल गए होंगे, मगर आप उसे याद करें या पुनः पढ़ जायँ, क्योंकि उसके एक-एक शब्द का मतलब इस समय कमलिनी से कुमार पूछना चाहते हैं।

    कुमार––मैं नहीं कह सकता और न मुझे मालूम ही है कि तुम इतनी भलाई मेरे साथ क्यों कर रही हो, तो भी मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इस समय मुझे चिन्ता में डाल कर दुःख न दोगी, बल्कि जो मैं पूछूँगा उसका ठीक-ठीक जवाब दोगी।

    कमलिनी––आप मेरी तरफ से किसी तरह का बुरा खयाल न रक्खें। आज मैं इस बात पर मुस्तैद हूँ कि अगर आपको कष्ट न हो तो रात भर जाग के बहुत कुछ हाल जो अब तक आपको मालूम नहीं है और आपके मतलब का है, आपसे कहूँ और जो-जो सवाल आप करें, उसका जवाब दूँ।

    कुमार––मुझे तुम्हारे इस कहने से बड़ी खुशी हुई। अच्छा पहले इस बात का जवाब दो कि तुम्हारी वह ऐयारा, जो रोहतासगढ़ में है और इस चिट्ठी के पढ़ने से जिसका नाम तारा मालूम होता है, रोहतासगढ़ में किस तौर पर है? जहाँ तक मैं सोचता हूँ वह भेष बदल कर नौकरी करती होगी?

    कमलिनी––नहीं, उसने नौकरी नहीं, बल्कि वहाँ इस तरह छिपकर रहती है कि वहाँ के किसी आदमी को उसका पता लग जाना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है।

    कुमार––अच्छा, तो उसने यह क्या लिखा है कि––'किशोरी का आशिक भी यहाँ मौजूद है!'

    कमलिनी––यह कटाक्ष माधवी के दीवान अग्निदत्त पर है, क्योंकि हम लोगों के हिसाब से वह किशोरी पर आशिक है! वह आपकी तरह सच्चा आशिक नहीं है, मगर बेईमान ऐयारों की तरह जरूर आशिक है।

    कुमार––नहीं-नहीं, उसे तो हमारे आदमियों ने गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया है!

    कमलिनी––आपका यह खयाल गलत है। वह चुनार नही पहुँचा, न मालूम किस तरह उसने अपनी जान बचा ली है। इसका हाल आपको लश्कर में जाने या किसी को चुनारगढ़ भेजने से मालूम होगा।

    कुमार––तो क्या वह भी रोहतासगढ़ पहुँच गया?

    कमलिनी––पहुँच ही गया तभी तो तारा ने लिखा है।

    कुमार––अच्छा, तो ये लाली और कुन्दन कौन हैं?

    कमलिनी––आपकी और मेरी दुश्मन, इन दोनों को मामूली दुश्मन न समझिएगा।

    कुमार––इसमें किशोरी के आशिक के बारे में लिखा है कि 'उसे किशोरी से बहुत-कुछ उम्मीद भी है'––इसका मतलब क्या है?

    कमलिनी––सो ठीक अभी मालूम नहीं हुआ।

    कुमार––यह जवाब तुमने बड़े खुटके का दिया।

    कमलिनी––(हँसकर) आप चिन्ता न करें। किशोरी तन-मन-धन आपको समर्पण कर चुकी है, वह किसी दूसरे की न होगी।

    कुमार––खैर, जब खुलासा हाल मालूम ही नहीं है तो जो कुछ सोचा जाय, मुनासिब है। इसमें लिखा है कि 'किशोरी ने भी पूरा धोखा खाया'––सो क्या?

    कमलिनी––इसका भी हाल अभी नहीं मालूम हुआ। शायद आज-कल में कोई दूसरी चिट्ठी आवेगी तो मालूम होगा। बल्कि और भी जो कुछ लिखा है, इशारा ही भर है, असल क्या बात है सो मैं नहीं कह सकती।

    कुमार––अच्छा, अब मैं तुम्हारा पूरा हाल जानना चाहता हूँ और इसी के साथ रोहतासगढ़ में रहने वाली लाली और कुन्दन का वृत्तान्त भी तुम्हारी जुबानी सुनना चाहता हूँ।

    कमलिनी––मैं सब हाल आपसे कहूँगी और इसके अलावा एक ऐसे भेद की खबर भी आपको दूँगी कि आप खुश हो जायँगे, मगर इसके लिए आपको तीन-चार तक दिन और सब्र करना चाहिए। इसी बीच में तारा भी रोहतासगढ़ से आ जायेगी या मैं खुद उसे बुलवा लूँगी।

    कुमार––इन सब बातों को जानने के लिए मैं बहुत बेचैन हो रहा हूँ, कृपा करके जो कुछ तुम्हें कहना हो, अभी कहो।

    कमलिनी––नहीं-नहीं, आप जल्दी न करें, मेरा दो-चार दिन के लिए टालना भी आप ही के फायदे के लिए है। आप यह न समझें कि मैं आपको जानबूझ कर यहाँ अटकाना चाहती हूँ। आप यदि मुझ पर भरोसा रक्खें और मुझे अपना दुश्मन न समझें तो यहाँ रहें। मैं लौंडियों की तरह आपकी ताबेदारी करने को तैयार हूँ, और यदि मुझ पर एतबार न हो तो अपने लश्कर चले जायें, चार-पाँच दिन के बाद मैं स्वयं आपसे मिलकर सब हाल कहूँगी।

    कुमार––बेशक मैं तुम्हारे बारे में तरह-तरह की बातें सोचता था और तुम पर विश्वास करना मुनासिब नहीं समझता था, मगर अब तुम्हारी तरफ से मुझे किसी तरह का खुटका नहीं है। तुम्हारी बातों का मेरे दिल पर बड़ा ही असर हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम सिवाय भलाई के मेरे साथ बुराई कभी न करोगी। मैं जरूर यहाँ रहूँगा और जब तक अपने दिल का शक अच्छी तरह न मिटा लूँगा, न जाऊँगा।

    कमलिनी––अहोभाग्य! (हँसकर) मगर ताज्जुब नहीं कि इसी बीच में आपके ऐयार लोग यहाँ पहुँचकर मुझे गिरफ्तार कर लें।

    कुमार––क्या मजाल है!

    3

    कुमार कई दिनों तक कमलिनी के यहाँ मेहमान रहे। उसने बड़ी खातिरदारी और नेकनीयती के साथ इन्हें रक्खा। इस मकान में कई लौंडियाँ भी थीं जो दिलोजान से कुमार की खिदमत किया करती थीं, मगर कभी-कभी वे सब दो-दो पहर के लिए न मालूम कहाँ चली जाया करती थीं।

    एक दिन शाम के वक्त उस मकान की छत पर कमलिनी और कुमार बैठे बात कर रहे थे, इसी बीच में कुमार ने पूछा––

    कुमार––कमलिनी, अगर किसी तरह का हर्ज न हो तो इस मकान के बारे में कुछ कहो। इन पुतलियों की तरफ, जो इस मकान के चारों कोनों में तथा इस छत के बीचोंबीच में हैं, जब मेरी निगाह पड़ती है तो ताज्जुब से अजब हालत हो जाती है।

    कमलिनी––बेशक इन्हें देख आप ताज्जुब करते होंगे। यह मकान एक तरह का छोटा-सा तिलिस्म है जो इस समय बिल्कुल मेरे अधीन है। मगर यहाँ का हाल बिना मेरे कहे थोड़े ही दिनों में आपको पूरा-पूरा मालूम हो जायगा।

    कुमार––उन दोनों औरतों के साथ, जो माधवी की लौंडियाँ थीं, तुमने क्या सलूक किया?

    कमलिनी––अभी तो वे दोनों कैद हैं।

    कुमार––माधवी का भी कुछ हाल मालूम हुआ है?

    कमलिनी––उसे आपके लश्कर और रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमते कई दफे मेरे आदमियों ने देखा है। जहाँ तक मैं समझती हूँ वह इस धुन में लगी है कि किसी तरह आप दोनों भाई और किशोरी उसके हाथ लगें और वह अपना बदला ले।

    कुमार––अभी तक रोहतासगढ़ का कुछ हाल नहीं मालूम हुआ, न लश्कर का कोई समाचार मिला।

    कमलिनी––मुझे भी इस बात का ताज्जुब है कि मेरे आदमी किस काम में फँसे हुए हैं। क्योंकि अभी तक एक ने भी लौटकर खबर न दी। (चौंककर और मैदान की तरफ देख के) मालूम होता है, इस समय कोई नया समाचार मिलेगा। मैदान की तरफ देखिए, दो आदमी एक बोझ लिये इसी तरफ आते दिखाई दे रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि ये मेरे ही आदमियों में से हों। कुमार––(मैदान की तरफ देख कर) हाँ ठीक है, इसी तरफ आ रहे हैं। उस गट्ठर में शायद कोई आदमी है।

    कमलिनी––बेशक ऐसा ही है, (हँसकर) नहीं तो क्या मेरे आदमी मालअसबाब चुराकर लावेंगे! देखिए, वे दोनों कितनी तेजी के साथ आ रहे हैं। (कुछ अटक कर) अब मैंने पहचाना, बेशक इस गठरी में माधवी होगी।

    थोड़ी देर तक दोनों आदमी चुपचाप उसी तरफ देखते रहे। जब वे लोग इस मकान के पास पहुँचे तो कमलिनी ने कुमार से कहा––

    कमलिनी––मुझे आज्ञा दीजिए तो जाकर इन लोगों को यहाँ लाऊँ।

    कुमार––क्या बिना तुम्हारे गये वे लोग यहाँ नहीं आ सकते?

    कमलिनी––जी नहीं, जब तक मैं खुद उन्हें किश्ती पर चढ़ा कर यहाँ न लाऊँ वे लोग नहीं आ सकते। वे क्या, कोई भी नहीं आ सकता।

    कुमार––क्या हरएक के लिए जब वह इस मकान में आना या जाना चाहे तुम्हीं को तकलीफ करनी पड़ती है? मैं समझता हूँ कि जिस आदमी को तुम एक दफे भी किश्ती पर चढ़ाकर ले जाओगी, उसे रास्ता मालूम हो जाएगा।

    कमलिनी––अगर ऐसा ही होता तो मैं इस मकान में बेखटके कैसे रह सकती थी? आप जरा नीचे चलें, मैं इसका सबब आपको बतला देती हूँ।

    कुमार खुशी-खुशी उठ खड़े हुए और कमलिनी के साथ नीचे उतर गए। कमलिनी उन्हें उस कोठरी में ले गई जो नहाने के काम में लाई जाती थी और जिसे कुमार देख चुके थे। उस कोठरी में दीवार के साथ एक आलमारी थी जिसे कमलिनी ने खोला। कुमार ने देखा कि उस दीवार के साथ चाँदी का एक मुट्ठा, जो हाथ भर से छोटा न होगा, लगा हुआ है। इसके सिवाय और कोई चीज उसमें नहीं थी।

    कमलिनी––मैं पहले ही आपसे कह चुकी हूँ कि इस तालाब में चारों ओर लोहे का जाल पड़ा हुआ है।

    कुमार––हाँ, ठीक है। मगर उस रास्ते में जाल न होगा, जिधर से तुम किश्ती लेकर आती-जाती हो।

    कमलिनी––ऐसा खयाल न कीजिए। उस रास्ते में भी जाल है, मगर उसे यहाँ आने का दरवाजा कहना चाहिए, जिसकी ताली यह है। देखिये, अब आप अच्छी तरह समझ जायेंगे। (उस चाँदी के मुट्ठे को कई दफे घुमाकर) अब उतनी दूर का या उस रास्ते का जाल, जिधर से किश्ती लेकर मैं आती-जाती हूँ हट गया, मानो दरवाजा खुल गया। अब मैं क्या, कोई भी जिसको आने-जाने का रास्ता मालूम है, किश्ती पर चढ़ के आ-जा सकता है। जब मैं इसको उलटा घुमाऊँगी तो वह रास्ता बन्द हो जायगा अर्थात् वहाँ भी जाल फैल जायगा, फिर किश्ती नहीं आ सकती।

    कुमार––(हँसकर) बेशक यह एक अच्छी बात है।

    इसके बाद कमलिनी किश्ती पर सवार होकर तालाब के बाहर गई और उन दोनों आदमियों को गठरी सहित सवार कराके मकान में से आई तथा तालाब में आने का रास्ता उसी रीति से, जैसे कि हम ऊपर लिख चुके हैं, बन्द कर दिया। इस समय यहाँ कई लौंडियाँ भी मौजूद थीं। उन्होंने कमलिनी के इशारे से छत के ऊपर रोशनी का बन्दोबस्त कर दिया और सब कोई छत के ऊपर चले गए। कुमार के पास ही कमलिनी गलीचे पर बैठ गई और वे दोनों आदमी भी गठरी सामने रखकर बैठ गये। इस छत की जमीन चिकने पत्थर की बहुत साफ और सुथरी बनी हुई थी, अगर नजाकत की तरफ खयाल न किया जाय तो फर्श या बिछाबन बिछाकर वहाँ बैठने की कोई जरूरत न थी।

    कमलिनी––कुमार, देखिए, इन दोनों आदमियों को मैंने माधवी को गिरफ्तार करने को भेजा था। मालूम होता है कि ये लोग अपना काम पूरा कर आए हैं और इस गठरी में शायद माधवी को ही लाए हैं। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) क्यों जी, माधवी ही है या किसी दूसरे को लाए हो?

    एक––जी, माधवी को ही लाए हैं।

    कमलिनी––गठरी खोलो, जरा इसकी सूरत देखू।

    उन दोनों ने गठरी खोली, कमलिनी और कुमार ने बड़े चाव से माधवी की सूरत देखी, परन्तु यकायक कमलिनी चौंकी और बोली, "क्या यह जख्मी है?"

    एक––जी हाँ, मुझे उम्मीद नहीं कि इसकी जान बचेगी क्योंकि चोट भारी है।

    एक––इसे किसने जख्मी किया है?

    एक––किसी औरत ने रोहतासगढ़ के तिलिस्मी तहखाने में इसे चोट पहुँचाई है।

    कुमार––(कमलिनी की तरफ देखकर) क्या रोहतासगढ़ में कोई तिलिस्मी तहखाना भी है?

    कमलिनी––जी हाँ, पर उसका भेद बहुत आदमियों को मालूम नहीं है, बल्कि जहाँ तक मैं समझती हूँ, वहाँ का राजा दिग्विजयसिंह भी उसका पूरा-पूरा हाल न जानता होगा। वहाँ का मामला भी बड़ा ही विचित्र है, किसी समय मैं आपसे उसका हाल कहूँगी।

    एक––मगर अब उस तहखाने की रंगत बदल गई।

    कमलिनी––सो क्यों?

    एक––(कुमार की तरफ इशारा करके) आपके ऐयारों ने उसमें अपना दखल कर लिया, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि रोहतासगढ़ ही ले लिया।

    कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) मुबारक हो, अच्छी खबर आई है।

    कुमार––बेशक इस खबर ने मुझे खुश कर दिया। ईश्वर करे, तुम्हारी तारा भी जल्द आ जाय और किशोरी का कुछ हल मालूम हो। (माधवी को गौर से देख और चौंककर) यह क्या? माधवी की दाहिनी कलाई दिखाई नहीं देती।

    कमलिनी––(हँसकर) इसका हाल आपको नहीं मालूम?

    कुमार––कुछ नहीं।

    कमलिनी––पूरा हाल तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर इतना सुना है कि कहीं गयाजी में इसकी और इसके दीवान अग्निदत्त की लड़की कामिनी से लड़ाई हो गई थी। उसी लड़ाई में यह अपनी दाहिनी कलाई खो बैठी। यह भी सुनने में आया है कि यह लड़ाई उसी मकान में हुई थी जिसमें आप लोग रहते थे और इसमें कमला भी शामिल थी।

    कमलिनी की यह बात सुन कर कुमार को वे ताज्जुब की बातें याद आ गई जो बीमारी की हालत में गयाजी में महल के अन्दर कई दफे रात के समय देखने में आई थीं और जब कि अन्त में कोठरी के अन्दर एक लाश और औरत की कलाई पाई गई थी।

    कुमार––हाँ, अब याद आया। वह मामला भी बड़ा ही विचित्र हुआ था अभी तक उसका ठीक-ठीक पता न लगा।

    कमलिनी––क्या हुआ था, जरा मैं भी सुनूँ।

    कुमार ने वह सब हाल कहा और जो कुछ देखने और सुनने में आया था, वह भी बताया।

    कमलिनी––कमला से मुलाकात हो तो कुछ और सुनने में आवे (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) पहले माधवी को यहाँ से ले जाओ, लौंडियों के हवाले करो और कह दो, इसे कैदखाने में रक्खें और होश में लाकर इसका इलाज करें। इसके बाद आओ तो तुम्हारी जुबानी वहाँ का सब हाल सुनें। शाबाश, तुम लोगों ने बेशक अपना काम पूरा किया, जिससे मैं बहुत ही खुश हूँ।

    'बहुत अच्छा' कहकर दोनों आदमी माधवी को वहाँ से उठाकर नीचे ले गए और इधर कमलिनी और कुमार में बातचीत होने लगी।

    कमलिनी––(मुस्कराकर) लीजिए आपकी मुराद पूरी होना चाहती है, पहले-पहले यह खुशखबरी मेरे ही सबब से आपको मिली है, सो सबसे भारी इनाम मुझी को मिलना चाहिए।

    कुमार––बेशक ऐसी ही बात है, मेरे पास इस वक्त कोई ऐसी चीज नहीं जो तुम्हारी नजर के लायक हो, खैर इसके बदले में मैं खुद अपने को तुम्हारे हाथ में देता हूँ।

    कमलिनी––वाह, क्या खूब!

    कुमार––सो क्यों?

    कमलिनी––आपको अपने बदन पर अख्तियार ही क्या है! यह तो किशोरी की मिलकियत है!

    कुमार लाजवाब हो गए और हँसकर चुप हो रहे। कमलिनी बड़ी ही खूबसूरत थी, इसके साथ-ही-साथ उसकी अच्छी चालचलन, मुरौवत, अहसान और नेकियों ने कुमार को अपना ताबेदार बना लिया। उसकी एक-एक बात पर कुमार प्रसन्न होते थे और दिल में बराबर उसकी तारीफ करते थे।

    कुमार––कमलिनी, मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मगर ईश्वर के लिए सच-सच जवाब देना, बात बनाकर टालने की कोशिश न करना।

    कमलिनी––कहिए तो सही, क्या बात है? रंग बेढंग मालूम होता है! कुमार––अगर सच जवाब देने का वादा करो तो पूछूँ, नहीं तो व्यर्थ मुँह क्यों दुखाऊँ।

    कमलिनी––आपकी नजाकत तो औरतों से भी बढ़ गई। जरा सी बात कहने में मुँह दुखा जाता है, दम फूलने लगता है। खैर पूछिये, मैं वादा करती हूँ कि सच्चा जवाब दूँगी, अगर कहिए तो कागज पर लिख दूँ!

    कुमार––(मुस्कुराकर) यह तो तुम वादा कर ही चुकी हो कि अपना हाल पूरा पूरा मुझसे कहोगी, मगर इस समय मैं तुमसे केवल इतना ही पूछता हूँ कि तुम्हारा कोई वली-वारिस भी है या नहीं? तुम्हारे व्यवहार से स्वतन्त्रता मालूम होती है और यह भी जाना जाता है कि तुम कुँआरी हो।

    कमलिनी––यह सवाल जवाब देने योग्य है। (मुस्कराकर) परन्तु क्या किया जाय, वादा करके चुप रहना भी मुनासिब नहीं। वास्तव में मैं स्वतन्त्र हूँ। कुँआरी तो हूँ परन्तु शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है।

    कुमार––कब और कहाँ?

    कमलिनी––यह दूसरा सवाल है, इसका सच्चा जवाब देने के लिए मैंने वादा नहीं किया है, इसलिए आप इसका उत्तर न पा सकेंगे।

    कुमार––अगर इसका भी जवाब दो, तो क्या कोई हर्ज है?

    कमलिनी––हाँ हर्ज है, बल्कि नुकसान है।

    कुमार चुप हो रहे और जिद करना मुनासिब न जाना। मगर यह सुनकर कि 'शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है' कुमार को रंज हुआ। क्यों रंज हुआ? इसमें कुमार की हानि ही क्या थी? क्या कुछ दूसरा इरादा था? नहीं, नहीं, कुमार यह नहीं चाहते थे कि हम ही इससे शादी करें, वे किशोरी के सच्चे प्रेमी थे, खूबसूरती के अतिरिक्त कमलिनी के अहसानों ने कुमार को ताबेदार बना लिया था और अभी उन्हें कमलिनी से बहुत-कुछ उम्मीद थी तथा यह भी सोचते थे कि ऐसी तरकीब निकल आवे जिससे इस अहसान का बदला चुक जाय। मगर इन बातों से कुमार के रंज होने का मतलब नहीं खुला। खैर, जो हो, पहले यह तो मालूम हो कि कमलिनी है कौन!

    वे दोनों आदमी भी, जो माधवी को लाये थे, छत पर आ पहुँचे और हाथ जोड़ कर सामने बैठ गये। कमलिनी ने उनसे खुलासा हाल कहने के लिए कहा और उन दोनों में से एक ने इस तरह कहना सुरू किया।

    दोनों––हम दोनों हुक्म के मुताबिक यहाँ से जाकर माधवी को खोजने लगे, मगर उसका पता गयाजी और राजगृह के इलाकों में कहीं भी न लगा। लाचार होकर रोहतासगढ़ किले के पास पहुँचे और पहाड़ी के चारों तरफ घूमने लगे। कभी-कभी रोहतासगढ़ की पहाड़ी के ऊपर भी जाते और घूम-घूमकर पता लगाते कि वहाँ क्या हो रहा है। एक दिन रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर घूमते-फिरते यकायक हम दोनों एक खोह के मुहाने पर जा पहुँचे और वहाँ कई आदमियों के धीरे-धीरे बातचीत करने की आवाज सुनकर एक झाड़ी में, जहाँ से उन लोगों की आवाज साफ सुनाई देती थी, छिपे रहे। अन्दाज से यह मालूम हुआ कि वे लोग कई आदमी हैं और उन्हीं के साथ एक औरत भी हैं। नीचे लिखी बातें हम लोगों ने सुनीं––

    एक––न मालूम हम लोगों को कब तक यहाँ अटकना और राह देखना पड़ेगा।

    दूसरा––अब हम लोगों को यहाँ ज्यादा दिन न रहना पड़ेगा। या तो काम हो जायेगा या खाली ही लौटकर चले जाने की नौबत आवेगी।

    तीसरा––रंग तो ऐसा ही नजर आता है, भाई, जो हो, हमें तो यही विश्वास होता है कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग तहखाने में घुस गये क्योंकि पहले कभी एक आदमी तहखाने में आता-जाता दिखाई नहीं देता था, बल्कि मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ कि कल उस कब्रिस्तान में हम लोगों ने जिसे देखा था, वह कोई ऐयार ही था।

    चौथा––खैर, और दो-तीन दिन में सब मालूम हो जाएगा।

    औरत––तुम लोगों का काम चाहे जब हो, मगर मेरा काम तो आज हुआ ही चाहता है। माधवी और तिलोत्तमा को मैंने खूब ही धोखा दिया है। आज उसी कब्रिस्तान की राह से मैं उन दोनों को तहखाने में ले जाऊँगी।

    एक––अब तुम्हें वहाँ जाना चाहिए, शायद माधवी वहाँ पहुँच गयी हो।

    औरत––हाँ, अब जाती हूँ, पर अभी समय नहीं हुआ।

    दूसरा––दम-भर पहले ही पहुँचना अच्छा है।

    ये बातें सुनकर मैं उन लोगों को पहचान गया। वे रामू वगैरह धनपतिजी के सिपाही लोग थे और औरत चमेली थी।

    इतना सुनते ही कमलिनी ने रोका और पूछा, "जिस खोह के मुहाने पर वे लोग बैठे थे, वहाँ कोई सलई का पेड़ भी है?"

    इसके जवाब में उन दोनों ने कहा, "हाँ-ह, दो पेड़ सलई के वहाँ थे, पर उनके सिवाय और दूर-दूर तक कहीं सलई का पेड़ दिखाई नहीं दिया।"

    कमलिनी––बस मैं समझ गयी। वह खोह का मुहाना भी तहखाने से निकलने का एक रास्ता है, शायद धनपति ने अपने आदमियों को कह रखा होगा कि मैं किशोरी को लिए हुए इसी राह से निकलूँगी तुम लोग मुस्तैद रहना, इसी से वे लोग वहाँ बैठे थे।

    एक––शायद ऐसा ही हो।

    कुमार––धनपति कौन है?

    कमलिनी––उसे आप नहीं जानते। ठहरिए, पहले इन लोगों का हाल सुन लूँ तो कहूँगी। (उन दोनों की तरफ देखकर) हाँ, तब क्या हुआ?

    उसने फिर यों कहना शुरू किया––

    "थोड़ी ही देर में चमेली वहाँ से उठी और एक तरफ को रवाना हुई, हम दोनों भी उसके पीछे-पीछे चले और सुबह की सफेदी निकलना ही चाहती थी कि उस कब्रिस्तान के पास पहुँच गये जो तहखाने में जाने का दरवाजा है। हम दोनों एक आड़ की जगह में छिप रहे और तमाशा देखने लगे। उसी समय माधवी और तिलोत्तमा भी वहाँ आ पहुँचीं। तीनों में धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगी जिसे दूर होने के सबब मैं बिलकुल न सुन सका। आखिर वे तीनों तहखाने में घुस गयीं और पहरों गुजर जाने पर भी बाहर न निकलीं। हम दोनों यह निश्चय कर चुके थे कि जब तक वे तहखाने से न निकलेंगी, यहाँ से न टलेंगे। सवेरा हो गया बल्कि धीरे-धीरे तीन पहर दिन भी बीत गया। आखिर हम दोनों तहखाने में घुसने के इरादे से कब्रिस्तान में गये। वहाँ पहुँचकर हमारे साथी ने कहा, "आखिर हम लोग दिन-भर परेशान हो ही चुके हैं, अब शाम हो लेने दो, तो तहखाने में चलें।" मैंने भी यही मुनासिब समझा और हम दोनों आदमी वहाँ से लौटना ही चाहते थे कि तहखाने का दरवाजा खु‌ला और चमेली दिखाई पड़ी, हम दोनों को भी चमेली ने देखा और पहचाना, मगर उसको ठहरने या कुछ कहने का साहस न हुआ। वह कुछ परेशान मालूम होती थी और खुन से भरा हुआ एक छुरा उसके हाथ में था। हम दोनों ने भी उसको कुछ टोकना मुनासिब न समझा और यह विचार कर कि शायद कोई और भी इस तहखाने से निकले, एक कब्र की आड़ में छिपकर बीच वाली कब्र, अर्थात् तहखाने के दरवाजे की तरफ देखने लगे। चमेली हम लोगों को देखते-देखते भाग गयी और थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा।

    "थोड़ी देर बाद हम लोगों ने दूर से राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार पण्डित बद्रीनाथ को आते देखा। वह तहखाने के दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि अन्दर से तिलोत्तमा निकली और पण्डित बद्रीनाथ ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ही एक बूढ़ा आदमी तहखाने से निकला और पण्डित बद्रीनाथ से बातें करने लगा। हम लोगों को कुछ-कुछ वे बातें सुनाई देती थीं। इतना मालूम हो गया कि तहखाने के अन्दर खून हुआ है और इन दोनों ने तिलोत्तमा को दोषी ठहराया है, मगर हम लोगों ने खून से भरा हुआ छुरा हाथ में लिए चमेली को देखा था, इसलिए विश्वास था कि अगर तहखाने में कोई खून हुआ है तो जरूर चमेली के ही हाथ से हुआ, तिलोत्तमा निर्दोष है।

    "पण्डित बद्रीनाथ और वह बूढ़ा आदमी तिलोत्तमा को लेकर फिर तहखाने में घुस गये। हम लोगों ने भी वहाँ अटकना मनासिब न समझा और थोड़ी ही देर बाद हम लोग भी तहखाने में घुस गये तथा तहखाने की पचासों कोठरियों में घूमने और देखने लगे कि कहाँ क्या होता है। बद्रीनाथ थोड़ी ही देर बाद तहखाने के बाहर निकल गये और हम लोगों ने तिलोत्तमा को एक खम्भे से साथ बँधे हुए पाया। हम्माम वाली कोठरी में माधवी को पड़े हुए पाकर हम लोग बड़े खुश हुए और उसे उठाकर ले भागे, फिर न मालूम, पीछे क्या हुआ और किस पर क्या गुजरी ‌

    कमलिनी––ताज्जुब नहीं कि वहाँ के दस्तूर के मुताबिक तिलोत्तमा की बलि दे दी गयी हो!

    एक––जो भी हो।

    इतने ही में नीचे से एक लौंडी दौड़ी हुई आयी और हाथ जोड़कर कमलिनी से बोली, "तारा आ गयी, तालाब के बाहर खड़ी है!"

    तारा के आने की खबर सुनकर कमलिनी बहुत खुश हुई और खुशी के मारे कुँअर इन्द्रजीतसिंह की घबराहट का तो ठिकाना ही न रहा, क्योंकि तारा ही की जुबानी रोहतासगढ़ का हाल और बेचारी किशोरी की खबर सुनने वाले थे और इसी के बाद कमलिनी का असल भेद उन्हें मालूम होने को था।

    कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) जिस तरह इन दोनों आदमियों को मैं तालाब के बाहर लायी हूँ उसी तरह तारा को भी लाना पड़ेगा।

    कुमार––हाँ-हाँ, उसे बहुत जल्द लाओ। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

    कमलिनी––आप क्यों तकलीफ करते हैं। बैठिए, मैं उसे अभी लाती हूँ। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) चलो, तुम दोनों को भी तालाब के बाहर पहुँचा दूँ।

    लाचार कुमार उसी जगह बैठे रहे। उन दोनों आदमियों को साथ लेकर कमलिनी वहाँ से चली गयी तथा थोड़ी देर में तारा को लेकर आ पहुँची। कुँअर इन्द्रजीत सिंह को देखकर तारा चौंकी और बोली––

    तारा––क्या कुमार यहाँ विराज रहे हैं?

    कमलिनी––हाँ, कई दिनों से यहाँ हैं और तुम्हारी राह देख रहे हैं। तुम्हारी जुबानी रोहतासगढ़ और किशोरी तथा लाली और कुन्दन का असल भेद और हाल सुनने के लिए बड़े बेचैन हो रहे हैं। आओ, मेरे पास बैठ जाओ और कहो, क्या हाल है?

    तारा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, मैं इस समय यहाँ बैठ नहीं सकती और न कुछ वहाँ का हाल ही कह सकती हूँ, क्योंकि हम लोगों का यह समय बड़ा ही अमूल्य है। कुमार को यहाँ देख मैं बहुत खुश हुई, अब वह काम बखूबी निकल जायगा! कुमार की तरफ देखकर) बेचारी किशोरी इस समय बड़े ही संकट में पड़ी हुई है। अगर आप उनकी जान बचाना चाहते हैं तो इस समय मुझसे कुछ न पूछिये, बस तुरन्त खड़े होइए और जहाँ मैं चलती हूँ, चले चलिये, हाँ, यदि बन बड़ा तो रास्ते में मैं वहाँ का हाल आपसे कहूँगी। (कमलिनी की तरफ देखकर) आप भी चलिए और कुछ आदमी अपने साथ लेती चलिए, मगर सब कोई घोड़े पर सवार और लड़ाई के सामान से दुरुस्त रहें।

    कमलिनी––ऐसा ही होगा।

    कुमार––(खड़े होकर) मैं तैयार हूँ।

    तीनों आदमी छत के नीचे उतरे और तारा के कहे मुताबिक कार्रवाई की गयी।

    सुबह की सफेदी आसमान पर निकलना ही चाहती है। आओ, देखो, हमारा बहादुर नौजवान कुँअर इन्द्रजीतसिंह किस ठाठ से मुश्की घोड़े पर सवार मैदान की तरफ घोड़ा फेंके चला जा रहा है और उसकी पेटी से लटकती हुई जड़ाऊ नयाम (म्यान) की तलवार किस तरह उछल-उछलकर घोड़े के पेट में थपकियाँ मार रही है, मानो उसकी चाल की तेजी पर शाबाशी दे रही है। कुमार के आगे-आगे घोड़े पर सवार तारा जा रही है, कुमार के पीछे सब्ज घोड़े पर कमलिनी सवार है और घोड़े की तेजी को बढ़ाकर कुमार के बराबर हुआ चाहती है। उसके पीछे दस दिलावर और बहादुर सवार घोड़ा फेंके चले जा रहे हैं और इस जंगली मैदान के सन्नाटे को घोड़ों के टापों की आवाज से तोड़ रहे हैं।

    ↑

    यहाँ पर तो पाठक समझ ही होंगे कि तहखाने में एक बड़ी मूरत के सामने जिस औरत की बलि दी गई थी, वह माधवी की ऐयारा तिलोत्तमा थी और माधवी के लाश को ले भागने वाले ये ही दोनों कमलिनी के नौकर थे।

    4

    हम ऊपर लिख आये हैं कि देवीसिंह को साथ लेकर शेरसिंह कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए रोहतासगढ़ से रवाना हुए। शेरसिंह इस बात को तो जानते थे कि भी खबर कुँअर इन्द्रजीतसिंह फलाँ जगह हैं परन्तु उन्हें तालाब के गुप्त भेदों की न थी। राह में आपस में बातचीत होने लगी।

    देवीसिंह––लाली का भेद कुछ मालूम हुआ?

    शेरसिंह––अफसोस, उसके और कुन्दन के बारे में मुझसे बड़ी भारी भूल हुई। ऐसा धोखा खाया कि शर्म के मारे कुछ कह नहीं सकता।

    देवीसिंह––इसमें शर्म की क्या बात है। ऐसा कोई ऐयार दुनिया में न होगा जिसने कभी धोखा न खाया हो। हम लोग कभी धोखा देते हैं, कभी स्वयं धोखे में आ जाते हैं, फिर इसका अफसोस कहाँ तक किया जाय!

    शेरसिंह––आपका कहना बहुत ठीक है, खैर, इस बारे में मैंने जो-कुछ मालूम किया है उसे कहता हूँ! यद्यपि थोड़े दिनों तक मैंने रोहतासगढ़ से अपना सम्बन्ध छोड़ दिया था, तथापि मैं कभी-कभी वहाँ जाया करता और गुप्त राहों से महल के अन्दर जाकर वहाँ की खबर भी लिया करता था। जब किशोरी वहाँ फँस गयी तो अपनी भतीजी कमला के कहने से मैं वहाँ दूसरे-तीसरे बराबर जाने लगा। लाली और कुन्दन को मैंने महल में देखा। यह न मालूम हुआ कि ये दोनों कौन हैं। बहुत-कुछ पता लगाया मगर कुछ काम न चला। परन्तु कुन्दन के चेहरे पर जब मैं गौर करता तो मुझे शक होता कि वह सरला है।

    देवीसिंह––सरला कौन?

    शेरसिंह––वही, सरला जिसे तुम्हारी चम्पा ने चेली बनाकर रखा था और जो उस समय चम्पा के साथ थी जब उसने एक खोह के अन्दर माधवी के ऐयार की लाश काटी थी।

    देवीसिंह––हाँ वह छोकरी, मुझे अब याद आया। मालूम नहीं कि आजकल वह कहाँ है। खैर, तब क्या हुआ? तुमने समझा कि वह सरला है मगर उस खोह का और लाश काटने का हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?

    शेरसिंह––वह हाल स्वयं सरला ने कहा था। वह मेरे आपस वालों में से है। इत्तिफाक से एक दिन मुझसे मिलने के लिए रोहतासगढ़ आयी थी, तब सब हाल मैंने सुना था। मगर मुझे यह नहीं मालूम कि आजकल वह कहाँ है।

    शेरसिंह––एक यही भेद खोलने की नीयत से मैं रात के समय रोहतासगढ़ महल के अन्दर गया और छिपकर सरला के सामने जाकर बोला, "मैं पहचान गया कि तू सरला है, फिर अपना भेद मुझसे क्यों छिपाती है?" इसके जवाब में कुन्दन से पूछा, "तुम कौन हो?"

    मैं––शेरसिंह। सरला––मुझे जब तक निश्चय न हो कि तुम शेरसिंह ही हो, मैं अपना भेद कैसे कहूँ?

    मैं––क्या तू मुझे नहीं पहचानती?

    सरला––क्या जाने, कोई ऐयार सूरत बदल के आया हो। अगर तुम पहचान गए कि मैं सरला हूँ तो कोई ऐसी छिपी हुई बात कहो जो मैंने तुमसे कही हो।

    इसके जवाब में मैं वही खोह वाला अर्थात् लाश काटने वाला किस्सा कह गया और अन्त में मैं बोला कि यह हाल स्वयं तूने मुझसे बयान किया था।

    उस किस्से को सुनकर कुन्दन हँसी और बोली, "हाँ, अब मैं समझ गयी। मैं चम्पा के हुक्म से यहाँ का हाल-चाल लेने आयी थी और अब किशोरी को छुड़ाने की फिक्र में हूँ। मगर लाली मेरे काम में बाधा डालती है। कोई ऐसी तरकीब बताइये जिसमें लाली मुझसे दबे और डरे।"

    मैं उस समय यह कहकर वहाँ से चला आया कि अच्छा, मैं सोच कर इसका जवाब दूँगा।

    देवीसिंह––तब क्या हुआ?

    शेरसिंह––मैं वहाँ से रवाना हुआ और पहाड़ी के नीचे उतरते समय एक विचित्र बात मेरे देखने और सुनने में आई।

    देवीसिंह––वह क्या?

    शेरसिंह––जब मैं अँधेरी रात में पहाड़ी के नीचे उतर रहा था तो जंगल में मालूम हुआ कि दो-तीन आदमी जो पगडण्डी के पास ही थे, आपस बातें कर रहे हैं। मैं पैर दवाता हुआ उनके पास गया और छिपकर बातें सुनने लगा, मगर उस समय उनकी बातें समाप्त हो चुकी थीं, केवल एक आखिरी बात सुनने में आई।

    देवीसिंह––वह क्या थी?

    शेरसिंह––एक ने कहा––'भरसक तो लाली और कुन्दन दोनों उन्हीं में से हैं, नहीं तो लाली तो जरूर इन्द्रजीतसिंह की दुश्मन है! मगर इसकी पहचान तो सहज ही में हो सकती है। केवल 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' इन दोनों जुमलों से अगर वह डर जाय, तो हम समझ जायँगे कि वीरेन्द्रसिंह की दुश्मन है। खैर, बूझा जायगा, पहले महल में जाने का मौका भी तो मिले। इसके बाद और कुछ सुनने में न आया और वे लोग वहाँ से न मालूम कहाँ चले गए। दूसरे दिन मैं फिर कुन्दन के पास गया और उससे बोला कि "तू लाली के सामने 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' का जिक्र करके देख, क्या होता है!"

    देवीसिंह––फिर क्या हुआ?

    शेरसिंह––तीन-चार दिन बाद मैं कुन्दन के पास गया तो उसकी जुबानी मालूम हुआ कि कुन्दन के मुँह से वे बातें सुनकर लाली बहुत डरी और उसने कुन्दन का मुकाबला करना छोड़ दिया। मगर मुझे थोड़े ही दिनों में मालूम हो गया कि कुन्दन सरला न थी, उसने मुझे धोखा दिया और चालाकी से मेरी जुबानी भेद मालूम करके अपना काम निकाल लिया। मुझे इस बात की बड़ी शर्म है कि मैंने अपने दुश्मन को दोस्त समझा और धोखा खाया।

    देवीसिंह––अक्सर ऐसा धोखा हो जाता है। खैर, लाली तो अभी हम लोगों के कैद ही में है, कहीं जाती नहीं, रही कुन्दन, सो इन्द्रजीतसिंह को लेकर लौटने पर कोई तरकीब ऐसी जरूर निकाली जायगी, जिसमें बाकी लोगों का असल हाल मालूम हो।

    इसी तरह की बातें करते हुए दोनों ऐयार चलते गये। रात को एक जगह दो-तीन घण्टे आराम किया और फिर चल पड़े। सवेरा होते-होते एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ एक छोटा-सा टीला ऐसा था जिस पर चढ़ने से दूर-दूर तक की जमीन दिखाई देती थी तथा वहाँ से कमलिनी का तालाब वाला मकान भी बहुत दूर न था। दोनों ऐयार उस टीले पर चढ़ गये और मैदान की तरफ देखने लगे। यकायक शेरसिंह ने चौंक कर कहा, "अहा, हम लोग क्या अच्छे मौके पर आये हैं! देखो, वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और वह औरत, जिसने उन्हें फँसा रक्खा है, घोड़े पर सवार इसी तरफ चले आ रहे हैं!"

    देवीसिंह––हाँ, ठीक तो है, उनके साथ और भी कई सवार हैं।

    शेरसिंह––मालूम होता है, उस औरत ने उन्हें अच्छी तरह अपने वश में कर लिया है। बेचारे इन्द्रजीतसिंह क्या जानें कि यह उनकी दुश्मन है। चाहे जो हो, इस समय इन लोगों को आगे न बढ़ने देना चाहिए।

    देवीसिंह––सबके आगे एक औरत घोड़े पर सवार आ रही है। मालूम होता है कि उन लोगों को रास्ता दिखाने वाली यही है।

    शेरसिंह––बेशक ऐसा ही है, तभी तो सब कोई उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं। पहले उसी को रोकना चाहिए, मगर घोड़ों की चाल बहुत तेज है।

    देवीसिंह––कोई हर्ज नहीं, हम दोनों आदमी घोड़े की राह पर अड़कर खड़े हो जायँ और अपने को घोड़े से बचाने के लिए मुस्तैद रहें। अच्छी नसल का घोड़ा यकायक आदमी के ऊपर टाप न रक्खेगा, वह लोगों को राह में देख जरूर अड़ेगा या झिककेगा, बस, उसी समय घोड़े की बाग थाम लेंगे।

    दोनों ऐयारों ने बहुत जल्द अपनी राय ठीक कर ली और दोनों आदमी एक साथ घोड़ों की राह में अड़ के खड़े हो गये। बात-की-बात में वे लोग भी आ पहुँचे। तारा का घोड़ा रास्ते में आदमियों को खड़ा देख कर झिझका और आड़ देकर बगल की तरफ घूमना चाहा, उसी समय देवीसिंह ने फुर्ती से लंगाम पकड़ ली। इस समय तारा का घोड़ा लाचार रुक गया और उसके पीछे आने वालों को भी रुकना पड़ा। कुँअर इन्द्रजीत सिंह शेरसिंह को तो नहीं जानते थे, मगर देवीसिंह को उन्होंने पहचान लिया और समझ गये कि ये लोग मेरी ही खोज में घूम रहे हैं। आखिर वे देवीसिंह के पास आये और बोले––

    कुमार––यद्यपि आप सब काम मेरी भलाई ही के लिए करते होंगे, परन्तु इस समय हम लोगों को रोका सो अच्छा न किया।

    देवीसिंह––क्या मामला है, कुछ कहिए तो!

    कुमार––(जल्दी में घबराए हुए ढंग से) बेचारी किशोरी एक आफत में फँसी हुई है उसी को बचाने जा रहे हैं।

    देवीसिंह––किस आफत में फँसी है?

    कुमार––इतना कहने का मौका नहीं है।

    देवीसिंह––यह औरत आपको अवश्य धोखा देगी जिसके साथ आप जा रहे हैं।

    कुमार––ऐसा नहीं हो सकता, यह बड़ी ही नेक और मेरी हमदर्द है।

    इतना सुनते ही कमलिनी आगे बढ़ आई और देवीसिंह से बोली––

    कमलिनी––मैं खूब जानती हूँ कि आप लोगों को मेरी तरफ से शक है, तथापि मुझे कहना ही पड़ता है कि इस समय आप हम लोगों को न रोकें, नहीं तो पछताना पड़ेगा। यदि आप लोगों को मेरी और कुमार की बात का विश्वास न हो तो मेरे सवारों में से दो आदमी घोड़ों पर से उतर पड़ते हैं, उनके बदले में आप दोनों आदमी घोड़ों पर सवार होकर साथ चलें और देख लें कि हम आपके खैरख्वाह हैं या बदख्वाह।

    देवीसिंह––बेशक यह अच्छी बात है और मैं इसे मंजूर करता हूँ।

    कमलिनी के इशारा करते ही दो सवारों ने घोड़ों की पीठ खाली कर दी। उनके बदले में देवीसिंह और शेरसिंह सवार हो गए और फिर उसी तरह सफर शुरू हुआ। इस समय कुछ-कुछ सूरज निकाल चुका था और सुनहरी धूप ऊँचे पेड़ों के ऊपर वाले हिस्सों पर फैल चुकी थी।

    आधे घण्टे और सफर करने के बाद वे लोग उस जगह पहुँचे जहाँ धनपति ने किशोरी को जलाकर खाक कर डालने के लिए चिता तैयार की थी और जहाँ से दीवान अग्निदत्त लड़-भिड़कर किशोरी को ले गया था। इस समय भी वह चिता कुछ बिगड़ी हुई सूरत में तैयार थी और इधर-उधर बहुत-सी लाशें पड़ी हुई थीं। उस जगह पहुँचकर तारा ने घोड़ा रोका और इसके साथ ही सब लोग रुक गये। तारा ने कमलिनी की तरफ देखकर कहा––

    तारा––बस, इसी जगह मैं आप लोगों को लाने वाली थी, क्योंकि इसी जगह धनपति के बहुत से आदमी मौजूद थे और यहीं वह किशोरी को लेकर आने वाली थी। (लाशों की तरफ देखकर) मालूम होता है, यहाँ बहुत खून-खराबा हुआ है!

    कमलिनी––तूने कैसे जाना कि किशोरी को लेकर धनपति इसी जगह आने वाली थी और धनपति को तूने कहाँ छोड़ा था?

    तारा––रात के समय खूब छिपकर धनपति के आदमियों की बात मैंने सुनी थी जिससे बहुत-कुछ हाल मालूम हुआ था और धनपति को मैंने उसी खोह के मुहाने पर छोड़ा था जो रोहतासगढ़ तहखाने से बाहर निकलने का रास्ता है और जहाँ सलई के दो पेड़ लगे हैं। उस समय बेहोश किशोरी धनपति के कब्जे में थी और धनपति के कई आदमी वहाँ मौजूद थे। उन लोगों की बातें सुनने से मुझे विश्वास हो गया था कि वे लोग किशोरी को लिए हुए इसी जगह आवेंगे। (एक लाश की तरफ देख के और चौंक के) देखिए, पहिचानिए।

    कमलिनी––बेशक यह धनपति का नौकर है। (और लाशों को भी अच्छी तरह देखकर) बेशक धनपति यहाँ तक आई थी, पर किसी से लड़ाई हो गई जो इन लाशों को देखने से जाना जाता है। मगर इनमें बहुत-सी लाशें ऐसी हैं जिन्हें मैं नहीं पहचानती। न मालूम इस लड़ाई का क्या नतीजा हुआ, धनपति गिरफ्तार हो गई या भाग गई, और किशोरी किसके कब्जे में पड़ गई! (कुमार की तरफ देखकर) शायद आपके सिपाही या ऐयार लोग यहाँ आए हों?

    कुमार––नहीं। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आप क्या खयाल करते हैं?

    देवीसिंह––खयाल तो मैं बहुत-कुछ करता हूँ, इसका हाल कहाँ तक पूछिएगा, मगर इन लाशों में हमारी तरफ वालों की कोई लाश नहीं है जिससे यह मालूम हो कि वे लोग यहाँ आये होंगे।

    सब लोग इधर-उधर घूमकर उन लाशों को देखने लगे। यकायक देवीसिंह एक ऐसी लाश के पास पहुँचे जिसमें जान बाकी थी और वह धीरे-धीरे कराह रहा था। उसके बदन में कई जगह जख्म लगे हुए थे और कपड़े खून से तर थे। देवीसिंह ने कुमार की तरफ देख के कहा, "इसमें जान बाकी है, अगर बच जाय और कुछ बातचीत कर सके, तो बहुत-कुछ हाल मालूम होगा।"

    कई आदमी उस लाश के पास जा मौजूद हुए और उसे होश में लाने की फिक्र करने लगे। उसके जख्मों पर पट्टी बाँधी गई और ताकत देने वाली दवा भी पिलाई गई। घोड़े नंगी पीठ करके दम लेने, हरारत मिटाने और चरने के लिए लम्बी बागडोरों से बाँध कर छोड़ दिए गए।

    आधे घण्टे बाद उस आदमी को होश आया और उसने कुछ बोलने का इरादा किया, मगर जैसे ही उसकी निगाह कमलिनी पर पड़ी, वह काँप उठा और उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई। उसके दिल का हाल कमलिनी समझ गई और उसके पास जाकर मुलायम आवाज में बोली, "बाँकेसिंह, डरो मत, मैं वादा करती हूँ कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ न दूँगी। हाँ, होश में आओ और मेरी बात का जवाब दो।"

    कमलिनी की बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत बदल गई, डर की निशानी जाती रही, और यह भी जाना गया कि वह कमलिनी की बातों का जवाब देने के लिए तैयार है।

    कमलिनी––किशोरी को लेकर धनपति यहाँ आई थी?

    बाँकेसिंह––(सिर हिलाकर धीरे से) हाँ, मगर …

    कमलिनी––मगर क्या?

    बाँकेसिंह––उसने किशोरी को जला देना चाहा था, मगर एकाएक अग्निदत्त और उसके साथी लोग आ पहुँचे और लड़-भिड़ कर किशोरी को ले गये। हम लोग उन्हीं के हाथ से जख्मी …

    बाँकेसिंह ने इतनी बातें धीरे-धीरे और रुक-रुककर कहीं क्योंकि जख्मों से ज्यादे खून निकल जाने के कारण वह बहुत ही कमजोर हो रहा था, यहाँ तक कि बात पूरी न कर सका और गश में आ गया। इन लोगों ने उसे होश में लाने के लिए बहुत-कुछ उद्योग किया मगर दो घण्टे तक होश न आया। इस बीच में देवीसिंह ने उसे कई दफे दवा पिलाई। देवीसिंह––इसमें कोई शक नहीं कि यह बच जायगा।

    शेरसिंह––(देवीसिंह की तरफ देखकर) हमने (कमलिनी की तरफ इशारा करके) इनके बारे में भी धोखा खाया, वास्तव में यह कुमार के साथ नेकी कर रही हैं।

    देवीसिंह––बेशक यह कुमार की दोस्त हैं, मगर तुमने इनके बारे में कई बातें ऐसी कही थीं कि अब भी

    कुमार––नहीं-नहीं देवीसिंह जी, मैं इन्हें अच्छी तरह आजमा चुका हूँ; सच तो यह है कि इन्हीं की बदौलत आज आप लोगों ने मेरी सूरत देखी।

  • चन्द्रकांता सन्तति १

    चन्द्रकांता सन्तति १

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    चन्द्रकांता सन्तति १
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    चन्द्रकान्ता सन्तति

    पहिला हिस्सा

    पहिला बयान

    गढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के लङके बीरेन्द्रसिंह की शादी विजयगढ़ | के महज जयसिह की लडकी चन्द्रकान्ता के साथ हो गई । भारत वाले | दिन तेजसिंह की अाखिरी दिल्ली के सर्वत्र चुनार के महाराज शिवदत्त को मशालची बनना पडा । बहुत की यह राय हुई कि महाराज शिवदत्त | कह दिल भी साफ नहीं हुआ इसलिये अब इनको कैद ही में रखना मुनासिव है, मगर महाराजा सुरेन्द्रसिंह ने इस बात को नापसन्द करके कहा कि 'महाराज शिवदत्त को हम छोड़ चुके हैं, इस वक्त जो तेजसिंह से उनकी लवई हो गई यह हमारे साथ बैर रखने का सबूत नहीं हो सकता, अाखिर महाराज शिवदत्त क्षत्री हैं, जब तेजसिंह उनकी सूरत बन बेइज्जती करने पर उतारू हो गये तो यद्द देख कर भी ये कैसे बरदाश्त कर सकते थे ! में यह भी नहीं कह सकता कि महाराज शिवदत्त का दिल हम लोगों की तरफ से बिल्कुल साफ हो गया क्योकि अगर उनका दिल साफ ही होता तो इस बात को छिप कर देखने के लिए आने की जरूरत क्या थी तो भी यह मानकर कि तेजसिंह के साथ की इनकी यह लड़ाई हमारी दुश्मनी का मन नहीं कहा जा सकता, हम फिर इनको छोड़ देते हैं। अगर अव भी ये हमारे साथ दुश्मनी करेंगे तो क्या हर्ज है, ये भी मर्द हैं और हम भी मर्द, देखा जायगा। __ महाराज शिवदत्त फिर भी छूट कर न मालूम कहाँ चले गए। बीरेन्द्रसिंह की शादी होने के बाद महाराज सुरेन्द्रसिंह और जयसिंह की राय से चपला की शादी तेजसिंह के साथ और चम्पा की शादी देवीसिंह के साथ की गई । चम्पा दूर के नाते में चपला की बहिन होती थी। ।

    न्यासी मब ऐयारों की शादी भई हुई थी। उन लोगो की घर गृहस्थी चुनार ही में थी, अदल बदल करने की जरूरत न पड़ी, क्योंकि शादी होने के थोड़े ही दिन बाद बड़े धूमधाम के साथ कुँवर वीरेन्द्रसिंह चुनार की राजगद्दी पर बैठाए गए और कुंवर छोड राजा कहलाने लगे । तेजतिह उनो राजद वान मुकर र रुए योर इसीलिए सब ऐयारों को भी चुनार ही मेसना पा। मुरेन्द्रसिंह अपने लके को ग्रॉसी के मामने से हटाया 'नहीं चाहते थे, लाचार नीदमा मद्दा फतेविद के सुपुर वे भी चुनार ही में राने लगे, मगर राज्य का काम मिल्कुन वीरेन्द्रहिस के जिम्मे या, हाँ कभी कमी गय दे दे।। ते जनिए के बार जीतसिंह भी बी भाजार के सात गुनार में लगे । महाराज मुरेन्दरिद और जीतसिद में बहुत सुन्नत भीती दमत नि दिन बढ़ता ही गई। रात म जातसिंह इसी गारकि उनती जितनी स्टर की जाना था। थी। नादीगने दाम बाट ता की लार या। मी गानो न भागमा पर सके न रस कागो तरान:दे चन्द्रमाता के बड़े लडके ________________

    पहिला हिस्सा | का नाम इन्द्रजीतसिंह, छोटे का नाम अनिन्दसिंह, चपला के लडके का | नाम भैरोसिह, और चम्पा के लक्ष्के को नाम तारासिंह रक्खा गया । जब ये चारो लडके कुछ बड़े श्रौर बातचीत करने लायक हुए तत्र इनके लिखने पढ़ने और तालीम का इन्तजाम किया गया और राजा सुरेन्द्रसिंह ने इन चारो लडको को जीतसिंह को शागिदीं और हिफाजत में छोड़ दिया। । भैरोसिंह और तारासिंह ऐवारी के फन में बड़े ही तेज और चालाक निकले । उनकी ऐयारी का इम्तिहान बराबर लिया जाता था । जैतह का हुक्म था कि भैरोसिंह और तारासिंह बुल ऐयारो को दकि अपने चाप तक को धोखा दे की कोशिश करें और इस तरह पन्नालाल बचे रह ऐयार भी उन दोनों लड़कों को भुलावा दिया करें । धीरे धीरे ये दोनों लडके इतने तेज और चालाक हो गए कि पन्नालाल वरह की ऐयारी इनके सामने व गई । भैरोसिंह ग्रोर तारासिंह इन दोनों में चान्नाक ज्या दे कौन था इसके कहने का कोई जरूरत नहीं, आगे मौका पने पर यापही मालूम हो | जायगा, ह इतना कह देना जरूरी है कि भैभिह को इन्द्रजीतसिंह के । साथ और तारासिंह को आनन्दसिंह के साथ ज्यादे मुहब्ब्त थी । चारो लडके होशियार हुए अर्थात् इन्द्रजीतसिंह भैरसिंह शौर तारा { सिंह की उम्र अट्र ह अटारह वर्ष की श्रौर नन्दसिंह की उम्र पन्द्रह .. वर्ष की हुई ! इतन दिन तक चुनार राज्य में बराबर शान्ति रही बल्कि ", छिनी तकलं फे श्रौर महाराज शिवदत्त की शैतानी एक स्वप्न की तरह सभी के दिल में रह गई ।। इन्द्रज तसिंह को शिकार का शौक बहुत था, जहाँ तक बन पडता वे • रोज शिकार खेला करते ! एक दिन किसी वनरखे ने हाजिर हो कर बयान | किया कि इन दिनो फलाने जंगल की शोभा खूब बढ़ो चढो है और । शिकारी जानवर भी इतने झाए हुए हैं कि अगर वहाँ महीने भर टिक कर ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति शिकार खेला जाय तो भी जानवर न घटें और कोई दिन खाली भी न जाय | यह सुन दोनों भाई बड़े खुश हुए। अपने बाप राजा बीरेन्द्रसिंह ते शिकार पेलने की इजाजत माँगी और कहा कि “हम लोगों का इरादा झाट दस दिन तक जंगल में रद्द कर शिकार खेलने का है । इसके जवाब में राज चोरेन्द्रसिंह ने कहा कि इतने दिनो तक जगल में रह कर शिकार पैलने का हुक्म में नहीं दे सकता, हाँ अपने दादा से पूछोअगर चे हुक्म है तो कोई हर्ज नहीं है। यह सुन इन्द्रजीतसिंह अौर अानन्दसिंह ने अपने दादा महाराज सुरेन्द्र के पास जाकर अपना मतलन अर्ज किया । उन्होंने खुशी से मन्जूर किया और हुक्म दिया कि शिकीरगाह में इन दोनों के लिए खेमा उदा किया जाय और जब तक वे शिकारगाह में रहे पाँच सौ फौज बरावर इनके साथ रहे ! शिफार पेलने का हुक्म पा इन्द्र जीतसिंह शौर श्रीनन्दसिंह बहुत पुग्न हुए श्रीर अपने दोनों ऐयार भैरोसिंह और तारासिंह को साथ ले मय पाँच मी फोन के चुनार से रवाना हुए। नुनार से पाँच कम दक्षि एक घने और भयानक जंगल में पहुँच कर उन्होंने देश ४ाला ! दिन थोटा बाकी रह गया था इसलिए यह राय गरि 'प्राज्ञ श्रीराम करे, कल सवेरे शिकार का बन्दोवस्त किया जायगा, मगर वनरम्प 5 ॐा शेर का पता लगाने के लिए, आज ही कर दिया जाय । जगली की हिफाजत के लिए जो नौकरे रहते हैं उनको बनरखे ने १ । शिर पिलाने का काम देनरी हा का है। ये लोग जगल * पून घूम र श्री शिकारी जानवरों के पैर का निशान दे और उस -गज पर जा जा जर पता लगाते हैं कि शेर इत्यादि कोई चिंकारा जानपर म जान ५१ ना, या प्रगर है तो कहाँ पर है । वनरखो का | ":{" ::रना ना । टप झा व उत्रर कि फलानो हो। ः । नागः या २५ ।। ________________

    पहिला हिस्सा भैंसा + बाधने की कोई जरूरत नहीं, शेर का शिकार पैदल ही किया जायगा । । दूसरे दिन सवेरे मनरखों ने हाजिर होकर अर्ज किया कि इस जुगल | में शेर तो है मगर रात हो जाने के सबब हम लोग उन्हें अपनी अॉखों से न दे सके, अगर आज का दिन शिकार न खेला जाय तो हम लोग देख कर उनका पता दे सकेंगे ।। | आज के दिन भी शिकार खेलना बन्द किया गया । पहर भर दिन बाकी रहे इन्द्रजीतसिंह और शानन्दसिंह घो पर सवार हो अपने दोनों + खास शेर के शिकार मै भैसा बाँधा जाता है । भैंसा बाँधने के दो कारण हैं । एक तो शिकार को अटकाने के लिए अथात् जब बनरखे आकर खवर दें कि फलाने जगले में शेर है, उस वक्त या कई दिनों तक अगर शिकार खेलने वाले को किसी कारण शिकार खेलने की फुरसत न हुई और शेर को अटकाना चाहा तो भंसा बाँधने का हुक्म दिया जाता है । बनरले भैसा ले जाते हैं और जिस जगह शेर का पता लगता हैं उसके पास ही किसी भयानक और सायेदार जगल या नाले में मजबूत लूटा बाड़ कर भैंसे को वाँध देते हैं । जब शेर भ से की वं पाता है तो वह आता है और भैंसे को खा कर उस जगल में कई दिनों तक मस्त और वैफिक्र पड़ा रहता है । इस वकीब से दो चार भैंसा देकर महेनो श्र को अटका लिया जाता है। शेर को जब तक खाने के लिए मिलता है वह दूसरे जगल में नहीं जाता | शेर का पेट अगर एक दफे खूब भर जाये – तो उसे सात आठ दिनों तक खाने की परवाह नहीं रहता 1 खुले भेसे को शेर जल्दी नहीं मार सकता है। – दूसरे जर मचान बॉध कर शेर का शिकार किया चाहते है या एक जंगल से दूसरे जंगल में अपने सुबीते के लिए उसे ले जाया चाहते हैं तेव ३ भो इसी तरह भैसे वय वव कर हटाते ले जाते है | इसको शिकार लोरा 'भर' भी कहते हैं । ऐयारों को साथ ले घूमने और दिल बहलाने के लिए डेरे से बाहर निकले और टहलते हुए दूर तक चले गए।

    ये लोग धीरे धीरे टहलते और बातें करते जा रहे थे कि बायें तरफ से शेर के गरजने की आवाज आई जिसे सुनते ही चारो अटक गए और धूम कर उस तरफ देखने लगे जिधर से वह आवाज आई थी।

    लगभग दो सौ गज की दूरी पर एक साधू शेर पर सवार जाता दिखाई पडा जिसकी लम्बी लम्बी और घनी जटाये पीछे की तरफ लटक रही थी एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में शख लिए हुए था। इसकी सवारी का शेर बहुत बड़ा था और उनके गर्दन के बाल जमीन तक पहुंच रहे थे।

    इसके आठ दस हाथ पीछे एक शेर और जा रहा था जिसकी पीट पर आदमी के बदले बोझ लदा हुया नजर आया। शायद यह असबाब उन्हीं शेर सवार महात्मा का हो।

    शाम हो जाने के सबब साधू की सूरत साफ मालूम न पडी तौ भी उसे देव दन चारो को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और कई तरह की बाते सोचने लगे।

    इन्द्र०। इस तरह शेर पर सवार हो कर घूमना मुश्किल है।

    आनन्द०। कोई अच्छे महात्मा मालूम होते।

    मैने०। पीछे वाने शेर को देखिए जिस पर असबाब लदा हुया है किस त भेद की तरह सिर नीचा किए जा रहा है।

    तास०। शेरों को बस में कर लिया है।

    इन्द्र०। जी चाहता है उनके पास चल कर दर्शन करें।

    आनन्द०। अच्ची बात है, चलिए पास से दरों कैसा शेर है।

    साग०। बिना पास गए महात्मा और पाखण्टी में भेद भी न मालूम होगा।

    भैगे०। शाम तो हो गई है, और चलिए आगे से बढ़ कर रोकें।

    आनन्द०। आगे से चल कर गरने से बुरा न मानें। ________________

    पहिला हिस्सा भैरो० } हम ऐयारों का तो पेशा ही ऐसा है कि पहले तो उनका साधू ना ही विश्वास न कर सकवै ! । इन्द्र० । अाप लोगों की क्या बात है जिनकी मूछ मेरो ही मुई। तो है, खैर चलिए तो सही । भै३० ३,लए ।। | चारो अामा अागे से घूम कर उन अरबाजी के सामने गए ? शेर र सवार जा रहे थे । इन लोगों को अपने पास अ.ते देख बाबाजी स्क ए ! पहिले तो इन्द्रजीतसिह और श्रानन्दसिह का ६ शेर को देख र अ मगर पिर ललकारने से आगे बढ़ा । थो दूर जाकर दोनों राई घोड़े के ऊपर से उतर पड़े, भैरोसिह और तारासिह में दोनों घो। को पेद से बाँध दिया। इसके बाद पैदल ही चारो अादमी महात्मा के इस पहुँचे ।। | बाबाजी० } { दूर ही से ) यो राजकुमार इन्द्रजंतसिंह और निन्दसिंह, कहो कुशल तो है ? इन्द्र० } ( प्रणाम करके ) आपकी कृपा से सब मंगल है । | बा० । ( भैरोसिंह और तारासिंह की तरफ देख कर ) को भैरो और तार, अच्छे हौ ? दोनो० ( पृथ जोड़ कर ) यापकी दया से । चा० । राजकुमार, मैं खुद तुम लोगों के पास जाने को था क्योंकि मने शेर के शिकार करने के लिए इस जल में डेरा डाला हैं । मैं रिनार जा रहा हूँ, घूमता फिरता इस जगल में भी र पचा | यह ल अच्छी मालूम होता है इसलिए दो तीन दिन तक यहाँ रहने का । चार है, कोई अच्छी जगह देख कर धूनी लगाऊँगा । मैरे साथ सवारी र अमात्र लादने के कई शोर हैं, इसलिए कहता हूँ कि धासे में मेरे सी शेर के मत मारना नहीं तो मुश्किल होग, सैक शेर पच कर हारे लश्कर में हलचल मचा डानेंगे और बहुत की जान जाय । ________________

    च द्रकान्ता सन्तति तुम प्रतापी राजा सुरेन्द्रसिंह * के लड़के ही इसलिए तुम्हें पहले ही समझा देना मुनासिव है जिसमें किसी तरह का दुःख न हो । इन्द्र० । महाराज में कैसे जानें गई कि यह श्रापका शेर है। ऐसा ही है तो शिकार न पैलूगा । बाथा ० । नहीं नहीं, तुम शिकार खेली, मगर मेरे शेरों को मत मारो । इन्द० | मगर यह कैसे मालूम हो कि फलाना शेर श्रीपका है। बाबा० । टेप में अपने शेरों को बुलाता हूँ, पहिचान ले । बाबाजी ने शंख बजाया । भारी शख की विजि चारो तरफ जंगल में गुज गई और हर तरफ से गुर्राहट की आवाज आने लगी । थोडी हो देर में इधर उधर से दौडते हुए पॉच शेर श्री श्री पहुचे । ये चारो दिलावर शौर बहादुर ये, अगर कोई दूसरा होता तो डर से उसकी जान निकल जाती । इन्द्रजीतसिह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देख उछनने कूदने लगे मगर रेशम को मजबूत बागडोर से बंधे हुए थे इससे माग न मके } इन शेरों ने श्राकर बडी उधम मचाई, इन्द्रजातसिंह वगैह को दे गरजने कूदने अौर उछलने लगे, मगर बाबाजी के डॉटते ही मी ठण्डे रो सिर नीचा कर भइ बकरी की तरह खड़े हो गए। यत्रि० । दे। इन शेरी को पहिचान लो, अभी दो चार शौर है, माग होता है उन्होंने शर ीं अविाज नहीं सुनी । खेर अभी तो * गं जगत् मे हैं, उन बाकी शेरों को भी दिखला दूंगा, कल भर • । गदा श्रीर त्रुट क्यो । | भो० } फिर अपने मुलत कहाँ होगी १ अापकी धूनी किस जग गई है। | जावा० | मुझे तो यही जग आनन्द की मालूम होती है, के : ना सुना होगा । | गाध माग भूल गए, वरिन्द्रसिद्द की जगह सुरेन्द्रसिंह का ना चाचीजी शेर से ना उत हे गौर जितने शेर उस जग्इ आए थे वे मन बावाजी चार तरफ धूने तथा मुहब्बत से उनके बदन को चाटने और सूधन लगे।व चार!दिम।धोडी देर तक वह और अटकने के बाद वविाजी से विदा है। अमे में शाये।

    जब सन्नाटा हुआ भैरोसिंह ने इन्द्रजःतभिह से कहा,"मेरे दिमाग में इम समय बहुत सी बातें घूम रही हैं।मैं चाहताहूँ कि हम लोग चारों|आदिमी एक जगह बैठ कुमेटी कर कुछ राय पक्की करें।

    इन्द्रजीतसिंह ने कहा, अच्छा आनन्द और तारा को भी इसी जगह बुला लो।

    भैरोसिंह गये और आनन्दसिह तथा तारासिंह को उसी जगह बुला लाए।उस वक्त सिवाय इन चारा के उस खेमे में और कोई न रहा।भैरोसिंह ने अपने दिल को हालै कद्दा जिसे सभी ने बड़े गौर से सुना,इसके बाद पहर भर तक कुमेटी करके निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।

    यह कुमेटी कैसी भई?भैरोसिंह का क्या इरादा हुशा श्रौर उन्होंने क्या निश्चय किया है?तथा रात भर वे लोग क्या करते रहे है?इसके कहनेकी कोई जरूरत नहीं, समय पर सब कुछ खुन जाय।

    सवेरा होते ही चारो आदमी खेमे के बाहर हुए और अपनी फौज के सदर कञ्चनसिंह को बुला कुछ समझा बुझा बावाजी की तरफ रवाना हुए । जव लश्कर से दूर निकल गए,नन्दसिंह भैरोसिंह और तारासिंह ता तेजी के साथ चुचार की तरफ रवाना हुए, और अकले इन्द्रजीतसिंह शबाजी से मिलने के लिए गए।

    बाबाजी शो के बीच में धूनी रमाए बैठे थे।दो शेर उनके चारो। तरफ घूम घूम कर पहरा दे रहे थे।इन्द्रजीतसिंह ने पहुँच कर प्रणाम किया और चार्ज ने प्रार्शीवाद देकर चैठने के लिए कहा।

    इन्द्रजतसिंह ने बनिस्बत कल के आज दो शेर और ज्यादै देखे।थोड़ी देर चुप रहने के बाद बातचीत होने लगी है।

    २

    बाबा कही इन्द्रजीतसिंह,तुम्हारे भाई और दोनों ऐयार कहाँ रह गए,वे नहीं आए?

    इन्द्र०।हमारे छोटे भाई आनन्द को बुखार आ गया।इस सबब से वह न या सका।उसी की हिफा नत में दोनों ऐयारों को छोड मैं अकेला आपके दर्शन को आया हूँ!

    वावा०।अच्छा क्या हर्ज है,आज शाम तक वह अच्छे हो जायेंगे,कहो आज कल तुम्हारे राज्य में कुशल तो है?

    इन्द्र०।आपकी कृपा से सब ग्रानन्द है।

    वावा०।बेचारे वीरेन्द्रसिंह ने भी बड़ा ही कष्ट पायो!खैर जो हो दुनिया।उनका नाम रह जायगा।इस हजार वर्ग के अन्दर कोई ऐसा सजा नहीं है जिसने तिलिस्म ताड़ हो!एक और तिलिस्म है,असल में वही भरी और तारीफ के लायक है।।

    एन्द्र०।पिताजी तो कहते हैं कि वह तिलिस्म तेरे हाथ से टूटेगा।

    वावा०।हाँ ऐसा ही होगा,वह जरूर तुम्हारे हाथ से फतह होगा,सभे केाई मन्दे नए।

    इन्द्र०।देखें कर तक ऐसा होता है,उसकी ताली का तो कही पता ही नहीं लगता।

    बावा°। ईश्वर चाहेंगा तो एक ही दो दिन तक तुम उस तिलिस्म के होने में हाथ लगा दोगे।उस तिलिस्म की ताली में हूं।कई पुश्त ने हम लोगों उस तिलिस्म के दागी होते चले आए हैं।मेरे परदादा दाट श्री बाप उमी तिलिस्म के दारोगा,जब मेरे पिता का देहान्तने लगा तो हैन को ताली मेरे सुपुर्द कर मुझे उसका दारोगा मुररर:दिइ।अप वर उतर आ गया है कि में उस ताला तुम्हारे या वह निन्मि तुग्गु नाम पर वाया गया है और मित नुरा’ र ? उमा मानिस' नद्दा पन मना है। • १ २ १ देर का है ? पहिला हिस्सा।वाचा।कुछ नहीं,कल से तुम उसके तोडने में हाथ लगा दो,मगर एक बात तुम्हारे फायदे की हम कहते हैं।

    इन्द्र०।वृह क्या?

    वावा॰तुम उसके तोड़ने में अपने भाई अनिन्द को भी शरीक कर लो,ऐसा करने से दौलत भी दूनी मिलेगी और नास मी दोनों भाइयों की दुनिया में हमेशा के लिए बना रहेगा।

    इन्द्र०।उसकी तो तबीयत ही ठीक नहीं!

    वाचा॰।क्या हर्ज है, तुम अभी जाकर जिस तरह बने उसे मेरे।पास ले आओ,मैं बात की बात में उसको चगा कर दूगा!श्रीज ही तुम लोग मेरे साथ चलो,जिसमें कल तिलिस्म टूटने में हाथ लग जाय,नहीं तो साल भर फिर मौका न मिलेगा।

    इन्द्र०।बावाजी, शअसल तो यह है कि मैं अपने भाई की बढ़ती नहीं चाहता,मुझे यह मजूर नहीं कि मेरे साथ उसका भी नाम हो।

    वावा॰।नहीं नहीं,तुम्हें ऐसा न सोचना चाहिए,दुनिया में भाई से बढ़ के कोई रन नहीं है।

    इन्द्र०।जी हाँ,दुनिया में भाई से बढ़ के रन नहो तो भाई से बढ़ के कोई दुश्मन भी नहीं,यह बात मेरे दिल में ऐसी वैठ गई है कि उसके हटाने के लिए ब्रह्मा भी कर समझा बुझा तो भी कुछ नतीजा न निकलेगा।

    बाबा०।विना उसको साथ लिए तुम तिलिस्म नहीं तोड़ सकते।

    इन्द्र०!( हाथ जोड़ कर ) बस तों जाने दीजिए,माफ कीजिए,मुझे तिलिस्म तोडने की जरूरत नहीं!

    वावा॰। क्या तुम्हें इतनी जिद्द है?

    इन्द्र०।में कह जो चुकी कि ब्रह्मा भी मेरी राय पलट नहीं सकते।

    वावा०।खैर तुम्हीं चलो,मगर इसी वक्त चलना होगा।

    इन्द्र०।हाँ हाँ,मैं तैयार है,अभी चलिए । नावाजी उसी समय उठ खड़े हुए,अपनी गठडी मुठडी चाध एक शैर पर लाद दिया तथा दूमरे पर आप सवार हो गए।इसके बाद एक गैर की तरफ देख कर कहा, 'इसा गङ्गाराम, यहाँ तो आओ।”वह शेर नुरत इनके पास आया ।बाबा जी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा,“तुम दुग्न पर मार हो लो।"इन्द्रजीतसिंह भी कूद कर सवार हो गए और था गज के साथ साथ दक्षिण का रास्ता लिया!बावाजी के साथ शेर भी कई प्रागे कोई पीछे कोई ये कोई दाहिने हो बाबाजी के साथ साथ जाने लगे।

    सब शेर तो पीछे रह गए मगर दो शेर जिन पर बावाजी श्रीर इन्द्र जीनसिंह मवार थे झागे निकल गएदो पहर तक ये दोन चल गए!जब दिन दुनने लगा वावज ने इन्द्र तमिह से कहा,'यह टड्र कर कुछ ग्या पी लेना चाहिए। इसके जवाब में कुमार चले,"बाबा,खाने पीन की कोई जरूरत नहीं।अभी महात्मा हा ठहरे,मुझे भूख ही नई लगी, फिर अटकने की क्या जरूरत है।जिस काम के पीछे पड़े उसमे मुला ऊना ठीकनहीं।

    बाबाजी न कर, शाबाश,तुम बड़े बहादुर,अगर तुम्हारा दिल इतना मजा न होता तो तिलिस्म तु हारे ही हाथ से टूटेगा ऐसा‌ लान न ह जाते,खेर चलो!

    कुछ दिन फ{ द्दा जब ये दान एक पहा के नाचे पहुंचे 1 बावज ने श ३ वजाया 1 धंदा हूँ दर में चारो तरफ से संकः पहाडा बुटेर द्दा * वर लिए आते दिपाई पई श्रीर में हैं। बीस पचास अदिमय मा५ लिए पूरा तप में ग्राती या राजा शिवदत्त नजर पजिरे * :17 िन ऊचा मायाज में कहा, “इन । म पहिचान *, * नाराज शिवदत्त । न तस्यार मेरे कमरे में लटका हुई। * 1 दादा नी म न तन्त्र र मुझे दियो कर कहा था कि हमारे सत्र में र न प दिन * | श्री श६, काश्ते में चावाज पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    घूमते फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी भरी सुहावनी पहाडी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए,मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमर और दालान रहने लायक थे।यह छोटी पहाडी अपने चारे तरफ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दत्री हुई थी वि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना श्रौर कुछ पता लगाना मुश्किल था।।इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ वास आदमी थे जिन तीन मुसलमान ऐयार भी थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्ते शरों में में से झीर यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गए।कि इनके शामिल रहने से कभी न कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला ले का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के श्रौर केाई इर लायक नजर भी न झात्ती था जो इन बेईमान को ऐयारी के लिए अपने मा राता।नेचे लिखे नाम से ये तीनों ऐयार पुकारे जाते थे-चाकर अला,ईटावक्श और यारग्रल!इन सत्र ऐयारों श्रौर साथियों ने मुपए,पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा महाराज शिवदत्त की मदद की।

    राजा वारेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ मगर मेंका न मिलने के स व मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा।अपनी चालाकी और होशियारी से वह् पहाटी भिल्ल कोल और पवार इत्यादि जाति के श्रादमिर्यों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजार में गल्ला मी शहद श्रीर,बहुत मी जगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों के मारफत दर में भैरवा और विया कर रुपए,बटोरने लगा।उन्हीं लोगो से शियार रके थे।बहुत फौज भी उस वन लधापहाति के लोग भै होशियार हो गए और खुद्द शहर मेंर मला वर्ग इंच रुपए इक्ट्ठा करने लगे । शिवदत्तगढ़ भा अच्छी तरह अबाद आ गया।

    दूध बो रह ऐयारी ने भी अपने कुल साथ को जो ________________

    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३

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    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३ ________________

    चन्द्र गन्ना सन्तति रेन्द्र शवदत्त के ऐयारों के चालाका ता खूब की था मगर… मेन्द्र । या जा सर पर मवार हा सिद्ध ता बन लेकिन अपना काम न कर सके न! मगर मे भैरामिह का अब वहत जल्द छुडाना चाहिए। नात० । कुमार घबगायो मत, तुम्हारे दोस्त को किसी तरह की तकलीप नाही हो वती, लेकिन अभी उमका शिवदत्त के यहाँ फंसे ही रहना मुना गय – । वह वाफ नहीं है, बिना मदद के श्राप ही छूट कर या राकना , तिस पर पनानाल रामनागयण चुन्नीलाल बद्रीनाथ और ज्योलीना उसकी मदद को भेजे हो गए है, देखो तो क्या होता है। स्तनांनी तक चुपचाप बैठे रह कर शिवदत्त ने फिर अपना स्वराया करने पर उमर योधी है। दर' । कुमारी के साथ फौज शिकारगाह में गई है उसके लिए शर दश 'क्माता ? जीत० । अभी शरगाह से डेरा उठाना मुनासिब नही । (तेजसिंह ताप दास का ) क्यों तेज ? ने० । (गाय नोट कर ) जी हाँ, शिकारगाह में डेरा कायम रहने से हम लोग बदी ग्यूवमूरती श्रीर दिल्लगी से अपना काम निकाल सकेंगे। मुंगेन्द्र यार शिवदत्तगढ़ से लौटे तो कुच हालचाल मालूम हो । तेजल ना नई मार परमी तक कोई न काई जसर पायेगा। पर भर में ज्याद देर तक बातचीत होती रहो । कुल बातों को सोचना पन नुनाममममले बल्कि यासिरी बात का पता तो हम मानगा जो मजान्न म उन के बाद जतसिंह नाले में तेजहि को राम जान दीजिए, लोहोगा देखा जायगा, जल्दा क्या है। गगा friअनी बादरोम इन्द्रजातसिंह और आनन्दसिंह नामा पल देव । वरमात का मीसिम है, गगा पदाग्नि के नीन जल पहुँचा हुआ है, छोटी छाटी सदर ________________

    पहिला हिस्सा दीवारों में टक्कर मार रही है, अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा जेल में पड़ कर लहरों को शाभा दूनी बढ़ा रही है, सन्नाटे का आलम है, इस चारदरी में सिवाय इन दोनों भाइयों के अौर कोई तीसरा दिखाई नहीं देता } इन्द्र० | अभी जल कुछ और बढ़ेगा । अानन्द० । जी हाँ, पारसाल तो गगा आज से कहीं ज्यादे बढी हुई यी जय दादाजी ने हम लोगों को तर केर पार जाने के लिए कहा था । | इन्द्र० { उस दिन भी खून ही दिल्लगी हुई, भैरोसिंर सभों में तेज रहा, बद्रीनाथ ने कितना ही चाहा कि उनके आगे निकल जायें मगर न हो सका। अनिन्द० । हम दोनो भी कास भर तक उस किश्ती के साथ ही साथ राएं जो हम लोगों की हिफाजत के लिए लग गई थी। इन्द्र० ! बम वही तो हम लोगो का शाखिरी इन्तिहीन रहा, फिर तव से जल में तेरने की नौबत ही कहाँ थाई ।। आनन्द० । कल तो मन दादाजी से कहा था कि आज कल गंगाजी खून बढ़ी हुई है तरने को जी चाहता है । इन्द्र० | तव क्या बोले ? | अनिन्द० । कहने लगे कि बस अब तुम लोगों का तेरना मुनासिब नहीं है, हँसी गो । तेरना भी एक इल्म है जिसमे तुम लोग होशियार हो चुके, अब क्या जरूरत है ? ऐसी है। जी चाहे तो किश्ती पर सवार हो कर जाग्रो सैर करो ।। इन्द्र० । उन्होंने वहुत ठीक कहा, चलो किश्ती पर थोडी दृर घूम श्रायें, इसके लिए इजाजत लेने की भी कोई जरूरत नहीं । बात चीत हो ही रही थी कि चोवदार ने आकर अर्ज किया, “एक * बहुत बूढ़ा जवहरी हाजिर है, दर्शन किया चाहती हैं ।” आनन्द० । यह कौन सा वक्त है ? चोपदार० । ( हाथ जोड़ कर ) तावेदार ने तो चाहा था कि इस ________________

    चन्द्रकान्त सन्ततिं समय उसे पिटा करै मगर यह ख्याल करके ऐसा करने का हौसला ने पदा कि एक तो लटकपन दो से व इस देवर को नमकवार है और भाराज की भी उन पर निगाह रहती है, दूसरे अस्सी वर्ष का बुड्डा है, तीसरे करता है कि अभी इस शहर में पहुंचा हूं, महाराज का दर्शन कर चुका है, सरकार के भी दर्शन हो जायें तब आराम से सराय में डेरा डाऊँ, र मेरे से उसका यह दस्तूर भी है ।। न्ट्र० । अगर ऐसा है तो उसे अपने ही देना मुनासिब है ।। अनिन्द्र० । तर अाज किश्ती पर सैर करने का रगनजर नहीं आता है। इन्द्र० । या दृर्ज है, कल सही । चोदार सलाम करके चला गया और थोड़ी ही देर में सौदागर को ले कर जिर हुआ । हकीकत में वह सौदागर बहुत ही बुड्ढा शा, यामत ग्रौर शरफ्त उसके चेहरे से बरसती थी । आते ही मुलाम करके उगने दोनों भाइयों को दो अंगूठियों नजर दी और कबूल होने के बाद गइन पर कर जमीन पर बैठ गया ।। म भुइवें जयरी की इजत ही गई, मिजाज का हल सफर की *पियत पूछने उद देने पर जाकर गर्म करने और कल फिर हाजिर होने का हुक्म हुआ, तीदागर सलाम करके चला गया । मंदिर में जो दो टूठिया दोनों भाइयों को नजर दी थी उनमें प्रानन्दर्भिद् की अंगूठी पर निहायत खुरार मानिक जना हुआ था और दर्जनह् िकी अँगूठी पर सिर्फ एक छोटी सी तस्वीर थी जिसे दो एक र निग" भर र इन्द्रजीतसिंह ने देगा श्ररि कुछ सोच कर चुप हो रहे । | एरन्त होने पर रात के शुमटान की रोशनी में फिर उसे अॅटूटी ३ र नि नगीने की जद कमसिन इमीन अँरित की तस्वीर

    : १ । चाहे थट तुन्दर निर्भर इन छोटो या न हो मगर मुसीवर ३ २ १ माई उम६ गचं कर थे | इ पर्ने देते एक मरतने तो इन्द्रादि । २ए लिन हो गई कि अपने का कोईर उस औरत की बैठ कर भोजन भी करना ही पडा़,हाँ शाम को इनकी बेचैनी बहुत बढ़ गई जब सुना कि तमाम शहर छान डालने पर भी उस जवहरी का कही पता न लगा और यह भी मालूम हुआ कि उस जवहरी ने यह बिल्कुल झूठ कहा था कि 'महाराज का दर्शन कर आया हूँ, अब कुमार के दर्शन हो जायँ तब आराम से सराय में डेरा डालू ।' वह वास्तव में महाराजा सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह से नहीं मिला था ।

    तीसरे दिन इनको बहुत ही उदास देख आनन्दसिंह ने किश्ती पर सवार होकर गद्गाजी को सेर करने और दिल बहलाने के लिए जिद्द की, लाचार उनकी बात माननी ही पड़ी ।

    एक छोटी सी खूबसूरत और तेज जाने वाली किश्ती पर सवार हो इन्द्रजीतसिंह ने चाहा कि किसी को साथ न ले जायें सिर्फ दोनों भाई ही सवार हो और खे कर दरिया की सैर करें,। किसी की मजाल थी जो इनकी बात काटता, मगर एक पुराने खिदमतगार में जिसने कि बीरेन्द्रसिंह को गोद में खिलाया था और अब इन दोनों के साथ रहता था ऐसा करने से रोका और जब दोनों भाइयों ने न माना तो वह खुद किश्ती पर सवार हो गया । पुराना नौकर होने के ख्याल से दोनों भाई कुछ न बोले, लाचार साथ ले जाना पड़ा ।

    आनन्द० । किश्ती को धारा में ले जाकर बहाव पर छोड़ दीजिए फिर से कर ले आवेगे ।

    इन्द्र० । अच्छी बात है ।

    सिर्फ दो घण्टे दिन बाकी था जब दोनों भाई किश्ती पर सवार हो दरिया की सैर करने को गए क्योंकि लौटती समय चॉदनी रात का भी आनंद लेना मंजूर था ।

    चुनार से दो कोस पश्चिम गंगा के किनारे ही पर एक छोटा सा जंगल था । जब किश्ती के पास पहुंची, वसी की और साथ ही गाने की बारीक सुरीली आवाज इन लोगों के कानो में पड़ी । संगीत एक ऐसी

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    चन्द्रकान्ता सन्तति चीज है कि हर एक के दिल को चाहे वह कैला ही नासमझ क्यों न हो | अपनी तरफ खेंच लेती है यहाँ तक कि जानवर भी इसके वश में हो कर अपने को भूल जाता है ! दो तीन दिन से कुअर इन्द्रजीतसिंह का दिल चुटीला हो रहा था, दरिया की बहार देखना तो दूर रहे इन्हें अपने तनोबदन की भी सुध न थी, ये तो अपनी प्यारी तस्वीर की धुन में सर झुकाए बैठे कुछ सोच रहे थे, इनके हिसाब चारो तरफ सन्नाटर था, मगर इस सुरीली आवाज ने इनकी गर्दन घुमा दी और उस तरफ देखने को मजबूर किया जिधर से वह अावाज आ रही थी ! किनारे की तरफ देखने से यह तो मालूम न हुअा कि बसी बजाने यो गाने वाला कौन है मगर इस बात का अन्दाजा जरूर मिल गया कि लोग बहुत दूर नहीं हैं जिनके गाने की विजि सुनने वालों पर जादू का सा असर कर रही है ! इन्द्र० | श्राहा, क्या सुरीली आवाज है !! । ग्रानन्द० ! दूसरी अावाज भी आई । बेशक कई औरतें मिल कर | गा ३ जा रही हैं। | इन्द्रजीत० । ( किश्ती का मुहूं किनारे की तरफ फेर कर ) ताज्जुब है कि इन लोगों ने गाने बजाने और दिल बहलाने के लिए ऐसी जगह पसन्द की ! जरा देखना चाहिए । | आनन्द० | क्या हुई है, चलिए। वृहे रिपदमतगार ने किनारे किश्ती लगाने और उतरने के लिए मन। फ़िया और बहुत समझाया मगर इन दोनों ने न मानी, किश्ती किनारे लगाई और उतर कर उस तरफ चले जिधर से अचाने आ रही थी । जगन्न में थोड़ी ही दूर जा कर उसे पन्द्रह नौजवान औरतों का झुण्ड नजर पडा ऊँ। रग विरगर पोशाक और कीमती जेवरों वे अपने हुस्न को दूना किए ऊँचे पेड़ से लटकते हुए एक फूले की फुला रही थीं। कोई वंसी कोई मृदग वजाती, कोई हाथ से ताल दे दे कर गा रही थी । उस हिंडोले ________________

    पहीली इसी पर सिर्फ एक ही शौरत गगा की तरफ रुर किए बैठी थी । ऐसा मालूम होता था मानों परिय साक्षात् किसी देवकन्या को झुना र ग वजा कर | इसलिए प्रसन्न कर रही है कि लुबरती बढ़ने और नौजवानी के स्थिर रहने का वरदान पावें । मगर नहीं, उनके भी दिल की दिल ही दे रही और कुँअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह को आते देख हिंडोले पर बैठी हुई नाजनीन को अकेली छोड़ न जाने क्यों भाग जाना ही पडा । शानन्द० । भैया, वह सब तो भाग गई ! इन्द्र० । हो, मैं इस हिंटोले के पास जाता हूँ, तुम देखो वे शौरतें किधर गई । अानन्द । दृत गच्छा ।। चाहे जो हो मगर कुअर इन्द्रजीतसिंह ने उसे पहिचान ही लिया | जो हिंडोले पर अकेली रह गई थी । भला यह क्यों न पहिचानते ? जवहरी की नजर दी हुई अंगटी पर उसकी तस्वीर देख चुके थे, उनके दिल में उसकी तस्वीर खुद गई थी, अत्र तर मु हमारी मुराद पाई, जिसके लिए अपने को मिटाना मंजूर था उसे विना परिश्रम पाया, फिर क्या चाहिए । ग्रानन्दसिंह पता लगाने के लिए उन ग्रेरितों के पीछे गए मगर वे ऐसी भागी कि झलक तक दिखाई न दी, लाचार आधे घंटे तक रान होकर फिर उसे हिंटोले के पास पहुचे ! हिंटले पर बैठी हु श्रेरित की कौन कहे अपने भाई को भी वहा ने पायी । वर्षा कर इधर उधर हुने और पुकारने लगे, चरा तक कि रात हो गर्ट और यह सोचकर क्रिती के पास पहुंचे कि शायद वह चले गए हों, लेकिन वह भी सिवाय उन चुढे | पिदमतगार के किसी दूसरे को न देता । जी बेचैन हो गया, ज़िदमतगार को सन्द हाल कह कर बोले, "ज तक अपने व्यारे भाई का पता ने लगा टूगा घर न जाऊंगा, तू जाकर यहां के हवाले की सभी को पयर कर दे ।” खिदमतगार नै र तरह से नन्दसिंह को समझाया बुझाया और घर चलने के लिए कहा मगर कुछ फायदा न निकला । लाचार उसने ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति किश्ती उसी जगह छोडी और पैदल रोता कलपती किले की तरफ रवाना हुआ क्योंकि यहा जो कुछ हो चुका था उसका हाल राजा बीरेन्द्रसिंह से कहना भी उसने आवश्यक समझा ! चौथा बयान खिदमतगार ने किले में पहुच कर और यह सुन कर कि इस समय दोनों एक ही जगह बैठे हैं कु अर इन्द्रजीतसिंह के गायब होने का हाल और सवत्र जो कु र आनन्दसिंह की जुबानी सुना था महाराज सुरेन्द्र सिंह और श्रीरेन्द्रसिंह के पास हाजिर होकर अर्ज किया । इस खबर के सुनते ही उन दोनों के कलेजे में चोट सी लगी । थोड़ी देर तक घबराहट के सब कुछ सोच न सके कि क्या करना चाहिये | रात भी एक पहर से ब्याई जा चुकी यी 1 आखिर जीतसिंह तेजसिंह और देवीसिंह को बुला कर खिदमतगार की जुबानी जो कुछ सुना था कहा और पूछा कि अब क्या करना चाहिये । तेजसिंह० | उस जगल में इतनी अौरत को इकट्ठे हो कर गाना बजाना और इस तरह धोखा देना बेसबब नहीं है ।। | सुरेन्द्र० । जत्र से शिवदत्त के उभरने की खबर सुनी है एक खुटका सा बना रहा है, मैं समझता हूँ यह भी उसी की शैतानी है। | वीरेन्द्र० । दोनों के ऐसे कमजोर तो नहीं हैं कि जिसका जी चाहे पकड़ ले । सुरेन्द्र० । ठीक है, मगर आनन्द का भी वही रह जाना बुरा ही हुआ ) तेज० । बेचारा खिदमतगार जबर्दस्ती साथ हो गया था नहीं तो पता भी न लगता कि दोनें कहा चले गये । खैर उनके बारे में जो कुछ सोचना हैं सोचिये मगर मुझे जल्द इजाजत दीजिए कि हजार सिपाहियों को साथ लेकर वहा जाऊँ और इस वक्त उसे छोटे से जङ्गल को चारो तरफ से घेर लू, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा | ________________

    पहिला हिस्सा सुरेन्द्रः । ( जीतसिंह से ) क्या राय है? |जत० । तेज टीक कहता है, इसे भी जाना चाहिए ।। | हुक्म पाने ही तेजसिंह दीवानखाने के ऊपर एक बुर्ज पर चढ़ गए जहाँ ग्र; मा नक्कारा और उसके पास ही एक भारी चोव :मलिए रक्खा हा था कि वक्त चैवक्त जत्र कोई जरूरत या पई ग्रार फौज को तुरंत तैयार कराना हो तो इस नकारे पर चोब मारी जाय । इसकी अावाज भी निराले ही ढंग की थी जो किमी नारे की आवाज मे मिलती न थी शौर म बजाने के लिए तेजसिंह ने कई इशारे भी मुर्रर किए हुए थे । नेत्रवि ने चोर उठा क्रेर जोर से एक दफे नक्का पर भारी जिसको प्रीम्राज तमाम शहर में बल्कि दूर दूर तक गूंज गई । चाहें इसका मवव तिमी २ वाले की ममझ में न आया हो मगर सेनापति ममझ गया कि मी वक्तेः इजार पीजी सिपाहियों की जरूरत है जिरका इन्तजाम उसने बदृत जल्द किया । तेजसि” अपने सामान से तैयार हो किले के बाहर निकले शोर हजार फाजी सिपारी तथा बहुत से मशालचियो को साथ ले उस छोटे से जगल की तरफ रवाना होकर बहुत जल्दी ही वहॉ जा पहुचे ।। | थोडी थोडी दृर पर पहरा मुकर्रर कर के चारो तरफ से उस जंगल को घेर लिया । इन्द्रजीतसिंह तो गायत्र हो ही चुके थे, आनन्दसिंह से भी मिलने को बहुत तकत्रि की गई मगर उनका भी पता न लेगा । तरत में रात निताई सवेरा होते ही तेजसि न हेक्म दिया कि एक तरफ से इसे अगल को तेजी के साथ काटना शुरू करो जिधर्म दिन भर में तमाम जगल स्पः हो जाय । उसी समय महाराजा सुरेन्द्रसिह और जीतसिह भी व आ पहुँचे । जगल का काटना इन्होने भी पसन्द किया और बोले कि बहुत अच्छा होगा अगर हम लोग इस जगल से एक दम ही निश्चित हो जॉय ।। | इस छोटे से जगल को काटते देर ही कितनी लगनी थी, तिस पर महा ________________

    २६ चन्द्रकान्ता सन्तति राज की मुस्तैदी के सबब यहाँ कोई भी ऐसा नजर नहीं आता था जो पेड़ की कटाई में न लगा हो । दोपहर होते होते जगल कट के साफ हो गया मगर किसी का कुछ पता न लगा यहाँ तक कि इन्द्रजीतसिंह को तरह आनन्दसिंह के मी गायब हो जाने का निश्चय करना पडा हाँ इस जगल के अन्त में एक कमसिन नौजवान हसीन और बेशकीमती गहने कपड़े से सजी हुई औरत की लाश जरूर पाई गई जिसके सिर का पता न था ।। | यह लाश महाराज सुरेन्द्रसिंह के सामने लाई गई। अब सभी की परेशानी और भी बढ़ गई और तरह तरह के ख्याल पैदा होने लगे । लाचार उस लाश को साथ ले शहर की तरफ लौटे। जीतसिंह ने तेजसिंह से कहा, हम लोग जाते हैं, तारासिंह को भेज के सब ऐयारी को जो शिवदत्त की फिक्र में गए हुए हैं बुलवा कर इन्द्रजीतसिंह और अनिन्दसिंह की तलाश में भेजेंगे, मगर तुम इसी वक्त उनकी खोज में जहाँ तुम्हारा दिल गवाही दे जायो !

    तेजसिंह अपने सामान से तैयार ही थे, उसी वक्त सलाम कर एक तरफ को रवाना हो गए, और महाराज रूमाल से अखिों को पोंछते हुए चुनार कीतरफ विदा हुए । उदास और पोतों की जुदाई से दुखी महाराज सुरेन्द्रसिंह घर पहुँचे । दोनों लड़कों के गायब होने का हाल चन्द्रकान्ता ने भी सुना वह बेचारी दुनिया के दु:ख सुख को अच्छी तरह समझ चुकी थी इसलिए कलेजा मसोस कर रह गई, जादिर में रोकना चिल्लाना उसने पसन्द न किया, मगर ऐसा करने से उसके नाजुक दिल पर और मी सदमा पहुची, घडी भर में ही उसकी सूरत बदल गई । चपला शोर चम्पा को चन्द्रकान्ता से कितनो मुहब्बत थी इसको आप लोग बूब जानते है लिखने की कोई जरूरत नहीं, दोनों लटक के गायब होने का गम इन दोनों को चन्द्रकान्ता से ज्यादे हुया श्रीर दोनों ने निश्चय कर लिया कि मौका पा कर इन्द्रजीतसिंह अौर श्रानन्दसिंह का पता लगाने की कोशिश करेंगी ।। ________________

    पहिला हिस्सा | महाराज सुरेन्द्रसिंह के अाने की खबर पाकर वीरेन्द्रसिंह मिलने के लिये उनके पास गए । देवीसिंह भी वहाँ मौजूद थे । वीरेन्द्रसिंह के सामने ही महाराज ने सन हाल देवीसिंह से कह कर पूछा कि अब क्या करना देवी० } मै पहिने उस लाश को देखा चाहता हूँ जो उस जगल में पाई गई थी । । सुरेन्द्र० 1 हाँ तुम उसे जरूर देखो । जीत० } ( चोचदार से ) उस लाश को जो जगल में पाई गई थी इसी जगह लाने के लिये कहो । “बहुत अच्छा" कह कर चवदार बाहर चला गया मगर थोडी हीं देर में वापस आकर बोला, “महाराज के साथ आते आते न मालूम वह लाश' कहा गुम हो गई ! कई आदमी उसकी खोज में परेशान है मगर | पता नहीं लगता !!" | वीरेन्द्र० 1 अब फिर हम लोगों को होशियारी से रहने का जमाना श्रा गया । जय हजारों अदिमियो के बीच से लाश गुम हो गई तो मालूम होता है, अभी बहुत कुछ उपद्रव होने वाला है । | जीत० । मने तो समझा था कि अब जो कुछ थोड़ी सी उम्र रह गई। है श्रीराम से कटेगी, मगर नहीं, ऐसी उम्मीद किसी को कुछ भी न रखनी चाहिए। | सुरेन्द्र० 1 खेर जो होगा देखा जायगा, इस समय क्या करना मुनासिन। उमे सोच । जति० 1 मेरा विचार था कि तारासिंह को बद्रीनाथ वगैरह के पास भेजते जिसमें वे लोग भैरोसिंह को छुड़ा कर ग्रौंर किसी कार्रवाई में न फंसे और मीधे यहाँ चले श्रावे, मगर अब ऐसा करने की भी जी नहीं चाहतः । आज भर अप और सन्न करे, अच्छी तरह सोच विचार कर कल में अपनी राय दूगी । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति पांचवां बयान परित बड़ीनाथ पन्नालाल रामनारायण श्रौर जगन्नाथ ज्योतिषी भैरोसिर ऐयार को छुड़ाने के लिए शिवदत्तगढ़ की तरफ गए । हुक्म के मुताविक कञ्चनसिंह मेनापति ने शेर वाले बाबाजी के पीछे जासूस भेज कर पता लगा लिया था कि भैरोसिंह ऐयार शिवदत्तगढ़ किले के अन्दर पहुँचाए गए, इसीलिए इन ऐयारों को पता लगाने की जरूरत न पडी, साधे शिवदत्तगढ़ पहुँचे और अपनी अपनी सूरत बदल शहर में घूमने लगे, पॉचो ने एक दूसरे का साथ छोड़ दिया मगर यह ठीक कर लिया था कि सब लोग घूम फिर कर फलानी जगह इकट्ठे हो जायँगे । दिन भर घूम फिर कर भैरोसिंह का पता लगाने के बाद कुल ऐयार शहर के बाहर एक पहाड़ी पर इकट्ठे हुए और रात मर सलाह करके राय कायम करने में काटी, दुमरे दिन ये लोग फिर सूरत बदल बदल कर शिवदत्तगढ़ में पहुँचे । रामनारायण और चुन्नीलाल ने अपनी सूरत उसी जगर के चोदारों की सी बनाई और वहा पहुँचे जहाँ भैरोसिंह कैद थे । कई दिनों तक कैद रहने के सवव उन्होने अपने को जाहिर कर दिया था और अपनी असली सूरत में एक कोठड़ी के अन्दर जिसके तीन तरफ दीवार श्रीर एक तरफ लोहे का अँगला ल हुया था वन्द थे । उस कोठी के बगल में उसी तरह की एक कोटी ग्रौर थी जिसमें गद्दी लगाए एफ वृद्धा दारोगा बेटा था और बार कई सिपाही नंगी तलवार लिए घूम घूम कर पा दे रहे थे । रामनारायण श्रौर चुन्नीलाल उस ६ट के देने पर जाकर पड़े हुए र बृढे दारोगा से बातचीत इग्न लगे। राम० | श्रापी महाराज ने याद किया है । चुदा० | क्यों क्या चाम १ १ भीतर श्राश्रा, बैठो, चलते हैं | रामनारायण श्रीर चुन्नीलाल कोटडी के अन्दर गए और बोले- ________________

    पहिला हिस्सा राम० । न मालूम क्यों बुलाया है मगर ताकीद की है कि जल्द बुला लाश्रो ! वृहा० । अभी घण्टे भर भी नहीं हुए जब किसी ने श्री के कहा था | कि महाराज खुद आने वाले हैं, क्या वह वात झूठ थी १ । राम० | हा महाराज ग्राने वाले थे मगर अब न अावेंगे । बूढ० अच्छा शाप दोग आदमी इसी उग्र वैट थ्रार कैदी की | हिफाजन करे में जाता हू ।। राम | बहुत अच्छा । रामनारायण श्रौर चुन्नीलाल को कड़ी के अन्दर बैठा कर बुढा दारोगा बाह्र श्राय और चालाकी से फूट इस कोठडी की दवा बन्द कर के बाहर से बोला, “इन्दगी । में दोनों को पहिचान राधा किं ऐयार हौ ! कहिये अब हमारे द मैं आप लोग फंसे या नहीं ? मने भी क्या मजे में पता लगा लिया ! पूछा कि अभी तो मालूम हुआ था कि महाराज खुद आने वाले हैं, अपने भी झट आबूल कर लिया अॅार कहा कि 'इवा आने वाले थे मगर अर्य न झायेगे। यह न समझे कि में धोखा देता है । इसी अक्ल पर ऐयारी करते ही १ वैर अप लोग भी अचे इसी कैदखाने की हवा खाइये और जान लीजिये कि मैं बाकरअली ऐयार झाप लोगो को मजा चखाने के लिए इस जगह बैठाया गया हू ।' चुढे की बातचीत मुन रामनारायण और बुन्नालाल चुप हो गये बल्कि शम कर सिर नीचा कर लिया 1 बूढा दारोगा वहा से रवाना हुआ और शिवदत्त के पास पहुंच इन दोन ऐयारों के रिप्तार करने का हाल का । महाराज ने खुश होकर चाकरअली को इनाम दिया और खुशी खुशी खुद रामनारायण और चुन्नीलाल को देखने आये । । | बद्रीनाथ पन्नालाल र ज्योतिदीजो को भी मालूम हो गया कि हमारे साथियों में से दो ऐयार पकड़े गये । अब तो एक की जगह तीन श्रादभिया के छुने की फिक्र करनी पड़ी। ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति कुछ रात गये ये तीनों ऐयार घूम फिर कर शहर के बाहर की तरफ जा रहे थे कि पीछे से एक आदमी काले कपड़े से अपना तमाम वदन छिपाये लपकता हुआ उनके पास आया और लपेटा हुशा छोटा सा एक कागज उनके सामने फेंक और अपने साथ ग्राने के लिये हाथ से इशारा कर के तेजी से आगे बढ़ा ।। बड़ीनाथ ने उम पुर्जे को उठा कर सड़क के किनारे एक वनिये की दुकान पर जलते हुए चिराग की रोशनी में पढ़ा, सिर्फ इतना ही लिखा था—“भैरोसिंह ।' बद्रीनाथ समझ गए कि भैरोसिंह किसी तरकीब से निकल भाग है और यही जा रहा है। बद्रीनाथ ने भैरोसिंह के हाथ की लिखी भी पहिचाना ।। भैरोंसिह पुर्जा फेंक कर इन तीनों को हाथ के इशारे से बुला गया श्री ग्रौर दम बारह कदम आगे बढ़ अब इन लोगों के आने की राह देख रहा था । | बद्रीनाथ वगैरपुश हो कर आगे बढ़े और उसे जगह पहुचे जहा भैरोसिंहू काले कपड़े से बटन को छिपाये सड़क के किनारे झाड देख कर पड़ा था । बातचीत करने का मौका न था, आगे आगे भैरोसिंह और पीछे पीछे बद्रीनाथ पन्नालाल और ज्योतिपीजी तेजी से कदम बढ़ाते शहर के वाइर हो गये ।। रात अन्धेरी थी । मैदान में जाकर भैरोसिंह ने काला कपडा उतार दिया | इन तीनों ने चन्द्रमा की गेशनी में भैरोसिंह को पहिचाना, खुश होकर बारी बारी तीनों ने उसे गले लगाया और तब एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर बातचीत करने लगे । | बद्री० । नैमिर, इस वक्त तुम्हें देय कर तबीयत बहुत ही खुश हुई । ६० { में तो किसी तरह छूट श्राया मगर रामनारायण श्रीर गुनीलाल दब जा फँसे है । पति० } उन दोनों ने भी क्या हो घोसा साया है । ________________

    पहिला हिस्सा भैरो० | मैं उनके छुडाने की भी फिक्र कर रहा हूँ। पन्ना० | वह क्यों ? भैरो० । सो सब कहने सुनने का मौका तो रात भर है मगर इस | समय मुझे भूख बटर जोर से लगी है कुछ हो तो खिलायो । | बद्री० } दो चार पेड़े है, जी चाहे तो खा लो ।। भै) ० । इन दो चार पेडों से क्या होगा ? खैर कम से कम पानी का तो बन्दोस्त होना चाहिये ।। वर्द्रः । पिर क्या करना चाहिये १ भैरो० 1 ( हाथ से इशारा कर के } वह देखो शहर के किनारे जो चिराग जल रहा है अभी देखते आये है कि वह हलवाई की दुकान है। और वह ताजी पूरियाँ बना रहा है, बल्कि पानी भी उसः हलवाई से मिल जायेगा | पन्ना० ! अच्छा में जाता है । भैरो० | हम लोग भी साथ ही चलते हैं, सभों को इकट्ठे ही रहना ठीक है, कहीं ऐसा न हो कि आप फेस जाये और हम लोग राह ही देखते रहे । | पन्ना० । फेसना क्या खिलवाड़ हो गया ? | भैरो० । खैर हर्ज ही क्या है अगर हमलोग साथ ही चले चले ? तीन आदमी किनारे खड़े हो जायगे एक अादमी आगे बढ़ कर सौदा ले लेगा ।। बढी • } हाँ हाँ यही ठीक होगा, चलो हम लोग एक साथ चलें । चारो ऐयार एक साथ वहाँ से रवाने हुए और उस इलवाई के पास पहुंचे जिसकी अकेली दूकान शहर के किनारे पर थे 1 बद्रीनाथ ज्योति जी और भैरोसिंहू कुछ दूर इधर ही खड़े रहे और पन्नालाल सौदा खरीदने के लिए दुकान पर गये ! जाने के पहले ही भैरोसिंह ने कहा, मिट्टी के बर्तन में पानी भी देने का एकरार हलवाई से पहिले कर लेना नहीं तो पीछे हुज्जत करेगा।

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    ३२ चन्द्रकान्ता सन्तति पन्नालाल हलवाई की दुकान पर गये और दो सेर पूरी सेर भर मिठाई मॉगी ! हलवाई ने खुद पूछा कि ‘पानी भी चाहिये या नहीं ? पन्ना० ! हा हा पानी जरूर देना होगा । इल० । कोई वर्तन है ? पन्ना० | वर्तन तो है मगर छोटा है, तुम्ही किसी मिट्टी के ठिलिये में जल दे दो } हले० । एक घटा जल के लिये अाठ अाने और देने पड़े गे ) पन्ना० । इतना अधेर ! खैर हम देगे । पूरी मिटाई और एक घडा जल लेकर चारो ऐयार वहा से चले मगर यह खबर किसी को भी न थी कि कुछ दूर पीछे दो आदमी साथ लिए छिपता हुआ हलवाई भी ग्रा रहा है । मैदान में एक बड़े पत्थर की चट्टान पर वैट चारो ने भोजन किया जल पिया और हाथ में है वो निश्चिन्त हो धीरे धीरे अ पुस में बातचीत करने लगे । आधा घण्टा भी न बीता होगा कि चारों बेहोश होकर चट्टान पर लेट गए और दोनों श्रादमियों का साथ लिए हलवाई दनकी खोपटी पर था मौजूद हुआ। | हुलचाई के साथ आए हुए दो श्रादमियों ने बद्रीनाथ ज्योतिपीजी शौर पन्नालाल की मुश्के कस टाली शोर कुछ सुधा भैरामिह को हाश में लाकर बोले, “वाह जी अजायबसिंह, श्रापकी चालाकी तो खूत्र काम कृर गर्ट 1 अत्र तो शिवदत्तगढ़ में आये हुए पाचो नालायक हमारे हाथ फस । महाराज से सच से ज्याद इनाम पान का काम तो श्राप ही न किय!" छठवां वयान बरन मी तली उठा कर महाराज मुरेन्द्रसिंह और बीरेन्द्रसिंह तथा इन् । बदलत चन्द्रकान्ता चपला चम्पा तेजसिंह ौर देवीसिह वगैरह ३ थे; दिन र मुगु र मगर अ५ व जमाना न रह 1 सच है सुख दु प र पहरा अविर बदलता रहता है। खुशी के दिन बात ________________

    पहिला हिस्सा की बात में निकल गए कुछ मालूम न पा थीं तक कि मुझे भी कोई बात उन लोगों की लिखने लायक न मिली लेकिन अब उन लोगों की मुमावत के, प्र काटे नहीं करते। | कौन जानना था कि गया जिरा शिवदत्त फिर बुला की तरह निकल आवेग १ किले खबर थी कि बेचार चन्द्र कान्ता की गौद से पले पाए दोनों होनहार ल* यो अल कर दिये जाए गे ? कौन साफ कह सकता था कि इन लो की वैशावली र राप्य में जितनी तरक्की होगी यकायक उतनी ही यादे श्राफत भी आ पड़ेगी ? खैर खुशी के दिन तो उन्होने काटे, अब मुनावत का घडी कौन झेन १ हाँ बेचारे जगन्नाथ ज्योतिया ने इतना अन्र कह दिया था कि वीरेन्द्रसिंह के राज्य शोर वश की बहुत कुछ वर होते. मगर मुसीबत को लिए हुए । खैर श्रागे जो कुछ होगा देखा जायगा पर इस समय ते सत्र के सब तर दुद में पड़े हैं । देखिए अपन एकान्त के कमरे म महाराजा सुरेन्द्र सिंह कैसा चिन्ता में बैठे हैं और वाई' तरफ गद्दी का कान ए राजा वीरेन्द्रसिंह अपने मामने बैठे हुए जीतहि की सूरत किस नेचैन। स देख रहे हैं। दोनो नाप बा अर्थ तु देवसिंह और तारासिंह अपने पास ऊपर के दर्ज पर बेठे हुए बुजुग और गुरू के समान जीतसिंह की तरफ कुरै हुए इस उम्र में बैठे हैं कि देले अब आखिरी हुक्म क्या होता हैं । (1वाय इन लोगों के इस कमरे में और कोई भी नहीं है, एक दम सन्नाटा छाया हुआ है । न मालूम इसके पहिले क्या क्या बातें हो चुकी है मगर इस वक्त ती महाराजा सुरेन्द्रसिंह ने इस सन्नाटे की सिर्फ इतना ही कह के तांदा, *बर चम्पा और चपला की भी दति मान लेनी चाहिए । जं.त० | जो मजी, मगर देवास के लिए क्या हुक्म होता है ? सुरेन्द्र० । और तो कुछ नहीं सिर्फ इतना ही ख्याल है कि चुनार की हिफाजत ऐसे वक्त है क्यों कर होगी १ जीत० । मैं समझता हूं कि यह की हिफाजत के लिए तारा बहुत है। और फिर वक्त पड़ने पर इस बुढौती में भी में कुछ कर गुजरूर । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति सुरेन्द्र० । कुल मुस्कुरा कर और उम्मीद भरी निगाहों से जीतसिंह की तरफ दे कर ) वैर, जो मुनासिब ममीको ।। जीत० } ( देव मिह से ) लीजिए साहवे, असे आपको भी पुरानी कसर निकालने का मौका दिया जाता है, देखें आप क्या करते हैं ! ईश्वर इस मुस्तेदो को पूरा करें ।। | इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए और सलाम कर कमरे के बाहर चले गए। सातवां बयान अपने माई इन्द्रजीतसिंह की जुदाई से व्याकुल हो उसी समय आनन्द सिंह उम जगल के बाहर हुए और मैदान में खड़े हो इधर उधर निगाह दौड़ाने लगे । पश्चिम तरफ दो औरतें घोड पर सवार धीरे धीरे जाती हुई दिखाई पड़ा । ये तेजी के साथ उस तरफ बढे और उन दोनों के पास पहुँचने की उम्मीद में दो कोस तक पीछा किए चले गए मगर उम्मीद पूरी न हुई क्योंकि एक पहाड़ी के नीचे पहुंच कर चे दोनों रुकी और अपने पीछे अाते हुए अनन्दसिंह की तरफ देख घोड़े को एक दम तेज कर पाटी के बगल में घूमती हुई गायब हो गई है। तू खिली हुई चाँदनी रात होने के समय से आनन्दर्भिह को ये दोनों रिते दिखाई पदी र उन्होंने इतनी हिम्मत भी की, पर पहाटी के पास पहुचते ही उन दोनों के भाग जाने से इनको वा ही रञ्च हुश्रा । खड़े हो कर मोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए । इनकी हैरान शौर सोचते हुए चोट कर निर्दयी चन्द्रमा ने भी धीरे धीरे अपने घर का रास्ता लिया और अपने दुश्मन को जाते देत मौका पाकर अन्धेरे ने चारो तरफ दुमत 'जमाई । शानन्दसि श्रीर भी दुरजी ए ! क्या करें ? कहाँ जाप ? किमले पूलें कि इन्द्रजीत िको कौन ले गया ? दूर से एक रोशनी दिखाई पड़ी। गौर करने से मालूम हुआ कि किसी ________________

    ३५, पहिला हिस्सा झ ! के आगे आग जल रही है। नन्दसिह उभी तरफ चले और थोडी ही देर में कुटी के पास पहुँच कर देखा कि पते की बनाई हुई हरी झोपी के आगे आठ से आदमी जर्मन पर फर्श त्रिछाये बेटे है जो कि दाढी र पहिरावे से साफ मुसलमान मालूम पड़ते हैं 1 बीच में दो मोमी शमदिन जल रहे हैं । एक आदमी फारसी के शेर पढ़ पढ़ कर मुना रहा है और बाकी सब ‘वाह वाह की धुन ला रहे है । एक तरफ अग जल रही शौर दो तीन आदमी कुछ खाने की चीजें पका रहे हैं । आनन्दसिंह फर्श के पास जाकर खड़े हो गए। अानन्दसिंह को देखते ही सब के सब उठ खड़े हुए और बड़ी इज्जत से उनको फर्श पर बैठाया । उस आदमी ने जो फारम की शेरै पढ़ पढ़ कर सुना रह था खड़े हो कर अपनी रगीली भाषा में कही, खुदा का शुक्र है कि शारदये चुनार ने इस मजलिस में पहुँच कर हम लोर की इज्जत क्रो फल्केहफ्तुम * तक पहुँचाया । इस जगल बयावान में हम लोग क्या खातिर कर सकते हैं सिवाय इसके कि इनके कदमों को अपनी अखिों पर जगह दें और इत्र व इलायची पेशकश करे !” केवल इतना ही कह कर इत्रदान और इलायची की दिव्यी उनके मागे ले गया । पढे लिखे भले आदमियों की खातिर जरूरी सम कर मानन्दसिंह ने इत्र सा और दो इलायची ले लिया, इसके बाद इनसे इजाजत ले कर वह फिर पारसी कविता पढ़ने लगा ! दूसरे आदमियों ने दो एक तकिए इनके अलग बगल में रख दिए । | इत्र की विचित्र खुशबू ने इनको मस्त कर दिया, इनकी पलकें भारी हो गई थौर बेहोशी ने धीरे धीरे अपना असर जमा कर इनको फर्श पर सुला दिया । दूसरे दिन दोपहर को आँख टलने पर इन्हें ने अपने को

    मुसलमानों के किताब में गत र आसमान के लिखे हैं, सत्र के ऊपर वाले दर्जे का नाम फल्नेहफ्तुम है । ________________

    चन्द्रकान्ता सन्तति एक दूसरे ही मकान में मसहरी पर पड़े हुए पाया। धवडा कर उठ वैट और इधर उधर देखने लगे । | पाच कममिन और खूपसूरत औरतें सामने खड़ी हुई दिखाई दी जिनमें से एक मदारी की तरह पर कुछ आगे बढ़ः हुई थी । उनके हुस्न ग्रौर अदा को देख ग्रानन्दसिंह दग हो गये । उसकी बडी बडी अखि शौर बाझी चितवन ने इन्हें प्रापे से बाहर कर दिया, उसको जरा सी इसी ने इनके दिल पर बिजली गिराई, और आगे बढ़ हाथ जोड़े इस कहने ने ती शोर भो भितम ढाया कि-क्या श्राप मुझसे खफा है ? अनिन्दसिंह भाई ३ जुदाई, रात की बात, ऐयारो के धोखे में पड़ना, सूत्र कुछ बिल्कुल भूल गए और उसकी मुहब्बत में चूर हो बोले"तुम्हारा सी परीजमाल से और रज !! | वह शौरत पल पर बैठ गई और आनन्दसिंह के गले में हाथ डाल के बोली, “बुदा को कमम खा कर कद्दती हूँ कि साल भर से आपके इश्क ने मुझे बेकार कर दिया ! मिवाय अापके ध्यान के स्वाने पीने की विल्कुल सुध न रही, मगर मौका न मिलने से लाचार या !' ग्रानन्द० ! ( चाक कर ) हैं ! क्या तुम मुसलमान हौ जो खुद को कसम खाती है ? ग़ौरत० } ( हम कर ) हा, क्या मुसलमान बुरे होते हैं ? ग्रानन्दसिंह य" कह कर उठ खड़े हुए—*अफमोम | अगर तुम मुसलमान न होता तो में तुम्हें जी जान में प्यार करता, मगर एक अंग्त ३ निए अपना मन नही गाड मफ्ता ??? ग्रीन ! ( हाथ थाम कर ) ३ । वेमुरी उनी मत करी । म मच को 7 प तु हारा जुदाई मुझमे न मह जायेग, ! अन द भ न मचे हना है कि मुझसे किस तरह के उम्मीद न ३ ] । *प्रश्न० । ( भा मिकी केर ) या यह बात दिल से कहते हो ? ________________

    39 पहिला हिस्सा अानन्द० । हाँ, बल्कि कसम खा कर ! श्रीरत० | देखो पछताओगे शीर मुझ सी चाहने वाली कभी न पाओगे ! ग्रानन्द० 1 ( अपना हाथ छुड़ा कर ) लानत है ऐसी चाह पर } औरत० । तो क्या तुम यहाँ से चले जाओगे ? अनिन्द० } जरूर ! औरत० } मुमकिन नहीं ।। आनन्द० | क्या मजाले कि तुम मुझे रोको ! श्रीरत० } ऐमा खयाल भी न करना ।

    देखें मुझे केन रोकता है !" कह कर नन्दसिंह उसे कमरे | के बाहर हुए श्रीर उसी कमरे को एक खिडकी जो दोबार में लगी हुई यी रोल ३ श्रीरते वहाँ से निकल गई ।।

    अानन्दसिंह इस उम्मीद में चारों तरफ घूमने लगे कि कहीं रास्ता | मिले तो बाहर हो जायं मगर उनकी उम्मीद किसी तरह पूरी नहीं हुई ।। यः मकान बहुत लम्बा चौडा न था । सिवाय इस कमरे और एक | सरन के और कोई जगह इसमें न थी ! चारो तरफ ऊ ची ऊंची दीवारों के सिवाय बाहर जाने के लिए कहीं कोई दुर्वाजा न था | हर तरह से | लाचार और दुःरी हो फिर उसी पत्नग पर श्री लेटे और सोचने लगे– । “अब म्या करना चाहिए ? इस कम्बख्त से किस तरह जान बचे ? यह तो हो ही नहीं सकता कि में इसे चाहूं या प्यार करें ! राम रमि, मुसलमानिन से और इश्क ! यह तो सपने में भी नहीं होने का । | तब फिर क्या करू ? लाचारी है, जब किसी तरह छुट्टी न देखें या तो | इसी खञ्जर से जो मेरी कमर में हैं अपनी जान दे देंगी । कमर से खञ्जर निकालना चाहा, देखा तो कृमर खाली है । फिर सोचने लगे— | गजब गया। इस हरामजादी ने तो मुझे किसी लायक न रक्खा। | अगर कोई दुश्मन आ जाय तो में क्या कर सकूगा । वेश्या अगर मैरे

    पेयार ही निकले,जो सोचा था वही हु।खैर या हर्च है, इन्द्रचीतसिंह को गिरफार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है।।

    शिवदत्त॰।(पास पहुँच कर)मेरा श्राधा कलेजा तो ठण्डा हुआसंगर अफसोस तुम दोनों भाई हाधे न आएँ।

    इन्द्रजीत।जी इस भरोसे न रहिएगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया, उनकी तरफ बुरा निगाह से देखना भी काम रखता है!

    ग्रन्थकर्ता०।भला इसमें भी कोई शक है!!

    दूसरा बयान।

    ।इस जगह पर थोडा सा हाल महाराज शिवदत्त की भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है।महाराज शिवदत्ते को हर तरह से कु अर रेन्द्रसिंह के मुकाले में हार मानना पटी।लाचार उस शहर छोड़ दियाऔरअपने कई पुन खैखाह को साथ ल चुनार के दक्खिने का तरफ रवाना हूं।

    चुनार से थोड़े ही दूर दक्खन लम्बा चौडा घना जगल है। यह विन्ध्य के पहाड़ जंगल का सिलसिला राव सरोज सुगुजा श्रौर सिंगरोल होता दुःश्रा सैकड़ों की तक चला गया है जिसमें बड़े बड़े पहाड धटया दरें शीर खोह पाते हैं।बीच बीच में दो दो चार चार कोस क फासल पर गाँव भी अवाद है।वही कहा पहाड़ो पर पुराने जमान के टूटे फूटे अलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं।चुनार से आठ केस दक्खन अहरौरा के पास पहाई पर पुरान जमाने के एक वदि किले का निशान व्याज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता हैं।गौर करने से मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोख से ज्यादं लम्बी चौडी जमीन इसने घेरं होगी,खीर में यह किला काशी के मशहूर राजा चेतसिंह के अधिकार में थी। इन्ही जगलों में अपना रानी और कई खैरखाही को मय उनकी श्रीरतो और बाल बच्चो के साथ लिए

    घूमते फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी भरी सुहावनी पहाडी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए,मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमर और दालान रहने लायक थे।यह छोटी पहाडी अपने चारे तरफ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दत्री हुई थी वि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना श्रौर कुछ पता लगाना मुश्किल था।।इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ वास आदमी थे जिन तीन मुसलमान ऐयार भी थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्ते शरों में में से झीर यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गए।कि इनके शामिल रहने से कभी न कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला ले का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के श्रौर केाई इर लायक नजर भी न झात्ती था जो इन बेईमान को ऐयारी के लिए अपने मा राता।नेचे लिखे नाम से ये तीनों ऐयार पुकारे जाते थे-चाकर अला,ईटावक्श और यारग्रल!इन सत्र ऐयारों श्रौर साथियों ने मुपए,पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा महाराज शिवदत्त की मदद की।

    राजा वारेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ मगर मेंका न मिलने के स व मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा।अपनी चालाकी और होशियारी से वह् पहाटी भिल्ल कोल और पवार इत्यादि जाति के श्रादमिर्यों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजार में गल्ला मी शहद श्रीर,बहुत मी जगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों के मारफत दर में भैरवा और विया कर रुपए,बटोरने लगा।उन्हीं लोगो से शियार रके थे।बहुत फौज भी उस वन लधापहाति के लोग भै होशियार हो गए और खुद्द शहर मेंर मला वर्ग इंच रुपए इक्ट्ठा करने लगे । शिवदत्तगढ़ भा अच्छी तरह अबाद आ गया।

    दूध बो रह ऐयारी ने भी अपने कुल साथ को जो ________________

    पहिला हिस्सा चुनार से इनके साथ आए थे ऐयारी के फन में खुत्र होशियार किया । इस बीच में एक लडका और उसके बाद एक लटकी भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई । मौका पाकर अपने बहुत से आदमियों और ऐयारो को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला थौर राजा बीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक धूमता रहा | बस महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसर हाल लिख कर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं ।। इन्द्रजीतसिंह के गिरक्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे । महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ श्रौर समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहे तो फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूगा । | इन्द्रजीतमिह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ ले गया | सभों को ताज्य इशा कि कु अर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ़ार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला किसी पर हब न उठाया, यहां तक कि अॉखों से उन्होंने रञ्ज अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया । {इकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि वहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल नड़की ऐसी हालत में चुप रह जाय और विना हुनत किए बेड पहिर कुले, मगर नहा इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चल कर मालूम होगा । तीसरा बयान धः चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र ५ रिह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और नन्दसिह इँटे। दए धीरे धीरे कुछ बातें कर रहे हैं । जति० । भैरो ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्र। दीवसिंह को सुरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया । ३

  • गो-दान

    गो-दान

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    गो-दान
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    १

    होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा—गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूँ। जरा मेरी लाठी दे दे।

    धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली—अरे, कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है।

    होरी ने अपने झुर्रिर्यों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा—तुझे रस-पानी की पड़ी है, मुझे यह चिन्ता है कि अबेर हो गयी तो मालिक से भेंट न होगी। असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।

    'इसी से तो कहती हूँ, कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन हरज होगा। अभी तो परसों गये थे।'

    'तू जो बात नहीं समझती, उसमें टाँग क्यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है। नहीं कहीं पता न लगता कि किधर गये। गाँव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।'

    धनिया इतनी व्यवहार-कुशल न थी। उसका विचार था कि हमने ज़मींदार के खेत जोते हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी खुशामद क्यों करें, उसके तलवे क्यों सहलायें। यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस बरसों में उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो, चाहे एक-एक कौड़ी को दाँत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक़ होना मुश्किल है। फिर भी वह हार न मानती थी, और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आये दिन संग्राम छिड़ा रहता था। उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन जिन्दा है, एक लड़का गोबर कोई सोलह साल का, और दो लड़कियाँ सोना और रूपा, बारह और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ही में मर गये। उसका मन आज भी कहता था, अगर उनकी दवादारू होती तो वे बच जाते; पर वह एक धेले की दवा भी न मँगवा सकी थी। उसकी ही उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाँ ही साल तो था; पर सारे बाल पक गये थे, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। सारी देह ढल गयी थी, वह सुन्दर गेहुआँ रंग सँवला गया था और आँखों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिन्ता ही के कारण तो। कभी तो जीवन का सुख न मिला। इस चिरस्थायी जीर्णावस्था ने उसके आत्म-सम्मान को उदासीनता का रूप दे दिया था। जिस गृहस्थी में पेट की रोटियाँ भी न मिलें, उसके लिए इतनी खुशामद क्यों? इस परिस्थिति से उसका मन बराबर विद्रोह किया करता था। और दो चार घुड़कियाँ खा लेने पर ही उसे यथार्थ का ज्ञान होता था। उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ लाकर सामने पटक दिये।

    होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा—क्या ससुराल जाना है जो पाँचों पोसाक लायी है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जाकर दिखाऊँ।

    होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा—ऐसे ही तो बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जायेंगी!

    होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा—तो क्या तू समझती है, मै बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते है।

    'जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे! तुम्हारी दशा देख-देखकर तो मैं और भी भूखी जाती हूँ कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?'

    होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में जैसे झुलस गयी। लकड़ी सँभालता हुआ बोला—साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पायगी धनिया! इसके पहले ही चल देंगे।

    धनिया ने तिरस्कार किया—अच्छा रहने दो, मत असुभ मुंह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।

    होरी लाठी कन्धे पर रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाये हुए हृदय में आतंकमय कम्पन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के सम्पूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अन्तःकरण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अन्दर छिपाये लेता था। विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी मानो झटका देकर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गयी यी। काना कहने से काने को जो दुःख होता है, वह क्या दो आँखोंवाले आदमी को हो सकता है?

    होरी कदम बढ़ाये चला जाता था। पगडण्डी के दोनों ओर ऊख के पौधों की लहराती हुई हरियाली देख कर उसने मन में कहा—भगवान कहीं गौं से बरखा कर दें और डाँड़ी भी सुभीते से रहे, तो एक गाय जरूर लेगा। देशी गायें तो न दूध दें न उनके बछवे ही किसी काम के हों। बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले। नहीं, वह पछाई गाय लेगा। उसकी खूब सेवा करेगा। कुछ नहीं तो चार-पाँच सेर दूध होगा। गोबर दूध के लिए तरस-तरस कर रह जाता है। इस उमिर में न खाया-पिया, तो फिर कब खायेगा। साल-भर भी दूध पी ले, तो देखने लायक हो जाय। बछवे भी अच्छे बैल निकलेंगे। दो सौ से कम की गोंई न होगी। फिर, गऊ से ही तो द्वार की सोभा है। सबेरे-सबरे गऊ के दर्शन हो जायें तो क्या कहना। न जाने कब यह साध पूरी होगी, कब वह शुभ दिन आयेगा!

    हर एक गृहस्थ की भाँति होरी के मन में भी गऊ की लालसा चिरकाल से संचित चली आती थी। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न, सबसे बड़ी साध थी बैंक सूद से चैन करने या ज़मीन खरीदने या महल बनवाने की विशाल आकांक्षाएँ उसके नन्हें-से हृदय में कैसे समातीं।

    जेठ का सूर्य आमों के झुरमुट से निकलकर आकाश पर छायी हुई लालिमा को अपने रजत-प्रताप से तेज प्रदान करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था और हवा में गर्मी आने लगी थी। दोनों ओर खेतों में काम करनेवाले किसान उसे देखकर राम-राम करते और सम्मान-भाव से चिलम पीने का निमन्त्रण देते थे; पर होरी को इतना अवकाश कहाँ था। उसके अन्दर बैठी हुई सम्मान-लालसा ऐसा आदर पाकर उसके सूखे मुख पर गर्व की झलक पैदा कर रही थी। मालिकों से मिलते-जुलते रहने ही का तो यह प्रसाद है कि सब उसका आदर करते हैं। नहीं उसे कौन पूछता? पाँच बीघे के किसान की विसात ही क्या? यह कम आदर नहीं है कि तीन-तीन, चार-चार हलवाले महतो भी उसके सामने सिर झुकाते हैं।

    अब वह खेतों के बीच की पगडण्डी छोड़कर एक खलेटी में आ गया था, जहाँ बरसात में पानी भर जाने के कारण तरी रहती थी और जेठ में कुछ हरियाली नज़र आती थी। आस-पास के गाँवों की गउएँ यहाँ चरने आया करती थीं। उस समय में भी यहाँ की हवा में कुछ ताज़गी और ठंडक थी। होरी ने दो-तीन साँसें जोर से लीं। उसके जी में आया, कुछ देर यहीं बैठ जाय। दिन-भर तो लू-लपट में मरना है ही। कई किसान इस गड्ढे का पट्टा लिखाने को तैयार थे। अच्छी रकम देते थे; पर ईश्वर भला करे राय साहब का कि उन्होंने साफ़ कह दिया, यह ज़मीन जानवरों की चराई के लिए छोड़ दी गयी है और किसी दाम पर भी न उठायी जायगी। कोई स्वार्थी ज़मींदार होता, तो कहता, गायें जायें भाड़ में, हमें रुपए मिलते हैं, क्यों छोड़ें। पर राय साहब अभी तक पुरानी मर्यादा निभाते आते हैं। जो मालिक प्रजा को न पाले, वह भी कोई आदमी है?

    सहसा उसने देखा, भोला अपनी गायें लिये इसी तरफ़ चला आ रहा है। भोला इसी गाँव से मिले हुए पुरवे का ग्वाला था और दूध-मक्खन का व्यवसाय करता था। अच्छा दाम मिल जाने पर कभी-कभी किसानों के हाथ गायें बेच भी देता था। होरी का मन उन गायों को देख कर ललचा गया। अगर भोला वह आगेवाली गाय उसे दे तो क्या कहना! रुपए आगे पीछे देता रहेगा। वह जानता था घर में रुपए नहीं हैं, अभी तक लगान नहीं चुकाया जा सका, बिसेसर साह का देना भी बाकी है, जिस पर आने रुपए का सूद चढ़ रहा है। लेकिन दरिद्रता में जो एक प्रकार की अदूरदर्शिता होती है, वह निर्लज्जता जो तकाजे, गाली और मार से भी भयभीत नहीं होती, उसने उसे प्रोत्साहित किया। बरसों से जो साध मन को आन्दोलित कर रही थी, उसने उसे विचलित कर दिया। भोला के समीप जाकर बोला––राम-राम भोला भाई, कहो क्या रंग-ढंग है। सुना अबकी मेले से नयी गायें लाये हो।

    भोला ने रुखाई से जवाब दिया। होरी के मन की बात उसने ताड़ ली थी––हाँ, दो बछिये और दो गायें लाया। पहलेवाली गायें सब सूख गयी थीं। बन्धी पर दूध न पहुँचे तो गुजर कैसे हो।

    होरी ने आनेवाली गाय के पुट्टे पर हाथ रखकर कहा––दुधार तो मालूम होती है। कितने में ली?

    भोला ने शान जमायी––अबकी बाजार बड़ा तेज़ रहा महतो, इसके अस्सी रुपए देने पड़े। आंखे निकल गयीं। तीस-तीस रुपए तो दोनों कलोरों के दिये। तिस पर गाहक रुपए का आठ सेर दूध माँगता है।

    'बड़ा भारी कलेजा है तुम लोगों का भाई, लेकिन फिर लाये भी तो वह माल कि यहाँ दस-पाँच गाँवों में तो किसी के पास निकलेगी नहीं।'

    भोला पर नशा चढ़ने लगा। बोला––राय साहब इसके सौ रुपए देते थे। दोनों कलोरों के पचास-पचास झपाए, लेकिन हमने न दियें। भगवान ने चाहा, तो सौ रुपए इसी व्यान में पीट लूँगा।

    'इसमें क्या सन्देह है भाई! मालिक क्या खाके लेगे। नजराने मे मिल जाय, तो भले ले लें। यह तुम्ही लोगों का गुर्दा है कि अंजुली-भर रुपए तकदीर के भरोसे गिन देते हो। यही जी चाहता है कि इसके दरसन करता रहूँ। धन्य है तुम्हारा जीवन कि गउओं की इतनी सेवा करते हो। हमें तो गाय का गोबर भी मयस्सर नही। गिरस्त के घर मे एक गाय भी न हो, तो कितनी लज्जा की बात है। माल-के-माल बीत जाते है, गोरस के दरसन नहीं होते। घरवाली बार-बार कहती है, भोला भैया से क्यों नहीं कहते। मैं कह देता हूँ, कभी मिलेगे तो कहूँगा। तुम्हारे सुभाव से बड़ी परसन रहती है। कहती है, ऐसा मर्द ही नहीं देखा कि जब बातें करेगे, नीची आँखें करके, कभी सिर नहीं उठाते।'

    भोला पर जो नशा चढ़ रहा था, उसे इस भरपूर प्याले ने और गहरा कर दिया। बोला––भला आदमी वही है, जो दूसरों की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझे। जो दुष्ट किसी मेहरिया की ओर ताके, उसे गोली मार देना चाहिए।

    यह तुमने लाख रुपए की बात कह दी भाई। बस सज्जन वही, जो दूसरों की आबरू को अपनी आबरू समझे।'

    'जिस तरह मर्द के मर जाने से औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत के मर जाने से मर्द के हाथ-पाँव कट जाते हैं। मेरा तो घर उजड़ गया महतो, कोई एक लोटा पानी देनेवाला भी नहीं।'

    गत वर्ष भोला की स्त्री लू लग जाने से मर गयी थी। यह होरी जानता था, लेकिन पचास बरस का खंखड़ भोला भीतर से इतना स्निग्ध है, वह न जानता था। स्त्री की लालसा उसकी आँखों में सजल हो गयी थी। होरी को आसन मिल गया। उसकी व्यावहारिक कृषक-बुद्धि सजग हो गयी। ⁠ 'पुरानी मसल झूठी थोड़ी है–विन घरनी घर भूत का डेग। कहीं सगाई नहीं ठीक कर लेते?'

    ⁠ ताक में हूँ महतो,पर कोई जल्दी फंसता नहीं। सौ-पचास खरच करने को भी तैयार हूं। जैसी भगवान की इच्छा।'

    ⁠ 'अब मैं भी फिकर में रहूँगा। भगवान चाहेंगे, तो जल्दी घर बम जायगा।

    ⁠ 'बस यही समझ लो कि उवर जाऊँगा भैया! घर में खाने को भगवान का दिया बहुत है। चार पसेरी रोज दूध हो जाता है,लेकिन किस काम का।'

    ⁠ 'मेरे ससुराल में एक मेहरिया है। तीन-चार साल हुए, उसका आदमी उसे छोड़कर कलकत्ते चला गया। बेचारी पिसाई करके गुजर कर रही है। बाल-बच्चा भी कोई नहीं। देखने-सुनने में अच्छी है। वस,लच्छमी समझ लो।'

    ⁠ भोला का सिकुड़ा हुआ चेहरा जैसे चिकना गया। आशा में कितनी सुधा है। बोला–अब तो तुम्हारा ही आसरा है महतो! छुट्टी हो, तो चलो एक दिन देख आयें।

    ⁠ 'मैं ठीक-ठाक करके तव तुमसे कहूँगा। बहुत उतावली करने से भी काम बिगड़ जाता है।'

    ⁠ 'जब तुम्हारी इच्छा हो तब चलो। उतावली काहे की। इस कबरी पर मन ललचाया हो,तो ले लो।'

    ⁠ 'यह गाय मेरे मान की नहीं है दादा। मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता। अपना धरम यह नहीं है कि मित्रों का गला दबायें। जैसे इतने दिन बीते हैं,वैसे और भी बीत जायेंगे।'

    ⁠ 'तुम तो ऐसी बातें करते हो होरी, जैसे हम-तुम दो है। तुम गाय ले जाओ, दाम जो चाहे देना। जैसे मेरे घर रही, वैसे तुम्हारे घर रही। अस्सी रुपए में ली थी, तुम अस्सी रुपए ही दे देना। जाओ।'

    ⁠ 'लेकिन मेरे पास नगद नहीं है दादा, समझ लो।'

    ⁠ 'तो तुमसे नगद मांगता कौन है भाई!'

    ⁠ होरी की छाती गज़-भर की हो गयी। अस्सी रुपए में गाय मॅहगी न थी। ऐसा अच्छा डील-डौल, दोनों जून में छ:-सात सेर दूध, सीधी ऐसी कि बच्चा भी दुह ले। इसका तो एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा। द्वार पर बँधेगी तो द्वार की शोभा बढ़ जायगी। उसे अभी कोई चार सौ रुपए देने थे; लेकिन उधार को वह एक तरह से मुफ्त समझता था। कहीं भोला की सगाई ठीक हो गयी तो साल दो साल तो वह बोलेगा भी नहीं। सगाई न भी हुई, तो होरी का क्या बिगड़ता है। यही तो होगा, भोला बार-बार तगादा करने आयेगा, विगड़ेगा, गालियाँ देगा। लेकिन होरी को इसकी ज्यादा शर्म न थी। इस व्यवहार का वह आदी था। कृषक के जीवन का तो यह प्रसाद है। भोला के साथ वह छल कर रहा था और यह व्यापार उसकी मर्यादा के अनुकूल था। अब भी लेन-देन में उसके लिए लिखा-पढ़ी होने और न होने में कोई अन्तर न था। सूखे-बूड़े की विपदाएँ उसके मन को भीरु बनाये रहती थीं। ईश्वर का रौद्र रूप सदैव उसके सामने रहता था। पर यह छल उसकी नीति में छल न था। यह केवल स्वार्थ-सिद्धि थी और यह कोई बुरी बात न थी। इस तरह का छल तो वह दिन-रात करता रहता था। घर में दो-चार रुपए पड़े रहने पर भी महाजन के सामने कस्में खा जाता था कि एक पाई भी नहीं है। सन को कुछ गीला कर देना और रुई में कुछ बिनौले भर देना उसकी नीति में जायज था। और यहाँ तो केवल स्वार्थ न था, थोड़ा-सा मनोरंजन भी था। बुड्ढों का बुढ़भस हास्यास्पद वस्तु है और ऐसे बुड्ढों से अगर कुछ ऐंठ भी लिया जाय, तो कोई दोष-पाप नहीं।

    ⁠ भोला ने गाय की पगहिया होरी के हाथ में देते हुए कहा-ले जाओ महतो, तुम भी याद करोगे। ब्याते ही छ: सेर दूध ले लेना। चलो, मैं तुम्हारे घर तक पहुँचा दूं। साइत तुम्हें अनजान समझकर रास्ते में कुछ दिक करे। अब तुमसे सच कहता हूँ, मालिक नब्बे रुपए देते थे, पर उनके यहाँ गउओं की क्या क़दर। मुझसे लेकर किसी हाकिमहुक्काम को दे देते। हाकिमों को गऊ की सेवा से मतलब। वह तो खून चूसना-भर जानते हैं। जब तक दूध देती, रखते, फिर किसी के हाथ बेच देते। किसके पल्ले पड़ती कौन जाने। रुपया ही सब कुछ नहीं है भैया, कुछ अपना धरम भी तो है। तुम्हारे घर आराम से रहेगी तो। यह न होगा कि तुम आप खाकर सो रहो और गऊ भूखी खड़ी रहे। उसकी सेवा करोगे, चुमकारोगे। गऊ हमें आसिरवाद देगी। तुमसे क्या कहूँ भैया, घर में चंगुलभर भी भूसा नही रहा। रुपए सव बाजार में निकल गये। सोचा था महाजन से कुछ लेकर भूसा ले लेगे; लेकिन महाजन का पहला ही नही चुका। उसने इनकार कर दिया। इतने जानवरो को क्या खिलाये, यही चिन्ता मारे डालती है। चुटकीचुटकी भर खिलाऊँ, तो मन-भर रोज का खरच है। भगवान ही पार लगाये तो लगे।

    ⁠ होरी ने सहानुभूति के स्वर मे कहा–तुमने हमसे पहले क्यों नही कहा? हमने एक गाड़ी भूसा बेच दिया।

    ⁠ भोला ने माथा टोककर कहा-इसीलिए नहीं कहा भैया कि सबसे अपना दुःख क्यों रोऊँ। वॉटता कोई नही, हंसते सब है। जो गाये सूख गयी है उनका गम नहीं, पत्ती-सत्ती खिलाकर जिला लूंगा; लेकिन अब यह तो रानिव बिना नहीं रह सकती। हो सके, तो दस-बीस रुपए भूसे के लिए दे दो।

    ⁠ किसान पक्का स्वार्थी होता है,इसमे सन्देह नही। उसकी गाँठ से रिश्वत के पैसे बड़ी मुश्किल से निकलते है,भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की घण्टों चिरौरी करता है, जब तक पक्का विश्वास न हो जाय, वह किसी के फुसलाने में नही आता, लेकिन उसका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है। वृक्षों में फल लगते हैं, उन्हें जनता खाती है; खेती में अनाज होता है, वह संसार के काम आता है; गाय के थन में दूध होता है, वह खुद पीने नहीं जाती दूसरे ही पीते है; मेघों से वर्षा होती है,उससे पृथ्वी तृप्त होती है। ऐसी संगति में कुत्सित स्वार्थ के लिए कहाँ स्थान। होरी किसान था और किसी के जलते हुए घर में हाथ सेंकना उसने सीखा ही न था। ⁠ भोला की संकट-कथा सुनते ही उसकी मनोवृत्ति बदल गयी। पगहिया को भोला के हाथ में लौटाता हुआ बोला-रुपए तो दादा मेरे पास नहीं हैं, हाँ थोड़ा-सा भूसा बचा है,वह तुम्हें दूंगा। चलकर उठवा लो। भूसे के लिए तुम गाय बेचोगे,और मैं लूंगा। मेरे हाथ न कट जायेंगे?

    ⁠ भोला ने आर्द्र कण्ठ से कहा-तुम्हारे बैल भूखों न मरेंगे! तुम्हारे पास भी ऐसा कौन-सा बहुत-सा भसा रखा है।

    ⁠ 'मैंने तुमसे नाहक भूसे की चर्चा की।'

    ⁠ 'तुम न कहते और पीछे से मुझे मालूम होता, तो मुझे बड़ा रंज होता कि तुमने मुझे इतना गैर समझ लिया। अवसर पड़ने पर भाई की मदद भाई भी न करे, तो काम कैसे चले।'

    ⁠ 'तो भूसे के दाम दूध में कटवा लेना।'

    ⁠ होरी ने दुःखित स्वर में कहा-दाम-कौड़ी की इसमें कौन बात है दादा,मैं एकदो जून तुम्हारे घर खा लूं,तो तुम मुझसे दाम

    ⁠ 'भगवान कोई-न-कोई सबील निकालेंग ही। असाढ़ सिर

    ⁠ 'मगर यह गाय तुम्हारी हो गयी। जिस दिन इच्छा हो आकर ले जाना।'

    ⁠ 'किसी भाई का निलाम पर चढ़ा हुआ बैल लेने में जो पाप है,वह इस समय तुम्हारी गाय लेने में है।'

    ⁠ होरी में बाल की खाल निकालने की शक्ति होती,तो वह खुशी से गाय लेकर घर की राह लेता। भोला जब नकद रुपए नहीं माँगता तो स्पष्ट था कि वह भूसे के लिए गाय नहीं बेच रहा है,बल्कि इसका कुछ और आशय है; लेकिन जैसे पत्तों के खड़कने पर घोड़ा अकारण ही ठिठक जाता है और मारने पर भी आगे कदम नहीं उठाता वही दशा होरी की थी। संकट की चीज़ लेना पाप है,यह वात जन्म-जन्मान्तरों से उसकी आत्मा का अंश बन गयी थी।

    ⁠ भोला ने गद्गद् कंठ से कहा–तो किसी को भेज दूं भूसे के लिए?

    ⁠ होरी ने जवाब दिया-अभी मैं राय साहब की ड्योढ़ी पर जा रहा हूँ। वहाँ से घड़ी-भर में लौटूंगा,तभी किसी को भेजना। भोला की आँखों में आँसू भर आये। बोला-तुमने आज मुझे उबार लिया होरी भाई! मुझे अब मालूम हुआ कि मैं संसार में अकेला नहीं हूँ। मेरा भी कोई हितू है। एक क्षण के बाद उसने फिर कहा-उस बात को भूल ⁠ होरी आगे बढ़ा, तो उसका चित्त प्रसन्न था। मन में एक विचित्र स्फूर्ति हो रही थी। क्या हुआ,दस-पाँच मन भूसा चला जायगा,बेचारे को संकट में पड़ कर अपनी गाय तो न बेचनी पड़ेगी। जब मेरे पास चारा हो जायगा, तब गाय खोल लाऊँगा। भगवान करें, मुझे कोई मेहरिया मिल जाय। फिर तो कोई बात ही नहीं।

    उसने पीछे फिर कर देखा। कबरी गाय पूंछ से मक्खियाँ उड़ाती, सिर हिलाती, मस्तानी, मंद-गति से झूमती चली जाती थी, जैसे वादियों के बीच में कोई रानी हो। कैसा शुभ होगा वह दिन, जब यह कामधेनु उसके द्वार पर बँधेगी!

    २

    सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रान्त के गाँव हैं। जिले का नाम बताने की कोई ज़रूरत नहीं। होरी बेलारी में रहता है, राय साहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल पाँच मील का अन्तर है। पिछले सत्याग्रह-संग्राम में राय साहब ने बड़ा यश कमाया था। कौंसिल की मेम्बरी छोड़कर जेल चले गये थे। तब से उनके इलाके के असामियों को उनसे बड़ी श्रद्धा हो गयी थी। यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो, या डाँड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो; मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जाती थी। राय साहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था। वह बेचारे भी तो उसी व्यवस्था के गुलाम थे। ज़ाब्ते का काम तो जैसे होता चला आया है, वैसा ही होगा। राय साहब की सज्जनता उस पर कोई असर न डाल सकती थी। इसलिए आमदनी और अधिकार में जौ-भर की भी कमी न होने पर भी उनका यश मानो बढ़ गया था। असामियों से वह हँसकर बोल लेते थे। यही क्या कम है? सिंह का काम तो शिकार करना है। अगर वह गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता।

    राय साहब राष्ट्रवादी होने पर भी हुक्काम से मेल-जोल बनाये रखते थे। उनकी नजरें और डालियाँ और कर्मचारियों की दस्तूरियाँ जैसी की तैसी चली आती थीं। साहित्य और संगीत के प्रेमी थे, ड्रामा के शौकीन, अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक, अच्छे निशानेबाज़। उनकी पत्नी को मरे आज दस साल हो चुके थे; मगर दूसरी शादी न की थी। हँस-बोलकर अपने विधुर जीवन को बहलाते रहते थे।

    होरी ड्योढ़ी पर पहुंचा तो देखा जेठ के दशहरे के अवसर पर होनेवाले धनुषयज्ञ की बड़ी जोरों से तैयारियां हो रही हैं: कहीं रंग-मंच बन रहा था, कहीं मंडप, कहीं मेहमानों का आतिथ्य-गृह, कहीं दूकानदारों के लिए दूकानें। धूप तेज़ हो गयी थी; पर राय साहब खुद काम में लगे हुए थे। अपने पिता से सम्पत्ति के साथ-साथ उन्होंने राम की भक्ति भी पायी थी और धनुष-यज्ञ को नाटक का रूप देकर उसे शिष्ट मनोरंजन का साधन बना दिया था। इस अवसर पर उनके यार-दोस्त, हाकिम-हुक्काम सभी निमन्त्रित होते थे। और दो-तीन दिन इलाके में बड़ी चहल-पहल रहती थी। राय साहब का परिवार बहुत विशाल था। कोई डेढ़ सौ सरदार एक साथ भोजन करते थे। कई चचा थे, दरजनों चचेरे भाई, कई सगे भाई, बीसियों नाते के भाई। एक चचा

    साहब राधा के अनन्य उपासक थे और वरावर वृन्दावन में रहते थे। भक्ति-रस के कितने ही कवित्त रच डाले थे और समय-समय पर उन्हें छपवाकर दोस्तों की भेंट कर देते थे। एक दूसरे चचा थे, जो राम के परमभक्त थे और फ़ारसी-भापा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे। रियासत से सबके वसीके बँधे हुए थे। किसी को कोई काम करने की जरूरत न थी।

    ⁠ होरी मण्डप में खड़ा सोच रहा था कि अपने आने की सूचना कैसे दे कि सहसा राय साहव उधर ही आ निकले और उसे देखते ही बोले–अरे! तू आ गया होरी, मै तो तुझे बुलवानेवाला था। देख,अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। ममझ गया न, जिस वक्त श्रीजानकी जी मन्दिर में पूजा करने जाती हैं, उसी वक्त तू एक गुलदस्ता लिये खड़ा रहेगा और जानकी जी की भेंट करेगा। गलती न करना और देख,असामियों से ताकीद करके कह देना कि सव-के-सव शगुन करने आयें। मेरे साथ कोठी में आ, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।

    ⁠ वह आगे-आगे कोठी की ओर चले,होरी पीछे-पीछे चला। वहीं एक घने वृक्ष की छाया में एक कुरसी पर बैठ गये और होरी को जमीन पर बैठने का इशारा करके बोले–समझ गया,मैंने क्या कहा। कारकुन को तो जो कुछ करना है, वह करेगा ही, लेकिन असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकुन की नहीं सुनता। हमें इन्हीं पाँच-सात दिनों में बीस हजार का प्रवन्ध करना है। कैसे होगा, समझ में नहीं आता। तुम सोचते होगे, मुझ टके के आदमी से मालिक क्यों अपना दुखड़ा ले वैठे। किससे अपने मन की कहूँ? न जाने क्यों तुम्हारे ऊपर विश्वास होता है। इतना जानता हूँ कि तुम मन में मुझ पर हँसोगे नहीं। और हँसो भी, तो तुम्हारी हँसी मैं बरदाश्त कर सकूँगा। नहीं सह सकता उनकी हँसी, जो अपने वरावर के हैं, क्योंकि उनकी हॅसी में ईर्ष्या, व्यंग और जलन है। और वे क्यों न हॅसेंगे। मै भी तो उनकी दुर्दशा और विपत्ति और पतन पर हँसता हूँ, दिल खोलकर, तालियां बजाकर। सम्पत्ति और सहृदयता में वैर है। हम भी दान देते हैं, धर्म करते हैं। लेकिन जानते हो, क्यों? केवल अपने बराबरवालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार। हम में से किसी पर डिग्री हो जाय, कुर्की आ जाय, बकाया मालगुजारी की इल्लत में हवालात हो जाय, किसी का जवान बेटा मर जाय, किसी की विधवा बहू निकल जाय, किसी के घर में आग लग जाय, कोई किसी वेश्या के हाथों उल्लू बन जाय, या अपने असामियों के हाथों पिट जाय, तो उसके और सभी भाई उस पर हँसेंगे, बग़लें बजायेंगे, मानो सारे संसार की सम्पदा मिल गयी है। और मिलेंगे तो इतने प्रेम से, जैसे हमारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार हैं। अरे, और तो और, हमारे चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई जो इसी रियासत की बदौलत मौज उड़ा रहे हैं, कविता कर रहे हैं और जुए खेल रहे हैं, शराबें पी रहे हैं और ऐयाशी कर रहे हैं, वह भी मुझसे जलते हैं, और आज मर जाऊँ तो घी के चिराग जलायें। मेरे दुःख को दुःख समझनेवाला कोई नहीं। उनकी नजरों में मुझे दुखी होने का कोई अधि कार ही नहीं है। मैं अगर रोता हूँ, तो दुःख की हँसी उड़ाता हूँ। मैं अगर बीमार होता हूँ, तो मुझे सुख होता है। मैं अगर अपना ब्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है; अगर व्याह कर लूं, तो वह विलासांधता होगी। अगर शराब नहीं पीता तो मेरी कंजूसी है। शराब पीने लगूं, तो वह प्रजा का रक्त होगा। अगर ऐयाशी नहीं करता,तो अरसिक हूँ; ऐयाशी करने लगूं, तो फिर कहना ही क्या। इन लोगों ने मुझे भोग-विलास में फंसाने के लिए कम चालें नहीं चलीं और अब तक चलते जाते हैं। उनकी यही इच्छा है कि मैं अन्धा हो जाऊँ और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म यह है कि सब कुछ देखकर भी कुछ न देखू। सब कुछ जानकर भी गधा बना रहूँ।

    ⁠ राय साहब ने गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए दो वीड़े पान खाये और होरी के मुंह की ओर ताकने लगे,जैसे उसके मनोभावों को पढ़ना चाहते हों।

    ⁠ होरी ने साहस बटोरकर कहा-हम समझते थे कि ऐसी बातें हमीं लोगों में होती हैं, पर जान पड़ता है,बड़े आदमियों में भी उनकी कमी नहीं है।

    ⁠ राय साहब ने मुंह पान से भरकर कहा-तुम हमें बड़ा आदमी समझते हो? हमारे नाम बड़े हैं, पर दर्शन थोड़े। गरीबों में अगर ईर्ष्या या वैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और वैर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुंह की रोटी कोई छीन ले तो उसके गले में उँगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनन्द के लिए है। हम इतने बड़े आदमी हो गये हैं कि हमें नीचता और कुटिलता में ही निःस्वार्थ और परम आनन्द मिलता है। हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गये हैं जव हमें दूसरों के रोने पर हंसी आती है। इसे तुम छोटी साधना मत समझो। जव इतना बड़ा कुटुम्ब है, तो कोई-न-कोई तो हमेशा बीमार रहेगा ही। और बड़े आदमियों के रोग भी बड़े होते हैं। वह बड़ा आदमी ही क्या,जिसे कोई छोटा रोग हो। मामूली ज्वर भी आ जाय,तो हमें सरसाम की दवा दी जाती है,मामूली फन्सी भी निकल आये, तो वह जहरवाद बन जाती है। अब छोटे सर्जन और मझोले सर्जन और बड़े सर्जन तार से बुलाये जा रहे हैं,मसीहुलमुल्क को लाने के लिए दिल्ली आदमी भेजा जा रहा है,भिषगाचार्य को लाने के लिए कलकत्ता। उधर देवालय में दुर्गापाठ हो रहा है और ज्योतिपाचार्य कुण्डली का विचार कर रहे हैं और तन्त्र के आचार्य अपने अनुष्ठान में लगे हुए हैं। राजा साहब को यमराज के मुंह से निकालने के लिए दौड़ लगी हुई है। वैद्य और डाक्टर इस ताक में रहते हैं कि कब इनके सिर में दर्द हो और कब उसके घर में सोने की वर्षा हो। और ये रुपए तुमसे और तुम्हारे भाइयों से वसूल किये जाते हैं,भाले की नोक पर। मुझे तो यही आश्चर्य होता है कि क्यों तुम्हारी आहों का दावानल हमें भस्म नहीं कर डालता;मगर नहीं, आश्चर्य करने की कोई बात नहीं। भस्म होने में तो बहुत देर नहीं लगती,वेदना भी थोड़ी ही देर की होती है।हम जौ-जौ और अंगुलअंगुल और पोर-पोर भस्म हो रहे हैं। उस हाहाकार से बचने के लिए हम पुलिस की, हुक्काम की,अदालत की,वकीलों की शरण लेते हैं।और रूपवती स्त्री की भाँति सभी के हाथों का खिलौना बनते हैं।दुनिया समझती है, हम बड़े सुखी हैं।हमारे पास इलाक़े,महल, सवारियाँ,नौकर-चाकर,कर्ज, वेश्याएँ,क्या नहीं हैं, लेकिन जिसकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं,वह और चाहे कुछ हो,आदमी नहीं है।जिसे दुश्मन के भय के मारे रात को नींद न आती हो,जिसके दुःख पर सब हँसें और रोनेवाला कोई न हो,जिसकी चोटी दूसरों के पैरों के नीचे दबी हो,जो भोग-विलास के नशे में अपने को बिलकुल भूल गया हो,जो हुक्काम के तलवे चाटता हो और अपने अधीनों का खून चूसता हो, उसे मैं सुखी नहीं कहता। वह तो संसार का सबसे अभागा प्राणी है। साहब शिकार खेलने आयें या दौरे पर, मेरा कर्तव्य है कि उनकी दुम के पीछे लगा रहूँ। उनकी भौंहों पर शिकन पड़ी और हमारे प्राण सूखे। उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम क्या नहीं करते। मगर वह पचड़ा सुनाने लगूं तो शायद तुम्हें विश्वास न आये। डालियों और रिश्वतों तक तो खैर गनीमत है, हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं। मुफ्तखोरी ने हमें अपंग बना दिया है,हमें अपने पुरुपार्थ पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं, केवल अफ़सरों के सामने दुम हिला-हिलाकर किसी तरह उनके कृपापात्र बने रहना और उनकी सहायता से अपनी प्रजा पर आतंक जमाना ही हमारा उद्यम है। पिछलगुओं की खुशामद ने हमें इतना अभिमानी और तुनकमिजाज़ बना दिया है कि हममें शील, विनय और सेवा का लोप हो गया है। मैं तो कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर सरकार हमारे इलाके छीनकर हमें अपनी रोज़ी के लिए मेहनत करना सिखा दे तो हमारे साथ महान उपकार करे, और यह तो निश्चय है कि अब सरकार भी हमारी रक्षा न करेगी। हमसे अब उसका कोई स्वार्थ नहीं निकलता। लक्षण कह रहे है कि बहुत जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिट जानेवाली है। मैं उस दिन का स्वागत करने को तैयार बैठा हूँ। ईश्वर वह दिन जल्द लाये। वह हमारे उद्धार का दिन होगा। हम परिस्थितियों के शिकार बने हुए हैं। यह परिस्थिति ही हमारा सर्वनाश कर रही है और जब तक संपत्ति की यह बेड़ी हमारे पैरों से न निकलेगी, जव तक यह अभिशाप हमारे सिर पर मंडराता रहेगा, हम मानवता का वह पद न पा सकेंगे जिस पर पहुँचना ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।

    ⁠ राय साहब ने फिर गिलौरी-दान निकाला और कई गिलौरियाँ निकालकर मुंहमें भर लीं। कुछ और कहने वाले थे कि एक चपरासी ने आकर कहा–सरकार, बेगारों ने काम करने से इनकार कर दिया है। कहते हैं,जब तक हमें खाने को न मिलेगा हम काम न करेंगे। हमने धमकाया,तो सब काम छोड़कर अलग हो गये।

    ⁠ राय साहब के माथे पर बल पड़ गये। आँखें निकालकर बोले-चलो,मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया,तो आज यह नयी बात क्यों? एक आने रोज के हिसाब से मजूरी मिलेगी,जो हमेशा मिलती रही है;और इस मजूरी पर उन्हें काम करना होगा,सीधे करें या टेढ़े।

    ⁠ फिर होरी की ओर देखकर बोले-तुम अब जाओ होरी, अपनी तैयारी करो। जो बात मैंने कही है,उसका खयाल रखना। तुम्हारे गाँव से मुझे कम-से-कम पाँच सौ की आशा है। राय साहब झल्लाते हुए चले गये। होरी ने मन में सोचा,अभी यह कैसी-कैसी नीति और धरम की बातें कर रहे थे और एकाएक इतने गरम हो गये!

    सूर्य सिर पर आ गया था। उसके तेज से अभिभूत होकर वृक्षों ने अपना पसार समेट लिया था। आकाश पर मटियाला गर्द छाया हुआ था और सामने की पृथ्वी काँपती हुई जान पड़ती थी।

    होरी ने अपना डण्डा उठाया और घर चला। शगून के रुपये कहाँ से आयेंगे, यही चिन्ता उसके सिर पर सवार थी।

    ३

    {Gap}}होरी अपने गांव के समीप पहुंचा,तो देखा, अभी तक गोबर खेत में ऊख गोड़ रहा है और दोनों लड़कियाँ भी उसके साथ काम कर रही हैं। लू चल रही थी,वगूले उठ रहे थे, भूतल धधक रहा था। जैसे प्रकृति ने वायु में आग घोल दिया हो। यह सब अभी तक खेत में क्यों है? क्या काम के पीछे सब जान देने पर तुले हुए है? वह खेत की ओर चला और दूर ही से चिल्लाकर वोला-आता क्यों नहीं गोवर, क्या काम ही करता रहेगा? दोपहर ढल गया,कुछ सूझता है कि नहीं?

    उसे देखते ही तीनों ने कुदालें उठा ली और उसके साथ हो लिये। गोबर सांवला,लम्बा,एकहरा युवक था, जिसे इस काम से रुचि न मालम होती थी। प्रसन्नता की जगह मुख पर असंतोप और विद्रोह था। वह इसलिए काम में लगा हुआ था कि वह दिग्वाना चाहता था, उसे खाने-पीने की कोई फिक्र नहीं है। बड़ी लड़की सोना लज्जाशील कुमारी थी, साँवली, मुडौल, प्रसन्न और चपल। गाढ़े की लाल साड़ी जिसे वह घुटनों से मोड़कर कमर में बाँधे हुए थी, उसके हलके शरीर पर कुछ लदी हुई सी थी,और उसे प्रौढ़ता की गरिमा दे रही थी। छोटी रूपा पाँच-छ:साल की छोकरी थी मैली,सिर पर वालों का एक घोंसला-सा बना हुआ, एक लॅगोटी कमर में वाँधे,बहुत ही ढीठ और रोनी।

    रूपा ने होरी की टाँगों में लिपटकर कहा–काका! देखो, मैने एक ढेला भी नहीं छोड़ा। बहन कहती है, जा पेड़ तले बैठ। ढेले न तोड़े जायेंगे काका,तो मिट्टी कैसे वरावर होगी।

    होरी ने उसे गोद में उठाकर प्यार करते हुए कहा-तूने बहुत अच्छा किया बेटी, चल घर चलें। कुछ देर अपने विद्रोह को दबाये रहने के बाद गोबर बोला–यह तुम रोज़-रोज़ मालिकों की खुशामद करने क्यों जाते हो? बाकी न चुके तो प्यादा आकर गालियाँ सुनाता है,बेगार देनी ही पड़ती है,नजर-नज़राना सब तो हमसे भराया जाता है। फिर किसी की क्यों सलामी करो!

    इस समय यही भाव होरी के मन में भी आ रहे थे; लेकिन लड़के के इस विद्रोहभाव को दबाना ज़रूरी था। बोला–सलामी करने न जायँ, तो रहें कहाँ। भगवान ने जब गुलाम बना दिया है,तो अपना क्या बस है। यह इसी सलामी की बरकत है

    कि द्वार पर मईया डाल ली और किसी ने कुछ नहीं कहा। घरे ने द्वार पर खूटा गाड़ा था, जिस पर कारिन्दों ने दो रुपए डाँड़ ले लिये थे। तलैया से कितनी मिट्टी हमने खोदी, कारिन्दा ने कुछ नहीं कहा। दूसरा खोदे तो नजर देनी पड़े। अपने मतलव के लिए सलामी करने जाता हूँ, पाँव में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है। घण्टों खड़े रहो,तव जाके मालिक को खबर होती है। कभी बाहर निकलते हैं. कभी कहला देते हैं कि फुरसत नहीं है।

    ⁠ गोबर ने कटाक्ष किया-बड़े आदमियों की हॉ-में-हाँ मिलाने में कुछ-न-कुछ आनन्द तो मिलता ही है। नहीं लोग मेम्बरी के लिए क्यों खड़े हो?

    ⁠ 'जब सिर पर पड़ेगी तब मालूम होगा बेटा,अभी जो चाहे कह लो। पहले मैं भी यही सब वातें सोचा करता था; पर अब मालूम हुआ कि हमारी गरदन दूसरों के पैगे के नीचे दबी हुई है, अकड़ कर निबाह नहीं हो सकता।'

    ⁠ पिता पर अपना क्रोध उतारकर गोबर कुछ शान्त हो गया और चुपचाप चलने लगा। सोना ने देखा, रूपा वाप की गोद में चढ़ी बैठी है तो ईर्ष्या हुई। उसे डाँटकर बोली–अब गोद से उतरकर पाँव-पाँव क्यों नही चलती, क्या पांव टूट गये है? .

    ⁠ रूपा ने बाप की गरदन में हाथ डालकर ढिठाई से कहा–न उतरेंगे जाओ। काका, बहन हमको रोज़ चिढ़ाती है कि तू रूपा है, मै सोना हूँ। मेग नाम कुछ और रख दो।

    ⁠ होरी ने सोना को बनावटी रोप मे देखकर कहा–तू इसे क्यों चिढ़ाती है सोनिया? सोना तो देखने को है। निवाह तो रूपा से होता है। रूपा न हो,तो रुपए कहाँ से बनें,बता।

    ⁠ सोना ने अपने पक्ष का समर्थन किया–सोना न हो तो मोहन कैसे बने,नथुनियाँ कहाँ से आयें,कण्ठा कैसे बने?

    ⁠ गोवर भी इस विनोदमय विवाद में शरीक हो गया। रूपा से वोला-तू कह दे कि सोना तो सूवी पत्ती की तरह पीला होता है, रूपा तो उजला होता है जैसे मूरज।

    ⁠ सोना बोली-शादी-व्याह में पीली साड़ी पहनी जाती है, उजली साड़ी कोई नही पहनता।

    ⁠ रूपा इस दलील से परास्त हो गयी। गोबर और होरी की कोई दलील इसके सामने न ठहर सकी। उसने क्षुब्ध आँखों से होरी को देखा।

    ⁠ होरी को एक नयी युक्ति सूझ गयी। बोला–सोना वड़े आदमियों के लिए है। हम गरीबों के लिए तो रूपा ही है। जैसे जौ को राजा कहते हैं, गेहूँ को चमार; इसलिए न कि गेहूँ बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं।

    ⁠ सोना के पास इस सबल युक्ति का कोई जवाब न था। परास्त होकर बोली-तुम सब जने एक ओर हो गये,नहीं रुपिया को रुलाकर छोड़ती।

    ⁠ रूपा ने उँगली मटकाकर कहा-ए राम,सोना चमार-ए राम, सोना चमार।

    ⁠ इस विजय का उसे इतना आनन्द हुआ कि बाप की गोद में रह न सकी। ज़मीन पर कूद पड़ी और उछल-उछलकर यही रट लगाने लगी-रूपा राजा,सोना चमार– रूपा राजा,सोना चमार!

    ⁠ ये लोग घर पहुँचे तो धनिया द्वार पर खड़ी इनकी बाट जोह रही थी। रुष्ट होकर बोली-आज इतनी देर क्यों की गोवर? काम के पीछे कोई परान थोड़े ही दे देता है।

    ⁠ फिर पति से गर्म होकर कहा–तुम भी वहाँ से कमाई करके लौटे तो खेत में पहुंच गये। खेत कहीं भागा जाता था!

    ⁠ द्वार पर कुआँ था। होरी और गोबर ने एक-एक कलसा पानी सिर पर उँडेला, रूपा को नहलाया और भोजन करने गये। जौ की रोटियाँ थीं; पर गेहूँ-जैसी सुफ़ेद और चिकनी। अरहर की दाल थी जिसमें कच्चे आम पड़े हुए थे। रूपा बाप की थाली में खाने बैठी। सोना ने उसे ईर्ष्या-भरी आँखों से देखा,मानो कह रही थी,वाह रे दुलार!

    ⁠ धनिया ने पूछा–मालिक से क्या बात-चीत हुई?

    ⁠ होरी ने लोटा-भर पानी चढ़ाते हुए कहा-यही तहसील-वसूल की बात थी और क्या। हम लोग समझते हैं, बड़े आदमी बहुत सुखी होंगे; लेकिन सच पूछो, तो वह हमसे भी ज्यादा दुःखी हैं। हमें अपने पेट ही की चिन्ता है,उन्हें हजारों चिन्ताएं घेरे रहती है।

    ⁠ राय साहब ने और क्या-क्या कहा था, वह कुछ होरी को याद न था। उस सारे कथन का खुलासा-मात्र उसके स्मरण में चिपका हुआ रह गया था।

    ⁠ गोबर ने व्यंग्य किया–तो फिर अपना इलाका हमें क्यों नहीं दे देते!हम अपने खेत, बैल, हल, कुदाल सब उन्हें देने को तैयार हैं। करेंगे बदला? यह सब धूर्तता है,निरी मोटमरदी। जिसे दुःख होता है,वह दरजनों मोटरें नहीं रखता,महलों में नहीं रहता, हलवा-पूरी नहीं खाता और न नाच-रंग में लिप्त रहता है। मजे से राज का सुख भोग रहे हैं, उस पर दुखी हैं!

    ⁠ होरी ने झुंझलाकर कहा-अब तुमसे बहस कौन करे भाई! जैजात किसी से छोड़ी जाती है कि वही छोड़ देंगे। हमी को खेती से क्या मिलता है? एक आने नफरी की मजूरी भी तो नहीं पड़ती। जो दस रुपए महीने का भी नौकर है, वह भी हमसे अच्छा खाता-पहनता है; लेकिन खेतों को छोड़ा तो नहीं जाता। खेती छोड़ दें, तो और करें क्या? नौकरी कहीं मिलती है? फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है वह नौकरी में तो नहीं है। इसी तरह जमींदारों का हाल भी समझ लो! उनकी जान को भी तो सैकड़ों रोग लगे हुए हैं, हाकिमों को रसद पहुँचाओ, उनकी सलामी करो, अमलों को खुश करो। तारीख पर मालगुजारी न चुका दें, तो हवालात हो जाय, कुड़की आ जाय। हमें तो कोई हवालात नहीं ले जाता। दो-चार गालियाँघुड़कियाँ ही तो मिलकर रह जाती हैं।

    ⁠ गोबर ने प्रतिवाद किया-यह सब कहने की बातें हैं। हम लोग दाने-दाने को मुहताज हैं,देह पर साबित कपड़े नहीं हैं, चोटी का पसीना एड़ी तक आता है,तब भी गुजर नहीं होता। उन्हें क्या,मजे से गद्दी-मसनद लगाये बैठे हैं,सैकड़ों नौकर-चाकर

    हैं, हज़ारों आदमियों पर हुकूमत है। रुपए न जमा होते हों; पर सुख तो सभी तरह का भोगते हैं। धन लेकर आदमी और क्या करता है?

    ⁠ 'तुम्हारी समझ में हम और वह बराबर हैं?'

    ⁠ 'भगवान ने तो सबको बराबर ही बनाया है।'

    ⁠ 'यह बात नहीं है बेटा, छोटे-बड़े भगवान के घर से बनकर आते हैं। सम्पत्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। उन्होंने पूर्वजन्म में जैसे कर्म किये हैं, उनका आनन्द भोग रहे हैं। हमने कुछ नहीं संचा, तो भोगें क्या?

    ⁠ 'यह सब मन को समझाने की बातें हैं। भगवान सबको बराबर बनाते है। यहाँ जिसके हाथ में लाठी है,वह गरीबों को कुचलकर बड़ा आदमी बन जाता है।'

    ⁠ 'यह तुम्हारा भरम है। मालिक आज भी चार घण्टे रोज़ भगवान का भजन करते है।'

    ⁠ 'किसके बल पर यह भजन-भाव और दान-धर्म होता है ?'

    ⁠ 'अपने बल पर।'

    ⁠ 'नहीं, किसानों के बल पर और मजदूरों के बल पर। यह पाप का धन पचे कैसे? इसीलिए दान-धर्म करना पड़ता है, भगवान का भजन भी इसीलिए होता है,भूखेनंगे रहकर भगवान का भजन करें,तो हम भी देखें। हमें कोई दोनों जून खाने को दे तो हम आठों पहर भगवान का जाप ही करते रहें। एक दिन खेत में ऊख गोड़ना पड़े तो सारी भक्ति भूल जाय।'

    {{Gapहोरी ने हार कर कहा–अब तुम्हारे मुंह कौन लगे भाई, तुम तो भगवान की लीला में भी टाँग अड़ाते हो।

    ⁠ तीसरे पहर गोबर कुदाल लेकर चला, तो होरी ने कहा-ज़रा ठहर जाओ देगा, हम भी चलते हैं। तब तक थोड़ा-सा भूसा निकालकर रख दो। मैने भोला को देने को कहा है। बेचारा आजकल बहुत तंग है।

    ⁠ गोबर ने अवज्ञा-भरी आँखों से देखकर कहा-हमारे पास बेचने को भूसा नहीं है।

    ⁠ 'बेचता नहीं हूँ भाई, यों ही दे रहा हूँ। वह संकट में है, उसकी मदद तो करनी ही पड़ेगी।'

    ⁠ 'हमें तो उन्होंने कभी एक गाय नहीं दे दी।'

    ⁠ 'दे तो रहा था; पर हमने ली ही नहीं।'

    ⁠ धनिया मटककर बोली-गाय नहीं वह दे रहा था। इन्हें गाय दे देगा! आँख में अंजन लगाने को कभी चिल्लू-भर दूध तो भेजा नहीं, गाय देगा!

    ⁠ होरी ने कसम खायी-नहीं,जवानी क़सम, अपनी पछाईं गाय दे रहे थे। हाथ तंग है,भूसा-चारा नहीं रख सके। अब एक गाय बेचकर भूसा लेना चाहते हैं। मैंने सोचा,संकट में पड़े आदमी की गाय क्या लूँगा। थोड़ा-सा भूसा दिये देता हूँ, कुछ रुपए हाथ आ जायँगे तो गाय ले लूंगा। थोड़ा-थोड़ा करके चुका दूंगा। अस्सी रुपए की है; मगर ऐसी कि आदमी देखता रहे।

    ⁠ गोबर ने आड़े हाथों लिया-तुम्हारा यही धर्मात्मापन तो तुम्हारी दुर्गत कर रहा है। साफ-साफ तो वात है। अस्सी रुपए की गाय है, हमसे वीस रुपए का भूगा ले लें और गाय हमे दे दे। साठ रुपए रह जायेंगे,वह हम धीरे-धीरे दे देंगे।

    ⁠ होरी रहस्यमय ढंग से मुस्कराया–मैने ऐसी चाल सोची है कि गाय सेंत-मेंत में हाथ आ जाय। कहीं भोला की सगाई ठीक करनी है, बस। दो-नार मन भसा तो खाली अपना रंग जमाने को देता हूँ।

    ⁠ गोवर ने निरस्कार किया–तो तुम अब सब की सगाई ठीक करते फिरोगे?

    ⁠ धनिया ने तीखी आँखों से देखा-अब यही एक उद्यम तो रह गया है। न देनाह है हमें भूमा किसी को। यहाँ भोली-भाला किसी का करज़ नही खाया है।

    ⁠ होरी ने अपनी सफाई दी-अगर मेरे जतन से किसी का घर वस जाय,तो इसमें कौन-सी बुराई है?

    ⁠ गोवर ने चिलम उठाई और आग लेने चला गया। उगे यह झमेला बिल्कुल नहीं भाता था।

    ⁠ धनिया ने सिर हिला कर कहा–जो उनका घर बसायेगा,वह अम्सी रुपए की गाय लेकर चुप न होगा।एक थैली गिनवायेगा।

    ⁠ होरी ने पुचाग दिया–यह मै जानता है;लेकिन उनकी भलमनसी को भी तो देखो। मुझसे जब मिलता है,तेरा बखान ही करता है–ऐसी लक्ष्मी है, ऐसी सलीकेदार है।

    ⁠ धनिया के मुख पर स्निग्धता झलक पड़ी। मनभाय मुड़िया हिलाये वाले भाव से वोली–मै उनके बखान की भूखी नहीं हूँ,अपना बखान धरे रहें।

    ⁠ होरी ने स्नेह-भरी मुस्कान के साथ कहा-मैने तो कह दिया,भैया,वह नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती,गालियों से बात करती है। लेकिन वह यही कहे जाय कि वहऔरत नहीं, लक्ष्मी है। बात यह है कि उसकी घरवाली जवान की बड़ी तेज थी। वेचारा उसके डर के मारे भागा-भागा फिरता था। कहता था, जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुँह सवेरे देख लेता हूँ,उम दिन कुछ-न-कुछ जरूर हाथ लगता है। मैने कहा– तुम्हारे हाथ लगता होगा, यहाँ तो रोज देखते है,कभी पैसे से भेंट नहीं होती।

    ⁠ 'तुम्हारे भाग ही खोटे हैं, तो मैं क्या करूं।'

    ⁠ 'लगा अपनी घरवाली की बुराई करने-भिखारी को भीख तक नहीं देती थी, झाड़ लेकर मारने दौड़ती थी,लालचिन ऐसी थी कि नमक तक दूसरों के घर से माँग लाती थी!'

    ⁠ ‘मरने पर किसी की क्या बुराई करूं। मुझे देखकर जल उठती थी।'

    ⁠ भोला वड़ा गमखोर था कि उसके साथ निबाह कर दिया। दूसरा होता तो जहर खाके मर जाता। मुझसे दस साल बड़े होंगे भोला; पर राम-राम पहले ही करते हैं।'

    ⁠ 'तो क्या कहते थे कि जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुंह देख लेता हूँ, तो क्या होता है?"

    ⁠ 'उस दिन भगवान कहीं-न-कहीं से कुछ भेज देते हैं।'

    ⁠ 'बहुएँ भी तो वैसी ही चटोरिन आयी हैं। अबकी सबों ने दो रुपए के खरबूजे उधार खा डाले। उधार मिल जाय, फिर उन्हें चिन्ता नहीं होती कि देना पड़ेगा या नहीं।'

    ⁠ 'और भोला रोते काहे को हैं?'

    ⁠ गोबर आकर बोला-भोला दादा आ पहुँचे। मन-दो मन भूसा है, वह उन्हें दे फिर उनकी सगाई ढूंढ़ने निकलो।

    ⁠ धनिया ने समझाया–आदमी द्वार पर बैठा है,उसके लिए खाट-वाट तो डाल ही दी,ऊपर से लगे भुनभुनाने। कुछ तो भलमंसी सीखो। कलसा ले जाओ,पानी नरकर रख दो,हाथ-मुंह धोयें,कुछ रस-पानी पिला दो। मुसीबत में ही आदमी दूसरों के सामने हाथ फैलाता है।

    ⁠ होरी बोला–रस-वस का काम नहीं है,कौन कोई पाहुने हैं।

    ⁠ धनिया बिगड़ी-पाहुने और कैसे होते हैं! रोज़-रोज़ तो तुम्हारे द्वार पर नही आते? इतनी दूर से धूप-घाम में आये हैं, प्यास लगी ही होगी। रुपिया, देख डब्बे में तमाखू है कि नहीं, गोबर के मारे काहे को बची होगी। दौड़कर एक पैसे का तमाख सहुआइन की दुकान से ले ले।

    ⁠ भोला की आज जितनी खातिर हुई,और कभी न हुई होगी। गोबर ने खाट डाल दी,सोना रस घोल लायी,रूपा तमाखू भर लायी। धनिया द्वार पर किवाड़ की आड़ में खड़ी अपने कानों से अपना बखान मुनने के लिए अधीर हो रही थी।

    ⁠ भोला ने चिलम हाथ में लेकर कहा-अच्छी घरनी घर में आ जाय, तो समझ लो लक्ष्मी आ गयी। वही जानती है छोटे-बड़े का आदर-सत्कार कैसे करना चाहिए।

    ⁠ धनिया के हृदय में उल्लास का कम्पन हो रहा था। चिन्ता और निराशा और अभाव से आहत आत्मा इन शब्दों में एक कोमल शीतल स्पर्श का अनुभव कर रही थी।

    ⁠ होरी जब भोला का खाँचा उठाकर भूसा लाने अन्दर चला, तो धनिया भी पीछेपीछे चली। होरी ने कहा-जाने कहाँ से इतना बड़ा खाँचा मिल गया। किसी भड़भूजे से माँग लिया होगा। मन-भर से कम में न भरेगा। दो खाँचे भी दिये,तो दो मन निकल जायँगे।

    ⁠ धनिया फूली हुई थी। मलामत की आँखों से देखती हुई बोली–या तो किसी को नेवता न दो,और दो तो भरपेट खिलाओ। तुम्हारे पास फूल-पत्र लेने थोड़े ही आये है कि चेंगेरी लेकर चलते। देते ही हो,तो तीन खाँचे दे दो। भला आदमी लड़कों को क्यों नहीं लाया। अकेले कहाँ तक ढोयेगा। जान निकल जायगी।

    ⁠ 'तीन खाँचे तो मेरे दिये न दिये जायेंगे?'

    ⁠ 'तब क्या एक खाँचा देकर टालोगे? गोबर से कह दो, अपना खाँचा भरकर उनके साथ चला जाय।'

    ⁠ 'गोबर ऊख गोड़ने जा रहा है।'

    ⁠ 'एक दिन न गोड़ने से ऊख न सूख जायगी।'

    ⁠ 'यह तो उनका काम था कि किसी को अपने साथ ले लेते। भगवान के दिये दोदो बेटे हैं।'

    ⁠ 'न होंगे घर पर। दूध लेकर बाजार गये होंगे।'

    ⁠ 'यह तो अच्छी दिल्लगी है कि अपना माल भी दो और उसे घर तक पहुँचा भी दो। लाद दे, लदा दे, लादनेवाला साथ कर दे।'

    ⁠ 'अच्छा भाई, कोई मत जाय। मैं पहुँचा दूंगी। बड़ों की सेवा करने में लाज नहीं है।'

    ⁠ 'और तीन खाँचे उन्हें दे दूं,तो अपन वैल क्या खायेंगे?'

    ⁠ 'यह सब तो नेवता देने के पहले ही सोच लेना था। न हो, तुम और गोबर दोनों जने चले जाओ।

    ⁠ 'मुरौवत मुरौवत की तरह की जाती है, अपना घर उठाकर नहीं दे दिया जाता!'

    ⁠ 'अभी ज़मींदार का प्यादा आ जाय,तो अपने सिर पर भूसा लादकर पहुंचाओगे तुम,तुम्हारा लड़का,लड़की सब। और वहाँ साइत मन-दो-मन लकड़ी भी फाड़नी पड़े।'

    ⁠ 'ज़मींदार की बात और है।'

    साँचा:GaP 'हाँ,वह डंडे के ज़ोर से काम लेता है न।'

    ⁠ 'उसके खेत नहीं जोतते?'

    ⁠ 'खेत जोतते हैं,तो लगान नहीं देते?'

    ⁠ 'अच्छा भाई,जान न खा,हम दोनों चले जायेंगे। कहाँ-से-कहाँ मैंने इन्हें मूसा देने को कह दिया। या तो चलेगी नहीं,या चलेगी तो दौड़ने लगेगी।'

    ⁠ तीनों खाँचे भूसे से भर दिये गये। गोवर कुढ़ रहा था। उसे अपने बाप के व्यवहारों में ज़रा भी विश्वास न था। वह समझता था, यह जहाँ जाते हैं, वहीं कुछन-कुछ घर से खो आते है। धनिया प्रसन्न थी। रहा होरी, वह धर्म और स्वार्थ के बीच में डूब-उतरा रहा था।

    ⁠ होरी और गोबर मिलकर एक खाँचा बाहर लाये। भोला ने तुरन्त अपने अंगौछे का वीड़ बनाकर सिर पर रखते हुए कहा–मैं इसे रखकर अभी भागा आता हूँ। एक खाँचा और लूंगा।

    ⁠ होरी वोला-एक नहीं, अभी दो और भरे धरे हैं। और तुम्हें न आना पड़ेगा। मै और गोबर एक-एक खाँचा लेकर तुम्हारे साथ ही चलते हैं।

    ⁠ भोला स्तम्भित हो गया। होरी उसे अपना भाई बल्कि उससे भी निकट जान पड़ा। उसे अपने भीतर एक ऐसी तृप्ति का अनुभव हुआ, जिसने मानो उसके संपूर्ण जीवन को हरा कर दिया।

    ⁠ तीनों भूसा लेकर चले,तो राह में बातें होने लगीं।

    ⁠ भोला ने पूछा-दशहरा आ रहा है,मालिकों के द्वार पर तो बड़ी धूमधाम होगी?

    ⁠ 'हाँ,तम्बू सामियाना गड़ गया है। अब की लीला में मैं भी काम करूंगा। राय साहब ने कहा है,तुम्हें राजा जनक का माली बनना पड़ेगा।'

    ⁠ 'मालिक तुमसे बहुत खुश हैं।'

    ⁠ 'उनकी दया है।'

    ⁠ एक क्षण के बाद भोला ने फिर पूछा-सगुन करने के लिए रुपए का कुछ जुगाड़ कर लिया है? माली बन जाने से तो गला न छूटेगा।

    ⁠ होरी ने मुंह का पसीना पोंछकर कहा-उसी की चिन्ता तो मारे डालती है दादा!अनाज तो सब-का-सब खलिहान में ही तुल गया। ज़मींदार ने अपना लिया,महाजन ने अपना लिया। मेरे लिए पाँच सेर अनाज बच रहा। यह भूसा तो मैने रातोंरात ढोकर छिपा दिया था,नहीं तिनका भी न बचता। जमींदार तो एक ही है। मगर महाजन तीनतीन हैं,सहुआइन अलग,मॅगरू अलग और दातादीन पण्डित अलग। किसी का व्याज भी पूरा न चुका। जमींदार के भी आधे रुपए बाकी पड़ गये। सहुआइन से फिर रुपए उधार लिये तो काम चला। सब तरह किफायत कर के देख लिया भैया,कुछ नहीं होता। हमारा जनम इसी लिए हुआ है कि अपना रक्त वहायें और वड़ों का घर भरें। मूलका दुगना सूद भर चुका;पर मूल ज्यों-का-त्यों सिर पर सवार है। लोग कहते हैं, सर्दी-गर्मी में, तीरथ-बरत में हाथ बाँधकर खरच करो। मुदा रास्ता कोई नहीं दिखाता। राय साहब ने बेटे के व्याह में बीस हजार लुटा दिये। उनसे कोई कुछ नहीं कहता। मंगरू ने अपने वाप के क्रिया-करम में पाँच हजार लगाये। उनसे कोई कुछ नहीं पूछता। वैसा ही मरजाद तो सबका है।

    ⁠ भोला ने करुण भाव से कहा-बड़े आदमियों की वरावरी तुम कैसे कर सकते हो भाई?

    ⁠ 'आदमी तो हम भी है।'

    ⁠ 'कौन कहता है कि हम तुम आदमी है। हममें आदमियत कहाँ?आदमी वह हैं,जिनके पास धन है,अख्तियार है, इलम है,हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं। उसपर एक दूसरे को देख नहीं सकता। एका का नाम नहीं। एक किमान दूसरे के खेत पर न चढ़े तो कोई जाफा कैसे करे,प्रेम तो संसार से उठ गया।'

    ⁠ बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता। दोनों मित्र अपने-अपने दुखड़े रोते रहे। भोला ने अपने बेटों के करतूत सुनाये, होरी ने अपने भाइयों का रोना रोया और तब एक कुएँ पर बोझ रखकर पानी पीने के लिए बैठ गये। गोवर ने बनिये से लोटा माँगा और पानी खींचने लगा।

    ⁠ भोला ने सहृदयता से पूछा-अलगौझे के समय तो तुम्हें बड़ा रंज हुआ होगा। भाइयों को तो तुमने बेटों की तरह पाला था।

    ⁠ होरी आर्द्र कण्ठ से बोला-कुछ न पूछो दादा,यही जी चाहता था कि कहीं जाके डूब मरूँ। मेरे जीते जी सब कुछ हो गया। जिनके पीछे अपनी जवानी धूल में मिला दी वही मेरे मुद्दई हो गये और झगड़े की जड़ क्या थी?यही कि मेरी घरवाली हार में काम करने क्यों नहीं जाती। पूछो,घर देखनेवाला भी कोई चाहिए कि नहीं। लेना-देना, धरना-उठाना,सँभालना-सहेजना,यह कौन करे। फिर वह घर बैठी तो नहीं रहती थी, झाड़-बुहारू, रसोई, चौका-बरतन, लड़कों की देख-भाल यह कोई थोड़ा काम है। सोभा की औरत घर सँभाल लेती कि हीरा की औरत में यह सलीका था? जब से अलगौझा हुआ है,दोनों घरों में एक जून रोटी पकती है। नहीं सब को दिन में चार बार भूख लगती थी। अब खायें चार दफ़े, तो देखू। इस मालिकपन में गोबर की माँ की जो दुर्गती हुई है, वह मै ही जानता हूँ। बेचारी अपनी देवरानियों के फटे-पुराने कपड़े पहनकर दिन काटती थी,खुद भूखी सो रही होगी;लेकिन बहुओं के लिए जलपान तक का ध्यान रखती थी। अपनी देह पर गहने के नाम कच्चा धागा भी न था, देवरानियों के लिए दोदो चार-चार गहने बनवा दिये। सोने के न सही चाँदी के तो हैं। जलन यही थी कि यह मालिक क्यों है। बहुत अच्छा हुआ कि अलग हो गये। मेरे सिर से बला टली।

    ⁠ भोला ने एक लोटा पानी चढाकर कहा-यही हाल घर-घर है भैया! भाइयों की बात ही क्या,यहाँ तो लड़कों से भी नहीं पटती और पटती इसीलिए नहीं कि मैं किसी की कुचाल देखकर मुंह नहीं बन्द कर सकता। तुम जुआ खेलोगे, चरस पीओगे, गाँजे के दम लगाओगे, मगर आये किसके घर से? खरचा करना चाहते हो तो कमाओ;मगर कमाई तो किसी से न होगी। खरच दिल खोलकर करेंगे। जेठा कामता सौदा लेकर वाजार जायगा, तो आधे पैसे गायब। पूछो तो कोई जवाब नहीं। छोटा जंगी है,वह संगत के पीछे मतवाला रहता है। साँझ हुई और ढोल-मजीरा लेकर बैठ गये। संगत को मैं बरा नहीं कहता। गाना-बजाना ऐब नही; लेकिन यह सब काम फरसत के है। यह नहीं कि घर का तो कोई काम न करो,आठों पहर उसी धुन में पड़े रहो। जाती है मेरे सिर;सानी-पानी मैं करूँ,गाय-भैस मै दुहूँ, दूध लेकर बाजार मै जाऊँ। यह गृहस्थी जी का जंजाल है,सोने की हँसिया,जिसे न उगलते बनता है,न निगलते। लड़की है,झुनिया,वह भी नसीब की खोटी। तुम तो उसकी सगाई में आये थे। कितना अच्छा घरवर था। उसका आदमी बम्बई में दूध की दूकान करता था। उन दिनों वहाँ हिन्दूमुसलमानों में दंगा हुआ, तो किसी ने उसके पेट में छूरा भोंक दिया। घर ही चौपट हो गया। वहाँ अब उसका निवाह नहीं। जाकर लिवा लाया कि दूसरी सगाई कर दूंगा; मगर वह राजी ही नहीं होती। और दोनों भावजें हैं कि रात-दिन उसे जलाती रहती है। घर में महाभारत मचा रहता है। विपत की मारी यहाँ आई, यहाँ भी चैन नही।

    ⁠ इन्ही दुखड़ों मे रास्ता कट गया। भोला का पुरवा था तो छोटा; मगर बहुत गुलजार। अधिकतर अहीर ही वसते थे।और किसानों के देखते इनकी दशा बहुत बुरी न थी। भोला गाँव का मुखिया था। द्वार पर बड़ी-सी चरनी थी जिस पर दस-बारह गाय-भैसें खड़ी सानी खा रही थी। ओसारे में एक बड़ा-सा तख्त पड़ा था जो शायद दस आदमियों से भी न उठता। किसी खूटी पर ढोलक लटक रही थी किसी पर मजीरा। एक ताख पर कोई पुस्तक बस्ते में बँधी रखी हुई थी, जो शायद रामायण हो। दोनों बहुएँ सामने बैठी गोबर पाथ रही थीं और झुनिया चौखट पर खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं और नाक के सिरे पर भी सुीं थी। मालूम होता था,अभी रोकर उठी है।उसके मांसल,स्वस्थ,सुगठित अंगों में मानो यौवन लहरें मार रहा था। मुंह बड़ा और गोल था,कपोल फूले हुए,आँखें छोटी और भीतर घुसी हुई,माथा पतला;पर वक्ष का उभार और गात का वही गुदगुदापन आँखों को खींचता था। उस पर छपी हुई गुलाबी साड़ी उसे और भी शोभा प्रदान कर रही थी।

    ⁠ भोला को देखते ही उसने लपककर उनके सिर से खाँचा उतरवाया। भोला ने गोवर और होरी के खाँचे उतरवाये और झुनिया से बोले-पहले एक चिलम भर ला, फिर थोड़ा-सा रस बना ले। पानी न हो तो गगरा ला,मैं खींच दूं। होरी महतो को पहचानती है न?

    ⁠ फिर होरी से बोला-घरनी के बिना घर नहीं रहता भैया। पुरानी कहावत है– नाटन खेती वहुरियन घर। नाटे बैल क्या खेती करेंगे और बहुएँ क्या घर सँभालेंगी। जव से इसकी माँ मरी है, जैसे घर की बरकत ही उठ गयी। बहुएँ आटा पाथ लेती है। पर गृहस्थी चलाना क्या जानें। हाँ, मुँह चलाना खूब जानती हैं। लौंडे कहीं फड़ पर जमे होंगे। सब-के-सब आलसी हैं,कामचोर। जब तक जीता हूँ, इनके पीछे मरता हूँ। मर जाऊँगा,तो आप सिर पर हाथ धरकर रोयेंगे। लड़की भी वैसी ही है। छोटा-सा अढ़ौना भी करेगी,तो भुन-भुनाकर। मैं तो सह लेता हूँ,खसम थोड़े ही सहेगा।

    ⁠ झुनिया एक हाथ में भरी हुई चिलम, दूसरे में लोटे का रस लिये बड़ी फुर्ती से आ पहुँची। फिर रस्सी और कलसा लेकर पानी भरने चली। गोबर ने उसके हाथ से कलसा लेने के लिए हाथ बढ़ाकर झेंपते हुए कहा–तुम रहने दो,मैं भरे लाता हूँ।

    ⁠ झुनिया ने कलसा न दिया। कुएँ के जगत पर जाकर मुस्कराती हुई बोली–तुम हमारे मेहमान हो। कहोगे एक लोटा पानी भी किसी ने न दिया।

    ⁠ 'मेहमान काहे से हो गया। तुम्हारा पड़ोसी ही तो हूँ।'

    ⁠ 'पड़ोसी साल-भर में एक बार भी सूरत न दिखाये, तो मेहमान ही है।'

    ⁠ 'रोज-रोज आने से मरजाद भी तो नहीं रहती।'

    ⁠ झुनिया हँसकर तिरछी नजरों से देखती हुई बोली–वही मरजाद तो दे रही हूँ। महीने में एक बेर आओगे,ठण्डा पानी दूंगी। पन्द्रहवें दिन आओगे, चिलम पाओगे। सातवें दिन आओगे, खाली बैठने को माची दूंगी। रोज-रोज आओगे,कुछ न पाओगे।

    ⁠ 'दरसन तो दोगी?'

    ⁠ 'दरसन के लिए पूजा करनी पड़ेगी।'

    ⁠ यह कहते-कहते जैसे उसे कोई भूली हुई बात याद आ गयी। उसका मुंह उदास हो गया। वह विधवा है। उसके नारीत्व के द्वार पर पहले उसका पति रक्षक बना बैठा रहता था। वह निश्चिन्त थी। अब उस द्वार पर कोई रक्षक न था,इसलिए वह उस द्वार को सदैव बन्द रखती है। कभी-कभी घर के सूनेपन से उकताकर वह द्वार खोलती है;पर किसी को आते देखकर भयभीत होकर दोनों पट भेड़ लेती है। ⁠ गोबर ने कलसा भरकर निकाला। सबों ने रस पिया और एक चिलम तमाखू और पीकर लौटे। भोला ने कहा–कल तुम आकर गाय ले जाना गोबर,इस बखत तो सानी खा रही है।

    ⁠ गोवर की आँखें उसी गाय पर लगी हुई थीं और मन-ही-मन वह मुग्ध हुआ जाता था। गाय इतनी सुन्दर और मुडौल है,इसकी उसने कल्पना भी न की थी।

    ⁠ होरी ने लोभ को रोककर कहा–मंगवा लूंगा, जल्दी क्या है?

    ⁠ 'तुम्हें जल्दी न हो,हमें तो जल्दी है। उसे द्वार पर देखकर तुम्हें वह वात याद रहेगी।'

    ⁠ 'उमकी मुझे बड़ी फिकर है दादा!'

    ⁠ 'तो कल गोबर को भेज देना।'

    ⁠ दोनों ने अपने-अपने खाँचे सिर पर रखे और आगे बढ़े। दोनों इतने प्रसन्न थे मानो व्याह करके लौटे हों। होरी को तो अपनी चिर संचित अभिलापा के पूरे होने का हर्ष था,और विना पैसे के। गोवर को इससे भी बहुमूल्य वस्तु मिल गयी थी। उसके मन में अभिलापा जाग उठी थी।

  • गल्प समुच्चय

    गल्प समुच्चय

    Aproximadamente 103.452 palavras.

    गल्प समुच्चय
    https://hi.wikisource.org/wiki/गल्प_समुच्चय

    १—पं॰ ज्वालादत्त शर्मा

    आप मुरादाबाद के निवासी हैं। संस्कृत, फ़ारसी और उर्दू के अच्छे ज्ञाता हैं। आपने उर्दू के कई सुविख्यात कवियों पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं। आप की वर्णन-शैली और भाषा सरस है।

    २—महाशय सुदर्शन

    आप पंजाब के निवासी हैं। आप कई समाचार-पत्रों का सम्पादन भी कर चुके हैं। आपका हिन्दी और उर्दू-दोनों ही भाषाओं—पर अधिकार है। आपके गल्प बड़ें मनोरंजक, शिक्षाप्रद और भाव-पूर्ण होते हैं। आपके गल्पों के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आप अच्छे नाट्यकार भी हैं। आपको दो बार "पंजाब टेक्स्ट-बुक कमेटी" से पुरस्कार मिल चुके हैं। आपकी शैली बड़ी मर्म-स्पर्शी तथा लालित्य-पूर्ण है। मनोभावों का चित्रण करने में आप निपुण हैं।

    ३-पं० चतुरसेन शास्त्री

    आप देहली के निवासी हैं। आपकी रचनायें अधिकतर गद्यकाव्य-मयी होती हैं, माधुर्य में डूबी हुई। मनोभावों का विश्लेषण करने में आप सिद्ध-हस्त हैं। आपकी भाषा बहुत परिमार्जित और भाव श्रृङ्गार-मय होते हैं। 'अन्तस्तल' आपका एक गद्य-काव्य है। "हृदय की प्यास" नाम का रोचक उपन्यास भी आपने लिखा है।

    ४—श्रीप्रेमचन्द

    आप काशी के रहने वाले हैं। आपने कानपुर के उर्दू-पत्र "ज़माना" में लेख लिखना शुरू किया। आपकी "प्रेम-पच्चीसी" और “सोज़ेवतन" यह दोनों प्रथम ज़माना ही से प्रकाशित हुई। सन् १९१४ से आप हिन्दी में लिख रहे हैं। आपके कई उपन्यास "सेवा-सदन", "वरदान", "काया- कल्प", "प्रेमाश्रम", "रंगभूमि", "प्रतिज्ञा" तथा "ग़बन" आदि प्रसिद्ध हो चुके हैं। आपकी कहानियों के कई संग्रह निकल चुके हैं-"प्रेम-प्रतिमा", "प्रेम-पूर्णिमा", "प्रेम-पञ्चीसी", "प्रेम-प्रसून", "प्रेमतीर्थ”, “सप्त-सरोज", "नव-निधि", "पाँच फूल", "सप्त सुमन", "प्रेम कुंज" आदि। आपकी दो-चार गल्पों के अनुवाद जापानी तथा अंग्रेजी भाषा में भी निकल चुके हैं। आप 'माधुरी' के संयुक्तसम्पादक तो वर्षों रहे ही हैं, इधर 'हंस' का सम्पादन भी बड़ी ही योग्यता से कर रहे हैं। (रामदासगौड़)

    ५—श्रीपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी बी॰ ए॰

    आप मध्यप्रदेश के निवासी और प्रसिद्ध मासिक-पत्रिका 'सरस्वती' के सम्पादक हैं। आपकी शैली बहुत ही प्रौढ़ विचार-शील और कटाक्ष-पूर्ण है। आपने प्राच्य और पाश्चात्य-साहित्य का गहरा अध्ययन किया है। 'साहित्य-विमर्श' में आपने संसार-साहित्य की मार्मिक विवेचना की है। आप सुकवि भी हैं।

    ६—पं॰ विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

    आप कानपूर के निवासी हैं। आपकी कहानियाँ प्रायः हिन्दी-मासिक-पत्रिकाओं में निकलती रहती हैं। 'गल्प-मन्दिर' और 'चित्रशाला'——ये दो संग्रह आपकी कहानियों के प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आपने 'मनोरंजन' मासिक-पत्र का बड़ी योग्यता से सम्पादन किया। आपकी कहानियों में बहुधा निम्न-श्रेणी के चरित्रों का चित्रण होता है। आपकी कला की विशेषता संभाषण है। संभाषणों-द्वारा ही आपने कई ड्रामे लिखे हैं। आपका एक उपन्यास धारा-वाहिक रूप में 'सुधा' में निकला था, जो अब पुस्तक रूप में भी छप गया।

    ७—श्रीशिवपूजन सहाय

    आप बिहार के निवासी हैं। आपकी भाषा माधुर्य से परिपूर्ण होती है। आप सच्चे कलाविद् की भाँति भापा को खूब अलंकृत करते हैं। आपकी कई पुस्तकें—'महिला-महत्व' 'देहाती दुनिया' आदि—प्रकाशित हो चुकी हैं। पहले आपने 'बालक' का सम्पादन बड़ी योग्यता से किया, अब 'गंगा' का सम्पादन करते हैं।

    ८–श्रीचण्डीप्रसाद, बी० ए० 'हदयेश'

    आप पीलीभीत के निवासी थे। आपके देहावसान को तीन वर्ष हो गये। आप सानुप्रास भाषा लिखते थे। आपकी लेखन-शैली मधुर और चरित्र-चित्रण आकर्षक होता था। यदि आप कुछ काल तक और जीवित रहते, तो हिन्दी-साहित्य में एक विशिष्ट धारा प्रवाहित कर जाते। आपके 'मंगल-प्रभात' और 'मनोरमा' आदि उपन्यास तथा 'नन्दन-निकुञ्ज' आदि गल्प-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आप 'चाँद' के सहकारी संपादक भी रह चुके हैं। कविताएँ भी आप अच्छी लिख लेते थे।

    ९-श्रीराजेश्वरप्रसादसिंह

    आप प्रयाग के रहनेवाले हैं। पहले आप 'लीडर' के कार्यालय में काम करते थे। अब स्वतंत्र रूप से साहित्य-सेवा करते हैं। आपकी कहानियाँ समाज की दुर्बलताओं पर आधारित होती हैं। आपकी शैली में दार्शनिक विचारों का अच्छा सम्मिश्रण होता है। आप अंग्रेजी में भो लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं।

    (१) शतरंज के खिलाड़ी

    ______

    ( १ )

    वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विला-सिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था। शासन-विभाग में, साहित्य- क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला-कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी। राज-कर्मचारी विषय-वासना में, कवि-गण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में, व्यवसायी सुरमे, इत्र, मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में, लिप्त थे। सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे हैं; तीतरों की लड़ाई के लिये पाली बदी जा रही है। कहीं चौसर बिछी हुई है; पौ-बारह का शोर मचा हुआ है। कहीं शतरंज

    का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर रंक तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते, तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते। सतरंज, ताश, गंजीफ़ा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है। ये दलीलें जोरों के साथ पेश की जाती थीं (इस सम्प्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है) इस लिए अगर मिरजा सज्जादअली और मीर रौशनअली अपना अधिकांश समय बुद्धि तीव्र करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशील पुरुष को क्या आपत्ति हो सकती थी? दोनों के पास मौरूसी जागीरें थीं; जविका को कोई चिन्ता न थी; घर में बैठे चखौतियाँ करते थे। आखिर और करते ही क्या? प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके विसात बिछाकर बैठ जाते, मुहरे सज जाते, और लड़ाई के दाव पेंच होने लगते। फिर खबर न होती थी कि कब दोपहर हुई, कब तीसरा पहर, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा आता कि खाना तैयार है। यहाँ से जवाब मिलता-चलो, आते हैं; दस्तरख्वान बिछाओ। यहाँ तक कि बावरची विवश होकर कमरे ही में खाना रख जाता था। और दोनों मित्र दोनों काम साथ-साथ करते थे। मिरजा सज्जादअली के घर में कोई बड़ा-बूढ़ा न था, इसलिए उन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ होती थीं; मगर यह बात न थी कि मिरजा के घर के और लोग उनके इस व्यवहार से खुश हों। घरवालों का तो कहना ही क्या, महल्लेवाले, घर के नौकर

    चाकर तक नित्य द्वेष-चूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे-बड़ा मनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे, किसी को इसकी चाट पड़े, आदमी दीन दुनिया किसी के काम का नहीं रहता। न घर का न घाट का। बुरा रोग है। यहाँ तक कि मिरजा की बेगम साहब को इससे इतना द्वेष था कि अवसर खोज-खोज कर पति को लताड़ती थीं; पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था। वह सोती ही रहती थीं, तब तक उधर बाजी बिछ जाती थी। और रात को जब सो जाती थीं, तब कहीं मिरेजाजी घर में आते थे। हाँ नौकरों पर वह अपना गुस्सा उतारती रहती थीं-क्या पान मांगे हैं? कह दो आकर ले जायें। खाने की फुरसत नहीं है? ले जाकर खाना सिर पर पटक दो, खायें चाहे कुत्ते को खिलावें। पर दूबदू वह भी कुछ न कह सकती थीं। उनको अपने पति से उतना मलाल न था, जितना मीरसाहब से। उन्होंने उनका नाम मीर बिगाड़ू रख छोड़ा था। शायद मिरजाजी अपनी सफाई देने के लिए सारा इलजाम मीरसाहब ही के सिर थोप देते थे।

    एक दिन बेगम साहबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौंडी से कहा-जाकर मिरजासाहब को बुला ला। किसी हकीम के यहाँ से दवा लावें। दौड़ जल्दी कर। लौंडी गई, तो मिरजाजी ने कहा-चल अभी आते हैं। बेगम साहबा का मिज़ाज़ गरम था। इतनी ताब कहाँ कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरंज खेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौंडी से कहा-जाकर

    कह, अभी चलिए, नहीं तो वह आपही हकीम के यहाँ चली जायँगी।

    मिरजाजी बड़ी दिलचस्पी बाजी खेल रहे थे, दो ही किस्तों में मिरसाहब को मात हुई जाती थी। झुँझलाकर बोले- क्या ऐसे दम लबों पर है? जरा सब्र नहीं होता?

    मीर-अरे तो जाकर सुन हो आइए न। औरतें नाजुक मिज़ाज़ होती ही हैं।

    मिरजा-जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ! दो किस्तों में आपकी मात होती है।

    मीर-जनाब इस भरोसे न रहियेगा। वह चाल सोची है कि आपके मुहरे धरे रहें और मात हो जाय; पर जाइये सुन आइए। क्यों खामख्वाह उनका दिल दुखाइएगा?

    मिरजा इसी बात पर मात ही करके जाऊँगा।

    मीर-मैं खोलूगा ही नहीं। आप जाकर सुन आइए।

    मिरजा-अरे यार, जाना पड़ेगा हकीम के यहाँ। सिर-दर्द खाक नहीं है; मुझे परेशान करने का बहाना है।

    मीर-कुछ ही हो, उनकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी।

    मिरजा-अच्छा, एक चाल और चल लूँ।

    मीर-हरगिज़ नहीं, जब तक आप सुन न आवेंगे, मैं मुहरे में हाथ ही न लगाऊँगा।

    मीरजा साहब मजबूर होकर अन्दर गये, तो बेगम साहबा ने त्यौरियाँ बदल कर; लेकिन कराहते हुए कहा-तुम्हें निगोड़ी शत-

    रंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर ही जाय; पर उठने का नाम नहीं लेते! नौज कोई तुम-जैसा आदमी हो!

    मिरजा-क्या कहूँ, मीरसाहब मानते ही न थे। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाकर आया हूँ।

    बेगम-क्या जैसे वह खुद निखट्टू हैं, वैसे ही सबको समझते हैं? उनके भी तो बाल-बच्चे हैं, या सबका सफाया कर डाला?

    मिरजा-बड़ा लती आदमी है। जब आ जाता है, तब मजबूर होकर मुझे भी खेलना ही पड़ता है।

    बेगम-दुत्कार क्यों नहीं देते?

    मिरजा-बराबर के आदमी हैं, उम्र में, दर्जे में मुझसे दो अङ्गुल ऊँचे। मुलाहिजा करना ही पड़ता है।

    बेगम-तो मैं ही दुत्कारे देती हूँ। नाराज़ हो जायेंगे, हो जायें। कौन किसी की रोटियाँ चला देता है। रानी रूठेंगी, अपना सुहाग लेंगी।—-हिरिया, जा, बाहर से शतरंज उठा ला। मीरसाहब से कहना, मियाँ अब न खेलेंगे, आप तशरीफ़ ले जाइये!

    मिरजा– हाँ हाँ, कहीं ऐसा ग़ज़ब भी न करना! जलील कराना चाहती हो क्या!– ठहर हिरिया, कहाँ जाती है।

    बेगम–जाने क्यों नहीं देते! मेरा ही खून पिये, जो उसे रोके। अच्छा, उसे रोका, मुझे रोको तो जानू!

    यह कहकर बेगम साहबा झल्लाई हुई दीवानखाने की तरफ़ चलीं। मिरजा बेचारे का रंग उड़ गया। बीवी की मिन्नतें करने लगे-खुदा के लिए, तुम्हें हज़रत हुसेन की क़सम है। मेरी ही

    मैयत देखे, जो उधर जाय; लेकिन बेगम ने एक दीवानखाने के द्वार तक गई; पर एकाएक पर पुरुष के सामने जाते हुए पाँव बंध-से गये। भीतर झांका। संयोग से कमरा खाली था। मीरसाहब ने दो-एक मुहरे इधर-उधर कर दिए थे, और अपनी सफ़ाई जताने के लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, बेगम ने अन्दर पहुँचकर बाजी उलट दी, मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिए, कुछ बाहर और किवाड़े अन्दर से बन्द करके कुंडी लगा दी। मीरसाहब दरवाजे पर थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की झनक कान में पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गए, बेगम साहबा बिगड़ गई। चुपके से घर की राह ली।

    मिरजा ने कहा——तुमने ग़ज़ब किय !

    बेगम——अब मीरसाहब इधर आये, तो खड़े-खड़े निकलवा दूंगी। इतनी लौ खुदा से लगाते, तो वली हो जाते। आप तो शतरंज खेलें, और मैं यहाँ चूल्हे-चक्की की फ़िक्र में सिर खपाऊँ! ले जाते हो हकीम साहब के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है?

    मिरजा घर से निकले, तो हकीम के घर जाने के बदले मीर साहब के घर पहुँचे, और सारा वृत्तान्त कहा। मीरसाहब बोले——मैने तो जब मुहरे बाहर आते देखे, तभी ताड़ गया। फौरन् भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती है; मगर आपने उन्हें यों सिर चढ़ा रक्खा है, यह मुनासिब नहीं। उन्हें इससे क्या मतलब कि आप बाहर क्या करते हैं। इन्तजाम करना उनका काम है, दूसरी बातों से उन्हें क्या सरोकार? मिरजा––ख़ैर, यह तो बताइए, अब कहाँ जमाव होगा?

    मीर––इसका क्या ग़म है। इतना बड़ा घर पड़ा हुआ है। बस, यहीं जमे।

    मिरजा––लेकिन बेगम साहबा को कैसे मनाऊँगा? जब घर पर बैठा रहता था, तब तो वह इतना बिगड़ती थीं; यहाँ बैठक होगी, तो शायद जिन्दा न छोड़ेंगी।

    मीर––अजी बकने भी दीजिए; दो-चार रोज़ में आप ही ठीक हो जायेंगी। हाँ, आप इतना कीजिए कि आज से ज़रा तन जाइए।

    ( २ )

    मीरसाहब को बेगम किसी अज्ञात कारण से मीरसाहब का घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझती थी; इसलिए वह उनके शतरंज-प्रेम की कभी आलोचना न करती थीं; बल्कि कभी-कभी मीर- साहब को देर हो जाती, तो याद दिला देती थीं। इन कारणों से मीरसाहब को भ्रम हो गया था, कि मेरी स्त्री अत्यंत विनयशील और गम्भीर है; लेकिन जब दीवानखाने में बिसात बिछने लगी, और मीरसाहब दिन-भर घर में रहने लगे, तो बेगम साहबा को बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड़ गई। दिनभर दरवाजे पर झाँकने को तरस जाती।

    उधर नौकरों में भी कानाफूसी होने लगी। अब तक दिन-भर पड़े-पड़े, मक्खियो मारा करते थे। घर में कोई आवे, कोई जाय, उनले कुछ मतलब न था। अब आठों पहर की धौंस हो गई। कभी पान लाने का हुक्म होता। कभी मिठाई का। और, हुक्का तो किसी प्रेमी के हृदय की भाँति जलता ही रहता था। वे बेगम साहबा से जा-जाकर कहते––हुजूर, मियाँ की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गई! दिन-भर दौड़ते-दौड़ते पैरों में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे तो शाम कर दी! घड़ी-आध घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमें तो कोई शिकायत नहीं, हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा, बजा ही लावेंगे; मगर यह खेल मनहूस है। इसका खेलनेवाला कभी पनपता नहीं; घर पर कोई न कोई आफ़त ज़रूर आती है। यहाँ तक कि एक के पीछे महल्ले के महल्ले तबाह होते देखे गये है। सारे महल्ले में यही चरचा होती रहती है। हुजूर का नमक खाते है, अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज हाता है; मगर क्या करें। इस पर बेगम साहबा कहती-मै तो खुद इसको पसन्द नहीं करती; पर वह किसी को सुनते ही नहीं, तो क्या किया जाय।

    महल्ले मे भी जो दो-चार पुराने ज़माने के लोग थे, वे आपस में भाँति-भाँति के अमङ्गल की कल्पनाएं करने लगे-अब खैरियत नहीं है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल्क का खुदा ही हाफ़िज़ है। यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगा। आसार बुरे हैं।

    राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फ़रियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी

    दौलत लखनऊ में खिंची आती थी, और वह वेश्याओं में, भाँड़ों में, ओर विलासिता के अन्य अङ्गों को पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज़-कम्पनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता था। कमली दिन-दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार-बार चेतावनी देता था; पर यहाँ तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे; किसी के कानों पर जूं न रेंगती थी।

    खैर, मीरसाहब के दीवानखाने में शतरंज होते कई महीने गुज़र गये। नये-नये नक्शे हल किये जाते, नये-नये किले बनाये जाते, नित्य नई व्यूह-रचना होती, कभी-कभी खेलते-खेलते झौड़ हो जाती, तू-तू मैं-मैं तक की नौबत आ जाती; पर शीघ्र ही दोनों मित्रों में मेल हो जाता। कभी -कभी ऐसा भी होता, कि बाज़ी उठा दी जाती, मिरजा जी रूठकर अपने घर चले आते। मीर- साहब अपने घर में जा बैठते; पर रात-भर को निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्य शान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनों मित्र दीवानखाने में आ पहुँचते थे।

    एक दिन दोनों मित्र बैठे हुए शतरंज के दल-दल में ग़ोते खा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफ़सर मीरसाहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा! मीरसाहब के होश उड़ गये! यह क्या बला सिर पर आई! यह तलबी किस लिए हुई है! अब खैरियत नहीं नज़र आती ! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकरों से बोले-कह दो, घर में नहीं हैं। सवार––घर में नहीं, तो कहाँ है?

    नौकर––यह मैं नहीं जानता। क्या काम है?

    सवार––काम तुझे क्या बतलाऊँ? हुजूर में तलबी है––शायद फ़ौज के लिए कुछ सिपाही मांगे गये हैं। जागीरदार हैं कि दिल्लगी! मोरचे पर जाना पड़ेगा, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा!

    नौकर––अच्छा, तो जाइए, कह दिया जायगा।

    सवार––कहने की बात नहीं है। मैं कल खुद आऊँगा, साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

    सवार चला गया। मीरसाहब की आत्मा काँप उठी।

    मिरजाजी से बोले––कहिए जनाब अब क्या होगा?

    मिरजा––बड़ी मुसीबत है कहीं मेरी तलबी भी न हो।

    मीर––कम्बख्त कल फिर आने को कह गया है।

    मिरजा––आफत है और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो बे-मौत मरे।

    मीर––बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलो ही नहीं। कल से गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। वहाँ किसे खबर होगी। हज़रत आकर आप लौट जाँयगे।

    मिरजा––वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा और कोई तदबीर ही नहीं है।

    इधर मीरसाहब की बेगम उस सवार से कह रही थीं, तुमने खूब धता बताई। उसने जवाब दिया-ऐसे गावदियों को तो

    चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चर ली। अब भूलकर भी घर पर न रहेंगे।

    ( ३ )

    दूसरे दिन से दोनों मित्र मुँह-अँधेरे घर से निकल खड़े होते। बग़ल में एक छोटी-सी दरी दबाये, डिब्बे में गिलौरियाँ भरे, गोमती-पार की एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफ़उद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम और मदरिया ले लेते और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भरकर शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फ़िक्र न रहती थी। किश्त, शह आदि दो-एक शब्दों के सिवा उनके मुंह से और कोई वाक्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता होगा। दोपहर को जब भूख मालूम होती, तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना खा आते, और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम-क्षेत्र में डट जाते। कभी-कभी तो उन्हें भोजन का भी ख्याल न रहता था।

    इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फौजें लखनऊ की तरफ़ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हल-चल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे; पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी ज़रा भी फ़िक्र न थी। वे घर से आते, तो गलियों में होकर। डर था, कि कहीं किसी बादशाही मुलाज़िम की निगाह न पड़ जाय, जो

    बेगार में पकड़ जायें। हजारों रुपये सालाना की जागीर मुफ्त ही में हज़म करना चाहते थे।

    एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिरजा की बाज़ी कुछ कमजोर थी। मीरसाहब उन्हें किश्त-पर-किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिये। यह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार ज़माने के लिये आ रही थी।

    मीरसाहब बोले––अंगरेजी फ़ौज आ रही है; खुदा खैर करे।

    मिरजा––आने दीजिये, किश्त बचाइये। यह किश्त!

    मीर––ज़रा देखना चाहिए, यहीं आड़ में खड़े हो जायं।

    मिरजा––देख लीजियेगा, जल्दी क्या है, किश्त!

    मीर––तोपखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे-कैसे जवान हैं! लाल बन्दरों के-से मुँह। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

    मिरजा––जनाब, हीले न कीजिये। ये चकमे किसी और को दीजियेगा, यह किश्त!

    मीर––आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत आई हुई है, और आपको किश्त की सूझी है! कुछ इसकी भी खबर है, कि शहर घिर गया, तो घर कैसे चलेंगे?

    मिरजा––जब घर चलने का वक्त आएगा, तो देखी जायगी––यह किश्त! बस, अबकी शह में मात है।

    फौज़ निकल गई। दस बजे का समय था। फिर बाज़ी बिछ गई। मिरजा बोले––आज खाने की कैसे ठहरेगी?

    मीर––अजी, आज तो रोज़ा है। क्या आपको ज्यादा भूख मालूम होती है?

    मिरजा––जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।

    मीर––शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना-खा-कर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।

    दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे, तो तीन बज गये। अबकी मिरजाजी की बाज़ी कमज़ोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज़ का वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली पकड़ लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आजतक किमी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से, इस तरह खून बहे बिना, न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नीद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

    मिरजा ने कहा–– हुजूर नवाबसाहब को जालिमों ने क़ैद कर लिया है।

    मीर––होगा, यह लीजिये शह!

    मिरजा––जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत

    नहीं लगती। बेचारे नवाबसाहब इस वक्त़ खून के आँसू रो रहे होंगे।

    मीर––रोया ही चाहें। यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा–– यह किश्त!

    मिरजा––किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।

    मीर––हाँ सो तो है ही—–यह लो फिर किश्त! बस, अबकी किश्त में मात है, बच नहीं सकते।

    मिरजा––खुदा की कसम, आप बड़े बेदर्द हैं। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दु:ख नहीं होता। हाय, ग़रीब वाजिदअली शाह!

    मीर––पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब-साहब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात! लाना हाथ!

    बादशाह को लिये हुए सेना सामने से निकल गई! उनके जाते ही मिरजा ने फिर बाजी बिछा दी । हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा-आइये, नवाबसाहब के मातम में एक मरसिया कह डालें; लेकिन मिरजा की राज-भक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी। वह हार का बदला चुकाने के लिये अधीर हो रहे थे।

    ( ४ )

    शाम हो गई। खँडहर में चमगादड़ों ने चीखना शुरू किया। अबाबीलें आ आकर अपने-अपने घोसलों में चिमटीं। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे, मानों दो खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। मिरजा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाज़ी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़ निश्चय करके सँभाल कर खेलते थे; लेकिन एक-न-एक चाल ऐसी बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाजी खराब हो जाती थी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और भी उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के ग़ज़लें गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुम धन पा गये हों। मिरजाजी सुन-सुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे; पर ज्यों-ज्यों बाज़ी कमज़ोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकला जाता था! यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुंझलाने लगे—जनाब, आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि एक चाल चले, और फिर उसे बदल दिया। जो कुछ चलना हो, एक बार चल लीजिए। यह आप मुहरे पर हाथ क्यों रखे रहते हैं? मुहरे को छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरे छूइए ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं। जिसे एक चाल चलने में पाँच मिनट से ज्यादा लगे, उसकी मात समझी जाय। फिर आपने चाल बदली! चुपके से मुहरे वहीं रख दीजिए।

    मीर साहब का फ़रजी पिटता था। बोले—मैंने चाल चली ही कब थी? मिरजा––आप चाल चल चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए––उसी घर में!

    मीर––उस घर में क्यों रक्खूँ? मैंने हाथ से मुहरा छोड़ा ही कब था?

    मिरजा––मुहरा आप क़यामत तक न छोड़ें, तो क्या चाल ही न होगी? फ़रजी पिटते देखा, तो धाँधली करने लगे!

    मीर––धाँधली आप करते हैं। हार-जीत तक़दीर से होती है ; धाँधली करने से कोई नहीं जीतता?

    मिरजा––जो इस बाज़ी में आपको मात हो गई।

    मीर––मुझे क्यों मात होने लगी?

    मिरजा––तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रक्खा था।

    मीर––वहां क्यों रक्खूँ? नहीं रखता!

    मिरजा––क्यों न रखिएगा? आपको रखना होगा!

    तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था, न वह! अप्रासंगिक बातें होने लगी। मिरजा बोले-किसी ने खानदान में शतरंज खेली होती, तब तो इसके कायदे जानते। वे तो हमेशा घास छीला किये आप शतरंज क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज़ है। जागीर मिल जाने से ही कोई रईस नहीं हो जाता।

    मीर––क्या! घास आपके अब्बाजान छीलते होंगे। यहाँ तों पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आ रहे हैं। मिरजा––अजी, जाइए भी, गाज़िउद्दीन हैदर के यहाँ बावरची का काम करते-करते उम्र गुज़र गई, आज रईस बनने चले हैं। रईस बनना कुछ दिल्लगी नहीं है।

    मीर—क्यों अपने बुजर्गों के मुँह कालिख लगाते हो-वे ही बाबरची का काम करते होंगे। यहाँ तो हमेशा बादशाह के दस्तरख्वान पर खाना खाते चले आये हैं।

    मिरजा—अरे चल चरकटे, बहुत बढ़-बढ़कर बातें न कर।

    मीर—ज़बान संभालिये, वरना बुरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का आदी नहीं हूँ। यहाँ तो किसी ने आँखें दिखाई कि उसकी आँखें निकाला। है हौसला?

    मिरजा—आप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जाय, इधर या उधर!

    मीर—तो यहाँ तुमसे दबनेवाला कौन है?

    दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल ली। नवाबी ज़माना था; सभी तलवार, पेशक़म्ज, कटार वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे; पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अधःपतन हो गया था-बादशाह के लिए, बादशाहत के लिए क्यों मरें; पर व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनों ने पैतरें बदले, तलवार चमका, छपाछप की आवाज आई। दोनों जख्म खाकर गिरे, और दोनों ने वहां तड़प-तड़प कर जानें दे दी। अपने बादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक बूंद आँसू न निकला, उन्हीं दोनों प्राणियों ने शतरंज के वज़ीर की रक्षा में प्राण दे दिये। अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।

    चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। खंडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवार और धूल धूसरित मीनारें इन लाशों को देखती और सिर धुनती थीं।

    ____०____

    (२) कामना-तरु

    (१)

    राजा इंद्रनाथ का देहान्त हो जाने के बाद, कुँअर राजनाथ को शत्रुओं ने चारों ओर से ऐसा दबाया, कि उन्हें अपने प्राण लेकर एक पुराने सेवक की शरण जाना पड़ा, जो एक छोटे-से गाँव का जागीरदार था। कुँअर स्वभाव ही से शांति-प्रिय, रसिक, हँस-खेलकर समय काटनेवाले युवक थे। रण-क्षेत्र की अपेक्षा कवित्व के क्षेत्र में अपना चमत्कार दिखाना उन्हें अधिक प्रिय था। रसिकजनों के साथ, किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए, काव्य-चरचा करने में उन्हें जो आनन्द मिलता था, वह शिकार या राज-दरबार में नहीं। इस पर्वत-मालाओं से घिरे हुए गाँव में आकर, उन्हें जिस शांति और आनन्द का अनुभव हुआ, उसके बदले में वह ऐसे-ऐसे कई राज त्याग कर सकते थे। यह पर्वत-मालाओं की मनोहर छटा, यह नेत्र-रंजक हरियाली, यह जल-प्रवाह की मधुर वीणा, यह पक्षियों की मीठी बोलियाँ, यह मृग-शावकों की छलाँग, यह बछड़ों की कुलेलें, यह ग्राम-निवा

    सियों की बालोचित सरलता, यह रमणियों की संकोच-मय चपलता, ये सभी बातें उनके लिये नई थीं; पर इन सबों से बढ़कर जो वस्तु उनको आकर्षित करती थी, वह जागीरदार की युवती कन्या चन्दा थी।

    चन्दा घर का सारा काम-काज आप ही करती थी। उसको माता की गोद में खेलना नसीब ही न हुआ था। पिता की सेवा ही में रत रहती थी। उसका विवाह इसी साल होनेवाला था, कि इसी बीच मे कुँअरजी ने आकर उसके जीवन में नवीन भावनाओं और नवीन आशाओं को अंकुरित कर दिया। उसने अपने पति का जो चित्र मन में खींच रक्खा था, वहो मानों रूप धारण करके उमके सम्मुख आ गया। कुँअर की आदर्श रमणी भी चन्दा ही के रूप में अवतरित हो गई; लेकिन कुँअर समझते थे, मेरे ऐसे भाग्य कहाँ? चन्दा भी समझती थी, कहाँ यह और कहाँ मैं!

    (२)

    दोपहर का समय था और जेठ का महीना। खपरैल का घर भट्ठी की भाँति तपने लगा। ख़स की टट्टियों और तहखानों में रहनेवाले राजकुमार का चित्त गरमी से इतना बेचैन हुआ, कि वह बाहर निकल आये और सामने के बाग़ में जाकर एक घने वृक्ष के छाँह में बैठ गये। सहसा उन्होंने देखा-चन्दा नदी से जल की गागर लिये चली आ रही है। नीचे जलती हुई रेत थी, ऊपर जलता हुआ सूर्य। लू से देह झुलसी जाती थी। कदाचित् इस समय प्यास से तड़पते हुए आदमी की भी नदी तक जाने का

    हिम्मत न पड़ती थी। चन्दा क्यों जल लेने गई थी? घर में पानी भरा हुआ है। फिर इस समय वह क्यों पानी लेने निकली?

    कुँअर दौड़कर उसके पास जा पहुँचे और उसके हाथ से गागर छीन लेने की चेष्टा करते हुए बोले––मुझे दे दो और भागकर छाँह में चली जाओ। इस समय पानी का क्या काम था?

    चन्दा ने गागर न छोड़ी। सिर से खिसका हुआ अंचल सँभाल कर बोली––तुम इम समय कैसे आ गये? शायद मारे गरमी के अन्दर न रह सके!

    कुँअर––मुझे दे दो, नहीं मैं छीन लूँगा।

    चन्दा ने मुस्कुराकर कहा––राजकुमारों को गागर लेकर चलना शोभा नहीं देता।

    कुँअर ने गागर का मुँह पकड़कर कहा––इस अपराध का बहुत दण्ड सह चुका हूँ। चन्दा, अब तो अपने को राजकुमार कहने में भी लज्जा आती है।

    चन्दा––देखो धूप में खुद हैरान होते हो और मुझे भी हैरान करते हो। गागर छोड़ दो। सच कहती हूँ, पूजा का जल है।

    कुँअर––क्या मेरे ले जाने से, पूजा का जल अपवित्र हो जायगा?

    चन्दा––अच्छा भाई नहीं जानते, तो तुम्हीं ले चलो। हाँ नहीं तो!

    कुँअर गागर लेकर आगे-आगे चले। चन्दा पीछे हो ली। बग़ीचे में पहुँचे, तो चन्दा एक छोटे-से पौधे के पास रुक कर

    बोली––इसी देवता की पूजा करनी है, गागर रख दो। कुँअर ने आश्चर्य से पूछा––यहाँ कौन देवता है चन्दा? मुझे तो नहीं नज़र आता।

    चन्दा ने पौधे को सींचते हुए कहा––यही तो मेरा देवता है!

    पानी पाकर पौधे की मुरझाई हुई पत्तियाँ हरी हो गई, मानो उनकी आँखें खुल गई हों।

    कुँअर ने पूछा––यह पौधा क्या तुमने लगाया है चन्दा?

    चन्दा ने पौधे को एक सीधी लकड़ी से बाँधते हुए कहा––हाँ, उसी दिन तो, जब तुम यहाँ आए। यहाँ पहले मेरी गुड़ियों का घरौंदा था। मैंने गुड़ियों पर छाँह करने के लिए एक अमोल लगा दिया था। फिर मुझे इसकी याद नहीं रही। घर के काम धन्धे में भूल गई। जिस दिन तुम यहाँ आये, मुझे न-जाने क्यों इस पौधे की याद आ गई। मैंने आकर देखा, तो यह सूख गया था। मैंने तुरन्त पानी लाकर इसे सींचा, तो कुछ-कुछ ताज़ा होने लगा। तब से रोज़ इसे सींचती हूँ। देखो कितना हरा-भरा हो गया है!

    यह कहते-कहते उसने सिर उठाकर कुँअर की ओर ताकते हुए कहा––और सब काम भूल जाऊँ; पर इस पौधे को पानी देना नहीं भूलती। तुम्हीं इसके प्राण-दाता हो। यह तुम्हीं ने आकर इसे जिला दिया, नहीं तो बेचारा सूख गया होता। यह तुम्हारे शुभागमन का स्मृति-चिह्न है। ज़रा इसे देखो। मालूम होता है, हँस रहा है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, कि यह मुझसे बोलता है। सच कहती हूँ, कभी यह रोता है, कभी हँसता है, कभी रूठता है; आज तुम्हारा लाया हुआ पानी पाकर यह फूला नहीं समाता। एक-एक पत्ता तुम्हें धन्यवाद दे रहा है।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों वह पौधा कोई नन्हा-सा क्रीड़ाशील बालक है। जैसे चुम्बन से प्रसन्न होकर बालक गोद में चढ़ने के लिए दोनों हाथ फैला देता है, उसी भाँति यह पौधा भी हाथ फैलाए जान पड़ा। उसके एक-एक अणु में चन्दा का प्रेम झलक रहा था।

    चन्दा के घर में खेती के सभी औज़ार थे। कुँअर एक फावड़ा उठा लाए ओर पौधे का एक थाला बनाकर चारों ओर ऊँची मेंड़ उठा दी। फिर खुरपी लेकर अन्दर की मिट्टी को गोड़ दिया। पौधा और भी लहलहा उठा।

    चन्दा बोली––कुछ सुनते हो, क्या कह रहा है?

    कुँअर ने मुस्कुराकर कहा––हाँ! कहता है अम्माँ की गोद में बैठूँगा।

    चन्दा––नहीं, कह रहा है, इतना प्रेम करके फिर भूल न जाना।

    (३)

    मगर कुँअर को अभी राजपुत्र होने का दण्ड भोगना बाक़ी था। शत्रुओं को न-जाने कैसे उनकी टोह मिल गई इधर तो हित-चिन्तकों के आग्रह से विवश होकर बूढ़ा कुबेरसिंह चन्दा और कुँअर के विवाह की तैयारियाँ कर रहा था, उधर शत्रुओं का एक

    दल सिर पर आ पहुँचा। कुँअर ने उस पौधे के आस-पास फूल-पत्ते लगाकर एक फुलवाड़ी-सी बना दी थी। पौधे को सींचना अब उनका काम था। प्रातःकाल वह कन्धे पर काँवर रक्खे नदी से पानी ला रहे थे कि दस-बारह आदमियों ने उन्हें रास्ते में घेर लिया। कुबेर सिंह तलवार लेकर दौड़ा; लेकिन शत्रुओं ने उसे मार गिराया। अकेला, शस्त्र-हीन कुँअर क्या करता। कन्धे पर काँवर रक्खे हुए बोला––अब क्यों मेरे पीछे पड़े हो भाई? मैंने तो सब कुछ छोड़ दिया।

    सरदार बोला-हमें आपको पकड़ ले जाने का हुक्म है।

    "तुम्हारा स्वामी मुझे इस दशा में भी नहीं देख सकता? खैर, अगर धर्म समझो, तो कुबेरसिंह की तलवार मुझे दे दो। अपनी स्वाधीनता के लिए लड़कर प्राण दूँ।"

    इसका उत्तर यही मिला कि सिपाहियों ने कुँअर को पकड़कर मुश्कें कस दीं और उन्हें एक घोड़े पर बिठाकर घोड़े को भगा दिया काँवर वहीं पड़ी रह गई।

    उसी समय चन्दा घर में से निकली। देखा, काँवर पड़ी हुई है और कुँअर को लोग घोड़े पर बिठाए लिए जा रहे हैं। चोट खाए हुए पक्षी की भाँति वह कई कदम दौड़ी, फिर गिर पड़ी। उसकी आँखों में अँधेरा छा गया।

    सहसा उसकी दृष्टि पिता की लाश पर पड़ी। वह घबड़ाकर उठी और लाश के पास जा पहुँची। कुबेर अभी मरा न था। प्राण आँखों में अटके हुए थे। चन्दा को देखते ही क्षीण स्वर में बोला––बेटी…कुँअर!…इसके आगे वह कुछ न कह सका। प्राण निकल गए; पर इस एक शब्द––"कुँअर"––ने उसका आशय प्रगट कर दिया।

    (४)

    बीस वर्ष बीत गए! कुँअर कैद से न छूट सके।

    यह एक पहाड़ी क़िला था। जहाँ तक निगाह जाती, पहाड़ियाँ ही नजर आतीं। क़िले में उन्हें कोई कष्ट न था। नौकर-चाकर, भोजन-वस्त्र, सैर-शिकार, किसी बात की कमी न थी; पर उस वियोगाग्नि को कौन शान्ति करता, जो नित्य कुँवर के हृदय में जला करती थी। जीवन में अब उनके लिए कोई आशा न थी, कोई प्रकाश न था। अगर कोई इच्छा थी, तो यही कि एक बार उस प्रेम-तीर्थ की यात्रा कर लें, जहाँ उन्हें वह सब कुछ मिला जो मनुष्य को मिल सकता है। हाँ, उनके मन में एक-मात्र यही अभिलाषा थी कि उस पवित्र-स्मृतियों से रंजित भूमि के दर्शन करके जोवन का उसी नदी के तट पर अन्त कर दे। वही नदी का किनारा, वही वृक्षों का कुञ्ज, वही चन्दा का छोटा-सा सुन्दर घर, उसकी आँख में फिरा करता, और वह पोधा, जिसे उन दोनों ने मिलकर सींचा था, उसमें तो मानो उसके प्राण ही बसते थे। क्या वह दिन भी आएगा, जब वह उस पौधे को हरी-हरी पत्तियों से लदा हुआ देखेगा। कौन जाने वह अब है भी या सूख गया। कौन अब उसको सोचता होगा! चन्दा इतने दिनों अविवाहिता थोड़े ही बैठी होगी। ऐसा संभव भी तो नहीं। उसे अब मेरी सुधि भी न

    होगी। हाँ शायद कभी अपने घर की याद खींच लाती हो, तो पौधे को देखकर उसे मेरी याद आ जाती हो। मुझ-जैसे अभागे के लिए इससे अधिक वह और कर ही क्या सकती है। उस भूमि को एक बार देखने के लिए वह अपना जीवन दे सकता था; पर यह अभिलाषा पूरी न होती थी।

    आह! एक युग बीत गया, शोक और नैराश्य ने उठती जवानी को कुचल दिया। न आँखों में ज्योति रही, न पैरों में शक्ति। जीवन क्या था, एक दुःखदायी स्वप्न था। उस सघन अंधकार में उसे कुछ न सूझता था, बस जीवन का आधार एक अभिलाषा थी, एक सुखद स्वप्न जो जीवन में न-जाने कब उसने देखा था, एक बार फिर वही स्वप्न देखना चाहता था। फिर, उसकी अरिलाषाओं का अन्त हो जायगा, उसे कोई इच्छा न रहेगी। सारा अनन्त भविष्य, सारी अनन्त चिन्ताएँ, इसी एक स्वप्न में लीन हो जाती थीं।

    उसके रक्षकों को अब उसकी ओर से काई शंका न थी। उन्हें उस पर दया आती थी। रात को पहरे पर केवल कोई एक आदमी रह जाता था और लोग मीठी नींद सोते थे। कुँअर भाग जा सकता है, इसकी कोई संभावना, कोई शंका न थी। यहाँ तक कि एक दिन यह एक सिपाही भी निश्शंक होकर बन्दूक लिए लेट रहा। निद्रा किसी हिंसक पशु की भाँति ताक लगाए बैठी थी। लेटते ही टूट पड़ी। कुँअर ने सिपाही की नाक की आवाज़ सुनी। उनका हृदय बड़े वेग से उछलने लगा। यह अवसर आज कितने

    दिनों के बाद मिला था। वह उठे; मगर पाँव थरथर कांप रहे थे। बरामदे के नीचे उतरने का साहस न हो सका। कहीं इसकी नींद खुल गई तो? हिंसा उनकी सहायता कर सकती थी। सिपाही की बगल में उसकी तलवार पड़ी थी; पर प्रेम को हिंसा से बैर है। कुँअर ने सिपाही को जगा दिया। वह चौंककर उठ बैठा। रहा सहा संशय भी उसके दिल से निकल गया। दूसरी बार जो सोया तो खर्राटे लेने लगा।

    प्रातःकाल जब उसकी निद्रा टूटी, तो उसने लपककर कुँअर के कमरे में झाँका। कुँअर का पता न था।

    कुँअर इम समय हवा के घोड़ों पर सवार, कल्पना की द्रुतगति से, भागा जा रहा था- उसस्थान को, जहाँ उसने सुख-स्वप्न देखा था।

    किले में चारों ओर तलाश हुई, नायक ने सवार दौड़ाये; पर कहों पता न चला।

    ( ५ )

    पहाड़ी रास्तों का काटना कठिन, उस पर अज्ञातवास की कैद, मृत्यु के दूत पीछे लगे हुए, जिनसे बचना मुश्किल। कुँअर को कामना-तीर्थ में महीनो लग गये। जब यात्रा पूरी हुई, तो कुँअर में एक कामना के सिवा और कुछ शेष न था। दिन-भर की कठिन यात्रा के बाद जब वह उस स्थान पर पहुंचे, तो संध्या हो गई थी। वहाँ बस्ती का नाम भी न था। दो-चार टूटे-फूटे झोंपड़े उस बस्ती के चिह्न-स्वरूप शेष रह गये थे। वह झोंपड़ा, जिसमें कभी प्रेम का

    प्रकाश था, जिसके नीचे उन्होंने जीवन के सुखमय दिन काटे थे, जो उनकी कामनाओं का आगार और उनकी उपासना का मन्दिर था, अब उनकी अभिलाषाओं की भाँति भग्न हो गया था! झोंपड़े की भग्नावस्था मूक-भाषा में अपनी करुण-कथा सुना रही थी। कुँअर उसे देखते ही "चन्दा-चन्दा!" पुकारता हुआ दौड़ा। उसने उस रज को माथे पर मला, मानो किसी देवता की विभूति हो और उसकी टूटी हुई दीवारों से चिमटकर बड़ी देर तक रोता रहा। हाय रे अभिलाषा! यह रोने ही के लिये इतनी दूर से आया था? रोने ही की अभिलाषा इतने दिनों से उसे विकल कर रही थी; पर इस रोदन में कितना स्वर्गीय आनन्द था। क्या समस्त संसार का सुख इन आँसुओं की तुलना कर सकता था?

    तब वह झोंपड़े से निकला। सामने मैदान में एक वृक्ष हरे-हरे नवीन पल्लवों को गोद में लिये, मानो उसका स्वागत करने को खड़ा था। यह वही पौधा है, जिसे आज से बीस वर्ष पहले दोनों ने आरोपित किया था। कुँअर उन्मत्त की भाँति दौड़ा और जाकर उस वृक्ष से लिपट गया, मानो कोई पिता अपने मातृ-हीन पुत्र को छाती से लगाये हुए हो। यह उसी प्रेम की निशानी है, उसी अक्षय प्रेम की, जो इतने दिनों के बाद आज इतना विशाल हो गया है। कुँअर का हृदय ऐसा फूल उठा, मानों इस वृक्ष को अपने अन्दर रख लेगा, जिसमें उसे हवा का झोंका भी न लगे। उसके एक-एक पल्लव पर चन्दा की स्मृति बैठी हुई थी। पक्षियों का इतना रम्य संगीत क्या कभी उसने सुना था! उसके हाथों में

    दम न था, सारी देह भूख-प्यास और थकन से शिथिल हो रही थी। पर, वह उस वृक्ष पर चढ़ गया, इतनी फुर्ती से चढ़ा कि बन्दर भी न चढ़ता। सबसे ऊँची फुनगी पर बैठकर उसने चारों ओर गर्व-पूर्ण दृष्टि डाली। यही उसकी कामनाओं का स्वर्ग था। सारा दृश्य चंदामय हो रहा था। दूर की नीली पर्वत-श्रेणियों पर चन्दा बैठी गा रही थी, आकाश में तैरनेवाली लालिमा-मयी नौकाओं पर चन्दा ही उड़ी जाती थी। सूर्य की श्वेत-पीत प्रकाश की रेखाओं पर चन्दा ही बैठी हँस रही थी। कुँअर के मन में आया, पक्षी होता तो इन्हीं डालियों पर बैठा हुआ जीवन के दिन पूरे करता।

    जब अँधेरा हो गया, तो कुँअर नीचे उतरा और उसी वृक्ष के नीचे थोड़ी-सी भूमि झाड़कर, पतियों को शय्या बनाई और लेटा। यही उसके जीवन का स्वर्ण-स्वप्न था, आह यही वैराग्य! अब वह इस वृक्ष की शरण छोड़कर कहीं न जायगा। दिल्ली के तख्त के लिए भी वह इस आश्रम को न छोड़ेगा।

    ( ६ )

    उसी स्निग्ध अमल चाँदनी में सहसा एक पक्षी आकर उस वृक्ष पर बैठा और दर्द में डूबे हुए स्वरों में गाने लगा। ऐसा जान पड़ा, मानो वह वृक्ष सिर धुन रहा है। वह नीरव रात्रि उस वेदना-मय संगीत से हिल उठी, कुँअर का हृदय इस तरह ऐंठने लगा, मानो वह फट जायगा। उस स्वर में करुणा और वियोग के तीर-से भरे हुए थे। आह! पक्षी, तेरा जोड़ा भी अवश्य बिछुड़

    गया है, नहीं तेरे राग में इतनी व्यथा, इतना विषाद, इतना रुदन कहाँ से आता! कुँअर के हृदय के टुकड़े हुए जाते थे, एक-एक स्वर तीर की भाँति दिल को छेदे डालता था। वहाँ बैठे न रह सके। उठकर एक आत्म-विस्मृत की दशा में दौड़े हुए झोंपड़े में गये, वहाँ से फिर वृक्ष के नीचे आए। उस पक्षी को कैसे पाएँ। कहीं दिखाई नहीं देता।

    पक्षी का गाना बन्द हुआ, तो कुँअर को नींद आ गई। उन्हें स्वप्न में ऐसा जान पड़ा कि वही पक्षी उनके समीप आया। कुँअर ने ध्यान से देखा, तो वह पक्षी न था, चन्दा थी, प्रत्यक्ष चन्दा थी।

    कुँअर ने पूछा—चन्दा यह पक्षी यहाँ कहाँ?

    चन्दा ने कहा—मैं ही तो वह पक्षी हूँ।

    कुँअर—तुम पक्षी हो! क्या तुम्हीं गा रही थीं?

    चन्दा—हाँ प्रियतम, मैं ही गा रही थी। इसी तरह रोते एक युग बीत गया।

    कुँअर—तुम्हारा घोंसला कहाँ है?

    चन्दा—उसी झोंपड़े में, जहाँ तुम्हारी खाट थी। उसी खाट के बान से मैंने अपना घोंसला बनाया है।

    कुँअर—और तुम्हारा जोड़ा कहाँ है?

    चन्दा—मैं अकेली हूँ। चन्दा को अपने प्रियतम के स्मरण करने में, उसके लिए रोने में, जो सुख है वह जोड़े में नहीं, मैं इसी तरह अकेली रहूँगी और अकेली मरूँगी।

    कुँअर—मैं क्या पक्षी नहीं हो सकता? चन्दा चली गई। कुँअर की नींद खुल गई। ऊषा की लालिमा आकाश पर छाई हुई थी और वह चिड़िया, कुँअर की शय्या के समीप एक डाल पर बैठी चहक रही थी। अब उस संगीत में करुणा न थी, विलाप न था, उसमें आनन्द था, चापल्य था, सारस्य था। वह वियोग का करुण-क्रन्दन न हों, मिलन का मधुर संगीत था।

    कुँवर सोचने लगे—इस स्वप्न का क्या रहस्य है?

    ( ७ )

    कुँवर ने शय्या से उठते ही एक झाडू बनाया और उस झोंपड़े को साफ करने लगे। उनके जीते-जी इसकी यह भग्न-दशा नहीं रह सकती। वह इसकी दीवारें उठाएँगे, इस पर छप्पर डालेंगे, इसे लीपेंगे। इनमें उनका चन्द स्मृति वास करती है। झोंपड़े के एक कोने में वह काँवर रक्खी हुई थी, जिस पर पानी ला-लाकर वह इस बृक्ष को सींचते थे। उन्होंने काँवर उठा ली और पानी लाने लगे। दो दिन से कुछ भोजन न किया था। रात को भूख लगी हुई थी; पर इस समय भोजन की बिलकुल इच्छा न थी। देह में एक अद्भुत स्फूर्ति का अनुभव होता था। उन्होंने नदी से पानी ला-ला मिट्टी भिगोना शुरु किया। दौड़े जाते थे और दौड़े आते थे। इतनी शक्ति उनमें कभी न थी।

    एक ही दिन में इतनी दीवार उठ गई, जितनी चार मज़दूर भी न उठा सकते थे। और कितनी सीधी, चिकनी दीवार थी कि कारीगर भी देखकर लज्जित हो जाता। प्रेम की शक्ति अपार है। सन्ध्या हो गई। चिड़ियों ने बसेरा लिया। वृक्षों ने भी आँखें बन्द की; मगर कुँवर को आराम कहाँ। तारों के मलिन प्रकाश में मिट्टी के रद्दे रक्खे जाते थे। हाय रे कामना! क्या तू इस बेचारे के प्राण ही लेकर छोड़ेगी?

    वृक्ष पर पक्षी का मधुर स्वर सुनाई दिया। कुँवर के हाथ से घड़ा छूट पड़ा। हाथ और पैरों में मिट्टी लपेटे वह वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए। उस स्वर में कितना लालित्य था, कितना उल्लास, कितनी ज्योति! मानव-संगीत इसके सामने बेसुरा आलाप था। उसमें यह जागृति, यह अमृत, यह जीवक कहाँ? संगीत के आनन्द में विस्मृति है; पर वह विस्मृति कितनी स्मृति-मय होती है, अतीत को जीवन और प्रकाश से रञ्जित करके प्रत्यक्ष कर देने की शक्ति, संगीत के सिवा और कहां है? कुँवर के हृदय-नेत्रों के सामने वह दृश्य आ खड़ा हुआ, जब चन्दा इसी पौधे को नदी से जल ला-लाकर सींचती थी। हाय, क्या वे दिन फिर आ सकते हैं!

    सहसा एक बटोही आकर खड़ा हो गया ओर कुँअर को देखकर प्रश्न करने लगा, जो साधारणत: दो अपरिचित प्राणियों में हुआ करते हैं-कौन हो, कहाँ से आते हो कहाँ जाओगे? पहले वह भी इसी गाँव में रहता था; पर जब गाँव उजड़ गया, तो समीप के एक दूसरे गाँव में जा बसा था। अब भी उसके खेत यहाँ थे। रात को जङ्गली पशुओं से अपने खेतों की रक्षा करने के लिए वह यहीं आकर सोता था। कुँवर ने पूछा-तुम्हें मालूम है, इस गाँव में एक कुबेरसिंह ठाकुर रहते थे?

    किसान ने बड़ी उत्सुकता से कहा-हाँ-हाँ भाई, जानता क्यों नहीं! बेचारे यहीं तो मारे गये। तुमसे क्या उसकी जान-पहचान थी?

    कुँअर हाँ, उन दिनों कभी-कभी आया करता था। मैं भी राजा की सेना में नौकर था। उनके घर में और कोई न था?

    किसान-अरे भाई कुछ न पूछो, बड़ी करुण-कथा है। उसकी स्त्री तो पहले ही मर चुकी थी। केवल लड़की बच रही थी। आह! कैसी सुशीला, कैसी सुघड़ वह लड़की थी! उसे देखकर आँखों में ज्योति आ जाती थी। बिलकुल स्वर्ग की देवी जान पड़ती थी। जब कुबेरसिंह जोता था, तभी कुँअर इन्द्रनाथ यहाँ भाग कर आये थे और उसके यहाँ रहे थे। उस लड़की की कुँअर से कहीं बात-चीत हो गई। जब कुँवर को शत्रुओं ने पकड़ लिया, तो चन्दा घर में अकेली रह गई। गाँववालों ने बहुत चाहा, कि उसका विवाह हो जाय। उसके लिए वरों का तोड़ा न था भाई, ऐसा कौन था, जो उसे पाकर अपने को धन्य न मानता; पर वह किसी से विवाह करने पर राजी न हुई। यह पेड़ जो तुम देख रहे हो, तब छोटा-सा पौधा था। इसके आस-पास फूलों की कई ओर क्यारियाँ थीं। इन्हीं को गोड़ने, निराने, सींचने में उसका दिन कटता था। बस, यह कहती, कि हमारे कुँअर साहब आते होंगे।

    कुँअर की आँखों से आंसू की वर्षा होने लगी। मुसाफिर ने

    ज़रा दम लेकर कहा-दिन-दिन घुलती जाती थी। तुम्हें विश्वास न आयेगा भाई, उसने दस साल इसी तरह काट दिये। इतनी दुर्बल हो गई थी, कि पहचानी न जाती थी; पर अब भी उसे कुँअर साहब के आने की आशा बनी हुई थी। आखिर एक दिन इसी वृक्ष के नीचे उसकी लाश मिली। ऐसा प्रेम कौन करेगा भाई! कुँअर न जाने मरे कि जिए, कभी उन्हें इस विरहिणी की याद भी आती है, कि नहीं; पर उसने तो प्रेम को ऐसा निभाया जैसा चाहिए।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों हृदय फटा जा रहा है। वह कलेजा थामकर बैठ गए। मुसाफिर के हाथ में एक सुलगता हुआ उपला था। उसने चिलम भरी और दो-चार दम लगाकर बोला- उसके मरने के बाद यह घर गिर गया। गांव पहले ही उजाड़ था। अब तो और भी सुनसान हो गया। दो-चार असामी यहाँ आ बैठते थे। अब तो चिड़िए का पूत भी यहाँ नहीं आता। उसके मरने के कई महीने के बाद, यही चिडिया इस पेड़ पर बोलती हुई सुनाई दी। तब से बराबर इसे यहाँ बोलते सुनता हूँ। रात को सभी चिड़ियाँ सो जाती हैं; पर यह रात भर बोलती रहती है। उसका जोड़ा कभी नहीं दिखाई दिया। बस, बस, फुट्टैल है। दिन-भर उसी झोंपड़े में पड़ी रहती है। रात को इस पेड़ पर आ बैठती है; मगर इस समय इसके गाने में कुछ और ही बात है, नहीं तो सुनकर रोना आता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई कलेजे को मसोस रहा हो। मैं तो कभी-कभी पड़े-पड़े रो दिया करता हूँ। सब लोग कहते हैं कि यह वही चन्दा है। अब भी कुँअर के वियोग में विलाप कर रही है । मुझे भी ऐसा ही जान पड़ता है। आज न-जाने क्यों मगन है।

    किसान तम्बाकू पीकर सो गया। कुँअर कुछ देर तक खोया हुआ-सा खड़ा रहा। फिर धीरे से बोला-चन्दा, क्या सचमुच तुम्ही हो? मेरे पास क्यों नहीं आती?

    एक क्षण में चिड़िया आकर उसके हाथ पर बैठ गई। चन्द्रमा के प्रकाश में कुँअर ने चिड़िया को देखा। ऐसा जान पड़ा, मानो उनकी आँखें खुल गई हों, मानों आँखों के सामने से कोई आवरण हट गया हो। पक्षी के रूप में भी चन्दा की मुखाकृति अंकित थी।

    दूसरे दिन किसान सोकर उठा, तो कुँअर की लाश पड़ी हुई थी।

    ( ८ )

    कुँअर अब नहीं हैं; किन्तु इनके झोंपड़े की दीवारें बन गई हैं, ऊपर फूस का नया छप्पर पड़ गया है और झोंपड़े के द्वार पर फूलों की कई क्यारियाँ लगी हुई हैं। गाँव के किसान इससे अधिक और क्या कर सकते थे।

    उस झोंपड़े में अब पक्षियों के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया है। दोनों साथ-साथ दाने-चारे की खोज में जाते हैं, साथ-साथ आते हैं। रात को दोनों उसी वृक्ष की डाल पर बैठे दिखाई देते हैं। उनका सुरम्य संगीत, रात की नीरवता में दूर तक सुनाई

    देता है। बन के जीव-जन्तु वह स्वर्गीय गान सुनकर मुग्ध हो जाते हैं।

    यह पक्षियों का जोड़ा कुँअर और चन्दा का जोड़ा है, इसमें किसी को सन्देह नहीं है।

    एक बार एक व्याध ने इन पक्षियों को फँसाना चाहा; पर गाँववालों ने उसे मारकर भगा दिया।

    ______

    (३) रानी सारन्धा

    (१)

    अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चकियाँ। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है, जिसको जङ्गली वृक्षों ने घेर रक्खा है। टीले के पूर्व की ओर एक छोटा-सा गाँव है । यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुन्देला सरदार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियाँ व्यतीत हो गई, बुन्देलखण्ड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ, मुसलमान आये और गये, बुन्देला राजा उठे और गिरे, कोई गाँव, कोई इलाका, ऐसा न था, जो इस दुर्व्यवस्थाओं से पीड़ित न हो; मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहराई और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।

    अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था। वह जमाना ही ऐसा था, जब मनुष्य-मात्र को अपने बाहु-बल और पराक्रम ही का भरोसा था। एक ओर मुसलमान सेनाए पैर जमाये खड़ी रहती थीं, दूसरी ओर बलवान् राजा अपने निर्बल भाइयों का गला घोटने पर तत्पर रहते थे। अनिरुद्धसिंह के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा, मगर सजीव, दल था। इससे वह अपने कुल और मर्यादा की रक्षा किया करता था। उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था। तीन वर्ष पहले उसका विवाह शीलता- देवी से हुआ; मगर अनिरुद्ध बिहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में। वह कितनी बार पति से अनुरोध कर चुकी थी, कितनी बार उसके पैरों पर गिरकर रोई थी, कि तुम मेरी आँखों से दूर न हो, मुझे हरिद्वार ले चलो मुझे तुम्हार साथ वन-वास अच्छा है, यह वियोग अब नहीं सहा जाता। उसने प्यार से कहा, जिद से कहा, विनय की; मगर अनिरुद्ध बुन्देला था। शीतला अपने किसी हथियार से उसे परास्त न कर सकी।

    ( २ )

    अँधेरी रात थी। सारी दुनिया सोती थी; मगर तारे आकाश में भागते थे। शीतलादेवी पलङ्ग पर पड़ी करवटें बदल रही थी ओर उसकी ननद सारन्धा फर्श पर बैठी हुई मधुर स्वर से गाती थी-

    बिन रघुबीर कटत नहीं रैन।

    शीतला ने कहा-जी न जलाओ। क्या तुम्हें भी नींद नहीं आती?

    सारन्धा-तुम्हें लोरी सुना रही हूँ।

    शीतला-मेरी आँखों से तो नींद लोप हो गई। सारन्धा—किसी को ढूँढ़ने गई होगी।

    इमने में द्वार खुला और एक गठे हुए बदन के रूपवान् पुरुष ने भीतर प्रवेश किया। यह अनिरुद्ध था। उसके कपड़े भीगे हुए थे, और बदन पर कोई हथियार न था। शीतला चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठ गई।

    सारन्धा ने पूछा—भैया, यह कपड़े भीगे क्यों हैं?

    अनिरुद्ध—नदी पैरकर आया हूँ।

    सारन्धा—हथियार क्या हुए?

    अनिरुद्ध—छिन गये।

    सारन्धा—और साथ के आदमी?

    अनिरुद्ध—सबने वीर गति पाई।

    शीतला ने दबी ज़बान से कहा—"ईश्वर ने ही कुशल किया…" मगर सारन्धा के तीवरों पर बल पड़ गये और मुखमण्डल गर्व से सतेज हो गया। बोली "भैया, तुमने कुल की मर्यादा खो दी। ऐसा कभी न हुआ था।"

    सारन्धा भाई पर जान देती थी। उसके मुंह से वह धिक्कार सुनकर अनिरुद्ध लज्जा और खेद से विकल हो गया। वह वीराग्नि जिसे क्षण भर के लिये अनुराग ने दबा दिया था, फिर ज्वलन्त हो गई। वह उल्टे पांव लौटा और यह कहकर बाहर चला गया कि "सारन्धा, तुमने मुझे सदैव के लिये सचेत कर दिया। यह बात मुझे कभी न भुलेगी।"

    अँधेरी रात थी। आकाश मण्डल में तारों का प्रकाश बहुत

    धुंधला था। अनिरुद्ध किले से बाहर निकला। पलभर में नदी के उस पार जा पहुँचा, और फिर अन्धकार में लुप्त हो गया। शीतला उसके पीछे-पीछे किले की दीवारों तक आई; मगर जब अनिरुद्ध छलाँग मारकर बाहर कूद पड़ा, तो वह विरहिणी एक चट्टान पर बैठकर रोने लगी।

    इतने में सारन्धा भी वहीं आ पहुँची। शीतला ने नागिन की तरह बल खाकर कहा—मर्यादा इतनी प्यारी है?

    सारन्धा—हाँ।

    शीतला—अपना पति होता, तो हृदय में छिपा लेती।

    सारन्धा—न, छाती में छुरी चुभा देती।

    शीतला ने ऐंठकर कहा—डोली में छिपाती फिरोगी, मेरी बात गिरह में बाँध लो।

    सारन्धा—जिस दिन ऐसा होगा, मैं भी अपना वचन पूरा कर दिखाऊँगी।

    इस घटना के तीन महीने पीछे अनिरुद्ध महरौना को जीत करके लौटा और साल-भर पीछे सारन्धा का विवाह ओरछा के राजा चम्पतराय से हो गया। मगर उस दिन की बातें दोनों महिलाओं के हृदय-स्थल में काँटे की तरह खटकती रहीं।

    ( ३ )

    राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुँदेला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उसने मुग़ल बादशाहों को कर देना बन्द कर

    दिया और अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगा। मुसलमानों की सेनायें बार-बार उस पर हमले करती थीं; पर हार कर लौट जाती थीं।

    यही समय था, जब अनिरुद्ध ने सारन्धा का चम्पतराय से विवाह कर दिया। सारन्धा ने मुँहमाँगी मुराद पाई। उसकी यह अभिलाषा कि मेरा पतिदेला जाति का कुल-तिलक हो, पूरी हुई। यद्यपि राजा के रनिवास में पाँच रानियाँ थीं, मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम हो गया कि वह देवी जो हृदय में मेरी पूजा करती है, सारन्धा है।

    परन्तु कुछ ऐसी घटनायें हुई कि चम्पतराय को मुगल-बादशाह का आश्रित होना पड़ा। वह अपना राज्य अपने भाई पहाड़सिंह को सौंपकर आप देहली को चला गया। यह शाहजहाँ के शासनकाल का अन्तिम भाग था। शाहजादा दारा शिकोह राजकीय कार्यों को सँभालते थे। युवराज की आँखों में शील था और चित्त में उदारता। उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथायें सुनी थीं, इसलिए उसका बहुत आदर-सम्मान किया, और कालपी की बहुमूल्य जागीर उसके भेंट की, जिसकी आमदनी नौ लाख थी। यह पहला अवसर था कि चम्मराय की आये-दिन की लड़ाई-झगड़े से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग-विलास का प्राबल्य हुआ। रात-दिन आमोद-प्रमोद की चर्चा रहने लगी। राजा विलास में डूबे, रानियाँ जड़ाऊ गहनों पर रीझी। मगर सारन्धा इन दिनों बहुत उदास और संकुचित रहती। वह इन रहस्यों से दूर-दूर रहती, ये नृत्य और गान की सभायें से सूनी प्रतीत होती। एक दिन चम्पतराय ने सारन्धा से कहा—सारन, तुम उदास क्यों रहती हो? मैं तुम्हें कभी हँसते नहीं देखता। क्या मुझसे नाराज हो?

    सारन्धा की आँखों में जल भर आया। बोली-स्वामी जी! आप क्यों ऐसा विचार करते है? जहाँ आप प्रसन्न हैं, वहाँ मैं भी खुश हूँ।

    चम्पतराय—मैं जब से यहाँ आया हूँ मैंने तुम्हारे मुख-कमल पर कभी मनोहारिणी मुसकिराहट नहीं देखी। तुमने कभी अपने हाथों से मुझे बीड़ा नहीं खिलाया। कभी मेरी पाग नहीं सँवारी कभी मेरे शरीर पर शस्त्र नहीं सजाये। कहीं प्रेमलता मुराझाने तो नहीं लगी?

    सारन्धा—प्राणनाथ! आप मुझसे ऐसी बाते पूछते हैं, जिसका उत्तर मेरे पास नहीं है! यथार्थ में इन दिनों मेरा चित्त कुछ उदास रहता है। मैं बहुत चाहती हूँ कि खुश रहूँ; मगर एक बोझा-सा हृदय पर धरा रहता है।

    चम्पतराय स्वयं आनन्द में मग्न थे। इसलिये उनके विचार में सारन्धा को असन्तुष्ट रहने का कोई उचित कारण नहीं हो सकता था। वे भौंहें सिकोड़कर बोले—मुझे तुम्हें उदास रहने का कोई विशेष कारण नहीं मालूम होता। ओरछे में कौन सा सुख था,जो यहाँ नहीं है? सारन्धा का चेहरा लाल हो गया। बोली—मैं कुछ कहूँ, आप नाराज तो न होंगे?

    चम्पतराय—नहीं, शौक से कहो। सारन्धा—ओरछा में मैं एक राजा की रानी थी। यहाँ मैं एक जागीरदार की चेरी हूँ। ओरछा में मैं वह थी जो अवध में कौशल्या थीं; परन्तु यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से काँपता था । रानी से चेरी होकर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महंगे दामों में मोल ली हैं।

    चम्पतराय के नेत्रों से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारन्धा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे माँ-बाप का बालक माँ को चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह ओरछा की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गई। उन्होंने आदर-युक्त अनुराग के साथ सारन्धा को हृदय से लगा लिया।

    आज से उन्हें फिर उसी उजड़ी बस्ती की फिक्र हुई, जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषायें खींच लाई थीं।

    (४)

    माँ अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जोती है। चम्पतराय के आने से बुन्देलखण्ड निहाल हो गया। ओरछा के भाग जागे। नौबतें झड़ने लगी, और फिर सारन्धा के कमल-नेत्रों में जातीय अभिमान का आभास दिखाई देने लगा।

    यहाँ रहते कई महीने बीत गये। इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा। शाहज़ादाओं में पहले से ईर्षा की अग्नि दहक रही थी। यह ख़बर सुनते ही ज्वाला प्रचण्ड हुई। संग्राम की तैयारियाँ

    होने लगीं। शाहज़ादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने-अपने दल सजाकर दक्खिन से चले। वर्षा के दिन थे। उर्बरा भूमि रंग-बिरंग के रूप भरकर अपने सौन्दर्य को दिखाती थी।

    मुराद और मुहीउद्दीन उमंगों से भरे हुए कदम बढ़ाते चले आते थे। यहाँ तक कि वे धौलपुर के निकट चम्बल के तट पर आ पहुँचे; परन्तु यहाँ उन्होने बादशाही सेना को अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया।