चन्द्रकांता सन्तति २
कमलिनी––नहीं, मगर इतना जानती हूँ कि इस बाग के चौथे दर्जे में किसी ठिकाने वे कैद हैं।
इन्द्रजीतसिंह––क्या इस बाग के कई दर्जे हैं, जिसमें मायारानी रहती है और जहाँ हम लोग बेबस करके लाये गये थे?
कमलिनी––हाँ, इस बाग के चार दर्जे हैं। पहले में तो सिपाहियों और नौकरों के ठहरने का ठिकाना है, दूसरे दर्जे में स्वयं मायारानी रहती है, तीसरे और चौथे दर्जे में कोई नहीं रहता। हाँ, यदि कोई ऐसा कैदी हो जिसे बहुत ही गुप्त रखना मंजूर हो तो वहाँ भेज दिया जाता है। तीसरे और चौथे दर्जे को तिलिस्म कहना चाहिए, बल्कि चौथा दर्जा तो (काँपकर) ओफ, बड़ी-बड़ी भयानक चीजों से भरा हुआ है।
इन्द्रजीतसिंह––तो उसी चौथे दर्जे में हमारे माता-पिता कैद हैं?
कमलिनी––जी हाँ।
आनन्दसिंह––शायद तुम्हारी छोटी बहिन कुछ जानती हों जो तुम्हारे साथ हैं?
कमलिनी––नहीं-नहीं, यह बेचारी तीसरे और चौथे दर्जे का हाल कुछ भी नहीं जानती।
लाड़िली––बल्कि तीसरे और चौथे दर्जे का पूरा-पूरा हाल मायारानी को भी नहीं मालूम। कमलिनी बहिन को मालूम न था, मगर दो ही चार महीनों में ना मालूम क्योंकर वहाँ का विचित्र हाल इन्हें मालूम हो गया। देखिये, इसी सुरंग को जिसने हमें लोग जा रहे हैं, मायारानी भी नहीं जानती और मुझे तो इसका कुछ गुमान भी न था।
यहाँ पर कमलिनी के हाथ की वह मोमबत्ती जल कर पूरी हो गयी और कमलिनी ने उसे जमीन पर फेंक दिया। अब इस सुरंग में केवल उस कन्दील को रोशनी रह गई, जो ये लोग कैदखाने में से लाये थे और इस समय तारासिंह उसे अपने हाथ में लटकाये सभी के पीछे-पीछे आ रहे,थे। कमलिनी के कहे मुताबिक तारासिंह अब कन्दील लिए हुए आगे-आगे चलने लगे। लगभग बीस कदम जाने के बाद एक चौमुहानी मिली, अर्थात् वहाँ से चारों तरफ सुरंगें गई हुई थीं। कमलिनी ने रुककर इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कहा, "अब यहाँ से अगर हम लोग चाहें तो इस तिलिस्मी मकान के बाहर निकल जा सकते हैं।"
इन्द्रजीतसिंह––यह सामने वाला रास्ता कहाँ गया है?
कमलिनी––बाग के तीसरे और चौथे दर्जे में जाने के लिए यही रास्ता है और बायीं तरफ वाली सुरंग उस दूसरे दर्जे में गई है, जिसमें मायारानी रहती है।
आनन्दसिंह और दाहिनी तरफ जाने से हम लोग कहाँ पहुँचेंगे?
कमलिनी––इस तिलिस्मी मकान या बाग से बाहर जाने के लिए वही राह है।
इन्द्रजीतसिंह––तो अब तुम हम लोगों को कहाँ ले जाना चाहती हो?
कमलिनी––जहाँ आप कहिए।
आनन्दसिंह––अगर मायारानी के बाग में ले चलो तो हम उसे इसी समय गिरफ्तार कर लें, इसके बाद सब काम सहज ही में हो जायगा।
कमलिनी––यह काम सहज नहीं है और इसके सिवाय जहाँ तक मैं समझती हूँ, मायारानी इस समय अपने कमरे में न होगी या यदि होगी भी तो हर तरह से होशियार होगी। केवल इतना ही नहीं वहाँ जाने से और भी कई प्रकार का धोखा है। एक तो उस बाग की चहारदीवारी के बाहर कूदकर या कमन्द लगाकर निकल जाना असंभव है, दूसरे उस बाग की हिफाजत के लिए पाँच सौ सिपाही मुकर्रर हैं जो हमेशा मुस्तैद और सहज ही मायारानी के पास पहुँच जाने के लिए तैयार रहते हैं। मायारानी को गिरफ्तार करके बाग के वाहर ले जाना कठिन है। मेरी समझ में तो आपको एक दफे यहाँ से बाहर निकल जाना चाहिए।
इन्द्रजीतसिंह––मगर मैं कुछ और ही चाहता हूँ।
कमलिनी––वह क्या?
इन्द्रजीतसिंह––यदि तुमसे हो सके तो हमें किसी ऐसी जगह ले चलो, जो इस बाग की सरहद के अन्दर हो और जहाँ दो-तीन रोज तक गुप्त रीति से हम लोग रह भी सकें।
कमलिनी––(कुछ सोचकर) हाँ, यह हो सकता है और इस राय को मैं भी पसंद कहती हूँ।
लाड़िली––(कमलिनी से) तुमने कौन-सी ऐसी जगह सोची है?
कमलिनी––ऐसी जगह बाग के तीसरे दर्जे में है, बल्कि चौथे दर्जे में भी है।
लाड़िली––चौथे दर्जे में जाकर दो-तीन दिन तक रहना उचित नहीं क्योंकि वह बड़ी भयानक जगह है, क्या तुम वहाँ के भेद अच्छी तरह जानती हो?
कमलिनी––हरे कृष्ण गोविन्द! वहाँ का हाल जानना क्या खिलवाड़ है? हाँ, एक मकान के अन्दर जाने का रास्ता जरूर मालूम है, जहाँ कोई दूसरा नहीं पहुँच सकता।
इन्द्रजीतसिंह––तो फिर उसी जगह हम लोगों को क्यों नहीं ले चलती हो?
कमलिनी––(कुछ सोचकर) हाँ, मुझे अब याद आया, इतनी देर से व्यर्थ भटक रही हूँ। अच्छा आप लोग मेरे पीछे-पीछे चले आइये।
सभी को साथ लिए हुए कमलिनी रवाना हुई। थोड़ी दूर जाने के बाद एक बन्द दरवाजा मिला। वह दरवाजा लोहे का था। मगर यह नहीं मालूम होता था कि वह किस तरह खलेगा क्योंकि न तो उसमें कहीं ताली लगाने की जगह थी और न कोई जंजीर या कुंडी ही दिखाई देती थी। दरवाजे की दोनों बगल दीवार में तीन-तीन हाथ ऊँचे दो हाथी बने हुए थे। ये हाथी चाँदी के थे और इनके धड़ का अगला हिस्सा कुछ आगे की तरफ बढ़ा हुआ था। एक हाथी की सूँड में दूसरे हाथी की सूँड गुथी थी। इन दोनों हाथियों के अगले एक-एक पैर आगे बढ़े और कुछ जमीन की तरफ इस प्रकार मुड़े हुए थे, जिसके देखने से मालूम होता था कि दो सफेद हाथी क्रोध में आकर सूँड मिला रहे हैं और लड़ने के लिए तैयार हैं।
कमलिनी––एक ग्रन्थ के पढ़ने से मुझे मालूम हुआ कि यह दरवाजा कमानी के सहारे से खुलता और बन्द होता है और इसकी कमानी इन दोनों हाथियों के पेट में है, जिस पर दोनों सूँड़ों के दबाने से दबाव पहुँचता है, अस्तु यहाँ ताकत का काम है। इन दोनों सूँड़ों को जोर से साथ यहाँ तक झुकाना और दबाना चाहिए कि दरवाजे के साथ लग जायें। मैं देखना चाहती हूँ कि आपके ऐयारों में कितनी ताकत है।
देवीसिंह––अगर किसी आदमी के झुकाये यह झुक सकता है, तो पहले मुझे उद्योग करने दीजिए।
कमलिनी––आइये-आइये, लीजिये, मैं हट जाती हूँ।
देवीसिंह ने दोनों सूँड़ों पर हाथ रखा और छाती से अड़ाकर जोर किया, मगर एक बित्ते से ज्यादा न दबा सके और दरवाजा दो हाथ की दूरी पर था, इसलिए दो हाथ दबाकर ले जाने की आवश्यकता थी। आखिर देवीसिंह यह कहते हुए पीछे हटे, "यह राक्षसी काम है।"
इसके बाद और ऐयारों ने भी जोर किया, मगर देवीसिंह से ज्यादा कान न कर सके। तब कमलिनी कुमारों की तरफ देखकर हँसी और बोली, "सिवाय आप दोनों के यह काम किसी तीसरे से न हो सकेगा!"
आनन्दसिंह––(इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) यदि आज्ञा हो तो मैं भी जोर करूँ?
इन्द्रजीतसिंह––क्या हर्ज है, तुम यह काम बखूबी कर सकते हो!
आज्ञा पाते ही कुँअर आनन्दसिंह ने दोनों सूँड़ों पर हाथ रख के जोर किया और पहले ही जोर में दरवाजे के साथ लगा दिया। यह हाल देखते ही लाड़िली ने जोश में आकर कहा, "वाह-वाह! कैद की मुसीबत उठाकर कमजोर होने पर भी यह हाल है!"
दरवाजे के साथ सूँड़ों का लगना था कि हाथियों के चिंघाड़ने की हलकी आवाज आई और दरवाजा जो एक ही पल्ले का था, सरसर करता जमीन के अन्दर घुस गया। कमलिनी ने आनन्द सिंह से कहा, "अब सूंड़ को पीछे की तरफ हटाइये, मगर पहले सूंड़ के नीचे से या उसके ऊपर से लाँघकर दूसरी तरफ निकल चलिए।
हाथ में कंदील लिए हुए पहले तारासिंह टप गये और दरवाजे के उस पार जा खड़े हुए, तब इन्द्रजीतसिंह दरवाजे के उस पार पहुँचे, उसके बाद कुँअर आनन्दसिंह जाना ही चाहते थे कि एक नई घटना ने सब खेल ही बिगाड़ दिया।
दरवाजे के उस पार एक आदमी न मालूम कब से छिपा बैठा था। उसने फुर्ती से आगे बढ़कर एक लात उस कन्दील में मारी जो तारासिंह के हाथ में थी। कंदील हाथ से छटकर जमीन पर तो न गिरी मगर बुझ गई और एकदम अन्धकार हो गया। यद्यपि यह काम उसने बड़ी फुर्ती से किया, तथापि इन लोगों की निगाह उस पर पड़ ही गई, लेकिन उसकी असली सूरत नजर न पड़ी क्योंकि वह काला कपड़ा पहने और अपने चेहरे को नकाब से छिपाये हुए था।
अँधेरा होते ही उसने दूसरा काम किया। भुजाली उसके पास थी जिसका एक भरपूर हाथ उसने कुँअर इन्द्रजीतसिंह के सिर पर जमाया। अंधेरे के सबब से निशाने में फर्क पड़ गया तो भी कुमार के बायें मोढ़े पर गहरी चोट बैठी। चोट खाते ही कुमार ने पुकारकर कहा, "सब कोई होशियार रहना! दुश्मन के हाथ में हर्बा है और वह मुझे जख्मी भी कर चुका है!"
यह हाल देख और सुनकर कमलिनी ने झट अपने तिलिस्मी खंजर से काम लिया। हम ऊपर लिख आये हैं कि उसकी कमर में दो तिलिस्मी खंजर हैं। उसने एक खंजर हाथ में लेकर उसका कब्जा दबाया और उसमें से बिजली की तरह चमक पैदा हुई जिससे कमलिनी के सिवाय जो आदमी वहाँ थे, कोई भी उस चमक को न सह सका और सभी ने अपनी-अपनी आँखें बन्द कर लीं।
दरवाजे के उस पार भी उसी तरह की सुरंग थी। कमलिनी ने देखा कि दुश्मन अपना काम करके सामने की तरफ भागा जा रहा है, मगर इस खंजर की चमक ने उसे भी चौंधिया दिया था। जिसका नतीजा यह हुआ कि कमलिनी बहुत जल्द ही उसके पास जा पहुँची और खंजर उसके बदन से लगा दिया, जिसके साथ ही वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। खंजर कमर में रखकर कमलिनी लौटी और उसने अपने बटुए में से सामान निकालकर एक मोमबत्ती जलाई तथा इतने में हमारे ऐयार लोग भी दरबाजे के दूसरी तरफ जा पहुँचे।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह के मोढ़े से खून निकल रहा था। यद्यपि कुमार को उसकी कुछ परवाह न थी और उनके चेहरे पर भी किसी प्रकार का रंज न मालूम होता था तथापि देवीसिंह ने जख्म बाँधने का इरादा किया, मगर कमलिनी ने रोककर अपने बटुए में से किसी प्रकार के तेल की एक शीशी निकाली और अपने नाजुक हाथों से घाव पर तेल लगाया, जिससे तुरन्त ही खून बन्द हो गया। इसके बाद अपने आँचल में से थोड़ा कपड़ा फाड़कर जख्म बाँधा। उसके अहसान ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह को पहले ही अपना कर लिया था, अब उसकी मुहब्बत और हमदर्दी ने उन्हें अच्छी तरह अपने काबू में कर लिया।
इन्द्रजीतसिंह––(कमलिनी से) तुम्हारे अहसानों के बोझ से मैं दबा ही जाता हूँ। (मुस्कुरा कर और धीरे से) देखना चाहिए, सिर उठाने का दिन भी कभी आता है या नहीं।
कमलिनी––(मुस्कुरा कर) बस, रहने दीजिये, बहुत बातें न बनाइये।
आनन्दसिंह––मालूम होता है, वह शैतान भाग गया।
कमलिनी––नहीं-नहीं, मेरे सामने से भाग कर निकल जाना जरा मुश्किल है, आगे चल कर आप उसे जमीन पर बेहोश पड़ा हुआ देखेंगे।
इन्द्रजीतसिंह––इस समय तो तुमने वह काम किया है जिसे करामात कहना चाहिए!
कमलिनी––मैं बेचारी क्या कर सकती हूँ, इस समय तो (खंजर की तरफ इशारा करके) इसने बड़ा काम किया।
इन्द्रजीतसिंह––बेशक यह अनूठी चीज है, इसकी चमक ने तो आँखें बन्द कर दी, कुछ देख भी न सके कि तुमने क्या किया। कमलिनी––यह तिलिस्मी खंजर है और इसमें बहुत से गुण हैं।
इन्द्रजीतसिंह––मैं सुनना चाहता हूँ कि इस खंजर में क्या-क्या गुण हैं। बल्कि और भी कई बातें पूछना चाहता हूँ मगर यकायक दुश्मन के पहुँचने से …
कमलिनी––खैर, ईश्वर की मर्जी, मैं खूब जानती हूँ कि सिवाय इस शैतान के और कोई यहाँ तक नहीं आ सकता, तिस पर भी इस दरवाजे को खोलने की इसे सामर्थ्य न थी, इसी से चुपचाप दुबका हुआ था। मगर फिर भी इसका यहाँ तक पहुँच जाना ताज्जुब मालूम होता है।
इन्द्रजीतसिंह––क्या तुम उसे पहचानती हो?
कमलिनी––हाँ, कुछ-कुछ शक तो होता है मगर निश्चय किये बिना कुछ नहीं कह सकती।
इन्द्रजीतसिंह––जो हो, मगर अब हम लोगों को यहाँ से निकल चलने के लिए जल्दी करनी चाहिए।
कमलिनी––पहले इस दरवाजे को बन्द कर लीजिये नहीं तो इस राह से दुश्मन के आ पहुँचने का डर रहेगा।
दरवाजे के दूसरी तरफ भी उसी प्रकार के दो हाथी बने हुए थे। कमलिनी के कहे मुताबिक आनन्दसिंह ने जोर से सूँड को दरवाजे की तरफ हटाया जिससे उस तरफ वाले हाथियों की सूँड ज्यों-की-त्यों सीधी हो गई और दरवाजा भी बन्द हो गया।
इन्द्रजीतसिंह––मालूम होता है कि इस तरफ से कोई दरवाजा खोलना चाहे तो इन हाथियों की सूँड़ों को, जो इस समय दरवाजे के साथ लगी हुई हैं, अपनी तरफ खींच कर सीधा करना पड़ेगा और ऐसा करने से उस तरफ के हाथियों की सूँड़ें दरवाजे के पास आ लगेंगी।
कमलिनी––आपका सोचना बहुत ठीक है, वास्तव में ऐसा ही है।
इन्द्रजीतसिंह––अच्छा, अब यहाँ से चल देना चाहिए, चलते-चलते इस खंजर का गुण भी कहो जिसकी करामात मैं अभी देख चुका हूँ।
कमलिनी––चलते-चलते कहने की कोई जरूरत नहीं, मैं इसी जगह अच्छी तरह समझा कर एक खंजर आपके हवाले करती हूँ।
उस खंजर में जो-जो गुण था उसके विषय में ऊपर कई जगह लिखा जा चुका है, कमलिनी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह को सब समझाया और इसके बाद खंजर के जोड़ की अँगूठी उनके हाथ में पहना कर एक खंजर उनके हवाले किया, जिसे पाकर कुमार बहत प्रसन्न हुए।
लाड़िली––(कमलिनी से) एक खंजर छोटे कुमार को भी देना चाहिए।
कमलिनी––(मुस्कुरा कर) आपकी सिफारिश की कोई जरूरत नहीं है, मैं खुद एक खंजर छोटे कुमार को दूँगी।
आनन्दसिंह––कब?
कमलिनी––यह दूसरा खंजर उसी तरह का मेरे पास है। इसे मैं आपको अभी दे देती मगर इसलिए रख छोड़ा है कि आप ही के लिए इस घर में अभी कई तरह का काम करना है, शायद कभी दुश्मनों के …
आनन्दसिंह––नहीं-नहीं, यह खंजर, जो तुम्हारे पास रह गया है, लेकर मैं तुम्हें खतरे में नहीं डाल सकता, कल-परसों या दस दिन में जब मौका हो तब मुझे देना।
कमलिनी––जरूर दूँगी, अच्छा अब यहाँ से चलना चाहिए।
दोनों कुमारों और ऐयारों को साथ लिये हुए कमलिनी वहाँ से रवाना हुई और उस ठिकाने पहुँची जहाँ वह शैतान बेहोश पड़ा हुआ था जिसने कन्दील बुझा कर कुमार को जख्मी किया था। चेहरे पर से नकाब हटाते ही कमलिनी चौंकी और बोली, "हैं, यह तो कोई दूसरा ही है! मैं समझे हुए थी कि दारोगा, किसी तरह राजा वीरेन्द्रसिंह की कैद से छूट कर आ गया होगा, मगर इसे तो मैं बिल्कुल नहीं पहचानती। (कुछ रुक कर) उसने मेरे साथ दगा तो नहीं की कौन ठिकाना, ऐसे आदमी का विश्वास न करना चाहिए, मगर मैंने तो उसके साथ…"
ऊपर लिखी बातें कह कमलिनी चुप हो गई और थोड़ी देर तक किसी गम्भीर चिन्ता में डूबी-सी दिखाई पड़ी। आखिर कुँअर इन्द्रजीतसिंह से रहा न गया, धीरे से कमलिनी की उँगली पकड़ कर बोले––
इन्द्रजीतसिंह––तुन्हें इस अवस्था में देख कर मुझे जान पड़ता है कि शायद कोई नयी मुसीबत आने वाली है जिसके विषय में तुम कुछ सोच रही हो।
कमलिनी––हाँ, ऐसा ही है, मेरे कामों में विघ्न पड़ता दिखाई देता है। अच्छा मर्जी परमेश्वर की! आपके लिए कष्ट उठाना क्या, जान तक देने को तैयार हूँ। (कुछ रुक कर) अब देर करना उचित नहीं, यहाँ से निकल ही जाना चाहिए।
इन्द्रजीतसिंह––क्या मायारानी के अनूठे बाग के बाहर निकलने को कहती हो?
कमलिनी––हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––मैं तो सोचे हुए था कि माता-पिता को छुड़ा कर तभी यहाँ से जाऊँगा।
कमलिनी––मैंने भी यही निश्चय किया था, परन्तु अब क्या किया जाय, सब के पहले अपने को बचाना उचित है, यदि आप ही आफत में फँसेंगे तो उन्हें कौन छुड़ायेगा!
इन्द्रजीतसिंह––यहाँ की अद्भुत बातों से मैं अनजान हूँ इसलिए जो कुछ करने को कहोगी करना ही पड़ेगा, नहीं तो मेरी राय तो यहाँ से भागने की न थी, क्योंकि जब मेरे हाथ-पैर खुले हैं और सचेत हूँ तो एक क्या पाँच सौ से भी डर नहीं सकता। जिस पर तुम्हारा दिया हुआ यह अनूठा तिलिस्मी खंजर पाकर तो साक्षात् काल का भी मुकाबला करने से बाज न आऊँगा।
कमलिनी––आपका कहना ठीक है, मैं आपकी बहादुरी को अच्छी तरह जानती हूँ, परन्तु इस समय नीति यही कहती है कि यहाँ से निकल जाओ।
इन्द्रजीतसिंह––अगर ऐसा ही है तो चलो मैं चलता हूँ।(धीरे-से कान में) तुम्हारी बुद्धिमानी पर मुझे डाह होता है।
कमलिनी––(धीरे से) डाह कैसा?
इन्द्रजीतसिंह––(दो कदम आगे ले जाकर) डाह इस बात का कि वह बड़ा ही भाग्यशाली होगा जिसके तुम पाले पड़ोगी।
इसके जवाब में कमलिनी ने कुमार को एक हल्की चुटफी काटी और धीरे से कहा, "मुझे तो तुमसे बढ़ कर भाग्यशाली कोई दिखाई नहीं पड़ता मगर … !"
आह, कमलिनी की इस बात ने तो कुमार को फड़का दिया लेकिन इस 'मगर' के शब्द ने भी बड़ा अंधेर किया जिसका सबब हमारे मनचले पाठक स्वयं समझ जायँगे क्योंकि वे कमलिनी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह की पहली बातें अभी भूले न होंगे, जो तालाब के बीच वाले उस मकान में हुई थीं जहाँ कमलिनी रहा करती थी।
कमलिनी––(देवीसिंह से) इस आदमी को जो बेहोश पड़ा है उठा के ले चलना चाहिए।
देवीसिंह––हाँ-हाँ, इसे मैं उठाकर ले चलूँगा।
इद्रजीतसिंह––शायद हम लोगों को फिर लौटना पड़े क्योंकि बाहर निकलने का रास्ता पीछे छोड़ आये हैं।
कमलिनी––हाँ, सुगम रास्ता तो यही था मगर अब मैं उधर न जाऊँगी। कौन ठिकाना हाथी वाले दरवाजे के उस तरफ दुश्मन लोग आ गये हों, क्योंकि कैदखाने की दीवार आप तोड़ ही चुके हैं और उधर वाली सुरंग का मुँह खुला रहने के कारण किसी का आना कठिन नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह––तब दूसरी राह कौन-सी है? क्या उधर चलोगी जिधर से यह दुश्मन आया है?
कमलिनी––नहीं, उधर भी दुश्मनों का गुमान है, आइये मैं एक और ही राह से ले चलती हूँ।
आगे-आगे कमलिनी और उसके पीछे दोनों कुमार और ऐयार लोग रवाना हए।
यहाँ भी दोनों तरफ दीवारों पर सुन्दर तस्वीरें बनी हुई थीं। दस-बारह कदम आगे जाने के बाद बगल की दीवार पर एक छोटा-सा खुला हुआ दरवाजा था जिसे देख कर कमलिनी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, "यह आदमी इसी राह से आया होगा, क्योंकि अभी तक दरवाजा खुला हुआ है, मगर मैं दूसरी ही राह से चलूँगी जो जरा कठिन है।"
कुमार––मैं तो कहता हूँ कि इसी राह से चलो। दरवाजे पर दस-पाँच दुश्मन मिल ही जायँगे तो क्या होगा।
कमलिनी––खैर, तब चलिये।
सब कोई उस राह से बाहर हुए और कमलिनी ने उस दरवाजे को जो एक खटके के सहारे खुलता और बन्द होता था बन्द कर दिया। उस तरफ भी थोड़ी दूर सूरंग में ही जाना पड़ा। जब सुरंग का अन्त हुआ तो छोटी-छोटी सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ने के लिए मिलीं। कमलिनी ने ऊपर की तरफ देखा और कहा, "यहाँ का दरवाजा तो बन्द है।" सबके आगे कमलिनी और फिर दोनों कुमार और ऐयार लोग ऊपर चढ़े। ये सीढ़ियाँ घूमती हुई ऊपर गई थीं, मालूम होता था कि किसी बुर्ज पर चढ़ रहे हैं।
जब सीढ़ियों का अन्त हुआ तो एक चक्कर पहिए की तरह बना हुआ दिखाई दिया जिसे कमलिनी ने चार-पाँच दफे घुमाया। खटके की आवाज के साथ पत्थर की चट्टान अलग हो गई और सभी लोग उस राह से निकल कर बाहर मैदान में दिखाई देने लगे। बाहर सन्नाटा देख कर कमलिनी ने कहा, "शुक्र है कि यहाँ हमारा दुश्मन कोई नहीं दिखाई देता।"
जिस राह से कुमार और ऐयार लोग बाहर निकले वह पत्थर का एक चबूतरा था, जिसके ऊपर महादेव का लिंग स्थापित था। चबूतरे के नीचे की तरफ का बगल वाला पत्थर खुल कर जमीन के साथ सट गया था और वही बाहर निकलने का रास्ता बन गया था। लिंग की बगल में तांबे का बड़ा-सा नन्दी (बैल) बना हुआ था और उसके मोढ़े पर लोहे का एक सर्प कुण्डली मारे बैठा था। कमलिनी ने साँप के सिर को दोनों हाथ से पकड़ कर उभाड़ा और साथ ही नन्दी ने मुँह खोल दिया, तब कमलिनी ने उसके मुँह में हाथ डाल कर कोई पेंच घुमाया। वह पत्थर की चट्टान जो अलग हो गई थी फिर ज्योंकी-त्यों हो गई और सुरंग का मुँह बन्द हो गया। कमलिनी ने साँप के फन को फिर दबा दिया और बैल ने भी अपना मुँह बन्द कर लिया।
इन्द्रजीतसिंह––(कमलिनी से) यह दरवाजा भी अजब तरह से खुलता और बन्द होता है।
कमलिनी––हाँ, बड़ी कारीगरी से बनाया गया है।
इन्द्रजीतसिंह––इसके खोलने और बन्द करने की तरकीब मायारानी को मालूम होगी?
कमलिनी––जी हाँ, बल्कि (लाड़िली की तरफ इशारा करके) यह भी जानती है, क्योंकि बाग के तीसरे दर्जे में जाने के लिए यह भी एक रास्ता है जिसे हम तीनों बहिनें जानती हैं, मगर उस हाथीवाले दरवाजे का हाल, जिसे आपने खोला था, सिवाय मेरे और कोई भी नहीं जानता।
आनन्दसिंह––यह जगह बड़ी भयानक मालूम पड़ती है!
कमलिनी––जी हाँ, यह पुराना मसान है और गंगाजी भी यहाँ से थोड़ी ही दूर पर हैं। किसी जमाने में जब का यह मसान है, गंगाजी इसी जगह पास ही में बहती थीं मगर अब कुछ दूर हट गईं और इस जगह बालू पड़ गया है।
आनन्दसिंह––खैर, अब क्या करना और कहाँ चलना चाहिए?
कमलिनी––अब हमको गंगा पार होकर जमानिया में पहुँचना चाहिए। वहाँ मैंने एक मकान किराये पर ले रवखा है जो बहुत ही गुप्त स्थान में है, उसी में दो-तीन दिन रह कर कार्रवाई करूँगी।
इन्द्रजीतसिंह––गंगा के पार किस तरह जाना होगा?
कमलिनी––थोड़ी ही दूर पर गंगा के किनारे एक किश्ती बँधी हुई है जिस पर मैं आई थी, मैं समझती हूँ वह किश्ती अभी तक वहाँ ही होगी।
सवेरा होने में कुछ विलम्ब न था। मन्द-मन्द दक्षिणी हवा चल रही थी और आसमान पर केवल दस-पाँच तारे दिखाई पड़ रहे थे जिनके चेहरे की चमक-दमक चलाचली की उदासी के कारण मन्द पड़ती जा रही थी, जब कि कमलिनी और कुमार इत्यादि सब कोई वहाँ से रवाना हुए और उसी किश्ती पर सवार होकर जिसका जिक्र कमलिनी ने किया था, गंगा पार हो गये।
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मायारानी उस बेचारे मुसीबत के मारे कैदी को रंज, डर और तरद्दुद की निगाहों से देख रही थी जब कि यह आवाज उसने सुनी, "बेशक मायारानी की मौत आ गई!" इस आवाज ने मायारानी को हद से ज्यादा बेचैन कर दिया। वह घबरा कर चारों तरफ देखने लगी मगर कुछ मालूम न हुआ कि यह आवाज कहाँ से आई। आखिर लाचार होकर धनपत को साथ लिये हुए वहाँ से लौटी और जिस तरह वहाँ गई थी उसी तरह बाग के तीसरे दर्जे से होती हुई कैदखाने के दरवाजे पर पहुँची जहाँ अपने दोनों ऐयार बिहारीसिंह और हरनामसिंह को छोड़ गई थी। मायारानी को देखते ही बिहारीसिंह बोला––
बिहारीसिंह––आप हम लोगों को यहाँ व्यर्थ ही छोड़ गईं।
मायारानी––हाँ, अब मैं भी यही सोचती हूँ क्योंकि अगर तुम दोनों को अपने साथ ले जाती तो इसी समय टण्टा तै हो जाता। यद्यपि धनपत मेरे साथ थी और तम लोग भी जानते हो कि यह बहुत ताकतवर है तथापि मेरा हौसला न पड़ा कि उसे बाहर निकालती।
बिहारीसिंह––(चौंक कर) तो क्या आप अपने कैदी को देखने के लिए चौथे दर्जे में गई थीं! मगर मैंने जो कुछ कहा वह कुछ दूसरे मतलब से कहा था।
मायारानी––हाँ, मैं उसी दुश्मन के पास गई थी जिसके बारे में चण्डूल ने मुझे होशियार किया था, मगर तुमने यह किस मतलब से कहा कि आप हम लोगों को यहाँ व्यर्थ ही छोड़ गई थी?
बिहारीसिंह––मैंने इस मतलब से कहा कि हम लोग यहाँ बैठे-बैठे जान रहे थे कि इस कैदखाने के अन्दर ऊधम मच रहा है मगर कुछ कर नहीं सकते थे।
मायारानी––ऊधम कैसा?
बिहारीसिंह––इस कैदखाने के अन्दर से दीवार तोड़ने की आवाज आ रही थी, मालूम होता है कि कैदियों की हथकड़ी-बेड़ी किसी ने खोल दीं।
मायारानी––मगर तुम्हारी बातों से यह जाना जाता है कि अभी कैदी लोग इसके अन्दर ही हैं। मैं सोच रहा था कि जब ताली लेकर लाड़िली चली गई तो कहीं कैदियों को भी छुड़ा न ले गई हो।
बिहारीसिंह––नहीं-नहीं, कैदी बेशक इसके अन्दर थे और आपके जाने के बाद कैदियों की बातचीत की कुछ-कुछ आवाज भी आ रही थी, कुछ देर बाद दीवार तोड़ने की आहट मालूम होने लगी, मगर अब मैं नहीं कह सकता कि कैदी इसके अन्दर हैं या निकल गये, क्योंकि थोड़ी देर से भीतर सन्नाटा-सा जान पड़ता है, न तो किसी की बातचीत की आहट मिलती है, न दीवार तोड़ने की।
मायारानी––(कुछ सोच कर) दीवार तोड़कर इस बाग के बाहर निकल जाना जरा मुश्किल है, मगर मुझे ताज्जुब मालूम होता है कि उन कैदियों की हथकड़ी-बेड़ी किसने खोली और दीवार तोड़ने का सामान उन्हें क्योंकर मिला! शायद तुम्हें धोखा हुआ हो।
बिहारीसिंह––नहीं-नहीं, मुझे धोखा नहीं हुआ, मैं पागल नहीं हूँ!
हरनामसिंह––क्या हम लोग इतना भी नहीं पहचान सकते कि यह दीवार तोड़ने की आवाज है?
मायारानी––(ऊँची साँस लेकर) हाय, न मालूम मेरी क्या दुर्दशा होगी! खैर, कैदियों के बारे में मैं पीछे सोचूँगी, पहले तुम लोगों से एक दूसरे काम में मदद लिया चाहती हूँ!
बिहारीसिंह––वह कौन-सा काम है?
मायारानी––मैंने जिस काम के लिए उसे कैद किया था वह न हुआ और न आशा है कि वह कोई भेद बताएगा, अतः अब उसे मार कर टण्टा मिटाया चाहती हूँ।
बिहारीसिंह––हाँ आपने उसे जिस तरह की तकलीफ दे रखी है उससे तो उसका मर जाना ही उत्तम है। हाय, वह बेचारा इस योग्य न था। हाय, आपकी बदौलत मेरे भी लोक परलोक दोनों बिगड़ गये! ऐसे नेक और होनहार मालिक के साथ आपके बहकाने से जो कुछ मैंने किया उसका दुःख जन्म भर न भूलूँगा।
मायारानी––और उन नेकियों को याद न करोगे जो मैंने तुम्हारे साथ की थीं।
बिहारीसिंह––खैर, अब इस विषय पर हुज्जत करना व्यर्थ है। जब लालच में आकर बुरा काम कर ही चुके तो अब रोना काहे का है।
हरनामसिंह––मुझे भी इस बात का बहुत ही दुःख है, देखा चाहिए क्या होता है। आजकल जो कुछ देखने-सुनने में आ रहा है उसका नतीजा अवश्य ही बुरा होगा।
मायारानी––(लम्बी साँस लेकर) खैर जो होगा देखा जायेगा मगर इस समय यदि सुस्ती करोगे तो मेरी जान तो जायेगी ही तुम लोग भी जीते न बचोगे।
बिहारीसिंह––यह तो हम लोगों को पहले ही मालूम हो चुका है कि अब उन बुरे कर्मों का फल शीघ्र ही भोगना पड़ेगा मगर खैर आप यह कहिए कि हम लोग क्या करें? जान बचाने की क्या कोई सुरत दिखाई पड़ती है?
मायारानी––मेरे साथ बाग के चौथे दर्जे में चलकर पहले उस कैदी को मारकर छुट्टी करो तो दूसरा काम बताऊँ।
हरनामसिंह––नहीं नहीं नहीं, यह काम मुझसे न हो सकेगा। बिहारीसिंह से हो सके तो इन्हें ले जाइए। मैं उनके ऊपर हर्बा नहीं उठा सकता। नारायण-नारायण, इस अनर्थ का भी कोई ठिकाना है।
मायारानी––(चिढ़कर) हरनाम, क्या तू पागल हो गया है जो मेरे सामने ऐसी बेतुकी बातें करता है? अदब और लिहाज को भी तूने एकदम चूल्हे में डाल दिया! क्या। तू मेरी सामर्थ्य को भूल गया?
हरनामसिंह––नहीं, मैं आपकी सामर्थ्य को को नहीं भूला बल्कि आपकी सामर्थ्य ने स्वयं आपका साथ छोड़ दिया।
बिहारीसिंह और हरनामसिंह की बातें सुन कर मायारानी को क्रोध तो बहुत आया परन्तु इस समय क्रोध करने का मौका न देखकर वह तरह दे गयी। मायारानी बड़ी ही चालबाज और दुष्ट औरत थी, समय पड़ने पर वह एक अदने को बाप बना लेती और काम न होने पर किसीको एक तिनके बराबर भी न मानती। इस समय अपने ऊपर संकट आया हुआ जान उसने दोनों ऐयारों को किसी तरह राजी रखना ही उचित समझा।
मायारानी––क्यों हरनामसिंह, तुमने कैसे जाना कि मेरी सामर्थ्य ने मेरा साथ छोड़ दिया?
हरनामसिंह––वह तो इसी से जाना जाता है कि बेबस कैदी की जान लेने के लिए हम लोगों को ले जाना चाहती हो। उस बेचारे को तो एक अदना लड़का भी मार सकता है।
बिहारीसिंह––हरनामसिंह का कहना ठीक है बाहर खड़े होकर आपके हाथ से चलाई हुई एक तीर उसका काम तमाम कर सकती है।
मायारानी––नहीं; यदि ऐसा होता तो मैं उसे बिना मारे लौट न आती। मेरे कई तीर व्यर्थ गये और नतीजा कुछ भी न निकला!
बिसारीसिंह ––(चौंक कर) सो क्यों?
मायारानी––उसके हाथ में एक ढाल है। न मालूम वह ढाल उसे किसने दी जिस पर वह तीर रोक कर हँसता है और कहता है कि अब मुझे कोई मार नहीं सकता।
बिहारीसिंह––(कुछ सोच कर) अब अनर्थ होने में कोई सन्देह नहीं, यह काम वेशक चण्डूल का है। कुछ समझ में नहीं आता कि वह कौन कम्बख्त है?
मायारानी––अब सोच-विचार में बिलम्ब करना उचित नहीं, जो होना था सो हो चुका, अब जान बचाने की फिक्र करनी चाहिए।
बाहारीसिंह––आपने क्या विचारा?
मायारानी––तुम लोग यदि मेरी मदद न करोगे तो मेरी जान न बचेगी और जब मुझ पर आफत आवेगी तो तुम लोग भी जीते न बचोगे।
बिहारीसिंह––हाँ, यह तो ठीक है, जान बचाने के लिए कोई-न-कोई उद्योग तो करना ही होगा।
मायारानी––अच्छा तो तुम लोग मेरे साथ चलो और जिस तरह हो उस कैदी को यमलोक पहुँचाओ। मुझे विश्वास हो गया कि उस कैदी की जान के साथ हम लोगों की आधी बला टल जायेगी और इसके बदले में मैं तुम दोनों को एक लाख दूँगी।
हरनामसिंह––काम तो बड़ा कठिन है!
यद्यपि बिहारीसिंह और हरनामसिंह अपने हाथ से उस कैदी को मारना नहीं चाहते थे, तथापि मायारानी की मीठी-मीठी बातों से और रुपये की लालच तथा जान के डर से वे लोग यह अनर्थ करने के लिए तैयार हो गये। धनपत और दोनों ऐयारों को साथ लिए हुए मायारानी फिर बाग के चौथे दर्जे की ओर रवाना हुई। सूर्य भगवान के दर्शन तो नहीं हुए थे मगर सवेरा हो चुका था और मायारानी के नौकर नींद से उठकर अपने-अपने कामों में लग चुके थे। लेकिन मायारानी का ध्यान उस तरफ कुछ भी न था, उस बेचारे कैदी की जान लेना ही सबसे जरूरी काम समझ रखा था।
थोड़ी ही देर में चारों आदमी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुँचे और कुएँ के अन्दर उतर कर उस कैदखाने में गये जिसमें मायारानी का वह अनूठा कैदी बन्द था। मायारानी को उम्मीद थी कि उस कैदी को फिर उसी तरह हाथ में ढाल लिए हुए देखेगी, मगर ऐसा न हुआ। उस जंगले वाली कोठरी का दरवाजा खुला हुआ था और उस कैदी का कहीं पता न था।
वहाँ की ऐसी अवस्था देखकर मायारानी अपने रंज और गम को सम्हाल न सकी और एकदम 'हाय' करके जमीन पर गिर कर बेहोश हो गई। धनपत और दोनों ऐयारों के भी होश जाते रहे, उनके चेहरे पीले पड़ गए और निश्चय हो गया कि अब जान जाने में कोई कसर नहीं है। केवल इतना ही नहीं बल्कि डर के मारे वहाँ ठहरना भी वे लोग उचित न समझते थे मगर बेहोश मायारानी को वहाँ से उठाकर बाग के दूसरे दर्जे में ले जाना भी कठिन काम था। इसलिए लाचार होकर उन लोगों को वहाँ ठहरना पड़ा।
बिहारीसिंह ने अपने बटुए में से लखलखा निकाल कर मायारानी को सुंघाया और कोई अर्क उसके मुँह में टपकाया। थोड़ी देर में मायारानी होश में आई और पड़े-पड़े, नीचे लिखी बातें प्रलाप की तरह बकने लगी––
"हाय, आज मेरी जिन्दगी का दिन पूरा हो गया और मेरी मौत आ पहुँची। हाय, मुझे तो अपनी जान का धोखा उसी दिन हो चुका था, जिस दिन कम्बख्त नानक ने दरबार में मेरे सामने कहा था कि 'उस कोठरी की ताली मेरे पास है जिसमें किसी के खून से लिखी हुई किताब रखी है ।' इस समय उसी किताब ने धोखा दिया। हाय, उस किताब के लिए नानक को छोड़ देना ही बुरा हुआ। यह काम उसी हरामजादे का है, लाड़िली और धनपत के किए कुछ भी न हुआ। (धनपत की तरफ देख कर) सच तो यह है कि मेरी मौत तेरे ही सबब से हुई। तेरी ही मुहब्बत ने मुझे गारत किया, तेरे ही सबब से मैंने पाप की गठरी सिर पर लादी, तेरे ही सबब से मैंने अपना धर्म खोया, तेरे ही सबब से मैं बूरे कामों पर उतारू हुई, तेरे ही सबब से मैंने अपने पति के साथ बुराई की, तेरे ही सबब से मैंने अपना सर्वस्व बिगाड़ दिया। तेरे ही सबब से मैं वीरेन्द्रसिंह के लड़कों के साथ बुराई करने के लिए तैयार हुई, तेरे ही सबब से कमलिनी मेरा साथ छोड़ कर चली गई, और तेरे ही सबब से आज मैं इस दशा को पहुँची। हाय, इसमें कोई सन्देह नहीं कि बरे कर्मों का बुरा फल अवश्य मिलता है। हाय, मुझ-सी औरत जिसे ईश्वर ने हर प्रकार का सूख दे रखा था आज बुरे कर्मों की बदौलत ही इस अवस्था को पहुँची। आह मैंने क्या सोचा था और क्या हुआ? क्या बुरे कर्म करके भी कोई सुख भोग सकता है! नहीं नहीं, कभी नहीं, दृष्टान्त के लिए स्वयं मैं मौजूद हूँ!
मायारानी न मालूम और भी क्या-क्या बकती मगर एक आवाज ने उनके प्रलाप में विघ्न डाल दिया और उसके होश-हवास दुरुस्त कर दिए। किसी तरफ से यह आवाज आई––"अब अफसोस करने से क्या होता है, बुरे कर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा।"
बहुत-कुछ विचारने और चारों तरफ निगाह दौड़ाने पर भी किसी की समझ में न आया कि बोलने वाला कौन या कहाँ है। डर के मारे सभी के बदन में कँपकँपी पैदा हो गई। मायारानी उठ बैठी और धनपत तथा दोनों ऐयारों को साथ लिए और काँपते हुए कलेजे पर हाथ रखे वहाँ से अपने स्थान अर्थात् बाग के दूसरे दर्जे की तरफ भागी।
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देखिए चौथा भाग, सातवां बयान।
4
कमलिनी की आज्ञानुसार बेहोश नागर की गठरी पीठ पर लादे हुए भूतनाथ कमलिनी के उस तिलिस्मी मकान की तरफ रवाना हुआ जो एक तालाब के बीचोंबीच में था। इस समय उसकी चाल तेज थी और वह खुशी के मारे बहुत ही उमंग और लापरवाही के साथ बड़े-बड़े कदम भरता जा रहा था। उसे दो बातों की खुशी थी, एक तो उन कागजों को वह अपने हाथ से जला कर खाक कर चुका था जिनके सबब से वह मनोरमा और नागर के आधीन हो रहा था और जिनका भेद लोगों पर प्रकट होने के डर से अपने को मुर्दे से भी बदतर समझे हुए था। दूसरे, उस तिलिस्मी खञ्जर ने उसका दिमाग आसमान पर चढ़ा दिया था, और ये दोनों बातें कमलिनी की बदौलत उसे मिली थीं, एक तो भूतनाथ पहले ही भारी मक्कार ऐयार और होशियार था, अपनी चालाकी के सामने किसी को कुछ गिनता ही न था, दूसरे आज खंजर का मालिक बन के खुशी के मारे अन्धा हो गया। उसने समझ लिया कि अब न तो उसे किसी का डर है और न किसी की परवाह।
अब हम उसके दूसरे दिन का हाल लिखते हैं जिस दिन भूतनाथ नागर की गठरी पीठ पर लादे कमलिनी के मकान की तरफ रवाना हुआ था। भूतनाथ अपने को लोगों की निगाहों से बचाते हुए आबादी से दूर-दूर जंगल, मैदान, पगडंडी और पेचीले रास्ते पर सफर कर रहा था। दोपहर के समय वह एक छोटी-सी पहाड़ी के नीचे पहुँचा जिसके चारों तरफ मकोय और बेर इत्यादि कँटीले और झाड़ी वाले पेड़ों ने एक प्रकार का हलका-सा जंगल बना रक्खा था। उसी जगह एक छोटा-सा 'चूआ' भी था और पास ही में जामुन का एक छोटा-सा पेड़ था। थकावट और दोपहर की धूप से व्याकुल भूतनाथ ने दो-तीन घण्टे के लिए वहाँ आराम करना पसन्द किया। जामुन के पेड़ के नीचे गठरी उतार कर रख दी और आप भी उसी जगह जमीन पर चादर बिछा कर लेट गया। थोड़ी देर बाद जब सुस्ती जाती रही तो उठ बैठा, कुएँ के जल से हाथ-मुँह धोकर कुछ मेवा खाया जो उसके बटुए में था और इसके बाद लखलखा सुंघा नागर को होश में लाया। नागर होश में आकर उठ बैठी और चारों तरफ देखने लगी। जब सामने बैठे भूतनाथ पर नजर पड़ी तो समझ गई कि कमलिनी की आज्ञानुसार यह मुझे कहीं लिए जाता है।
नागर––यह तो मैं समझ ही गई कि कमलिनी ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और उसी की आज्ञा से तू मुझे लिए जाता है, मगर यह देख कर मुझे ताज्जुब होता है कि कैदी होने पर भी मेरे हाथ-पैर क्यों खुले हैं और मेरी बेहोशी क्यों दूर की गई?
भूतनाथ––तेरी बेहोशी इसलिए दूर की गयी कि जिसमें तू भी इस दिलचस्प मैदान और यहाँ की साफ हवा का आनन्द उठा ले। तेरे हाथ-पैर बँधे रहने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि अब मैं तेरी तरफ से होशियार हूँ, तू मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, दूसरे तेरे पास वह अँगूठी भी अब नहीं रहीं जिसके भरोसे तू फूली हुई थी, तीसरे (खंजर की तरफ इशारा करके) यह अनूठा खंजर भी मेरे पास मौजूद है, फिर किसका डर है? इसके अलावा उन कागजों को भी मैं जला चुका जो तेरे पास थे और जिनके सबब से मैं तुम लोगों के आधीन हो रहा था।
नागर––ठीक है, अब तुझे किसी का डर नहीं है, मगर फिर भी मैं इतना कहे बिना न रहूँगी कि तू हम लोगों के साथ दुश्मनी करके कोई फायदा नहीं उठा सकता और राजा वीरेन्द्रसिंह तेरा कसूर कभी माफ न करेंगे।
भूतनाथ––राजा वीरेन्द्रसिंह अवश्य मेरा कसूर माफ करेंगे और जब मैं उन कागजों को जला ही चुका तो मेरा कसूर साबित भी कैसे हो सकता है?
नागर––ऐसा होने पर भी तुझे सच्ची खुशी इस दुनिया में नहीं मिल सकती और राजा वीरेन्द्रसिंह के लिए जान दे देने पर भी तुझे उनसे कुछ विशेष लाभ नहीं हो सकता।
भूतनाथ––सो क्यों? वह कौन सच्ची खुशी है जो मुझे नहीं मिल सकती?
नागर––तेरे लिए सच्ची खुशी यही है कि तेरे पास इतनी धन-दौलत हो कि तू बेफिक्र होकर अमीरों की तरह जिन्दगी काट सके और तेरे पास तेरी वह प्यारी स्त्री भी हो जो काशी में रहती थी और जिसके पेट से नानक पैदा हुआ है।
भूतनाथ––(चौंक कर) तुझे यह कैसे मालूम हुआ कि वह मेरी ही स्त्री थी?
नागर––वाह-वाह, क्या मुझसे कोई बात छिपी रह सकती है? मालूम होता है नानक ने तुझसे वह सब हाल नहीं कहा जो तेरे निकल जाने के बाद उसे मालूम हआ था और जिसकी बदौलत नानक को उस जगह का पता लग गया जहाँ किसी के खून से लिखी हुई किताब रक्खी हुई थी?
भूतनाथ––नहीं, नानक ने मुझसे वह सब हाल नहीं कहा, बल्कि वह यह भी नहीं जानता कि मैं ही उसका बाप हूँ, हाँ, खून से लिखी किताब का हाल मुझे मालूम है।
नागर––शायद वह किताब अभी तक नानक ही के कब्जे में है। भूतनाथ––उसका हाल मैं तुझसे नहीं कह सकता।
नागर––खैर, मुझे उसके विषय में कुछ जानने की इच्छा भी नहीं है।
भूतनाथ––हाँ, तो मेरी स्त्री का हाल तुझे मालूम है?
नागर––बेशक मालूम है।
भूतनाथ––क्या अभी तक वह जीती है?
नागर––हाँ, जीती है मगर अब चार-पाँच दिन के बाद जीती न रहेगी।
भूतनाथ––सो क्यों? क्या बीमार है?
नागर––नहीं बीमार नहीं है, जिसके यहाँ वह कैद है उसी ने उसके मारने का विचार किया है।
भूतनाथ––उसे किसने कैद कर रक्खा है?
नागर––यह हाल तुझसे मैं क्यों कहूँ? जब तू मेरा दुश्मन है और मुझे कैदी बनाकर लिए जाता है तो मैं तेरे साथ नेकी क्यों करूँ?
भूतनाथ––इसके बदले में मैं तेरे साथ कुछ नेकी कर दूँगा।
नागर––बेशक इसमें कोई सन्देह नहीं कि तू हर तरह से मेरे साथ नेकी कर सकता है और मैं भी तेरे साथ बहुत-कुछ भलाई कर सकती हूँ, सच तो यह है कि तुझ पर मेरा दावा है।
भूतनाथ––दावा कैसा
नागर––(हँस कर) उस चाँदनी रात में मेरी चुटिया के साथ फूल गूँथने का दावा! उस मसहरी के नीचे रूठ जाने का दावा! नाखून के साथ खून निकालने का दावा! और उस कसम की सचाई का दावा जो रोहतासगढ़ जाती समय नरमी लिए हुए कठोर पिण्डी पर––! क्या और कहूँ?
भूतनाथ––बस बस बस, मैं समझ गया! विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह सब कार्रवाई तुम्हीं लोगों की तरफ से हुई थी। जरूर नानक की माँ के गायब होने के बाद तू ही उसकी शक्ल बनाके बहुत दिनों तक मेरे घर रही और तेरे ही साथ बहुत दिनों तक मैंने ऐश किया।
नागर––और अन्त में वह 'रिक्तगन्थ' तुमने मेरे ही हाथ में दिया था।
भूतनाथ––ठीक है ठीक है, तो तेरा दावा मुझ पर अब उतना ही हो सकता है जितना किसी बेईमान और बेमुरौवत रण्डी का अपने यार पर।
नागर––खैर उतना ही सही, मैं रण्डी तो हूँ ही, मुझे चालाक और अपने काम का समझ कर मनोरमा ने अपनी सखी बना लिया और इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि उसकी बदौलत मैंने बहुत कुछ सुख भोगा।
भूतनाथ––खैर तो मालूम हुआ कि यदि तू चाहे तो मेरी स्त्री को मुझसे मिला सकती है?
नागर––बेशक ऐसा ही है मगर इसके बदले में तू मुझे क्या देगा?
भूतनाथ––(खंजर की तरफ इशारा करके) यह तिलिस्मी खंजर छोड़ कर जो माँगे सो तुझे दूँ। नागर––मैं तेरा खंजर नहीं लेना चाहती, मैं केवल इतना ही चाहती हूँ कि तू वीरेन्द्रसिंह की तरफदारी छोड़ दे और हम लोगों का साथी बन जा। फिर तुझे हर तरह की खुशी मिल सकती है। तू करोड़ों रुपये का धनी हो जायगा और दुनिया में बड़ी खुशी से अपनी जिन्दगी बितावेगा।
भूतनाथ––यह मुश्किल बात है, ऐसा करने से मेरी सख्त बदनामी ही नहीं होगी बल्कि मैं बड़ी दुर्दशा के साथ मारा जाऊँगा।
नागर––तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा, मैं खूब जानती हूँ कि इस समय जिस सूरत में तुम हो वह तुम्हारी असली सूरत नहीं है और कमलिनी से तुम्हारी नई जान-पहचान है, जरूर कमलिनी तुम्हारी असली सूरत से वाकिफ न होगी इसलिए तुम सूरत बदलकर दुनिया में घूम सकते हो और कमलिनी तुम्हारा कुछ भी नहीं कर सकती।
भूतनाथ––(हँस कर) कमलिनी को मेरा सब भेद मालूम है और कमलिनी के साथ दगा करना अपनी जान के साथ दुश्मनी करना है क्योंकि वह साधारण औरत नहीं है। वह जितनी ही खूबसूरत है उतनी ही बड़ी चालाक धूर्त, विद्वान और ऐयार भी है और साथ इसके नेक और दयावान भी। ऐसे के साथ दगा करना बुरा है। ऐसा करने से दूसरों की क्या कहूँ, खास मेरा लड़का नानक ही मुझ से घृणा करेगा।
नागर––नानक जिस समय अपनी माँ का हाल सुनेगा, बहुत ही प्रसन्न होगा बल्कि मेरा अहसान मानेगा, रहा तुम्हारा कमलिनी से डरना तो वह बहुत बड़ी भूल है, महीने दो महीने के अन्दर ही तुम सुन लोगे कि कमलिनी इस दुनिया से उठ गई, और यदि तुम हम लोगों की मदद करोगे तो आठही दस दिन में कमलिनी का नाम-निशान मिट जायगा। फिर तुम्हें किसी तरह का डर नहीं रहेगा और तुम्हारे इस खंजर का मुकाबला करने वाला भी इस दुनिया में कोई न रहेगा। तुम विश्वास करो कि कमलिनी बहुत जल्द मारी जायगी और तब उसका साथ देने से तुम सूखे ही रह जाओगे। मैं तुम्हें फिर समझा कर कहती हूँ कि हम लोगों की मदद करो। तुम्हारी मदद से हम लोग थोड़े ही दिनों में कमलिनी, राजा वीरेन्द्र सिंह और उनके दोनों कुमारों को मौत की चारपाई पर सुला देंगे। तुम्हारी खूरसूरत प्यारी जोरू तुम्हारे बगल में होगी, करोड़ों रुपये की सम्पत्ति के तुम मालिक होगे और मैं भी तुम्हारी रण्डी बनकर तुम्हारी बगल गर्म करूँगी क्योंकि मैं तम्हें दिल से चाहती हूँ, और ताज्जुब नहीं कि तुम्हें विजयगढ़ का राज्य दिला हूँ। मैं समझती हूँ कि तुम्हें मायारानी की ताकत का हाल मालूम होगा।
भूतनाथ––हाँ हाँ मैं मशहूर मायारानी को अच्छी तरह जानता हँ, परन्तु उसके गुप्त भेदों का हाल कुछ-कुछ सिर्फ कमलिनी की जुबावी सुना है अच्छी तरह नहीं मालूम।
नागर––उसका हाल मैं तुमसे कहूँगी, वह लाखों आदमियों को इस तरह मार डालने की कुदरत रखती है कि किसी को कानों-काम मालूम न हो। उसके एक जरा से इशारे पर तम दीन-दुनिया से बेकार कर दिए गए, तुम्हारी जोरू छीन ली गई, और तुम किसी को मुँह दिखाने लायक न रहे। कहो, जो मैं कहती हूँ वह ठीक है या नहीं?
भूतनाथ––हाँ ठीक है मगर इस बात को मैं नहीं मान सकता कि वह गुप्त रीति से लाखों आदमियों को मार डालने की कुदरत रखती है। अगर ऐसा ही होता तो
च॰ स॰-2-12
वीरेन्द्रसिंह आदि को तथा मुझे मारने में कठिनता ही काहे की थी?
नागर––यह कौन कहता है कि वीरेन्द्रसिंह आदि के मारने में उसे कठिनता है! इस समय वीरेन्द्रसिंह, उनके दोनों कुमार, किशोरी, कामिनी और तेजसिंह आदि कई ऐयारों को उसने कैद कर रक्खा है, जब चाहे तब मार डाले, और तुम्हें तो वह ऐसा समझती है जैसे तुम एक खटमल हो, हाँ कभी-कभी उसके ऐयार धोखा खा जाये तो यह बात दूसरी है। यही सबब था कि रिक्तग्रंथ हम लोगों के हाथ में आकर इत्तिफाक से निकल गया, परन्तु क्या हर्ज है, आज ही कल में वह किताब फिर महारानी मायारानी के हाथ में दिखाई देगी। यदि तुम हमारी बात न मानोगे तो कमलिनी तथा वीरेन्द्रसिंह इत्यादि के पहले ही मारे जाओगे। हम तुमसे कुछ काम निकालना चाहते हैं इसलिए तुम्हें छोड़े जा रहे हैं। फिर जरा सी मदद के बदले में क्या तुम्हें दिया जाता है, इस पर भी ध्यान दो और यह मत सोचो कि कमलिनी ने मुझे और मनोरमा को कैद कर लिया तो कोई बड़ा काम किया, इससे मायारानी का कुछ भी न बिगड़ेगा और हम लोग भी ज्यादा दिन तक कैद में न रहेंगे। जो कुछ मैं कह चुकी हूँ उस पर अच्छी तरह विचार करो और कमलिनी का साथ छोड़ो, नहीं तो पछताओगे और तुम्हारी जोरूभी बिलख-बिलख के मर जायगी। दुनिया में ऐश-आराम से बढ़कर कोई चीज नहीं है सो सब कुछ तुम्हें दिया जाता है, और यदि यह कहो कि तेरी बातों का मुझे विश्वास क्योंकर हो तो इसका जवाब अभी से यह देती हूँ कि मैं तुम्हारी दिलजमई ऐसी अच्छी तरह से कर दूँगी कि तुम स्वयं कहोगे कि हाँ, मुझे विश्वास हो गया। (मुस्कुरा कर और नखरे के साथ भूतनाथ की उँगली दबाकर) मैं तुम्हें चाहती हूँ इसीलिए इतना कहती हूँ, नहीं तो मायारानी को तुम्हारी कुछ भी परवाह न थी, तुम्हारे साथ रहकर मैं भी दुनिया का कुछ आनन्द ले लूँगी।
नागर की बातें सुनकर भूतनाथ चिन्ता में पड़ गया और देर तक कुछ सोचता रह गया। इसके बाद वह नागर की तरफ देखकर बोला, "खैर, तुम जो कुछ कहती हो मैं करूँगा और अपनी प्यारी स्त्री के साथ तुम्हारी मुहब्बत की भी कदर करूँगा!"
इतना सुनते ही नागर ने झट भूतनाथ के गले में हाथ डाल दिया और तब दोनों प्रेमी हँसते हुए उस छोटी-सी पहाड़ी के ऊपर चढ़ गये
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'चूआ'––छोटा सा (हाथ दो हाथ का) खड़ा जिसमें से पहाड़ी पानी धीरे-धीरे दिन-रात बारह महीने निकला करता है।
5
दिन दोपहर से कुछ ज्यादा चढ़ चुका है मगर मायारानी को खाने-पीने की कुछ भी सुध नहीं है। पल-पल में उसकी परेशानी बढ़ती ही जाती है। यद्यपि बिहारीसिंह, हरनामसिंह और धनपत ये तीनों उसके पास मौजूद हैं परन्तु समझाने-बुझाने की तरफ किसी का ध्यान नहीं। उसे कोई भी नहीं दिलासा देता, कोई धीरज भी नहीं बँधाता और कोई भी यह विश्वास नहीं दिलाता कि तुझ पर आई हुई बला टल जायेगी, यहाँ तक कि किसी के मुँह से यह भी नहीं निकलता कि सब्र कर, हम लोग ऐयारी के फन में होशियार हैं, कोई-न-कोई काम अवश्य करेंगे।
ऊपर के बयानों को पढ़ कर पाठक समझ ही गये होंगे कि मायारानी की तरह उसकी सखी धनपत और उसके दोनों ऐयार विहारीसिंह तथा हरनामसिंहभी किसी भारी पाप के बोझ से दबे हुए हैं और ऊपर की घटनाओं ने उन तीनों की भी जान सुखा दी है। ये तीनों ही बदहोश और परेशान हो रहे हैं, इन तीनों को भी अपनी-अपनी फिक्र पड़ी है, और इस समय इन तीनों के अतिरिक्त कोई चौथा आदमी मायारानी के सामने नहीं है, फिर उसे कौन समझावे-बुझावे? इनके सिवाय कोई चौथा आदमी उसके भेदों को जानता भी नहीं और न वह किसी को अपना भेद बताने का साहस कर सकती है। मायारानी की उदासी से चारों तरफ उदासी फैली हुई है। लौंडियों, नौकरों और सिपाहियों को भी चिन्ता ने आकर घेर लिया और कोई भी नहीं जानता कि क्या हुआ या क्या होने वाला है।
बहुत देर तक चुप रहने के बाद बिहारीसिंह ने सिर उठाया और मायारानी की तरफ देखकर कहा––
बिहारीसिंह––एक तो वीरेन्द्रसिंह के ऐयार स्वयं धुरंधर हैं जिनका मुकाबला कोई कर नहीं सकता, दूसरे कमलिनी की मदद से उन लोगों का साहस और भी बढ़ गया है।
धनपत––इसमें कोई सन्देह नहीं कि आज-कल जो खराबी हो रही है वह सब कमलिनी ही की बदौलत है जिसका हम लोग कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
मायारानी––अफसोस, वह कम्बख्त इस तिलिस्मी बाग के अन्दर आकर अपना काम कर जाय और किसी को कानोंकान खबर न हो! हाय, न मालूम हम लोगों की क्या दुर्दशा होने वाली है! क्या करूँ, कहाँ भाग कर जाऊँ अपनी जान बचाने के लिए क्या उद्योग करूँ।
धनपत––अभी एक दम से हताश न हो जाना चाहिए बल्कि देखना चाहिए कि इस मुनादी का क्या असर रिआया के दिल पर होता है।
मायारानी––हाँ, मुझे जरा फिर से समझा के कह तो सही कि मुनादी वाले को क्या कह के पुकारने की आज्ञा मेरी तरफ से दी गई है? उस समय मैं आपे में बिल्कुल न थी इससे कुछ समझ में न आया।
धनपत––आपकी तरफ से मैंने दीवान साहब को हुक्म दिया जिसका बन्दोबस्त उन्होंने पूरा-पूरा किया। मेरे सामने ही उन्होंने चार.डुग्गी वालों को तलब किया और समझा कर कह दिया कि वे लोग शहर भर में पुकार कर इस बात की मुनादी कर दें कि "सरकारी ऐयारों को मालूम हुआ है कि वीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार राजा गोपालसिंह की सूरत बनाकर शहर में आया है, जिन्हें बैकुण्ठ पधारे पाँच वर्ष के लगभग हो चुके हैं और रिआया को भड़काना चाहता है। जो कोई उस कम्बख्त का सिर काट कर लावेगा उसे एक लाख रुपया इनाम दिया जायगा।"
मायारानी––ठीक है, मगर देखना चाहिए इसका नतीजा क्या निकलता है। बिहारीसिंह––दो दिन के अन्दर ही अन्दर कुछ काम न चला तो समझ लेना चाहिए कि इस मुनादी का असर उलटा ही होगा।
मायारानी––खैर, जो कुछ नसीब में लिखा है भोगूँगी, इस समय बदहवास होने से तो काम नहीं चलेगा। मगर यह तो कहो कि तुम दोनों ऐयार ऐसी अवस्था में मेरी सहायता किस रीति से करोगे?
बिहारीसिंह––मेरे किये तो कुछ न होगा। मैं खूब समझ चुका हूँ कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों तथा कमलिनी का मुकाबला मैं किसी तरह नहीं कर सकता। देखो, तेजसिंह ने मेरा मुँह ऐसा काला किया कि अभी तक रंग साफ नहीं होता। न मालूम उसे कैसे-कैसे मसाले याद हैं। इसके अतिरिक्त तुम्हें अपने लिए शायद कुछ उम्मीद हो, मगर मैं तो बिल्कुल ही नाउम्मीद हो चुका हूँ और अब एक घंटे के लिए भी यहाँ ठहरना बुरा समझता हूँ।
मायारानी––क्या तुम वास्तव में ऐसा ही करोगे जैसा कह चुके हो?
बिहारीसिंह––हाँ बेशक मैं अपनी राय पवकी कर चुका हूँ। मैं इसी समय यहाँ से चला जाऊँगा और फिर मेरा पता कोई भी न लगा सकेगा।
मायारानी––(हरनामसिंह की तरफ देख के) और तुम्हारी क्या राय है?
हरनामसिंह––मेरी भी वही राय है जो बिहारीसिंह की है।
मायारानी––खूब समझ-बूझ कर मेरी बातों का जवाब दो।
हरनामसिंह––जो कुछ समझना था समझ चुका।
मायारानी––(कुछ सोचकर) अच्छा मैं एक तरकीब बताती हूँ, अगर उससे कुछ काम न चले तो फिर जो कुछ तुम्हारी समझ में आवे करना या जहाँ जी चाहे जाना।
बिहारीसिंह––अब उद्योग करना वृथा है, मेरे किए कुछ भी न होगा!
मायारानी––नहीं-नहीं, घबराओ मत, तुम जानते हो कि मैं इस तिलिस्म की रानी हूँ जौर इस तिलिस्म में बहत-सी अदभत चीजें हैं। मैं तुम दोनों को एक चीज देती हूँ जिसे देख कर और जिसका मतलब समझ कर तुम दोनों स्वयं कहोगे कि 'कोई हर्ज नहीं, अब हम लोग बात की बात में लाखों आदमियों की जान ले सकते हैं।'
हरनामसिंह––बेशक तुम इस तिलिस्म की रानी हो और तुम्हारे अधिकार में बहुत-सी अनमोल चीजें हैं परन्तु जब तक हम लोग उस वस्तु को देख नहीं लेते जिसके विषय में तुम कह रही हो, तब तक किसी तरह का वादा नहीं कर सकते।
मायारानी––मैं भी तो यही कह रही हूँ, तुम दोनों मेरे साथ चलो और उस चीज को खुद देख लो, फिर अगर मन भरे तो मेरा साथ दो, नहीं तो जहाँ जी चाहे चले जाओ।
हरनामसिंह––खैर; पहले देखें तो सही वह कौन सी अनूठी चीज है, जिस पर तुम्हें इतना भरोसा है।
मायारानी––हाँ, तुम मेरे साथ चलो, मैं अभी वह चीज तुम दोनों के हवाले करती हूँ।
मायारानी उठ खड़ी हुई और धनपत तथा दोनों ऐयारों को साथ लिए हुए वहाँ से रवाना हुई। बाग में घूमती वह उस बुर्ज के पास गई जो बाग के पिछले कोने में था और जिसमें लाड़िली और कमलिनी की मुलाकात हुई थी। उस बुर्ज के बगल ही में एक और कोठरी स्याह पत्थर से बनी हुई थी मगर यह मालूम न होता था कि उसका दरवाजा किधर से है क्योंकि पिछली तरफ तो बाग की दीवार थी और बाकी तीनों तरफ वाली कोठरी की स्याह दीवारों में दरवाजे का कहीं कोई निशान न था। मायारानी ने बिहारी से कहा, 'कमन्द लगाओ क्योंकि हम लोगों को इस कोठरी की छत पर चलना होगा।' बिहारीसिंह ने वैसा ही किया। सबके पहले मायारानी कमन्द के सहारे उस कोठरी पर चढ़ गई और उसके बाद धनपत और दोनों ऐयार भी उसी छत पर जा पहुंचे।
ऊपर जाकर दोनों ऐयारों ने देखा कि छत के बीचोंबीच में एक दरवाजा ठीक वैसा ही है जैसा प्रायः तहखानों के मुँह पर रहता है। वह दरवाजा लकड़ी का था मगर उस पर लोहे की चादर मढ़ी हुई थी और उसमें एक साधारण ताला लगा हुआ था। मायारानी ने हरनामसिंह से कहा, "यह ताला मामूली है, इसे किसी तरह खोलना चाहिए।"
बिहारीसिंह ने ऐयारी के बटुए में से लोहे की एक टेढ़ी सलाई निकाली और उस ताले के मुँह में डालकर ताला खोल डाला, इसके बाद दरवाजे का पल्ला हटा कर किनारे किया। मायारानी ने दोनों ऐयारों को अन्दर जाने के लिए कहा, मगर बिहारीसिंह ने इनकार किया और कहा, "पहले आप इसके अन्दर उतरिये तब हम लोग इसके अन्दर जायेंगे क्योंकि यहाँ की अद्भुत बातों से हम लोग बहुत डर गये हैं।" लाचार होकर मायारानी कमन्द के सहारे उस कोठरी के अन्दर उतर गई जोर इसके बाद धनपत और दोनों ऐयार भी नीचे उतर गये।
ऊपर का दरवाजा खुला रहने से कोठरी के अन्दर चाँदना पहुँच रहा था। यह कोठरी लगभग बीस हाथ के चौडी और इससे कुछ ज्यादा लम्बी थी। यहाँ की जमीन लकड़ा की थी और उस पर किसी तरह का मसाला चढा हआ था। कोठरी के बीचोंबीच में एक छोटा-सा सन्दूक पड़ा हुआ था। धनपत का हाथ पकड़े मायारानी एक किनारे खड़ी हो गई और दोनों ऐयारों की तरफ देखकर बोली, "तुम दोनों मिलकर इस सन्दूक को मेरे पास लाओ।"
हुक्म के मुताबिक दोनों ऐयार उस सन्दूक के पास गए, मगर सन्दूक का कुण्डा पकड़ के उठाने का इरादा किया ही था कि उस जमीन का वह गोल हिस्सा जिस पर दोनों ऐयार खड़े थे किवाड़ के पल्ले की तरह एक तरफ से अन्दर की तरफ यकायक घुस गया और वे दोनों ऐयार जमीन के अन्दर जा रहे, साथ ही एक आवाज ऐसी आई जिसके सुनने से धनपत को मालूम हो गया कि दोनों ऐयार नीचे जल की तह तक पहुँच गये।
इसके बाद जमीन का वह हिस्सा जो लकड़ी का था फिर बराबर हो गया और सन्दूक भी उसी तरह दिखाई देने लगा।
यह हाल देख धनपत डर के मारे काँपने लगी और मायारानी की तरफ देख के बोली, "क्या यह कोई कुआँ है?"
मायारानी––हाँ, यह कुआँ है और ऐसे नमकहरामों को सजा देने के लिए बनाया गया है! दोनों बेईमान ऐयार मेरा साथ छोड़ के अपनी जान बचाना चाहते थे। हरामजादे पाजी नालायक, अब अपनी सजा को पहुँचे।
नपत––इतने दिनों तक आपके साथ रहने पर भी इस कुएँ का हाल मुझे मालूम न था।
मायारानी––यहाँ के बहुत से भेद अभी तुम्हें मालूम नहीं हैं, खैर, अब यहाँ से चलना चाहिए।
धनपत को साथ लिए मायारानी उस कोठरी के बाहर निकली और दरवाजा बन्द करने के बाद कमन्द के सहारे उतरकर अपने खास सोने वाले कमरे में चली आई। मायारानी की लौंडियों ने मायारानी को दोनों ऐयारों और धनपत के साथ उस कोठरी की तरफ जाते देखा था मगर अब केवल धनपत को साथ लिए लौटते देख उनको ताज्जुब हुआ लेकिन डर के मारे कुछ पूछ न सकी।
संध्या का समय हो गया। मायारानी अपने कमरे में जाकर मसहरी पर लेट गई। उस समय बहुत-सी लौंडियाँ उसके सामने थीं मगर इशारा पाकर सब बाहर चली गईं केवल धनपत वहाँ रह गई।
धनपत––आपने बहुत जल्दी की, बेचारे ऐयारों की जान व्यर्थ ही गई।
मायारानी––वे दोनों कमीने इसी लायक थे। इसीलिए मैं उनसे बार-बार पूछ रही थी, जब देख लिया कि वे अपने विचार पर दृढ़ हैं तो लाचार …
धनपत––खैर, जो कुछ हुआ सो अच्छा हुआ लेकिन अब क्या करना चाहिए? अफसोस यह है कि ऐसे समय में बेचारी मनोरमा भी नहीं है।
मायारानी––(लम्बी साँस लेकर) हाय, बेचारी मनोरमा मेरी सच्ची सहायक थी पर उसे भी तेजसिंह ने गिरफ्तार कर लिया। इसी खबर के साथ नागर ने कहला भेजा था कि भूतनाथ के कागजात अपने साथ लेकर उसे छुड़ाने जाती हूँ, मगर उस बात को भी बहुत दिन बीत गए और अभी तक मालूम न हुआ कि नागर के जाने का क्या नतीजा निकला। तेजसिंह ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया हो तो ताज्जुब नहीं, सच तो यह है कि भूतनाथ के मारने में मनोरमा ने बड़ी जल्दी की।
धनपत––बेशक भूतनाथ के मारने में उसने बड़ी भूल की, भूतनाथ से बहुतकुछ काम निकलने की आशा थी!
इतने ही में बाहर से आवाज आई, "थी नहीं बल्कि है!" मायारामी ने दरवाजे की तरफ देखा तो नागर पर निगाह पड़ी।
मायारानी––आह, इस समय तेरा आना बहुत ही अच्छा हुआ, आ, मेरे पास आकर बैठ।
नागर––(मायारानी के पास बैठकर) मैं देखती हूँ कि आज आपकी अवस्था बिल्कुल बदली हुई है। कहिये मिजाज तो अच्छा है?
मायारानी––अच्छा क्या है बस दम निकलने की देर है। नागर––(घबराकर) सो क्यों?
मायारानी––अब आई है तो सब कुछ सुन ही लेगी, पर पहले अपना हाल तो कह कि मेरी प्यारी सखी मनोरमा को छुड़ा लाई या नहीं और चौखट के अन्दर पैर रखते ही तूने यह क्या कहा कि 'थी नहीं बल्कि है!' क्या भूतनाथ मारा नहीं गया? क्या वह खबर झूठ थी।
नागर––हाँ, वह खबर झूठ थी, मनोरमा ने भूतनाथ की जान नहीं ली और न उसे तेजसिंह ने गिरफ्तार किया है बल्कि वह कमलिनी का कैदी है।
मायारानी––तो वह औरत जो मनोरमा की खबर लेकर तेरे पास आई थी, झूठी थी?
नागर––वह स्वयं कमलिनी थी, मनोरमा को कैद कर चुकी थी और मुझे भी गिरफ्तार किया चाहती थी, वह तो असल में भूतनाथ के कागजात ले लेने का बन्दोबस्त कर रही थी बल्कि यों कहना चाहिए कि मैं उसके धोखे में आ गई थी। उसने मुझे गिरफ्तार कर लिया और भूतनाथ के कुल कागजात भी मुझसे लेकर जला दिये।
मायारानी––यह बहुत ही बुरा हुआ, अब भूतनाथ बिल्कुल हम लोगों के कब्जे से बाहर हो गया, खैर जीता है यही बहुत है। यह कह कि तेरी जान कैसे बची?
इसके बाद नागर ने अपना पूरा-पूरा हाल मायारानी के सामने कहा और उसने बड़े गौर से सुना। अन्त में नागर ने कहा, "इस समय भूतनाथ को अपने साथ ले आई हूँ जो जी से हम लोगों की मदद करने के लिए तैयार है।"
यह सुनकर कि भूतनाथ अब हम लोगों का पक्षपाती हो गया और नागर के साथ आया है मायारानी बहुत ही खुश हुई और उसे एक प्रकार की आशा बंध गई। उसने धनपत की तरफ देख कर कहा, "ताज्जुब नहीं कि अब वह बला मेरे सिर से टल जाय जिसके टलने की आशा न थी।"
नागर––आपने अपना हाल तो कुछ कहा ही नहीं! यह जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा है कि आप क्यों उदास हो रही हैं और आप पर क्या बला आई है?
मायारानी––थोड़ी देर में तुझे सब कुछ मालूम हो जायगा, पहले भूतनाथ को मेरे पास बुला ला, मैं स्वयं उससे कुछ बात किया चाहती हूँ!
नागर––नहीं-नहीं, पहले आप अपना कुल हाल मुझसे कहिये क्योंकि मेरी तबीयत घबरा रही है।
मायारानी ने अपना बिल्कुल हाल अर्थात् तेजसिंह का पागल बन के जाना, उन्हें बाग के तीसरे दर्जे में कैद करना, चण्डूल का यकायक पहुँचना और उसकी अद्भुत बातें तथा लाड़िली का दगा दे जाना आदि नागर से कहा, मगर अपने पुराने कैदी के छुडाने का और दोनों ऐयारों के मार डालने का हाल छुपा रक्खा, हाँ उसके बदले में इतना कहा कि "वीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार मेरे पति की सूरत बनाकर आया है जिन्हें मरे पाँच वर्ष के लगभग हए, उसी को गिरफ्तार करने के लिए बिहारीसिंह और हरनामसिंह गये हैं।"
JIM – Assistente
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