चन्द्रकांता सन्तति २
तेजसिंह––मैं इस मूरत पर अच्छी तरह गौर कर रहा हूँ, मुझे आशा है कि कोई अनूठी बात जरूर दिखाई पड़ेगी।
वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब में आकर) देखो-देखो, शेर की आँखें इस तरह घूम रहा हैं जैसे वह इधर-उधर देख रहा हो!
आनन्दसिंह––(अच्छी तरह देखकर) हाँ, ठीक तो है!
इसी समय एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और हाथ जोड़कर बोला, "महाराज, चारों तरफ से दुश्मन की फौज ने आकर हम लोगों को घेर लिया है। दो हजार सवारों के साथ शिवदत्त आ पहुँचा, जरा मैदान की तरफ देखिए।"
न मालूम शिवदत्त इतने दिनों तक कहाँ छिपा हुआ था, और वह क्या कर रहा था। इस समय दो हजार फौज के साथ उसका यकायक आ पहुँचना और चारों तरफ से खँडहर को घेर लेना बड़ा ही दुखदायी हुआ, क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के पास इस समय केवल सौ सिपाही थे।
सूर्य अस्त हो चुका था, चारों तरफ से अँधेरी घिरी चली आती थी। फौज सहित राजा शिवदत्त जब तक खँडहर के पास पहुँचे, तब तक रात हो गई। राजा शिवदत्त को तो यह मालूम ही हो चुका था कि केवल सौ सिपाहियों के साथ राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग इसी खँडहर में हैं, परन्तु राजा वीरेन्द्रसिंह, कुमार और उनके ऐयारों की वीरता और साहस को भी वह अच्छी तरह जानता था, इसलिए रात के समय खँडहर के अन्दर घुसने की उसकी हिम्मत न पड़ी। यद्यपि उसके साथ दो हजार सिपाही थे, मगर खँडहर के अन्दर डेढ़ दो सौ सिपाहियों से ज्यादा नहीं जा सकते थे, क्योंकि उसके अन्दर ज्यादा जमीन न थी, और वीरेन्द्रसिंह तथा उनके साथी इतने आदमियों को कुछ भी न समझते, इसलिए शिवदत्त ने सोचा कि रात भर इस खँडहर को घेर कर चुपचाप पड़े रहना ही उत्तम होगा। वास्तव में शिवदत्त का विचार बहुत ठीक था और उसने ऐसा ही किया भी। राजा वीरेन्द्रसिंह को भी रात-भर सोचने- विचारने की मोहलत मिली। उन्होंने कई सिपाहियों को फाटक पर मुस्तैद कर दिया और उसके बाद अपने बचाव का ढंग सोचने लगे।
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इस समय शिवदत्त की खुशी का अन्दाज करना मुश्किल है और यह कोई ताज्जुब की बात भी नहीं है, क्योंकि लड़ाकों और दोस्त ऐयारों के सहित राजा वीरेन्द्रसिंह को उसने ऐसा बेबस कर दिया कि उन लोगों को जान बचाना कठिन हो गया है। शिवदत्त के आदमियों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और उसे निश्चय हो गया कि अब हम पुनः चुनार की गद्दी पावेगे, और इसके साथ ही नौगढ़, विजयगढ़, गयाजी और रोहतासगढ़ की हुकूमत भी बिना परिश्रम हाथ लगेगी।
एक घने वटवृक्ष के नीचे अपने दोस्तों और ऐयारों को साथ लिये शिवदत्त गप्पें उड़ा रहा है। ऊपर एक सफेद चँदोवा तना हुआ है। बिछावन और गद्दी उसी प्रकार की है जैसी मामूली सरदार अथवा डाकुओं के भारी गिरोह के अफसर की होनी चाहिए। दो मशालची हाथ में मशालें लिए सामने खड़े हैं, और इधर-उधर कई जगह आग सुलग रही है। बाकरअली, खुदाबक्श, यारअली और अजायबसिंह ऐयार शिवदत्त के दोनों तरफ बैठे हैं, और सभी की निगाह उन शराब की बोतलों और प्यालों पर बराबर पड़ रही है जो शिवदत्त के सामने काठ की चौकी पर रखे हुए हैं। धीरे-धीरे शराब पीने के साथ-साथ सब कोई शेखी बघार रहे हैं। कोई अपनी बहादुरी की तारीफ कर रहा है, तो कोई वीरेन्द्रसिंह को सहज ही गिरफ्तार करने की तरकीब बता रहा है। शिवदत्त ने सिर उठाया और बाकरअली ऐयार की तरफ देखकर कुछ कहना चाहा, परन्तु उसी समय उसकी निगाह सामने मैदान की तरफ जा पड़ी, और वह चौंक उठा। ऐयारों ने भी पीछे फिरकर देखा और देर तक उसी तरफ देखते रहे।
दो मशालों की रोशनी, जो कुछ दूर पर थी, इसी तरफ आती दिखाई पड़ी। वे दोनों मशाल मामूली न थे, बल्कि मालूम होता था कि लम्बे नेजे या छोटे-से बाँस के सिरे पर बहुत-सा कपड़ा लपेट कर मशाल का काम लिया गया है और उसे हाथ में लिए बल्कि ऊँचा किए हुए दो सवार घोड़ा दौड़ाते इसी तरफ आ रहे हैं। उन्हीं मशालों को देखकर शिवदत्त चौंका था।
बाकरअली ऐयार पेड़ के ऊपर चढ़ गया और थोड़ी देर में नीचे उतरकर बोला, "मशाल लेकर केवल दो सवार ही नहीं हैं, बल्कि और भी कई सवार उनके साथ मालूम होते हैं।"
थोड़ी देर में शिवदत्त के कई आदमी उन सवारों को अपने साथ लिये हुए वहीं आ पहुँचे, जहाँ शिवदत्त बैठा हुआ था। उन सवारों में से एक ने घोड़े पर से उतरने में शीघ्रता की। शिवदत्त ने पहचान लिया कि वह उसका लड़का भीमसेन है। भीमसेन दौड़कर शिवदत्त के कदमों पर गिर पड़ा। शिवदत्त ने प्रेम के साथ उठाकर गले लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू भर आये और देर तक मुहब्बत-भरी निगाहों से एक दूसरे को देखता रह गया। इसके बाद लड़के का हाथ थामे हुए शिवदत्त अपनी गद्दी पर
जा बैठा, और भीमसेन से बातचीत करने लगा। उन सवारों ने भी कमर खोली जो भीमसेन के साथ आये थे।
भीमसेन––(गद्गद स्वर से) इन चरणों के दर्शन की कदापि आशा न थी।
शिवदत्त––ठीक है, केवल मेरी ही भूल ने यह सब किया, परन्तु आज मुझ पर ईश्वर की दया हुई है, जिसका सबूत इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि वीरेन्द्रसिंह को मैंने फाँस लिया और मेरा प्यारा लड़का भी मुझसे आ मिला। हाँ, यह कहो, तुम्हें छुट्टी क्योंकर मिली?
भीमसेन––(अपने साथियों में से एक की तरफ इशारा करके) केवल इनकी बदौलत मेरी जान बची। भीमसेन ने उस आदमी को जिसको तरह इशारा किया था अपने पास बुलाया और बैठने का इशारा किया, वह अदब के साथ सलाम करने के बाद बैठ गया। उसकी उम्र लगभग चालीस वर्ष के होगी, शरीर दुबला और कमजोर था। रंग यद्यपि गोरा और आँखें बड़ी थीं परन्तु चेहरे से उदासी और लाचारी पाई जाती थी और यह भी मालूम होता था कि कमजोर होने पर भी क्रोध ने उसे अपना सेवक बना रक्खा है।
भीमसेन––इसी ने मेरी जान बचाई है। यद्यपि यह बहुत दुबला और कमजोर मालूम होता है परन्तु परले सिरे का दिलावर और बात का धनी है और मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि इसके ऐसा चतुर और बुद्धिमान होना आजकल के जमाने में कठिन है। यह ऐयार नहीं है मगर ऐयारों को कोई चीज नहीं समझता! यह रोहतासगढ़ का रहने वाला है, वीरेन्द्रसिंह के कारिन्दों के हाथ से दुःखी होकर भागा और इसने कसम खा ली है कि जब तक वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान का नाम-निशान न मिटा लूँगा अन्न न खाऊँगा, केवल कन्दमूल खाकर जान बचाऊँगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह जो कुछ चाहे कर सकता है। रोहतासगढ़ के तहखाने और (हाथ का इशारा करके) इस खँडहर का भेद भी यह बखूबी जानता है जिसमें वीरेन्द्रसिंह वगैरह लाचार और आपके सिपाहियों से घिरे पड़े हैं। इसने मुझे जिस चालाकी से निकाला उसका हाल इस समय कह कर समय नष्ट करना उचित नहीं जान पड़ता क्योंकि आज ही इस थोड़ी सी बची हुई रात में इसकी मदद से एक भारी काम निकलने की उम्मीद है। अब आप स्वयं इससे बातचीत कर लें।
भीमसेन की बात, जो उस आदमी की तारीफ से भरी हुई थी, खुशी के मारे कूल उठा और उससे स्वयं बातचीत करने लगा।
शिवदत्त––सब के पहले मैं आपका नाम सुनना चाहता हूँ।
रूहा––(धीरे से कान की तरफ झुककर) मुझे लोग बाँकेसिंह कहकर पुकारते थे, परन्तु अब कुछ दिनों के लिए मैंने अपना नाम बदल दिया है। आप मुझे 'रूहा' कहकर पुकारा कीजिए जिसमें किसी को मेरा असल नाम मालूम न हो।
शिवदत्त––जैसा आपने कहा वैसा ही होगा। इस समय तो हमने वीरेन्द्रसिंह को अच्छी तरह घेर लिया है, उनके साथ सिपाही भी बहुत कम हैं जिन्हें हम लोग सहज ही गिरफ्तार कर लेंगे। आपका प्रण भी अब पूरा हुआ ही चाहता है। रूहा––(मुस्कुरा कर) इस बन्दोबस्त से आप वीरेन्द्रसिंह का कुछ भी नहीं कर सकते।
शिवदत्त––सो क्यों?
रूहा––क्या आप इस बात को नहीं जानते कि इस खँडहर की दीवार बड़ी मजबूत है?
शिवदत्त––बेशक मजबूत है मगर इससे क्या हो सकता है?
रूहा––क्या इस खँडहर के भीतर घुसकर आप उनका मुकाबला कर सकेंगे?
शिवदत्त––क्यों नहीं!
रूहा––कभी नहीं। इसके अन्दर सौ आदमियों से ज्यादे के जाने की जगह नहीं है और इतने आदमियों को वीरेन्द्रसिंह के साथी सहज ही में काट गिरावेंगे।
शिव––हमारे आदमी दीवारों पर चढ़ कर हमला करेंगे और सबसे भारी बात यह है कि वे लोग दो ही तीन दिन में भूख-प्यास से तंग होकर लाचार बाहर निकलेंगे, उस समय उनको मार लेना कोई बड़ी बात नहीं है।
रूहा––सो भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह खँडहर एक छोटा सा तिलिस्म है जिसका रोहतासगढ़ के तहखाने वाले तिलिस्म से सम्बन्ध है। इसके अन्दर घुसना और दीवारों पर चढ़ना खेल नहीं है। वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों को इस खँडहर का बहुत कुछ भेद मालूम है और आप कुछ भी नहीं जानते इसी से समझ लीजिए कि आपमें और उनमें क्या फर्क है, इसके अतिरिक्त इस खँडहर में बहुत से तहखाने और सुरंगें भी हैं, जिनसे वे लोग बहुत फायदा उठा सकते हैं।
शिवदत्त––(कुछ सोच कर) आप बड़े बुद्धिमान हैं और इस खंडहर का हाल अच्छी तरह जानते हैं। अब मैं अपना बिल्कुल काम आप ही की राय पर छोड़ता हूँ, जो आप कहेंगे मैं वही करूँगा, अब आप ही कहिये क्या किया जाय?
रूहा––अच्छा मैं आपकी मदद करूँगा और राय दूँगा। पहले आप बतावें कि क्या वीरेन्द्रसिंह के यहाँ आने का सबब आप जानते हैं?
शिवदत्त––नहीं।
रूहा––इसका असल हाल मुझे मालूम हो चुका है। (भीमसेन की तरफ देखकर) उस आदमी का कहना बहुत ठीक है।
भीमसेन––बेशक ऐसा ही है, वह आपका शागिर्द होकर आपसे झूठ कभी नहीं बोलेगा।
शिवदत्त––क्या बात है?
रूहा––हम लोग यहाँ आ रहे थे तो रास्ते में मेरा एक चेला मिला था जिसकी जुबानी वीरेन्द्रसिंह के यहाँ आने का सबब हम लोगों को मालूम हो गया।
शिवदन––क्या मालूम हुआ?
रूहा––इस खँडहर के तहखाने में कुँअर इन्द्रजीतसिंह न मालूम क्यों कर जा फँसे हैं जो किसी तरह निकल नहीं सकते, उन्हीं को छुड़ाने के लिए ये लोग आये हैं। मैं खँडहर के हरएक तहखाने और उसके रास्ते को जानता हूँ, अगर चाहूँ तो कुँअर इन्द्र जीतसिंह को सहज ही निकाल लाऊँ।
शिवदत्त––ओ हो, यदि ऐसा हो तो क्या बात है। परन्तु आपको इस खँडहर में कोई जाने क्यों देगा और बिना खँडहर में गये आप तहखाने के अन्दर पहुँच नहीं सकते।
रूहा––नहीं-नहीं, खँडहर में जाने की कोई जरूरत नहीं हैं, मैं बाहर ही बाहर अपना काम कर सकता हूँ।
शिवदत्त––तो फिर ऐसे काम में क्यों न जल्दी की जाय?
रूहा––मेरी राय है कि आप या आपके लड़के भीमसेन पाँच सौ बहादुरों को साथ लेकर मेरे साथ चलें, यहाँ से लगभग दो कोस जाने के बाद एक छोटा सा टूटा-फूटा मकान मिलेगा, पहले उसे घेर लेना चाहिए।
शिवदत्त––उसके घेरने से क्या फायदा होगा?
रूहा––इस खँडहर में से एक सुरंग गई है जो उसी मकान में निकली है, ताज्जुब नहीं है कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह उस राह सेभाग जायँ इसलिए उस पर कब्जा कर लेना चाहिए। सिवाय इसके एक बात और है!
शिवदत्त––वह क्या?
रूहा––उसी मकान में से एक दूसरी सुरंग उस तहखाने में गई है जिसमें कुँअर इन्द्रजीतसिंह हैं। यद्यपि उस सुरंग की राह से इस तहखाने तक पहुँचते-पहुँचते पाँच दरवाजे लोहे के मिलते हैं जिनका खोलना अति कठिन है परन्तु खोलने की तरकीब मुझे मालूम है। वहाँ पहुँचकर मैं और भी कई काम करूँगा।
शिवदत्त––(खुश होकर) तब तो सबके पहले हमें वहाँ ही पहुँचना चाहिए
रूहा––बेशक ऐसा ही होना चाहिए, पांच सौ सिपाही लेकर आप मेरे साथ चलिये या भीमसेन चलें, फिर देखिये मैं क्या करता हूँ।
शिवदत्त––अब भीमसेन को तकलीफ देना तो मैं पसन्द नहीं करता।
रूहा––यह बहुत थक गये हैं और कैद की मुसीबत उठा कर कमजोर भी हो गये हैं, यहाँ का इन्तजाम इन्हें सुपुर्द कीजिए और आप मेरे साथ चलिये।
इसके कुछ ही देर बाद शिवदत्त पाँच सौ फौज को लेकर रूहा के साथ उत्तर की तरफ रवाना हुआ। इस समय पहर भर रात बाकी थी, चाँद ने भी अपना चेहरा छिपा लिया था मगर नरमदिल तारे डबडबाई हुई आँखों से दुष्ट शिवदत्त और उसके साथियों की तरफ देख-देख अफसोस कर रहे थे।
ये पाँच सौ लड़ाके घोड़ों पर सवार थे, रूहा और शिवदत्त अरबी घोड़ों पर सवार सबके आगे-आगे जा रहे थे। रूहा केवल एक तलवार कमर से लगाये हुए था मगर शिवदत्त पूरे ठाठ से था कमर में कटार और तलवार तथा हाथ में नेजा लिये हुए बड़ी खुशी से घुल-घुल कर बातें करता जाता था। सड़क पथरीली और ऊँची-नीची थी इसलिए ये लोग पूरी तेजी के साथ नहीं जा सकते थे तिस पर भी घंटे भर चलने के बाद एक छोटे से टूटे-फूटे मकान दीवार पर रूहा की नजर पड़ी और उसने हाथ का इशारा करके शिवदत्त से कहा, "बस अब हम लोग ठिकाने पर आ पहुँचे, यही मकान है।"
शिवदत्त के साथी सवारों ने उस मकान को चारों तरफ से घेर लिया।
रूहा––इस मकान में कुछ खजाना भी है जिसका हाल मुझे अच्छी तरह मालूम है।
शिवदत्त––(खुश होकर) आजकल मुझे रुपये की जरूरत भी है।
रूहा––मैं चाहता हूँ कि पहले केवल आपको इस मकान में ले चलकर दो एक जगह निशान और वहाँ का कुछ भेद बता दूँ फिर आगे जैसा मुनासिब होगा वैसा किया जायगा। आप मेरे साथ अकेले चलने के लिए तैयार हैं, डरते तो नहीं?
शिवदत्त––(घमंड के साथ) क्या तुमने मुझे डरपोक समझ लिया है? और फिर ऐसी अवस्था में जब कि हमारे पाँच सौ सवारों से यह मकान घिरा हुआ है?
रूहा––(हँसकर) नहीं-नहीं, मैंने इसलिए टोका कि शायद इस पुराने मकान में आपको भूत-प्रेत का गुमान पैदा हो।
शिवदत्त––छि:, मैं ऐसे खयाल का आदमी नहीं हूँ, बस देर न कीजिये, चलिये।
रूहा ने पथरी से आग झाड़ कर मोमबत्ती जलाई जो उसके पास थी और शिवदत्त को साथ लेकर मकान के अन्दर घुसा। इस समय उस मकान की अवस्था बिल्कुल खराब थी, केवल तीन कोठरियाँ बची हुई थीं जिनकी तरफ इशारा करके रूहा ने शिवदत्त से कहा, यद्यपि यह मकान बिल्कुल टूट-फूट गया है मगर इन तीनों कोठरियों को अभी तक किसी तरह का सदमा नहीं पहुँचा है, मुझे केवल इन्हीं कोठरियों से मतलब है। इस मकान की मजबूत दीवारें अभी दो-तीन और बरसातें सम्हालने की हिम्मत रखती हैं।
शिवदत्त––मैं देखता हूँ कि वे तीनों कोठरियाँ एक के साथ एक सटी हुई हैं और इसका भी कोई सबब जरूर होगा।
रूहा––जी हाँ, मगर इन तीन कोठरियों से इस समय तीन काम निकलेंगे।
इसके बाद रूहा एक कोठरी के अन्दर घुसा। इसमें एक तहखाना था और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ नजर आती थीं। शिवदत्त ने पूछा, "मालूम होता है इसी सुरंग की राह आप मुझे ले चलेंगे?" इसके जवाब में रूहा ने कहा, "हाँ इन्द्रजीतसिंह को गिरफ्तार करने के लिए इसी सुरंग में चलना होगा, मगर अभी नहीं, मैं पहले आपको दूसरी कोठरी में ले चलता हूँ जिसमें खजाना है, मेरी तो यही राय है कि पहले खजाना निकाल लेना चाहिए, आपकी क्या राय है?"
शिवदत्त––(खुश होकर) हाँ-हाँ, पहले खजाना अपने कब्जे में लेना चाहिए। कहिये, तो कुछ आदमियों को अन्दर बुलाऊँ?
रूहा––अभी नहीं, पहले आप स्वयं चल कर उस खजाने को देख तो लीजिए।
शिवदत्त––अच्छा चलिये।
अब ये दोनों दूसरी कोठरी में पहुँचे। इसमें भी एक वैसा ही तहखाना नजर आया जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ मौजूद थीं। शिवदत्त को साथ लिए हुए रूहा उस तहखाने में उतर गया। यह ऐसी जगह थी कि यदि सौ आदमी एक साथ मिल कर चिल्लाएं तो भी मकान के बाहर आवाज न जाय। शिवदत्त को उम्मीद थी कि अब रुपये और अशर्फियों से भरे हुए देग दिखाई देंगे मगर उसके बदले यहाँ दस सिपाही ढाल- तलवार लिए मुँह पर नकाब डाले दिखाई पड़े और साथ ही इसके एक सुरंग पर भी नजर पड़ी जो मालूम होता था कि अभी खोद कर तैयार की गई है। शिवदत्त एक दम काँप उठा, उसे निश्चय हो गया कि रूहा ने मेरे साथ दगा की, और ये लोग मुझे मार कर इसी गड़हे में दबा देंगे। उसने एक लाचारी की निगाह रूहा पर डाली और कुछ कहना चाहा मगर खौफ ने उसका गला ऐसा दबा दिया कि एक शब्द भी मुँह से न निकल सका।
उन दसों ने शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया और मुश्कें बाँध लीं। रूहा ने कहा, "बस अब आप चुपचाप इन लोगों के साथ इस सुरंग में चले चलिए नहीं तो इसी जगह आपका सिर काट लिया जायगा।"
इस समय शिवदत्त रूहा और उसके साथियों का हुक्म मानने के सिवाय और कुछ भी न कर सकता था। सुरंग में उतरने के बाद लगभग आधा कोस के चलना पड़ा, इसके बाद सब लोग बाहर निकले और शिवदत्त ने अपने को एक सुनसान मैदान में पाया। यहाँ पर कई साईसों की हिफाजत में बारह घोड़े कसे-कसाये तैयार थे। एक पर शिवदत्त को सवार कराया गया और नीचे से उसके दोनों पैर बाँध दिए गए, बाकी पर रूहा और वे दसों नकाबपोश सवार हुए और शिवदत्त को लेकर एक तरफ को चलते
कुँअर इन्द्रजीतसिंह पर आफत आने से वीरेन्द्रसिंह दुखी होकर उनको छुड़ाने का उद्योग कर ही रहे थे परन्तु बीच में शिवदत्त का आ जाना बड़ा ही दुखदाई हुआ। ऐसे समय में जब कि यह अपनी फौज से बहुत ही दूर पड़े हैं सौ दो सौ आदमियों को लेकर शिवदत्त की दो हजार फौज से मुकाबला करना बहुत ही कठिन मालूम पड़ता था, साथ ही इसके यह सोच कर कि जब तक शिवदत्त यहाँ है कुँअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने की कार्रवाई किसी तरह नहीं हो सकती, वे और भी उदास हो रहे थे। यदि उन्हें कुँअर इन्द्रजीतसिंह का खयाल न होता तो शिवदत्त का आना उन्हें न गड़ता और वे लड़ने से बाज न आते मगर इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह बड़ी फिक्र में पड़ गए और सोचने लगे कि क्या करना चाहिए। सबसे ज्यादा फिक्र तारासिंह को थी क्योंकि वह कुँअर इन्द्रजीत सिंह का मृत शरीर अपनी आँखों से देख चुका था। राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी लोग तो अपनी फिक्र में लगे हुए थे और खंडहर के दरवाजे पर तथा दीवारों पर से लड़ने का इन्तजाम कर रहे थे, परन्तु तारासिंह उस छोटी सी बावली के किनारे जो अभी जमीन खोदने से निकली थी बैठा अपने खयाल में ऐसा डूबा था कि उसे दीन-दुनिया की खबर न थी। वह नहीं जानता था कि हमारे संगी-साथी इस समय क्या कर रहे हैं। आधी रात से ज्यादे जा चुकी थी मगर वह अपने ध्यान में डूबा हुआ बावली के किनारे बैठा है। राजा वीरेन्द्रसिंह ने भी यह सोच कर कि शायद वह इसी बावली के विषय में कुछ सोच रहा है तारासिंह को कुछ न टोका और न कोई काम उसके सुपुर्द किया। हम ऊपर लिख आये हैं कि इस बावली में से कुछ मिट्टी निकल जाने पर बावली के बीचोबीच में पीतल की मूरत दिखाई पड़ी। उस मूरत का भाव यह था कि एक हिरन का शेर ने शिकार किया है और हिरन की गर्दन का आधा भाग शेर के मुँह में है। मूरत बहुत ही खूबसूरत बनी हुई थी।
जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं अर्थात् आधी रात गुजर जाने के बाद यकायक उस मूरत में एक प्रकार की चमक पैदा हुई और धीरे-धीरे वह चमक यहाँ तक बढ़ी कि तमाम बावली बल्कि तमाम खँडहर में उजियाला हो गया, जिसे देख सब-के- सब घबरा गए। वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और कमला ये तीनों आदमी फुर्ती के साथ उस जगह पहुँचे जहाँ तारासिंह बैठा हुआ ताज्जुब में आकर उस मूरत को देख रहा था। घण्टा भर बीतते-बीतते मालूम हुआ कि वह मूरत हिल रही है। उस समय शेर की दोनों आँखें ऐसी चमक रही थीं कि निगाह नहीं ठहरती। मूरत को हिलते देख सभी को बड़ा ताज्जुब हुआ और निश्चय हो गया कि अब तिलिस्म की कोई-न-कोई कार्रवाई हम लोग जरूर देखेंगे।
यकायक मूरत बड़े जोर से हिली और तब एक भारी आवाज के साथ जमीन के अन्दर धँस गई। खँडहर में चारों तरफ अँधेरा हो गया। कायदे की बात है कि आँखों के सामने जब थोड़ी देर तक कोई तेज रोशनी रहे और वह यकायक गायब हो जाय या बुझा दी जाय तो आँखों में मामूली से ज्यादा अँधेरा छा जाता है, वही हालत इस समय खँडहर वालों की हुई। थोड़ी देर तक उन लोगों को कुछ भी नहीं सूझता था। आधी घड़ी गुजर जाने के बाद वह गड़हा दिखाई देने लगा जिसके अन्दर मूरत धँस गई थी। अब उस गड़हे के अन्दर भी एक प्रकार की चमक मालूम होने लगी और देखते-देखते हाथ में चमकता हुआ नेजा लिए वही राक्षसी उस गड़हे में से बाहर निकली जिसका जिक्र ऊपर कई दफे किया जा चुका है।
हमारे वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयार लोग उस औरत को कई दफे देख चुके थे और वह औरत इनके साथ अहसान भी कर चुकी थी, इनलिए उसे यकायक देख कर वे लोग कुछ प्रसन्न हुए और उन्हें विश्वास हो गया कि इस समय यह औरत जरूर हमारी कुछ-न-कुछ मदद करेगी और थोड़ा-बहुत यहाँ का हाल भी हम लोगों को जरूर मालूम होगा।
उस औरत ने नेजे को हिलाया। हिलने के साथ ही बिजली-सी चमक उसमें पैदा हुई और तमाम खंडहर में उजाला हो गया। वह वीरेन्द्र सिंह के पास आई और बोली, आपको पहर भर की मोहलत दी जाती है। इसके अन्दर इस खँडहर के हर एक तहखाने में यदि रास्ता मालूम है तो आप घूम सकते हैं। शाहदरवाजा जो बन्द हो गया था, उसे आपके खातिर से पहर भर के लिए मैंने खोल दिया है। इससे विशेष समय लगाना अनर्थ करना है।"
इतना कह वह राक्षसी उसी गड़हे में घुस गई और वह पीतल वाली मूरत जमीन के अन्दर धँस गई थी फिर अपने स्थान पर आकर बैठ गई। इस समय उसमें किसी तरह की चमक न थी। अब वीरेन्द्रसिंह और आनन्दसिंह वगैरह को कुँअर इन्द्रजीत सिंह से मिलने की उम्मीद हुई।
वीरेन्द्रसिंह––कुछ मालूम नहीं होता कि यह औरत कौन है और समय-समय पर हम लोगों की सहायता क्यों करती है
तारासिंह––जब तक वह स्वयं अपना हाल न कहे हम लोग उसे किसी तरह नहीं जान सकते। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह औरत तिलिस्मी है और कोई भारी सामर्थ्य रखती है।
कमला––परन्तु सूरत इसकी भयानक है।
तेजसिंह––यदि यह सूरत बनावटी हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं।
वीरेन्द्रसिंह––हो सकता है, खैर, अब हमको तहखाने के अन्दर चलना और इन्द्रजीत को छुड़ाना चाहिए, पहर भर का समय हम लोगों के लिए कम नहीं है, मगर शिवदत्त के लिए क्या किया जाय? यदि वह इस खँडहर में घुस आने और लड़ने का उद्योग करेगा तो यह अमूल्य पहर भर समय यों ही नष्ट हो जायगा।
तेजसिंह––इसमें क्या सन्देह है? ऐसे समय में इस कम्बख्त का चढ़ आना बड़ा ही दुःखदायी हुआ।
इतना कहकर तेजसिंह गौर में पड़ गये और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। इसी बीच में खँडहर के फाटक की तरफ से सिपाहियों के चिल्लाने की आवाज आई और यह भी मालूम हुआ कि वहाँ लड़ाई हो रही है।
जिस समय शिवदत्त के चढ़ आने की खबर मिली थी उसी समय राजा वीरेन्द्रसिंह के हुक्म से पचास सिपाही खँडहर के फाटक पर मुस्तैद कर दिये गये थे और उसिपाहियों ने आपस में निश्चय कर लिया था कि जब तक पचास में से एक भी जीता रहेगा, फाटक के अन्दर कोई घुसने न पावेगा।
फाटक पर कोलाहल सुनकर तेजसिंह और तारासिंह दौड़े गये और थोड़ी देर में वापस आकर खुशी-भरी आवाज में तेजसिंह ने वीरेन्द्रसिंह से कहा, "वेशक फाटक पर लड़ाई हो रही है। न मालूम हमारे किस दोस्त ने किस ऐयारी से शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया जिससे उसकी फौज हताश हो गई। थोड़े आदमी तो फाटक पर आकर लड़ रहे हैं और बहुत लोग भागे जा रहे हैं। मैंने एक सिपाही से पूछा तो उसने कहा कि "मैं अपने साथियों के साथ फाटक पर पहरा दे रहा था कि यकायक कुछ सवार इसी तरफ से मैदान की ओर भागे जाते देखे। वे लोग चिल्ला-चिल्ला कर यह कहते जाते थे कि 'तुम लोग भागो और अपनी जान बचाओ। शिवदत्त गिरफ्तार हो गया, अब तुम उसे किसी तरह से नहीं छुड़ा सकते!' इसके बाद बहुत-से तो भाग गये और भाग रहे हैं, मगर थोड़े आदमी यहाँ आ गये जो लड़ रहे हैं।
तेजसिंह की बात सुन कर वीरेन्द्र सिंह वीर भाव से यह कहते हुए फाटक की तरफ लपके कि "तब तो पहले उन्हीं लोगों को भगाना चाहिए जो भागने से बच रहे हैं, जब तक दुश्मन का कोई आदमी गिरफ्तार न होगा, खुलासा हाल मालूम न होगा।"
खँडहर के फाटक पर से लौट कर तेजसिंह ने जो कुछ हाल राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा वह बहुत ठीक था। जब रूहा अपनी बातों में फँसा कर शिवदत्त को ले गया, उसके दो घण्टे बाद भीमसेन ने अपने साथियों को तैयार होने और घोड़े कसने की आज्ञा दी। शिवदत्त के ऐयारों को ताज्जुब हुआ, उन्होंने भीमसेन से इसका सबब पूछा जिसके जवाब में भीमसेन ने केवल इतना ही कहा कि "हम क्या करते हैं सो अभी मालूम हो जायगा।" जब घोड़े तैयार हो गये तो साथियों को कुछ इशारा करके भीमसेन घोड़े पर सवार हो गया और म्यान से तलवार निकाल शिवदत्त के आदमियों को जख्मी करता और यह कहता हुआ कि "तुम लोग भागो और अपनी जान बचाओ, शिवदत्त तुम्हारा गिफ़्तार हो गया अब तुम उसे किसी तरह नहीं छुड़ा सकते" मैदान की तरफ भागा। उस समय शिवदत्त के ऐयारों की आँखें खुली और वे समझ गये कि हम लोगों के साथ ऐयारी की गई तथा यह भीमसेन नहीं है, बल्कि कोई ऐयार है! उस समय शिवदत्त की फौज हर तरह से गाफिल और बेफिक्र थी। शिवदत्त के ऐयारों के कई आदमियों ने घोड़ों की नंगी पीठ पर सवार होकर नकली भीमसेन का पीछा किया मगर अब क्या हो सकता था, बल्कि उसका नतीजा यह हुआ कि फौजी आदमी अपने साथियों को भागता हुआ समझ खुद भी भागने लगे। ऐयारों ने रोकने के लिए बहुत उद्योग किया, परन्तु बिना मालिक की फौज कब तक रुक सकती थी, बड़ी मुश्किल से थोड़े आदमी रुके और खँडहर के फाटक पर आकर हुल्लड़ मचाने लगे, परन्तु उस समय उन लोगों की हिम्मत भी जाती रही जब बहादुर वीरेन्द्रसिंह, आनन्दसिंह उनके ऐयार तथा शेरदिल साथी और सिपाही हाथों में नंगी तलवारें लिए उन लोगों पर आ टूटे। राजा वीरेन्द्रसिंह और कुँअर आनन्दसिंह शेर की तरह जिस तरफ झपटते थे, सफाई हो जाती थी। जिसे देख शिवदत्त के आदमियों में से बहुतों की तो यह अवस्था हो गई कि खड़े होकर उन दोनों की बहादुरी देखने के सिवाय कुछ भी न कर सकते थे। आखिर यहाँ तक नौवत पहुँची कि सभी ने पीठ दिखा दी और मैदान का रास्ता लिया।
इस लड़ाई में जो घण्टे भर से ज्यादा तक होती रही, राजा वीरेन्द्रसिंह के दस आदमी मारे गए और बीस जख्मी हुए। शिवदत्त के चालीस मारे गए और साठ जख्मी हुए जिनसे दरियाफ्त करने पर राजा वीरेन्द्रसिंह को भीमसेन और शिवदत्त का खुलासा हाल जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं मालूम हो गया, मगर इसका पता न लगा कि शिवदत्त को किसने किस रीति से गिरफ्तार कर लिया।
वीरेन्द्रसिंह ने अपने कई आदमी लाशों को हटाने और जख्मियों की हिफाजत के लिए तैनात किये और इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए खँडहर के तहखाने में जाने का इरादा किया।
जिस तहखाने में कुँअर इन्द्रजीतसिंह थे, उसके रास्ते का हाल कई दफे लिखा जा चुका है, पुनः लिखने की कोई आवश्यकता नहीं, इसलिए केवल इतना ही लिखा जाता है कि वे दरवाजे जिनका खुलना शाहदरवाजा बन्द हो जाने के कारण कठिन हो गया था अब सुगमता से खुल गए जिससे सभी को खुशी हुई और केवल वीरेन्द्र, तेजसिंह, कमला और तारासिंह मशाल लेकर उस तहखाने के अन्दर उतर आये।
इस समय तारासिंह की अजब हालत थी। उसका कलेजा काँपता और उछलत था। वह सोचता था कि देखें कुँअर इन्द्रजीतसिंह, भैरोंसिंह और कामिनी को किस अवस्था में पाते हैं। ताज्जुब नहीं कि हमारे पाठकों की भी इस समय वही अवस्था हो और वे भी इसी सोच-विचार में हों, मगर वहाँ तहखाने में तो मामला ही दूसरे ढंग का था।
तहखाने में उतर जाने के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह, आनन्दसिंह और ऐयारों ने चारों तरफ देखना शुरू किया मगर कोई आदमी दिखाई न पड़ा और न कोई ऐसी चीज नजर पड़ी जिससे उन लोगों का पता लगता, जिनकी खोज में वे लोग तहखाने के अन्दर गए थे। न तो वह सन्दूक था जिसमें इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और न भैरोंसिंह, कामिनी या उस सिपाही की सूरत नजर आई, जो उस संदूक के साथ तहखाने में आया था, जिसमें कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी।
वीरेन्द्रसिंह (तारासिंह की तरफ देख कर) यहाँ तो कोई भी नहीं है! क्या तुमने उन लोगों को किसी दूसरे तहखाने में छोड़ा था?
तारासिंह––जी नहीं, मैंने उन सभी को इसी जगह छोड़ा। (हाथ से इशारा करके) इसी कोठरी में कामिनी ने अपने को बन्द कर रखा था!
वीरेन्द्रसिंह––कोठरी का दरवाजा खुला हुआ है, उसके अन्दर जाकर देखो तो शायद कोई हो।
कमला ने कोठरी का दरवाजा खोला और झाँककर देखा इसके बाद कोठरी के अन्दर घुस कर उसने आनन्दसिंह और तारासिंह को पुकारा और उन दोनों ने भी कोठरी के अन्दर पैर रखा।
कमला, तारासिंह और आनन्दसिंह को कोठरी के अन्दर घुसे आधी घड़ी से ज्यादा गुजर गई, मगर उन तीनों में से एक भी बाहर न निकला। आखिर तेजसिंह ने पुकारा परन्तु जवाब न मिलने पर लाचार हो हाथ में मशाल लेकर तेजसिंह खुद कोठरी के अन्दर गए और इधर-उधर ढूँढ़ने लगे।
वह कोठरी बहुत छोटी और संगीन थी। चारों तरफ पत्थर की दीवारों पर खूब ध्यान देने से कोई खिड़की या दरवाजे का निशान नहीं पाया जाता था, हाँ ऊपर की तरफ एक छोटा-सा छेद दीवार में था मगर वह भी इतना छोटा था कि आदमी का सिर किसी तरह उसके अन्दर नहीं जा सकता था और दीवार में कोई ऐसी रुकावट भी न थी जिस पर चढ़ कर या पैर रख कर कोई आदमी अपना हाथ उस मोखे (छेद) तक पहुँचा सके। ऐसी कोठरी में से यकायक कमला, तारासिंह और आनन्दसिंह का गायब हो जाना बड़े ही आश्चर्य की बात थी। तेजसिंह ने इसका सबब बहुत कुछ सोचा मगर अक्ल ने कुछ मदद न थी। वीरेन्द्रसिंह भी कोठरी के अन्दर गये और तलवार के कब्जे से हर एक दीवार को ठोंक-ठोंक कर देखने लगे जिसमें मालूम हो जाय कि किसी जगह से दीवार पोली तो नहीं है मगर इससे भी कोई काम न चला। थोड़ी देर तक दोनों आदमी हैरान हो चारों तरफ देखते रहे। आखिर किसी आवाज ने उन्हें चौकन्ना दोनों ध्यान देकर उस छेद की तरफ देखने लगे जो उस कोठरी के अन्दर ऊँची दीवार में था और जिसमें से आवाज आ रही थी। वह आवाज यह थी–– "बस, जहाँ तक जल्द हो सके तुम दोनों आदमी इस तहखाने से बाहर निकल जाओ, नहीं तो व्यर्थ तुम दोनों की जान चली जायेगी। अगर बचे रहोगे तो दोनों कुमारों को छुड़ाने का उद्योग करोगे और पता लगा ही लोगे। मैं वही बिजली की तरह चमकने वाला नेजा हाथ में रखने वाली औरत हूँ, पर लाचार, इस समय मैं किसी तरह तुम्हारी मदद नहीं कर सकती। अब तुम लोग बहुत जल्द रोहतासगढ़ चले जाओ, उसी जगह आकर मैं तुममें मिलूँगी और सब हाल खुलासा कहूँगी। अब मैं जाती हूँ क्योंकि इस समय मुझे भी अपनी जान की पड़ी है।"
इस बात को सुन कर दोनों आदमी ताज्जुब में आ गए और कुछ देर तक सोचने के बाद तहखाने के बाहर निकल आए।
डबडबाई आँखों के साथ उसांसें लेते हुए राजा वीरेन्द्रसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए। कैदियों और अपने कुल आदमियों को साथ लेते गए, मगर तेजसिंह ने न मालूम क्या कह-सुन कर और क्यों छुट्टी ले ली और राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ रोहतासगढ़ न गये।
राजा वीरेन्द्रसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए और तेजसिंह ने दक्खिन का रास्ता लिया। इस वारदात को कई महीने गुजर गये और इस बीच में कोई बात ऐसी नहीं हुई जो लिखने योग्य हो।
3
अब हम अपने पाठकों को फिर उस मैदान के बीच वाले अद्भुत मकान के पास ले चलते हैं जिसके अन्दर इन्द्रजीतसिंह, देवीसिंह, शेरसिंह और कमलिनी के सिपाही लोग जा फँसे थे अर्थात् कमन्द के सहारे दीवार पर चढ़ कर अन्दर की तरफ झाँकने के बाद हँसते-हँसते उस मकान में कूद पड़े थे। हम लिख आये हैं कि जब वे लोग मकान के अन्दर कूद गए तो न मालूम क्या समझ कर कमलिनी हँसी और अपनी ऐयारा तारा को साथ ले वहाँ से रवाना हो गई।
तारा को साथ लिए और बातें करती हुई कमलिनी दक्खिन की तरफ रवाना हुई जिधर का जंगल घना और सुहावना था। लगभग दो कोस चले जाने के बाद जंगब बहुत ही रमणीक मिला, बल्कि यों कहना चाहिए कि जैसे-जैसे वे दोनों बढ़ती जाती थीं, जंगल सुहावना और खुशबूदार जंगली फूलों की महक से बसा हुआ मिलता था। यहाँ तक कि दोनों एक ऐसे सुन्दर चश्मे के किनारे पहुँची जिसका जल बिल्लौर की तरह साफ था और जिसके दोनों किनारों पर दूर-दूर तक मौलसिरी के पेड़ लगे हुए थे। इस चश्मे का पाट दस हाथ का होगा और गहराई दो हाथ से ज्यादा न होगी। यहां की जमीन पथरीली और पहाड़ी थी।
अब ये दोनों उस चश्मे के किनारे-किनारे चलने लगीं। ज्यों-ज्यों आगे जाती थीं, जमीन ऊँची मिलती जाती थी, जिससे समझ लेना चाहिए कि यह मुकाम किसी पहाड़ी की तराई में है। लगभग आधा कोस जाने के बाद वे दोनों ऐसी जगह पहुँचीं जहाँ चश्मे के दोनों किनारे वाले मौलसिरी के पेड़ झुककर आपस में मिल गये थे और जिसके सबब से चश्मा अच्छी तरह से ढँककर मुसाफिरों का दिल लुभा लेने वाली छटा दिखा रहा था। इस जगह चश्मे के किनारे एक छोटा-सा चबूतरा था जिसकी ऊँचाई पुर्सा भर से कम न होगी। चबूतरे पर एक छोटी-सी पिण्डी इस ढब से बनी हुई थी जिसे देखते ही लोगों को विश्वास हो जाय कि किसी साधु की समाधि है।
इस ठिकाने पर पहुँचकर वे दोनों रुकीं और घोड़े से नीचे उतर पड़ीं। तारा ने अपने घोड़े का असबाब नहीं उतारा अर्थात् उसे कसा-कसाया छोड़ दिया परन्तु कमलिनी ने अपने घोड़े का चारजामा उतार लिया और लगाम उतारकर घोड़े को यों ही छोड़ दिया। घोड़ा पहले तो चश्मे के किनारे आया और पानी पीने के बाद कुछ दूर जाकर सब्ज जमीन पर चरने और खुशी-खुशी घूमने लगा। तारा ने भी अपने घोड़े को पानी पिलाया और बागडोर के सहारे एक पेड़ से बाँध दिया। इसके बाद कमलिनी और तारा चश्मे के किनारे पत्थर की एक बड़ी-सी चट्टान पर बैठ गयी और यों बातचीत करने लगीं––
कमलिनी––अब इसी जगह से मैं तुमसे अलग होऊँगी।
तारा––अफसोस, यह दुश्मनी अब हद से ज्यादा बढ़ चली!
कमलिनी––फिर क्या किया जाय, तू ही बता, इसमें मेरा क्या कसूर है।
तारा––तुम्हें कोई भी दोषी नहीं ठहरा सकता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महारानी अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार रही हैं।
कमलिनी––हरएक लक्षण पर ध्यान देने से अब महारानी को भी निश्चय हुआ है कि ये ही दोनों भाई तिलिस्म के मालिक होंगे, फिर उसके लिए जिद करना और उन दोनों की जान लेने का उद्योग करना भूल नहीं तो क्या है?
तारा––बेशक भूल है और इसकी वह सजा पावेंगी। तुमने बहुत अच्छा किया कि उनका साथ छोड़ दिया। (मुस्करा कर) इसके बदले में जरूर तुम्हारी मुराद पूरी होगी।
कमलिनी––(ऊँची साँस लेकर) देखें, क्या होता है।
तारा––होना क्या है? क्या उनकी आँखों ने उनके दिल का हाल तुमसे नहीं कह दिया?
कमलिनी––हाँ, ठीक है। खैर, इस समय तो उन पर भारी मुसीबत या पड़ी है। जहाँ तक हो सके उन्हें जल्द बचाना चाहिए।
तारा––मगर मुझे ताज्जुब मालूम होता है कि उनके छुड़ाने का कोई उद्योग किए बिना ही तुम यहाँ चली आयीं?
कमलिनी––क्या तुझे मालूम नहीं कि नानक ने इसी ठिकाने मुझसे मिलने का वादा लिया है? उसने कहा था कि जब मिलना हो, इसी ठिकाने आना। कह दिया? तारा––(कुछ सोचकर) हाँ-हाँ, ठीक है, अब याद आया। तो क्या वह यही जगह है?
कमलिनी––हाँ, यही जगह है।
तारा––मगर तुम तो इस तरह घोड़ा फेंके चली आयीं, जैसे कई दफे जाने-आने के कारण यहाँ का रास्ता तुम्हें बखूबी याद हो।
कमलिनी––बेशक मैं यहाँ कई दफे आ चुकी हूँ। बल्कि नानक को इस ठिकाने का पता पहले मैंने ही बताया था, और यहाँ का कुछ भेद भी कहा था।
तारा––अफसोस, इस जगह का भेद तुमने आज तक मुझसे कुछ नहीं कहा।
कमलिनी––यद्यपि तू ऐयारा है और मैं तुझे चाहती हूँ, परन्तु तिलिस्मी कायदे के मुताबिक मेरे भेदों को तू नहीं जान सकती।
तारा––सो तो मैं जानती हूँ मगर अफसोस इस बात का है कि मुझसे तो तुमने छिपाया और नानक को यहाँ का भेद बता दिया। न मालूम, नानक की कौन-सी बात पर तुम रीझ गई हो?
कमलिनी––(कुछ हँसकर और तारा के गाल पर धीरे से चपत मारकर) बदमाश कहीं की, मैं नानक पर क्यों रीझने लगी?
तारा––(झुँझलाकर) तो फिर ऐसा क्यों किया?
कमलिनी––अरे, उससे उस कोठरी की ताली जो लेनी है, जिसमें खून से लिखी हुई किताब रखी है।
तारा––तो फिर ताली लेने के पहले ही यहाँ का भेद उसे क्यों बता दिया? अगर वह ताली न दे तब?
कमलिनी––ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि भूतनाथ ने मेरी दिलजमई कर दी है और वह भूतनाथ के कब्जे में है।
"हाँ-हाँ, वह मेरे कब्जे में है––" उसी समय यह आवाज पेड़ों के झुरमुट में से, जो कमलिनी के पीछे की तरफ था, आई और कमलिनी ने फिर कर देखा तो भूतनाथ की सूरत दिखाई पड़ी।
कमलिनी––अजी आओ भूतनाथ, तुम कहाँ थे? मैं बड़ी देर से यहाँ बैठी हूँ, नानक कहाँ है?
बात की बात में नानक भी वहाँ आ पहुँचा और कमलिनी को सलाम करके खड़ा हो गया।
कमलिनी––कहो जी नानकप्रसाद, अब वादा पूरा करने में क्या देर है?
नानक––कुछ देर नहीं। मैं तैयार हूँ, परन्तु आप भी अपना वादा पूरा कीजिये और समाधि पर हाथ रखकर कसम खाइये।
कमलिनी––हाँ-हाँ, लो, मैं अपना वादा पूरा करती हूँ।
भूतनाथ––मेरा भी ध्यान रखना।
कमलिनी––अवश्य।
कमलिनी उठी और समाधि के पास जाकर खड़ी हो गयी। पहले तो उसने
च० स०-2-5
समाधि के सामने अदब से सिर झुकाया और तब उस पर हाथ रखकर यों बोली––
"मैं उस महात्मा की समाधि पर हाथ रखकर कसम खाती हूँ जो अपना सानी नहीं रखता था, हर एक शास्त्र का पूरा पण्डित, पूरा योगी, भूत-भविष्य और वर्तमान का हाल जानने वाला और ईश्वर का सच्चा भक्त था। यद्यपि यह उसकी समाधि है। परन्तु मुझे विश्वास है कि योगिराज सजीव हैं और मेरी रक्षा का ध्यान उन्हें सदैव रहता है। (हाथ जोड़कर) योगिराज से मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी प्रतिज्ञा को निबाहें। (समाधि पर हाथ रखकर) यदि नानक मुझे वह ताली दे देगा तो मैं उसके साथ कभी दगा न करूँगी, उसे अपने भाई के समान मानूँगी और उसी काम में उद्योग करूँगी जिसमें उसकी खुशी हो। मैं उस आदमी के लिए भी कसम खाती हूँ जिसने अपना नाम भूतनाथ रखा हुआ है। उसे मैं अपने सहोदर भाई के समान मानूँगी और जब तक वह मेरे साथ बुराई न करेगा, मैं उसकी भलाई करती कहूँगी।"
इतना कहकर कमलिनी समाधि से अलग हो गयी। नानक ने एक छोटी-सी डिबिया कमलिनी के हाथ में दी और उसके पैरों पर गिर पड़ा। कमलिनी ने पीठ ठोंक कर उसे उठाया और उस डिबिया को इज्जत के साथ सिर से लगाया। इसके बाद चारों आदमी फिर उस पत्थर की चट्टान पर आकर बैठ गये और बातचीत होने लगी।
भूतनाथ––(कमलिनी से) जब आपने मुझे और नानक को अपने भाई के समान मान लिया तो मुझे जो कुछ आपसे कहना हो, दिल खोलकर कह सकता हूँ और जो कुछ माँगना हो माँग सकता हूँ चाहे आप दें अथवा न दें।
कमलिनी––(मुस्कराकर) हाँ-हाँ, जो कुछ कहना हो कहो और जो माँगना हो, माँगो।
भूतनाथ––इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके पास एक से एक बढ़कर अनमोल चीजें होंगी, अस्तु मुझे और नानक को कोई ऐसी चीज दीजिए जो समय पर काम आये और दुश्मनों को धमकाने और उन पर फतह पाने के लिए बेनजीर हो।
कमलिनी––इसके कहने की तो कोई जरूरत न थी, मैं स्वयं चाहती थी कि तुम दोनों को कोई अनमोल वस्तु दूँ, खैर ठहरो, मैं अभी ला देती हूँ।
इतना कह कर कमलिनी उठी और चश्मे के जल में कूद पड़ी। उस जगह जल बहुत गहरा था, इसलिए मालूम न हुआ कि वह कहाँ चली गयी। कमलिनी के इस काम ने सभी को ताज्जुब में डाल दिया और तीनों आदमी टकटकी बाँधकर उसी तरफ देखने लगे।
आधे घण्टे बाद कमलिनी जल के बाहर निकली। उसके एक हाथ में छोटी-सी कपड़े की गठरी और दूसरे हाथ में लोहे की जंजीर थी। यद्यपि कमलिनी जल में से निकली थी और उसके कपड़े गीले हो रहे थे, तथापि उस कपड़े की गठरी पर जल ने कुछ भी असर न किया था, जिसे कमलिनी लाई थी।
कमलिनी ने कपड़े की गठरी पत्थर की चट्टान पर रख दी और लोहे की जंजीर भूतनाथ के हाथ में देकर बोली, "इसे तुम दोनों आदमी मिलकर खींचो।" उस जंजीर के साथ लोहे का एक छोटा-सा मगर हलका सन्दूक बँधा हुआ था, जिसे भूतनाथ और नानक ने खींचकर बाहर निकाला।
कमलिनी ने एक खटका दबाकर सन्दूक खोला। इसके अन्दर चार खंजर, एक नेजा और पाँच अंगूठियाँ थीं। कमलिनी ने पहले एक अँगूठी निकाली और अपनी अंगुली में उसे पहिन लिया, इसके बाद एक खंजर निकाला और उसे भी म्यान से बाहर कर तारा, भूतनाथ और नानक को दिखाकर बोली, "देखो इस खंजर का लोहा कितना उम्दा है।"
भूतनाथ––वेशक बहुत उम्दा लोहा है।
कमलिनी––अब इसके गुण सुनो। यह खंजर जिस चीज पर पड़ेगा उसे दो टुकड़े कर देगा चाहे वह चीज लोहा, पत्थर, अष्टधातु या फौलादी हर्बा क्यों न हो। इसके अतिरिक्त जब इसका कब्जा दबाओगे तो इसमें बिजली की तरह चमक पैदा होगी, उस समय यदि सौ आदमी भी तुम्हें घेरे हुए खड़े होंगे तो चमक से सभी की आँखें बन्द हो जायंगी। यद्यपि इस समय दिन है और किसी तरह की चमक सूर्य का मुकाबला नहीं कर सकती, तथापि इसका मजा मैं तुम्हें दिखाती हूँ।
इतना कह कर कमलिनी ने खंजर का कब्जा दबाया। यकायक इतनी ज्यादा चमक उसमें से पैदा हुई कि दिन का समय होने पर भी उन तीनों की आँखें बन्द हो गईं। मालूम हुआ कि एक बिजली सी आँख के सामने चमक गई।
कमलिनी––सिवाय इसके इस खंजर को जो कोई छूएगा या जिसके बदन से यह खंजर छुआ दोगे उसके खून में एक प्रकार की विजली दौड़ जायगी और वह तुरंत बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ेगा। लो, इसे तुम लोग छूकर देखो, यही अद्भुत खंजर मैं तुम लोगों को दूँगी।
कमलिनी ने खंजर भूतनाथ के आगे रख दिया। भूतनाथ ने उसे उठाना चाहा मगर हाथ लगाने के साथ ही वह काँपा और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ा। कमलिनी ने अपना दूसरा हाथ, जिसमें अंगूठी थी, उसके बदन पर फेरा तब उसे होश आया।
भूतनाथ––चीज तो बहुत अच्छी है मगर इसका छूना गजब है।
कमलिनी––(सन्दूक में से कई अंगूठियाँ निकाल कर) पहले इन अंगूठियों को तुम लोग पहिनो तब इस खंजर को हाथ में ले सकोगे और तभी इसकी तेज चमक भी तुम्हारी आँखों पर अपना पूरा असर न कर सकेगी अर्थात् जो कोई मुकाबले में या तुम्हारे चारों तरफ होगा उसकी आँखें तो बन्द हो जायेंगी, मगर तुम्हारी आँखें खुली रहेंगी और तुम दुश्मनों को बखूबी मार सकोगे।
इतना कह कर कमलिनी ने एक-एक अँगूठी तीनों को पहिना दी और इसके बाद एक-एक खंजर तीनों के हवाले किया। तारा, भूतनाथ और नानक ऐसा अद्भुत खंजर पाकर हद से ज्यादा खुश हुए और घड़ी-घड़ी उसका कब्जा दबाकर उसकी चमक का मजा लेते रहे।
कमलिनी––अव एक खंजर और एक अँगूठी बच गई सो कुँअर इन्द्रजीतसिंह के लिए अपने पास रक्खूँगी। जिस समय उनसे मुलाकात होगी उनके हवाले करूँगी, और यह अँगूठी जो मेरी उँगली में है और यह नेजा, जो अपने वास्ते लाई हूँ, इसमें भी वही गुण हैं जो खंजर में हैं मगर फर्क इतना है कि बनिस्बत खंजर के इस नेजे में बिजली का असर बहुत ज्यादे है।
उस नेजे के चार टुकड़े थे जो पेंच पर चढ़ा कर एक कर दिये जाते थे। कमलिनी ने इन चारों टुकड़ों को एक कर दिया और अब वह पूरा नेजा हो गया।
भूतनाथ––इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपने हम लोगों को अद्भुत और अनमोल चीज दी, इसकी बदौलत हम लोगों के हाथ से बड़े-बड़े काम निकलेंगे।
इसके बाद कमलिनी ने वह कपड़े की गठरी खोली। इसमें स्याह रंग की एक साड़ी, एक चोली और एक बोतल थी। कमलिनी उठ कर समाधि के पीछे गई और गीले कपड़े उतार कर वही काली साड़ी और चोली पहिन कर अपने ठिकाने आ बैठी। वह साड़ी और चोली रेशमी थी और उसमें एक प्रकार का रोगन चढ़ा हुआ था जिसके सबब उस कपड़े पर पानी का असर नहीं होता था। कमलिनी ने वह गीली साड़ी और चोली तारा के सामने रख दी और बोली, "इसे तू पेड़ पर डाल दे जिसमें झटपट सूख जाय, इसके बाद तू कमलिनी बन जा अर्थात् मेरी तरह अपनी सूरत बना ले और इसी साड़ी और चोली को पहिन कर मेरे घर अर्थात् उस तालाब वाले मकान में जाकर बैठ जिसमें नौकरों को मेरे गायब होने का हाल मालूम न हो, वे यही समझें कि तारा कहीं गई हुई है!
तारा––बहुत अच्छा, मगर आप कहाँ जायँगी?
कमलिनी––मेरा कोई ठिकाना नहीं, मुझे बहुत काम करना है। (भूतनाथ और नानक की तरफ देखकर) आप लोग भी जाइये और जहाँ तक हो सके, राजा वीरेन्द्रसिंह की भलाई का उद्योग कीजिये।
नानकप्रसाद––बहुत अच्छा। (हाथ जोड़ कर) मेरी बात का जवाब दीजिए तो बड़ी कृपा होगी।
कमलिनी––वह क्या?
नानकप्रसाद––इस प्रकार का खंजर उन लोगों के पास भी है या नहीं?
कमलिनी––(हँस कर) क्या उन लोगों के पास पुनः जाने की इच्छा है? अपनी रामभोली को देखा चाहता है?
नानकप्रसाद––हाँ, यदि मौका मिलेगा तो।
कमलिनी––अच्छा जा, कोई हर्ज नहीं, इस प्रकार की कोई वस्तु उन लोगों के पास नहीं है और न इसका पता ही उन्हें मिल सकता है। मगर जो कुछ करना, होशियारी के साथ।
इसके बाद कमलिनी ने वह बोतल खोली जो कपड़े की गठरी में थी। उसमें किसी प्रकार का अर्क था। समाधि के पीछे जाकर कमलिनी ने वह अर्क अपने तमाम बदन में लगाया जिससे बात की बात में उसका रंगं बहुत ही काला हो गया, तब वह फिर तारा पास आई और उससे दो लम्बे बनावटी दाँत लेकर अपने मुँह में लगाने के बाद नेजा हाथ में लेकर खड़ी हो गई।
तारा ने भी अपनी सूरत बदली और कमलिनी बन कर तैयार हो गई। इस काम में भूतनाथ ने उसकी मदद की। कमलिनी के हुक्म से वह सन्दूक और जंजीर पानी में डाल दी गई।
कमलिनी ने अपने घोड़े को आवाज दी। यद्यपि वह कुछ दूर पर चर रहा था, परन्तु मालिक की आवाज के साथ ही दौड़ता हुआ पास आ गया। तारा ने उसे पकड़ लिया और चारजामा कस कर उस पर सवार हो गई तथा कमलिनी तारा के घोड़े पर सवार हुई। अन्त में चारों आदमी कुछ सलाह करके अलग हुए और चारों ने अपना-अपना रास्ता लिया अर्थात् उसी जगह से चारों आदमी जुदा हो गए।
इस वारदात के कई दिन बाद कमलिनी इसी राक्षसी वेष में नेजा लिए रोहतासगढ़ की पहाड़ी पर कब्रिस्तान में कमला से मिली थी, इसी ने राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद से छुड़ाया, और फिर भी कई दफे उनके काम आई थी, जिसका हाल पिछले बयानों में लिखा जा चुका है।
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इसका नाम'मौलिश्री'भी है।
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अब तो मौसम में फर्क पड़ गया। ठंडी-ठंडी हवा जो कलेजे को दहला देती थी और बदन में कँपकँपी पैदा करती थी अब भली मालूम पड़ती है। वह धूप भी, जिसे देख चित्त प्रसन्न होता था और जो बदन में लग कर रग-रग से सर्दी निकाल देती थी, अब बुरी मालूम होती है। यद्यपि अभी आसमान पर बादल के टुकड़े दिखाई नहीं देते तथापि संध्या के समय मैदान, बाग और तराई की ठंडी-ठंडी और शीतल तथा मन्द-मन्द वायु सेवन करने को जी चाहता है। वहाँ से हिलते हुए पेड़ों की कोमल-कोमल पत्तियों की बहार आँखों की राह घुस कर अन्दर से दिल को अपनी तरफ खींच लेती है तथा टकटकी बँधी हुई आँखों को दूसरी तरफ देखने का यकायक मौका नहीं मिलता। यद्यपि सूर्य अस्त हुआ ही चाहता है और आसमान पर उड़ने वाले परिन्दों के उतार और जमीन की तरफ झुके हुए एक ही तरफ उड़े जाने से मालूम होता है कि बात की बात में चारों तरफ अँधेरा छा जायगा तथापि हम अपने पाठकों को किसी पहाड़ की तराई में ले चलकर एक अनूठा रहस्य दिखाया चाहते हैं।
तीन तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और बीच में कोसों तक का मैदान रमणीक तो है परन्तु रात की अवाई और सन्नाटे ने उसे भयानक बना दिया है। सूर्य अस्त होने में अभी विलम्ब है परन्तु ऊँचे-ऊँचे पहाड़ सूर्य की आखिरी लालिमा को इस मैदान में पहुँचने नहीं देते। चारों तरफ सन्नाटा है, जहाँ तक निगाह काम करती है इस मैदान में आदमी की सूरत दिखाई नहीं पड़ती, हाँ पश्चिम तरफ वाले पहाड़ के नीचे एक छोटा चमड़े का खेमा दिखाई पड़ता है। इस समय हमें इसी खेमे से मतलब है और इसी के दरवाजे पर पहुँच कर अपना काम निकाला चाहते हैं।
इस खेमे के दरवाजे पर केवल एक आदमी कमर में खंजर लगाए टहल रहा है। यद्यपि इसकी जवानी ने इसका साथ छोड़ दिया है और फिक्र ने इसे दुर्बल कर दिया है मगर फुर्ती, मजबूती और दिलेरी ने अभी तक इसके साथ दुश्मनी नहीं की और वे इस गई, गुजरी हालत में भी इसका साथ दिए जाती हैं। इस आदमी की सूरत-शक्ल के बारे में हमें कुछ विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारे पाठक इसे पहचानते हैं और जानते हैं कि इसका नाम 'भूतनाथ' है।
भूतनाथ को खेमे के दरवाजे पर टहलते हुए देर हो गई। वह न मालूम किस सोच में डूबा हुआ था कि सिर नीचा किए हुए सिवाय टहलने के इधर-उधर देखने की उसे बिल्कुल फुरसत न थी, हाँ कभी-कभी वह सिर उठाता और एक लम्बी साँस लेकर केवल उत्तर की तरफ देखता और सिर नीचा कर फिर उसी तरह टहलने लगता। अब सूर्य ने अपना मुँह अच्छी तरह जमीन के पर्दे में छिपा लिया और भूतनाथ ने कुछ बेचैन होकर उत्तर की तरफ देख धीरे से कहा, "अब तो बहुत ही विलम्ब हो गया, क्या बेमौके जान आफत में फँसी है।"
यकायक तेजी के साथ घोड़ा दौड़ाता हुआ एक सवार उत्तर की तरफ से आता हुआ दिखाई पड़ा। कुछ और पास आने से मालूम हो गया कि वह औरत है मगर सिपाहियाना ठाठ में, ढाल-तलवार के सिवाय उसके पास कोई हरबा न था। इस औरत की उम्र लगभग चालीस वर्ष की होगी। सूरत-शक्ल से मालूम होता था कि किसी समय में यह बहुत ही हसीन और दिल लुभाने वाली रही होगी। बात की बात में यह औरत खेमे के पास आ पहुँची और घोड़े से उतर कर उसकी लगाम खेमे की एक डोरी से अटका देने के बाद भूतनाथ के पास आकर बोली, "शाबाश भूतनाथ, बेशक तुम वादे के सच्चे हो।"
भूतनाथ––मगर अभी तक मेरी समझ में यह न आया कि तुम मुझसे दुश्मनी रखती हो या दोस्ती।
औरत––(हँस कर) अगर तुम ऐसे ही समझदार होते तो जीते-जागते और निरोग रहने पर भी मुर्दो में क्यों गिने जाते?
भूतनाथ––(कुछ सोचकर) खैर जो हुआ सो हुआ, अब मुझसे क्या चाहती हो?
औरत––तुमसे एक काम कराया चाहती हूँ
भूतनाथ––वह कौन काम है जिसे तुम स्वयं नहीं कर सकती?
औरत––केवल यही एक काम!
भूतनाथ––(आश्चर्य की रीति से गर्दन हिलाकर) खैर कहो तो सही, करने लायक होगा तो करूँगा।
औरत––मैं खूब जानती हूँ कि तुम उस काम को सहज ही में कर सकते हो।
भूतनाथ––तब कहने में देर क्यों करती हो?
औरत––अच्छा सुनो, यह तो जानते ही हो कि कमलिनी को ईश्वर ने अद्भुत बल दे रक्खा है।
भूतनाथ––हाँ बेशक! उसमें कोई देवी शक्ति है, वह जो कुछ चाहे, सो कर सकती है। जो कोई उसे जानता है वहीं कहेगा कि कमलिनी को कोई जीत नहीं सकता।
औरत––हाँ ठीक है परन्तु मैं खूब जानती हूँ कि तुम कमलिनी से ज्यादा ताकत रखते हो।
भूतनाथ––(चौंक और काँप कर) इसका क्या मतलब?
औरत––मतलब यही कि तुम अगर चाहो तो उसे मार सकते हो।
भूतनाथ––मगर मैं ऐसा क्यों करने लगा?
औरत––केवल मेरी आज्ञा से।
इतना सुनते ही भूतनाथ के चेहरे पर मुर्दनी छा गई, उसका कलेजा काँपने लगा और सिर कमजोर होकर चक्कर खाने लगा, यहाँ तक कि वह अपने को सँभाल न सका और जमीन पर बैठ गया। मालूम होता था कि उस औरत की आखिरी बात ने उसका खून निचोड़ लिया है। न मालूम क्या सबब था कि निडर होकर भी एक साधारण और अकेली औरत की बातों का जवाब नहीं दे सकता और उसकी सूरत से मजबूरी और लाचारी झलक रही है।
भूतनाथ की ऐसी अवस्था देखकर उस औरत को किसी तरह का रंज नहीं हुआ बल्कि वह मुस्कुराई और उसी जगह घास पर बैठ कर न मालूम क्या सोचने लगी। थोड़ी देर बाद जब भूतनाथ का जी ठिकाने हआ तो उसने उस औरत की तरफ देखा और हाथ जोड़कर कहा, "क्या सचमुच मुझे ऐसा हुक्म लगाया जाता है?"
औरत––हाँ, कमलिनी का सिर लेकर मेरे पास हाजिर होना पड़ेगा और यह काम सिवाय तेरे और कोई भी नहीं कर सकता, क्योंकि वह तुझ पर विश्वास रखती है।
भूतनाथ––(कुछ सोचकर) नहीं-नहीं, मेरे किए यह काम न होगा। जो कुछ कर चुका हूँ उसी के प्रायश्चित से आज तक छुट्टी नहीं मिलती।
औरत––क्या तू मेरा हुक्म टाल सकता है? क्या तुझमें इतनी ताकत है?
यह सुन भूतनाथ बहुत बेचैन हुआ। वह उठ खड़ा हुआ और सिर नीचा किए इधर-उधर टहलने और नीचे लिखी बातें धीरे-धीरे बोलने लगा––
"आह मुझ-सा बदनसीब भी दुनिया में कोई न होगा। मुद्दत तक मुर्दो में अपनी गिनती कराई, अब ऐसा संयोग हो गया कि अपने को जीता-जागता साबित करूँ, मगर अफसोस, करी-कराई मेहनत मिट्टी हुआ चाहती है। हाय, उस आदमी के साथ जिसमें नेकी कूट-कूटकर भरी है, मैं बदी करने के लिए मजबूर किया जा रहा हूँ। क्या उसके साथ बदी करने वाला कभी सुख भोग सकता है? नहीं-नहीं, कभी नहीं, फिर मैं ऐसा क्यों करूँ? मगर मेरी जान क्योंकर बच सकती है इसका हुक्म न मानना मेरी कुदरत के बाहर है। हाय, एक दफे की भूल जन्म-भर के लिए दुःखदाई हो जाती है। शेरसिंह सच कहता था, इन्हीं बातों को सोचकर उसने मेरा नाम 'काल' रख दिया था और उसे मेरी सुरत से घृणा हो गई थी। (कुछ देर तक चुप रहकर) ओफ, मैं भी व्यर्थ के विचार में पड़ा है, आखिर जान तो जायेगी ही, इसका हुक्म मानूँगा तो भी मारा जाऊँगा और यदि न मानूँगा तो भी मौत की तकलीफ उठाऊँगा और तमाम दुनिया में मेरी बुराई फैलेगी। (चौंक कर) राम-राम, मुझे क्या हो गया जो …
भूतनाथ––(उस औरत की तरफ देख के) अच्छा मैं कमलिनी को मारने के लिए तैयार हूँ, मगर इसके बदले में मुझे इनाम क्या मिलेगा?
औरत––(हँस कर) तू इस लायक नहीं है कि तुझे इनाम दिया जाये।
भूत––क्या मैं इस दर्जे को पहुँच गया?
औरत––बेशक।
भूत––नहीं, कभी नहीं! जा, मैं तेरा हुक्म नहीं मानता। देखूँ तू मेरा क्या कर लेती है!
औरत––भूतनाथ, देख खूब सोचकर कोई बात मुँह से निकाल, ऐसा न हो कि अन्त में पछताना पड़े।
भूत––जा जा, जो करते बने कर ले।
भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर वह औरत क्रोध में आकर काँपने लगी। उसके होंठ काँप रहे थे मगर कुछ कहना मुश्किल हो रहा था।
इस समय चारों तरफ अँधेरा छा चुका था अर्थात् रात बखूबी हो चुकी थी। थोड़ी देर के लिए दोनों आदमी चुप हो गये, यकायक घोड़ों की टापों की आवाज (जो बहुत दूर से आ रही थी) भूतनाथ के कान में पड़ी और साथ ही इसके वह औरत भी बोल उठी, "अच्छा देख, मैं तेरी ढिठाई का कैसा मजा चखाती हूँ।"
भूतनाथ पहले तो कुछ घबड़ाया मगर उसने तुरन्त ही अपने को सँभाला और कमर से खंजर निकाल कर उस औरत के सामने खड़ा हो गया। वह खंजर वही था जो कमलिनी ने उसे दिया था। कब्जा दबाते ही खंजर में से बिजली की चमक पैदा हुई जिसके सबब से उस औरत की आँखें बन्द हो गई और वह बावली-सी हो गई तथा उस समय तो उसे तन-बदन की सुध भी न रही जब भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से छुआ दिया।
भूतनाथ ने बड़ी होशियारी से उस बेहोश औरत को उसके घोड़े पर लादा और आप भी उसी पर सवार हो तेजी के साथ मैदान का रास्ता लिया। थोड़ी दूर जाकर भूतनाथ ने बेहोशी की तेज दवा उसे सुँघाई, जिससे वह औरत बहुत देर के लिए मुर्दे की-सी हो गई। हमको इससे कोई मतलब नहीं कि वे सवार जिनके घोड़ों के टापों की आवाज भूतनाथ के कान में पड़ी थी कौन थे और उन्होंने वहाँ पहुँच कर क्या किया जहाँ से भूतनाथ उस औरत को ले भागा था, हम केवल भूतनाथ के साथ चलते हैं, जिसमें उस औरत का और भूतनाथ का हाल मालूम हो।
यद्यपि रात अँधेरी और रास्ता पथरीला था तथापि भूतनाथ ने चलने में कसर न की। थोड़ी-थोड़ी दूर पर घोड़ा ठोकर खाता था जिससे भूतनाथ को तकलीफ होती थी और वह बड़ी मुश्किल से उस बेहोश औरत को सँभाले लिए जाता था मगर यह तकलीफ ज्यादा देर के लिए न थी क्योंकि पहर भर के बाद ही आसमान पर कुदरती माहताबी जलने लगी और उसकी (चन्द्रमा की) रोशनी ने चारों तरफ ठंडक और खूबसूरती के साथ उजाला कर दिया। ऐसी अवस्था में भूतनाथ ने रुकना उचित न समझा और सवेरा होने तक तेजी के साथ बराबर चलता गया। जिस समय आसमान पर सुबह की सफेदी फैल रही थी, घोड़े ने यहाँ तक हिम्मत हार दी कि दस कदम भी चलना उसके लिए कठिन हो गया। लाचार भूतनाथ घोड़े के नीचे उतरा और उस औरत की भी उतार लिया। घोड़ा उसी समय जमीन पर गिर पड़ा, मगर भूतनाथ ने उसकी कुछ परवाह न की।
कमर से चादर खोल उसने औरत की गठरी बाँधी और पीठ पर लाद आगे का रास्ता लिया।
पहर भर चलते जाने बाद भूतनाथ एक ऐसी पहाड़ी के नीचे पहुँचा जिसकी ऊँचाई बहुत ज्यादा न थी मगर खुशनुमा और सायेदार दरख्त पहाड़ी के ऊपर तथा उसकी तराई में बहुत थे। पहाड़ी की चोटी पर सलई का एक ऊँचा पेड़ था और उसके ऊपर लम्बी काँड़ी में लगा हुआ एक लाल फरहरा (ध्वजा) दूर से दिखाई दे रहा था। यह निशान कमलिनी का लगाया हुआ था। भूतनाथ, तारा और नानक से मिलने के लिए कमलिनी ने एक यह जगह भी मुकर्रर की थी और निश्चय कर रखा था कि जब इन चारों में किसी को किसी से मिलने की आवश्यकता पड़े तो वह इसी जगह आवे और यदि किसी से मुलाकात न हो, इस झंडे को झुका हुआ देखे तो तुरन्त इस पहाड़ी के नीचे आवे और नियत स्थान पर अपने साथी को ढूँढ़े। यह फरहरा बहुत दूर से दिखाई देता था और यह पहाड़ी रोहतासगढ़ और गयाजी के बीच में पड़ती थी।
उस औरत को पीठ पर लादे हुए भूतनाथ पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगा। लगभग दो सौ कदम जाने के बाद रास्ता छोड़कर दाहिनी तरफ घूमा जिधर छोटे-छोटे जंगली पेड़ों की गुंजान झाड़ी दूर तक चली गई थी। उस झाड़ी में आदमी बखूबी छिप सकता था अर्थात् उस झाड़ी के पेड़ यद्यपि छोटे थे परन्तु आदमी की ऊँचाई से उन पेड़ों की ऊँचाई कुछ ज्यादा थी। भूतनाथ दोनों हाथ से पेड़ों को हटाता हुआ कुछ दूर तक चला गया। आखिर उसे एक गुफा मिली जिसका मुँह जंगली लताओं ने अच्छी तरह ढाँक रखा था। भूतनाथ उस गुफा के अन्दर चला गया और अपना बोझ अर्थात् उस औरत को गुफा के अन्दर छोड़ बाहर निकल आया। इसके बाद पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गया और सलई पेड़ पर चढ़कर लाल फरहरे (झण्डे) को झुकाने का इरादा किया परन्तु उसी समय सलई के पेड़ पर चढ़ी हुई कमलिनी उसे दिखाई पड़ी जो फरहरा झुकाने का उद्योग कर रही थी। इस समय भी कमलिनी उसी राक्षसी के भेष में थी जैसा कि ऊपर के बयानों में लिख आए हैं। भूतनाथ ने कमलिनी को पहचाना और उसने भी भूतनाथ को देखा। कमलिनी पेड़ के नीचे उतर आई और बोली––
कमलिनी––खूब पहुँचे, मैं तुमसे मिला चाहती थी, इसीलिए झण्डा झुकाने का उद्योग कर रही थी।
भूतनाथ––मैं खुद तुमसे मिलना चाहता था, इसीलिए यहाँ तक आया हूँ। यदि इस समय तुम न मिलती तो मैं इस पेड़ पर चढ़कर फरहरा झुकाता।
JIM – Assistente
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