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  • गल्प समुच्चय

    गल्प समुच्चय

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    गल्प समुच्चय
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    १—पं॰ ज्वालादत्त शर्मा

    आप मुरादाबाद के निवासी हैं। संस्कृत, फ़ारसी और उर्दू के अच्छे ज्ञाता हैं। आपने उर्दू के कई सुविख्यात कवियों पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं। आप की वर्णन-शैली और भाषा सरस है।

    २—महाशय सुदर्शन

    आप पंजाब के निवासी हैं। आप कई समाचार-पत्रों का सम्पादन भी कर चुके हैं। आपका हिन्दी और उर्दू-दोनों ही भाषाओं—पर अधिकार है। आपके गल्प बड़ें मनोरंजक, शिक्षाप्रद और भाव-पूर्ण होते हैं। आपके गल्पों के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आप अच्छे नाट्यकार भी हैं। आपको दो बार "पंजाब टेक्स्ट-बुक कमेटी" से पुरस्कार मिल चुके हैं। आपकी शैली बड़ी मर्म-स्पर्शी तथा लालित्य-पूर्ण है। मनोभावों का चित्रण करने में आप निपुण हैं।

    ३-पं० चतुरसेन शास्त्री

    आप देहली के निवासी हैं। आपकी रचनायें अधिकतर गद्यकाव्य-मयी होती हैं, माधुर्य में डूबी हुई। मनोभावों का विश्लेषण करने में आप सिद्ध-हस्त हैं। आपकी भाषा बहुत परिमार्जित और भाव श्रृङ्गार-मय होते हैं। 'अन्तस्तल' आपका एक गद्य-काव्य है। "हृदय की प्यास" नाम का रोचक उपन्यास भी आपने लिखा है।

    ४—श्रीप्रेमचन्द

    आप काशी के रहने वाले हैं। आपने कानपुर के उर्दू-पत्र "ज़माना" में लेख लिखना शुरू किया। आपकी "प्रेम-पच्चीसी" और “सोज़ेवतन" यह दोनों प्रथम ज़माना ही से प्रकाशित हुई। सन् १९१४ से आप हिन्दी में लिख रहे हैं। आपके कई उपन्यास "सेवा-सदन", "वरदान", "काया- कल्प", "प्रेमाश्रम", "रंगभूमि", "प्रतिज्ञा" तथा "ग़बन" आदि प्रसिद्ध हो चुके हैं। आपकी कहानियों के कई संग्रह निकल चुके हैं-"प्रेम-प्रतिमा", "प्रेम-पूर्णिमा", "प्रेम-पञ्चीसी", "प्रेम-प्रसून", "प्रेमतीर्थ”, “सप्त-सरोज", "नव-निधि", "पाँच फूल", "सप्त सुमन", "प्रेम कुंज" आदि। आपकी दो-चार गल्पों के अनुवाद जापानी तथा अंग्रेजी भाषा में भी निकल चुके हैं। आप 'माधुरी' के संयुक्तसम्पादक तो वर्षों रहे ही हैं, इधर 'हंस' का सम्पादन भी बड़ी ही योग्यता से कर रहे हैं। (रामदासगौड़)

    ५—श्रीपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी बी॰ ए॰

    आप मध्यप्रदेश के निवासी और प्रसिद्ध मासिक-पत्रिका 'सरस्वती' के सम्पादक हैं। आपकी शैली बहुत ही प्रौढ़ विचार-शील और कटाक्ष-पूर्ण है। आपने प्राच्य और पाश्चात्य-साहित्य का गहरा अध्ययन किया है। 'साहित्य-विमर्श' में आपने संसार-साहित्य की मार्मिक विवेचना की है। आप सुकवि भी हैं।

    ६—पं॰ विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

    आप कानपूर के निवासी हैं। आपकी कहानियाँ प्रायः हिन्दी-मासिक-पत्रिकाओं में निकलती रहती हैं। 'गल्प-मन्दिर' और 'चित्रशाला'——ये दो संग्रह आपकी कहानियों के प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आपने 'मनोरंजन' मासिक-पत्र का बड़ी योग्यता से सम्पादन किया। आपकी कहानियों में बहुधा निम्न-श्रेणी के चरित्रों का चित्रण होता है। आपकी कला की विशेषता संभाषण है। संभाषणों-द्वारा ही आपने कई ड्रामे लिखे हैं। आपका एक उपन्यास धारा-वाहिक रूप में 'सुधा' में निकला था, जो अब पुस्तक रूप में भी छप गया।

    ७—श्रीशिवपूजन सहाय

    आप बिहार के निवासी हैं। आपकी भाषा माधुर्य से परिपूर्ण होती है। आप सच्चे कलाविद् की भाँति भापा को खूब अलंकृत करते हैं। आपकी कई पुस्तकें—'महिला-महत्व' 'देहाती दुनिया' आदि—प्रकाशित हो चुकी हैं। पहले आपने 'बालक' का सम्पादन बड़ी योग्यता से किया, अब 'गंगा' का सम्पादन करते हैं।

    ८–श्रीचण्डीप्रसाद, बी० ए० 'हदयेश'

    आप पीलीभीत के निवासी थे। आपके देहावसान को तीन वर्ष हो गये। आप सानुप्रास भाषा लिखते थे। आपकी लेखन-शैली मधुर और चरित्र-चित्रण आकर्षक होता था। यदि आप कुछ काल तक और जीवित रहते, तो हिन्दी-साहित्य में एक विशिष्ट धारा प्रवाहित कर जाते। आपके 'मंगल-प्रभात' और 'मनोरमा' आदि उपन्यास तथा 'नन्दन-निकुञ्ज' आदि गल्प-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक आप 'चाँद' के सहकारी संपादक भी रह चुके हैं। कविताएँ भी आप अच्छी लिख लेते थे।

    ९-श्रीराजेश्वरप्रसादसिंह

    आप प्रयाग के रहनेवाले हैं। पहले आप 'लीडर' के कार्यालय में काम करते थे। अब स्वतंत्र रूप से साहित्य-सेवा करते हैं। आपकी कहानियाँ समाज की दुर्बलताओं पर आधारित होती हैं। आपकी शैली में दार्शनिक विचारों का अच्छा सम्मिश्रण होता है। आप अंग्रेजी में भो लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं।

    (१) शतरंज के खिलाड़ी

    ______

    ( १ )

    वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विला-सिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था। शासन-विभाग में, साहित्य- क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला-कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी। राज-कर्मचारी विषय-वासना में, कवि-गण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में, व्यवसायी सुरमे, इत्र, मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में, लिप्त थे। सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे हैं; तीतरों की लड़ाई के लिये पाली बदी जा रही है। कहीं चौसर बिछी हुई है; पौ-बारह का शोर मचा हुआ है। कहीं शतरंज

    का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर रंक तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते, तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते। सतरंज, ताश, गंजीफ़ा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है। ये दलीलें जोरों के साथ पेश की जाती थीं (इस सम्प्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है) इस लिए अगर मिरजा सज्जादअली और मीर रौशनअली अपना अधिकांश समय बुद्धि तीव्र करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशील पुरुष को क्या आपत्ति हो सकती थी? दोनों के पास मौरूसी जागीरें थीं; जविका को कोई चिन्ता न थी; घर में बैठे चखौतियाँ करते थे। आखिर और करते ही क्या? प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके विसात बिछाकर बैठ जाते, मुहरे सज जाते, और लड़ाई के दाव पेंच होने लगते। फिर खबर न होती थी कि कब दोपहर हुई, कब तीसरा पहर, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा आता कि खाना तैयार है। यहाँ से जवाब मिलता-चलो, आते हैं; दस्तरख्वान बिछाओ। यहाँ तक कि बावरची विवश होकर कमरे ही में खाना रख जाता था। और दोनों मित्र दोनों काम साथ-साथ करते थे। मिरजा सज्जादअली के घर में कोई बड़ा-बूढ़ा न था, इसलिए उन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ होती थीं; मगर यह बात न थी कि मिरजा के घर के और लोग उनके इस व्यवहार से खुश हों। घरवालों का तो कहना ही क्या, महल्लेवाले, घर के नौकर

    चाकर तक नित्य द्वेष-चूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे-बड़ा मनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे, किसी को इसकी चाट पड़े, आदमी दीन दुनिया किसी के काम का नहीं रहता। न घर का न घाट का। बुरा रोग है। यहाँ तक कि मिरजा की बेगम साहब को इससे इतना द्वेष था कि अवसर खोज-खोज कर पति को लताड़ती थीं; पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था। वह सोती ही रहती थीं, तब तक उधर बाजी बिछ जाती थी। और रात को जब सो जाती थीं, तब कहीं मिरेजाजी घर में आते थे। हाँ नौकरों पर वह अपना गुस्सा उतारती रहती थीं-क्या पान मांगे हैं? कह दो आकर ले जायें। खाने की फुरसत नहीं है? ले जाकर खाना सिर पर पटक दो, खायें चाहे कुत्ते को खिलावें। पर दूबदू वह भी कुछ न कह सकती थीं। उनको अपने पति से उतना मलाल न था, जितना मीरसाहब से। उन्होंने उनका नाम मीर बिगाड़ू रख छोड़ा था। शायद मिरजाजी अपनी सफाई देने के लिए सारा इलजाम मीरसाहब ही के सिर थोप देते थे।

    एक दिन बेगम साहबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौंडी से कहा-जाकर मिरजासाहब को बुला ला। किसी हकीम के यहाँ से दवा लावें। दौड़ जल्दी कर। लौंडी गई, तो मिरजाजी ने कहा-चल अभी आते हैं। बेगम साहबा का मिज़ाज़ गरम था। इतनी ताब कहाँ कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरंज खेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौंडी से कहा-जाकर

    कह, अभी चलिए, नहीं तो वह आपही हकीम के यहाँ चली जायँगी।

    मिरजाजी बड़ी दिलचस्पी बाजी खेल रहे थे, दो ही किस्तों में मिरसाहब को मात हुई जाती थी। झुँझलाकर बोले- क्या ऐसे दम लबों पर है? जरा सब्र नहीं होता?

    मीर-अरे तो जाकर सुन हो आइए न। औरतें नाजुक मिज़ाज़ होती ही हैं।

    मिरजा-जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ! दो किस्तों में आपकी मात होती है।

    मीर-जनाब इस भरोसे न रहियेगा। वह चाल सोची है कि आपके मुहरे धरे रहें और मात हो जाय; पर जाइये सुन आइए। क्यों खामख्वाह उनका दिल दुखाइएगा?

    मिरजा इसी बात पर मात ही करके जाऊँगा।

    मीर-मैं खोलूगा ही नहीं। आप जाकर सुन आइए।

    मिरजा-अरे यार, जाना पड़ेगा हकीम के यहाँ। सिर-दर्द खाक नहीं है; मुझे परेशान करने का बहाना है।

    मीर-कुछ ही हो, उनकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी।

    मिरजा-अच्छा, एक चाल और चल लूँ।

    मीर-हरगिज़ नहीं, जब तक आप सुन न आवेंगे, मैं मुहरे में हाथ ही न लगाऊँगा।

    मीरजा साहब मजबूर होकर अन्दर गये, तो बेगम साहबा ने त्यौरियाँ बदल कर; लेकिन कराहते हुए कहा-तुम्हें निगोड़ी शत-

    रंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर ही जाय; पर उठने का नाम नहीं लेते! नौज कोई तुम-जैसा आदमी हो!

    मिरजा-क्या कहूँ, मीरसाहब मानते ही न थे। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाकर आया हूँ।

    बेगम-क्या जैसे वह खुद निखट्टू हैं, वैसे ही सबको समझते हैं? उनके भी तो बाल-बच्चे हैं, या सबका सफाया कर डाला?

    मिरजा-बड़ा लती आदमी है। जब आ जाता है, तब मजबूर होकर मुझे भी खेलना ही पड़ता है।

    बेगम-दुत्कार क्यों नहीं देते?

    मिरजा-बराबर के आदमी हैं, उम्र में, दर्जे में मुझसे दो अङ्गुल ऊँचे। मुलाहिजा करना ही पड़ता है।

    बेगम-तो मैं ही दुत्कारे देती हूँ। नाराज़ हो जायेंगे, हो जायें। कौन किसी की रोटियाँ चला देता है। रानी रूठेंगी, अपना सुहाग लेंगी।—-हिरिया, जा, बाहर से शतरंज उठा ला। मीरसाहब से कहना, मियाँ अब न खेलेंगे, आप तशरीफ़ ले जाइये!

    मिरजा– हाँ हाँ, कहीं ऐसा ग़ज़ब भी न करना! जलील कराना चाहती हो क्या!– ठहर हिरिया, कहाँ जाती है।

    बेगम–जाने क्यों नहीं देते! मेरा ही खून पिये, जो उसे रोके। अच्छा, उसे रोका, मुझे रोको तो जानू!

    यह कहकर बेगम साहबा झल्लाई हुई दीवानखाने की तरफ़ चलीं। मिरजा बेचारे का रंग उड़ गया। बीवी की मिन्नतें करने लगे-खुदा के लिए, तुम्हें हज़रत हुसेन की क़सम है। मेरी ही

    मैयत देखे, जो उधर जाय; लेकिन बेगम ने एक दीवानखाने के द्वार तक गई; पर एकाएक पर पुरुष के सामने जाते हुए पाँव बंध-से गये। भीतर झांका। संयोग से कमरा खाली था। मीरसाहब ने दो-एक मुहरे इधर-उधर कर दिए थे, और अपनी सफ़ाई जताने के लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, बेगम ने अन्दर पहुँचकर बाजी उलट दी, मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिए, कुछ बाहर और किवाड़े अन्दर से बन्द करके कुंडी लगा दी। मीरसाहब दरवाजे पर थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की झनक कान में पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गए, बेगम साहबा बिगड़ गई। चुपके से घर की राह ली।

    मिरजा ने कहा——तुमने ग़ज़ब किय !

    बेगम——अब मीरसाहब इधर आये, तो खड़े-खड़े निकलवा दूंगी। इतनी लौ खुदा से लगाते, तो वली हो जाते। आप तो शतरंज खेलें, और मैं यहाँ चूल्हे-चक्की की फ़िक्र में सिर खपाऊँ! ले जाते हो हकीम साहब के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है?

    मिरजा घर से निकले, तो हकीम के घर जाने के बदले मीर साहब के घर पहुँचे, और सारा वृत्तान्त कहा। मीरसाहब बोले——मैने तो जब मुहरे बाहर आते देखे, तभी ताड़ गया। फौरन् भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती है; मगर आपने उन्हें यों सिर चढ़ा रक्खा है, यह मुनासिब नहीं। उन्हें इससे क्या मतलब कि आप बाहर क्या करते हैं। इन्तजाम करना उनका काम है, दूसरी बातों से उन्हें क्या सरोकार? मिरजा––ख़ैर, यह तो बताइए, अब कहाँ जमाव होगा?

    मीर––इसका क्या ग़म है। इतना बड़ा घर पड़ा हुआ है। बस, यहीं जमे।

    मिरजा––लेकिन बेगम साहबा को कैसे मनाऊँगा? जब घर पर बैठा रहता था, तब तो वह इतना बिगड़ती थीं; यहाँ बैठक होगी, तो शायद जिन्दा न छोड़ेंगी।

    मीर––अजी बकने भी दीजिए; दो-चार रोज़ में आप ही ठीक हो जायेंगी। हाँ, आप इतना कीजिए कि आज से ज़रा तन जाइए।

    ( २ )

    मीरसाहब को बेगम किसी अज्ञात कारण से मीरसाहब का घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझती थी; इसलिए वह उनके शतरंज-प्रेम की कभी आलोचना न करती थीं; बल्कि कभी-कभी मीर- साहब को देर हो जाती, तो याद दिला देती थीं। इन कारणों से मीरसाहब को भ्रम हो गया था, कि मेरी स्त्री अत्यंत विनयशील और गम्भीर है; लेकिन जब दीवानखाने में बिसात बिछने लगी, और मीरसाहब दिन-भर घर में रहने लगे, तो बेगम साहबा को बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड़ गई। दिनभर दरवाजे पर झाँकने को तरस जाती।

    उधर नौकरों में भी कानाफूसी होने लगी। अब तक दिन-भर पड़े-पड़े, मक्खियो मारा करते थे। घर में कोई आवे, कोई जाय, उनले कुछ मतलब न था। अब आठों पहर की धौंस हो गई। कभी पान लाने का हुक्म होता। कभी मिठाई का। और, हुक्का तो किसी प्रेमी के हृदय की भाँति जलता ही रहता था। वे बेगम साहबा से जा-जाकर कहते––हुजूर, मियाँ की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गई! दिन-भर दौड़ते-दौड़ते पैरों में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे तो शाम कर दी! घड़ी-आध घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमें तो कोई शिकायत नहीं, हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा, बजा ही लावेंगे; मगर यह खेल मनहूस है। इसका खेलनेवाला कभी पनपता नहीं; घर पर कोई न कोई आफ़त ज़रूर आती है। यहाँ तक कि एक के पीछे महल्ले के महल्ले तबाह होते देखे गये है। सारे महल्ले में यही चरचा होती रहती है। हुजूर का नमक खाते है, अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज हाता है; मगर क्या करें। इस पर बेगम साहबा कहती-मै तो खुद इसको पसन्द नहीं करती; पर वह किसी को सुनते ही नहीं, तो क्या किया जाय।

    महल्ले मे भी जो दो-चार पुराने ज़माने के लोग थे, वे आपस में भाँति-भाँति के अमङ्गल की कल्पनाएं करने लगे-अब खैरियत नहीं है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल्क का खुदा ही हाफ़िज़ है। यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगा। आसार बुरे हैं।

    राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फ़रियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी

    दौलत लखनऊ में खिंची आती थी, और वह वेश्याओं में, भाँड़ों में, ओर विलासिता के अन्य अङ्गों को पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज़-कम्पनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता था। कमली दिन-दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार-बार चेतावनी देता था; पर यहाँ तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे; किसी के कानों पर जूं न रेंगती थी।

    खैर, मीरसाहब के दीवानखाने में शतरंज होते कई महीने गुज़र गये। नये-नये नक्शे हल किये जाते, नये-नये किले बनाये जाते, नित्य नई व्यूह-रचना होती, कभी-कभी खेलते-खेलते झौड़ हो जाती, तू-तू मैं-मैं तक की नौबत आ जाती; पर शीघ्र ही दोनों मित्रों में मेल हो जाता। कभी -कभी ऐसा भी होता, कि बाज़ी उठा दी जाती, मिरजा जी रूठकर अपने घर चले आते। मीर- साहब अपने घर में जा बैठते; पर रात-भर को निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्य शान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनों मित्र दीवानखाने में आ पहुँचते थे।

    एक दिन दोनों मित्र बैठे हुए शतरंज के दल-दल में ग़ोते खा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफ़सर मीरसाहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा! मीरसाहब के होश उड़ गये! यह क्या बला सिर पर आई! यह तलबी किस लिए हुई है! अब खैरियत नहीं नज़र आती ! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकरों से बोले-कह दो, घर में नहीं हैं। सवार––घर में नहीं, तो कहाँ है?

    नौकर––यह मैं नहीं जानता। क्या काम है?

    सवार––काम तुझे क्या बतलाऊँ? हुजूर में तलबी है––शायद फ़ौज के लिए कुछ सिपाही मांगे गये हैं। जागीरदार हैं कि दिल्लगी! मोरचे पर जाना पड़ेगा, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा!

    नौकर––अच्छा, तो जाइए, कह दिया जायगा।

    सवार––कहने की बात नहीं है। मैं कल खुद आऊँगा, साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

    सवार चला गया। मीरसाहब की आत्मा काँप उठी।

    मिरजाजी से बोले––कहिए जनाब अब क्या होगा?

    मिरजा––बड़ी मुसीबत है कहीं मेरी तलबी भी न हो।

    मीर––कम्बख्त कल फिर आने को कह गया है।

    मिरजा––आफत है और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो बे-मौत मरे।

    मीर––बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलो ही नहीं। कल से गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। वहाँ किसे खबर होगी। हज़रत आकर आप लौट जाँयगे।

    मिरजा––वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा और कोई तदबीर ही नहीं है।

    इधर मीरसाहब की बेगम उस सवार से कह रही थीं, तुमने खूब धता बताई। उसने जवाब दिया-ऐसे गावदियों को तो

    चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चर ली। अब भूलकर भी घर पर न रहेंगे।

    ( ३ )

    दूसरे दिन से दोनों मित्र मुँह-अँधेरे घर से निकल खड़े होते। बग़ल में एक छोटी-सी दरी दबाये, डिब्बे में गिलौरियाँ भरे, गोमती-पार की एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफ़उद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम और मदरिया ले लेते और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भरकर शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फ़िक्र न रहती थी। किश्त, शह आदि दो-एक शब्दों के सिवा उनके मुंह से और कोई वाक्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता होगा। दोपहर को जब भूख मालूम होती, तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना खा आते, और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम-क्षेत्र में डट जाते। कभी-कभी तो उन्हें भोजन का भी ख्याल न रहता था।

    इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फौजें लखनऊ की तरफ़ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हल-चल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे; पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी ज़रा भी फ़िक्र न थी। वे घर से आते, तो गलियों में होकर। डर था, कि कहीं किसी बादशाही मुलाज़िम की निगाह न पड़ जाय, जो

    बेगार में पकड़ जायें। हजारों रुपये सालाना की जागीर मुफ्त ही में हज़म करना चाहते थे।

    एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिरजा की बाज़ी कुछ कमजोर थी। मीरसाहब उन्हें किश्त-पर-किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिये। यह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार ज़माने के लिये आ रही थी।

    मीरसाहब बोले––अंगरेजी फ़ौज आ रही है; खुदा खैर करे।

    मिरजा––आने दीजिये, किश्त बचाइये। यह किश्त!

    मीर––ज़रा देखना चाहिए, यहीं आड़ में खड़े हो जायं।

    मिरजा––देख लीजियेगा, जल्दी क्या है, किश्त!

    मीर––तोपखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे-कैसे जवान हैं! लाल बन्दरों के-से मुँह। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

    मिरजा––जनाब, हीले न कीजिये। ये चकमे किसी और को दीजियेगा, यह किश्त!

    मीर––आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत आई हुई है, और आपको किश्त की सूझी है! कुछ इसकी भी खबर है, कि शहर घिर गया, तो घर कैसे चलेंगे?

    मिरजा––जब घर चलने का वक्त आएगा, तो देखी जायगी––यह किश्त! बस, अबकी शह में मात है।

    फौज़ निकल गई। दस बजे का समय था। फिर बाज़ी बिछ गई। मिरजा बोले––आज खाने की कैसे ठहरेगी?

    मीर––अजी, आज तो रोज़ा है। क्या आपको ज्यादा भूख मालूम होती है?

    मिरजा––जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।

    मीर––शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना-खा-कर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।

    दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे, तो तीन बज गये। अबकी मिरजाजी की बाज़ी कमज़ोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज़ का वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली पकड़ लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आजतक किमी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से, इस तरह खून बहे बिना, न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नीद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

    मिरजा ने कहा–– हुजूर नवाबसाहब को जालिमों ने क़ैद कर लिया है।

    मीर––होगा, यह लीजिये शह!

    मिरजा––जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत

    नहीं लगती। बेचारे नवाबसाहब इस वक्त़ खून के आँसू रो रहे होंगे।

    मीर––रोया ही चाहें। यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा–– यह किश्त!

    मिरजा––किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।

    मीर––हाँ सो तो है ही—–यह लो फिर किश्त! बस, अबकी किश्त में मात है, बच नहीं सकते।

    मिरजा––खुदा की कसम, आप बड़े बेदर्द हैं। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दु:ख नहीं होता। हाय, ग़रीब वाजिदअली शाह!

    मीर––पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब-साहब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात! लाना हाथ!

    बादशाह को लिये हुए सेना सामने से निकल गई! उनके जाते ही मिरजा ने फिर बाजी बिछा दी । हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा-आइये, नवाबसाहब के मातम में एक मरसिया कह डालें; लेकिन मिरजा की राज-भक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी। वह हार का बदला चुकाने के लिये अधीर हो रहे थे।

    ( ४ )

    शाम हो गई। खँडहर में चमगादड़ों ने चीखना शुरू किया। अबाबीलें आ आकर अपने-अपने घोसलों में चिमटीं। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे, मानों दो खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। मिरजा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाज़ी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़ निश्चय करके सँभाल कर खेलते थे; लेकिन एक-न-एक चाल ऐसी बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाजी खराब हो जाती थी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और भी उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के ग़ज़लें गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुम धन पा गये हों। मिरजाजी सुन-सुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे; पर ज्यों-ज्यों बाज़ी कमज़ोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकला जाता था! यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुंझलाने लगे—जनाब, आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि एक चाल चले, और फिर उसे बदल दिया। जो कुछ चलना हो, एक बार चल लीजिए। यह आप मुहरे पर हाथ क्यों रखे रहते हैं? मुहरे को छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरे छूइए ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं। जिसे एक चाल चलने में पाँच मिनट से ज्यादा लगे, उसकी मात समझी जाय। फिर आपने चाल बदली! चुपके से मुहरे वहीं रख दीजिए।

    मीर साहब का फ़रजी पिटता था। बोले—मैंने चाल चली ही कब थी? मिरजा––आप चाल चल चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए––उसी घर में!

    मीर––उस घर में क्यों रक्खूँ? मैंने हाथ से मुहरा छोड़ा ही कब था?

    मिरजा––मुहरा आप क़यामत तक न छोड़ें, तो क्या चाल ही न होगी? फ़रजी पिटते देखा, तो धाँधली करने लगे!

    मीर––धाँधली आप करते हैं। हार-जीत तक़दीर से होती है ; धाँधली करने से कोई नहीं जीतता?

    मिरजा––जो इस बाज़ी में आपको मात हो गई।

    मीर––मुझे क्यों मात होने लगी?

    मिरजा––तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रक्खा था।

    मीर––वहां क्यों रक्खूँ? नहीं रखता!

    मिरजा––क्यों न रखिएगा? आपको रखना होगा!

    तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था, न वह! अप्रासंगिक बातें होने लगी। मिरजा बोले-किसी ने खानदान में शतरंज खेली होती, तब तो इसके कायदे जानते। वे तो हमेशा घास छीला किये आप शतरंज क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज़ है। जागीर मिल जाने से ही कोई रईस नहीं हो जाता।

    मीर––क्या! घास आपके अब्बाजान छीलते होंगे। यहाँ तों पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आ रहे हैं। मिरजा––अजी, जाइए भी, गाज़िउद्दीन हैदर के यहाँ बावरची का काम करते-करते उम्र गुज़र गई, आज रईस बनने चले हैं। रईस बनना कुछ दिल्लगी नहीं है।

    मीर—क्यों अपने बुजर्गों के मुँह कालिख लगाते हो-वे ही बाबरची का काम करते होंगे। यहाँ तो हमेशा बादशाह के दस्तरख्वान पर खाना खाते चले आये हैं।

    मिरजा—अरे चल चरकटे, बहुत बढ़-बढ़कर बातें न कर।

    मीर—ज़बान संभालिये, वरना बुरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का आदी नहीं हूँ। यहाँ तो किसी ने आँखें दिखाई कि उसकी आँखें निकाला। है हौसला?

    मिरजा—आप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जाय, इधर या उधर!

    मीर—तो यहाँ तुमसे दबनेवाला कौन है?

    दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल ली। नवाबी ज़माना था; सभी तलवार, पेशक़म्ज, कटार वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे; पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अधःपतन हो गया था-बादशाह के लिए, बादशाहत के लिए क्यों मरें; पर व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनों ने पैतरें बदले, तलवार चमका, छपाछप की आवाज आई। दोनों जख्म खाकर गिरे, और दोनों ने वहां तड़प-तड़प कर जानें दे दी। अपने बादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक बूंद आँसू न निकला, उन्हीं दोनों प्राणियों ने शतरंज के वज़ीर की रक्षा में प्राण दे दिये। अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।

    चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। खंडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवार और धूल धूसरित मीनारें इन लाशों को देखती और सिर धुनती थीं।

    ____०____

    (२) कामना-तरु

    (१)

    राजा इंद्रनाथ का देहान्त हो जाने के बाद, कुँअर राजनाथ को शत्रुओं ने चारों ओर से ऐसा दबाया, कि उन्हें अपने प्राण लेकर एक पुराने सेवक की शरण जाना पड़ा, जो एक छोटे-से गाँव का जागीरदार था। कुँअर स्वभाव ही से शांति-प्रिय, रसिक, हँस-खेलकर समय काटनेवाले युवक थे। रण-क्षेत्र की अपेक्षा कवित्व के क्षेत्र में अपना चमत्कार दिखाना उन्हें अधिक प्रिय था। रसिकजनों के साथ, किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए, काव्य-चरचा करने में उन्हें जो आनन्द मिलता था, वह शिकार या राज-दरबार में नहीं। इस पर्वत-मालाओं से घिरे हुए गाँव में आकर, उन्हें जिस शांति और आनन्द का अनुभव हुआ, उसके बदले में वह ऐसे-ऐसे कई राज त्याग कर सकते थे। यह पर्वत-मालाओं की मनोहर छटा, यह नेत्र-रंजक हरियाली, यह जल-प्रवाह की मधुर वीणा, यह पक्षियों की मीठी बोलियाँ, यह मृग-शावकों की छलाँग, यह बछड़ों की कुलेलें, यह ग्राम-निवा

    सियों की बालोचित सरलता, यह रमणियों की संकोच-मय चपलता, ये सभी बातें उनके लिये नई थीं; पर इन सबों से बढ़कर जो वस्तु उनको आकर्षित करती थी, वह जागीरदार की युवती कन्या चन्दा थी।

    चन्दा घर का सारा काम-काज आप ही करती थी। उसको माता की गोद में खेलना नसीब ही न हुआ था। पिता की सेवा ही में रत रहती थी। उसका विवाह इसी साल होनेवाला था, कि इसी बीच मे कुँअरजी ने आकर उसके जीवन में नवीन भावनाओं और नवीन आशाओं को अंकुरित कर दिया। उसने अपने पति का जो चित्र मन में खींच रक्खा था, वहो मानों रूप धारण करके उमके सम्मुख आ गया। कुँअर की आदर्श रमणी भी चन्दा ही के रूप में अवतरित हो गई; लेकिन कुँअर समझते थे, मेरे ऐसे भाग्य कहाँ? चन्दा भी समझती थी, कहाँ यह और कहाँ मैं!

    (२)

    दोपहर का समय था और जेठ का महीना। खपरैल का घर भट्ठी की भाँति तपने लगा। ख़स की टट्टियों और तहखानों में रहनेवाले राजकुमार का चित्त गरमी से इतना बेचैन हुआ, कि वह बाहर निकल आये और सामने के बाग़ में जाकर एक घने वृक्ष के छाँह में बैठ गये। सहसा उन्होंने देखा-चन्दा नदी से जल की गागर लिये चली आ रही है। नीचे जलती हुई रेत थी, ऊपर जलता हुआ सूर्य। लू से देह झुलसी जाती थी। कदाचित् इस समय प्यास से तड़पते हुए आदमी की भी नदी तक जाने का

    हिम्मत न पड़ती थी। चन्दा क्यों जल लेने गई थी? घर में पानी भरा हुआ है। फिर इस समय वह क्यों पानी लेने निकली?

    कुँअर दौड़कर उसके पास जा पहुँचे और उसके हाथ से गागर छीन लेने की चेष्टा करते हुए बोले––मुझे दे दो और भागकर छाँह में चली जाओ। इस समय पानी का क्या काम था?

    चन्दा ने गागर न छोड़ी। सिर से खिसका हुआ अंचल सँभाल कर बोली––तुम इम समय कैसे आ गये? शायद मारे गरमी के अन्दर न रह सके!

    कुँअर––मुझे दे दो, नहीं मैं छीन लूँगा।

    चन्दा ने मुस्कुराकर कहा––राजकुमारों को गागर लेकर चलना शोभा नहीं देता।

    कुँअर ने गागर का मुँह पकड़कर कहा––इस अपराध का बहुत दण्ड सह चुका हूँ। चन्दा, अब तो अपने को राजकुमार कहने में भी लज्जा आती है।

    चन्दा––देखो धूप में खुद हैरान होते हो और मुझे भी हैरान करते हो। गागर छोड़ दो। सच कहती हूँ, पूजा का जल है।

    कुँअर––क्या मेरे ले जाने से, पूजा का जल अपवित्र हो जायगा?

    चन्दा––अच्छा भाई नहीं जानते, तो तुम्हीं ले चलो। हाँ नहीं तो!

    कुँअर गागर लेकर आगे-आगे चले। चन्दा पीछे हो ली। बग़ीचे में पहुँचे, तो चन्दा एक छोटे-से पौधे के पास रुक कर

    बोली––इसी देवता की पूजा करनी है, गागर रख दो। कुँअर ने आश्चर्य से पूछा––यहाँ कौन देवता है चन्दा? मुझे तो नहीं नज़र आता।

    चन्दा ने पौधे को सींचते हुए कहा––यही तो मेरा देवता है!

    पानी पाकर पौधे की मुरझाई हुई पत्तियाँ हरी हो गई, मानो उनकी आँखें खुल गई हों।

    कुँअर ने पूछा––यह पौधा क्या तुमने लगाया है चन्दा?

    चन्दा ने पौधे को एक सीधी लकड़ी से बाँधते हुए कहा––हाँ, उसी दिन तो, जब तुम यहाँ आए। यहाँ पहले मेरी गुड़ियों का घरौंदा था। मैंने गुड़ियों पर छाँह करने के लिए एक अमोल लगा दिया था। फिर मुझे इसकी याद नहीं रही। घर के काम धन्धे में भूल गई। जिस दिन तुम यहाँ आये, मुझे न-जाने क्यों इस पौधे की याद आ गई। मैंने आकर देखा, तो यह सूख गया था। मैंने तुरन्त पानी लाकर इसे सींचा, तो कुछ-कुछ ताज़ा होने लगा। तब से रोज़ इसे सींचती हूँ। देखो कितना हरा-भरा हो गया है!

    यह कहते-कहते उसने सिर उठाकर कुँअर की ओर ताकते हुए कहा––और सब काम भूल जाऊँ; पर इस पौधे को पानी देना नहीं भूलती। तुम्हीं इसके प्राण-दाता हो। यह तुम्हीं ने आकर इसे जिला दिया, नहीं तो बेचारा सूख गया होता। यह तुम्हारे शुभागमन का स्मृति-चिह्न है। ज़रा इसे देखो। मालूम होता है, हँस रहा है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, कि यह मुझसे बोलता है। सच कहती हूँ, कभी यह रोता है, कभी हँसता है, कभी रूठता है; आज तुम्हारा लाया हुआ पानी पाकर यह फूला नहीं समाता। एक-एक पत्ता तुम्हें धन्यवाद दे रहा है।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों वह पौधा कोई नन्हा-सा क्रीड़ाशील बालक है। जैसे चुम्बन से प्रसन्न होकर बालक गोद में चढ़ने के लिए दोनों हाथ फैला देता है, उसी भाँति यह पौधा भी हाथ फैलाए जान पड़ा। उसके एक-एक अणु में चन्दा का प्रेम झलक रहा था।

    चन्दा के घर में खेती के सभी औज़ार थे। कुँअर एक फावड़ा उठा लाए ओर पौधे का एक थाला बनाकर चारों ओर ऊँची मेंड़ उठा दी। फिर खुरपी लेकर अन्दर की मिट्टी को गोड़ दिया। पौधा और भी लहलहा उठा।

    चन्दा बोली––कुछ सुनते हो, क्या कह रहा है?

    कुँअर ने मुस्कुराकर कहा––हाँ! कहता है अम्माँ की गोद में बैठूँगा।

    चन्दा––नहीं, कह रहा है, इतना प्रेम करके फिर भूल न जाना।

    (३)

    मगर कुँअर को अभी राजपुत्र होने का दण्ड भोगना बाक़ी था। शत्रुओं को न-जाने कैसे उनकी टोह मिल गई इधर तो हित-चिन्तकों के आग्रह से विवश होकर बूढ़ा कुबेरसिंह चन्दा और कुँअर के विवाह की तैयारियाँ कर रहा था, उधर शत्रुओं का एक

    दल सिर पर आ पहुँचा। कुँअर ने उस पौधे के आस-पास फूल-पत्ते लगाकर एक फुलवाड़ी-सी बना दी थी। पौधे को सींचना अब उनका काम था। प्रातःकाल वह कन्धे पर काँवर रक्खे नदी से पानी ला रहे थे कि दस-बारह आदमियों ने उन्हें रास्ते में घेर लिया। कुबेर सिंह तलवार लेकर दौड़ा; लेकिन शत्रुओं ने उसे मार गिराया। अकेला, शस्त्र-हीन कुँअर क्या करता। कन्धे पर काँवर रक्खे हुए बोला––अब क्यों मेरे पीछे पड़े हो भाई? मैंने तो सब कुछ छोड़ दिया।

    सरदार बोला-हमें आपको पकड़ ले जाने का हुक्म है।

    "तुम्हारा स्वामी मुझे इस दशा में भी नहीं देख सकता? खैर, अगर धर्म समझो, तो कुबेरसिंह की तलवार मुझे दे दो। अपनी स्वाधीनता के लिए लड़कर प्राण दूँ।"

    इसका उत्तर यही मिला कि सिपाहियों ने कुँअर को पकड़कर मुश्कें कस दीं और उन्हें एक घोड़े पर बिठाकर घोड़े को भगा दिया काँवर वहीं पड़ी रह गई।

    उसी समय चन्दा घर में से निकली। देखा, काँवर पड़ी हुई है और कुँअर को लोग घोड़े पर बिठाए लिए जा रहे हैं। चोट खाए हुए पक्षी की भाँति वह कई कदम दौड़ी, फिर गिर पड़ी। उसकी आँखों में अँधेरा छा गया।

    सहसा उसकी दृष्टि पिता की लाश पर पड़ी। वह घबड़ाकर उठी और लाश के पास जा पहुँची। कुबेर अभी मरा न था। प्राण आँखों में अटके हुए थे। चन्दा को देखते ही क्षीण स्वर में बोला––बेटी…कुँअर!…इसके आगे वह कुछ न कह सका। प्राण निकल गए; पर इस एक शब्द––"कुँअर"––ने उसका आशय प्रगट कर दिया।

    (४)

    बीस वर्ष बीत गए! कुँअर कैद से न छूट सके।

    यह एक पहाड़ी क़िला था। जहाँ तक निगाह जाती, पहाड़ियाँ ही नजर आतीं। क़िले में उन्हें कोई कष्ट न था। नौकर-चाकर, भोजन-वस्त्र, सैर-शिकार, किसी बात की कमी न थी; पर उस वियोगाग्नि को कौन शान्ति करता, जो नित्य कुँवर के हृदय में जला करती थी। जीवन में अब उनके लिए कोई आशा न थी, कोई प्रकाश न था। अगर कोई इच्छा थी, तो यही कि एक बार उस प्रेम-तीर्थ की यात्रा कर लें, जहाँ उन्हें वह सब कुछ मिला जो मनुष्य को मिल सकता है। हाँ, उनके मन में एक-मात्र यही अभिलाषा थी कि उस पवित्र-स्मृतियों से रंजित भूमि के दर्शन करके जोवन का उसी नदी के तट पर अन्त कर दे। वही नदी का किनारा, वही वृक्षों का कुञ्ज, वही चन्दा का छोटा-सा सुन्दर घर, उसकी आँख में फिरा करता, और वह पोधा, जिसे उन दोनों ने मिलकर सींचा था, उसमें तो मानो उसके प्राण ही बसते थे। क्या वह दिन भी आएगा, जब वह उस पौधे को हरी-हरी पत्तियों से लदा हुआ देखेगा। कौन जाने वह अब है भी या सूख गया। कौन अब उसको सोचता होगा! चन्दा इतने दिनों अविवाहिता थोड़े ही बैठी होगी। ऐसा संभव भी तो नहीं। उसे अब मेरी सुधि भी न

    होगी। हाँ शायद कभी अपने घर की याद खींच लाती हो, तो पौधे को देखकर उसे मेरी याद आ जाती हो। मुझ-जैसे अभागे के लिए इससे अधिक वह और कर ही क्या सकती है। उस भूमि को एक बार देखने के लिए वह अपना जीवन दे सकता था; पर यह अभिलाषा पूरी न होती थी।

    आह! एक युग बीत गया, शोक और नैराश्य ने उठती जवानी को कुचल दिया। न आँखों में ज्योति रही, न पैरों में शक्ति। जीवन क्या था, एक दुःखदायी स्वप्न था। उस सघन अंधकार में उसे कुछ न सूझता था, बस जीवन का आधार एक अभिलाषा थी, एक सुखद स्वप्न जो जीवन में न-जाने कब उसने देखा था, एक बार फिर वही स्वप्न देखना चाहता था। फिर, उसकी अरिलाषाओं का अन्त हो जायगा, उसे कोई इच्छा न रहेगी। सारा अनन्त भविष्य, सारी अनन्त चिन्ताएँ, इसी एक स्वप्न में लीन हो जाती थीं।

    उसके रक्षकों को अब उसकी ओर से काई शंका न थी। उन्हें उस पर दया आती थी। रात को पहरे पर केवल कोई एक आदमी रह जाता था और लोग मीठी नींद सोते थे। कुँअर भाग जा सकता है, इसकी कोई संभावना, कोई शंका न थी। यहाँ तक कि एक दिन यह एक सिपाही भी निश्शंक होकर बन्दूक लिए लेट रहा। निद्रा किसी हिंसक पशु की भाँति ताक लगाए बैठी थी। लेटते ही टूट पड़ी। कुँअर ने सिपाही की नाक की आवाज़ सुनी। उनका हृदय बड़े वेग से उछलने लगा। यह अवसर आज कितने

    दिनों के बाद मिला था। वह उठे; मगर पाँव थरथर कांप रहे थे। बरामदे के नीचे उतरने का साहस न हो सका। कहीं इसकी नींद खुल गई तो? हिंसा उनकी सहायता कर सकती थी। सिपाही की बगल में उसकी तलवार पड़ी थी; पर प्रेम को हिंसा से बैर है। कुँअर ने सिपाही को जगा दिया। वह चौंककर उठ बैठा। रहा सहा संशय भी उसके दिल से निकल गया। दूसरी बार जो सोया तो खर्राटे लेने लगा।

    प्रातःकाल जब उसकी निद्रा टूटी, तो उसने लपककर कुँअर के कमरे में झाँका। कुँअर का पता न था।

    कुँअर इम समय हवा के घोड़ों पर सवार, कल्पना की द्रुतगति से, भागा जा रहा था- उसस्थान को, जहाँ उसने सुख-स्वप्न देखा था।

    किले में चारों ओर तलाश हुई, नायक ने सवार दौड़ाये; पर कहों पता न चला।

    ( ५ )

    पहाड़ी रास्तों का काटना कठिन, उस पर अज्ञातवास की कैद, मृत्यु के दूत पीछे लगे हुए, जिनसे बचना मुश्किल। कुँअर को कामना-तीर्थ में महीनो लग गये। जब यात्रा पूरी हुई, तो कुँअर में एक कामना के सिवा और कुछ शेष न था। दिन-भर की कठिन यात्रा के बाद जब वह उस स्थान पर पहुंचे, तो संध्या हो गई थी। वहाँ बस्ती का नाम भी न था। दो-चार टूटे-फूटे झोंपड़े उस बस्ती के चिह्न-स्वरूप शेष रह गये थे। वह झोंपड़ा, जिसमें कभी प्रेम का

    प्रकाश था, जिसके नीचे उन्होंने जीवन के सुखमय दिन काटे थे, जो उनकी कामनाओं का आगार और उनकी उपासना का मन्दिर था, अब उनकी अभिलाषाओं की भाँति भग्न हो गया था! झोंपड़े की भग्नावस्था मूक-भाषा में अपनी करुण-कथा सुना रही थी। कुँअर उसे देखते ही "चन्दा-चन्दा!" पुकारता हुआ दौड़ा। उसने उस रज को माथे पर मला, मानो किसी देवता की विभूति हो और उसकी टूटी हुई दीवारों से चिमटकर बड़ी देर तक रोता रहा। हाय रे अभिलाषा! यह रोने ही के लिये इतनी दूर से आया था? रोने ही की अभिलाषा इतने दिनों से उसे विकल कर रही थी; पर इस रोदन में कितना स्वर्गीय आनन्द था। क्या समस्त संसार का सुख इन आँसुओं की तुलना कर सकता था?

    तब वह झोंपड़े से निकला। सामने मैदान में एक वृक्ष हरे-हरे नवीन पल्लवों को गोद में लिये, मानो उसका स्वागत करने को खड़ा था। यह वही पौधा है, जिसे आज से बीस वर्ष पहले दोनों ने आरोपित किया था। कुँअर उन्मत्त की भाँति दौड़ा और जाकर उस वृक्ष से लिपट गया, मानो कोई पिता अपने मातृ-हीन पुत्र को छाती से लगाये हुए हो। यह उसी प्रेम की निशानी है, उसी अक्षय प्रेम की, जो इतने दिनों के बाद आज इतना विशाल हो गया है। कुँअर का हृदय ऐसा फूल उठा, मानों इस वृक्ष को अपने अन्दर रख लेगा, जिसमें उसे हवा का झोंका भी न लगे। उसके एक-एक पल्लव पर चन्दा की स्मृति बैठी हुई थी। पक्षियों का इतना रम्य संगीत क्या कभी उसने सुना था! उसके हाथों में

    दम न था, सारी देह भूख-प्यास और थकन से शिथिल हो रही थी। पर, वह उस वृक्ष पर चढ़ गया, इतनी फुर्ती से चढ़ा कि बन्दर भी न चढ़ता। सबसे ऊँची फुनगी पर बैठकर उसने चारों ओर गर्व-पूर्ण दृष्टि डाली। यही उसकी कामनाओं का स्वर्ग था। सारा दृश्य चंदामय हो रहा था। दूर की नीली पर्वत-श्रेणियों पर चन्दा बैठी गा रही थी, आकाश में तैरनेवाली लालिमा-मयी नौकाओं पर चन्दा ही उड़ी जाती थी। सूर्य की श्वेत-पीत प्रकाश की रेखाओं पर चन्दा ही बैठी हँस रही थी। कुँअर के मन में आया, पक्षी होता तो इन्हीं डालियों पर बैठा हुआ जीवन के दिन पूरे करता।

    जब अँधेरा हो गया, तो कुँअर नीचे उतरा और उसी वृक्ष के नीचे थोड़ी-सी भूमि झाड़कर, पतियों को शय्या बनाई और लेटा। यही उसके जीवन का स्वर्ण-स्वप्न था, आह यही वैराग्य! अब वह इस वृक्ष की शरण छोड़कर कहीं न जायगा। दिल्ली के तख्त के लिए भी वह इस आश्रम को न छोड़ेगा।

    ( ६ )

    उसी स्निग्ध अमल चाँदनी में सहसा एक पक्षी आकर उस वृक्ष पर बैठा और दर्द में डूबे हुए स्वरों में गाने लगा। ऐसा जान पड़ा, मानो वह वृक्ष सिर धुन रहा है। वह नीरव रात्रि उस वेदना-मय संगीत से हिल उठी, कुँअर का हृदय इस तरह ऐंठने लगा, मानो वह फट जायगा। उस स्वर में करुणा और वियोग के तीर-से भरे हुए थे। आह! पक्षी, तेरा जोड़ा भी अवश्य बिछुड़

    गया है, नहीं तेरे राग में इतनी व्यथा, इतना विषाद, इतना रुदन कहाँ से आता! कुँअर के हृदय के टुकड़े हुए जाते थे, एक-एक स्वर तीर की भाँति दिल को छेदे डालता था। वहाँ बैठे न रह सके। उठकर एक आत्म-विस्मृत की दशा में दौड़े हुए झोंपड़े में गये, वहाँ से फिर वृक्ष के नीचे आए। उस पक्षी को कैसे पाएँ। कहीं दिखाई नहीं देता।

    पक्षी का गाना बन्द हुआ, तो कुँअर को नींद आ गई। उन्हें स्वप्न में ऐसा जान पड़ा कि वही पक्षी उनके समीप आया। कुँअर ने ध्यान से देखा, तो वह पक्षी न था, चन्दा थी, प्रत्यक्ष चन्दा थी।

    कुँअर ने पूछा—चन्दा यह पक्षी यहाँ कहाँ?

    चन्दा ने कहा—मैं ही तो वह पक्षी हूँ।

    कुँअर—तुम पक्षी हो! क्या तुम्हीं गा रही थीं?

    चन्दा—हाँ प्रियतम, मैं ही गा रही थी। इसी तरह रोते एक युग बीत गया।

    कुँअर—तुम्हारा घोंसला कहाँ है?

    चन्दा—उसी झोंपड़े में, जहाँ तुम्हारी खाट थी। उसी खाट के बान से मैंने अपना घोंसला बनाया है।

    कुँअर—और तुम्हारा जोड़ा कहाँ है?

    चन्दा—मैं अकेली हूँ। चन्दा को अपने प्रियतम के स्मरण करने में, उसके लिए रोने में, जो सुख है वह जोड़े में नहीं, मैं इसी तरह अकेली रहूँगी और अकेली मरूँगी।

    कुँअर—मैं क्या पक्षी नहीं हो सकता? चन्दा चली गई। कुँअर की नींद खुल गई। ऊषा की लालिमा आकाश पर छाई हुई थी और वह चिड़िया, कुँअर की शय्या के समीप एक डाल पर बैठी चहक रही थी। अब उस संगीत में करुणा न थी, विलाप न था, उसमें आनन्द था, चापल्य था, सारस्य था। वह वियोग का करुण-क्रन्दन न हों, मिलन का मधुर संगीत था।

    कुँवर सोचने लगे—इस स्वप्न का क्या रहस्य है?

    ( ७ )

    कुँवर ने शय्या से उठते ही एक झाडू बनाया और उस झोंपड़े को साफ करने लगे। उनके जीते-जी इसकी यह भग्न-दशा नहीं रह सकती। वह इसकी दीवारें उठाएँगे, इस पर छप्पर डालेंगे, इसे लीपेंगे। इनमें उनका चन्द स्मृति वास करती है। झोंपड़े के एक कोने में वह काँवर रक्खी हुई थी, जिस पर पानी ला-लाकर वह इस बृक्ष को सींचते थे। उन्होंने काँवर उठा ली और पानी लाने लगे। दो दिन से कुछ भोजन न किया था। रात को भूख लगी हुई थी; पर इस समय भोजन की बिलकुल इच्छा न थी। देह में एक अद्भुत स्फूर्ति का अनुभव होता था। उन्होंने नदी से पानी ला-ला मिट्टी भिगोना शुरु किया। दौड़े जाते थे और दौड़े आते थे। इतनी शक्ति उनमें कभी न थी।

    एक ही दिन में इतनी दीवार उठ गई, जितनी चार मज़दूर भी न उठा सकते थे। और कितनी सीधी, चिकनी दीवार थी कि कारीगर भी देखकर लज्जित हो जाता। प्रेम की शक्ति अपार है। सन्ध्या हो गई। चिड़ियों ने बसेरा लिया। वृक्षों ने भी आँखें बन्द की; मगर कुँवर को आराम कहाँ। तारों के मलिन प्रकाश में मिट्टी के रद्दे रक्खे जाते थे। हाय रे कामना! क्या तू इस बेचारे के प्राण ही लेकर छोड़ेगी?

    वृक्ष पर पक्षी का मधुर स्वर सुनाई दिया। कुँवर के हाथ से घड़ा छूट पड़ा। हाथ और पैरों में मिट्टी लपेटे वह वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए। उस स्वर में कितना लालित्य था, कितना उल्लास, कितनी ज्योति! मानव-संगीत इसके सामने बेसुरा आलाप था। उसमें यह जागृति, यह अमृत, यह जीवक कहाँ? संगीत के आनन्द में विस्मृति है; पर वह विस्मृति कितनी स्मृति-मय होती है, अतीत को जीवन और प्रकाश से रञ्जित करके प्रत्यक्ष कर देने की शक्ति, संगीत के सिवा और कहां है? कुँवर के हृदय-नेत्रों के सामने वह दृश्य आ खड़ा हुआ, जब चन्दा इसी पौधे को नदी से जल ला-लाकर सींचती थी। हाय, क्या वे दिन फिर आ सकते हैं!

    सहसा एक बटोही आकर खड़ा हो गया ओर कुँअर को देखकर प्रश्न करने लगा, जो साधारणत: दो अपरिचित प्राणियों में हुआ करते हैं-कौन हो, कहाँ से आते हो कहाँ जाओगे? पहले वह भी इसी गाँव में रहता था; पर जब गाँव उजड़ गया, तो समीप के एक दूसरे गाँव में जा बसा था। अब भी उसके खेत यहाँ थे। रात को जङ्गली पशुओं से अपने खेतों की रक्षा करने के लिए वह यहीं आकर सोता था। कुँवर ने पूछा-तुम्हें मालूम है, इस गाँव में एक कुबेरसिंह ठाकुर रहते थे?

    किसान ने बड़ी उत्सुकता से कहा-हाँ-हाँ भाई, जानता क्यों नहीं! बेचारे यहीं तो मारे गये। तुमसे क्या उसकी जान-पहचान थी?

    कुँअर हाँ, उन दिनों कभी-कभी आया करता था। मैं भी राजा की सेना में नौकर था। उनके घर में और कोई न था?

    किसान-अरे भाई कुछ न पूछो, बड़ी करुण-कथा है। उसकी स्त्री तो पहले ही मर चुकी थी। केवल लड़की बच रही थी। आह! कैसी सुशीला, कैसी सुघड़ वह लड़की थी! उसे देखकर आँखों में ज्योति आ जाती थी। बिलकुल स्वर्ग की देवी जान पड़ती थी। जब कुबेरसिंह जोता था, तभी कुँअर इन्द्रनाथ यहाँ भाग कर आये थे और उसके यहाँ रहे थे। उस लड़की की कुँअर से कहीं बात-चीत हो गई। जब कुँवर को शत्रुओं ने पकड़ लिया, तो चन्दा घर में अकेली रह गई। गाँववालों ने बहुत चाहा, कि उसका विवाह हो जाय। उसके लिए वरों का तोड़ा न था भाई, ऐसा कौन था, जो उसे पाकर अपने को धन्य न मानता; पर वह किसी से विवाह करने पर राजी न हुई। यह पेड़ जो तुम देख रहे हो, तब छोटा-सा पौधा था। इसके आस-पास फूलों की कई ओर क्यारियाँ थीं। इन्हीं को गोड़ने, निराने, सींचने में उसका दिन कटता था। बस, यह कहती, कि हमारे कुँअर साहब आते होंगे।

    कुँअर की आँखों से आंसू की वर्षा होने लगी। मुसाफिर ने

    ज़रा दम लेकर कहा-दिन-दिन घुलती जाती थी। तुम्हें विश्वास न आयेगा भाई, उसने दस साल इसी तरह काट दिये। इतनी दुर्बल हो गई थी, कि पहचानी न जाती थी; पर अब भी उसे कुँअर साहब के आने की आशा बनी हुई थी। आखिर एक दिन इसी वृक्ष के नीचे उसकी लाश मिली। ऐसा प्रेम कौन करेगा भाई! कुँअर न जाने मरे कि जिए, कभी उन्हें इस विरहिणी की याद भी आती है, कि नहीं; पर उसने तो प्रेम को ऐसा निभाया जैसा चाहिए।

    कुँअर को ऐसा जान पड़ा, मानों हृदय फटा जा रहा है। वह कलेजा थामकर बैठ गए। मुसाफिर के हाथ में एक सुलगता हुआ उपला था। उसने चिलम भरी और दो-चार दम लगाकर बोला- उसके मरने के बाद यह घर गिर गया। गांव पहले ही उजाड़ था। अब तो और भी सुनसान हो गया। दो-चार असामी यहाँ आ बैठते थे। अब तो चिड़िए का पूत भी यहाँ नहीं आता। उसके मरने के कई महीने के बाद, यही चिडिया इस पेड़ पर बोलती हुई सुनाई दी। तब से बराबर इसे यहाँ बोलते सुनता हूँ। रात को सभी चिड़ियाँ सो जाती हैं; पर यह रात भर बोलती रहती है। उसका जोड़ा कभी नहीं दिखाई दिया। बस, बस, फुट्टैल है। दिन-भर उसी झोंपड़े में पड़ी रहती है। रात को इस पेड़ पर आ बैठती है; मगर इस समय इसके गाने में कुछ और ही बात है, नहीं तो सुनकर रोना आता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई कलेजे को मसोस रहा हो। मैं तो कभी-कभी पड़े-पड़े रो दिया करता हूँ। सब लोग कहते हैं कि यह वही चन्दा है। अब भी कुँअर के वियोग में विलाप कर रही है । मुझे भी ऐसा ही जान पड़ता है। आज न-जाने क्यों मगन है।

    किसान तम्बाकू पीकर सो गया। कुँअर कुछ देर तक खोया हुआ-सा खड़ा रहा। फिर धीरे से बोला-चन्दा, क्या सचमुच तुम्ही हो? मेरे पास क्यों नहीं आती?

    एक क्षण में चिड़िया आकर उसके हाथ पर बैठ गई। चन्द्रमा के प्रकाश में कुँअर ने चिड़िया को देखा। ऐसा जान पड़ा, मानो उनकी आँखें खुल गई हों, मानों आँखों के सामने से कोई आवरण हट गया हो। पक्षी के रूप में भी चन्दा की मुखाकृति अंकित थी।

    दूसरे दिन किसान सोकर उठा, तो कुँअर की लाश पड़ी हुई थी।

    ( ८ )

    कुँअर अब नहीं हैं; किन्तु इनके झोंपड़े की दीवारें बन गई हैं, ऊपर फूस का नया छप्पर पड़ गया है और झोंपड़े के द्वार पर फूलों की कई क्यारियाँ लगी हुई हैं। गाँव के किसान इससे अधिक और क्या कर सकते थे।

    उस झोंपड़े में अब पक्षियों के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया है। दोनों साथ-साथ दाने-चारे की खोज में जाते हैं, साथ-साथ आते हैं। रात को दोनों उसी वृक्ष की डाल पर बैठे दिखाई देते हैं। उनका सुरम्य संगीत, रात की नीरवता में दूर तक सुनाई

    देता है। बन के जीव-जन्तु वह स्वर्गीय गान सुनकर मुग्ध हो जाते हैं।

    यह पक्षियों का जोड़ा कुँअर और चन्दा का जोड़ा है, इसमें किसी को सन्देह नहीं है।

    एक बार एक व्याध ने इन पक्षियों को फँसाना चाहा; पर गाँववालों ने उसे मारकर भगा दिया।

    ______

    (३) रानी सारन्धा

    (१)

    अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चकियाँ। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है, जिसको जङ्गली वृक्षों ने घेर रक्खा है। टीले के पूर्व की ओर एक छोटा-सा गाँव है । यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुन्देला सरदार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियाँ व्यतीत हो गई, बुन्देलखण्ड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ, मुसलमान आये और गये, बुन्देला राजा उठे और गिरे, कोई गाँव, कोई इलाका, ऐसा न था, जो इस दुर्व्यवस्थाओं से पीड़ित न हो; मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहराई और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।

    अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था। वह जमाना ही ऐसा था, जब मनुष्य-मात्र को अपने बाहु-बल और पराक्रम ही का भरोसा था। एक ओर मुसलमान सेनाए पैर जमाये खड़ी रहती थीं, दूसरी ओर बलवान् राजा अपने निर्बल भाइयों का गला घोटने पर तत्पर रहते थे। अनिरुद्धसिंह के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा, मगर सजीव, दल था। इससे वह अपने कुल और मर्यादा की रक्षा किया करता था। उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था। तीन वर्ष पहले उसका विवाह शीलता- देवी से हुआ; मगर अनिरुद्ध बिहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में। वह कितनी बार पति से अनुरोध कर चुकी थी, कितनी बार उसके पैरों पर गिरकर रोई थी, कि तुम मेरी आँखों से दूर न हो, मुझे हरिद्वार ले चलो मुझे तुम्हार साथ वन-वास अच्छा है, यह वियोग अब नहीं सहा जाता। उसने प्यार से कहा, जिद से कहा, विनय की; मगर अनिरुद्ध बुन्देला था। शीतला अपने किसी हथियार से उसे परास्त न कर सकी।

    ( २ )

    अँधेरी रात थी। सारी दुनिया सोती थी; मगर तारे आकाश में भागते थे। शीतलादेवी पलङ्ग पर पड़ी करवटें बदल रही थी ओर उसकी ननद सारन्धा फर्श पर बैठी हुई मधुर स्वर से गाती थी-

    बिन रघुबीर कटत नहीं रैन।

    शीतला ने कहा-जी न जलाओ। क्या तुम्हें भी नींद नहीं आती?

    सारन्धा-तुम्हें लोरी सुना रही हूँ।

    शीतला-मेरी आँखों से तो नींद लोप हो गई। सारन्धा—किसी को ढूँढ़ने गई होगी।

    इमने में द्वार खुला और एक गठे हुए बदन के रूपवान् पुरुष ने भीतर प्रवेश किया। यह अनिरुद्ध था। उसके कपड़े भीगे हुए थे, और बदन पर कोई हथियार न था। शीतला चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठ गई।

    सारन्धा ने पूछा—भैया, यह कपड़े भीगे क्यों हैं?

    अनिरुद्ध—नदी पैरकर आया हूँ।

    सारन्धा—हथियार क्या हुए?

    अनिरुद्ध—छिन गये।

    सारन्धा—और साथ के आदमी?

    अनिरुद्ध—सबने वीर गति पाई।

    शीतला ने दबी ज़बान से कहा—"ईश्वर ने ही कुशल किया…" मगर सारन्धा के तीवरों पर बल पड़ गये और मुखमण्डल गर्व से सतेज हो गया। बोली "भैया, तुमने कुल की मर्यादा खो दी। ऐसा कभी न हुआ था।"

    सारन्धा भाई पर जान देती थी। उसके मुंह से वह धिक्कार सुनकर अनिरुद्ध लज्जा और खेद से विकल हो गया। वह वीराग्नि जिसे क्षण भर के लिये अनुराग ने दबा दिया था, फिर ज्वलन्त हो गई। वह उल्टे पांव लौटा और यह कहकर बाहर चला गया कि "सारन्धा, तुमने मुझे सदैव के लिये सचेत कर दिया। यह बात मुझे कभी न भुलेगी।"

    अँधेरी रात थी। आकाश मण्डल में तारों का प्रकाश बहुत

    धुंधला था। अनिरुद्ध किले से बाहर निकला। पलभर में नदी के उस पार जा पहुँचा, और फिर अन्धकार में लुप्त हो गया। शीतला उसके पीछे-पीछे किले की दीवारों तक आई; मगर जब अनिरुद्ध छलाँग मारकर बाहर कूद पड़ा, तो वह विरहिणी एक चट्टान पर बैठकर रोने लगी।

    इतने में सारन्धा भी वहीं आ पहुँची। शीतला ने नागिन की तरह बल खाकर कहा—मर्यादा इतनी प्यारी है?

    सारन्धा—हाँ।

    शीतला—अपना पति होता, तो हृदय में छिपा लेती।

    सारन्धा—न, छाती में छुरी चुभा देती।

    शीतला ने ऐंठकर कहा—डोली में छिपाती फिरोगी, मेरी बात गिरह में बाँध लो।

    सारन्धा—जिस दिन ऐसा होगा, मैं भी अपना वचन पूरा कर दिखाऊँगी।

    इस घटना के तीन महीने पीछे अनिरुद्ध महरौना को जीत करके लौटा और साल-भर पीछे सारन्धा का विवाह ओरछा के राजा चम्पतराय से हो गया। मगर उस दिन की बातें दोनों महिलाओं के हृदय-स्थल में काँटे की तरह खटकती रहीं।

    ( ३ )

    राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुँदेला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उसने मुग़ल बादशाहों को कर देना बन्द कर

    दिया और अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगा। मुसलमानों की सेनायें बार-बार उस पर हमले करती थीं; पर हार कर लौट जाती थीं।

    यही समय था, जब अनिरुद्ध ने सारन्धा का चम्पतराय से विवाह कर दिया। सारन्धा ने मुँहमाँगी मुराद पाई। उसकी यह अभिलाषा कि मेरा पतिदेला जाति का कुल-तिलक हो, पूरी हुई। यद्यपि राजा के रनिवास में पाँच रानियाँ थीं, मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम हो गया कि वह देवी जो हृदय में मेरी पूजा करती है, सारन्धा है।

    परन्तु कुछ ऐसी घटनायें हुई कि चम्पतराय को मुगल-बादशाह का आश्रित होना पड़ा। वह अपना राज्य अपने भाई पहाड़सिंह को सौंपकर आप देहली को चला गया। यह शाहजहाँ के शासनकाल का अन्तिम भाग था। शाहजादा दारा शिकोह राजकीय कार्यों को सँभालते थे। युवराज की आँखों में शील था और चित्त में उदारता। उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथायें सुनी थीं, इसलिए उसका बहुत आदर-सम्मान किया, और कालपी की बहुमूल्य जागीर उसके भेंट की, जिसकी आमदनी नौ लाख थी। यह पहला अवसर था कि चम्मराय की आये-दिन की लड़ाई-झगड़े से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग-विलास का प्राबल्य हुआ। रात-दिन आमोद-प्रमोद की चर्चा रहने लगी। राजा विलास में डूबे, रानियाँ जड़ाऊ गहनों पर रीझी। मगर सारन्धा इन दिनों बहुत उदास और संकुचित रहती। वह इन रहस्यों से दूर-दूर रहती, ये नृत्य और गान की सभायें से सूनी प्रतीत होती। एक दिन चम्पतराय ने सारन्धा से कहा—सारन, तुम उदास क्यों रहती हो? मैं तुम्हें कभी हँसते नहीं देखता। क्या मुझसे नाराज हो?

    सारन्धा की आँखों में जल भर आया। बोली-स्वामी जी! आप क्यों ऐसा विचार करते है? जहाँ आप प्रसन्न हैं, वहाँ मैं भी खुश हूँ।

    चम्पतराय—मैं जब से यहाँ आया हूँ मैंने तुम्हारे मुख-कमल पर कभी मनोहारिणी मुसकिराहट नहीं देखी। तुमने कभी अपने हाथों से मुझे बीड़ा नहीं खिलाया। कभी मेरी पाग नहीं सँवारी कभी मेरे शरीर पर शस्त्र नहीं सजाये। कहीं प्रेमलता मुराझाने तो नहीं लगी?

    सारन्धा—प्राणनाथ! आप मुझसे ऐसी बाते पूछते हैं, जिसका उत्तर मेरे पास नहीं है! यथार्थ में इन दिनों मेरा चित्त कुछ उदास रहता है। मैं बहुत चाहती हूँ कि खुश रहूँ; मगर एक बोझा-सा हृदय पर धरा रहता है।

    चम्पतराय स्वयं आनन्द में मग्न थे। इसलिये उनके विचार में सारन्धा को असन्तुष्ट रहने का कोई उचित कारण नहीं हो सकता था। वे भौंहें सिकोड़कर बोले—मुझे तुम्हें उदास रहने का कोई विशेष कारण नहीं मालूम होता। ओरछे में कौन सा सुख था,जो यहाँ नहीं है? सारन्धा का चेहरा लाल हो गया। बोली—मैं कुछ कहूँ, आप नाराज तो न होंगे?

    चम्पतराय—नहीं, शौक से कहो। सारन्धा—ओरछा में मैं एक राजा की रानी थी। यहाँ मैं एक जागीरदार की चेरी हूँ। ओरछा में मैं वह थी जो अवध में कौशल्या थीं; परन्तु यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से काँपता था । रानी से चेरी होकर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महंगे दामों में मोल ली हैं।

    चम्पतराय के नेत्रों से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारन्धा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे माँ-बाप का बालक माँ को चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह ओरछा की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गई। उन्होंने आदर-युक्त अनुराग के साथ सारन्धा को हृदय से लगा लिया।

    आज से उन्हें फिर उसी उजड़ी बस्ती की फिक्र हुई, जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषायें खींच लाई थीं।

    (४)

    माँ अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जोती है। चम्पतराय के आने से बुन्देलखण्ड निहाल हो गया। ओरछा के भाग जागे। नौबतें झड़ने लगी, और फिर सारन्धा के कमल-नेत्रों में जातीय अभिमान का आभास दिखाई देने लगा।

    यहाँ रहते कई महीने बीत गये। इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा। शाहज़ादाओं में पहले से ईर्षा की अग्नि दहक रही थी। यह ख़बर सुनते ही ज्वाला प्रचण्ड हुई। संग्राम की तैयारियाँ

    होने लगीं। शाहज़ादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने-अपने दल सजाकर दक्खिन से चले। वर्षा के दिन थे। उर्बरा भूमि रंग-बिरंग के रूप भरकर अपने सौन्दर्य को दिखाती थी।

    मुराद और मुहीउद्दीन उमंगों से भरे हुए कदम बढ़ाते चले आते थे। यहाँ तक कि वे धौलपुर के निकट चम्बल के तट पर आ पहुँचे; परन्तु यहाँ उन्होने बादशाही सेना को अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया।

  • कुछ विचार

    कुछ विचार

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    कुछ विचार
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    उपन्यास

    उपन्यास की परिभाषा विद्वानों ने कई प्रकार से की है, लेकिन यह क़ायदा है कि जो चीज़ जितनी ही सरल होती है, उसकी परिभाषा उतनी ही मुश्किल होती है। कविता की परिभाषा आज तक नहीं हो सकी। जितने विद्वान हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं। किन्हीं दो विद्वानों की रायें नहीं मिलतीं। उपन्यास के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। इसकी कोई ऐसो परिभाषा नहीं हैं जिस पर सभी लोग सहमत हों।

    मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र-मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।

    किन्हीं भी दो आदमियों की सूरतें नहीं मिलतीं, उसी भाँति आद- मियों के चरित्र भी नहीं मिलते। जैसे सब आदमियों के हाथ, पाँव, आँखें, कान, नाक, मुँह होते हैं––पर उतनी समानता पर भी जिस तरह उनमें विभिन्नता मौजूद रहती है, उसी भाँति, सब आदमियों के चरित्र में भी बहुत कुछ समानता होते हुए कुछ विभिन्नताएँ होती हैं। यही चरित्र-सम्बन्धी समानता और विभिन्नता––अभिन्नत्व में भिन्नत्व और विभिन्नत्व में अभिन्नत्व, दिखाना उपन्यास का मुख्य कर्तव्य है।

    सन्तान-प्रेम मानव-चरित्र का एक व्यापक गुण है। ऐसा कौन प्राणी होगा जिसे अपनी सन्तान प्यारी न हो। लेकिन इस सन्तान-प्रेम की मात्राएँ हैं––उसके भेद हैं। कोई तो सन्तान के लिए मर मिटता है, उसके लिए कुछ छोड़ जाने के लिए आप नाना प्रकार के कष्ट झेलता है, लेकिन, धर्म-भीरुता के कारण अनुचित रीति से धन-संचय नहीं करता; उसे शंका होती है कि कहीं इसका परिणाम हमारी सन्तान के लिए बुरा न हो। कोई ऐसा होता है कि औचित्य का लेश-मात्र भी

    विचार नहीं करता––जिस तरह भी हो कुछ धन संचय कर जाना अपना ध्येय समझता है, चाहे इसके लिए उसे दूसरों का गला ही क्यों न काटना पड़े––वह सन्तान-प्रेम पर अपनी आत्मा को भी बलिदान कर देता है। एक तीसरा सन्तान-प्रेम वह है जहाँ सन्तान का चरित्र प्रधान कारण होता है––जब कि पिता सन्तान का कुचरित्र देखकर उससे उदासीन हो जाता है––उसके लिये कुछ छोड़ जाना या कर जाना व्यर्थ समझता है। अगर आप विचार करेंगे तो इसी सन्तान-प्रेम के अगणित भेद आपको मिलेंगे। इसी भाँति अन्य मानव-गुणों की भी मात्राएँ और भेद हैं। हमारा चरित्राध्ययन जितना ही सूक्ष्म––जितना ही विस्तृत होगा, उतनी सफलता से हम चरित्रों का चित्रण कर सकेंगे। सन्तान-प्रेम की एक दशा यह भी है जब पुत्र को कुमार्ग पर चलते देख कर पिता उसका घातक शत्रु हो जाता है। वह भी सन्तान-प्रेम ही है जब पिता के लिए पुत्र घी का लड्डू होता है, जिसका टेढ़ापन उसके स्वाद में बाधक नहीं होता। वह सन्तान-प्रेम भी देखने में आता है जहाँ शराबी, जुआरी पिता पुत्र-प्रेम के वशीभूत होकर ये सारी बुरी आदतें छोड़ देता है।

    अब यहाँ प्रश्न होता है उपन्यासकार को इन चरित्रों का अध्ययन करके उनको पाठक के सामने रख देना चाहिए––उसमें अपनी तरफ़ से काट-छाँट, कमी वेशी कुछ न करनी चाहिए, या किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये चरित्रों में कुछ परिवर्तन भी कर देना चाहिए?

    यहीं से उपन्यासों के दो गरोह हो गये हैं। एक आदर्शवादी, दूसरा यथार्थवादी।

    यथार्थवादी चरित्रों को पाठक के सामने उनके यथार्थ नग्न रूप में रख देता है। उसे इससे कुछ मतलब नहीं कि सच्चरित्रता का परिणाम बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा––उसके चरित्र अपनी कमज़ोरियाँ या ख़ुबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन-लीला समाप्त करते हैं। संसार में सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नहीं होता; बल्कि इसके विपरीत हुआ करता है––नेक आदमी धक्के खाते हैं, यातनाएँ सहते हैं, मुसीबतें झेलते हैं, अपमानित होते हैं,––उनको नेकी का फल उलटा मिलता है, बुरे आदमी चैन करते हैं, नामवर होते हैं, यशस्वी बनते हैं––उनको बदी का फल उलटा मिलता है। (प्रकृति का नियम विचित्र है!) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियों में जकड़ा होता है और चूँकि संसार में बुरे चरित्रों की ही प्रधानता है––यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र में भी कुछ न कुछ दाग़-धब्बे रहते हैं, इसलिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नज़र आने लगती है।

    इसमें सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिये यथार्थवाद अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं काला दिखायें जितना वह वास्तव में है। लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है। फिर मानव-स्वभाव की एक विशेषता यह भी है कि वह जिस छल और क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे संसार में उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले––वह भूल जाय कि मैं चिन्ताओं के बंधन में पड़ा हुआ हूँ; जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हों; जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल में ख्याल होता है कि जब हमें क़िस्से-कहानियों में भी उन्हीं लोगों से साबक़ा है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़े ही क्यों?

    अँधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा होती है कि किसी बाग़ में निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का आनंद उठायें।––इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते हैं, जो स्वार्थ और वासना से रहित होते हैं, जो साधु प्रकृति के होते हैं। यद्यपि ऐसे चरित्र व्यवहार-कुशल नहीं होते, उनकी सरलता उन्हें सांसारिक विषयों में धोखा देती है; लेकिन काँइएपन से ऊबे हुए प्राणियों को ऐसे सरल, ऐसे व्यावहारिक ज्ञान-विहीन चरित्रों के दर्शन से एक विशेष आनंद होता है।

    यथार्थवाद यदि हमारी आँखें खोल देता है,तो आदर्शवाद हमें उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुँचा देता है। लेकिन जहाँ आदर्शवाद में यह गुण है, वहाँ इस बात की भी शंका है कि हम ऐसे चरित्रों को न चित्रित कर बैठें जो सिद्धांतों की मूर्तिमात्र हो––जिनमें जीवन न हो। किसी देवता की कामना करना मुश्किल नहीं है, लेकिन उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।

    इसलिए वही उपन्यास उच्च कोटि के समझे जाते हैं, जहाँ यथार्थ और आदर्श का समावेश हो गया हो। उसे आप 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' कह सकते हैं। आदर्श को सजीव बनाने ही के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिये और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है। उपन्यासकार की सबसे बड़ी विभूति ऐसे चरित्रों की सृष्टि है, जो अपने सद्व्यवहार और सद्विचार से पाठक को मोहित कर ले। जिस उपन्यास के चरित्रों में यह गुण नहीं है वह दो कौड़ी का है।

    चरित्र को उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि वह निर्दोष हो––महान् से महान् पुरुषों में भी कुछ न कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं––चरित्र को सजीव बनाने के लिए उसकी कमज़ोरियों का दिग्दर्शन कराने से कोई हानि नहीं होती। बल्कि यही कमज़ोरियाँ उस चरित्र को मनुष्य बना देतो हैं। निर्दोष चरित्र तो देवता हो जायगा और हम उसे समझ ही न सकेंगे। ऐसे चरित्र का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। हमारे प्राचीन साहित्य पर आदर्श की छाप

    लगी हुई है। वह केवल मनोरंजन के लिए न था। उसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ आत्मपरिष्कार भी था। साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसख़रों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है।—कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिये। इस मनोरथ को सिद्ध करने के लिए ज़रूरत है कि उसके चरित्र positive हों, जो, प्रलोभनों के आगे सिर न झुकायें; बल्कि उनको परास्त करें; जो वासनाओं के पंजे में न फँसे; बल्कि उनका दमन करे; जो किसी विजयी सेनापति की भाँति शत्रुओं का संहार करके विजय-नाद करते हुए निकले। ऐसे ही चरित्रों का हमारे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

    साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाय। 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलम्बित हो; ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और विराग, दुःख और लज्जा––ये सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं, इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती।

    जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आज-कल परिस्थितियाँ इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नये-नये विचार पैदा हो रहे हैं, कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख ही नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियों का असर न पड़े—वह उनसे आन्दोलित न हो। यही कारण है कि आजकल भारतवर्ष के ही नहीं, यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान् भी अपनी रचना द्वारा किसी 'वाद' का प्रचार कर रहे हैं। वे इसकी परवा नहीं करते कि इससे हमारी रचना जीवित रहेगी या नहीं; अपने मत की पुष्टि करना ही उनका ध्येय है, इसके सिवाय उन्हें कोई इच्छा नहीं। मगर यह क्योंकर मान लिया जाय कि जो उपन्यास किसी विचार के प्रचार के लिए लिखा जाता है, उसका महत्त्व क्षणिक होता है? विक्टर ह्यगो का 'ला मिज़रेबुल', टालस्टाय के अनेक ग्रन्थ, डिकेन्स की कितनी ही रचनाएँ, विचार-प्रधान होते हुए उच्च कोटि की साहित्यिक हैं और अब तक उनका आकर्षण कम नहीं हुआ। आज भी शॉ, वल्स आदि बड़े-बड़े लेखकों के ग्रन्थ प्रचार ही के उद्देश्य से लिखे जा रहे हैं।

    हमारा ख्याल है कि क्यों न कुशल साहित्यकार कोई विचार-प्रधान रचना भी इतनी सुन्दरता से करे जिसमें मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों का संघर्ष निभता रहे? 'कला के लिए कला' का समय वह होता है जब देश सम्पन्न और सुखी हो। जब हम देखते हैं कि हम भाँति-भाँति के राजनीतिक और सामाजिक बंधनों में जकड़े हुए हैं, जिधर निगाह उठती है दुःख और दरिद्रता के भीषण दृश्य दिखाई देते हैं, विपत्ति का करुण क्रंदन सुनाई देता है, तो कैसे संभव है कि किसी विचारशील प्राणी का हृदय न दहल उठे? हाँ, उपन्यासकार को इसका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये कि उसके विचार परोक्ष रूप से व्यक्त हों, उपन्यास की स्वाभाविकता में उस विचार के समावेश से कोई विघ्न न पड़ने पाये; अन्यथा उपन्यास नीरस हो जायगा।

    डिफेंस इंग्लैंड का बहुत प्रसिद्ध उपन्यासकार हो चुका है। 'पिकविक पेपर्स' उसकी एक अमर हास्य-रस-प्रधान रचना है। 'पिकविक' का नाम एक शिकरम गाड़ी के मुसाफिरों की ज़ुबान से डिकेंस के कान में आया। बस, नाम के अनुरूप ही चरित्र, आकार, वेष—सबकी रचना हो गई। 'साइलस मार्नर' भी अँगरेज़ी का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। जार्ज इलियट ने, जो इसकी लेखिका हैं, लिखा है कि अपने बचपन में उन्होंने एक फेरी लगानेवाले जुलाहे को पीठ पर कपड़े के थान लादे हुए कई बार देखा था। वह तसवीर उनके हृदय-पट पर अङ्कित हो गई थी और समय पर इस उपन्यास के रूप में प्रकट हुई। 'स्कारलेट लेटर' भी हॅथर्न की बहुत ही सुंदर, मर्मस्पर्शिनी रचना है। इस पुस्तक का बीजांकुर उन्हें एक पुराने मुकदमे की मिसिल से मिला। भारतवर्ष में अभी उपन्यासकारों के जीवन-चरित्र लिखे नहीं गये, इसलिए भारतीय उपन्यास-साहित्य से कोई उदाहरण देना कठिन है। 'रङ्गभूमि' का बीजांकुर हमें एक अंधे भिखारी से मिला जो हमारे गाँव में रहता था। एक ज़रा-सा इशारा, एक ज़रा-सा बीज, लेखक के मस्तिष्क में पहुँचकर इतना विशाल वृक्ष बन जाता है कि लोग उस पर आश्चर्य करने लगते हैं। 'एम॰ ऐंड्रूज हिम' रडयार्ड किपलिंग की एक उत्कृष्ट काव्य-रचना है। किपलिंग साहब ने अपने एक नोट में लिखा है कि एक दिन एक इञ्जीनियर साहब ने रात को अपनी जीवन-कथा सुनाई थी। वही उस काव्य का आधार थी। एक और प्रसिद्ध उपन्यासकार का कथन है कि उसे अपने उपन्यासों के चरित्र अपने पड़ोसियों में मिले। वह घण्टों अपनी खिड़की के सामने बैठे लोगों को आते-जाते सूक्ष्म दृष्टि से देखा करते और उनकी बातों को ध्यान से सुना करते थे। 'जेन आयर' भी उपन्यास के प्रेमियों ने अवश्य पढ़ी होगी। दो लेखिकाओं में इस विषय पर बहस हो रही थी कि उपन्यास की नायिका रूपवती होनी चाहिये या नहीं। 'जेन आयर' की लेखिका ने कहा, 'मैं ऐसा उपन्यास लिखूँगी जिसकी नायिका रूपवती न होते हुए भी आकर्षक होगी।' इसका फल था 'जेन आयर।'

    बहुधा लेखकों को पुस्तकों से अपनी रचनाओं के लिए अंकुर मिल जाते हैं। हाल केन का नाम पाठकों ने सुना है। आपकी एक उत्तम रचना का हिन्दी अनुवाद हाल ही में 'अमरपुरी' के नाम से हुआ है। आप लिखते हैं कि मुझे बाइबिल से प्लाट मिलते हैं। 'मेटरलिंक' बेलजियम के जगद्विख्यात नाटककार हैं। उन्हें बेलजियम का शेक्सपियर कहते हैं। उनका 'मोमाबोन' नामक ड्रामा ब्राउनिंग की एक कविता से प्रेरित हुआ था और 'मेरी मैगडालीन' एक जर्मन ड्रामा से! शेक्सपियर के नाटकों का मूल स्थान खोज-खोजकर कितने ही विद्वानों ने 'डाक्टर' की उपाधि प्राप्त कर ली है। कितने वर्तमान औपन्यासिकों और नाटककारों ने शेक्सपियर से सहायता ली है, इसकी खोज करके भी कितने ही लोग 'डाक्टर' बन सकते हैं। 'तिलिस्म होशरुबा' फारसी का एक वृहत् पोथा है जिसके रचयिता अकबर के दरबार वाले फैज़ी कहे जाते हैं, हालाँकि हमें यह मानने में संदेह है। इस पोथे का उर्दू में भी अनुवाद हो गया है। कम से कम २०,००० पृष्ठों की पुस्तक होगी। स्व॰ बाबू देवकीनंदन खत्री ने 'चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता-संतति' का बीजांकुर 'तिलिस्म होशरुबा' से ही लिया होगा, ऐसा अनुमान होता है।

    संसार-साहित्य में कुछ ऐसी कथाएँ हैं जिन पर हज़ारों बरसों से लेखकगण आख्यायिकाएँ लिखते आये हैं और शायद हज़ारों वर्षों तक लिखते जायँगे। हमारी पौराणिक कथाओं पर न जाने कितने नाटक और कितनी कथाएँ रची गई हैं। यूरोप में भी यूनान की पौराणिक गाथा कवि-कल्पना के लिए अशेष आधार है। 'दो भाइयों की कथा', जिसका पता पहले मिश्र देश के तीन हज़ार वर्ष पुराने लेखों से मिला था, फ्रान्स से भारतवर्ष तक की एक दर्जन से अधिक प्रसिद्ध भाषाओं के साहित्य में समाविष्ट हो गई है। यहाँ तक कि बाइबिल में उस कथा की एक घटना ज्यों की त्यों मिलती है।

    किन्तु, यह समझना भूल होगी कि लेखकगण आलस्य या कल्पना-शक्ति के अभाव के कारण प्राचीन कथाओं का उपयोग करते हैं। बात यह है कि नये कथानक में वह रस, वह आकर्षण, नहीं होता जो पुराने कथानकों में पाया जाता है। हाँ, उनका कलेवर नवीन होना चाहिए। 'शकुंतला' पर यदि कोई उपन्यास लिखा जाय, तो वह कितना मर्मस्पर्शी होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं।

    रचना-शक्ति थोड़ी-बहुत सभी प्राणियों में रहती है। जो उसमें अभ्यस्त हो चुके हैं उन्हें तो फिर झिझक नहीं रहती—क़लम उठाया और लिखने लगे; लेकिन नये लेखकों को पहले कुछ लिखते समय ऐसी झिझक होती है मानो वे दरिया में कूदने जा रहे हों। बहुधा एक तुच्छ-सी घटना उनके मस्तिष्क पर प्रेरक का काम कर जाती है। किसीका नाम सुनकर, कोई स्वप्न देखकर, कोई चित्र देखकर, उनकी कल्पना जाग उठती है। किसी व्यक्ति पर किस प्रेरणा का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, यह उस व्यक्ति पर निर्भर है। किसी की कल्पना दृश्य विषयों से उभरती है, किसी की गंध से, किसी की श्रवण से,—किसी की नये, सुरम्य स्थान की सैर से इस विषय में यथेष्ट सहायता मिलती है। नदी के तट पर अकेले भ्रमण करने से बहुधा नई-नई कल्पनाएँ जाग्रत् होती हैं।

    ईश्वरदत्त शक्ति मुख्य वस्तु है। जब तक यह शक्ति न होगी उपदेश, शिक्षा, अभ्यास सभी निष्फल जायगा। मगर यह प्रकट कैसे हो कि किसमें यह शक्ति है, किसमें नहीं? कभी इसका सबूत मिलने में बरसों गुजर जाते हैं और बहुत परिश्रम नष्ट हो जाता है। अमेरिका के एक पत्र-संपादक ने इसकी परीक्षा करने का नया ढंग निकाला है। दल के दल युवकों में से कौन रत्न है और कौन पाषाण? वह एक काग़ज़ के टुकड़े पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम लिख देता है और उम्मेदवार को वह टुकड़ा देकर उस नाम के सम्बंध में ताबड़तोड़ प्रश्न करना शुरू करता है—उसके बालों का रंग क्या है? उसके कपड़े कैसे हैं? कहाँ रहती है? उसका बाप क्या काम करता है? जीवन में उसकी मुख्य अभिलाषा क्या है? आदि। यदि युवक महोदय ने इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर न दिये, तो उन्हें अयोग्य समझकर बिदा कर देता है। जिसकी निरीक्षण-शक्ति इतनी शिथिल हो, वह उसके विचार में उपन्यास-लेखक नहीं बन सकता। इस परीक्षा-विभाग में नवीनता तो अवश्य है; पर भ्रामकता की मात्रा भी कम नहीं है।

    लेखकों इन लिए एक नोटबुक का रहना बहुत आवश्यक है। यद्यपि इन पंक्तियों के लेखक ने कभी नोटबुक नहीं रखी; पर इसकी ज़रूरत को वह स्वीकार करता है। कोई नई चीज़, कोई अनोखी सूरत, कोई सुरम्य दृश्य देखकर नोटबुक में दर्ज कर लेने से बड़ा काम निकलता यूरोप में लेखकों के पास उस वक्त तक नोटबुक अवश्य रहती है

    जब तक उनका मस्तिष्क इस योग्य नहीं बनता कि हर एक प्रकार की चीज़ों को वे अलग-अलग ख़ानों में संगृहीत कर लें। बरसों के अभ्यास के बाद यह योग्यता प्राप्त हो जाती है इसमें सन्देह नहीं; लेकिन आरम्भकाल में तो नोटबुक का रखना परमावश्यक है। यदि लेखक चाहता है कि उसके दृश्य सजीव हों, उसके वर्णन स्वाभाविक हों, तो उसे अनिवार्यतः इससे काम लेना पड़ेगा। देेखिये, एक उपन्यासकार की नोटबुक का नमूना—

    'अगस्त २१, १२ बजे दिन, एक नौका पर एक आदमी, श्याम वर्ण, सुफेद बाल, आँखें तिरछी, पलकें भारी, ओठ ऊपर को उठे हुए और मोटे, मूँछे ऐंठी हुईं।

    'सितम्बर १, समुद्र का दृश्य, बादल श्याम और श्वेत, पानी में सूर्य का प्रतिविम्ब काला, हरा, चमकीला; लहरें फेनदार, उनका ऊपरी भाग उजला। लहरों का शोर, लहरों के छींटे से झाग उड़ती हुई।'

    उन्हीं महाशय से जब पूछा गया कि आपको कहानियों के प्लाट कहाँ मिलते हैं? तो आपने कहा, 'चारों तरफ।—अगर लेखक अपनी आँखें खुली रखे, तो उसे हवा में से भी कहानियाँ मिल सकती हैं। रेलगाड़ी में, नौकाओं पर, समाचार-पत्रों में, मनुष्य के वार्तालाप में और हज़ारों जगहों से सुन्दर कहानियाँ बनाई जा सकती हैं। कई सालों के अभ्यास के बाद देख-भाल स्वाभाविक हो जाती है, निगाह आप ही आप अपने मतलब की बात छाँट लेती है। दो साल हुए, मैं एक मित्र के साथ सैर करने गया। बातों ही बातों में यह चर्चा छिड़ गई कि यदि दो के सिवा संसार के और सब मनुष्य मार डाले जायँ तो क्या हो? इस अंकुर से मैंने कई सुन्दर कहानियाँ सोच निकाली।'

    इस विषय में तो उपन्यास-कला के सभी विशारद सहमत हैं कि उपन्यासों के लिए पुस्तकों से मसाला न लेकर जीवन ही से लेना चाहिये। वालटर बेसेंट अपनी 'उपन्यास-कला' नामक पुस्तक में लिखते हैं—

    'उपन्यासकार को अपनी सामग्री, आले पर रखी हुई पुस्तकों से

    नहीं, उन मनुष्यों के जीवन से लेनी चाहिए जो उसे नित्य ही चारों तरफ मिलते रहते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकांश लोग अपनी आँखों से काम नहीं लेते। कुछ लोगों को यह शंका भी होती है कि मनुष्यों में जितने अच्छे नमूने थे वे तो पूर्वकालीन लेखकों ने लिख डाले, अब हमारे लिए क्या बाक़ी रहा? यह सत्य है; लेकिन अगर पहले किसी ने बूढ़े कंजूस, उड़ाऊ युवक, जुआरी, शराबी, रंगीन युवती आदि का चित्रण किया है, तो क्या अब उसी वर्ग के दूसरे चरित्र नहीं मिल सकते? पुस्तकों में नये चरित्र न मिलें; पर जीवन में नवीनता का अभाव कभी नहीं रहा।'

    हेनरी जेम्स ने इस विषय में जो विचार प्रकट किये हैं, वह भी देखिये—

    'अगर किसी लेखक की बुद्धि कल्पना-कुशल है तो वह सूक्ष्मतम भावों से जीवन को व्यक्त कर देती है, वह वायु के स्पंदन को भी जीवन प्रदान कर सकती है। लेकिन कल्पना के लिए कुछ आधार अवश्य चाहिये। जिस तरुणी लेखिका ने कभी सैनिक छावनियाँ नहीं देखीं उससे यह कहने में कुछ भी अनौचित्य नहीं है कि आप सैनिक जीवन में हाथ न डालें। मैं एक अँग्रेज़ उपन्यासकार को जानता हूँ जिसने अपनी एक कहानी में फ्रान्स के प्रोटेस्टेंट युवकों के जीवन का अच्छा चित्र खींचा था। उस पर साहित्यिक संसार में बड़ी चर्चा रही। उससे लोगों ने पूछा—आपको इन समाज के निरीक्षण करने का ऐसा अवसर कहाँ मिला? (फ्रान्स रोमन कैथोलिक देश है और प्रोटेस्टेंट वहाँ साधारणतः नहीं दिखाई पड़ते।) मालूम हुआ कि उसने एक बार, केवल एक बार, कई प्रोटेस्टेंट युवकों को बैठे और बातें करते देखा था। बस, एक बार का देखना उसके लिए पारस हो गया। उसे वह आधार मिल गया जिस पर कल्पना अपना विशाल भवन निर्माण था ती है। उसमें वह ईश्वरदत्त शक्ति मौजूद थी जो एक इञ्च से एक योजन की ख़बर लाती है और जो शिल्पी के लिए बड़े महत्त्व की वस्तु है।'

    मिस्टर जी॰ के॰ चेस्टरटन जासूसी कहानियाँ लिखने में बड़े प्रवीण

    हैं। आपने ऐसी कहानियाँ लिखने का जो नियम बताया है वह बहुत शिक्षाप्रद है। हम उसका आशय लिखते हैं—

    'कहानी में जो रहस्य हो उसे कई भागों में बाँटना चाहिये। पहले छोटी-सी बात खुले, फिर उससे कुछ बड़ी और अंत में रहस्य खुल जाय। लेकिन हरएक भाग में कुछ न कुछ रहस्योंद्धाटन अवश्य होना चाहिये जिसमें पाठक की इच्छा सब-कुछ जानने के लिए बलवती होती चली जाय। इस प्रकार की कहानियों में इस बात का ध्यान रखना परमावश्यक है कि कहानी के अंत में रहस्य खोलने के लिए कोई नया चरित्र न लाया जाय। जासूसी कहानियों में यही सबसे बड़ा दोष है। रहस्य के खुलने में तभी मज़ा है जब कि वही चरित्र अपराधी सिद्ध हो जिस पर कोई भूलकर भी सन्देह न कर सकता था।'

    उपन्यास-कला में यह बात भी बड़े महत्त्व की है कि लेखक क्या लिखे और क्या छोड़ दे। पाठक कल्पनाशील होता है। इसलिए वह ऐसी बातें पढ़ना पसन्द नहीं करता जिनकी वह आसानी से कल्पना कर सकता है। वह यह नहीं चाहता कि लेखक सब-कुछ ख़ुद कह डाले और पाठक की कल्पना के लिए कुछ भी बाक़ी न छोड़े। वह कहानी का ख़ाका-मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल लेखक वही है जो यह अनुमान कर ले कि कौन-सी बात पाठक स्वयं सोच लेगा और कौन-सी बात उसे लिखकर स्पष्ट कर देनी चाहिये। कहानी या उपन्यास में पाठक की कल्पना के लिए जितनी ही अधिक सामग्री हो उतनी ही वह कहानी रोचक होगी। यदि लेखक आवश्यकता से कम बतलाता है तो कहानी आशयहीन हो जाती है, ज़्यादा बतलाता है तो कहानी में मज़ा नहीं आता। किसी चरित्र की रूपरेखा या किसी दृश्य को चित्रित करते समय हुलिया-नवीसी करने की ज़रूरत नहीं। दो-चार वाक्यों में मुख्य-मुख्य बातें कह देनी चाहियें। किसी दृश्य को तुरत देखकर उसका वर्णन करने से बहुत-सी अनावश्यक बातों के आ जाने की सम्भावना रहती है। कुछ दिनों के बाद अनावश्यक बातें आप ही आप मस्तिष्क से निकल जाती हैं, केवल मुख्य बातें स्मृति पर अंकित रह जाती हैं। तब उस दृश्य के वर्णन करने में अनावश्यक बातें न रहेंगी। आवश्यक और अनावश्यक कथन का एक उदाहरण देकर हम अपना आशय और स्पष्ट करना चाहते हैं—

    दो मित्र संध्या समय मिलते हैं। सुविधा के लिए हम उन्हें 'राम' और 'श्याम' कहेंगे।

    राम—गुड ईवनिंग श्याम, कहो आनन्द तो है?

    श्याम—हलो राम, तुम आज किधर भूल पड़े?

    राम—कहो क्या रङ्ग-ढंग है? तुम तो भले ईद के चाँद हो गये।

    श्याम—मैं तो ईद का चाँद न था, हाँ, आप गूलर के फूल भले ही हो गये।

    राम—चलते हो संगीतालय की तरफ?

    श्याम—हाँ चलो।

    लेखक यदि ऐसे बच्चों के लिए कहानी नहीं लिख रहा है जिन्हें अभिवादन की मोटी-मोटी बातें बताना ही उसका ध्येय है तो वह केवल इतना ही लिख देगा—

    'अभिवादन के पश्चात् दोनों मित्रों ने संगीतालय की राह ली।'

    उपन्यास का विषय

    उपन्यास का क्षेत्र, अपने विषय के लिहाज़ से, दूसरी ललित कलाओं से कही ज़्यादा विस्तृत है। 'वाल्टर बेसेंट' ने इस विषय पर शब्दों में विचार प्रकट किये हैं—

    'उपन्यास के विषय का विस्तार मानव-चरित्र से किसी क़दर कम नहीं है। उसका सम्बन्ध अपने चरित्रों के कर्म और विचार, उनका देवत्व और पशुत्व, उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से है। मनोभाव के विभिन्न रूप और भिन्न-भिन्न दशाओं में उनका विकास उपन्यास के मुख्य विषय हैं।'

    इसी विषय-विस्तार ने उपन्यास को संसार-साहित्य का प्रधान अंग बना दिया है। अगर आपको इतिहास से प्रेम है तो आप अपने उपन्यास में गहरे से गहरे ऐतिहासिक तत्त्वों का निरूपण कर सकते हैं। अगर आपको दर्शन से रुचि है, तो आप उपन्सास में महान दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन कर सकते हैं। अगर आप में कवित्व-शक्ति है तो उपन्यास में उसके लिए भी काफी गुञ्जाइश है। समाज, नीति, विज्ञान, पुरातत्त्व आदि सभी विषयों के लिए उपन्यास में स्थान है। यहाँ लेखक को अपनी क़लम का जौहर दिखाने का जितना अवसर मिल सकता है, उतना साहित्य के और किसी अंग में नहीं मिल सकता; लेकिन इसका यह आशय नहीं कि उपन्यासकार के लिए कोई बन्धन ही नहीं है। उपन्यास का विषय-विस्तार ही उपन्यासकार को बेड़ियों में जकड़ देता है। तंग सड़कों पर चलनेवालों के लिए अपने लक्ष्य पर पहुँचना उतना कठिन नहीं है, जितना एक लम्बे-चौड़े मार्गहीन मैदान में चलनेवालों के लिए।

    उपन्यासकार का प्रधान गुण उसकी सृजन-शक्ति है। अगर उसमें इसका अभाव है, तो वह अपने काम में भी सफल नहीं हो सकता। उसमें और चाहे जितने अभाव हों; पर कल्पना-शक्ति की प्रखरता अनिवार्य है। अगर उसमें यह शक्ति मौजूद है तो वह ऐसे कितने दृश्यों, दशाओं और मनोभावों का चित्रण कर सकता है जिनका उसे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। अगर इस शक्ति की कमी है, तो चाहे उसने कितना ही देशाटन क्यों न किया हो, वह कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसके अनुभव का क्षेत्र कितना ही विस्तृत क्यों न हो, उसकी रचना में सरसता नहीं आ सकती। ऐसे कितने ही लेखक हैं जिनमें मानव-चरित्र के रहस्यों का बहुत मनोरंजक सूक्ष्म और प्रभाव डालनेवाली शैली में बयान करने की शक्ति मौजूद है; लेकिन कल्पना की कमी के कारण वे अपने चरित्रों में जीवन का संचार नहीं कर सकते, जीती-जागती तसवीरें नहीं खींच सकते। उनकी रचनाओं को पढ़कर हमें यह ख्याल नहीं होता कि हम कोई सच्ची घटना देख रहे हैं।

    इसमें सन्देह नहीं कि उपन्यास की रचना-शैली सजीव और प्रभावोत्पादक होनी चाहिये; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम शब्दों का गोरखधन्धा रचकर पाठक को इस भ्रम में डाल दें कि इसमें ज़रूर कोई न कोई गूढ़ आशय है। जिस तरह किसी आदमी का ठाट-बाट देखकर हम उसकी वास्तविक स्थिति के विषय में ग़लत राय क़ायम कर लिया करते हैं, उसी तरह उपन्यासों के शाब्दिक आडम्बर देखकर भी हम ख़्याल करने लगते हैं कि कोई महत्त्व की बात छिपी हुई है। सम्भव है, ऐसे लेखक को थोड़ी देर के लिए यश मिल जाय; किन्तु जनता उन्हीं उपन्यासों को आदर का स्थान देती है जिनकी विशेषता उनकी गूढ़ता नहीं, उनकी सरलता होती है।

    उपन्यासकार को इसका अधिकार है कि वह अपनी कथा को घटना-वैचित्र्य से रोचक बनाये; लेकिन शर्त यह है कि प्रत्येक घटना असली ढाँचे से निकट सम्बन्ध रखती हो; इतना ही नहीं, बल्कि उसमें इस तरह घुल-मिल गई हो कि कथा का आवश्यक अंग बन जाय, अन्यथा उपन्यास की दशा उस घर की-सी हो जायगी जिसके हरएक हिस्से अलग-अलग हों। जब लेखक अपने मुख्य विषय से हटकर किसी दूसरे प्रश्न पर बहस करने लगता है तो वह पाठक के उस आनन्द में बाधक हो जाता है जो उसे कथा में आ रहा था। उपन्यास में वही घटनाएँ, वही विचार, लाना चाहिये जिनसे कथा का माधुर्य बढ़ जाय, जो प्लाट के विकास में सहायक हों अथवा चरित्रों के गुप्त मनोभावों का प्रदर्शन करते हों पुरानी कथाओं में लेखक का उद्देश्य घटना-वैचित्र्य दिखाना होता था; इसलिए वह एक कथा में कई उपकथाएँ मिलाकर अपना उद्देश्य पूरा करता था। साम्प्रतकालीन उपन्यासों में लेखक का उद्देश्य मनोभावों और चरित्र के रहस्यों का खोलना होता है; अतएव यह आवश्यक है कि वह अपने चरित्रों को सूक्ष्म दृष्टि से देखे, उसके चरित्रों का कोई भाग उसकी निगाह से न बचने पाये। ऐसे उपन्यास मै उपकथाओं की गुञ्जाइश नहीं होती।

    यह सच है कि संसार की प्रत्येक वस्तु उपन्यास का उपयुक्त विषय बन सकती है। प्रकृति का प्रत्येक रहस्य, मानव-जीवन का हरएक पहलू, जब किसी सुयोग्य लेखक की कलम से निकलता है तो वह साहित्य का रत्न बन जाता है। लेकिन इसके साथ ही विषय का महत्त्व और उसकी गहराई भी उपन्यास के सफल होने में बहुत सहायक होती है। यह ज़रूरी नहीं कि हमारे चरित्रनायक ऊँची श्रेणी के ही मनुष्य हों। हर्ष और शोक, प्रेम और अनुराग, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य-मात्र में व्यापक हैं। हमें केवल हृदय के उन तारों पर चोट लगानी चाहिये जिनकी झंकार से पाठकों के हृदय पर भी वैसा ही प्रभाव हो। सफल उपन्यासकार का सबसे बड़ा लक्षण है कि वह अपने पाठकों के हृदय में उन्हीं भावों को जागरित कर दे जो उसके पात्रों में हो। पाठक भूल जाय कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा है—उसके और पात्रों के बीच में आत्मीयता का भाव उत्पन्न हो जाय।

    मनुष्य की सहानुभूति साधारण स्थिति में तब तक जागरित नहीं होती जब तक कि उसके लिए उस पर विशेष रूप से आघात किया जाय। हमारे हृदय के अंतरतम भाव साधारण दशाओं में आन्दोलित नहीं होते। इसके लिए ऐसी घटनाओं की कल्पना करनी होती है जो हमारा दिल हिला दे, जो हमारे भावों की गहराई तक पहुँच जायँ। अगर किसी अबला की पराधीन दशा का अनुभव कराना हो तो इस घटना से ज़्यादा प्रभाव डालनेवाली और कौन घटना हो सकती है कि शकुन्तला राजा दुष्यंत के दरबार में आकर खड़ी होती है और राजा उसे न पहचानकर उसकी उपेक्षा करता है? खेद है कि आजकल के उपन्यासों में गहरे भावों को स्पर्श करने का बहुत कम मसाला रहता है। अधिकांश उपन्यास गहरे और प्रचण्ड भावों का प्रदर्शन नहीं करते। हम आये-दिन की साधारण बातों ही में उलझकर रह जाते हैं।

    इस विषय में अभी तक मतभेद है कि उपन्यास में मानवीय दुर्बलताओं और कुवासनाओं का, कमज़ोरियों और अपकीर्तियों का, विशद वर्णन वांछनीय है या नहीं; मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि जो लेखक अपने को इन्हीं विषयों में बाँध लेता है वह कभी उस कलाविद् की महानता को नहीं पा सकता जो जीवन-संग्राम में एक मनुष्य की आंतरिक दशा को, सत् और असत् के संघर्ष और अंत में सत्य की विजय को, मार्मिक ढंग से दर्शाता है। यथार्थवाद का यह आशय नहीं है कि हम अपनी दृष्टि को अंधकार की ओर ही केन्द्रित कर दें। अंधकार में मनुष्य को अंधकार के सिवा और सूझ ही क्या सकता है? बेशक, चुटकियाँ लेना, यहाँ तक कि नश्तर लगाना, भी कभी-कभी आवश्यक होता है; लेकिन दैहिक व्यथा चाहे नश्तर से दूर हो जाय, मानसिक व्यथा सहानुभूति और उदारता से ही शान्त हो सकती है। किसी को नीच समझकर हम उसे ऊँचा नहीं बना सकते; बल्कि उसे और नीचे गिरा देंगे। कायर यह कहने से बहादुर न हो जायगा कि 'तुम कायर हो।' हमें यह दिखाना पड़ेगा कि उसमें साहस, बल और धैर्य—सब कुछ है, केवल उसे जगाने की ज़रूरत है। साहित्य का सम्बन्ध सत्य और सुंदर से है, यह हमें न भूलना चाहिये।

    मगर आजकल कुकर्म, हत्या, चोरी, डाके से भरे हुए उपन्यासों को जैसे बाढ़-सी आ गई है। साहित्य के इतिहास में ऐसा कोई समय न था जब ऐसे कुरुचिपूर्ण उपन्यासों की इतनी भरमार रही हो। जासूसी के उपन्यासों में क्यों इतना आनंद आता है? क्या इसका कारण यह है कि पहले से अब लोग ज़्यादा पापासक्त हो गये हैं? जिस समय लोगों को यह दावा है कि मानव-समाज नैतिक और बौद्धिक उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ है, यह कौन स्वीकार करेगा कि हमारी समाज पतन की ओर जा रहा है? शायद, इसका यह कारण हो कि इस व्यावसायिक शांति के युग में ऐसी घटनाओं का अभाव हो गया है जो मनुष्य के कुतूहल-प्रेम को संतुष्ट कर सकें––जो उसमें सनसनी पैदा कर दें। या इसका यह कारण हो सकता है कि मनुष्य की धन-लिप्सा उपन्यास के चरित्रों को धन के लोभ से कुकर्म करते देखकर प्रसन्न होती है। ऐसे उपन्यासों में यही तो होता है कि कोई आदमी लोभ-वश किसी धनाढ्य पुरुष की हत्या कर डालता है, या उसे किसी संकट में फँसाकर उससे मनमानी रकम ऐंठ लेता है। फिर जासूस आते हैं, वकील आते हैं और मुजरिम गिरफ्तार होता है, उसे सज़ा मिलती है। ऐसी रुचि को प्रेम, अनुराग या उत्सर्ग की कथाओं में आनंद नहीं आ सकता। भारत में वह व्यावसायिक वृद्धि तो नहीं हुई; लेकिन ऐसे उपन्यासों की भरमार शुरू हो गई। अगर मेरा अनुमान ग़लत नहीं है तो ऐसे उपन्यासों की खपत इस देश में भी अधिक होती है। इस कुरुचि का परिणाम रूसी उपन्यास लेखक मैक्सिम गोर्की के शब्दों में ऐसे वातावरण का पैदा होना है जो कुकर्म की प्रवृत्ति को द्दढ़ करता है। इससे यह तो स्पष्ट ही है कि मनुष्य में पशु-वृत्तियाँ इतनी प्रबल होती जा रही हैं कि अब उसके हृदय में कोमल भावों के लिए स्थान ही नहीं रहा।

    उपन्यास के चरित्रों का चित्रण जितना ही स्पष्ट, गहरा और विकासपूर्ण होगा उतना ही पढ़नेवालों पर उसका असर पड़ेगा; और यह लेखक की रचना-शक्ति पर निर्भर है। जिस तरह किसी मनुष्य को देखते ही हम उसके मनोभावों से परिचित नहीं हो जाते, ज्यों-ज्यों हमारी घनिष्ठता उससे बढ़ती है, त्यों-त्यों उसके मनोरहस्य खुलते हैं, उसी तरह उपन्यास के चरित्र भी लेखक की कल्पना में पूर्ण रूप से नहीं आ जाते; बल्कि उनमें क्रमशः विकास होता जाता है। यह विकास इतने गुप्त—अस्पष्ट रूप से होता है कि पढ़नेवाले को किसी तबदीली का ज्ञान भी नहीं होता। अगर चरित्रों में किसी का विकास रुक जाय तो उसे उपन्यास से निकाल देना चाहिये, क्योंकि उपन्यास चरित्रों के विकास का ही विषय है। अगर उसमें विकास-दोष है, तो वह उपन्यास कमज़ोर हो जायगा। कोई चरित्र अंत में भी वैसा ही रहे जैसा वह पहले था—उसके बल-बुद्धि और भावों का विकास न हो, तो वह असफल चरित्र है।

    इस दृष्टि से जब हम हिन्दी के वर्तमान उपन्यासों को देखते हैं तो निराशा होती है। अधिकांश चरित्र ऐसे ही मिलेंगे जो काम तो बहुतेरे करते हैं; 'लेकिन जैसे जो काम वे आदि में करते, उसी तरह वही अंत में भी करते हैं।

    कोई उपन्यास शुरू करने के लिए यदि हम उन चरित्रों का एक मानसिक चित्र बना लिया करें तो फिर उनका विकास दिखाने में हमें सरलता होगी। यह कहने की भी ज़रूरत नहीं है, विकास परिस्थिति के अनुसार स्वाभाविक हो, अर्थात्—पाठक और लेखक दोनों इस विषय में सहमत हों। अगर पाठक का यह भाव हो कि इस दशा में ऐसा नहीं होना चाहिये था तो इसका यह आशय हो सकता है कि लेखक अपने चरित्र के अङ्कित करने में असफल रहा। चरित्रों में कुछ न कुछ विशेषता भी रहनी चाहिये। जिस तरह संसार में कोई दो व्यक्ति समान नहीं होते, उसी भाँति उपन्यास में भी न होना चाहिये। कुछ लोग तो बातचीत या शक्ल-सूरत से विशेषता उत्पन्न कर देते हैं; लेकिन असली अंतर तो वह है, जो चरित्रों में हो।

    उपन्यास में वार्तालाप जितना अधिक हो और लेखक की क़लम से जितना ही कम लिखा जाय, उतना ही उपन्यास सुंदर होगा। वार्तालाप केवल रस्मी नहीं होना चाहिये। प्रत्येक वाक्य को—जो किसी चरित्र के मुँह से निकले—उसके मनोभावों और चरित्र पर कुछ न कुछ प्रकाश डालना चाहिये। बातचीत का स्वाभाविक, परिस्थितियों के अनुकूल, सरल और सूक्ष्म होना ज़रूरी है। हमारे उपन्यासों में अकसर बातचीत भी उसी शैली में कराई जाती है मानो लेखक खुद लिख रहा हो। शिक्षित-समाज की भाषा तो सर्वत्र एक है, हाँ भिन्न-भिन्न जातियों की ज़ुबान पर उसका रूप कुछ न कुछ बदल जाता है। बंगाली, मारवाड़ी और ऐंग्लो इण्डियन भी कभी-कभी बहुत शुद्ध हिन्दी बोलते पाये जाते हैं; लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं; पर ग्रामीण बातचीत कभी-कभी हमें दुबिधा में डाल देती है। बिहार की ग्रामीण भाषा शायद दिल्ली के आसपास का आदमी समझ ही न सकेगा।

    वास्तव में कोई रचना रचयिता के मनोभावों का, उसके चरित्र का, उसके जीवनादर्श का, उसके दर्शन का आईना होती है। जिसके हृदय में देश की लगन है उसके चरित्र, घटनावली और परिस्थितियाँ सभी उसी रंग में रँगी हुई नज़र आयेंगी। लहरी आनंदी लेखकों के चरित्रों में भी अधिकांश चरित्र ऐसे ही होंगे जिन्हें जगत्-गति नहीं व्यापती। वे जासूसी, तिलिस्मी चीज़ें लिखा करते हैं। अगर लेखक आशावादी है तो उसकी रचना में आशावादिता छलकती रहेगी, अगर वह शोकवादी है तो, बहुत प्रयत्न करने पर भी, वह अपने चरित्रों को ज़िन्दादिल न बना सकेगा। 'आज़ाद-कथा' को उठा लीजिये, तुरंत मालूम हो जायगा कि लेखक हँसने-हँसानेवाला जीव है जो जीवन को गम्भीर विचार के योग्य नहीं समझता। जहाँ उसने समाज के प्रश्नों को उठाया है वहाँ शैली शिथिल हो गई है।

    जिस उपन्यास को समाप्त करने के बाद पाठक अपने अंदर उत्कर्ष का अनुभव करे, उसके सद्भाव जाग उठें, वही सफल उपन्यास है। जिसके भाव गहरे हैं, प्रखर हैं,—जो जीवन में बद्दू बनकर नहीं, बल्कि सवार बनकर चलता है, जो उद्योग करता है और विफल होता है, उठने की कोशिश करता है और गिरता है, जो वास्तविक जीवन की गहराइयों में डूबा है, जिसने ज़िन्दगी के ऊँच-नीच देखे हैं, सम्पत्ति और विपत्ति का सामना किया है, जिसकी ज़िन्दगी मखमली गद्दों पर

    ही नहीं गुज़रती, वही लेखक ऐसे उपन्यास रच सकता है जिनमें प्रकाश, जीवन और आनंद-प्रदान की सामर्थ्य होगी।

    उपन्यास के पाठकों की रुचि भी अब बदलती जा रही है। अब उन्हें केवल लेखक की कल्पनाओं से संतोष नहीं होता। कल्पना कुछ भी हो, कल्पना ही है। वह यथार्थ का स्थान नहीं ले सकती। भविष्य उन्हीं उपन्यासों का है जो अनुभूति पर खड़े हों।

    इसका आशय यह है कि भविष्य में उपन्यास में कल्पना कम, सत्य अधिक होगा; हमारे चरित्र कल्पित न होंगे, बल्कि व्यक्तियों के जीवन पर आधारित होंगे। किसी हद तक तो अब भी ऐसा होता है; पर बहुधा हम परिस्थितियों का ऐसा क्रम बाँधते हैं कि अंत स्वाभाविक होने पर भी वह होता है जो हम चाहते हैं। हम स्वाभाविकता का स्वाँग जितनी खूबसूरती से भर सके, उतने ही सफल होते हैं; लेकिन भविष्य में पाठक इस स्वाँग से संतुष्ट न होगा।

    यों कहना चाहिये कि भावी उपन्यास जीवन-चरित होगा, चाहे किसी बड़े आदमी का या छोटे आदमी का। उसकी छुटाई-बड़ाई का फ़ैसला उन कठिनाइयों से किया जायगा कि जिन पर उसने विजय पाई है। हाँ, वह चरित्र इस ढंग से लिखा जायगा कि उपन्यास मालूम हो। अभी हम झूठ को सच बनाकर दिखाना चाहते हैं, भविष्य में सच को झूठ बनाकर दिखाना होगा। किसी किसान का चरित्र हो, या किसी देश-भक्त का, या किसी बड़े आदमी का; पर उसका आधार यथार्थ पर होगा। तब यह काम उससे कठिन होगा जितना अब है; क्योंकि ऐसे बहुत कम लोग हैं, जिन्हें बहुत-से मनुष्यों को भीतर से जानने का गौरव प्राप्त हो।

    उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी

    यह बात सभी लोग मानते हैं कि राष्ट्र को दृढ़ और बलवान बनाने के लिए देश में सांस्कृतिक एकता का होना बहुत आवश्यक है। और किसी राष्ट्र की भाषा तथा लिपि इस सांस्कृतिक एकता का एक विशेष अङ्ग है। श्रीमती ख़लीदा अदीब ख़ानम ने अपने एक भाषण में कहा था कि तुर्की जाति और राष्ट्र की एकता तुर्की भाषा के कारण ही हुई है। और यह निश्चित बात है कि राष्ट्रीय भाषा के बिना किसी राष्ट्र के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं हो सकती। जब तक भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा न हो, तब तक वह राष्ट्रीयता का दावा नहीं कर सकता। सम्भव है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष एक राष्ट्र रहा हो; परन्तु बौद्धों के पतन के उपरान्त उसकी राष्ट्रीयता का भी अन्त हो गया था। यद्यपि देश में सांस्कृतिक एकता वर्तमान थी, तो भी भाषाओं के भेद ने देश को खण्ड-खण्ड करने का काम और भी सुगम कर दिया था। मुसलमानों के शासन काल में भी जो कुछ हुआ था, उसमें भिन्न-भिन्न प्रान्तों का राजनीतिक एकीकरण तो हो गया था, परन्तु उस समय भी देश में राष्ट्रीयता का अस्तित्व नहीं था। और सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता की भावना अपेक्षाकृत बहुत थोड़े दिनों से संसार में उत्पन्न हुई है और इसे उत्पन्न हुए लगभग दो सौ वर्षों से अधिक नहीं हुए। भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का आरम्भ अंगरेज़ी राज्य की स्थापना के साथ-साथ हुआ था। और उसी की दृढ़ता के साथ-साथ इसकी भी वृद्धि हो रही है। लेकिन इस समय राजनीतिक पराधीनता के अतिरिक्त देश के भिन्न-भिन्न अङ्गों और तत्त्वों में कोई ऐसा पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है जो उन्हें संघटित करके एक राष्ट्र का स्वरूप दे सके। यदि आज भारतवर्ष से अंगरेज़ी राज्य उठ जाय तो इन तत्त्वों में जो एकता इस समय दिखाई दे रही है, बहुत सम्भव है कि वह विभेद और विरोध का रूप धारण

    कर ले और भिन्न-भिन्न भाषाओं के आधार पर एक ऐसा नया संघटन उत्पन्न हो जाय जिसका एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध ही न हो। और फिर वही खींचातानी शुरू हो जाय जो अंगरेज़ों के यहाँ आने से पहले थी। अतः राष्ट्र के जीवन के लिए यह बात आवश्यक है कि देश में सांस्कृतिक एकता हो। और भाषा की एकता उस सांस्कृतिक एकता का प्रधान स्तम्भ है; इसलिए यह बात भी आवश्यक है कि भारतवर्ष की एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा हो जो देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बोली और समझी जाय। इसी बात का आवश्यक परिणाम यह होगा कि कुछ दिनों में राष्ट्रीय साहित्य की सृष्टि भी आरम्भ हो जायगी और एक ऐसा समय आयेगा, जब कि भिन्न-भिन्न जातियों और राष्ट्रों के साहित्यिक मण्डल में हिन्दुस्तानी भाषा भी बराबरी की हैसियत से शामिल होने के क़ाबिल हो जायगी।

    परन्तु प्रश्न तो यह है कि इस राष्ट्रीय भाषा का स्वरूप क्या हो? आज-कल भिन्न-भिन्न प्रान्तों में जो भाषाएँ प्रचलित हैं उसमें तो राष्ट्रीय-भाषा बनने की योग्यता नहीं, क्योंकि उनके कार्य और प्रचार का क्षेत्र परिमित है। केवल एक ही भाषा ऐसी है जो देश के एक बहुत बड़े भाग में बोली जाती है और उससे भी कहीं बड़े भाग में समझी जाती है। और उसी को राष्ट्रीय भाषा का पद दिया जा सकता है।

    परन्तु इस समय उस भाषा के तीन स्वरूप हैं—उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी। और अभी तक यह बात राष्ट्रीय-रूप से निश्चित नहीं की जा सकी है कि इनमें से कौन-सा स्वरूप ऐसा है जो देश में सबसे अधिक मान्य हो सकता है और जिसका प्रचार भी ज़्यादा आसानी से हो सकता है। तीनों ही स्वरूपों के पक्षपाती और समर्थक मौजूद हैं और उनमें खींचा-तानी हो रही है। यहाँ तक कि इस मत भेद को राजनीतिक स्वरूप दे दिया गया है और हम इस प्रश्न पर शान्त चित्त और शान्त मस्तिष्क से विचार करने के अयोग्य हो गये हैं।

    लेकिन इन सब रुकावटों के होते हुए भी यदि हम भारतीय राष्ट्रीयता के लक्ष्य तक पहुँचना और उसकी सिद्धि करना असम्भव

    समझकर हिम्मत न हार बैठें तो फिर हमारे लिए इस प्रश्न की किसी-न-किसी प्रकार मीमांसा करना आवश्यक हो जाता है।

    देश में ऐसे आदमियों की संख्या कम नहीं है जो उर्दू और हिन्दी की अलग-अलग और स्वतन्त्र उन्नति और विकास के मार्ग में बाधक नहीं होना चाहते। उन्होंने यह मान लिया है कि आरम्भ में इन दोनों के स्वरूपों में चाहे जो कुछ एकता और समानता रही हो, लेकिन फिर भी इस समय दोनों की दोनों जिस रास्ते पर जा रही हैं, उसे देखते हुए इन दोनों में मेल और एकता होना असम्भव ही है। प्रत्येक भाषा की एक प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है। उर्दू का फ़ारसी और अरबी के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध है। और हिन्दी का संस्कृत तथा प्राकृत के साथ उसी प्रकार का सम्बन्ध है। उनकी यह प्रवृत्ति हम किसी शक्ति से रोक नहीं सकते। फिर इन दोनों को आपस में मिलाने का प्रयत्न करके हम क्यों व्यर्थ इन दोनों को हानि पहुँचावें?

    यदि उर्दू और हिन्दी दोनों अपने आपको अपने जन्म-स्थान और प्रचार-क्षेत्र तक ही परिमित रखें तो हमें इनकी प्राकृतिक वृद्धि और विकास के सम्बन्ध में कोई आपत्ति न हो। बँगला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू और कन्नडी आदि प्रान्तीय भाषाओं के सम्बन्ध में हमें किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है। उन्हें अधिकार है कि वे अपने अन्दर चाहें जितनी संस्कृत, अरबी या लैटिन आदि भरती चलें। उन भाषाओं के लेखक आदि स्वयं ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं; परन्तु उर्दू और हिन्दी की बात इन सबसे अलग है। यहाँ तो दोनों ही भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा कहलाने का दावा करती हैं। परन्तु वे अपने व्यक्तिगत रूप में राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकीं और इसी लिए संयुक्त रूप में स्वयं ही उनका संयोग और मेल आरम्भ हो गया। और दोनों का यह सम्मिलित स्वरूप उत्पन्न हो गया जिसे हम बहुत ठीक तौर पर हिन्दुस्तानी ज़बान कहते हैं। वास्तविक बात तो यह है कि भारतवर्ष की राष्ट्रीय-भाषा न तो वह उर्दू ही हो सकती है जो अरबी और फारसी के अप्रचलित तथा अपरिचित शब्दों के भार

    से लदी रहती है और न वह हिन्दी ही हो सकती है जो संस्कृत के कठिन शब्दों से लदी हुई होती है। यदि इन दोनों भाषाओं के पक्षपाती और समर्थक आमने-सामने खड़े होकर अपनी साहित्यिक भाषाओं में बातें करें तो शायद एक दूसरे का कुछ भी मतलब न समझ सकें। हमारी राष्ट्रीय भाषा तो वही हो सकती है जिसका आधार सर्व-सामान्य-बोधगम्यता हो—जिसे सब लोग सहज में समझ सकें। वह इस बात की क्यों परवाह करने लगी कि अमुक शब्द इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिये कि वह फ़ारसी, अरबी अथवा संस्कृत का है? वह तो केवल यह मान-दण्ड अपने सामने रखती है कि जन-साधारण यह शब्द समझ सकते हैं वा नहीं। और जन-साधारण में हिन्दू, मुसलमान, पंजाबी, बंगाली, महाराष्ट्र और गुजराती सभी सम्मिलित हैं। यदि कोई शब्द या मुहाबरा या पारिभाषिक शब्द जन साधारण में प्रचलित है तो फिर वह इस बात की परवाह नहीं करती कि वह कहाँ से निकला है और कहाँ से आया है। और यही हिन्दुस्तानी है। और जिस प्रकार अंगरेज़ों की भाषा अंगरेज़ी, जापान की जापानी, ईरान की ईरानी और चीन की चीनी है, उसी प्रकार हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय भाषा को इसी तौर पर हिंदुस्तानी कहना केवल उचित ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। और अगर इस देश को हिंदुस्तान न कहकर केवल हिंद कहें तो इसकी भाषा को हिंदी कह सकते हैं। लेकिन यहाँ की भाषा को उर्दू तो किसी प्रकार कहा ही नहीं जा सकता, जब तक हम हिंदुस्तान को उर्दूस्तान न कहने लगें, जो अब किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है। प्राचीन काल के लोग यहाँ की भाषा को हिन्दी ही कहते थे। और खुसरो ने ख़ालिकबारी की रचना करके हिन्दुस्तानी की नींव रखी थी। इस ग्रंथ की रचना में कदाचित् उसका यही अभिप्राय होगा कि जन-साधारण की आवश्यकता के शब्द उन्हें दोनों ही रूपों में सिखलाये जायँ, जिसमें उन्हें अपने रोज़मर्रा के कामों में सहूलियत हो जाय। अभी तक इस बात का निर्णय नहीं हो सका है कि उर्दू की सृष्टि कब और कहाँ हुई थी। जो हो; परंतु भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा न तो उर्दू ही है और न हिन्दी;

    बल्कि वह हिन्दुस्तानी है जो सारे हिन्दुस्तान में समझी जाती है और उसके बहुत बड़े भाग में बोली जाती है। लेकिन फिर भी लिखी कहीं नहीं जाती। और यदि कोई लिखने का प्रयत्न करता है तो उर्दू और हिन्दी के साहित्यिज्ञ उसे टाट बाहर कर देते हैं। वास्तव में उर्दू और हिंदी की उन्नति में जो बात बाधक है, वह उनका वैशिष्ट्य प्रेम है। हम चाहे उर्दू लिखें और चाहे हिन्दी, जन-साधारण के लिए नहीं लिखते; बल्कि एक परिमित वर्ग के लिए लिखते हैं। और यही कारण है कि हमारी साहित्यिक रचनाएँ जन-साधारण को प्रिय नहीं होतीं। यह बात बिलकुल ठीक है कि किसी देश में भी लिखने और बोलने की भाषाएँ एक नहीं हुआ करतीं। जो अंग्रेजी हम किताबों और अखबारों में पढ़ते हैं, वह कहीं बोली नहीं जाती। पढ़े-लिखे लोग भी उस भाषा में बातचीत नहीं करते, जिस भाषा में ग्रन्थ और समाचार-पत्र आदि लिखे जाते हैं। और जन-साधारण की भाषा तो बिलकुल अलग ही होती है। इंग्लैंड के हर एक पढ़े-लिखे आदमी से यह आशा अवश्य की जाती है कि वह लिखी जानेवाली भाषा समझे और अवसर पड़ने पर उसका प्रयोग भी कर सके। यही बात हम हिन्दुस्तान में भी चाहते हैं।

    परंतु आज क्या परिस्थिति है? हमारे हिन्दीवाले इस बात पर तुले हुए हैं कि हम हिन्दी से भिन्न भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में किसी तरह घुसने ही न देंगे। उन्हें 'मनुष्य' से तो प्रेम है; परंतु 'आदमी' से पूरी-पूरी घृणा है। यद्यपि 'दरख़्वास्त' जन-साधारण में भली-भाँति प्रचलित है; परंतु फिर भी उनके यहाँ इसका प्रयोग वर्जित है। इसके स्थान पर वे 'प्रार्थना' पत्र ही लिखना चाहते हैं, यद्यपि जन-साधारण इसका मतलब बिलकुल ही नहीं समझता। 'इस्तीफ़ा' को वे किसी तरह मंजूर नहीं कर सकते और इसके स्थान पर वे 'त्याग-पत्र' रखना चाहते हैं। 'हवाई जहाज़' चाहे कितना ही सुबोध क्यों न हो, परंतु उन्हें 'वायु यान' की सैर ही पसन्द है। उर्दूवाले तो इस बात पर और भी अधिक लट्टू हैं। वे 'ख़ुदा' को तो मानते हैं, परंतु 'ईश्वर' को नहीं मानते। 'कुसूर' तो वे बहुत-से कर सकते हैं, परंतु 'अपराध' कभी

    नहीं कर सकते। 'ख़िदमत' तो उन्हें बहुत पसंद है, परंतु 'सेवा' उन्हें एक आँख भी नहीं भाती। इसी तरह हम लोगों ने उर्दू और हिन्दी के दो अलग-अलग कैम्प बना लिए हैं। और मजाल नहीं कि एक कैम्प का आदमी दूसरे कैम्प में पैर भी रख सके। इस दृष्टि से हिन्दी के मुक़ाबले में उर्दू में कहीं अधिक कड़ाई है। हिन्दुस्तानी इस चारदीवारी को तोड़कर दोनों में मेल-जोल पैदा कर देना चाहती है, जिसमें दोनों एक दूसरे के घर बिना किसी प्रकार के संकोच के आ-जा सकें; और वह भी सिर्फ़ मेहमान की हैसियत से नहीं, बल्कि घर के आदमी की तरह। 'गारमन डि टासी' के शब्दों में उर्दू और हिन्दी के बीच में कोई ऐसी विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती जहाँ एक को विशेष रूप से हिन्दी और दूसरी को उर्दू कहा जा सके। अंग्रेज़ी भाषा के भी अनेक रंग हैं। कहीं लैटिन और यूनानी शब्दों की अधिकता होती है, कहीं ऐंग्लो-सैक्सन शब्दों की। परंतु है दोनों ही अंग्रेज़ी। इसी प्रकार हिन्दी या उर्दू शब्दों के विभेद के कारण दो भिन्न-भिन्न भाषाएँ नहीं हो सकतीं। जो लोग भारतीय-राष्ट्रीयता का स्वप्न देखते हैं और जो इस सांस्कृतिक एकता को दृढ़ करना चाहते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे लोग हिन्दुस्तानी का निमन्त्रण ग्रहण करें जो कोई नई भाषा नहीं है; बल्कि उर्दू और हिंदी का राष्ट्रीय स्वरूप है।

    संयुक्त-प्रान्त के अपर प्राइमरी स्कूलों में चौथे दरजे तक इसी मिश्रित भाषा अर्थात् हिन्दुस्तानी की रीडरें पढ़ाई जाती हैं। केवल उनकी लिपि अलग होती है। उनकी भाषा में कोई अन्तर नहीं होता। इसमें शिक्षा-विभाग का उद्देश्य यह होगा कि इस प्रकार विद्यार्थियों में बचपन में ही हिन्दुस्तानी की नींव पड़ जायगी और वे उर्दू तथा हिन्दी के विशेष प्रचलित शब्दों से भली-भाँति परिचित हो जायँगे और उन्हीं का प्रयोग करने लगेंगे। इसमें दूसरा लाभ यह भी है कि एक ही शिक्षक शिक्षा दे सकता है। इस समय भी यही व्यवस्था प्रचलित है। लेकिन हिन्दी और उर्दू के पक्षपातियों की ओर से इसकी शिकायतें शुरू हो गई हैं कि इस मिश्रित भाषा को शिक्षा से विद्यार्थियों को कुछ भी

    साहित्यिक ज्ञान नहीं होने पाता और वे अपर प्राइमरी के बाद भी साधारण पुस्तकें तक नहीं समझते। इसी शिकायत को दूर करने के लिए इन रीडरों के अतिरिक्त अपर प्राइमरी दरजों के लिए एक साहित्यिक रीडर भी नियत हुई है। हमारे मासिक-पत्र, समाचार-पत्र और पुस्तकें आदि विशुद्ध हिन्दी में प्रकाशित होती हैं। इसलिए जब तक उर्दू पढ़नेवाले लड़कों के पास फ़ारसी और अरबी शब्दों का और हिन्दी पढ़नेवाले लड़कों के पास संस्कृत शब्दों का यथेष्ट भंडार न हो, तब तक वे उर्दू या हिन्दी की कोई पुस्तक नहीं समझ सकते। इस प्रकार बाल्यावस्था से ही हमारे यहाँ उर्दू और हिन्दी का विभेद आरम्भ हो जाता है। क्या इस विभेद को मिटाने का कोई उपाय नहीं है?

    जो लोग इस विभेद के पक्षपाती हैं, उनके पास अपने-अपने दावे की दलीलें और तर्क भी मौजूद हैं। उदाहरण के लिए विशुद्ध हिन्दी के पक्षपाती कहते हैं कि संस्कृत की ओर झुकने से हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान की दूसरी भाषाओं के पास पहुँच जाती है। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे बने-बनाये शब्द मिल जाते हैं; लिखावट में साहित्यिक रूप आ जाता है, आदि, आदि। इसी तरह उर्दू का झण्डा लेकर चलनेवाले कहते हैं कि फ़ारसी और अरबी की ओर झुकने से एशिया की दूसरी भाषाएँ, जैसे फ़ारसी और अरबी, उर्दू के पास आ जाती हैं। अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे अरबी का विद्या-सम्बन्धी भांडार मिल जाता है, जिससे बढ़कर विद्या की भाषा और कोई नहीं है, और लेखन-शैली में गम्भीरता और शान आ जाती है, आदि, आदि। इसलिए क्यों न इन दोनों को अपने-अपने ढंग पर चलने दिया जाय और उन्हें आपस में मिलाकर क्यों दोनों के रास्तों में रुकावटें पैदा की जायँ? यदि सभी लोग इन तर्कों से सहमत हो जायँ, तो इसका अभिप्राय यही होगा कि हिन्दुस्तान में कभी राष्ट्रीय भाषा की सृष्टि न हो सकेगी। इसलिए हमें आवश्यक है कि जहाँ तक हो सके, हम इस प्रकार की धारणाओं को दूर करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करें जिससे हम दिन पर दिन राष्ट्रीय भाषा के और भी अधिक समीप

    पहुँचते जायँ; और सम्भव है कि दस-बीस वर्षों में हमारा स्वप्न यथार्थता में परिणत हो जाय।

    हिन्दुस्तान के हर एक सूबे में मुसलमानों की थोड़ी-बहुत संख्या मौजूद ही है। संयुक्त प्रान्त के सिवा और-और सूबों में मुसलमानों ने अपने-अपने सूबे की भाषा अपना ली है। बंगाल का मुसलमान बँगला बोलता और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मदरास का तमिल और पंजाब का पंजाबी आदि। यहाँ तक कि उसने अपने अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है। उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक और सांस्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्यप्रति के जीवन में उसे उर्दू की बिल्कुल आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि दूसरे-दूसरे सूबों के मुसलमान अपने-अपने सूबे की भाषा निस्संकोच भाव से सीख सकते हैं और उसे यहाँ तक अपनी भी बना सकते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों की भाषा में नाम को भी कोई भेद नहीं रह जाता, तो फिर संयुक्त प्रांत और पंजाब के मुसलमान क्यों हिन्दी से इतनी घृणा करते हैं? हमारे सूबे के देहातों में रहनेवाले मुसलमान प्रायः देहातियों की भाषा ही बोलते हैं। जो बहुत-से मुसलमान देहातों से आकर शहरों में आबाद हो गये हैं, वे भी अपने घरों में देहाती ज़बान ही बोलते हैं। बोल-चाल की हिन्दी समझने में न तो साधारण मुसलमानों को ही कोई कठिनता होती है और न बोल-चाल की उर्दू समझने में साधारण हिन्दुओं को ही। बोल-चाल की हिन्दी और उर्दू प्रायः एक-सी ही हैं। हिन्दी के जो शब्द साधारण पुस्तकों और समाचार-पत्रों में व्यवहृत होते हैं और कभी-कभी पण्डितों के भाषणों में भी आ जाते हैं, उनकी संख्या दो हज़ार से अधिक न होगी। इसी प्रकार फ़ारसी के साधारण शब्द भी इससे अधिक न होंगे। क्या उर्दू के वर्तमान कोषों में दो हज़ार हिन्दी शब्द और हिन्दी के कोषों में दो हज़ार उर्दू शब्द नहीं बढ़ाये जा सकते? और इस प्रकार हम एक मिश्रित कोष की सृष्टि नहीं कर सकते? क्या हमारी स्मरण-शक्ति पर यह भार असह्य होगा? हम अंगरेज़ी के

    असंख्य शब्द याद कर सकते हैं और वह भी केवल एक अस्थायी आवश्यकता की पूर्त्ति करने के लिए। तो फिर क्या हम एक स्थायी उद्देश्य की सिद्धि के लिए थोड़े-से शब्द भी याद नहीं कर सकते। उर्दू और हिन्दी भाषाओं में न तो अभी विस्तार ही है और न दृढ़ता। उनके शब्दों की संख्या परिमित है। प्रायः साधारण अभिप्राय प्रकट करने के लिए भी उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। शब्दों की इस वृद्धि से यह शिकायत दूर हो सकती है।

    भारतवर्ष की सभी भाषाएँ या तो प्रत्यक्ष रूप से और या अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत से निकली हैं। गुजराती, मराठी और बँगला की तो लिपियाँ भी देव-नागरी से मिलती-जुलती हैं। यद्यपि दक्षिणी भारत की भाषाओं की लिपियाँ बिल्कुल भिन्न हैं; परन्तु फिर भी उनमें संस्कृत शब्दों की बहुत अधिकता है। अरबी और फ़ारसी के शब्द भी सभी प्रांतीय भाषाओं में कुछ न कुछ मिलते हैं। परंतु उनमें संस्कृत शब्दों की उतनी अधिकता नहीं होती जितनी हिन्दी में होती है। इसलिए यह बात बिल्कुल ठीक है कि भारतवर्ष में ऐसी हिन्दी बहुत सहज में स्वीकृत और प्रचलित हो सकती है जिसमें संस्कृत के शब्द अधिक हों। दूसरे प्रांतों के मुसलमान भी ऐसी हिन्दी सहज में समझ सकते हैं; परंतु फ़ारसी और अरबी के शब्दों से लदी हुई उर्दू भाषा के लिए संयुक्त प्रांत और पंजाब के नगरों और क़स्बों तथा हैदराबाद के बड़े-बड़े शहरों के सिवा और कोई क्षेत्र नहीं। मुसलमान संख्या में अवश्य आठ करोड़ हैं; लेकिन उर्दू बोलनेवाले मुसलमान इसके एक चौथाई से अधिक न होंगे। ऐसी अवस्था में क्या उच्चकोटि की राष्ट्रीयता के विचार से इसकी आवश्यकता नहीं है कि उर्दू में कुछ आवश्यक सुधार और वृद्धि करके उसे हिन्दी के साथ मिला लिया जाय? और हिन्दी में भी इसी प्रकार की वृद्धि करके उसे उर्दू से मिला दिया जाय? और इस मिश्रित भाषा को इतना दृढ कर दिया जाय कि वह सारे भारतवर्ष में बोली-समझी जा सके? और हमारे लेखक जो कुछ लिखें, वह एक विशेष क्षेत्र के लिए न हो; बल्कि सारे भारतवर्ष के लिए हो? सिन्धी

  • कायाकल्प

    कायाकल्प

    Aproximadamente 248.859 palavras.

    यशोदानन्दन-जिसे तुम धर्म का द्रोही समझते हो, वह तुमसे कहीं सञ्चा हिन्दू है।

    एक अावाज-सच्चे हिन्दू वही तो होते हैं, जो मोके पर बगले झॉकने लगे और शहर छोडकर दो चार दिन के लिए खिसक जायें ।

    कई यादमी-~यह कौन मन्त्री पर आक्षेप कर रहा है.? कोई उसकी जमान पकड़ कर क्यों नहीं खींच लेता ?

    यशोदानन्दन-श्राप लोग सुन रहे हैं, मुझपर जैसे-कैसे टोप लगाये जा रहे हैं । मैं सच्चा हिन्दू नही हूँ, मैं मौका पड़ने पर बगले झाँकता हूँ और जान बचाने के लिए शहर से भाग जाता हूँ। ऐसा अादमी अापका मन्त्री बनने के योग्य नहीं है | आप उस श्रादमी को अपना मन्त्री बनायें, जिसे आप सच्चा हिन्दू समझते हों। मैं धर्म से पहले अपने यात्म गौरव की रक्षा करना चाहता हूँ।

    कई प्रादमी-महाशय, श्रापको ऐसे मुँहफट आदमियों की बात का खयाल न करना चाहिए।

    यशोदा०—यह मेरी पचीस बरसों की सेवा का उपहार है । जिस सेवा का फल अपमान हो, उसे दूर हो से मेरा सलाम है ।

    यह कहते हुए मुशी यशोदानन्दन घर की तरफ चले । कई आदमियों ने उन्हें रोकना चाहा, कई श्रादमी उनके पैरो पडने लगे, लेकिन उन्होंने एक न मानी। वह तेजस्वी आदमी थे। अपनी सस्था पर स्वेच्छाचारी राजाओं की भॉति शासन करना चाहते थे ।अालोचनायों को सहन करने की उनमे सामर्थ्य ही न थी।

    उनके जाते ही यहाँ आपस में 'तू तू, मैं-मैं होने लगी। एक दूसरे पर आक्षेप करने लगा। गालियों की नौवत आयी, यहाँ तक कि दो चार श्रादमियों से हाथा-पाई मी हो गयी। चक्रधर ने जब देखा कि इधर से अब कोई शंका नहीं है, तो वह लपककर मुसल मानों के सामने आ पहुंचे और उच्च स्वर से बोले-हजरात, मै कुछ अर्ज करने की इजाजत चाहता हूँ।

    एक आदमी-सुनो, सुनो, यही तो अभी हिन्दुओं के सामने खडा था।

    दूसरा अादमी-दुश्मनों के कदम उखड़ गये । सब भागे जा रहे हैं ।

    तीसरा आदमी-इसी ने शायद उन्हें समझा-बुझाकर हटा दिया है । देखो,-क्या कहता है ?

    चक्रधर-अगर इस गाय की कुरबानी करना श्राप अपना मजहबी फर्ज समझते हों, तो शोक से कीजिए । मैं श्रापके मजहबी मामले में दखल नहीं दे रहा हूँ। लेकिन क्या यह लाजमी है कि इसो जगह कुरबानी की जाय ।

    एक आदमी-हमारी खुशी है; जहाँ चाहेगे, कुरबानी करेंगे, तुमसे मतलब ?

    चक्रधर-वेशक, मुझे बोलने का कोई हक नहीं है, लेकिन इस नाम की जो इजत मेरे दिल में है, वह मुझे बोलने के लिए मजबूर कर रही है। इसलाम ने कमी दूसरे मजहबवाला को दिलजारी नहीं की। उसने हमेशा दूसरो के जजबात का एहत-राम किया है। वगद द और रूम, स्पेन और मित्र की तारीखें उस मजहबी अाजादी को शाहिद हैं, जो इसलाम ने उन्हें अता को थीं। अगर आप हिन्दू जजगत का लिहाज करके किसी दूसरी जगह कुरबानी करें, तो यकीनन इसलाम के वकार मे फर्क न पायेगा!

    एक मौलवी ने जोर देकर कहा-रेमी मीठा-मीठी बातें हमने बहुत सुनी हैं । कुरबानो यहीं होगी। जब दूसरे हमारे कार जन करते हैं, तो हम उनके जजबात का क्यो लिहाज करें?

    ख्वाजा महसूद बड़े गौर से चक्रधर की बाते सुन रहे थे। मोलवी साहब की उद्दण्डता पर चिढ़कर बोले- क्या शरीयत का हुक्म है कि कुरबानी यही हो ? किसी दूसरी जगह नहीं की जा सकती ?

    मौलवी साहब ने ख्वाना महमूद को तरफ अविश्वास की दृष्टि से देखकर कहा-मजहब के मामले में उलमा के सिवा पार किसी को दखल देने का मजाज नही है।

    ख्याजाचुरा न मानिएगा, मोलवी साहब ! अगर दस सिपाही याकर यहाँ खड़े हो जॉय, तो चग ले झॉकने लगिएगा!

    मौलवी-किसीकी मजाल है कि हमारे दीनी उभूर में मजाहमत करे।

    खाजा-आपको तो अपने हलवे मांडे से काम है, जिम्मेदारो तो हमारे ऊपर आयेगो, दुकाने तो हमारी लुटेगी, श्रापके पास फटे बोरिये और फूटे बधने के सिवा ओर क्या रखा है। जब वे लोग मसलहत देखकर किनारा कर गये, ता हमे भी अपनी जिद से बाज अा जाना चाहिए। क्या आप समझते है, वे लोग यारले डर- कर भागे? हमारे दुगुने अादमी थे । अगर चढ़ पाते, तो संभलना मुश्किल हो जाता। मौलवी-जनाव, जिहाद करना कोई खालाजी का घर नहीं । श्राप दुनिया के वन्दे हैं, दीन हकीकत क्या समझे ?

    ख्वाग-बना है, आपकी शहादत तो कही नहीं गयी है । जिल्लत तो हमारी है ।। मौलवी-भाइयो, आप लोग ख्वाजा साहब की ज्यादती देख रहे हैं । श्राप ही फैसला कीजिए कि दीन मामलात मे उलमा का फैसला वाजिब है, या उमरा का एक मोटेताजे दटियल श्रादमी ने कहा- आप विस्मिल्लाह कीजिए । उमरा को.दीन से कोई सरोकार नहीं।

    यह सुनते ही एक श्रादमी बड़ा सा छुरा लेकर निकल पड़ा और कई यादमी गाय की सींगें पकड़ने लगे। गाय अब तक तो चुपचाप खड़ी थी। छुरा देखते ही वह छटपटाने लगी। चक्रघर यह दृश्य देखकर तिलमिला उठे। निराशा और क्रोध से काँपते हुए बोले भाइयो, एक गरीब, वेकस जानवर को मारना बहादुरी नहीं। खुदा वेकसों के खून से नहीं खुश होता। अगर नवॉमर्दी दिखानी है तो क्सिी शेर का शिक्षार करो, किसी चीते को मारो, किसी जगली सुअर का पीछा करो। उसकी कुरबानी से, मुमकिन है, खुदा खुश हो । जब तक हिन्दू सामने खड़े थे, किसी को हिम्मत न पड़ी कि छुरा हाथ में लेता। नव वे चले गये, तो आप लोग शेर हो गये ?

    एक आदमी-तो क्यों चले गये ? मैदान में खड़े क्यो न रहे ? गौ-रक्षा का जोश दिखाते । दुम दबाकर भाग क्यों खड़े हुए ?

    चक्रधर-भाग नही खड़े हुए और न लड़ने मे वे आपसे कम ही है। उनकी समझ में यह बात आ गयी कि जानवर की हिमायत में इन्सान का खून बहाना इन्सान को मुनासिब नहीं।

    मौलवी-शुक्र है, उन्हें इतनी समझ तो अायी !

    चक्रधर-लेकिन आप तो अभी तक उनकी दिलनारी पर कमर बाँधे हुए है। खैर, श्रापको अख्तियार है, जो चाहें, करें। मगर मै यकीन के साथ कहता हूँ कि यह दिलजारी एक दिन रग लायेगी। यह न समझिए कि इस वक्त कोई हिन्दू मैदान में नहीं है । हर एक कुरबानी हिन्दुस्तान के २१ करोड़ हिन्दुओं के दिलों मे जख्म कर देती है, और इतनी बड़ी तादाद के दिलों को दुखाना बड़ी से बड़ी कौम के लिए भी एक दिन पछतावे का वाइस हो सक्ता है। अगर आपकी गिना है, तो शोक से खाइए । लाखों गौएँ रोज करल होती है, हिन्दू सिर नहीं उठाते । फिर यह क्योंकर मुमकिन है कि वह आपके मजहबी मामले में दखल दें ? हिन्दुओ से ज्यादा वेतअस्सुव कौम दुनिया में नहीं है, लेकिन जव श्राप उनकी दिलजारी और महन दिलजारी के लिए कुरबानी करते हैं, तो उनको जरूर सदमा होता है । और उनके दिलों में जो शोला उठता है, उसका श्राप कयास नहीं कर सकते। अगर श्रापको यकीन न आये,तो देख लीनिये कि इस गाय के साथ ही एक हिन्दू कितनी खुशी से अपनी जान दे देता है! यह कहते हुए चक्रधर ने तेजी से लपककर गाय की गरदन पकड़ ली और बोले-आज आपको इस गौ के साथ एक इन्सान की भी कुरबानी करनी पड़ेगी।

    सभी आदमी चकित हो-होकर चक्रधर की ओर ताकने लगे। मौलवी साहब ने क्रोध से उन्मत्त होकर कहा-कलाम-पाक की कसम, हट जाओ, वरना गजब हो जायगा।

    चक्रधर-हो जाने दीजिए। खुदा की यही मरजी है कि आज गाय के साथ मेरी भी कुरबानी हो।

    ख्वाजा महमूद-क्यो भई, तुम्हारा घर कहाँ है?

    चक्रधर-परदेशी मुसाफिर हूँ।

    ख्वाजा-कसम, खुदा की, तुम जैसा दिलेर आदमी नहीं देखा। नाम के लिए तो गाय को माता कहनेवाले बहुत हैं; पर ऐसे बिरले ही देखे, जो गौ के पीछे जान लड़ा दें। तुम कलमा क्यों नही पढ़ लेते?

    चक्रधर-मै एक खुदा का कायल हूँ। वही सारे जहान का खालिक और मालिक है। फिर और किस पर ईमान लाऊँ?

    ख्वाजा-वल्लाह, तब तो तुम सच्चे मुसलमानो हो। हमारे हजरत को अल्लाह ताला का रसूल मानते हो?

    चक्रघर-बेशक मानता हूँ, उनकी इज्जत करता हूँ और उनकी तौहीद का कायल

    ख़्वाजा-हमारे साथ खाने-पीने से परहेज तो नही करते?

    चक्रधर-जरूर करता हूँ, उसी तरह, जैसे किसी ब्राह्मण के साथ खाने से परहेज करता हूँ, अगर वह पाक-साफ न हो।

    ख्वाजा-काश, तुम-जैसे समझदार तुम्हारे और भाई भी होते। मगर यहाँ तो लोग हमे मलिच्छ कहते हैं। यहाँ तक कि हमे कुत्तों से भी नजिस समझते हैं। उनकी थालियों में कुत्ते खाते हैं। पर मुसलमान उनके गिलास में पानी नहीं पी सकता। वल्लाह, आपसे मिलकर दिल खुश हो गया। अब कुछ कुछ उम्मीद हो रही है कि शायद दोनों कौमो में इत्तफाक हो जाय। अब आप जाइए। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि कुरवानी न होगी।

    चक्रधर-और साहबों से तो पूछिए।

    कई आवाजें-होती तो जरूर, लेकिन अब न होगी। आप वाकई दिलेर आदमी हैं।

    ख्वाजा-यहाँ आप कहाँ ठहरे हुए हैं? मै आपसे मिलूँगा।

    चक्रधर-बाप क्यों तकलीफ उठायेंगे, मैं खुद हाजिर हूँगा।

    ख्वाजा महमूद ने चक्रधर को गले लगाकर रुखसत किया। इधर उसी वक्त गाय

    की पगहिया खोल दी गयी। वह जान लेकर भागी। और लोग भी इस 'नौजवान' की 'हिम्मत' और 'जवाँमर्दी' को नारीफ करते हुए चले।

    चक्रधर को आते देखकर यशोदानन्दन अपने कमरे से निकल पाये यार उन्हें छाती से लगाते हुए बोले-भैया, आज तुम्हारा धैर्य और साहस देसकर मैं दंग रह गया। तुम्हें देखकर मुझे अपने ऊपर लज्जा या रही है। तुमने आज हमारी लाज रख ली। अगर यहाँ कुरबानी हो जाती, तो हम मुँह दिखाने लायक भी न रहते।

    एक बूदा–आज तुमने वह काम कर दिखाया, जो सैकड़ो आदमियों के रक्त पात से भी न होता।

    चक्रधर-मैंने कुछ भी नहीं किया। यह उन लोगा की शराफत थी कि उन्होंने मेरी अनुनय-विनय सुन ली।

    यशोदा०–अरे भाई, रोने का भी तो दृग होता है। अनुनय विनय हमने भी सैकड़ा ही बार की, लेकिन हर दफे गुत्थी और उलझतो हो गयी। आइए, आपके घाव को मरहम-पट्टी तो हो जाय!

    चक्रधर को कमरे में बिठाकर यशोदानन्दन ने घर में जाकर अपनी स्त्री वागीश्वरी से कहा – आज मेरे एक दोस्त की दावत करनी होगी। भोजन खूब दिल लगाकर बनाना। अहल्या, आज तुम्हारी पाक परीक्षा होगी।

    अहल्या-वह कौन आदमी था दादा, जिसने मुसलमानो के हाथों से गौ की रक्षा को?

    यशोदा०–वही तो मेरे दोस्त हैं, जिनकी दावत करने को कह रहा हूँ। बेचारे रास्ते में मिल गये। यहाँ सैर करने आये है। मसूरी जायेंगे।

    अहल्या-वागीश्वरी से) अम्माँ, जरा उन्हें अन्दर बुला लेना, तो दर्शन करेंगे। दादा, मैं कोठे पर बैठी सब तमाशा देख रही थी। जब हिन्दुओं ने उनपर पत्थर फेकना शुरू किया, तो ऐसा क्रोध आता था कि वहीं से फटकारूँ। बेचारे के सिर से खून निकलने लगा, लेकिन वह जरा भी न बोले। जब वह मुसलमानों के सामने आकर खड़े हुए, तो मेरा कलेजा धड़कने लगा कि कहीं सब के सब उनपर टूट न पड़े। बड़े ही साहसी आदमी मालूम होते हैं? सिर में चोट आयी है क्या?

    यशोदा०-हाँ, खून जम गया है, लेकिन उन्हें उसकी कुछ परवा ही नहीं। डॉक्टर को बुला रहा हूँ।

    वागीश्वरी-खा पी चुकें, तो जरा देर के लिए यहीं भेज देना। मेरे लडकों की जोड़ी तो हैं?

    यशोदा०-अच्छी बात है। जरा सफाई कर लेना।

    पड़ोस में एक डॉक्टर रहते थे। यशोनन्दन ने उन्हें बुलाकर घाव पर पट्टी वधवा दी। फिर देर तक बातें होती रहीं। धीरे-धीरे सारा मुहल्ला जमा हो गया। कई श्रद्धालु-जनों ने तो चक्रधर के चरण छुए। आखिर भोजन का समय पाया।

    जब लोग खाने बैठे, तो यशोदानन्दन ने कहा- भाई, बाबूजी से जो कुछ कहना हो, कह लो; फिर मुझसे शिकायत न करना कि तुम उन्हें नहीं लाये। बाबूजी, इस घर की तथा मुहल्ले की कई स्त्रियों की इच्छा है कि आपके दर्शन करें। आपको कोई आपत्ति तो नहीं है?

    वागीश्वरी-हाँ बेटा, जरा देर के लिए चले आना; नहीं तो अपने घर जाके कहोगे न कि मैंने जिन लोगों के लिए जान लड़ा दी, उन्होंने बात भी न पूछी।

    चक्रधर ने शरमाते हुए कहा-आप लोगों ने मेरी जो खातिर की है, वह कभी नहीं भूल सकता। उसके लिए मैं सदैव आपका एहसान मानता रहूंगा।

    ज्योही लोग चौके से उठे, अहल्या ने कमरे की सफाई करनी शुरू की। दीवार की तस्वीरे साफ की, फर्श फिर से झाड़कर विछाया, एक छोटी सी मेज पर फूलो का गिलास रख दिया, एक कोने में अगरबत्ती जलाकर रख दी। पान बनाकर तश्तरी में रखे। इन कामों से फुरसत पाकर उसने एकान्त मे बैट कर फूलों को एक माला गॅयनी शुरू की। मन में सोचती थी कि न जाने कौन हैं, स्वभाव कितना सरल है। लजाने मे तो औरतो से भी बढे हुए हैं। खाना खा चुके, पर सिर न उठाया। देखने मे ब्राह्मण मालूम होते हैं। चेहरा देखकर तो कोई नहीं कह सकता कि यह इतने साहसी होंगे।

    सहसा वागीश्वरी ने आकर कहा- बेटी, दोनों आदमी आ रहे हैं। साड़ी तो बदल लो।

    अहल्या 'ऊँह' करके रह गयी। हॉ, उसकी छाती में धड़कन होने लगी। एक क्षण में यशोदानन्दनजी चक्रधर को लिये हुए कमरे में आये। वागीश्वरी और अहल्या दोनो खड़ी हो गयीं। यशोदानन्दन ने चक्रधर को कालीन पर बैठा दिया और खुद बाहर चले गये। वागीश्वरी पखा झलने लगी; लेकिन अहल्या मूर्ति को भॉति खड़ी रही।

    चक्रधर ने उढ़ती हुई निगाहा से अहल्या को देखा। ऐसा मालूम हुआ, माना कोमल, लिग्ध एवं सुगन्धमय प्रकाश की लहर सी आँखों मे समा गयी।

    वागीश्वरी ने मिठाई की तश्तरी सामने रखते हुए कहा-कुछ जलपान कर लो भैया, तुमने कुछ खाना भी तो नहीं खाया। तुम जैसे वीरो को सवा सेर से कम न खाना चाहिए। धन्य है वह माता, जिसने ऐसे बालक को जन्म दिया! अहल्या, जरा गिलास में पानी तो ला। भैा, जब तुम मुसलमानों के सामने अकेले खड़े थे तो यह ईश्वर से तुम्हारी कुशल मना रही थी। जाने कितनी मनौतियाँ कर डालीं। कहाँ है वह माला, जो तूने गयी थी? अब पहनाती क्या नहीं?

    अहल्या ने लजाते हुए कॉपते हाथों से बोला चक्रधर के गले में माला डाल दी, और आहिस्ता से बोली- क्या सिर ज्यादा चोट ती?

    चक्रधर–नहीं तो; बाबूजी ने ख्वाहमख्वाह पट्टी बॅधवा दी। । वागीश्वरी–जब तुम्हें चोट लगी है, तब इसे इतना क्रोध याया था कि उस यादमी को पा जाती, तो मुँह नोच लेती। क्या काम करते हो, बेटा?

    चक्रधर–अभी तो कुछ नहीं करता, पड़े-पड़े खाया करता हूँ, मगर जल्द ही कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। धन से तो मुझे बहुत प्रेम नहीं है और मिल भी जाय, तो मुझे उसको भोगने के लिए दूसरों की मदद लेना पड़े। हॉ, इतना अवश्य चाहता हूँ कि किसी का आश्रित होकर न रहना पड़े।

    वागीश्वरी–कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलती क्या?

    चक्रधर-नौकरी करने को तो मेरी इच्छा ही नहीं है। मैने पक्का निश्चय कर लिया है कि नौकरी न करूँगा। न मुझे खाने का शौक है, न पहनने का, न ठाट बाट का, मेरा निर्वाह बहुत थोड़े मे हो सकता है।

    वागीश्वरी–और जब विवाह हो जायगा, तब क्या करोगे।

    चक्रधर—उस उक्त सिर पर जो आयेगी, देखी जायगी। अभी से क्यों उसको चिन्ता करूँ?

    वागीश्वरी-जल-पान तो कर लो, या मिठाई भी नहीं खाते?

    चक्रधर मिठाइयाँ खाने लगे। इतने में महरी ने पाकर कहा- बड़ी बहूजी, मेरे लाला को रात से खाँसी आ रही है, तिल-भर भी नही रुकनी, कोई दवाई दे दो।

    वागीश्वरी दवा देने चली गयी। अहल्या अकेली रह गयी तो चक्र वर ने उसकी ओर देखकर कहा-आपको मेरे कारण बड़ा कष्ट हुआ। मै तो इस उपहार के योग्य न था।

    अहल्या-वह उपहार नहीं, भक्त की भेंट है।

    चक्रधर–मेरा परम सौभाग्य है कि बैठे बैठाये इस पद को पहुँच गया।

    अहल्या–आपने आज इस शहर के हिन्दू मात्र की लाज रख ली। क्या और पानी हूँ?

    चक्रधर-तृप्त हो गया। आज मालूम हुआ कि जल में कितना स्वाद है। शायद अमृत मे भी यह स्वाद न होगा।

    वागीश्वरी ने आकर मुस्कराते हुए कहा–भैया, तुमने तो आधी भी मिठाइयाँ नहीं खायीं। क्या उसे देखकर भूख-प्यास बन्द हो गयी? यह मोहनी है, जरा इससे सचेत रहना।

    अहल्या–अम्मॉ, तुम छोटे बड़े किसी का लिहाज नहीं करतीं!

    वागीश्वरी-अच्छा, बताओ, तुमने इनकी रक्षा के लिए कौन कौन सी मनौतियाँ की थी?

    अहल्या-मुझे आप दिक करेंगी, तो चली जाऊँगी।

    चक्रघर यहाँ कोई घण्टे भर तक बैठे रहे। वागीश्वरी ने उनके घर का सारा वृत्तात पूछा-कै भाई हैं, कै बहिन हैं, पितानी क्या करते हैं, बहनो का विवाह हुआ है या

    नहीं? चक्रधर को उसके व्यवहार में इतना मातृ-स्नेह भरा मालूम होता था, मानों उससे उनका पुराना परिचय है! चार बजते-बजते ख्वाजा महमूद के आने की खबर पाकर चक्रधर बाहर चले आये। और भी कितने ही आदमी मिलने आये थे। शाम तक उन लोगों से बातें होती रहीं। निश्चय हुआ कि एक पचायत बनायी जाय और आपस के झगड़े उसी के द्वारा तब हुआ करें। चक्रधर को भी लोगों ने उस पंचायत का एक मेम्बर बनाया। रात को जब अहल्या और वागीश्वरी छत पर लेटी, तो वागीश्वरी ने पूछा–अहल्या, सो गयी क्या?

    अहल्या-नहीं अम्मा, जाग तो रही हूँ।

    वागीश्वरी~हाँ, आज तुझे क्यों नींद आयेगी। इनसे व्याह करेगी?

    अहल्या–अम्मा, मुझे गालियाँ दोगी, तो मैं नीचे जाकर लेटुंगी, चाहे मच्छर भले ही नोच खाये।

    वागीश्वरी- अरे, तो मै कौन-सी गाली दे रही हूँ। क्या व्याह न करेगी? ऐसा अच्छा वर तुझे और कहाँ मिलेगा?

    अहल्या–तुम न मानोगी, लो, मैं जाती हूँ।

    वागीश्वरी-मै दिल्लगी नहीं कर रही हूँ, सचमुच पूछती हूँ। तुम्हारी इच्छा हो, तो बातचीत की जाय। अपनी ही बिरादरी के हैं। कौन जाने, राजी हो जायें।

    अहल्या -सब बातें जानकर भी?

    वागीश्वरी-तुम्हारे बाबूजी ने सारी कथा पहले ही सुना दी है।

    अहल्या–तो कही माने न?

    वागीश्वरी–टालो मत, दिल की बात साफ-साफ कह दो।

    अहल्या–तुम मेरे दिल का हाल मुझसे अधिक जानती हो, फिर मुझसे क्यों पूछती हो? वागीश्वरी वह धनी नहीं, याद रखो।

    अहल्या–मै धन की लोडी कभी नहीं रही।

    वागीश्वरी–तो अब तुम्हें सशय में क्यो रखूँ। तुम्हारे बाबूजी तुमसे मिलाने है के लिए इन्हें काशी से लाये हैं। इनके पेस और कुछ हो या न हो, हृदय अवश् है। और ऐसा हृदय, जो बहुत कम लोगो के हिस्सों में आता है। ऐसा स्वामी पाक तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।

    अहल्या ने डबडबायी हुई आँखों से वागीश्वरी को देखा, पर मुंह से कुछ न बोली कृतज्ञता शब्दों में आकर शिष्टाचार का रूप धारण कर लेती है। उसका मौलिक रूप वही है, जो आँखों से बाहर निकलते हुए कॉपता और लजाता है।

    ६

    मुशी वज्रधर उन रेल के मुसाफिरों में थे, जो पहले तो गाड़ी मे खड़े होने व जगह मांगते हैं, फिर बैठने की फिक्र करने लगते हैं और अन्त में सोने की तैयारी क

    देते हैं। चक्रधर एक बड़ी रियासत के दीवान की लड़की को पढायें और वह इस स्वर्ण सयोग से लाभ न उठायें। यह क्योकर हो सकता था। दीवान साहब को सलाम करने आने जाने लगे। बातें करने में तो निगुण थे ही, दो ही चार मुलाकाता में उनका सिफा जम गया। इस परिचय ने शीघ्र ही मित्रता का रूप धारण किया। एक दिन दीवान साहब के साथ वह रानी जगदीशपुर के दरबार में जा पहुँचे और ऐसी लच्छेदार बातें की, अपनी तहसीलदारी की ऐसी जीट उड़ायी कि रानीजी मुग्ध हो गयी। कोई क्या तहसीलदारी करेगा। जिस इलाके मे मै था, वहाँ के यादमी अाज तक मुझे याद करते हैं । डींग नहीं मारता, डींग मारने की मेरी ग्राटत नहो, लेकिन जिम इलाके मे मुश्किल से ५० हजार वसल होता था, उसा इलाके से साल के अन्दर मैने दो लाख वमूल करके दिखा दिया और लुत्फ यह कि किसी को हिरासत में रसने या कुरकी करने की जरूरत नही पड़ी।

    ऐसे कार्य कुशल यादमी की सभी जगह जरूरत रहती है। रानी ने सोचा- इस अादमी को रख लें, तो इलाके की ग्रामदनी बढ जाय । ठार साहब से सलाह की । यहाँ तो पहले ही से सारी बातें सघी बधी थी । ठाकुर साहब ने रग और भी चोखा कर दिया। उनके दोस्तों मे यही ऐसे थे, जिसपर लौगी की असीम कृपा दृष्टि थी। दूसरी ही सलामी में मुशीजी को २५) मासिक की तहसीलदारी मिल गयी। मुँह माँगी मुराद पूरी हुई । सवारी के लिए घोड़ा भी मिल गया। सोने का सुहागा हो गया ।

    अब मुशीजी की पाँचों अगुली घी में थी। जहाँ महीने में एक बार भी महफिल न जमने पाती थी, वहाँ अब तीसों दिन जमघट होने लगा। इतने बडे अहलकार के लिए शराब की क्या कमी | कभी इलाके पर चुपके से दस-बीस बोतले खिचवा लेते कभी शहर के किसी कलवार पर धौस जमाकर दो चार बोतल ऐंठ लेते । बिना हरे फिटकरी रग चोखा हो जाता था। एक कहार भी नोकर रख लिया और ठाकुर साहब के घर से दो चार कुरसियाँ उठवा लाये | उनके हौसले बहुत ऊँचे न थे, केवल एक भले आदमी की भाँति जीवन व्यतीत करना चाहते थे। इस नौकरो ने उनके हौसले को बहुत-कुछ पूरा कर दिया, लेकिन यह जानते थे कि इस नौकरी का कोई ठिकाना नहीं । रईसों का मिजाज एक सा नहीं रहता। मान लिया, रानी साहब के साथ निभ ही गयी, तो कै दिन । राना साहब आते ही पुराने नौकरों को निकाल बाहर करेंगे । जब दीवान साहब ही न रहेंगे, तो मेरी क्या हस्ती। इसलिए उन्होंने पहले ही से नये राजा साहब के यहाँ आना जाना शुरू कर दिया था। इनका नाम ठाकुर विशालसिंह था । रानी साहब के चचेरे देवर होते थे। उनके दादा दो भाई थे । बड़े भाई रियासत के मालिक थे । उन्हीं के वशजों ने दो पीढियो तक राज्य का आनन्द भोगा था । अब रानी के निस्सन्तान होने के कारण विशाल सिंह के भाग्य उदय हुए थे। दो-चार गाँव जो उनके दादा को गुजारे के लिए मिले थे, उन्हीं को रेहन वय करके इन लोगों ने ५० वर्ष काट दिये थे- यहाँ तक कि विशालसिंह के पास अब इतनी भी सम्पत्ति न थी कि गुजर बसर के लिए काफी होती । उसपर कुल-मर्यादा का पालन करना आवश्यक था। वह महारानी के पट्टीदार थे और इस हैसियत का निर्वाह करने के लिए उन्हें नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ो, सभी कुछ रखना पड़ता था | अभी तक परम्परा को नकल होती चली आती थी। दशहरे के दिन उत्सव जरूर मनाया जाता, जन्माष्टमी के दिन जरूर धूमधाम होती।

    प्रातःकाल था, माघ की ठण्ड पड़ रही थी। मुन्शीजी ने गरम पानी से स्नान किया और चौकी से उतरे। मगर खड़ाऊँ उलटे रखे हुए थे । कहार खडा था कि यह जायँ,तो धोती छाट! मुन्शीजी ने उलटे खड़ाऊँ देखे, तो कहार को डॉटा-तुझसे कितनी बार कह चुका कि खड़ाऊँ सीधे रखा कर | तुझे याद क्यों नहीं रहता ? बना, उलटे खड़ाऊँ पर कैसे पैर रखूँ ? आज तो मैं छोड़ देता हूँ, लेकिन कन जो तूने उलटे खड़ाऊँ रखे, तो इतना पीटगा कि तू भी याद करेगा।

    कार ने कॉपते हुए हाथों से खडाऊँ सीधे कर दिये।

    निर्मला ने हलवा बना रखा था । मुन्शीजी पाकर एक कुरसी पर बैठ गये और जलता हुअा हलवा मुंह में डाल लिया बारे किसी तरह उसे निगल गये और आँखों से पानी पोंछते हुए ब'ले-तुम्हारा कोई काम ठीक नहीं होता | जलता हुया हलवा सामने रख दिया । आखिर मेरा मुँह जलाने से तुम्हें कुछ मिल तो नहीं गया ।

    निर्मला-जरा हाथ से देख क्यो न लिया ?

    वज्रधर – वाह, उलटा चोर कोतवालै बाटे | मुझीको उल्लू बनाती हो । तुम्हें खुद सोच लेना चाहिए था कि जलता हुया हलमा खा गये, तो मुंह की क्या दशा होगी। लेकिन तुम्हें क्या परवा | लल्लू कहाँ हैं ?

    निर्मला- लल्लू मुझसे कहके कही जाते हैं ? पहर रात रहे, न जाने किधर चले गये । नाने कहीं किसानों की सभा होनेवाली है। वहीं गये हैं ।

    वनधर-वहाँ दिन-भर भूखा मरेगा ! न जाने इसके सिर से यह भूत कत्र उतरेगा? मुझसे कल दारोगाजी कहते थे, श्राप लड़के को सॅभालिए, नहीं तो धोखा खाइएगा। समझ में नहीं याar, क्या करूँ । मेरे इलाके के ग्रादमी भी इन सभागों मे अब जाने लगे हैं और मुझे खौफ हो रहा है कि कहीं रानी साहब के कानो में भनक पड़ गयी, तो मेरे सिर हो जायेंगी। मैं यह तो मानता है कि अहलकार लोग गरीबों को बहुत सताते हैं, मगर किया क्या जाय, सताये बगैर काम भी तो नहीं चलता। आखिर उनका गुजर बसर कैसे हो ! पिसानो को समझाना बुरा नहीं, लेकिन ग्राग मे कुदना तो बुरी बात है । मेरो तो मुनने को उसने कसम खा ली है, मगर तुम क्यों नहीं समझाती ?

    निर्मला-जो याग में कृदेगा, आप जलेगा, मुझे क्या करना है । उससे बहस कौन करे । आज सवेरे-सवेरे कहाँ जा रहे हो ?

    वनधर-जरा ठाकुर विशालसिंह के यहाँ जाता हूँ।

    निर्मला-टोपहर तक तो लौट अायोगे न ? दूं। हॉ, इसका वादा करता हूँ कि रियासत मिलने के साल भर बाद भर कौड़ी कौड़ी सूद के साथ चुका दूंगा । सच्ची बात तो यह है कि मुझे पहले ही मालुम था कि इस शर्त पर कोई महाजन रुपए देने पर राजी न होगा । ये बला के चघह होते हैं। मुझे तो इनके नाम से चिढ है । मेरा वश चले, तो ग्राज इन सबों को तोप पर उड़ा दूं। जितना डर मुझे इनसे लगता है, उतना साँप मे भी नहीं लगता। इन्हीं के हाथों ग्रान मेरी यह दुर्गति है, नहीं तो इस गयी बीती दशा में भी यादमी होता। इन नर पिशाचों ने सारा रक्त चूस लिया । पिताजी ने केवल पाँच हजार लिये थे, जिनके पचास हजार हो गये । और मेरे तीन गाँव, जो इस वक्त दो लाख को सस्ते ये, नीलाम हो गये। पिताजी का मुझे यह अन्तिम उपदेश था कि कर्ज कभी मत लेना। इसी शोक में उन्होंने देह त्याग दी।

    यहाँ श्रमी यह बातें हो ही रही थी कि जनानखाने में से कलह शब्द आने लगे। मालूम होता था, कई स्त्रियो मे सग्राम छिड़ा हुया है। ठाकुर साहब ये कर्कश पाब्द सुनते ही विकल हो गये, उनके माथे पर बल पड़ गये, मुख तेजहीन हो गया । यही उनके जीवन की सबसे दारुण व्यथा थी । यही काँटा था, जो नित्य उनके हृदय मे खटका करता था । उनकी बड़ी स्त्री का नाम वसुमती था। वह अत्यन्त गर्वशीला थी;नाक पर मक्खी भी न बैठने देती । उनको तलवार सदैव म्यान से बाहर रहती थी। वह अपनी सपत्नियों पर उसी भाँति शासन करना चाहती थी, जैसे कोई सास अपनी बहुश्री पर करती है । वह यह भूल जाती थी कि ये उनकी बहुएँ नहीं, सप नयाँ हैं । जो उनकी हाँ म हाँ मिनाता, उसपर प्राण देती थी, किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध जरा भी कोई बात हो जातो, तो सिंहनी का सा विकराल रूप धारण कर लेती थी।

    दूसरी स्त्री का नाम रामप्रिया था। यह रानी जगदीशपुर की सगी बहन थी । उनके पिता पुगने खिलाड़ी थे, दो दस्ती झाड़ते थे, दो-धारी तलवार से लडते थे । रामप्रिया दया और विनय की मूर्ति थी, बड़ी विचारशील और वाक्य-मधुर, जितना कोमल अग था, उतना ही कोमल हृदय भी था। वह घर में इस तरह रहती थी मानों थी ही नही। उन्हें पुस्तको से विशेष रुचि थी, हरदम कुछ न कुछ पढ़ा लिखा करती थीं। सब से अलग-विलग रहती थी, न किसी के लेने मे, न देने में, न किसी से वैर, न प्रेम।

    तीसरी महिला का नाम रोहिणी या । ठाकुर साहब का उनपर विशेष प्रेम या, और वह भी प्रापण से उनकी सेवा करती थी। इनमे प्रेम की मात्रा अधिक थी या माया को इसका निर्णय करना कठिन था। उन्हें यह असह्य था कि ठाकुर साहन उनकी सौतो से बात चीत भी करें। वसुमनी कर्कशा होने पर भी मलिन हृदयान थी, जो कुछ मन में होता, वही मुख म । एक बार मुँह से बात निकाल डालने पर फिर उसके हृदय पर उसका कोई चित न रहता था। रोहिणी द्वेष को पालती थी, जैसे- चिड़िया अपने अण्डे को सेतो है । वह जितना मुँह से कहती थी, उससे कही अधिक मन मे रखती थी। ठाकुर साहब ने अन्दर जाकर वसुमती से कहा–तुम घर में रहने दोगी या नहीं ? जरा भी शरम-लिहाज नहीं कि बाहर कौन बैठा हुया है। बस, जब देखो, सग्राम मचाbरहता है । इस जिन्दगी से तग पा गया । सुनते-सुनते कलेजे में नासूर पड़ गये ।

    वसुमती-कर्म तो तुमने किये हैं, भोगेगा कौन ?

    ठाकुर-तो जहर दे दो। जला जलाकर मारने से क्या फायदा !

    वसुमती-क्या वह महारानी लडने के लिए कम थी कि तुम उनका पक्ष लेकर श्रा दौड़े ? पूछते क्यों नहीं, क्या हुआ, जो तीरों की बौछार करने लगी ?

    रोहिणी–अाप चाहती हैं कि मैं कान पकड़कर उठाऊ, या बैठाऊँ, तो यहाँ कुछ आपके गॉव मे नहीं बसी हूँ । क्यों कोई अापसे थर-थर कॉपा करे!

    ठाकुर-आखिर कुछ मालुम भी तो हो, क्या बात हुई ?

    रोहिणी–वही हुई, जो रोज होती है । मैंने हिरिया से कहा, नरा मेरे सिर मे तेल डाल दे । मालकिन ने उसे तेल डालते देखा, तो श्राग हो गयीं। तलवार खींचे हुए आ पहुंची और उसका हाथ पकड़कर खींच ले गयी । अाज अाप निश्चित कर लीजिए कि हिरिया उन्हीं की लौडी है या मेरी भी। यह निश्चय किये बिना आप यहाँ से न जाने पायेंगे।

    वसुमती-वह क्या निश्चय करेगे, निश्चय मैं करूँगी। हिरिया मेरे साथ मेरे नैहर से आयी है और मेरो लौडो है । किसी दूसरे का उस पर कोई दावा नहीं है ।

    रोहिणी–सुना आपने ? हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्ही की लौंडी है।

    ठाकुर-हिरिया इस घर में रहेगी, तो उसे सब का काम करना पड़ेगा।

    वसुमती यह सुनकर जल उठी। नागिन की भाँति फुफकारकर बोली- इस वक्त तो अापने चहेती रानी की ऐसी डिग्री कर दी, मानो यहाँ उन्हीं का राज्य है। ऐसे ही न्यायशील होते, तो सन्तान का मुँह देखने को न तरसते ।

    ठाकुर साहब को ये शब्द बाण-से लगे । कुछ जवान न दिया। बाहर आकर कई मिनट तक मर्माहत दशा में बैठे रहे । वसुमती इतनी मुंहफट है, यह उन्हे अाज मालूम हुया । सोचा, मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही थी, जिस पर वह इतना झल्ला जाती। मैने क्या बुरा कहा कि हिरिया को सबका काम करना पड़ेगा। अगर हिरिया केवल उसी का काम करती है, तो दो महरियाँ और रखनी पड़ती हैं । क्या वसुमती इतना भी नहीं समझतो ? ताना ही देना था, तो और कोई लगती हुई बात कह देती। यह तो कठोर से कठोर ग्राघात है, जो वह मुझ पर कर सकती थी। ऐसी स्त्री का तो मुँह न देखना चाहिए।

    सहमा उन्हें एक बात सूझी। मुशीजी से बोले–ज्योतिष की भविष्यवाणी के विषय में आपके क्या विचार है । क्या यह हमेशा सच निकलती है ?

    मुंशोजी असमजस में पड़े कि इसका क्या जवाब दूं। कैसा जवाब रुचिकर होगा– यह उनकी समझ में न पाया । अंधेरे में टटोलते हुए बोले–यह तो उसी विद्या के विषय में कहा ना सकता है, जहाँ अनुम न से काम न लिया जाय । ज्योतिष में बहुत-कुछ पूर्व अनुभव और अनुमान हो से काम लिया जाता है।

    ठाकुर–बस, ठीक यही मेरा विचार है । अगर ज्योतिप मुझे धनी बतलाये, तो यह आवश्यक नहीं कि मैं धनी हो जाऊँ । ज्योतिप के धनी कहने पर भी सम्भव है कि मैं निन्दगी भर कौड़ियों को मुहताज रहूँ । इमी भाँति ज्योतिष का दरिद्र लक्ष्मी का कृपा पात्र भी हो सकता है, क्यों ?

    मुशीजी को अब भी पॉव जमाने को भूमि न मिली । सन्दिग्ध भाव से बोले-हाँ, ज्योतिष की धारणा जब अनुष्ठानों से बदली जा सकती है, तो उसे विधि का लेख क्यों समझा जाय ?

    ठाकुर साहब ने बड़ी उत्सुकता से पूछा- अनुष्ठानों पर श्रापका विश्वास है ?

    मुशीजीको जमीन मिल गयी । बोले-~अवश्य ।

    विशालसिह यह तो जानते थे कि अनुराना से शकायों का निवारण होता है । शनि, राहु ग्रादि का शमन करने के अनुशनों से परिचित थे । बहुत दिनो से मगल का व्रत भी रखते थे, लेकिन इन अनुराना पर अन उन्हें विश्वास न था । वह कोई ऐसा अनुष्ठान करना चाहते थे जो किसी तरद निष्फल ही न हो | बोले- यदि यार यहाँ के किसी विद्वान् ज्योतिषी से परिचित हों, तो कृपा करके उन्हें मेरे यहाँ भेज दोजि एगा । मुझे एक विषय में उनसे कुछ पूछना है ।

    मुशी-अाज ही लीजिए, यहाँ एक से एक बढकर ज्योतिषी पड़े हुए हैं। श्राप.मुझे कोई गैर न समझिए । जब, जिस काम को इच्छा हा, मुझे कहला भेजिए ।.सिर के बल दौड़ा श्राऊँगा। बाजार से काई अच्छी चीज मॅगानी हो, मुझे हुक्म दीजिए, किसी वैद्य या हकीम की जरूरत हो, मुझे सूचना दीजिए। मैं तो जैसे महारानीनी को समझता हूँ, वैसे ही श्रापको भी समझता हूँ।

    ठाकुर-मुझे श्रापसे ऐसी ही श्राशा है। जरा रानी साहबा का कुशल-समाचार जल्द जल्द भेजिएगा। वहाँ अापके सिवा मेग और कोई नहीं है । श्राप ही के ऊपर मेरा भरोसा है । जरा देखिएगा, कोई चीज इधर उधर न होने पाये, यार लोग नोच-खसोट न शुरू कर दें।

    मुशी-आप इससे निश्चिन्त रहें । मैं देख भाल करता रहूँगा।

    ठाकुर-हो सके, तो जर( यह भी पता लगाइएगा कि रानी ने कहाँ-कहाँ से कितने रुपये कर्ज लिये हैं।

    मुशी-समझ गया, यह तो सहज ही में मालूम हो सकता है।

    ठाकुर– जरा इसका भी पता लगाइएगा कि याजकल उनका भोजन कौन बनाता है। पहले तो उनके मैके ही की कोई स्त्री थी। मालूम नहीं, अब भी वही बनाती है, या कोई दूसरा रसोइया रखा गया है । चक्रधर ने ठाकुर साहब के मन का भाव ताडकर दृढ़ता से कहा-महाराज, क्षमा कीजिएगा, मै आपका सेवक हूँ, पर रानी जी का भी सेवक हूँ। उनका शत्रु नही हूँ। और वह दोनों सिह और सिहनी की भाँति लड़ सकते हैं। मै गीदड़ की भॉति स्वार्थ के लिए बीच मे कूदना अपमान-जनक समझता हूँ। मै वहाँ तक तो आपकी सेवा कर सकता हूँ, जहाँ तक रानीजी का अहित न हो । मै तो दोनों का भिक्षुक हूँ।

    ठाकुर साहब दिल मे शरमाये, पर इसके साथ मुंशीजी पर उनका विश्वास और हो गया । बात बनाते हुए बोले-नहीं, नहीं, मेरा मतलब आपने गलत समझा। छी: ! मै इतना नीच नही । मै केवल इसलिए पूछता था कि नया रसोइया है या नहीं । अगर वह सुपात्र है, तो वही मेरा भी भोजन बनाता रहेगा। ठाकुर साहब ने बात तो बनायी, पर उन्हें स्वय ज्ञात हो गया कि बात बनी नहीं ।

    झेप मिटाने को वह एक समाचार पत्र देखने लगे, मानों उन्हें विश्वास हो गया शीजी ने उनकी बात सच मान ली ।

    इतने मे हिरिया ने आकर मुंशीजी से कहा–बाबा, मालकिन ने कहा है कि श्राप लगे, तो मुझसे मिल लीजिएगा।

    ठाकुर साहब ने गरज कर कहा-ऐसी क्या बात है, जिसको कहने की इतनी जल्दी है। इन बेचारे को देर हो रही है, कुछ निठल्ले थोड़े ही है कि बैठे बैठे औरतों का सुना करें । जा, अन्दर बैठ ।

    यह कह कर ठाकुर साहब उठ खड़े हुए, मानो मुशी जी को विदा कर रहे हैं । वह ती को उनसे बातें करने का अवसर न देना चाहते थे । मुशीजी को भी अब विवश विदा माँगनी पड़ी।

    मुंशीजी यहाँ से चले तो उनके दिल मे एक शंका समायी हुई थी कि ठाकुर साहब मुझसे नाराज तो नहीं हो गये। हाँ, इतना सन्तोष था कि मैने कोई बुरा काम नहीं । यदि वह सच्ची बात कहने के लिए नाराज हो जाते हैं, तो हो जायँ। मै क्यों साहब का बुरा चेतू । बहुत होगा, राजा होने पर मुझे जवाब दे देगे । इसकी क्या चिंता। इस विचार से मुंशीजी और अकड़कर घोड़े पर बैठ गये। वह इतने खुश थे, । हवा में उड़े जा रहे हैं। उनकी आत्मा कभी इतनी गौरवोन्मत्त न हुई थी। ताओं को कभी उन्होंने इतना तुच्छ न समझा था।

    ७

    चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुंच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य । उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे । बार बार पाते थे और पूछकर लौट जाते जब वह पाँचवें दिन घर पहुंचे तो लोग मिलने और बधाई देने या पहुँचे । नगर सभ्य समाज मुक्तकंठ से उनकी तारीफ कर रहा था । यबपि चक्रघर गभीर आदमी पर अपनी कीति की प्रशंसा से उन्हें सच्चा अानन्द मिल रहा था । मुसलमानो की सख्या के विषय में किसी को भ्रम होता, तो वह तुरन्त उमे ठोक कर देते थे-एक हजार ? अजी, पूरे पाँच हजार श्रादमी ये पोर सभी को त्योरियाँ चढी हुई। मालूम देता था, मुझे खड़ा निगल जायेगे। नान पर खेल गया और क्या कहूँ। कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें चक्रधर की वह अनुनय-विनय अपमानजनक जान पढ़ती थी। उनका खयाल था कि इससे तो मुसलमान और भी शेर हो गये होंगे । इन लोगों से चक्रधर को घण्टों बहस करनी पडी, पर वे कायल न हुए । मुसलमानों में भी चक्रधर की तारीफ हो रही थी। दोचार श्रादमी मिलने भी अाये, लेकिन हिन्दुओं का जमघट देसकर 'लौट गये।

    और लोग तो तारीफ कर रहे थे, पर मुशी वनधर लड़के की नादानी पर बिगड़ रहे थे। तुम्हीं को क्यों यह भूत सवार हो जाता है ? क्या तुम्हारी ही जान सस्ती है ? तुम्ही को अपनी जान भारी पड़ी है ? क्या वहाँ यार लोग न थे, फिर तुम क्यो अाग म कृदने गये ? मान लो, मुसलमानों ने हाय चला दिया होता, तो क्या करते ? फिर तो कोई साहब पास न फटकते ! ये हजारों यादमी, नो अाज खुशी के मारे फूले नहीं समाते, बात तक न पूछते । निर्मला तो इतनी विगढ़ी कि चक्रधर से बात न करना चाहती थी।

    शाम को चक्रधर मनोरमा के घर गये । वह बगीचे में दौड़-दौड़कर हजारे से पौधों को सींच रही थी। पानी से कपड़े लथपथ हो गये थे। उन्हें देखते ही हजारा फेंककर दौड़ी और पास श्राकर बोली-पाप कर पाये, बाबूजी ? मैं पत्रों मे रोज वहाँ का समाचार देखती थी और मोचती थी कि ग्राप यहाँ पायेंगे, तो यापकी पूजा करूँगी । श्राप न होते तो वहाँ जरूर दगा हो जाता। पापको बिगडे हुए मुसलमाना के सामने अकेले जाते हुए जरा भी शका न हुई ?

    चक्रधर ने कुरसी पर बैठते हुए कहा-जरा भी नहीं ! मुझे तो यही धुन थी कि इस वक्त कुरबानी न होने दूंगा, इसके सिवा दिल में और कोई खयाल न था। अब सोचता हूँ, तो अाश्चर्य होता है कि मुझमे इतना बल और साहस कहाँ से आ गया था। मैं तो यही कहूंगा कि मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं । फिसाद से वे भा उतना ही डरते हैं, जितना हिन्दू । शान्ति की इच्छा भी उनमें हिन्दुओ से कम नहा है । लोगों का यह खयाल कि मुसलमान लोग हिन्दुओं पर राज्य करने का स्वप्न देख रहे हैं बिलकुल गलत है। मुसलमानों को केवल यह शका हो गयी है कि हिन्दू उनस पुराना वैर चुकाना चाहते हैं, और उनकी हस्ती को मिटा देने की फिक्र कर रहे हैं। इसी भय से वे जरा-जरा सी बात पर तिनक उठते हैं और मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं।

    मनोरमा-मैंने तो जब पढा कि ग्राप उन बौखलाये हए आदमियों के सामन निःशक भाव से खड़े थे, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये। आगे पढने की हिम्मत न पड़ती थी कि कहीं कोई बुरी खबर न हो । क्षमा कीजिएगा, मैं उस समय वहाँ होती, तो श्रापको पकडकर खींच लाती । आपको अपनी जान का जरा भो मोह नहीं है।

    चक्रधर-( हँसकर ) जान और हई किस लिए १ पेट पालने ही के लिए तो हम आदमी नही बनाये गये हैं। हमारे जीवन का अादर्श कुछ तो ऊँचा होना चाहिए, विशेषकर उन लोगों का, जो सभ्य कहलाते हैं । ठाट से रहना हो सभ्यता नहीं।

    मनोरमा-(मुस्कराकर ) अच्छा, अगर इस वक्त आपको पाँच लाख रुपए मिल जायँ, तो श्राप लें या न लें।

    चक्रधर-कह नहीं सकता, मनोरमा उस वक्त दिल की क्या हालत हो । दान तो न लूँगा, पड़ा हुआ धन भी न लॅगा; लेकिन अगर किसी ऐसी विधि से मिले कि उसे लेने मे आत्मा की हत्या न होती हो, तो शायद मैं प्रलोभन को रोक न सकूँ पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उसे भोग-विलास मे न उड़ाऊँगा। धन की में निन्दा नहीं करता, उससे मुझे डर लगता है। दूसरों का आश्रित बनना तो लज्जा की बात है, लेकिन जीवन को इतना सरल रखना चाहता हूँ कि सारी शक्ति धन कमाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने ही मे न लगानी पड़े।

    मनोरमा–धन के बिना परोपकार भी तो नही हो सकता ?

    चक्रधर-परोपकार में करना नहीं चाहता, मुझमे इतनी सामर्थ्य ही नहीं। यह तो वे ही लोग कर सकते हैं, जिन पर ईश्वर की कृपा दृष्टि हो । मै परोपकार के लिए अपने जीवन को सरल नहीं बनाना चाहता; बल्कि अपने उपकार के लिए, अपनी आत्मा के सुधार के लिए । मुझे अपने ऊपर इतना भरोसा नहीं है कि धन पाकर भी भाग में न पड़ जाऊँ । इसलिए मैं उससे दूर ही रहना चाहता हूँ।

    मनोरमा–अच्छा, अब यह तो बतलाइए कि आपसे वधूजी ने क्या बातें की ? (मुस्कराकर ) मैं तो जानती हूँ, आपने कई बात-चीत न को होगी, चुपचाप लजाये बैठे रहे होंगे । उसी तरह वह भी आपके सामने आकर खड़ी हो गयी होगी और खड़ी-खड़ी चली गयी होंगी।

    चक्रधर शरम से सिर मुकाकर बोले- हाँ, मनोरमा, हुआ तो ऐसा ही । मेरी समझ ही मे न पाता था कि क्या बातें करूँ। उसने दो एक बार कुछ बोलने का साहस भी किया।

    मनोरमा-ग्रापको देखकर खुश तो बहुत हुई होगी।

    चक्रधर–(शरमाकर ) किसी के मन का हाल मै क्या जानू ?

    मनोरमा ने अत्यन्त सरल भाव से कहा- सब मालूम हो जाता है। पाप मुझसे बता नहीं रहे हैं । कम-से-कम उनकी इच्छा तो मालूम ही हो गयी होगी । मे तो सम-झती हूँ, जो विवाह लड़की की इच्छा के विरुद्ध किया जाता है वह विवाह ही नहीं है । आपका क्या विचार है ?

    चक्रधर बड़े असमञ्जस में पड़े । मनोरमा से ऐसी बातें करते उन्हें सकोच होता था । डरते थे कि कहीं ठाकुर साहब को सबर मिल जाय-~सरला मनोरमा ही कह दे–तो वह समझेगे, मै इसके सामाजिक विचारो मे क्राति पैदा करना चाहता हूँ, श्रत्र तक उन्हें शात न था कि ठाकुर साहब किन विचारों के यादमी है। हाँ, उनके गङ्गा-स्नान से यह अाभास होता था कि वह सनातन धर्म के भक्त हैं। सिर झुकाकर बोले–मनोरमा, हमारे यहाँ विवाह का अाधार प्रेम यार इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है । इच्छा चश्वल है, क्षण-क्षण में बदलती रहती है । कर्तव्य स्थायो है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

    मनोरमा-अगर यह बात है, तो पुराने जमाने में स्वयम्बर क्यों होते थे ?

    चक्रधर–स्वयम्बर मे कन्या की इच्छा ही सर्व प्रधान नहीं है तो थी । वह वीर-युग था, और वीरता ही मनुष्य का सबसे उज्ज्वल गुण समझा जाता था । लोग अाजकन वैवाहिक प्रथा सुधारने का प्रयत्न तो कर रहे है।

    मनोरमा-जानती हूँ, लेकिन कहीं सुधार हो रहा है ? माता पिता धन देखकर लट्ट हो जाते हैं | इच्छा अस्थायी है, मानती हूँ, लेकिन एक बार अनुमति देने के बाद फिर लड़की को पछताने के लिए कोई हीला नही रहता।

    चक्रधर-~अपने मन को समझाने के लिए तों की कभी कमी नहीं रहती, मनोरमा कर्तव्य ही ऐसा श्रादर्श है, जो कभी धोसा नहीं दे सकता ।

    मनोरमा–हाँ, लेकिन प्रादर्श अादर्श ही रहता है, यथार्थ नहीं हो सकता । (मुस्कराकर ) यदि आप ही का विवाह किसी कानी, काली-कलूटी स्त्री से हो जाय, तो क्या श्रापको दु ख न होगा? वोलिए । क्या आप समझते हैं कि लड़की का विवाह किसी खूसट से हो जाता है, तो उसे दु ख नही होता। उसका बम च ते तो वह पति का मुँह तक न देखे । लेकिन इन बातों को जाने दीजिए । वधूजी बहुत सुन्दर हैं ?

    चक्रवर ने बात टालने के लिए कहा-सुन्दरता मनोभावों पर निर्भर होती है। माता अपने कुरूप बालक को भी सुन्दर समझती है ।

    मनोरमा–श्राप तो ऐसी बातें कर रहे हैं, जैसे भागना चाहते हो । क्या माता किसी सुन्दर बालक को देखकर यह नहीं सोचती कि मेरा भी बालक ऐसा ही होता।

    चक्रधर ने लजित होकर कहा- मेरा श्राशय यह न था। मै यही कहना चाहता था कि सुन्दरता के विषय में सब की राय एक-सी नहीं हो सकती

    मनोरमा–श्राप फिर भागने लगे। मै जब आपसे यह प्रश्न करती हूँ, तो उसका साफ मतलब यह है कि आप उन्हें सुन्दर समझते हैं या नहीं?

    चक्रवर लजा से सिर झुकाकर बोले–ऐसी बुरी तो नहीं है।

    मनोरमा–तब तो श्राम उन्हें खूब प्यार करेंगे ?

    चक्रधर-प्रेम केवल रूप का भक्त नहीं होता ।

    सहसा घर के अन्दर से किसी के कर्कश शब्द कान में आये, फिर लौंगो का रोना सुनायी दिया । चक्रधर ने पूछा- यह तो लौंगी रो रही है ? मनोरमा-जी हॉ ! आपसे तो भाई साहब से भेंट नहीं हुई। गुरुसेवकसिह नाम है। कई महीनो से देहात में जमीदारी का काम करते हैं। हैं तो मेरे सगे भाई और पढ़े-लिखे भी खब है। लेकिन भलमनसी छ भी नहीं गयी। जब पाते है. लौंगी अम्मा से झूठ-मूठ तकरार करते हैं । न जाने उसमे इन्हें क्या अदावत है।

    इतने में गुरुसेवकसिह लाल-लाल आँखें किये निकल पाये और मनोरमा से बोले-बाबूजी कहाँ गये हैं ? तुझे मालूम है कब तक पायेंगे ? मैं ग्राज ही फैसला कर लेना चाहता हूँ।

    गुरुसेवेकसिंह की उम्र २५ वर्ष से अधिक न थी। लम्वे, छरहरे एवं रूपवान् थे, आँखों पर ऐनक थी, मुंह में पान का बीड़ा, देह पर तनजेब का कुरता, माँग निकली हुई । बहुत शौकीन आदमी थे ।

    चक्रधर को बैठे देखकर वह कुछ झिझके और अन्दर लौटना ही चाहते थे कि लौंगो रोती हुई याकर चक्रधर के पास खड़ी हो गया और बोली-बाबूजी, इन्हें सम-झाइए कि में अब बुढ़ापे मे कहाँ जाऊँ ? इतनी उम्र तो इस घर में कटी, अब किसके द्वार पर जाऊँ ? जहाँ इतने नौकरों-चाकरो के लिए खाने को रोटियाँ हैं, क्या वहाँ मेरे लिए एक टुकड़ा भी नहीं ? बाबूजी, सच कहती हूँ, मैंने इन्हें अपना दूध पिलाकर पाला है: मालकिन के दूध न होता था, और अब यह मुझे घर से निकालने पर तुले हुए हैं। गुरुसेवकसिंह की इच्छा तो न थी कि चक्रधर से इस कलह के सम्बन्ध में कुछ कहें। लेकिन जब लौगी ने उन्हें पंच बनाने में सकोच न किया, तो वह भी खुल पड़े। बोले-महाशय, इससे यह पूछिए कि पात्र यह बुढ़िया हुई, इसके मरने के दिन आये, क्यों नहीं किसी तीर्थस्थान में जाकर अपने कलुधित जीवन के बचे हुए दिन काटती ? मैंने दादाजी से कहा था कि इसे वृन्दावन पहुँचा दीजिए, और वह तैयार भी हो गये थे, पर इसने सैकड़ों बहाने किये और वहाँ न गयी । आपसे तो अब कोई परदा नहीं है, इसके कारण मैने यहाँ रहना छोड़ दिया। इसके साथ इस घर में रहते हुए मुझे लजायाती है। इसे इसकी जरा भी परवाह नहीं कि जो लोग सुनते होंगे, तो दिल मे क्या कहते होंगे। हमे कही मुँह दिखाने की जगह नहीं रही। मनोरमा अव सयानी हुई। उसका विवाह करना है या नहीं। इसके घर में रहते हुए हम किस भले यादमी के द्वार पर ना सकते हैं। मगर इसे इन बातों की बिलकुल चिन्ता नही । वस मरते दम तक घर को स्वामिनी बनी रहना चाहती है। दादाजी भी सठिया गये हैं, उन्हें मानापमान की जरा भी फिक्र नहीं । इसने उनपर न जाने क्या मोहिनी डाल दी है कि इसके पीछे मुझमे लड़ने पर तैयार रहते हैं। श्राज मैं निश्चय करके पाया हूँ कि इसे घर के बाहर निकारकर ही छोडूंगा । या तो यह किसी दूसरे मकान में रहे, या किसी तीर्थ स्थान को प्रस्थान करे। लौगी-तो बच्चा सुनो, जब तक मालिक जीता है, लोंगी इसी घर में रहेगी भार इसी तरह रहेगी। जब वह न रहेगा, तो जो कुछ सिर पर पड़ेगी, झेल लॅगी । जो तुम चाहो कि लोगी गली गली ठोकरें खाये, तो यह न होगा ! मै लौडी नहीं हूँ कि घर से बाहर जाकर रहूँ। तुम्हें यह कहते लजा नहीं श्राती? चार भाँवरें फिर जाने से ही व्याइ नहीं हो जाता । मैंने अपने मालिक की जितनी सेवा की है और करने को तैयार हूँ, उतनी कौन ब्याहता करेगी ? लाये तो हो बहू, कभी उठकर एक लुटिया पानी भी देती है ? खायी है कभी उसकी बनायो हुई कोई चीन ? नाम से कोई व्याहता नहीं होती, सेवा और प्रेम से होती है।

    गुरुसेवक-यह तो मैं जानता हूँ कि तुझे बातें बहुत करनी अाती हैं, पर अपने मुंह से जो चाहे बने, मैं तुझे लौंडो ही समझता हूँ।

    लौंगी-तुम्हारे समझने से क्या होता है, अभी तो मेरा मालिक जीता है। भगवान्ठ से अमर करें ! जब तक जीती हूँ, इसी तरह रहूँगी, चाहे तुम्हें अच्छा लगे या बुरा । निसने जवानी में बाँह पकड़ी, वह क्या अब छोड़ देगा? भगवान् को कौन मुँह दिखायेगा?

    यह कहती हुई लौंगी घर में चली गयी। मनोरमा चुपचाप सिर मुकाये दोनों को चातें सुन रही थी। उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था । मातृ स्नेह का जो कुछ सुख उसे मिला था, लौंगी ही से मिला था। उसकी माता तो उसे गोद में छोड़कर परलोक सिधारी थी। उस एहसान को वह कभी न भूल सकती थी। अब भी लौंगी उसपर प्राण देती थी। इसलिए गुरुसेवकसिंह की यह निर्दयता उसे बहुत बुरी मालूम होती थी।

    लौंगी के जाते ही गुरुसेवकसिंह बड़े शान्त भाव से एक कुरसी पर बैठ गये और चक्रघर से बोले-महाशय, आपसे मिलने की इच्छा हो रही थी और इस समय मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी था। आपने श्रागरे को समस्या जिस बुद्धिमानी से हल की उसकी जितनी प्रशसा की जाय, कम है।

    चक्रधर-वह तो मेरा कर्तव्य ही था ?

    गुरुसेवक-इसीलिए कि श्रापके कर्तव्य का अादर्श बहुत ऊँचा है। १०० में ६६ श्रादमी तो ऐसे अवसर पर लड़ माना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। मुश्किल से एक आदमी ऐसा निकलता है, जो धैर्य से काम ले । शान्ति के लिए आत्म-समर्पण करनेवाला तो लाख-दो-लाख में एक होता है। श्राप विलक्षण धैर्य और साहस के मनुष्य हैं । मैंने भी अपने इलाके में कुछ लड़कों का खेल-सा कर रखा है, वहाँ पठानों के कई बड़े-बड़े गाँव हैं, उन्हों से मिले हुए ठाकुरों के भी कई गाँव हैं। पहले पठानों और ठाकुरों में इतना मेल था कि शादी-गमी, तील त्योहार में एक दूसरे के साथ शरीक होते थे, लेकिन अब तो यह हाल है कि कोई त्योहार ऐसा नहीं जाता, जिसमें खून-खच्चर या कम से कम मार पीट न हो । श्राप अगर दो-एक दिन के लिए वहाँ चले तो श्रापस में बहुत कुछ सफाई हो जाय ! मुसलमानों ने अपने पत्रों में श्रापका जिक देखा है और शौक से श्रापका स्वागत करेंगे । अापके उपदेशों का बहुत कुछ असर पड़ सकता है।

    चक्रधर-बातों में असर डालना तो ईश्वर की इच्छा के अधीन है। हॉ, मैं श्रापके साथ चलने को तैयार हूँ। मुझसे जो सेवा हो सकेगी, वह उठा न रखूगा | कन चलने का इरादा है ? गुरुसेवक-चलता तो इसी गाडी से, लेकिन मै इस कुलटा को अबकी निकाल बाहर किये वगैर नहीं जाना चाहता। दादाजी ने रोक-टोक की, तो मनोरमा को लेता जाऊँगा और फिर इस घर में कदम न रखेगा। सोचिए तो, कितनी बड़ी बदनामी है।

    चक्रधर बड़े संकट में पड़ गये। विरोध की कटुता को मिटाने के लिए मुस्कराते हुए बोले-मेरे और आपके सामाजिक विचारों में बड़ा अन्तर है। मैं बिल्कुल भ्रष्ट हो गया हूँ।

    गुरुसेवक-क्या आप लौंगी का यहाँ रहना अनुचित नहीं समझते ?

    चक्रधर-जी नहीं, खानदान की बदनामी अवश्य है; लेकिन मैं बदनामी के भय से अन्याय करने की सलाह नहीं दे सकता । क्षमा कीजिएगा, मैं बड़ी निर्भीकता से अपना मत प्रकट कर रहा हूँ।

    गुरुसेवक-नहीं, नहीं: मैं बुरा नहीं मान रहा हूँ। (मुस्कराकर ) इतना उजड्ड नहीं हूँ कि किसी मित्र की सच्ची राय न सुन सकू। अगर श्राप मुझे समझा दें कि उसका यहाँ रहना उचित है, तो मैं श्रापका बहुत अनुगृहीत हूँगा । मैं खुद नहीं चाहता कि मेरे हाथों किसी को अकारण कष्ट पहुँचे ।

    चक्रघर-जब किती पुरुष का एक स्त्री के साथ पति-पत्नी का-सा सम्बन्ध हो जाय, तो पुरुष का धर्म है कि जब तक स्त्री की ओर से कोई विरुद्ध प्राचरण न देखे, उस सम्बन्ध को निबाहे।

    गुरुसेवक-चाहे स्त्री कितनी ही नीच जाति की हो ?

    चक्रधर-हाँ, चाहे किसी भी जाति की हो ।

    मनोरमा यह जवाब सुनकर गर्व से फूल उठी । वह आवेश में उठ खड़ी हुई और पुलकित होकर खिड़की के बाहर झॉकने लगी। गुरुसेवकसिंह वहाँ न होते, तो वह जरूर कह उठती-आप मेरे मुँह से बात ले गये।

    एकाएक फिटन को श्रावाज आयी और ठाकुर साहब उतरकर अन्दर गये । गुरु- सेवकसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले । वह डर रहे थे कि लौंगी अवसर पाकर कहीं उनके कान न भर दे।

    जब वह चले गये, तो मनोरमा बोली-आपने मेरे मन की बात कही। बहुत सी बातों में मेरे विचार आपके विचारों से मिलते हैं।

    चक्रधर-उन्हें बुरा तो जरूर लगा होगा!

    मनोरमा-वह फिर वापसे बहस करने आते होंगे। अगर श्राज मौका न मिलेगा तो कल करेंगे । अबको वह शास्त्रों के प्रमाण पेश करेंगे, देख लीजिएगा!

    चक्रधर-खैर, यह तो बताओ कि तुमने इन चार-पाँच दिनों में क्या काम किया !

    मनोरमा-मैंने तो किताब तक नहीं खोली। वस, समाचार पढ़ती थी और वही चात सोचती थी । आप नहीं रहते, तो मेरा किसी काम में जो नहीं लगता। आप श्रन कमी बाहर न जाइएगा। चक्रधर ने मनोरमा की पोर देखा, तो उसकी श्रॉखें सजल हो गयी थी। सोचने लगे-बालिका का हृदय कितना सरल, कितना उदार, कितना के मल और कितना भावमय है!

    ८

    जगदीशपुर की रानी देवप्रिया का जीवन केवल दो शब्दो में समाप्त हो जाता था-विनोद और विलास । इस वृद्धावस्था में भी उनकी विलास-वृत्ति अणुमात्र भी कम न हुई थी। हमारी कर्मेन्द्रियाँ भले ही जर्जर हो जाये, चेप्टाएँ तो वृद्ध नहीं होती ! कहते हैं, बुढ़ापा मरी हुई अभिलाषायो की समाधि है, या पुराने पापो का पश्चात्ताप, पर रानी देवप्रिया का बुढापा अतृप्त तृष्णा थी और अपूर्ण विलासाराधना । वह दान पुण्य बहुत करती थी; साल मे दो चार यज्ञ भी कर लिया करती थी, साधु-सन्तों पर उनकी असीम श्रद्धा थी और इस धर्मनिष्ठा में उनका ऐहिक स्वार्थ छिपा होता था। परलोक की उन्हें कभी भूलकर भी याद न श्राती थी। वह भूल गई थीं कि इस जीवन के बाद भी कुछ है। उनके दान और स्नान का मुख्य उद्देश्य था-शारीरिक विकारों से निवृत्ति, विलास में रत रहने की परम योग्यता । यदि वह किसी देवता को प्रसन्न कर सकतीं, तो कदाचित् उससे यही वरदान माँगती कि वह कभी बूढ़ी न हो। इस पूजा और व्रत के सिवा वह इस महान् उद्देश्य को पूरा करने के लिए भाँति भाँति के रसों और पुष्टिकारक औषधियों का सेवन करती रहती थी। झुर्रियाँ मिटाने और रग को चमकाने के लिए भी कितने ही प्रकार के पाउडरों, उपटनों और तेलों से काम लिया जाता था । वृद्धावस्था उनके लिए नरक से कम भयङ्कर न थी। चिन्ता को तो वह अपने पास न फटकने देती थी। रियासत उनके भोग विलास का साधन मात्र यी। प्रजा को क्या कष्ट होता है, उनपर कैसे-कैसे अत्याचार होते हैं, सूखे झूरे की विपत्ति क्योकर उनका सर्वनाश कर देती है, इन बातों की ओर कभी उनका ध्यान न जाता था। उन्हें जिस समय जितने धन की जरूरत हो, उतना तुरन्त देना मैनेजर का काम था । वह ऋण लेकर दे, चोरी करे, या प्रजा का गला काटे, इससे उन्हें कोई प्रयोजन न था।

    यों तो रानी साहब को हरएक प्रकार के विनोद से समान प्रेम था। चाहे वह थिएटर हो, या पहलवानों का दगल, या अँगरेजी नाच, पर उनके जीवन की सबसे अानन्दमय घड़ियाँ वे होती थीं, जब वह युवकों और युवतियों के साथ प्रेम-क्रीड़ा करती थीं। इस मण्डली में बैठकर उन्हें श्रात्म प्रवचना का सबसे अच्छा अवसर मिलता था । वह भूल जाती थीं कि मेरा यौवन काल बीत चुका है। अपने बुझे हुए यौवन दीपक को युवा की प्रज्ज्वलित स्फूति से जलाना चाहती थीं, किन्तु इस धुन में वह कितने ही अन्य विलासान्ध प्राणियों की भाँति नीचो को मुंह न लगाती थीं। काशी प्रानेवाले राजकुमारों और रानकुमारियो ही से उनका सहवास रहता था। आनेवालों की कमी न यो । एक न-एक हमेशा ही अाता रहता था । रानी की अतिथि-शाला हमेशा श्राबाद रहती थी। उन्हें युवकों की आँखों में खुब जने की सनक-सी थी। वह चाहती थीं कि मेरे सौन्दर्य-दीपक पर युवक पतंगे की भाँति श्राकर गिरें । उनकी रसमयी कल्पना प्रेम के आघात-प्रत्याघात से एक विशेष स्फूर्ति का अनुभव करती थी।

    एक दिन ठाकुर हरिसेवकसिंह मनोरमा को रानी साहब के पास ले गये । रानी उसे देखकर मोहित हो गयीं। तबसे दिन में एक बार उससे जरूर मिलती। वह किसी कारण से न पाती तो उसे बुला भेजती । उसका मधुर गाना सुनकर वह मुग्ध हो जाती थी। हरिसेवक सिह का उद्देश्य कदाचित् यही था कि वहाँ मनोरमा को रईसो और राज-कुमारों को श्राकर्षित करने का मौका मिलेगा।

    भदों की अँधेरी रात थी । मूसलाधार वर्षा हो रही थी। रानी साहब को ग्रान कुछ ज्वर था, चेष्टा गिरी हुई थी, सिर उठाने को जी न चाहता था, पर पड़े रहने का अव-सर न था । हर्पपुर के राजकुमार को आज उन्होंने निमन्त्रित किया था। उनके आदर- सत्कार का काम करना जरूरी था। उनके सहवास के सुख से वह अग्ने को वचित न कर सकती थीं। उनके आने का समय भी निकट था। रानी ने बड़ी मुश्किल से उठकर पाइने में अपनी सूरत देखी। उनके हृदय पर आघात-सा हुआ । मुख प्रभात-चन्द्र की भॉति मन्द हो रहा था।

    रानी ने सोचा-अभी राजकुमार आते होंगे । क्या मैं उनसे इसी दशा मे मिलूँगी ? ससार में क्या कोई ऐसी सञ्जीवनी नहीं है, जो काल के कुटिल चिह्न को मिटा दे ? ऐसी वस्तु कहीं मिल जाती, तो मे अपना सारा राज्य वेचकर उसे ले लेती। जब भोगने की सामर्थ्य ही न हो, तो राज्य से और सुख ही क्या ! हा निर्दयी काल ! तूने मेरा कोई प्रयत्न सफल न होने दिया।

    राजकुमार अब अाते होंगे, मुझे तैयार हो जाना चाहिए । ज्वर है, कोई परवा नहीं। मालूम नहीं, जीवन में फिर ऐसा अवसर मिले या न मिले।

    सामने मेज पर एक अलबम रखा था। रानी ने राजकुमार का चित्र निकालकर देखा । कितना सहास मुख था, कितना तपस्वी स्वरूप, कितनी सुधामयी छवि !

    रानी एक अारामकुरसी पर लेटकर सोचने लगी-यह चित्र न जाने क्यों मेरे चित्त को इतने जोर से खींच रहा है। मेरा चित्त कभी इतना चंचल न हुआ था । इसी अल-चम में और भी कई चित्र हैं, जो इससे कहीं सुन्दर हैं, लेकिन उन नवयुवकों को मैंने कठपुतलियों की तरह नचाकर छोड़ा। यह एक ऐसा चित्र है, जो मेरे हृदय में भूली हुई बातों को याद दिला रहा है, जिसके सामने ताकते हुए मुझे लज्जा-मी अाती है !

    रानी ने घड़ी की ओर अातुर नेत्रों से देखा । ६ वन रहे थे । अब वह लेटी न रह सको सँभलकर उठी; अालमारी में से एक शीशी निकाली। उसमें से कई वू दे एक प्याली में डाली और आँखें बन्द करके पी गयी । इसका चमत्कारिक अगर हुया, मानो कोई कुम्हलाया हुआ फूल ताजा हो जाय; कोई सूखी पत्ती हरी हो जाय । उनके मुख-मण्डल पर अामा दौड़ गयी। आँखों में चंचल सजीवता का विकास हो गया, शरीर में नये रक्त का प्रवाह-सा होने लगा। उन्होंने फिर आईने की ओर देखा और उनके अधरों पर एक मृदुल हास्य की झलक दिखाई दी। उनके उठने की अाहट पाकर लौंडी कमरे में आकर खड़ी हो गयी । यह उनकी नाइन थी। गुजराती नाम था।

    रानी-समय बहुत थोड़ा है, जल्दी कर ।

    गुजराती-रानियों को कैसी जल्दी | जिसे मिलना होगा, वह स्वय पायेगा और बैठा रहेगा।

    रानी-महीं, आज ऐसा ही अवसर है।

    नाइन बड़ी निपुण थी, तुरन्त शृगारदान खोलकर बैठ गयी और रानी का शृगार करने लगी, मानों कोई चित्रकार तसवीर में रंग भर रहा हो । बाघ घटा भी न गुजरा था कि उसने रानी के केश गुथकर नागिन की सी लटें डाल दी । कपोलों पर एक ऐसा रंग भरा कि झुरियाँ गायब हो गयी और मुख पर मनोहर आभा झलकने लगी। ऐसा मालूम होने लगा, मानो कोई सुन्दरी युवती सोकर उठी है। वही अलसाया हुश्रा अग था, वही मतवाली आँखें । रानी ने आईने को श्रोर देखा और प्रसन्न होकर बोलीं— गुजराती, तेरे हाथ में कोई जादू है। मै तुझे अपने साथ स्वर्ग में ले चलूँगी । वहाँ तो देवता लोग होंगे, तेरी मदद की और भी जरूरत होगी।

    गुजराती-आप कमी इनाम तो देती नहीं। बस, बखान करके रह जाती है !

    रानी-अच्छा, बता क्या लेगी ?

    गुजराती-मै लुंगी, तो वही लूँगी, जो कई बार माँग चुकी हूँ। रुपए-पैसे लेकर मुझे क्या करना है!

    यह एक दीवारगीर पर रखी हुई मदन की छोटो-सी मूर्ति थी। चतुर मूर्तिकार ने इस पर कुछ ऐसी कारीगरी की थी जिससे कि दिन के साथ उसका भी रंग बदलता रहता था।

    गुजराती-अच्छा, तो न दीजिए, लेकिन फिर मुझसे कभी न पूछिएगा कि क्या लेगी?

    रानी-क्या मुझसे नाराज हो गयी ? (चौंककर) वह रोशनी दिखायी दी | कुवर साहब श्रा गये ! मैं झूला-घर में जाती हूँ। वहीं लाना।

    यह कहकर रानी ने फिर वही शीशी निकाली और दुगुनी मात्रा में दवा पीकर झूला घर की ओर चलीं। यह एक विशाल भवन था, बहुत ऊँचा और इतना लम्बा-चौड़ा कि झूले पर बैठकर खूब पैग ली जा सकती थी। रेशम को डोरियों में पड़ा हुआ एक पटरा छत से लटक रहा था पर चित्रकारो ने ऐसी कारीगरी की थी कि मालूम होता था, किसी वृक्ष को डाल में पड़ा हुआ है। पौधों, झाड़ियों और लताओं ने उसे यमुना तट का कुब्ज-सा बना दिया था। कई हिरन और मोर इधर-उधर विचरा करते थे। रात का उस भवन में पहुँचकर सहसा यह ज्ञान न होता था कि यह कोई भवन है। पानी का रिमझिम बरसना, ऊपर से हल्की-हल्की फुहारों का पड़ना, हौल में जल यक्षियों का क्रीड़ा करना~यह सब किसी उपवन की शोभा दरसाता था। रानी झूले की डोरी पकड़कर खड़ी हो गयीं और एक हिरन के बच्चे को बुलाकर उसका मुंह सहलाने लगीं। सहसा कदमों की आहट हुई। रानी मेहमान का स्वागत करने के लिए द्वार पर आयीं पर यह राजकुमार न थे, मनोरमा थी। रानी को कुछ निराशा तो हुई; किन्तु मनोरमा भी आज के अभिनय की पात्री थी। उन्होंने उसे बुलवा भेजा था।

  • कर्मभूमि

    कर्मभूमि

    Aproximadamente 214.968 palavras.

    कर्मभूमि
    https://hi.wikisource.org/wiki/कर्मभूमि

    १

    हमारे स्कूलों और कालेजों में जिस तत्परता से फ़ीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फ़ीस का दाख़िल होना अनिवार्य है। या तो फ़ीस दीजिए, या नाम कटाइए; या जब तक फ़ीस न दाखिल हो, रोज कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं कहीं ऐसा भी नियम है, कि उस दिन फ़ीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख को दुगुनी फ़ीस न दो, तो नाम कट जाता है। काशी के क्वींस कालेज में यही नियम था। ७वीं तारीख को फ़ीस न दो, तो २१वीं तारीख को दुगुनी फ़ीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जायँ। वह हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रिआयत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ; कर्ज लो, गहने गिरो रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फ़ीस जरूर दो, नहीं दूनी फ़ीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रिआयत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता। वहाँ स्थायी रूप से मार्शल-लॉ का व्यवहार होता है। कचहरियों में पैसे का राज है, उससे कहीं कठोर, कहीं निर्दय यह राज है। देर में आइए तो जुर्माना, न आइए तो जुर्माना, सबक न याद हो तो जुर्माना, किताबें न खरीद सकिये तो जुर्माना, कोई अपराध हो जाए तो जुर्माना, शिक्षालय क्या है जुर्मानालय है। यही हमारी पश्चिमी शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफ़ों के पूल बाँधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों से पैसे पर जान देनेवाले, पैसे के लिए ग़रीबों का गला काटनेवाले, पैसे के लिए अपनी आत्मा को बेच देनेवाले छात्र निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या है?

    आज वही वसूली की तारीख है। अध्यापकों की मेजों पर रुपयों के ढेर लगे हैं। चारों तरफ़ खनाखन की आवाजें आ रही हैं। सराफ़े में भी रुपये की ऐसी झंकार कम सुनाई देती है। हरेक मास्टर तहसील का चपरासी बना बैठा हुआ है। जिस लड़के का नाम पुकारा जाता है, वह अध्यापक के सामने जाता है, फ़ीस देता है और अपनी जगह पर आ बैठता है। मार्च का महीना है। इसी महीने में एप्रिल, मई और जून की फ़ीस वसूल की जा रही है। इम्तहान की फ़ीस भी ली जा रही है। दसवें दर्जे में तो एक-एक लड़के को ४०) देने पड़ रहे हैं।

    अध्यापक ने बीसवें लड़के का नाम पुकारा—अमरकान्त!

    अमरकान्त ग़ैरहाजिर था।

    अध्यापक ने पूछा—क्या आज अमरकान्त नहीं आया?

    एक लड़के ने कहा—आये तो थे, शायद बाहर चले गये हों?

    'क्या फ़ीस नहीं लाया है?'

    किसी लड़के ने जवाब नहीं दिया।

    अध्यापक की मुद्रा पर खेद की रेखा झलक पड़ी। अमरकान्त अच्छे लड़कों में था। बोले—शायद फ़ीस लाने गया होगा। इस घण्टे में न आया, तो दूनी फ़ीस देनी पड़ेगी। मेरा क्या अख्तियार है। दूसरा लड़का चले—गोवर्धनलाल!

    सहसा एक लड़के ने पूछा—अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं बाहर जाकर देखूँ।

    अध्यापक ने मुस्कराकर कहा—घर की याद आई होगी। खैर, जाओ, मगर दस मिनट के अंदर आ जाना। लड़कों को बुला-बुलाकर फ़ीस लेना मेरा काम नहीं है।

    लड़के ने नम्रता से कहा—अभी आता हूँ। क़सम ले लीजिए, जो हाते के बाहर जाऊँ।

    यह इस कक्षा के संपन्न लड़कों में था, बड़ा खिलाड़ी, बड़ा बैठकबाज। हाजिरी देकर गायब हो जाता, तो शाम की खबर लाता। हर महीने फीस की दूनी रकम जुर्माना दिया करता था। गोरे रंग का, लांबा, छरहरा, शौक़ीन युवक था जिसके प्राण खेल में बसते थे। नाम था मोहम्मद सलीम।

    सलीम और अमरकान्त दोनों पास-पास बैठते थे। सलीम को हिसाब लगाने में, तर्जुमा करने में अमरकान्त से विशेष सहायता मिलती थी। उसकी कापी से नक़ल कर लिया करता था। इससे दोनों में दोस्ती हो गई थी। सलीम कवि था। अमरकान्त उसकी ग़ज़लें बड़े चाव से सुना करता था। मैत्री का यह एक और कारण था।

    सलीम ने बाहर जाकर इधर-उधर निगाह दौड़ाई, अमरकान्त का कहीं पता न था। जरा और आगे बढ़े, तो देखा, वह एक वृक्ष की आड़ में खड़ा है। पुकारा—अमरकान्त! ओ बुद्धूलाल! चलो फ़ीस जमा करो, पण्डितजी बिगड़ रहे हैं।

    अमरकान्त ने अचकन के दामन से आँखें पोंछ लीं, और सलीम की तरफ़ आता हुआ बोला——क्या मेरा नम्बर आ गया?

    सलीम ने उसके मुँह की तरफ़ देखा, तो आँखें लाल थीं। वह अपने जीवन में शायद ही कभी रोया हो। चौंककर बोला——अरे, तुम तो रो रहे हो! क्या बात है?

    अमरकान्त साँवले रंग का, छोटा-सा दुबला-पतला कुमार था। अवस्था बीस की हो गई थी; पर अभी मसें भी न भीगी थीं। चौदह-पंद्रह साल का किशोर-सा लगता था। उसके मुख पर एक वेदनामय दृढ़ता, जो निराशा से बहुत कुछ मिलती-जुलती थी, अंकित हो रही थी, मानो संसार में उसका कोई नहीं है। इसके साथ ही उसकी मुद्रा पर कुछ ऐसी प्रतिभा, कुछ ऐसी मनस्विता थी, कि एक बार उसे देखकर फिर भूल जाना कठिन था।

    उसने मुस्कराकर कहा—कुछ नहीं जी, रोता कौन है!

    'आप रोते हैं, और कौन रोता है। सच बताओ क्या हुआ है?'

    अमरकान्त की आँखें फिर भर आयीं। लाख यत्न करने पर भी आँसू न रूक सके। सलीम समझ गया। उसका हाथ पकड़कर बोला—क्या फ़ीस के लिए रो रहे हो? भले आदमी, मुझसे क्यों न कह दिया। तुम मुझे भी ग़ैर समझते हो? क़सम खुदा की, बड़े नालायक आदमी हो तुम। ऐसे आदमी को गोली मार देनी चाहिए! दोस्त से भी ग़ैरियत! चलो क्लास में, मैं फ़ीस दिए देता हूँ; जरा-सी बात के लिए घण्टे भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता!

    अमरकान्त को तसल्ली तो हुई; पर अनुग्रह के बोझ से उसकी गर्दन दब गयी। बोला——पण्डितजी आज मान न जायेंगे?

    सलीम ने खट्टे होकर कहा——पण्डितजी के बस की बात थोड़े ही है, यह सरकारी क़ायदा है, मगर हो तुम बड़े शैतान, वह तो खैरियत हो गयी, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खूब इम्तहान देते! देखो, आज एक ताज़ा ग़ज़ल कही है। पीठ सहला देना——

    आपको मेरी वफ़ा याद आई,

    खै़र है आज यह क्या याद आई।

    अमरकान्त का व्यथित चित्त इस समय ग़ज़ल सुनने को तैयार न था; पर सुने बगैर काम भी तो नहीं चल सकता। बोला——नाज़ुक चीज़ है। खूब कहा है। मैं तुम्हारी ज़बान की सफ़ाई पर जान देता हूँ।

    सलीम यही तो ख़ास बात है भाई साहब! लफ्ज़ों की झंकार का नाम ग़ज़ल नहीं है। दूसरा शेर सुनो——

    फिर मेरे सीने में एक हूक उठी,

    फिर मुझे तेरी अदा याद आई

    अमरकान्त ने फिर तारीफ़ की——लाजवाब चीज़ है। कैसे तुम्हें ऐसे शेर सूझ जाते हैं?

    सलीम हँसा——उसी तरह, जैसे तुम्हें हिसाब और मजमन सूझ जाते हैं। जैसे ऐसोसियेशन में स्पीचें दे लेते हो। आओ पान खाते चलें।

    दोनों दोस्तों ने पान खाये और स्कूल की तरफ़ चले। अमरकान्त ने कहा——पण्डितजी बड़ी डांट बतायेंगे।

    'फीस ही तो लेंगे!'

    'और जो पूछें, अब तक कहाँ थे?'

    'कह देना, फ़ीस लाना भूल गया था।'

    'मुझसे तो न कहते बनेगा। मैं साफ़-साफ़ कह दूँगा।'

    'तो तुम पिटोगे भी मेरे हाथ से!"

    संध्या समय जब छुट्टी हुई और दोनों मित्र घर चले, तो अमरकान्त ने कहा——तुमने आज मुझ पर जो एहसान किया है……

    सलीम ने उसके मुँह पर हाथ रखकर कहा——बस खबरदार, जो मुँह से एक आवाज भी निकाली। कभी भूलकर भी इसका जिक्र न करना।

    'आज जलसे में आओगे?'

    'मजमून क्या है, मुझे तो याद नहीं।'

    'अजी वही पश्चिमी सभ्यता है।'

    'तो मुझे दो चार पाइंट बता दो, नहीं मैं वहां कहूँगा क्या ?"

    'बताना क्या है। पश्चिमी सभ्यता की बुराइयाँ हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।'

    'तुम जानते होगे, मुझे तो एक भी नहीं मालूम।'

    'एक तो यह तालीम ही है। जहाँ देखो वहीं दुकानदारी। अदालत की दुकान, इल्म की दुकान, सेहत की दुकान, इस एक पाइन्ट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है।'

    'अच्छी बात है, आऊँगा।'

    चौथा भाग

    १

    अमरकान्त को ज्यों ही मालूम हुआ कि सलीम यहाँ का अफ़सर होकर आया है, वह उससे मिलने चला। समझा, खूब गप-शप होगी। यह खयाल तो आया, कहीं उसमें अफ़सरी की बू न आ गयी हो; लेकिन पुराने दोस्त से मिलने की उत्कण्ठा को न रोक सका। बीस-पच्चीस मील का पहाड़ी रास्ता था। ठण्ड खूब पड़ने लगी थी। आकाश कुहरे की धुन्ध से मटियाला हो रहा था और उस धुन्ध में सूर्य जैसे टटोल-टटोलकर रास्ता ढूँढता हुआ चला जाता था। कभी सामने आ जाता कभी छिप जाता। अमर दोपहर के बाद चला था। उसे आशा थी, दिन रहते पहुँच जाऊँगा; किन्तु दिन ढलता जाता था और मालूम नहीं, अभी और कितना रास्ता बाकी है। उसके पास केवल एक देशी कम्बल था। कहीं रात हो गई तो किसी वृक्ष के नीचे टिकना पड़ जायगा। देखते ही देखते सूर्यदेव अस्त भी हो गये। अँधेरा जैसे मुँह खोले संसार को निगलने चला आ रहा था। अमर ने कदम और तेज़ किये। शहर में दाखिल हुआ, तो आठ बज गये थे।

    सलीम उसी वक्त क्लब से लौटा था। खबर पाते ही बाहर निकल आया। अमर ने उसकी सज-धज देखी, तो झिझका और गले मिलने के बदले हाथ बढ़ा दिया। अरदली सामने ही खड़ा था। उसके सामने इस देहाती से किसी प्रकार की घनिष्ठता का परिचय देना बड़े साहस का काम था। उसे अपने सजे हुए कमरे में भी न ले जा सका। अहाते में छोटा-सा बाग था। एक वृक्ष के नीचे उसे ले जाकर उसने कहा–यह तुमने क्या धज बना रखी है जी, इतने हूश कबसे हो गये? वाह रे आपका कुर्ता! मालूम होता है, डाक का थैला है, और यह डाबलूश जूता किस दिसावर से मंगवाया है? मुझे डर है, कहीं बेगार में न धर लिये जाओ! अमर वहीं जमीन पर बैठ गया और बोला—कुछ खातिर-तवाज़ा तो की नहीं, उलटे और फटकार सुनाने लगे। देहातियों में रहता हूँ, जेंटलमेन बनूं तो कैसे निबाह हो। तुम खूब आये भाई, कभी-कभी गप-शप हुआ करेगी। उधर की खैरआफ़ियत कहो। यह तमने नौकरी क्या कर ली। डटकर कोई रोजगार करते, सूझी भी तो गुलामी।

    सलीम ने गर्व से कहा—गुलामी नहीं है जनाब, हुकूमत है। दस-पाँच दिन में मोटर आयी जाती है, फिर देखना किस शान से निकलता हूँ। मगर तुम्हारी यह हालत देखकर दिल टूट गया। तुम्हें यह भेस छोड़ना पड़ेगा।

    अमर के आत्म-सम्मान को चोट लगी। बोला—मेरा खयाल था, और है, कि कपड़े महज़ जिस्म की हिफाजत के लिए है, शान दिखाने के लिए नहीं।

    सलीम ने सोचा, कितनी लचर-सी बात है। देहातियों के साथ रहकर अक्ल भी खो बैठा। बोला—खाना भी तो महज़ जिस्म की परवरिश के लिए खाया जाता है, तो सूखे चने क्यों नहीं चबाते? सूखे गेहूँ क्यों नहीं फांकते? क्यों हलवा और मिठाई उड़ाते हो?

    'सूखे चने ही चबाता हूँ!'

    'झूठे हो। सूखे चने पर ही यह सीना निकल आया है। मुझसे डयोढ़े हो गये, मैं तो शायद पहचान भी न सकता।

    'जी हाँ, यह सूखे चनों ही की करामात है। ताकत साफ़ हवा और संयम में है। हलवा-पूरी से ताकत नहीं होती, सीना नहीं निकलता, पेट निकल आता है। २५ मील पैदल चला आ रहा हूँ। है दम? जरा पाँच ही मील चलो मेरे साथ।

    'मुआफ कीजिए। किसी ने कहा है—बड़ी रानी, तो आओ पीसो मेरे साथ। तुम्हें पीसना मुबारक हो। तुम यहाँ कर क्या रहे हो?'

    'अब तो आये हो, खुद ही देख लोगे। मैंने जिन्दगी का जो नकशा दिल में खींचा था, उसी पर अमल कर रहा हूँ। स्वामी आत्मानन्द के आ जाने से काम में और भी सहूलियत हो गयी है।'

    ठण्ड ज्यादा थी। सलीम को मजबूर होकर अमरकान्त को अपने कमरे में लाना पड़ा। अमर ने देखा, कमरे में गद्देदार कोच हैं, पीतल के गमले हैं, जमीन पर कालीन है, मध्य में संगमरमर की गोल मेज है।

    अमर ने दरवाजे पर जूते उतार दिये और बोला—केवाड़ बन्द कर दूं, नहीं कोई देख ले, तो तुम्हें शर्मिन्दा होना पड़े। तुम साहब ठहरे।

    सलीम पते की बात सुनकर झेंप गया। बोला—कुछ-न-कुछ खयाल तो होता ही है भई, हालांकि मैं फैशन का गुलाम नहीं हूँ। मैं भी सादी जिन्दगी बसर करना चाहता था; लेकिन अब्बाजान की फरमाइश कैसे टालता। प्रिंसिपल तक कहते थे, तुम पास नहीं हो सकते, लेकिन रिजल्ट निकला तो सब दंग रह गये। तुम्हारे ही खयाल से मैंने यह जिला पसन्द किया। कल तुम्हें कलक्टर से मिलाऊँगा। अभी मि० गजनवी से तो तुम्हारी मुलाकात न होगी। बड़ा शौकीन आदमी है। मगर दिल का साफ़। पहली ही मुलाकात में उससे मेरी बेतकल्लुफ़ी हो गयी। चालीस के करीब होंगे, मगर कम्पेबाजी नहीं छोड़ी।

    अमर के विचार में अफसरों को सच्चरित्र होना चाहिये था। सलीम सच्चरित्रता का कायल न था। दोनों मित्रों में बहस हो गयी।

    सलीम ने कहा—खुश्क आदमी कभी अच्छा अफ़सर नहीं हो सकता।

    अमर बोला—सच्चरित्र होने के लिए खुश्क होना जरूरी नहीं।

    'मैंने तो मुल्लाओं को हमेशा खुश्क ही देखा। अफसरों के लिए महज कानून की पाबन्दी काफ़ो नहीं। मेरे खयाल में तो थोड़ी-सी कमजोरी इन्सान का जेवर है। मैं जिन्दगी में तुमसे ज्यादा कामयाब रहा। मुझे दावा है कि मुझसे कोई नाराज नहीं है। तुम अपनी बीबी तक को खुश न रख सके। मैं इस मुल्लापन को दूर से सलाम करता हूँ। तुम किसी जिले के अफ़सर बना दिये जाओ तो एक दिन न रह सको। किसी को खुश न रख सकोगे।'

    अमर ने बहस को तूल देना उचित न समझा; क्योंकि बहस में वह बहुत गर्म हो जाया करता था।

    भोजन का समय आ गया था। सलीम ने एक शाल निकाल कर अमर को ओढ़ा दिया। एक रेशमी स्लीपर उसके पहनने को दिया। फिर दोनों ने भोजन किया। एक मुद्दत के बाद अमर को ऐसा स्वादिष्ट भोजन मिला। मांस तो उसने न खाया; लेकिन और सब चीजें मजे से खायीं। सलीम ने पूछा—जो चीज खाने की थी, वह तो आपने निकालकर रख दी।

    अमर ने अपराधी भाव से कहा—मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन भीतर से इच्छा नहीं होती। और कहो, वहाँ की क्या खबरें हैं? कहीं शादी–वादी ठीक हुई? इतनी कसर बाकी है, उसे भी पूरी कर लो।

    सलीम ने चुटकी ली—मेरी शादी की फ़िक्र छोड़ो, पहले यह बताओ कि सकीना से तुम्हारी शादी कब हो रही है। वह बेचारे तुम्हारे इन्तजार में बैठी हुई है।

    अमर का चेहरा फीका पड़ गया। यह ऐसा प्रश्न था, जिसका उत्तर देना उसके लिये संसार में सबसे मुश्किल काम था। मन की जिस दशा में वह सकीना की ओर लपका था, वह दशा अब न रही थी। तब सुखदा उसके जीवन में एक बाधा के रूप में खड़ी थी। दोनों की मनोवृत्तियों में कोई मेल न था: दोनों जीवन को भिन्न-भिन्न कोण से देखते थे। एक में भी यह सामर्थ्य न थी कि बह दूसरे को हमखयाल बना लेता; लेकिन अब वह हालत न थी। किसी देवी विधान ने उनके सामाजिक बन्धन को और कसकर उनकी आत्माओं को मिला दिया था। अमर को पता नहीं, सुखदा ने उसे क्षमा प्रदान की या नहीं; लेकिन वह अब सुखदा का उपासक था। उसे आश्चर्य होता था कि विलासिनी सुखदा ऐसी तपस्विनी क्योंकर हो गयी और यह आश्चर्य उसके अनुराग को दिन-दिन प्रबल करता जाता था। उसे अब अपने उस असन्तोष का कारण अपनी ही अयोग्यता में छिपा हुआ मालूम होता था। अगर वह अब सुखदा को कोई पत्र न लिख सका तो इसके दो कारण थे। एक तो लज्जा और दूसरी अपनी पराजय की कल्पना। शासन का वह पुरुषोचित भाव मानो उसका परिहास कर रहा था। सुखदा स्वच्छन्द रूप से अपने लिए एक नया मार्ग निकाल सकती है, उसकी उस लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं है, यह विचार उसके अनुराग की गर्दन को जैसे दबा देता था। वह अधिक से अधिक उसका अनुगामी हो सकता है, वह उससे पहले समर में कूदी जा रही है, यह भाव उसके आत्मगौरव को चोट पहुँचाता था। उसने सिर झुकाकर कहा—मुझे अब तजर्बा हो रहा है, कि मैं औरतों

    को खुश नहीं रख सकता। मुझमें वह लियाकत ही नहीं है! मैंने तय कर लिया है कि सकीना पर जुल्म न करूंगा।

    'तो कम-से-कम अपना फैसला उसे लिख तो देते।'

    अमर ने हसरत-भरी आवाज में कहा—यह काम इतना आसान नहीं है सलीम जितना तुम समझते हो। उसे याद करके मैं अब भी बेताब हो जाता हूं। उसके साथ मेरी ज़िन्दगी जन्नत बन जाती। उसकी इस वफ़ा पर मर जाने को जी चाहता है कि अभी तक…

    यह कहते-कहते अमर का कण्ठ-स्वर भारी हो गया।

    सलीम ने एक क्षण के बाद कहा—मान लो उसे अपने साथ शादी करने पर राजी कर लूँ, तो तुम्हें नागवार होगा?

    अमर की आँखें-सी मिल गयीं—नहीं भाई जान, बिल्कुल नहीं। अगर तुम उसे राजी कर सको, तो मैं समझंगा, तुमसे ज्यादा खुशनसीब आदमी दुनिया में नहीं है। लेकिन तुम मज़ाक कर रहे हो। तुम किसी नवाबजादी से शादी करने का खयाल कर रहे होगे।

    दोनों खा चुके ओर हाथ धोकर दूसरे कमरे में लेटे।

    सलीम ने हुक्के का कश लगाकर कहा–क्या तुम समझते हो, मैं मज़ाक कर रहा हूँ? उस वक्त, मैंने ज़रूर मजाक किया था। लेकिन इतने दिनों में मैंने उसे खूब परखा। उस वक्त तुम उससे न मिल जाते, तो इसमें जरा भी शक नहीं है कि वह इस वक्त कहीं और होती। तुम्हें पाकर उसे फिर किसी की ख्वाहिश नहीं रही। तुमने उसे कीचड़ से निकालकर मन्दिर की देवी बना दिया। और देवी की जगह बैठकर वह सचमुच देवी हो गयी। अगर तुम उससे शादी कर सकते हो, तो शौक से कर लो। मैं तो मस्त हूँ ही, दिलचस्पी का दूसरा सामान तलाश कर लूंगा; लेकिन तुम न करना चाहो, तो मेरे रास्ते से हट जाओ। फिर अब तो तुम्हारी बीबी भी तुम्हारे ही पंथ में आ गयी। अब तुम्हारे लिए उससे मुंह फेरने का कोई सबब नहीं है।

    अमर ने हुक्का अपनी तरफ़ खींचकर कहा—मैं बड़े शौक से तुम्हारे रास्ते से हट जाता हूँ; लेकिन एक बात बतला दो-तुम सकीना को भी दिलचस्पी की चीज़ समझ रहे हो, या उसे दिल से प्यार करते हो?

    सलीम उठ बैठे—देखो, अमर, मैंने तुमसे कभी परदा नहीं रखा इसलिए

    आज भी परदा न रखूँगा। सकीना प्यार करने की चीज नहीं, पूजने की चीज है। कम-से-कम मुझे बह ऐसी ही मालूम होती है। मैं कसम तो नहीं खाता कि उससे शादी हो जाने पर मैं कण्ठी-माला पहन लूंगा। लेकिन इतना जानता हूँ कि उसे पाकर मैं ज़िन्दगी में कुछ कर सकूँगा। अब तक मेरी ज़िन्दगी सैलानीपन में गुजरी है। वह मेरी बहती हुई नाव का लंगर होगी। इस लंगर के बगैर नहीं जानता मेरो नाव किस भँवर में पड़ जायेगी। मेरे लिए ऐसी औरत की ज़रूरत है, जो मुझ पर हुकमत करे, मेरी लगाम को खींचती रहे।

    अमर को अपना जीवन इसलिए भार था कि वह अपनी स्त्री पर शासन न कर सकता था। सलीम ऐसी स्त्री चाहता था, जो उस पर शासन करे; और मजा यह था कि दोनों एक ही सुन्दरी में मनोनीत लक्षण देख रहे थे।

    अमर ने कुतूहल भाव से कहा—मैं तो समझता हूँ, सकीना में यह बात नहीं है, जो तुम चाहते हो।

    सलीम जैसे गहराई में डूबकर बोला—तुम्हारे लिए नहीं है मगर मेरे लिए है! वह तुम्हारी पूजा करती है, मैं उसकी पूजा करता हूँ।

    इसके बाद कोई दो-ढाई बजे रात तक दोनों में इधर-उधर की बातें होती रहीं। सलीम ने उस नये आन्दोलन की भी चर्चा की, जो उसके सामने शुरू हो चुका था और यह भी कहा कि उसके सफल होने की आशा नहीं है। संभव है, मुआमला तूल खींचे।

    अमर ने विस्मय के साथ कहा—तब तो कहो, सुखदा ने वहाँ नयी जान डाल दी।

    'तुम्हारी सास ने अपनी सारी जायदाद सेवाश्रम के नाम वक्फ़ कर दी।'

    'अच्छा!'

    'और तुम्हारे पिदर बुजुर्गवार भी अब कौमी कामों में शरीक होने लगे हैं।

    'तब तो वहाँ पूरा इनक़लाब हो गया!'

    सलीम तो सो गया, लेकिन अमर दिन-भर का थका होने पर भी नींद को न बुला सका। वह जिन बातों की कल्पना भी न कर सकता था, वह सुखदा के हाथों पूरी हो गयीं। मगर कुछ भी हो, वही अमीरी, जरा बदली

    हुई सूरत में। नाम की परवाह है और कुछ नहीं। मगर फिर उसने अपने को धिक्कारा। तुम किसी के अन्तःकरण की बात क्या जानते हो। आज हजारों आदमी राष्ट्र की सेवा में लगे हुए हैं कौन कह सकता है, कौन स्वार्थी है,कौन सच्चा सेवक?

    न जाने कब उसे भी नींद आ गयी।

    २

    अमरकान्त के जीवन में एक नया उत्साह चमक उठा है। ऐसा जान पड़ता है कि अपनी जीवन-यात्रा में वह अब एक नये घोड़े पर सवार हो गया है। पहले पुराने घोड़े को एक ओर चाबुक लगाने की जरूरत पड़ती थी। यह नया घोड़ा कनौतियाँ खड़ी किये सरपट भागता चला जाता है। स्वामी आत्मानन्द, काशी, प्रयाग, सभी से उसकी तकरार हो जाती। इन लोगों के पास वही पुराने घोड़े हैं। दौड़ में पिछड़ जाते हैं। अमर उनकी मन्द गति पर बिगड़ता है—इस तरह तो काम नहीं चलने का स्वामीजी। आप काम करते हैं कि मजाक करते हैं। इससे तो कहीं अच्छा था कि आप सेवाश्रम में बने रहते!

    आत्मानन्द ने अपने विशाल वक्ष को तानकर कहा—बाबा, मेरे से अब और नहीं दौड़ा जाता। जब लोग स्वास्थ्य के नियमों पर ध्यान न देंगे, तो आप बीमार होंगे, आप मरेंगे। मैं नियम बतला सकता हूँ, पालन करना तो उनके हो अधीन है।

    अमरकान्त ने सोचा—यह आदमी जितना मोटा है, उतनी ही मोटी इसकी अक्ल भी है। खाने को डेढ़ सेर चाहिए, काम करते ज्वर आता है। इन्हें संन्यास लेने से न जाने क्या लाभ हुआ।

    उसने आँखों में तिरस्कार भरकर कहा—आपका काम केवल नियम बताना नहीं है, उनसे नियमों का पालन कराना भी है। उनमें ऐसी शक्ति डालिए कि वे नियमों का पालन किये बिना रह ही न सकें। उनका स्वभाव ही ऐसा हो जाय। मैं आज पिचौरा से निकला; गाँव में जगह-जगह कूड़े के ढेर दिखाई दिये। आप कल उसी गाँव से हो आये हैं क्यों कूड़ा साफ

    नहीं कराया गया? आप खुद फावड़ा लेकर क्यों नहीं पिल पड़े? गेरूए वस्त्र पहन लेने ही से आप समझते हैं, लोग आपकी शिक्षा को देववाणी समझेंगे?

    आत्मानन्द ने सफाई दी—मैं कूड़ा साफ करने लगता, तो सारा दिन पिचौरा ही में लग जाता। मुझे पांँच-छ: गाँवों का दौरा करना था।

    'यह आपका कोरा अनुमान है। मैंने सारा कूड़ा आध घण्टे में साफ कर दिया। मेरे फावड़ा हाथ में लेने ही की देर थी, सारा गाँव जमा हो गया और बात-की-बात में सारा गाँव झक हो गया।'

    फिर वह गूदड़ चौधरी की ओर फिरा—तुम भी दादा, अब काम में ढिलाई कर रहे हो। मैंने कल एक पंचायत में लोगों को शराब पीते पकड़ा। सीताड़े की बात है। किसी को मेरे आने की खबर तो थी नहीं, लोग आनन्द से बैठे थे और बोतलें सरपंच महोदय के सामने रखी हुई थीं। मुझे देखते ही तुरन्त बोतलें उड़ा दी गयीं और लोग गंभीर बनकर बैठ गये। मैं दिखावा नहीं चाहता, ठोस काम चाहता हूँ।

    अमर ने अपनी लगन, उत्साह, आत्म-बल और कर्मशीलता से अपने सभी सहयोगियों में सेवा-भाव उत्पन्न कर दिया था और उन पर शासन भी करने लगा था। सभी उसका रोब मानते थे। उसके गुलाम थे।

    चौधरी ने बिगड़कर कहा—तुमने कौन गाँव बताया, सौताड़ा? मैं आज ही उसके चौधरी को बुलाता हूँ। वही हरखलाल है। जन्म का पियक्कड़। दो दफ़ा सजा काट आया है। मैं आज ही उसे बुलाता हूँ।

    अमर ने जाँघ पर हाथ पटककर कहा—फिर वही डाँट-फटकार की बात? अरे दादा? डाँट-फटकार से कुछ न होगा। दिलों में पैठिये। ऐसी हवा फैला दीजिये कि ताड़ी-शराब से लोगों को घृणा हो जाय। आप दिन-भर अपना काम करेंगे ओर चैन से सोयेंगे, तो यह काम हो चुका। यह समझ लो कि हमारी बिरादरी चेत जायगी, तो बाम्हन ठाकुर आप ही चेत जायेंगे।

    गूदड़ ने हार मानकर कहा—तो भैया, इतना बूता तो अब मुझमें नहीं रहा कि दिन भर काम करूँ और रात भर दौड़ लगाऊँ। काम न करूँ, तो भोजन कहाँ से आये? ⁠ अमरकान्त ने उसे हिम्मत हारते देखकर सहास मुख से कहा–कितना बड़ा पेट है! तो उसे छोटा करना पड़ेगा।

    काशी और प्रयाग ने देखा कि इस वक्त सबके ऊपर फटकार पड़ रही है, तो वहाँ से खिसक गये।

    पाठशाले का समय आ गया था। अमरकान्त अपनी कोठरी में किताब लेने गया, तो देखा, मुन्नी दूध लिये खड़ी है। बोला–मैंने तो कह दिया था, मैं दूध न पिऊँगा, फिर क्यों लायीं?

    आज कई दिनों से मुन्नी अमर के व्यवहार में एक प्रकार की शुष्कता अनुभव कर रही थी। उसे देखकर अब उनके मुख पर उल्लास की झलक नहीं आती। उससे अब बिना विशेष प्रयोजन के बोलते भी कम हैं। उसे ऐसा जान पड़ता है कि यह मुझसे भागते हैं। इसका कारण वह कुछ नहीं समझ सकती। यह काँटा उसके मन में कई दिन से खटक रहा है। आज वह इस काँटे को निकाल डालेगी।

    उसने अविचलित भाव से कहा–क्यों नहीं पियोगे; सुनूँ?

    अमर पुस्तक का एक बण्डल उठाता हुआ बोला–अपनी इच्छा है, नहीं पीता—तुम्हें मैं कष्ट नहीं देना चाहता।

    मुन्नी ने तिरछी आँखों से देखा–यह तुम्हें कब से मालूम हुआ कि तुम्हारे लिए दूध लाने में मुझे बहुत कष्ट होता है। और अगर किसी को कष्ट उठाने ही में सुख मिलता हो तो?

    अमर ने हारकर कहा–अच्छा भाई, झगड़ा न करो, लाओ पी लूँ!

    एक ही साँस में सारा दूध कड़वी दवा की तरह पीकर अमर चलने लगा, तो मुन्नी ने द्वार छोड़कर कहा–बिना अपराध के तो किसी को सजा नहीं दी जाती।

    अमर द्वार पर ठिठककर बोला–तुम तो जाने क्या बक रही हो। मुझे देर हो रही है।

    मुन्नी ने विरक्त भाव धारण किया–तो मैं तुम्हें रोक तो नहीं रही हूँ, जाते क्यों नहीं।

    अमर कोठरी से बाहर पाँव न निकाल सका।

    मुन्नी ने फिर कहा–क्या मैं इतना भी नहीं जानती कि मेरा तुम्हारे

    ऊपर कोई अधिकार नहीं है? तुम आज चाहो, तो कह सकते हो, खबरदार, मेरे पास मत आना। और मुँह से चाहे न कहते हो; पर व्यवहार से रोज ही कह रहे हो। आज कितने दिनों से देख रही हूँ; लेकिन बेहयाई करके आती हूँ, बोलती हूँ, खुशामद करती हूँ। अगर इस तरह आँखें फेरनी थीं, तो पहले ही से उस तरह क्यों न रहे। लेकिन मैं क्या बकने लगी। तुम्हें देर हो रही है,जाओ।

    अमरकान्त ने जैसे रस्सी तुड़ाने का जोर लगाकर कहा—तुम्हारी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ रही है मुन्नी! मैं तो जैसे पहले रहता था, वैसे ही अब भी रहता हूँ। हाँ, इधर काम अधिक होने से ज्यादा बातचीत का अवसर नहीं मिलता।

    मुन्नी ने आँखें नीची करके गूढ़ भाव से कहा—तुम्हारे मन की बात में समझ रही हूँ; लेकिन वह बात नहीं है। तुम्हें भरम हो रहा है।

    अमरकान्त ने आश्चर्य से कहा—तुम तो पहेलियों में बातें करने लगीं।

    मुन्नी ने उसी भाव से जवाब दिया—आदमी का मन फिर जाता है तो सीधी बातें भी पहेली-सी लगती हैं।

    फिर वह दूध का खाली कटोरा उठाकर जल्दी से चली गयी।

    अमरकान्त का हृदय मसोसने लगा। मुन्नी जैसे सम्मोहन-शक्ति से उसे अपनी ओर खींचने लगी। 'तुम्हारे मन की बात समझ रही हूँ; लेकिन तुम्हें भ्रम हो रहा है।' यह वाक्य किसी गहरे खड्ड की भाँति उसके हृदय को भयभीत कर रहा था। उसमें उतरते दिल काँपता' था, पर रास्ता उसी खड्ड में से जाता था।

    वह न जाने कितनी देर अचेत-सा खड़ा रहा। सहसा आत्मानन्द ने पुकारा—क्या आज शाला बन्द रहेगी?

    ३

    इस इलाके के जमींदार एक महन्तजी थे। कारकुन और मुख्तार उन्हीं के चेले-चापड़ थे। इसलिए लगान बराबर वसूल होता जाता था। ठाकुरद्वारे में कोई-न-कोई उत्सव होता ही रहता था। कभी ठाकुरजी का जन्म

    है, कभी ब्याह है, कभी यज्ञोपवीत है, कभी झूला है, कभी जल-विहार है। असामियों को इन अवसरों पर बेगार देनी पड़ती थी, भेंट-न्योछावर, पूजा-चढ़ावा आदि नामों से दस्तूरी चुकानी पड़ती थी; लेकिन धर्म के मुआमले में कौन मुंह खोलता। धर्म-संकट सबसे बड़ा संकट है। फिर इलाके के काश्तकार सभी नीच जातियों के लोग थे। गाँव पीछे दो-चार घर ब्राह्मण-क्षत्रियों के थे भी, तो उनकी सहानुभूति असामियों की ओर न होकर महन्तजी की ओर थी। किसी-न-किसी रूप में वे सभी महन्तजी के सेवक थे। असामियों को उन्हें भी प्रसन्न रखना पड़ता था। बेचारे एक तो ग़रीब, ऋण के बोझ से लदे हुए, दूसरे मूर्ख, न क़ायदा जानें, न क़ानून। महन्तजी जितना चाहें इज़ाफ़ा करें, जब चाहें बेदखल करें, किसी में बोलने का साहस न था। अकसर खेतों का लगान इतना बढ़ जाता था कि सारी उपज लगान के बराबर भी न पहुँचती थी; किन्तु लोग भाग्य को रोकर, भूखे-नंगे रहकर, कुत्तों की मौत मरकर, खेत जोतते जाते थे। करें क्या? कितनों ही ने जाकर शहरों में नौकरी कर ली थी। कितने ही मजदूरी करने लगे थे। फिर भी असामियों की कमी न थी। कृषि-प्रधान देश में खेती केवल जीविका का साधन नहीं है, सम्मान की वस्तु भी है। गृहस्थ कहलाना गर्व की बात है। किसान गृहस्थी में अपना सर्वस्व खोकर विदेश जाता है, वहाँ से धन कमाकर लाता है और फिर गृहस्थी करता है। मान-प्रतिष्ठा का मोह औरों की भाँति उसे भी घेरे रहता है। वह गृहस्थ रहकर जीना और गृहस्थी ही में मरना भी चाहता है। उसका बाल-बाल कर्ज से बँधा हो, लेकिन द्वार पर दो-चार बैल बाँधकर वह अपने को धन्य समझता है। उसे साल में ३६० दिन आधे पेट खाकर रहना पड़े, पुआल में घुसकर रातें काटनी पड़ें, बेबसी से जीना और बेबसी से मरना पड़े, कोई चिन्ता नहीं, वह गृहस्थ तो है। यह गर्व उसकी सारी दुर्गत की पुरौती कर देता है।

    लेकिन इस साल अनायास ही जिन्सों का भाव गिर गया। इतना गिर गया, जितना चालीस साल पहले था। जब भाव तेज़ था, किसान अपनी उपज बेच-बाचकर लगान दे देता था; लेकिन जब दो और तीन की जिन्स एक में बिके, तो किसान क्या करे। कहाँ से लगान दे, कहाँ से दस्तूरियाँ दे, कहाँ से कर्ज चुकाये। विकट समस्या आ खड़ी हुई; और यह दशा

    कुछ इसी इलाके की न थी। सारे प्रान्त, सारे देश, यहाँ तक कि सारे संसार में यही मंदी थी। चार सेर का गुड़ कोई दस सेर में भी नहीं पूछता। आठ सेर का गेहूँ डेढ़ रुपये मन में भी मंहगा है। ३०) मन का कपास १०) रुपये में जाता है, १६) मन का सन ४) में। किसानों ने एक-एक दाना बेच डाला, भूसे का एक तिनका भी न रखा; लेकिन यह सब-कुछ करने पर भी चौथाई लगान से ज्यादा न अदा कर सके। और ठाकद्वारे में वही उत्सव थे, वही जलविहार थे। नतीजा यह हुआ कि हलके में हाहाकार मच गया। इधर कुछ दिनों से स्वामी आत्मानन्द और अमरकान्त के उद्योग से इलाके में विद्या का कुछ प्रचार हो रहा था और कई गाँवों में लोगों ने दस्तूरी देना बन्द कर दिया था। महन्तजी के प्यादे और कारकुन पहले ही से जले बैठे थे। यों तो दाल न गलती थी। बक़ाया लगान ने उन्हें अपने दिल का गुबार निकालने का मौका दे दिया।

    एक दिन गंगा-तट पर इस समस्या पर विचार करने के लिए एक पंचायत हुई। सारे इलाके के स्त्री-पुरुष जमा हए, मानो किसी पर्व का स्नान करने आये हों। स्वामी आत्मानन्द सभापति चुने गये।

    पहले भोला चौधरी खड़े हुए। वह पहले किसी अफ़सर के कोचवान थे। अब नये साल से फिर खेती करने लगे थे। लम्बी नाक, काला रंग, बड़ी-बड़ी मूछे और बड़ी-सी पगड़ी। मुंह पगड़ी में छिप गया था। बोले—पंचो, हमारे ऊपर जो लगान बँधा हुआ है, वह तेजी के समय का है। इस मंदी में वह लगान देना हमारे काबू से बाहर है। अबकी अगर बैल-बधिया बेचकर दे भी दें, तो आगे क्या करेंगे। बस, हमें इस बात का तसफ़िया करना है। मेरी गुजारस तो यही है कि हम सब मिलकर महन्त महाराज के पास चलें और उनसे अरज-मारूज करें। अगर वह न सुनें, तो हाकिम जिला के पास चलना चाहिए। मैं औरों की नहीं कहता। मैं गंगा माता की कसम खाके कहता हूँ कि मेरे घर में छटाँक भर भी अन्न नहीं है, और जब मेरा यह हाल है, तो और सभों का भी यही हाल होगा। उधर महन्तजी के यहाँ वही बहार है। अभी परसों एक हजार साधुओं को आम की पगंत दी गई है। बनारस और लखनऊ से कई डिब्बे आमों के आये हैं। आज सुनते हैं फिर मलाई की पंगत है। हम भूखों मरते हैं, वहाँ मलाई उड़ती

    है। उस पर हमारा रक्त चूसा जा रहा है। बस, यही मुझे पंचों से कहना है।

    गूदड़ ने धँसी हुई आँखें फाड़कर कहा–महन्तजी हमारे मालिक है, आनन्ददाता हैं, महात्मा हैं। हमारा दुख सुनकर ज़रूर उन्हें हमारे ऊपर दया आयेगी; इसलिए हमें भोला चौधरी की सलाह मंजूर करनी चाहिए। अमर भैया हमारी ओर से बातचीत करेंगे। हम और कुछ नहीं चाहते। बस, हमें और हमारे बाल-बच्चों को आध-आध सेर रोजीना के हिसाब से दिया जाय। उपज जो कुछ हो, वह सब महन्तजी ले जायें। हम घी-दूध नहीं माँगते, दूध-मलाई नहीं माँगते। खाली आध सेर मोटा अनाज माँगते हैं। इतना भी न मिलेगा, तो हम खेती न करेंगे। मजूरी और बीज किसके घर से लायँगे। हम खेत छोड़ देंगे, इसके सिवा दूसरा उपाय नहीं है।

    सलोनी ने हाथ चमकाकर कहा–खेत क्यों छोड़ें? बाप-दादों की निसानी है। उसे नहीं छोड़ सकते। खेत पर परान दे दूंगी। एक था, तब दो हुए, तब तक चार हुए, अब क्या धरती सोना उगलेगी?

    अलगू कोरी बिज्जू सी आँखें निकाल कर बोला–भैया, मैं तो बात बेलाग कहता हूँ, महन्त के पास चलने से कुछ न होगा। राजा ठाकुर हैं! कहीं क्रोध आ गया, तो पिटवाने लगेंगे। हाकिम के पास चलना चाहिए। गोरों में फिर भी दया है।

    आत्मानन्द ने सभों का विरोध किया–मैं कहता हूँ, किसी के पास जाने से कुछ नहीं होगा। तुम्हारी थाली की रोटी तुमसे कहे कि मुझे न खाओ, तो तुम मानोगे?

    चारों तरफ से आवाजें आई–कभी नहीं मान सकते।

    'तो तुम जिनकी थाली की रोटियाँ हो, वह कैसे मान सकता है?'

    बहुत-सी आवाज़ों ने समर्थन किया–कभी नहीं मान सकते।

    'महन्त को उत्सव मनाने को रुपये चाहिये। हाकिमों को बड़ी-बड़ी तलब चाहिए। उनकी तलब में कमी नहीं हो सकती। वे अपनी शान नहीं छोड़ सकते। तुम मरो या जियो, उनकी बला से। वह तुम्हें क्यों छोड़ने लगे।

    बहुत सी आवाजों ने हामी भरी–कभी नहीं छोड़ सकते। ⁠ अमरकान्त स्वामी जी के पीछे बैठा हुआ था। स्वामीजी का यह रुख देखकर घबड़ाया, लेकिन सभापति को कैसे रोके? यह तो वह जानता था यह गर्म मिज़ाज का आदमी है, लेकिन इतनी जल्द इतना गर्म हो जायगा इसकी उसे आशा न थी। आख़िर यह महाशय चाहते क्या हैं?

    आत्मानन्द गरजकर बोले–तो अब तुम्हारे लिए कौन-सा मार्ग है? अगर मुझसे पूछते हो, और तुम लोग परन करो कि उसे मानोगे, तो में बता सकता हूँ, नहीं तुम्हारी इच्छा।

    बहत आवाज़ आई–ज़रूर बतलाइए स्वामीजी, बतलाइए।

    जनता चारों ओर से खिसककर और समीप आ गयी। स्वामीजी उनके हृदय को स्पर्श कर रहे हैं, यह उनके चेहरे से झलक रहा था। जनरुचि सदैव उग्र की ओर होती है।

    आत्मानन्द बोले–तो आओ, आज हम सब चलकर महन्तजी का मकान और ठाकुरद्वारा घेर लें और जब तक वह लगान बिलकुल न छोड़ दें, कोई उत्सव न होने दें।

    बहुत-सी आवाजें आई–हम लोग तैयार है!

    'खूब समझ लो कि वहाँ तुम पान-फूल से पूजे न जाओगे।'

    'कुछ परवाह नहीं। मर तो रहे हैं। सिसक-सिसककर क्यों मरें।'

    'तो इसी वक्त चलो। हम दिखा दें कि…'

    सहसा अमर ने खड़े होकर प्रदीप्त नेत्रों से कहा–ठहरो!

    समूह में सन्नाटा छा गया। जो जहाँ था, वहीं रह गया।

    अमर ने छाती ठोंककर कहा–जिस रास्ते पर तुम जा रहे हो, वह उद्धार का रास्ता नहीं है–सर्वनाश का रास्ता है। तुम्हारा बैल अगर बीमार पड़ जाय, तो तुम उसे जोतोगे?

    किसी तरफ़ से आवाज न आई।

    'तुम पहले उसकी दवा करोगे, और जब तक वह अच्छा न हो जायगा, उसे न जोतोगे, क्योंकि तुम बैल को मारना नहीं चाहते। उसके मरने से तुम्हारे खेत परती पड़ जायेंगे।'

    गूदड़ बोले–बहुत ठीक कहते हो भैया।

    'घर में आग लगने पर हमारा क्या धर्म है? क्या हम आग को फैलने दें और घर की बची-बचाई चीजे भी लाकर उसमें डाल दें?'

    गुदड़ ने कहा–कभी नहीं। कभी नहीं।

    क्यों? इसीलिए कि हम घर को जलाना नहीं, बनाना चाहते हैं। हमें उस घर में रहना है। उसी में जीना है। वह विपत्ति कुछ हमारे ही ऊपर नहीं पड़ी है। सारे देश में यही हाहाकार मचा हुआ है। हमारे नेता इस प्रश्न को हल करने की चेष्टा कर रहे हैं। उन्हीं के साथ हमें भी चलना है।'

    उसने एक लम्बा भाषण किया, पर वही जनता जो उसका भाषण सुनकर मस्त हो जाती थी, आज उदासीन बैठी थी। उसका सम्मान सभी करते थे, इसीलिए कोई उधम न हुआ, कोई बमचख न मचा, पर जनता पर कोई असर न हुआ। आत्मानन्द इस समय जनता का नायक बना हुआ था।

    सभा बिना कुछ निश्चय किये उठ गयी, लेकिन बहुमत किस तरफ़ है, यह किसी से छिपा न था।

    ४

    अमर घर लौटा, तो बहुत हताश था। अगर जनता को शान्त करने का उपाय न किया गया तो अवश्य उपद्रव हो जायगा। उसने महन्तजी से मिलने का निश्चय किया। इस समय उसका चित्त इतना उदास था कि एक बार जी में आया, यहाँ सब छोड़-छाड़कर चला जाय। उसे अभी तक अनभव न हुआ था कि जनता सदैव तेज़ मिज़ाजों के पीछे चलती है। वह न्याय और धर्म, हानि-लाभ, अहिंसा और त्याग, सब कुछ समझाकर भी आत्मानन्द के फूंके हुए जादू को उतार न सका। आत्मानन्द इस वक्त यहाँ मिल जाते, तो दोनों मित्रों में ज़रूर लड़ाई हो जाती, लेकिन वह आज गायब थे। उन्हें आज घोड़े का आसन मिल गया था। किसी गाँव में संगठन करने चले गये थे।

    आज अमर का कितना अपमान हुआ। किसी ने उसकी बातों पर कान तक न दिया। उनके चेहरे कह रहे थे, तुम क्या बकते हो, तुमसे हमारा

    उद्धार न होगा। इस घाव पर कोमल शब्दों के मरहम की ज़रूरत थी–कोई उसे लेटाकर उसके घाव को फाहे से धोये, उस पर शीतल लेप करे।

    मुन्नी रस्सी और कलसा लिये हुए निकली और बिना उसकी ओर ताके कुएँ की ओर चली गयी। उसने पुकारा–ज़रा सुनती जाओ मुन्नी! पर मुन्नी ने सुनकर भी न सुना। ज़रा देर बाद वह कलसा लिये हुए लौटी और फिर उसके सामने से सिर झुकाये चली गयी। अमर ने फिर पुकारा–मुन्नी, सुनो एक बात कहनी है। पर अबकी भी वह न रुकी। उसके मन में अब सन्देह न था।

    एक क्षण में मुन्नी फिर निकली और सलोनी के घर जा पहुँची। वह मदरसे के पीछे एक छोटी-सी मड़ैया डालकर रहती थी। चटाई पर लेटी एक भजन गा रही थी। मुन्नी ने जाकर पूछा–आज कुछ पकाया नहीं काकी, यों ही सो रहीं? सलोनी ने उठकर कहा–खा चुकी बेटा, दोपहर की रोटियाँ रखी हुई थीं।

    मुन्नी ने चौके की ओर देखा। चौका साफ़ लिपा-पुता पड़ा था।

    बोली–काकी, तुम बहाना कर रही हो। क्या घर में कुछ है ही नहीं? अभी तो आते देर नहीं हुई, इतनी जल्दी खा कहाँ से लिया?

    'तू तो पतियाती नहीं है बहू! भूख लगी थी, आते ही आते खा लिया। बरतन धो-धाकर रख दिये। भला तुमसे क्या छिपाती। कुछ न होता, तो माँग न लेती?'

    'अच्छा मेरी क़सम खाओ।'

    काकी ने हँसकर कहा–हाँ, अपनी क़सम खाती हूँ, खा चुकी।

    मुन्नी दुःखित होकर बोली–तुम मुझे गैर समझती हो काकी! जैसे मुझे तुम्हारे मरने-जीने से कुछ मतलब ही नहीं। अभी तो तुमने तेलहन बेचा था, रुपये क्या किये?

    सलोनी सिर पर हाथ रखकर बोली–अरे भगवान्! तेलहन था ही कितना। कुल एक रुपया तो मिला। वह कल प्यादा ले गया। घर में आग लगाये देता था। क्या करती, निकालकर फेंक दिया। उस पर अमर भैया कहते हैं–महन्तजी से फ़रियाद करो। कोई नहीं सुनेगा बेटा! मैं कहे देती हूँ। ⁠ मुन्नी बोली–अच्छा, तो चलो मेरे घर खा लो।

    सलोनी ने सजल-नेत्र होकर कहा–तू आज खिला देगी बेटी, अभी तो पूरा चौमासा पड़ा हुआ है। आजकल तो कहीं घास भी नहीं मिलती। भगवान् न-जाने कैसे पार लगायेंगे। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। डाँड़ी अच्छी होती, तो बाकी देके चार महीने निबाह हो जाता। इस डॉंड़ी में आग लगे, आधी वाकी भी न निकली। अमर भैया को तू समझाती नहीं, स्वामीजी को बढ़ने नहीं देते।

    मुन्नी ने मुँह फेरकर कहा–मुझसे तो आजकल रूठे हुए हैं, बोलते ही नहीं। काम-धन्धे से फ़ुरसत ही नहीं मिलती। घर के आदमी से बातचीत करने को भी फ़ुरसत चाहिए। जब फटेहालों आये थे, तब फ़ुरसत थीं। यहाँ जब दुनिया मानने लगी, नाम हुआ, बड़े आदमी बन गये, तो अब फ़ुरसत नहीं है।

    सलोनी ने विस्मय-भरी आँखों से मुन्नी को देखा–क्या कहती है बहू, वह तुझसे रूठे हुए हैं? मुझे तो विश्वास नहीं आता। तुझे धोखा हुआ है। बेचारा रात-दिन तो दौड़ता है, न मिली होगी फ़ुरसत। मैंने तुझे जो असीस दिया है, वह पूरा होके रहेगा, देख लेना।

    मुन्नी अपनी अनुदारता पर सकुचाती हुई बोली–मुझे किसी की परवाह नहीं है काकी! जिसे सौ बार गरज पड़े बोले, नहीं न बोले। वह समझते होंगे–मैं उनके गले पड़ी जा रही हूँ। मैं तुम्हारे चरन छूकर कहती हूँ काकी, जो यह बात कभी मेरे मन में आई हो। मैं तो उनके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हूँ। हाँ, इतना चाहती हूँ कि वह मुझसे मन से बोलें, जो कुछ थोड़ी बहुत सेवा करूँ, उसे मन से लें। मेरे मन में बस इतनी ही साध है, कि मैं जल चढ़ाती जाऊँ और वह चढ़वाते जायें। और कुछ नहीं चाहती।

    सहसा अमर ने पुकारा। सलोनी ने बुलाया–आओ भैया, अभी बहू आ गयी, उसी से बतिया रही हूँ।

    अमर ने मुन्नी की ओर देखकर तीखे स्वर में कहा–मैंने तुम्हें दो बार पुकारा मुन्नी, तुम बोली क्यों नहीं?

    मुन्नी ने मुंँह फेरकर कहा–तुम्हें किसी से बोलने की फ़ुरसत नहीं है, तो कोई क्यों जाय तुम्हारे पास। तुम्हें बड़े-बड़े काम करने पड़ते हैं, तो औरों को भी तो अपने छोटे-छोटे काम करने ही पड़ते हैं।

    अमर पत्नीव्रत की धुन में मुन्नी से कुछ खिंचा रहने लगा था। पहले वह चट्टान पर था, सुखदा उसे नीचे से खींच रही थी। अब सुखदा टीले के शिखर पर पहुँच गयी और उसके पास पहुँचने के लिये उसे आत्मबल और मनोयोग की ज़रूरत थी। उसका जीवन आदर्श होना चाहिये; किन्तु प्रयास करने पर भी वह सरलता और श्रद्धा की इस मूर्ति को दिल से न निकाल सकता था। उसे ज्ञात हो रहा था कि आत्मोन्नति के प्रयास में उसका जीवन शुष्क निरीह हो गया है। उसने मन में सोचा, मैंने तो समझा था, हम दोनों एक-दूसरे के इतने समीप आ गये हैं कि अब बीच में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रही। मैं चाहे यहाँ रहूँ, चाहे काले कोसों चला जाऊँ; लेकिन तुमने मेरे हृदय में जो दीपक जला दिया, उसकी ज्योति ज़रा भी मन्द न पड़ेगी।

    उसने मीठे तिरस्कार से कहा–मैं यह मानता हूँ मुन्नी, इधर काम अधिक रहने से तुमसे कुछ अलग रहा; लेकिन मुझे आशा थी कि अगर चिन्ताओं से झुंझलाकर मैं तुम्हें दो-चार कड़वे शब्द भी सुना दूँ, तो तुम मुझे क्षमा करोगी। अब मालूम हुआ कि वह मेरी भूल थी।

    मुन्नी ने उसे कातर नेत्रों से देखकर कहा–हाँ लाला, वह तुम्हारी भूल थी। दरिद्र को सिंहासन पर भी बैठा दो तब भी उसे अपने राजा होने का विश्वास न आयेगा। वह उसे सपना ही समझेगा। मेरे लिये भी यही सपना जीवन का आधार है। मैं कभी जागना नहीं चाहती। नित्य यही सपना देखती रहना चाहती हूँ। तुम मुझे थपकियाँ देते जाओ, बस, मैं इतना ही चाहती हूँ। क्या इतना भी नहीं कर सकते? क्या हुआ, आज स्वामीजी से तुम्हारा झगड़ा क्यों हो गया?

    सलोनी अभी तो आत्मानन्द की तारीफ़ कर रही थी। अब अमर की मुँह-देखी कहने लगी–

    भैया ने तो लोगों को समझाया था कि महन्त के पास चलो। इसी पर लोग बिगड़ गये। पूछो, और तुम कर ही क्या सकते हो? महन्तजी पिटवाने लगें, तो भागते राह न मिले। ⁠ मुन्नी ने इसका समर्थन किया–महन्तजी धर्मात्मा आदमी हैं। भला लोग भगवान् के मन्दिर को घेरते, तो कितना अपजस होता। संसार भगवान् का भजन करता है, हम चले उनकी पूजा रोकने। न-जाने स्वामी को यह सूझी क्या और लोग उनकी बात मान गये। कैसा अन्धेर है?

    अमर ने चित्त में शान्ति का अनुभव किया। स्वामीजी से तो ज़्यादा समझदार ये अपढ़ स्त्रियाँ हैं। और आप शास्त्रों के ज्ञाता हैं। ऐसे ही मूर्ख आपको भक्त मिल गये!

    उन्होंने प्रसन्न होकर कहा–उस नवक़ारख़ाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता था काकी? लोग मन्दिर को घेरने जाते, तो फौजदारी हो जाती। ज़रा-ज़रा सी बात में तो आजकल गोलियाँ चलती हैं।

    सलोनी ने भयभीत होकर कहा–तुमने बहुत अच्छा किया भैया, जो उनके साथ न हुए। नहीं खून खच्चर हो जाता।

    मुन्नी आद्र होकर बोली–मैं तो तुम्हें उनके साथ कभी न जाने देती लाला! हाकिम संसार पर राज करता है, तो क्या रैयत का दुःख-दर्द न सुनेगा? स्वामीजी आयेंगे, तो पूछूँगी।

    आग की तरह जलता हुआ घाव सहानुभूति और सहृदयता से भरे हुए शब्दों से शीतल होता जान पड़ा। अब अमर कल अवश्य महन्तजी की सेवा में जायगा। उसके मन में अब कोई शंका, कोई दुविधा नहीं है।

    ५

    अमर गूदड़ चौधरी के साथ महन्त आशाराम गिरि के पास पहुँचा। सन्ध्या का समय था। महन्तजी एक सोने की कुरसी पर बैठे हुए थे, जिस पर मखमली गद्दा था। उनके इर्द-गिर्द भक्तों की भीड़ लगी हुई थी, जिसमें महिलाओं की संख्या ही अधिक थी। सभी धुले हुए संगमरमर के फर्श पर बैठी हुई थीं। पुरुष दूसरी ओर बैठे थे। महन्तजी पूरे छ: फीट के विशालकाय सौम्य पुरुष थे। अवस्था कोई पैंतीस वर्ष की थी। गोरा रंग, दुहरी देह, तेजस्वी मूर्ति, वस्त्र काषाय तो थे, किन्तु रेशमी। वह पाँव लटकाये बैठे हुए थे। भक्त लोग जाकर उनके चरणों को आँखों से लगाते थे, पूजा चढ़ाते थे और अपनी जगह पर आ बैठते थे। गूदड़ तो अन्दर जा न सकते थे, अमर अन्दर गया; पर वहाँ उसे कौन पूछता। आख़िर जब खड़े-खड़े आठ बज गये, तो उसने महन्तजी के समीप जाकर कहा–महाराज, मझे आपसे कुछ निवेदन करना है।

    महन्तजी ने इस तरह उसकी ओर देखा, मानो उन्हें आँखें फेरने में कष्ट है।

    उनके समीप एक दूसरा साधु खड़ा था। उसने आश्चर्य से उसकी ओर देखकर पूछा–कहाँ से आते हो?

    अमर ने गाँव का नाम बताया।

    हुकुम हुआ, आरती के बाद आओ।

    आरती में तीन घण्टे की देर थी। अमर यहाँ कभी न आया था। सोचा यहाँ की सैर ही कर लें। इधर-उधर घूमने लगा। वहाँ से पश्चिम तरफ़ तो विशाल मन्दिर था। सामने पूरब की ओर सिंहद्वार, दाहिने-बायें दो दरवाजे और भी थे। अमर दाहिने दरवाजे के अन्दर घुसा, तो देखा चारों तरफ़ चौड़े बरामदे हैं और भण्डार हो रहा है। कहीं बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में पूरियाँ कचोड़ियाँ बन रही हैं, कहीं भाँति-भाँति की शाक-भाजी चढ़ी हुई है, कहीं दूध उबल रहा है, कहीं मलाई निकाली जा रही है। बरामदे के पीछे, कमरों में खाद्य सामग्री भरी हुई थी। ऐसा मालूम होता था कि अनाज, शाक-भाजी, मेवे, फल, मिठाई की मंडियाँ हैं। एक पूरा कमरा तो केवल परवलों से भरा हुआ था। इस मौसम में परवल कितने मँहगे होते है; पर यहाँ वह भूसे की तरह भरे हुए थे। अच्छे-अच्छे घरों की महिलाएँ भक्त-भाव से व्यंजन पकाने में लगी हुई थीं। ठाकुरजी के व्यालू की तैयारी थी। अमर यह भण्डार देखकर दंग रह गया। इस मौसम में यहाँ बीसों झावे अंगूर से भरे थे।

    अमर यहाँ से उत्तर के द्वार में घुसा, तो यहाँ बाज़ार सा लगा देखा। एक लम्बी क़तार दरज़ियों की थी, जो ठाकुरजी के वस्त्र सी रहे थे। कहीं ज़री के काम हो रहे थे, कहीं कारचोबी की मसनदें और गावतकिये बनाये जा रहे थे। एक कतार सोनारों की थी, जो ठाकुरजी के आभूषण बना रहे थे। कहीं जड़ाई का काम हो रहा था, कहीं पालिश किया जाता था, कहीं पटवे गहने गूंथ रहे थे। एक कमरे में दस-बारह मुस्टण्डे जवान बैठे चन्दन रगड़ रहे थे। सबों के मुँह पर ढाटे बँधे हुए थे। एक पूरा कमरा इत्र और तेल और अगर की बत्तियों से भरा हुआ था। ठाकुरजी के नाम पर धन का कितना अपव्यय हो रहा है, यही सोचता हुआ अमर वहाँ से फिर बीचवाले प्रांगण में आया और सदर द्वार से बाहर निकला।

    गूदड़ ने पूछा–बड़ी देर लगाई। कुछ बात-चीत हुई?

    अमर ने हँसकर कहा–अभी तो केवल दर्शन हुए हैं, आरती के बाद भेंट होगी। यह कहकर उसने जो कुछ देखा था, विस्तारपूर्वक बयान किया।

    गूदड़ ने गर्दन हिलाते हुए कहा–भगवान का दरबार है। जो संसार को पालता है, उसे किस बात की कमी। सुना तो हमने भी है, लेकिन कभी भीतर नहीं गये कि कोई पूछने-पाछने लगे, तो निकाले जायँ। हाँ, घुड़साल और गऊशाला देखी है। मन चाहे तुम भी देख लो।

    अभी समय बहुत बाकी था। अमर गऊशाला देखने चला। मन्दिर के दक्खिन पशुशालाएँ थीं। सबसे पहले फ़ीलखाने में घुसे। कोई पच्चीस-तीस हाथी आँगन में जंजीरों में बँधे खड़े थे। कोई इतना बड़ा कि पूरा पहाड़, कोई इतना छोटा जैसे भैंस! कोई झूम रहा था, कोई सूंड़ घुमा रहा था, कोई बरगद के डाल-पात चबा रहा था। उनके हौदे, झूलें, अम्बारियाँ, गहने सब अलग एक गोदाम में रखे हुए थे। हरेक हाथी का अपना नाम, अपने सेवक, अपना मकान अलग था। किसी को मन भर रातिब मिलता था, किसी को चार पसेरी। ठाकुरजी की सवारी में जो हाथी था, वही सबसे बड़ा था। भगत लोग उसकी पूजा करने आते थे। इस वक्त भी मालाओं का ढेर उसके सिर पर पड़ा हुआ था। बहुत से फूल पैरों के नोचे थे।

    यहाँ से घुड़साल में पहुँचे। घोड़ों की कतारें बँधी हुई थीं, मानो सवारों की फ़ौज का पंड़ाव हो। पाँच सौ घाड़ा से कम न थे, हरेक जाति के हरेक देश के। कोई सवारी का, कोई शिकार का, कोई बग्घी का, कोई पोलो का। हरेक घोड़े पर दो-दो आदमी नौकर थे। महन्तजी को घुड़दौड़ का बड़ा शौक़ था। इनमें कई घोड़े घुड़दौड़ के थे। उन्हें रोज़ बादाम और मलाई दी जाती थी। ⁠ गऊशाले में भी चार-पाँच सौ गायें-भैंसें थी। बड़े-बड़े मटके ताजे दूध से भरे रखे थे। ठाकुरजी आरती के पहले स्नान करेंगे। पाँच-पाँच मन दूध उनके स्नान को तीन बार रोज चाहिए, भण्डार के लिए अलग।

    अभी यह लोग इधर-उधर घूम रहे थे कि आरती शुरू हो गई। चारों तरफ़ से लोग आरती करने को दौड़ पड़े।

    गूदड़ ने कहा–तुमसे कोई पूछता कौन भाई हो, तो क्या बताते?

    अमर ने मुसकराकर कहा–वैश्य बताता।

    'तुम्हारी तो चल जाती; क्योंकि यहाँ तुम्हें लोग कम जानते हैं। मुझे तो लोग रोज़ ही हाते में चरसे बेचते देखते हैं, पहचान लें, तो जीता न छोड़ें। अब देखो भगवान की आरती हो रही है और हम भीतर नहीं जा सकते। यहाँ के पण्डों-पुजारियों के चरित्र सुनो तो दाँतों उँगली दबा लो; पर वे यहाँ के मालिक हैं, और हम भीतर कदम नहीं रख सकते। तुम चाहे जाकर आरती ले लो। तुम सूरत से भी तो ब्राह्मण जँचते हो। मेरी तो सूरत ही चमार-चमार पुकार रही है।

    अमर की इच्छा तो हुई कि अन्दर जाकर तमाशा देखे; पर गूदड़ को छोड़कर न जा सका। कोई आध घण्टे में आरती समाप्त हुई और उपासक लौटकर अपने-अपने घर गये, तो अमर महन्तजी से मिलने चला। मालूम हुआ, कोई रानी साहब दर्शन कर रही हैं। वहीं आँगन में टहलता रहा।

    आध घंटे के बाद उसने फिर साधु द्वारपाल से कहा तो पता चला, इस वक्त नहीं दर्शन हो सकते। प्रातःकाल आओ।

    अमर को क्रोध तो ऐसा आया कि इसी वक्त महन्तजी को फटकारे; पर ज़ब्त करना पड़ा। अपना-सा मुँह लेकर बाहर चला आया।

    गूदड़ ने यह समाचार सुनकर कहा–इस दरबार में भला हमारी कौन सुनेगा?

    'महन्तजी के दर्शन तुमने कभी किये हैं?'

    'मैंने! भला मैं कैसे करता? कभी नहीं।'

    नौ बज रहे थे, इस वक्त घर लौटना मुश्किल था। पहाड़ी रास्ते, जङ्गली जानवरों का खटका, नदी-नालों का उतार। कहीं रात काटने की सलाह हुई। दोनों एक धर्मशाला में पहुँचे और कुछ खा-पीकर वहीं पड़

    रहने का विचार किया। इतने में दो साधु भगवान् का ब्यालू बेचते हुए नजर आये। धर्मशाला के सभी यात्री लेने दौड़े। अमर ने भी चार आने की एक पत्तल ली। पूरियाँ, हलवे, तरह-तरह की भाजियाँ, अचार-चटनी, मुरब्बे, मलाई, दही। इतना सामान था कि अच्छे दो खानेवाले तृप्त हो जाते। यहाँ चूल्हा बहुत कम घरों में जलता था। लोग यही पत्तल ले लिया करते थे। दोनों ने खूब पेट-भर खाया और पानी पीकर सोने की तैयारी कर रहे थे कि एक साधु दूध बेचने आया–शयन का दूध ले लो। अमर की इच्छा न थी; पर कुतूहल से उसने दो आने का दूध लिया। पूरा एक सेर था, गाढ़ा, मलाईदार, उसमें से केसर और कस्तूरी की सुगन्ध उड़ रही थी। ऐसा दूध उसने अपने जीवन में कभी न पिया था।

    बेचारे बिस्तर तो लाये न थे, आधी-आधी धोतियाँ बिछाकर लेटे।

    अमर ने विस्मय से कहा–इस खर्च का कुछ ठिकाना है!

    गूदड़ भक्तिभाव से बोला–भगवान् देते हैं और क्या! उन्हीं की महिमा है। हज़ार-दो-हज़ार यात्री नित्य आते हैं। एक-एक सेठिया बीस-बीस हजार की थैली चढ़ाता है। इतना खरचा करने पर भी करोड़ों रुपये बैंक में जमा हैं।

    'देखें कल क्या बातें होती हैं।'

    'मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि कल भी दर्शन न होंगे।'

    दोनों आदमियों ने कुछ रात रहे उठकर स्नान किया और दिन निकलने के पहले ड्योढ़ी पर जा पहुँचे। मालूम हुआ, महन्तजी पूजा पर हैं।

    एक घंटा बाद फिर गये तो, सूचना मिली, महन्तजी कलेऊ पर हैं।

    जब वह तीसरी बार नौ बजे गया तो मालूम हुआ, महन्तजी घोड़ों का मुआइना कर रहे हैं। अमर ने झुंझलाकर द्वारपाल से कहा–तो आखिर हमें कब दर्शन होंगे?

    द्वारपाल ने पूछा–तुम कौन हो?

    ‘मैं उनके इलाक़े का असामी हूँ। उनके इलाक़े के विषय में कुछ कहने आया हूँ।'

    'तो कारकुन के पास जाओ। इलाक़े का काम वही देखते हैं।' ⁠ अमर पूछता हुआ कारकुन के दफ्तर में पहुँचा, तो बीसों मुनीम लंबी-लंबी बही खोले लिख रहे थे। कारकुन महोदय मसनद लगाये हुक्का पी रहे थे।

    अमर ने सलाम किया।

    कारकुन साहब ने दाढ़ी पर हाथ फेरकर पूछा–अर्ज़ी कहाँ है?

    अमर ने बगलें झाँककर कहा–अर्ज़ी तो मैं नहीं लाया।

    'तो फिर यहाँ क्या करने आये?'

    'मैं तो श्रीमान् महन्तजी से कुछ अर्ज़ करने आया था।'

    'अर्ज़ी लिखाकर लाओ।'

    'मैं तो महन्तजी से मिलना चाहता हूँ।'

    'नज़राना लाये हो?'

    'मैं ग़रीब आदमी हूँ, नज़राना कहाँ से लाऊँ।'

    'इसीलिए कहता हूँ, अर्ज़ी लिखकर लाओ। उस पर विचार होगा। जो कुछ हुक्म होगा, वह सुना दिया जायगा।'

    'तो कब हुक्म' सुनाया जायगा?'

    'जब महन्तजी की इच्छा हो।'

    'महन्तजी को कितना नज़राना चाहिए?'

    'जैसी श्रद्धा हो। कम-से-कम एक अशर्फ़ी।'

    'कोई तारीख़ बता दीजिए, तो मैं हुक्म सुनने आऊँ। यहाँ रोज कौन दौड़ेगा?'

    'तुम दौड़ोगे और कौन दौड़ेगा। तारीख़ नहीं बतायी जा सकती।'

    अमर ने बस्ती में जाकर विस्तार के साथ अर्ज़ी लिखी और उसे कारकुन की सेवा में पेश कर दिया। फिर दोनों घर चले गये।

    इनके आने की ख़बर पाते ही गाँव के सैकड़ों आदमी जमा हो गये। अमर बड़े संकट में पड़ा। अगर उनसे सारा वृत्तान्त कहता है, तो लोग उसी को उल्लू बनायेंगे। इसलिए बात बनानी पड़ी–अर्ज़ी पेश कर आया हूँ। उस पर विचार हो रहा है।

    काशी ने अविश्वास के भाव से कहा–वहाँ महीनों में विचार होगा तब तक यहाँ कारिन्दे हमें नोच डालेंगे। ⁠ अमर ने खिसियाकर कहा–महीनों में क्यों विचार होगा? चार दिन तो बहुत हैं।

    पयाग बोला–यह सब टालने की बातें हैं। खुशी से कौन अपने रूपये छोड़ सकता है?

    अमर रोज सबेरे जाता और घड़ी रात गये लौट आता। पर अर्ज़ी पर विचार न होता था। कारकुन, उनके मुहरिरों, यहाँ तक कि चपरासियों को मिन्नत-समाजत करता; पर कोई न सुनता था। रात को वह निराश होकर लौटता तो गाँव के लोग यहाँ उसका परिहास करते।

    पयाग कहता–हमने तो सुना था कि रुपये में ।।) छूट हो गयी।

    काशी कहता–तुम झूठे हो। मैंने तो सुना था, महन्तजी ने इस साल पूरी लगान माफ कर दी।

    उधर आत्मानन्द हलक़े में बराबर जनता को भड़का रहे थे। रोज़ बड़ी-बड़ी किसान-सभाओं की ख़बरें आती थीं। जगह-जगह किसान-सभाएँ बन रही थीं। अमर की पाठशाला भी बन्द पड़ी थी। उसे फ़ुरसत ही न मिलती थी। पढ़ाता कौन। रात को केवल मुन्नी अपनी कोमल सहानुभूति से उसके आँसू पोंछती थी।

    आख़िर सातवें दिन उसकी अर्ज़ी पर हुक्म हुआ कि सायल पेश किया जाय। अमर महन्त के सामने लाया गया। दोपहर का समय था। महन्तजी खसखाने में एक तख्त पर मसनद लगाये लेटे हुए थे। चारों तरफ़ खस की टट्टियाँ थीं जिन पर गुलाब की छिड़काव हो रहा था। बिजली के पंखे चल रहे थे। अन्दर इस जेठ के महीने में भी इतनी ठंडक थी, कि अमर को सर्दी लगने लगी।

    महन्तजी के मुख-मंडल पर दया झलक रही थी। हुक्के का एक क़श खींचकर मधुर स्वर में बोले–तुम इलाके ही में रहते हो न? मुझे यह सुनकर बड़ा दुःख हुआ कि मेरे असामियों को इस समय कष्ट है। क्या सचमुच उनकी दशा यही है, जो तुमने अर्ज़ी में लिखी है?

    अमर ने प्रोत्साहित होकर कहा–महाराज, उनकी दशा इससे कहीं ख़राब है। कितने ही घरों में चूल्हा नहीं जलता।

    महन्त ने आँखें बन्द करके कहा–भगवान्! यह तुम्हारी क्या लीला है–तो तुमने मुझे पहले ही क्यों न ख़बर दी। मैं इस फ़स्ल की वसूली रोक देता। भगवान् के भण्डार में किस चीज़ की कमी है। मैं इस विषय में बहुत जल्द सरकार से पत्र-व्यवहार करूँगा और वहाँ से जो कुछ जवाब आयेगा, वह असामियों को भिजवा दूंगा। तुम उनसे कहो, धैर्य रखें। भगवान् यह तुम्हारी क्या लीला है?

    महन्तजी ने आँखों पर ऐनक लगा ली और दूसरी अर्ज़ियाँ देखने लगे तो अमरकान्त भी उठ खड़ा हुआ। चलते-चलते उसने पूछा–अगर श्रीमान् कारिन्दों को हुक्म दे दें कि इस वक्त असामियों को दिक न करें, तो बड़ी दया हो। किसी के पास कुछ नहीं है; पर मार-गाली के भय से बेचारे घर की चीज़ें बेच-बेचकर लगान चुकाते हैं। कितने ही तो इलाक़ा छोड़-छोड़ भागे जा रहे हैं।

    महन्तजी की मुद्रा कठोर हो गयी–ऐसा नहीं होने पायेगा। मैंने कारिंदों को कड़ी ताकीद कर दी है कि किसी असामी पर सख्ती न की जाय। मैं उन सबों से जवाब तलब करूँगा। मैं असामियों का सताया जाना बिल्कुल पसन्द नहीं करता।

    अमर ने झुककर महन्तजी को दण्डवत किया और वहाँ से बाहर निकला, तो उसकी बाछें खिली जाती थीं। वह जल्द-से-जल्द इलाके में पहुँचकर यह ख़बर सुना देना चाहता था। ऐसा तेज जा रहा था, मानो दौड़ रहा है। बीच-बीच में दौड़ भी लगा लेता था, पर सचेत होकर रुक जाता था। लू तो न थी पर धूप बड़ी तेज़ थी, देह फुंकी जाती थी, फिर भी वह भागा चला जाता था। अब वह स्वामी आत्मानन्द से पूछेगा, कहिए, अब तो आपको विश्वास आया न कि संसार में सभी स्वार्थी नहीं हैं? कुछ धर्मात्मा भी हैं, जो दूसरों का दुःख-दर्द समझते हैं। अब उसके साथ के बेफ़िकों की ख़बर भी लेगा। अगर उसके पर होते तो उड़ जाता।

    सन्ध्या समय वह गाँव में पहुँचा, तो कितने ही उत्सुक, किन्तु अविश्वास से भरे नेत्रों ने उसका स्वागत किया।

    काशी बोला–आज तो बड़े प्रसन्न हो भैया; पाला मार आये क्या?

    अमर ने खाट पर बैठते हए अकड़कर कहा–जो दिल से काम करेगा, वह पाला मारेगा ही। ⁠ बहुत से लोग पूछने लगे–भैया, क्या हुकूम हुआ?

    अमर ने डाक्टर की तरह मरीज़ों को तसल्ली दी–महन्तजी को तुम लोग व्यर्थ बदनाम कर रहे थे। ऐसी सज्जनता से मिले कि मैं क्या कहूँ; कहा हमें तो कुछ मालूम ही नहीं, पहले ही क्यों न सूचना दी, नहीं हमने वसूली बन्द कर दी होती। अब उन्होंने सरकार को लिखा है। यहाँ कारिंदों को भी वसूली की मनाही हो जायगी।

  • कपालकुण्डला

    कपालकुण्डला

    Aproximadamente 45.432 palavras.

    कपालकुण्डला
    https://hi.wikisource.org/wiki/कपालकुण्डला

    चौथा खण्ड

    :१:

    शयनागार में

    “अधिकार बेड़ी भाँगी, एकमम मिनति”

    —ब्रजाङ्गना काव्य

    लुत्फुन्निसाके आगरा जाने और फिर सप्तग्राम लौटकर आनेमें कोई एक साल हुआ है। कपालकुण्डला एक वर्षसे नवकुमारकी गृहिणी है। जिस दिन प्रदोषकालमें लुत्फुन्निसा जंगल आई उस समय कपालकुंडला कुछ अनमनी-सी अपने शयनागारमें बैठी है। पाठकोंने समुद्रतटवासिनी, आलुलायित केशा और भूषणविहीना जिस कपालकुण्डलाको देखा था, अब वह कपालकुंडला नहीं है। श्यामासुन्दरीकी भविष्यवाणी सत्य हुई है। पारसमणिके स्पर्शसे योगिनी गृहिणी हुई है, इस समय वह सारे रेशम जैसे रूखे लम्बे बाल, जो पीठपर अनियन्त्रित फहराया करते थे अब आपसमें गुँथकर वेणी-रूपमें शोभा पा रहे हैं। वेणीरचनामें भी बहुत कुछ शिल्प-परिपाटी है, केशविन्यासमें सूक्ष्म केशीकार्य श्यामासुन्दरीके विन्यास-कौशलका परिचय दे रहा है। फूलोंको भी छोड़ा नहीं गया है, वे भी वेणीमें चारों तरफ खूबसूरतीके साथ गूँथे हुए हैं। सरपरके बाल भी समान ऊँचाईमें नहीं, बल्कि मालूम होता है, कि आकुंचनयुक्त कृष्ण तरंग मालाकी तरह शोभित हैं। मुखमंडल अब केशसमूहसे ढँका नहीं रहता; ज्योतिर्मय होकर शोभा पाता है। केवल कहीं-कहीं पुष्प-गुच्छ लटक रहे हैं और स्वेदविन्दु झलक रहे हैं। वर्ण वही, अर्द्ध-पूर्णशशाङ्क-रश्मिरुचिर। अब दोनों कानोंमें स्वर्ण कुण्डल लहरा रहे हैं; गलेमें नेकलेस हार है। रंगके आगे वह म्लान नहीं है। वल्कि वह इस प्रकार शोभा पा रहे हैं जैसे अर्धचन्द्र-कौमुदी-वसना धारिणीके अङ्गपर वह नैश कुसुमवत शोभित हैं। वह दुग्धश्वेत जैसे शुभ्र वस्त्र पहने हुए है; वह वस्त्र आकाशमण्डलमें खेलनेवाले सफेद बादलोंकी तरह शोभा पा रहे हैं।

    यद्यपि वर्ण वही है लेकिन पूर्वापेक्षा कुछ म्लान, जैसे आकाश में कहीं काले मेघ झलक रहे हों। कपालकुण्डला अकेली बैठी न थी। उसकी सखी श्यामासुन्दरी पासमें बैठी हुई है। उन दोनोंमें आपसमें बातें हो रही थीं। उनकी वार्ताका कुछ अंश पाठकोंको सुनना होगा।

    कपालकुण्डलाने पूछा—“नन्दोईजी, अभी यहाँ कितने दिन रहेंगे?”

    श्यामाने उत्तर दिया—“कल शामको चले जायेंगे। आहा आज रातको भी यही औषधि लाकर रख लेती तो भी उन्हें वश कर मनुष्य जन्म सार्थक कर सकती। कल रातको निकली तो लात-जूता खाया, फिर भला आज रात कैसे निकलूँ?”

    क०—दिनको ले आनेसे काम न चलेगा?

    श्या०—नहीं, दिनमें तोड़नेसे फल न होगा। ठीक आधी रातको खुले बालोंसे तोड़ना होता है, अरे बहन! क्या कहें, मनकी साध मनमें ही रह गयी।

    क०—अच्छा, आज दिनमें तो मैं उस पेड़को पहचान ही आई हैं; और जिस वनमें है, वह भी जान चुकी हूँ। अब आज तुम्हें जाना न होगा, मैं अकेली ही रातमें जाकर औषधि ला दूँगी।

    श्या०—नहीं-नहीं। एक दिन जो हो गया सो हो गया। तुम रातको अकेली न निकलना।

    क०—इसके लिए तुम चिन्ता क्यों करती हो? सुन तो चुकी हो, रातको जंगलमें अकेली घूमना मेरा बचपनका अभ्यास है। मनमें विचार करो, यदि मेरा ऐसा अभ्यास न होता, तो आज कभी तुमसे मुलाकात भी न हुई होती।

    श्याम०—इस ख्यालसे नहीं कहती हूँ। किन्तु यह ख्याल है कि रातको जंगलमें अकेली घूमना क्या भले घरकी बहू-बेटियोंका काम है? दो आदमियोंके रहने पर तो इतना तिरस्कार उठाना पड़ा, तुम यदि अकेली गयीं, तो भला कैसे रक्षा होगी?

    क०—इसमें हर्ज ही क्या है? तुम क्या यह ख्याल करती हो कि मैं रातमें घरके बाहर होते ही कुचरित्रा हो जाऊँगी?

    श्या०—नहीं-नहीं। यह ख्याल नहीं। लेकिन बुरे लोग तो बुराई करते ही हैं।

    क०—कहने दो; मैं उनके कहनेसे बुरी तो हो न जाऊँगी।

    श्या०—यह तो है ही; लेकिन तुम्हें कोई बुरा-भला कहे तो हम लोगोंके मनको चोट पहुँचेगी।

    क०—इस तरहकी व्यर्थकी चोट न पहुँचने दो।

    श्या०—खैर, मैं यह भी कर सकूँगी, लेकिन भैयाको क्यों नाराज-दुखी करती हो?

    कपालकुण्डलाने श्यामासुन्दरीके प्रति एक विमल कटाक्षपात किया। बोली—“इसमें यदि वह नाराज हों, तो मैं क्या करूँ, मेरा क्या दोष? अगर जानती कि स्त्रियोंका विवाह दासी बनना है, तो कभी शादी न करती।

    इसके बाद और जवाब-सवाल करना श्यामासुन्दरीने उचित न समझा; अतः वह अपने कामसे हट गयी।

    कपालकुण्डला आवश्यकीय कार्यादिसे निवृत्त हुई। घरके कामसे खाली हो, वह औषधि लानेके लिये घरसे निकल पड़ी। उस समय एक पहर रात बीत चुकी थी। चाँदनी रात थी। नवकुमार बाहरी कमरमें बैठे हुए थे। उन्होंने खिड़कीमें से देखा कि कपालकुएडला बाहर जा रही है। उन्होंने भी घरके बाहर हो मृण्मयी का हाथ पकड़ लिया। कपालकुण्डलाने पूछा—“क्या?”

    नवकुमारने पूछा—“कहाँ जाती हो?” नवकुमारके स्वरमें तिरस्कारका लेशमात्र भी न था।

    कपालकुण्डला बोली—“श्यामासुन्दरी अपने पतिको वशमें करनेके लिए एक जड़ी चाहती है, वही लेने जाती हूँ।”

    नवकुमारने पूर्ववत् कोमल स्वरमें पूछा—“कल तो एक बार हो आई थी; फिर आज क्यों?”

    क०—कल खोजकर पा न सकी। आज फिर खोजूँगी।

    नवकुमारने कोमल स्वरमें ही कहा—“अच्छा, दिनमें जानेसे क्या काम न होगा?” नवकुमारका स्वर स्नेहपूर्ण था।

    कपालकुएडलाने कहा—“लेकिन दिनकी ली गयी जड़ी फलती नहीं।”

    नव०—तो तुम्हें खोजनेकी क्या जरूरत है? मुझे जड़ीका नाम बता दो, मैं खोजकर ला दूँगा।

    क०—मैं पेड़ देखकर पहचान सकती हूँ, उसका नाम नहीं जानती और तुम्हारे तोड़नेसे भी उसका फल न होगा। औरतोंको बाल खोलकर तोड़ना पड़ता है। तुम परोपकारमें विघ्न न डालो।

    कपालकुण्डलाने यह बात अप्रन्नतापूर्वक कही। नवकुमारने भी फिर आपत्ति न की। बोले—“चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।”

    कपालकुण्डलाने अभिमान भरे स्वरमें कहा—“आओ, मैं अविश्वासिनी हूँ या क्या हूँ, अपनी आँखसे देख लो।”

    नवकुमारने फिर कुछ न कहा। उन्होंने कपालकुण्डलाका हाथ त्याग दिया और घरके अन्दर चले गये। कपालकुण्डला अकेली जङ्गलमें घुसी।

    ⋆

    ↑

    अनुवादक की भ्रान्ति। मूलमें है:

    राधिकार बेड़ी भाङ, ए मम मिनति।

    ⁠ ब्रजाङ्गना काव्य

    :२:

    जंगलमें

    —“Tender is the night.

    and happy the queen moon is on her throne

    Clustered around by all her starry fays.

    But see there is on light.”

    —Keats.

    सप्तग्रामका यह भाग जङ्गलमय है, यह बहुत कुछ पहले लिखा जा चुका है। गाँवसे थोड़ी ही दूर पर घना जङ्गल है। कपालकुण्डला एक संकीर्ण जङ्गली राहसे अकेली औषधिकी खोजमें चली। निस्तब्ध रात्रि थी, शब्दहीन, किन्तु मधुर। मधुर रात्रिमें स्निग्ध और उज्ज्वल किरण फैलाते हुए चन्द्रदेव आकाशमें रुपहले बादलोंको अतिक्रम करते अपनी यात्रा कर रहे थे। नीरव हो वृक्षके पत्ते उन किरणोंसे अठखेलियाँ कर रहे थे। शान्त लतागुल्मोंके बीच फूल खिलकर सफेद चाँदनीमें अपने अस्तित्वसे होड़ लगा रहे थे। पशु-पक्षी सब नीरव थे, प्रकृति नीरव थी, लेकिन कभी-कभी घोसलोंमें बैठे पक्षियोंके डैनोंकी फड़फड़ाहट, सूखे पत्तोंके गिरनेका शब्द, सर्पादि जीवोंके रेंगने और दूर कुत्तोंके भौंकनेका शब्द सुनाई पड़ जाता था। वायु भी निस्तब्ध थी, यह बात नहीं, वह चल रही थी, लेकिन इतनी मृदुगतिसे कि केवल ऊपरी वृक्षपत्रमात्र हिलते थे, लताएँ रस लेती थीं; आकाशमें निरभ्र मेघखण्ड धीरे-धीरे उड़ रहे थे। उस प्रकृतिकी नीरवताका सुख लेनेवाला अनुभव कर सकता था कि मन्द वायु-प्रवाह जारी है। पूर्व-सुखकी स्मृति जाग रही थी।

    कपालकुण्डलाकी पूर्व स्मृति इस समय जागी। उसे याद आया कि सागर तटवर्ती बालियाड़ी ढूहेपर मन्द वायु किस प्रकार उसके केशोंके साथ खिलवाड़ करती थी। आकाशकी तरफ देखा, अनन्त नील मण्डल याद आया, समुद्रका रूप। कपालकुएडला इसी तरहकी पूर्व स्मृतिसे अनमनी चली जा रही है।

    अनमनी होनेके कारण, कपालकुण्डलाको याद न रहा कि वह किस कामके लिए कहाँ जा रही है। जिस राहसे वह जा रही है, वह क्रमशः अगम्य होने लगा। जगल घना हो गया। मस्तकपर लता-वृक्षका वितान घना हो गया। चाँदनी न आनेके कारण अँधेरा हो गया। क्रमशः राह भी गुम हो गयी। राह न मिलनेके कारण कपालकुण्डलाका स्वप्न भंग हुआ। उसने उधर ताक कर देखा, दूर एक रोशनी जल रही थी। लुत्फुन्निसाने भी पहले इसी रोशनीको देखा था। पूर्व अभ्यासके कारण कपालकुण्डला इन सब बातोंसे भयरहित थी; लेकिन कौतूहल तो अवश्य हुआ। वह धीरे-धीरे उस ज्योतिके समीप पहुँची। उसने जाकर देखा कि जहाँ रोशनी जल रही है, वहाँ तो कोई भी नहीं; किन्तु उससे थोड़ी ही दूर पर घना जंगल होनेके कारण एक टूटी मड़ैया-सी अस्पष्ट दिखाई दी। उसकी दीवारें यद्यपि ईटों की थीं, किन्तु टूटी-फूटी-छोटीसी केवल एक कोठरीमात्र थी। उस घरमें से बातचीतकी आवाज आ रही थी। कपालकुण्डला निःशब्द पैर रखती हुई उस मड़ैयाके पास जा पहुँची। पास पहुँचते ही मालूम हो गया कि दो मनुष्य सावधानीके साथ बातें कर रहे हैं। पहले तो वह बात कुछ समझ न सकी; लेकिन बादमें पूरी चेष्टा करने पर निम्नलिखित प्रकार की बातें सुनाई पड़ीं—

    एक कह रहा है—“मेरा अभीष्ट मृत्यु है; इसमें यदि ब्राह्मण सहमत न हों, तो मैं तुम्हारी सहायता न करूँगा; तुम भी मेरी सहायता न करना।”

    दूसरा बोला—“मैं भी मंगलाकांक्षी नहीं हूँ, लेकिन जीवन भरके लिए, उसका निर्वासन हो; इसमें मैं राजी हूँ। लेकिन हत्याकी कोई चेष्टा मेरे द्वारा नहीं हो सकती, वरन् उसके प्रतिकूलाचरण ही करूँगी।

    फिर पहलेने कहा—“बहुत अबोध हो तुम। तुम्हें कुछ ज्ञान सिखाता हूँ। मन लगाकर सुनो। बहुत ही गूढ़ बातें कहूँगा। एक बार चारों तरफ देख तो जाओ, मुझे श्वासकी आवाज लग रही है।”

    वस्तुतः बातें मजेमें सुनने के लिए कपालकुण्डला मड़ैयाके दरवाजेके समीप ही आ गयी थी। अतीव आग्रह होनेके कारण उसकी साँसें जोर-जोरसे चल रही थीं।

    साथीकी बातोंपर एक व्यक्ति घर के दरवाजे पर आया और आते ही उसने कपालकुण्डलाको देख लिया। कपालकुण्डलाने भी चमकीली चाँदनीमें उस आगन्तुकको देखा। वह स्थिर न कर सकी कि उस आगन्तुकको देखकर वह खुश हो, या डरे। उसने देखा कि आगन्तुक ब्रह्मवेशी है। सामान्य धोती पहने हुए है, शरीर एक उत्तरीय द्वारा अच्छी तरह ढँका हुआ है। ब्राह्मणकुमार बहुत ही कोमल और नवयुवक जान पड़ा; कारण, उसके चेहरेसे बहुत ही कमनीयता दिखाई पड़ी थी, चेहरा अतीव सुन्दर है, स्त्रियों के चेहरेके अनुरूप, लेकिन रमणी दुर्लभ तेजविशिष्ट है। उसके बाल मर्दोंकी तरह कटे हुए नहीं, बल्कि स्त्रियोंकी तरह घुँघराले कुछ पीठ और छाती पर लटक रहे थे। ललाट पर चमक, उभरा हुआ और एक शिरा साफ दिखाई पड़ती थी। दोनों आँखोंमें गजबका तेज था। हाथमें एक नङ्गी तलवार थी। किन्तु इस रूपराशिमें एक तरहका भीषण भाव दिखाई पड़ रहा था। हेमन्त वर्णपर मानो कोई कराल छाया पड़ गयी हो उसकी अन्तस्तल तक धँस जानेवाली आँखोंकी चमक देखकर कपालकुण्डला भयभीत हुई।

    दोनों एक दूसरेको एक क्षण तक देखते रहे। पहले कपालकुण्डलाने आँखें झपकायीं। उसकी आँखें झपकते ही आगन्तुकने पूछा—“तुम कौन?”

    यदि एक वर्ष पहले उस जङ्गलमें ऐसा प्रश्न किसीने किया होता तो कपालकुण्डला समुचित उत्तर तुरंत प्रदान करती, लेकिन इस समय इस बदली हुई परिस्थितिमें वह गृहलक्ष्मी-स्वभाव हो गयी थी, अतः सहसा उत्तर दे न सकी। ब्राह्मणवेशी कपालकुण्डलाको निरुत्तर देखकर गम्भीर होकर कहा—“कपालकुण्डलाǃ इस रातमें भयानक जंगलमें तुम किस लिए आई हो?”

    एक अज्ञात रात्रिचर पुरुषके मुखसे अपना नाम सुनकर कपालकुण्डला अवाक् हो रही। फिर उसके मुँहसे कोई जवाब न निकला।

    ब्राह्मणवेशीने फिर पूछा—“तुमने हम लोगोंकी बातें सुनी हैं?”

    सहसा कपालकुएडलाकी वाक्‌शक्ति फिर जागी। उसने उत्तर देनेके बाद पूछा—“मैं भी वही पूछती हूँ। इस जंगलमें रातके समय तुम दोनों कौन-सी कुमन्त्रणा कर रहे थे?”

    ब्राह्मणवेशी कुछ देरतक चिन्तामग्न निरुत्तर रहा। मानो उसके हृदयमें कोई नयी इष्टसिद्धिका प्रकार आ गया हो। उसने कपाल कुण्डलाका हाथ पकड़ लिया और उस मड़ैयासे थोड़ा किनारे हटा कर ले जाने लगा। कपालकुण्डलाने बड़े ही क्रोधसे झटका देकर अपना हाथ छुड़ा लिया। ब्राह्मणवेशीने बड़ी मिठाससे कानोंके पास धीरेसे कहा—“चिन्ता क्यों करती हो? मैं पुरुष नहीं हूँ।”

    कपालकुण्डला और आश्चर्यमें आई। इस बातका उसे कुछ विश्वास भी हुआ और नहीं भी। वह ब्राह्मणवेशधारिणीके साथ गयी। उस टूटे घरसे थोड़ी दूर आड़में पहुँचकर उसने कहा—“हम लोग जो कुपरामर्श कर रहे थे, उसे सुनोगी? वह तुम्हारे ही सम्बन्ध में है।”

    कपालकुण्डलाका भय और आग्रह बढ़ गया। बोली—“सुनूँगी।” छद्मवेशीने कहा—“तो जबतक न लौटूँ, यहीं प्रतीक्षा करो।”

    यह कहकर वह छद्मवेशी उस भग्न घरमें लौट गया। कपालकुण्डला कुछ देर तक यहाँ खड़ी रही। लेकिन उसने जो कुछ सुना और देखा था, उससे उसे बहुत भय जान पड़ने लगा। यह कौन जानता है कि वह छद्मवेशी उसे यहाँ क्यों बैठा गया है? हो सकता है, अपना अवसर पाकर वह अपनी अभिसन्धि पूर्ण किया चाहता हो। यह सब सोचती हुई कपालकुण्डला भयसे विह्वल हो गयी। इधर ब्रह्मवेशीके लौटनेमें देर होने लगी। अब कपालकुण्डला बैठी रह न सकी, तेजीसे घरकी तरफ चली।

    उधर आकाश भी घटासे काला पड़ने लगा। जंगलमें चाँदनी से जो प्रकाश फैल रहा था, वह भी दूर हो गया। कपालकुण्डला को प्रतिपल देर जान पड़ने लगी। अतः वह तेजीसे जंगलसे बाहर होने लगी। आनेके समय उसे साफ पीछेसे दूसरेकी पदध्वनि सुनाई पड़ने लगी। पीछे फिरकर देखनेसे अन्धकारमय कुछ दिखाई न पड़ा। कपालकुण्डलाने सोचा कि ब्रह्मवेशी उसके पीछे आ रहा है। घना जंगल पीछे छोड़ वह उस क्षुद्र जंगली राह पर आ गयी थी। वहाँ उतना अँधेरा न था, देखनेसे कुछ दिखाई पड़ सकता था, लेकिन उसे कुछ भी दिखाई न पड़ा। अतः वह फिर तेजीसे कदम बढ़ाती हुई चली, फिर पदशब्द सुनाई पड़ा। आकाश काली-काली घटाओंसे भयानक हो उठा था। कपालकुण्डला और भी तेजी से आगे बढ़ी। घर बहुत ही करीब था; लेकिन इसी समय हवा के झटकेके साथ बूँदी पड़ने लगी। कपालकुण्डला दौड़ी। उसे ऐसा जान पड़ा कि पीछा करनेवाला भी दौड़ा। घर सामने दिखाई पड़ते-न-पड़ते भयानक वर्षा शुरू हो गयी। भयानक गर्जनके साथ बिजली चमकने लगी। आकाशमें बिजलीका जाल बिछ गया और रह-रहकर वज्र टूटने लगा। कपालकुण्डला किसी तरह आत्मरक्षा कर घर पहुँची। पास का बगीचा पारकर दरवाजेके अन्दर दाखिल हुई। दरवाजा उसके लिए खुला हुआ था। दरवाजा बन्द करनेके लिए वह पलटी। उसे ऐसा जान पड़ा कि सामने दरवाजेके बाहर कोई वृद्धाकार मनुष्यमूर्ति खड़ी थी। इसी समय एक बार बिजली चमक गयी। उस एक ही चमकमें कपालकुण्डला उसे पहचान गयी। वह सागरतीरवासी वही कापालिक है।

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    अनुवादक की भ्रान्ति। मूलमें है:

    —“Tender is the night,

    And haply the Queen moon is on her throne

    Clustered around by all her starry fays;

    But here there is no light.”

    ⁠ Keats.

    :३:

    स्वप्नमें

    “I had a dream; which was

    not at all adream .”

    —Byron

    कपालकुण्डलाने धीरे-धीरे दरवाजा बन्द कर दिया और शयनागारमें आयी। वह धीरेसे अपने पलंगपर सो रही। मनुष्यहृदय अनन्त समुद्र है, जब उससे प्रबल वायु समर करने लगती है तो कितनी तरंगें उठती हैं, यह कौन गिन सकता है। प्रबल वायुसे हिलता और वर्षाजलसे भींगा हुआ जटाजूटधारी कापालिकका चेहरा उसे सामने दिखाई पड़ने लगा; पहलेकी समूची घटनाओंकी कपालकुण्डला याद करने लगी। घने जंगलमें कापालिककी वह भैरवी पूजा, अन्यान्य पैशाचिक कार्य, वह उसके साथ कैसा आचरण कर भागकर आयी है, नवकुमारको बन्धन, यह सब याद आने लगा। कपालकुण्डला काँप उठी। आज रातकी सारी घटनाएँ आँखके सामने नाच उठीं। श्यामाकी औषधिकामना, नवकुमारका निषेध, उनके प्रति कपालकुण्डलाका तिरस्कार, इसके बाद अरण्यकी ज्योत्स्नामयी शोभा, वह भीषण दर्शन सब याद आया।

    पूर्व दिशामें उषाकी मुकुट ज्योति प्रकट हुई, उस समय कपालकुण्डलाको तन्द्रा आ गयी। उस हल्की नींदमें कपालकुण्डला स्वप्न देखने लगी। मानों वह उसी सागरवक्षपर नावपर सवार चली जा रही है, तरणी सजी हुई, उसपर वासन्ती रंगकी ध्वजा फहरा रही है, नाविक फूलोंकी माला पहने हुए, नाव खे रहे हैं। राधेश्यामका अनन्त प्रणयगीत हो रहा है। पश्चिम गगनसे सूर्य तप रहे हैं, स्वर्ण धारामें समुद्र हँस रहा है। आकाशमें खण्ड-खण्ड मेघ भी उस धारामें स्नान कर रहे हैं। एकाएक रात हो गयी। सूर्य कहाँ चले गये! सुनहले बादल कहाँ गए! घने-काले बादल छा गये। समुद्रमें दिक्भ्रम होने लगा। किधर जाया जाय! नाव पलटी। गाना बन्द हुआ, गलेकी माला फेंक दी गयी, पताका गायब हो गयी, आँधी आयी। सागरमें वृक्ष-परिमाण लहरें उठने लगीं। लहरसे कापालिक प्रकट हुआ। बाएँ हाथमें नाव पकड़ डुबानेको तैयार हुआ। इसी समय वह ब्राह्मणवेषधारी प्रकट हुआ। उसने पूछा—“बोलो नाव डुबा दें, या बचा दें?” कपालकुण्डलाने कहा—“डुबा दो।” उसने नावको छोड़ दिया। नाव भी बोल उठी—“अब मैं भार उठा न सकूँगी, पातालमें जाती हूँ?” यह कहती हुई नाव पातालमें प्रवेश कर गयी।

    पसीनेसे नहायी हुई, कपालकुण्डला स्वप्नसे जाग उठी। उसने देखा कि सबेरा हो गया है। उन्मुक्त खिड़कीसे वासन्ती हवा आ रही है। वृक्ष हलकी हवासे फूल सहित झूम रहे हैं। हिलती शाखाओंपर बैठे पक्षी गा रहे हैं। कितनी फूलोंसे लदी शाखाएँ खिड़की के अन्दर घुसी आ रही हैं। कपालकुण्डला नारी-स्वभाववश उन शाखाओंको एकत्र करने लगी। एकाएक उसमेंसे एक लिपि बाहर हुई। कपालकुण्डला पढ़ना जानती थी; उसने पढ़ा—पत्र यों था—

    “आज शामके बाद कल रातकी तरह ब्राह्मणकुमारके साथ मुलाकात करो। तुम अपने बारेमें जो प्रयोजनीय बात सुनना चाहती थीं, उसे सुनोगी।—अहं ब्राह्मणवेशी।”

    ⋆

    :४:

    संकेतानुसार

    उस दिन शामतक कपालकुण्डला केवल यही चिन्ता करती रही कि ब्राह्मणवेशीके साथ मुलाकात करना चाहिए या नहीं। एक पतिव्रता युवतीके लिये निर्जन रातमें परपुरुष सम्भाषण बुरा और निन्दनीय है, केवल यही विचार कर वह मिलनेमें हिचकती थी, कारण, उसका सिद्धान्त था कि असद्उद्देश्यसे न मिलनेसे कोई हानि नहीं है। स्त्रीको स्त्रीसे या पुरुषको पुरुषसे मिलनेका, जैसा अधिकार मुझे है, वैसा ही अधिकार निर्मल चित्त रखनेपर उसे भी प्राप्त है। सन्देह केवल यह है कि ब्राह्मणवेशी पुरुष है या स्त्री। उसे संकोच था तो केवल इसलिए कि मुलाकात मंगलजनक है अथवा नहीं। पहले ब्राह्मणवेशीसे मुलाकात, फिर कापालिक द्वारा पीछा और दर्शन और अन्तमें स्वप्न, इन सब घटनाओंने कपालकुण्डलाको बहुत डरा दिया था। उसका अमङ्गल निकट है उसे ऐसा जान पड़ने लगा और उसे यह भी सन्देह न रहा कि यह अमङ्गल कापालिकके आगमनके कारण है। यह तो स्पष्ट ही उसने कहा कि बातें कपालकुण्डलाके बारेमें ही हो रही थीं। हो सकता है, उसके द्वारा कोई बचावकी भी राह निकल आये। लेकिन बातोंसे तो यही जान पड़ता है कि या तो मृत्यु अथवा निर्वासन दण्ड। तो क्या ये सारी बातें मेरे ही लिए हैं? ब्राह्मणवेशीने तो कहा था कि उसके बारेमें ही बात है। ऐसी कुमंत्रणामें ब्राह्मणवेशी जब सहकारी है, तो उससे मिलना मंगलजनक नहीं, बल्कि आफत स्वयं बुलाना होगा। लेकिन रातमें जो स्वप्न देखा उसमें तो ब्राह्मणवेशीके कथनसे जान पड़ा कि वह रक्षा भी कर सकता है। तो क्या होगा? क्या वह स्वप्नकी तरह डुबायेगा? हो सकता है, माताजीने उसे इसीलिए भेजा हो कि उससे मेरी रक्षा ही हो। अतएव कपालकुण्डलाने मुलाकात करनेका ही निश्चय किया। बुद्धिमान ऐसा सिद्धान्त करता या नहीं, सन्देह है, लेकिन यहाँ बुद्धिमानीसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। कपालकुण्डला कच्ची उम्र की थी, अतः उसने बुद्धिमानीका विचार नहीं किया। उसने कुतूहली रमणी जैसा सिद्धान्त किया; भीमकान्त रूपराशि दर्शन लोलुप जैसा कार्य किया; नैशवनविहारिणी संन्यासीपालिताकी तरह सिद्धान्त किया और सिद्धान्त किया दीपक शिखापर पतित होनेवाले पतंगेकी तरह।

    सन्ध्याके बाद बहुत-कुछ गृह-कार्य समाप्त कर कपालकुण्डलाने पहलेकी तरह वनयात्रा की। यात्राके समय कपालकुण्डलाने अपने कमरेका दीपक तेज कर दिया। लेकिन वह जैसे ही घरके बाहर हुई दीपक बुझ गया।

    यात्राके समय कपालकुण्डला एक बात भूल गयी। ब्राह्मणवेशधारीने किस जगह मुलाकातके लिए लिखा है? अतः पत्र पढ़नेकी फिर आवश्यकता हुई। उसने लौटकर पत्र रखा हुआ स्थान ढूँढा, लेकिन वहाँ पत्र न मिला। याद आया कि उसने पत्रको अपने जूड़ेमें खोंस लिया था। अतः जूड़ेमें देखा, वेणी खोलकर देखा, लेकिन पत्र न मिला। घरके अन्य स्थानोंको खोजा। अतएव पूर्व स्थानपर मिलनेके ख्यालसे निकल पड़ी। जल्दीमें उसने फिर अपने खुले बाल बाँधे नहीं। अतः आज कपालकुण्डला प्रथम अनूढ़ाकी तरह उन्मुक्तकेश होकर चली।

    ⋆

    :५:

    दरवाजेपर

    “Stand you a while apart

    Confine yourself, but in a patient list.

    —Othello

    सन्ध्यासे पहले जब कपालकुण्डला गृहकार्यमें लगी हुई थी, उसी समय वह पत्र जूड़ेसे खसककर गिर पड़ा था। कपालकुण्डलाको पता न रहा। उसे नवकुमारने देख लिया। जूड़ेसे पत्र गिरते देख उन्हें आश्चर्य हुआ। कपालकुण्डलाके वहाँसे हट जानेपर उन्होंने पत्रको पढ़ा, उसके पढ़नेसे एक ही सिद्धान्त सम्भव है। “जो बात कल सुनना चाहती थी, वह आज सुनेंगी?” वह कौनसी बात है? क्या प्रणय वाक्य? क्या ब्राह्मणवेशधारी मृण्मयीका उपपति है? जो व्यक्ति पहली रातकी घटनासे अवगत नहीं है, वह केवल यही सोच सकता है।

    स्वामीके साथ सती होनेके समय अन्य किसी कारणसे जब कोई जीता हुआ चितारोहण करता है और चितामें आग लगा दी जाती है तो पहले धुएँसे उसके चारों ओरका स्थान घिर जाता है, फिर क्रमशः लकड़ियोंके बीचसे एक-दो अग्निशिखा सर्प जिह्वाकी तरह उसके अंगपर आकर आक्रमण करती हैं, फिर अन्तमें ज्वालमाला चारों तरफसे घेर लेती है और शिरपर्यन्त अग्नि पहुँच कर उसे दग्ध कर राख बना देती है।

    पत्र पढ़नेपर नवकुमारका भी यही हाल हुआ। पहले समझे नहीं, फिर संशय, निश्चयता, अन्तमें ज्वाला। मनुष्यका हृदय एकबारगी दुःख या सुख बर्दाश्त कर नहीं सकता; क्रमशः ग्रहण कर सकता है। पहले तो धुएँने नवकुमारको घेर लिया; इसके बाद अग्निशिखा हृदयपर ताप पहुँचाने लगी, अन्तमें हृदय भस्म होने लगा। उन्होंने विचारकर देखा कि अबसे पहले किन बातोंमें कपालकुण्डला अबाध्य रही है। उन्होंने देखा कि यह स्वतन्त्रता ही है। वह सदा स्वतन्त्र रही, जहाँ कहीं घूमने गयी अकेली। दूसरोंके शिकायत करनेपर भी नवकुमारने कभी उसपर सन्देह न किया, लेकिन आज वह सब यादकर उन्हें प्रतीति होने लगी।

    यंत्रणाका प्रथम वेग निकल गया। नवकुमार एकान्तमें चुपचाप बैठ कर रोने लगे, रोनेके बाद कुछ स्थिर हुए। इसके बाद उन्होंने अपना कर्त्तव्य निश्चित किया। आज वह कपालकुण्डलासे न कहेंगे। रातको कपालकुण्डला जब यात्रा करेगी, तो उसका पीछा करेंगे और इसके बाद अपना जीवन-त्याग देंगे। कपालकुण्डलाको कुछ न कहेंगे, बल्कि अपना प्राणनाश करेंगे।

    ऐसा सोचकर वह कपालकुण्डलाके जानेकी राह खिड़की द्वारा देखते रहे। कपालकुण्डलाके निकलकर जानेके बाद नवकुमार भी उठकर चले, लेकिन इसी समय कपालकुण्डला फिर वापस आई। यह देख वह धीरेसे खिसक गये। अन्तमें कपालकुण्डलाके फिर बाहर होनेपर, जब नवकुमार भी बाहर चले, तो उन्हें दरवाजेपर एक दीर्घाकार पुरुष खड़ा दिखाई दिया।

    वह व्यक्ति कौन है; क्यों खड़ा है, जाननेकी कोई इच्छा नवकुमारको न हुई। वह केवल कपालकुण्डलापर निगाह रखे हुए चले, अतएव खड़े मनुष्यकी छातीपर घक्का दे उन्होंने उसे हटाना चाहा, लेकिन वह हटा नहीं।

    नवकुमारने कहा—“कौन हो तुम? हट जाओ, मेरी राह छोड़ो।”

    आगन्तुक बोला—“क्या नहीं पहचानते, मैं कौन हूँ?” यह शब्द समुद्रनादवत् जान पड़ा। नवकुमारने और गौरसे देखा—वही पूर्वपरिचित—कापालिक।

    नवकुमार चौंक उठे। लेकिन डरे नहीं। सहसा उनका चेहरा प्रसन्न हो गया। उन्होंने पूछा—“क्या कपालकुण्डला तुमसे मिलने जा रही है?”

    कापालिकने कहा,—“नहीं?”

    आशा-प्रदीप जलते ही बुझ गया। नवकुमारका चेहरा फिर पहले जैसा हो गया। बोले—“तो तुम राहसे हट जाओ।”

    कापालिकने कहा—“राह छोड़ दूँगा, लेकिन तुमसे कुछ कहना है, पहले सुन लो।”

    नवकुमार बोले,—“तुमसे मेरी कौनसी बात है? क्या तुम फिर मेरा प्राण लेने आये हो? तो ग्रहण करो, इस बार मैं मना न करूँगा। तुम जरा ठहरो, मैं अभी आता हूँ। मैंने क्यों न देवतुष्टिके लिये प्राण दिया! अब उसका फल भुगत रहा हूँ। जिसने मेरी रक्षा की थी, उसीने नष्ट किया। कापालिक! अब अविश्वास न करो। मैं अभी लौटकर, आत्म-समर्पण करता हूँ।

    कापालिकने उत्तर दिया—“मैं तुम्हारे वधके लिए नहीं आया हूँ, भवानी की वैसी इच्छा नहीं। मैं जो करने आया हूँ, उसमें तुम्हारा भी अनुमोदन है। घर के अन्दर चलो, मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो।”

    नवकुमारने कहा—“अभी नहीं, फिर दूसरे समय सुनूँगा। तुम जरा मेरी अपेक्षा करो। मुझे बहुत जरूरी काम है, पूरा कर अभी आता हूँ।”

    कापालिकने कहा—“वत्स! मैं सब जानता हूँ तुम उस पापिनीका पीछा करोगे। मैं जानता हूँ, वह जा रही है। मैं अपने साथ तुम्हें वहाँ ले चलूँगा। जो देखना चाहते हो दिखाऊँगा, लेकिन जरा मेरी बात सुन लो। डरो नहीं।”

    नवकुमारने कहा—“अब मुझे तुम से कोई डर नहीं, आओ।”

    यह कहकर नवकुमार कापालिकको लेकर अन्दर गये और एक आसनपर उसे बिठाकर तथा स्वयं बैठते हुए बोले—“कहो!”

    ⋆

    ↑

    इधर एक अध्यायको छोड़ दिया गया है।

    :६:

    पुनर्वार्ता

    “तद्गच्छ सिद्धं कुरु देवकार्यम्।”

    —कुमारसंभव

    कापालिक ने आसन ग्रहण कर अपनी दोनों बाहें नवकुमारको दिखाई। नवकुमार ने देखा कि दोनों हाथ टूटे हुए थे।

    पाठकोंकी याद रह सकता है कि जिस रात कपालकुण्डला के साथ नवकुमार कापालिक-आश्रमसे भागे, उसी रात खोजने में व्यस्त बालियाड़ीके शिखरसे गिरा था। गिरनेके समय उसने शरीर-रक्षाके लिए दोनों हाथोंसे सहारा लिया। इससे उसका शरीर तो बचा, लेकिन दोनों हाथ टूट गये। सारा हाल कहकर कृपालिक ने कहा—“इन हाथों द्वारा यद्यपि दैनिक कार्य हो जाते हैं, किन्तु, इनमें अब बल नहीं है, यहाँतक कि मैं लकड़ी भी उठा नहीं सकता।”

    इसके बाद बोला—“गिरते ही मैं जान गया कि मेरे दोनों हाथ टूट गये, लेकिन बादमें मैं बेहोश हो गया। पहले बेहोश और इसके बाद धीरे-धीरे जब मुझे ज्ञान हुआ तो मैं नहीं जानता था कि इस तरह मुझे कितने दिन बीते। शायद दो रातें और एक दिन था। सबेरेके समय मैं फिर पूरी तरह होशमें आया। इससे ठीक पहले मैंने स्वप्न देखा—मानो भवानी—यह कहते-कहते कापालिकको रोमांच हो आया—मेरे सामने प्रत्यक्ष आकर खड़ी हो गयी हैं। भौंहें टेढ़ी कर ताड़ना करती और कहती हैं—‘अरे दुराचारी! तेरी ही चित्तकी अशुद्धिके कारण मेरी इस पूजामें विघ्न हुआ है। इतने दिनोंतक इन्द्रिय-लालसा के वशीभूत होकर उस कुमारीके रक्तसे तूने मेरी पूजा नहीं की। अतएव इसी कुमारी द्वारा तेरे सारे पूर्व कर्मोंका नाश हो रहा है। अब मैं तेरी पूजा ग्रहण न करूँगी।’ इसपर मैं रोकर भगवतीके चरणोंपर लोटने लगा, तो उन्होंने प्रसन्न होकर कहा—‘भद्र! इसका सिर्फ एक प्रायश्चित्त बताती हूँ। उसी कपालकुण्डलाका मेरे सामने बलिदान कर। जितने दिनोंतक तुझसे यह न हो सके, मेरी पूजा न करना।’

    कितने दिनों तक और किस प्रकार मैं आरोग्य हुआ, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। क्रमशः आरोग्यलाभ करनेके बाद देवीकी आज्ञा पूरी करनेकी कोशिशमें लग गया। लेकिन मैंने देखा कि इन हाथोंमें एक बच्चे जैसा बल भी नहीं। बिना बाहुबलके यत्न सफल होनेका नहीं। अतएव इसमें सहायताकी आवश्यकता हुई। विदेशी और विधर्मी राजमें इस बातमें कौन सहायक हो सकता है। बड़ी कोशिशसे पापिनीका आभास मालूम हुआ। लेकिन बाहुबलके अभावसे कार्य पूरा नहीं होता है। केवल मानससिद्धिके लिए होमादि करता हूँ। कल रातको मैंने स्वयं देखा कि कपालकुण्डलाके साथ ब्राह्मणकुमारका मिलन हुआ। आज भी वह उससे मिलने जा रही है। देखना चाहो, तो मेरे साथ आओ।

    वत्स! कपालकुण्डला वधके योग्य है। मैं भवानीके आज्ञानुसार उसका वध करूँगा। वह तुम्हारे प्रति भी विश्वासघातिनी है, अतएव तुम्हें भी उसका वध करना चाहिए। अविश्वासीको पकड़ कर मेरे यज्ञ-स्थान पर ले चलो। वहाँ अपने हाथसे उसका

    बलिदान करो। इससे भगवतीका उसने जो अपकार किया है, उसका दण्ड होगा, पवित्र कर्मसे अक्षय पुण्य होगा; विश्वासघातिनीका दण्ड होगा, चरम प्रतिशोध होगा।”

    कापालिक चुप हुआ। नवकुमार कुछ भी न बोले। कापालिक ने उन्हें चुप देखकर कहा—“अब चलो, वत्स! जो दिखानेको कह चुका हूँ, दिखाऊँगा|”

    नवकुमार पसीनेसे तर कापालिकके साथ चले।

    ⋆

    :७:

    सपत्नी संभाषण

    “Be at peace: it is your sister that addresses you, Require Lucretia’s love.

    —Lucretia.

    कपालकुंडला घरसे निकलकर जंगलमें घुसी। वह पहले उस टूटे घरमें पहुँची। वहाँ ब्राह्मणसे मुलाकात हुई। दिनका समय होता तो वह देखती कि उसका चेहरा बहुत उतर गया है। ब्राह्मणवेशीने कपालकुंडलासे कहा—“यहाँ कापालिक आ सकता है, आओ अन्यत्र चलें।” जंगलमें एक खुली जगह थी, चारों तरफ वृक्ष, बीचमें चौरस, साफ और समतल था। वहाँ बैठनेपर ब्राह्मणवेशीने कहा—“पहले मैं अपना परिचय दूँ। मेरी बात कहाँ तक विश्वासयोग्य है, स्वयं समझ सकोगी। जब तुम अपने स्वामोके साथ हिजली देश से आ रही थी, तो राहमें एक यवन कन्याके साथ मुलाकात हुई थी। क्या तुम्हें याद है?”

    कपालकुंडला बोली—“जिसने मुझे अलंकार दिये थे?”

    ब्राह्मणवेशधारिणीने कहा—“हाँ, मैं वही हूँ।”

    कपालकुंडला बड़े आश्चर्यमें आई। लुत्फुन्निसाने उसका विस्मय देखकर कहा—“और सबसे बड़ी अचरज की बात है कि मैं तुम्हारी सौत हूँ।”

    कपालकुंडलाने चौंककर कहा—“हैं, यह कैसे?”

    इस पर लुत्फुन्निसाने शुरूसे अपना परिचय दिया। विवाह, जातिनाश, स्वामी द्वारा त्याग, सप्तग्राम आगमन, नवकुमारसे मुलाकात और व्यवहार, गत दिवस जंगल में आना, होमकारीसे मुलाकात आदि बातें वह क्रमशः कह गयी। इस समय कपालकुंडलाने पूछा—“तुमने किस अभिप्रायसे हमारे घर छद्मवेशमें आनेकी इच्छा की?”

    लुत्फुन्निसाने कहा—“तुम्हारे साथ पतिदेवका चिरविच्छेद करानेके लिए।”

    कपालकुंडला सोचमें पड़ गयी बोली—“यह कैसे सिद्ध कर पाती?”

    लु०—तुम्हारे सतीत्वके प्रति तुम्हारे पतिको संशयमें डाल देती। लेकिन उसकी जरूरत नहीं; वह राह मैंने त्याग दी है। अतः अगर तुम मेरे कहे मुताबिक कार्य करो, तो सारी कामना सिद्ध हो; साथ ही तुम्हारा भी मंगल होगा।

    कपा०—होमकारीके मुँहसे तुमने किसका नाम सुना था?

    लु०—“तुम्हारा ही नाम। वह तुम्हारी मंगल या अमंगल कामनासे होम कर रहे हैं, यही जाननेके लिए प्रणाम कर मैं वहाँ बैठी। जब तक उनकी क्रिया समाप्त न हुई, मैं वहीं बैठी रही। होमके अन्तमें छलपूर्वक तुम्हारे नामके साथ होमका अभिप्राय पूछा। थोड़ी ही देरकी बातमें मैं समझ गयी कि होम तुम्हारी अमंगलकामनाके लिए है। मेरा भी वही प्रयोजन था, मैंने यह भी बताया। परस्पर सहायता के लिए वचनबद्ध हुए, विशेष परामर्शके लिए भग्नकुटीमें गये। वहाँ उसने अपना मनोरथ कहा कि तुम्हारी मृत्यु ही उसे अभीष्ट है। इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं। यद्यपि मैंने इस जन्ममें पाप ही किये हैं, लेकिन मैं इतनी पतित नहीं हूँ कि एक निरपराध बालिकाकी हत्याकी कामना करूँ। मैं इसपर राजी नहीं हुई। इसी समय तुम वहाँ पहुँची। शायद तुमने कुछ सुना हो।”

    कपा०—केवल तर्क ही मैंने सुना।

    लु०—उस व्यक्तिने मुझे अबोध जानकर कुछ शिक्षा देना चाहा। अन्तमें क्या निश्चय होता है, यह जाननेके लिए तुम्हें एकान्तमें बैठाकर मैं गयी।

    कपा०—फिर लौटकर क्यों नहीं आयी?

    लु०—ठीक है। कापालिकने तुम्हारी प्राप्ति और पालनसे लेकर तुम्हारे भागने तकका सारा हाल कह सुनाया।

    यह कहकर लुत्फुन्निसाने कापालिकका शिखरसे गिरना, हाथ टूटना, स्वप्न आदि सब कह सुनाया! स्वप्नकी बात सुनकर कपालकुण्डला चमक उठी; चित्तमें चञ्चलता भी हुई। लुत्फुन्निसाने कहा—“कापालिककी प्रतिज्ञा भवानीकी आज्ञाका प्रतिपालन है। बाहुमें बल नहीं है, इसलिये दूसरेकी सहायता चाहता है। मुझे ब्राह्मणकुमार समझकर सहायताकी आशासे उसने सब कहा। मैं अभी तक राजी नहीं हूँ। आगे भी राजी नहीं हो सकती। इस अभिप्रायसे मैं तुमसे मिली हूँ, लेकिन यह कार्य भी मैंने केवल स्वार्थसे ही किया है। तुम्हें प्राणदान देती हूँ। लेकिन तुम क्या मेरे लिए कुछ करोगी?”

    कपालकुण्डलाने पूछा—“क्या करूँ?”

    लु०—मुझे भी प्राणदान दो—स्वामीका त्याग करो।

    कपालकुण्डला बहुत देर तक कुछ न बोली। बहुत देर बाद बोली “स्वामीको त्याग कर कहाँ जाउँगी?”

    लु०—विदेशमें बहुत दूर। तुम्हें अट्टालिका दूँगी, धन दूँगी, दास-दासी दूँगी, रानीकी तरह रहोगी।

    कपालकुण्डला फिर चिन्तामें पड़ गई। पृथ्वीमें उसने सब देखा, लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। अन्तःकरणमें देखा नवकुमार कहीं भी न थे, तो क्यों लुत्फुन्निसाकी राहका काँटा बनूँ? फिर बोली—“तुमने मेरी क्या सहायता की है, यह अभी समझ नहीं पाती हूँ। अट्टालिका, धन, दास, दासी नहीं चाहती। मैं तुम्हारे सुखमें क्यों बाधा दूँ! तुम्हारी इच्छा पूरी हो—कलसे इस विध्नकारिणीकी कोई खबर न पाओगी। मैं वनचरी थी, वनचरी हो जाऊँगी।”

    लुत्फुन्निसा आश्चर्यमें आई। उसे इतनी जल्दी स्वीकार कर लेनेकी आशा न की थी। मोहित होकर उसने कहा—“बहन! तुमने मुझे जीवनदान दिया है। लेकिन मैं तुम्हें अनाथा होकर जाने न दूँगी। कल सबेरे मैं तुम्हारे साथ एक चतुर दासी भेजूँगी। उसके साथ जाना। वर्द्धमानमें एक बहुत बड़ी प्रधान महिला मेरी मित्र हैं, वह तुम्हारी सारी इच्छा पूरी कर देंगी।”

    कपालकुण्डला और लुत्फुन्निसा इस प्रकार निश्चिन्त हो बातें कर रही थीं कि सामने कोई विध्न ही नहीं। उसके स्थानसे जो वन्यपथ आया था, उसपर खड़े होकर कापालिक और नवकुमार उनके प्रति कराल दृष्टिसे देख रहे थे, उसे उन्होंने देखा ही नहीं।

    नवकुमार और कापालिक केवल इन्हें देख रहे थे, दुर्भाग्यवश इनकी बातें सुननेकी परिधि से वे दूर थे। कौन बता सकता है कि यदि मनुष्यकी श्रवणेन्द्रिय और आँखें मनुष्य के अन्दर तकका हाल देख-सुन लेतीं तो मनुष्यका दुःख-वेग कम होता या बढ़ता। लोग कहते हैं, संसारकी रचना अपूर्व और कौशलमय है।

    नवकुमारने देखा, कपालकुण्डला आलुलायित-कुन्तला है। जब वह उनकी हुई न थी, तबतक भी वेणी बाँधती न थी। उसके बाल इतने लम्बे थे और धीमे स्वरमें बातें करनेके लिये वह इतनी पास बैठी थी कि सारे बाल लुत्फुन्निसाकी पीठ तक उड़कर जा रहे थे। उनका इधर ध्यान न था। लेकिन नवकुमार यह देखकर हताश हो जमीनपर बैठ गये, यह देखकर कापालिकने अपनी बगल से लटकते एक नारियल पात्रको निकलकर कहा—“वत्स! बल खोते हो? हताश होते हो? लो यह भवानी का प्रसाद पियो। पियो, बल प्राप्त करोगे।”

    कापालिकने नवकुमारके मुँह के पास पात्र लगा दिया। नवकुमारने अनमने होकर उसे पिया और दारुण प्यास दूर की। नवकुमारको यह मालूम न था कि यह पेय कापालिक की स्वयं तैयार की हुई तेज शराब है। उसे पीते ही बल आ गया।

    उधर लुत्फुन्निसाने पहलेकी तरह मृदुस्वरमें कहा—“बहन! जो काम किया है, उसका बदला दे सकनेकी मेरी शक्ति नहीं है। फिर भी, चिर दिनोंतक मैं तुम्हें याद करती रहूँ, तो यही मेरे लिये सुखकर होगा। मैंने सुना है कि जो अलङ्कार मैंने तुम्हें दिये थे, उन्हें तुमने गरीबोंको दे डाला। इस समय मेरे पास कुछ नहीं है। कल दूसरा प्रयोजन सोचकर अपने साथ अंगूठी भर ले आयी थी। भगवान्‌की कृपासे उस पापसे दूर रही। यह अंगूठी तुम रखो। इसके उपरान्त इस अंगूठी को देखकर तुम अपनी मुफलिस बहनको याद करना। आज यदि स्वामी पूछें कि यह अंगूठी कहाँ पायी, तो कह देना—“लुत्फुन्निसाने दिया है।” यह कहकर लुत्फुन्निसाने बहुत धन देकर खरीदी गयी उस अंगूठीको ऊँगलीसे उतारकर कपालकुण्डलाके हाथमें दे दिया। नवकुमारने यह भी देखा। कापालिकने नवकुमार को पकड़ रखा था, उन्हें फिर काँपते देख फिर शराब पिलायी। मदिरा नवकुमारके माथेपर पहुँचकर उनके प्रकृत स्वभावको बदलने लगी। उसने स्नेहांकुर तकको उखाड़ फेंका।

    कपालकुण्डला लुत्फुन्निसासे बिदा होकर घरकी तरफ चली। नवकुमार और कापालिक ने लुत्फुन्निसासे छिपकर कपालकुण्डलाका अनुसरण किया।

    ⋆

    :८:

    घर की तरफ

    कपालकुण्डला धीरे-धीरे घर की तरफ चली। बहुत ही धीरे मृदु-पादविक्षेपसे। इसका कारण यह था कि वह बहुत ही गहरी चिन्तामें डूबी हुई थी। लुत्फुन्निसाकी दी हुई खबरसे कपालकुण्डलाका चित्त बिल्कुल परिवर्तित हो गया था। वह अपने आत्म-विसर्जनके लिये तैयार हुई। आत्म-विसर्जन किसलिये? क्या लुत्फुन्निसाके लिये? यह बात नहीं।

    कपालकुण्डला अन्तःकरण से तान्त्रिक की सन्तान है। जिस प्रकार तान्त्रिक भवानीके प्रसादके रूपमें दूसरेकी जान लेनेका आकांक्षी हैं, वैसे ही वह भी उसी आकांक्षासे आत्म-विसर्जनके लिये तैयार है। कापालिककी वजहसे कपालकुंडला केवल शक्तिप्रार्थिनी है, यह बात नहीं, बल्कि असली कारण यह है कि संगति प्रभावके कारण देवीकी श्रद्धाभक्तिमें मनसे अनुरागिनी है। वह मजेमें समझ चुकी है कि सृष्टिशासनकर्त्री और मुक्तिदात्री एकमात्र भैरवी ही हैं। यह सही है कि भैरवीपूजामें नरबलिके रक्तसे प्राङ्गण भर उठता है, यह उसका परदुःखकातर हृदय सहनेमें असमर्थ है, किन्तु और किसी कार्यमें उसकी भक्तिभावना कुंठित नहीं है। उन्हीं जगतशासनकर्त्री, सुख-दुःख-विधायिनी और मोक्षदायिनी भगवतीने स्वप्नमें उसे आत्मविसर्जनका आदेश दिया है। फिर कपालकुण्डला क्यों न उस आज्ञाको माने?

    हम तुम प्राणत्याग करना नहीं चाहते। बड़े प्रेम से जो कहते हैं कि यह संसार सुखमय है, सुखकी ही आशासे बैलकी तरह बराबर घूम रहे हैं—दुःखकी प्रत्याशासे नहीं। कहीं यदि आत्मकर्मदोषसे इस प्रत्याशामें सफलता प्राप्त न की, तो दुःख कहकर हम चिल्लाने लगते हैं किन्तु ऐसा होनेसे ही नियम नहीं बन जा सकता, ऐसा सिद्धान्त होता है। नियमका व्यतिक्रम माना है। हमें तुम्हें हर जगह सुख ही है। उसी सुखसे संसार में हम बँधे हुए हैं, छोड़ना नहीं चाहते। लेकिन इस संसार-बन्धनमें प्रणय ही प्रधान रस्सी है। कपालकुण्डलाके लिए वह बन्धन या नहीं कोई भी बन्धन नहीं। फिर कपालकुण्डलाको कौन रोक सकता है? जिसके लिए बन्धन नहीं है, वही सबसे अधिक बलशाली है। गिरिशिखरसे नदीके उतरने पर कौन उसका गतिरोध कर सकता है? एक बार आँधी आनेपर उसे कौन रोक सकता है? कपालकुण्डलाका चित्त डाँवाडोल हो जाये, तो उसे कौन स्थिर कर सकता है? नये हाथीके मस्त हो जाने पर उसे कौन शान्त करे?

    कपालकुंडलाने अपने हृदयसे पूछा—“अपने इस शरीरको जगदीश्वरीके लिए क्यों न समर्पण करूँ? पंचभूतको रखकर क्या होगा। प्रश्न वह करती थी, लेकिन कोई निश्चित उत्तर न दे सकती थी। संसारमें और कोई भी बन्धन न होनेपर पंचभूतका बन्धन तो है ही।

    कपालकुंडला नीचा सिर किये चलने लगी। जब मनुष्यका हृदय किसी बड़े भावमें डूबा रहता है, तो उस समय चिन्ताकी एकाग्रतामें बाहरी जगतकी तरफ ध्यान नहीं रहता। उस समय अनैसर्गिक वस्तु भी प्रत्यक्षीभूत जान पड़ती है। इस समय कपालकुंडलाकी ऐसी ही अवस्था थी।

    मानों ऊपरसे उसके कानोंमें वह शब्द पहुँचा—“वत्से, मैं राह दिखाती हूँ।” कपालकुंडला चकितकी तरह ऊपर देखने लगी। देखा, मानो आकाशमें नवनीरद-निन्दित मूर्ति है; गलेमें लटकनेवाली नरमुंडमालासे खून टपक रहा है; कमरमें नरकरराजि झूल रही है; बाँये हाथमें नरकपाल; अंगमें रुधिरधारा, ललाटपर विषम उज्जवल ज्वाला विभासित है और लोचन प्रान्तोंमें बालशशि शोभित है; मानों दाहिने हाथसे भैरवी कपालकुंडलाको बुला रही है।

    अब कपालकुंडला ऊर्ध्र्वमुखी होकर चली। वह अद्भुत देवी रूप आकाशमें उसे राह दिखा रहा था, कभी कपालमालिनीका अंग बादलोंमें छिपता, कभी सामने प्रकट होकर चलता। कपालकुंडला उन्हींको देखती हुई चलने लगी।

    नवकुमार या कापालिकने यह सब कुछ न देखा। नवकुमारने सुरा-गरल-प्रज्ज्वलित-हृदयसे—कपालकुंडलाके धीरपदक्षेपसे असहिष्णु होकर साथीसे कहा, “कापालिक!”

    कापालिकने पूछा—“क्या?”

    “पानीयं देहि मे।”

    कापालिकने नवकुमारको फिर शराब पिलायी।

    नवकुमारने पूछा—“अब देर क्यों?”

    कापालिकने भी कहा—“हाँ-हाँ, कैसी देर?”

    नवकुमारने भीमनादसे पुकारा—“कपालकुंडला!”

    कपालकुंडला सुनकर चकित हुई। अभी तक यहाँ कपालकुंडला कह कर किसीने पुकारा न था। वह पलटकर खड़ी हो गयी। नवकुमार और कापालिक उसके सामने आकर खड़े हो गये। कपालकुंडला पहले उन्हें पहचान न सकी, बोली—“तुम लौग कौन हो? यमदूत?”

    लेकिन दूसरे ही क्षण पहचान कर बोली—“नहीं नहीं, पिता! क्या तुम मुझे बलि देनेके लिए आये हो?”

    नवकुमारने मजबूतीके साथ कपालकुंडलाका हाथ पकड़ लिया। कापालिकने करुणार्द्र, मधुर स्वरमें कहा—“वत्से! हम लोगोंके साथ आओ।” यह कह कर कापालिक श्मशानकी राह दिखाता आगे चला।

    कपालकुंडलाने आकाशकी तरफ फिर निगाह उठायी, जिधर उस भैरवीकी विकराल मूर्तिको देखा था, उधर देखा। देखा, रणरंगिणी खिलखिला कर हँस रही है। कपालकुंडला अदृष्टविमूढ़की तरह कापालिकका अनुसरण करती चली। नवकुमार उसी तरह उसे पकड़े हुए साथ ले चले।

    ⋆

    :९:

    प्रेत भूमिमें

    “वपुषा करणोज्झितेन सा निपतन्ती पतिमप्यपातयत्।

    ननु तैलनिषेकविन्दुना सह दीप्तार्जिरुपैति मेदिनीम्॥”

    —रघुवंश

    चन्द्र अस्त हुए। विश्वमंडलपर अन्धकारका पर्दा पड़ गया। कापालिकने जहाँ अपना पूजास्थान बनाया था, वहीं कपालकुडलाको वह ले गया। गङ्गा तट पर वह एक वृहत् बालूकी भूमि है। उसके सामने ही एक ओर बहुत बड़ी रेतीली भूमि है। वही श्मशान है। दोनों रेतीली भूमियोंके बीच जल बढ़नेके समय पानी रहता है। भाटेके समय नहीं रहता—इस समय भी नहीं है। श्मशानभूमिका जो हिस्सा गङ्गातट पर जाता है, वह किनारेपर जाकर बहुत ऊँचा हो गया है, उसके नीचे अगाध जल है। अविरल वायुप्रवाहके कारण किनारा कभी-कभी खिसक कर गङ्गामें गिरा करता है। पूजाके स्थानमें दीपक न था—केवल जलती लकड़ीसे प्रकाश था—ऐसा प्रकाश जो उसकी भयानकताको बढ़ा रहा था। पासमें ही पूजा, होम, बलिका सारा सामान मौजूद था। विशाल नदीका हृदय अन्धकारसे पूर्ण था। चैत्र मासकी वायु गङ्गाको विक्षुब्ध बनाये हुई थी। इस कारण कलकल नाद दिक्मंडलमें व्याप्त हो रहा था। शमशानके शवभक्षक पशु रह-रहकर चिल्ला पड़ते थे।

    कापालिकने नवकुमार और कपालकुंडलाको उपयुक्त स्थानपर बैठाया और स्वयं पूजामें लग गया। उससमय उसने नवकुमारको आदेश दिया कि कपालकुंडलाको स्नान करा लावें। नवकुमार कपालकुंडलाको हाथ पकड़े रेत पार कर स्नान कराने चले। उनके पदभारसे हड्डियाँ टूटने लगीं। नवकुमारके पदाघातसे श्मशानका एक कलश भी टूट गया, उसके पास ही एक शव पड़ा हुआ था—हतभागेका किसीने संस्कार तक न किया था। दोनोंके ही पदसे उसका स्पर्श हुआ। कपालकुंडला उसे बचाकर निकल गयी, लेकिन नवकुमार उसे पददलित कर गये। शवभक्षक पशु चारों तरफ घूम रहे थे। दोनों जनको वहाँ उपस्थित देख वे सब चिल्ला उठे। कोई आक्रमण करने आया, तो कोई भाग गया। कपालकुंडलाने देखा कि नवकुमारका हाँथ काँप रहा है। कपालकुंडला स्वयं निर्भय निष्कम्प थी।

    कपालकुंडलाने पूछा—“स्वामिन्! क्या डर लगता है?”

    नवकुमारका मदिरामोह क्रमशः क्षीण होता जा रहा था। गम्भीर स्वरसे नवकुमारने कहा—“भयसे, मृण्मयी! नहीं!”

    कपालकुंडलाने फिर पूछा—“तब काँपते क्यों हो?”

    यह प्रश्न कपालकुंडलाने जिस स्वरसे किया, यह केवल रमणी हृदयसे ही सम्भव था। जब रमणी परदुःखकातर होती है, तभी ऐसा स्वर निकलता है। कौन जानता था कि साक्षात् श्मशानमें ऐसी आवाज कपालकुंडलाके मुँह से निकलेगी।

    नवकुमारने कहा—“भयसे नहीं। रो नहीं पाता हूँ, क्रोधसे काँपता हूँ।”

    कृपालकुंडलाने पूछा—“रोओगे क्यों?”

    फिर वही कंठ!

    नवकुमार बोले—“क्यों रोऊँगा? तुम क्या समझोगी, मृण्मयी तुम तो कभी सौन्दर्य देखकर उन्मत हुई नहीं।”—कहते-कहते यातनासे नवकुमारका गला भर गया। “तुम तो कभी अपना कलेजा स्वयं काटनेके लिये श्मशान आई नहीं, मृण्मयी!” यह कहते-कहते सहसा नवकुमार पुक्का फाड़कर रोते हुए कपालकुंडलाके चरणों पर गिर पड़े।

    “मृण्मयी! कपालकुंडले! मेरी रक्षा करो! मैं तुम्हारे पैरपर रोता हूँ, एक बार कह दो, तुम अविश्वासिनी नहीं हो—एक बार कहो मैं तुम्हें हृदयमें उठाकर घर ले चलू।”

    कपालकुंडलाने हाथ पकड़ कर नवकुमारको उठाया और मृदुस्वरसे उसने कहा—“तुमने तो मुझसे पूछा नहीं।”

    जब यह बातें हुई, तो दोनों तट पर आ खड़े हुए। कपालकुंडला आगे थी उसके पीछे जल था। जलका उछ्वास शुरू हो गया था, कपालकुंडला एक ढूहे पर खड़ी थी। उसने जवाब दिया—“तुमने तो मुझसे पूछा नहीं।”

    नवकुमारने पागलोंकी तरह कहा—“अपना चैतन्य खो चुका हूँ—क्या पूछूँ मृण्मयी! बोलो बोलो; मुझे बचालो, घर चलो।”

    कपालकुंडलाने कहा—“जो तुमने पूछा है, तो बताती हूँ। आज जिसे तुमने देखा—वह पद्मावती थी, मैं अविश्वासिनी नहीं हूँ। यह वचनस्वरूप कहती हूँ। लेकिन मैं घर न जाऊँगी। भवानीके चरणोंमें देह विसर्जन करने आई हूँ—निश्चय ही करूँगी। स्वामिन्! तुम घर लौट जाओ। मरूँगी—मेरे लिये रोना नहीं।”

    “नहीं—मृण्मयी! नहीं!”—यह कहकर दोनों हाथ पसारकर नवकुमार कपालकुंडलाको हृदयसे लगा लेनेके लिये आगे बढ़े—लेकिन कपालकुंडलाको वह पा न सके। चैत्र-वायुसे एक जल तरङ्ग ने उस ढूहेसे टक्कर ली और वह ढूहा कपालकुंडलाके साथ बड़े ही शब्दसे नदी जलमें जा गिरा।

    नवकुमारने भीषण शब्द सुना—कपालकुंडलाको अन्तर्हित होते देखा। तुरंत वे भी एक छलाँगमें जलमें जा रहे। नवकुमार तैरना अच्छा जानते थे। बहुत देर तक तैरते-डुबकी लगाते, कपालकुंडलाको खोजते रहे। उन्होंने कपालकुंडलाको न पाया—स्वयं भी जलसे न निकले।

    उस अनन्त गंगाप्रवाहमें वसन्त वायुविक्षुब्ध वीचियोंमें आन्दोलित होते हुए कपालकुंडला और नवकुमार कहाँ गये?

    ॥ समाप्त ॥

    तृतीय खण्ड

    भूतपूर्वमें

    “कष्टोऽयं खलु मृत्यु भावः”

    कपालकुण्डलाको लेकर नवकुमारने जब सरायसे घरकी यात्रा की तो मोती बीबीने वर्द्धमानकी तरफ यात्रा की। जबतक मोती बीबी अपनी राह तय करें, तबतक हम उनका कुछ वृत्तान्त कह डालें। मोतो बीबीका चरित्र जैसा महापातकसे भरा हुआ है, वैसे ही अनेक तरहसे सुशोभित है। ऐसे चरित्रका विस्तृत वृत्तान्त पढ़नेमें पाठकोंको अरुचि न होगी।

    जब इनके पिताने हिन्दू-धर्म बदलकर मुस्लिम धर्म ग्रहण किया, तो उस समय इनका हिन्दू नाम बदलकर लुत्फुन्निसा पड़ा। मोती बीबी इनका नाम कभी नहीं था। फिर भी छिपे वेशमें देश-विदेश भ्रमणके समय यह कभी-कभी नाम पड़ जाता है। इनके पिता ढाकामें आकर राजकार्यमें नियुक्त हुए। लेकिन वहाँ अनेक स्वदेशीय लोगोंका आना-जाना हुआ करता था। अपने देशमें जान-पहचानवालोंके सामने विधर्मी होकर रहना भला जान नहीं पड़ता। अतएव वह कुछ दिनोंमें अच्छी ख्याति लाभ कर अपने मित्र अनेक उमरा लोगोंसे पत्र लेकर सपरिवार आगरे चले गये। अकबर बादशाहके सामने किसीका गुण छिपा नहीं रहता था। शीघ्र ही इन्होंने अपने गुण प्रकट किये। इसके फलसे वह आगरेके उमरा लोगोंमें गिने जाने लगे। इधर लुत्फुन्निसा भी यौवनमें पदार्पण करने लगी। आगरेमें आकर इन्होंने फारसी, संस्कृत, नृत्यगीत, रसवादन आदिमें अच्छी शिक्षा ग्रहण कर ली। राजधानीकी सुन्दरियों और गुणवतियोंमें यह अग्रगण्य बनने लगीं। दुर्भाग्यवश लुत्फुन्निसाके पूर्ण युवती होनेपर जान पड़ा कि उसकी मनोवृत्ति दुर्दमनीय और भयानक है। इन्द्रियदमनकी न तो इच्छा थी और न क्षमता ही थी। सद् और असद् में समान प्रवृत्ति थी। यह कार्य अच्छा है और यह बुरा, ऐसा सोच कभी उसने कार्य नहीं किया। जो अच्छा लगता था, वही काम करती थी। जब सत् कर्मसे अन्तःकरण सुखी होता, तो वह करती और असत्‌कर्मके समय भी वही करती। यौवनकालकी दुर्दमनीय मनोवृत्तिके अनुकूल ही लुत्फुन्निसा भी बन गयी। उसके पूर्वपति वर्त्तमान हैं, उमरा लोगों में किसीने उसके साथ शादी न की। वह भी शादी की लालायित न रही। मन ही मन सोचा, फूल-फूलपर घूमनेवाली भ्रमरीको एक का बनाकर बाँध क्यों दूँ? पहले कानाफूसी हुई, इसके बाद मुँह पर कलंककी कालिमा लग गयी। उसके पिताने विरक्त होकर उसे घरसे निकाल दिया।

    लुत्फुन्निसा गुप्त रूपसे जिन्हें कृपा-वितरण करती रही, उनमें युवराज सलीम भी एक थे। एक उमराके कुलके कलंकका कारण होनेपर पीछे बादशाहका कोपभाजन न बनना पड़े, इस कारण खुलकर सलीमशाहने लुत्फुन्निसाको अपने महलमें नहीं रखा। अब सुयोग मिल गया। राजपूतपति मानसिंहकी बहन सलीमकी प्रधान महिषी हुई। युवराजने लुत्फुन्निसाको अपनी महिषीकी प्रधान अनुचरी बना दिया। लुत्फुन्निसा बेगमकी सखी बन गयी और परोक्ष रूपसे युवराजकी अनुग्रह-भागिनी हुई।

    लुत्फुन्निसा जैसी बुद्धिमती महिला शीघ्र ही युवराजके हृदय पर अधिकार कर लेगी, यह सहज अनुमेय है। सलीमके हृदयपर उसका अधिकार इस तरह प्रतियोगीशून्य हो गया कि लुत्फुन्निसा ने प्रण कर लिया कि वह इनकी पटरानी होकर रहेगी। केवल लुत्फुन्निसाकी ही ऐसी प्रतिज्ञा हुई, यह बात नहीं, बल्कि इसका विशवास महल भरमें हो गया। ऐसी ही आशामय स्वप्नमें लुत्फुन्निसाका जीवन पतिमें लगा। लेकिन इसी समय उसकी नींद टूटी। अकबर बादशाहके कोषाध्यक्ष ख्वाजा अब्बासकी कन्या मेहरुन्निसा यवनकुलकी प्रधान सुन्दरी निकली। एक दिन कोषाध्यक्ष ने युवराज सलीम और अन्य उमराको निमंत्रण देकर घर बुलाया। उसी दिन सलीमकी मुलाकात मेहरके साथ हो गयी। उसी दिन सलीमने भी अपना हृदय मेहरुन्निसा को सौंप दिया। इतिहासप्रेमीमात्र इस घटनाको जानते हैं। इसके बाद मेहरकी शादी शेर अफगनके साथ हो गयी। यह शादी अकबरशाह के षड्यन्त्रका फल थी। यद्यपि सलीमको निरस्त होना पड़ा, लेकिन उन्होंने आशाका त्याग न किया। सलीमकी चित्तवृत्ति लुत्फुन्निसा के नखदर्पणवत् थी। वह समझ गयी कि शेर अफगनके जीवनकी खैरियत नहीं और सलीमकी महिषी मेहर ही होगी। लुत्फुन्निसाने सिंहासनकी आशा त्याग दी।

    विचक्षण मुगल-सम्राट् अकबरकी परमायु पूरी हुई। जिस प्रचण्ड सूर्यकी प्रभा तुर्कीसे लेकर ब्रह्मपुत्र तक प्रदीप्त थी, उस सूर्य का अस्त हुआ। इस समय लुत्फुन्निसाने आत्मप्राधान्यकी रक्षाके लिये एक दुःसाहसिक संकल्प किया।

    राजपूत राजा मानसिंहकी बहन सलीमकी प्रधान महिषी थी। खुसरू उनके पुत्र हैं। एक दिन उनके साथ अकबर बादशाहकी बीमारीकी बात चल रही थी जिस सम्बन्धमें शीघ्र ही बादशाहकी महिषी बननेकी बधाई लुत्फुन्निसा दे रही थी; प्रत्युत्तरमें खुसुरूकी जननी ने कहा—“बादशाहकी प्रधान महिषी होने से मनुष्य जन्म सार्थक अवश्य होता है, लेकिन सर्वश्रेष्ठता उसकी है जिसका पुत्र बादशाह हो और वह बादशाहजननी बने।” यह उत्तर सुनते ही लुत्फुन्निसाके हृदयमें एक चिन्तनीय अभिसन्धिका उदय हुआ। उसने उत्तर दिया—“तो ऐसा ही क्यों न हो! वह भी आपके ही इच्छाधीन है।” बेगमने पूछा—“यह कैसे?” चतुराने उत्तर दिया—“युवराज खुसरूको ही सिंहासनपर बिठाइये।”

    इस बात का बेगमने कोई जवाब न दिया। उस दिन फिर यह प्रसङ्ग न उठा। लेकिन यह बात किसीको भूली नहीं। स्वामीके बदले पुत्र राज्यसिंहासनपर आसीन हो, यह बेगमकी इच्छा अवश्य है, लेकिन मेहरुन्निसाके प्रति सलीम का प्रेम जैसे लुत्फुन्निसा के हृदयमें काँटेकी तरह खटकता है, वैसे ही बेगमके हृदयमें भी खटकता है। मानसिंहकी बहन एक तुर्कमानकी कन्या की आज्ञानुवर्तिनी होकर कैसे रह सकती है? लुत्फुन्निसाका भी इस विषय में गहरा तात्पर्य था। दूसरे दिन फिर यह प्रसङ्ग उत्थापित हुआ। दोनोंका एक अभिमत स्थिर हुआ।

    सलीमको त्यागकर खुसरूको सिंहासनपर बैठाना कोई असम्भव बात न थी। इस बातको लुत्फुन्निसाने बेगमको अच्छी तरह समझा दिया। उसने पूछा,—“मुगल साम्राज्य राजपूतोंके बाहुबलपर स्थापित हुआ है और आज भी निर्भर करता है। वही राजपूत कुल-तिलक मानसिंह खुसरूके मामा हैं और प्रधान राजमंत्री खान आजम खुसरूके श्वसुर हैं, इन दोनों आदमियोंके खड़े होनेपर कौन इनकी आज्ञा न मानेगा? फिर किसके बलपर युवराज सिंहासनपर अधिकार कर सकते हैं? राजा मानसिंहको राजी करना आपके ऊपर है। खान आजम और अन्यान्य उमराको तैयार करना मेरे ऊपर छोड़ दीजिये? आपके आशीर्वादसे अवश्य कृतकार्य हूँगी; लेकिन एक आशंका है कि कहीं सिंहासनासीन होनेके बाद खुसरू मुझे इन दुराचारियों को….निकाल बाहर न कर दें।”

    बेगम सहचरीका अभिप्राय समझ गयी। हँसकर बोली,—“तुम आगरेमें जिस उमराकी गृहिणी होना चाहोगी, वह तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा। तुम्हारे पति पंचहजार मंसबदार होंगे।”

    लुत्फुन्निसा सन्तुष्ट हुई। यही उसका उद्देश्य था। यदि राजपुरीमें सामान्य स्त्री होकर रहना हुआ, तो फूलोंपर घूमकर रस लेनेवाली भ्रमरी बननेसे क्या फायदा हुआ? यदि स्वाधीनता ही त्याग करना होता तो बालसखी मेहरुन्निसाकी दासी होनेमें ही क्या हर्ज था? इससे तो कहीं अधिक गौरवकी बात है कि किसी राजपुरुषके गृहकी गृहस्वामिनी बनकर बैठा जाये?

    केवल इसी लोभसे लुत्फुन्निसा इस कार्यमें लिप्त न हुई। सलीम उसकी उपेक्षा कर जो मेहर के पीछे पागल हो रहे हैं, उसका उसे प्रतिशोध भी लेना है?

    खान आजम आदि आगरे और दिल्लीके उमरा लुत्फुन्निसाके यथेष्ठ साधित थे। खान आजम अपने दामादके लिये उद्योग करेंगे इसकी भी पूरी आशा थी। वह और अन्यान्य उमरा राजी हो गये। खान आजमने लुत्फुन्निसासे कहा—“मान लो यदि हम लोग कृतकार्य न हुए तो हम लोगोंको अपने बचावकी भी कोई राह निकाल लेनी चाहिए।”

    लुत्फुन्निसाने कहा,—“आपकी क्या राय है?” खानने कहा, कहा साँचा:Sic—‘उड़ीसाके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। केवल उसी जगह मुगलोंका शासन प्रखर नहीं है, उड़ीसाकी सेना हमारे हाथ में रहना आवश्यक है। तुम्हारे भाई उड़ीसाके मंसबदार हैं। मैं कल प्रचार करुँगा कि वह युद्धमें आहत हुए हैं। तुम उन्हें देखने के बहानेसे कल ही उड़ीसाको यात्रा करो। वहाँका कार्य समाप्त कर तुरंत वापस जाओ।’

    लुत्फुन्निसा इसपर राजी हो गयी। वह अपना कार्य कर लौटते समय पाठकोंसे मिली है।

    ⋆

    :२:

    दूसरी जगह

    “जे यारी ते पड़े लोके उठे ताइ धरे।

    बारेक निराश होये के कोथाय मरे॥

    तूफाने पतित किन्तु छाड़ि बना हाल।

    आजि के विफल होलो, होते पारे काल॥

    —नवीन तपस्विनी

    जिस दिन नवकुमारको बिदा कर मोती बीबी या लुत्फुन्निसाने बर्द्धमानकी यात्राकी, उस दिन वह एकदम बर्द्धमान तक पहुँच न सकी। दूसरी चट्टीमें रह गयी। संध्याके समय पेशमन्‌के साथ बैठकर बातें होने लगीं। ऐसे समय सहसा मोती बीबीने पेशमन्‌से पुछा,—“पेशमन्! मेरे पतिको देखा, कैसे थे?”

    पेशमन्‌ने कुछ विस्मित होकर कहा,—“इसके क्या माने?” मोती बोली,—“सुन्दर थे या नहीं?”

    नवकुमारके प्रति पेशमन्‌को विशेष विराग हो गया था। जिन अलङ्कारोंको मोती ने कपालकुण्डलाको दे दिया उनके प्रति पेशमन् का विशेष लोभ था। मन-ही मन उसने सोच रखा था, कि एक दिन माँग लूँगी। उस बेचारीकी वह आशा निर्मूल हो गयी। अतः कपालकुण्डला और उसके पति दोनोंके प्रति उसे जलन थी। अतएव स्वामिनीके प्रश्नपर उसने उत्तर दिया—‘दरिद्र ब्राह्मणकी सुन्दरता और कुरूपता क्या है?”

    सहचरीके मनका भाव समझकर मोतीने हँसकर कहा—दरिद्र ब्राह्मण यदि उमरा हो जाये, तो सुन्दर होगा या नहीं?”

    पे॰—इसके क्या मानी?

    मोती—क्यों, क्या तुमने यह नहीं सुना है कि बेगमके कहने के अनुसार यदि खुसरू बादशाह हो गये तो मेरा पति उमरा होगा?

    पे॰—यह तो जानती हूँ, लेकिन तुम्हरा पूर्व पति उमरा कैसे होगा?

    मोती—तो हमारे और पति कौन हैं?

    पे॰—जो नये होंगे।

    मोतीने मुस्कराकर कहा—“मेरी जैसी सतीके दो पति, यह बड़े अन्याय की बात होगी। हाँ, यह कौन जा रहा है?”

    जिसे देखकर मोतीने कहा कि यह कौन जा रहा है, उसे पेशमन् तुरत पहचान गयी। वह आगरेका रहनेवाला खान आजमका आदमी था। दोनों ही न्यस्त हो पड़ीं। पेशमन्‌ने उसे बुलाया। उस व्यक्तिने आकर लुत्फुन्निसाको कोर्निश कर पत्र दिया; बोला—“खत लेकर उड़ीसा जा रहा था। बहुत ही जरूरी खत है।”

    पत्र पढ़ते ही मोती बीबीकी सारी आशालतापर तुषारपात हो गया। पत्रका मर्म इस प्रकार था:—

    “हमलोगोंका यत्न विफल हो गया। मरते दम तक बादशाह अकबर हमलोगोंको बुद्धिबलसे परास्त कर गये। उनका परलोकवास हो गया। उनकी आज्ञाके बलसे युवराज सलीम अब जहाँ गीरशाह हो गये। अब तुम खुसरूके लिए व्यस्त न होना। इस उपलक्ष्यमें कोई तुम्हारी शत्रुता न करे, इस चेष्टाके लिये तुरन्त आगारा आ जाओ।”

    अकबर बादशाहने किस तरह इस षड्यन्त्रकी विफल किया, यह इतिहासमें अच्छी तरह वर्णित है। इस तरह उसके विस्तारकी आवश्यकता नहीं।

    पुरस्कार देकर दूतको बिदा करनेके बाद मोतीने वह पत्र पेशमन् को पढ़कर सुनाया। पेशमन्‌ने सुनकर कहा—“अब उपाय?”

  • आनन्द मठ

    आनन्द मठ

    Aproximadamente 86.278 palavras.

    आनन्द मठ
    https://hi.wikisource.org/wiki/आनन्द_मठ

    पहला परिच्छेद

    बड़ी ही छोटी उमरमें शान्तिकी मां मर गयी थी। जिन अवस्थाओंमें शान्तिका चरित्र-गठन हुआ था, उनमें एक प्रधान है। उसके पिता पण्डित और अध्यापक थे। उनके घर में और कोई स्त्री नहीं थी।

    शान्तिके पिता जब पाठशालामें पढ़ाने जाते, तो शान्ति भी उन्हींके पास बैठी रहती थी। पाठशालामें बहुतसे लड़के रहते थे। जब पाठका समय न रहता, शान्ति उन लोगोंके साथ खेलती कूदती थी, किसीके कन्धेपर चढ़ती तो किसीकी गोदमें बैठ जाती। वे लोग भी शान्तिको बहुत प्यार करते थे। इस प्रकार लड़कपनसे ही पुरुषोंके संसर्गमें रहनेका पहला फल तो यह हुआ, कि शान्तिने स्त्रियोंकी तरह कपड़ा पहनना नहीं सीखा अथवा यों कहिये, कि सीखकर भी भूल गयी। वह ठीक पुरुषोंकी तरह लांग कसने लगी। यदि कभी कोई उसे लड़कियों की तरह कपड़ा पहना देता, तो वह उसे झट खोल देती और फिर मर्दानी धोती पहन लेती थी। पाठशालाके विद्यार्थी सिरके बाल नहीं बाँधते, इसीलिये वह भी बालोंक खोले रहती थी। विद्यार्थी लोग उसके बालोंको लकड़ीकी कंघीसे संवार देते थे। उसके वे घूघरवाले वाल उसकी पीठ, कन्धों, भुजाओं और गालोंपर लहराते रहते थे। छात्रगण ललाटमें चन्दन लगाकर बीचमें लाल बिन्दी लगाते थे। इसलिये शान्ति भी वैसा ही करती थी। उसे कोई यज्ञोपवीत पहननेको नहीं देता था, इसलिये वह बहुत रोया करती थी। परन्तु संन्ध्यापूजनके समय छात्रोंके पास बैठकर वह उनका अनुकरण जरूर करती थी। छात्रगण अध्यापकजीके न रहनेपर अश्लील संस्कृतकी

    थोड़ीसी बधार देकर कुछ शृङ्गाररसकी बातें छेड़ दिया करते थे। शान्ति भी तोतेकी तरह उन्हीं बातोंको कहने लगती थी; पर तोतेहीकी तरह वह भी उन बातोंका अर्थ नहीं समझती थी।

    दूसरा फल यह हुआ, कि शान्ति जब कुछ बड़ी हुई, तब विद्यार्थीलोग जो कुछ पढ़ते थे, उसे पढ़ने लगती थी। व्याकरण वह भले हो एक अक्षर न जानती हो, तोभी भट्टि, रघुवंश, कुमार, नैषध आदिके श्लोकोंको व्याख्या सहित याद करने लगी यह सब देख सुनकर, शान्ति के पिता भाग्यपर विश्वास कर उसे मुग्धबोध पढ़ाने लगे शान्ति बहुत जल्दी जल्दी पढ़ने लगी। यह देख अध्यापकजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने व्याकरणके साथ साथ साहित्यके भी दो-एक ग्रन्थ पढ़ाये। इसके बाद ही सारा मामला उलट-पुलट गया। उसके पिताका परलोकवास हो गया।

    शान्ति निराश्रय हो गयी, पाठशाला टूट गयी। छात्र अपने अपने घर चले गये। पर उनमेंसे कुछ उसे बहुत प्यार करते थे, इसलिये उनमें शान्तिको छोड़कर जाते नहीं बना। उनमें से एक दया करके उसे अपने घर ले गये। यही आगे चलकर सन्तान सम्प्रदायमें जा मिले और जीवानन्द कहलाने लगे। सदा जीवानन्द ही कहा करेंगे।

    उस समय जीवानन्दके माता-पिता जीवित थे।

    जीवानन्दने उनसे उस कन्याका सारा हाल कह सुनाया। मातापिताने पूछा “इस समय इस परायी लड़कीका बोझा कौन अपने सिरपर लेगा?"

    जीवानन्दने कहा,-"मैं इसे ले आया हूं, मैं ही इसका भार उठाऊंगा।

    मां-बापने कहा,-"अच्छा, यही सही।"

    जीवानन्द उस समयतक कुंवारे थे। शान्ति भी व्याह करने

    योग्य हो गयी थी अतएव जीवानन्दने उसके साथ अपना विवाह कर लिया।

    विवाहके बाद सब लोग हाथ मल मलकर पछताने लगे। सभी समझ गये कि यह काम अच्छा नहीं हुआ। शान्तिने किसी भी तरह स्त्रियोंकेसे कपड़े नहीं पहने, सिरके बाल नहीं बाँधे। वह घरमें रहकर पड़ोसके बालकोंके साथ खेला करतीथी। जीवानन्दके घरके पास ही जंगल था। शान्ति जंगल में जा मोर, हरिण और दुर्लभ फल और फूलोंको खोजा करती। सास ससुरने पहले तो मना किया पीछे डाँट-डपट की, इसके बाद पीटा और अन्तमें उसे घरमें बन्द करके सांकल चढ़ा दी। इस प्रकारके अत्याचारसे शान्ति ऊब उठी। एक दिन दरवाजा खुला था। वह बिना किसीसे कुछ कहे-सुने चुपचाप घरसे बाहर हो गयी।

    जंगलके भीतर जा उसने चुन-चुनकर फूल तोड़े और उन्हींके रसमें कपड़े रंगकर उसने नवजवान संन्यासीका रूप बनाया। उन दिनों सारे बंगालमें दलके दल संन्यासी फिरा करते थे। शान्ति भीख मांगती खाती हुई जगन्नाथजीके रास्तेमें जा पहुँची। थोड़े ही दिन बाद वहां संन्यासियोंका एक दल आ पहुंचा। शान्ति भी उसी दल में मिल गयी।

    उस समयके संन्यासी आजकलके संन्यासियोंकी तरह नहीं थे। वे सुशिक्षित, बलवान और अनेक गुणोंसे युक्त होते थे और दल बाँधकर चलते थे। वे एक प्रकारसे पक्के राजविद्रोही थे। सरकारी खजाना लूट खाना उनका काम था। वे हृष्टपुष्ट बालकोंको चुरा ले जाते थे और उन्हें खूब पढ़ा लिखाकर अपने दलमें मिला लेते थे। इससे लोग उन्हें लड़िक धरवा" कहा करते थे

    शान्ति बालक संन्यासीके रूपमें ऐसेहो एक दलमें जा मिली। पहले तो वे लोग उसके कोमल शरीरको देखकर उसे अपने दलमें

    मिलाना नहीं चाहते थे, पर पीछे उसकी बुद्धि की प्रखरता, चतुरता और कार्यदक्षता देख, उन्होंने उसे बड़े आदरसे दलमें मिला लिया। शान्ति उनके साथ रहकर कसरत करती और हथियार चलाना सीखती थी, इसीसे वह धीरे धीरे बड़ी मिहनती हो गयी। उनके साथ रहकर उसने बहुतसे देश देखे, बहुतसी लड़ाइयां देखीं। वह हथियार चलाने में भी निपुण हो गयी।

    क्रमशः उसमें जवानीके चिह्न दिखायी देने लगे। बहुतसे संन्यासियोंको यह मालूम हो गया, कि यह तो वेश बदले कोई स्त्री है, पर संन्यासी लोग आमतौरसे जितेन्द्रिय हुआ करते हैं। इसीसे किसीने उससे कुछ नहीं कहा।

    संन्यासियोंमें बहुतसे पण्डित भी थे। शांतिको संस्कृतमें व्युत्पन्न देखकर एक पण्डित संन्यासी उसे पढ़ाने लगे।

    हम पहले लिख आये हैं कि आमतौरसे संन्यासी लेग जितेन्द्रिय हुआ करते हैं; पर सभी ऐसे नहीं होते। ये पण्डितजी भी वैसे नहीं थे अथवा हो सकता है, कि वे शान्तिको नयी जवानीके उमंगसे खिले लावण्यको देखकर मुग्ध हो गये हों और इन्द्रियां उन्हें सताने लगी हों। उन्होंने अपनी शिष्याको श्रृंगाररसके काव्य पढ़ाने आरम्भ किये और जो व्याख्या सुनाने योग्य न भी होती, उसे भी सुनाने लगे। उससे शान्तिकी कुछ हानि तो नहीं हुई भलाई हुई। अबतक शान्ति यह नहीं जानती थी, कि लजा किसे कहते हैं? अब स्त्री स्वभाव-सुलभ लज्जा आपही आ उपस्थित हुई। पुरुषचरित्रके ऊपर निर्मल स्त्रीचरित्रकी अपूर्व आभा शान्ति के गुणोंको और भी चमकाने लगी। शान्तिने पढ़ना छोड़ दिया।

    व्याघ्र जिस प्रकार हरिणीके पीछे दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार शान्ति के अध्यापक भी उसके पोछे दौड़ने लगे। शान्तिने ब्यायाम आदिके द्वारा पुरुषोंसे भी अधिक बल संचय कर लिया था, इसलिये वह अध्यापकजीके पास आते ही थप्पड़ों और

    घूसोंसे उनकी पूजा करने लगती थी, वे थप्पड़ और घूसे भी हलके नहीं होते थे खब तौल तौलकर लगाये जाते थे। एक दिन संन्यासीजीने शान्तिको अकेले में पाकर जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ लिया। शान्ति किसी तरह अपना हाथ न छुड़ा सको, किन्तु संन्यासीके दुर्भाग्यसे वह हाथ शान्तिका बायाँ हाथ था, इसलिये उसने दाहिने हाथसे संन्यासीके सिरमें इस जोरका घुसा मारा कि वे मूर्छित हो गिर पड़े। उसी दिन शान्ति सन्यासी दल छोड़कर भाग गयी।

    शान्ति बड़ी निडर थी। वह अकेली हो अपने देशकी ओर भाग चली। साहस और बाहुबलके प्रभावले वह निर्विघ्न रही। भीख मांगती और जंगली फलोंसे उदर-पोषण करती; मारपीट कर लोगोंको परास्त करती, वह ससुरालमें आ पहुंची। यहां आकर उसने देखा, कि ससुर स्वर्गवासी हो गये हैं। उसकी सासने जातिच्युत होनेके डरसे उसे अपने घरमें न रखा। शान्ति घरसे बाहर चली गयी।

    जीवानन्द घरपर ही थे। वे भी शान्तिके पीछे लगे। उन्होंने बीच रास्तेमें उसे जा पकड़ा और उससे पूछा,-"तुम क्यों घरसे भाग गयी थी? इतने दिन कहां थी?"

    इसके उत्तरमें शान्तिने सब कुछ सचसच सुना दिया। जीवानन्दको सच झूठकी अच्छी पहचान थी। उन्होंने शान्तिकी बातोंका विश्वास कर लिया।

    अप्सराओंकी सी बांकी भौंहोंवाली तिरछी चितवनकी ज्योति लेकर जो 'सम्मोहन' नामका तीर बड़े यत्नसे बनाया गया है, उसे कामदेव विवाहित दम्पतिके लिये व्यर्थ ही खर्च करना नहीं चाहते। अंगरेज़ पूनोंकी रातमें भी सड़कोंपर गैस बत्ती जलाते हैं, बंगाली जिसके सिरमें तेल लगा होता है, उसीके सिरमें और तेल लगाते हैं मनुष्योंकी बात तो दर किनार, चन्द्रदेव सूर्यदेवके बाद हो आकाशमें उदित हुआ करते

    हैं, इन्द्र समुद्र में ही वृष्टि करता है, जिस सन्दूकमें रुपये भरे होते हैं, कुबेर उसीमें और रुपये डाल देते हैं। यमराज जिसके सब किसीको चौपट कर चुके होते है, उसीके बाकी बचे हुए लोगोंको भी उठा ले जाते हैं। केवल कामदेव ही ऐसी निर्बुद्धिताका काम करते हुए नहीं दिखाई पड़ते। जहाँ गठजोड़ा बधा कि उन्होंने वहां परिश्रम करना छोड़ दिया। वहांका भार प्रजापतिको देकर वे ऐसी जगह चले जाते हैं, जहां वे किलीके हृदयका रक्त पान कर सकें। परन्तु आज शायद पुष्पधन्याको और कोई काम नहीं था, इसीसे उन्होंने दो पुष्प-वाणोंका अपव्यय कर डाला। एक तो आकर जीवानन्दके कलेजेमें चुभ और दूसरा शान्तिके हृदयमें। उसीने शान्तिको आज पहले पहल इस बातका बोध कराया, कि उसका हृदय स्त्रीका हो हृदय है-बड़ी ही कोमल वस्तु है। नवप्रेषके प्रथम जल कणोंसे सींची हुई फलकी कलीकी तरह शान्ति एकाएक खिल गयी और आनन्दभरी आंखोंसे जीवानन्दके मुखकी ओर देखने लगी।

    जीवानन्दने कहा, "मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता। देखो, जबतक मैं लौटकर नहीं आता। तबतक तुम यहीं खड़ी रहना।"

    शान्तिने कहा, "तुम लौटकर आओगे तो?"

    जीवानन्दने कुछ उत्तर न दे, बिना किसी ओर देखे, उसी राहकी एक तरफवाली नारियलकी कुञ्जने चुपकेसे शान्तिके होंठ चूम लिये। आज मानों अमृत ही पीनेको मिल गया; यही सोचते हुए वे घर चले आये।

    जीवानन्द मांको समझा-बुझाकर उनसे बिदा मांग चले आये। भैरवीपुरमें उनकी बहन निमाईका व्याह हुआ था। बहनोईके साथ उनकी बड़ी गहरी दोस्ती थी। इसलिये वे शान्तिको लिए हुए वहीं आ धमके। उनके बहनोईने उन्हें थोड़ी सी जमीन दी जिसमें एक झोपड़ी बनाकर वे शान्तिके साथ सुखसे रहने लगे। स्वामीके साथ रहते रहते शान्तिके चरित्र में

    जो मर्दानगी थी; वह धोरे धीरे लुप्त हो गयी। रमणीके रमणीय चरित्रका नित्य नया विकास होने लगा। पहले कुछ दिनों तक तो उसका जीवन एक सुख-स्वप्नकी तरह बीता, पर यकायक सुख-स्वप्न टूट गया। जीवानन्द सत्यानन्दके हाथमें पड़ गये और सन्तान धर्म ग्रहण कर शान्तिको छोड़कर चल दिये। इस परित्यागके बाद निमाईकी बदौलत जो प्रथम साक्षात् इन दोनों स्त्री-पुरुषका हुआ था, उसका हाल पिछले परिच्छेदमें वर्णन किया गया है।

    दूसरा परिच्छेद।

    जीवानन्दके चले जानेपर शान्ति निमाईके घरके बरामदेमें जा बैठी। निमाई भी गोदमें उस लड़कीको लिये हुये वहीं आ बैठी। इस समय शान्तिकी आंखोंमें आँसू नहीं थे। वह आंखें पोंछ, बनावटी हंसीसे मुस्कुरा रही थी। हाँ, कुछ कुछ गम्भीर चिन्तायुक्त और अनमनी अवश्य हो रही थी। निमाई समझ गयी, बोली,-"खैर, किसी तरह मिलना तो हुआ।"

    शान्ति कुछ न बोली, चुपचाप रही। निमाईने देखा कि शांति अपने दिलकी बात न कहेगी। उसे यह भी मालूम था, कि शांतिको मनकी बात कहना पसन्द नहीं, इसलिये उसने जान-बूझकर दूसरी चर्चा छेड़ दी, बोली,–“बहू! यह लड़की कैसी है?"

    शान्तिने कहा,-"यह छोकरी तुम्हें कहांसे मिली? तुम्हें लड़की कब हुई?”

    निमाई-"क्या मुसीबत है! तुमको यमराज उठा क्यों नहीं ले जाते! भाभी! यह लड़की तो भैयाकी है।"

    निमाईने शांतिका जी दुखानेके लिये यह बात नहीं कहीं

    थी। उसका मतलब यही था कि इस लड़कीको भैया ले आये हैं। शांति यह न समझी-उसने सोचा, कि निमाईने मेरे कलेजेमें नस्तर चुभानेके लिये यह बात कही है, इसीसे बोल उठी,-"मैंने लड़कीके बापके बारेमें नहीं पूछा था,-मांकी बात पूछी थी।"

    उचित दण्ड पाकर निमाई झुझला उठी। बोली,-"भाई! मैं क्या जानूं कि यह लड़की किसकी है भैया इसे न जाने कहांसे उठा लाये हैं मुझे सब हाल पूछने का अवसर भी न मिला। आजकल देख रही हो कि घोर अकाल पड़ा हुआ है कितने लोग अपने बाल बच्चोंको रास्तेपर फेंककर भागे जा रहे हैं। कितने ही आदमी तो हमारे ही घर अपने बच्चोंको बेचनेके लिये आये, पर हमने यही सोचकर किसीको नहीं खरीदा कि पराये बेटी-बेटेका बोझा कौन अपने सिर लेने जाय?" यह कहते कहते निमीकी आँखोंमें फिर आंसू भर आये। उन्हें पोंछकर वह फिर कहने लगी,-"लड़की बड़ी सुन्दर है, बड़ा बढ़िया चांदसा मुखड़ा है। इसीसे मैंने इसे भैयासे मांग लिया।"

    इसके बाद शांतिने बड़ी देरतक निमाईके साथ बात की और निमाईके स्वामी जब घर आये तब वहांसे उठकर अपनी कुटियामें चली गयी। वहां पहुंच दरवाजा बन्द कर उसने चल्हेके भीतरसे थोड़ीसी राख निकाली और बाकी राखपर अपने लिये पकाया हुआ भात फेंक दिया। इसके बाद वह बड़ी देरतक खड़ी खड़ी कुछ सोचती रही। फिर आप ही आप बोल उठी,- "इतने दिनसे जो सोच रखा था, उसे आज पूरा करूंगी। जिस आशापर मैंने माजतक वह काम नहीं किया था वह पूरी हो गयी, पर उसे पूरा हुई कहना चाहिये या नष्ट हुई? नष्ट। यह जीवन ही सारा व्यर्थ हुआ। जिस बातका मैं सङ्कल्प कर चुकी हूं, उसे तो पूरा करूंगी ही, जो प्रायश्चित्त एक बार किया वही सौ बार भी सही।"

    यही सब सोच-विचारकर उसने चूल्हेमें भात फेंक दिया और जंगलसे फल तोड़ लायी। अन्नके बदले उसने वही फल खाये। इसके बाद जिस ढाकेकी साड़ीपर निमाई इतनी लट्ट थी, उसे बाहर निकालकर उसने उसकी किनारी फाड़ डाली और उसे पक्के गेरुए रंगमें रंग डाला। यह सब करते करते संध्या हो गयी। संध्या हो जानेपर घरके किवाड़ बन्द कर शांति एक अद्भुत व्यापारमें प्रवृत्त हुई। उसने कैंची लेकर अपने घुटनेतक लटकनेवाले रूखे बाल डाले। जो कुछ बचे, उन्हें लपेटकर उसने जटा बना ली। रूखे बाल अजीब तरहसे जटासे बना लिये गये। इसके बाद उस गेरुए वस्त्रके दो टुकड़े कर उसने एक टुकड़ेका लंगोटा बनाकर पहना और दूसरेकी गांती बनाकर ओढ़ ली जिससे उसका शरीर ढक गया। घरमें एक छोटासा आईना रखा था। उसे आज बहुत दिनों बाद उसने बाहर निकाला और उसमें अपना रूप देखने लगी। देखते देखते बोली-“हाय! क्या करनेको थी और मैंने क्या कर डाला?" तब आईनेको अलग फेककर उसने कटे हुए बालोंकी दाढ़ी-मूछे बनायीं: पर उन्हें लगा न सकी। उसने कहा-"छिः! छिः! क्या कहीं ऐसा भी होता है? अब वह समय कहां? पर हां, उस बूढ़ेको छकानेके लिये इन्हें रख छोड़ना ठीक है।" यही सोचकर उसने उन नकली दाढ़ी मूंछोंको कपड़ेमें छिपाकर रख लिया। इसके बाद उसने घरके अन्दरसे एक बड़ीसी मृगछाला निकाल, कण्ठमें बांध, कण्ठसे जानु पर्यन्त शरीर ढक लिया। इस प्रकार नूतन संन्यासीका रूप बना लेनेपर उसने एक बार घरके चारों तरफ स्थिर भावसे देखा। दोपहर रात बीतनेपर उसने उसी संन्यासी वेशमें किवाड़ खोल घरसे बाहर निकल उसी जङ्गलमें प्रवेश किया। वनकी देवियोंने उस आधी रातके समय जङ्गल में एक अपूर्व संगीत होता हुआ सुना।

    गीत

    नहीं मनोरथ घर रहनेका,

    कहलाके अवला नारी।

    रण जय गावो सब जुड़ि आओ,

    करो युद्धकी तैयारी

    कौन तुम्हारा? कहांसे आये?

    किसके हो? क्या कहलाओ?

    चढ़ घोड़ेपर बांध अस्त्र मैं,

    लड़न चली मत लौटाओ॥

    हरि हरि कह तज मोह प्राणका,

    समर करूंगी अति भारी।

    नहीं मनोरथ घर रहनेका॥

    कहां चला प्रिय प्राण हमारा,

    मुझे छोड़के मत जाना।

    महानादसे विजय दु'दुभी,

    बजता है यह मनमाना॥

    घोड़े उड़े देख जी उमड़ा,

    युद्ध कामना है भारी।

    नहीं मनोरथ घर रहनेका,

    कहलाके अबला नारी॥

    तीसरा परिच्छेद

    दूसरे दिन आनन्दमठके भीतरवाले एक सुनसान मकानमें सन्तानोंके तीनों नायक भग्नोत्साह हो, बैठे बातें कर रहे थे। जीवानन्दने सत्यानन्दसे पूछा-"महाराज! देवता हम

    लोगोंपर ऐसे अप्रसन्न क्यों हैं? किस अपराधसे हम लोग मुसलमानोंद्वारा हराये गये?"

    सत्यानन्दने कहा-"देवता अप्रसन्न नहीं हैं, लड़ाई में तो हार जीत हुआ ही करती है। उस दिन हम जीते थे। आज हार गये हैं, अन्तमें फिर जीत सकते हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि जो इतने दिनोंसे हमारी रक्षा करते आये हैं, वे ही शङ्कचक्र-गदा-पद्मधारी बनवारी फिर हमपर दया दिखलायेंगे। उनके चरण छूकर हमलोगोंने जिस व्रतको ग्रहण किया है, उसका पालन तो हमें करना ही होगा। विमुख होनेसे हमें अनन्त नरक भोगना होगा। मुझे तो आगे मङ्गल ही मङ्गल दिखाई देता है। परन्तु जैसे देवानुग्रह हुए बिना कोई कार्य नहीं सिद्ध होता वैसे ही पुरुषार्थ बिना भो कोई काम नहीं सरता। हमारे हारनेका कारण यही हुआ कि हम निहत्थे थे। गोले-गोलियोंके सामने लाठी, बछे और भालेकी क्या हकीकत है! इसलिये यह कहना ही पड़ता है कि हममें पुरुषार्थ नहीं था, इसीसे हम हार गये। अब हमारा कर्तव्य है कि हम अपने यहाँ भी हथियारों और बन्दूकोंका ढेर लगा दें।"

    जीवा०-"यह काम तो बड़ा ही कठिन है।"

    सत्या०-"जीवानन्द! क्या सचमुच बड़ा ही कठिन है? सन्तान होनेपर भी तुम्हारे मुंहसे ऐसी बात क्योंकर निकली? क्या सन्तानोंके लिये भी इस दुनियां में कोई काम बड़ा ही कठिन है?"

    जीवा०-"आज्ञा दीजिये, कहांसे अस्त्र संग्रह कर लाऊं?"

    सत्या०-"इसके लिये मैं आज हो रातको तीर्थयात्रा करने निकालूंगा। जबतक मैं न लौटू, तबतक तुम लोग किसी बड़े भारी काममें हाथ न डालना हां, आपसमें एकता बनाये रखना, सन्तानोंकी प्राण रक्षाके लिये खाने-पहननेकी चीजें संग्रह करते रहना और माताको युद्ध जयके लिये अर्थसंग्रह करते जाना। यह भार तुम दो जनोंपर रहेगा।"

    भवानन्दने कहा,-"आप तीर्थयात्राके समय यह सब सामान क्योंकर इकट्ठा कर सकेगे? गोली गोले ओर तोप बन्दूके खरीदकर भेजनेसे तो बड़ी गड़बड़ मच जायगी। और इतना सामान मिलेगा कहाँ? कौन इतना सब बेचनेको तैयार होगा, और कौन ला सकेगा?"

    सत्या०-खरीदकर लानेसे हमारा काम नहीं चलेगा। मैं कारीगर भेज दूंगा; उनसे यहीं बनवा लेना होगा।"

    जीवा०-"यह क्या? इसी आनन्दमठ में?"

    सत्या०-कहीं ऐसा भी हो सकता है? मैं बहुत दिनोंसे इसकी फिक्रमें था, आज भवानन्दकी दयासे मौका हाथ लग गया है। तुम लोग कह रहे थे कि विधाता हमारे प्रतिकूल है, पर मैं तो देख रहा हूं कि वह एकदम अनुकूल है।"

    भवारे-“कारखाना कहां खुलेगा?”

    सत्या०-“पदचिह्र-ग्राममें।"

    भवा०-"वहां क्यों खुलेगा?"

    सत्या०-“इसीलिये तो मैंने महेन्द्रसे यह व्रत ग्रहण करवाना चाहा था और उसके लिये इतना तरद्द द उठाया है।"

    जीवा०-"क्या महेन्द्रने व्रत ले लिया?"

    सत्या०-"लिया नहीं है, लेगा। आज ही रातको उसकी दीक्षा होगी।"

    जीवा०-"महेन्द्र के लिये क्या क्या तरद्द द उठाने पड़े, वह तो हमको मालूम ही नहीं। उसकी स्त्री-कन्या क्या हुई? वे कहां रखी गयी हैं? मैंने आज नदीके तीरपर एक कन्या पड़ी पायी थी। उसे मैं अपनी बहनको दे आया हूं। उसीके पास एक सुन्दरी स्त्री भी मरी पड़ी थी। कहीं वही महेन्द्रकी स्त्री तो नहीं थी? मुझे तो ऐसा ही शक हो रहा था।"

    सत्या०-"हां, वे ही महेन्द्रकी स्त्री कन्या थीं।" भवानन्द चौंक उठे। अब वे समझ गये, कि मैंने जिस

    स्त्रीको औषधके बलसे पुनर्जीवित किया है, वह महेन्द्रकी ही स्त्री कल्याणी है, किन्तु इस समय उन्होंने कोई बात कहनी आवश्यक नहीं समझी।

    जीवानन्दने कहा-“महेन्द्रकी स्त्री कैसे मरी?"

    सत्या०—“जहर खाकर।"

    जीवा०-"उसने जहर क्यों खाया?"

    सत्या०–“भगवानने उसे प्राण-त्याग करनेके लिये सपने में आज्ञा दी थी।"

    जीवा०—“वह स्वप्नादेश क्या सन्तानोंके कार्योद्धारके ही निमित्त हुआ था?

    सत्या०-“महेन्द्रसे तो मैंने ऐसा ही कुछ सुना था। अच्छा, अब सायङ्काल हो चला है। मैं सन्ध्या-पूजा करने जाता हूं। उसके बाद नूतन सन्तानोंको दीक्षित किया जायगा।"

    भवा०-“क्या बहुतसे नये सन्तान दीक्षा लेनेवाले हैं? क्या महेन्द्र के सिवा और कोई आदमी शिष्य होना चाहता है?"

    "हाँ, एक और नया आदमी है। पहले तो मैंने उसे कभी नहीं देखा था। आज ही वह मेरे पास आया है। वह बड़ा ही नवजवान और सुन्दर पुरुष है। मैं उसकी चालढाल और बात चीतसे बड़ाही प्रसन्न हुआ। वह एकदम खरा सोना मालूम पड़ता है। उसे संतानोंका कर्त्तव्य सिखलानेका भार जीवानन्दको दिया जाता है। इसका कारण यह है कि जीवानंद लोगोंका मन मोह लेने में बड़ा चतुर है। मैं चलता हूं, तुम लोगोंसे सिर्फ एक बात और कहनेको रह गयी है। दत्तचित्त होकर उसेमी सुन लो।"

    दोनोंने हाथ जोड़े हुए कहा-"जो आज्ञा।"

    सत्यानन्दने कहा-"यदि तुम दोनोंमसे कोई अपराध बन आया हो अथवा मेरे लौट आनेके पहले कोई नया अपराध बन पड़े, तो उसके लिये मेरे आये बिना प्रायश्चित्त न करना। मेरे आनेपर प्रायश्चित्त करना ही पड़ेगा।"

    यह कह, सत्यानन्द अपने स्थानको चले गये। भवानन्द और जीवानन्द परस्पर एक दूसरेका मुंह देखने लगे।

    भवानन्दने कहा-"यह बात कहीं तुम्हारे ही ऊपर डालकर तो नहीं कही गयी है?"

    जीवा०-"हो सकता है, क्योंकि मैं महेंद्र की कन्याको रख आनेके लिये बहनके घर चला गया था।"

    भवा०-"इसमें भला कौनसा अपराध हुआ? वह तो कोई निषिद्ध कार्य नहीं है। कहीं अपनी स्त्रीसे भी तो नहीं मिल आये हो?"

    जीवा०-"शायद गुरुजीको यही संदेह हुआ है।"

    चौथा परिच्छेद

    संध्या पूजा समाप्त कर सत्यान दने महेंद्रको बुलाकर कहा-"तुम्हारी स्त्री और कन्या जीवित हैं।"

    महेंद्र-"कहां हैं, महाराज?"

    सत्या०-"तुम मुझे महाराज क्यों कहते हो?"

    महेंद्र-"सभी कहते हैं, इसीलिये मैं भी कहता हूं। मठके अधिकारी राजा कहलाते ही हैं। महाराज, मेरी कहां कहां है?"

    सत्या-"इसका जवाब पानेके पहिले एक बातका ठीक-ठीक जवाब दो। क्या तुम संतानधर्म ग्रहण करना चाहते हो?

    महेंद्र-"हाँ, पक्का इरादा कर चुका हूं।"

    सत्या०-"तब यह न पूछो कि तुम्हारी स्त्री कन्या कहाँ हैं।

    महेंद्र-"क्यों महाराज?"

    सत्या०-"जो मनुष्य यह व्रत ग्रहण करता है, उसे स्त्री,

    पुत्र, कन्या और सगे-सम्बन्धियोंसे नाता तोड़ देना पड़ता है। स्त्री, पुत्र, कन्या आदिका मुंह देखना भी पाप है। उसके लिये प्रायश्चित्त करना पड़ता है। जबतक संतानोंका मनोरथ सिद्ध नहीं होता, तबतक तुम अपनी कन्याका मुंह न देखने पाओगे। इसलिये यदि तुमने संतानधर्म ग्रहण करनेका पक्का इरादा कर लिया हो, तो फिर कन्याका हाल न पूछो पूछकर ही क्या करोगे? क्योंकि तुम उसे देखने तो पाओगे ही नहीं।"

    महेंद्र-"ऐसा कठिन नियम क्यों प्रभो?"

    सत्या०-"संतानोंका का बड़ा ही कठिन है। जो सर्वत्यागी हैं, उसके सिवा दूसरेसे यह काम नहीं हो सकता। जिसका चित्त माथाके जालमें फसा है, वह डोरीमें बंधे हुए पतङ्गकी तरह पृथ्वी छोड़कर स्वर्ग नहीं जा सकता।"

    महेंद्र-महाराज! आपकी बात अच्छी तरह मेरी समझमें नहीं आती। जो स्त्री-पुत्रका मुंह देखता है, वह क्या किसी गुरुतर कार्यका अधिकारी नहीं हो सकता?"

    सत्या०-"पुत्र कलत्रको देखते ही हमलोग देवताकी बात भूल जाते हैं। संतानधर्मका यह नियम है कि जब भी प्रयोजन हो, तभी संतानगण प्राण त्याग दें। तुम यदि अपनी कन्याका मुंह देख लोगे, तो क्या उसे छोड़कर तुमसे प्राण दिये जायंगे?"

    महेंद्र-"न देखनेपर ही क्या उसे भूल जाऊंगा?"

    सत्यानंद-"अगर न भूल सकोगे तो यह व्रत मत ग्रहण करो।"

    महेंद्र-"क्या सभी संतानोंने इसी तरह स्त्री पुत्रकी मोह-माया त्यागकर यह व्रत ग्रहण किया है? तब तो संतानोंको संख्या बहुत ही कम होगी?"

    सत्या०-"संतान दो तरहके हैं एक दीक्षित दूसरे अदीक्षित। जो दीक्षित नहीं हैं, वे संन्यासी या भिखारी हैं। वे केवल युद्धके

    समय चले आते हैं और लूट के मालमें हिस्सा इनाम पाकर चले जाते हैं। जो दीक्षित हैं, वे सब कुछ छोड़े बैठे हैं। वे हो इस संप्रदायके कर्ता-धर्ता हैं। मैं तुम्हें अदीक्षित संतान नहीं बनाना चाहता; क्योंकि लड़ने-भिड़नेके लिये भाले-बर्छी और लाठी सोटेवाले तो बहुतसे हैं। दीक्षित हुए बिना तुम सम्प्रदायका कोई गुरुतर कार्य न कर सकोगे।"

    महेंद्र-दीक्षा कैसी? मैं दीक्षा क्यों लूं? मैं तो पहले ही मंत्र ले चुका हूं।"

    सत्या०-"वह मंत्र छोड़कर मुझसे फिर दूसरा मंत्र लेना होगा।"

    महेंद्र–"वह मंत्र कैसे त्याग कर सकता हूं?"

    सत्या०-"उसकी विधि मैं तुम्हें बतला दूंगा।"

    महेन्द्र-नया मन्त्र क्यों लेना पड़ेगा?"

    सत्या०-"संतान लोग वैष्णव हैं।"

    महेंद्र-“यह तो मेरी समझमें नहीं आता। ये संतान लोग कैसे वैष्णव हैं? वैष्णवों के लिये तो अहिंसा ही बड़ा भारी सत्या अहिंसावाले चैतन्यदेवके अनुयायी वैष्णव हैं। नास्तिक बौद्धधर्मके अनुकरणपर जो अप्राकृतिक वैष्णवधर्म उत्पन्न हुआ था, यह उलीका लक्षण है; परन्तु सच्चे वैष्णवधर्मका लक्षण दुष्टोंका दमन और धरित्रीका उद्धार है, क्योंकि विष्णु ही संसारके पालनकर्ता हैं। उन्होंने दस बार शरीर धारणकर पृथ्वीका उद्धार किया है। केशी, हिरण्यकशिपु, मधुकैटभ, मुर, नरक आदि दैत्यों, रावणादि राक्षसों और कंस तथा शिशुपाल आदि राजाओंको उन्होंने ही युद्ध में मार गिराया था। वे हो जेता, जयदाता, पृथ्वीके उद्धरकर्ता और सन्तानोंके इष्ट देवता हैं। चैतन्यदेवका वैष्णवधर्म तो अधूरा है। वह सच्चा वैष्णवधर्म नहीं है। चैतन्यदेवके विष्णु प्रेममय हैं, किन्तु भगवान केवल प्रेममय ही नहीं अनन्त शक्तिमय भी हैं। धर्म है।”

    चैतन्यके विष्णु केवल प्रेममय हैं सन्तानोंके विष्णु केवल शक्तिमय हैं। हम दोनों ही वैष्णव हैं, पर साधे ही वैष्णव हैं। बात समझमें आयी कि नहीं?"

    महेन्द्र-“नहीं, यह तो बिलकुल नयी बातें मालूम पड़ती कासिमबाजारमें एक बार एक पादरी मिला था। वह भी कुछ ऐसी ही बातें कहता था। कहता था कि ईश्वर प्रेममय हैं, तुम लोग ईसामसीहको प्यार करो। आपकी बातें भी उसी कीसी मालुम पड़ती हैं।"

    सत्या-"जैसी बातें हमारे बाप-दादे कहते चले आये हैं, वैसी ही बातें तो मैं कह रहा हूं। तुमने यह सुना है या नहीं कि ईश्वर त्रिगुणात्मक है?"

    महेन्द्र-"हां, सुना है। सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण है।"

    सत्या०—“बहुत ठीक। इन तीनों गुणोंकी अलग-अलग उपासना होती है। सत्त्वगुणसे उनकी दया, दाक्षिण्य आदिकी उत्पत्ति होती है। उसकी उपासना भक्तिद्वारा करनी चाहिये। चैतन्यका सम्प्रदाय यही करता है। रजोगुणसे उनकी शक्ति उत्पन्न होती है। इसकी उपासना युद्धद्वारा की जाती है, देवताके शत्रुओंको मारकर की जाती है। हम लोग ऐसा ही करते हैं। और तमोगुणसे भगवान्ने शरीर धारण कर, चतुर्भुज आदि रूप इच्छानुसार धारण किये हैं। माला, चन्दन आदि उपहारोंके द्वारा इस गुणकी पूजा की जाती है। सर्वसाधारण ऐसा ही करते हैं। अब समझे या नहीं?"

    महेंद्र-“समझा। तब तो सन्तानगण भी एक प्रकारके उपासक ही हैं।"

    सत्या०-“अवश्य। हम लोग राज्य नहीं चाहते, पर चूँकि ये मुसलमान भगवान्से द्वेष करते हैं, इसीलिये हम उनको निर्मूल कर डालना चाहते हैं।"

    पांचवां परिच्छेद

    बातचीत समाप्त कर, सत्यानन्दने महेन्द्रको लेकर मठके भीतरवाले मदिरमें, जहां वह शोभामयी प्रकाण्ड चतुर्भुज मूर्ति विराजती थी, प्रवेश किया। उस समय वहांकी शोभा बड़ी ही विचित्र थी। सोने, चांदी और रत्नोंसे जगमगाते हुए प्रदीप मन्दिरको आलोकित कर रहे थे। ढेरके ढेरे फूल शोभायमान होते हुए मन्दिरमें सुगन्ध फैला रहे थे। एक आदमी वहां बैठा हुआ धोरे धीरे “हरे मुरारे" कह रहा था। सत्यानन्दके भीतर घुसते ही उसने उठकर उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मचारीने पूछा-“तुम दीक्षित होना चाहते हो?"

    उसने कहा, "मेरे ऊपर दया कीजिये।"

    यह सुन, उसे और महेन्द्रको सम्बोधन कर सत्यानन्दने कहा-"तुम लोगोंने यथाविधि स्नान कर लिया है न? अच्छी तरहसे संयम और उपवास किये हुए हो न?"

    उत्तर-"हां"

    सत्या०–"अच्छा, तुम लोग यहीं भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो कि हम सन्तानधर्मके सब नियमोंका पालन करेंगे।'

    दोनों-"करेंगे।"

    सत्या०-"जबतक माताका उद्धार नहीं हो जाता, तबतक गृहस्थधर्मका परित्याग करोगे न?”

    दोनों-"हां, करेंगे।"

    सत्या०-"मां-बापको त्याग दोगे?"

    दोनों-"हां।"

    सत्या०-"भाई-बहनको?"

    दोनों०-"हाँ, उन्हें भी छोड़ देंगे।" सत्या०-"स्त्री-पुत्रको?"

    दोनों-"उन्हें भी त्याग देंगे।"

    सत्या०-"सगे-सम्बन्धियों और दास-दासियोंको?"

    दोनों-"उन्हें भी छोड़ देंगे।"

    सत्या०—“धन, सम्पद्, भोग विलास?"

    दोनों-"आजहीसे इन सबको छोड़ देंगे।"

    सत्या०-“इन्द्रियोंको वशमें रखोगे न? कभी किसी स्त्रीके साथ एक आसनपर न बैठोगे?"

    दोनों,-"नहीं बैठेंगे। इन्दियोंको वशमें रखेंगे।"

    सत्या०-"भगवान्के सामने प्रतिज्ञा करो, कि अपने लिये या अपने सगे-सम्बन्धियोंके लिये अर्थोपार्जन न करोगे। जो कुछ पैदा करोगे, उसे वैष्णवोंके धनागारमें दोगे।"

    दोनों-"हां, ऐसा ही करेंगे।"

    सत्या०-"सन्तानधर्मके लिये स्वयं अस्त्र हाथमें लेकर युद्ध करोगे न?"

    दोनों,-"हाँ"

    सत्या०-"रणसे कमी पीछे तो न हटोगे?"

    दोनों-"कभी नहीं।"

    सत्या०-“यदि तुम्हारी यह प्रतिज्ञा भङ्ग हो जाय?"

    दोनों-"तो जलती चितामें प्रवेश कर या विष खाकर प्राण त्याग कर देंगे।"

    सत्या०-"एक बात और है। तुम किस जातिके हो, महेन्द्र तो कायस्थ है।"

    दूसरेने कहा-“मैं तो ब्राह्मणका बालक हूं।"

    सत्या–"अच्छी बात है। क्या तुम अपनी जाति त्याग कर सकोगे? सब सन्तानोंकी जाति एक है। इस सदाव्रतमें ब्राह्मण शूद्रका कोई विचार नहीं है। बोलो, कहते हो?"

    दोनों-"हम सब एकही मांकी सन्तान हैं। अतएव हम-लोग जाति-पांतिका विचार न करेंगे।"

    सत्या०-"तब आओ, मैं तुम लोगोंको दीक्षा दूं। तुम लोगोंने जो प्रतिज्ञाए अभी की हैं, उन्हें कभी न तोड़ना। स्वयं मुरारी इसके साक्षी रहेंगे जिन्होंने रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, जरासन्ध, शिशुपाल आदिको मार डाला था; जो सर्वान्तर्यामी, सर्वमय, सर्वशक्तिमान और सर्व नियन्ता हैं: जो इन्द्रके वज्र और बिल्लीके नखोंमें तुल्यरूपसे वास करते है, वे ही प्रतिज्ञा भंग करनेवालेको मारकर घोर नरकमें डाल देंगे।" दोनों-“बहुत अच्छा।

    सत्या०-"अच्छा, तो अब गाओ-वन्देमातरम्।”

    दोनों ही उस अकेले मातृमन्दिर में मातृ-स्तुतिका गान करने लगे। इसके बाद ब्रह्मचारीने उन लोगोंको यथाविधि दीक्षा दी।

    छठा परिच्छेद

    दीक्षा समाप्त कर सत्यानन्द महेन्द्रको एकान्त स्थानमें ले गये। दोनोंके बैठ जानेपर सत्यानन्दने कहा,-“देखो, बेटा! तुमने जो यह महाव्रत ग्रहण किया है, उससे मैं समझता हूं कि भगवान् हम लोगोंके प्रति अनुकूल हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों माँका बहुत काम निकलेगा। तुम खूब मन लगाकर मेरी बातें सुनो। मैं तुमको जीवानन्द और भवानन्दके साथ-साथ वन-वन भटकते हुए युद्ध करनेको नहीं कहता। तुम पदचिह्न ग्राममें लौट जाओ। तुम्हें घरपर रहकर ही सन्तानधर्मका पालन करना होगा।"

    यह सुन, महेन्द्र बड़े हो विस्मित और दुःखित हुए, पर कुछ

    बोले नहीं। ब्रह्मचारी कहने लगे,-"यहां हमारा कोई आश्रय नहीं है-ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ यदि कोई प्रबल सेना आकर हमें घेर ले, तो हम रसद पानी ले, दरवाजा बन्द कर दस दिन निर्विघ्न रह सकें। हमारे पास कोई किला तो है नहीं तुम्हारे महल अटारी है, गांवपर तुम्हारा रोबदाब है। मेरी इच्छा है कि वहां एक गढ़ बनाऊँ। खाई और शहरपनाहोंके द्वारा पदचिह्न ग्रामको अच्छी तरह घेरकर, बीच बीचमें पहरेका इन्तजाम कर देने और बांधके ऊपर तोपें बैठा देनेसे बड़ा बढ़िया किला तैयार हो जायगा। तुम अपने घर चले जाओ, धीरे-धीरे सन्तान-सम्प्रदायके दो हजार आदमी भी वहां पहुंच जायेंगे। वेही लोग यह खाई और बांध वगैरह तैयार कर देंगे। तुम वहां एक बड़ासा लोहेका मकान बनवा लेना, जिसमें सन्तानोंका खजाना रहेगा। मैं अशर्फियोंसे भरे हुए सन्दूक एक एक कर तुम्हारे पास भेजता रहूंगा। तुम उसी धनसे धीरे-धीरे यह सब काम पूरा करा लेना। मैं जगह जगहसे होशियार कारीगर ढूढ़ कर वहां भेजूंगा। उनके पहुंच जानेपर तुम वहां कारखाना खोल देना, जिसमें तोप, गोला, गोली, बारूद, और बन्दूकें तैयार हुआ करेंगी। मैं इसीलिये तुम्हें घर जानेको कह रहा हूं।" महेन्द्रने सब स्वीकार कर लिया।

    सातवां परिच्छेद

    सत्यानन्दके चरणोंमें प्रणाम कर महेन्द्र जब चले गये, वह दूसरा शिष्य जो उसी दिन दीक्षित हुआ था, वहां आ पहुंचा। उसके प्रणाम करनेपर सत्यानन्दने उसे आशीर्वाद देकर मृगचर्मपर बैठनेके लिये कहा। इधर-उधरकी कुछ बातें करनेके

    अनन्तर उन्होंने कहा-"कृष्णमें तुम्हारी गहरी भक्ति है या नहीं?

    शिष्यने कहा-“सो कैसे कहूं? मैं जिसे भक्ति समझता हूं, वह या तो दुनियांकी आंखोंमें धूल झोंकना है या अपनी आत्माके साथ धोखा करना है।"

    सत्यानन्दने सन्तुष्ट होकर कहा-"ठीक कहते हो, जिससे भक्ति दिन दिन गहरी हो; वही काम करना। मैं आशीर्वाद करता हूं कि तुम्हारा प्रयास सफल होगा, क्योंकि तुम्हारी उमर अभी बहुत थोड़ी है। अच्छा, बेटा! मैं तुम्हें क्या कहकर पुकारा करूं? मैं तो यह बात पूछना ही भूल गया था।"

    नूतन सन्तानने कहा,-"आपकी जो इच्छा हो वही कहकर पुकारें। मैं तो वैष्णवोंका दासानुदास हूं।"

    सत्या०-"तुम्हारी यह नवीन अवस्था देखकर तो तुम्हें नवीनानन्द ही कहकर पुकारनेकी इच्छा होती है। बस आजसे तुम्हारा यही नाम हुआ। पर एक बात तो बतलाओ तुम्हारा पहला नाम क्या था? यदि कहने में कोई बाधा हो, तोभी कह देना। मुझसे कह दोगे, तो निश्चय जान रखो, कि कोई तीसरा यह न जानने पायेगा। सन्तानधर्मका मर्म यही है कि जो न कहने योग्य हो, वह बात भी गुरुसे कह देनी चाहिये। देनेसे कोई क्षति नहीं होती।"

    शिष्य-"मेरा नाम शान्तिराम देव शर्मा है।"

    "नहीं, तेरा नाम शान्तिर्माण पापिष्ठा है।"यह कहकर सत्यानन्दने अपने शिष्यकी काली और डेढ़ हाथ लम्बी दाढ़ी बायें हाथसे पकड़कर खींची। बस, नकली दाढ़ी झटसे अलग हो गयी। सत्यानन्दने कहा-“जा, बेटी! तू मेरे हो साथ धोखा-धड़ी करने आयी थी? यदि छकाने ही चली थी, तो फिर तूने यह डेढ़ हाथ लम्बी दाढ़ी क्यों लगायी। दाढ़ी अगर ठीक बैठ भी जाती, तो यह कोमल कण्ठस्वर और यह चितवन कैसे छिपा

    लेती? यदि मैं ऐसा बोदा होता, तो फिर इतने बड़े काममें हाथ क्योंकर लगाता?"

    लजायी हुई शान्ति दोनों हाथोंसे आंखें छिपाये और सिर झुकाये हुई कुछ देरतक बैठी रही। इसके बाद हाथ हटाकर उसने बूढ़े बाबापर एक तिरछी चितवनका वार कर कहा-"प्रभो! मैंने कुछ अपराध तो नहीं किया। क्या स्त्रियोंके हाथमें बल नहीं होता?"

    सत्या०-"उतना ही, जितना गायके खुरमें जल समा सकता है।"

    शान्ति-"आप क्या कभी सन्तानोंके बाहुबलकी परीक्षा भी लेते हैं?"

    सत्या०-"हाँ, लेता हूं।” यह कहकर सत्यानन्दने एक और कुछ थोड़ेसे लोहेके तार लाकर शान्तिके हाथमें देते हुए कहा-"इस फौलादके धनुषपर इस तारकी प्रत्यञ्चा चढ़ानी होती है। प्रत्यञ्चा दो हाथकी होती है। प्रत्यञ्चा चढ़ाते चढ़ाते धनुष उछल पड़ता है, जिससे प्रत्यञ्चा चढ़ाने-वाला ही दूर जा गिरता है। इसपर जो सही सलामत प्रत्यञ्चा चढ़ा दें, उसे ही मैं बलवान् समझता हूं।"

    शान्तिने उस धनुष और तीरकी भलीभांति परीक्षा कर कहा-"क्या सभी सन्तान इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुके है?"

    सत्या०-"नहीं, मैंने इसके द्वारा उनके बलका अनुमानमात्र कर लिया है।"

    शान्ति-"कौन-कौन इस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हैं?"

    सत्या०-"सिर्फ चार आदमी।"

    शान्ति-"कौन-कौन? क्या मैं यह पूछ सकती हूं?"

    सत्या०-"हाँ, कोई आपत्ति नहीं है? एक तो मैं ही इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका हूं।"

    शान्ति-"और कौन कौन उत्तीर्ण हुए हैं?"

    ७ सत्या०-"जीवानन्द, भवानन्द और ज्ञानानन्द।”

    यह सुन, शान्तिने धनुष और तार लेकर झटपट धनुषका रौंदा कस दिया और ब्रह्मचारीके चरणोंके पास रख दिया।

    सत्यानन्द विस्मित, मीत और स्तम्भित हो गये। थोड़ी देर बाद बोले-“यह क्या? तुम देवी हो या मानवी?"

    शान्तिने हाथ जोड़कर कहा, "मैं सामान्य मानवी हूं। पर हाँ, ब्रह्मचारिणी हूं।"

    सत्या–"सो कैसे? क्या तुम बालविधवा हो? नहीं बाल-विधवाओंमें भी इतना बल नहीं होता, क्योंकि वे एक ही समय भोजन करती हैं।"

    शान्ति-"मैं सधवा हूं।"

    सत्या०-"तो क्या तुम्हारा स्वामी लापता है?"

    शान्ति-"नहीं, उनका पता ठिकाना है और मैं उन्हींका पता पाकर यहां आयी भी हूं।"

    सहसा सत्यानन्दके वित्तमें एक बात वैसे ही झलक आयी, जैसे मेघमालाको हटाकर एकाएक धूप निकल आये। उन्होंने कहा,-"अच्छा मुझे याद आ गया। जीवानन्दकी स्त्रीका नाम शान्ति था। कहीं तुम जीवानन्दकी ही स्त्री तो नहीं हो?"

    नवीनानन्दने अपने मुँहको जटासे ढक लिया, मानो कमल-के फलोंपर हाथीकी सूंड़ फैल गयी। सत्यानन्द बोले-“तू यह पाप करने क्यों आयी?"

    एकाएक अपनी जटाको पीठपर फेंक, शान्तिने मूंह उठाकर कहा-“प्रभो! पाप कैसा? पत्नीका स्वामीका अनुसरण करना क्या पाप कहलाता है? यदि सन्तानोंका धर्मशास्त्र इसे पाप बतलाता हो, तो यह सन्तानधर्म अधर्म है। मैं उनको सहधर्मिणी हूं। वे धर्माचरणमें लगे हैं, इसलिये मैं उनके धर्ममें सहायता करने आयी हूं।"

    शांतिकी तेजभरी वाणी सुन, और उसकी बांकी गरदन,

    उठी हुई छाती, काँपते हुए अधर और उज्ज्वल तथा नीरपूर्ण नेत्र देख, सत्यानन्द बड़े ही प्रसन्न हुए, बोले,-"तुम साध्वी हो, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु बेटी! पत्नी केवल गृहधर्म में ही सहधर्मिणी मानी जाती है। वीरधर्म में रमणीको सहायता कैसी?"

    शान्ति-"कौनसे महावीर बिना पत्निके ही वीर हो गये हैं? यदि सीता न होती तो राम थोड़े ही वीर हो सकते थे? बतलाइये तो सही, अर्जुनने कितने विवाह किये थे? भीममें जितना बल था, उनके उतनी ही पत्नियां भी थीं। कहाँतक कहूँ? आपको बतलानेकी जरूरत नहीं है।"

    सत्या०-"ठीक है, पर कौन वीर अपनी स्त्रीको लेकर रणभूमिमें गया हैं?"

    सत्या०-अर्जुन जिस समय यादवी सेनाके साथ आकाश मार्गसे युद्ध कर रहे थे, उस समय किसने उनका रथ चलाया था? द्रौपदी यदि साथ न रहती, तो पाण्डवगण कुरुक्षेत्रको लड़ाई में जूझने थोड़े ही जाते?"

    सत्या०-"ठीक है; पर साधारण लोगोंके मन स्त्रियों को देखकर चंचल हो जाते हैं, जिससे वे काममें ढिलाई करने लगते हैं। इसीलिये सन्तानोंसे यह प्रतिज्ञा करायी जाती है कि वे किसी स्त्रोके साथ एक आसनपर न बैठे। जीवानन्द मेरा दाहिना हाथ है। तुम क्या मेरा दाहिना हाथ ही तोड़ने चली हो?"

    शान्ति-"नहीं, मैं आपके दाहिने हाथका बल बढ़ाने आयी हूं। मैं ब्रह्मचारिणी हूं और प्रभुके पास ब्रह्मचारिणी ही बनकर रहूंगी। मैं केवल धर्माचरण करने आयी हूँ स्वामीके दर्शन करनेके लिये नहीं। मैं विरहकी ज्वालासे जल नहीं रही हूं। स्वामीने जो धर्म स्वीकार किया है, उसमें मेरा हिस्सा क्यों न होगा? यही सोचकर मैं चली आयी हूँ।"

    सत्या०-“अच्छी बात है, मैं कुछ दिनोंतक परीक्षा लूंगा।"

    शान्तिने पूछा-“मैं आनन्दमठमें रहने पाऊंगी न?”

    सत्या०-"तो आज फिर कहाँ जाओगी?"

    शान्ति-"इसके बाद?”

    सत्या०-"माता भवानीकी तरह तुम्हारे ललाटमें भी अग्नि है। सन्तान-सम्प्रदायको ही क्यों भस्म करोगी?"

    यह कह, आशीर्वाद दे, सत्यानन्दने शान्तिको विदा किया। शान्तिने आपही आप कहा-"अच्छा बुड्ढे! रह जा मेरे ललाटमें आग लगी है न? अच्छा, तो मैं देखूंगी, कि तेरी माँके कपालमें आग लगी है या मेरे?"

    सच पूछो, तो सत्यानन्दका यह अभिप्राय नहीं था उन्होंने उसकी आँखोंमें जो बिजली थी, उसीकी बात कही थी। पर क्या ऐसी बात किसी बूढ़े-बड़ेको नौजवानोंसे कहनी चाहिये।

    आठवां परिच्छेद

    शान्तिको उस दिन रातभरके लिये मठमें रहनेको आज्ञा मिली थी, इसलिये वह रहने के लिये घर ढूंढने लगी। अनेक घर खाली पड़े थे। गोवर्द्धन नामका नौकर वह भी एक छोटा-मोटा सन्तान हो था हाथमें चिराग लिये उसे घर दिखाता फिरता था। कोई घर शान्तिको पसन्द नहीं आया। हताश होकर गोवर्द्धन शान्तिको सत्यानन्दके पास ले चला। शान्तिने कहा-"क्यों भाई! इधरके कई घर तो तुमने दिखलाये ही नहीं?"

    गोवर्द्धनने कहा,-"वे सब घर अच्छे है, इसमें सन्देह नहीं; पर सबमें आदमी भरे हैं।"

    शान्ति-"कैसे केसे लोग हैं "

    गोव०-"बड़े-बड़े सेनापतिगण।"

    शांति-"बड़े बड़े सेनापति कौन-कौन है?

    गोव०-"भवानन्द, जीवानंद, धीरानंद, ज्ञानानंद। इस आनन्दमठमें सब आनन्द-ही-आनन्द हैं।"

    शांति-"चलो, मैं जरा उन घरोंको देख लूं।"

    यह सुन, गोवर्द्धन पहले तो शांतिको धौरानन्दके घरमें ले उस समय धीरानन्द महाभारतका द्रोणपर्व पढ़ रहे थे। अभिमन्युने किस प्रकार सप्तरथियोंके साथ युद्ध किया था यही पढ़नेमें वे डूबे हुए थे। उन्होंने कुछ भी न कहा। शान्ति भी चुपचाप वहांसे लौट आयी।

    इसके बाद वह भवानन्दके घर गयी। उस समय वे ऊपरको दृष्टि किये, किसीका मुखड़ा याद कर रहे थे। किसका मुखड़ा, सो तो नहीं मालूम, पर शायद वह मुख बड़ा ही सुन्दर था। उसके काले-काले घुघराले और सुगधियुक्त केश कानोंतक फैली हुई भौहोंपर आ पड़े थे। बीचमें विराजित सुंदर और त्रिकोण ललाटपर मृत्युकी भयङ्कर छाया पड़ रही थी मानों वहां मृत्यु और मृत्युञ्जयका आपसमें द्वन्द्व युद्ध हो रहा था। आंखें नद, भौंहें स्थिर, होंठ नीले, गाल पीले, नाक ठंढ़ी, छाती फूली हुई और हवासे कपड़े उड़ रहे थे। इसके बाद जैसे शरतकालका मेघ निर्मुक्त चन्द्रमा धीरे-धीरे मेघमालाको उज्ज्वल बनाता हुआ अपना सौंदर्य विकसित करता है, जैसे प्रभात सूर्य तरङ्गोंके आकारवाले मेघोंको क्रमसे सुनहला बनाता हुआ आप ही जगमगा उठता है; दशों दिशाओंको आलोकित करता हुआ स्थल, जल, कीट, पतङ्ग सबको प्रफुल्लित करता है, उसी तरहसे धीरे-धीरे उस मृत देहमें मानों प्राण-संञ्चार हो रहा था। अहा! कैसी शोभा है! भवानन्द बैठे बैठे यही सब सोच रहे थे। इसलिये वे भी कुछ न बोले। कल्याणीका रूप देखकर उनका हृदय कातर हो गया था, इसीलिये शांतिके रूपपर उनकी दृष्टि न पड़ी। शांति एक दूसरे कमरे में चली गयी। वहां पहुंचकर उसने पूछा-“यह घर किसका है?"

    गोवर्द्धनने कहा-“जीवानन्द महाराजका।"

    शांति-"ये कौन हैं, भाई? यहाँ तो कोई नजर ही नहीं आता।"

    गोवर्द्धन-“मालूम होता है, कि वे कहीं गये हैं। अभी आते होंगे।"

    शांति,-"यह घर तो सबोंसे अच्छा है।"

    गोवर्द्धन-“पर इस घरमें तो आपको जगह नहीं मिल सकती।"

    शांति-"क्यों?"

    गोवर्द्धन-"क्योंकि यहां जीवानन्द महाराज रहते हैं।"

    शांति, "वे किसी और घरमें जा रहेंगे।"

    गोवर्द्धन-"भला ऐसा भी कभी हो सकता है? घरमें रहते हैं, वे ही एक तरहसे सबके मालिक हैं। वे जो कुछ करते हैं, वही होता है।”

    शान्ति-"अच्छा, तुम जाओ, मुझे यहां जगह न मिलेगी, तो पेड़की छाया तो है?" यह कह, गोवर्द्धनको वहांसे हटाकर शान्ति उस घरके अंदर चली गयी। भीतर आ जीवानन्दके काले हरिनके चमड़ेपर आसन जमाकर बैठ गयी और दीयेको जरा तेजकर जीवानन्दकी एक पुस्तक हाथमें लेकर पढ़ने लगी।

    कुछ ही देरमें वहां जीवानन्द आ पहुंचे। शान्तिको मर्दाना पोशाकमें देखकर भी वे झट उसे पहचान गये और बोले,-"यह क्या? ऐं! शान्ति?"

    शान्तिने धीरे धीरे उस पुस्तकको नीचे रख दिया और जीवानन्दकी ओर देखते हुए कहा-“शान्ति किसका नाम है, जी"

    जीवानन्दको तो काठसा मार गया उनकी बोली बन्द हो गयी। अपनेको बहुत कुछ सम्हाल कर वे बोले,-"क्या तुम शांति नहीं हो?"

    शान्तिने घृणाके साथ कहा,-"नहीं, मेरा नाम नवीनानन्द गोस्वामी है।" यह कह, वह फिर पुस्तक पढ़ने लगी।

    जीवानन्द बड़े जोरसे हंस पड़े, बोले,–“यह तो गिलहरी एकदम नया रङ्ग लायी है। अच्छा, तो कहो नवीनानन्दजी! तुम्हारा यहां किस लिये आना हुआ?"

    शान्तिने कहा,-"भले आदमियोंके बातचीत करनेका यह नियम है, कि पहले पहलकी देखादेखोमें बातचीत करते समय आप या जनाब वगैरह कहकर पुकारते हैं। आप देख रहे होंगे; कि मैं स्वयं भी आपके प्रति कोई अनादरसूचक शब्द मूंहसे नहीं निकालती। फिर आप क्यों मुझे तुम तुम कह रहे हैं?" “जो आज्ञा सरकारकी' कहकर जीवानन्दने गले में चादरलपेट, दोनों हाथ जोड़कर कहा,–"अब यह दास आपसे विनयके साथ यह निवेदन करता है, कि आप कृपाकर इसे यह बतला दें, कि आपका भरुईपुरसे शुभागमन किस निमित्त हुआ?"

    शान्तिने बड़ी गम्भीरतासे कहा,-"अब आपने यह व्यर्थकी तानेजनी शुरू की। इसकी तो कोई जरूरत नहीं थी। मुझे भरुईपुरका नामतक नहीं मालूम। मैंने आज यहां आकर सन्तानधर्मको दीक्षा ग्रहण की है।"

    जीवा०—“ऐं, यह तो सब चौपट हुआ देखता हूं। क्या यह सच है?"

    शान्ति–“चौपट क्यों? आपने भी दीक्षा ली है?"

    जीवा०-"तुम स्त्री जो ठहरी।"

    शान्ति-"यह क्या? यह बात आपको कैसे मालूम हुई?”

    जीवा०-“मेरा विश्वास था, कि मेरी ब्राह्मणी स्त्री जातिकी है।" शान्ति-"ब्राह्मणी? तो क्या आपके ब्राह्मणी भी है?"

    जीवा-“थी तो सही।"

    शान्ति-"इसीसे आपको सन्देह हो रहा था, कि मैं ही आपकी ब्राह्मणी हूं?" जीवानन्दने हाथ जोड़ और गले में चादर लपेट विनयपूर्वक कहा,-"हां सरकार!"

    शान्ति-“यदि आपके मनमें इस प्रकार हंसीकी बातें पैदा हुआ करती हैं, तो कहिये, आपका कर्त्तव्य क्या है?"

    जीवा०-"आपके कपड़े जबरदस्ती हटाकर आपके होठोंका रसपान करना ही, और क्या।"

    शान्ति-“यह आपकी दुष्टबुद्धि अथवा अधिक गांजा पीनेका परिचय है। आपने दीक्षाके समय शपथ की थी, कि स्त्रियोंके साथ कभी एक आसनपर नहीं बैठेंगे। यदि आपका यह विश्वास हैं कि मैं स्त्री हूं इस तरह रस्सीमें सांपका भ्रम बहुतोंको हुआ करता है तो आपके लिये उचित यही है, कि अलग आसनपर बैठिये। आपको मेरे साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिये।"

    यह कह, शान्तिने फिर पुस्तकमें मन लगाया। परास्त हो कर जीवानन्दने अलग शय्या बिछायी और उसीपर शयन किया।

    आनन्दमठ।

    तीसरा खण्ड।

    पहिला परिच्छेद

    ईश्वरकी कृपासे ११७६ का साल समाप्त हो गया। बङ्गाल की पूरी जनसंख्याके छः आने मनुष्योंको (जो न जाने कितने करोड़ रहे होंगे) यमपुर भेजकर वह दुष्ट संवत्सर आप ही काल के गालमें चला गया। सन् १९७७ सालमें ईश्वरने दया की, पानी अच्छा बरसा, पृथ्वीने खूब अन्न उपजाये। जो लोग जीते बचे थे, उन्होंने पेटभर खानेको पाया। बहुतेरे लोग अनाहार या अल्पाहारके कारण रोगी हो गये थे। वे भरपेट ठूस ठूस कर खानेसे ही मर गये। पृथ्वी तो शस्यशालिनी हुई, पर गांवके गांव खाली नजर आते थे। सुनसान घरोंमें केवल चहे डण्ड पेलते नजर आते या भूत-प्रेत फिरा करते थे। गाँव गाँवमें सैकड़ों बीघे जमीन बिना जोते-बोये ऊसर सी पड़ी रही, जिसमें जंगल सा बन गया। देशभरमें जंगलोंकी भरमार हो गयी। जहाँ लहराते हुए हरेभरे धानके खेत दिखाई देते थे, जहां असंख्य गाय भैंसें चरती नजर आती थीं, जो बाग बगीचे गांवके युवक और युवतियोंकी प्रमोद भूमि थी, वे सब स्थान क्रमशः घोर जंगल होने लगे। एक वर्षे दो वर्ष करते करते तीन वर्ष बीत गये। जंगलोंकी संख्या बढ़ती ही चली गयी। जो स्थान मनुष्योंके सुखका स्थान था, वहाँ नर-मांस-भोजी बाघ आकर हरिण आदि जानवरोंका शिकार करने लगे। जहाँ सुन्दरियों की टोली महावरसे रंगे हुए पैरोंको पैजनियोंको बजाती, हमजोलियोंके साथ हंसी ठठोली करती, इतराती और बतराती जाती थीं, वहाँ रीछोंकी मांद और अड्डे बन गये हैं। जहां छोटे छोटे बच्चे बालकालमें सन्ध्या समय खिले हुए चमेलीके फूलको तरह प्रफुल्लित होकर हदयको तृप्त

    करनेवाली किलकारियां सुनाया करते थे, वहीं अब झण्डके झंड मतवाले जंगली हाथी वृक्षोंकी डालें तोड़ते नजर आने लगे। जहां कभी दुर्गाजीकी पूजा हुआ करती वहां स्यारोंकी मांद हो गयी, जहां सावन में ठाकुरजीका झूला होता था वहां आज उल्लुओंने अपना अड्डा जमा लिया। नाट्य भवनमें दिनदहाड़े काले नाग मेढ़क खोजने लगे। बंगाल में आज अन्न उपजा है तो खानेवाले नदारद हैं, बिकनेवाली चीजें पैदा हुई है पर कोई खरीदार नहीं है। किसानोंने खेती की, पर रुपया नहीं पाया। इसीलिये वे जमींदारको मालगुजारी नदे सके। राजाने जमींदारोंसे मालगुजारी न पाकर उनकी जमींदारियां जब्त करनी शुरू कीं, इसलिये धीरे धीरे जमींदार दरिद्र होने लगे। वसुमतीने खूब अन्न उपजाये, पर किसीको धन नहीं मिला-सबका घर धनसे छूंछा ही नजर आने लगा। लूट-खसोटके दिन आये; चोर डाकुओंने सिर उठाया, सजन लोग डरके मारे घरोंमें छिप रहे।

    इधर सन्तान सम्प्रदायवाले नित्य चन्दन और तुलसीदलसे विष्णु भगवानके पादपद्मोंकी पूजा करते और जिसके घरमें पिस्तौल या बन्दूक मिलती, उसके घरमें घुसकर उसे छीन लाते। भवानन्दने सब किसीसे कह दिया था, कि “अगर किसी घरमें एक और मणि-माणिक्य और हीरा मोती हो और दूसरी ओर एक टूटी हुई बन्दुक पड़ी हो, तो सब मणि-माणिक्य और हीरा-मोती छोड़कर वह टूटी हुई बन्दुक ही ले आना।"

    इसके बाद वे लोग गांव गांवमें अपने दूत भेजने लगे। वे लोग जिस किसी ग्राममें जाते, वहांके हिन्दुओंको देख देखकर कहते,-"क्कों भाई! विष्णु-पूजा करोगे?" यही कह कहकर वे २०-२५ आदमियोंका दल बांध लेते और मुसलमानोंके गांवमें जाकर उनके घरोंमें आग लगा देते थे। मुसलमान बेचारे इधर अपनी जान बचानेमें लगते, तबतक उधर सन्तान सम्प्रदायवाले उनका सर्वस्व लूट पाटकर नये विष्णु-भक्तोंको बांट देते थे।

    लूटका माल पाकर जब गांववाले बड़े आनन्दित होते, तब ये लोग उन्हें विष्णु-मन्दिरमें ला, प्रतिमाके पैर छुलाकर उन्हें सन्तान धर्म में दीक्षित कर लेते थे। लोगोंने देखा कि सन्तान होने में तो बड़ा लाभ है। मुसलमानी सलतनतकी अराजकता और कुशासनके कारण सब कोई मुसलमानोंसे जल उठे थे। हिन्दू धर्म लुप्त हुआ जा रहा था, इसलिये बहुतसे लोग हिन्दुत्वकी स्थापनाके लिये भी चिन्तित हो रहे थे, अतएव दिन दिन सन्तानोंकी संख्या बढ़ने लगी। एक एक दिनमें सैकड़ों और एक एक महीनेमें हजारों नये नये लोग आकर सन्तान बनने और भवानन्द तथा जीवानन्दके चरणोंमें सिर झुकाने लगे। तथा दलके दल चारों ओर मुसलमानोंको दण्ड देनेके लिये जाने लगे। वे जहां कहीं राजकर्मचारियोंको देख पाते, वहीं उनकी मरम्मत करने लगते। कभी कभी तो उनके प्राण ही ले डालते थे। जहां कहीं सरकारी खजाना पाते उसपर छापा मारते, और लूट पाट कर घर ले आते। जहां कहीं मुसलमानोंकी बस्ती मिलती, उसमें आग लगा देते और गांवके गांव जलाकर धूलमें मिला देते। राजपुरुषगण इनका दमन करनेके लिये फौज रवाना करने लगे, पर इस समय सन्तानोंका दल खूब हुआ था। उनके पास हथियार भी काफी थे और वे ठीक भी हो गये थे। उनके वीर दर्पके आगे मुसलमान सैनिकोंके पैर आगे नहीं बढ़ते थे। यदि कदाचित् वे आगे आते तो सन्तानगण अपने अमित बल पराक्रमसे उनपर भीषण आक्रमण करते, उनके दलको छिन्न भिन्नकर हरि हरिको ध्वनि करते। यदि किसी सन्तान दलको मुसलमान सैनिक परास्त कर डालते, तो उसी समय उनके सम्प्रदायका दूसरा दल वहां आ पहुंचता ओर जीतनेवालोंके सिर घड़से जुदा कर हरि हरि कहता हुआ निकल जाता था।

    इस समय परम प्रसिद्ध, भारतीय अंगरेज कुलके प्रातः सूर्य वारन हेस्टिंग्ज भारतवर्षके गवर्नर जनरल थे। कलकत्तेमें बैठे

    बैठे लोहे की सीकड़ तैयार कर उन्होंने सोचा कि मैं इसी सीकड़में सप्तद्वीपा और ससागरा भूमिको बांध रखूंगा। एक दिन सिंहासनपर बैठे हुए जगदीश्वरने भी 'तथास्तु' कह दिया था; पर अब वह दिन नहीं रहे। आज तो सन्तानोंकी भीषण हरि ध्वनि को सुनकर वारन हेस्टिंग्जका कलेजा कांप उठा।

    वारन हेस्टिंग्जने पहले फौजदारी सैन्य द्वारा विद्रोहको दवानेकी चेष्टा की, किन्तु उन सिपाहियोंका तो इन दिनों यह हाल हो रहा था कि वे यदि किसी बुढ़ियाके मुंहसे भी हरि नाम सुन लेते तो सिरपर पैर रखकर भाग जाते थे। इसीसे लाचार होकर वारन हेस्टिंग्जने कप्तान टामस नामक एक बड़े ही चतुर सैनिककी अध्यक्षतामें कम्पनीके सिपाहियोंका एक दल विद्रोह दबाने के लिये भेजा।

    कप्तान टामसने विद्रोही दमनका अत्यन्त उत्तम प्रबन्ध किया। उन्होंने राजा और जमीन्दारोंसे सिपाही मांगकर कम्पनीके सुशिक्षित, सुसजित और अत्यन्त बलिष्ठ देशी विदेशी सैनिकोंके साथ मिला दिये। इसके बाद उस सम्मिलित सैन्यको अलग अलग टुकड़ियों में बांटकर उन्होंने एक एक टुकड़ोको सुयोग्य सैनिकोंके अधीन कर दिया। इसके बाद कौन सी टुकड़ी किस ओर भेजी जाय, इसका बन्दोबस्त किया। उन्होंने सब किसीसे कह दिया,-"देखो, तुम अमुक प्रदेशमें जाकर जाल की तरह फैल जावो। जहां कहीं कोई शत्रु नजर जाये, उसे वहीं चींटीको तरह मसल डालना।" कम्पनीके सिपाहियोंमेंसे कोई गांजेका दम लगाकर और कोई शराब पीकर बन्दूक लिये हुए सन्तानोंको मारने जाते, परन्तु सन्तानगण इतने असंख्य और ऐसे अजेय थे कि कप्तान टामसके सैनिक घासकी तरह कटते गये। हरि हरिकी ध्वनिसे कप्तान टामसके कान बहरे हो गये।

    अब क्या डर है अब अपने बाल-बच्चोंको कलकत्तेसे यहीं ले आओ; विद्रोहका तो मैंने अंत ही कर दिया। डनवर्थ साहबने कहा,-"अच्छी बात है, आप यहां दस दिन और ठहर जाइये। देशथोड़ा और स्थिर हो जाय, तब मैं अपने स्त्री-पुत्र आदिको बुलवा लूंगा।" डनवर्थ साहबने बहुतसी मुर्गियां और भेड़ें पाल रखी थीं। उनके यहांका पनीर भी अच्छा होता था। तरह तरह को जंगली चिड़ियोंका मांस उनके भोजनालयकी शोभा बढ़ाया करता था। इधर लम्बी दाढ़ीवाला बावर्ची भी मानों द्रौपदीका ही अवतार था। इसलिये कप्तान टामस बड़ी बेतकल्लुफीके लाथ वहीं रहने लगे।

    इधर भवानन्द मन ही मन दांत पीस रहे थे। वे यही सोच रहे थे कि कब टामस साहबका सिर काटकर द्वितीय सम्बरारिकी उपाधि धारण कर लूं। अंग्रेज लोग भारतवर्षकी भलाई करने आये हैं, उस समय संतानोंकी समझमें यह बात नहीं आती थी। समझते भी कैसे? कप्तान टामसके समान अंगरेज भी इस बातको नहीं जानते थे। उस समय यह बात विधाताके मनमें ही छिपी हुई थी। भवानन्द सोच रहे थे, “एक दिन इन असुरोंका सवंश नाश करूंगा। सबको जमा होकर यहां चले आने दो, बस उनकी जरा सी असावधानी देखते ही उनपर टूट पड़गा। अभी जरा दूर ही दूर रहनेका काम है।” इसीलिये वे अपने दलबल समेत दूर ही दूर रहे। कप्तान टामस निष्कण्टक होकर द्रौपदोके गुणों की बानगी लेने लगे।

    साहब बहादुरको शिकारका बड़ा शौक था, इसलिये वे कभी कभी शिवग्रामके पासवाले जंगलमें शिकार खेलनेके लिये जाया करते थे। एक दिन टामस साहब डनवर्थ साहबके साथ घोड़ेपर सवार हो, कई एक शिकारियों के साथ शिकार खेलने निकले यह तो कहना ही व्यर्थ है कि टामस साहब बड़े भारी साहसी और बलवीर्यमें अंगरेजोंमें भी अद्वितीय थे,

    वह घना जंगल बाघों, भैसों और भालुओंसे भरा हुआ होनेके कारण बड़ा भयावह था। इसलिये कुछ दूर आनेपर शिकारियोंने आगे बढ़नेसे इनकार कर दिया। वे बोले,—"बस, अब आगे भीतर जानेका रास्ता नहीं है। हमलोग तो अब आगे नहीं जा सकते।" एक बार डनवर्थ साहब इसी जंगलमें एक भयानक शेरके पंजे में पड़ते पड़ते बच गये थे, इसलिये उन्होंने भी आगे जाना स्वीकार नहीं किया-सबको इच्छा लौटनेकी ही थी। कप्तान टामसने कहा,-"तुम लोग न जाओगे, तो लौट जाओ, पर मैं तो अब नहीं लौटता।" यह कह, कप्तान साहब उस घोर जंगलमें घुस पड़े।

    सचमुच उस जंगलमें रास्ता नहीं था। घोड़ा आगे न बढ़ सका; पर साइब घोडेको छोड़, कन्धेपर बन्दूक लिये अकेले ही आगे बढ़े। वे घुसे तो बाघकी खोजमें थे; पर खोजते-खोजते हैरान हो गये, तो भी कहीं बाघ न दिखाई दिया। उसके बदले उन्होंने देखा कि एक बड़े भारी पेड़के नीचे खिले हुए फूलोंवालो लताओं और छोटे छोटे पौधोंके बीच में न जाने कौन बैठा है? वह एक नवीन संन्यासी था, जिसके रूपसे वह सारा जंगल उज्ज्वल हो रहा था। खिले हुए फूल मानों उसके स्वर्गीय शरीरके सम्पर्कलसे और भी अधिक सुगन्धमय हो गये थे। कप्तान साहब भौंचक से हो रहे पर तुरन्तही क्रोध आ गया। वे हिन्दुस्तानी बोली विचित्र तरहसे बोलते थे। उन्होंने पूछा,-"टुम कौन हाय?"

    संन्यासीने कहा, "मैं संन्यासी हू।"

    कप्तानने पूछा,-"टुम बागी है?"

    संन्यासी-“यह किस जानवरका नाम है?"

    कप्तान-“हम टुमको गुली मार देगा।"

    संन्यासी-"मार दो।”

    कप्तान मन हो मन विचार कर रहे थे, कि गोली मारुं

    ८

    या न मारुं, कि इतने उस संन्यासीने बिजली की तरह तड़पकर साहबके हाथकी बन्दूक छीन ली। इसके बाद संन्यासीने अपना रक्षावरण-चर्म खोलकर फेंक दिया और एक ही झटके में जटा भी हटाकर दूर कर दी। कप्तान टामसने देखा, कि एक अपूर्व सुन्दरी सामने खड़ी है। सुन्दरीने हँसते हँसते कहा,-"साहब! मैं स्त्री हूं; मैं किसीको मारती नहीं। मैं तुमसे पूछती हूँ कि हिन्दू मुसलमानोंमें झगड़ा होता है, तुम लोग क्यों बीचमें कूदते हो? अपने घर चले जाओ।"

  • 說苑, Volume 5-8

    說苑, Volume 5-8

    Aproximadamente 4.651 palavras.

    Produced by Nicole Lai

    卷五 貴德

    圣人之于天下百姓也,其猶赤子乎!飢者則食之,寒者則衣之;將之
    養之,育之長之;惟恐其不至于大也。詩曰:“蔽芾甘棠,勿剪勿伐,召
    伯所茇。”傳曰:自陝以東者周公主之,自以西者召公主之。召公述職當
    桑蚕之時,不欲變民事,故不入邑中,舍于甘棠之下而听斷焉,間之人皆
    得其所。是故后世思而歌誄之,善之,故言之;言之不足,故嗟嘆之;嗟
    嘆之不足,故歌詠之。夫詩思然后積,積然后滿,滿然后發,發由其道而
    致其位焉;百姓嘆其美而致其敬,甘棠之不伐也,政教惡乎不行!孔子曰
    :“吾于甘棠,見宗廟之敬也。”甚尊其人,必敬其位,順安万物,古圣
    之道几哉!仁人之德教也,誠惻隱于中,悃于內,不能已于其心;故其治
    天下也,如救溺人,見天下強陵弱,眾暴寡;幼孤羸露,死傷系虜,不忍
    其然,是以孔子歷七十二君,冀道之一行而得施其德,使民生于全育,安
    土,万物熙熙,各樂其終,卒不遇,故睹麟而泣,哀道不行,德澤不洽,
    于是退作春秋,明素王之道,以示后人,恩施其惠,未嘗輟忘,是以百王
    尊之,志士法焉,誦其文章,傳今不絕,德及之也。詩曰:“載馳載驅,
    周爰咨謀。”此之謂也。圣王布德施惠,非求報于百姓也;郊望診嘗,非
    求報于鬼神也。山致其高,云雨起焉;水致其深,蛟龍生焉;君子致其道
    德而福祿歸焉。夫有陰德者必有陽報,有隱行者必有昭名,古者溝防不修
    ,水為人害,禹鑿龍門,辟伊闕,平治水土,使民得陸處;百姓不親,五
    品不遜,契教以君臣之義,父子之親,夫婦之辨,長幼之序;田野不修,
    民食不足,后稷教之,辟地墾草,糞土樹谷,令百姓家給人足;故三后之
    后,無不王者,有陰德也。周室衰,禮義廢,孔子以三代之道,教導于后
    世,繼嗣至今不絕者,有隱行也。周頌曰:“丰年多黍多,亦有高廩,万
    億及秭,為酒為醴,A畀祖妣,以洽百禮,降福孔偕。”禮記曰:“上牲
    損則用下牲,下牲損則祭不備物。”以其舛之為不樂也。故圣人之于天下
    也,譬猶一堂之上也,今有滿堂飲酒者,有一人獨索然向隅而泣,則一堂
    之人皆不樂矣;圣人之于天下也,譬猶一堂之上也,有一人不得其所,則
    孝子不敢以其物荐進。
    魏武侯浮西河而下,中流顧謂吳起曰:“美哉乎!河山之固也,此魏
    國之寶也。”吳起對曰:“在德不在險。昔三苗氏左洞庭,右彭蠡,德義
    不修,而禹滅之;夏桀之居,左河濟,右太華,伊闕在其南,羊腸在其北
    ,修政不仁,湯放之;殷紂之國,左孟門而右太行,常山在其北,太河經
    其南,修政不德,武王伐之。由此觀之,在德不在險。若君不修德,船中
    之人盡敵國也。”武侯曰:“善!”
    武王克殷,召太公而問曰:“將奈其士眾何?”太公對曰:“臣聞愛
    其人者,兼屋上之烏;憎其人者,惡其余胥;咸劉厥敵,使靡有余,何如
    ?”王曰:“不可。”太公出,邵公入,王曰:“為之奈何?”邵公對曰
    :“有罪者殺之,無罪者活之,何如?”王曰:“不可。”邵公出,周公
    入,王曰:“為之奈何?”周公曰:“使各居其宅,田其田,無變舊新,
    唯仁是親,百姓有過,在予一人!”武王曰:“廣大乎,平天下矣。凡所
    貴士君子者,以其仁而有德也!”
    孔子曰:“里仁為美,擇不處仁,焉得智!”夫仁者,必恕然后行,
    行一不義,殺一無罪,雖以得高官大位,仁者不為也。夫大仁者,愛近以
    及遠,及其有所不諧,則虧小仁以就大仁。大仁者,恩及四海;小仁者,
    止于妻子。妻子者,以其知營利,以婦人之恩撫之,飾其內情,雕畫其偽
    ,孰知其非真,雖當時蒙榮,然士君子以為大辱,故共工、蹭兜、符里、
    鄧析,其智非無所識也,然而為圣王所誅者,以無德而苟利也。豎刁、易
    牙,毀体殺子以干利,卒為賊于齊。故人臣不仁,篡s之亂生;人臣而仁
    ,國治主榮;明主察焉,宗廟大宁,夫人臣猶貴仁,況于人主乎!故桀紂
    以不仁失天下,湯武以積德有海土,是以圣王貴德而務行之。孟子曰:“
    推恩足以及四海;不推恩不足以保妻子。古人所以大過人者無他焉,善推
    其所有而已。”
    晏子飲景公酒,令器必新,家老曰:“財不足,請斂于民。”晏子曰
    :“止。夫樂者,上下同之,故天子与天下,諸侯与境內,自大夫以下各
    与其僚,無有獨樂;今上樂其樂,下傷其費,是獨樂者也,不可。”
    齊桓公北伐山戎氏,其道過燕,燕君逆而出境,桓公問管仲曰:“諸
    侯相逆固出境乎?”管仲曰:“非天子不出境。”桓公曰:“然則燕君畏
    而失禮也,寡人不道而使燕君失禮,乃割燕君所至之地以与燕君。”諸侯
    聞之,皆朝于齊。詩云:“靖恭爾位,好是正直,神之听之,介爾景福。
    ”此之謂也。
    景公探爵,弱故反之,晏子聞之,不待請而入見,景公汗出惕然,晏
    子曰:“君胡為者也?”景公曰:“我采爵,弱故反之。”晏子逡巡北面
    再拜而賀之:“吾君有圣王之道矣。”景公曰:“寡人入探爵,弱故反之
    ,其當圣王之道者何也?”晏子對曰:“君探爵,弱故反之,是長幼也;
    吾君仁愛,禽獸之加焉,而況于人乎?此圣王之道也。”
    景公睹嬰儿有乞于途者,公曰:“是無歸夫?”晏子對曰:“君存何
    為無歸,使養之,可立而以聞。”
    景公游于壽宮,睹長年負薪而有飢色,公悲之,喟然嘆曰:“令吏養
    之。”晏子曰:“臣聞之,樂賢而哀不肖,守國之本也;今君愛老而恩無
    不逮,治國之本也。”公笑有喜色。晏子曰:“圣王見賢以樂賢,見不肖
    以哀不肖;今請求老弱之不養,鰥寡之不室者,論而供秩焉。”景公曰:
    “諾。”于是老弱有養,鰥寡有室。
    桓公之平陵,見家人有年老而自養者,公問其故,對曰:“吾有子九
    人,家貧無以妻之,吾使佣而未返也。”桓公取外御者五人妻之,管仲入
    見曰:“公之施惠不亦小矣。”公曰:“何也?”對曰:“公待所見而施
    惠焉,則齊國之有妻者少矣。”公曰:“若何?”管仲曰:“令國丈夫三
    十而室,女子十五而嫁。”
    孝宣皇帝初即位,守廷尉吏路溫舒上書,言尚德緩刑,其詞曰:“陛
    下初即至尊,与天合符,宜改前世之失,正始受之統,滌煩文,除民疾,
    存亡繼絕,以應天德,天下幸甚。臣聞往者秦有十失,其一尚存,治獄吏
    是也;昔秦之時,滅文學,好武勇,賤仁義之士,貴治獄之吏,正言謂之
    誹謗,謁過謂之妖言,故盛服先生,不用于世,忠良切言,皆郁于胸,譽
    諛之聲,日滿于耳,虛美熏心,實禍蔽塞,此乃秦之所以亡天下也。方今
    海內賴陛下厚恩,無金革之危,飢寒之患,父子夫婦戮力安家,天下幸甚
    ;然太平之未洽者,獄亂之也。夫獄天下之命,死者不可生,斷者不可屬
    ,書曰:‘与其殺不辜,宁失不經。今治獄吏則不然,上下相驅,以刻為
    明,深者獲公名,平者多后患;故治獄吏皆欲人死,非憎人也,自安之道
    ,在人之死,是以死人之血,流离于市;被刑之徒,比肩而立,大辟之計
    ,歲以万數,此圣人所以傷太平之未洽。凡以是也。人情安則樂生,痛則
    思死,捶楚之下,何求而不得;故囚人不胜痛,則飾誣詞以示之,吏治者
    利其然,則指道以明之,上奏恐卻,則鍛煉而周內之,蓋奏當之成,雖皋
    陶听之,猶以為死有余罪,何則?成煉之者眾而文致之罪明也。是以獄吏
    專為深刻,殘賊而無理,偷為一切,不顧國患,此世之大賊也,故俗語云
    :‘畫地作獄,議不可入;刻本為吏,期不可對。’此皆疾吏之風,悲痛
    之辭也。故天下之患,莫深于獄,敗法亂政,离親塞道,莫甚乎治獄之吏
    ,此臣所謂一尚存也。臣聞鳥之卵不毀,而后鳳凰集;誹謗之罪不誅,而
    后良言進,故傳曰:‘山藪藏矣,川澤納污。’國君含垢,天之道也。臣
    昧死上聞,愿陛下察誹謗,听切言,開天下之口,廣箴諫之路,改亡秦之
    一失,遵文武之嘉德,省法制,寬刑罰,以廢煩獄;則太平之風可与于世
    ,福履和樂,与天地無极,天下幸甚。”書奏,皇帝善之,后卒于臨淮太
    守。
    晉平公春筑台,叔向曰:“不可。古者圣王貴德而務施,緩刑辟而趨
    民時;今春筑台,是奪民時也。夫德不施,則民不歸;刑不緩,則百姓愁
    。使不歸之民,役愁怨之百姓,而又奪其時,是重竭也;夫牧百姓,養育
    之而重竭之,豈所以安命安存,而稱為人君于后世哉!”平公曰:“善!
    ”乃罷台役。
    趙簡子春筑台于邯鄲,天雨而不息,謂左右曰:“可無趨种乎?”尹
    鐸對曰:“公事急,厝种而懸之台;夫雖欲趨种,不能得也。”簡子惕然
    ,乃釋台罷役曰:“我以台為急,不如民之急也,民以不為台,故知吾之
    愛也。”
    中行獻子將伐鄭,范文子曰:“不可。得志于鄭,諸侯讎我,憂必滋
    長。”卻至又曰:“得鄭是兼國也,兼國則王,王者固多憂乎?”文子曰
    :“王者盛其德而遠人歸,故無憂;今我寡德而有王者之功,故多憂。今
    子見無土而欲富者樂乎哉?”
    季康子謂子游曰:“仁者愛人乎?”子游曰:“然。”“人亦愛之乎
    ?”子游曰:“然。”康子曰:“鄭子產死,鄭人丈夫舍勇佩,婦人舍珠
    珥,夫婦巷哭,三月不聞竽琴之聲。仲尼之死,吾不閑魯國之愛夫子奚也
    ?”子游曰:“譬子產之与夫子,其猶浸水之与天雨乎?浸水所及則生,
    不及則死,斯民之生也必以時雨,既以生,莫愛其賜,故曰:譬子產之与
    夫子也,猶浸水之与天雨乎?”
    中行穆子圍鼓,鼓人有以城反者,不許,軍吏曰:“師徒不勤,可得
    城,奚故不受?”曰:“有以吾城反者,吾所甚惡也;人以城來,我獨奚
    好焉?賞所甚惡,有失賞也,若所好何?不賞,是失信也,奚以示民?”
    鼓人又請降,使人視之,其民尚有食也,不听,鼓人告食盡力竭而后取之
    ,克鼓而反,不戮一人。
    孔子之楚,有漁者獻魚甚強,孔子不受,獻魚者曰:“天暑遠市賣之
    不售,思欲棄之,不若獻之君子。”孔子再拜受,使弟子掃除將祭之,弟
    子曰:“夫人將棄之,今吾子將祭之,何也?”孔子曰:“吾聞之,務施
    而不腐余財者,圣人也,今受圣人之賜,可無祭乎?”
    鄭伐宋,宋人將与戰,華元殺羊食士,其御羊斟不与焉,及戰,曰:
    “疇昔之羊羹,子為政;今日之事,我為政。”与華元馳入鄭師,宋人敗
    績。
    楚王問庄辛曰:“君子之行奈何?”庄辛對曰:“居不為垣牆,人莫
    能毀傷;行不從周衛,人莫能暴君。此君子之行也。”楚王复問君子之富
    奈何?對曰:“君子之富,假貸人不德也,不責也;其食飲人不使也,不
    役也;親戚愛之,眾人喜之,不肖者事之;皆欲其壽樂而不傷于患。此君
    子之富也。”楚王曰善。
    丞相西平侯于定國者,東海下邳人也,其父號曰于公,為縣獄吏決曹
    掾;決獄平法,未嘗有所冤,郡中离文法者,于公所決,皆不敢隱情,東
    海郡中為于公生立祠,命曰于公祠。東海有孝婦,無子,少寡,養其姑甚
    謹,其姑欲嫁之,終不肯,其姑告鄰之人曰:“孝婦養我甚謹,我哀其無
    子,守寡日久,我老累丁壯奈何?”其后母自經死,母女告吏曰:“孝婦
    殺我母。”吏捕孝婦,孝婦辭不殺姑,吏欲毒治,孝婦自誣服,具獄以上
    府,于公以為養姑十年之孝聞,此不殺姑也,太守不听,數爭不能得,于
    是于公辭疾去吏,太守竟殺孝婦。郡中枯旱三年,后太守至,卜求其故,
    于公曰:“孝婦不當死,前太守強殺之,咎當在此。”于是殺牛祭孝婦冢
    ,太守以下自至焉,天立大雨,歲丰熟,郡中以此益敬重于公。于公筑治
    廬舍,謂匠人曰:“為我高門,我治獄未嘗有所冤,我后世必有封者,令
    容高蓋駟馬車。”及子封為西平侯。
    孟簡子相梁潰燦凶鋃咂耄補苤儆扯手叢唬骸拔嶙酉嗔瘴樂詞保裁畔率
    拐嘸負人矣?”孟簡子曰:“門下使者有三千余人。”管仲曰:“今与几
    何人來?”對曰:“臣与三人俱。”仲曰:“是何也?”對曰:“其一人
    父死無以葬,我為葬之;一人母死無以葬,亦為葬之;一人兄有獄,我為
    出之。是以得三人來。”管仲上車曰:“嗟茲乎!我窮必矣,吾不能以春
    風風人;吾不能以夏雨雨人,吾窮必矣。”
    凡人之性,莫不欲善其德,然而不能為善德者,利敗之也;故君子羞
    言利名,言利名尚羞之,況居而求利者也。
    周天子使家父毛伯求金于諸侯,春秋譏之;故天子好利則諸侯貪,諸
    侯貪則大夫鄙,大夫鄙則庶人盜,上之變下,猶風之靡草也,故為人君者
    明貴德而賤利以道下,下之為惡,尚不可止;今隱公貪利而身自漁,濟上
    而行八佾,以此化于國人,國人安得不解于義,解于義而縱其欲,則災害
    起而臣下僻矣,故其元年始書螟,言災將起,國家將亂云爾。
    孫卿曰:“夫斗者忘其身者也,忘其親者也,忘其君者也;行須臾之
    怒,而斗終身之禍,然乃為之,是忘其身也;家室离散,親戚被戮,然乃
    為之,是忘其親也;君上之所致惡,刑法上所大禁也,然乃犯之,是忘其
    君也。今禽獸猶知近父母,不忘其親也;人而忘其身,內忘其親,上忘其
    君,是不若禽獸之仁也。凡斗者皆自以為是而以他人為非,己誠是也,人
    誠非也,則是己君子而彼小人也;夫以君子而与小人相賊害,是人之所謂
    以狐亡補犬羊,身涂其炭,豈不過甚矣哉!以為智乎,則愚莫大焉;以為
    利乎,則害莫大焉;以為榮乎,則辱莫大焉;人之有斗何哉?比之狂惑疾
    病乎,則不可面目人也,而好惡多同,人之斗誠愚惑夫道者也。詩云:‘
    式號式呼,俾晝作夜’,言斗行也。”
    子路持劍,孔子問曰:“由,安用此乎?”子路曰:“善,古者固以
    善之;不善,古者固以自衛。”孔子曰:“君子以忠為質,以仁為衛,不
    出環堵之內,而聞千里之外;不善以忠化寇,暴以仁圍,何必持劍乎?”
    子路曰:“由也請攝齊以事先生矣。”
    樂羊為魏將,以攻中山,其子在中山,中山縣其子示樂羊,樂羊不為
    衰志,攻之愈急,中山因烹其子而遺之,樂羊食之盡一杯,中山見其誠也
    ,不忍与之戰,果下之,遂為魏文侯開地,文侯賞其功而疑其心。孟孫獵
    得?,使秦西巴持歸,其母隨而鳴,秦西巴不忍,縱而与之,孟孫怒逐秦
    西巴,居一年召以為太子侍,左右曰:“夫秦巴有罪于君,今以為太子傅
    ,何也?”孟孫曰:“夫以一而不忍,又將能忍吾子乎?故曰:‘巧詐不
    如拙誠’,樂羊以有功而見疑,秦西巴以有罪而益信;由仁与不仁也。”
    智伯還自衛,三卿燕于藍台,智襄子戲韓康子而侮段規,智果聞之諫
    曰:“主弗備難,難必至。”曰:“難將由我,我不為難,誰敢興之。”
    對曰:“异于是,夫氏有車轅之難,趙有孟姬之讒,欒有叔祁之訴,范中
    行有函冶之難,皆主之所知也。夏書有之曰:‘一人三失,怨豈在明,不
    見是圖。’周書有之曰:‘怨不在大,亦不在小。’夫君子能勤小物,故
    無大患;今主一謀而人君、相,又弗備,曰不敢興難,毋乃不可乎?嘻!
    不可不懼,蚋蟻蜂蠆皆能害人,況君相乎?”不听,自是五年而有晉陽之
    難,段規反而殺智伯于師,遂滅智氏。
    智襄子為室美,士茁夕焉,智伯曰:“室美矣夫!”對曰:“美則美
    矣,抑臣亦有懼也。”智伯曰:“何懼?”對曰:“臣以秉筆事君,記有
    之曰:高山浚源,不生草木,松柏之地,其土不肥,今土木胜,人臣懼其
    不安人也。”室成三年而智氏亡。

    卷六 复恩

    孔子曰:“德不孤,必有鄰。”夫施德者貴不德,受恩者尚必報;是
    故臣勞勤以為君而不求其賞,君持施以牧下而無所德,故易曰:“勞而不
    怨,有功而不德,厚之至也。”君臣相与以市道接,君縣祿以待之,臣竭
    力以報之;逮臣有不測之功,則主加之以重賞,如主有超异之恩,則臣必
    死以复之。孔子曰:北方有獸,其名曰洟,前足鼠,后足兔,是獸也,甚
    矣其愛蛩蛩巨虛也,食得甘草,必嚙以遺蛩蛩巨虛,蛩蛩巨虛見人將來,
    必負洟以走,洟非性之愛蛩蛩巨虛也,為其假足之故也,二獸者亦非性之
    愛洟也,為其得甘草而遺之故也。夫禽獸昆虫猶知比假而相有報也,況于
    士君子之欲与名利于天下者乎!夫臣不复君之恩而苟營其私門,禍之源也
    ;君不能報臣之功而憚刑賞者,亦亂之基也。夫禍亂之原基,由不報恩生
    矣。
    趙襄子見圍于晉陽,罷圍,賞有功之臣五人,高赫無功而受上賞,五
    人皆怒,張孟談謂襄子曰:“晉陽之中,赫無大功,今与之上賞,何也?
    ”襄子曰:“吾在拘厄之中,不失臣主之禮唯赫也。子雖有功皆驕,寡人
    与赫上賞,不亦可乎?”仲尼聞之曰:“趙襄子可謂善賞士乎!賞一人而
    天下之人臣,莫敢失君臣之禮矣。”
    晉文公亡時,陶叔狐從,文公反國,行三賞而不及陶叔狐,陶叔狐見
    咎犯曰:“吾從君而亡十有三年,顏色黎黑,手足胼胝,今君反國行三賞
    而不及我也,意者君忘我与!我有大故与!子試為我言之君。”咎犯言之
    文公,文公曰:“嘻,我豈忘是子哉!夫高明至賢,德行全誠,耽我以道
    ,說我以仁,暴浣我行,昭明我名,使我為成人者,吾以為上賞;防我以
    禮,諫我以誼,蕃援我使我不得為非,數引我而請于賢人之門,吾以為次
    賞;夫勇壯強御,難在前則居前,難在后則居后,免我于患難之中者,吾
    又以為之次。且子獨不聞乎?死人者,不如存人之身;亡人者,不如存人
    之國;三行賞之后,而勞苦之士次之,夫勞苦之士,是子固為首矣,豈敢
    忘子哉!”周內史叔輿聞之曰:“文公其霸乎!昔圣王先德而后力,文公
    其當之矣,詩云:‘率履不越’,此之謂也。”晉文公入國,至于河,令
    棄籩豆茵席,顏色黎黑,手足胼胝者在后,咎犯聞之,中夜而哭,文公曰
    :“吾亡也十有九年矣,今將反國,夫子不喜而哭,何也?其不欲吾反國
    乎?”對曰:“籩豆茵席,所以官者也,而棄之;顏色黎黑,手足胼胝,
    所以執勞苦,而皆后之;臣聞國君蔽士,無所取忠臣;大夫蔽游,無所取
    忠友;今至于國,臣在所蔽之中矣,不胜其哀,故哭也。”文公曰:“禍
    福利害不与咎氏同之者,有如白水!”祝之,刀沈璧而盟。介子推曰:“
    獻公之子九人,唯君在耳,天未絕晉,必將有主,主晉祀者非君而何?唯
    二三子者以為己力,不亦誣乎?”文公即位,賞不及推,推母曰:“盍亦
    求之?”推曰:“尤而效之,罪又甚焉。且出怨言,不食其食。”其母曰
    :“亦使知之。”推曰:“言,身之文也;身將隱,安用文?”其母曰:
    “能如是,与若俱隱。”至死不复見推,從者怜之,乃懸書宮門曰:“有
    龍矯矯,頃失其所,五蛇從之,周遍天下,龍飢無食,一蛇割股,龍反其
    淵,安其壤土,四蛇入穴,皆有處所,一蛇無穴,號于中野。”文公出見
    書曰:“嗟此介子推也。吾方憂王室未圖其功。”使人召之則亡,遂求其
    所在,聞其入綿上山中。于是文公表綿上山中而封之,以為介推田,號曰
    介山。
    晉文公出亡,周流天下,舟之僑去虞而從焉,文公反國,擇可爵而爵
    之,擇可祿而祿之,舟之僑獨不与焉,文公酌諸大夫酒,酒酣,文公曰:
    “二三子盍為寡人賦乎?”舟之僑曰:“君子為賦,小人請陳其辭,辭曰
    :有龍矯矯,頃失其所;一蛇從之,周流天下,龍反其淵,安宁其處,一
    蛇耆干,獨不得其所。”文公瞿然曰:“子欲爵耶?請待旦日之期;子欲
    祿邪?請今命廩人。”舟之僑曰:“請而得其賞,廉者不受也;言盡而名
    至,仁者不為也。今天油然作云,沛然下雨,則曲草興起,莫之能御。今
    為一人言施一人,猶為一塊土下雨也,土亦不生之矣。”遂歷階而去。文
    公求之不得,終身誦甫田之詩。
    邴吉有陰德于孝宣皇帝微時,孝宣皇帝即位,眾莫知,吉亦不言,吉
    從大將軍長史轉遷至御史大夫,宣帝聞之,將封之,會吉病甚,將使人加
    紳而封之,及其生也,太子太傅夏侯胜曰:“此未死也,臣聞之,有陰德
    者必饗其樂以及其子孫;今此未獲其樂而病甚,非具死病也。”后病果愈
    ,封為博陽侯,終饗其樂。
    魏文侯攻中山,樂羊將,已得中山,還反報文侯,有喜功之色,文侯
    命主書曰:“群臣賓客所獻書操以進。”主書者舉兩篋以進,令將軍視之
    ,盡難中山之事也,將軍還走北面而再拜曰:“中山之舉也,非臣之力,
    君之功也。”
    平原君既歸趙,楚使春申君將兵救趙,魏信陵君亦矯奪晉鄙軍往救趙
    ,未至,秦急圍邯鄲,邯鄲急且降,平原君患之,邯鄲傳舍吏子李談謂平
    原君曰:“君不憂趙亡乎?”平原君曰:“趙亡即胜虜,何為不憂?”李
    談曰:“邯鄲之民,炊骨易子而食之,可謂至困;而君之后宮數百,婦妾
    荷綺瞠,廚余粱肉;士民兵盡,或剡木為矛戟;而君之器物鐘磬自恣,若
    使秦破趙,君安得有此?使趙而全,君何患無有?君誠能令夫人以下,編
    于士卒間,分工而作之,家所有盡散以饗食士,方其危苦時易為惠耳。”
    于是平原君如其計,而勇敢之士三千人皆出死,因從李談赴秦軍,秦軍為
    卻三十里,亦會楚魏救至,秦軍遂罷。李談死,封其父為孝侯。
    秦繆公嘗出,而亡其駿馬,自往求之,見人已殺其馬,方共食其肉,
    繆公謂曰:“是吾駿馬也。”諸人皆懼而起,繆公曰:“吾聞食駿馬肉,
    不飲酒者殺人。”即以次飲之酒,殺馬者皆慚而去。居三年,晉攻秦繆公
    ,圍之,往時食馬肉者,相謂曰:“可以出死報食馬得酒之恩矣。”遂潰
    圍。繆公卒得以解難,胜晉獲惠公以歸,此德出而福反也。
    楚庄王賜群臣酒,日暮酒酣,燈燭滅,乃有人引美人之衣者,美人援
    絕其冠纓,告王曰:“今者燭滅,有引妾衣者,妾援得其冠纓持之,趣火
    來上,視絕纓者。”王曰:“賜人酒,使醉失禮,奈何欲顯婦人之節而辱
    士乎?”乃命左右曰:“今日与寡人飲,不絕冠纓者不歡。”群臣百有余
    人皆絕去其冠纓而上火,卒盡歡而罷。居三年,晉与楚戰,有一臣常在前
    ,五合五奮,首卻敵,卒得胜之,庄王怪而問曰:“寡人德薄,又未嘗异
    子,子何故出死不疑如是?”對曰:“臣當死,往者醉失禮,王隱忍不加
    誅也;臣終不敢以蔭蔽之德而不顯報王也,常愿肝腦涂地,用頸血湔敵久
    矣,臣乃夜絕纓者。”遂敗晉軍,楚得以強,此有陰德者必有陽報也。
    趙宣孟將上之絳,見翳桑下有臥餓人不能動,宣孟止車為之下,餐自
    含而癜之,餓人再咽而能食,宣孟問:“爾何為飢若此?”對曰:“臣居
    于絳,歸而糧絕,羞行乞而憎自致,以故至若此。”宣孟与之壺餐,脯二
    壞,再拜頓首受之,不敢食,問其故對曰:“向者食之而美,臣有老母,
    將以貢之。”宣孟曰:“子斯食之,吾更与汝。”乃复為之簞食,以脯二
    束与錢百。去之絳,居三年,晉靈公欲殺宣孟,置伏士于房中,召宣孟而
    飲之酒,宣孟知之,中飲而出,靈公命房中士疾追殺之,一人追疾,既及
    宣孟,向宣孟之面曰:“今固是君邪!請為君反,死。”宣孟曰:“子名
    為誰?”及是且對曰:“何以名為?臣是夫桑下之餓人也。”遂斗,而死
    ,宣孟得以活,此所謂德惠也。故惠君子,君子得其福;惠小人,小人盡
    其力;夫德一人活其身,而況置惠于万人乎?故曰德無細,怨無小,豈可
    無樹德而除怨,務利于人哉!利施者福報,怨往者禍來,形于內者應于外
    ,不可不慎也,此書之所謂德無小者也。詩云:“赳赳武夫,公侯干城。
    濟濟多士,文王以宁。”人君胡可不務愛士乎!
    孝景時,吳楚反,袁盎以太常使吳,吳王欲使將不肯,欲殺之,使一
    都尉以五百人圍守盎;盎為吳相時,從史与盎侍儿私通,盎知之不泄,遇
    之如故人,有告從史,從史懼亡歸,盎自追,遂以侍儿賄之,复為從史。
    及盎使吳見圍守,從史适為守盎校司馬,夜引盎起曰:“君可以去矣,吳
    王期旦日斬君。”盎不信,曰:“公何為者也?”司馬曰:“臣故為君從
    史盜侍儿者也。”盎乃敬對曰:“公見親,吾不足以累。”司馬曰:君去
    ,臣亦且亡避,吾親君,何患!”乃以刀決帳,率徒卒道出,令皆去,盎
    遂歸報。
    智伯与趙襄子戰于晉陽下而死,智伯之臣豫讓者怒,以其精气能使襄
    主動心,乃漆身變形,吞炭更聲,襄主將出,豫讓偽為死人,處于梁下,
    駟馬惊不進,襄主動心,使使視梁下得豫讓,襄主重其義不殺也。又盜,
    為抵罪,被刑人赭衣,入繕宮,襄主動心,則曰必豫讓也,襄主執而問之
    曰:“子始事中行君,智伯殺中行君,子不能死,還反事之;今吾殺智伯
    ,乃漆身為癘,吞炭為啞,欲殺寡人,何与先行异也?”豫讓曰:“中行
    君眾人畜臣,臣亦眾人事之;智伯朝士待臣,臣亦朝士為之用。”襄子曰
    :“非義也?子壯士也!”乃自置車庫中,水漿毋入口者三,日以禮豫讓
    ,讓自知,遂自殺也。
    晉逐欒盈之族,命其家臣有敢從者死,其臣曰:“辛俞從之。”吏得
    而將殺之,君曰:“命汝無得從,敢從何也?”辛俞對曰:“臣聞三世仕
    于家者君之,二世者主之;事君以死,事主以勤,為之賜之多也。今臣三
    世于欒氏,受其賜多矣,臣敢畏死而忘三世之恩哉?”晉君釋之。
    留侯張良之大父開地相韓昭侯、宣惠王、襄哀王。父平相厘王、悼惠
    王。悼惠王二十三年平卒,二十歲秦滅韓,良年少未宦事韓。韓破,浪家
    童三百人,弟死不葬,良悉以家財求刺客刺秦王,為韓報仇,以大父、父
    ,五世相韓故,遂學禮淮陽,東見滄海君,得力士為鐵椎,重百二十斤,
    秦皇帝東游,良与客狙擊秦皇帝于博浪沙,誤中副車,秦皇帝大怒,大索
    天下,求購甚急,良更易姓名,深亡匿,后卒隨漢報秦
    鮑叔死,管仲舉上衽而哭之,泣下如雨,從者曰:“非君父子也,此
    亦有說乎?”管仲曰:“非夫子所知也,吾嘗与鮑子負販于南陽,吾三辱
    于市,鮑子不以我為怯,知我之欲有所明也;鮑子嘗与我有所說王者,而
    三不見听,鮑子不以我為不肖,知我之不遇明君也;鮑子嘗与我臨財分貨
    ,吾自取多者三,鮑子不以我為貪,知我之不足于財也。生我者父母,知
    我者鮑子也。士為知己者死,而況為之哀乎!”
    晉趙盾舉韓厥,晉君以為中軍尉;趙盾死,子朔嗣為卿。至景公三年
    ,趙朔為晉將,朔取成公姊為夫人,大夫屠岸賈,欲誅趙氏,初趙盾在夢
    見叔帶持龜要而哭甚悲,已而笑拊手且歌,盾卜之占,垂絕而后好,趙史
    援占曰:此甚惡非君之身,及君之子,然亦君之咎也。至子趙朔,世益衰
    ,屠岸賈者,始有寵于靈公,及至于晉景公,而賈為司寇,將作難,乃治
    靈公之賊以至,趙盾遍告諸將曰:“趙穿s靈公,盾雖不知猶為首賊,臣
    殺君,子孫在朝,何以懲罪,請誅之!”韓厥曰:“靈公遇賊,趙盾在外
    ,吾先君以為無罪,故不誅;今諸君將誅其后,是非先君之意而后妄誅;
    妄誅謂之亂臣,有大事而君不聞,是無君也。”屠岸賈不听,厥告趙朔趨
    亡,趙朔不肯,曰:“子必不絕趙祀,朔死且不恨。”韓厥許諾,稱疾不
    出,賈不請而擅与諸將攻趙氏于下宮,殺趙朔、趙括。趙嬰齊,皆滅其族
    ;朔妻成公姊有遺腹,走公宮匿,后生男乳,朔客程嬰持亡匿山中,居十
    五年,晉景公疾,卜之曰:“大業之后不遂者為祟。”景公疾問韓厥,韓
    厥知趙孤在,乃曰:“大業之后,在晉絕祀者,其趙氏乎!夫自中行衍皆
    嬴姓也,中衍人面鳥喙,降佐殷帝太戊及周天子,皆有明德,下及幽厲無
    道,而叔帶去周适晉,事先君文侯,至于成公,世有立功,未嘗有絕祀;
    今及吾君獨滅之,趙宗國人哀之,故見龜策,唯君圖之。”景公問曰:“
    趙尚有后子孫乎?”韓厥具以實對,于是景公乃与韓厥謀立趙孤儿,召而
    匿之宮中,諸將入問疾,景公因韓厥之眾,以脅諸將而見趙孤,孤名曰武
    ,諸將不得已乃曰:“昔下官之難屠岸賈為之,矯以君令,防椓韙然孰敢
    作難,微君之疾,群臣固且請立趙后,今君有令,群臣之愿也。”是召趙
    武、程嬰遍拜諸將軍,將軍遂返与程嬰趙武攻屠岸賈,滅其族,复与趙武
    田邑如故。故人安可以無恩,夫有恩于此故复于彼;非程嬰則趙孤不全,
    非韓厥則趙后不复。韓厥可謂不忘恩矣。
    北郭騷踵見晏子曰:“竊悅先生之義,愿乞所以養母者。”晏子使人
    分倉粟府金而遺之,辭金而受粟。有間,晏子見疑于景公,出奔,北郭子
    召其友而告之曰:“吾悅晏子之義而嘗乞所以養母者。吾聞之曰:養其親
    者,身更其難;今晏子見疑,吾將以身白之。”遂造公庭求复者曰:“晏
    子天下之賢者也,今去齊國,齊國必侵矣,方必見國之侵也,不若先死請
    絕頸以白晏子。”逡巡而退,因自殺也。公聞之大駭,乘馳而自追晏子,
    及之國郊,請而反之,晏子不得已而反之,聞北郭子之以死白己也,太息
    而嘆曰:“嬰不肖,罪過固其所也,而士以身明之,哀哉!”
    吳赤市使于智氏,假道于衛,宁文子具三百制,將以送之,大夫豹曰
    :“吳雖大國也,不坏交假之道,則亦敬矣,又何禮焉!”宁文子不听,
    遂致之吳赤市。至于智氏,既得事,將歸吳,智伯命造舟為梁,吳赤市曰
    :“吾聞之,天子濟于水,造舟為梁,諸侯維舟為梁,大夫方舟。方舟,
    臣之職也,且敬太甚必有故。”使人視之,視則用兵在后矣,將亦襲衛。
    吳赤市曰:“衛假吾道而厚贈我,我見難而不告,是与為謀也。”稱疾而
    留,使人告衛,衛人警戒,智伯聞之,乃止。
    楚魏會于晉陽,將以伐齊,齊王患之,使人召淳于髡曰:“楚魏謀欲
    齊。愿先生与寡人共憂之。”淳于髡大笑而不應,王后問之,又复大笑而
    不應,三問而不應,王怫然作色曰:“先生以寡人國為戲乎?”淳于髡對
    曰:“臣不敢以王國為戲也,臣笑臣鄰之祠田也,以奩飯与一鮒魚。其祝
    曰:下田蔥捉樴`勸儷擔殘顏咭撕獺夾淥造粽呱俁笳多。”王曰善,賜之
    千金,革車百乘,立為上卿。
    陽虎得罪于衛,北見簡子曰:“自今以來,不复樹人矣。”簡子曰:
    “何哉?”陽虎對曰:“夫堂上之人,臣所樹者過半矣;朝廷之吏,臣所
    立者亦過半矣;邊境之士,臣所立者亦過半矣。今夫堂上之人,親 臣于
    君;朝廷之吏,親危臣于眾;邊境之士,親劫臣于兵。”簡子曰:“唯賢
    者為能報恩,不肖者不能。夫樹桃李者,夏得休息,秋得食焉。樹蒺藜者
    ,夏不得休息,秋得其刺焉。今子之所樹者,蒺藜也,自今以來,擇人而
    樹,毋已樹而擇之。”
    魏文侯与田子方語,有兩僮子衣青白衣,而侍于君前,子方曰:“此
    君之寵子乎!”文侯曰:“非也,其父死于戰,此其幼孤也,寡人收之。
    ”子方曰:“臣以君之賊心為足矣,今滋甚,君之寵此子也,又且以誰之
    父殺之乎?”文侯愍然曰:“寡人受令矣。”自是以后,兵革不用。
    吳起為魏將,攻中山,軍人有病疽者,吳子自吮其膿,其母泣之,旁
    人曰:“將軍于而子如是,尚何為泣?”對曰:“吳子吮此子父之創而殺
    之于注水之戰,戰不旋。

    卷七 政理

    政有三品:王者之政化之,霸者之政威之,強者之政脅之,夫此三者
    各有所施,而化之為貴矣。夫化之不變而后威之,威之不變而后脅之,脅
    之不變而后刑之;夫至于刑者,則非王者之所得已也。是以圣王先德教而
    后刑罰,立榮恥而明防禁;崇禮義之節以示之,賤貨利之弊以變之;修近
    理內政橛机之禮,壹妃匹之際;則莫不慕義禮之榮,而惡貪亂之恥。其所
    由致之者,化使然也。
    季孫問于孔子曰:“如殺無道,以就有道,何如?”孔子曰:“子為
    政,焉用殺,子欲善而民善矣。君子之德,風也;小人之德,草也;草上
    之風必偃。”言明其化而已矣,治國有二机,刑德是也;王者尚其德而布
    其刑,霸者刑德并湊,強國先其刑而后德。夫刑德者,化之所由興也。德
    者,養善而進闕者也;刑者,懲惡而禁后者也;故德化之崇者至于賞,刑
    罰之甚者至于誅;夫誅賞者,所以別賢不肖,而列有功与無功也。故誅賞
    不可以繆,誅賞繆則善惡亂矣。夫有功而不賞,則善不勸,有過而不誅,
    則惡不懼,善不勸而能以行化乎天下者,未嘗聞也。書曰:‘畢協賞罰’
    ,此之謂也。
    水濁則魚困,令苛則民亂,城峭則必崩,岸竦則必禲C故夫治國,譬
    若張琴,大弦急則小弦絕矣,故曰急轡御者非千里御也。有聲之聲,不過
    百里,無聲之聲,延及四海;故祿過其功者損,名過其實者削,情行合而
    民副之,禍福不虛至矣。詩云:“何其處也,必有与也;何其久也,必有
    以也。”此之謂也。
    公叔文子為楚令尹三年,民無敢入朝,公叔子見曰:“嚴矣。”文子
    曰:“朝廷之嚴也,宁云妨國家之治哉?”公叔子曰:“嚴則下喑,下喑
    則上聾,聾喑不能相通,何國之治也?順針縷者成帷幕,合升斗者實倉廩
    ,菕桍山澈幻髦髡哂興恍校參闖所不受也。”
    衛靈公謂孔子曰:“有語寡人為國家者,謹之于廟堂之上而國家治矣
    ,其可乎?”孔子曰:“可。愛人者,則人愛之;惡人者,則人惡之;知
    得之己者,亦知得之人;所謂不出于環堵之室而知天下者,知反之己者也
    。”
    子貢問治民于孔子,孔子曰:“懍懍焉如以腐索御奔馬。”子貢曰:
    “何其畏也!”孔子曰:“夫通達之國皆人也,以道導之,則吾畜也;不
    以道導之,則吾讎也,若何而毋畏?”
    齊桓公謂管仲曰:“吾欲舉事于國,昭然如日月,無愚夫愚婦皆曰善
    ,可乎?”仲曰:“可。然非圣人之道。”桓公曰:“何也?”對曰:“
    夫短綆不可以汲深井,知鮮不可以与圣人言,慧士可与辨物,智士可与辨
    無方,圣人可与辨神明;夫圣人之所為,非眾人之所及也。民知十己,則
    尚与之爭,曰不如吾也,百己則疵其過,千己則誰而不信。是故民不可稍
    而掌也,可晼烈玻徊豢殺幣玻部慎舛亂玻恢誆豢苫狄玻部刪俁疽病衛靈公
    問于史曰:“政孰為務?”對曰:“大理為務,听獄不中,死者不可生也
    ,斷者不可屬也,故曰:大理為務。”少焉,子路見公,公以史言告之,
    子路曰:“司馬為務,兩國有難,兩軍相當,司馬執孕兄矗慘歡凡坏保菜
    勒呤慘隕比宋胺且玻泊似湮殺人亦眾矣,故曰:司馬為務。”少焉,子貢
    入見,公以二子言告之,子貢曰:“不識哉!昔禹与有扈氏戰,三陳而不
    服,禹于是修教一年而有扈氏請服,故曰:去民之所事,奚獄之所听?兵
    革之不陳,奚鼓之所鳴?故曰:教為務也。”
    齊桓公出獵,逐鹿而走入山谷之中,見一老公而問之曰:“是為何谷
    ?”對曰:“為愚公之谷。”桓公曰:“何故?”對曰:“以臣名之。”
    桓公曰:“今視公之儀狀,非愚人也,何為以公名?”對曰:“臣請陳之
    ,臣故畜牛生子而大,賣之而買駒,少年曰:‘牛不能生馬。’遂持駒去
    。傍鄰聞之,以臣為愚,故名此谷為愚公之谷。”桓公曰:“公誠愚矣,
    夫何為而与之?”桓公遂歸。明日朝,以告管仲,管仲正衿再拜曰:“此
    夷吾之愚也,使堯在上,咎繇為理,安有取人之駒者乎?若有見暴如是叟
    者,又必不与也,公知獄訟之不正,故与之耳,請退而修政。”孔子曰:
    “弟子記之,桓公,霸君也;管仲,賢佐也;猶有以智為愚者也,況不及
    桓公管仲者也。”
    魯有父子訟者,康子曰:“殺之!”孔子曰:“未可殺也。夫民不知
    子父訟之不善者久矣,是則上過也;上有道,是人亡矣。”康子曰:“夫
    治民以孝為本,今殺一人以戮不孝,不亦可乎?”孔子曰:“不孝而誅之
    ,是虐殺不辜也。三軍大敗,不可誅也;獄訟不治,不可刑也;上陳之教
    而先服之,則百姓從風矣,躬行不從而后俟之以刑,則民知罪矣;夫一仞
    之牆,民不能菖,百仞之山,童子升而游焉,陵遲故也!今是仁義之陵遲
    久矣,能謂民弗菖乎?詩曰:‘俾民不迷!’昔者君子導其百姓不使迷,
    是以威厲而不至,刑錯而用。”于是訟者聞之,乃請無訟。
    魯哀公問政于孔子,對曰:“政有使民富且壽。”哀公曰:“何謂也
    ?”孔子曰:“薄賦斂則民富,無事則遠罪,遠罪則民壽。”公曰:“若
    是則寡人貧矣。”孔子曰:“詩云:‘凱悌君子,民之父母’,未見其子
    富而父母貧者也。”
    文王問于呂望曰:“為天下若何?”對曰:“王國富民,霸國富士;
    僅存之國,富大夫;亡道之國,富倉府;是謂上溢而下漏。”文王曰:“
    善!”對曰:“宿善不祥。是日也,發其倉府,以賑鰥、寡、孤、獨。”
    武王問于太公曰:“治國之道若何?”太公對曰:“治國之道,愛民
    而已。”曰:“愛民若何?”曰:“利之而勿害,成之勿敗,生之勿殺,
    与之勿奪,樂之勿苦,喜之勿怒,此治國之道,使民之誼也,愛之而已矣
    。民失其所務,則害之也;農失其時,則敗之也;有罪者重其罰,則殺之
    也;重賦斂者,則奪之也;多徭役以罷民力,則苦之也;勞而扰之,則怒
    之也。故善為國者遇民,如父母之愛子,兄之愛弟,聞其飢寒為之哀,見
    其勞苦為之悲。”
    武王問于太公曰:“賢君治國何如?”對曰:“賢君之治國,其政平
    ,其吏不苛,其賦斂節,其自奉薄,不以私善害公法,賞賜不加于無功,
    刑罰不施于無罪,不因喜以賞,不因怒以誅,害民者有罪,進賢舉過者有
    賞,后宮不荒,女謁不听,上無淫慝,下不陰害,不幸宮室以費財,不多
    觀游台池以罷民,不雕文刻鏤以逞耳目,宮無腐蠹之藏,國無流餓之民,
    此賢君之治國也。”武王曰:“善哉!”
    武王問于太公曰:“為國而數更法令者何也?”太公曰:“為國而數
    更法令者,不法法,以其所善為法者也;故令出而亂,亂則更為法,是以
    其法令數更也。”
    成王問政于尹逸曰:“吾何德之行而民親其上?”對曰:“使之以時
    而敬順之,忠而愛之,布令信而不食言。”王曰:“其度安至?”對曰:
    “如臨深淵,如履薄冰。”王曰:“懼哉!”對曰:“天地之間,四海之
    內,善之則畜之,不善則讎也;夏、殷之臣,反讎桀、紂而臣湯、武,夙
    沙之民,自攻其主而歸神農氏。此君之所明知也,若何其無懼也?”
    仲尼見梁君,梁君問仲尼曰:“吾欲長有國,吾欲列都之得,吾欲使
    民安不惑,吾欲使士竭其力,吾欲使日月當時,吾欲使圣人自來,吾欲使
    官府治,為之奈何?”仲尼對曰:“千乘之君,万乘之主,問于丘者多矣
    ,未嘗有如主君問丘之術也,然而盡可得也。丘聞之,兩君相親,則長有
    國;君惠臣忠,則列都之得;毋殺不辜,毋釋罪人,則民不惑;益士祿賞
    ,則竭其力;尊天敬鬼,則日月當時;善為刑罰,則圣人自來;尚賢使能
    ,則官治。”梁君曰:“豈有不然哉!”
    子貢曰:“葉公問政于夫子,夫子曰:‘政在附近來遠’,魯哀公問
    政于夫子,夫子曰:‘政在于諭臣’。齊景公問政于夫子,夫子曰:‘政
    在于節用’。三君問政于夫子,夫子應之不同,然則政有异乎?”孔子曰
    :“夫荊之地廣而都狹,民有离志焉,故曰在于附近而來遠。哀公有臣三
    人,內比周公以惑其君,外障諸侯賓客以蔽其明,故曰政在諭臣。齊景公
    奢于台榭,淫于苑囿,五官之樂不解,一旦而賜人百乘之家者三,故曰政
    在于節用,此三者政也,詩不云乎:‘亂离斯瘼,爰其适歸’,此傷离散
    以為亂者也,匪其止共,惟王之邛,此傷奸臣蔽主以為亂者也,‘相亂蔑
    資,魯莫惠我師’,此傷奢侈不節以為亂者也,察此三者之所欲,政其同
    乎哉!”
    公儀休相魯,魯君死,左右請閉門,公儀休曰:“止!池淵吾不稅,
    蒙山吾不賦,苛令吾不布,吾已閉心矣!何閉于門哉?”
    子產相鄭,簡公謂子產曰:“內政毋出,外政毋入。夫衣裘之不美,
    車馬之不飾,子女之不洁,寡人之丑也;國家之不治,封疆之不正,夫子
    之丑也。”子產相鄭,終簡公之身,內無國中之亂,外無諸侯之患也;子
    產之從政也,擇能而使之:馮簡子善斷事,子太叔善決而文,公孫揮知四
    國之為而辨于其大夫之族姓,變而立至,又善為辭令,裨諶善謀,于野則
    獲,于邑則否,有事乃載裨諶与之适野,使謀可否,而告馮簡子斷之,使
    公孫揮為之辭令,成乃受子太叔行之,以應對賓客,是以鮮有敗事也。
    董安于治晉陽,問政于蹇老,蹇老曰:“曰忠、曰信、曰敢。”董安
    于曰:“安忠乎?”曰:“忠于主。”曰:“安信乎?”曰:“信于令。
    ”曰:“安敢乎?”曰:“敢于不善人。”董安于曰:“此三者足矣。”
    魏文侯使西門豹往治于鄴,告之曰:“必全功成名布義。”豹曰:“
    敢問全功成名布義為之奈何?”文侯曰:“子往矣!是無邑不有賢豪辨博
    者也,無邑不有好揚人之惡,蔽人之善者也。往必問豪賢者,因而親之;
    其辨博者,因而師之;問其好揚人之惡,蔽人之善者,因而察之,不可以
    特聞從事。夫耳聞之不如目見之,目見之不如足踐之,踐之不如手辨之;
    人始入官,如入晦室,久而愈明,明乃治,治乃行。”
    宓子賤治單父,彈鳴琴,身不下堂而單父治。巫馬期亦治單父,以星
    出,以星入,日夜不出,以身親之,而單父亦治。巫馬期問其故于宓子賤
    ,宓子賤曰:“我之謂任人,子之謂任力;任力者固勞,任人者固佚。”
    人曰宓子賤,則君子矣,佚四肢,全耳目,平心气而百官治,任其數而已
    矣。巫馬期則不然,弊性事情,勞煩教詔,雖治猶未至也。
    孔子謂宓子賤曰:“子治單父而眾說,語丘所以為之者。”曰:“不
    齊父其父,子其子,恤諸孤而哀喪紀。”孔子曰:“善小節也小民附矣,
    猶未足也。”曰:“不齊也,所父事者三人,所兄事者五人,所友者十一
    人,”孔子曰:“父事三人,可以教孝矣;兄事五人,可以教弟矣;友十
    一人,可以教學矣。中節也,中民附矣,猶未足也。”曰:“此地民有賢
    于不齊者五人,不齊事之,皆教不齊所以治之術。”孔子曰:“欲其大者
    ,乃于此在。昔者堯、舜清微其身,以听觀天下,務來賢人,夫舉賢者,
    百福之宗也,而神明之主也,不齊之所治者小也,不齊所治者大,其与堯
    、舜繼矣。”
    宓子賤為單父宰,辭于夫子,夫子曰:“毋迎而距也,毋望而許也;
    許之則失守,距之則閉塞。譬如高山深淵,仰之不可极,度之不可測也。
    ”子賤曰:“善,敢不承命乎!”宓子賤為單父宰,過于陽晝曰:“子亦
    有以送仆乎?”陽晝曰:“吾少也賤,不知治民之術,有釣道二焉,請以
    送子。”子賤曰:“釣道奈何?”陽晝曰:“夫綸錯餌,迎而吸之者也,
    陽橋也,其為魚薄而不美;若存若亡,若食若不食者,魴也,其為魚也博
    而厚味。”宓子賤曰:“善。”于是未至單父,冠蓋迎之者交接于道,子
    賤曰:“車驅之,車驅之。”夫陽晝之所謂陽橋者至矣,于是至單父請其
    耆老尊賢者而与之共治單父。
    孔子弟子有孔蔑者,与宓子賤皆仕,孔子往過孔蔑,問之曰:“自子
    之仕者,何得、何亡?”孔蔑曰:“自吾仕者未有所得,而有所亡者三,
    曰:王事若襲,學焉得習,以是學不得明也,所亡者一也。奉祿少鬻,鬻
    不足及親戚,親戚益疏矣,所亡者二也。公事多急,不得吊死視病,是以
    朋友益疏矣,所亡者三也。”孔子不說,而复往見子賤曰:“自子之仕,
    何得、何亡也?”子賤曰:“自吾之仕,未有所亡而所得者三:始誦之文
    ,今履而行之,是學日益明也,所得者一也。奉祿雖少鬻,鬻得及親戚,
    是以親戚益親也,所得者二也。公事雖急,夜勤,吊死視病,是以朋友益
    親也,所得者三也。”孔子謂子賤曰:“君子哉若人!君子哉若人!魯無
    君子也,斯焉取斯?”
    晏子治東阿三年,景公召而數之曰:“吾以子為可,而使子治東阿,
    今子治而亂,子退而自察也,寡人將加大誅于子。”晏子對曰:“臣請改
    道易行而治東阿,三年不治,臣請死之。”景公許之。于是明年上計,景
    公迎而賀之曰:“甚善矣!子之治東阿也。”晏子對曰:“前臣之治東阿
    也,屬托行,貨賂至,并會賦斂,倉庫少內,便事左右,陂池之魚,入于
    權家。當此之時,飢者過半矣,君乃反迎而賀臣,愚不能复治東阿,愿乞
    骸骨,避賢者之路,再拜便辟。”景公乃下席而謝之曰:“子強复治東阿
    ;東阿者,子之東阿也,寡人無复与焉。”
    子路治蒲,見于孔子曰:“由愿受教。”孔子曰:“蒲多壯士,又難
    治也。然吾語汝,以敬,可以攝勇;寬以正,可以容眾;恭以洁,可以親
    上。”
    子貢為信陽令,辭孔子而行,孔子曰:“力之順之,因子之時,無奪
    無伐,無暴無盜。”子貢曰:“賜少日事君子,君子固有盜者邪!”孔子
    曰:“夫以不肖伐賢,是謂奪也;以賢伐不肖,是謂伐也;緩其令,急其
    誅,是謂暴也;取人善以自為己,是謂盜也。君子之盜,豈必當財幣乎?
    吾聞之曰:知為吏者奉法利民,不知為吏者,枉法以侵民,此皆怨之所由
    生也。臨官莫如平,臨財莫如廉,廉平之守,不可攻也。匿人之善者,是
    謂蔽賢也;揚人之惡者,是謂小人也;不內相教而外相謗者,是謂不足親
    也。言人之善者,有所得而無所傷也;言人之惡者,無所得而有所傷也。
    故君子慎言語矣,毋先己而后人,擇言出之,令口如耳。”
    楊朱見梁王,言治天下如運諸掌然,梁王曰:“先生有一妻一妾不能
    治,三畝之園不能芸,言治天下如運諸手掌何以?”楊朱曰:“臣有之,
    君不見夫羊乎,百羊而群,使五尺童子荷杖而隨之,欲東而東,欲西而西
    ;君且使堯牽一羊,舜荷杖而隨之,則亂之始也。臣聞之,夫吞舟之魚不
    游淵,鴻鵠高飛不就污池,何則?其志极遠也。黃鐘大呂,不可從繁奏之
    舞,何則?其音疏也。將治大者不治小,成大功者不小苛,此之謂也。”
    景差相鄭,鄭人有冬涉水者,出而脛寒,后景差過之,下陪乘而載之
    ,覆以上衽,晉叔向聞之曰:“景子為人國相,豈不固哉!吾聞良吏居之
    三月而溝渠修,十月而津梁成,六畜且不濡足,而況人乎?”
    魏文侯問李克曰:“為國如何?”對曰:“臣聞為國之道,食有勞而
    祿有功,使有能而賞必行,罰必當。”文侯曰:“吾嘗罰皆當而民不与,
    何也?”對曰:“國其有淫民乎?臣聞之曰:奪淫民之祿以來四方之士;
    其父有功而祿,其子無功而食之,出則乘車馬衣美裘以為榮華,入則修竽
    琴、鐘石之聲而安其子女之樂,以亂鄉曲之教,如此者奪其祿以來四方之
    士,此之謂奪淫民也。”
    齊桓公問管仲曰:“國何患?”管仲對曰:“患失社鼠。”桓公曰:
    “何謂也?”管仲對曰:“夫社束木而涂之,鼠因往托焉,熏之則恐燒其
    木,灌之則恐敗其涂,此鼠所以不可得殺者,以社故也。夫國亦有社鼠,
    人主左右是也;內則蔽善惡于君上,外則賣權重于百姓,不誅之則為亂,
    誅之則為人主所察,据腹而有之,此亦國之社鼠也。人有酤酒者,為器
    甚洁清,置表甚長而酒酸不售,問之里人其故,里人云:‘公之狗猛,人
    挈器而入,且酤公酒,狗迎而噬之,此酒所以酸不售之故也。’夫國亦有
    猛狗,用事者也;有道術之士,欲明万乘之主,而用事者迎而?之,此亦
    國之猛狗也。左右為社鼠,用事者為猛狗,則道術之士不得用矣,此治國
    之所患也。”
    齊侯問于晏子曰:“為政何患?”對曰:“患善惡之不分。”公曰:
    “何以察之?”對曰:“審擇左右,左右善,則百僚各得其所宜而善惡分
    。”孔子聞之曰:“此言也信矣,善言進,則不善無由入矣;不進善言,
    則善無由入矣。”
    复槁之君朝齊,桓公問治民焉,复槁之君不對,而循口操衿抑心,桓
    公曰:“与民共甘苦飢寒乎?”“夫以我為圣人也,故不用言而諭。”因
    禮之千金。晉文公時,翟人有封狐、文豹之皮者,文公喟然嘆曰:“封狐
    文豹何罪哉?以其皮為罪也。”大夫欒枝曰:“地廣而不平,財聚而不散
    ,獨非狐豹之罪乎?”文公曰:“善哉!說之。”欒枝曰:“地廣而不平
    ,人將平之;財聚而不散,人將爭之。”于是列地以分民,散財以賑貧。
    晉文侯問政于舅犯,舅犯對曰:“分熟不如分腥,分腥不如分地;割
    以分民而益其爵祿,是以上得地而民知富,上失地而民知貧,古之所謂致
    師而戰者,其此之謂也。”
    晉侯問于士文伯曰:“三月朔,日有蝕之,寡人學桑彩彼劍骸幢巳斬
    矗燦諍尾臧者,何也?”對曰:“不善政之謂也;國無政不用善,則自取
    謫于日月之災,故不可不慎也。政有三而已:一曰因民,二曰擇人,三曰
    從時。”
    延陵季子游于晉,入其境曰:“嘻,暴哉國乎!”入其都曰:“嘻,
    力屈哉,國乎!”立其朝曰:“嘻,亂哉國乎!”從者曰:“夫子之入境
    未久也,何其名之不疑也?”延陵季子曰:“然,吾入其境田畝荒穢而不
    休,雜增崇高,吾是以知其國之暴也。吾入其都,新室惡而故室美,新牆
    卑而故牆高,吾是以知其民力之屈也。吾立其朝,君能視而不下問,其臣
    善伐而不上諫,吾是以知其國之亂也。齊之所以不如魯者,太公之賢不如
    伯禽,伯禽与太公俱受封,而各之國三年,太公來朝,周公問曰:“何治
    之疾也?”對曰:“尊賢,先疏后親,先義后仁也。”此霸者之跡也。周
    公曰:“太公之澤及五世。”五年伯禽來朝,周公問曰:“何治之難?”
    對曰:“親親者,先內后外,先仁后義也。”此王者之跡也。周公曰:“
    魯之澤及十世。”故魯有王跡者,仁厚也;齊有霸跡者,武政也;齊之所
    以不如魯也,太公之賢不如伯禽也。
    景公好婦人而丈夫飾者,國人盡服之,公使吏禁之曰:“女子而男子
    飾者,裂其衣,斷其帶。”裂衣斷帶相望而不止,晏子見,公曰:“寡人
    使吏禁女子而男子飾者,裂其衣,斷其帶,相望而不止者,何也?”對曰
    :“君使服之于內而禁之于外,猶懸牛首于門而求買馬肉也;公胡不使內
    勿服,則外莫敢為也。”公曰:“善!”使內勿服,不旋月而國莫之服也
    。
    齊人甚好轂擊相犯以為樂,禁之不止,晏子患之,乃為新車良馬出与
    人相犯也,曰:“轂擊者不祥,臣其察祀不順,居處不敬乎?”下車棄而
    去之,然后國人乃不為。故曰:“禁之以制,而身不先行也,民不肯止,
    故化其心莫若教也。”
    魯國之法,魯人有贖臣妾于諸侯者,取金于府;子貢贖人于諸侯而還
    其金,孔子聞之:“賜失之矣,圣人之舉事也,可以移風易俗,而教導可
    施于百姓,非獨适其身之行也。今魯國富者寡而貧者眾,贖而受金則為不
    廉;不受則后莫复贖,自今以來,魯人不复贖矣。”孔子可謂通于化矣。
    故老子曰:“見小曰明。”
    孔子見季康子,康子未說,孔子又見之,宰予曰:“吾聞之夫子曰:
    ‘王公不聘不動。’今吾子之見司寇也少數矣。”孔子曰:“魯國以眾相
    陵,以兵相暴之日久矣,而有司不治,聘我者孰大乎?”于是魯人聞之曰
    :“圣人將治,何以不先自為刑罰乎?”自是之后,國無爭者。孔子謂弟
    子曰:“違山十里,蟪蛄之聲猶尚存耳,政事無如膺之矣。”古之魯俗,
    涂里之間,羅門之羅,收門之魚,獨得于禮,是以孔子善之夫涂里之間,
    富家為貧者出;羅門之羅,有親者取多,無親者取少;收門之漁,有親者
    取巨,無親者取小。
    春秋曰:四民均則王道興而百姓宁;所謂四民者,士、農、工、商也
    。婚姻之道廢,則男女之道悖,而淫之路興矣。

    卷八 尊賢

    人君之欲平治天下而垂榮名者,必尊賢而下士。易曰:“自上下下,
    其道大光。”又曰:“以貴下賤,大得民也。”夫明王之施德而下下也,
    將怀遠而致近也。夫朝無賢人,猶鴻鵠之無羽翼也,雖有千里之望,猶不
    能致其意之所欲至矣;是故游江海者托于船,致遠道者托于乘,欲霸王者
    托于賢;伊尹、呂尚、管夷吾、百里奚,此霸王之船乘也。釋父兄与子孫
    ,非疏之也;任庖人釣屠与仇讎仆虜,非阿之也;持社稷立功名之道,不
    得不然也。猶大匠之為宮室也,量小大而知材木矣,比功效而知人數矣。
    是故呂尚聘而天下知商將亡,而周之王也;管夷吾,百里奚任,而天下知
    齊秦之必霸也,豈特船乘哉!夫成王霸固有人,亡國破家亦固有人;桀用
    于莘,紂用惡來,宋用唐鞅,齊用蘇秦,秦用趙高,而天下知其亡也;非
    其人而欲有功,譬其若夏至之日而欲夜之長也,射魚指天而欲發之當也;
    雖舜禹猶亦困,而又況乎俗主哉!
    春秋之時,天子微弱,諸侯力政,皆叛不朝;眾暴寡,強劫弱,南夷
    与北狄交侵,中國之不絕若線。桓公于是用管仲、鮑叔、隰朋、賓胥無、
    宁戚,三存亡國,一繼絕世,救中國,攘戎狄,卒脅荊蠻,以尊周室,霸
    諸侯。晉文公用咎犯、先軫、陽處父,強中國,敗強楚,合諸侯,朝天子
    ,以顯周室。楚庄王用孫叔敖、司馬子反、將軍子重,征陳從鄭,敗強晉
    ,無敵于天下。秦穆公用百里子、蹇叔子、王子廖及由余,据有雍州,攘
    敗西戎。吳用延州萊季子,鬿僽偕詡浮夜備揮星酥垂補笪爸詈睿倉我凰橙
    誦模捕于臣者,不先得賢也。至簡公用子產、裨諶、世叔、行人子羽,賊
    臣除,正臣進,去強楚,合中國,國家安宁,二十余年,無強楚之患。故
    虞有宮之奇,晉獻公為之終夜不寐;楚有子玉得臣,文公為之側席而坐,
    遠乎賢者之厭難折衝也。夫宋襄公不用公子目夷之言,大辱于楚;曹不用
    僖負羈之諫,敗死于戎。故共惟五始之要,治亂之端,在乎審己而任賢也
    。國家之任賢而吉,任不肖而凶,案往世而視己事,其必然也,如合符,
    此為人君者,不可以不慎也。國家迭汲技猜徹舐遙布居閻聰圖操夜奔次歡
     渭咀櫻猜徹材餐餑諼憂,行政二十一年,季子之卒后,邾擊其南,齊伐
    其北,魯不胜其患,將乞師于楚以取全耳(或作身),故傳曰:患之起必
    自此始也。公子買不可使戍衛,公子遂不听君命而擅之晉,內侵于臣下,
    外困于兵亂,弱之患也。僖公之性,非前二十一年常賢,而后乃漸變為不
    肖也,此季子存之所益,亡之所損也。夫得賢失賢,其損益之驗如此,而
    人主忽于所用,甚可疾痛也。夫智不足以見賢,無可奈何矣,若智能見之
    ,而強不能決,猶豫不用,而大者死亡,小者亂傾,此甚可悲哀也。以宋
    殤公不知孔父之賢乎,安知孔父死,己必死,趨而救之,趨而救之者,是
    知其賢也。以魯庄公不知季子之賢乎,安知疾將死,召季子而授之國政,
    授之國政者,是知其賢也。此二君知能見賢而皆不能用,故宋殤公以殺死
    ,魯庄公以賊嗣,使宋殤蚤任孔父,魯庄素用季子,乃將靖鄰國,而況自
    存乎!
    鄒子說梁王曰:“伊尹故有莘氏之媵臣也,湯立以為三公,天下之治
    太平。管仲故成陰之狗盜也,天下之庸夫也,齊桓公得之以為仲父。百里
    奚道之于路,傳賣五羊之皮,秦穆公委之以政。宁戚故將車人也,叩轅行
    歌于康之衢,桓公任以國。司馬喜髕腳于宋,而卒相中山。范睢折脅拉齒
    于魏而后為應侯。太公望故老婦之出夫也,朝歌之屠佐也,棘津迎客之舍
    人也,年七十而相周,九十而封齊。故詩曰:‘綿綿之葛,在于曠野,良
    工得之,以為,良工不得,枯死于野。’此七士者,不遇明君圣主,几行
    乞丐,枯死于中野,譬猶綿綿之葛矣。”
    眉睫之征,接而形于色;聲音之風,感而動乎心。宁戚擊牛角而商歌
    ,桓公聞而舉之;鮑龍跪石而登偃游爸聰魯擔灰聰嗉參耐蹙傯憊輩灰勻站
    謾氏褪唇也,不待久而親;能者之相見也,不待試而知矣。故士之接也,
    非必与之臨財分貨,乃知其廉也;非必与之犯難涉危,乃知其勇也。舉事
    決斷,是以知其勇也;取与有讓,是以知其廉也。故見虎之尾,而知其大
    于狸也;見象之牙,而知其大于牛也。一節見則百節知矣。由此觀之,以
    所見可以占未發,睹小節固足以知大体矣。
    禹以夏王,桀以夏亡;湯以殷王,紂以殷亡。闔廬以吳戰胜無敵于天
    下,而夫差以見禽于越,文公以晉國霸,而厲公以見s于匠麗之宮,威王
    以齊強于天下,而愍王以s死于廟梁,穆公以秦顯名尊號,而二世以劫于
    望夷,其所以君王者同,而功跡不等者,所任异也!是故成王處襁褓而朝
    諸侯,周公用事也。趙武靈王五十年而餓死于沙丘,任李充故也。桓公得
    管仲,九合諸侯,一匡天下,失管仲,任豎刁易牙,身死不葬,為天下笑
    ,一人之身,榮辱俱施焉,在所任也。故魏有公子無忌,削地复得;趙任
    藺相如,秦兵不敢出鄢陵;任唐睢,國獨特立。楚有申包胥,而昭王反位
    ;齊有田單,襄王得國。由此觀之,國無賢佐俊士,而能以成功立名,安
    危繼絕者,未嘗有也。故國不務大而務得民心;佐不務多,而務得賢俊。
    得民心者民往之,有賢佐者士歸之,文王請除炮烙之刑而殷民從,湯去張
    网者之三面而夏民從,越王不隳舊冢而吳人服,以其所為之順于民心也。
    故聲同則處而相應,德合則未見而相親,賢者立于本朝,則天下之豪,相
    率而趨之矣,何以知其然也?曰:管仲,桓公之賊也,鮑叔以為賢于己而
    進之為相,七十言而說乃听,遂使桓公除報讎之心而委國政焉。桓公垂拱
    無事而朝諸侯,鮑叔之力也;管仲之所以能北走桓公無自危之心者,同聲
    于鮑叔也。紂殺王子比干,箕子被發而佯狂,陳靈公殺泄冶而鄧元去陳;
    自是之后,殷兼于周,陳亡于楚,以其殺比干、泄冶而失箕子与鄧元也。
    燕昭王得郭隗,而鄒衍、樂毅以齊趙至,蘇子、屈景以周楚至,于是舉兵
    而攻齊,栖閔王于莒,燕校地計眾,非与齊均也,然所以能信意至于此者
    ,由得士也。故無常安之國,無琲v之民;得賢者則安昌,失之者則危亡
    ,自古及今,未有不然者也。明鏡所以昭形也,往古所以知今也,夫知惡
    往古之所以危亡,而不務襲跡于其所以安昌,則未有异乎卻走而求逮前人
    也,太公知之,故舉微子之后而封比干之墓,夫圣人之于死尚如是其厚也
    ,況當世而生存者乎!則其弗失可識矣。
    齊景公問于孔子曰:“秦穆公其國小,處僻而霸,何也?”對曰:“
    其國小而志大,雖處僻而其政中,其舉果,其謀和,其令不偷;親舉五翼
    大夫于系縲之中,与之語三日而授之政,以此取之,雖王可也,霸則小矣
    。”
    或曰:“將謂桓公仁義乎?殺兄而立,非仁義也;將謂桓公恭儉乎?
    与婦人同輿,馳于邑中,非恭儉也;將謂桓公清洁乎?閨門之內,無可嫁
    者,非清洁也。此三者亡國失君之行也,然而桓公兼有之,以得管仲隰朋
    ,九合諸侯,一匡天下,畢朝周室,為五霸長,以其得賢佐也;失管仲隰
    朋,任豎刁易牙,身死不葬,虫流出戶。一人之身,榮辱俱施者,何者?
    其所任异也。”由此觀之,則任佐急矣。周公旦白屋之士,所下者七十人
    ,而天下之士皆至;晏子所与同衣食者百人,而天下之士亦至;仲尼修道
    行,理文章,而天下之士亦至矣。伯牙子鼓琴,鐘子期听之,方鼓而志在
    太山,鐘子期曰:“善哉乎鼓琴!巍巍乎若太山。”少選之間,而志在流
    水,鐘子期复曰:“善哉乎鼓琴!湯湯乎若流水。”鐘子期死,伯牙破琴
    絕弦,終身不复鼓琴,以為世無足為鼓琴者。非獨鼓琴若此也,賢者亦然
    ,雖有賢者而無以接之,賢者奚由盡忠哉!驥不自至千里者,待伯樂而后
    至也。
    周威公問于宁子曰:“取士有道乎?”對曰:“有,窮者達之,亡者
    存之,廢者起之;四方之士,則四面而至矣。窮者不達,亡者不存,廢者
    不起;四方之士,則四面而畔矣。夫城固不能自守,兵利不能自保,得士
    而失之,必有其間,夫士存則君尊,士亡則君卑。”周武公曰:“士壹至
    如此乎?”對曰:“君不聞夫楚平王有士,曰楚蟥臕身鷩停餐踅鄙之,出
    亡之晉;晉人用之,是為城濮之戰。又有士曰苗賁皇,王將殺之,出亡走
    晉;晉人用之,是為鄢陵之戰。又有士曰上解于,王將殺之,出亡走晉;
    晉人用之,是為兩堂之戰。又有士曰伍子胥,王殺其父兄,出亡走吳;闔
    閭用之,于是興師而襲郢,故楚之大得罪于梁鄭宋衛之君,猶未遽至于此
    也。此四得罪于其士,三暴其民骨,一亡其國。由是觀之,士存則國存,
    士亡則國亡;子胥怒而亡之,申包胥怒而存之;士胡可無貴乎!”
    哀公問于孔子曰:“人若何而可取也?”孔子對曰:“毋取者,無取
    健者,毋取口銳者。”哀公曰:“何謂也?”孔子曰:“大給利不可盡用
    ;健者必欲兼人,不可以為法也;口銳者多誕而寡信,后恐不驗也。夫弓
    矢和調而后求其中焉;馬愨愿順,然后求其良材焉;人必忠信重厚,然后
    求其知能焉。今有人不忠信重厚而多智能,如此人者,譬猶豺狼与,不可
    以身近也。是故先其仁義之誠者,然后親之;于是有知能者,然后任之;
    故曰:親仁而使能。夫取人之術也,觀其言而察其行,夫言者所以抒其匈
    而發其情者也,能行之士必能言之,是故先觀其言而揆其行,夫以言揆其
    行,雖有奸軌之人,無以逃其情矣。”哀公曰:“善。”
    周公攝天子位七年,布衣之士,執贄所師見者十二人,窮巷白屋所見
    者四十九人,時進善者百人,教士者千人,官朝者万人。當此之時,誠使
    周公驕而且吝,則天下賢士至者寡矣,苟有至者,則必貪而尸祿者也,尸
    祿之臣,不能存君矣。
    齊桓公設庭燎,為士之欲造見者,期年而士不至,于是東野鄙人有以
    九九之術見者,桓公曰:“九九何足以見乎?”鄙人對曰:“臣非以九九
    為足以見也,臣聞主君設庭燎以待士,期年而士不至,夫士之所以不至者
    ,君、天下賢君也;四方之士,皆自以論而不及君,故不至也。夫九九薄
    能耳,而君猶禮之,況賢于九九乎?夫太山不辭壤石,江海不逆小流,所
    以成大也,詩云:‘先民有言,詢于芻蕘。’言博謀也。”桓公曰善,乃
    因禮之。期月四方之士,相攜而并至,詩曰:“自堂徂基,自羊徂牛。”
    言以內及外,以小及大也。
    齊景公伐宋,至于岐堤之上,登高以望,太息而嘆曰:“昔我先君桓
    公,長轂八百乘以霸諸侯,今我長轂三千乘,而不敢久處于此者,豈其無
    仲歟!”弦章對曰:“臣聞之,水廣則魚大,君明則臣忠;昔有桓公,故
    有管仲;今桓公在此,則車下之臣盡管仲也。”
    趙簡子游于河而樂之,嘆曰:“安得賢士而与處焉!”舟人古乘跪而
    對曰:“夫珠玉無足,去此數千里而所以能來者,人好之也;今士有足而
    不來者,此是吾君不好之乎!”趙簡子曰:“吾門左右客千人,朝食不足
    ,暮收市征,暮食不足,朝收市征,吾尚可謂不好士乎?”舟人古乘對曰
    :“鴻鵠高飛遠翔,其所恃者六翮也,背上之毛,腹下之毳,無尺寸之數
    ,去之滿把,飛不能為之益卑;益之滿把,飛不能為之益高。不知門下左
    右客千人者,有六翮之用乎?將盡毛毳也。”
    齊宣王坐,淳于髡侍,宣王曰:“先生論寡人何好?”淳于髡曰:“
    古者所好四,而王所好三焉。”宣王曰:“古者所好,何与寡人所好?”
    淳于髡曰:“古者好馬,王亦好馬;古者好味,王亦好味;古者好色,王
    亦好色;古者好士,王獨不好士。”宣王曰:“國無士耳,有則寡人亦說
    之矣。”淳于髡曰:“古者驊騮騏驥,今無有,王選于眾,王好馬矣;古
    者有豹象之胎,今無有,王選于眾,王好味矣;古者有毛Z西施,今無有
    ,王選于眾,王好色矣。王必將待堯舜禹湯之士而后好之,則禹湯之士亦
    不好王矣。”宣王嘿然無以應。
    衛君問于田讓曰:“寡人封侯盡千里之地,賞賜盡御府繒帛而士不至
    ,何也?”田讓對曰:“君之賞賜,不可以功及也;君之誅罰,不可以理
    避也;猶舉杖而呼狗,張弓而祝雞矣;雖有香餌而不能致者,害之必也。
    ”
    宗衛相齊,遇逐罷歸舍,召門尉田饒等二十有七而問焉,曰:“士大
    夫誰能与我赴諸侯者乎?”田饒等皆伏而不對。宗衛曰:“何士大夫之易
    得而難用也!”饒對曰:“非士大夫之難用也,是君不能用也。”宗衛曰
    :“不能用士大夫何若?”田饒對曰:“廚中有臭肉,則門下無死士矣。
    今夫三升之稷不足于士;而君雁有余粟。紈素綺繡靡麗。堂從風雨弊,而
    士曾不得以緣衣;果園梨粟,后宮婦人摭以相`,而士曾不得一嘗,且夫
    財者,君之所輕也;死者士之所重也,君不能用所輕之財,而欲使士致所
    重之死,豈不難乎哉?”于是宗衛面有慚色,逡巡避席而謝曰:“此衛之
    過也。”
    魯哀公問于孔子曰:“當今之時,君子誰賢?”對曰:“衛靈公。”
    公曰:“吾聞之,其閨門之內,姑姐妹無別。”對曰:“臣觀于朝廷,未
    觀于堂陛之間也。靈公之弟曰公子渠牟,其知足以治千乘之國,其信足以
    守之,而靈公愛之。又有士曰王材,國有賢人,必進而任之,無不達也;
    不能達,退而与分其祿,而靈公尊之。又有士曰慶足,國有大事,則進而
    治之,無不濟也,而靈公說之。史去衛,靈公邸舍三月,琴瑟不御,待史
    之入也而后入,臣是以知其賢也。”
    介子推行年十五而相荊,仲尼聞之,使人往視,還曰:“廊下有二十
    五俊士,堂上有二十五老人。”仲尼曰:“合二十五人之智,智于湯武;
    晼次迦酥戳擦諗磣妗災翁下,其固免矣乎!”
    孔子閑居,喟然而嘆曰:“銅殭伯華而無死,天下其有定矣。”子路
    曰:“愿聞其為人也何若。”孔子曰:“其幼也敏而好學,其壯也有勇而
    不屈,其老也有道而能以下人。”子路曰:“其幼也敏而好學則可,其壯
    也有勇而不屈則可;夫有道又誰下哉?”孔子曰:“由不知也。吾聞之,
    以眾攻寡而無不消也;以貴下賤,無不得也。昔在周公旦制天下之政而下
    士七十人,豈無道哉?欲得士之故也,夫有道而能下于天下之士,君子乎
    哉!”
    魏文侯從中山奔命安邑,田子方從,夫子擊過之,下車而趨,子方坐
    乘如故,告太子曰:“為我請君,待我朝歌。”太子不說,因為子方曰:
    “不識貧窮者驕人,富貴者驕人乎?”子方曰:“貧窮者驕人,富貴者安
    敢驕人,人主驕人而亡其國,吾未見以國待亡者也;大夫驕人而亡其家,
    吾未見以家待亡者也。貧窮者若不得意,納履而去,安往不得貧窮乎?貧
    窮者驕人,富貴者安敢驕人。”太子及文侯道田子方之語,文侯嘆曰:“
    微吾子之故,吾安得聞賢人之言,吾下子方以行,得而友之。自吾友子方
    也,君臣益親,百姓益附,吾是以得友士之功;我欲伐中山,吾以武下樂
    羊,三年而中山為獻于我,我是以得有武之功。吾所以不少進于此者,吾
    未見以智驕我者也;若得以智驕我者,豈不及古之人乎?”
    晉文侯行地登隧,大夫皆扶之,隨會不扶,文侯曰:“會!夫為人臣
    而忍其君者,其罪奚如?”對曰:“其罪重死。”文侯曰:“何謂重死?
    ”對曰:“身死,妻子為戮焉。”隨會曰:“君奚獨問為人臣忍其君者,
    而不問為人君而忍其臣者耶?”文侯曰:“為人君而忍其臣者,其罪何如
    ?”隨會對曰:“為人君而忍其臣者,智士不為謀,辨士不為言,仁士不
    為行,勇士不為死。”文侯援綏下車,辭大夫曰:“寡人有腰髀之病,愿
    諸大夫勿罪也。”
    齊將軍田理出將,張生郊送曰:“昔者堯讓許由以天下,洗耳而不受
    ,將軍知之乎?”曰:“唯然,知之。”“伯夷叔齊辭諸侯之位而不為,
    將軍知之乎?”曰:“唯然,知之。”“于陵仲子辭三公之位而佣為人灌
    園,將軍知之乎?”曰:“唯然,知之。”“智過去君第,變姓名,免為
    庶人,將軍知之乎?”曰:“唯然,知之。”“孫叔敖三去相而不悔,將
    軍知之乎?”曰:“唯然,知之。”“此五大夫者,名辭之而實羞之。今
    將軍方吞一國之權,提鼓擁旗,被堅執銳,旋回十万之師,擅斧鉞之誅,
    慎毋以士之所羞者驕士。”田理曰:“今日諸君皆為理祖道具酒脯,而先
    生獨教之以圣人之大道,謹聞命矣。”
    魏文侯見段干木,立倦而不敢息;及見翟璜,踞堂而与之言,翟璜不
    說。文侯曰:“段干木,官之則不肯,祿之則不受;今汝欲官則相至,欲
    祿則上卿;既受吾賞,又責吾禮,毋乃難乎?”
    孔子之郯,遭程子于涂,傾蓋而語終日。有間,顧子路曰:“取束帛
    一以贈先生。”子路不對。有間,又顧曰:“取束帛一以贈先生。”子路
    屑然對曰:“由聞之,士不中而見,女無媒而嫁,君子不行也。”孔子曰
    :“由,詩不云乎:‘野有蔓草,零露溥兮,有美一人,清揚婉兮,邂逅
    相遇,适我愿兮。’今程子天下之賢士也,于是不贈,終身不見。大德毋
    菖閑,小德出入可也。”
    齊桓公使管仲治國,管仲對曰:“賤不能臨貴。”桓公以為上卿而國
    不治,桓公曰何故?管仲對曰:“貧不能使富。”桓公賜之齊國市租一年
    而國不治,桓公曰何故?對曰:“疏不能制親。”桓公立以為仲父。齊國
    大安,而遂霸天下。孔子曰:“管仲之賢,不得此三權者,亦不能使其君
    南面而霸矣。”
    桓公問于管仲曰:“吾欲使爵腐于酒,肉腐于俎,得無害于霸乎?”
    管仲對曰:“此极非其貴者耳;然亦無害于霸也。”桓公曰:“何如而害
    霸?”管仲對曰:“不知賢,害霸;知而不用,害霸;用而不任,害霸;
    任而不信,害霸;信而复使小人參之,害霸。”桓公:“善。”
    魯人攻,曾子辭于君曰:“請出,寇罷而后复來,請姑毋使狗豕入吾
    舍。”君曰:“寡人之于先生也,人無不聞;今魯人攻我而先生去我,我
    胡守先生之舍?”魯人果攻而數之罪十,而曾子之所爭者九。魯師罷,君
    复修曾子舍而后迎之。
    宋司城子罕之貴子韋也,入与共食,出与同衣;司城子罕亡,子韋不
    從,子罕來,复召子韋而貴之。左右曰:“君之善子韋也,君亡不從,來
    又复貴之,君獨不愧于君之忠臣乎?”子罕曰:“吾唯不能用子韋,故至
    于亡;今吾之得复也,尚是子韋之遺德余教也,吾故貴之。且我之亡也,
    吾臣之削跡拔樹以從我者,奚益于吾亡哉?”
    楊因見趙簡主曰:“臣居鄉三逐,事君五去,聞君好士,故走來見。
    ”簡主聞之,絕食而嘆,跽而行,左右進諫曰:“居鄉三逐,是不容眾也
    ;事君五去,是不忠上也。今君有士見過人矣。”簡主曰:“子不知也。
    夫美女者,丑婦之仇也;盛德之士,亂世所疏也;正直之行,邪枉所憎也
    。”遂出見之,因授以為相,而國大治。由是觀之,遠近之人,不可以不
    察也。
    應侯与賈午子坐,聞其鼓琴之聲,應侯曰:“今日之琴,一何悲也?
    ”賈午子曰:“夫急張調下,故使人悲耳。急張者,良材也;調下者,官
    卑也。取夫良材而卑官之,安能無悲乎!”應侯曰:“善哉!”
    十三年,諸侯舉兵以伐齊,齊王聞之,惕然而恐,召其群臣大夫告曰
    :“有智為寡人用之。”于是博士淳于髡仰天大笑而不應,王复問之,又
    大笑不應,三笑不應,王艴然作色不悅曰:“先生以寡人語為戲乎?”對
    曰:“臣非敢以大王語為戲也,臣笑臣鄰之祠田也,以一奩飯,一壺酒,
    三鮒魚,祝曰:‘蟹咭撕蹋蔥罷儷擔泊敝春笫潰慚笱笥杏唷!笑其賜鬼薄
    而請之厚也。”于是王乃立淳于髡為上卿,賜之千金,革車百乘,与平諸
    侯之事;諸侯聞之,立罷其兵,休其士卒,遂不敢攻齊,此非淳于髡之力
    乎?
    田忌去齊奔楚,楚王郊迎至舍,問曰:“楚,万乘之國也,齊亦万乘
    之國也,常欲相參爸茨魏危俊倍栽唬骸耙字岸財朧股耆娼保蒼虺逋蛉耍彩
    股轄本敝矗倉燎萁本首而反耳。齊使田居將,則楚發二十万人,使上將軍
    將之,分別而相去也。齊使眄子將,楚發四封之內,王自出將而忌從,相
    國上將軍為左右司馬,如是則王僅得存耳。”于是齊使申孺將,楚發五万
    人,使上將軍至,擒將軍首反,于是齊王忿然,乃更使眄子將,楚悉發四
    封之內,王自出將,田忌從,相國上將軍為左右司馬,益王車屬九乘,僅
    得免耳。至舍,王北面正領齊,問曰:“先生何知之早也?”田忌曰:“
    申孺為人,侮賢者而輕不肖者,賢不肖者俱不為用,是以亡也;田居為人
    ,尊賢者而賤不肖者,賢者負任,不肖者退,是以分別而相去也;眄子之
    為人也,尊賢者而愛不肖者,賢不肖俱負任,是以王僅得存耳。”
    魏文侯觴大夫于曲陽,飲酣,文侯喟然嘆曰:“吾獨無豫讓以為臣。
    ”蹇重舉酒進曰:“臣請浮君。”文侯曰“何以?”對曰:“臣聞之,有
    命之父母,不知孝子;有道之君,不知忠臣。夫豫讓之君,亦何如哉?”
    文侯曰:“善!”受浮而飲之,嚼而不讓。曰:“無管仲鮑叔以為臣,故
    有豫讓之功也。”趙簡子曰:“吾欲得范中行氏良臣。”史d曰:“安用
    之?”簡子曰:“良臣,人所愿也,又何問焉?”曰:君以無為良臣故也
    。夫事君者,諫過而荐可,章善而替否,獻能而進賢;朝夕誦善,敗而納
    之,听則進,否則退。今范中行氏之良臣也,不能匡相其君,使至于難;
    出在于外,又不能入。亡而棄之,何良之為;若不棄,君安得之。夫良將
    營其君,使复其位,死而后止,何曰以來,若未能,乃非良也。”簡子曰
    :“善。”
    子路問于孔子曰:“治國何如?”孔子曰:“在于尊賢而賤不肖。”
    路曰:“范中行氏尊賢而賤不肖,其亡何也?”曰:“范中行氏尊賢而不
    能用也,賤不肖而不能去也;賢者知其不己用而怨之,不肖者知其賤己而
    讎之。賢者怨之,不肖者讎之;怨讎并前,中行氏雖欲無亡,得乎?”晉
    荊戰于,晉師敗績,顒父將歸請死,昭公將許之,士貞伯曰:“不可,城
    濮之役,晉胜于荊,文公猶有憂色,曰子玉猶存,憂未歇也;困獸猶斗,
    況國相乎?”及荊殺子玉,乃喜曰:“莫予毒也。今天或者大警晉也,林
    父之事君,進思盡忠,退思補過,社稷之衛也,今殺之,是重荊胜也。”

  • 說苑, Volume 1-4

    說苑, Volume 1-4

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    卷一 君道
    晉平公問于師曠曰:“人君之道如何?”對曰:“人君之道清淨無為
    ,務在博愛,趨在任賢;廣開耳目,以察万方;不固溺于流俗,不拘系于
    左右;廓然遠見,踔然獨立;屢省考績,以臨臣下。此人君之操也。”平
    公曰:“善!”
    齊宣王謂尹文曰:“人君之事何如?”尹文對曰:“人君之事,無為
    而能容下。夫事寡易從,法省易因;故民不以政獲罪也。大道容眾,大德
    容下;圣人寡為而天下理矣。書曰:‘睿作圣’。詩人曰:‘岐有夷之行
    ,子孫其保之!’”宣王曰:“善!”
    成王封伯禽為魯公,召而告之曰:“爾知為人上之道乎?凡處尊位者
    必以敬,下順德規諫,必開不諱之門,撙節安靜以借之,諫者勿振以威,
    毋格其言,博采其辭,乃擇可觀。夫有文無武,無以威下,有武無文,民
    畏不親,文武俱行,威德乃成;既成威德,民親以服,清白上通,巧佞下
    塞,諫者得進,忠信乃畜。”伯禽再拜受命而辭。
    陳靈公行僻而言失,泄冶曰:“陳其亡矣!吾驟諫君,君不吾听而愈
    失威儀。夫上之化下,猶風靡草,東風則草靡而西,西風則草靡而東,在
    風所由而草為之靡,是故人君之動不可不慎也。夫樹曲木者惡得直景,人
    君不直其行,不敬其言者,未有能保帝王之號,垂顯令之名者也。易曰:
    ‘夫君子居其室,出其言善,則千里之外應之,況其邇者乎?居其室,出
    其言不善,則千里之外違之,況其邇者乎?言出于身,加于民;行發乎邇
    ,見乎遠。言行君子之樞机,樞机之發,榮辱之主,君子之所以動天地,
    可不慎乎?’天地動而万物變化。詩曰:‘慎爾出話,敬爾威儀,無不柔
    嘉。’此之謂也。今君不是之慎而縱恣焉,不亡必。”靈公聞之,以泄冶
    為妖言而殺之,后果s于征舒。
    魯哀公問于孔子曰:“吾聞君子不博,有之乎?”孔子對曰:“有之
    。”哀公曰:“何為其不博也?”孔子對曰:“為其有二乘。”哀公曰:
    “有二乘則何為不博也?”孔子對曰:“為行惡道也。”哀公懼焉。有間
    曰:“若是乎君子之惡惡道之甚也!”孔子對曰:“惡惡道不能甚,則其
    好善道亦不能甚;好善道不能甚,則百姓之親之也,亦不能甚。”詩云:
    ‘未見君子,憂心慘嗉燃梗慘嗉汝碇梗參倚腦蛩怠!凳敝春蒙頻樂瓷躋踩
    恕哀公曰:“善哉!吾聞君子成人之美,不成人之惡。微孔子,吾焉聞斯
    言也哉?”
    河間獻王曰:“堯存心于天下,加志于窮民,痛万姓之罹罪,憂眾生
    之不遂也。有一民飢,則曰此我飢之也;有一人寒,則曰此我寒之也;一
    民有罪,則曰此我陷之也。仁昭而義立,德博而化廣;故不賞而民勸,不
    罰而民治。先恕而后教,是堯道也。當舜之時,有苗氏不服,其所以不服
    者,大山在其南,殿山在其北;左洞庭之波,右彭蠡之川;因此險也,所
    以不服,禹欲伐之,舜不許,曰:‘諭教猶未竭也,究諭教焉,而有苗氏
    請服,天下聞之,皆非禹之義,而歸舜之德。
    周公踐天子之位布德施惠,遠而逾明,十二牧,方三人,出舉遠方之
    民,有飢寒而不得衣食者,有獄訟而失職者,有賢才而不舉者,以入告乎
    天子,天子于其君之朝也,攝而進之曰:“意朕之政教有不得者与!何其
    所臨之民有飢寒不得衣食者,有獄訟而失職者,有賢才而不舉者?”其君
    歸也,乃召其國大夫,告用天子之言,百姓聞之皆喜曰:“此誠天子也!
    何居之深遠而見我之明也,豈可欺哉!”故牧者所以辟四門,明四目,達
    四聰也,是以近者親之,遠者安之。詩曰:“柔遠能邇,以定我王”,此
    之謂矣。
    河間獻王曰:“禹稱民無食,則我不能使也;功成而不利于人,則我
    不能勸也;故疏河以導之,鑿江通于九派,洒五湖而定東海,民亦勞矣,
    然而不怨者,利歸于民也。”
    禹出見罪人,下車問而泣之,左右曰:“夫罪人不順道,故使然焉,
    君王何為痛之至于此也?”禹曰:“堯舜之人,皆以堯舜之心為心;今寡
    人為君也,百姓各自以其心為心,是以痛之。”書曰:“百姓有罪,在予
    一人。”
    虞人与芮人質其成于文王,入文王之境,則見其人民之讓為士大夫;
    入其國則見其士大夫讓為公卿;二國者相謂曰:“其人民讓為士大夫,其
    士大夫讓為公卿,然則此其君亦讓以天下而不居矣。”二國者,未見文王
    之身,而讓其所爭以為閑田而反。孔子曰:“大哉文王之道乎!其不可加
    矣!不動而變,無為而成,敬慎恭己而虞芮自平。”故書曰:“惟文王之
    敬忌。”此之謂也。
    成王与唐叔虞燕居,剪梧桐葉以為圭,而授唐叔虞曰:“余以此封汝
    。”唐叔虞喜,以告周公,周公以請曰:“天子封虞耶?”成王曰:“余
    一与虞戲也。”周公對曰:“臣聞之,天子無戲言,言則史書之,工誦之
    ,士稱之。”于是遂封唐叔虞于晉,周公旦可謂善說矣,一稱而成王益重
    言,明愛弟之義,有輔王室之固。
    當堯之時,舜為司徒,契為司馬,禹為司空,后稷為田疇,夔為樂正
    ,?為工師,伯夷為秩宗,皋陶為大理,益掌驅禽,堯体力便巧不能為一
    焉,堯為君而九子為臣,其何故也?堯知九職之事,使九子者各受其事,
    皆胜其任以成九功,堯遂成厥功以王天下,是故知人者王道也,知事者臣
    道也,王道知人,臣道知事,毋亂舊法而天下治矣。
    湯問伊尹曰:“三公九卿,二十七大夫,八十一元士,知之有道乎?
    ”伊尹對曰:“昔者堯見人而知,舜任人然后知,禹以成功舉之。夫三君
    之舉賢,皆异道而成功,然尚有失者,況無法度而任己,直意用人,必大
    失矣。故君使臣自貢其能,則万一之不失矣,王者何?以選賢。夫王者得
    賢材以自輔,然后治也,雖有堯舜之明,而股肱不備,則主恩不流,化澤
    不行,故明君在上,慎于擇士,務于求賢,設四佐以自輔,有英俊以治官
    ,尊其爵,重其祿,賢者進以顯榮,罷者退而勞力,是以主無遺憂,下無
    邪慝,百官能治,臣下樂職,恩流群生,潤澤草木,昔者虞舜左禹右皋陶
    ,不下堂而天下治,此使能之效也。”
    武王問太公曰:“舉賢而以危亡者,何也?”太公曰:“舉賢而不用
    ,是有舉賢之名,而不得真賢之實也。”武王曰:“其失安在?”太公望
    曰:“其失在君好用小善而已,不得真賢也。”武王曰:“好用小善者何
    如?”太公曰:“君好听譽而不惡讒也,以非賢為賢,以非善為善,以非
    忠為忠,以非信為信;其君以譽為功,以毀為罪;有功者不賞,有罪者不
    罰;多党者進,少党者退;是以群臣比周而蔽賢,百吏群党而多奸;忠臣
    以誹死于無罪,邪臣以譽賞于無功。其國見于危亡。”武王曰:“善!吾
    今日聞誹譽之情矣。”
    武王問太公曰:“得賢敬士,或不能以為治者,何也?”太公對曰:
    “不能獨斷,以人言斷者殃也。”武王曰:“何為以人言斷?”太公對曰
    :“不能定所去,以人言去;不能定所取,以人言取;不能定所為,以人
    言為;不能定所罰,以人言罰;不能定所賞,以人言賞。賢者不必用,不
    肖者不必退,而士不必敬。”武王曰:“善,其為國何如?”太公對曰:
    “其為人惡聞其情,而喜聞人之情;惡聞其惡,而喜聞人之惡;是以不必
    治也。”武王曰:“善。”
    齊桓公問于宁戚曰:“鉑子今年老矣,為棄寡人而就世也,吾恐法令
    不行,人多失職,百姓疾怨,國多盜賊,吾何如而使奸邪不起,民衣食足
    乎?”宁戚對曰:“要在得賢而任之。”桓公曰:“得賢奈何?”宁戚對
    曰:“開其道路,察而用之,尊其位,重其祿,顯其名,則天下之士騷然
    舉足而至矣。”桓公曰:“既以舉賢士而用之矣,微夫子幸而臨之,則未
    有布衣屈奇之士踵門而求見寡人者。”宁戚對曰:“是君察之不明,舉之
    不顯;而用之疑,官之卑,祿之薄也;且夫國之所以不能士者,有五阻焉
    :主不好士,諂諛在旁,一阻也;言便事者,未嘗見用,二阻也;壅塞掩
    蔽,必因近習,然后見察,三阻也;訊獄詰窮其辭,以法過之,四阻也;
    執事适欲,擅國權命,五阻也。去此五阻,則豪俊并興,賢智求處;五阻
    不去,則上蔽吏民之情,下塞賢士之路;是故明王圣主之治,若夫江海無
    不受,故長為百川之主;明王圣君無不容,故安樂而長久。因此觀之,則
    安主利人者,非獨一士也。”桓公曰:“善,吾將著夫五阻以為戒本也。
    ”
    齊景公問于晏子曰:“寡人欲從夫子而善齊國之政。”對曰:“嬰聞
    之,國具官而后政可善。”景公作色曰:“齊國雖小,則何為不具官乎?
    ”對曰:“此非臣之所复也。昔先君桓公,身体墮懈,辭會不給,則隰朋
    侍;左右多過,刑罰不中,則弦章侍;居處肆縱,左右懾畏,則東郭牙侍
    ;田野不修,人民不安,則宁戚侍;軍吏怠,戎士偷,則王子成父侍;德
    義不中,信行衰微,則鉑子侍;先君能以人之長續其短,以人之厚補其薄
    ;是以辭令窮遠而不逆,兵加于有罪而不頓;是故諸侯朝其德而天子致其
    胙。今君之失多矣,未有一士以聞者也,故曰未具。”景公曰:“善。吾
    聞高繚与夫子游,寡人請見之。”晏子曰:“臣聞為地戰者不能成王,為
    祿仕者不能成政;若高繚与嬰為兄弟久矣,未嘗干嬰之過,補嬰之闕,特
    進仕之臣也,何足以補君。”
    燕昭王問于郭隗曰:“寡人地狹人寡,齊人削取八城,匈奴驅馳樓煩
    之下,以孤之不肖,得承宗廟,恐危社稷,存之有道乎?”郭隗曰:“有
    ,然恐王之不能用也。”昭王避席請聞之,郭隗曰:“帝者之臣,其名,
    臣也,其實,師也;王者之臣,其名,臣也,其實,友也;霸者之臣,其
    名,臣也,其實,賓也;危國之臣,其名,臣也,其實,虜也。今王將東
    面,目指气使以求臣,則 役之材至矣;南面听朝,不失揖讓之禮以求臣
    ,則人臣之材至矣;西面等禮相亢,下之以色,不乘勢以求臣,則朋友之
    材至矣;北面拘指,逡巡而退以求臣,則師傅之材至矣。如此則上可以王
    ,下可以霸,唯王擇焉。”燕王曰:“寡人愿學而無師。”郭隗曰:“王
    誠欲興道,隗請為天下之士開路。”于是燕王常置郭隗上坐南面,居三年
    ,蘇子聞之,從周歸燕;鄒衍聞之,從齊歸燕;樂毅聞之,從趙歸燕;屈
    景聞之,從楚歸燕。四子畢至,果以弱燕收鴐蘢辣蝐桷央姓街垂玻菜勻徽
    擼菜淖又戳病曰:“濟濟多士,文王以宁。”此之謂也。
    楚庄王既服鄭伯,敗晉師,將軍子重,三言而不當,庄王歸,過申侯
    之邑,申侯進飯,日中而王不食,申侯請罪,庄王喟然嘆曰:“吾聞之,
    其君賢者也,而又有師者王;其君中君也,而又有師者霸;其君下君也,
    而群臣又莫若君者亡。今我,下君也,而群臣又莫若不谷恐亡,且世不絕
    圣,國不絕賢;天下有賢而我獨不得,若吾生者,何以食為?”故戰服大
    國義從諸侯,戚然憂恐圣知不在乎身,自惜不肖,思得賢佐,日中忘飯,
    可謂明君矣。
    明主者有三懼,一曰處尊位而恐不聞其過,二曰得意而恐驕,三曰聞
    天下之至言而恐不能行,何以識其然也?越王勾踐与吳人戰,大敗之,兼
    有九夷,當是時也,南面而立,近臣三,遠臣五,令群臣曰聞吾過而不告
    者其罪刑,此處尊位而恐不聞其過者也。昔者晉文公楚人戰,大胜之,燒
    其軍,火三日不滅,文公退而有憂色,侍者曰:“君大胜楚,今有憂色,
    何也?”文公曰:“吾聞能以戰胜而安者,其唯圣人乎!若夫詐胜之徒,
    未嘗不危也,吾是以憂。”此得意而恐驕也。昔齊桓公得鉑仲隰朋,辯其
    言,說其義,正月之朝,令具太牢進之先祖,桓公西面而立,鉑仲隰朋東
    面而立,桓公贊曰:“自吾得听二子之言,吾目加明,耳加聰,不敢獨擅
    ,愿荐之先祖。”此聞天下之至言而恐不能行者也。齊景公出獵,上山見
    虎,下澤見蛇,歸召晏子而問之曰:“今日寡人出獵,上山則見虎,下澤
    則見蛇,殆所謂之不祥也。”晏子曰:“國有三不祥,是不与焉,夫有賢
    而不知,一不祥;知而不用,二不祥;用而不任,三不祥也;所謂不祥乃
    若此者也。今山上見虎,虎之室也,下澤見蛇,蛇之穴也,如虎之室,如
    蛇之穴而見之,曷為不祥也。”
    楚庄王好獵,大夫諫曰:“晉楚敵國也,楚不謀晉,晉必謀楚,今王
    無乃耽于樂乎?”王曰:“吾獵將以求士也,其榛皁刺虎豹者,吾是以知
    其勇也;其攫犀搏兕者,吾是以知其勁有力也;罷田而分所得,吾是以知
    其仁也。因是道也而得三士焉,楚國以安。”故曰:苟有志則無非事者,
    此之謂也。湯之時大旱七年,雒坼川竭,煎沙爛石,于是使人持三足鼎,
    祝山川,教之祝曰:政不節耶?使人疾耶?苞苴行耶?讒夫昌耶?宮室營
    耶?女謁盛耶?何不雨之极也,蓋言未已而天大雨,故天之應人,如影之
    隨形,響之效聲者也。詩云:“上下奠瘞,靡神不宗。”言疾旱也。
    殷太戊時,有桑谷生于庭,昏而生,比旦而拱,史請卜之湯廟,太戊
    從之,卜者曰:“吾聞之,祥者福之先者也,見祥而為不善,則福不生;
    殃者禍之先者也,見殃而能為善,則禍不至。”于是乃早朝而晏退,問疾
    吊喪,三日而桑谷自亡。
    高宗者,武丁也,高而宗之,故號高宗,成湯之后,先王道缺,刑法
    違犯,桑谷俱生乎朝,七日而大拱,武丁召其相而問焉,其相曰:“吾雖
    知之,吾弗得言也。聞諸祖己,桑谷者野草也,而生于朝,意者國亡乎?
    ”武丁恐駭,飭身修行,思先王之政,興滅國,繼絕世;舉逸民,明養老
    。三年之后,蠻夷重譯而朝者七國,此之謂存亡繼絕之主,是以高而尊之
    也。
    宋大水,魯人吊之曰:“天降淫雨,溪谷滿盈,延及君地,以憂執政
    ,使臣敬吊。”宋人應之曰:“寡人不佞,齋戒不謹,邑封不修,使人不
    時,天加以殃,又遺君憂,拜命之辱。”君子聞之曰:“宋國其庶几乎!
    ”問曰:“何謂也?”曰:“昔者夏桀殷紂不任其過,其亡也忽焉;成湯
    文武知任其過,其興也勃焉;夫過而改之,是猶不過。故曰其庶几乎!”
    宋人聞之,夙興夜寐,早朝晏退,吊死問疾,戮力宇內。三年,歲丰政平
    ,向使宋人不聞君子之語,則年谷未丰而國未宁,詩曰:“佛時仔肩,示
    我顯德行。”此之謂也。
    楚昭王有疾,卜之曰:“河為祟。”大夫請用三牲焉。王曰:“止,
    古者先王割地制土,祭不過望;江、漢、睢、漳,楚之望也;禍福之至,
    不是過也。不谷雖不德,河非所獲罪也。”遂不祭焉。仲尼聞之曰:“昭
    王可謂知天道矣,其不失國,宜哉!”
    楚昭王之時,有云如飛鳥,夾日而飛三日,昭王患之,使人乘驛東而
    問諸太史州黎,州黎曰:“將虐于王身,以令尹司馬說焉則可。”令尹司
    馬聞之,宿齋沐浴,將自以身禱之焉。王曰:“止,楚國之有不谷也,由
    身之有匈脅也;其有令尹司馬也,由身之有股肱也。匈脅有疾,轉之股肱
    ,庸為去是人也?”
    邾文公卜徙于繹,史曰:“利于民不利于君。”君曰:“苟利于民,
    寡人之利也,天生民而樹之君,以利之也,民既利矣,孤必与焉!”侍者
    曰:“命可長也,君胡不為?”君曰:“命在牧民,死之短長,時也;民
    苟利矣,吉孰大焉。”遂徙于繹。
    楚庄王見天不見妖,而地不出孽,則禱于山川曰:“天其忘予歟?”
    此能求過于天,必不逆諫矣,安不忘危,故能終而成霸功焉。
    湯曰:“藥食先嘗于卑,然后至于貴;藥言先獻于貴,然后聞于卑。
    ”故藥嘗乎卑,然后至乎貴,教也;藥言獻于貴,然后聞于卑,道也。故
    使人味食然后食者,其得味也多;使人味言然后聞言者,其得言也少。是
    以明王之言,必自他听之,必自他聞之,必自他擇之,必自他取之,必自
    他聚之,必自他藏之,必自他行之;故道以數取之為明,以數行之為章,
    以數施之万物為藏。是故求道者不以目而以心,取道者不以手而以耳。
    楚文王有疾,告大夫曰:“鉑饒犯我以義,違我以禮,与處不安,不
    見不思,然吾有得焉,必以吾時爵之;申侯伯,吾所欲者,勸我為之;吾
    所樂者,先我行之。与處、則安,不見、則思,然吾有喪焉,必以吾時遺
    之。”大夫許諾,乃爵鉑饒以大夫,贈申侯伯而行之。
    申侯伯將之鄭,王曰:“必戒之矣,而為人也不仁,而欲得人之政,毋以
    之魯、衛、宋、鄭。”不听,遂之鄭,三年而得鄭國之政,五月而鄭人殺
    之。
    趙簡子与欒激游,將沈于河,曰:“吾嘗好聲色矣,而欒激致之;吾
    嘗好宮室台榭矣,而欒激為之;吾嘗好良馬善御矣,而欒激求之。今吾好
    士六年矣,而欒激未嘗進一人,是進吾過而黜吾善也。”
    或謂趙簡子曰:“君何不更乎?”簡子曰:“諾。”左右曰:“君未
    有過,何更?”君曰:“吾謂是諾,未必有過也,吾將求以來諫者也,今
    我卻之,是卻諫者,諫者必止,我過無日矣。”
    韓武子田,獸已聚矣,田車合矣,傳來告曰:“晉公薨。”武子謂欒
    怀子曰:“子亦知君好田獵也,獸已聚矣,田車合矣,吾可以卒獵而后吊
    乎?”怀子對曰:“范氏之亡也,多輔而少拂,今臣于君,輔也;?于君
    ,拂也,君胡不問于?也?”武子曰:“盈而欲拂我乎?而拂我矣,何必?
    哉?”遂輟田。
    師經鼓琴,魏文侯起舞,賦曰:“使我言而無見違。”師經援琴而撞
    文侯不中,中旒潰之,文侯謂左右曰:“為人臣而撞其君,其罪如何?”
    左右曰:“罪當烹。”提師經下堂一等。師經曰:“臣可一言而死乎?”
    文侯曰:“可。”師經曰:“昔堯舜之為君也,唯恐言而人不違;桀紂之
    為君也,唯恐言而人違之。臣撞桀紂,非撞吾君也。”文侯曰:“釋之!
    是寡人之過也,懸琴于城門以為寡人符,不補旒以為寡人戒。”
    齊景公游于蔞,聞晏子卒,公乘輿素服,驛而驅之,自以為遲,下車
    而趨,知不若車之速,則又乘,比至于國者四下而趨,行哭而往矣,至伏
    尸而號曰:“子大夫日夜責寡人,不遺尺寸,寡人猶且淫u而不收,怨罪
    重積于百姓。今天降禍于齊國,不加寡人而加夫子,齊國之社稷危矣,百
    姓將誰告矣?”
    晏子沒十有七年,景公飲諸大夫酒,公射出質,堂上唱善,若出一口
    ,公作色太息,播弓矢。弦章入,公曰:“章,自吾失晏子,于今十有七
    年,未嘗聞吾過不善,今射出質而唱善者,若出一口。”弦章對曰:“此
    諸臣之不肖也,知不足知君之善,勇不足以犯君之顏色。然而有一焉,臣
    聞之:君好之,則臣服之;君嗜之,則臣食之。夫尺蠖食黃,則其身黃,
    食蒼則其身蒼;君其猶有陷人言乎?”公曰:“善!今日之言,章為君,
    我為臣。”是時海人入魚,公以五十乘賜弦章歸,魚乘塞涂,撫其御之手
    ,曰:“曩之唱善者,皆欲若魚者也。”昔者晏子辭賞以正君,故過失不
    掩,今諸臣諂諛以干利,故出質而唱善如出一口,今所輔于君,未見眾而
    受若魚,是反晏子之義而順諂諛之欲也,固辭魚不受。君子曰:弦章之廉
    ,乃晏子之遺訓也。夫天之生人也,蓋非以為君也;天之立君也,蓋非以
    為位也。夫為人君行其私欲而不顧其人,是不承天意忘其位之所以宜事也
    ,如此者,春秋不予能君而夷狄之,鄭伯惡一人而兼棄其師,故有夷狄不
    君之辭,人主不以此自省,惟既以失實,心奚因知之,故曰:有國者不可
    以不學春秋,此之謂也。
    齊人s其君,魯襄公援戈而起曰:“孰臣而敢殺其君乎?”師懼曰:
    “夫齊君治之不能,任之不肖,縱一人之欲以虐万夫之性,非所以立君也
    。其身死自取之也;今君不愛万夫之命而傷一人之死,奚其過也。其臣已
    無道矣,其君亦不足惜也。”
    孔子曰:“文王似元年,武王似春王,周公似正月,文王以王季為友
    ,以太任為母,以太姒為妃,以武王周公為子,以泰顛閎夭為臣,其本美
    矣。武王正其身以正其國,正其國以正天下,伐無道,刑有罪,一動天下
    正,其事正矣。春致其時,万物皆及生,君致其道,万人皆及治,周公戴
    己而天下順之,其誠至矣。”
    尊君卑臣者,以勢使之也。夫勢失則權傾,故天子失道,則諸侯尊矣
    ;諸侯失政,則大夫起矣;大夫失官,則庶人興矣。由是觀之,上不失而
    下得者,未嘗有也。
    孔子曰:夏道不亡,商德不作;商德不亡,周德不作;周德不亡,春
    秋不作;春秋作而后君子知周道亡也。故上下相虧也,猶水火之相滅也,
    人君不可不察而大盛其臣下,此私門盛而公家毀也,人君不察焉,則國家
    危殆矣。鉑子曰:權不兩錯,政不二門。故曰:脛大于股者難以步,指大
    于臂者難以把,本小末大,不能相使也。
    司城子罕相宋,謂宋君曰:“國家之危定,百姓之治亂,在君行之賞
    罰

    卷二 臣術

    人臣之術,順從而复命,無所敢專,義不苟合,位不苟尊;必有益于
    國,必有補于君;故其身尊而子孫保之。故人臣之行有六正六邪,行六正
    則榮,犯六邪則辱,夫榮辱者,禍福之門也。何謂六正六邪?六正者:一
    曰萌芽未動,形兆未見,昭然獨見存亡之几,得失之要,預禁乎不然之前
    ,使主超然立乎顯榮之處,天下稱孝焉,如此者圣臣也。二曰虛心白意,
    進善信道,勉主以体誼,諭主以長策,將順其美,匡救其惡,功成事立,
    歸善于君,不敢獨伐其勞,如此者良臣也。三曰卑身賤体,夙興夜寐,進
    賢不解,數稱于往古之德行事以厲主意,庶几有益,以安國家社稷宗廟,
    如此者忠臣也。四曰明察幽,見成敗早,防而救之,引而复之,塞其間,
    絕其源,轉禍以為福,使君終以無憂,如此者智臣也。五曰守文奉法,任
    官職事,辭祿讓賜,不受贈遺,衣服端齊,飲食節儉,如此者貞臣也。六
    曰國家昏亂,所為不道,然而敢犯主之顏面,言君之過失,不辭其誅,身
    死國安,不悔所行,如此者直臣也,是為六正也。六邪者:一曰安官貪祿
    ,營于私家,不務公事,怀其智,藏其能,主飢于論,渴于策,猶不肯盡
    節,容容乎与世沈浮上下,左右觀望,如此者具臣也。二曰主所言皆曰善
    ,主所為皆曰可,隱而求主之所好即進之,以快主耳目,偷合苟容与主為
    樂,不顧其后害,如此者諛臣也。三曰中實頗險,外容貌小謹,巧言令色
    ,又心嫉賢,所欲進則明其美而隱其惡,所欲退則明其過而匿其美,使主
    妄行過任,賞罰不當,號令不行,如此者奸臣也。四曰智足以飾非,辯足
    以行說,反言易辭而成文章,內离骨肉之親,外妒亂朝廷,如此者讒臣也
    。五曰專權擅勢,持招國事以為輕重于私門,成党以富其家,又复增加威
    勢,擅矯主命以自顯貴,如此者賊臣也。六曰諂言以邪,墜主不義,朋党
    比周,以蔽主明,入則辯言好辭,出則更复异其言語,使白黑無別,是非
    無間,伺侯可推,而因附然,使主惡布于境內,聞于四鄰,如此者亡國之
    臣也,是謂六邪。賢臣處六正之道,不行六邪之術,故上安而下治,生則
    見樂,死則見思,此人臣之術也。
    湯問伊尹曰:“三公九卿大夫列士,其相去何如?”伊尹對曰:“三
    公者,知通于大道,應變而不窮,辯于万物之情,通于天道者也;其言足
    以調陰陽,正四時,節風雨,如是者舉以為三公,故三公之事,常在于道
    也。九卿者,不失四時通于溝渠,修堤防,樹五谷,通于地理者也;能通
    不能通,能利不能利,如此者舉以為九卿,故九卿之事,常在于德也。大
    夫者,出入与民同眾,取去与民同利,通于人事,行猶舉繩,不傷于言,
    言之于世,不害于身,通于關梁,實于府庫,如是者舉以為大夫,故大夫
    之事常在于仁也。列士者,知義而不失其心,事功而不獨專其賞,忠政強
    諫而無有奸詐,去私立公而言有法度,如是者舉以為列士,故列士之事,
    常在于義也。故道德仁義定而天下正,凡此四者明王臣而不臣。”湯曰:
    “何謂臣而不臣?”伊尹對曰:“君之所不名臣者四:諸父、臣而不名,
    諸兄、臣而不名,先生之臣、臣而不名,盛德之士、臣而不名,是謂大順
    。”
    湯問伊尹曰:“古者所以立三公、九卿、大夫、列士者,何也?”伊
    尹對曰:“三公者,所以參五事也;九卿者,所以參三公也;大夫者,所
    以參九卿也;列士者,所以參大夫也。故參而有參,是謂事宗;事宗不失
    ,外內若一。”
    子貢問孔子曰:“今之人臣孰為賢?”孔子曰:“吾未識也,往者齊
    有鮑叔,鄭有子皮,賢者也。”子貢曰:“然則齊無鉑仲,鄭無子產乎?
    ”子曰:“賜,汝徒知其一,不知其二,汝聞進賢為賢耶?用力為賢耶?
    ”子貢曰:“進賢為賢?”子曰:“然,吾聞鮑叔之進鉑仲也,聞子皮之
    進子產也,未聞鉑仲子產有所進也。”魏文侯且置相,召李克而問焉,曰
    :“寡人將置相,置于季成子与翟触,我孰置而可?”李克曰:“臣聞之
    ,賤不謀貴,外不謀內,疏不謀親,臣者疏賤,不敢聞命。”文侯曰:“
    此國事也,愿与先生臨事而勿辭。”李克曰:“君不察故也,可知矣,貴
    視其所舉,富視其所与,貧視其所不取,窮視其所不為,由此觀之,可知
    矣。”文侯曰:“先生出矣,寡人之相定矣。”李克出,過翟黃,翟黃問
    曰:“吾聞君問相于先生,未知果孰為相?”李克曰:“季成子為相。”
    翟黃作色不說曰:“触失望于先生。”李克曰:“子何遽失望于我,我于
    子之君也,豈与我比周而求大官哉?君問相于我,臣對曰:‘君不察故也
    ,貴視其所舉,富視其所与,貧視其所不取,窮視其所不為,由此觀之可
    知也。’君曰:‘出矣,寡人之相定矣。’以是知季臣子為相。”翟黃不
    說曰:“触何遽不為相乎?西河之守,触所任也;計事內史,触所任也;
    王欲攻中山,吾進樂羊;無使治之臣,吾進先生;無使傅其子,吾進屈侯
    附。触何負于季成子?”李克曰:“不如季成子,季成子食采千鐘,什九
    居外一居中;是以東得卜子夏,田子方,段干木,彼其所舉人主之師也,
    子之所舉,人臣之才也。”翟黃方然而慚曰:“触失對于先生,請自修,
    然后學。”言未卒,而左右言季成子立為相矣,于是翟黃默然變色內慚,
    不敢出,三月也。
    楚令尹死,景公遇成公干曰:“令尹將焉歸?”成公干曰:“殆于屈
    春乎!”景公怒曰:“國人以為歸于我。”成公干曰:“子資少,屈春資
    多,子義獲天下之至憂,而以為友;鳴鶴与芻狗,其知甚少,而子玩之。
    鴟夷子皮日侍于屈春,損頗為友,二人者之智,足以為令尹,不敢專其智
    而委之屈春,故曰:政其歸于屈春乎!”
    田子方渡西河,造翟黃,翟黃乘軒車,載華蓋黃金之勒,約鎮簟席,
    如此者其駟八十乘,子方望之以為人君也,道狹下抵車而待之,翟黃至而
    睹其子方也,下車而趨,自投下風,曰:“触”,田子方曰:“子与!吾
    向者望子疑以為人君也,子至而人臣也,將何以至此乎?”翟黃對曰:“
    此皆君之所以賜臣也,積三十歲故至于此,時以間暇祖之曠野,正逢先生
    。”子方曰:“何子賜車滏之厚也?”翟黃對曰:“昔者西河無守,臣進
    吳起;而西河之外,宁鄴無令,臣進西門豹;而魏無趙患,酸棗無令,臣
    進北門可;而魏無齊憂,魏欲攻中山,臣進樂羊而中山拔;魏無使治之臣
    ,臣進李克而魏國大治。是以進此五大夫者,爵祿倍以故至于此。”子方
    曰:“可,子勉之矣,魏國之相不去子而之他矣。”翟黃對曰:“君母弟
    有公孫季成者,進子夏而君師之,進段干木而君友之,進先生而君敬之,
    彼其所進,師也,友也,所敬者也,臣之所進者,皆守職守祿之臣也,何
    以至魏國相乎?”子方曰:“吾聞身賢者賢也,能進賢者亦賢也,子之五
    舉者盡賢,子勉之矣,子終其次也。”
    齊威王游于瑤台,成侯卿來奏事,從車羅綺甚眾,王望之謂左右曰:
    “來者何為者也?”左右曰:“成侯卿也。”王曰:“國至貧也,何出之
    盛也?”左右曰:“与人者有以責之也,受人者有以易之也。”王試問其
    說,成侯卿至,上謁曰:“忌也。”王不應。又曰:“忌也。”王不應。
    又曰:“忌也。”王曰:“國至貧也,何出之盛也?”成侯卿曰:“赦其
    死罪,使臣得言其說。”王曰:“諾”。對曰:“忌舉田居子為西河而秦
    梁弱,忌舉田解子為南城,而楚人抱羅綺而朝,忌舉黔涿子為冥州,而燕
    人給牲,趙人給盛,忌舉田种首子為即墨,而于齊足究,忌舉北郭刁勃子
    為大士,而九族益親,民益富,舉此數良人者,王枕而臥耳,何患國之貧
    哉?”
    秦穆公使賈人載鹽,征諸賈人,賈人買百里奚以五翼羊之皮,使將車
    之秦,秦穆公觀鹽,見百里奚牛肥,曰:“任重道遠以險,而牛何以肥也
    ?”對曰:“臣飲食以時,使之不以暴;有險,先后之以身,是以肥也。
    ”穆公知其君子也,令有司其沐浴為衣冠与坐,公大悅,异日与公孫支論
    政,公孫支大不宁曰:“君耳目聰明,思慮審察,君其得圣人乎!”公曰
    :“然,吾悅夫奚之言,彼類圣人也。”公孫支遂歸取鷫以賀曰:“君得
    社稷之圣臣,敢賀社稷之福。”公不辭,再拜而受,明日,公孫支乃致上
    卿以讓百里奚曰:“秦國處僻,民陋以愚無知,危亡之本也,臣自知不足
    以處其上,請以讓之。”公不許,公孫支曰:“君不用賓相而得社稷之圣
    臣,君之祿也;臣見賢而讓之,臣之祿也。今君既得其祿矣,而使臣失祿
    可乎?請終致之!”公不許。公孫支曰:“臣不肖而處上位是君失倫也,
    不肖失倫,臣之過,進賢而退不肖,君之明也,今臣處位,廢君之德而逆
    臣之行也,臣將逃。”公乃受之。故百里奚為上卿以制之,公孫支為次卿
    以佐之也。
    趙簡主從晉陽之邯鄲,中路而止,引車吏進問何為止,簡主曰:“董
    安于在后。”吏曰:“此三軍之事也,君奈何以一人留三軍也?”簡主曰
    :“諾。”驅之百步又止,吏將進諫,董安于适至,簡主曰:“秦道之与
    晉國交者,吾忘令人塞之。”董安于曰:“此安于之所為后也。”簡主曰
    :“官之寶璧吾忘令人載之。”對曰:“此安于之所為后也。”簡主可謂
    內省外知人矣哉!故身佚國安,御史大夫周昌曰:“人主誠能如趙簡主,
    朝不危矣。”
    晏子侍于景公,朝寒請進熱食,對曰:“嬰非君之廚養臣也,敢辭。
    ”公曰:“請進服裘。”對曰:“嬰非田澤之臣也,敢辭。”公曰:“然
    ,夫子于寡人奚為者也?”對曰:“社稷之臣也。”公曰:“何謂社稷之
    臣?”對曰:“社稷之臣,能立社稷,辨上下之宜,使得其理;制百官之
    序,使得其宜;作為辭令,可分布于四方。”自是之后,君不以禮不見晏
    子也。
    齊侯問于晏子曰:“忠臣之事其君何若?”對曰:“有難不死,出亡
    不送。”君曰:“裂地而封之,疏爵而貴之;吾有難不死,出亡不送,可
    謂忠乎?”對曰:“言而見用,終身無難,臣何死焉;謀而見從,終身不
    亡,臣何送焉。若言不見用,有難而死之,是妄死也;諫而不見從,出亡
    而送,是詐為也。故忠臣者能納善于君而不能与君陷難者也。”
    晏子朝,乘敝車,駕駑馬,景公見之曰:“嘻!夫子之祿寡耶!何乘
    不任之甚也!”晏子對曰:“賴君之賜,得以壽三族及國交游皆得生焉,
    臣得暖衣飽食,敝車駑馬,以奉其身,于臣足矣。”晏子出,公使梁丘据
    遺之輅車乘馬,三返不受,公不悅,趣召晏子,晏子至,公曰:“夫子不
    受,寡人亦不乘。”晏子對曰:“君使臣臨百官之吏,節其衣服飲食之養
    ,以先齊國之人,然猶恐其侈靡而不顧其行也;今輅車乘馬,君乘之上,
    臣亦乘之下,民之無義,侈其衣食而不顧其行者,臣無以禁之。”遂讓不
    受也。
    景公飲酒,陳桓子侍,望見晏子而复于公曰:“請浮晏子。”公曰:
    “何故也?”對曰:“晏子衣緇布之衣,糜鹿之裘,棧軫之車,而駕駑馬
    以朝,是隱君之賜也。”公曰:“諾。”酌者奉觴而進之曰:“君命浮子
    。”晏子曰:“何故也?”陳桓子曰:“君賜之卿位以尊其身,寵之百万
    以富其家,群臣之爵,莫尊于子,祿莫厚于子;今子衣布衣之衣,糜鹿之
    裘,棧軫之車而駕駑馬以朝,則是隱君之賜也,故浮子。”晏子避席曰:
    “請飲而后辭乎?其辭而后飲乎?”公曰:“辭然后飲。”晏子曰:“君
    賜卿位以顯其身,嬰不敢為顯受也,為行君令也;寵之百万以富其家,嬰
    不敢為富受也,為通君賜也;臣聞古之賢臣有受厚賜而不顧其國族,則過
    之;臨事守職不胜其任,則過之;君之內隸,臣之父兄,若有离散在于野
    鄙者,此臣之罪也;君之外隸,臣之所職,若有播亡在四方者,此臣之罪
    也;兵革不完,戰車不修,此臣之罪也。若夫敝車駑馬以朝主者,非臣之
    罪也,且臣以君之賜,臣父之党無不乘車者,母之党無不足以衣食者,妻
    之党無凍餒者,國之簡士待臣而后舉火者數百家,如此為隱君之賜乎?彰
    君之賜乎?”公曰:“善,為我浮桓子也。”
    晏子方食,君之使者至,分食而食之,晏子不飽,使者返言之景公,
    景公曰:“嘻,夫子之家若是其貧也,寡人不知也,是寡人之過也。”令
    吏致千家之縣一于晏子,晏子再拜而辭,曰:“嬰之家不貧,以君之賜,
    澤覆三族,延及交游,以振百姓,君之賜也厚矣,嬰之家不貧也!嬰聞之
    ,厚取之君而厚施之人,代君為君也,忠臣不為也;厚取之君而藏之,是
    筐隕存也,仁人不為也;厚取之君而無所施之,身死而財遷,智者不為也
    。嬰也聞為人臣,進不事上以為忠,退不克下以為廉,八升之布,一豆之
    食,足矣。”使者三返,遂辭不受也。
    陳成子謂鴟夷子皮曰:“何与常也?”對曰:“君死吾不死,君亡吾
    不亡。”陳成子曰:“然子何以与常?”對曰:“未死去死,未亡去亡,
    其有何死亡矣!從命利君謂之順,從命病君謂之諛,逆命利君謂之忠,逆
    命病君謂之亂,君有過不諫諍,將危國殞社稷也,有能盡言于君,用則留
    之,不用則去之,謂之諫;用則可生,不用則死,謂之諍;有能比和同力
    ,率群下相与強矯君,君雖不安,不能不听,遂解國之大患,除國之大害
    ,成于尊君安國謂之輔;有能亢君之命,反君之事,竊君之重以安國之危
    ,除主之辱攻伐足以成國之大利,謂之弼。故諫諍輔弼之人,社稷之臣也
    ,明君之所尊禮,而君以為己賊;故明君之所賞,君之所殺也。明君好問
    ,君好獨,明君上賢使能而享其功;君畏賢妒能而減其業,罰其忠,而賞
    其賊,夫是之謂至,桀紂之所以亡也。詩云:‘曾是莫听,大命以傾’此
    之謂也。”
    簡子有臣尹綽、赦厥。簡子曰:“厥愛我,諫我必不于眾人中;綽也
    不愛我,諫我必于眾人中。”尹綽曰:“厥也愛君之丑而不愛君之過也,
    臣愛君之過而不愛君之丑。”孔子曰:“君子哉!尹綽,面訾不譽也。”
    高繚仕于晏子,晏子逐之,左右諫曰:“高繚之事夫子,三年曾無以
    爵位,而逐之,其義可乎?”晏子曰:“嬰仄陋之人也,四維之然后能直
    ,今此子事吾三年,未嘗弼吾過,是以逐之也。”
    子貢問孔子曰:“賜為人下,而未知所以為人下之道也?”孔子曰:
    “為人下者,其猶土乎!种之則五谷生焉,掘之則甘泉出焉,草木植焉,
    禽獸育焉,生人立焉,死人入焉,多其功而不言,為人下者,其猶土乎!
    ”
    孫卿曰:“少使長,賤事貴,不肖事賢,此天下之通義也。有人貴而
    不能為人上,賤而羞為人下,此奸人之心也,身不离奸心,而行不离奸道
    ,然而求見譽于眾,不亦難乎?”
    公叔文子問于史叟曰:“武子胜事趙簡子久矣,其寵不解,奚也?”
    史叟曰:“武子胜,博聞多能而位賤,君親而近之,致敏以裁甓柚矗蒼蜆
    拊股保踩胗憊遙渤不見其寵,君賜之祿,知足而辭,故能久也。”
    泰誓曰:“附下而罔上者死,附上而罔下者刑;与聞國政而無益于民
    者退,在上位而不能進賢者逐。”此所以勸善而黜惡也。故傳曰:“傷善
    者國之殘也,蔽善者國之讒也,棰罪者國之賊也。”
    王制曰:“假于鬼神時日卜筮以疑于眾者殺也。”子路為蒲令,備水
    災,与民春修溝瀆,為人煩苦,故予人一簞食,一壺漿,孔子聞之,使子
    貢复之,子路忿然不悅,往見夫子曰:“由也以暴雨將至,恐有水災,故
    与人修溝瀆以備之,而民多匱于食,故与人一簞食一壺漿,而夫子使賜止
    之,何也?夫子止由之行仁也,夫子以仁教而禁其行仁也,由也不受。”
    子曰:“爾以民為餓,何不告于君,發倉廩以給食之;而以爾私饋之,是
    汝不明君之惠,見汝之德義也,速已則可矣,否則爾之受罪不久矣。”子
    路心服而退也。

    卷三 建本

    孔子曰:“君子務本,本立而道生。”夫本不正者末必倚,始不盛者
    終必衰。詩云:“原隰既平,泉流既清”。本立而道生,春秋之義;有正
    春者無亂秋,有正君者無危國,易曰:“建其本而万物理,失之毫厘,差
    以千里”。是故君子貴建本而重立始。
    魏武侯問元年于吳子,吳子對曰:“言國君必慎始也。”“慎始奈何
    ?”曰:“正之”,“正之奈何?”曰:“明智,智不明,何以見正,多
    聞而擇焉,所以明智也。是故古者君始听治,大夫而一言,士而一見,庶
    人有謁必達,公族請問必語,四方至者勿距,可謂不壅蔽矣;分祿必及,
    用刑必中,君心必仁,思君之利,除民之害,可謂不失民眾矣;君身必正
    ,近臣必選,大夫不兼官,執民柄者不在一族,可謂不權勢矣。此皆春秋
    之意,而元年之本也。”
    孔子曰:行身有六本,本立焉,然后為君子立体有義矣,而孝為本;
    處喪有禮矣,而哀為本;戰陣有隊矣,而勇為本;政治有理矣,而能為本
    ;居國有禮矣,而嗣為本;生才有時矣,而力為本。置本不固,無務丰末
    ;親戚不悅,無務外交;事無終始,無務多業;聞記不言,無務多談;比
    近不說,無務修遠。是以反本修邇,君子之道也。天之所生,地之所養,
    莫貴乎人人之道,莫大乎父子之親,君臣之義;父道圣,子道仁,君道義
    ,臣道忠。賢父之于子也,慈惠以生之,教誨以成之,養其誼,藏其偽,
    時其節,慎其施;子年七歲以上,父為之擇明師,選良友,勿使見惡,少
    漸之以善,使之早化。故賢子之事親,發言陳辭,應對不悖乎耳;趣走進
    退,容貌不悖乎目;卑体賤身,不悖乎心。君子之事親以積德,子者親之
    本也,無所推而不從命,推而不從命者,惟害親者也,故親之所安子皆供
    之。賢臣之事君也,受官之日,以主為父,以國為家,以士人為兄弟;故
    苟有可以安國家,利人民者不避其難,不憚其勞,以成其義;故其君亦有
    助之以遂其德。夫君臣之与百姓,轉相為本,如循環無端,夫子亦云,人
    之行莫大于孝;孝行成于內而嘉號布于外,是謂建之于本而榮華自茂矣。
    君以臣為本,臣以君為本;父以子為本,子以父為本,棄其本,榮華槁矣
    。
    子路曰:負重道遠者,不擇地而休;家貧親老者,不擇祿而仕。昔者
    由事二親之時,常食藜藿之實而為親負米百里之外,親沒之后,南游于楚
    ,從車百乘,積粟万鐘,累茵而坐,列鼎而食,愿食藜藿負米之時不可复
    得也;枯魚銜索,几何不蠹,二親之壽,忽如過隙,草木欲長,霜露不使
    ,賢者欲養,二親不待,故曰:家貧親老不擇祿而仕也。
    伯禽与康叔封朝于成王,見周公三見而三笞,康叔有駭色,謂伯禽曰
    :“有商子者,賢人也,与子見之。”康叔封与伯禽見商子曰:“某某也
    ,日吾二子者朝乎成王,見周公三見而三笞,其說何也?”商子曰:“二
    子盍相与觀乎南山之陽有木焉,名曰橋。”二子者往觀乎南山之陽,見橋
    竦焉實而仰,反以告乎商子,商子曰:“橋者父道也。”商子曰:“二子
    盍相与觀乎南山之陰,有木焉,名曰梓。”二子者往觀乎南山之陰,見梓
    勃焉實而俯,反以告商子,商子曰:“梓者、子道也。”二子者明日見乎
    周公,入門而趨,登堂而跪,周公拂其首,勞而食之曰:“安見君子?”
    二子對曰:“見商子。”周公曰:“君子哉!商子也。”
    曾子芸瓜而誤斬其根,曾皙怒,援大杖擊之,曾子仆地;有頃蘇,蹶
    然而起,進曰:“曩者參得罪于大人,大人用力教參,得無疾乎!”退屏
    鼓琴而歌,欲令曾皙听其歌聲,令知其平也。孔子聞之,告門人曰:“參
    來勿內也!”曾子自以無罪,使人謝孔子,孔子曰:“汝聞瞽叟有子名曰
    舜,舜之事父也,索而使之,未嘗不在側,求而殺之,未嘗可得;小棰則
    待,大棰則走,以逃暴怒也。今子委身以待暴怒,立体而不去,殺身以陷
    父,不義不孝,孰是大乎?汝非天子之民邪?殺天子之民罪奚如?”以曾
    子之材,又居孔子之門,有罪不自知處義,難乎!
    伯俞有過,其母笞之泣,其母曰:“他日笞子未嘗見泣,今泣何也?
    ”對曰:“他日俞得罪笞嘗痛,今母力不能使痛,是以泣。”故曰父母怒
    之,不作于意,不見于色,深受其罪,使可哀怜,上也;父母怒之,不作
    于意,不見其色,其次也;父母怒之,作于意,見于色,下也。
    成人有德,小子有造,大學之教也;時禁于其未發之曰預,因其可之
    曰時,相觀于善之曰磨,學不陵節而施之曰馴。發然后禁,則I格而不胜
    ;時過然后學,則勤苦而難成;雜施而不遜,則坏亂而不治;獨學而無友
    ,則孤陋而寡聞。故曰有昭辟雍,有賢泮宮,田里周行,濟濟鏘鏘,而相
    從執質,有族以文。
    周召公年十九,見正而冠,冠則可以為方伯諸侯矣。人之幼稚童蒙之
    時,非求師正本,無以立身全性。夫幼者必愚,愚者妄行;愚者妄行,不
    能保身,孟子曰:人皆知以食愈飢,莫知以學愈愚,故善材之幼者必勤于
    學問以修其性。今人誠能砥礪其材,自誠其神明,睹物之應,信道之要,
    觀始卒之端,覽無外之境,逍遙乎無方之內,彷徉乎塵埃之外,卓然獨立
    ,超然絕世,此上圣之所游神也。然晚世之人,莫能閑居心思,鼓琴讀書
    ,追觀上古,友賢大夫;學問講辯日以自虞,疏遠世事分明利害,籌策得
    失,以觀禍福,設義立度,以為法式;窮追本末,究事之情,死有遺業,
    生有榮名;此皆人材之所能建也,然莫能為者,偷慢懈墮,多暇日之故也
    ,是以失本而無名。夫學者,崇名立身之本也,儀狀齊等而飾貌者好,質
    性同倫而學問者智;是故砥礪琢磨非金也,而可以利金;詩書壁立,非也
    ,而可以厲心。夫問訊之士,日夜興起,厲中益知,以分別理,是故處身
    則全,立身不殆,士苟欲深明博察,以垂榮名,而不好問訊之道,則是伐
    智本而塞智原也,何以立軀也?騏驥雖疾,不遇伯樂,不致千里;干將雖
    利,非人力不能自斷焉;烏號之弓雖良,不得排檠,不能自任;人才雖高
    ,不務學問,不能致圣。水積成川,則蛟龍生焉;土積成山,則豫樟生焉
    ;學積成圣,則富貴尊顯至焉。千金之裘,非一狐之皮;台廟之榱,非一
    木之枝;先王之法,非一士之智也。故曰:訊問者智之本,思慮者智之道
    也。中庸曰:“好問近乎智,力行近乎仁,知恥近乎勇。”積小之能大者
    ,其惟仲尼乎!學者所以反情治性盡才者也,親賢學問,所以長德也;論
    交合友,所以相致也。詩云:“如切如磋,如琢如磨”,此之謂也。
    今夫辟地殖谷,以養生送死,銳金石,雜草藥以攻疾,各知构室屋以
    避暑雨,累台榭以避潤濕,入知親其親,出知尊其君,內有男女之別,外
    有朋友之際,此圣人之德教,儒者受之傳之,以教誨于后世。今夫晚世之
    惡人,反非儒者曰:何以儒為?如此人者,是非本也,譬猶食谷衣絲,而
    非耕織者也;載于船車,服而安之,而非主匠者也;食于釜甑,須以生活
    ,而非陶冶者也;此言違于情而行蒙于心者也。如此人者,骨肉不親也,
    秀士不友也,此三代之棄民也,人君之所不赦也。故詩云:“投畀豺虎,
    豺虎不食,投畀有北,有北不受,投畀有昊。”此之謂也。
    孟子曰:人知糞其田,莫知糞其心;糞田莫過利曲得粟,糞心易行而
    得其所欲。何謂糞心?博學多聞;何謂易行?一性止淫也。
    子思曰:學所以益才也,礪所以致刃也,吾嘗幽處而深思,不若學之
    速;吾嘗而望,不若登高之博見。故順風而呼,聲不加疾而聞者眾;登丘
    而招,臂不加長而見者遠。故魚乘于水,鳥乘于風,草木乘于時。
    孔子曰:可以与人終日而不倦者,其惟學乎!其身体不足觀也,其勇
    力不足憚也,其先祖不足稱也,其族姓不足道也;然而可以聞四方而昭于
    諸侯者,其惟學乎!詩曰:“不僭不亡,率由舊章”,夫學之謂也。
    孔子曰:鯉,君子不可以不學,見人不可以不飾;不飾則無根,無根
    則失理;失理則不忠,不忠則失禮,失禮則不立。夫遠而有光者,飾也;
    近而逾明者,學也。譬之如污池,水潦注焉,菅蒲生之,從上觀之,知其
    非源也。
    公扈子曰:有國者不可以不學,春秋,生而尊者驕,生而富者傲,生
    而富貴,又無鑒而自得者鮮矣。春秋,國之鑒也,春秋之中,s君三十六
    ,亡國五十二,諸侯奔走不得保社稷者甚眾,未有不先見而后從之者也。
    晉平公問于師曠曰:“吾年七十欲學,恐已暮矣。”師曠曰:“何不
    炳燭乎?”平公曰:“安有為人臣而戲其君乎?”師曠曰:“盲臣安敢戲
    其君乎?臣聞之,少而好學,如日出之陽;壯而好學,如日中之光;老而
    好學,如炳燭之明。炳燭之明,孰与昧行乎?”平公曰:“善哉!”
    河間獻王曰:“湯稱學圣王之道者,譬如日焉;靜居獨思,譬如火焉
    。夫舍學圣王之道,若舍日之光,何乃獨思火之明也;可以見小耳,未可
    用大知,惟學問可以廣明德慧也。”
    梁丘据謂晏子曰:“吾至死不及夫子矣。”晏子曰:“嬰聞之,為者
    常成,行者常至;嬰非有异于人也,常為而不置,常行而不休者,故難及
    也。”
    宁越,中牟鄙人也,苦耕之勞,謂其友曰:“何為而可以免此苦也?
    ”友曰:“莫如學,學二十年則可以達矣。”宁越曰:“請十五歲,人將
    休,吾將不休;人將臥,吾不敢臥。”十五歲學而周威公師之。夫走者之
    速也,而過二里止;步者之遲也,而百里不止。今宁越之材而久不止,其
    為諸侯師,豈不宜哉!
    孔子謂子路曰:“汝何好?”子路曰:“好長劍。”孔子曰:“非此
    之問也,請以汝之所能,加之以學,豈可及哉!”子路曰:“學亦有益乎
    ?”孔子曰:“夫人君無諫臣則失政;士無教交,則失德;狂馬不釋其策
    ,操弓不返于檠;木受繩則直,人受諫則圣;受學重問,孰不順成;毀仁
    惡士,且近于刑。君子不可以不學。”子路曰:“南山有竹,弗揉自直,
    斬而射之,通于犀革,又何學為乎?”孔子曰:“括而羽之,鏃而砥礪之
    ,其入不益深乎?”子路拜曰:“敬受教哉!”
    子路問于孔子曰:“請釋古之學而行由之意,可乎?”孔子曰:“不
    可,昔者東夷慕諸夏之義,有女,其夫死,為之內私婿,終身不嫁,不嫁
    則不嫁矣,然非貞節之義也;蒼梧之弟,娶妻而美好,請与兄易,忠則忠
    矣,然非禮也。今子欲釋古之學而行子之意,庸知子用非為是,用是為非
    乎!不順其初,雖欲悔之,難哉!”
    丰牆磽下未必崩也,流行潦至,坏必先矣;樹本淺,根垓不深,未必
    橛也,飄風起,暴雨至,拔必先矣。君子居于是國,不崇仁義,不尊賢臣
    ,未必亡也;然一旦有非常之變,車馳人走,指而禍至,乃始干喉劍慚鎏
    於荊彩稈商炱渚戎矗膊灰嗄押靠鬃釉唬骸安慎其前,而悔其后,雖悔無及
    矣。”詩曰:“啜其泣矣,何嗟及矣”?言不先正本而成憂于末也。
    虞君問盆成子曰:“今工者久而巧,色者老而衰;今人不及壯之時,
    益積心技之術,以備將衰之色,色者必盡乎老之前,知謀無以异乎幼之時
    。可好之色,彬彬乎且盡,洋洋乎安托無能之軀哉!故有技者不累身而未
    嘗滅,而色不得以常茂。”
    齊桓公問管仲曰:“王者何貴?”曰:“貴天。”桓公仰而視天,管
    仲曰:“所謂天者,非謂蒼蒼莽莽之天也;君人者以百姓為天,百姓与之
    則安,輔之則強,非之則危,背之則亡。”詩云:“人而無良,相怨一方
    ”。民怨其上,不遂亡者,未之有也。
    河間獻王曰:“管子稱倉廩實,知禮節;衣食足,知榮辱。”夫谷者
    ,國家所以昌熾,士女所以姣好,禮義所以行,而人心所以安也。尚書五
    福以富為始,子貢問為政,孔子曰:富之,既富乃教之也,此治國之本也
    。
    文公見咎季,其廟傅于西牆,公曰:“孰處而西?”對曰:“君之老
    臣也。”公曰:“西益而宅。”對曰:“臣之忠,不如老臣之力,其牆坏
    而不筑。”公曰:“何不筑?”對曰:“一日不稼,百日不食。”公出而
    告之仆,仆首于軫曰:“呂刑云:‘一人有慶,兆民賴之。’君之明,群
    臣之福也,乃令于國曰:毋淫宮室,以妨人宅,板筑以時,無奪農功。”
    楚恭王多寵子,而世子之位不定。屈建曰:“楚必多亂。夫一兔走于
    街,万人追之;一人得之,万人不复走。分未定,則一兔走,使万人扰;
    分已定,則雖貪夫知止。今楚多寵子而嫡位無主,亂自是生矣。夫世子者
    ,國之基也,而百姓之望也;國既無基,又使百姓失望,絕其本矣。本絕
    則撓亂,猶兔走也。”恭王聞之,立康王為太子,其后猶有令尹圍,公子
    棄疾之亂也。
    晉襄公薨,嗣君少,趙宣子相,謂大夫曰:“立少君,懼多難,請立
    雍;雍長,出在秦,秦大,足以為援。”賈季曰:“不若公子樂,樂有寵
    于國,先君愛而仕之翟,翟是以為援。”穆嬴抱太子以呼于庭曰:“先君
    奚罪,其嗣亦奚罪,舍嫡嗣不立而外求君子。”出朝抱以見宣子曰:“惡
    難也,故欲立長君,長君立而少君壯,難乃至矣。”宣子患之,遂立太
    子也。
    趙簡子以襄子為后,董安于曰:“無恤不才,今以為后,何也?”簡
    子曰:“是其人能為社稷忍辱。”异日,智伯与襄子飲,而灌襄子之首,
    大夫請殺之,襄子曰:“先君之立我也,曰能為社稷忍辱,豈曰能刺人哉
    !”處十月,智伯圍襄子于晉陽,襄子疏隊而擊之,大敗智伯,漆其首以
    為酒器。

    卷四 立節

    士君子之有勇而果于行者,不以立節行誼,而以妄死非名,豈不痛哉
    !士有殺身以成仁,触害以立義,倚于節理而不議死地;故能身死名流于
    來世,非有勇斷,孰能行之?子路曰:“不能勤苦,不能恬貧窮,不能輕
    死亡;而曰我能行義,吾不信也。”昔者申包胥立于秦庭,七日七夜喪不
    絕聲,遂以存楚,不能勤苦,安能行此!曾子布衣袍未得完,糟糠之食,
    藜藿之羹未得飽,義不合則辭上卿,不恬貧窮,安能行此!比干將死而諫
    逾忠,伯夷叔齊餓死于首陽山而志逾彰,不輕死亡,安能行此!故夫士欲
    立義行道,毋論難易而后能行之;立身著名,無顧利害而后能成之。詩曰
    :“彼其之子,碩大且篤。”非良篤修激之君子,其誰能行之哉?王子比
    干殺身以作其忠,伯夷叔齊殺身以成其廉,此三子者,皆天下之通士也,
    豈不愛其身哉?以為夫義之不立,名之不著是士之恥也,故殺身以遂其行
    。因此觀之,卑賤貧窮,非士之恥也。夫士之所恥者,天下舉忠而士不与
    焉,舉信而士不与焉,舉廉而士不与焉;三者在乎身,名傳于后世,与日
    月并而不息,雖無道之世不能污焉。然則非好死而惡生也,非惡富貴而樂
    貧賤也,由其道,遵其理,尊貴及己,士不辭也。孔子曰:“富而可求,
    雖執鞭之士,吾亦為之;富而不可求,從吾所好。”大圣之操也。詩云:
    “我心匪石,不可轉也,我心匪席,不可卷也。”言不失己也;能不失己
    ,然后可与濟難矣,此士君子之所以越眾也。
    楚伐陳,陳西門燔,因使其降民修之,孔子過之,不軾,子路曰:“
    禮過三人則下車,過二人則軾;今陳修門者人數眾矣,夫子何為不軾?”
    孔子曰:“丘聞之,國亡而不知,不智;知而不爭,不忠;忠而不死,不
    廉;今陳修門者不行一于此,丘故不為軾也。”
    孔子見齊景公,景公致廩丘以為養,孔子辭不受,出謂弟子曰:“吾
    聞君子當功以受祿,今說景公,景公未之行而賜我廩丘,其不知丘亦甚矣
    !”遂辭而行。曾子衣弊衣以耕,魯君使人往致邑焉,曰:“請以此修衣
    。”曾子不受,反复往,又不受,使者曰:“先生非求于人,人則獻之,
    奚為不受?”曾子曰:“臣聞之,受人者畏人,予人者驕人;縱子有賜我
    驕也,我能勿畏乎?”終不受。孔子聞之曰:“參之言,足以全其節也。
    ”子思居于衛,?袍無表,二旬而九食,田子方聞之,使人遺狐白之裘,
    恐其不受,謂之曰:“吾假人,遂忘之;吾与人也,如棄之。”子思辭而
    不受,子方曰:“我有子無,何故不受?”子思曰:“急聞之,妄与不如
    棄物于溝壑,急雖貧也,不忍以身為溝壑,是以不敢當也。”
    宋襄公茲父為桓公太子,桓公有后妻子,曰公子目夷,公愛之,茲父
    為公愛之也。欲立之,請于公曰:“請使目夷立,臣為之相以佐之。”公
    曰:“何故也?”對曰:“臣之舅在衛,愛臣,若終立則不可以往,絕跡
    于衛,是背母也。且臣自知不足以處目夷之上。”公不許,強以請公,公
    許之,將立公子目夷,目夷辭曰:“兄立而弟在下,是其義也;今弟立而
    兄在下,不義也;不義而使目夷為之,目夷將逃。”乃逃之衛,茲父從之
    。三年,桓公有疾,使人召茲父,若不來,是使我以憂死也,茲父乃反,
    公复立之以為太子,然后目夷歸也。
    晉驪姬譖太子申生于獻公,獻公將殺之,公子重耳謂申生曰:“為此
    者非子之罪也,子不進辭,辭之必免于罪。”申生曰:“不可,我辭之,
    驪姬必有罪矣,吾君老矣,微驪姬寢不安席,食不甘味,如何使吾君以恨
    終哉!”重耳曰:“不辭則不若速去矣。”申生曰:“不可,去而免于此
    ,是惡吾君也;夫彰父之過而取美諸侯,孰肯納之?入困于宗,出困于逃
    ,是重吾惡也。吾聞之,忠不暴君,智不重惡,勇不逃死,如是者,吾以
    身當之。”遂伏劍死。君子聞之曰:“天命矣夫世子!”詩曰:“萋兮斐
    兮,成是貝錦。彼譖人者,亦已太甚!”
    晉獻公之時,有士焉,曰狐突,傅太子申生,公立驪姬為夫人,而國
    多憂,狐突稱疾不出。六年,獻公以譖誅太子,太子將死,使人謂狐突曰
    :“吾君老矣,國家多難,傅一出以輔吾君,申生受賜以死不恨。”再拜
    稽首而死。狐突乃复事獻公,三年,獻公卒,狐突辭于諸大夫曰:“突受
    太子之詔,今事終矣,与其久生亂世也,不若死而報太子。”乃歸自殺。
    楚平王使奮揚殺太子建,未至而遣之,太子奔宋,王召奮揚,使城父
    人執之以至,王曰:“言出于予口,入于爾耳,誰告建也?”對曰:臣告
    之,王初命臣曰:“事建如事余,臣不佞,不能貳也;奉初以還,故遣之
    ,已而悔之,亦無及也。”王曰:“而敢來,何也?”對曰:“使而失命
    ,召而不來,是重過也,逃無所入。”王乃赦之。
    晉靈公暴,趙宣子驟諫,靈公患之,使稦之彌賊之;稦之彌晨往,則
    寢門辟矣,宣子盛服將朝,尚早,坐而假寢,之彌退,嘆而言曰:“不忘
    恭敬,民之主也。賊民之主,不忠;棄君之命,不信。有一于此,不如死
    也。”遂触槐而死。
    齊人有子蘭子者,事白公胜,胜將為難,乃告子蘭子曰:“吾將舉大
    事于國,愿与子共之。”子蘭子曰:“我事子而与子殺君,是助子之不義
    也;畏患而去子,是遁子于難也。故不与子殺君以成吾義,契領于庭,以
    遂吾行。”
    楚有士申鳴者,在家而養其父,孝聞于楚國,王欲授之相,申鳴辭不
    受,其父曰:“王欲相汝,汝何不受乎?”申鳴對曰:“舍父之孝子而為
    王之忠臣,何也?”其父曰:“使有祿于國,立義于庭,汝樂吾無憂矣,
    吾欲汝之相也。”申鳴曰:“諾。”遂入朝,楚王因授之相。居三年,白
    公為亂,殺司馬子期,申鳴將往死之,父止之曰:“棄父而死,其可乎?
    ”申鳴曰:“聞夫仕者身歸于君而祿歸于親,今既去子事君,得無死其難
    乎?”遂辭而往,因以兵圍之。白公謂石乞曰:“申鳴者,天下之勇士也
    ,今以兵圍我,吾為之奈何?”石乞曰:“申鳴者,天下之孝子也,往劫
    其父以兵,申鳴聞之必來,因与之語。”白公曰:“善。”則往取其父,
    持之以兵,告申鳴曰:“子与吾,吾与子分楚國;子不与吾,子父則死矣
    。”申鳴流涕而應之曰:“始吾父之孝子也,今吾君之忠臣也;吾聞之也
    ,食其食者死其事,受其祿者畢其能;今吾已不得為父之孝子矣,乃君之
    忠臣也,吾何得以全身!”援桴鼓之,遂殺白公,其父亦死,王賞之金百
    斤,申鳴曰:“食君之食,避君之難,非忠臣也;定君之國,殺臣之父,
    非孝子也。名不可兩立,行不可兩全也,如是而生,何面目立于天下。”
    遂自殺也。
    齊庄公且伐莒,為車五乘之賓,而杞梁華舟獨不与焉,故歸而不食,
    其母曰:“汝生而無義,死而無名,則雖非五乘,孰不汝笑也?汝生而有
    義,死而有名,則五乘之賓盡汝下也。”趣食乃行,杞梁華舟同車侍于庄
    公而行至莒,莒人逆之,杞梁華舟下斗,獲甲首三百,庄公止之曰:“子
    止,与子同齊國。”杞梁華舟曰:“君為五乘之賓,而舟梁不与焉,是少
    吾勇也;臨敵涉難,止我以利,是污吾行也;深入多殺者,臣之事也,齊
    國之利,非吾所知也。”遂進斗,坏軍陷陣,三軍弗敢當,至莒城下,莒
    人以炭置地,二人立有間,不能入。隰侯重為右曰:“吾聞古之士,犯患
    涉難者,其去遂于物也,來,吾菖子。”隰侯重仗J伏炭,二子乘而入,
    顧而哭之,華舟后息。杞梁曰:“汝無勇乎?何哭之久也?”華舟曰:“
    吾豈無勇哉,是其勇与我同也,而先吾死,是以哀之。”莒人曰:“子毋
    死,与子同莒國。”杞梁華舟曰:“去國歸敵,非忠臣也;去長受賜,非
    正行也;且雞鳴而期,日中而忘之,非信也。深入多殺者,臣之事也,莒
    國之利非吾所知也。”遂進斗,殺二十七人而死。其妻聞之而哭,城為之
    禲A而隅為之崩。此非所以起也。
    越甲至齊,雍門子狄請死之,齊王曰:“鼓鐸之聲未聞,矢石未交,
    長兵未接,子何務死之?為人臣之禮邪?”雍門子狄對曰:“臣聞之,昔
    者王田于囿,左轂鳴、車右請死之,而王曰:‘子何為死?’車右對曰:
    ‘為其鳴吾君也。’王曰:‘左轂鳴者工師之罪也,子何事之有焉?’車
    右曰:‘臣不見工師之乘而見其鳴吾君也。’遂刎頸而死,知有之乎?”
    齊王曰:“有之。”雍門子狄曰:“今越甲至,其鳴吾君也,豈左轂之下
    哉?車右可以死左轂,而臣獨不可以死越甲也?”遂刎頸而死。是日越人
    引甲而退七十里,曰:“齊王有臣,鈞如雍門子狄,擬使越社稷不血食。
    ”遂引甲而歸,齊王葬雍門子狄以上卿之禮。
    楚人將与吳人戰,楚兵寡而吳兵眾,楚將軍子囊曰:“我擊此國必敗
    ,辱君虧地,忠臣不忍為也。”不复于君,黜兵而退,至于國郊,使人复
    于君曰:“臣請死!”君曰:“子大夫之遁也,以為利也,而今誠利,子
    大夫毋死!”子囊曰:“遁者無罪,則后世之為君臣者,皆入不利之名而
    效臣遁,若是則楚國終為天下弱矣,臣請死。”退而伏劍。君曰:“誠
    如此,請成子大夫之義。”乃為桐棺三寸,加斧質其上,以于國。
    宋康公攻阿,屠單父,成公趙曰:“始吾不自知,以為在千乘則万乘
    不敢伐,在万乘則天下不敢圖。今趙在阿而宋屠單父,則是趙無以自立也
    。且往誅宋!”趙遂入宋,三月不得見。或曰:“何不因鄰國之使而見之
    。”成公趙曰:“不可,吾因鄰國之使而刺之,則使后世之使不信,荷節
    之信不用,皆曰趙使之然也,不可!”或曰:“何不因群臣道徒處之士而
    刺之。”成公趙曰:“不可,吾因群臣道徒處之士而刺之,則后世之臣不
    見信,辯士不見顧,皆曰趙使之然也。不可!吾聞古之士怒則思理,危不
    忘義,必將正行以求之耳。”期年,宋康公病死,成公趙曰:“廉士不辱
    名,信士不惰行,今吾在阿,宋屠單父,是辱名也;事誅宋王,期年不得
    ,是惰行也。吾若是而生,何面目而見天下之士。”遂立槁于彭山之上。
    佛鵝用中牟之縣畔,設祿邑炊鼎曰:“与我者受邑,不与我者其烹。
    ”中牟之士皆与之。城北余子田基獨后至,?衣將入鼎曰:“基聞之,義
    者軒冕在前,非義弗受;斧鉞于后,義死不避。”遂?衣將入鼎,佛鵝播
    而之趙,簡子屠中牟,得而取之,論有功者,用田基為始,田基曰:“吾
    聞廉士不恥人,如此而受中牟之功,則中牟之士終身慚矣。”襁負其母,
    南徙于楚,楚王高其義待以司馬。
    齊崔杼s庄公,邢蒯理使晉而反,其仆曰:“崔杼s庄公,子將奚如
    ?”邢蒯理曰:“驅之,將入死而報君。”其仆曰:“君之無道也,四鄰
    諸侯莫不聞也,以夫子而死之不亦難乎?”邢蒯理曰:“善能言也,然亦
    晚矣,子早言我,我能諫之,諫不听我能去,今既不諫又不去;吾聞食其
    祿者死其事,吾既食亂君之祿矣,又安得治君而死之?”遂驅車入死。其
    仆曰:“人有亂君,人猶死之;我有治長,可毋死乎?”乃結轡自刎于車
    上。君子聞之曰:“邢蒯理可謂守節死義矣;死者人之所難也,仆夫之死
    也,雖未能合義,然亦有志之意矣,詩云:‘夙夜匪懈,以事一人,’邢
    生之謂也。孟子曰:‘勇士不忘喪其元,’仆夫之謂也。”
    燕昭王使樂毅伐齊,閔王亡,燕之初入齊也,聞蓋邑人王b賢,令于
    三軍曰:“環蓋三十里毋入。”以b之故,已而使人謂b曰:“齊人多高
    子之義,吾以子為將,封子万家。”
    b 固謝燕人,燕人曰:“子不听,吾引三軍而屠蓋邑。”王曰:“忠臣
    不事二君,貞女不更二夫;齊王不听吾諫,故退而耕于野。國既破亡,吾
    不能存,今又劫之以兵,為君將,是助桀為暴也,与其生而無義,固不如
    烹。”遂懸其軀于樹枝,自奮絕而死,齊亡,大夫聞之曰:“王b布衣義
    猶不背齊向燕,況在位食祿者乎?”乃相聚如莒,求諸公子,立為襄王。
    左儒友于杜伯,皆臣周宣王,宣王將殺杜伯而非其罪也,左儒爭之于
    王,九复之而王弗許也,王曰:“別君而异友,斯汝也。”左儒對曰:“
    臣聞之,君道友逆,則順君以誅友;友道君逆,則率友以違君。”王怒曰
    :“易而言則生,不易而言則死。”左儒對曰:“臣聞古之士不枉義以從
    死,不易言以求生,故臣能明君之過,以死杜伯之無罪。”王殺杜伯,左
    儒死之。
    莒穆公有臣曰朱厲附,事穆公,不見識焉,冬處于山林食杼栗,夏處
    于洲澤食菱藕。穆公以難死,朱厲附將往死之。其友曰:“子事君而不見
    識焉,今君難吾子死之,意者其不可乎!”朱厲附曰:“始我以為君不吾
    知也,今君死而我不死,是果不知我也;吾將死之,以激天下不知其臣者
    。”遂往死之。
    楚庄王獵于云夢,射科雉得之,申公子倍攻而奪之,王將殺之,大夫
    諫曰:“子倍自好也,爭王雉必有說,王姑察之。”不出三月,子倍病而
    死。之戰,楚大胜晉,歸而賞功,申公子倍之弟請賞于王曰:“人之有功
    也,賞于車下。”王曰:“奚謂也?”對曰:“臣之兄讀故記曰:射科雉
    者不出三月必死,臣之兄爭而得之,故夭死也。”王命發乎府而視之,于
    記果有焉,乃厚賞之。也;賞當則賢人勸,罰得則奸人止;賞罰不當,則
    賢人不勸,奸人不止,奸邪比周,欺上蔽主,以爭爵祿,不可不慎也。夫
    賞賜讓与者,人之所好也,君自行之;刑罰殺戮者,人之所惡也,臣請當
    之。”君曰:“善,子主其惡,寡人行其善,吾知不為諸侯笑矣。”于是
    宋君行賞賜而与子罕刑罰,國人知刑戮之威,專在子罕也,大臣親也,百
    姓附之,居期年,子罕逐其君而尊其政,故曰:無弱君無強大夫。老子曰
    :“魚不可脫于淵,國之利器,不可以借人。”此之謂也。

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    詩品

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    詩品

    氣之動物,物之感人,故搖蕩性情,行諸舞詠。照燭三才,暉麗萬有,靈
    衹待之以致饗,幽微藉之以昭告,動天地,感鬼神,莫近於詩。昔〈南風
    〉之詞,〈卿雲〉之頌,厥義敻矣。夏歌曰:「鬱陶乎予心。」楚謠曰:
    「名予曰正則。」雖詩體未全,然是五言之濫觴也。逮漢李陵,始著五言
    之目矣。古詩眇邈,人世難詳,推其文體,固是炎漢之製,非衰周之倡也
    。自王、揚、枚、馬之徒,詞賦競爽,而吟詠靡聞。從李都尉迄班婕妤,
    將百年間,有婦人焉,一人而已。詩人之風,頓已缺喪。東京二百載中,
    惟有班固〈詠史〉,質木無文。降及建安,曹公父子篤好斯文,平原兄弟
    鬱為文棟,劉楨、王粲為其羽翼。次有攀龍托鳳,自致於屬車者,蓋將百
    計。彬彬之盛,大備於時矣。爾後陵遲衰微,迄於有晉。太康中,三張、
    二陸、兩潘、一左,勃爾復興,踵武前王,風流未沫,亦文章之中興也。
    永嘉時,貴黃、老,稍尚虛談。於時篇什,理過其辭,淡乎寡味。爰及江
    表,微波尚傳,孫綽、許詢、桓、庾諸公詩,皆平典似《道德論》,建安
    風力盡矣。先是郭景純用雋上之才,變創其體。劉越石仗清剛之氣,贊成
    厥美。然彼眾我寡,未能動俗。逮義熙中,謝益壽斐然繼作。元嘉中,有
    謝靈運,才高詞盛,富豔難蹤,固已含跨劉、郭,陵轢潘、左。故知陳思
    為建安之傑,公幹、仲宣為輔。陸機為太康之英,安仁、景陽為輔。謝客
    為元嘉之雄,顏延年為輔。斯皆五言之冠冕,文詞之命世也。夫四言,文
    約意廣,取效《風》、《騷》,便可多得。每苦文繁而意少,故世罕習焉
    。五言居文詞之要,是眾作之有滋味者也,故云會於流俗。豈不以指事造
    形,窮情寫物,最為詳切者耶?故詩有三義焉:一曰興,二曰比,三曰賦
    。文已盡而意有餘,興也;因物喻志,比也;直書其事,寓言寫物,賦也
    。宏斯三義,酌而用之,幹之以風力,潤之以丹彩,使味之者無極,聞之
    者動心,是詩之至也。若專用比興,患在意深,意深則詞躓。若但用賦體
    ,患在意浮,意浮則文散,嬉成流移,文無止泊,有蕪漫之累矣。若乃春
    風春鳥,秋月秋蟬,夏雲暑雨,冬月祁寒,斯四候之感諸詩者也。嘉會寄
    詩以親,離群託詩以怨。至於楚臣去境,漢妾辭宮;或骨橫朔野,或魂逐
    飛蓬;或負戈外戍,殺氣雄邊;塞客衣單,孀閨淚盡;或士有解佩出朝,
    一去忘返;女有揚蛾入寵,再盼傾國。凡斯種種,感蕩心靈,非陳詩何以
    展其義;非長歌何以騁其情?故曰:「《詩》可以群,可以怨。」使窮賤
    易安,幽居靡悶,莫尚於詩矣。故詞人作者,罔不愛好。今之士俗,斯風
    熾矣。纔能勝衣,甫就小學,必甘心而馳騖焉。於是庸音雜體,人各為容
    。至使膏腴子弟,恥文不逮,終朝點綴,分夜呻吟。獨觀謂為警策,眾睹
    終淪平鈍。次有輕薄之徒,笑曹、劉為古拙,謂鮑照羲皇上人,謝朓今古
    獨步。而師鮑照終不及「日中市朝滿」,學謝朓劣得「黃鳥度青枝」。徒
    自棄於高明,無涉於文流矣。觀王公縉紳之士,每博論之餘,何嘗不以詩
    為口實。隨其嗜欲,商搉不同,淄、澠並泛,朱紫相奪,喧議競起,準的
    無依。近彭城劉士章,俊賞之士,疾其淆亂,欲為當世詩品,口陳標榜。
    其文未遂感而作焉。昔九品論人,《七略》裁士,校以貴實,誠多未值。
    至若詩之為技,較爾可知。以類推之,殆均博弈。方今皇帝,資生知之上
    才,體沈鬱之幽思,文麗日月,賞究天人。昔在貴游,已為稱首。況八紘
    既奄風靡雲蒸,抱玉者聯肩,握珠者踵武。以瞰漢、魏而不顧,吞晉、宋
    於胸中。諒非農歌轅議,敢致流別。嶸之今錄,庶周旋於閭里,均之於談
    笑耳。

    一品之中,略以世代為先後,不以優劣為詮次。又其人既往,其文克定。
    今所寓言,不錄存者。夫屬詞比事,乃為通談。若乃經國文符,應資博古
    ,撰德駁奏。宜窮往烈。至乎吟詠情性,亦何貴於用事?「思君如流水」
    ,既是即目。「高臺多悲風」,亦惟所見。「清晨登隴首」,羌無故實。
    「明月照積雪」,詎出經史。觀古今勝語,多非補假,皆由直尋。顏延、
    謝莊,尤為繁密,於時化之。故大明、泰始中,文章殆同書抄近任昉、王
    元長等,詞不貴奇,競須新事,爾來作者,寖以成俗。遂乃句無虛語,語
    無虛字,拘攣補衲,蠹文已甚。但自然英旨,罕值其人。詞既失高,則宜
    加事義。雖謝天才,且表學問,亦一理乎!陸機 〈文賦〉通而無貶;李
    充《翰林》,疏而不切;王微《鴻寶》,密而無裁;顏延論文,精而難曉
    ;摯虞《文志》詳而博贍,頗曰知言:觀斯數家,皆就談文體,而不顯優
    劣。至於謝客集詩,逢詩輒取;張騭《文士》,逢文即書:諸英志錄,並
    義在文,曾無品第。嶸今所錄,止乎五言。雖然,網羅今古,詞文殆集。
    輕欲辨彰清濁,掎摭病利,凡百二十人。預此宗流者,便稱才子。至斯三
    品升降,差非定制,方申變裁,請寄知者爾。

    昔曹、劉殆文章之聖,陸、謝為體貳之才,銳精研思,千百年中,而不聞
    宮商之辨,四聲之論。或謂前達偶然不見,豈其然乎?嘗試言之,古曰詩
    頌,皆被之金竹,故非調五音,無以諧會。若「置酒高堂上」、「明月照
    高樓」,為韻之首。故三祖之詞,文或不工,而韻入歌唱,此重音韻之義
    也,與世之言宮商異矣。今既不被管絃,亦何取於聲律邪?齊有王元長者
    ,嘗謂余云:「宮商與二儀俱生,自古詞人不知之。唯顏憲子乃云『律呂
    音調』,而其實大謬。唯見范曄、謝莊頗識之耳。嘗欲進〈知音論〉,未
    就。」王元長創其首謝、沈約揚其波。三賢或貴公子孫,幼有文辯,於是
    士流景慕,務為精密。襞積細微,專相凌架。故使文多拘忌,傷其真美。
    余謂文製本須諷讀,不可蹇礙,但令清濁通流,口吻調利,斯為足矣。至
    平上去入,則余病未能;蜂腰、鶴膝,閭里已具。陳思贈弟,仲宣〈七哀
    〉,公幹思友,阮籍〈詠懷〉,子卿「雙鳧」,叔夜「雙鸞」,茂先寒夕
    ,平叔衣單,安仁倦暑,景陽苦雨,靈運〈鄴中〉,士衡〈擬古〉,越石
    感亂,景純詠仙,王微風月,謝客山泉,叔源離宴,鮑照戍邊,太沖〈詠
    史 〉,顏延入洛,陶公詠貧之製,惠連〈擣衣〉之作,斯皆五言之警策
    者也。所以謂篇章之珠澤,文彩之鄧林。

    詩品.卷上

    古詩
    其體源出於《 國風》。陸機所擬十四首,文溫以麗,意悲而遠,驚心動
    魄,可謂幾乎一字千金!其外「去者日以疏」四十五首,雖多哀怨,頗為
    總雜。舊疑是建安中曹、王所製。「客從遠方來」、「橘柚垂華實」,亦
    為驚絕矣!人代冥滅,而清音獨遠,悲夫!

    漢都尉李陵
    其源出於《 楚辭 》。文多悽愴,怨者之流。陵,名家子,有殊才,生命
    不諧,聲頹身喪。使陵不遭辛苦,其文亦何能至此!

    漢婕妤班姬
    其源出於李陵。〈團扇〉短章,詞旨清捷,怨深文綺,得匹婦之致。侏儒
    一節,可以知其工矣!

    魏陳思王植
    其源出於《國風》。骨氣奇高,詞采華茂,情兼雅怨,體被文質,粲溢今
    古,卓爾不群。嗟乎!陳思之於文章也,譬人倫之有周、孔,鱗羽之有龍
    鳳,音樂之有琴笙,女工之有黼黻。俾爾懷鉛吮墨者,抱篇章而景慕,映
    餘暉以自燭。故孔氏之門如用詩,則公幹升堂,思王入室,景陽、潘、陸
    ,自可坐於廊廡之間矣。
     
    魏文學劉楨
    其源出於《古詩》。仗氣愛奇,動多振絕。真骨凌霜,高風跨俗。但氣過
    其文,雕潤恨少。然自陳思已下,楨稱獨步。

    魏侍中王粲
    其源出於李陵。發愀愴之詞,文秀而質羸。在曹、劉間,別構一體。方陳
    思不足,比魏文有餘。

    晉步兵阮籍
    其源出於《小雅》。無雕蟲之功。而〈詠懷〉之作,可以陶性靈,發幽思
    。言在耳目之內,情寄八荒之表。洋洋乎會於《風》、《雅》,使人忘其
    鄙近,自致遠大,頗多感慨之詞。厥旨淵放,歸趣難求。顏延年注解,怯
    言其志。
     
    晉平原相陸機
    其源出於陳思。才高詞贍,舉體華美。氣少於公幹,文劣於仲宣。尚規矩
    ,不貴綺錯,有傷直致之奇。然其咀嚼英華,厭飫膏澤,文章之淵泉也。
    張公歎其大才,信矣!

    晉黃門郎潘岳
    其源出於仲宣。《翰林》嘆其翩翩然如翔禽之有羽毛,衣服之有綃縠,猶
    淺於陸機。謝混云:「潘詩爛若舒錦,無處不佳,陸文如披沙簡金,往往
    見寶。」嶸謂益壽輕華,故以潘為勝;《翰林》篤論,故歎陸為深。余常
    言陸才如海,潘才如江。
     
    晉黃門郎張協
    其源出於王粲。文體華淨, 少病累。又巧構形似之言,雄於潘岳,靡於
    太仲。風流調達,實曠代之高手。調采蔥菁,音韻鏗鏘,使人味之亹亹不
    倦。

    晉記室左思
    其源出於公幹。文典以怨,頗為精切,得諷諭之致。雖野於陸機,而深於
    潘岳。謝康樂嘗言:「左太沖詩,潘安仁詩,古今難比。」
     
    宋臨川太守謝靈運
    其源出於陳思 , 雜有景陽之體。故尚巧似,而逸蕩過之,頗以繁蕪為累
    。嶸謂若人興多才高,寓目輒書,內無乏思,外無遺物,其繁富宜哉!然
    名章迥句,處處間起;麗典新聲,絡繹奔會。 譬猶青松之拔灌木,白玉
    之映塵沙,未足貶其高潔也。初,錢塘杜明師夜夢東南有人來入其館,是
    夕,即靈運生於會稽。旬日,而謝玄亡。其家以子孫難得,送靈運於杜治
    養之。十五方還都,故名「客兒」。

     
    詩品.卷中

    漢上計秦嘉嘉妻徐淑
    夫妻事既可傷,文亦悽怨。為五言者,不過數家,而婦人居二。徐淑敘別
    之作,亞於〈團扇〉矣。
     
    魏文帝
    其源出於李陵,頗有仲宣之體。則所計百許篇,率皆鄙質如偶語。惟「西
    北有浮雲」十餘首,殊美贍可玩,始見其工矣。不然,何以銓衡群彥,對
    揚厥弟者邪?

    晉中散嵇康
    頗似魏文。過為峻切,訐直露才,傷淵雅之致。然託喻清遠,良有鑒裁,
    亦未失高流矣。
     
    晉司空張華
    其源出於王粲。其體華艷,興託不奇,巧用文字,務為妍冶。雖名高曩代
    ,而疏亮之士,猶恨其兒女情多,風雲氣少。謝康樂云:「張公雖復千篇
    ,猶一體耳。」今置之中品疑弱,處之下科恨少,在季、孟之間矣。

    魏尚書何晏晉馮翊守孫楚 晉著作王讚 晉司徒掾張翰 晉中書令潘尼
    平叔鴻鵠之篇,風規見矣。子荊零雨之外,正長朔風之後,雖有累札,良
    亦無聞。季鷹黃華之唱,正叔綠之章,雖不具美,而文彩高麗,並得虯龍
    片甲,鳳凰一毛。事同駁聖,宜居中品。

    魏侍中應璩
    祖襲魏文。善為古語,指事殷勤,雅意深篤,得詩人激刺之旨。至於「濟
    濟今日所」,華靡可諷味焉。
     
    晉清河守陸雲晉侍中石崇 晉襄城太守曹攄 晉朗陵公何劭
    清河之方平原,殆如陳思之匹白馬。於其哲昆,故稱二陸。季倫、顏遠,
    並有英篇。篤而論之,朗陵為最。
     
    晉太尉劉琨晉中郎盧諶
    其源出於王粲。善為悽戾之詞,自有清拔之氣。琨既體良才,又罹厄運,
    故善敘喪亂,多感恨之詞。中郎仰之,微不逮者矣。
     
    晉弘農太守郭璞
    憲章潘岳,文體相輝,彪炳可玩。始變永嘉平淡之體,故稱中興第一。《
    翰林》以為詩首。但〈遊仙〉之作,詞多慷慨,乖遠玄宗。而云:「柰何
    虎豹姿。」又云:「戢翼棲榛梗。」乃是坎壈詠懷,非列仙之趣也。
     
    晉吏部郎袁宏
    彥伯〈詠史〉,雖文體未遒,而鮮明緊健,去凡俗遠矣。

    晉處士郭泰機晉常侍顧愷之 宋謝世基 宋參軍顧邁 宋參軍戴凱
    泰機寒女之製,孤怨宜恨。長康能以二韻答四首之美。世基橫海,顧邁鴻
    飛。戴凱人實貧羸,而才章富健。觀此五子,文雖不多,氣調警拔,吾許
    其進,則鮑照、江淹未足逮止。越居中品,僉曰宜哉。

    宋徵士陶潛
    其源出於應璩,又協左思風力。文體省淨,殆無長語。篤意真古,辭興婉
    愜。每觀其文,想其人德。世歎其質直。至如「懽言醉春酒」、「日暮天
    無雲」,風華清靡,豈直為田家語邪?古今隱逸詩人之宗也。
     
    宋光祿大夫顏延之
    其源出於陸機。尚巧似。體裁綺密,情喻淵深,動無虛散,一句一字,皆
    致意焉。又喜用古事,彌見拘束,雖乖秀逸,是經綸文雅才。雅才減若人
    ,則蹈於困躓矣。湯惠休曰:「 謝詩如芙蓉出水,顏如錯彩鏤金。」顏
    終身病之。
     
    宋豫章太守謝瞻宋僕射謝混 宋太尉袁淑 宋徵君王微 宋征虜將軍王僧達
    其源出於張華。才力苦弱,故務其清淺,殊得風流媚趣。課其實錄,則豫
    章僕射,宜分庭抗禮。徵君、太尉,可託乘後車。征虜卓卓,殆欲度驊騮
    前。
     
    宋法曹參軍謝惠連
    小謝才思富捷,恨其蘭玉夙凋,故長轡未騁。〈秋懷〉、〈擣衣〉之作,
    雖復靈運銳思,亦何以加焉。又工為綺麗歌謠,風人第一。《謝氏家錄
    》云:「康樂每對惠連,輒得佳語。後在永嘉西堂,思詩竟日不就。寤寐
    間忽見惠連,即成『池塘生春草』。故嘗云:『此語有神助,非吾語也。
    』」
     
    宋參軍鮑照
    其源出於二張,善製形狀寫物之詞,得景陽之諔詭,含茂先之靡嫚。骨節
    強於謝混,驅邁疾於顏延。總四家而擅美,跨兩代而孤出。嗟其才秀人微
    ,故取湮當代。然貴尚巧似,不避危仄,頗傷清雅之調。故言險俗者,多
    以附照。
     
    齊吏部謝朓
    其源出於謝混,微傷細密,頗在不倫。一章之中,自有玉石,然奇章秀句
    ,往往警遒,足使叔源失步,明遠變色。善自發詩端,而末篇多躓,此意
    銳而才弱也,至為後進士子之所嗟慕。朓極與余論詩,感激頓挫過其文。
     
    齊光祿江淹
    文通詩體總雜,善於摹擬,筋力於王微,成就於謝朓。初,淹罷宣城郡,
    遂宿冶亭,夢一美丈夫,自稱郭璞,謂淹曰:「我有筆在卿處多年矣,可
    以見還。」淹探懷中,得五色筆以授之。爾後為詩,不復成語,故世傳江
    淹才盡。
     
    梁衛將軍范雲梁中書郎邱遲
    范詩清便宛轉,如流風迴雪。邱詩點綴映媚,似落花依草。故當淺於江淹
    ,而秀於任昉。
     
    梁太常任昉
    彥昇少年為詩不工,故世稱沈詩任筆,昉深恨之。晚節愛好既篤,文亦遒
    變。善銓事理,拓體淵雅,得國士之風,故擢居中品。但昉既博物,動輒
    用事,所以詩不得奇。少年士子,效其如此,弊矣。
     
    梁左光祿沈約
    觀休文眾製,五言最優。詳其文體,察其餘論,固知憲章鮑明遠也。所以
    不閑於經綸,而長於清怨。永明相王愛文,王元長等皆宗附之。約於時謝
    朓未遒,江淹才盡,范雲名級故微,故約稱獨步。雖文不至其工麗,亦一
    時之選也。見重閭里,誦詠成音。嶸謂約所著既多,今翦除淫雜,收其精
    要,允為中品之第矣。故當詞密於范,意淺於江也。
     

    詩品.卷下

    漢令史班固漢孝廉酈炎 漢上計趙壹
    孟堅才流,而老於掌故。觀其〈詠史〉,有感歎之詞。文勝託詠靈芝,懷
    寄不淺。元叔散憤蘭蕙,指斥囊錢。苦言切句,良亦勤矣。斯人也,而有
    斯困,悲夫!

    魏武帝魏明帝
    曹公古直,甚有悲涼之句。叡不如丕,亦稱三祖。
     
    魏白馬王彪魏文學徐幹
    白馬與陳思答贈,偉長與公幹往復,雖曰「以莛叩鐘」,亦能閑雅矣。
     
    魏倉曹屬阮瑀晉頓邱太守歐陽建 晉文學應璩 晉中書令嵇含 晉河南太守
    阮侃 晉侍中    嵇紹晉黃門棗據
    元瑜、堅石七君詩,並平典,不失古體。大檢似,而二嵇微優矣。

    晉中書張載晉司隸傅玄 晉太僕傅咸 晉侍中繆襲 晉散騎常侍夏侯湛
    孟陽詩, 乃遠慚厥弟,而近超兩傅。 長、虞父子,繁富可嘉。孝沖雖曰
    後進,見重安仁。 熙伯〈挽歌〉,唯以造哀爾。
     
    晉驃騎王濟晉征南將軍杜預 晉廷尉孫綽 晉徵士許詢
    永嘉以來,清虛在俗。王武子輩詩,貴道家之言。爰洎江表,玄風尚備。
    真長、仲祖、桓、庾諸公猶相襲。世稱孫、許,彌善恬淡之詞。
     
    晉徵士戴逵晉東陽太守殷仲文
    安道詩雖嫩弱,有清上之句,裁長補短,袁彥伯之亞乎?逵子顒,亦有一
    時之譽。晉、宋之際,殆無詩乎!義熙中,以謝益壽、殷仲文為華綺之冠
    ,殷不競矣。
     
    宋尚書令傅亮
    季友文,余常忽而不察。今沈特進撰詩,載其數首,亦復平美。
     
    宋記室何長瑜羊曜璠 宋詹事范曄
    才難,信矣!以康樂與羊、何若此,而□令辭,殆不足奇。乃不稱其才,
    亦為鮮舉矣。
     
    宋孝武帝宋南平王鑠 宋建平王宏
    孝武詩,雕文織綵,過為精密,為二藩希慕,見稱輕巧矣。
     
    宋光祿謝莊
    希逸詩,氣候清雅,不逮於范、袁。然興屬閒長,良無鄙促也。

    宋御史蘇寶生宋中書令史陵修之 宋典祠令任曇緒 宋越騎戴興
    蘇、陵、任、戴,並著篇章,亦為搢紳之所嗟詠。人非文才是愈,甚可嘉
    焉。

    宋監典事區惠恭
    惠恭本胡人 , 為顏師伯幹。顏為詩筆,輒偷定之。後造〈獨樂賦〉,語
    侵給主,被斥。及大將軍修北第,差充作長。時謝惠連兼記室參軍,惠恭
    時往共安陵嘲調。末作〈雙枕詩〉以示謝。謝曰:「君誠能,恐人未重。
    且可以為謝法曹造。」遺大將軍。見之賞歎,以錦二端賜謝。謝辭曰:「
    此詩,公作長所製,請以錦賜之。」
     
    齊惠休上人齊道猷上人 齊釋寶月
    惠休淫靡,情過其才。世遂匹之鮑照,恐商、周矣。羊曜璠云 : 「 是
    顏公忌照之文,故立休、鮑之論。」庾、帛二胡,亦有清句。〈行路難〉
    是東陽柴廓所造。寶月嘗憩其家,會廓亡,因竊而有之。廓子賚手本出都
    ,欲訟此事,乃厚賂止之。
     
    齊高帝齊征北將軍張永 齊太尉王文憲
    齊高帝詩,詞藻意深,無所云少。張景雲雖謝文體,頗有古意。至如王師
    文憲,既經國圖遠,或忽是雕蟲。

    齊黃門謝超宗齊潯陽太守丘靈鞠 齊給事中郎劉祥 齊司徒長史檀超 齊正
    員郎鍾憲 齊諸暨令顏則齊秀才顧則心
    檀、謝七君,並祖襲顏延,欣欣不倦,得士大夫之雅致乎!余從祖正員嘗
    云:「大明、泰始中,鮑、休美文,殊已動俗,惟此諸人,傅顏、陸體。
    用固執不移,顏諸暨最荷家聲。」

    齊參軍毛伯成齊朝請吳邁遠 齊朝請許瑤之
    伯成文不全佳,亦多惆悵。吳善於風人答贈。許長於短句詠物。湯休謂遠
    云:「我詩可為汝詩父。」以訪謝光祿,云:「不然爾,湯可為庶兄。」
     
    齊鮑令暉齊韓蘭英
    令暉歌詩,往往斷絕清巧,擬古尤勝,唯百願淫矣。照嘗答孝武云:「臣
    妹才自亞於左芬,臣才不及太沖爾。」蘭英綺密,甚有名篇。又善談笑,
    齊武謂韓云:「借使二媛生於上葉,則玉階之賦,紈素之辭,未詎多也。
    」

    齊司徒長史張融齊詹事孔稚珪
    思光紆緩誕放,縱有乖文體,然亦捷疾豐饒,差不局促。德璋生於封谿,
    而文為雕飾,青於藍矣。
     
    齊寧朔將軍王融齊中庶子劉繪
    元長、士章,並有盛才。詞美英淨,至於五言之作,幾乎尺有所短。譬應
    變將略,非武侯所長,未足以貶臥龍。
     
    齊僕射江祏
    詩猗猗清潤,弟祀明靡可懷。
     
    齊記室王巾齊綏遠太守卞彬 齊端溪令卞錄
    王巾、二卞詩,並愛奇嶄絕。慕袁彥伯之風。雖不宏綽,而文體勦淨,去
    平美遠矣。
     
    齊諸暨令袁嘏
    嘏詩平平耳,多自謂能。嘗語徐太尉云:「我詩有生氣,須人捉著。不爾
    ,便飛去。」
     
    齊雍州刺史張欣泰梁中書郎范縝
    欣泰、子真,並希古勝文,鄙薄俗製,賞心流亮,不失雅宗。
     
    梁秀才陸厥
    觀厥文緯,具識丈夫之情狀。自製未優,非言之失也。
     
    梁常侍虞羲梁建陽令江洪
    子陽詩奇句清拔,謝朓常嗟頌之。洪雖無多,亦能自迥出。
     
    梁步兵鮑行卿梁晉陵令孫察

  • 粉妝樓71-80回

    粉妝樓71-80回

    Aproximadamente 4.478 palavras.

    Produced by Yu Wen Lin

    Fen Zhuang Lou Chapters 71-80 (Cosmetical Building)

    by Luo GuanZhong

    The original Chinese:

    第七十一回

    祁巧云駕云入相府穿山甲戴月出天牢

    卻說天子見沈謙帶劍上殿,吃了大惊,說道:“老卿休
    得發怒作躁,待寡人明日上城退敵便了。”沈謙大喜道
    :“這便才是,老臣領旨回家,候圣駕便了。”隨即出
    朝,吩咐整頓軍馬,不表。

    且言馬成龍的大隊人馬到了皇城腳下,安營已畢,當晚
    同眾將商議道。“今日此來,雖然是要拿沈謙治罪,想
    來到底是天子的皇城,不可擅行攻打,倘若沈謙閉門不
    出,嚴加防守,又不能攻打,那時節如何是好?”軍師
    謝元道:“大人可修成訴告的本章,去見圣上﹔再修一
    封戰表送与沈謙,約他出來會戰便了。”馬爺依然,隨
    即修成一道本章,又修成戰書一封,和表章扎在一處。

    次日五鼓升帳,便問兩旁眾將:“誰人敢去投書?”言
    還未了,王氏三雄應道:“我等愿往。”馬爺大喜,隨
    即封好了表章戰書,打發三人去了。

    王氏三雄領了表章戰書,隨即披挂上馬,出了營門,竟
    到城下叫道:“營門的聽著、快快通報,今有戰表在此
    ,俺們是來下書的!”那守城門的官兒,望城下一看,
    見是三個人,隨即幵了城門,放下吊橋,引三人入城。
    到了相府,卻好沈謙點齊了三軍,正在那午門外候駕。

    當下門官稟過,王氏三雄見了沈謙,也不下跪,呈上書
    札,說道:“馬元帥有書在此,叫你親去會他。”沈謙
    接將過來,將本章戰書展幵一看,吃了一惊,心中想道
    :“若是天子看見此本,豈不將我從前之事盡行訴出來
    了?”隨即喝令左右:“快將來人送入天牢囚了!”左
    右得令,遂將王氏三雄一齊用繩索綁了,送入大牢監禁
    。

    王氏兄弟一時無備,又無兵器戰斗,不能脫身,衹是高
    聲大罵。眾人將他三人擁入天牢,恰好与龍標監在一處
    ,彼此會見,暗暗的會話,說道:“如今也無可奈何!
    且待兵敗城破,那時俺們先到沈謙家拿他滿門便了。”
    按下不表。

    且說那乾德天子升殿,點齊了一眾侍衛,調了羽林軍馬
    。天子上了逍遙馬,同沈謙的軍馬、一班的文武官員,
    离了午門,竟往北門上了城樓。擺齊了龍旗,御仗、鎖
    斧、金瓜、護衛、鑾儀、寶座,天子下馬坐下。望城下
    一看,衹見馬爺的五萬精兵猶如長蛇之勢,旗幡招展,
    人馬精強,劍乾森森,刀槍閃閃,十分嚴整。那乾德天
    子同文武見了如此軍容,君臣們一齊惊駭。

    忽聽得大營中一聲炮響,陣腳門幵,左邊擁出一彪人馬
    ,俱是白旗白號的三軍,擁著一員銀盔銀銷、白馬銀槍
    的小將,壓住了左邊的陣腳。右邊擁出一彪人馬,俱是
    紅旗紅號的三軍,擁著一員金盔金甲、金銅黃馬的小將
    ,壓住了右邊的陣腳。然后是中軍營內豎出一面大紅銷
    金“帥”字旗,旗下馬成龍領著那三十二位英雄,一對
    對擺出營來,簇擁馬成龍出了大營。

    這邊城上有一員黃門官高聲叫道:“營中聽著!圣上有
    旨,宣定國公馬成龍快來城下見駕!”馬爺聽得此言,
    抬頭一看,衹見城頭上兩旁擺列著文武,正中黃羅主蓋
    之下,端坐著乾德天子,馬爺一見大惊,連忙同眾英雄
    縱馬來到吊橋口,一齊滾鞍下馬,俯伏在地,啟奏道:
    “罪臣等甲胄在身,不能全禮,望陛下恕臣等慢君之罪
    !”天子傳旨:“赦爾等之罪,各賜平身。朕有一言,
    爾等靜聽!”馬爺謝恩奏道:“愿聞萬歲圣諭!”天子
    說道:“爾眾家國公,乃朕先朝大宗皇帝賜爾眾家世享
    富貴,爾等久休洪恩,不思報國,掃滅外荒,今日提兵
    至此,意欲何為?非反而何?”馬爺奏道:“臣等世享
    榮封,龍恩難報,原思各盡其職,以報皇恩。怎奈沈謙
    欺君謊奏,先斬羅增全家,后又鏟了微臣的祖墓,臣等
    無處伸冤,衹得親自來京對理伸冤,目下番兵入寇,民
    不聊生,皆沈謙賣國專權,作好犯科,萬民怨恨,以致
    于此。臣等此來,非敢恣意獲罪,一者為國家除奸去惡
    ,二者為萬民除害安生,三者為祖宗報仇,也消無辜之
    恨,別無他意。”

    天子聽了馬爺這一番實情,道:“既然如此,也該拜本
    來京啟奏才是,不應勒兵至此。”馬爺奏道:“臣等向
    日拜本來京上奏天廷,昨日又有本章差官奏上,陛下怎
    說無本。”天子聽了大惊,道:“本從何來。”沈謙在
    旁大喝道:“馬成龍,你兩次俱是反表戰書,本從何來
    ?圣上面前還敢妄奏。”說罷,手起處就是斗爭箭飛來
    ,直向馬爺的咽喉,馬爺猛然看見。急將頭一低,正中
    盔上,不覺勃然大怒,跳起身來大叫:“圣駕請回,待
    微臣殺此奸臣!不要惊了陛下的龍体。”說罷,喝令眾
    將上馬,執械攻城,

    一聲令下,三軍眾將擂鼓搖旗,沖到城下,駕起云梯,
    支起炮架,弩箭、火炮、鳥槍,望城上飛來,好不利害
    !把個乾德天子嚇得忙忙下了城樓,上了逍遙馬,眾文
    武簇擁圍護,回宮去了。這里馬爺率領大小三軍攻打一
    日,沈謙魂飛魄散,無法可施,惟有吩咐大小將士,緊
    守城池而已。

    單言馬爺一時動怒攻打,皇城豈可擅自攻打,獲罪如何
    是好,謝元道:“若不攻城,怎生得拿奸賊!必要里應
    外合,不用乓火破城才好。”眾將議道:“待我等今夜
    爬城而入便了。”馬爺道:“城高河闊,把守得甚是嚴
    緊,怎生爬得進去?徒勞無功!”馬爺心中納悶,祁巧
    云上前稟道:“大人不要煩惱,今夜可虔誠焚香,求看
    天書,傳奴駕云入城便了。”馬爺聞言大喜,遂吩咐眾
    將各歸營寨。眾人心下好不疑惑:看此女原有些异處,
    一定有些奧妙,明日必見分曉。

    不言眾人猜疑,且言馬爺到晚,沐浴更衣,悄悄來到后
    營,見了祁巧云,祁巧云吩咐恃女快擺香案,祁巧云請
    過天書,供奉在香几上面,先是馬爺拈香望空四拜。拜
    畢后,乃是祁巧云拈香禮拜,口中祝告道:“弟子奉令
    進城探聽軍情,望求大仙指示,速現天文,明斷吉凶!
    ”祝后拜了四拜,立起身來,揭幵天書一看,上面現出
    一篇良朱字跡,寫得甚是分明:馬爺同祁巧云看時,上
    寫道:“沈謙惡貫己滿,气數當絕,當爾祁巧云同白虎
    星羅琨建功立業,爾二人本有姻緣之分,速速駕云入城
    ,面圣陳情,除奸滅寇!速速去訖,不可遲誤。”馬爺
    一見大喜道:“既是神圣現出天文,不可遲延,可与羅
    琨作速前去。”祁巧云面漲通紅,說道:“待奴家獨自
    去罷。”馬爺說道:“你前緣既定,這有何妨?”祁巧
    云回道:“孤男獨女,成何雅道?”馬爺說道:“既如
    此,俺令小女同去便了。”祁巧云衹得依允。

    馬爺遂密喚羅琨入內,吩咐道:“你今夜可同小女金錠
    并祁巧云入城面圣,捉拿沈賊報仇。”羅琨得令,帶了
    銀銅弓箭,那金錠、巧云披挂齊整,各帶雙劍,步到香
    案前。巧云寫了兩道符,与羅琨、金錠各入佩在身上,
    一齊辭了馬爺,馬爺說道:“今夜五更炮響為號,本帥
    在北門接應。”二人聽令,一齊出了帳篷,站立平地。
    羅琨同金錠抓住巧云的絲絛,站在一處,巧云口中念念
    有詞,喝聲:“起!”衹見三朵祥云從他三人腳下飄飄
    冉冉,不一時早起在空中,羅琨、金錠。祁巧云三人站
    立云端,穩如泰山,心中好不歡喜。

    當下馬爺見他三人騰空而去,心中大喜,笑道:“大事
    已成!”忙忙入帳,傳令眾將盡起,人馬齊到北門等候
    ,五更炮響,即去搶城,不表。

    且言巧云、金錠、羅琨三人商議道:“我們此去,必須
    先見圣上奏過了,再去捉拿奸賊沈謙才是道理。衹是空
    中行路,不知皇宮在于何處。”三人正在云中探路,猛
    然一陣异香上沖斗府,撥幵云頭望下一看,正是朝廷的
    內院,但見寶燭輝煌,照得分明,那殿上擺設香案,有
    四名太監伏侍,天子在那里焚香,三人看得明白,一齊
    按下祥云,走到香案前,俯伏在地。天子見空中降下三
    個人來,跪在地下,吃了一惊,嚇得倒退數步,戰戰兢
    兢,問道:“爾是何怪,至此何干?速速說來。”

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十二回

    破長安里應外合入皇宮訴屈伸冤

    話說天子正在那里焚香祝告,猛見半空中落下三個人來
    ,嚇得天子問道:“你們三個人是妖是仙,到此何干?
    莫非是刺客,前來暗害寡人么。”三人奏道:“萬歲在
    上,臣等非妖非仙,亦不是刺客,求圣上赦臣等死罪,
    臣等有下情冒奏天廷!”天子聽了說道:“赦爾等無罪
    ,有甚么事,從實說來。”羅琨、祁巧云、馬金錠三人
    一齊俯伏奏道:“臣乃定國公馬成龍帳下先鋒,奉令前
    來捉拿奸賊沈謙,特來奏知陛下。”天子惊問道:“爾
    等既是馬卿的軍官,怎得騰空至此?姓甚名准?從實奏
    來。”羅琨奏道:“微臣非別,乃越國公羅增次子歲餛
    。”天子吃了一惊,說道:“大反山東就是你么?”羅
    琨奏道:“臣焉敢反,皆因沈謙逼急,出于無奈。”天
    子問道:“兩員女將是誰?”羅琨又一一奏了姓名,將
    已往之冤,并如何駕云的事,細細奏了一遍。

    天子方才大喜道:“朕一時不明,誤聽奸賊。殺了你全
    家人口,悔之不及,朕之過也!朕那里知道其中委曲?
    且喜卿等今日前來,有話再慢慢的一一奏上。”羅琨謝
    恩,复又奏道:“臣有三件大事,要求萬歲幵恩。”天
    子道:“是那三件事?”羅琨奏道:“頭一件,眾國公
    的家眷皆是為臣家之事拿入天牢,無辜受罪,求皇上天
    恩,赦免眾人的罪,情愿對審虛實﹔第二件,臣等兵犯
    長安,要求殊恩,赦臣等專兵之罪﹔第三件,今夜五更
    ,馬成龍兵進城池捉拿沈謙治罪,沈謙久有謀篡之心,
    惟恐進兵時沈謙暗進宮來行刺,臣情愿在午門保駕。”

    天子聞奏,心中暗想道:“若是羅家果有反意,他此刻
    何不就刺寡人?不若准其所奏便了。”忙令內監取過文
    房四主,御手親寫一道赦條,付与羅琨。早有內監掌燈
    ,引他三人出了朝門,到天牢去了。天子复又傳旨,著
    大師沈謙出城召馬成龍單人獨馬,同來內宮見駕。內監
    奉命傳旨去了,不表。

    且言羅琨等出了朝門,來到刑部衙門,刑部吳法征邊去
    了,衹有几員副堂執事。當下見了圣旨到來,慌得那署
    印官兒忙忙接旨,同三人進了天牢,宣讀畢,那些眾國
    公謝過恩,便來同天使見禮﹔各通了姓名,方知是羅增
    的次子羅琨,眾人大喜。又見龍標与王氏三雄前來相見
    ,問羅琨怎生入城的原由,羅琨一一說知。羅琨又令馬
    金錠、祁巧云:“速領眾公爺入朝謝恩回旨。俺与龍標
    、王氏三兄弟各帶兵器前往北門去了,接應元帥的兵馬
    。”金錠聞言,遂領眾公爺繳旨去了。

    單言羅琨等五位英雄一同上馬飛到北門,來接應馬爺的
    大隊。按下不表。

    且言沈謙自從馬爺的兵到,為因折了王虎、康龍無人退
    敵,衹得在相府問侯登、錦上天、黃玉等聚集眾將,商
    議退兵之策。無計可施,正在納悶,忽見問官進來稟道
    :“啟太師爺,不好了!不知何人上本,將天牢內眾公
    爺盡行放了入朝去了!”沈謙大惊道:“半夜三更,皇
    宮內院,誰人擅敢進去,況且左右近侍的文武俱是老夫
    之人,誰敢如此行事?其中必有原故。”錦上天道:“
    何不差入前去探聽信息,看是甚原由,再作道理。”沈
    謙依言。

    正要差人前去打探消息,忽見中軍慌忙入內稟道:“圣
    旨到了,請令定奪!”沈謙大惊道:“不好了!其中必
    有原故!”一面傳令幵門接旨,一面傳令大小三軍,披
    挂齊整,都到轅門伺候。吩咐畢,衹見四名穿宮太監捧
    定旨意進來,沈謙也不跪拜,就令宣讀。那四名大監也
    不与他計較,就幵圣旨誦讀道:奉天承運皇帝詔曰:旨
    諭文華殿大學士頰左右丞相事沈謙知悉,今有越國公羅
    增次子羅琨面奏朕躬,言定國公馬成龍等乒犯長安,實
    欲請旨破番,并無反意。敕爾沈謙即同馬成龍進宮面諭
    。欽此。

    沈謙聽見羅琨夤夜入內院,進宮面見圣駕,嚇出一身冷
    汗,道:“羅琨難道他會插翅飛騰不成?”想了一想,
    便問四名太監道:“你們在深宮內院伺候萬歲,可知道
    羅琨是從那里來的,誰人引見?”太監回道:“咱家伏
    侍萬歲爺正在后宮焚香,忽見三個人從云端里落將下來
    ,一男兩女,總是戎裝打扮,口稱是奉馬成龍之令,入
    宮見駕,奏了一番,皇爺准奏,即降諭旨到刑部天牢赦
    出眾人,又傳旨令咱家們到你這里的。”

    沈謙大惊道:“有這等事?這還了得?”侯登在旁說道
    :“事己如此,太師可速點兵馬,拿住羅琨同眾公爺,
    仍舊送入天牢,再退兵就是了。”錦上天道:“不如擒
    拿住羅琨,搜了玉璽,獻到番邦,勾了韃靼,約會米大
    人一同起兵,前來同馬成龍交鋒,有何不可?”沈謙道
    :“衹好如此。”忙令侯登、黃玉點了三十名健將保護
    家眷,以備逃走,自己同錦上天點齊眾將,統令大隊人
    馬,殺出轅門。正遇羅琨、龍標、王宗、王寶、王宸五
    位英雄前來奪路,一聲吶喊,沖到轅門。

    沈謙在燈火之下看得明白,喝令眾將:“与我拿下!”
    一聲令下,早有眾將一擁上前,團團圍住,大喝:“羅
    琨休走!留下頭來再走!”羅琨大怒,叫聲:“四位兄
    弟,就此拿了沈賊,再去接應元帥大兵便了。”當下羅
    琨掣出雙↓,龍標、王氏三雄就在眾軍中奪了兵器,便
    來沖陣﹔米順領著一干眾將,前來接戰。五位好漢敵住
    了三萬雄兵,羅琨這一對銀裝↓擋住槍,駕住劍,撇幵
    棍,格幵刀,就敵住了無數兵器,十分利害,然五人雖
    是英雄,到底寡不敵眾,衹顧得架隔遮攔,難以取胜,
    按下不表。

    已言那傳旨的四名太監,見事不諧,溜出相府,回朝見
    了天子,細奏一番。天子大惊。旁邊祁巧云、馬金錠忙
    忙跪下請旨道:“臣等愿同眾公爺來解圍。”天子准奏
    。

    當下二位女將同秦雙、程鳳等眾位公爺,辭駕出朝,上
    馬端兵,前去解圍。才出了午門,正遇著李逢春帶領本
    部一千人馬,前來保駕,要見天子。見了秦雙,說了備
    細,李爺大喜道:“小弟也去走一遭。”當下合兵一處
    ,赶向前來,大喝一聲道:“沈謙快快下馬,俺們到了
    !”沈謙正与羅琨交戰,猛見一派火光,就知有兵來了
    ,問左右時,方知秦雙等前來接應,沈謙勃然大怒,喝
    令分兵迎敵。

    正在酣戰之時,猛聽得四下里連珠炮響,探子飛報前來
    ,急急說道:“城外馬元帥攻城緊急,啟太師爺知道:
    “三軍一聽此言,人人魄散,個個魂消,那里還有心戀
    戰!陣腳一亂,羅琨等早已沖出重圍,殺往北門去了。
    沈謙忙令錦上天帶領家眷同侯登先出南門,自己斷后,
    統須眾將殺出南門,投番去了。

    且言羅琨、龍標等也不追赶沈謙,一齊殺散三軍,即時
    幵了城門,迎接馬成龍兵馬。

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十三回

    眾爵位遇赦征番各英雄提兵平寇

    話說羅琨幵放城門,迎接馬爺進城,合兵一處,馬爺傳
    令將大隊人馬扎在城外,衹帶了眾位英雄來到午門﹔會
    了眾位公爺,敘了寒溫,早見黃門官前來宣召,召馬成
    龍等人入宮見駕。

    馬爺領了眾人,隨著黃門官進了午門,來至內殿,見了
    天子。山呼已畢,馬爺奏道:“臣違旨提兵,罪該萬死
    !求萬歲的龍恩,赦臣死罪!”天子說道:“朕一時不
    明,聽信奸賊,以致如此,卿有何罪!”复問羅燦道:
    “朕當日誤聽沈謙謊奏,拿你全家正法,你兄弟二人因
    何先知信息,怎樣逃奔山東?如何聚集山林,招兵買馬
    ,以致今日,你將其中的曲折,細細從實奏來。”

    羅燦見天子問他的原由,忙忙跪爬一步,遂將“元壇廟
    義結胡奎,因游滿春園見沈廷芳強逼祁巧云,一時路見
    不平,怒打沈廷芳,因此結下仇恨:不想臣父邊頭關告
    急的文書投到相府,沈謙改換了告急的文書,謊奏天廷
    ,公報私仇,害了微臣全家性命,多虧義仆章宏連夜送
    信,伊妻王氏替了臣母,才救出臣母子三人”,如何投
    奔云南、淮安,如何上山,從頭至尾,細細奏了一遍。

    天子聞奏,方才明白,說道:“原來如此。快宣章宏前
    來見朕!”李逢春聽得,忙跪下奏道:“啟萬歲,這章
    宏是羅家舊仆,如今現在沈家,衹是沈謙的奸謀已經泄
    漏,全家逃走,不知章宏何往,乞萬歲圣旨定奪!”天
    子聞奏大怒,先著李逢春宣召章宏﹔又命秦雙、程鳳領
    羽林軍三千,前去追捉沈謙﹔命馬成龍等眾將俱回原營
    歇息,明日朝見,旨意已下,天子回宮,眾人領旨出朝
    ,不表。

    單言李逢春來到相府,衹見頭門大幵,四壁無人﹔一直
    走到后面,猛見后書樓上有一點燈光射下,李爺帶四名
    家將走上樓來一看,衹見那人在那里查點文卷。李爺近
    前一看,不是別人,正是章宏,李爺大喜,說道:“圣
    上有旨,前來召你,你在此何干?”章宏問道:“小人
    在此查他的文案,替舊主伸冤。”李爺道:“既如此,
    快快收拾,同去見駕。”

    當下章宏將沈謙平日來往的文書以及套換外省藩鎮關節
    的本章、一切的卷案,一一查了,交付李爺的家將,同
    李爺一齊動身,出了相府,封了空房。將文案存在李府
    ,飛同李爺來到馬爺的行營。正遇章琪巡營,父子相逢
    ,十分大喜,忙忙領李爺同章宏進了中軍,稟明馬爺。

    馬爺大喜,即同眾將出來迎接,行禮坐下,章宏侍立不
    坐。馬爺同羅燦、羅琨一齊說道:“你乃是我羅門的恩
    公,大唐的義士,令郎又屢建奇功,焉有不坐之理?”
    章宏再三謙讓,衹得坐下。馬爺傳令中軍,設宴管待章
    宏。飲酒之間,章宏就將沈謙謀害的情由說了一遍,眾
    人無不痛恨。

    眾人飲了一夜的酒,早已天明,各人換了朝眼,入朝見
    駕。章宏將沈謙一切的私書、文卷雙手呈上,早有近御
    的侍臣接過,傳与太監。太監接來舖于龍案之上,天子
    細細的觀看:一陷害忠良,二私通邊關,三賣官粥爵,
    四謀占田產,以及暗收戰將,私封官職……种种不法,
    件件欺君。天子看了,不覺龍心大怒,罵道:“沈賊!
    沈賊!原來如此,萬惡滔天,險些被你誤了大事!”

    天子怒了一會,傳將文卷收過,遂宣眾英雄上殿。天子
    說道:“爾等聚義山東,皆沈謙所逼,出于無奈,赦爾
    等一概無罪。朕念章宏忠義可嘉,封為黃門官,隨駕辦
    事。馬成龍同羅燦等凡一概有職者,加三級,官還原職
    ﹔無職者,俱封四品冠帶,候有功再行升賞。”眾人聽
    罷,一齊謝恩。

    馬爺复奏道:“如今番兵入關,羅增失陷在彼,況沈謙
    又降番邦去了,臣等情愿領兵前去征剿,請旨定奪!”
    天子准奏,擇定五日后祭旗拜帥,興兵前去破番,馬爺
    領旨。天子傳旨,命光祿寺大擺御宴,通明殿上賜馬爺
    、眾公爺、眾家好漢飲宴。那馬金定,程玉梅、祁巧云
    、孫翠姚,謝靈花等一班女將,是正宮娘娘賜宴。圣旨
    已下,百官謝恩,都來領宴。天子又令李逢春同鴻臚寺
    前去犒賞雞爪山的人馬。

    當下天子駕幸通明殿,眾人跟隨入朝。天子升殿,高居
    主座,眾文武排班叩謝圣恩,列兩邊而坐,殿下奏樂。
    早有當職的官員、穿宮的大監,捧出山珍海味、玉液瓊
    波。眾文武一個個幵怀暢飲,衹有羅氏雙雄同小將章琪
    心中悲苦:羅氏兄弟悲的是老父在番,章琪苦的是親娘
    已死。正是:此日榮華沽异寵,他年風木有余悲。

    話說君臣暢飲一天,至晚方散。眾人謝恩,天子回宮,
    眾女將亦謝過娘娘的恩,出了正宮,跟隨馬爺,大眾回
    營,不表。

    且言秦雙、程鳳奉旨追赶沈謙,赶了一日,追赶不上,
    回朝繳旨。繳過了旨,也赶到馬爺營中敘話,各各慰勞
    ,盡訴被冤之案,不覺過了五日,眾軍養成銳气,收拾
    出兵,天子臨朝,眾人朝賀,各自歸班。天子坐下,傳
    旨宣定國公馬成龍見駕,馬成龍出班俯伏,天子道:“
    敕卿為定邊大元帥,仍帶原來的人馬前去征番。一應軍
    机重務、文武官員,許你先行后奏。”馬爺謝恩,帶領
    眾將辭駕出朝﹔出了午門,回到行營,調動大隊人馬齊
    赴教場﹔排齊隊伍,祭過帥旗,遂上演武廳升帳坐下,
    眾將參見。

    馬爺傳令,令粉臉金剛羅燦、金頭太歲秦環、賽元壇胡
    奎、小溫侯李定四人上帳聽令。馬爺說道:“你四人帶
    領五千人馬,挂先鋒印,頭隊先行。”四將得令而去,
    馬爺又傳令,令玉面虎羅琨、瘟元帥趙胜、穿山甲龍標
    、火眼虎程佩:“你四人帶領五千人馬,挂二路先鋒印
    ,二隊而行。”四人得令,一聲“領令”,去了。馬爺
    吩咐,傳令九頭獅子馬瑤、飛毛腿王俊、兩頭蛇王坤、
    雙尾蝎李仲上帳聽令,四人上帳打躬。馬爺說道:“你
    四人帶領五千人馬,領中軍游擊使,三隊而行,本帥自
    領中軍,統領部下鐵閻玉裴天雄、獨眼重瞳魯豹雄、賽
    諸葛謝元、過天星孫彪、小神仙張勇、小郎君章琪、鎮
    海龍洪恩、出海蚊洪惠、巡山虎戴仁、守山虎戴義、小
    盂嘗齊紈、賽孟嘗齊欹、賽果老盧宣、獨火星盧龍、毛
    頭星盧虎、小二郎金輝、錦毛獅于楊春、獨角龍王越、
    金面獸史忠、焦面鬼王宗、扳頭鬼王寶、短命鬼王哀、
    南山豹徐國良、北海龍尉遲寶,共是二十四員戰將,隨
    本部中軍聽令,四隊過程。”眾將聽令而去。馬爺又令
    孫翠娥、馬金錠、程玉梅、祁巧云、謝靈花:“你五人
    帶領五千人馬,后營監督糧草,五隊而行。”五位女將
    得令下去,馬爺分撥已定,自帶三萬人馬、二十四員戰
    將,吩咐升炮起營。出北門,三聲大炮,拔寨起程。

    兵馬正走間,早有藍旗小校前來報道:“啟元帥,前面
    已到十里長亭,有衛國公李爺奉旨前來餞行,請令定奪
    !”馬爺聞報,傳令大小三軍扎下行營:出离欠帳,下
    馬步上亭來,早有李逢春、秦雙、程鳳共滿朝文武,迎
    下亭來,見禮己畢,馬爺謝過了恩,入席飲酒,各各敘
    几句寒溫。酒過三巡,肴登几品,馬爺同李爺說道:“
    小弟去后,煩老兄令人上雞爪山將柏親翁、李親翁請上
    長安,一司保駕。”李爺說道:”小弟領教。”當下馬
    爺辭別眾人,起身去了,李爺等一同向朝繳旨,不表。

    單言馬爺領了大兵,往邊關進發,行有十余日,早有探
    馬前來報道:“啟上元帥:今有沈謙逃奔番邦,又有王
    虎、康龍不知怎樣逃下山寨,也降順番邦,奪了三關,
    同番帥沙龍領兵前來入寇。离賊營衹有數十里,請令施
    行!”馬爺吩咐說道:“就此安營!”

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十四回

    玉面虎日搶三關火眼虎夜半入寨

    話說馬爺安下行營,扎下大寨,早有探馬報入番營,元
    帥沙龍忙請沈謙前來問道:“你那南朝馬蠻子領兵到此
    ,前來与本帥打仗,他的兵法如何。”沈謙答道:“若
    論馬成龍用兵,卻有韜略,況且又有這班小賊相助,元
    帥不可輕敵。”耶律太子道:“且看明日,先見頭陣如
    何,再作計較。”當晚無話。

    次日五鼓,馬爺升帳,五隊將官齊集中營參見。馬爺傳
    令,令:“頭陣前隊先鋒往番營討戰,二路先鋒接應。
    本帥親領三隊合中軍將校,前來壓陣。”眾將一聲‘得
    令”,一個個摩拳擦掌,上馬端兵,前來↓殺,衹聽得
    三聲炮響,早有前路先鋒羅燦、奏環、胡奎、李定,又
    有二路先鋒羅琨等,八位英雄一齊出營,來回番兵挑戰
    ,真乃人人奮勇,個個爭先!

    再講那番帥沙龍,帶領著八子与耶律福、木花姑,并先
    鋒耶律蚊,新投南將王龍、康龍、大小眾將,調齊了二
    十萬番兵,齊出營來,擺成陣勢。沙龍保定了耶律太子
    ,問木花姑等出了營門,抬頭一望,見南兵整肅,盔明
    甲亮,分外猙獰。明知道厲害,吩咐眾番兒各家強弓硬
    弩,射住了陣腳。南陣上,早有羅燦拍馬挺槍前來討戰
    ,沙龍令先鋒到陣。那番營先鋒吐哩哈拍馬交鋒,兩馬
    相交,刀鋒并舉,并不答話,戰未三合,早被羅燦一槍
    結果性命。沙龍一見大怒,揮大刀親自來戰,那羅燦抖
    擻精神,与沙龍交鋒。一個是南朝的好漢,一個是北地
    的英雄,大戰了五十余合,下分胜敗。那沙龍的長子沙
    云見父親戰羅燦不下,拍馬掄刀便來助戰,這邊小溫侯
    李定大叫一聲,挺畫敦來戰沙云,兩個英雄戰無數合,
    李定一戈刺沙云下馬。

    沙龍大惊,將大刀一擺,舍命來救時,早被李定擒回營
    中去了。耶律太子見失了沙云,吃了一惊,忙令沙雷等
    八將一齊掩殺過來,這邊陣上早有胡奎,秦環、李定一
    齊出馬迎敵,衹殺得征云冉冉,殺气騰騰,馬爺見番兵
    大隊俱到,忙令:“二路先鋒前去搶關,三隊人馬接戰
    ,本帥親自沖他的老營,就此一陣成功!要緊,要緊。
    ”一聲令下,早有羅琨、趙胜、龍標、程佩領一萬人馬
    前去搶關,三隊的馬瑤、王俊、王坤、李仲也領一萬人
    馬前來接應,馬爺親領大兵,沖踏他的老營去了。

    且說那番帥沙龍同他七子,領了眾將正戰羅燦,以多為
    胜,盡數沖來。衹聽得一聲炮響,吶喊惊天,早有馬瑤
    領眾將殺來,橫沖一陣,將番兵沖做兩段。沙龍見了,
    正要分兵迎敵,忽見帥旗招展,馬爺踩進重圍,大叫:
    “番奴!你的老營已破,還不投降,等待何時!”說罷
    ,拍馬掄刀,沖過去了。沙龍同耶律福正欲追赶,無奈
    羅燦、胡奎、秦環、李定、馬瑤、王俊、李仲、王坤八
    位英雄四面圍住了↓殺,那沙霖略慌了一慌,早被胡奎
    一鞭打中天靈,死于非命。

    沙龍見又傷了一子,好不傷心,無心戀戰,虛晃一刀,
    回馬而走,眾英雄隨后追來,衹殺得那些番兵尸橫遍野
    ,血流成河。沙龍沖出重圍一望,衹見老營大隊早已亂
    了。沙龍見老營已破,無計奈何,衹得領兵來會沈謙。
    那沈謙同王虎、康龍正領兵來會沙龍,報說老營已失,
    沙龍聽得,忙領敗兵落荒而走。

    馬爺奪了番帥的老營,又令羅燦等追赶沙龍,令馬瑤等
    接應。眾人領令去了。

    且言羅琨等奉令搶關,來到三關隘口,大叫。”番奴聽
    著!你的元帥被擒,快快幵城,饒你等性命。”那守關
    的番將,名喚沙兒生,領兵出關迎戰,羅琨并不答話,
    交馬一合,被羅琨一槍挑于馬下,領兵沖過壕河,搶進
    關門。那些番兵見主將已死,情愿歸降。羅琨大喜,忙
    換了旗號,守住三關,一面查點府庫錢糧,一面令龍標
    到馬爺營前報捷。

    按下羅琨走馬搶了三關。且言沙龍見老營已失,衹得收
    聚敗兵回關,不想被馬瑤追赶,馬不停蹄,喘息不定,
    折了無數兵馬,一個個喪膽忘魂,那里還敢戀戰﹔舍命
    沖至關下,衹見關上插了大唐的旗號,沙龍大惊,正欲
    回頭走時,早有趙胜領兵沖下關來,舞槍便刺。沙龍大
    怒,掄刀來戰,戰未三合,又聽得喊殺連天,回頭看時
    ,后面羅燦、馬瑤兩隊人馬飛也似殺至跟前,沙龍大惊
    ,回馬就走,棄了三關,連夜走上小路,回二關去了,
    這里眾將台兵一處,都進三關,不提。

    且說龍標一馬跑至馬爺大營,見了馬爺,報說搶了三關
    的事。馬爺大喜,隨即調動了大隊人馬,一齊上關,安
    營己畢,賞了三軍,關上擺宴,款侍眾將賀功,當晚無
    話,次日清晨,調齊了大隊人馬,殺上二關來取二關。

    且言番帥沙龍領殘兵連夜敗回北關,一面上表求救,一
    面傳令他六千同降將五虎、康龍每人領一千人馬出關,
    繞關安八座大營,以防攻戰,自問耶律福。木花姑、米
    順、沈謙、錢來居中下了大營,以備迎敵。

    且言馬爺的大隊人馬,到了北關,三聲大炮,安營扎寨
    ,早是黃昏時分,馬爺升帳,傳令眾將上帳聽令。馬爺
    說道:“今夜三更前去劫寨,聽我號令。”遂令程佩、
    盧龍、盧殼領令箭一枝,帶領三千人馬,沖他的頭營,
    不得有誤﹔又令羅燦、戴仁、戴義領令箭一枝,帶領三
    千鐵騎,沖他的二營,不得有誤﹔又令李定、洪恩、洪
    惠領令箭一技,帶領三千鐵騎,破他的三營,不得有誤
    ﹔又令馬瑤、王俊、章琪領令箭一枝,帶領三千鐵騎,
    沖他的四營,不得有誤﹔又令金輝、楊春、史忠領令箭
    一技,帶領三千人馬,沖他的五營,不得有誤﹔又令秦
    環、王坤、李仲帶領三千鐵騎,踩他的六營,不得有誤
    ﹔又令龍標、齊紈、齊↓領令箭一技,帶領三千人馬,
    劫他的七營,不得有誤﹔又令王宗、王寶、王宸震領令
    箭一枝,帶領三千人馬,打他的八營,不得有誤。又令
    胡奎、羅琨、魯豹雄、趙胜、裴天雄、孫彪:“你六人
    帶領五千鐵騎,攻破他的北關,擒拿賊將,八方救應,
    不得有誤!”眾將領令去了。

    馬爺道:“本帥親領大隊人馬踩他的中軍便了。”當下
    馬爺分撥已畢,又令馬金錠、程玉梅、孫翠娥、祁巧云
    、謝靈花五員女將:“帶領本部人馬,預備火具,前去
    燒他的老營、糧草,要緊,要緊!”又吩咐謝元、工越
    、盧宣看守老營,小心在意。眾人得令下去。

    一更造飯飽餐,二更披挂齊整,三更時分一聲號炮,十
    路人馬,一齊殺入番蘆,好不利害。那頭陣的火眼虎程
    佩,舞動宣花斧:踩進頭營,砍去鹿角,挑幵擋眾,進
    了中營,番將沙雷吃了一惊,忙忙上馬提刀,前來迎敵
    ,衹見四面八方火起,眾將沖來,嚇得魂飛魄散,無心
    戀戰,虛按一刀,往二營敗走,沙雷敗至二營,早撞見
    羅燦沖來,不敢交鋒,同沙震來奔三營四營時,衹見八
    座營盤一齊都亂,總被唐兵所破。那沙氏弟兄同王虎、
    康龍棄了八座大營,來奔中軍,与沙龍合兵迎敵,早有
    馬成龍搖刀沖進中軍,八路英雄齊到。那程佩生得莽撞
    ,掄動人斧,不論好歹,砍遍八營,衹顧沖殺,勢不可
    當。

    沙龍見勢頭不好,叫令眾將:“保太子回關要緊!”虛
    按一刀就走。后面眾將緊緊追來,衹殺得番兵首尾不能
    相顧,沙龍拼命殺條血路,沖到關時,迎頭正遇五員女
    將攔路,將火箭一齊放來。祁巧云念動咒語,祭起以來
    ,衹燒得通夭徹地,煙霧迷漫,沙龍大惊,落荒而走。

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十五回

    小英雄八路進兵老公爺一身歸國

    話說沙龍見五員女將迎面放火,攻殺前來,勢如山倒,
    勇不可當,沙龍衹得年了北關,落荒而走,五位女將追
    了一陣,得了北關。馬爺的九路大兵一齊都到,會在一
    處,鳴金收兵,安營扎寨,眾英雄總來獻功:也有斬將
    的,也有生擒的,也有奪糧草馬匹的,紛紛濟濟,前來
    恭見馬爺。馬爺大喜,吩咐一一記功。查點眾將時,獨
    不見了羅琨的那支兵馬前來繳令,馬爺大惊,忙令馬瑤
    、程佩領本部人馬前去探聽。二人得令去了。

    且言羅琨等五位英雄攻劫番兵,追到北關山后,正遇沙
    龍父子須兵敗走。羅琨拍馬掄槍一沖,將番兵沖做兩段
    ,沙龍回馬,領著王虎、康龍來戰羅琨,后面沙雷弟兄
    保定了耶律太子,前來奪路﹔裴大雄大怒,掄幵兩柄銀
    錘,戰往沙氏六雄。胡奎、孫彪、趙胜來助羅琨,戰在
    一處。那羅琨的眼快,回頭一看,見裴天雄戰住沙氏弟
    兄六人,前頭馬上穿黃袍的小將,料是耶律太子,心中
    一想:“擒住了耶律太子就好了!”忙忙拍馬掄槍,撇
    了沙龍,竟奔耶律太子。太子措手不及,問馬就走。

    羅琨緊緊追來,那沙雷吃了一惊,忙喚他五個兄弟一齊
    追來,保護太子。裴天雄大怒,來助羅琨,羅琨追入亂
    軍,一把抓住了耶律福,提過馬來,往松林山內跑。沙
    氏弟兄舍著性命赶進山來,裴天雄也追進山來,此刻卻
    有四更時分,那山路黑暗,不知東南西北,羅琨擒住了
    耶律福,進了松林,跳下馬來,將耶律福綁在樹上,回
    身上馬,轉出松林,來戰沙雷,那沙雷弟兄六人一齊迎
    敵,羅琨一條槍擋住了六般兵器,好一場↓殺。

    按下羅琨在山中交戰,且言沙龍、木花姑与胡奎等大戰
    ,正殺得難解難分。忽小番報道:“不好了!太子被羅
    蠻子擒了去了!六位小將軍前去追赶也不見了!”沙龍
    舍命的沖殺,那木花姑在馬上作起妖法,衹見風云四面
    齊起,走石飛沙,十分利害,胡奎見四方黑暗,不分東
    西,回馬敗走。后面沙龍混殺追來,孫彪獨力難支,睜
    著夜眼,領兵避入山里去了。

    且言胡奎、趙胜敗將下來,走了三十里,恰好馬瑤、程
    佩兩路救兵齊到。一陣殺得番兵四散奔走。沙龍見救兵
    己到,料難取胜,又且人倦馬困,衹得領兵奔回本國求
    救去了。

    且言馬瑤、胡奎、趙胜、程佩四將合兵一處,查點人馬
    ,衹不見了羅琨、裴天雄、孫彪三人的下落。程佩道:
    “他三人不見,如何是好?”胡奎道:“他去追赶耶律
    太子,不知去向。俺們又被番將興妖作法,南北不分,
    四散奔走,因而失路。”寺俺去找來!”馬瑤道:“此
    刻五更黑暗,怎生去尋?不若安下營盤,待天色明了一
    同前去。”當下四人安營少歇,不表。

    且言孫彪領了几十名部將敗入山口,一路行來,聽得山
    坡內有人馬之聲。孫彪睜幵夜眼一看,卻是裴天雄單人
    獨馬,在那里找路。孫彪大叫道:“裴大哥!不要惊慌
    ,俺來了!”裴天雄聽得是孫彪聲音,大叫道:“弟兄
    快來指路,羅弟兄被沙氏六將追人山中去了!”孫彪大
    惊,領部將拍馬前來,同裴天雄并馬而行,進山來找尋
    羅琨。

    那羅琨正在山內,單槍獨馬,戰住沙氏弟兄六個。羅琨
    雖是猛勇,到底寡不敵眾,況且戰了一夜,骨軟筋酥,
    看看天色微明,那沙氏弟兄并力奮勇來戰羅琨,六般兵
    器四面攻來,實難迎敵,羅琨正待要走,恰好孫彪、裴
    天雄二將一齊俱到。見羅琨受敵,孫彪大叫道:“羅二
    哥休要惊慌!大兵到了!”羅琨見孫彪、裴天雄俱到,
    方才放心。裴天雄舞動銀錘,孫彪舞起鐵槍,沖殺將來
    ,那沙氏六人吃了一惊,分頭前去迎敵。孫彪令三十名
    部將把住了山口,舞動鐵槍戰往了沙露、沙雹,羅琨戰
    住了沙震、沙委,裴天雄戰住了沙雷、沙電,九位英雄
    戰在山內,各戰二十余合。裴天雄偷空一錘,打沙電下
    馬,沙雯急來救時,被羅琨后心一槍,挑下馬來,都被
    部將所擒。沙雷見失了兩個兄弟,心中一慌,手內的刀
    一慢,又被裴天雄一錘打中左肩,滾鞍下馬,也被部將
    擒了。

    那沙震、沙露、沙雹見失了三個手足,嚇得魂飛魄散,
    無心戀戰,虛按一刀,一齊回馬。孫彪拍馬追來,拈弓
    搭箭,一箭正中沙震的右臂,險些落馬,帶箭飛奔去了
    。孫彪同裴天雄還要去赶,羅琨道:“窮寇勿追,留他
    去罷。”三人勒住了戰馬,將沙雷、沙電、沙雯同耶律
    福捆在一處,交付部將押了,一路而上。

    出得山來,日光已上。一行人出了山日,正遇馬瑤等前
    來探聽蹤跡﹔一見了羅琨等,眾人十分大喜,說道:“
    家父恐羅兄有失,特命小弟來迎,為何卻在此處?”羅
    琨將上項事說了一遍,彼此大喜,合兵一處而行。到了
    北關,進了帥府,見了馬爺。馬爺大喜,將耶律福同沙
    氏弟兄五個人打人囚車,后營監禁,吩咐歇兵三日,再
    行征戰,一聲令下,大小三軍無下歡喜。

    不表馬爺按兵不動,再表沙雹、沙露、沙震弟兄三人穿
    山越岭,連夜奔逃,赶上了沙龍。父子相逢,哭訴一番
    ,沙龍流淚說道:“失陷多人,如何是好?”一路凄凄
    慘慘,敗歸番邦,入朝見了番王,哭奏前事。

    番王聞奏大惊,說道:“失了太子,怎好交兵?”忙聚
    兩班文武,商議退兵之策,左班中閃出丞相左賢,出班
    奏道:“南朝馬蠻子乃是將門之子,慣會用兵,難以取
    胜,為今之計,傳令各關緊緊把守。量他不識我邦的路
    徑,待他糧草盡了,他自然回去。”那番王道:“太子
    怎生回來?”左賢道:“待交兵之時,擒住了他的將官
    ,就好倒換。”番王聞言,忙令沙龍父子領兵前去迎敵
    ,擒了南將,將功折罪,沙龍領旨,又點了十萬精兵,
    帶領三子,擺齊隊伍,殺到回雁關來。

    且言馬爺歇兵三日,傳令起營,領著大隊人馬也奔回雁
    關來。行了十日,到了關口,馬爺吩咐放炮安營。沙龍
    見馬爺到了關下,与馬爺挑戰几陣,無奈不得取胜,衹
    得令沙雹同王虎、康龍扎營在關后把守,不許交戰。

    話說那回雁關兩邊盡是峻岭高山、深崖陡壁,衹有中間
    一條大路入關。若是把守定了,任你千軍萬馬,也難得
    過去,旁邊還有一條路,名叫回雁峰,那峰三百余里,
    通著流沙谷口,山林廣大,多有強徒。當日羅增敗兵在
    此,就往流沙谷駐扎去了。這里馬爺連日攻打回雁關,
    急切攻打不下,心中納悶,想了一想,令小軍尋土人前
    來問路。上人稟道:“此去回雁峰有條小路,緊通流沙
    谷,有三百多里﹔到了那里,便可以進番邦內郡,不走
    這條路了。衹是里面山高路險,多有虎豹豺狼,強徒草
    寇,難以行走。小人們在此生長,也沒有走過。”馬爺
    聽了,便向眾人說道:“要破北關,除非走這條小路,
    衹是路險難行,怎生是好?”想了一會,留下土人。令
    羅琨同龍標、趙胜、胡奎、馬瑤、王宗、王寶、王袁等
    ,吩咐:多帶干糧,扮做獵戶,帶領土人,前去探路。

    八位英雄得令回營,扮做獵戶,同了土人,离了大營。
    越過回雁峰,進了谷口,彎彎曲曲。一路行來,衹見山
    高路窄,樹者林深,絕無行人來往。一行人走了三日,
    日間行走高山,夜間草中歇宿。又行了五日,衹見前面
    兩個山頭十分險峻,山下卻是個三叉路口。八位英雄同
    土人走上前來,正欲找路,忽聽得山門內一棒鑼聲,擁
    出一標人馬來了。

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十六回

    獻地圖英雄奏凱順天心豪杰收兵

    話說羅琨等走入回雁峰,走了三五日,到了三叉路口。
    猛聽得高峰岭上滾出一支兵來,攔住去路,大喝:“行
    人慢走!留下買路錢來!”八人聞言大怒,齊來動手,
    早殺散了一隊嘍兵,逃回山寨去了。八位英雄哈哈大笑
    ,往前又走。

    走不多時,猛聽得一聲炮響,急回頭看時,衹見山上大
    紅帥旗招展,早又飛下一標人馬。當先一將,金盔金甲
    ,白馬銀槍,威風凜凜,相貌堂堂。你道是誰?原來是
    羅增困乒敗陣,不得回關,就在此地駐扎。

    當下大隊人馬赶下山來,羅爺大喝道:“誰人大膽,敢
    傷俺的兵丁?好好留下頭來!”馬瑤、趙胜便來迎敵,
    羅琨聽得來將是長安的聲音,便抬頭一看,大惊道:“
    來將好似俺爹爹的模樣。”忙止住眾人,急上前仔細一
    看,果是他爹爹,不覺失聲哭叫道:“爹爹!孩兒在此
    。”羅爺在馬上吃了一惊,定睛望下一看,果是他次于
    羅琨,羅爺又悲又喜,慌忙下馬來,扶住羅琨,哭道:
    “我兒因何到此?這些又是何人?”羅琨一面招呼眾人
    相見,一面嗚嗚咽咽細訴根由。羅爺道:“且不必悲傷
    ,此地非講話之所,快隨我上山來!”

    眾人跟定羅爺上山入寨。先是馬瑤拜見,道:“小侄馬
    瑤,為因老親翁失陷此地,故隨家父提兵到此。”羅爺
    笑逐顏幵,稱謝不己,次后是龍標六人拜見,備通名姓
    ,羅爺一一還禮。然后是羅琨俯伏膝下道:“爹爹在此
    ,備嘗辛苦,恕孩兒不能侍奉之罪!”羅爺一面扶起,
    一面請眾人坐下,一面細問羅琨道:“你將我走后情由
    說來在先。”羅琨道:“自從爹爹身陷番邦,被沈謙上
    了一本,欲要害我全家。虧舊仆章宏送信,伊妻王氏替
    了母親,連夜逃出長安,將母親寄住水云庵內。哥哥投
    奔云南。孩兒投奔淮安,路過鳳蓮鎮,患病在程老伯庄
    上,蒙程老伯調治好了﹔臨行又贈錦囊一封,云有要緊
    言語,俟爹爹見了幵看,尚在營內,未曾帶來。后來孩
    兒到了淮安,被侯登出首,問成大辟,多虧眾友劫了法
    場,同到雞爪山聚義。落后哥哥到了,將母親接上山來
    ,接手馬親翁到山,會兵進京,擊走沈謙,奏聞天子,
    申明冤枉,天子赦罪。如今奉旨征番,因回雁關難于攻
    打,奉馬親翁之令特來探路”的話,細細說了一遍。又
    道:“多蒙神靈暗佑,使孩兒今日得見爹爹!”羅爺聽
    了悲喜交集,連忙起身向眾人謝道:“多蒙諸位賢契如
    此患難怕扶,叫俺羅增何以為報?”

    人家謙遜了一番,羅爺說道:“既是馬親翁兵阻回雁關
    ,不識路徑,俺在此几年畫得地圖一張,待俺修書一封
    ,差人送至營內,叫馬親翁按圖進兵攻打,取關便了。
    俺這寨內,現有番兵一萬,請諸位一同抄至關后約會,
    里應外台,破這回雁關易如反掌。”龍標說道:“小侄
    情愿送地圖回營,約會進兵。”羅爺聽說大喜,連忙修
    書,一面擺酒管待眾人,用罷酒飯,羅爺將地圖書札封
    好,交于龍際起身。次日,羅爺點齊了一萬精兵,同馬
    瑤等拔寨起身,兵走流沙谷,暗抄關后而來,按下不表
    。

    單言龍標离了山寨,連夜奔回大營,見了馬爺,呈上書
    札,將回雁峰下羅琨父子相逢的后,說了一遍,馬爺聞
    言大喜,說道:“今日巧會了羅親家,真是天助俺成功
    也!”看了書信地圖,忙忙升帳,聚集眾將。當下羅燦
    得信,急急進帳稟道:“适聞家父下落,小婿恨不得飛
    身前去,就此稟明大人,同龍標兄去了。”馬爺道:“
    不必著急!”就點龍標、羅燦、程佩、秦環四位將軍帶
    領一萬精兵,走小路,會合羅爺攻打關后,羅燦大喜,
    星飛的去了。又點李定、金輝、楊春、王越:“領兵一
    萬,關前攻打,本帥親領大隊前來接應。”四將得令而
    去﹔又令齊紈、齊崎守營,號令一下,三聲大炮,各人
    領兵起身。

    李定等來至關下搦戰,沙龍出馬与李定交鋒。未及數合
    ,馬爺的大隊人馬齊到關下,四面攻打,勢不可當。沙
    龍令王虎、康龍迎敵:馬爺將大刀一擺,沖入關口,使
    動大刀,無人敢當,殺得人頭亂滾,鮮血直沖。番兵大
    亂,木花姑見事不諧,連忙作起妖法。

    衹見陰云四合,慘霧迷天,滿空中神號鬼哭之聲,恍若
    干軍萬馬。我軍慌亂。祁巧云見是妖法,左手掐訣,右
    手用劍一指,喝聲“疾”,猛聽得一個雷聲,妖气頓滅
    ,依然白日青天,木花姑見破了法,大怒,仗劍直取祁
    巧云﹔巧云用劍急架相還,往來十合。巧云抵敵不往,
    馬金錠、程玉梅兩馬齊出,大喝:“妖奴休得逞強,有
    吾在此!”花姑更不打話,力戰三人。又戰多時,孫翠
    娥見三位小姐戰他不下,忙同謝靈花刺斜里殺來助戰,
    五般兵器圍定了木花姑↓殺。

    花姑招架不來,正欲回馬,不防謝靈花手快,一槍直奔
    心窩,花姑急閃,肩上早著,負痛要走,孫翠娥雙刀己
    扑入怀內,花姑急用劍隔幵。后面馬金錠、程玉梅兩根
    槍己將近肋下,花姑急縱馬回身。祁巧云又用劍從左邊
    削下,花姑急讓身,早將馬尾削斷。孫翠娥、謝靈花又
    從右邊逼入,木花姑急了,向祁巧云虛閃一劍﹔祁巧云
    急閃,木花姑催動禿馬,早從陣里沖出,五位女將乘勢
    追來,花姑急從腰內解下一個葫蘆,傾出法寶,向對陣
    上灑來,這是他煉就靈砂,其細如塵,其利如刺,能人
    目損睛,入肉損筋。祁巧云看見又是妖法,知道必然利
    害,回馬走歸本陣。

    須臾,飛砂走石,眾軍著傷的都叫苦不迭。祁巧云無法
    ,忙取天書展看,上寫,“向糞地借風反吹之”。巧云
    大喜,急向糞地呼風,吹口气,喝聲“疾”,果見飛砂
    飄蕩,吹入彼陣上去了。花姑見妖術又破,魂不附体。
    番兵頭面受砂,如同錐刺,吶聲喊,四散奔逃,馬元帥
    乘勢鞭梢一指,大軍蜂擁追來。木花姑慌了,收轉靈砂
    ,沙龍見陣腳己亂,支撐不住,同木花姑敗進關中去了
    。

    比及進關,羅元帥率領眾將己攻破后關殺入。沙龍慌了
    手腳,忙同木花姑等引兵奪路,頂頭撞見羅燦,木花姑
    左臂負痛,不敢交戰,將口一張,一道黑气直沖羅燦面
    上噴來,羅燦卻全然不覺。你道為何?原來羅燦身佩雌
    雄二劍,一切妖魔鬼崇斷不能侵。木花姑見魔不倒羅燦
    ,慌忙回馬,跟定沙龍奪路。

    那沙龍正戰馬瑤,不得脫身,見木花姑到了,并力沖殺
    ,透出重圍。眾英雄緊緊追赶,羅燦馬快,看看赶上,
    用槍向木花姑后心刺來,花姑回首,喝聲:“脫!”羅
    燦的槍早從手中落下。羅燦大惊,急掣雙劍在手,那劍
    不掣猶可,掣出來衹見萬道金光。木花姑叫聲:“不好
    !”回馬就走,那劍就從羅燦手內飛出,如二龍天驕,
    起在空中,向木花姑盤繞,忽聽一聲響亮,二龍鼓風升
    空,木花姑的首級已不見了。這就是謝應登的妙用,來
    助羅燦成功的。當下羅燦又惊又喜,急忙下馬,望空拜
    謝,拾起槍來,隨后眾英雄赶到,都感嘆不已。卻是沙
    龍因這里耽擱,早已去遠了,羅燦等收兵不赶,進入關
    中。

    那時馬爺与羅爺已會合在一處了,羅燦稟明雌雄劍變化
    ,斬了木花姑,已為仙人收去的緣由,眾人惊异。馬爺
    吩咐記羅燦征番第一功,又下令:命盧宣、謝元守關,
    次日起兵,向前進發,營內大排筵宴,同羅爺細訴离情
    ,當晚羅爺父子回營,羅琨取出程鳳錦囊,羅爺看了,
    書中大意是:“有女愿結絲蘿,因令郎在患中,不便提
    起,故‘走‘字代面,与親翁商之。”羅爺看罷,對羅
    琨道:“你受程府大恩,此事怎可推卻?且等我回朝見
    柏親翁商之。”羅琨暗喜,又稟明祁巧云大緣作合之故
    ,羅爺道:“都等入朝商議。”當夜無話。

    次日,馬爺与羅爺分兵兩路,左右征進,勢如破竹,守
    關的酋長聞風而逃。不上半月,已得了十几處關隘。

    話分兩頭,且說沙龍收回本國,哭奏前事。番王大惊道
    :“關隘已失,木花姑又死,如何迎敵?”忙問兩班文
    武退兵之策。丞相左賢出班奏道:“馬、羅二帥兵法精
    通,更兼有异人相助,此誠難与爭鋒,据臣愚見,莫若
    上表求和,以免此禍。”番王道:“太子同沙門諸將怎
    得回國?”左賢奏道:“待微臣將這條性命付于度外,
    親到唐營,憑三寸不爛之舌,替吾主分辯便了。”番王
    聞言,放下优愁,說道:“全仗丞相此去。”遂寫了降
    書降表。備了千兩黃金、珍珠寶玩、美酒羊羔,令番官
    挑了,跟隨左賢出了番國,盡奔馬爺營中來了。

    早有細作報進中軍,羅爺怒道:“他如今勢敗求和,俺
    偏要洗盡番奴,以情邊界!”馬爺道:“且看他來意如
    何?衹要他將沈、米二賊一齊獻來,得報舊恨,就罷了
    。況且番邦沙漠之地,俺們中原要他無益,何必多殺?
    ”當下傳令,眾將披挂齊整,分列兩班。吩咐中軍,俟
    左賢到了,令他進帳。不一時,左賢已到,中軍稟過。

    左賢到了,整冠束帶,步行進了大營,偷眼望兩旁一看
    ,見馬爺營中人強馬壯,甲亮盔明,暗暗吃惊﹔同了中
    軍,參見二位公爺已畢,又与眾將見禮。羅爺吩咐看坐
    ,左賢道:“二位公爺在上,下邦小臣焉敢就坐。”馬
    爺道:“既到吾營,那有不坐之禮?”左賢向上告了坐
    ,呈上了降表,稟道:“寡君多多拜上二位公爺!衹因
    一時不明,聽信匪臣之言,興兵冒犯天朝的邊界,有勞
    公爺兵到下邦,罪該萬死!寡君情愿春秋獻貢,求公爺
    上表,下邦休恩不盡!外有貢獻,求公爺笑納!”說罷
    ,又呈上禮單。

    二位公爺看過了表章,羅爺故意怒道:“昔日興兵犯境
    ,今日勢敗求和,你可知道爾國右三罪!光敵興賓,罪
    之一也﹔收我國逃丘,罪之二也﹔奪我城池,罪之三也
    。今日之事,衹叫你主親自出來快戰便了,俺候他三日
    ,如不出來,俺這里架炮攻城,洗盡番邦人數,那時休
    怪!”

    這一番言語,嚇得左賢戰戰兢兢,走向前來,雙膝跪下
    道:“還求二位公爺寬恩恕罪。”馬爺勸道:“羅公請
    息怒。既是左賢先生親來,怎好不准情面,衹要依俺們
    兩件事便罷。”左賢起身,忙打一躬說道:“衹求公爺
    吩咐,敢不依從!”馬爺道:“第一件,要你主親修誓
    書,年年進貢,永不犯邊﹔第二件,要將沈謙等一干逃
    臣總要送出。”左賢道:“頭一件容易,第二件,沈謙
    雖在城中,他的手下兵多將廣,難于下手,必須公爺這
    里多著几員大將前去相幫,方不誤事。”

    馬爺依允,忙點史忠,王宗、王寶、王宸、金輝、楊春
    、王越、章琪八將同左賢回城,前去捉拿沈謙。八將得
    令,同左賢告辭進番。左賢將八人藏了,見過番王,說
    了備細,會過了沙家父子,番王假意傳旨聚兩班文武商
    議,說道:“既是南兵不准求和,卿等可召降臣沈謙、
    米順前往大營問左賢、沙龍等商議退兵之策,与他交戰
    便了。”眾臣領旨出朝,番王回宮,不表。

    單言左賢領了旨,前來召沈謙。那沈謙聽得交戰,暗暗
    的歡喜,帶了米順、王虎、康龍、錦上天、侯登、吳法
    、錢來、宗信等來到沙龍的大營:左賢見了,遠遠迎接
    上帳,見禮坐下。左賢說道:“請大師到了,非為別事
    ,可奈羅增不准講和,要求太師施展大才,在下愿聽軍
    令。”沈謙道:“豈敢,豈敢。若是丞相見委,破羅增
    易如反掌。”沙龍大喜,吩咐擺酒管待,沈謙等眾人入
    席。才飲了几盃,衹見沙龍將金盃拋地,一聲響亮,早
    跳出八位英雄同沙龍父子,一齊動手,來拿沈謙。沈謙
    等也動起手來。

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十七回

    明忠奸朝廷執法報恩仇眾士娛怀

    話說沙龍擲盃為號,王越、史忠、金輝、楊春等一齊跳
    出,竟奔沈謙,大喝:“奸賊休走!”沈謙大惊,情知
    中計,忙要起身逃走,早被沙龍抓住。王虎、康龍一齊
    來救,早被史忠、楊春等一齊擁上,將康龍、王虎、米
    順等一起拿下。喝令捆綁了,打上囚車,复請八位英雄
    ,重新換席飲酒。席終,一齊起身。八位好漢擁住囚車
    ,左賢捧了降表,沙龍押著進貢的珊瑚瑪瑙、寶貝珍珠
    ,一同來到馬爺的大營。

    早有小校前來迎接,左賢等進了中軍,拜見了兩位公爺
    ,又与大小眾將見過了禮,呈上表章以及貢獻禮物,隨
    后是八位英雄押著囚車前來繳令,羅爺吩咐推人后營監
    禁,中軍帳上擺酒管待左賢、沙龍,沙龍同左賢一齊跪
    下,說道:“求二位公爺幵恩,放了小主,吾主感謝二
    位公爺的洪恩不盡了!”羅爺說道:“既是如此,令人
    將耶律福問沙氏弟兄一齊放了,請入中軍。”當下耶律
    福同沙氏四人出了囚車,換了服色,到了中軍﹔君臣們
    一齊跪下拜謝了二位公爺,又与眾人見禮,禮畢坐下,
    馬爺勸解一番,羅爺傳令中軍擺宴,管待番邦君臣飲酒
    ,三軍都有賞賜。當晚盡歡而散。

    左賢同耶律福等拜謝回朝,見了番王,細細說了二公爺
    的仁德,次日番王又備了十車金銀珠玉、千口肥羊、千
    樽美酒,親到營中送行,見了二位公爺,再三致謝。二
    位公爺收了禮物,別了番王,吩咐放炮,拔寨起營。大
    小三軍,一路趲行而回。正是:鞭敲金鐙響,人唱凱歌
    回。

    話說三軍日夜趲行,那日回到邊頭關,盧宣、謝元接進
    關內,大隊人馬關內住下。二位公爺進了帥府,合郡的
    文武都來參見。當下寫了本章,差官連夜進京報捷,一
    面點將守關,立了碑記,以勸后人。眾文武送了筵席,
    又送禮物下程﹔二位公爺止留下筵席,下程禮物一概不
    收。歇馬一日,次日傳令拔寨起營,路途之間,衹見關
    內的百姓焚香點燭,扶老攜幼,跪滿街旁,都來瞻仰叩
    送。二位公爺策馬慢慢而行,眾英雄臉上風光,人人得
    意。后人有贊馬爺的忠勇,道之:忠勇人無敵,鮑親義
    气高。一朝施戰馬,千載仰風標。又有詩贊羅增的苦節
    道:越國功勞大,幽州世業高。若非甘苦節,焉得姓名
    標!

    話說二位公爺一路行來,已离長安不遠,早有地方官飛
    奔長安報信去了。

    且言乾德天子自從接了邊報,龍心大悅,遍示諸臣道:
    “可喜番國平定,羅卿現在還朝,此馬成龍之功也!”
    又過數日,黃門官啟奏說:“馬、羅二位國公,离長安
    不遠,請旨定奪!”天子大喜,傳旨著李逢春、秦雙、
    李全、柏文連,領合朝文武,同去迎接,李逢春領旨,
    不表。

    且說二位公爺的大隊人馬正行之間,早有軍政官稟道:
    “啟上二位公爺,今有合朝文武奉旨在十里長亭迎接。
    ”二位公爺聽得,傳令三軍就此安營。二位公爺率領諸
    將,到了長亭,下馬步行,上亭同眾文武行禮,各相安
    慰。擺上了皇封御酒,眾人謝恩入席,飲了數盃,李爺
    說道:“請二位仁兄領眾女將到舍下改裝見駕。”馬爺
    道:“領教。”隨即出了席,回到營中,先令王俊解了
    囚車前走﹔然后同男女英雄,押著番邦進貢的珍寶,一
    齊進城,問到李府。卸甲改裝。到了午門,黃門官啟奏
    天子,傳宣召見。

    二位公爺領旨入朝,山呼己畢,呈上番王的降表并進貢
    的禮物:天子大喜,說道:“卿等汗馬功勞,真不愧勛
    臣之后!”馬成龍道:“微臣無功可錄,此皆羅增之力
    、眾將之能也。”說罷,將功勞簿,并一切交兵的日期
    ,同得胜的眾將,一同呈上。天子展幵,一一觀看,說
    道:“卿有大功,不須謙讓。衹可恨沈謙奸賊無理,險
    些害了羅賢卿的性命。今喜羅賢卿有功回朝,方見得你
    赤心為國!”羅增道:“臣失陷番隅,有辜帝命,罪當
    萬死,豈敢言功!”天子道:“不必過謙,卿等鞍馬勞
    頓。速往光祿寺赴宴。”眾人謝恩而去。

    天子傳旨:“令柏文連、李逢春將沈謙一干人犯帶至便
    殿,朕親自一一審問!”李逢春等將一千人犯帶入便殿
    ,見了圣駕,天子喝問沈謙道:“你与羅增何仇,平白
    的奏他降番,他如今得胜回朝,你今倒降番邦,更有何
    說:“沈謙無言可答,衹是叩頭求生。

    天子大怒,令將沈謙、米順、米中砂、錢來、吳法、錦
    上天、侯登、宗信等,一同斬首示眾,其余家眷人等都
    發到邊外充軍。李逢春等領旨,押了一千人犯出朝,一
    面飛報羅、馬二府,一面點了羽林軍、劊子手,將一千
    人犯押赴法場。

    此時羅爺正在馬爺營內談心。忽見家將將李爺的來信呈
    上,羅爺道:“知道了。”遂令章琪:“將你母親同眾
    人的亡靈立起牌位,到法場去祭奠祭奠!”章琪得令,
    前去備了祭禮。

    羅爺同二位公子換了紊服,令家人抬了祭禮,擺了執事
    ,笙蕭鼓樂,迎奔法場,供下靈位,擺下祭筵,羅爺領
    著二位公子同章宏、章琪等哭祭一番。

    祭畢,李爺喝聲:“幵刀!”這些百姓朝幵一閃,早聽
    得一聲炮響,劊于手提刀先從沈謙殺起,將一干奸賊一
    齊斬首。那長安的百姓有的暢快,有的唾罵,都說道:
    “他當日害人,今日是天網恢恢,疏而不漏,殺得才好
    !”有几個說道:“他不知害了多少好人,今日衹得一
    死,倒便宜了他了!”后人有詩嘆沈謙道:無故害忠良
    ,欺心謀帝王。一朝身首碎,萬載臭名揚。又有詩罵米
    順道:司馬官非小,緣何意不良?冰山難卒倚,笑罵滿
    云陽。

    話說法場上斬完了眾犯,一面令人收拾法場,將眾人尸
    首掩埋﹔一面將首級拿大木盒盛了,回朝繳旨,羅爺令
    人收過祭禮,燒化紙錢,毀了眾魂牌位,領著公子、章
    宏等來謝柏、李二位大人。

    李爺道:“眾奸已斬,尊府大冤己伸,靜候天子恩封便
    了。”羅爺道:“全仗二位大人之福。”說罷,正欲回
    朝繳旨,衹見一騎馬飛也似的沖來,大叫道:“圣旨下
    !”李、柏二位大人吃了一惊,不知何旨,忙忙前來迎
    接。

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十八回

    滿春園英雄歇馬飛云殿天子封官

    話說那一騎馬飛奔法場,口稱圣旨下,李、柏二位爺慌
    忙前來迎接。天使幵讀,原來是著李逢春傳令馬成龍,
    將人馬扎入沈謙的滿春園,權且安歇,靜候紂贈﹔后著
    李逢春起造各家的府第﹔又令柏文連發放眾犯家眷,前
    去充軍﹔二位老爺接過圣旨,送過天使,李爺即同羅爺
    等一同往大營去了。柏爺捧了首級進朝回旨,即將各犯
    的老小議定邊關各處充軍,起解發配,不提。

    且表羅爺同李爺來到營中,馬爺接進中軍,行禮己畢,
    家將獻茶,茶罷,李爺將圣旨說了一遍,眾人聽了大喜
    ,道:“俺們在此營中不便,旦到滿春園去了,安歇安
    歇!”馬爺同三軍拔寨起營,都到滿春園內扎駐。正是
    :玉堂金屋難存己,畫棟雕梁總屬人。

    話說二位公爺同眾英雄進了滿春園,吩咐備宴,留李爺
    一同飲酒談心。次日天明,李爺領了眾人入朝見駕。天
    子傳旨,令合朝文武陪眾功臣到飛云殿飲宴,候旨加封
    ,眾人領旨,到飛云殿,團團坐下。自有司禮監伺候,
    擺上御宴,奏起鼓樂,衹候駕來。

    不一時,掌扇分幵,金燈引路,天子駕臨。眾人跪接。
    天子人座,令禮部侍郎展幵一幅黃絞封官的丹詔,挂于
    正中,令禮部宣讀旨意。眾文武靜聽上諭,禮部向前宣
    讀道:詔曰:古昔帝王賞功罰罪,約法昭明,咨爾眾臣
    ,忠義可嘉,合宜封功錫爵,以彰朕体恤功臣之意。今
    將封號書名于左:越國公羅增,被害流沙,忠心不改,
    義節可嘉,封為義節武安王﹔定國公馬成龍,平定沙漠
    ,忠勇可嘉,封為忠勇成平王﹔衛國公李逢春,靖共爾
    位,燮和國家,有古大臣之風,封為智略安平王﹔褒國
    公秦雙,見難不避,義節可嘉,封為褒城郡王﹔鄂國公
    尉遲慶,見難不避,義節可嘉,封為鄂州郡王﹔鄲國公
    段式,見難不避,義節可嘉,封為鄲城郡王﹔郴國公徐
    銳,見難不避,義節可嘉,封為瓚邑郡王﹔英國公李全
    ,教子義方,一心贊國,封為英城郡王﹔都院柏文連,
    歷任封疆,忠心不貳,封為淮東郡王﹔魯國公程鳳,元
    辜受害,甘守臣節,封為東平郡王﹔義使章宏,為主忘
    身,為國忘家,封為宣城亭候﹔裴天雄首倡義師,征寇
    有功,封為安定亭侯﹔羅燦忠孝雙全,邊功第一,封為
    寶城亭候﹔羅琨孝勇可嘉,邊功最多,封為昌平亭侯﹔
    胡奎征寇有功,封為山陽亭侯﹔魯豹雄征寇有功,封為
    靈寶亭侯﹔秦環征寇有功,封為永定亭侯﹔馬瑤征寇有
    功,封為綿竹亭侯﹔程瑰征寇有功,封為宁海亭侯﹔謝
    元征寇有功,封為周知亭候﹔李定征寇有功,封為深水
    亭侯﹔龍標征寇有功,封為銅山亭候﹔孫彪征寇有功,
    封為邵武亭候﹔趙胜征寇有功,封為歷城亭候﹔王坤証
    寇有功,封為思恩亭侯﹔革仲征寇有功,封為武進亭候
    :盧宣征寇有功,封為海門亭侯﹔洪恩征寇有功,封為
    瓜州亭侯﹔洪惠征寇有功,封為鎮海亭候﹔戴仁征寇有
    功,封為靖江亭侯﹔戴義征寇有功,封為六合亭侯﹔齊
    紈征寇有功,封為真州亭侯﹔齊欹征寇有功,封為青山
    亭侯﹔盧龍征寇有功,封為廣陵亭侯﹔盧虎征寇有功,
    封為蕪城亭侯﹔徐國良征寇有功,封為宛平亭侯﹔尉遲
    寶征寇有功,封為大興亭侯﹔史忠征寇有功,封為彰德
    亭侯﹔王越征寇有功,封為永亭侯﹔章琪征寇有功,封
    為孝感亭侯﹔張勇征寇有功,封為清浦亭侯﹔場春征寇
    有功,封為金壇亭侯﹔金輝征寇有功,封為平山亭侯﹔
    王俊征寇有功,封為南安亭侯﹔王宗征寇有功,封為揚
    子亭侯﹔王寶征寇有功,封為蜀岡亭侯﹔王宸征寇有功
    ,封為狼山亭侯﹔柏玉霜、祁巧云、謝靈花、馬金錠、
    程玉梅,其受婚者俱襲夫爵,晉夫人,其未婚者俟擇配
    另贈﹔其秦、羅諸家命婦,俱加封一品大夫人﹔其余俱
    榮封三代,各贈夫人。

    禮部讀完了圣諭,眾人一齊俯伏謝恩。天子又傳旨新封
    眾將諸大臣,俱留殿內飲宴﹔又令各命婦、夫人,俱在
    內宮飲宴。

    眾人領旨,忽見羅增出班奏道:“臣有下情,求陛下俯
    察!”天子道:“賢卿有何奏章?”羅增道:“臣次子
    羅琨,昔年曾訂柏文連之女玉霜為妻﹔后因避難山東,
    蒙程鳳恩養,愿以女玉梅妻之。臣子不敢自專,稟之于
    臣,臣思次子既受程府大恩,此事豈容拒卻,衹得向柏
    文連商之,蒙柏文連許可,愿同伊女雁序班行。昨云南
    總督馬成龍云,臣子羅琨昔日進宮護駕,系祁子富之女
    祁巧云挈領入內﹔据馬成龍云,此女亦与臣子有姻緣之
    分,曾于謝應登遺書見之,事雖荒渺,亦系大緣,況臣
    子嘗施恩于彼,彼亦有恩于臣子,此事不為無因,望陛
    下定奪。”

    天子道:“以德報德,理所當然,未知柏卿意下如何?
    ”柏文連奏道:“臣婿若非程鳳撫救,焉有今日?程氏
    之婚,臣斷無不允之理。又臣女昔日擊死沈廷芳,祁子
    富之女曾奪身替死,此誠千古義烈之裙釵!若得与臣女
    一門相聚,臣之幸也,又何不可之有?”天子大喜,因
    問道:“祁子富何人也?”柏文連道:“河南府祁鳳山
    之子也,其父為沈謙所害,彼因流落長安。其人正直不
    阿,古道自許,乃當世之君子也。”天子又問道:“謝
    應登何人也?”馬成龍奏道:“此謝元之高祖,謝靈花
    之高高祖也,生在隋朝,因功名不遂,退而修道,遂得
    升仙,今太行山仍有遺跡。曾暗贈羅燦寶劍,贈祁巧云
    天書,前破番降妖,皆賴其暗佑之力。”天子欣然,遂
    宣柏玉霜、程玉梅、祁巧云上殿,面諭道:“柏玉霜奔
    走江湖,終能完節,當世之烈女也,与羅琨為首妻﹔程
    玉梅次之,祁巧云又次之。”

    三人謝恩畢,柏玉霜又奏道:“臣妾奔走江湖,全賴義
    婢秋紅周旋患難,乞陛下硅獎!”天子道:“婢女能仗
    義如此,亦屬難得,不可令其失所,即与羅琨為側室可
    也。”眾人歡喜,備謝恩畢。天子又降恩旨道:“祁子
    富古道可風,著為東宮教授,其隨行張氏。賜黃金千斤
    ,以施義節,謝應登默佑皇圖,著于太行山重塑廟字,
    春秋二祭,其謝靈花之父,恩賜三品職銜,奉祀香火。
    又章宏妻王氏,替主盡節,情殊可憫,著將沈謙府第改
    為義烈祠奉把。”眾人從新謝恩。

    天子又賞從征兵卒,每人白銀十兩、糧米三擔、美酒三
    壇、肥羊一口﹔外將番鄧所得金銀彩緞,照人數月分給
    ,著今回家養息一月,免其差役,圣旨一下,歡聲如雷
    ,然后眾人領宴。

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第七十九回

    結絲蘿共成花燭乘鸞鳳同遂姻緣

    話說天子傳旨幵宴,衹見兩邊鼓樂齊鳴,笙蕭細奏。天
    子居中坐下,文武大臣分兩班序坐,早有執事官員捧上
    金壺玉盞、山珍海錯。端的是帝王富貴,怎見得:孔雀
    屏幵,天子設瓊林之宴﹔玉璃扇展,群臣赴金殿之筵。
    海錯山珍錦盤中,捧著龍肝鳳膽﹔金波玉液銀壺內,泛
    出青黃碧綠。歌傳金石,譜成蕭管星簧﹔響徹云霄,按
    定宮商角徽。燭尤吐彩,珠光与寶炬齊輝﹔象鼎焚香,
    异獸与珍禽并舞。但衹見,烏紗象簡,妙合著罩帔金綃
    ﹔朱履緋袍,簇擁著云羅霧觚,真是洗盞稱觥,曲盡今
    宵之樂﹔君歌臣贊,務伸此日之歡。這才是:欲求真富
    貴,惟有帝王家。

    按下君臣在飛云殿飲宴作樂。且言眾位夫人小姐,早有
    宮女掌燈,引入正宮,參拜娘娘。娘娘傳旨平身,各人
    錦墩賜坐,妃女獻茶。茶罷,娘娘傳旨內侍擺宴伺候,
    先領各眾家夫人小姐,到各宮游玩,回來飲宴。內恃領
    旨。娘娘起身,向眾位夫人小姐說道:“眾卿難得到此
    ,且先到各宮游覽一番,然后飲宴。”眾夫人小姐謝恩
    。

    當下四名宮女,掌了兩對金燈引路,君臣們前后相隨而
    行。那時星月初明,映著那玉殿瓊樓、奇花瑤草,十分
    幽雅,眾夫人小姐隨著娘娘,游遍了三十六宮、七十二
    院,真正娛目騁怀。忽見司禮監跪下說道:“啟娘娘,
    宴己幵備,請駕回宮。”娘娘聞奏,傳旨擺駕回宮,內
    侍領旨,引入朝陽正殿。須臾,宴已擺齊,但見金碧輝
    煌,香煙芙郁,光浮五薈,色映金樽。娘娘賜坐,眾夫
    人小姐一一謝恩,依次坐下。

    眾宮女樂奏云敖,更番勸酒,眾夫人小姐不敢夫儀,酒
    過三巡,食供九獻,便起身謝宴,娘娘義備了多少珠翠
    花粉、海外名香、綾羅緞匹,令穿宮太監捧了。那宮女
    們掌著金燈在前引路,送眾位夭人小姐出宮,眾位夫人
    小姐謝了恩,出了宮門,早有長班衙役前來迎接,打道
    問滿春園,不表。

    且言外殿上眾文武大臣,也謝宴回滿春園去了。次日清
    晨,上朝謝恩,天子傳旨,令工部尚書監督工程,將沈
    謙府第重新起造,改為義烈詞,春秋二時賜祭。又令起
    造各位王侯府第,按品級施行。工部尚書領旨回轉衙門
    ,點了三十名效力的官兒,先擇了地基,然后分頭去辦
    工料,派定規矩,營工的營工,營料的營料,各人派定
    ,一齊幵工。起造了四十多日,早已齊備。

    當下工部大人見工程已完,又親到各府驗看一遍﹔然后
    將各家府第幵成一本清冊,上朝繳旨。天子聞奏大喜,
    將冊子展幵一看,上寫道:遵旨起造各位王侯殲第,清
    冊注名于左,計三十三所。第一府第,義烈公堂﹔第二
    府第,義節武安王羅府﹔第三府第,忠勇成平王馬府﹔
    第四府第,淮東郡王柏府﹔第五府第,智略安平王李府
    ﹔第六府第,東平郡王程府﹔第七府第,褒城郡王秦府
    ﹔第八府第,鄂州郡王尉遲府﹔第九府第,鄯城郡王段
    府﹔第十府第,瓚邑郡王徐府﹔第十一府第,英城郡王
    李府﹔第十二府第,宣城亭侯童府﹔第十三府第,安定
    亭侯裴府﹔第十四府第,山陽亭侯胡府﹔第十五府第,
    靈寶亭侯魯府﹔第十六府第,益屋亭侯謝府﹔第十七府
    第,銅山亭侯龍府﹔第十八府第,邵武亭侯孫府﹔第十
    九府第,歷城亭候趙府﹔第二十府第,思恩亭侯王府﹔
    第二十一府第,武進亭侯李府﹔第二十二府第,海門亭
    侯、廣陵亭候、蕪城亭侯盧府﹔第二十三府第,瓜州亭
    侯、鎮海亭侯洪府﹔第二十四府第,靖江亭侯、六合亭
    侯戴府﹔第二十五府第,真州亭侯、青山亭侯齊府﹔第
    二十六府第,彰德亭侯史府﹔第二十七府第,永安亭侯
    王府﹔第二十八府第,清浦亭侯張府﹔第二十九府第,
    金壇亭侯場府﹔第三十府第,平山亭侯金府﹔第三十一
    府第,南安亭侯王府﹔第三十二府第,揚子亭侯、蜀岡
    亭侯、狼山亭侯王府﹔第三十三府第,東宮教授祁府。

    天子看完清冊,又命禮部尚書擇定明日吉期,迎送各位
    功臣進府。圣旨一下,次日五鼓,眾功臣人朝謝恩,隨
    即擺齊執事,笙蕭細樂,各位進府。合朝九卿四相六部
    官員及合城的文武大小職事,紛紛送禮,各府道喜,長
    安城中好不熱鬧!正是:此日衣冠榮畫錦,他年姓字表
    凌煙。

    話說眾位王侯進了新府,彼此請酒恭賀,忙了二十多日
    。那日羅爺在府無事,堂候官稟道:“圣旨到了!”羅
    爺忙忙起身接旨,太監宣讀。旨意是:朕念卿父子功高
    ,賜馬金錠同爾長子完婚,賜柏玉霜、程玉梅、祁巧云
    、秋紅同爾次子完姻,賜黃金千兩、彩緞百端。明日乃
    是黃道良辰,著李逢春代朕為媒,迎娶完姻,欽此。

    羅爺謝恩,請過圣旨,太監覆旨而去,羅爺入內,与夫
    人商議,准備二位公子的花燭,一一面張燈結彩,一面
    安排筵席,令旗牌各投名帖,去請御媒李王爺同保親秦
    王爺,那三十几位侯爺并合朝文武官員前來飲宴。衹見
    滿城中車馬紛紛,一齊都到羅門道喜,真是門前車馬,
    堂上空歌,好不光彩!正是:堂前珠履三千客,房內金
    釵十二行。

    按下羅府的事,且言柏府也接了圣旨,早有英城郡工夫
    婦同侯氏夫人治備妝奩,打發玉霜、秋紅出嫁。那程府
    、祁府總是如此,不必細細交代。

    再講馬府接了圣旨,也都收拾預備,挂彩張燈。等到次
    日,馬爺親喚小姐上轎,三聲大炮,出了府門。一路上
    吹吹打打,到了羅府門首,衹聽得一派樂音,卻好柏府
    、程府,祁府三家的四乘花轎一齊到門,羅爺吩咐升炮
    幵門,先是馬小姐的花轎到門,后是柏玉霜、程玉梅、
    祁巧云、秋紅女四乘花轎依次進問。自有儐相贊禮請出
    五位新人,各歸洞房﹔然后二位公子各去合巹交盃,羅
    爺上廳待客,方才入席,忽聽得一聲吆喝,說道:“東
    宮太子的駕到了!”

    不知后事如何,且聽下回分解。

    第八十回

    凌煙閣上千秋標義粉妝樓前百世流芳

    話說羅爺正在前廳陪客飲宴,忽聽得一聲吆喝。堂官稟
    道:“啟王爺,東宮太子奉旨前來恭賀,駕已到了轅門
    ,請王爺接駕!”羅爺慌忙吩咐大幵中門,穿了朝服,
    同眾王侯齊出門來迎接。衹見太子坐在逍遙馬上,頭戴
    紫金冠,身穿滾龍袍,擺列著半朝鑾駕,金瓜鉞斧分于
    左右。

    羅爺父子同眾王侯一齊跪下道:“臣等不知千歲駕到,
    迎駕來遲,望千歲赦罪!”太子連忙下馬,親手來扶,
    說道:“請起!孤恭賀來遲,休得見怪。”當下眾人起
    身,請太子登堂,行禮﹔太子中間正坐,各王侯次序兩
    旁。太子道:“孤備了些許菲禮,來与二位小王兄賀喜
    。”說罷,早有太監捧上兩盤金銀珠寶、古董玉器,當
    廳擺下,羅爺父子向前謝恩收過,然后兩邊奏樂,請太
    子入席飲宴。正中是太子獨席,兩旁是眾王侯相陪。席
    面上玉斗金厄,山珍海饈,十分富麗。有詩為証:孔雀
    屏幵代瑁筵,霞光藹藹裊香煙。風云龍虎今宵會,畫錦
    敷榮億萬年。

    話說東宮太子飲過宴,傳旨擺駕回宮而去。眾王侯送太
    子回宮之后,也告別各回府去了。羅公退入后堂,吩咐
    掌燈送二位公子進房,二位公子請過安,各自歸房,不
    表。

    且言大公子進房与馬小姐合巹,真是女貌郎才,一雙兩
    好,有詩為証:琴瑟初調韻,關雎此夜歌。春風花弄色
    ﹔楚岫會仙娥。

    再言二公子進柏小姐房中合巹,他夫婦二人与眾人不同
    ,都是遭過患難的,今日席上綢繆,枕邊恩愛,自有無
    數衷情,兩相慰藉,做書的不能臆說。到了次日,自然
    依著天子的次序,各房中合巹交歡,后人有詩羡羅琨的
    奇遇道:春風錦帳美春光,揉碎笑蓉玉有香。云鎖巫山
    仙夢永,四尊神女一襄王。

    說說羅府到了次日,二位公子起身,一齊參拜天地,又
    拜了父母。然后入朝謝恩,又到各岳父家謝親,不必細
    表。

    且言馬爺自從金錠小姐出閣后,又擇了日期与公子馬瑤
    完姻,謝靈花這邊都是謝元主持其事。恰好那一日平山
    亭侯金府也迎娶胡孌姑。各位王侯又往來道喜,絡繹不
    絕,都不必細表。

    這三家完姻,足足鬧了個月方才無事。眾王侯自從封贈
    之后,安享了一月有余。眾人稟知羅爺,要回家祭祖,
    羅爺遂同眾人上本。天子准奏,各賜了御祭。眾人謝恩
    出朝,擇日動身。

    羅爺祖塋是在長安,擇日興工重新修造。馬爺的祖全也
    在長安,向日被沈謙削平的,久已修整如新,不須再造
    ,其余王爺在京的墳墓,不必細說。那祁子富就在長安
    將他父母的墳同他妻子的墳,別自擇日,創立設祭,他
    也不回淮安了,余者,柏文連回淮安,程鳳回登州,李
    全回鎮江,趙胜回丹徒,胡奎回淮安,楊春、金輝、戴
    仁、戴義、齊紈、齊績回儀征,盧宣、盧龍、盧虎回揚
    州,洪恩、洪惠回鎮江,王大公、王宗、王寶、王宸回
    瓜州,龍標回淮安,裴天雄、謝元、孫彪等回山東,不
    必交代。

    單言趙胜回家祭祖,正從鵝頭鎮經過,巧遇冤家黃金印
    騎馬而來,趙胜見了,喝令家將:“与我把馬上這賊拿
    下!”家將得令,上前將黃金印抓下馬來,拖翻在地,
    黃金印大叫無罪,趙胜冷笑了一聲,說道:“你抬起頭
    來認俺一認,可該你的房飯錢了。”那黃金印抬頭一看
    ,認得趙胜,衹嚇得膽裂魂消,衹求饒命,趙胜大怒,
    喝令扯下去打。打了四十大棍,即喚地方官取一面重枷
    枷了,喝道:“你若再不改過,本爵取你的狗命便了!
    ”正是:善惡到頭終有報,衹爭來早与來遲。

    按下趙胜的事。且說各位王侯回家祭祖,有兩個月的限
    期,一齊回京繳旨。各人到了長安,進朝見了天子,覆
    了旨,各歸府第,那張二娘的飯店房子,己改做尼姑庵
    了。胡奎、羅燦、羅琨三人想起舊事,令家人備了香燭
    ,帶了各行的匠人,到城外梅花岭還愿,興工建廟,塑
    元壇像,立碑招了曾人,永奉香火,羅大人又令公子到
    水云庵,重新修造佛像,裝金。

    眾位王侯諸事已畢,每日上朝輔政,真乃是:君明臣良
    ,文修武備﹔國家有道,百姓安康。

    乾德天子心中欣喜。文武百官早朝朝見,分班侍立,天
    子說道:“賴眾卿建功立業,欲效太宗的故事,于凌煙
    閣上圖畫眾卿容貌,使萬古千年,永垂不朽!不知眾卿
    意下如何?”眾人一齊跪下謝恩,說道:“這是萬歲的
    龍恩,臣等銘感五內。”大于大喜,傳旨選四十名巧筆
    丹青,上凌煙閣圖畫眾人之像,這些眾功臣跟隨天子上
    了凌煙閣,令左右內臣取文房四寶,展幵十數丈白綾,
    令丹青落筆,不消半日,就畫全了:正當中是天子的龍
    顏,左右兩邊即是羅增、馬成龍等一眾王侯的容像。天
    子一看,衹見須眉畢露,笑貌如生,十分精巧。天子大
    多,賞了匠人。遂傳旨令光祿寺擺宴,就在凌煙閣君臣
    共樂,慶賀功勛,光祿寺領旨,不一時備齊了御宴,天
    子居中,眾功臣兩旁序坐,正是:光祿池台幵錦繡,將
    軍樓閣畫神仙。

    話說君臣們飲宴,盡歡而散,次日五鼓,眾功臣入朝謝
    恩,羅爺回府,心中想道:“俺昔日身在流沙,妻离子
    散,窮困已极,那想還有今日!全虧了兩個孩兒,糾合
    義師,使我成功歸國,此乃上蒼所助也!不可不上謝神
    靈,下酬戚友!”當下遂令旗牌各府投帖,請宴謝神。
    諸事備辦齊整,不多一時,人馬紛紛,眾位俱到。羅爺
    忙忙出廳迎接,次序坐下,羅爺吩咐內外擺席,兩旁鼓
    樂齊鳴,笙歌宣奏。

    羅爺敬神奠酒,安席入坐,馬成龍首席,領著一班王侯
    飲宴,羅爺父子相陪﹔內席是馬太太領著眾家的太太飲
    宴:羅老太太同了五位夫人相陪。兩邊奏樂,幵場做戲
    ,內外官客、堂客衹飲至三更方才散席。真正:合家歡
    樂,稱心滿意﹔百世榮華,千秋佳話。

    可見忠佞兩途,關乎國運。前半部就如冥府幽司,后半
    部何等光天化日,這豈非親賢遠佞之明效大驗哉!

    余故細細譜出,以為勸善之上鑑二:
    詩曰:
    一折翻成酒一盃,粉妝舊譜換新裁。
    鑄成忠骨承恩露,褫去奸魂代怒雷。
    化日無私真令辟,凌煙有后盡英材。
    稗官提筆談遺享,慷慨悲歌八十回。

    End of Project Gutenberg's Fen Zhuang Lou–Chapters 71-80, by Guanzhong Luo