चन्द्रकांता सन्तति २
किशोरी की हालत पर अफसोस करती हुई कमलिनी अभी नीचे देख ही रही थी कि यकायक उस कमरे का दरवाजा खुला और एक खूबसूरत नौजवान अमीराना पोशाक पहने अन्दर आता हुआ दिखाई पड़ा। उसके पीछे हाथ में पंखा लिए एक लौंडी भी थी जिसने अन्दर पहुँचने पर उस दरवाजे को उसी तरह बन्द कर दिया।
इस नौजवान की उम्र लगभग पचीस वर्ष के होगी। दर्म्याना कद, गोरा रंग, हाथ-पैर से मजबूत और खूबसूरत था। वह किशोरी के पलंग के पास आकर खड़ा हो गया और गौर से उसकी तरफ देखने लगा। उस पलंग के पास ही एक मोढा कपड़े से मढ़ा हुआ पड़ा था जिसे लौंडी उठा लाई और पलंग के पास रखकर पंखा झलने लगी। नौजवान ने बड़े गौर से किशोरी की नाड़ी देखी और फिर उस लौंडी की तरफ मुँह करके कहा, "गश आ गया है।"
लौंडी––कमजोरी के सबब से।
नौजवान––एक तो बीमार, दूसरे कई दिन से खाना-पीना सब छोड़ दिया, फिर ऐसी नौबत तो हुआ ही चाहे। अफसोस, यह मेरी बात नहीं मानती और मुफ्त में जान दे रही है।
लौंडी––इस जिद का भी कोई ठिकाना है!
नौजवान––खैर चाहे जो हो, मगर दो बात से तीसरी कभी हो ही नहीं सकती, या तो यह मेरी होकर रहेगी या इसी अवस्था में पड़ी-पड़ी यमलोक को सिधार जायगी। अच्छा, इसे होश में लाना चाहिए।
"जो हुक्म" कह कर लौंडी वहाँ से चली गई और एक आलमारी में से जो पलंग के सिरहाने की तरफ थी, कई बोतलें निकाल लाई, जिन्हें उस नौजवान के पास रख कर दह फिर पंखा झलने लगी। नौजवान ने अपनी जेब में से रूमाल निकाल कर एक बोतल के अर्क से उसे तर किया और दूसरी बोतल में से थोड़ा-सा अर्क हाथ में लेकर किशोरी के मुँह पर छींटा दिया। इसके बाद वही रूमाल नाक के पास ले जाकर कुछ देर तक सुँघाया। जब उससे कुछ काम न चला तो तीसरी बोतल से अर्क लेकर उसके मुँह पर छींटा दिया। थोड़ी देर में किशोरी का गश जाता रहा और उसने आँख खोल कर देखा मगर जैसे ही उस नौजवान पर निगाह पड़ी वह काँप उठी और दोनों हाथों से मुँह ढाँप कर बोली––
"हाय, न मालूम यह चाण्डाल अब क्यों मेरे पास आया है!"
नौजवान––मैं इसी वास्ते आया हूँ कि एक दफे तुमसे और पूछ लूँ।
किशोरी––एक दफे क्या सौ दफे कह चुकी कि तू मुझसे किसी तरह की उम्मीद न रख। मैं तेरी सूरत देखने की बनिस्बत मौत को हजार दर्जे अच्छा समझती हूँ!
नौजवान––क्या अभी तक तुझे इस बात की उम्मीद है कि इन्द्रजीतसिंह आकर तेरी मदद करेंगे और छुड़ा ले जायेंगे?
किशोरी––मुझे क्या पड़ी है कि इन सब बातों का तुझे जवाब दूँ? मैं तुझ पर बल्कि तेरे सात पुश्त पर थूकती हूँ। चाण्डाल, हट जा मेरे सामने से?
लौंडी––(नौजवान से) हुजूर, इस कमीनी औरत से क्यों बेइज्जती करा रहे हैं? इसमें क्या ऐसा हीरा जड़ा है?
नौजवान क्रोध के मारे काँपने लगा, आँखें लाल हो गईं, और दाँत पीसता हुआ मोढ़े पर से उठ खड़ा। दाहिने हाथ से वह छुरा निकाल लिया जो उसकी कमर में छिपा हुआ था और बाएँ हाथ से किशोरी का हाथ पकड़कर यह कहता हुआ उसकी तरफ झुका, "जब ऐसा ही है तो मैं इसी समय क्यों न तुझे यमलोक पहुँचाऊँ!"
उस नौजवान और किशोरी की यह अवस्था देख कर कमलिनी परेशान हो गई और सोचने लगी कि इस जल्दी में कौन सी तरकीब की जाय कि किशोरी की जान बचे। मगर वह कर ही क्या सकती थी? एक तो वह स्वयं चोरों की तरह कोठरियों में घूम रही थी, यदि किसी को जरा भी शक हो जाय तो उसकी जान पर आ बने। दूसरे, कोई ऐसा रास्ता भी नहीं दिखाई देता था जिधर से किशोरी के पास पहुँचकर उसकी सहायता करती। मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि कमलिनी बहुत होशियार चालाक और बुद्धिमान थी। उसने बहुत जल्द ही दिल में इस बात का फैसला कर लिया कि अब क्या करना चाहिए। एक खयाल बिजली की तरह उसके दिल में दौड़ गया मगर देखना चाहिए उससे कहाँ तक काम निकलता है।
जिस समय किशोरी को मारने के लिए वह नौजवान झुका और कमलिनी को मालूम हुआ कि अब उस बेचारी का काम तमाम होना चाहता है उसी समय कमलिनी ने अपनी कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल लिया और जिस मोखे में देख रही थी उसके अन्दर डाल कर उसका कब्जा दबाया । यह खंजर बिजली की तरह चमका और उस कोठरी में इतनी ज्यादा चमक या रोशनी पैदा हुई कि तुरत किशोरी और उस नौजवान की आँखें बिल्कुल बन्द हो गई जो किशोरी को मारना चाहता था, इसके साथ ही कमलिनी ने भारी स्वर में यह आवाज दी, "खबरदार! किशोरी की जान लेकर अपनी जान का ग्राहक मत बन!"
उस बिजली की चमक ने तो नौजवान को परेशान कर ही दिया था, मगर साथ ही कमलिनी की आवाज ने जो गैव की आवाज मालूम होती थी उसे बदहवास कर दिया और वह इतना डरा और घबराया कि बिना कुछ सोचे और किशोरी को दु:ख दिये उस कोठरी से निकल भागा। कमलिनी ने भी अब उस जगह ठहरना मुनासिब न जाना। जहाँ तक जल्द हो सका अपने कमरे में चली आई। उस तख्ते के दरवाजे को जिसे खोल दूसरी कोठरी में गई थी ज्यों-का-त्यों बन्द करने के बाद अपने कमरे का दरवाजा भी खोल दिया जो दूसरी कोठरी में जाने के पहले भीतर से बन्द कर लिया था।
इस समय रात बहुत थोड़ी रह गई थी। कमलिनी ने चाहा कि दो घण्टे आराम करे मगर जो कुछ अद्भुत बातें उसने देखी और सूनी थीं, उनके खयाल और विचार न आराम लेने न दिया और उसे किसी तरह नींद न आई। अभी आसमान पर सुबह का सफेदी अच्छी तरह फैलने भी नहीं पाई थी कि दरवाजा खुलने की उसे आहट मालूम हुई। कमलिनी ने दरवाजे की तरफ देखा तो नागर पर नजर पड़ी।
कमलिनी पहले ही से सोचे हुए थी कि आज की अद्भुत बातों का असर कुछ न कुछ नागर पर जरूर पड़ेगा और वह सवेरा होने से पहले ही यहाँ पहुँचेगी बल्कि ताज्जुब नहीं कि वह मुझ पर किसी तरह का शक भी करे। आखिर कमलिनी का सोचना ठीक निकला।
इस समय नागर के चेहरे पर परेशानी और उदासी छाई हुई थी। उसने आते ही कमलिनी पर एक तेज निगाह डाली और सवाल करना शुरू किया––
नागर––इस समय तुम्हारी आँखें लाल मालूम होती हैं, क्या नींद नहीं आई?
कमलिनी––हाँ दो घण्टे के लगभग तो मैं सोई मगर फिर नींद नहीं आई, अभी तक डर के मारे मेरा कलेजा काँप रहा है। यह उम्मीद न थी कि तुम मुझे एसी भयानक जगद सोने के लिए दोगी क्योंकि मैंने तुम्हारे साथ किसी तरह की बुराई नहीं की था।
नागर––(ताज्जुब से) सो क्या? तुम्हें किस बात की तकलीफ हुई और यहाँ पर क्या भयानक वस्तु देखने में आई?
कमलिनी––मैं यहाँ पर अब एक सायत भी नहीं ठहर सकती, केवल तुम्हारा राह देख रही थी।
नागर––आखिर मामला क्या है, कुछ कहो भी तो।
कमलिनी––अच्छा, बाहर चलो तो जो कुछ देखा है तुमसे कहूँ।
इसमें कोई शक नहीं कि नागर बहुत तेजी के साथ आई थी और उसे कमलिनी पर शक था मगर कमलिनी ने ऐसे ढंग से बातें कीं कि उसकी हालत बिल्कुल ही बदल गई और वह तरह-तरह के सोच में पड़ गई। नागर और कमलिनी बाहर आई और सहन में एक संगमरमर की चौकी पर बैठकर बातचीत करने लगी।
नागर––हाँ कहो, तुमने क्या देखा?
च॰ स॰-2-2
कमलिनी––दो घण्टे तो मैं बड़े आराम से सोई पर यकायक घड़घड़ाहट की आवाज सुन चौंक पड़ी और घबरा कर चारों तरफ देखने लगी।
नागर––घड़घड़ाहट की आवाज कैसी?
कमलिनी––मालूम होता था कि इस कमरे के नीचे कई गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। पहले तो मुझे शक हुआ कि शायद भूकम्प आने वाला है क्योंकि उसके पहले भी प्रायः ऐसी घटना हुआ करती है, मगर सो न हुआ। आखिर थोड़ी देर तक राह देख कर फिर सो रही। आधा घण्टा भी न हुआ होगा कि मेरी चारपाई हिली, मैं घबरा कर उठ बैठी और अपने सामने एक कम-उम्र लड़के को देख कर ताज्जुब करने लगी।
नागर––(ताज्जुब से) कम-ऊम्र लड़का! या कोई औरत थी? शायद तुमने अच्छी तरह खयाल न किया हो।
कमलिनी––जी नहीं, जहाँ तक मैं समझती हूँ, वह लड़का ही था!
नागर––भला उसकी उम्र क्या होगी? और सूरत-शक्ल कैसी थी?
कमलिनी––शायद चौदह या पन्द्रह वर्ष होगी, चेहरा खूबसूरत और रंग गोरा, सिर पर मुँडासा बाँधे और हाथ में एक बड़ा-सा डिब्बा लिए था।
नागर––(कुछ सोच कर) तुमने धोखा खाया, वह जरूर कोई औरत बल्कि कमलिनी … अच्छा, तब क्या हुआ?
कमलिनी––उसने आते ही मुझसे पूछा कि 'सच बता, किशोरी कहाँ है?'
नागर––आते ही किशोरी को पूछा?
कमलिनी––जी हाँ। मैंने जवाब दिया कि 'मुझे खबर नहीं।' इतना सुनते ही उसकी आँखें लाल हो गई और गुस्से के मारे थरथर काँपने लगा। उसने वह बड़ा डिब्बा जो हाथ में लिए था जमीन पर दे मारा। उस डिब्बे में से इतनी तेज चमक पैदा हुई कि जिसे मैं अच्छी तरह बयान नहीं कर सकती। मालूम होता था कि आसमान से उतर कर कई बिजलियाँ एक साथ कमरे के अन्दर आ घुसी हैं। मेरी आँखें एकदम बन्द हो गई और मैं काँप कर चारपाई पर गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद मालूम हुआ कि कोई आदमी मेरे बदन पर हाथ फेर रहा है। बस, उस समय मैं बेहोश हो गई और तन-बदन की सध जाती रही। मैं समझती हूँ कि कोई पहर भर के बाद मुझे होश आई और तब से बराबर जाग रही हूँ। मैंने बहुत चाहा कि कमरे से निकल भागूँ मगर डर के मारे हाथ-पैर ऐसे कमजोर हो गए थे कि चारपाई से उठ न सकी, इस समय जब तुम्हारी सूरत देखी तो जरा जी ठिकाने हुआ।
नागर––(कुछ देर सोचने के बाद धीरे से) बेशक यह काम मँझली रानी का है, दूसरे का नहीं।
कमलिमी––मँझली रानी कौन?
नागर––तुम उसे नहीं जानती हो।
कमलिनी––खैर, जो हो, मैं तो सोचे हुए थी कि कल या परसों जब मैं अपना काम करके लौटँगी और एक रात इस शहर में काटने की नौबत आवेगी तो बस इसी मकान में रह जाऊँगी, क्योंकि मनोरमा की मोहब्बत के भरोसे इसे भी अपना घर समझती हूँ मगर रात की बात ने ऐसा डरा दिया कि अब हिम्मत नहीं पड़ती।
नागर––नहीं-नहीं, तुम जब इधर आया-जाया करो तो यहाँ जरूर टिका करो और इस मकान को अपना ही समझो। मैं लौंडियों और नौकरों को इस विषय में पूरा-पूरा हुक्म देती हूँ। यह भयानक घटना जो आज हुई है, रोज नहीं हो सकती, इससे निश्चित रहो।
कमलिनी––क्या कहूँ अभी तक होशहवास दुरुस्त नहीं हुए।
नागर––जरा ठहरो, मैं इस कमरे में जाती हूँ और एक चीज देख कर अभी लौट आती हूँ।
नागर उठी और उस कमरे में चली गई जिसमें कमलिनी सोई थी। मगर, थोड़ी देर बाद आकर बोली, "तुम बेखौफ रहो, आज के बाद फिर कभी इस मकान में ऐसी घटना न देखोगी। क्या करूँ लाचार हूँ, क्योंकि इस समय मुझे झख मार कर रोहतासगढ़ मनोरमा को छुड़ाने के लिए जाना ही पड़ेगा नहीं तो आज एक भारी काम निकलने का मौका आ गया था।"
कमलिनी––तुमने क्या कहा, मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया।
नागर––इन बातों को तुम नहीं समझ सकतीं। खैर, अब तुम्हारा क्या इरादा है? मैं तो रोहतासगढ़ जाने के लिए तैयार हो चुकी हूँ।
कमलिनी––अच्छी बात है। जहाँ तक हो सके जल्दी जाओ, मैं भी एक जरूरी काम के लिए मिर्जापुर जाती हूँ, कल या परसों तक लौटूँगी। मैं तो कल ही चली जाती, मगर तुमने व्यर्थ मुझे रोक लिया।
नागर––मैंने व्यर्थ नहीं रोका था, मगर हाँ, अब उसे व्यर्थ ही कहना चाहिए, खैर माफ करो और कृपा करके मेरी एक बात स्वीकार करो तो बड़ा अहसान मानूँगी।
कमलिनी––वह क्या?
नागर––इस समय तो मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ, क्या जाने कब तक लौटना हो, मगर तुम पन्द्रह दिन के अन्दर मुझसे एक दफे जरूर मिलो।
कमलिनी––पन्द्रह दिन तक तो मैं इस प्रान्त में नहीं रह सकती, हाँ पाँच-सात दिन तक में यदि मुझसे मिल सको तो ठीक है।
नागर––शायद पाँच-सात दिन तक मेरा लौटना न हो।
कमलिनी––ऐसा नहीं हो सकता, तुम जिस समय पहुँचोगी और भूतनाथ के कागजात तेजसिंह को दिखाओगी उसी समय मनोरमा की छुट्टी हो जायगी। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि तेजसिंह बात का बड़ा धनी है।
नागर––यदि ऐसा हो तो मैं अपने तेज घोड़े पर सवार होकर कल बखूबी रोहतासगढ़ पहुँच सकती हूँ।
कमलिनी––ऐसा करो तो तुम चार ही दिन में लौट आओगी। मैं भी कल या परसों मिर्जापुर से आ जाऊँगी और जब तक तुम न लौटोगी इसी मकान में टिकी रहूँगी क्योंकि मनोरमा ने पुनः मिलने के लिए मुझसे कसम खिला ली है। अस्तु, पाँच-चार दिन तक अपना हर्ज करके भी मनोरमा के लिए यहाँ अटकना आवश्यक है। नागर––बहुत अच्छी बात है। जब मनोरमा से वायदा कर चुकी हो तो मुझे विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं।
कमलिनी––अच्छा तो आप अब मेरा एक काम करें।
नागर––कहिये।
कमलिनी––अपने किसी आदमी को भेज कर एक घोड़ा किराये का मँगवा दीजिए, जिस पर सवार होकर मैं मिर्जापुर जाऊँ, क्योंकि यद्यपि मैं ऐयार हूँ परन्तु रोहतासगढ़ से यहाँ तक तेजी के साथ आने के कारण बहुत सुस्त हो रही हूँ।
नागर––क्या मनोरमा के घर में घोड़ों की कमी है जो तुम्हारे लिए किराए का घोड़ा मँगवाया जाय।
इतना कह कर नागर चली गई। थोड़ी देर के बाद एक लौंडी आई जिसने कमलिनी को स्नान इत्यादि से छुट्टी पा लेने के लिए कहा। कमलिनी ने दो-एक जरूरी काम से तो छुट्टी पा ली, मगर स्नान करने से इन्कार किया और अपने बटुए से सामान निकाल कर चिट्ठी लिखने लगी।
घण्टे भर बाद सफर के सामान से लैस होकर कई लौंडियों को साथ लिए हुए नागर भी उसी जगह आ पहुँची जहाँ कमलिनी बैठाई गई थी। उस समय कमलिनी चिट्ठी लिख चुकी थी।
नागर––मैंने तुम्हारे पास इसलिए एक लौंडी भेजी थी कि तुम्हें नहला-धुला दे मगर तुमने …
कमलिनी––हाँ, मैंने स्नान नहीं किया क्योंकि इस समय अर्थात सूर्योदय के पहले स्नान करने की मेरी आदत नहीं। कहीं स्नान कर लूँगी, और कामों से छुट्टी पा चुकी हूँ।
नागर––खैर, कुछ मेवा खाकर जल पी लो।
कमलिनी––नहीं, इस समय माफ करो। हाँ, थोड़ा-सा मेवा साथ रख लूँगी जो सफर में काम आवेगा।
थोडी देर बाद दो घोड़े कसे-कसाये लाए गये, एक पर नागर और दूसरे पर कमलिनी सवार हुई। उस समय कमलिनी ने वह चिट्ठी जो अभी घण्टा-भर हुआ लिख कर तैयार की थी नागर के हाथ में दे दी और कहा, "इसे हिफाजत से रखो, मनोरमा को देकर मेरी तरफ से 'जय माया की' कहना।" वह चिट्ठी लिफाफे के अन्दर थी और जोड़ पर मोहर लगाई हुई थी।
बाग के बाहर निकल कर कमलिनी ने पश्चिम का रास्ता लिया और नागर पूरब की तरफ रवाना हुई।
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पाठकों को याद होगा कि कमलिनी की कमर में इस समय दो तिलिस्मी खंजर मौजूद हैं।
समय नागर जा रही है, क्योंकि इधर से कई कोस का बचाव पड़ता था।
यकायक नागर का घोड़ा भड़का और रुक कर अपने दोनों कान आगे की तरफ करके देखने लगा। नागर शहसवारी का फन बखूबी जानती और अच्छी तरह समझती थी, इसलिए घोड़े के भड़कने और रुकने से उसे किसी तरह का रंज न हुआ बल्कि वह चौकन्नी हो गई और बड़े गौर-से चारों तरफ देखने लगी। अचानक सामने की तरफ पगडंडी के बीचोंबीच में बैठे हुए एक शेर पर उसकी निगाह पड़ी जिसका पिछला भाग नागर की तरफ था अर्थात् मुँह उस तरफ जिधर नागर जा रही थी। नागर बड़े गौर से शेर को देखने और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। अभी उसने कोई राय पक्की नहीं की थी कि दाहिनी बगल की झाड़ी में से एक आदमी निकल कर बढ़ा और फुर्ती के साथ धोड़े के पास आ पहँचा, जिसे देखते ही वह चौंक पड़ी और घबराहट के मारे बोल उठी, "ओफ, मुझे बड़ा भारी धोखा दिया गया!" साथ ही इसके वह अपना हाथ पथरकले पर ले गई, मगर उस आदमी ने इसे कुछ भी करने न दिया। उसने नागर का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और एक झटका ऐसा दिया कि वह घोड़े के नीचे आ रही। वह आदमी तुरन्त उसकी छाती पर सवार हो गया और उसके दोनों हाथ कब्जे में कर लिए।
यद्यपि नागर को विश्वास हो गया कि अब उसकी जान किसी तरह नहीं बच सकती तो भी उसने बड़ी दिलेरी से अपने दुश्मन की तरफ देखा और कहा––
नागर––बेशक, उस हरामजादी ने मुझे पूरा धोखा दिया, मगर भूतनाथ, तुम मुझे मार कर जरूर पछताओगे। वह कागज जिसके मिलने की उम्मीद में तुम मुझे मार रहे हो, तुम्हारे हाथ कभी न लगेगा क्योंकि मैं उसे अपने साथ नहीं लाई हूँ। यदि तुम्हें विश्वास न हो तो मेरी तलाशी ले लो, और बिना वह कागज पाए मेरे या मनोरमा के साथ बुराई करना तुम्हारे हक में ठीक नहीं है इसे तुम अच्छी तरह जानते हो।
भूतनाथ––अब मैं तुझे किसी तरह नहीं छोड़ सकता। मुझे विश्वास है कि वे कागजात, जिनके सबब से मैं तुझ ऐसी कमीनों की ताबेदारी करने पर मजबूर हो रहा हैं, इस समय जरूर तेरे पास हैं तथा इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि कमलिनी ने अपना वादा पूरा किया और कागजों के सहित तुझे मेरे हाथ फँसाया। अब तू मुझे धोखा नहीं दे सकती और न तलाशी लेने की नीयत से मैं तुझे कब्जे से छोड़ ही सकता हूँ। तेरा जमीन से उठना मेरे लिए काल हो जायगा क्योंकि फिर तू हाथ नहीं आवेगी।
नागर––(चौंककर और ताज्जुब से) हैं, तो क्या वह कम्बख्त कमलिनी थी, जिसने मुझे धोखा दिया! अफसोस, शिकार घर में आकर निकल गया। खैर, जो तेरे जी में आवे कर, यदि मेरे मारने में ही तेरी भलाई हो तो मार, मगर मेरी एक बात सुन ले।
भूतनाथ––अच्छा कह, क्या कहती है? थोड़ी देर तक ठहर जाने में मेरा कोई हर्ज भी नहीं।
नागर––इसमें तो कोई शक नहीं कि अपने कागजात, जिन्हें तेरा जीवन-चरित्र कहना चाहिए, उन्हें लेने के लिए ही तू मुझे मारना चाहता है। भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है। यदि वह मुट्ठा मेरे हाथ का लिखा हुआ न होता तो मुझे उसकी परवाह न होती।
नागर––हाँ, ठीक है, परन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि मुझे मारकर तू वे कागजात न पावेगा। खैर, जब मैं इस दुनिया से जाती ही हूँ तो क्या जरूरत है कि तुझे भी बर्बाद करती जाऊँ? मैं तेरी लिखी चीजें खुशी से तेरे हवाले करती हूँ, मेरा दाहिना हाथ छोड़ दे, मैं तुझे बता दूँ कि मुझे मारने के बाद वे कागजात तुझे कहाँ से मिलेंगे।
भूतनाथ इतना डरपोक और कमजोर भी न था कि नागर का केवल दाहिना हाथ जिसमें हर्बे की किस्म से एक काँटा भी न था, छोड़ने से डर जाय, दूसरे उसने यह भी सोचा कि जब यह स्वयं ही कागजात देने को तैयार है तो क्यों न ले लिये जाय, कौन ठिकाना इसे मारने के बाद कागजात हाथ न लगें। थोड़ी देर तक कुछ सोच-विचार कर भूतनाथ ने नागर का दाहिना हाथ छोड़ दिया जिसके साथ ही उसने फुर्ती से वह हाथ भूतनाथ के गाल पर दबा कर फेरा। भूतनाथ को ऐसा मालूम हुआ कि नागर ने एक सूई उसके गाल में चुभो दी, मगर वास्तव में ऐसा न था। नागर की उँगली में एक अँगूठी थी, जिस पर नगीने की जगह स्याह रंग का कोई पत्थर जड़ा हुआ था, वही भूतनाथ के गाल में गड़ा, जिससे एक लकीर-सी पड़ गई और जरा खून भी दिखाई देने लगा। पर मालूम होता है कि वह नोकीला स्याह पत्थर, जो अँगूठी में जड़ा हुआ था, किसी प्रकार का जहर-हलाहल था, जो खून के साथ मिलते ही अपना काम कर गया क्योंकि उसने भूतनाथ को बात करने की मोहलत न दी। वह एकदम चक्कर खा कर जमीन पर गिर पड़ा और नागर उसके कब्जे से छूट कर अलग हो गई।
नागर ने घोड़े की बागडोर, जो चारजामे में बँधी हुई थी खोली और उसी से भूतनाथ के हाथ-पैर बाँधने के बाद एक पेड़ के साथ कस दिया, इसके बाद उसने अपने ऐयारी के बटुए में से एक शीशी निकाली, जिसमें किसी प्रकार का तेल था। उसने थोड़ा तेल उसमें से भूतनाथ के गाल पर उसी जगह जहाँ लकीर पड़ी हुई थी, मला। देखते-ही-देखते उस जगह एक बड़ा फफोला पड़ गया। नागर ने खंजर की नोक से उस फफोले में छेद कर दिया, जिससे उसके अन्दर का कुल जहरी पानी निकल गया और भूतनाथ होश में आ गया।
नागर––क्यों बे कम्बख्त, अपने किये की सजा पा चुका या कुछ कसर है? तूने देखा, मेरे पास कैसी अद्भुत चीज है। अगर हाथी भी हो तो इस जहर को बर्दाश्त न कर सके और मर जाय, तेरी क्या हकीकत है!
भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है और अब मुझे निश्चय हो गया कि मेरी किस्मत में जरा भी सुख भोगना बदा नहीं है।
नागर––साथ ही इसके तुझे यह भी मालूम हो गया कि इस जहर को मैं सहज ही में उतार भी सकती हूँ। इसमें सन्देह नहीं कि तू मर चुका था, मगर मैंने इसलिए तुझे जिला दिया कि अपने लिखे हुए कागजों का हाल दुनिया में फैला हुआ तू स्वयम् देख और सून ले, क्योंकि उससे बढ़कर कोई दुःख तेरे लिए नहीं है, पर यह भी देख ले कि उस कम्बख्त कमलिनी के साथ मैंने क्या किया, जिसने मुझे धोखे में डाला था। इस समय वह मेरे कब्जे में है, क्योंकि कल वह मेरे घर में जरूर आकर टिकेगी! अहा, अब मैं समझ गई कि रात वाले अद्भुत मामले की जड़ भी वही है। जरूर ही इस मुर्दे शेर को रास्ते में तूने ही बैठाया होगा।
भूतनाथ––(आँखों में आँसू भरकर) अबकी दफे मुझे माफ करो, जो कुछ हुक्म दो, मैं करने को तैयार हूँ।
नागर––मैं अभी कह चुकी हूँ कि तुझे मारूँगी नहीं, फिर इतना क्यों डरता है?
भूतनाथ––नहीं-नहीं, मैं वैसी जिन्दगी नहीं चाहता, जैसी तुम देती हो, हाँ यदि इस बात का वादा करो कि वे कागजात किसी दूसरे को न दोगी तो मैं वे सब काम करने को तैयार हैं, जिन्हें पहले इनकार करता था।
नागर––मैं ऐसा कर सकती हूँ, क्योंकि आखिर तुझे जिन्दा छोड़ूँगी ही, और यदि मेरे काम से तू जी न चुरावेगा तो मैं तेरे कागजात भी बड़ी हिफाजत से रखूँगी। हाँ, खूब याद आया––उस चिट्ठी को तो जरा पढ़ना चाहिए जो उस कम्बख्त कमलिनी ने यह कहकर दी थी कि मुलाकात होने पर मनोरमा को दे देना।
यह सोचते ही नागर ने बटुए में से वह चिट्ठी निकाली और पढ़ने लगी। यह लिखा हुआ था––
"जिस काम के लिए मैं आई थी, ईश्वर की कृपा से वह काम बखूबी हो गया। वे कागजात इसके पास हैं, ले लेना। दुनिया में यह बात मशहूर है कि उस आदमी का जहान से उठ जाना ही अच्छा है, जिससे भलों को कष्ट पहुँचे। मैं तुमसे मिलने के लिए यहाँ बैठी हूँ।"
नागर––देखो नालायक ने चिट्ठी भी लिखी तो ऐसे ढंग से कि यदि मैं चोरी से पढ़ भी तो किसी तरह का शक न हो और इसका पता भी न लगे कि यह भूतनाथ के नाम लिखें गई है या मनोरमा के, स्त्रीलिंग और पुलिंग को भी बचा ले गई है। उसने यही सोच के चिट्ठी मुझे दी होगी कि जब यह भूतनाथ के कब्जे में आ जायगी, और वह इसकी तलाशी लेगा तो यह चिट्ठी उसके हाथ लग जायगी, और जब वह पढ़ेगा तो नागर को अवश्य मार डालेगा, और फिर तुरत आकर मुझसे मिलेगा, जिसमें वह किशोरी को छुड़ा ले। अच्छा कम्बख्त, देख, मैं तेरे साथ क्या सलूक करती हूँ।
भूतनाथ––अच्छा, इतना वादा तो मैं कर ही चुका हूँ कि हर तरह से तुम्हारी ताबेदारी करूँगा और जो कुछ तुम कहोगी, बेउज्र बजा लाऊँगा, अब इस समय मैं तुम्हें एक भेद की बात बताता हूँ, जिसे जानकर तुम बहुत प्रसन्न होओगी।
नागर––कहो, क्या कहते हो? शायद तुम्हारी नेकचलनी का सबूत यहीं मिल जाय।
भूतनाथ––मेरे हाथ तो बँधे हैं, खैर, तुम ही आओ मेरी कमर से खंजर निकालो। उसके साथ एक पुर्जा बँधा है, खोलकर पढ़ो और देखो, क्या लिखा है?
नागर भूतनाथ के पास गई और उसकी कमर से खंजर निकालना चाहा, मगर खंजर पर हाथ पड़ते ही उसके बदन में बिजली दौड़ गई और वह काँप कर जमीन पर गिरते ही बेहोश हो गई। भूतनाथ पुकार उठा––"वह मारा!" उस तिलिस्मी खंजर का हाल जो कमलिनी ने भूतनाथ को दिया था, पाठक बखूबी जानते ही हैं, कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं। इस समय वही खंजर भूतनाथ की कमर में था। उसकी तासीर से नागर बिल्कुल बेखबर थी। वह नहीं जानती थी कि जिसके पास उसके जोड़ की अँगूठी न हो, वह उस खंजर को छू नहीं सकता।
अब भूतनाथ का जी ठिकाने हुआ, और वह अपने छूटने का उद्योग करने लगा, परन्तु हाथ-पैर बँधे रहने के कारण कुछ न कर सका। आखिर वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, जिससे किसी आते-जाते मुसाफिर के कान में आवाज पड़े तो वह आकर उसको छुड़ावे।
दो घण्टे बीत गए, मगर किसी मुसाफिर के कान में भूतनाथ की आवाज न पड़ी और तब तक नागर भी होश में आकर उठ बैठी।
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हम ऊपर लिख आए हैं कि राजा वीरेन्द्रसिंह तिलिस्मी खँडहर से (जिसमें दोनों कुमार और तारासिंह इत्यादि गिरफ्तार हो गए थे) निकलकर रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए तो तेजसिंह उनसे कुछ कह-सुनकर अलग हो गए और उनके साथ रोहतासगढ़ न गए। अब हम यह लिखना मुनासिब समझते हैं कि राजा वीरेन्द्रसिंह से अलग होकर तेजसिर ने क्या किया।
एक दिन और रात उस खंडहर के चारों तरफ जंगल और मैदान में तेजसिंह घुमते रहे, मगर कुछ काम न चला। दूसरे दिन वह एक छोटे से पुराने शिवालय के पास पहुँचे, जिसके चारों तरफ बेल और पारिजात के पेड़ बहुत ज्यादा थे, जिसके सबब से वह स्थान बहुत ठंडा और रमणीक मालूम होता था। तेजसिंह शिवालय के अन्दर गए और शिवजी का दर्शन करने के बाद बाहर निकल आए, उसी जगह से बेलपत्र तोड़कर शिवजी की पूजा की, और फिर उस चश्मे के किनारे जो मन्दिर के पीछे की तरफ बह रखा था, बैठकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। इस समय तेजसिंह एक मामली जमींदार की सूरत में थे, और यह स्थान भी उस खण्डहर से बहुत दूर न था।
थोडी देर बाद तेजसिंह के कान में आदमियों के बोलने की आवाज आई। बात साथ समझ में नहीं आती थी इससे मालूम हुआ कि वे लोग कुछ दूर पर हैं। तेजसिंह ने सिर उठा कर देखा तो कुछ दूर पर दो आदमी दिखाई पड़े जो उसी शिवालय की तरफ आ रहे थे। तेजसिंह चश्मे के किनारे से उठ खड़े हुए और एक झाड़ी के अन्दर छिप कर देखने लगे कि वे लोग कहाँ जाते और क्या करते हैं। इन दोनों की पोशाकें उन लोगों से बहत-कूछ मिलती थीं जो तारासिंह की चालाकी से तिलिस्मी खँडहर में बेहोश हुए थे और जिन्हें राजा वीरेन्द्रसिंह साधू बाबा (तिलिस्मी दारोगा) के सहित कैदी बना कर रोहतासग़ढ़ ले गए थे, इसलिए तेजसिंह ने सोचा कि ये दोनों आदमी भी जरूर उन्हीं लोगों में से हैं जिनकी बदौलत हम लोग दुःख भोग रहे हैं अस्तु, इन लोगों में से किसी को फँसा कर अपना काम निकालना चाहिए।
तेजसिंह के देखते-ही-देखते वे दोनों आदमी वहाँ पहुँच कर उस शिवालय के अन्दर घुस गये और लगभग दो घड़ी के बीत जाने पर भी बाहर न निकले। तेजसिंह ने छिप कर राह देखना उचित न जाना। वह झाड़ी में से निकल कर शिवालय में आये मगर झाँक कर देखा तो शिवालय के अन्दर किसी आदमी की आहट न मिली। ताज्जुब करते हुए शिवलिंग के पास तक चले गये मगर किसी आदमी की सूरत दिखाई न पड़ी। तेजसिंह तिलिस्मी कारखानों और अद्भुत मकानों तथा तहखानों की हालत से बहुत-कुछ वाकिफ हो चुके थे इसलिए समझ गए कि इस शिवालय के अन्दर कोई गुप्त राह या तहखाना अवश्य है और इसी सबब से ये दोनों आदमी गायब हो गये हैं।
शिवालय के सामने की तरफ बेल का एक पेड़ था। उसी के नीचे तेजसिंह यह निश्चय करके बैठ गए कि जब तक वे लोग अथवा उनमें से कोई एक बाहर न आयेगा तब तक यहाँ से न टलेंगे। आखिर घण्टे भर के बाद उन्हीं में से एक आदमी शिवालय के अन्दर से बाहर आता हुआ दिखाई पड़ा। उसे देखते ही तेजसिंह उठ खड़े हुए, निगाह मिलते ही झुक कर सलाम किया और तब कहा, "ईश्वर आपका भला करे, मेरे भाई की जान बचाइए!"
आदमी––तू कौन है और तेरा भाई कहाँ है?
तेजसिंह––मैं जमींदार हूँ, (हाथ का इशारा करके) उस झाड़ी के दूसरी ओर मेरा भाई है। बेचारे को एक बुढ़िया व्यर्थ मार रही है। आप पूजारीजी हैं, धर्मात्मा हैं, किसी तरह मेरे भाई को बचाइए। इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ। (गिड़गिड़ा कर) बस, अब देर न कीजिए, ईश्वर आपका भला करे!
तेजसिंह की बातें सुन कर उस आदमी को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और बेशक ताज्जुब की बात भी थी, क्योंकि तेजसिंह बदन के मजबूत और निरोग मालूम होते थे, देखने वाला कह सकता था कि बेशक इसका भाई भी वैसा ही होगा, फिर ऐसे दो आदमियों के मुकाबले में एक बूढ़ी औरत का जबर्दस्त पड़ना ताज्जुव नहीं तो क्या है!
आखिर बहत-कुछ सोच-विचार कर उस आदमी ने तेजसिंह से कहा, "खैर चलो देखें वह बुढ़िया कैसी पहलवान है।"
उस आदमी को साथ लिए हुए तेजसिंह शिवालय से कुछ दूर चले गये और एक गुंजान झाड़ी के पास पहुँच कर इधर-उधर घूमने लगे।
आदमी––तुम्हारा भाई कहाँ है?
तेजसिंह––उसी को तो ढूँढ़ रहा हूँ।
आदमी––क्या तुम्हें याद नहीं कि उसे किस जगह छोड़ गए थे?
तेजसिंह––राम-राम, कैसे बेवकूफ से पाला पड़ा है! अरे कम्बख्त, जब जगह याद नहीं तो यहाँ तक कैसे आए!
आदमी––पाजी कहीं का! हम तो तेरी मदद को आए और तू हमें ही कम्बख्त कहता है!
तेजसिंह––बेशक तू कम्बख्त बल्कि कमीना है, तू मेरी मदद क्या करेगा जब तू अपने ही को नहीं बचा सकता?
इतना सुनते ही वह आदमी चौकन्ना हो गया और बड़े गौर से तेजसिंह की तरफ देखने लगा। जब उसे निश्चय हो गया कि यह कोई ऐयार है, तब उसने खंजर निकाल कर तेजसिंह पर वार किया। तेजसिंह ने वार बचा कर उसकी कलाई पकड़ ली और एक झटका ऐसा दिया कि खंजर उसके हाथ से छूटकर दूर जा गिरा। वह और कुछ चोट करने की फिक्र में था कि तेजसिंह ने उसकी गर्दन में हाथ डाल दिया और बात-की-बात में जमीन पर दे मारा। वह घबरा कर चिल्लाने लगा, मगर इससे भी कुछ काम न चला क्योंकि उसकी नाक में बेहोशी की दवा जबर्दस्ती ढूँस दी गई और एक छींक मार कर वह बेहोश हो गया।
उस बेहोश आदमी को उठा कर तेजसिंह एक ऐसी झाड़ी में घुस गए जहाँ से आते-जाते मुसाफिरों को वे बखूबी देख सकते मगर उन पर किसी की निगाह न पड़ती। उस बेहोश आदमी को जमीन पर लिटा देने के बाद तेजसिंह चारों तरफ देखने लगे और जब किसी को न पाया तो धीरे से बोले, "अफसोस, इस समय मैं अकेला हूँ, यदि मेरा कोई साथी होता तो इसे रोहतासगढ़ भिजवा कर बेखौफ हो जाता और बेफिक्री के साथ काम करता! खैर कोई चित्ता नहीं, अब किसी तरह काम तो निकालना ही पड़ेगा।"
तेजसिंह ने ऐयारी का बटुआ खोला और आईना निकाल कर सामने रक्खा, अपनी सुरत ठीक वैसी ही बनाई जैसा कि वह आदमी था, इसके बाद अपने कपड़े उतार कर रख दिए और उसके बदन से कपड़े उतार कर आप पहन लेने के बाद उसकी सूरत बदलने लगे। किसी तेज दवा से उसके चेहरे पर कई जख्म के दाग ऐसे बनाये कि सिवाय तेजसिंह के दूसरा कोई छुड़ा ही नहीं सकता था और मालूम ऐसा होता था कि ये जख्म के दाग कई वर्षों से उसके चेहरे पर मौजूद हैं। इसके बाद उसका तमाम बदन एक स्याह मसाले से रंग दिया। इसमें यह गुण था कि जिस जगह लगाया जाय वह आबनूस के रंग की तरह स्याह हो जाय और जब तक केले के अर्क से न धोया जाय वह दाग किसी तरह न छूटे चाहे वर्षों बीत जायें।
वह आदमी गोरा था मगर अब पूर्णरूप से काला हो गया, चेहरे पर कई जख्म के निशान भी बन गये। तेजसिंह ने बड़े गौर से उसकी सूरत देखी और इस ढंग से गर्दन हिला कर उठ खड़े हुए कि जिससे उनके दिल का भाव साफ झलक गया। तेजसिंह ने सोच लिया कि बस इसकी सूरत बखूबी बदल गई, अब और कोई कारीगरी करने की आवश्यकता नहीं है और वास्तव में ऐसा ही था भी, दूसरे की बात तो दूर रही यदि उसकी माँ भी उसे देखती तो अपने लड़के को कभी न पहचान सकती।
उस आदमी की कमर के साथ ऐयारी का बटुआ भी था, तेजसिंह ने उसे खोल लिया और अपने बटुए की कुल चीजें उसमें रखकर अपना बटुआ उसकी कमर से बाँध दिया और वहाँ से रवाना हो गये।
तेजसिंह फिर उसी शिवालय के सामने आए और एक बेल के पेड़ के नीचे बैठ कर कुछ गाने लगे। दिन केवल घण्टे भर बाकी रह गया था जब वह दूसरा आदमी भी शिवालय के बाहर निकला। तेजसिंह को जो उसके साथी की सूरत में थे, पेड़ के नीचे मौजूद पाकर वह गुस्से में आ गया और उनके पास आकर खूब कड़ी आवाज में बोला, "वाहजी बिहारीसिंह, अभी तक आप यहाँ बैठे गीत गा रहे हैं।"
तेजसिंह को इतना मालूम हो गया कि हम जिसकी सूरत में हैं उसका नाम बिहारीसिंह है। अब जब तक ये अपनी असली सूरत में न आवें, हम भी इन्हें बिहारीसिंह के ही नाम से लिखेंगे, हाँ कहीं-कहीं तेजसिंह लिख जायें तो कोई हर्ज भी नहीं।
बिहारीसिंह ने अपने साथी की बात सुन कर गाना बन्द किया और उसकी तरफ देख के कहा––
बिहारीसिंह––(दो तीन दफे खाँस कर) बोलो मत, इस समय मुझे खाँसी हो गई है, आवाज भारी हो रही है, जितना कोशिश करता हूँ उतना ही गाना बिगड़ जाता है। खैर तुम भी आ जाओ और जरा सुर में सुर मिला कर साथ गाओ तो!
हरनामसिंह––क्या बात है! मालूम होता है, तुम कुछ पागल हो गये हो, मालिक का काम गया जहन्नुम में और हम लोग बैठे गाया करें!
बिहारीसिंह––वाह, जरा-सी बूटी ने क्या मजा दिखाया। अहा हा, जीते रहो पट्टे! ईश्वर तुम्हारा भला करे, खूब सिद्धी पिलाई।
हरनामसिंह––बिहारीसिंह, यह तुम्हें क्या हो गया? तुम तो ऐसे न थे!
बिहारीसिंह––जब न थे तब बुरे थे, अब हैं तो अच्छे हैं। तुम्हारी वात ही क्या है, सत्रह हाथी जलपान कर के बैठा हूँ। कम्बख्त ने जरा नमक भी नहीं दिया, फीका ही उड़ाना पड़ा। ही-ही-ही-ही, आओ एक गदहा तुम भी खा लो, नहीं-नहीं सूअर, अच्छा कुत्ता ही सही। ओ हो हो हो, क्या दूर की सूझी! बच्चाजी ऐयारी करने बैठे हैं, हल जोतना आता ही नहीं, जिन्न पकड़ने लगे। हा-हा-हा-हा-हा, वाह रे वूटी, अभी तक जीभ चटचटाती है––लो देख लो (जीभ चटचटा कर दिखाता है)।
हरनामसिंह––अफसोस!
बिहारीसिंह––अब अफसोस करने से क्या फायदा? जो होना था वह तो हो गया। जाके पिण्डदान करो। हाँ, यह तो बताओ, पितर-मिलौनी कब करोगे? मैं जाता हूँ तुम्हारी तरफ से ब्राह्मणों को नेवता दे आता हूँ।
हरनामसिंह––(गर्दन हिला कर) इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम पूरे पागल हो गए हो। तुम्हें जरूर किसी ने कुछ खिला-पिला दिया है।
बिहारीसिंह––न इसमें सन्देह न उसमें सन्देह, पागल की बातचीत तो बिल्कुल जाने दो क्योंकि तुम लोगों में केवल मैं ही हूँ सो हूँ, बाकी सब पागल। खिलानेवाले की ऐसी-तैसी, पिलानेवाले का बोलबाला। एक लोटा भाँग, दो सौ पैंतीस साढ़े तेरह आना, लोटा निशान। ऐयारी के नुस्खे एक से एक बढ़ के याद हैं, जहाज की पाल भी खूब ही उड़ती है। वाह, कैसी अँधेरी रात है। बाप रे बाप, सूरज भी अस्त होना ही चाहता है। तुम भी नहीं हम भी नहीं, अच्छा तुम भी सही, बड़े अकिलमन्द हो, अकिल, अकिल, अकिल, मन्द, मन्द, मन्द। (कुछ देर तक चुप रह कर) अरे बाप रे बाप, मैया री मैया, बड़ा ही गजब हो गया, मैं तो अपना नाम भी भूल गया! अभी तक तो याद था कि मेरा नाम बिहारीसिंह है मगर अब भूल गया, तुम्हारे सिर की कसम जो कुछ भी याद हो। भाई यार दोस्त मेरे, जरा बता तो दो, मेरा नाम क्या है?
हरनामसिंह––अफसोस, रानी मुझी को दोष देंगी, कहेंगी कि हरनामसिंह अपने साथी की हिफाजत न कर सका।
बिहारीसिंह––ही ही ही ही, वाह रे भाई हरनामसिंह, अलिफ बे ते टे से च छ ज झ, उल्लू की दुम फाख्ता … !
हरनामसिंह को विश्वास हो गया कि जरूर किसी ऐयार की शैतानी से जिसने कुछ खिला या पिला दिया है, हमारा साथी बिहारीसिंह पागल हो गया, इसमें कोई सन्देह नहीं। उसने सोचा कि अब इससे कुछ कहना-सुनना उचित नहीं, इसे इस समय किसी तरह फुसला कर घर ले चलना चाहिए।
हरनामसिंह––अच्छा यार, अब देर हो गई, चलो घर चलें।
बिहारीसिंह––क्या हम औरत हैं कि घर चलें! चलो जंगल में चलें। शेर का शिकार खेलें, रंडी का नाच देखें, तुम्हारा गाना सुनें और सबके अन्त में तुम्हारे सिरहाने बैठकर रोएँ। ही ही ही ही … !
हरनामसिंह––खैर, जंगल ही में चलो।
बिहारीसिंह––हम क्या साधु वैरागी या उदासी हैं कि जंगल में जायें! बस, इसी जगह रहेंगे, भंग पीएँगे, चैन करेंगे, यह भी जंगल ही है। तुम्हारे जैसे गदहों का शिकार करेंगे, गदहे भी कैसे कि बस पूरे अन्धे! (इधर-उधर देखकर) सात-पाँच बारह पाँच तीन, तीन घण्टे बीत गये अभी तक भंग लेकर नहीं आया, पूरा झूठा निकला मगर मुझसे बढ़ के नहीं! बदमाश है, लुच्चा है, अब उसकी राह या सड़क नहीं देखूगा! चलो भाईसाहब चलें, घर ही की तरफ मुँह करना उत्तम है, मगर मेरा हाथ पकड़ लो, मुझे कुछ सूझता नहीं।
हरनामसिंह ने गनीमत समझ और बिहारीसिंह का हाथ पकड़ घर की तरफ अर्थात् मायारानी के महल की तरफ ले चला। मगर वाह रे तेजसिंह, पागल वन के क्या काम निकाला है! अब ये चाहे दो सौ दफे चूकें मगर किसी की मजाल नहीं कि शक करे। बिहारीसिंह को मायारानी बहुत चाहती थी क्योंकि इसकी ऐयारी खूब चढ़ी-बढ़ी थी, इसलिए हरनामसिंह उसे ऐसी अवस्था में छोड़ कर अकेला जा भी नहीं सकता था। मजा तो उस समय होगा जब नकली बिहारीसिंह मायारानी के सामने होंगे और भूत की सूरत बने असली बिहारीसिंह भी पहुँचेंगे।
बिहारीसिंह को साथ लिए हरनामसिंह जमानिया की तरफ रवाना हुआ। मायारानी वास्तव में जमानिया की रानी थी, इसके बाप-दादे भी इस जगह हुकूमत कर गए थे। जमानिया के सामने गंगा के किनारे से कुछ दूर हट कर एक बहुत ही खुश नुमा और लम्बा-चौड़ा बाग था जिसे वहाँ वाले 'खास बाग' के नाम से पुकारते थे। इस बाग में राजा अथवा राज्य कर्मचारियों के सिवाय कोई दूसरा आदमी जाने नहीं पाता था। इस बाग के बारे में तरह-तरह की गप्पें लोग उड़ाया करते थे, मगर असल भेद यहाँ का किसी को भी मालूम न था। इस बाग के गुप्त भेदों को शाहीखानदान और दीवान तथा ऐयारों के सिवाय कोई गैर आदमी नहीं जानता था और न कोई जानने की कोशिश कर सकता था, यदि कोई गैर आदमी इस बाग में पाया जाता तो तुरन्त मार डाला जाता था, और यह कायदा बहत पुराने जमाने से चला आता था।
जमानिया में जिस छोटे किले के अन्दर मायारानी रहती थी उसमें से गंगा के नीचे-नीचे एक सुरंग भी इस बाग तक गई थी और इसी राह से मायारानी वहाँ आती जाती थी, इस सबब से मायारानी का इस बाग में आना या यहाँ से जाना खास-खास आदमियों के सिवाय,किसी गैर को न मालूम होता था। किले और इस बाग का खुलासा हाल पाठकों को स्वयं मालूम हो जायेगा इस जगह विशेष लिखने की कोई आवश्यकता नहीं। हाँ, इस जगह इतना लिख देना मुनासिब मालूम होता है कि रामभोली के आशिक नानक तथा कमला ने इसी बाग में मायारानी का दरबार देखा था।
जमानिया पहुँचने तक बिहारीसिंह ने अपने पागलपन से हरनामसिंह को बहुत ही तंग किया और साबित कर दिया कि पढ़ा-लिखा आदमी किस ढंग का पागल होता है। यदि मायारानी का डर न होता तो हरनामसिंह अपने साथी को बेशक छोड़ देता और हजार खराबी के साथ घर ले जाने की तकलीफ न उठाता।
कई दिन के बाद बिहारीसिंह को साथ लिए हुए हरनामसिंह जमानिया के किले में पहुँच गया। उस समय पहर भर रात जा चुकी थी। किले के अन्दर पहुँचने पर मालूम हुआ कि इस समय मायारानी बाग में है, लाचार बिहारीसिंह को साथ लिए हुए हरनामसिंह को उस बाग में जाना पड़ा और इसलिए बिहारीसिंह (तेजसिंह) ने किले और सुरंग का रास्ता भी बखूबी देख लिया। सुरंग के अन्दर दस-पन्द्रह कदम जाने के बाद बिहारीसिंह ने हरनामसिंह से कहा––
बिहारीसिंह––सुनो जी, इस सुरंग के अन्दर सैकड़ों दफे हम आ चुके और आज भी तुम्हारे मलाहिजे से चले आये, मगर आज के बाद फिर कभी यहाँ लाओगे तो मैं तुम्हें कच्चा ही खा जाऊँगा और इस सुरंग को भी बर्बाद कर दूँगा, अच्छा, यह बताओ कि मुझे कहाँ लिए जाते हो?
हरनामसिंह––मायारानी के पास।
बिहारीसिंह––तब तो मैं नहीं जाऊँगा क्योंकि मैं सुन चुका हूँ कि मायारानी आजकल आदमियों को खाया करती है, तुम भी तो कल तक तीन गदहियाँ खा चुके हो! मायारानी के सामने चलो तो सही, देखो मैं तुम्हें कैसे छकाता हूँ, ही ही ही, बच्चा तुम्हें छकाने से क्या होगा, मायारानी को छकाऊँ तो कुछ मजा मिले! भज मन राम चरन सुखदाई! (भजन गाता है)।
बड़ी मुश्किल से सुरंग खतम की और बाग में पहुँचे। उस सुरंग का दूसरा सिरा बाग में एक कोठरी के अन्दर निकलता था। जिस समय वे दोनों कोठरी के बाहर हुए तो उस दालान में पहुँचे, जिसमें मायारानी का दरबार होता था। इस समय मायारानी उसी दालान में थी, मगर दरवार का सामान वहाँ कुछ न था, केवल अपनी बहिन और सखी सहेलियों के साथ बैठी दिल बहला रही थी। मायारानी पर निगाह पड़ते ही उनकी पोशाक और गम्भीर भाव ने बिहारीसिंह (तेजसिंह) को निश्चय करा दिया कि यहाँ की मालिक यही है।
हरनामसिंह और बिहारीसिंह को देखकर मायारानी को एक प्रकार की खुशी हुई और उसने बिहारीसिंह की तरफ देखकर पूछा, "कहो, क्या हाल है?"
बिहारीसिंह––रात अँधेरी है, पानी खूब बरस रहा है, काई फट गई, दुश्मन ने सिर निकाला, चोर ने घर देख लिया, भूख के मारे पेट फूल गया, तीन दिन से भूखा हूँ, कल का खाना अभी तक हजम नहीं हुआ। मुझ पर बड़े अन्धेर का पत्थर आ टूटा, बचाओ! बचाओ!
बिहारीसिंह के बेतुके जवाब से मायारानी घबरा गई, सोचने लगी कि इसको क्या हो गया जो बेमतलब की बात बक गया। आखिर हरनामसिंह की तरफ देख कर पूछा, "बिहारी क्या कह गया मेरी समझ में न आया!"
बिहारीसिंह––अहा हा, क्या बात है! तुमने मारा हाथ पसारा, छुरा लगाया खंजर खाया, शेर लड़ाया गीदड़ काया! राम लिखाया नहीं मिटाया, फाँस लगाया आप चुभाया, ताड़ खुजाया खून बहाया, समझ खिलाड़ी बूझ मेरे लल्लू, हा हा हा, भला समझो तो!
मायारानी और भी घबराई, बिहारीसिंह का मुँह देखने लगी। हरनामसिंह मायारानी के पास गया और धीरे से बोला, "इस समय मुझे दुख के साथ कहना पढ़ता है कि बेचारा बिहारीसिंह पागल हो गया है, मगर ऐसा पागल नहीं है कि हथकड़ी-बेड़ी की जरूरत पड़े क्योंकि किसी को दुःख नहीं देता, केवल बकता बहुत है और अपने-पराये का होश नहीं है, कभी बहुत अच्छी तरह भी बातें करता है। मालूम होता है कि वीरेन्द्र सिंह के किसी ऐयार ने धोखा देकर इसे कुछ खिला दिया।"
मायारानी––तुम्हारा और इसका साथ क्योंकर छूटा और क्या हुआ कुछ कहो तो हाल मालूम हो।
हरनामसिंह––पहले इनके लिए कुछ बन्दोबस्त कर दीजिये फिर सब हाल कहँगा वैद्यजी को बुलाकर जहाँ तक जल्द हो इनका इलाज कराना चाहिए!
बिहारीसिंह––यह काना-फुसकी अच्छी नहीं, मैं समझ गया कि तुम मेरी चुगली खा रहे हो। (चिल्लाकर) दोहाई रानी साहिबा की, इस कम्बख्त हरनामसिंह ने मुझे मार डाला, जहर खिलाकर मार डाला, मैं जिन्दा नहीं हूँ, मैं तो मरने बाद भूत बनकर यहाँ आया हूँ, तुम्हारी कसम खाकर कहता हूँ, मैं अब वह बिहारीसिंह नहीं हूँ, मैं कोई दसरा ही हँ। हाय-हाय, बड़ा गजब हुआ। या ईश्वर उन लोगों से तू ही समझियो जो भले आदमियों को पकड़ कर पिंजरे में बन्द किया करते हैं।
मायारानी––अफसोस, इस बेचारे की क्या दशा हो गई, मगर हरनामसिंह, यह तो तुम्हारा ही नाम लेता है, कहता है हरनामसिंह ने जहर खिला दिया! हरनामसिंह––इस समय मैं इसकी बातों से रंज नहीं हो सकता, क्योंकि इस बेचारे की अवस्था ही दूसरी हो रही है।
मायारानी––इसकी फिक्र जल्द करनी चाहिए। तुम जाओ, वैद्यजी को बुला लाओ।
हरनामसिंह––बहुत अच्छा।
मायारानी––(बिहारी से) तुम मेरे पास आकर बैठो। कहो, तुम्हारा मिजाज कैसा है?
बिहारीसिंह––(मायारानी के पास बैठ कर) मिजाज? मिजाज है, बहुत है, अच्छा है, क्यों अच्छा है सो ठीक है!
मायारानी––क्या तुम्हें मालूम है कि तुम कौन हो?
बिहारीसिंह––हाँ, मालूम है, मैं महाराजधिराज श्री वीरेन्द्रसिंह हूँ। (कुछ सोच कर) नहीं, वह तो अब बुड्ढे हो गये, मैं कुँअर इन्द्रजीतसिंह बनूँगा क्योंकि वह बड़े खूबसूरत हैं, औरतें देखने के साथ ही उन पर रीझ जाती हैं, अच्छा अब मैं कुँअर इन्द्रजीतसिंह हूँ। (सोच कर) नहीं नहीं नहीं, वह तो अभी लड़के हैं और उन्हें ऐयारी भी नहीं आती, और मुझे बिना ऐयारी के चैन नहीं, अतएव मैं तेजसिंह बनूँगा। बस यही बात पक्की रही, मुनादी फिरवा दीजिए कि लोग मुझे तेजसिंह कह के पुकारा करें।
मायारानी––(मुस्कुराकर) बेशक ठीक है, अब हम भी तुमको तेजसिंह ही कह के पुकारेंगे।
बिहारीसिंह––ऐसा ही उचित है। जो मजा दिन भर भूखे रहने में है वह मजा आपकी नौकरी में है, जो मजा डूब मरने में है वह मजा आपका काम करने में है।
मायारानी––सो क्यों?
बिहारीसिंह––इतना दुःख भोगा, लड़े-झगड़े, सिर के बाल नोंच डाले, सब-कुछ किया, मगर अभी तक आँख से अच्छी तरह न देखा। यह मालूम ही न हआ कि किसके लिए किसको फाँसा और उस फँसाई से फँसने वाले की सूरत अब कैसी है!
मायारानी––मेरी समझ में न आया कि इस कहने से तुम्हारा क्या मतलब है?
बिहारसिंह––(सिर पीट कर) अफसोस, हम ऐसे नासमझ के साथ हैं, ऐसी जिन्दगी ठीक नहीं, ऐसा खून किसी काम का नहीं। जो कुछ मैं कह चुका है जब तक उसका कोई मतलब न समझेगा और मेरी इच्छा पूरी न होगी, तब तक मैं किसी से न बोलूँगा, न खाऊँगा, न सोऊँगा, न एक न दो न चार, हजार पाँच सौ कुछ नहीं, चाहे जो हो मैं तो देखूँगा
मायारानी––क्या देखोगे?
बिहारीसिंह––मुँह से तो बोलने वाला नहीं, आपको समझने की गौ हो तो समझिए।
मायारानी––भला कुछ कहो भी तो सही।
बिहारीसिंह––समझ जाइए। मायारानी––कौन-सी चीज ऐसी है जो तुम्हारी देखी नहीं है?
बिहारीसिंह––देखी है मगर अच्छी तरह देखूँगा।
मायारानी––क्या देखोगे?
बिहारीसिंह––समझिए!
मायारानी––कुछ कहो भी कि समझिये-समझिये ही बकते जाओगे।
बिहारीसिंह––अच्छा एक हर्फ कहो तो कह दूँ।
मायारानी––खैर, यही सही।
बिहारीसिंह––कै कै कै कै!
मायारानी––(मुस्कुरा कर) कैदियों को देखोगे?
बिहारीसिंह––हाँ हाँ हाँ, बस बस बस, वही वही वही।
मायारानी––उन्हें तो तुम देख ही चुके हो, तुम्हीं लोगों ने तो उन्हें गिरफ्तार किया है।
बिहारीसिंह––फिर देखेंगे, सलाम करेंगे, नाच नचावेंगे, ताक धिनाधिन नाचो भालू (उठ कर कूदता है)
मायारानी बिहारीसिंह को बहुत मानती थी। मायारानी के कुछ ऐयारों का वह सरदार था और वास्तव में बहुत ही तेज और ऐयारी के फन में पूरा उस्ताद भी था। यद्यपि इस समय वह पागल है तथापि मायारानी को उसकी खातिर मंजूर है। मायारानी हँस कर उठ खड़ी हुई और बिहारीसिंह को साथ लिए हुए उस कोठरी में चली गई जिसमें सुरंग का रास्ता था। दरवाजा खोल कर सुरंग के अन्दर गई। सुरंग में कई शीशे की हाँडियाँ लटक रही थीं और रोशनी बखूबी हो रही थी। मायारानी लगभग पचास कदम के जाकर रुकी, उस जगह दीवार में एक छोटी-सी आलमारी बनी जोर थी, उसके साथ तालियों का एक छोटा-सा गुच्छा लटक रहा था। मायारानी ने वह गुच्छा निकाला और उसमें की एक ताली लगा कर यह आलमारी खोली। आलमारी के अन्दर निगाह करने से सीढ़ियाँ नजर आईं जो नीचे उतर जाने के लिए थीं। वहाँ भी शीशे की कन्दील में रोशनी हो रही थी। बिहारीसिंह को साथ लिए हुए मायारानी नीचे उतरी। अब बिहारीसिंह ने अपने को ऐसी जगह पाया लहाँ लोहे के जंगले वाली कई कोठरियाँ थीं और हर एक कोठरी का दरवाजा मजबूत ताले से बन्द था। उन कोठरियों में हथकड़ी-बेड़ी से बेबस उदास और दुःखी केवल चटाई पर लेटे अथवा बैठे हुए कई कैदियों की सूरत दिखाई दे रही थी। ये कोठरियाँ गोलाकार ऐसे ढंग से बनी हुई थीं कि हर एक कोठरी में अलग अलग कैद करने पर भी कैदी लोग आपस में बातें कर सकते थे।
सबसे पहले बिहारीसिंह की निगाह जिस कैदी पर पड़ी वह तारासिंह था जिसे देखते ही बिहारी सिंह खिलखिला कर हँसा और चारों तरफ देख न मालूम क्या-क्या बक गया जिसे मायारानी कुछ भी न समझ सकी, इसके बाद बिहारीसिंह ने मायारानी की तरफ देखा और कहा––
"छिः छिः, मुझे आप इन कम्बख्तों के सामने क्यों लाईं? मैं इन लोगों की सूरत
च॰ स॰-2-8
नहीं देखना चाहता। मैं तो कै देखूँगा कै, बस केवल कै देखूँगा और कुछ नहीं, आप जब तक चाहें यहाँ रहें मगर मैं दम भर नहीं रह सकता, अब कै देखूँगा कै, बस कै देखूँगा बस कै केवल कै!"
'कै-कै' बकता हुआ बिहारीसिंह वहाँ से भागा और उस जगह आकर बैठ गया जहाँ मायारानी से पहले-पहल मुलाकात हुई थी। बिहारीसिंह की बदहवासी देखकर मायारानी घबराई और जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ कैदखाने का ताला बन्द करने के बाद अपनी जगह पर आई, जहाँ लम्बी-लम्बी साँसें लेते बिहारीसिंह को बैठे हुए माया। मायारानी की वे सहेलियाँ भी उसी जगह बैठी थीं, जिन्हें छोड़कर मायारानी कैदखाने की तरफ गई थी।
मायारानी ने बिहारीसिंह से भागने का सबब पूछा, मगर उसने कुछ जवाब न दिया। मायारानी ने कई तरह के प्रश्न किए, मगर बिहारीसिंह ने ऐसी चुप्पी साधी कि जिसका कोई हिसाब ही नहीं। मालूम होता था कि यह जन्म का गूँगा और बहरा है, न सुनता है न कुछ बोल सकता है। मायारानी की सहेलियों ने भी बहुत कुछ जोर मारा मगर बिहारीसिंह ने मुँह न खोला। इस परेशानी में मायारानी को बिहारीसिंह की हालत पर अफसोस करते हुए घंटा भर बीत गया और तब तक वैद्यजी को जिनकी उम्र लगभग अस्सी वर्ष के होगी, अपने साथ लिए हुए हरनामसिंह भी आ पहुँचा।
वैद्यराज ने इस अनोखे पागल की जाँच की और अन्त में यह निश्चय किया कि वेशक इसे कोई ऐसी दवा खिलाई गई है, जिसके असर से पागल हो गया है, और यदि इसी समय इसका इलाज किया जाय तो एक ही दो दिन में आराम हो सकता है। मायारानी ने इलाज करने की आज्ञा दी और वैद्यराज ने अपने पास से एक जड़ाऊ डिबिया निकाली जो कई तरह की दवाओं से भरी हुई हमेशा उनके पास रहा करती थी।
वैद्यराज को उस अनोखे पागल की जाँच में कुछ भी तकलीफ न हुई। बिहारीसिंह ने नाड़ी दिखाने में उज्र न किया और अन्त में दवा की वह गोली भी खा गया जो वैद्यराज ने अपने हाथ ने उसके मुँह में रख दी थी। बिहारी सिंह ने अपने को ऐसा बनाया जिससे देखने वालों को विश्वास हो कि वह दवा खा गया, परन्तु उस चालाक पागल ने गोली दाँतों के नीचे छिपा ली, और थोड़ी देर बाद मौका पा इस ढब से थूक दी कि किसी को गुमान तक न हुआ।
आधी घड़ी तक उछल-कूद करने के बाद बिहारीसिंह जमीन पर गिर पड़ा और सवेरा होने तक उसी तरह पड़ा रहा। वैद्यराज ने नब्ज देखकर कहा कि यह दवा की तासीर से बेहोश हो गया है, इसे कोई छेड़े नहीं, आशा है कि जब इसकी आँख खुलेगी तो अच्छी तरह बातचीत करेगा। बिहारीसिंह चुपचाप पड़ा ये बातें सुन रहा था। मायारानी बिहारीसिंह की हिफाजत के लिए कई लौंडियाँ छोड़ दूसरे कमरे में चली गई और एक नाजुक पलंग पर जो वहाँ बिछा हुआ था सो रही।
सूर्योदय से पहले ही मायारानी उठी और हाथ-मुँह धोकर उस जगह पहुँची जहाँ बिहारीसिंह को छोड़ गई थी। हरनामसिंह पहले ही वहाँ जा चुका था। बिहारीसिंह को जव मालूम हो गया कि महारानी उसके पास आकर बैठ गई है तो वह भी दो-तीन करवटें लेकर उठ बैठा और ताज्जुब से चारों तरफ देखने लगा।
मायारानी––अब तुम्हारा क्या हाल है?
बिहारीसिंह––हाल क्या कहूँ, मुझे ताज्जुब मालूम होता है कि मैं यहाँ क्योंकर आया, मेरी आवाज क्यों बैठ गई, और इतनी कमजोरी क्यों मालूम होती है कि मैं उठ कर चल-फिर नहीं सकता!
मायारानी––ईश्वर ने बड़ी कृपा की, जो तुम्हारी जान बच गई, तुम तो पूरे पागल हो गये थे, वैद्यराज ने भी ऐसी दवा दी कि एक ही खुराक में फायदा हो गया। बेशक उन्होंने इनाम पाने का काम किया। तुम अपना हाल तो कहो, तुम्हें क्या हो गया था?
बिहारीसिंह––(हरनामसिंह की तरफ देखकर) मैं एक ऐयार के फेर में पड़ गया सा, मगर पहले आप कहिए कि मुझे इस अवस्था में कहाँ पाया?
हरनामसिंह––आप मुझसे यह कहकर कि तुम थोड़ा-सा काम जो बच रहा है उसे पूरा करके जमानिया चले जाना, मैं कमलिनी से मुलाकात करके और जिस तरह होगा, उसे राजी करके जमानिमा आऊँगा-खँडहर वाले तहखाने से बाहर चले गये, परन्तु काम पूरा करने के बाद मैं सुरंग के बाहर निकला तो आपको शिवालय के सामने पेड़ के नीचे विचित्र दशा में पाया। (पागलपने की बातचीत और मायारानी के पास तक आने का खुलासा हाल कहने के बाद) मालूम होता है आप कमलिनी के पास नहीं गये?
बिहारीसिंह––(मायारानी से) जैसा धोखा मैंने अबकी खाया, आज तक नहीं खाया था। हरनामसिंह का कहना सही है। जब मैं सुरंग से निकलकर शिवालय से बाहर हुआ तो एक आदमी पर नजर पड़ी जो मामूली जमींदार की सूरत में था। वह मुझे देखते ही मेरे पैरों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ा कर कहने लगा कि "पुजारी महाराज, किसी तरह मेरे भाई की जान बचाइए!" मैंने उससे पूछा कि "तेरे भाई को क्या हुआ है?" उसने जवाब दिया कि "उसे एक बुढ़िया बेतरह मार रही है। किसी तरह उसके हाथ से छुड़ाइये।" वह जमींदार बहुत ही मजबूत और मोटा-ताजा था। मुझे ताज्जुब मालूम हुआ कि वह कैसी बुढ़िया है, जो ऐसे-ऐसे दो भाइयों से नहीं हारती! आखिर मैं उसके साथ चलने पर राजी हो गया। वह मुझे शिवालय से कुछ दूर एक झाड़ी में ले गया, जहाँ कई आदमी छिपे हुए बैठे थे। उस जमींदार के इशारे से सभी ने मुझे घेर लिया और एक ने चाँदी की एक लुटिया मेरे सामने रखकर कहा कि "यह भंग है इसे पी जाओ।" मुझे मालूम हो गया कि यह वास्तव में कोई ऐयार है जिसने मुझे धोखा दिया। मैंने भंग पीने से इनकार किया और वहाँ से लौटना चाहा, सभी ने भागने न दिया। थोड़ी देर तक मैं उन लोगों से लड़ा, मगर क्या कर सकता था क्योंकि वे लोग गिनती में पन्द्रह से कम न थे। आखिर में उन लोगों ने पटक कर मुझे मारना शुरू किया और जब मैं बेदम हो एया तो भंग या दवा जो कुछ हो मुझे जबर्दस्ती पिला दी, बस इसके बाद मुझे कुछ भी खबर नहीं कि क्या हआ।
थोड़ी देर तक इसी तरह की ताज्जुब की बातें कहकर बिहारीसिंह ने मायारानी का दिल बहलाया और इसके बाद कहा, "मेरी तबीयत बहुत खराब हो रही है, यदि कुछ देर तक बाग में टहलूँ तो बेशक जी प्रसन्न हो, मगर कमजोरी इतनी बढ़ गई है कि स्वयं उठने और टहलने की हिम्मत नहीं पड़ती।" मायारानी ने कहा, "कोई हर्ज नहीं, हरनामसिंह सहारा देकर तुम्हें टहलावेंगे, मैं समझती हूँ कि बाग की ताजा हवा खाने और फूलों की खुशबू सूँघने से तुम्हें बहुत कुछ फायदा पहुँचेगा।"
आखिर हरनामसिंह ने बिहारीसिंह को हाथ पकड़ के बाग में अच्छी तरह टहलाया और इस बहाने से तेजसिंह ने उस बाग को तथा वहाँ की इमारतों को भी अच्छी तरह देख लिया। ये लोग घूम-फिर कर मायारानी के पास पहुँचे ही थे कि एक लौंडी ने जो चोबदार थी, मायारानी के सामने आकर और हाथ जोड़कर कहा, "बाग के फाटक पर एक आदमी आया है और सरकार में हाजिर होना चाहता है। बहुत ही बदसूरत और काला-कलूटा है, परन्तु कहता है कि मैं बिहारीसिंह हूँ, मुझे किसी ऐयार ने धोखा दिया और चेहरे तथा बदन को ऐसे रंग से रंग दिया कि अभी तक साफ नहीं होता!"
मायारानी––यह अनोखी बात सुनने में आई कि ऐयारों का रँगा हुआ रंग और धोने से न छुटे! कोई-कोई रंग पक्का जरूर होता है मगर उसे भी ऐयार लोग छुड़ा सकते हैं। (हँसकर) बिहारीसिंह ऐसा बेवकूफ नहीं है कि अपने चेहरे का रंग न छुड़ा सके!
बिहारीसिंह––रहिये-रहिये, मुझे शक पड़ता है कि शायद यह वही आदमी हो जिसने मुझे धोखा दिया, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि मेरे साथ जबर्दस्ती की। (लौंडी की तरफ देखकर) उसके चेहरे पर जख्म के दाग भी हैं?
लौंडी––जी हाँ, पुराने जख्म के कई दाग हैं।
बिहारीसिंह––भौंह के पास भी कोई जख्म का दाग है?
लौंडी––एक आड़ा दाग है, मालूम होता हैं कि कभी लाठी की चोट खाई है।
बिहारीसिंह––बस-बस, यह वही आदमी है, देखो जाने न पावे। चंडूल को यह खबर ही नहीं कि बिहारीसिंह तो यहाँ पहुँच गया है। (मायारानी की तरफ देखकर) यहाँ पर्दा करवा कर उसे बुलवाइये, मैं भी पर्दे के अन्दर रहूँगा, देखिए क्या मजा करता हूँ। हाँ, हरनामसिंह पर्दे के बाहर रहें, देखें पहचानता है या नहीं।
मायारानी––(लौंडी की तरफ देखकर) पर्दा करने के लिए कहो और नियमानुसार आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे यहाँ लिवा आओ।
लौंडी––वह यहाँ की हरएक चीज का पूरा-पूरा पता देता है और जरूर इस बाग के अन्दर आ चुका है।
बिहारीसिंह––पक्का चोर है, ताज्जुब नहीं कि यहाँ आ चुका हो! खैर, तुम लोगों को अपना नियम पूरा करना चाहिए।
हुक्म पाते ही लौंडियों ने पर्दे का इन्तजाम कर दिया और वह लौंडी जिसने बिहारीसिंह के आने की खबर दी थी, इसलिए फाटक की तरफ रवाना हुई कि नियमानुसार आँख पर पट्टी बाँधकर बिहारीसिंह को बाग के अन्दर ले आवे और मायारानी के सामने हाजिर करे।
इस जगह इस बाग का कुछ थोड़ा-सा हाल लिख देना मुनासिब मालूम होता है। यह दो सौ बीघे का बाग मजबूत चहारदीवारी के अन्दर था। इसके चारों तरफ की दीवारें बहुत मोटी मज़बूत और लगभग पच्चीस हाथ के ऊँची थीं। दीवार के ऊपरी हिस्से में तेज नोक और धार वाले लोहे के काँटे और फाल इस ढंग से लगे हुए थे कि काबिल ऐयार भी दीवार लाँघकर बाग के अन्दर जाने का साहस नहीं कर सकते थे। कांटों के सबब यद्यपि कमन्द लगाने में सुभीता था। परन्तु उसके सहारे ऊपर चढ़ना बिलकुल ही असम्भव था। इस चहारदीवारी के अन्दर की जमीन जिसे हम बाग कहते हैं चार हिस्सों में बँटी हुई थी। पूरब की तरफ आलीशान फाटक था, जिसके अन्दर जाकर एक बाग जिसे पहला हिस्सा कहना चाहिए, मिलता था। इसकी चौड़ी-चौड़ी रविशें ईंट और चूने से बनी हुई थीं। पश्चिम तरफ अर्थात् इस हिस्से के अन्त में बीस हाथ मोटी और इससे ज्यादा ऊँची दीवार बाग की पूरी चौड़ाई तक बनी हई थी जिसके नीचे बहुत-सी कोठरियाँ थीं जो सिपाहियों के काम में आती थीं। उस दीवार के ऊपर चढ़ने के लिए खूबसुरत सीढ़ियाँ थीं जिन पर जाने से बाग का दूसरा हिस्सा दिखाई देता था और इन्हीं सीढ़ियों की राह दीवार के नीचे उतर कर उस हिस्से में आना पड़ता था, सिवा इसके और कोई दूसरा रास्ता उस बाग में जिसे हम दूसरा हिस्सा कहते हैं जाने के लिए नहीं था। बाग के इसी दूसरे हिस्से में वह इमारत या कोठी थी, जिसमें मायारानी दरबार किया करती थी या जिसमें पहुँचकर नानक ने मायारानी को देखा था। पहले हिस्से की अपक्षा यह हिस्सा विशेष खूबसूरत और सजा हुआ था। बाग के तीसरे हिस्से में जाने का रास्ता उसी मकान के अन्दर से था जिसमें मायारानी रहा करती थी। बाग के तीसरे हिस्से का हाल लिखवा जरा मुश्किल है तथापि इमारत के बारे में इतना कह सकते हैं कि इस तीसरे हिस्से के बीचोंबीच में एक बहुत ऊँचा बुर्ज था। उस बुर्ज के चारों तरफ कई मकान थे जिनके दालानों, कोठरियों, कमरों और बारहदरियों तथा तहखानों का हाल इस जगह लिखना कठिन है, क्योंकि उन सभी का तिलिस्मी बातों से विशेष सम्बन्ध है। हाँ, इतना कह सकते हैं कि उसी बूर्ज में से बाग के चौथे हिस्से में जाने का रास्ता था, मगर इस बाग के चौथे हिस्से में क्या-क्या है, उसका हाल लिखते कलेजा काँपता है। इस जगह हम उसका जिक्र करना मुनासिब नहीं समझते, आगे जाकर किसी मौके पर वह हाल लिखा जायगा।
जब वह लौंडी असली बिहारीसिंह को जो बाग के फाटक पर आया था, लेने चली गई तो नकली बिहारीसिंह अर्थात् तेजसिंह ने मायारानी से कहा, "इसे ईश्वर की कृपा ही कहनी चाहिए कि वह शैतान ऐयार, जिसने मेरे साथ जबर्दस्ती की और ऐसी दवा खिलाई कि जिसके असर से मैं पागल ही हो गया था, घर बैठे फँदे में आ गया।"
JIM – Assistente
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