चन्द्रकांता सन्तति २
चण्डूल ने हरनामसिंह के कान में कोई बात कही। उस समय हरनामसिंह चण्डूल की तरफ कान झुकाए जमीन की तरफ देख रहा था। चण्डूल कान में कुछ कह कर दो कदम पीछे हट गया मगर हरनामसिंह ज्यों-का-त्यों झुका हुआ खड़ा ही रह गया। यदि उस समय उसे कोई नया आदमी देखता तो यही समझता कि यह पत्थर का पुतला है। मायारानी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ, कई सायत बीत जाने पर भी जब हरनामसिंह वहाँ से न हिला तो उसने पुकारा, "हरनाम!" उस समय वह चौंका और चारों तरफ देखने लगा, जब चण्डूल पर निगाह पड़ी तो मुँह फेर लिया और बिहारीसिंह के पास जा सिर पर हाथ रख कर बैठ गया।
मायारानी––हरनाम, क्या तू भी बिहारी का साथी हो गया? वह बात मुझसे न कहेगा जो अभी तूने सुनी है?
हरनामसिंह––मैं इसी वास्ते यहाँ आ बैठा हूँ कि आखिर तुम रंज होकर मेरा सिर काट लेने का हुक्म दोगी ही क्योंकि तुम्हारा मिजाज बड़ा क्रोधी है। मगर, लाचार हूँ, मैं वह बात कदापि नहीं कह सकता।
मायारानी––मालूम होता है कि यह आदमी कोई जादूगर है। अस्तु, मैं हुक्म देती हूँ कि यह फौरन गिरफ्तार किया जाय!
चण्डूल––गिरफ्तार होने के लिए तो मैं आया ही हूँ, कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है? लीजिए स्वयं मैं आपके पास आता हूँ, हथकड़ी-बेड़ी कहाँ है लाइए!
इतना कह कर चण्डूल तेजी के साथ मायारानी के पास गया और जब तक वह अपने को सम्हाले, झुक कर उसके कान में न मालूम क्या कह दिया कि उसकी अवस्था बिल्कुल ही बदल गई। बिहारीसिंह और हरनामसिंह तो बात सुनने के बाद इस लायक भी रहे थे कि किसी की बात सुनें और उसका जवाब दें। मगर, मायारानी इस लायक भी न रही। उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई तथा वह घूम कर जमीन पर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। बिहारीसिंह और हरनामसिंह को छोड़ कर बाकी जितने आदमी उसके साथ आये थे सभी में खलबली मच गई और सभी को इस बात का डर बैठ गया कि चण्डूल उनके कान में भी कोई ऐसी बात न कह दे जिससे मायारानी की सी अवस्था हो जाय।
घण्टा भर बीत गया पर मायारानी होश में न आई। चण्डूल, तेजसिंह के पास गया और उनके कान में भी कोई बात कही, जिसके जवाब में तेजसिंह ने केवल इतना!" ही कहा, "मैं तैयार हूँ!"
तेजसिंह का हाथ पकड़े हुए चण्डूल उसी कोठरी में चला गया जिसमें से बाहर निकला था। अन्दर जाने के बाद दरवाजा बखूबी बन्द कर लिया। मायारानी के साथियों में से किसी की भी हिम्मत न पड़ी कि चण्डूल को या तेजसिंह को जाने से रोके। जिस समय चण्डूल यकायक कोठरी का दरवाजा खोल कर बाहर निकला था, उस समय मालूम होता था कि उस कोठरी के अन्दर और भी कई आदमी हैं। मगर, उस समय तेजसिंह ने वहाँ सिवाय अपने और चण्डूल के और किसी को भी न पाया। उधर माया- रानी जब होश में आई तो बिहारीसिंह, हरनामसिंह तथा अपने और साथियों को लेकर खास महल में चली गई। उसके दोनों ऐयार बिहारीसिंह और हरनामसिंह अपने मालिक के वैसे ही ताबेदार और खैरखाह बने रहे जैसे थे। मगर, चण्डूल की कही हुई बात वे दोनों अपने मुँह से कभी भी निकाल नहीं सकते थे। जब-जब चण्डूल का ध्यान आता बदन के रोंगटे खड़े हो जाते थे और ठीक यही अवस्था मायारानी की भी थी। माया- रानी को यह भी निश्चय हो गया कि चण्डूल नकली बिहारीसिंह अर्थात् तेजसिंह को छुड़ा ले गया।
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नेमची रिक्तगन्थ––यह ऐयारी भाषा का शब्द है, इसका अर्थ है––खून से लिखी किताब का घर
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ऐयारी भाषा में 'हारीत' देवी-पूजा को कहते हैं।
4
शाम का वक्त है। सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं तथापि पश्चिम तरफ आसमान पर कुछ-कुछ लाली अभी तक दिखाई दे रही है। ठण्डी हवा मन्द गति से चल रही है। गरमी तो नहीं मालूम होती लेकिन इस समय की हवा बदन में कँपकँपी भी पैदा नहीं कर सकती। हम इस समय आपको एक ऐसे मैदान की तरफ ध्यान देने के लिए कहते हैं, जिसकी लम्बाई और चौड़ाई का अन्दाज करना कठिन है। जिधर निगाह दौड़ाइये, सन्नाटा नजर आता है। कोई पेड़ भी ऐसा नहीं है, जिसके पीछे या जिस पर चढ़ कर कोई आदमी अपने को छिपा सके। हाँ, पूरब तरफ निगाह कुछ ठोकर खाती है और एक धुँधली चीज को देख कर गौर करने वाला कह सकता है कि उस तरफ शायद कोई छोटी-सी पहाड़ी या पुराने जमाने का कोई ऊँचा टीला है।
ऐसे मैदान में तीन औरतें घोड़ियों पर सवार धीरे-धीरे उसी तरफ जा रही हैं, जिधर उस टीले या छोटी पहाड़ी की स्याही मालूम हो रही है। यद्यपि उन औरतों की पोशाक जनाना वजः की है। मगर, फिर भी चुस्त और दक्षिणी ढंग की है। तीनों के चेहरे पर नकाब पड़ी हुई है, तथापि वदन की सुडौली और कलाई तथा नाजुक उँगलियों पर ध्यान देने से देखने वाले के दिल में यह बात जरूर पैदा होगी कि ये तीनों ही नाजुक नौजवान और खूबसुरत हैं। इन औरतों के विषय में हम अपने पाठकों को ज्यादा देर तक खटके में न डाल कर इसी समय इनका परिचय दे देना उत्तम समझते हैं। वह देखिये ऊँची और मुश्की घोड़ी पर जो सवार है, वह मायारानी है। चोगर आँखों वाली सफेद पचकल्यान घोड़ी पर जो पटरी जमाये है, वह उसकी छोटी बहिन लाड़िली है, जिसे अभी तक हम रामभोली के नाम से लिखते चले आये हैं, और सब्जी घोड़ी पर सवार चारों तरफ निगाह दौड़ा-दौड़ा कर देखने वाली धनपत है। ये तीनों आपस में धीरे-धीरे बातें करती जा रही हैं। लीजिए तीनों ने अपने चेहरों पर से नकाबें उलट दीं, अब हमें तीनों की बातों पर ध्यान देना उचित है।
मायारानी––न मालूम चण्डूल कम्बख्त तीसरे नम्बर के बाग में क्योंकर जा पहुँचा! इसमें तो कुछ सन्देह नहीं कि जिस राह से हम लोग आते-जाते हैं उस राह से वह नहीं गया था।
लाड़िली––तिलिस्म बनाने वालों ने वहाँ पहुँचने के लिए कई रास्ते बनाए हैं, शायद उन्हीं रास्तों में से कोई रास्ता उसे मालूम हो गया हो।
धनपति––मगर उन रास्तों का हाल किसी दूसरे को मालूम हो जाना तो बड़ी भयानक बात है।
मायारानी––और यह एक ताज्जुब की बात है कि उन रास्तों का हाल जब मुझको जो तिलिस्म की रानी कहलाती है, नहीं मालूम तो किसी दूसरे को कैसे मालूम हुआ!
लाड़िली––ठीक है, तिलिस्म की बहुत-सी बातें ऐसी हैं, जो तुम्हें मालूम हैं। मगर नियमानुसार तुम मुझसे भी नहीं कह सकती हो। हाँ, उन रास्तों का हाल जीजाजी को जरूर मालूम था। अफसोस, उन्हें मरे पाँच वर्ष हो गये, अगर जीते होते तो …
मायारानी––(कुछ घबरा कर और जल्दी से) तुम कैसे जानती हो कि उन रास्तों का हाल उन्हें मालूम था?
लाड़िली––हँसी-हँसी में उन्होंने एक दिन मुझसे कहा था कि बाग के तीसरे दर्जे में जाने के लिए पाँच रास्ते हैं, बल्कि वे मुझे अपने साथ वहाँ ले चल कर नया रास्ता दिखाने को तैयार भी थे मगर मैं तुम्हारे डर से उनके साथ न गई।
मायारानी––आज तक तूने यह हाल मुझसे क्यों न कहा?
लाड़िली––मेरी समझ में यह कोई जरूरी बात न थी जो तुमसे कहती।
लाड़िली की बात सुन मायारानी चुप हो गई और बड़े गौर में पड़ गई। उसकी अवस्था और उसकी सूरत पर ध्यान देने से मालूम होता था कि लाड़िली की बात से उसके दिल पर एक सख्त सदमा पहुँचा है और वह थोड़ी देर के लिए अपने को बिल्कुल ही भूल गई है। मायारानी की ऐसी अवस्था क्यों हो गई और इस मामूली-सी बात से उसके दिल पर क्यों चोट लगी इसका सबब उसकी छोटी बहिन लाड़िली भी न समझ सकी। कदाचित् यह कहा जाय कि वह अपने पति को याद करके इस अवस्था में पड़ गई, सो भी नहीं हो सकता। क्योंकि लाड़िली खूब जानती थी कि मायारानी अपने खूबसूरत, हँसमुख और नेक चाल-चलन वाले पति को कुछ भी नहीं चाहती थी। इस समय लाड़िली के दिल में एक तरह का खटका पैदा हुआ और शक की निगाह से मायारानी की तरफ देखने लगी। मगर मायारानी कुछ भी नहीं जानती थी कि उसकी छोटी बहिन उसे किस निगाह देख रही है। लगभग दो सौ कदम चले जाने बाद वह चौंकी और लाड़िली की तरफ जरा-सा मुँह फेर कर बोली, "हाँ, तो वह उन रास्तों का हाल जानता था?"
लाड़िली के दिल में और भी खुटका पैदा हुआ बल्कि इस बात का रंज हुआ कि मायारानी ने अपने पति या लाड़िली के प्यारे बहनोई की तरफ ऐसे शब्दों में इशारा किया जो किसी नीच या खिदमतगार तथा नौकर के लिए बरता जाता है। लाड़िली का ध्यान धनपत की तरफ भी गया जिसके चेहरे पर उदासी और रंज की निशानी मामूली से कुछ ज्यादा पाई जाती थी और जिसकी घोड़ी भी पाँच-सात कदम पीछे रह गई थी। मगर मायारानी और धनपत की ऐसी अवस्था ज्यादा देर तक न रही, उन दोनों ने बहुत जल्द अपने का सम्हाला और फिर मामूली तौर पर बातचीत करने लगीं।
धनपति––अब वह टीला भी आ पहुँचा। देखा चाहिए बाबाजी से मुलाकात होती है या नहीं!
मायारानी––मुलाकात अवश्य होगी क्योंकि वे कहीं नहीं जाते मगर अब मेरा जी नहीं चाहता कि वहाँ तक जाऊँ या उनसे मिलूँ।
लाड़िली––सो क्यों! तुम तो बड़े उत्साह से उनसे मिलने के लिए आई हो!
माया––ठीक है, मगर अब जो मैं सोचती हूँ तो यही जान पड़ता है कि बेचारे बाबाजी इन सब बातों का जवाब कुछ भी न दे सकेंगे।
लाड़िली––खैर, जब इतनी दूर आ चुकी हो तो अब लौट चलना भी उचित नहीं।
माया––नहीं, अब मैं वहाँ न जाऊँगी!
इतना कहकर मायारानी ने घोड़ा फेरा, लाचार होकर लाड़िली और धनपत को भी घूमना पड़ा, मगर इस कार्रवाई से लाड़िली के दिल का शक और भी ज्यादा हुआ और उसे निश्चय हो गया कि मेरी बात से मायारानी के दिल पर गहरी चोट बैठी है मगर ठीक इसका सबब क्या है सो कुछ भी नहीं मालूम होता।
मायारानी ने जैसे ही घोड़े की बाग फेरी, वैसे ही उसकी निगाह तेजसिंह पर पड़ी जो तीर और कमान हाथ में लिए बहुत दूर से कदम बढ़ाए इन तीनों के पीछे-पीछे आ रहे थे। मायारानी तेजसिंह को अच्छी तरह से जानती थी। यद्यपि इस समय कुछ अँधेरा हो गया था परन्तु मायारानी की तेज निगाहों ने तेजसिंह को तुरन्त ही पहचान लिया और इसके साथ ही वह तलवार खींच कर तेजसिंह पर झपटी।
मायारानी को नंगी तलवार लिए झपटते देख तेजसिंह ने ललकार के कहा, "खबरदार, आगे न बढ़ना, नहीं तो एक ही तीर में काम तमाम कर दूँगा!"
तेजसिंह के ललकारने से मायारानी रुक गई मगर धनपत से न रहा गया। वह तलवार खींच कर यह कहती हुई आगे बढ़ी, "मैं तेरे तीर से डरने वाली नहीं!"
तेजसिंह––मालूम होता है तुझे अपनी जान प्यारी नहीं है, इसे खूब समझ लेना कि तेजसिंह के हाथ से छूटा तीर खाली न जायगा।
धनपत––मालूम होता है कि तू केवल एक तीर ही से हम तीनों को डरा कर अपना काम निकालना चाहता है। अफसोस, इस समय मेरे पास तीर-कमान नहीं है, यदि होता तो तुझे जान पड़ता कि तीर चलाना किसे कहते हैं?
तेजसिंह––(हँसकर) न मालूम तूने औरत होने पर भी अपने को क्या समझ रक्खा है? खैर, अब मैं एक कमसिन औरत पर तीर न चलाऊँगा।
इतना कहकर तेजसिंह ने तीर तरकस में रख लिया तथा कमान बगल में लटकाने के बाद ऐयारी के बटुए में से एक छोटा-सा लोहे का गोला निकालकर सामने खड़े हो गये और धनपति को वह गोला दिखाकर बोले, "तुम लोगों के लिए यही बहुत है, मगर मैं फिर कहे देता हूँ कि मुझ पर तलवार चलाकर भलाई की आशा मत रखना!" धनपत––(मायारानी की तरफ करके) क्या तू जानता नहीं कि यह कौन हैं?
तेजसिंह––मैं तुम तीनों को खूब जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि मायारानी सैंतालीस नम्बर की कोठरी को पवित्र करके बेवा हो गई और इस बात को पाँच वर्ष का जमाना हो गया।
इतना कहकर मुस्कुराते हुए तेजसिंह ने एक भेद की निगाह मायारानी पर डाली और देखा कि मायारानी का चेहरा पीला पड़ गया और शर्म से उसकी आँखें नीचे की तरफ झुकने लगीं। मगर यह अवस्था उसकी बहुत देर तक न रही, तेजसिंह के मुँह से बात निकलने के बाद जैसे ही लाड़िली की ताज्जुब-भरी निगाह मायारानी पर पड़ी वैसे ही मायारानी ने अपने को सम्हाल कर धनपत की तरफ देखा।
अब धनपत अपने को रोक न सकी, उसने घोड़ी बढ़ाकर तेजसिंह पर तलवार का वार किया। तेजसिंह ने फुर्ती से वार खाली देकर अपने को बचा लिया और वही लोहे का गोला धनपति की घोड़ी के सिर में इस जोर से मारा कि वह सम्हल न सकी और सर हिलाकर जमीन पर गिर पड़ी। लोहे का गोला छिटककर दूर जा गिरा और तेजसिंह ने लपक कर उसे उठा लिया।
आशा थी कि घोड़ी के गिरने से धनपति को भी कुछ चोट लगेगी मगर वह घोड़ी पर से उछल कुछ दूर जा रही और बड़ी चालाकी से गिरते-गिरते उसने अपने को बचा लिया। तेजसिंह फिर वही गोला लेकर सामने खड़े हो गए।
तेजसिंह––(गोला दिखाकर) इस गोले की करामात देखी? अगर अबकी फिर वार करने का इरादा करेगो तो यह गोला तेरे घुटने पर बैठेगा और तुझे लँगड़ी होकर मायारानी का साथ देना पड़ेगा। मैं यह नहीं चाहता कि तुम लोगों को इस समय जान से मारूँ मगर हाँ इस जिस काम के लिए आया हूँ, उसे किए बिना लौट जाना भी मुनासिब नहीं समझता।
मायारानी––अच्छा बताओ, तुम हम लोगों के पीछे-पीछे क्यों आए हो और क्या चाहते हो?
तेजसिंह––(लाड़िली की तरफ इशारा करके) केवल इनसे एक बात कहनी है और कुछ नहीं।
लाड़िली––कहो, क्या कहते हो?
तेजसिंह––मैं इस तरह नहीं कहना चाहता कि तुम्हारे सिवाय कोई दूसरा सुने, इन दोनों से अलग होकर सुन लो फिर मैं चला जाऊँगा। डरो मत, मैं दगाबाज नहीं हूँ, यदि चाहूँ तो ललकार कर तुम तीनों को यमलोक पहुँचा सकता हूँ, मगर नहीं, तुमसे केवल एक बात कहने के लिए आया हूँ जिसके सुनने का अधिकार सिवाय तुम्हारे और किसी को नहीं है।
कुछ सोचकर लाड़िली वहाँ से हट गई और कुछ दूर जाकर तेजसिंह की तरफ देखने लगी मानो वह तेजसिंह की बात सुनने के लिए तैयार हो। तेजसिंह लाड़िली के पास गए और बटुए में से एक चिट्ठी निकाल उसके हाथ में देकर बोले, "इसे जल्द पढ़ लो, देखो, मायारानी को इसका हाल न मालूम हो!" लाड़िली ने बड़े गौर से वह चिट्ठी पढ़ी और इसके बाद टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दी।
तेजसिंह––इसका जवाब?
लाड़िली––केवल इतना ही कह देना कि 'बहुत अच्छा!'
अब तेजसिंह को ठहरने की कोई जरूरत न थी। उन्होंने उत्तर का रास्ता लिया, मगर घूम-घूमकर देखते जाते थे कि पीछे कोई आता तो नहीं। तेजसिंह के जाने के बाद मायारानी ने लाड़िली से पूछा, "वह चिट्ठी किसकी थी और उसमें क्या लिखा था!" लाड़िली ने असल भेद तो छिपा रक्खा, मगर कोई विचित्र बात गढ़कर उस समय मायारानी की दिलजमई कर दी।
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जीजाजी से मतलब मायारानी के पति से है जो लाड़िली का बहनोई था।
5
पाठकों को याद होगा कि भूतनाथ को नागर ने एक पेड़ के साथ बाँध रक्खा है। यद्यपि भूतनाथ ने अपनी चालाकी और तिलिस्मी खंजर की मदद से नागर को बेहोश कर दिया मगर देर तक उसके चिल्लाने पर भी वहां कोई उसका मददगार न पहुँचा और नागर फिर से होश में आकर उठ बैठी।
नागर––अब मुझे मालूम हुआ कि तेरे पास भी एक अद्भुत वस्तु है।
भूतनाथ––जो अब तुम्हारी होगी।
नागर––नहीं, जिसके छूने से बेहोश हो गई उसे अपने पास क्यों कर रख सकती हूँ! मगर मालूम होता है कि कोई ऐसी चीज भी तेरे पास जरूर है जिसके सबब से इस खंजर का असर तुझ पर नहीं होता। खैर, मैं तेरा यह तीसरा कसूर भी माफ करूँगी यदि तू यह खंजर मुझे दे दे और वह दूसरी चीज भी मेरे हवाले कर दे जिसके सबब से इस खंजर का असर तुझ पर नहीं होता।
भूतनाथ––मगर मुझे क्योंकर विश्वास होगा कि तुमने मेरा कसूर माफ किया?
नागर––और मुझे क्योंकर विश्वास होगा कि तूने वास्तव में वही चीज मुझे दी जिसके सबब से खंजर की करामात से तू बचा हुआ है?
भूतनाथ––बेशक मैं वही चीज तुम्हें दूँगा, और तुम आजमाने के बाद मुझे छोड़ सकती हो।
नागर––मगर ताज्जुब नहीं कि आजमाते ही मैं फिर बेहोश हो जाऊँ क्योंकि तू धोखा देने में मुझसे किसी तरह कम नहीं है!
भूतनाथ––इसका जवाब तुम खुद समझ सकती हो!
नागर––हाँ ठीक है, यदि मैं थोड़ी देर के लिए बेहोश भी हो जाऊँगी तो तू मेरा कुछ कर नहीं सकता क्योंकि पेड़ के साथ बँधा हुआ है और तेरे हाथ-पैर भी खुले नहीं हैं।
भूतनाथ––और मेरे चिल्लाने से भी यहां कोई मददगार न पहुँचेगा।
नागर––हो, इसका प्रमाण भी …
कहते-कहते नागर रुक गई क्योंकि तभी पत्तों के खड़खड़ाने की आवाज उसने सुनी और किसी के आने का उसे शक हुआ। नागर ने पीछे घूम कर देखा तो कमलिनी पर नजर पड़ी जो नागर के दिए घोड़े पर सवार इसी तरफ आ रही थी। कमलिनी इस समय भी उसी सूरत में थी जिस सुरत में नागर के यहाँ गई थी और उसका पहचानना मुश्किल था, मगर भूतनाथ को जुबानी नागर को पता लग चुका था इसलिए उसने कमलिनी को तुरत पहचान लिया और भूतनाथ को उसी तरह छोड़ फुर्ती से अपने घोड़े पर सवार हो गई। कमलिनी भी पास पहुँची और नागर की तरफ देखकर बोली––
कमलिनी––तुझे तो विश्वास हो गया होगा कि मैं मिर्जापुर चली गई!
नागर––बेशक तुमने मुझे धोखा दिया, खैर, अब मेरे हाथ से बच कर कहाँ जा सकती हो? यद्यपि तुम मायारानी की बहिन हो और इस सबब से मुझे तुम्हारा अदब करना चाहिए मगर तुम्हारी बुराइयों पर ध्यान देकर मायारानी ने हुक्म दे रक्खा है कि जो कोई तुम्हारा सिर काट कर उनके पास ले जायेगा वह मुँहमाँगा इनाम पाएगा, अस्तु अब मैं तुम्हें किसी तरह छोड़ नहीं सकती। हाँ, अगर तुम खुशी से मायारानी के पास चली चलो तो अच्छी बात है!
कमलिनी––(मुस्कुरा कर) ठीक है, मालूम होता है कि तू अभी तक अपने को अपने मकान में मौजूद समझती है और चारों तरफ अपने नौकरों को देख रही है।
नागर––(कुछ शर्माकर) मैं खूब जानती हूँ कि इस मैदान में मैं अकेली हूँ लेकिन यह भी देख रही हूँ कि तुम्हारे साथ भी कोई दूसरा नहीं है। अगर तुम अपने को हर्बा चलाने और ताकत में मुझसे बढ़कर समझती हो तो यह तुम्हारी भूल है और इसका फैसला हाथ मिलाने से ही हो सकता है (हाथ बढ़ाकर) आइए!
कमलिनी––(हँसकर) वाह, तू समझती है कि मुझे उस अँगूठी की खबर नहीं जो तेरे इस बढ़े हुए हाथ में देख रही हूँ, अच्छा ले!
"अच्छा ले" कह कर कमलिनी ने दिखा दिया कि उसमें कितनी तेजी और फुर्ती है। घोड़ा आगे बढ़ाया और तिलिस्मी खंजर निकाल कर इतनी तेजी के साथ नागर के हाथ पर रख दिया कि वह अपना हाथ हटा भी न सकी और खंजर की तासीर से बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी। कमलिनी ने घोड़े से उतर कर भूतनाथ को कैद से छुट्टी दी और कहा, "वाह, तुम इतने बड़े चालाक होकर भी इसके फन्दे में आ गये!"
भूतनाथ––मैं इसके फन्दे में न आता यदि उस अँगूठी का गुण जानता जो इसकी उँगली में चमक रही है, वास्तव में यह अनमोल वस्तु है और कठिन समय पर काम दे सकती है।
कमलिनी––इस कम्बख्त के पास यही तो एक चीज है जिसके सबब से मायारानी की आँखों में इसकी इज्जत है। इसके जहर से कोई बच नहीं सकता, हाँ यदि यह चाहे तो जहर उतार भी सकती है। न मालूम यह अँगूठी और इसका जहर उतारने की तरकीब मनोरमा ने कहाँ से पाई।
भूतनाथ––मायारानी से और इससे क्या सम्बन्ध?
कमलिनी––मनोरमा उसकी छह सखियों में सबसे बड़ा दर्जा रखती है और वह
च॰ स॰-2-10
इस कम्बख्त को अपनी बहिन से बढ़ के मानती है। यह अँगूठी भी मनोरमा ही की है।
भूतनाथ––तो मायारानी ने यह अँगूठी क्यों न ले ली? उसके तो बड़े काम की चीज थी!
कमलिनी––उसको भी मनोरमा ने ऐसी ही अँगूठी बना दी है और जहर उतारने की दवा भी तैयार कर दी है मगर इसके बनाने की तरकीब नहीं बताती।
भूतनाथ––खैर, अब यह अँगूठी आप ले लीजिए।
कमलिनी––यद्यपि यह मेरे काम की चीज नहीं है बल्कि इसको अपने पास रखने में मैं पाप समझती हूँ तथापि जब तक मायारानी से खटपट चली जाती है तब तक यह अँगूठी अपने पास जरूर रक्खूगी (तिलिस्मी खंजर की तरफ इशारा करके) इसके सामने यह अँगूठी कोई चीज नहीं है।
भूतनाथ––बेशक बेशक! जिसके पास यह खंजर है उसे दुनिया में किसी चीज की परवाह नहीं और वह अपने दुश्मन से चाहे वह कैसा जबरदस्त क्यों न हो कभी नहीं डर सकता। आपने मुझ पर बड़ी ही कृपा की जो ऐसा खंजर थोड़े दिन के लिए मुझे दिया। आह, वह दिन भी कैसा होगा जिस दिन यह खंजर हमेशा अपने पास रखने की आज्ञा आप मुझे देंगी।
कमलिनी––(मुस्कुराकर) खैर, वह दिन आज ही समझ लो, मैं हमेशा के लिए यह खंजर तुम्हें देती हूँ, मगर नानक के लिए ऐसा करने की सिफारिश मत करना।
भूतनाथ ने खुश होकर कमलिनी को सलाम किया। कमलिनी ने नागर की उँगली से जहरीली अँगूठी उतार ली और उसके बटुए में से खोज कर उस दवा की शीशी भी निकाल ली जो उस अँगूठी के भयानक जहर को बात की बात में दूर कर सकती थी। इसके बाद कमलिनी ने भूतनाथ से कहा, "नागर को हमारे अद्भुत मकान में ले जाकर तारा के सुपुर्द करो और फिर मुझसे आकर मिलो। मैं फिर वहीं अर्थात् मनोरमा के मकान पर जाती हूँ। अपने कागजात भी उसके बटुए में से निकाल लो और इसी समय उन्हें जलाकर सदैव के लिए निश्चिन्त हो जाओ!"
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मायारानी का डेरा अभी तक खास बाग (तिलिस्मी बाग) में है। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है, चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। पहरे वालों के सिवाय सभी को निद्रादेवी ने बेहोश करके डाल रक्खा है, मगर उस बाग में दो औरतों की आँखों में नीद का नाम-निशान भी नहीं। एक तो मायारानी की छोटी बहिन लाड़िली, जो अपने सोने वाले कमरे में मसहरी के ऊपर पड़ी कुछ सोच रही है और थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर बाहर निकलती और सन्नाटे की तरफ ध्यान देकर लौट जाती है, मालूम होता है कि वह मकान से बाहर जाकर किसी से मिलने का मौका ढूँढ़ रही है और दूसरी मायारानी जो निद्रा न आने के कारण अपने कमरे में टहल रही है। उसे भी तरह-तरह के खयालों ने सता रक्खा है। कभी-कभी उसका सिर हिल जाता है जो उसके दिल की परेशानी को पूरी तरह से छिपा रहने नहीं देता, उसके होंठ भी कभी-कभी अलग होकर दिल का दरवाजा खोल देते हैं जिससे दिल के अन्दर कैद रहने वाले कई भेद शब्द रूप होकर धीरे से बाहर निकल पड़ते हैं।
जब चारों तरफ अच्छी तरह सन्नाटा हो गया तो लाड़िली ने काले कपड़े पहने और ऐयारी का बटुआ कमर में लगाने के बाद कमरे के बाहर निकल कर इधर-उधर टहलना शुरू किया। वह उस कमरे के पास आई जिसके अन्दर मायारानी तरद्दुद और घबराहट से निद्रा न आने के कारण टहल रही थी। लाड़िली छिपकर देखने लगी कि मायारानी क्या कर रही है। थोड़ी देर के बाद मायारानी के मुँह से निकले हुए शब्द लाड़िली ने सुने और वे शब्द ये थे––"वह इस रास्ते को जानता है … वह भेद जिसे लाड़िली नहीं जानती––आह, धनपत को मुहब्बत ने––"
इन शब्दों को सुनकर लाड़िली घबरा गई और बेचैनी से अपने कमरे में लौट आने के लिए तैयार हुई, मगर उसके दिल ने उसे वहाँ से लौटने न दिया। इच्छा हुई कि मायारानी के मुँह से और भी कोई शब्द निकलें तो सुने, परन्तु इसके बाद मायारानी कुछ ज्यादा बेचैन मालूम हुई और अपनी मसहरी पर जाकर लेट रही। आधी घड़ी से ज्यादा न बीती थी कि मायारानी की साँस ने लाड़िली को उसके सो जाने की खबर दी और लाड़िली वहाँ से लौट कर बाग में टहलने लगी। फिर घूमती-फिरती और अपने को पेड़ों की आड़ में बचाती हुई वह बाग के पिछले कोने में पहुँची जहाँ एक छोटा-सा मगर मजबूत बुर्ज बना था। इसके अन्दर जाने के लिए छोटा-सा लोहे का दरवाजा था जिसे उसने धीरे से खोला और अन्दर जाने के बाद फिर बन्द कर लिया। भीतर बिल्कुल अँधेरा था। बटुए में से सामान निकाल कर मोमबत्ती जलाई और उस कोठरी की हालत अच्छी तरह देखने लगी। यह बुर्ज वाली कोठरी वर्षों से ही बन्द थी और इस सबब से इसके अन्दर मकड़ों ने अच्छी तरह अपना घर बना लिया था, मगर लाड़िली ने इस कोठरी की गन्दी हालत पर कुछ ध्यान न दिया। इस कोठरी की जमीन चौखूटे पत्थरों से बनी हुई थी और छत में छोटे-छोटे दो-तीन सूराख थे जिनमें से आसमान में जड़े हुए तारे दिखाई दे रहे थे। पहले तो लाड़िली इस विचार में पड़ी कि बहुत दिनों से बन्द रहने के कारण इस कोठरी की हवा खराब होकर जहरीली हो गई होगी, शायद किसी तरह का नुकसान पहुँचे, मगर छत के सूराखों को देख निश्चिन्त हो गई और मोमबत्ती एक किनारे जमा कर जमीन पर बैठ गई। आधी घड़ी तक सोच विचार में पड़ी रही, इसके बाद हलकी आवाज के साथ कोने की तरफ जमीन का एक चौखूँटा पत्थर किवाड़ के पल्ले की तरह खुल कर अलग हो गया और नीचे से अपनी असली सूरत में कमलिनी निकल कर लाड़िली के सामने खड़ी हो गई। कमलिनी को देखते ही लाड़िली उठ खड़ी हुई और बड़ी मुहब्बत से उसके साथ लिपट कर रोने लगी तथा कमलिनी की आँखें भी आँसु की बूँदें गिराने लगीं, कुछ देर बाद दोनों अलग हुई और जमीन पर बैठकर बात- चीत करने लगी। लाड़िली––मेरी प्यारी बहिन, इस समय मेरी खुशी का अन्दाजा कोई भी नहीं कर सकता। मुझे तो इस बात का बड़ा ही रंज था कि तुमने मुझे अपने दिल से भुला दिया जिसकी आशा कदापि न थी, मगर आज शाम को तुम्हारे हाथ की लिखी हुई उस चिट्ठी ने मुझमें जान डाल दी जो तेजसिंह के हाथ मुझ तक पहुँचाई गई थी।
कमलिनी––नहीं-नहीं, अभी तक मैं तुझे उतना ही प्यार करती हूँ जितना यहाँ रहने पर करती थी परन्तु इस समय आशा कम थी कि मेरे लिखे अनुसार यहाँ आकर तू मुझसे मिलेगी, क्योंकि बड़ी बहिन मायारानी मेरी जान की ग्राहक हो रही है और तू पूरी तरह उसके कब्जे में है।
लाड़िली––प्यारी बहिन, चाहे मायारानी का दिल तुम्हारी दुश्मनी से भरा हुआ क्यों न हो मगर मेरा दिल तुम्हारी मुहब्बत से किसी तरह खाली नहीं हो सकता। तुम्हारी चिट्ठी पाते ही मैं बेचैन हो गई और हजारों आफतों की तरफ ध्यान न देकर बेखटके यहाँ चली आई। क्या अब भी तुम्हें …
कमलिनी––हाँ-हाँ मुझे विश्वास है और मैं खूब जानती हूँ कि अगर तेरे दिल में मेरी मुहब्बत न होती तो तू मेरे लिखने पर यकायक यहाँ न आती।
लाड़िली––मुझे इस बात की शिकायत करने का मौका आज मिला कि तुमने इस घर को तिलांजलि देते समय अपने इरादे से मुझे बेखबर रक्खा।
कमलिनी––तो क्या मेरा इरादा जानने पर तू मेरा साथ देती?
लाड़िली––(जोर देकर) जरूर साथ देती! हाय, यहाँ रह कर जैसी तकलीफ में दिन काट रही हूँ वह मेरा ही जी जान रहा है। ऐसे-ऐसे भयानक काम मुझसे लिए जाते हैं कि जिसे मैं मुख्तसिर में कह नहीं सकती, लाचार होकर और झख मारकर सब कुछ करना पड़ता है क्योंकि इस बात को मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि मायारानी के गुस्से में पड़ कर मैं अपनी जान भारत वर्ष के किसी घने जंगल में छिपकर भी नहीं बचा सकती।
कमलिनी––इसका सबब यही है कि तू तिलिस्मी हाल से बिल्कुल बेखबर और भोली है, बल्कि वास्तव में रामभोली है।
लाड़िली––(चौंककर) क्या तुम जानती हो कि मैं रामभोली बनने पर लाचार की गई थी?
कमलिनी––मुझे अच्छी तरह मालूम है, अभी तक नानक मेरे साथ रहकर मेरा काम कर रहा है।
लाड़िली––हाय, जब वह तुम्हारे साथ है तो जरूर एक दिन सामना होगा।
उस समय शर्म से मेरी आँखें ऊँची न होंगी, उस बेचारे के साथ मैंने बड़ी बुराई की।
कमलिनी––लेकिन मैं खूब जानती हूँ कि इसमें तेरा कोई कसूर नहीं। खैर इस बात को जाने दे, मुझे तेरी मुहब्बत यहाँ तक खींच लाई है, मैं इस समय यह पूछने आई हूँ कि अब तेरा क्या इरादा है क्योंकि इस तिलिस्म की उम्र अब तमाम हो गई और मायारानी अपने बुरे कर्मों का फल भोगा ही चाहती है।
लाड़िली––(हाथ जोड़ कर) मैं यही चाहती हूँ कि तुम मुझे अपने साथ रक्खो जिसमें मायारानी का मुँह देखना नसीब न हो। मैं जानती हूँ कि यह तिलिस्म अब टूटा ही चाहता है क्योंकि इधर थोड़े दिनों से बड़ी-बड़ी अद्भुत बातें देखने में आ रही हैं जिनसे खुद मायारानी की अक्ल चक्कर में है, मगर शक है तो इतना ही कि तिलिस्म तोड़ने वाले कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह इस समय मायारानी के कैदी हो रहे हैं और कल उन दोनों का सिर जरूर काटा जायगा।
कमलिनी––यह बात मुझे भी मालूम है मगर सवेरा होने के पहले ही मैं उन दोनों को छुड़ा कर ले जाऊँगी।
लाड़िली––यदि ऐसा हो तो क्या बात है! वे दोनों कैसे नेक और खूबसूरत हैं। जिस समय मैंने आनन्दसिंह को देखा …
इतना कह लाड़िली चुप हो रही, उसकी आँखें नीची हो गईं और उसके गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गई। कमलिनी समझ गई कि यह आनन्दसिंह को चाहती है।
कमलिनी––मगर उन दोनों को छुड़ाने के लिए कुछ तुमसे भी मदद चाहती हूँ।
लाड़िली––तुम्हारी आज्ञा मानने के लिए मैं हर तरह से तैयार हूँ।
कमलिनी––तू बस कैदखाने की ताली मुझे ला दे जिसमें दोनों कुमार कैद हैं।
लाड़िली––मैं उद्योग कर सकती हूँ, मगर वह तो हरदम मायारानी की कमर में रहती है!
कगलिनी––उसके लेने की सहज तरकीब मैं बताती हूँ। लाड़िली-क्या?
कमलिनी––(कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल और दिखाकर) यह तिलिस्म की सौगात है, हाथ में लेकर जब इसका कब्जा दबाया जायगा तो बिजली की सी चमक पैदा होगी जिसके सामने किसी की आँख खुली नहीं रह सकती। इसके अतिरिक्त इस में और भी दो गुण हैं, एक तो यह कि जिसके बदन से यह लगा दिया जाय उसके बदन में बिजली दौड जाती है और वह तुरत बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ता है, और दूसरे यह हर एक चीज को काट डालने की ताकत रखता है।
कमलिनी ने खंजर का कब्जा दबाया। उसमें से ऐसी चमक पैदा हई कि लाडिली ने दोनों हाथों से आँखें बन्द कर ली और कहा, "बस-बस इस चमक को दूर करो तो आँखें खोलूँ!"
कमलिनी––(कब्जा ढीला करके) लो चमक बन्द हो गई, आँखें खोलो।
लाडिली––(आँखें खोलकर) मेरे हाथ में दो तो मैं भी कब्जा दबा कर देखें! मगर नहीं तुम तो कह चुकी हो कि यह जिसके बदन से छुआया जायगा वह बेहोश हो जायगा, तो मैं इसे कैसे ले सकूँगी और तुम पर इसका असर क्यों नहीं होता?
हम ऊपर लिख आए हैं कि कमलिनी की कमर में दो तिलिस्मी खंजर थे और उनके जोड़ की दो अँगठियाँ भी उसकी उँगलियों में थीं। उसने एक अँगूठी लाडिली की उँगली में पहिना कर उसका गुण अच्छी तरह समझा दिया और कह दिया कि जिसके हाथ में यह अँगूठी रहेगी केवल वही इस खंजर को अपने पास रख सकेगा।
लाडिली––जब ऐमी चीज तुम्हारे पास है तो वह ताली तुम स्वयं उससे ले सकती हो।
कमलिनी––हाँ, मैं यह काम खुद भी कर सकती हूँ मगर ताज्जुब नहीं कि मायारानी के कमरे तक जाते मुझे कोई देख ले और गुल करे तो मुश्किल होगी। यद्यपि मेरा कोई कुछ कर नहीं सकता और मैं इस खंजर की बदौलत सैकड़ों को मार कर निकल जा सकती हूँ, मगर जहाँ तक बिना खून-खराबा किए काम निकल जाय तो उत्तम ही है।
लाड़िली––हाँ ठीक है, तो अब विलम्ब न करना चाहिए।
कमलिनी––तो फिर जा, मैं इसी जगह बैठी तेरी राह देखूँगी!
खंजर के जोड़ की अँगूठी हाथ में पहनने वाद लाड़िली ने तिलिस्मी खंजर ले लिया और बुर्ज का दरवाजा खोल यहाँ से रवाना हुई। कमलिनी को आधे घंटे से ज्यादे राह न देखनी पड़ी, इसके भीतर ही ताली लिए हुए लाड़िली आ पहुँची और अपनी बड़ी बहिन के सामने ताली रख कर बोली, "इस ताली के लेने में कुछ भी कठिनाई न हुई। मुझे किसी ने भी न देखा। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था, मायारानी बेखबर सो रही थी, ताली लेते समय वह जाग न उठे इससे यह लिलिस्मी खंजर एक दफे उस के बदन से लगा देना पड़ा, बस तुरत ही उसका बदन काँप उठा मगर वह आँखें न खोल सको, मुझे विश्वास हो गया कि वह बेहोश हो गई। बस मैं ताली लेकर चली आई, मगर अब यहाँ ठहरना उचित नहीं।
कमलिनी––हाँ, अब यहाँ से चलना और उन कैदियों को छुड़ाना चाहिए।
लाडिली––मगर उन कैदियों को छुड़ाने के लिए तुमको इसी बाग की राह से कैदखाने तक जाना होगा!
कमलिनी––नहीं, वहाँ जाने के लिए दूसरी राह भी है जिसे मैं जानती हूँ।
लाडिली––(ताज्जुब से कमलिनी का मुँह देख के) जीजाजी यहाँ के बहत से रास्तों और सुरंगों तथा तहखानों को जानते थे, मालूम होता है तुमने उन्हीं से इसका हाल जाना होगा?
कमलिनी––नहीं, यहाँ की बहुत सी बातें किसी दूसरे ही सबब से मुझे मालम हुई जिसे सुनकर तू बहुत ही खुश होगी, हाँ यदि जीजाजी हम लोगों से जदा न कि जाते तो यहाँ की अजीब बातों के देखने का आनन्द मिलता। मायारानी को भी यहाँ के भेद अच्छी तरह मालूम नहीं हैं
लाड़िली––जीजाजी हम लोगों से जुदा किये गये इसका मतलब मैं नहीं समझी।
कमलिनी––क्या तू समझती है कि गोपालसिंहजी (माया रानी के पति) अपनी मौत से मरे?
लाडिली––(कुछ सोचकर) मुझे तो यही विश्वास है कि उन्हें जहर दिया गया मैंने स्वयं देखा कि मरने पर उनका रंग काला हो गया था और चेहरा ऐसा बिगड़ गया कि मैं पहचान न सकी। हाय, हम दोनों बहिनों पर उनकी बड़ी कृपा रहती थी। थी!
कमलिनी––उनकी कृपा किस पर नहीं रहती थी! (कुछ सोचकर) खैर आज मैं तुझे इस बाग के चौथे दर्जे में ले चल कर एक तमाशा दिखलाऊँगी। लाड़िली––(ताज्जुब से) क्या चौथे दर्जे में तुम जा सकती हो?
कमलिनी––हाँ, मैं यहाँ के बहुत से भेदों को जान गई हूँ और सब जगह घूम फिर सकती हूँ।
लाड़िली––अहा, अब तो मैं जरूर चलूँगी! जीजाजी अक्सर कहा करते थे कि इस बाग के चौथे दर्जे में अगर कोई जाय तो उसे मालूम हो कि दुनिया क्या चीज है और ईश्वर की सृष्टि में कैसी विचित्रता दिखाई दे सकती है।
कमलिनी––अच्छा, अब चलकर पहले कैदियों को छुड़ाना चाहिए।
इतना कह कर कमलिनी उठी और मोमबत्ती हाथ में लिए हुए उस सुरंग के मुहाने पर गई जिसका मुँह चौखूँटे पत्थर के हट जाने से खुल गया था और जिसमें से वह कुछ ही देर पहले निकली थी। नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ मौजूद थीं, दोनों बहिनें नीचे उतर गईं। आखिरी सीढ़ी पर पहुँचने के साथ ही वह चौखूँटा पत्थर एक हलकी आवाज के साथ अपने ठिकाने पहुँच गया और उस सुरंग का मुँह बन्द हो गया।
कर रक्खा है।
माया––अच्छा तो तू मुझसे जुदा होकर कहाँ जाएगी?
धनपत––जहाँ कहो।
माया––(कुछ सोचकर) अभी जल्दी न करो, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह कब्जे में आ ही चुके हैं, सूर्योदय के पहले ही मैं उनका काम तमाम कर दूँगी।
धनपत––मगर उसका क्या बन्दोबस्त किया जायगा जिसके विषय में चण्डूल में तेरे कान में …
माया––आह, उसकी तरफ से भी अब मुझे निराशा हो गई, वह बड़ा जिद्दी है।
धनपत––तो क्यों नहीं उसकी तरफ से भी निश्चिन्त हो जाती हो?
माया––हाँ, अब यही होगा।
धनपत––फिर देर करने की क्या जरूरत है?
माया––मैं अभी जाती हूँ, क्या तू भी मेरे साथ चलेगी?
धनपत––मैं चलने को तैयार हूँ, मगर न मालूम उसे (चण्डूल को) यह बात क्योंकर मालूम हो गई।
माया––खैर, अब चलना चाहिए।
अब मायारानी का ध्यान कैदखाने की ताली पर गया। अपनी कमर में ताली न देख कर बहुत हैरान हुई। थोड़ी देर के लिए वह अपने को बिल्कुल ही भूल गई पर आखिर एक लम्बी साँस लेकर धनपत से बोली––
माया––आफत आने की यह दूसरी निशानी है।
धनपत––सो क्या? मेरी समझ में कुछ भी न आया कि यकायक तेरी अवस्था क्यों बदल गई और किस नई घटना ने आकर तुझे घेर लिया।
माया––कैदखाने की ताली जिसे मैं सदा अपनी कमर में रखती थी, गायब हो गई।
धनपत––(घबराकर) कहीं दूसरी जगह न रख दी हो।
माया––नहीं-नहीं, जरूर मेरे पास ही थी। चल लाड़िली से पूछूँ, शायद वह इस विषय में कुछ कह सके।
मायारानी धनपत को साथ लिए लाड़िली के कमरे में गई मगर वहाँ लाड़िली थी कहाँ जो मिलती। अब उसकी घबराहट की कोई हद न रही। एकदम बोल उठी, "बेशक लाडिली ने धोखा दिया।"
धनपत––उसे ढूँढ़ना चाहिए।
मायारानी––(आसमान की तरफ देख कर और लम्बी साँस लेकर) आह, यह पहर भर के लगभग रात जो बाकी है मेरे लिए बड़ी ही अनमोल है। इसे मैं लाड़िली की खोज में व्यर्थ नहीं खोना चाहती। इतने ही समय में मुझे उस जिद्दी के पास पहुँचना और उसका सिर काट कर लौट आना है। कैदियों से भी ज्यादे तरद्दुद मुझे उसका है। हाय, अभी तक वह आवाज मेरे कानों में गूँज रही है जो चण्डूल ने कही थी। खैर, वहाँ जाते-जाते कैदखाने को भी देखती चलूँगी, (जोश में आकर) कैदी चाहे कैदखाने के बाहर हो जायँ मगर इस बाग की चहारदीवारी को नहीं लाँघ सकते। जा, बिहारीसिंह और हरनामसिंह को बहुत जल्द बुला ला।
धनपत दौड़ी हुई गई और थोड़ी ही देर में दोनों ऐयारों को साथ लिए हुए लौट आई। वे दोनों ऐयारी के सामान से दुरुस्त और हर एक काम के लिए मुस्तैद थे। यद्यपि बिहारी सिंह के चेहरे का रंग अच्छी तरह साफ नहीं हुआ था, तथापि उसकी कोशिश ने उसके चेहरे की सफाई आधी से ज्यादा कर दी थी, आशा थी कि दो ही एक दिन में वह आईने में अपनी असली सूरत देख लेगा।
कैदखाने का रास्ता पाठकों को मालूम है, क्योंकि तेजसिंह जब बिहारीसिंह की सूरत में यहाँ आए थे तो मायारानी के साथ कैदियों को देखने गये थे।
लाड़िली के कमरे में से दस-बारह तीर और कमान ले के धनपत तथा दोनों ऐयारों को साथ लिए हुए मायारानी सुरंग में घुसी। जब कैदखाने के दरवाजे पर पहुँची तो दरवाजा ज्यों-का-त्यों बन्द पाया। कैदखाने की ताली और लाड़िली के गायब होने का हाल कह के बिहारसिंह और हरनामसिंह को ताकीद कर दी कि जब तक मैं लौट कर न आऊँ तब तक तुम दोनों बड़ी होशियारी से इस दरवाजे पर पहरा दो। इसके बाद धनपत को साथ लिये हुए मायरानी बाग के तीसरे दर्जे में उसी रास्ते से गई जिस राह से तेजसिंह भेजे गये थे।
हम पहले लिख आए हैं कि बाग के तीसरे दर्जे में एक बुर्ज है और उसके चारों तरफ बहुत से मकान, कमरे और कोठरियाँ हैं। बाग में एक छोटा-सा चश्मा बह रहा था जिसमें हाथ भर से ज्यादा पानी कहीं नहीं था। मायारानी उसी चश्मे के किनारे-किनारे थोड़ी दूर तक गई यहाँ तक कि वह एक मौलसिरी के पेड़ के नीचे पहुँची जहाँ संगमरमर का एक छोटा-सा चबूतरा बना हुआ था और उस चबूतरे पर पत्थर की मूरत आदमी के बराबर की बैठी हुई थी। रात पहर भर से कम बाकी थी। चन्द्रमा धीरे-धीरे निकल कर अपनी सफेद रोशनी पूरे आसमान पर फैला रहा था। मायारानी ने उस मुरत की कलाई पकड़ कर उमेठी, साथ ही मूरत ने मुँह खोल दिया। मायारानी ने उसके मुँह में हाथ डालकर कोई पेंच घुमाना शुरू किया। थोड़ी देर में चबूतरे के सामने की तरफ का एक बड़ा-सा पत्थर हल्की आवाज के साथ हट कर अलग होगया और नीचे उतरने के लिए सीढियाँ दिखाई दीं। अपने पीछे-पीछे धनपत को आने का इशारा करके मायारानी उस तहखाने में उतर गई। यद्यपि तहखाने में अँधेरा था मगर मायारानी ने टटोल कर एक आले पर से लालटेन और उसके बालने का सामान उतारा और बत्ती वाल कर चारों तरफ देखने लगी। पूरब तरफ की सुरंग का एक छोटा-सा दरवाजा खुला हआ था, दोनों उसके अन्दर घुसी और सुरंग में चलने लगीं। लगभग सौ कदम जाने के बाद वह सुरंग खत्म हई और ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ दिखाई दीं। दोनों औरतें ऊपर चढ गई और उस बुर्ज के निचले हिस्से में पहुँची जो बहुत से मकानों से घिरा हुआ था। यहाँ भी उसी तरह का चबूतरा और उस पर पत्थर का आदमी बैठा हुआ था। वह भी किसी सुरंग का दरवाजा था जिसे मायारानी ने पहली रीति से खोला। यह सुरंग चौथे दर्जे में जाने के लिए थी। दोनों औरतें उस सुरंग में घुसी। दो सौ कदम के लगभग जाने के बाद वह सुरंग खत्म हुई और ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ नजर आई। दोनों औरतें ऊपर चढ़कर एक कोठरी में पहुँची जिसका दरवाजा खुला हुआ था। कोठरी के बाहर निकल कर धनपत और मायारानी ने अपने को बाग के चौथे हिस्से में पाया। इस बाग का पूरा-पूरा नक्शा हम आगे चल कर खींचेंगे यहाँ केवल मायारानी की कार्रवाई का हाल लिखते है।
कोठरी से आठ-दस कदम की दूरी पर पक्का मगर सूखा कुआँ था जिसके अन्दर लोहे की एक मोटी जंजीर लटक रही थी। कुएँ के ऊपर डोल और रस्सा पड़ा था। डोल में लालटेन रख कर कुएँ के अन्दर ढीला और जब वह तह में पहुँच गया तो दोनों औरतें जंजीर थाम कर कुएँ के अन्दर उतर गईं। नीचे कुएँ की दीवार के साथ छोटा-सा दरवाजा था जिसे खोल कर धनपत को पीछे आने का इशारा करके मायारानी हाथ में लालटेन लिये हुए अन्दर घुसी। वहां पर छोटी-छोटी कई कोठरियाँ थीं। निचली कोठरी में, जिसके आगे लोहे का जंगला लगा हुआ था, एक आदमी हाथ में फौलादी ढाल लिए टहलता हुआ दिखाई पड़ा। यहां बिल्कुल अँधेरा था मगर मायारानी के हाथ वाली लालटेन ने उस कोठरी की हर एक चीज और उस आदमी की सूरत बखूबी दिखा दी। इस समय उस आदमी की उम्र का अन्दाज करना मुश्किल है क्योंकि रंज और गम ने उसे सुखा कर काँटा कर दिया है, बड़ी-बड़ी आँखों के चारों तरफ स्याही दौड़ गई है और उसके चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई हैं, तो भी हर एक हालत पर ध्यान देकर कह सकते हैं कि वह किसी जमाने में पहुत ही हसीन और नाजुक रहा होगा मगर इस समय कैद ने उसे मुर्दा बना रक्खा है। उसके बदन के कपड़े बिल्कुल फटे और मैले थे और वह बहुत ही मजहूल हो रहा था। कोठरी के एक तरफ ताँबे का घड़ा, लोटा और कुछ खाने का सामान रक्खा हुआ था, ओढ़ने और विछाने के लिए दो कम्बल थे। कोठरी की पिछली दीवार में खिड़की थी जिसके अन्दर से वदवू आ रही थी।
मायारानी और धनपत को देख कर वह आदमी ठहर गया और इस अवस्था में भी लाल-लाल जाँखें करके उन दोनों की तरफ देखने लगा।
मायाननी––यह आखिरी दफे मैं तेरे पास आई हूँ।
कैदी––ईश्वर करे ऐसा ही हो और फिर तेरी सूरत दिखाई न दे।
मालारानी––अब भी अगर वह भेद मुझे बता दे तो तुझे छोड़ दूँगी।
दो––हरामजादी कमीनी औरत, दूर हो मेरे सामने से!
मायारानी––मालूम होता है वह भेद तू अपने साथ ले जायगा?
कैदी––बेशक ऐसा ही है।
मायारानी––यह ढाल तेरे हाथ में में कहाँ से आई?
कैदी––तुझ चाण्डालिन की इस बात का जवाब मैं क्यों दूँ?
मायारानी––मालूम होता है कि तुझे अपनी जान प्यारी नहीं है और अब तू मौत के पंजे में पड़ना चाहता है!
कैदी––बेशक पहले मुझे अपनी जान प्यारी न थी, पाँच दिन पीछे भोजन करना मुझे पसन्द न था, कभी-कभी तेरी सूरत देखने की बनिम्बत मौत को हजार दर्जे अच्छा समझता था, मगर अब मैं मरने के लिए तैयार नहीं हूँ।
मायारानी––(हँस कर) तुझे मेरे हाथ से बचाने वाला कौन है?
कैदी––(ढाल दिखा कर) यह!
धनपत––(मायारानी के कान में) न मालूम यह ढाल इसे क्योंकर मिल गई! क्या चण्डूल यहाँ तो नहीं पहुँच गया?
मायारानी––(धनपत से) कुछ समझ में नहीं आता। यह ढाल भविष्य बुरा बता रही है।
धनपत––मेरा कलेजा डर के मारे काँप रहा है।
मायारानी––(कैदी से) यह तुझे किसी तरह बचा नहीं सकती और मैं तेरी जान लिए बिना जा नहीं सकती।
कैदी––खैर, जो कुछ तू कर सके, कर ले।
मायारानी––तू जिद्दी और बेहया है।
कैदी––हरामजादी की बच्ची, बेहया तो तू है जो घड़ी-घड़ी के बाद मेरे सामने आती है।
इस बात के जवाब में मायारानी ने एक तीर कैदी को मारा, जिसे उसने बडी चालाकी से ढाल पर रोक लिया, दूसरा तीर चलाया, वह भी बेकार हुआ, तीसरा तीर चलाया, उससे भी कोई काम न चला। लाचार मायारानी कैदी का मुंह देखने लगी।
कैदी––तेरे किए अब कुछ भी न होगा।
मायारानी––खैर, देखूगी, तू कब तक अपनी जान बचाता है।
कैदी––मेरी जान कोई भी नहीं ले सकता, बल्कि मुझे निश्चय हो गया कि अब तेरी मौत आ गई।
इसका जवाब मायारानी कुछ देना ही चाहती थी कि एक आवाज ने उसे चौंका दिया। कैदी की बात पूरी होने के साथ ही किसी ने कहा, "बेशक मायारानी की मौत आ गई!"
2
कैदखाने का हाल हम ऊपर लिख चुके हैं, पुनः लिखने की कोई आवश्यकता नहीं। उस कैदखाने में कई कोठरियाँ थीं जिनमें से आठ कोठरियों में तो हमारे बहादर लोग कैद थे और बाकी कोठरियाँ खाली थीं। कोई आश्चर्य नहीं, यदि हमारे पाठक महाशय उन बहादुरों के नाम भूल गये हों जो इस समय मायारानी के कैदखाने में बेबस पड़े हैं अस्तु एक दफे पुनः याद दिला देते हैं। उस कैदखाने में कुंअर इन्द्रजीतसिंह, अर आनन्दसिंह, तारासिंह, भैरोंसिंह, देवीसिंह और शेरसिंह के अतिरिक्त एक कुमारी भी थी जिसके मुख की सुन्दर आभा ने उस कैदखाने में उजाला कर रखा था। पाठक समझ ही गये होंगे कि हमारा इशारा कामिनी की तरफ है। यद्यपि वह ऐसी कोठरी में बन्द थी जिसके अन्दर मर्दो की निगाह नहीं जा सकती थी तथापि कुँअर आनन्दसिंह को इस बात पर ढाढ़स थी कि उनकी प्यारी कामिनी उनसे दूर नहीं है, मगर कुँअर इन्द्रजीतसिंह के रंज का कोई ठिकाना न था। वे कुछ भी नहीं जानते थे कि उनकी प्यारी किशोरी कहाँ और किस अवस्था में है।
इस कैदखाने में छत के सहारे शीशे की एक कन्दील लटक रही थी। उसी में मायारानी का एक आदमी रोज जाकर रोशनी ठीक कर देता था। ठीक कर देना हम इसलिए कहते हैं, कि उस कैदखाने में अँधेरा रहने के कारण दिन-रात बत्ती जला करती थी और ठीक समय पर आदमी जाकर उसे दुरुस्त कर दिया करता था। खाने-पीने का सामान आठ पहर में एक दफे कैदियों को दिया जाता था। कैदखाने की भयानक अवस्था लिखने में हम विशेष समय नष्ट करना नहीं चाहते, क्योंकि हमें किस्सा बहुत लिखना है और जगह कम है।
अब हम उस संध्या का हाल लिखते हैं जिस दिन मायारानी से और चण्डूल से बातचीत हुई थी, या जब कमलिनी से लाड़िली मिली थी। यों तो तहखाने के अन्दर दिन-रात समान था और कैदियों को इस बात का ज्ञान बिल्कुल नहीं हो सकता था कि सूर्य कब उदय और कब अस्त हुआ, तथापि बाहरी हिसाब से हमें समय लिखना ही पड़ता है।
संध्या होने के बाद एक आदमी कैदखाने में आया और कैदियों की तरफ देखकर बोला, "मायारानी की तरफ से इस समय मैं आप लोगों के पास यह कहने के लिए आया हूँ कि कल पहर दिन चढ़ने के पहले ही आप लोग इस दुनिया से उठा दिए जायेंगे। इसके अतिरिक्त अपनी तरफ से अफसोस के साथ आपको इत्तिला देता हूँ कि राजा वीरेन्द्रसिंह और रानी चन्द्रकान्ता को भी हमारी मायारानी ने गिरफ्तार कर लिया है। उन्हीं के सामने आप लोग मारे जायेंगे, और इसके बाद उन दोनों की भी जान ली जायगी।"
इस आदमी के आने के पहले कैदी लोग सुस्त और उदास बैठे हुए थे, मगर जब इस आदमी ने आकर ऊपर लिखी बातें कहीं तो सभी की अवस्था बदल गई। क्रोध से सभी का चेहरा लाल हो गया और बदन काँपने लगा, लेकिन उस आदमी की बात का जवाब किसी ने भी कुछ न दिया।
कैदियों को सन्देशा देने के बाद मायारानी का आदमी उस कोठरी में गया, जिसमें हथकड़ी और बेड़ी से बेबस बेचारी कामिनी कैद थी। थोड़ी ही देर बाद कामिनी को साथ लिए हुए वह आदमी बाहर निकला। उस समय सभी की निगाह उस बेचारी पर पड़ी। देखा कि रंज, गम और दुःख के मारे वह सूखकर काँटा हो गई है। मालूम होता है मानो वर्षों से बीमार है। सिर के बाल खुले और फैले हुए हैं, साड़ी मैली और खराब हो गई है, मगर भोलापन, खूबसूरती और नजाकत ने इस अवस्था में भी उसका साथ नहीं छोड़ा है। उसके दोनों हाथ बँधे थे, और वह बेड़ी के सबब से अच्छी तरह कदम नहीं उठा सकती थी। सभी को देखते-देखते कामिनी को साथ लिए हुए मायारानी का आदमी कैदखाने के बाहर चला गया और कैदखाने का दरवाजा फिर बन्द हो गया। ताली भरने की आवाज भी बहादुर कैदियों के कानों में पड़ी। यों तो वहाँ जितने कैदी थे, सभी क्रोध के मारे काँप रहे थे, मगर हमारे आनन्दसिंह की अवस्था कुछ और ही थी। एक तो अपने मां-बाप का हाल सुनकर जोश में आ ही चुके थे, दूसरे कामिनी को जो इस बेबसी के साथ कैदखाने के बाहर जाते देखा, और भी उबल पड़े, क्रोध सम्हाल न सके, उठके खड़े हो गए और जंगले वाली कोठरी में जिसमें कैद थे टहलने लगे। जिस जंगले वाली कोठरी में कुँअर इन्द्रजीतसिंह थे, वह आनन्दसिंह के ठीक सामने थी और ऐयार लोग भी उन्हें अच्छी तरह देख सकते थे। टहलने के साथ आनन्दसिंह के पैर की जंजीर बोली, जिससे सभी का ध्यान उनकी तरफ जा रहा।
इन्द्रजीतसिंह––आनन्द!
आनन्दसिंह––आज्ञा!
इन्द्रजीतसिंह––क्या बेबसी हम लोगों का साथ न छोड़ेगी?
आनन्दसिंह––बेशक छोड़ेगी, अब हम लोग इस अवस्था में कदापि नहीं रह सकते। हम लोग जंगली शेर नहीं हैं जो जंगले के अन्दर बन्द पड़े रहें।
इन्द्रजीतसिंह––(खड़े होकर) हाँ, ऐसा ही है, यह लोहे की तार अब हमें रोक नहीं सकती!
इतना कह के इन्द्रजीतसिंह ने इष्टदेव का ध्यान कर अपनी कलाई उमेठी, और जोर करके हथकड़ी तोड़ डाली। बड़े भाई की देखादेखी आनन्दसिंह ने भी वैसा ही किया। हथकड़ी तोड़ने के बाद दोनों ने अपने पैरों की बेड़ियाँ खोली, और तब जंगले के बाहर निकलने का उद्योग करने लगे। दोनों हाथों से लोहे का छड़ जो जंगले में लगा हुआ था पकड़ के और लात अड़ा के खींचने लगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि दोनों कुमार बड़े बहादुर और ताकतवर। छड़ टेढ़े हो-हो कर छेदों से बाहर निकलने लगे और बात-की-बात में दोनों शेर जंगले वाली कोठरी के बाहर निकल के खड़े हो गये दोनों गले मिले, और इसके बाद हर एक जंगले के छड़ों को निकालकर दोनों भाइयों ने अपने ऐयारों को भी छुड़ाया, और जोश में आकर बोले, "उद्योग से बढ़ के दुनिया में कोई पदार्थ नहीं!"
आनन्दसिंह––ईश्वर चाहेगा तो अब थोड़ी देर में हम लोग इस कैदखाने के बाहर भी निकल जायँगे।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, अब हम लोगों को इसके लिए भी उद्योग करना चाहिए।
भैरोंसिंह––हम लोग जोर करके तहखाने का दरवाजा उखाड़ डालेंगे, और इसी समय कम्बख्त मायारानी के सामने जा खड़े होंगे।
ऐयारों को साथ लिए हुए दोनों भाई सदर दरवाजे के पास गये जो बाहर से बन्द था। यह दरवाजा चार अंगुल मोटे लोहे का बना था और इसकी मजबूत चूल भी जमीन में बहुत गहरी घुसी हुई थी। इसलिए पूरे दो घण्टे तक मेहनत करने पर भी कोई नतीजा न निकला। क्रोध में आकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने लोहे का छड़, जो जंगले में से निकला था उठा लिया, और बाईं तरफ की दीवार जो चूना और ईंटों से बनी हुई थी, तोड़ने लगे। उस समय ऐयारों ने दोनों भाइयों के हाथ से छड़ ले लिया, और दीवार तोड़ना शुरू किया।
पहर भर की मेहनत से दीवार में इतना बड़ा छेद हो गया कि आदमी उसकी राह बखूबी निकल जाय। भैरोंसिंह ने झाँककर देखा, उस तरफ बिल्कुल अँधेरा था और इस बात का ज्ञान जरा-भी नहीं हो सकता था कि दीवार के दूसरी तरफ क्या है। हम ऊपर लिख आए हैं कि इस कैदखाने में छत के सहारे शीशे की एक कन्दील लटकती थी। इस समय ऐयारों ने उसी कन्दील की रोशनी से काम लेना चाहा। तारासिंह ने भैरोंसिंह के कन्धे पर चढ़कर कन्दील उतार ली और उसे हाथ में लिए हए उस सूराख की राह दूसरी तरफ निकल गये। इनके पीछे दोनों कुमार और ऐयार लोग भी गए। अब मालूम हुआ कि यह कोठरी है जो लगभग तीस हाथ के लम्बी और पन्द्रह हाथ से कम चौड़ी है। कुमार तथा ऐयार लोग अगर बिना रोशनी के इस कोठरी में आते तो जरूर दुःख भोगते, क्योंकि यहाँ जमीन बराबर न थी, बीचोंबीच में एक कुआँ था और उसके चारों तरफ जमीन में चार दरवाजे बने हुए थे, जिनके देखने से मालूम होता था कि यहाँ कई तहखाने हैं, और ये दरवाजे नहीं, तहखानों के रास्ते हैं। इस समय उन दरवाजों के पल्ले जो लकड़ी के थे। अच्छी तरह देखने से मालूम हुआ कि नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं, और उस कुएँ में भी लोहे की एक जंजीर लटक रही थी। इसके अतिरिक्त चारों तरफ की दीवारें बराबर थीं, अर्थात् किसी तरफ कोई दरवाजा न था, जिसे खोलकर ये लोग बाहर जाने की इच्छा करते।
इन्द्रजीतसिंह––मालूम होता है कि यहाँ आने या यहाँ से जाने के लिए इन तहखानों के सिवाय कोई राह नहीं है।
आनन्दसिंह––मैं भी यही समझता हूँ।
देवीसिंह––इन तहखानों में उतरे बिना काम न चलेगा।
तारासिंह––आज्ञा हो तो मैं रोशनी लेकर एक तहखाने में उतरूँ और देखूँ कि क्या है।
इन्द्रजीतसिंह––खैर, जाओ, कोई हर्ज नहीं।
आज्ञा पाकर तारासिंह एक तहखाने के मुँह पर गये, मगर जब नीचे उतरने लगे तो कुछ देखकर रुक गये। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने रुकने का सबब पूछा। जिसके जवाब में तारासिंह ने कहा, "इस तहखाने में रोशनी मालूम होती है और धीरे-धीरे वह रोशनी तेज होती जाती है। मालूम होता है कि सुरंग है, और कोई आदमी हाथ में बत्ती लिये इसी तरफ आ रहा है।"
दोनों कुमार और ऐयार लोग भी वहाँ गये और झाँककर देखने लगे। थोड़ी देर में दो कमसिन औरतें नजर पड़ीं, जो सीढ़ी के पास आकर ऊपर चढ़ने का इरादा कर रही थीं। एक के हाथ में मोमबत्ती थी, जिसे देखते ही कुमार ने पहचान लिया कि यह कमलिनी है, साथ में लाड़िली भी थी, मगर उसे वे पहचानते न थे। हाँ, जब कैदी बनकर मायारानी के दरबार में लाए गये थे, तो मायारानी की बगल में बैठे हुए उसे देखा था और समझते थे कि वह भी हम लोगों की दुश्मन है। इस समय कमलिनी के साथ उसे देखकर कुमार को शक मालूम हुआ, क्योंकि इन्द्रजीतसिंह कमलिनी को दोस्त समझते थे और दोस्त के साथ दुश्मन का होना बेशक खटके की बात है।
कमलिनी जब सीढ़ी के पास पहुँची तो ऊपर रोशनी देखकर रुक गई। साथ ही कुमार ने पुकार कर कहा, "डरो मत, ऊपर चली आओ, मैं हूँ इन्द्रजीतसिंह!"
कमलिनी ने कुमार की आवाज पहचान ली और लाड़िली को साथ लिये ऊपर चली आई, मगर दोनों कुमारों और उनके ऐयारों को वहाँ देखकर ताज्जुब करने लगी।
कमलिनी––आप लोग यहाँ कैसे आये?
इन्द्रजीतसिंह––यही बात मैं तुमसे पूछने वाला था!
कमलिनी––मैं तो आपको छुड़ाने के लिए आई हूँ, मगर मालूम होता है कि मेरे आने के पहले ही, किसी ने पहुँचकर आप लोगों को छुड़ा दिया।
देवीसिंह––कोई दूसरा नहीं आया, दोनों कुमारों ने स्वयं अपनी-अपनी हथकड़ी तोड़ डाली, जंगलों के सींखचे खींचकर बाहर निकल आये और हम लोगों को भी कैद। से छुड़ाया, इसके बाद दीवार तोड़ कर हम लोग अभी थोड़ी देर हुई इधर आये हैं!
कमलिनी––(हँसकर) बहादुर हैं, यह न ऐसा करेंगे तो दूसरा कौन करेगा!
इन्द्रजीतसिंह––हम एक बात तुमसे और पूछना चाहते हैं।
कमलिनी––आपका मतलब मैं समझ गई। (लाड़िली की तरफ देखकर) शायद इसके बारे में आप कुछ पूछेंगे!
इन्द्रजीतसिंह––हाँ ठीक है, क्योंकि इन्हें हमने उसके पास बैठा देखा था, जिसके फरेब ने हमारी यह दशा की है, और लोगों की बातों से यह भी मालूम हुआ कि उसका नाम मायारानी है।
कमलिनी––बहुत दिनों तक साथ रहने पर भी आपको मेरा भेद कुछ भी मालूम नहीं हुआ, मगर इस समय मैं इतना कह देना उचित समझती हूँ कि यह मेरी छोटी बहन है और मायारानी बड़ी बहिन है। हम तीनों बहिनें हैं। लेकिन अनबन होने के कारण मैं उससे अलग हो गई और आज इसने भी उसका साथ छोड दिया। आज से पहले वह मेरी ही दुश्मन थी, मगर आज से इसकी भी जिसका नाम लाड़िली है, जान की प्यासी हो गयी, मगर इतना सुनने पर भी मैं समझती हूँ कि आप मुझे अपना दुश्मन न समझते होंगे।
इन्द्रजीतसिंह––नहीं-नहीं, कदापि नहीं। मैं तुम्हें अपना हमदर्द समझता हूँ, तुमने मेरे साथ बहुत-कुछ नेकी की है।
कमलिनी––आप लोगों को छुड़ाने के लिए तेजसिंह भी यहाँ आये थे, मगर गिरफ्तार हो गये!
इन्द्रजीतसिंह––क्या तेजसिंह भी गिरफ्तार हो गये? लेकिन वे उस कैदखाने में नहीं लाये गये जहाँ हम लोग थे।
कमलिनी––वह दूसरी जगह रखे गये थे। मैंने उन्हें भी कैद से छुड़ाया है, अब थोड़ी ही देर में आप उनसे मिलना चाहते हैं। आनन्दसिंह चुपचाप इन दोनों की बातें सुन रहे थे, और छिपी निगाहों से लाड़िली के रूप की अलौकिक छटा का भी आनन्द ले रहे थे। लाड़िली भी प्रेम की निगाहों से उन्हें देख रही थी। इस बात को कमलिनी ने भी जान लिया, मगर वह तरह दे गई। जब आनन्दसिंह ने तेजसिंह का हाल सुना तब चौंके और कमलिनी की तरफ देखकर बोले––
आनन्दसिंह––सुना है कि हमारे माता-पिता भी …
कमलिनी––हाँ, उन दोनों को भी कम्बख्त मायारानी ने फँसा लिया है! हाय, मैंने सुना है कि वे दोनों बेचारे बड़े संकट में हैं और सहज ही में उन दोनों का छूटना मुश्किल है, तथापि उद्योग में बिलम्ब न करना चाहिए। अब आप कोई सवाल न कीजिये और यहाँ से जल्द निकल चलिये।
राजा वीरेन्द्रसिंह और रानी चन्द्रकान्ता का हाल सुनकर सब के सब घबरा गये और आगे कुछ सवाल करने की हिम्मत न पड़ी। कुमार कमलिनी के साथ चलने के लिए तैयार हो गये और सभी को साथ लिए हए कमलिनी फिर उसी तहखाने में उतर गई, जहाँ से आई थी। कुँअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी का और आनन्दसिंह किशोरी का हाल पूछने के लिए बेचैन थे, मगर मौका न समझकर चुप रह गये।
नीचे जाने पर मालूम हुआ कि वह एक सुरंग का रास्ता था, मगर यह सुरंग साधारण न थी। इसकी चौड़ाई केवल इतनी थी कि दो आदमी बराबर मिलकर जा सकते थे। ऊँचाई की यह अवस्था थी कि हर एक मर्द हाथ ऊँचा करके उसकी छत छू सकता था। दोनों तरफ की दीवार स्याह पत्थर की थी, जिस पर तरह-तरह की खूबसूरत, भयानक और कहीं-कहीं आश्चर्यजनक तस्वीरें मुसौवरों की कारीगरी का नमूना दिखा रही थीं, अर्थात् रंगों से बनी थीं। पत्थर गढ़ कर नहीं बनाई गई थीं, परन्तु उन तस्वीरों के रंग की भी यह अवस्था थी कि अभी दो-चार दिन की बनी मालूम होती थीं जिन्हें देख हमारे कुमारों और ऐयारों को बहुत ही ताज्जुब मालूम हो रहा था।
कमलिनी––(इन्द्रजीतसिंह से) आप चाहते होंगे कि इन विचित्र तस्वीरों को अच्छी तरह देखें!
इन्द्रजीतसिंह––बेशक ऐसा ही है, किंतु इस दौडादौड़ में ऐसी उत्तन तस्वीरों के देखने का आनन्द कुछ भी नहीं मिल सकता और यहाँ की एक-एक तस्वीर ध्यान देकर देखने योग्य है, परन्तु क्या किया जाय, जबसे अपने माता-पिता का हाल तुम्हारी जुबानी सुना है, जी बेचैन हो रहा है, यही इच्छा होती है कि जहाँ तक जल्द हो सके, उनके पास पहुँचे और उन्हें कैद से छुड़ावें। तुम स्वयं कह चुकी हो कि वह बड़े संकट में पड़े हैं, परन्तु यह न जाना गया कि उन्हें किस प्रकार का संकट है!
कमलिनी––आपका कहना बहुत ठीक है, इन तस्वीरों को देखने के लिए बहुत समय चाहिए बल्कि इनका हाल और मतलब जानने के लिए कई दिन चाहिए, और यह समय यहाँ अटकने का नहीं है, मगर साथ ही इसके यह भी याद रखिये कि आप दो चार या दस घण्टे के अन्दर ठिकाने पहुँचकर भी अपने माता-पिता को नहीं छुड़ा सकते। मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं कि वह किस कैदखाने में कैद हैं, पहले तो इसी बात का पता
च॰ स॰-2-11
लगाने के लिए कई दिन नहीं तो कई पहर चाहिए।
इन्द्रजीतसिंह––तो क्या तुमने उन्हें अपनी आँखों से नहीं देखा?
JIM – Assistente
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