गो-दान
राय साहब ने कुतूहल से पूछा––मगर इन बूटियों के गुण आपको याद कैसे रहेंगे?
खन्ना ने क़हक़हा मारा––आप भी राय साहब! बड़े मजे की बातें करते हैं। जिस बूटी में जो गुण चाहे बता दीजिए, वह आपकी लियाक़त पर मुनहसर है। सेहत तो रुपए में आठ आने विश्वास से होती है। आप जो इन बड़े-बड़े अफ़सरों को देखते हैं, और इन लम्बो पूँछवाले विद्वानों को, और इन रईसों को, ये सब अंधविश्वासी होते हैं। मैं तो वनस्पति-शास्त्र के प्रोफेसर को जानता हूँ, जो कुकरौंधे का नाम भी नहीं जानते। इन विद्वानों का मज़ाक तो हमारे स्वामीजी खूब उड़ाते हैं। आपको तो कभी उनके दर्शन न हुए होंगे। अबकी आप आयेंगे, तो उनसे मिलाऊँगा। जब से मेरे बगीचे में ठहरे हैं, रात-दिन लोगों का तांता लगा रहता है। माया तो उन्हें छू भी नहीं गयी। केवल एक बार दूध पीते हैं। ऐसा विद्वान महात्मा मैंने आज तक नहीं देखा। न जाने कितने वर्ष हिमालय पर तप करते रहे। पूरे सिद्ध पुरुष हैं। आप उनसे अवश्य दीक्षा लीजिए। मुझे विश्वास है, आपकी यह सारी कठिनाइयाँ छूमन्तर हो जायँगी। आपको देखते ही आपका भूत-भविष्य सब कह सुनायेंगे। ऐसे प्रसन्नमुख हैं कि देखते ही मन खिल उठता है। ताज्जुब तो यह है कि खुद इतने बड़े महात्मा हैं; मगर संन्यास और त्याग मंदिर और मठ, संप्रदाय और पन्थ, इन सबको ढोंग कहते हैं, पाखण्ड कहते हैं, रूढ़ियों के बन्धन को तोड़ो और मनुष्य बनो, देवता बनने का खयाल छोड़ो। देवता बनकर तुम मनुष्य न रहोगे।
राय साहब के मन में शंका हुई। महात्माओं में उन्हें भी वह विश्वास था, जो प्रभुतावालों में आमतौर पर होता है। दुखी प्राण को आत्मचिन्तन में जो शान्ति मिलती है। उसके लिए वह भी लालायित रहते थे। जब आर्थिक कठिनाइयों से निराश हो जाते, मन में आता, संसार से मुँह मोड़कर एकान्त में जा बैठे और मोक्ष की चिन्ता करें। संसार के बन्धनों को वह भी साधारण मनुष्यों की भाँति आत्मोन्नति के मार्ग की बाधाएँ समझते थे और इनसे दूर हो जाना ही उनके जीवन का भी आदर्श था; लेकिन संन्यास और त्याग के बिना बन्धनों को तोड़ने का और क्या उपाय है?
'लेकिन जब वह संन्यास को ढोंग कहते है, तो खुद क्यों संन्यास लिया है?'
'उन्होंने संन्यास कब लिया है साहब, वह तो कहते हैं––आदमी को अन्त तक काम करते रहना चाहिए। विचार-स्वातन्त्र्य उनके उपदेशों का तत्त्व है।'
'मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। विचार-स्वातन्त्र्य का आशय क्या है?'
'समझ में तो मेरे भी कुछ नही आता, अबकी आइए, तो उनमें बातें हों। वह प्रेम को जीवन का सत्य कहते हैं। और इसकी ऐसी मुन्दर व्याख्या करते हैं कि मन मुग्ध हो जाता है।'
'मिस मालती को उनमे मिलाया या नहीं?'
'आप भी दिल्लगी करते हैं। मालती को भला इनसे क्या मिलता….'
वाक्य पूरा न हुआ था कि वह सामने झाड़ी में सरसराहट की आवाज सुनकर चौक पड़े और प्राण-रक्षा की प्रेरणा से राय साहब के पीछे आ गये। झाड़ी में से एक तेंदुआ निकला और मन्द गति से सामने की ओर चला।
राय साहब ने बन्दूक उठायी और निशाना बाँधना चाहते थे कि खन्ना ने कहा––यह क्या करते हैं आप? ख्वाहमख्वाह उसे छेड़ रहे हैं। कही लौट पड़े तो?
'लौट क्या पड़ेगा, वहीं ढेर हो जायगा।'
'तो मुझे उस टीले पर चढ़ जाने दीजिए। मैं शिकार का ऐसा शौकीन नहीं हूं।'
'तब क्या शिकार खेलने चले थे?'
'शामत और क्या।'
राय साहब ने बन्दूक नीचे कर ली।
'बड़ा अच्छा शिकार निकल गया। ऐसे अवसर कम मिलते हैं।'
'मैं तो अब यहाँ नहीं ठहर सकता। खतरनाक जगह है।'
'एकाध शिकार तो मार लेने दीजिए। खाली हाथ लौटते शर्म आती है।'
'आप मुझे कृपा करके कार के पास पहुंचा दीजिए, फिर चाहे तेंदुए का शिकार कीजिए या चीते का।'
'आप बड़े डरपोक हैं मिस्टर खन्ना, सच।'
'व्यर्थ में अपनी जान खतरे में डालना बहादुरी नहीं है।'
'अच्छा तो आप खुशी से लौट सकते हैं।'
'अकेला?'
'रास्ता बिलकुल साफ़ है।'
'जी नहीं। आपको मेरे साथ चलना पड़ेगा।' राय साहब ने बहुत समझाया; मगर खन्ना ने एक न मानी। मारे भय के उनका चेहरा पीला पड़ गया था। उस वक्त अगर झाड़ी में से एक गिलहरी भी निकल आती, तो वह चीख मारकर गिर पड़ते। बोटी-बोटी काँप रही थी। पसीने से तर हो गये थे! राय साहब को लाचार होकर उनके साथ लौटना पड़ा।
जब दोनों आदमी बड़ी दूर निकल आये, तो खन्ना के होश ठिकाने आये।
बोले-खतरे से नहीं डरता; लेकिन खतरे के मुंह में उँगली डालना हिमाक़त है।
'अजी जाओ भी। ज़रा-सा तेंदुआ देख लिया, तो जान निकल गयी।'
'मैं शिकार खेलना उस ज़माने का संस्कार समझता हूँ, जब आदमी पशु था। तब से संस्कृति बहुत आगे बढ़ गयी है।'
'मैं मिस मालती से आपकी कलई खोलूंगा।'
'मैं अहिंसावादी होना लज्जा की बात नहीं समझता।'
'अच्छा, तो यह आपका अहिंसावाद था। शाबाश!'
खन्ना ने गर्व से कहा-जी हाँ, यह मेरा अहिंसावाद था। आप बुद्ध और शंकर के नाम पर गर्व करते हैं और पशुओं की हत्या करते हैं, लज्जा आपको आनी चाहिए, न कि मुझे।
कुछ दूर दोनों फिर चुपचाप चलते रहे। तब खन्ना बोले––तो आप कब तक आयेंगे? मैं चाहता हूँ, आप पालिसी का फ़ार्म आज ही भर दें और शक्कर के हिस्सों का भी। मेरे पास दोनों फ़ार्म भी मौजूद हैं।
राय साहब ने चिन्तित स्वर में कहा––ज़रा सोच लेने दीजिए।
'इसमें सोचने की ज़रूरत नहीं।'
× × ×
तीसरी टोली मिर्ज़ा खुर्शेद और मिस्टर तंखा की थी। मिर्ज़ा खुर्शेद के लिए भूत और भविष्य सादे काग़ज की भाँति था। वह वर्तमान में रहते थे। न भूत का पछतावा था, न भविष्य की चिंता। जो कुछ सामने आ जाता था, उसमें जी-जान से लग जाते थे। मित्रों की मंडली में वह विनोद के पुतले थे। कौसिल में उनसे ज्यादा उत्साही मेम्बर कोई न था। जिस प्रश्न के पीछे पड़ जाते, मिनिस्टरों को रुला देते। किसी के साथ रू-रियायत करना न जानते थे। बीच-बीच में परिहास भी करते जाते थे। उनके लिए आज जीवन था, कल का पता नहीं। गुस्सेवर भी ऐसे थे कि ताल ठोंककर सामने आ जाते थे। नम्रता के सामने दंडवत करते थे; लेकिन जहाँ किसी ने शान दिखायी और यह हाथ धोकर उसके पीछे पड़े। न अपना लेना याद रखते थे, न दूसरों का देना। शौक़ था शायरी का और शराब का। औरत केवल मनोरंजन की वस्तु थी। बहुत दिन हुए हृदय का दिवाला निकाल चुके थे।
मिस्टर तंखा दाँव-पेंच के आदमी थे, सौदा पटाने में, मुआमला सुलझाने में, अड़ंगा लगाने में, बालू से तेल निकालने में, गला दबाने में, दुम झाड़कर निकल जाने में बड़े सिद्धहस्त। कहिये रेत में नाव चला दें, पत्थर पर दूब उगा दें। ताल्लुकेदारों को महाजनों से कर्ज दिलाना, नयी कम्पनियाँ खोलना, चुनाव के अवसर पर उम्मेदवार खड़े करना, यही उनका व्यवसाय था। खासकर चुनाव के समय उनकी तक़दीर चमकती थी। किसी पोढ़े उम्मेदवार को खड़ा करते, दिलोजान से उसका काम करते और दस-बीस हज़ार बना लेते। जब काँग्रेस का ज़ोर था तो काँग्रेस के उम्मेदवारों के सहायक थे। जब साम्प्रदायिक दल का ज़ोर हुआ, तो हिन्दूसभा की ओर से काम करने लगे; मगर इस उलट-फेर के समर्थन के लिए उनके पास ऐसी दलीलें थीं कि कोई उँगली न दिखा सकता था। शहर के सभी रईस, सभी हुक्काम, सभी अमीरों से उनका याराना था। दिल में चाहे लोग उनकी नीति पसन्द न करें; पर वह स्वभाव के इतने नम्र थे कि कोई मुंह पर कुछ न कह सकता था।
मिर्ज़ा खुर्शेद ने रूमाल से माथे का पसीना पोंछकर कहा––आज तो शिकार खेलने के लायक दिन नहीं है। आज तो कोई मुशायरा होना चाहिए था।
वकील ने समर्थन किया––जी हाँ, वहीं बाग़ में बड़ी बहार रहेगी।
थोड़ी देर के बाद मिस्टर तंखा ने मामले की बात छेड़ी।
'अबकी चुनाव में बड़े-बड़े गुल खिलेंगे। आपके लिए भी मुश्किल है।'
मिर्ज़ा विरक्त मन से बोले––अबकी मैं खड़ा ही न हूँगा।
तंखा ने पूछा––क्यों ?
'मुफ्त की बकबक कौन करे। फ़ायदा ही क्या! मुझे अब इस डेमॉक्रेसी में भक्ति नहीं रही। ज़रा-सा काम और महीनों की बहस। हाँ, जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए अच्छा स्वाँग है। इससे तो कहीं अच्छा है कि एक गवर्नर रहे, चाहे वह हिन्दुस्तानी हो, या अँग्रेज़, इसमे बहस नहीं। एक इंजिन जिस गाड़ी को बड़े मजे से हज़ारों मील खींच ले जा सकता है, उसे दम हज़ार आदमी मिलकर भी उतनी तेज़ी से नहीं खींच सकते। मैं तो यह सारा तमाशा देखकर कौंसिल से बेज़ार हो गया हूँ। मेरा बस चले, तो कौंसिल में आग लगा दूँ। जिसे हम डेमॉक्रेसी कहते हैं, वह व्यवहार में बड़े-बड़े व्यापारियों और ज़मींदारों का राज्य है, और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाज़ी ले जाता है, जिसके पास रुपए हैं। रुपए के ज़ोर से उसके लिए सभी सुविधाएँ तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े पण्डित, बड़े-बड़े मौलवी, बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले, जो अपनी ज़बान और क़लम से पबलिक को जिस तरफ़ चाहें फेर दें, सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं। मैंने तो इरादा कर लिया है, अब एलेक्शन के पास न जाऊँगा! मेरा प्रोपेगंडा अब डमॉक्रेसी के खिलाफ़ होगा।'
मिर्ज़ा साहब ने कुरान की आयतों से सिद्ध किया कि पुराने जमाने के बादशाहों के आदर्श कितने ऊँचे थे। आज तो हम उसकी तरफ़ ताक भी नहीं सकते। हमारी आँखों में चकाचौंध आ जायगी। बादशाह को खज़ाने की एक कौड़ी भी निजी खर्च में लाने का अधिकार न था। वह किताबें नक़ल करके, कपड़े सीकर, लड़कों को पढ़ाकर अपना गुज़र करता था। मिर्ज़ा ने आदर्श महीपों की एक लम्बी सूची गिना दी। कहाँ तो वह प्रजा को पालनेवाला वादशाह,और कहाँ आजकल के मन्त्री और मिनिस्टर,पाँच,छ,सात,आठ हजार माहवार मिलना चाहिए। यह लूट है या डेमॉक्रेसी!
हिरनों का एक झुण्ड चरता हुआ नज़र आया। मिर्जा़ के मुख पर शिकार का जोश चमक उठा। बन्दूक सँभाली और निशाना मारा। एक काला-सा हिरन गिर पड़ा। वह मारा! इस उन्मत्त ध्वनि के साथ मिर्जा भी वेतहागा दौड़े। बिलकुल बच्चों की तरह उछलते,कूदते,तालियाँ बजाते।
समीप ही एक वृक्ष पर एक आदमी लकड़ियाँ काट रहा था। वह भी चट-पट वक्ष से उतरकर मिर्जा़जी के साथ दौड़ा। हिरन की गर्दन में गोली लगी थी,उसके पैरों में कम्पन हो रहा था और आँखें पथरा गयी थीं।
लकड़हारे ने हिरन को करुण नेत्रों से देखकर कहा–अच्छा पट्ठा था,मन-भर से कम न होगा। हुकुम हो,तो मैं उठाकर पहुँचा दूंँ?
मिर्जा़ कुछ बोले नहीं। हिरन की टॅगी हुई,दीन वेदना से भरी आँखें देख रहे थे। अभी एक मिनट पहले इसमें जीवन था। ज़रा-सा पत्ता भी खड़कता,तो कान खड़े करके चौकड़ियाँ भरता हुआ निकल भागता। अपने मित्रों और बाल-बच्चों के साथ ईश्वर की उगाई हुई घास खा रहा था;मगर अब निस्पन्द पड़ा है। उसकी खाल उधेड़ लो,उसकी बोटियाँ कर डालो,उसका क़ीमा बना डालो,उसे खबर न होगी। उसके क्रीड़ामय जीवन में जो आकर्षण था,जो आनन्द था,वह क्या इस निर्जीव शव में है? कितनी सुन्दर गठन थी,कितनी प्यारी आँखें,कितनी मनोहर छवि? उसकी छलाँगें हृदय में आनन्द की तरंगें पैदा कर देती थीं,उसकी चौकड़ियों के साथ हमारा मन भी चौकड़ियाँ भरने लगता था। उसकी स्फूर्ति जीवन-सा बिखेरती चलती थी,जैसे फूल सुगन्ध बिखेरता है;लेकिन अब! उसे देखकर ग्लानि होती है।
लकड़हारे ने पूछा–कहाँ पहुँचाना होगा मालिक? मुझे भी दो-चार पैसे दे देना। मिर्जा़जी जैसे ध्यान से चौंक पड़े। बोले-अच्छा उठा ले। कहाँ चलेगा?
'जहाँ हुकुम हो मालिक।'
'नहीं,जहाँ तेरी इच्छा हो,वहाँ ले जा। मैं तुझे देता हूँ।'
लकड़हारे ने मिर्जा़ की ओर कुतूहल से देखा। कानों पर विश्वास न आया।'अरे नहीं मालिक,हुजूर ने सिकार किया है,तो हम कैसे खा लें।'
'नहीं-नहीं मैं खुशी से कहता हूँ, तुम इसे ले जाओ। तुम्हारा घर यहाँ से कितनी दूर है?'
'कोई आधा कोस होगा मालिक!'
'तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा। देखूँगा,तुम्हारे वाल-वच्चे कैसे खुश होते हैं।'
‘ऐसे तो मैं न ले जाऊँगा सरकार!आप इतनी दूर से आये,इस कड़ी धूप में सिकार किया,मैं कैसे उठा ले जाऊँ?'
'उठा उठा,देर न कर। मुझे मालूम हो गया तु भला आदमी है।'
लकड़हारे ने डरते-डरते और रह-रह कर मिर्जा़जी के मुख की ओर सशंक नेत्रों से देखते हुए कि कहीं विगड़ न जायँ, हिरन को उठाया। सहसा उसने हिरन को छोड़ दिया और खड़ा होकर बोला — मैं समझ गया मालि़क, हजूर ने इसकी हलाली नहीं की।
मिर्ज़ाजी ने हॅसकर कहा — बस-बस, तूने खूब समझा। अब उठा ले और घर चल।
मिर्जा़जी धर्म के इतने पावन्द न थे। दस साल से उन्होंने नमाज़ न पढ़ी थी। दो महीने में एक दिन व्रत रख लेते थे। विलकुल निराहार, निर्जल; मगर लकड़हारे को इस खयाल से जो सन्तोष हुआ था कि हिरन अब इन लोगों के लिए अखाद्य हो गया है, उसे फीका न करना चाहते थे।
लकड़हारे ने हलके मन से हिरन को गरदन पर रख लिया और घर की ओर चला। तंखा अभी तक-तटस्थ से वहीं पेड़ के नीचे खड़े थे। धूप में हिरन के पास जाने का कष्ट क्यों उठाते। कुछ समझ में न आ रहा था कि मुआमला क्या है; लेकिन जब लकड़हारे को उल्टी दिशा में जाते देखा, तो आकर मिर्जा से बोले — आप उधर कहाँ जा रहे हैं हज़रत!क्या रास्ता भल गये?
मिर्जा़ ने अपराधी भाव से मुस्कराकर कहा — मैंने शिकार इस ग़रीब आदमी को दे दिया। अब ज़रा इसके घर चल रहा हूँ। आप भी आइए न।
तंखा ने मिर्जा़ को कुतूहल की दृष्टि से देखा और बोले — आप अपने होश में हैं या नहीं।
'कह नहीं सकता। मुझे खुद नहीं मालूम।'
'शिकार इसे क्यों दे दिया?'
'इसीलिए कि उसे पाकर इसे जितनी खुशी होगी, मुझे या आपको न होगी।'
तंखा खिसियाकर बोले — जाइए! सोचा था, खूब कबाब उड़ायेंगे, सो आपने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया। खैर, राय साहब और मेहता कुछ न कुछ लायेंगे ही। कोई ग़म नहीं। मैं इस एलेक्शन के बारे में कुछ अर्ज करना चाहता हूॅ। आप नहीं खड़ा होना चाहते न सही, आपकी जैसी मर्जी़, लेकिन आपको इसमें क्या ताम्मुल है कि जो लोग खड़े हो रहे हैं, उनसे इसकी अच्छी क़ीमत वसूल की जाय। मैं आपसे सिर्फ इतना चाहता हूॅ कि आप किसी पर यह भेद न खुलने दें कि आप नहीं खड़े हो रहे हैं। सिर्फ इतनी मेहरबानी कीजिए मेरे साथ। ख्वाजा जमाल ताहिर इसी शहर से खड़े हो रहे हैं। रईसों के वोट सोलहों आने उनकी तरफ़ है ही, हुक्काम भी उनके मददगार हैं। फिर भी पबलिक पर आपका जो असर है, इससे उनकी कोर दब रही है। आप चाहें तो आपको उनसे दस-बीस हज़ार रुपए महज़ यह ज़ाहिर कर देने के मिल सकते हैं कि आप उनकी खातिर बैठ जाते हैं….नहीं मुझे अर्ज़ कर लेने दीजिए। इस मुआमले में आपको कुछ नहीं करना है। आप बेफ़िक बैठे रहिए। मैं आपकी तरफ़ से एक मेनिफेस्टो निकाल दूंँगा। और उसी शाम को आप मुझसे दस हज़ार नक़द वसूल कर लीजिए। मिर्जा़ साहब ने उनकी ओर हिकारत से देखकर कहा — मैं ऐसे रुपए पर और आप पर लानत भेजता हूँ।
मिस्टर तंखा ने ज़रा भी बुरा नहीं माना। माथे पर बल तक न आने दिया।
'मुझ पर आप जितनी लानत चाहें भेजें;मगर रुपए पर लानत भेजकर आप अपना ही नुक़सान कर रहे हैं।'
'मैं ऐसी रक़म को हराम समझता हूँ।'
'आप शरीयत के इतने पाबन्द तो नहीं हैं।'
'लूट की कमाई को हराम समझने के लिए शरा का पावन्द होने की ज़रूरत नहीं है।'
'तो इस मुआमले में क्या आप अपना फैसला तब्दील नहीं कर सकते?'
'जी नही।'
'अच्छी बात है, इसे जाने दीजिए। किसी बीमा कम्पनी के डाइरेक्टर बनने में तो आपको कोई एतराज़ नहीं है? आपको कम्पनी का एक हिस्सा भी न खरीदना पड़ेगा। आप सिर्फ़ अपना नाम दे दीजिएगा।'
'जी नहीं, मुझे यह भी मंजूर नहीं है। मैं कई कम्पनियों का डाइरेक्टर,कई का मैनेजिंग एजेण्ट, कई का चेयरमैन था। दौलत मेरे पाँव चुमती थी। मैं जानता हूँ, दौलत से आराम और तकल्लुफ़ के कितने सामान जमा किये जा सकते हैं; मगर यह भी जानता हूँ कि दौलत इंसान को कितना खुद-ग़रज़ बना देती है,कितना ऐश-पसन्द,कितना मक्कार,कितना वेगैरत।'
वकील साहब को फिर कोई प्रस्ताव करने का साहस न हुआ। मिर्जा़जी की बुद्धि और प्रभाव में उनका जो विश्वास था, वह बहुत कम हो गया। उनके लिए धन ही सब कुछ था और ऐसे आदमी से, जो लक्ष्मी को ठोकर मारता हो, उनका कोई मेल न हो सकता था।
लकड़हारा हिरन को कंधे पर रखे लपका चला जा रहा था। मिर्जा़ ने भी क़दम बढ़ाया; पर स्थूलकाय तखा पीछे रह गये।
उन्होंने पुकारा — ज़रा सुनिए, मिर्जा़जी, आप तो भागे जा रहे हैं।
मिर्जा़जी ने बिना रुके हुए जवाब दिया — वह ग़रीब बोझ लिये इतनी तेजी़ से चला जा रहा है। हम क्या अपना बदन लेकर भी उसके बराबर नहीं चल सकते?
लकड़हारे ने हिरन को एक ठूँठ पर उतारकर रख दिया था और दम लेने लगा था।
मिर्जा साहब ने आकर पूछा — थक गये, क्यों?
लकड़हारे ने सकुचाते हुए कहा — बहुत भारी है सरकार !
'तो लाओ, कुछ दूर मैं ले चलूंँ।'
लकड़हारा हॅसा। मिर्जा़ डील-डौल में उससे कहीं ऊँचे और मोटे-ताजे़ थे, फिर भी वह दुबला-पतला आदमी उनकी इस बात पर हॅसा। मिर्जा़जी पर जैसे चाबुक पड़ गया।
'तुम हँसे क्यों? क्या तुम समझते हो, मैं इसे नहीं उठा सकता?'
लकड़हारे ने मानो क्षमा माँगी––सरकार आप लोग बड़े आदमी हैं। बोझ उठाना तो हम-जैसे मजूरों ही का काम है।
'मैं तुम्हारा दुगुना जो हूँ।'
'इससे क्या होता है मालिक!'
मिर्जा़जी का पुरुषत्व अपना और अपमान न सह सका। उन्होंने बढ़कर हिरन को गर्दन पर उठा लिया और चले; मगर मुश्किल से पचास क़दम चले होंगे कि गर्दन फटने लगी; पाँव थरथराने लगे और आँखों में तितिलियाँ उड़ने लगीं। कलेजा मज़बूत किया और एक बीस कदम और चले। कम्बख्त कहाँ रह गया? जैसे इस लाश में सीसा भर दिया गया हो। ज़रा मिस्टर तंखा की गर्दन पर रख दूँ, तो मज़ा आये। मशक की तरह जो फ्ले चलते हैं, ज़रा उसका मज़ा भी देखें; लेकिन बोझा उतारें कैसे? दोनों अपने दिल में कहेंगे, बड़ी जवाँमर्दी दिखाने चले थे। पचास क़दम में चीं बोल गये।
लकड़हारे ने चुटकी ली––कहो मालिक, कैसे रंग-ढंग हैं। बहुत हलका है न?
मिर्जा़जी को बोझ कुछ हलका मालूम होने लगा। बोले––उतनी दूर तो ले ही जाऊँगा, जितनी दूर तुम लाये हो।
'कई दिन गर्दन दुखेगी मालिक!'
'तुम क्या समझते हो, मैं यों ही फूला हुआ हूँ!'
'नहीं मालिक, अब तो ऐसा नहीं समझता। मुदा आप हैरान न हों; वह चट्टान है, उस पर उतार दीजिए।'
'मैं अभी इसे इतनी ही दूर और ले जा सकता हूँ।'
'मगर यह अच्छा तो नहीं लगता कि मैं ठाला चलूँ और आप लदे रहें।'
मिर्ज़ा साहब ने चट्टान पर हिरन को उतारकर रख दिया। वकील साहब भी आ पहुंँचे।
मिर्ज़ा ने दाना फेंका––अब आप को भी कुछ दूर ले चलना पड़ेगा जनाब!
वकील साहब की नज़रों में अब मिर्जा़जी का कोई महत्व न था। बोले––मुआफ़ कीजिए। मुझे अपनी पहलवानी का दावा नहीं है।
'बहुत भारी नहीं है, सच।'
'अजी रहने भी दीजिए।'
'आप अगर इसे सौ क़दम ले चलें, तो मैं वादा करता हूँ आप मेरे सामने जो तजवीज़ रखेंगे, उसे मंजूर कर लूंँगा।'
'मैं इन चकमों में नहीं आता।'
'मैं चकमा नहीं दे रहा हूँ, वल्लाह। आप जिस हलके से कहेंगे खड़ा हो जाऊँगा। जब हुक्म देंगे, बैठ जाऊँगा। जिस कम्पनी का डाइरेक्टर, मेम्बर, मुनीम, कनवेसर, जो कुछ कहिएगा, बन जाऊँगा। बस सौ क़दम ले चलिए। मेरी तो ऐसे ही दोस्तों से निभती है, जो मौक़ा पड़ने पर सब कुछ कर सकते हों।'
तंखा का मन चुलबुला उठा। मिर्ज़ा अपने क़ौल के पक्के हैं, इसमें कोई सन्देह न था। हिरन ऐसा क्या बहुत भारी होगा। आखिर मिर्ज़ा इतनी दूर ले ही आये। बहुत ज्यादा थके तो नहीं जान पड़ते; अगर इनकार करते हैं तो सुनहरा अवसर हाथ से जाता है। आखिर ऐसा क्या कोई पहाड़ है। बहुत होगा, चार-पाँच पॅसेरी होगा। दो-चार दिन गर्दन ही तो दुखेगी! जेब में रुपए हों, तो थोड़ी-सी बीमारी सुख की वस्तु है।
'सौ क़दम की रही।'
'हाँ, सौ क़दम। मैं गिनता चलूँगा।'
'देखिए, निकल न जाइएगा।'
'निकल जानेवाले पर लानत भेजता हूँ।'
तंखा ने जूते का फीता फिर से बाँधा, कोट उतारकर लकड़हारे को दिया, पतलून ऊपर चढ़ाया, रूमाल से मुंह पोंछा और इस तरह हिरन को देखा, मानो ओखली में सिर देने जा रहे हों। फिर हिरन को उठाकर गर्दन पर रखने की चेष्ठा की। दो-तीन बार ज़ोर लगाने पर लाश गर्दन पर तो आ गयी; पर गर्दन न उठ सकी। कमर झुक गयी, हाँफ उठे और लाश को ज़मीन पर पटकनेवाले थे कि मिर्ज़ा ने उन्हें सहारा देकर आगे बढ़ाया।
तंखा ने एक डग इस तरह उठाया जैसे दलदल में पाँव रख रहे हों। मिर्ज़ा ने बढ़ावा दया––शाबाश! मेरे शेर, वाह-वाह!
तंखा ने एक डग और रखा। मालूम हुआ,गर्दन टूटी जाती है।
'मार लिया मैदान! नजीते रहो पठ्ठे!'
तंखा दो डग और बढ़े। आँखें निकली पड़ती थीं।
'बस,एक बार और जोर मारो दोस्त। सौ क़दम की शर्त ग़लत। पचास क़दम की ही रही।'
वकील साहब का बुरा हाल था। वह बेजान हिरन शेर की तरह उनको दबोचे हुए,उनका हृदय-रक्त चूस रहा था। सारी शक्तियाँ जवाब दे चुकी थीं। केवल लोभ,किसी लोहे की धरन की तरह छत को सँभाले हुए था। एक से पच्चीस हजार तक की गोटी थी। मगर अन्त में वह शहतीर भी जवाब दे गयी। लोभी की कमर भी टूट गयी। आँखों के सामने अँधेरा छा गया। सिर में चक्कर आया और वह शिकार गर्दन पर लिये पथरीली ज़मीन पर गिर पड़े।
मिर्ज़ा ने तुरन्त उन्हें उठाया और अपने रूमाल से हवा करते हुए उनकी पीठ ठोंकी।
'ज़ोर तो यार तुमने खूब मारा; लेकिन तक़दीर के खोटे हो।'
तंखा ने हांफते हुए लम्बी साँस खींचकर कहा––आपने तो आज मेरी जान ही ले ली थी। दो मन से कम न होगा ससुर।
मिर्ज़ा ने हँसते हुए कहा––लेकिन भाईजान मैं भी तो इतनी दूर उठाकर लाया ही था।
वकील साहब ने खुशामद करनी शुरू की––मुझे तो आपकी फ़रमाइश पूरी करनी थी। आपको तमाशा देखना था, वह आपने देख लिया। अब आपको अपना वादा पूरा करना होगा।
'आपने मुआहदा कब पूरा किया।
‘कोशिश तो जान तोड़कर की।'
'इसकी सनद नही।'
लकड़हारे ने फिर हिरन उठा लिया था और भागा चला जा रहा था। वह दिखा देना चाहता था कि तुम लोगों ने काँख-कूँखकर दस क़दम इसे उठा लिया, तो यह न समझो कि पास हो गये। इस मैदान में मैं दुर्बल होने पर भी तुमसे आगे रहूँगा। हाँ, कागद तुम चाहे जितना काला करो और झूठे मुकदमे चाहे जितने बनाओ।
एक नाला मिला, जिसमें बहुत थोड़ा पानी था। नाले के उस पार टीले पर एक छोटा-सा पाँच-छ: घरों का पुरवा था और कई लड़के इमली के पेड़ के नीचे खेल रहे थे। लकड़हारे को देखते ही सबों ने दौड़कर उसका स्वागत किया और लगे पूछने––किसने मारा बापू? कैसे मारा, कहाँ मारा, कैसे गोली लगी, कहाँ लगी, इसी को क्यों लगी, और हिरनों को क्यों न लगी? लकड़हारा हूँ-हाँ करता इमली के नीचे पहुंचा और हिरन को उतार कर पास की झोपड़ी से दोनों महानुभावों के लिए खाट लेने दौड़ा। उसके चारों लड़कों और लड़कियों ने शिकार को अपने चार्ज में ले लिया और अन्य लड़कों को भगाने की चेष्ठा करने लगे।
सबसे छोटे बालक ने कहा––यह हमारा है।।
उसकी बड़ी बहन ने, जो चौदह-पन्द्रह साल की थी, मेहमानों की ओर देखकर छोटे भाई को डाँटा––चुप,नहीं मिपाई पकड़ ले जायगा।
मि़र्जा़ ने लड़के को छेड़ा––तुम्हारा नहीं हमारा है।
बालक ने हिरन पर बैठकर अपना क़ब्ज़ा सिद्ध कर दिया और बोला––बापू तो लाये हैं।
बहन ने सिखाया––कह दे भैया,तुम्हारा है।
इन बच्चों की माँ बकरी के लिए पत्तियाँ तोड़ रही थी। दो नये भले आदमियों को देखकर उसने ज़रा-सा घूँघट निकाल लिया और शर्मायी कि उसकी साड़ी कितनी मैली, कितनी फटी, कितनी उटंगी है। वह इस वेष में मेहमानों के सामने कैसे जाय? और गये बिना काम नहीं चलता। पानी-वानी देना है।
अभी दोपहर होने में कुछ कसर थी; लेकिन मिर्ज़ा साहब ने दोपहरी इसी गाँव में काटने का निश्चय किया। गाँव के आदमियों को जमा किया। शराब मँगवायी, शिकार पका, समीप के बाजार से घी और मैदा मँगाया और सारे गाँव को भोज दिया। छोटे-बड़े स्त्री-पुरुष सबों ने दावत उड़ायी। मर्दों ने खूब शराब पी और मस्त होकर शाम तक गाते रहे। और मिर्ज़ाजी बालकों के साथ बालक, शराबियों के साथ शराबी, बूढों के साथ बूढ़े, जवानों के साथ जवान बने हुए थे। इतनी देर में सारे गाँव से उनका इतना घनिष्ठ परिचय हो गया था, मानो यहीं के निवासी हों। लड़के तो उनपर लदे पड़ते थे। कोई उनकी फुँदनेदार टोपी सिर पर रखे लेता था, कोई उनकी राइफल कन्धे पर रखकर अकड़ता हुआ चलता था, कोई उनकी कलाई की घड़ी खोलकर अपनी कलाई पर बाँध लेता था। मिर्ज़ा ने खुद खूब देशी शराब पी और झूम-झूमकर जंगली आदमियों के साथ गाते रहे।
जब ये लोग सूर्यास्त के समय यहाँ से विदा हुए तो गाँव-भर के नर-नारी इन्हें बड़ी दूर तक पहुँचाने आये। कई तो रोते थे। ऐसा सौभाग्य उन गरीबों के जीवन में शायद पहली ही बार आया हो कि किसी शिकारी ने उनकी दावत की हो। ज़रूर यह कोई राजा है, नहीं तो इतना दरियाव दिल किसका होता है। इनके दर्शन फिर काहे को होंगे!
कुछ दूर चलने के बाद मिर्जा़ ने पीछे फिरकर देखा और बोले–बेचारे कितने खुश थे। काश मेरी जिन्दगी में ऐसे मौके रोज आते। आज का दिन बड़ा मुबारक था।
तंखा ने वेरुखी के साथ कहा––आपके लिए मुबारक होगा, मेरे लिए तो मनहस ही था। मतलब की कोई बात न हुई। दिन-भर जंगलों और पहाड़ों की खाक छानने के बाद अपना-सा मुँह लिये लौट जाते है।
मिर्ज़ा ने निर्दयता से कहा––मुझे आपके साथ हमदर्दी नही है।
दोनों आदमी जब बरगद के नीचे पहुँचे, तो दोनों टोलियाँ लौट चुकी थीं। मेहता मुँह लटकाये हुए थे। मालती विमन-सी अलग बैठी थी,जो नयी बात थी। राय साहब और खन्ना दोनों भूखे रह गये थे और किसी के मुंह से बात न निकलती थी। वकील साहब इसलिए दुखी थे कि मिर्जा़ ने उनके साथ बेवफ़ाई की। अकेले मिर्ज़ा साहब प्रसन्न थे और वह प्रसन्नता अलौकिक थी।
८
जब से होरी के घर में गाय आ गयी है, घर की श्री ही कुछ और हो गयी है। धनिया का घमण्ड तो उसके संभाल से बाहर हो-हो जाता है। जब देखो गाय की चर्चा।
भूसा छिज गया था। ऊख में थोड़ी-सी चरी वो दी गयी थी। उसी की कुट्टी काटकर जानवरों को खिलाना पड़ता था। आंखें आकाश की ओर लगी रहती थीं कि कब पानी बरसे और घास निकले। आधा आसाढ़ बीत गया और वर्षा न हुई।
सहसा एक दिन बादल उठे और आसाढ़ का पहला दौगड़ा गिरा। किसान खरीफ़ बोने के लिए हल ले-लेकर निकले कि राय साहब के कारकुन ने कहला भेजा, जब तक बाकी न चुक जायगी किसी को खेत में हल न ले जाने दिया जायगा। किसानों पर जैसे वज्रपात हो गया। और कभी तो इतनी कड़ाई न होती थी, अबकी यह कैसा हुक्म। कोई गाँव छोड़कर भागा थोड़ा ही जाता है। अगर खेती में हल न चले, तो रुपए कहाँ से आ जायेंगे। निकालेंगे तो खेत ही से। सब मिलकर कारकुन के पास जाकर रोये। कारकुन का नाम था पण्डित नोखेराम। आदमी बुरे न थे; मगर मालिक का हुक्म था। उसे कैसे टालें। अभी उस दिन राय साहब ने होरी से कैसी दया और धर्म की बातें की थीं और आज आसामियों पर यह जुल्म। होरी मालिक के पास जाने को तैयार हुआ; लेकिन फिर सोचा, उन्होंने कारकुन को एक बार जो हुक्म दे दिया, उसे क्यों टालने लगे। वह अगुवा बनकर क्यों बुरा बने। जब और कोई कुछ नहीं बोलता, तो वही आग में क्यों कूदे। जो सब के सिर पड़ेगी, वह भी झेल लेगा।
किसानों में खलबली मची हुई थी। सभी गाँव के महाजनों के पास रुपए के लिए दौड़े। गाँव में मँगरू साह की आजकल चढ़ी हुई थी। इस साल सन में उसे अच्छा फ़ायदा हुआ था। गेहूँ और अलसी में भी उसने कुछ कम नहीं कमाया था। पण्डित दातादीन और दुलारी सहुआइन भी लेन-देन करती थीं। सबसे बड़े महाजन थे झिंगुरीसिंह। वह शहर के एक बड़े महाजन के एजेण्ट थे। उनके नीचे कई आदमी और थे, जो आस-पास के देहातों में घूम-घूमकर लेन-देन करते थे। इनके उपरान्त और भी कई छोटे-मोटे महाजन थे, जो दो आने रुपये ब्याज पर बिना लिखा-पढ़ी के रुपए देते थे। गाँववालों को लेन-देन का कुछ ऐसा शौक़ था कि जिसके पास दस-बीस रुपए जमा हो जाते, वही महाजन बन बैठता था। एक समय होरी ने भी महाजनी की थी। उसी का यह प्रभाव था कि लोग अभी तक यही समझते थे कि होरी के पास दबे हुए रुपए हैं। आखिर वह धन गया कहाँ। बॅटवारे में निकला नहीं, होरी ने कोई तीर्थ, व्रत, भोज किया नहीं; गया तो कहाँ गया। जूते जाने पर भी उसके घट्टे बने रहते हैं।
किसी ने किसी देवता को सीधा किया, किसी ने किसी को। किसी ने आना रुपया ब्याज देना स्वीकार किया, किसी ने दो आना। होरी में आत्म-सम्मान का सर्वथा लोप न हुआ था। जिन लोगों के रुपए उस पर बाकी थे, उनके पास कौन मुंह लेकर जाय। झिंगुरीसिंह के सिवा उसे और कोई न सूझा, वह पक्का काग़ज़ लिखाते थे, नज़राना अलग लेते थे, दस्तूरी अलग, स्टाम्प की लिखाई अलग। उस पर एक साल का ब्याज पेशगी काटकर रुपया देते थे। पचीस रुपए का काग़ज़ लिखा, तो मुश्किल से सत्रह रुपए हाथ लगते थे; मगर इस गाढ़े समय में और क्या किया जाय? राय साहब की ज़बरदस्ती है, नहीं इस समय किसी के सामने क्यों हाथ फैलाना पड़ता।
झिंगुरीसिंह बैठे दतून कर रहे थे। नाटे, मोटे, खल्वाट, काले, लम्बी नाक और बड़ी-बड़ी मूछोंवाले आदमी थे, बिलकुल विदूषक-जैसे। और थे भी बड़े हँसोड़। इस गाँव को अपनी सरासुल बनाकर मर्दों से साले या ससुर और औरतों से साली या सलहज का नाता जोड़ लिया था। रास्ते में लड़के उन्हें चिढ़ाते––पण्डितजी पाल्लगी! और झिंगुरीसिंह उन्हें चटपट आशीर्वाद देते––तुम्हारी आँखें फूटे, घुटना टुटे, मिर्गी आये, घर में आग लग जाय आदि। लड़के इस आशीर्वाद से कभी न अघाते थे; मगर लेन-देन में बड़े कठोर थे। सूद की एक पाई न छोड़ते थे और वादे पर बिना रुपए लिये द्वार से न टलने थे।
होरी ने सलाम करके अपनी विपत्ति-कथा सुनायी।
झिंगुरीसिंह ने मुस्कराकर कहा––वह सब पुराना रुपया क्या कर डाला? और बिना उसे खिलाये कौर मुंह में न डालती थी। गाय कितने प्यार से उसका हाथ चाटती थी, कितनी स्नेहभरी आँखों से उसे देखती थी। उसका बछड़ा कितना सुन्दर होगा। अभी से उसका नाम-करण हो गया था––मटरू। वह उसे अपने साथ लेकर सोयेगी। इस गाय के पीछे दोनों बहनों में कई बार लड़ाइयाँ हो चुकी थीं। सोना कहती, मुझे ज्यादा चाहती है, रूपा कहती, मुझे। इसका निर्णय अभी तक न हो सका था। और दोनों दावे क़ायम थे।
मगर होरी ने आगा-पीछा सुझाकर आखिर धनिया को किसी तरह राजी़ कर लिया। एक मित्र से गाय उधार लेकर बेच देना भी बहुत ही वैसी बात है; लेकिन विपत में तो आदमी का धरम तक चला जाता है, यह कौन-सी बड़ी बात है। ऐसा न हो, तो लोग विपत से इतना डरे क्यों। गोबर ने भी विशेष आपत्ति न की। वह आजकल दूसरी ही धुन में मस्त था। यह तै किया गया कि जब दोनों लड़कियाँ रात को सो जाये, तो गाय झिंगुरीमिह के पास पहुँचा दी जाय।
दिन किसी तरह कट गया। साँझ हुई। दोनों लड़कियाँ आठ बजते-बजते खा-पीकर सो गयी। गोबर इस करण दृश्य से भागकर कहीं चला गया था। वह गाय को जाने कैसे देख सकेगा? अपने आंसुओं को कैसे रोक सकेगा? होरी भी ऊपर ही में कठोर बना हुआ था। मन उसका चंचल था। ऐसा कोई माई का लाल नही, जो इस वक्त उसे पचीस रुपए उधार दे-दे, चाहे फिर पचास रूपए ही ले-ले। वह गाय के सामने जाकर बड़ा हुआ तो उसे ऐसा जान पड़ा कि उसकी काली-काली सजीव आँखों में आंसू भरे हुए है और वह कह रही है––क्या चार दिन में ही तुम्हारा मन मुझसे भर गया? तुमने तो वचन दिया था कि जीते-जी इसे न बेचूंगा। यही वचन था तुम्हारा! मैंने तो तुममे कभी किसी बात का गिला नहीं किया। जो कुछ रूखा-सूखा तुमने दिया, वही खाकर सन्तुष्ट हो गयी। बोलो।
धनिया ने कहा––लड़कियाँ तो सो गयीं। अब इसे ले क्यों नहीं जाते। जब बेचना ही है, तो अभी बेच दो।
होरी ने काँपते हुए स्वर मे कहा––मेरा तो हाथ नहीं उठता धनिया! उसका मुंह नही देखती? रहने दो, रुपए सूद पर ले लूंगा। भगवान् ने चाहा तो सब अदा हो जायेंगे। तीन-चार सौ होते ही क्या है। एक बार ऊख लग जाय।
धनिया ने गर्व-भरे प्रेम से उसकी ओर देखा––और क्या! इतनी तपस्या के बाद तो घर में गऊ आयी। उमे भी बेच दो। ले लो कल रुपए। जैसे और सब चुकाये जायेंगे वैसे इसे भी चुका देंगे।
भीतर बड़ी उमस हो रही थी। हवा बन्द थी। एक पत्ती न हिलती थी। बादल छाये हुए थे; पर वर्षा के लक्षण न थे। होरी ने गाय को बाहर बाँध दिया। धनिया ने टोका भी, कहां लिये जाते हो? पर होरी ने सुना नहीं, बोला––बाहर हवा में बाँधे देता हूँ। आराम से रहेगी। उसके भी तो जान है। गाय बाँधकर वह अपने मंझले भाई शोभा को देखने गया। शोभा को इधर कई महीने से दमे का आरजा हो गया था। दवा-दारू की जुगत नहीं। खाने-पीने का प्रवन्ध नहीं, और काम करना पड़ता था जी तोड़कर; इसलिए उसकी दशा दिन-दिन बिगड़ती जाती थी। शोभा सहनशील आदमी था, लड़ाई-झगड़े से कोसों भागनेवाला। किसी से मतलब नहीं। अपने काम से काम। होरी उसे चाहता था। और वह भी होरी का अदब करता था। दोनों में रुपए-पैसे की बातें होने लगीं। राय साहब का यह नया फ़रमान आलोचनाओं का केन्द्र बना हुआ था।
कोई ग्यारह बजते-बजते होरी लौटा और भीतर जा रहा था कि उसे भास हुआ, जैसे गाय के पास कोई आदमी खड़ा है। पूछा––कौन खड़ा है वहाँ ?
हीरा बोला––मैं हूँ दादा, तुम्हारे कौड़े में आग लेने आया था।
हीरा उसके कौड़े में आग लेने आया है, इस ज़रा-सी बात में होरी को भाई की आत्मीयता का परिचय मिला। गांव में और भी तो कौड़े हैं। कहीं से भी आग मिल सकती थी। हीरा उसके कौड़े सें आग ले रहा है, तो अपना ही समझकर तो। सारा गाँव इस कौड़े में आग लेने आता था। गाँव में सबसे सम्पन्न यही कौड़ा था; मगर हीरा का आना दूसरी बात थी। और उस दिन की लड़ाई के बाद! हीरा के मन में कपट नहीं रहता। गुस्सैल है; लेकिन दिल का साफ़।
उसने स्नेह भरे स्वर में पूछा––तमाखू है कि ला दूं?
'नहीं, तमाखू तो है दादा!'
'सोभा तो आज बहुत बेहाल है।'
'कोई दवाई नहीं खाता, तो क्या किया जाय। उसके लेखे तो मारे वैद, डाक्टर, हकीम अनाड़ी हैं। भगवान के पास जितनी अक्कल थी, वह उसके और उसकी घरवाली के हिस्से पड़ गयी।'
होरी ने चिन्ता से कहा––यही तो बुराई है उसमें। अपने सामने किसी को गिनता ही नहीं। और चिढ़ने तो बिमारी में सभी हो जाते हैं। तुम्हें याद है कि नहीं, जब तुम्हें इफ़िजा हो गया था, तो दवाई उठाकर फेंक देते थे। मैं तुम्हारे दोनों हाथ पकड़ता था, तब तुम्हारी भाभी तुम्हारे मुंह में दवाई डालती थीं। उस पर तुम उसे हजारों गालियां देते थे।
'हाँ दादा, भला वह बात भूल सकता हूँ। तुमने इतना न किया होता, तो तुमसे लड़ने के लिए कैसे बचा रहता।'
होरी को ऐसा मालूम हुआ कि हीरा का स्वर भारी हो गया है। उसका गला भी भर आया।
'बेटा, लड़ाई-झगड़ा तो जिन्दगी का धरम है। इससे जो अपने हैं, वह पराये थोड़े ही हो जाते हैं। जब घर में चार आदमी रहते हैं, तभी तो लड़ाई-झगड़े भी होते हैं। जिसके कोई है ही नहीं, उसके कौन लड़ाई करेगा।'
दोनों ने साथ चिलम पी। तब हीरा अपने घर गया, होरी अन्दर भोजन करने चला।
धनिया रोष से बोली––देखी अपने सपूत की लीला? इतनी रात हो गयी और अभी उसे अपने सैल से छुट्टी नहीं मिली। मैं सब जानती हूँ। मुझको सारा पता मिल गया है। भोला की वह राँड़ लड़की नहीं है, झुनिया। उसी के फेर में पड़ा रहता है।
होरी के कानों में भी इस बात की भनक पड़ी थी, पर उसे विश्वास न आया था। गोबर बेचारा इन बातों को क्या जाने।
बोला––किसने कहा तुझसे?
धनिया प्रचण्ड हो गयी––तुमसे छिपी होगी, और तो सभी जगह चर्चा चल रही है। यह भुग्गा, वह बहत्तर घाट का पानी पिये हुए। इसे उँगलियों पर नचा रही है, और यह समझता है, वह इस पर जान देती है। तुम उसे समझा दो नहीं कोई ऐसी-वैसी बात हो गयी, तो कहीं के न रहोगे।
होरी का दिल उमंग पर था। चुहल की सूझी––झुनिया देखने-सुनने में तो बुरी नहीं है। उसी से कर ले सगाई। ऐसी सस्ती मेहरिया और कहाँ मिली जाती है।
धनिया को यह चुहल तीर-सा लगा––झुनिया इस घर में आये, तो मुंह झुलस दूँ राँड़ का। गोबर की चहेती है, तो उसे लेकर जहाँ चाहे रहे।
'और जो गोबर इसी घर में लाये?'
'तो यह दोनों लड़कियाँ किसके गले बांधोगे? फिर बिरादरी में तुम्हें कौन पूछेगा, कोई द्वार पर खड़ा तक तो होगा नहीं।'
'उसे इसकी क्या परवाह।'
'इस तरह नहीं छोड़ँगी लाला को। मर-मर के पाला है और झुनिया आकर राज करेगी। मुंँह में आग लगा दूंँगी राँड़ के।'
सहसा गोबर आकर घबड़ाई हुई आवाज़ में बोला––दादा,सुन्दरिया को क्या हो गया? क्या काले नाग ने छू लिया? वह तो पड़ी तड़प रही है।
होरी चौके में जा चुका था। थाली सामने छोड़कर बाहर निकल आया और बोला––क्या असगुन मुंह से निकालते हो। अभी तो मैं देखे आ रहा हूँ। लेटी थी।
तीनों बाहर गये। चिराग़ लेकर देखा। सुन्दरिया के मुंह से फिचकुर निकल रहा था। आँखें पथरा गयी थीं, पेट फूल गया था और चारों पाँव फैल गये थे। धनिया सिर पीटने लगी। होरी पंडित दातादीन के पास दौड़ा। गाँव में पशु-चिकित्सा के वही आचार्य थे। पण्डितजी सोने जा रहे थे। दौड़े हुए आये। दम-के-दम में सारा गाँव जमा हो गया। गाय को किसी ने कुछ खिला दिया। लक्षण स्पष्ट थे। साफ़ विष दिया गया है। लेकिन गाँव में कौन ऐसा मुद्दई है, जिसने विष दिया हो; ऐसी वारदात तो इस गाँव में कभी हुई नहीं; लेकिन बाहर का कौन आदमी गाँव में आया। होरी की किसी से दुश्मनी भी न थी कि उस पर सन्देह किया जाय। हीरा से कुछ कहा-सुनी हुई थी; मगर वह भाईभाई का झगड़ा था। सबसे ज्यादा दुखी तो हीरा ही था। धमकियाँ दे रहा था कि जिसने यह हत्यारों का काम किया है, उसे पाय तो खून पी जाय। वह लाख गुस्सैल हो; पर इतना नीच काम नहीं कर सकता।
आधी रात तक जमघट रहा। सभी होरी के दुःख में दुखी थे और वधिक को गालियाँ देते थे। वह इस समय पकड़ा जा सकता, तो उसके प्राणों की कुशल न थी। जब यह हाल है तो कोई जानवरों को बाहर कैसे बाँधेगा। अभी तक रात-बिरात सभी जानवर बाहर पड़े रहते थे। किसी तरह की चिन्ता न थी, लेकिन अब तो एक नयी विपत्ति आ खड़ी हुई थी। क्या गाय थी कि बस देखता रहे। पूजने जोग। पाँच सेर से दूध कम न था। सौ-सौ का एक-एक बाछा होता। आते देर न हुई और यह वज्र गिर पड़ा।
जब सब लोग अपने-अपने घर चले गये, तो धनिया होरी को कोसने लगी––तुम्हें कोई लाख समझाये, करोगे अपने मन की। तुम गाय खोलकर आँगन से चले, तब तक मैं जुझती रही कि बाहर न ले जाओ। हमारे दिन पतले हैं, न जाने कब क्या हो जाय; लेकिन नहीं, उसे गर्मी लग रही है। अब तो खूब ठण्डी हो गयी और तुम्हारा कलेजा भी ठण्डा हो गया। ठाकुर माँगते थे; दे दिया होता, तो एक बोझ सिर से उतर जाता और निहोरा का निहोरा होता; मगर यह तमाचा कैसे पड़ता। कोई बुरी बात होनेवाली होती है तो मति पहले ही हर जाती है। इतने दिन मजे से घर में बँधती रही; न गर्मी लगी, न जूड़ी आयी। इतनी जल्दी सबको पहचान गयी थी कि मालूम ही न होता था कि बाहर से आयी है। बच्चे उसके सींगों से खेलते रहते थे। सिर तक न हिलाती थी। जो कुछ नाँद में डाल दो, चाट-पोंछकर साफ़ कर देती थी। लच्छमी थी, अभागों के घर क्या रहती। सोना और रूपा भी यह हलचल सुनकर जाग गयी थीं और बिलख-बिलखकर रो रही थीं। उसकी सेवा का भार अधिकतर उन्हीं दोनों पर था। उनकी संगिनी हो गयी थी। दोनों खाकर उठतीं, तो एक-एक टुकड़ा रोटी उसे अपने हाथों से खिलातीं। कैसा जीभ निकालकर खा लेती थी, और जब तक उनके हाथ का कौर न पा लेती, खड़ी ताकती रहती। भाग्य फूट गये!
सोना और गोबर और दोनों लड़कियाँ रो-धोकर सो गयी थीं। होरी भी लेटा। धनिया उसके सिरहाने पानी का लोटा रखने आयी तो होरी ने धीरे से कहा–तेरे पेट में बात पचती नहीं; कुछ सुन पायेगी, तो गाँव भर में ढिंढोरा पीटती फिरेगी।
धनिया ने आपत्ति की––भला सुनूँ; मैंने कौन-सी बात पीट दी कि यों ही नाम बदनाम कर दिया।
'अच्छा तेरा सन्देह किसी पर होता है।'
'मेरा सन्देह तो किसी पर नहीं है। कोई बाहरी आदमी था।'
'किसी से कहेगी तो नहीं?'
'कहूँगी नहीं, तो गाँववाले मुझे गहने कैसे गढ़वा देंगे।'
'अगर किसी से कहा, तो मार ही डालूंगा।'
'मुझे मारकर सुखी न रहोगे। अब दूसरी मेहरिया नहीं मिली जाती। जब तक हूँ, तुम्हारा घर सँभाले हुए हूँ। जिस दिन मर जाऊँगी, सिर पर हाथ धरकर रोओगे। अभी मुझमें सारी बुराइयाँ ही बुराइयाँ हैं, तब आँखों से आँसू निकलेंगे।'
'मेरा सन्देह हीरा पर होता है।'
'झूठ,बिलकुल झूठ! हीरा इतना नीच नहीं है। वह मुंह का ही खराब है।'
'मैंने अपनी आँखों देखा। सच, तेरे सिर की सौंह।' 'तुमने अपनी आँखों देखा! कब?'
'वही,मैं सोभा को देखकर आया;तो वह सुन्दरिया की नाँद के पास खड़ा था। मैंने पूछा—कौन है,तो बोला,मैं हूँ हीरा,कौड़े में से आग लेने आया था। थोड़ी देर मुझसे बातें करता रहा। मुझे चिलम पिलायी। वह उधर गया,मैं भीतर आया और वही गोबर ने पुकार मचायी। मालूम होता है,मैं गाय बाँधकर सोभा के घर गया हूँ,और इसने इधर आकर कुछ ग्विला दिया है। साइत फिर यह देखने आया था कि मरी या नहीं।
धनिया ने लम्बी साँस लेकर कहा–इस तरह के होते है भाई,जिन्हें भाई का गला काटने में भी हिचक नहीं होती। उपफोह। हीरा मन का इतना काला है!और दाढ़ीजार को मैंने पाल-पोसकर बड़ा किया।
'अच्छा जा सो रह,मगर किसी मे भूलकर भी जिकर न करना।'
'कौन,सबेरा होते ही लाला को थाने न पहुंँचाऊँ,तो अपने अमल वाप की नहीं। यह हत्यारा भाई कहने जोग है! यही भाई का काम है! वह बैगे है,पवका बैरी और बैरी को मारने में पाप नही,छोड़ने में पाप है।'
होरी ने धमकी दी–मैं कहे देता हूँ धनिया,अनर्थ हो जायगा।
धनिया आवेश में बोली–अनर्थ नहीं,अनर्थ का बाप हो जाय। मैं बिना लाला को बड़े घर भिजवाये मानूंँगी नहीं। तीन साल चक्की पिसवाऊंँगी,तीन माल। वहाँ से छूटेंगे,तो हत्या लगेगी। तीरथ करना पड़ेगा। भोज देना पड़ेगा। इम धोखे में न रहें लाला! और गवाही दिलाऊँगी तुमगे,बेटे के सिर पर हाथ रखकर।
उसने भीतर जाकर किवाड़ बन्द कर लिये और होरी बाहर अपने को कोमता पड़ा रहा। जब स्वयं उसके पेट में बात न पची,तो धनिया के पेट में क्या पचेगी। अब यह चुडै़ल माननेवाली नहीं! ज़िद पर आ जाती है,तो किमी की मुनती ही नहीं। आज उमने अपने जीवन में सबसे बड़ी भूल की।
चारों ओर नीरव अन्धकार छाया हुआ था। दोनों बैलों के गले की घण्टियाँ कभी-कभी बज उठती थीं। दस कदम पर मृतक गाय पड़ी हुई थी और होरी घोर पश्चाताप में करवटें वदल रहा था। अन्धकार में प्रकाश की रेखा कहीं नजर न आती थी।
९
प्रातःकाल होरी के घर में एक पूरा हंगामा हो गया। होरी धनिया को मार रहा था। धनिया उसे गालियाँ दे रही थी। दोनों लड़कियाँ बाप के पाँवों में लिपटी चिल्ला रही थीं और गोबर माँ को बचा रहा था। बार-बार होरी का हाथ पकड़कर पीछे ढकेल देता;पर ज्योंही धनिया के मुँह से कोई गाली निकल जाती,होरी अपने हाथ छुड़ाकर उसे दो-चार घूसे और लात जमा देता। उसका बूढ़ा क्रोध जैसे किसी गुप्त संचित शक्ति को निकाल लाया हो। सारे गाँव में हलचल पड़ गयी। लोग समझाने के बहाने तमाशा देखने आ पहुँचे। शोभा लाठी टेकता आ खड़ा हुआ। दातादीन ने डाँटा–यह क्या है होरी,तुम बावले हो गये हो क्या? कोई इस तरह घर की लक्ष्मी पर हाथ छोड़ता है! तुम्हें तो यह रोग न था। क्या हीरा की छूत तुम्हें भी लग गयी।
होरी ने पालागन करके कहा–महाराज,तुम इस बखत न बोलो। मैं आज इसकी बान छुड़ाकर तब दम लूंँगा। मैं जितना ही तरह देता हूँ,उतना ही यह सिर चढ़ती जाती है।
धनिया मजल क्रोध में बोली–महाराज तुम गवाह रहना। मैं आज इसे और इसके हत्यारे भाई को जेहल भेजवाकर तब पानी पिऊँगी। इसके भाई ने गाय को माहुर खिलाकर मार डाला। अब जो मैं थाने में रपट लिखाने जा रही हूँ तो यह हत्यारा मुझे मारता है। इसके पीछे अपनी ज़िन्दगी चौपट कर दी, उसका यह इनाम दे रहा है।
होरी ने दाँत पीसकर और आँखें निकालकर कहा–फिर वही बात मुँहसे निकाली। तूने देखा था हीरा को माहुर ग्विलाते?
'तू कसम खा जा कि तूने हीग को गाय की नाँद के पास खड़े नहीं देखा?'
'हाँ,मैंने नहीं देखा,कसम खाता हूँ।'
'बेटे के माथे पर हाथ रख के कसम खा!'
होरी ने गोबर के माथे पर कांँपता हुआ हाथ रखकर काँगते हए स्वर में कहामैं बेटे की कसम खाता हूं कि मैंने हीरा को नाँद के पास नहीं देखा।
धनिया ने जमीन पर थूक कर कहा–धुड़ी है तेरी झुठाई पर। तूने खुद मुझसे कहा कि हीरा चोरों की तरह नाँद के पास खड़ा था। और अब भाई के पक्ष में झूठ बोलता है। थुड़ी है !अगर मेरे बेटे का बाल भी बाँका हुआ,तो घर में आग लगा दूंँगी। मारी गृहस्ती में आग लगा दूंँगी। भगवान,आदमी मुंँह से बात कहकर इतनी बेसरमी मे मुकुर जाता है।
होरी पाँव पटककर बोला–धनिया,गुस्सा मत दिखा, नही बुरा होगा।
'मार तो रहा है,और मार ले। जा,तू अपने बाप का बेटा होगा तो आज मुझे मारकर तव पानी पियेगा। पापी ने मारते-मारते मेरा भुरकस निकाल लिया,फिर भी इसका जी नहीं भरा। मुझे मारकर समझता है मैं बड़ा बीर हूँ। भाइयों के सामने भीगी बिल्ली बन जाता है,पापी कहीं का,हत्यारा।'
फिर वह बैन कहकर रोने लगी–इस घर में आकर उसने क्या नहीं झेला,किस किस तरह पेट-तन नहीं काटा, किस तरह एक-एक लत्ते को तरसी,किस तरह एक-एक पैसा प्राणों की तरह संचा,किस तरह घर-भर को खिलाकर आप पानी पीकर सो रही।और आज उन सारे बलिदानों का यह पुरस्कार! भगवान वैठे यह अन्याय देख रहे हैं और उसकी रक्षा को नहीं दौड़ते। गज की और द्रौपदी की रक्षा करने बैकुण्ठ मे दौड़े थे। आज क्यों नींद में सोये हुए हैं।
जनमत धीरे-धीरे धनिया की ओर आने लगा। इसमें अब किसी को मन्देह नही रहा कि हीरा ने ही गाय को जहर दिया। होरी ने बिलकुल झूठी कसम खाई है,इसका भी लोगों को विश्वास हो गया। गोबर को भी बाप की इस झूठी क़सम और उसके फलस्वरूप आनेवाली विपत्ति की शंका ने होरी के विरुद्ध कर दिया। उस पर जो दातादीन ने डाँट बतायी,तो होरी परास्त हो गया। चुपके से बाहर चला गया,सत्य ने विजय पायी। दातादीन ने शोभा से पूछा–तुम कुछ जानते हो शोभा, क्या बात हुई?
शोभा ज़मीन पर लेटा हुआ बोला–मैं तो महाराज, आठ दिन से बाहर नहीं निकला। होरी दादा कभी-कभी जाकर कुछ दे आते हैं,उसी से काम चलता है। रात भी वह मेरे पास गये थे। किसने क्या किया,मैं कुछ नहीं जानता। हाँ,कल साँझ को हीरा मेरे घर खुरपी माँगने गया था। कहता था,एक जड़ी खोदना है। फिर तब से मेरी उससे भेंट नहीं हुई।
धनिया इतनी शह पाकर बोली–पण्डित दादा,वह उसी का काम है। सोभा के घर से खुरपी माँगकर लाया और कोई जड़ी खोदकर गाय को खिला दी। उस रात को जो झगड़ा हुआ था,उसी दिन से वह ग्वार खाये बैठा था।
दातादीन बोले–यह बात साबित हो गयी,तो उसे हत्या लगेगी। पुलिस कुछ करे या न करे,धरम तो बिना दण्ड दिये न रहेगा। चली तो जा रुपिया,हीरा को बुला ला। कहना, पण्डित दादा बुला रहे हैं। अगर उसने हत्या नहीं की है,तो गंगाजली उठा ले और चौरे पर चढ़कर क़सम खाय।
धनिया बोली–महाराज,उसके क़सम का भरोसा नहीं। चटपट खा लेगा। जब इसने झूठी क़सम खा ली,जो बड़ा धर्मात्मा बनता है,तो हीरा का क्या विश्वास।
अब गोबर बोला–खा ले झूठी कसम। बन्स का अन्त हो जाय। बूढ़े जीते रहें। जवान जीकर क्या करेंगे!
रूपा एक क्षण में आकर बोली–काका घर में नहीं है, पण्डित दादा! काकी कहती हैं,कहीं चले गये हैं।
दातादीन ने लम्बी दाढ़ी फटकारकर कहा–तूने पूछा नहीं,कहाँ चले गये हैं? घर में छिपा बैठा न हो। देख तो सोना,भीतर तो नहीं बैठा है।
धनिया ने टोका–उसे मत भेजो दादा! हीरा के सिर हत्या सवार है,न जाने क्या कर बैठे।
दातादीन ने खुद लकड़ी सँभाली और खबर लाये कि हीरा सचमुच कहीं चला गया है। पुनिया कहती है,लुटिया-डोर और डण्डा सब लेकर गये हैं। पुनिया ने पूछा भी,कहाँ जाते हो;पर बताया नहीं। उसने पाँच रुपए आले में रखे थे। रुपए वहाँ नहीं हैं। साइत रुपए भी लेता गया।
धनिया शीतल हृदय से बोली–मुंँह में कालिख लगाकर कहीं भागा होगा।
शोभा बोला–भाग के कहाँ जायगा। गंगा नहाने न चला गया हो।
धनिया ने शंका की–गंगा जाता तो रुपए क्यों ले जाता,और आजकल कोई परब भी तो नहीं है?
इस शंका का कोई समाधान न मिला। धारणा दृढ़ हो गयी।
आज होरी के घर भोजन नहीं पका। न किसी ने बैलों को सानी-पानी दिया। सारे गाँव में सनसनी फैली हुई थी। दो-दो चार-चार आदमी जगह-जगह जमा होकर इसी विषय की आलोचना कर रहे थे। हीरा अवश्य कहीं भाग गया। देखा होगा कि भेद खुल गया,अब जेहल जाना पड़गा,हत्या अलग लगेगी। बस,कहीं भाग गया। पुनिया अलग रो रही थी,कुछ कहा न सुना,न जाने कहाँ चल दिये।
जो कुछ कसर रह गयी थी वह संध्या-समय हलके के थानेदार ने आकर पूरी कर दी। गाँव के चौकीदार ने इस घटना की रपट की,जैसा उसका कर्त्तव्य था। और थानेदार साहब भला अपने कर्तव्य से कब चूकनेवाले थे। अब गाँववालों को भी उनकी सेवा-सत्कार करके अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। दातादीन,झिंगुरीसिंह,नोखेराम,उनके चारों प्यादे,मॅगरू साह और लाला पटेश्वरी,सभी आ पहुँचे और दारोग़ाजी के सामने हाथ बांधकर खड़े हो गये। होरी की तलबी हुई। जीवन में यह पहला अवसर था कि वह दारोगा के सामने आया। ऐसा डर रहा था, जैसे फाँसी हो जायेगी। धनिया को पीटते समय उसका एक-एक अंग फड़क रहा था। दारोगा के सामने कछुए की भाँति भीतर सिमटा जाता था। दारोगा ने उसे आलोचक नेत्रों से देखा और उसके हृदय तक पहुंँच गये। आदमियों की नस पहचानने का उन्हें अच्छा अभ्यास था। कितावी मनोविज्ञान में कोरे,पर व्यावहारिक मनोविज्ञान के मर्मज थे। यक़ीन हो गया,आज अच्छे का मुँह देखकर उठे हैं। और होरी का चेहरा कहे देता था,इसे केवल एक घुड़की काफ़ी है।
दारोगा़ ने पूछा–तुझे किस पर सुबहा है?
होरी ने ज़मीन छुई और हाथ बाँधकर बोला–मेरा सुबहा किसी पर नहीं है सरकार,गाय अपनी मौत से मरी है। बुड्ढी हो गयी थी।
धनिया भी आकर पीछे खड़ी थी। तुरन्त बोली–गाय मारी है तुम्हारे भाई हीरा ने। सरकार ऐसे बौड़म नहीं हैं कि जो कुछ तुम कह दोगे,वह मान लेंगे। यहाँ जाँच-तहकिकात करने आये हैं।
दारोग़ाजी ने पूछा– यह कौन औरत है?
{{Gap{}कई आदमियों ने दारोग़ाजी से कुछ बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए चढ़ा-ऊपरी की। एक साथ बोले और अपने मन को इस कल्पना से सन्तोष दिया कि पहले मैं बोला–होरी की घरवाली है सरकार!
'तो इसे बुलाओ,मैं पहले इसी का बयान लिखूँगा। वह कहाँ है हीरा?'
विशिष्ट जनों ने एक स्वर से कहा–वह तो आज सबेरे से कहीं चला गया है सरकार!
'मैं उसके घर की तलाशी लूंँगा।'
तलाशी! होरी की साँस तले-ऊपर होने लगी। उसके भाई हीरा के घर की तलाशी होगी और हीरा घर में नहीं है। और फिर होरी के जीते-जी,उसके देखते यह तलाशी न होने पायेगी; और धनिया से अब उसका कोई सम्बन्ध नहीं। जहाँ चाहे जाय। जब वह उसकी इज्जत बिगाड़ने पर आ गयी है,तो उसके घर में कैसे रह सकती है। जब गली-गली ठोकर खायेगी,तब पता चलेगा।
गाँव के विशिष्ट जनों ने इस महान् संकट को टालने के लिए काना-फुसी शुरू की।
दातादीन ने गंजा सिर हिलाकर कहा–यह सब कमाने के ढंग हैं। पूछो,हीरा के घर में क्या रखा है। पटेश्वरीलाल बहुत लम्बे थे;पर लम्बे होकर भी बेवकूफ़ न थे। अपना लम्बा काला मुंँह और लम्बा करके बोले–और यहाँ आया है किस लिए,और जब आया है बिना कुछ लिये-दिये गया कब है?
झिंगुरीसिंह ने होरी को बुलाकर कान में कहा–निकालो जो कुछ देना हो। यों गला न छूटेगा।
दारोग़ाजी ने अब ज़रा गरजकर कहा–मैं हीरा के घर की तलाशी लूंँगा।
होरी के मुख का रंग ऐसा उड़ गया था,जैसे देह का सारा रक्त मूख गया हो। तलाशी उसके घर हुई तो,उसके भाई के घर हुई तो,एक ही बात है। हीरा अलग सही;पर दुनिया तो जानती है,वह उसका भाई है;मगर इस वक्त उसका कुछ बस नहीं। उसके पाम रुपए होते,तो इसी वक्त पचास रुपए लाकर दारोग़ाजी के चरणों पर रख देता और कहता–सरकार, मेरी इज्जत अब आपके हाथ है। मगर उसके पास तो ज़हर खाने को भी एक पैसा नहीं है। धनिया के पास चाहे दो-चार रुपए पड़े हों;पर वह चुडै़ल भला क्यों देने लगी। मृत्यु-दण्ड पाये हुए आदमी की भाँति सिर झुकाये,अपने अपमान की वेदना का तीव्र अनुभव करता हुआ चुपचाप खड़ा रहा।
दातादीन ने होरी को सचेत किया—अब इस तरह खड़े रहने से काम न चलेगा होरी,रुपए की कोई जुगत करो।
होरी दीन स्वर में बोला–अब मैं क्या अरज करूँ महाराज! अभी तो पहले ही की गठरी सिर पर लदी है,और किस मुंँह से मागूँ;लेकिन इस संकट से उबार लो। जीता रहा, तो कौड़ी-कौड़ी चुका दूँगा। मैं मर भी जाऊँ तो गोबर तो है ही।
नेताओं में सलाह होने लगी। दारोगाजी को क्या भेट किया जाय। दातादीन ने पचास का प्रस्ताव किया। झिंगुरीसिंह के अनुमान में सौ से कम पर सौदा न होगा। नोखेगम भी सौ के पक्ष में थे। और होरी के लिए सौ और पचास में कोई अन्तर न था। इस तलाशी का संकट उसके सिर से टल जाय। पूजा चाहे कितनी ही चढ़ानी पड़े। मरे को मन-भर लकड़ी से जलाओ,या दस मन से;उसे क्या चिन्ता!
मगर पटेश्वरी से यह अन्याय न देखा गया। कोई डाका या क़तल तो हुआ नहीं। केवल तलाशी हो रही है। इसके लिए बीस रुपए बहुत हैं।
नेताओं ने धिक्कारा–तो फिर दारोग़ाजी से बातचीत करना। हम लोग नगीच न जायेंगे। कौन घुड़कियां खाय।
होरी ने पटेश्वरी के पाँव पर अपना सिर रख दिया–भैया,मेरा उद्धार करो। जब तक जिऊँगा,तुम्हारी तावेदारी करूंँगा।
दारोग़ाजी ने फिर अपने विशाल वक्ष और विशालतर उदर की पूरी शक्ति से कहा– कहाँ है हीरा का घर? मैं उसके घर की तलाशी लूंँगा।
पटेश्वरी ने आगे बढ़कर दारोग़ाजी के कान में कहा–तलासी लेकर क्या करोगे हुजूर,उसका भाई आपकी ताबेदारी के लिए हाज़िर है।
दोनों आदमी ज़रा अलग जाकर बातें करने लगे। 'कैसा आदमी है?'
‘बहुत ही ग़रीब हुजूर! भोजन का ठिकाना भी नहीं!'
'सच?'
'हाँ हुजूर,ईमान से कहता हूँ।'
'अरे तो क्या एक पचासे का डौल भी नहीं है?'
'कहाँ की बात हुजूर!दस मिल जायें,तो हज़ार समझिए। पचास तो पचास जनम में भी मुमकिन नहीं और वह भी जब कोई महाजन खड़ा हो जायगा।'
दारोगा़जी ने एक मिनट तक विचार करके कहा–तो फिर उसे सताने में क्या फ़ायदा। मैं ऐसों को नहीं सताता,जो आप ही मर रहे हों।
पटेश्वरी ने देखा,निशाना और आगे जा पड़ा। बोले—नही हुजूर,ऐसा न कीजिए,नही फिर हम कहाँ जायँगे। हमारे पास दूसरी और कौन-सी खेती है?
'तुम इलाके के पटवारी हो जी,कैसी बातें करते हो?'
'जब ऐसा ही कोई अवसर आ जाता है,तो आपकी बदौलत हम भी कुछ पा जाते हैं। नहीं पटवारी को कौन पूछता है।
'अच्छा जाओ,तीस रुपए दिलवा दो;बीस रुपए हमारे, दम रुपा तुम्हारे।'
'चार मुग्विया है,इसका ख्याल कीजिए।'
'अच्छा आधे-आध पर रखो,जल्दी करो। मुझे देर हो रही है।'
पटेश्वरी ने झिगुरी से कहा,झिंगुरी ने होरी को इशारे से बुलाया,अपने घर ले गये,तीस रुपए गिनकर उसके हवाले किये और एहसान से दबाते हुए बोले–आज ही कागद लिखा लेना। तुम्हारा मुंँह देखकर रुपए दे रहा हूंँ,तुम्हारी भलमंसी पर।
होरी ने रुपए लिये और अंँगोछे के कोर में बाँधे प्रसन्न मुख आकर दारोगा़जी की ओर चला।
सहसा धनिया झपटकर आगे आयी और अंँगोछी एक झटके के साथ उसके हाथ से छीन ली। गाँठ पक्की न थी। झटका पाते ही खुल गयी और सारे स्पए जमीन पर बिख़र गये। नागिन की तरह फुँकारकर बोली–ये रुपए कहाँ लिये जा रहा है, बता। भला चाहता है,तो सब रुपए लौटा दे,नहीं कहे देती हूँ। घर के परानी रात-दिन मरें और दाने-दाने को तरसें,लत्ता भी पहनने को मयस्सर न हो और अंँजुली-भर रुपए लेकर चला है इज्जत बचाने! ऐसी बड़ी है तेरी इज्जत! जिसके घर में चूहे लोटें,वह भी इज्जतवाला है! दारोगा तलासी ही तो लेगा। ले-ले जहाँ चाहे तलासी। एक तो सौ रुपए की गाय गयी,उस पर यह पलेथन! वाह री तेरी इज्जत!
होरी खून का घूँट पीकर रह गया। सारा समूह जैसे थर्रा उठा। नेताओं के सिर झुक गये। दारोगा का मुंँह ज़रा-सा निकल आया। अपने जीवन में उसे ऐसी लताड़ न मिली थी।
होरी स्तम्भित-सा खड़ा रहा। जीवन में आज पहली बार धनिया ने उसे भरे अखाड़े में पटकनी दी,आकाश तका दिया। अब वह कैसे सिर उठाये! मगर दारोगा़जी इतनी जल्द हार माननेवाले न थे। खिसियाकर बोले–मुझे ऐसा मालूम होता है,कि इस शैतान की खाला ने हीरा को फंँसाने के लिए खुद गाय को जहर दे दिया।
धनिया हाथ मटकाकर बोली–हाँ,दे दिया। अपनी गाय थी,मार डाली,फिर किसी दूसरे का जानवर तो नहीं मारा? तुम्हारे तहकियात में यही निकलता है,तो यही लिखो। पहना दो मेरे हाथ में हथकड़ियाँ। देख लिया तुम्हारा न्याय और तुम्हारे अक्कल की दौड़। गरीबों का गला काटना दूसरी बात है। दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात।
होरी आँखों से ॲगारे बरसाता धनिया की ओर लपका; पर गोबर सामने आकर खड़ा हो गया और उग्र भाव से बोला–अच्छा दादा,अब बहुत हुआ। पीछे हट जाओ,नहीं मैं कहे देता हूंँ,मेरा मुँह न देखोगे। तुम्हारे ऊपर हाथ न उठाऊँगा। ऐसा कपून नहीं हूँ। यहीं गले में फाँसी लगा लूंँगा।
JIM – Assistente
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