चन्द्रकांता सन्तति २

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चन्द्रकांता सन्तति २

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चन्द्रकांता सन्तति २
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पाँचवाँ भाग

1

बेचारी किशोरी को चिता पर बैठाकर जिस समय दुष्टा धनपति ने आग लगाई, उसी समय बहुत-से आदमी, जो उसी जंगल में किसी जगह छिपे हुए थे, हाथों में नंगी तलवारें लिये 'मारो! मारो!' कहते हुए उन लोगों पर आ टूटे। उन लोगों ने सबसे पहले किशोरी को चिता पर से खींच लिया और इसके बाद धनपति के साथियों को पकड़ने लगे।

पाठक समझते होंगे कि ऐसे समय में इन लोगों के आ पहुँचने और जान बचने से किशोरी खुश हुई होगी और इन्द्रजीतसिंह से मिलने की कुछ उम्मीद भी उसे हो गई होगी। मगर नहीं, अपने बचानेवालों को देखते ही किशोरी चिल्ला उठी और उसके दिल का दर्द पहले से भी ज्यादा बढ़ गया। किशोरी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, "मुझे तो विश्वास हो गया था कि इस चिता में जलकर ठंडे-ठंडे बैकुण्ठ चली जाऊँगी, क्योंकि इसकी आँच कुँअर इन्द्रजीतसिंह की जुदाई की आँच से ज्यादा गर्म न होगी, मगर हाय, इस बात का गुमान भी न था कि यह दुष्ट आ पहुँचेगा और मैं एक सचमुच की तपती हुई भट्ठी में झोंक दी जाऊँगी। मौत, तू कहाँ है? तू कोई वस्तु है भी या नहीं, मुझे तो इसी में शक है!"

वह आदमी, जिसने ऐसे समय में पहुँचकर किशोरी को बचाया, माधवी का दीवान अग्निदत्त था, जिसके चंगुल में फँसकर किशोरी ने राजगृह में बहुत दुःख उठाया था और कामिनी की मदद से, जिसका नाम कुछ दिनों तक किन्नरी था, छुट्टी मिली थी। किशोरी को अपने मरने की कुछ भी परवाह न थी और वह अग्निदत्त की सूरत देखने की बनिस्बत मौत को लाख दर्जे उत्तम समझती थी, यही सबब था कि इस समय उसे अपनी जान बचने का रंज हुआ।

अग्निदत्त और उसके आदमियों ने किशोरी को तो बचा लिया, मगर जब उसके दुश्मनों को, अर्थात् धनपति और उसके साथियों को, पकड़ने का इरादा किया तो लड़ाई गहरी हो पड़ी। मौका पाकर धनपति भाग गई और गहन वन में किसी झाड़ी के अन्दर छिपकर उसने अपनी जान बचाई। उसके साथियों में से एक भी न बचा, सब मारे गये। अग्निदत्त के भी केवल दो ही आदमी जीवित बचे। उस संगदिल ने रोती और चिल्लाती हुई बेचारी किशोरी को जबर्दस्ती उठा लिया और एक तरफ का रास्ता लिया।

पाठक आश्चर्य करते होंगे कि अग्निदत्त को तो राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने राजगृह में गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया था, वह यकायक यहाँ कैसे आ पहुँचा? इसलिए अग्निदत्त का थोड़ा-सा हाल इस जगह लिख देना हम मुनासिब समझते हैं।

राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने दीवान अग्निदत्त को गिरफ्तार करके अपने बीस सवारों के पहरे में चुनारगढ़ रवाना कर दिया और एक चिट्ठी भी सब हाल की महाराज सुरेन्द्रसिंह को लिखकर उन्हीं लोगों की मार्फत भेजी। अग्निदत्त को हथकड़ी डाल घोड़े पर सवार कराया गया और उसके पैर रस्सी से घोड़े की जीन के साथ बाँध दिये गए। घोड़े की लम्बी बागडोर दोनों तरफ से दो सवारों ने पकड़ ली और सफर शुरू किया। तीसरे दिन जब वे लोग सोन नदी के पास पहुँचे, अर्थात् जब वह नदी दो कोस दूर रह गई, तब उन लोगों पर डाका पड़ा। पचास आदमियों ने चारों तरफ से घेर लिया। घण्टे भर की लड़ाई में राजा वीरेन्द्रसिंह के सब आदमी मारे गये। खबर पहुँचाने के लिए भी एक आदमी न बचा और अग्निदत्त को उन लोगों के हाथों से छुट्टी मिली। वे डाकू सब अग्निदत्त के तरफदार और उन लोगों में से थे जो गयाजी में फसाद मचाया करते और उन लोगों की जानें लेते और घर लूटते थे जो दीवान अग्निदत्त के विरुद्ध जाने जाते। इस तरह अग्निदत्त को छुट्टी मिली और बहुत दिन तक इस डाके की खबर राजा वीरेन्द्रसिंह या उनके आदमियों को न मिली।

यद्यपि दीवान अग्निदत्त के हाथ से गया की दीवानी जाती रही और वह एक साधारण आदमी की तरह मारा-मारा फिरने लगा, तथापि वह अपने साथी डाकुओं में मालदार गिना जाता था क्योंकि उसके पास जुल्म की कमाई हुई दौलत बहुत थी और वह उस दौलत को राजगृह से थोड़ी दूर पर एक मढ़ी में, जो पहाड़ी के ऊपर थी, रखता था। इस मढ़ी का हाल दस-बारह आदमियों के सिवाय और किसी को भी मालूम न था। उस दौलत को निकालने में अग्निदत्त ने विलम्ब न किया और उसे अपने कब्जे में लेकर साथी डाकुओं के साथ अपनी धुन में चारों तरफ घूमने तथा इस बात की टोह लेने लगा कि राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ क्या होता है।

थोड़े ही दिन बाद मौका समझकर वह रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमने लगा और जिस तरह किशोरी से मिला, उसका हाल आप ऊपर पढ़ चुके हैं।

जिस जगह अग्निदत्त किशोरी से मिला था, उससे थोड़ी ही दूर पर एक पहाड़ी थी जिसमें कई खोह और गार थे। वह किशोरी को उठाकर उसी पहाड़ी पर ले गया। रोते और चिल्लाते-चिल्लाते किशोरी बेहोश हो गई थी। अग्निदत्त ने उसे खोह के अन्दर ले जाकर लिटा दिया और आप बाहर चला आया।

पहर रात जाते-जाते जब किशोरी होश में आई, तो उसने अपने को अजब हालत में पाया। ऊपर-नीचे चारों तरफ पत्थर देखकर वह समझ गई कि मैं किसी खोह में हूँ। एक तरफ चिराग जल रहा था‌। गुलाब की फूल-सी नाजुक किशोरी की अवस्था इस समय बहुत ही नाजुक थी। अग्निदत्त की याद से उसे घड़ी-घड़ी में रोमांच होता था। उसके धड़कते हुए कलेजे में अजब तरह का दर्द था। और इस सोच ने उसे बिल्कुल ही निकम्मा कर रखा था कि देखें चाण्डाल अग्निदत्त के पहुँचने पर मेरी क्या दुर्दशा होती है। घण्टों की मेहनत में बड़ी कोशिश करके उसने अपने होश-हवास दुरुस्त किए और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उसने इस इरादे को तो पक्का कर ही लिया था कि अगर अग्निदत्त मेरे पास आवेगा, तो पत्थर पर सिर पटक कर अपनी जान दे दूँगी, मगर यह भी सोचती थी कि पत्थर पर सिर पटकने से जान नहीं जा सकती, किसी तरह खोह के बाहर निकल कर ऐसा मौका ढूँढ़ना चाहिए कि अपने को इस पहाड़ के नीचे गिराकर बखेड़ा खत्म कर दिया जाय, जिसमें हमेशा के लिए इस खिंचाखिंची से छुट्टी मिले।

किशोरी चिराग बुझाने के लिए उठी ही थी कि सामने से किसी के पैरों की चाप मालूम हुई। वह डर कर उसी तरफ देखने लगी कि यकायक अग्निदत्त पर नजर पड़ी। देखते ही वह काँप गई, ऐसा मालूम हुआ कि रगों में खून की जगह पारा भर गया। वह अपने को किसी तरह सम्हाल न सकी और जमीन पर बैठ कर रोने लगी। अग्निदत्त सामने आकर खड़ा हो गया और बोला––

अग्निदत्त––तुमने मुझको बड़ा ही धोखा दिया। अपने साथ मेरी लड़की को भी मुझसे जुदा कर दिया। अभी तक मुझे इस बात का पता न लगा कि मेरी स्त्री पर क्या बीती और वीरेन्द्रसिंह ने उसके साथ क्या सलूक किया, और यह सब तुम्हारी बदौलत हुआ।

किशोरी––फिर भी मैं कहती हूँ कि यदि मुझे छोड़ दोगे, तो मैं राजा वीरेन्द्रसिंह से कहकर तुम्हारा कसूर माफ करा दूँगी और तुम्हारी जीविका-निर्वाह के लिए भी बन्दोबस्त हो जायगा। नहीं तो याद रखना, तुम्हारी स्त्री भी…

अग्निदत्त––जो तुम कहोगी, सो मैं समझ गया। मेरी स्त्री पर चाहे जो बीते इसकी परवाह नहीं, न मुझे वीरेन्द्रसिंह का डर है। मुझे दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई चीज नहीं दिखाई देती। देखो, तुम्हारे लिए मैंने कितना दुख भोगा और भोगने को तैयार हूँ, क्या अब भी तुमको मुझ पर तरस नहीं आता! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हें अपनी जान से ज्यादा प्यार करूँगा, यदि मेरी होकर रहोगी।

किशोरी––अरे दुष्ट चाण्डाल, खबरदार, फिर ऐसी बात मुँह से न निकालना!

अग्निदत्त––चाहे जो हो, मैं तुम्हें किसी तरह नहीं छोड़ सकता!

किशोरी––जान जाय तो जाय, मगर तेरी हवा अपने बदन से नहीं लगने दूँगी।

अग्निदत्त––(हँस कर) देखूँ, तू अपने को मुझसे कैसे बचाती है!

इतना कहकर अग्निदत्त किशोरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। किशोरी घबराकर उठ खड़ी हुई और दूर हट गई। थोड़ी देर तक तो इस तंग जगह में दौड़-धूप कर किशोरी ने अपने को बचाया, मगर कहाँ तक? आखिर मर्द के सामने औरत की क्या पेश आ सकती थी! अग्निदत्त को क्रोध आ गया। उसने किशोरी को पकड़ लिया और जमीन पर पटक दिया।

2

पाठक अभी भूले न होंगे कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह कहाँ हैं। हम ऊपर लिख आए हैं कि उस मकान में जो तालाब के अन्दर बना हुआ था, कुँअर इन्द्रजीतसिंह दो औरतों को देखकर ताज्जुब में आ गए। कुमार उन औरतों का नाम नहीं जानते थे मगर पहचानते जरूर थे, क्योंकि उन्हें राजगृह में माधवी के यहाँ देख चुके थे और जानते थे कि ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं। परन्तु यह जानने के लिए कुमार व्याकुल हो रहे थे कि ये दोनों ‌यहाँ कैसे आई। क्या इस औरत से, जो इस मकान की मालिक है, और उस माधवी से कोई सम्बन्ध है? इसी समय उन दोनों औरतों के पीछे-पीछे वह औरत भी आ पहुँची जिसने इन्द्रजीतसिंह के ऊपर अहसान किया था और जो उस मकान की मालिक थी। अभी तक इस औरत का नाम मालूम नहीं हुआ, मगर आगे इससे काम बहुत पड़ेगा, इसलिए जब तक इसका असल नाम मालूम न हो कोई बनावटी नाम रख दिया जाय तो उत्तम होगा, मेरी समझ में तो कमलिनी नाम कुछ बुरा न होगा।

जिस समय कुँअर इन्द्रजीतसिंह की निगाह उन दोनों औरतों पर पड़ी, वे हैरान होकर उनकी तरफ देखने लगे। उसी समय दौड़ती हुई कमलिनी भी आई और दूर ही से बोली––

कमलिनी––कुमार, इन दोनों हरामजादियों का कोई मुलाहिजा न कीजिएगा और न किसी तरह की जुबान ही दीजिएगा। अपनी जान बचाने के लिए ही दोनों आपके पास आई हैं।

इन्द्रजीतसिंह––क्या मामला है? ये दोनों कौन हैं?

कमलिनी––ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं और आपकी जान लेने आई थीं। मेरे आदमियों के हाथ गिरफ्तार हो गईं।

इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारे आदमी कहाँ हैं? मैंने तो इस मकान में सिवाय तुम्हारे किसी को भी नहीं देखा!

कमलिनी––बाहर निकलकर देखिये, मेरे वे सिपाही यहीं मौजूद हैं जिन्होंने इन्हें गिरफ्तार किया।

इन्द्रजीतसिंह––अगर ये गिरफ्तार होकर आई हैं तो इनके हाथ-पैर खुले क्यों हैं?

कमलिनी––इसके लिए कोई हर्ज नहीं। ये मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, जब तक कि मैं जागती हूँ या अपने होश में हूँ।

इन्द्रजीतसिंह––(उन दोनों की तरफ देखकर) तुम क्या कहती हो?

एक––(कमलिनी की तरफ इशारा करके) ये जो कुछ कहती हैं, ठीक है। परन्तु आप वीर पुरुष हैं, आशा है कि हम लोगों का अपराध क्षमा करेंगे!

कुँअर इन्द्रजीतसिंह इन बातों को सुनकर सोच में पड़ गये। उन्हें उन दोनों औरतों की और कमलिनी की बातों का विश्वास न हुआ, बल्कि यकीन हो गया कि ये लोग किसी तरह का धोखा देना चाहती हैं। आधी घड़ी तक सोचने के बाद कुमार बँगले के बाहर निकले तो देखा कि तालाब के बाहर लगभग बीस सिपाही खड़े आपस में कुछ बातें कर रहे और घड़ी-घड़ी इसी तरफ देख रहे हैं। कुमार वहाँ से लौट आये और कमलिनी की तरफ देखकर बोले––

इन्द्रजीतसिंह––खैर, जो तुम्हारे जी में आये करो, हम इस बारे में कुछ नहीं कह सकते।

कमलिनी––करना क्या है, इन दोनों का सिर काटा जायगा।

इन्द्रजीतसिंह––खुशी तुम्हारी। मैं जरा इस तालाब के बाहर जाना चाहता। हूँ।

कमलिनी––क्यों?

इन्द्रजीतसिंह––यह समय मजेदार है। जरा मैदान की हवा खाऊँगा और उस घोड़े की भी खबर लूँगा जिस पर सवार होकर आया था।

कमलिनी––इस मकान की छत पर चढ़ने से अच्छी और साफ हवा आपको मिल सकती है। घोड़े के लिए चिन्ता न करें, या फिर ऐसा ही है तो सवेरे जाइयेगा!

न मालूम, क्या सोचकर इन्द्रजीतसिंह चुप हो रहे। कमलिनी ने उन दोनों औरतों का हाथ पकड़ा और धमकाती हुई न जाने कहाँ ले गई, इसका हाल कुमार को न मालूम हुआ और न उन्होंने जानने का उद्योग ही किया।

यद्यपि इस औरत अर्थात् कमलिनी ने कुमार की जान बचाई थी, तथापि उन्हें विश्वास हो गया कि कमलिनी ने दोस्ती की राह पर यह काम नहीं किया, बल्कि किसी मतलब से किया है। उस मकान में गुलदस्ते के नीचे से जो चिट्ठी कुमार ने पाई थी, उसके पढ़ने से कुमार होशियार हो गये थे तथा समझ गये थे कि यह मुझे किसी फरेब में फँसाना चाहती है और किशोरी के साथ भी किसी तरह की बुराई किया चाहती है। इसमें कोई शक नहीं कि कुमार इसे चाहने लगे थे और जान बचाने का बदला चुकाने की फिक्र में थे, मगर उस चिट्ठी के पढ़ते ही उनका रंग बदल गया और वे किसी दूसरी ही धुन में लग गए।

कुमार चाहते तो शायद यहाँ से निकल भागते, क्योंकि उस औरत की तरफ से होशियार हो चुके थे, मगर इस काम में उन्होंने यह समझकर जल्दी न की कि इस औरत का कुछ हाल मालूम करना चाहिए और जानना चाहिए कि यह कौन है। पर कमलिनी को कुमार के दिल की क्या खबर थी, उसने तो सोच रखा था कि मैंने कुमार पर अहसान किया है और वे किसी तौर पर मुझसे बदगुमान न होंगे।

कुमार के पास इस समय सिवाय कपड़ों के कोई चीज ऐसी न थी जिससे वे अपनी हिफाजत करते या समय पड़ने पर मतलब निकाल सकते।

कुछ दिन बाकी था जब कुमार उस मकान की छत पर चढ़ गए और चारों तरफ के पहाड़, जंगल तथा मैदान के बाहर देखने लगे। कुमार को यह जगह बहुत ही पसन्द आई और उन्होंने दिल में कहा कि यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो सब बखेड़ों से छुट्टी पा कर किशोरी के साथ कुछ दिनों तक इस मकान में जरूर रहेंगे। थोड़ी देर तक प्रकृति की शोभा देखकर दिल बहलाते रहे, जब सूर्य अस्त हो गया तो कमलिनी भी वहाँ पहुँची और कुमार के पास खड़ी होकर बातचीत करने लगी।

कमलिनी––यहाँ से अच्छी बहार दिखाई देती है।

कुमार––ठीक है मगर यह छटा मेरे दिल को किसी तरह नहीं बहला सकती।

कमलिनी––सो क्यों?

कुमार––तरह-तरह की फिक्रों और तरद्दुदों ने मुझे दुखी कर रखा है, बल्कि यहाँ आने और तुम्हारे मिलने से तरद्दुद और भी ज्यादा हो गया।

कमलिनी––यहाँ आकर कौन सी फिक्र बढ़ गई?

कुमार––यह तो तब कह सकता हूँ जब कुछ तुम्हारा हाल मुझे मालूम हो। अभी तो मैं यह भी नहीं जानता कि तुम कौन हो और कहाँ की रहने वाली हो और इस मकान में आके रहने का सबब क्या है।

कमलिनी––कुमार, मुझे आपसे बहुत बातें कहनी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मेरे बारे में आप तरह-तरह की बातें सोचते होंगे, कभी मुझे खैर-ख्वाह तो कभी बदख्वाह समझते होंगे, बल्कि बदख्वाह समझने का मौका ही ज्यादा मिलता होगा। अक्सर उन लोगों ने जो मुझे जानते हैं, मुझे शैतान और खूनी समझ रखा है, और इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। मैं उन लोगों का जिक्र इस समय केवल इसीलिए करती हूँ कि शायद उन लोगों ने, जो केवल दो-तीन ऐयार लोग हैं, कुछ चर्चा आपसे की हो।

कुमार––नहीं, मैंने किसी से कभी तुम्हारा जिक्र नहीं सुना।

कमलिनी––खैर, ऐसा मौका न पड़ा होगा। पर मेरा मतलब यह है कि जब तक मैं अपने मुँह से कुछ न कहूँगी, मेरे बारे में कोई भी अपनी राय ठीक नहीं कह सकता और …

इतने ही में सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आवाज मालूम हुई जिसे सुनकर दोनों चौंके और उसी तरफ देखने लगे।

कुमार––इस मकान में तो केवल तुम्हीं रहती हो?

कमलिनी––नहीं, और भी कई आदमी रहते हैं, मगर वे लोग उस समय नहीं थे जब आप आए थे।

दो लौंडियाँ आती हुई दिखाई पड़ीं। एक के हाथ में छोटा-सा गलोचा था, दूसरी के हाथ में शमादान और तीसरी पानदान लिये हुए थी। गलीचा बिछा दिया गया, शमादान और पानदान रखकर लौंडियाँ हाथ जोड़े सामने खड़ी हो गई। कमलिनी के कहने से कुमार गलीचे पर बैठ गए और कमलिनी भी पास बैठ गई। इस समय इन तीनों लौंडियों का वहाँ पहुँचकर बातचीत में बाधा डालना कुमार को बहुत बुरा मालूम हुआ, क्योंकि वे बड़े ही गौर से कमलिनी की बातें सुन रहे थे और इस बीच में उनके दिल की अजीब हालत थी। कुमार ने कमलिनी की तरफ देख के कहा, "हाँ, तुम अपनी बातों का सिलसिला मत तोड़ो।"

कमलिनी––(लौंडियों की तरफ देखकर) अच्छा, तुम लोग जाओ! बहुत जल्दी खाने का बन्दोबस्त करो। कुमार––अभी खाने के लिए जल्दी न करो।

कमलिनी––खैर, ये लोग अपना काम पूरा कर रखें, आप जब चाहें, भोजन करें।

कुमार––अच्छा हाँ, तब?

कमलिनी––(डिब्बे से पान निकालकर) लीजिए, पान खाइए।

कुमार ने पान हाथ में रख लिया और पूछा, "हाँ, तब?"

कमलिनी––पान खाइए, आप डरिए मत, इसमें बेहोशी की दवा नहीं मिली है। हाँ, अगर आप ऐसा खयाल करें भी तो कोई बेमौका नहीं!

कुमार––(हँस कर) इसमें कोई शक नहीं कि इतनी खैरख्वाही करने पर भी मैं तुम्हारी तरफ से बदगुमान हूँ। मगर तुम्हारी बातें अजब ढंग पर चल रही हैं। (पान खाकर) अब जो हो, जब तुमने मेरी जान बचाई है तो कब हो सकता है कि तुम अपने हाथ से मुझे जहर दो।

कमलिनी––(हँसकर) कुमार, यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि आप मुझ पर शक करें। माधवी की दोनों लौंडियों का मामला, जो अभी थोड़ी देर हुआ, आप देख चुके हैं, मुझ पर शक करने का मौका आपको देगा। मगर नहीं, आप पूरा विश्वास रखिए कि मैं आपके साथ कभी बुराई न करूँगी। कई आदमी मेरी शिकायत आपसे करेंगे, आप ही के कई ऐयार असल हाल न जानने के कारण मेरे दुश्मन हो जायँगे, मगर सिवाय कसम खाकर कहने के और किस तरह आपको विश्वास दिलाऊँ कि मैं आपकी खैरख्वाह हूँ। आप यह भी सोच सकते हैं कि मैं आपके साथ इतनी खैरख्वाह क्यों हो रही हूँ! दुनिया का कायदा है कि बिना मतलब कोई किसी का काम नहीं करता और मैं भी दुनिया के बाहर नहीं हूँ, अस्तु मैं भी आपसे बहुत-कुछ उम्मीद करती हूँ मगर उसे जुवान से कह नहीं सकती। अभी आपको मुझसे वर्षों तक काम पड़ेगा, जब आप हर तरह से निश्चिन्त हो जायँगे, आपकी किशोरी, जो इस समय रोहतासगढ़ में कैद है, आपको मिल जायगी। इसके अतिरिक्त एक और भी भारी काम आपके हाथ से हो लेगा, तब कहीं मेरी मुराद पूरी होगी, अर्थात् उस समय मुझे जो कुछ आपसे माँगना होगा, माँगूंगी। आप मेरी बात याद रखिएगा कि आप ही के ऐयार मेरे दुश्मन होंगे और अन्त में झख मार के मुझ ही से दोस्ती के तौर पर सलाह लेनी पड़ेगी। आप यह भी न समझिए कि मैं आज या कल से आपकी तरफदार बनी हूँ, नहीं, बल्कि मैं महीनों से आपका काम कर रही हूँ और इस सबब से सैकड़ों आदमी मेरे दुश्मन हो रहे हैं। दुश्मनों ही के डर से मैं इस तालाब में छिपकर बैठी रहती हूँ क्योंकि जिन्हें इसका भेद मालूम नहीं है वे इस मकान के अन्दर पैर नहीं रख सकते। आप मुझे अकेली समझते होंगे, मगर मैं अकेली नहीं हूँ, लौंडियाँ, सिपाही और ऐयार मिलाकर इस गई-गुजरी हालत में भी पचास आदमी मेरी तावेदारी कर रहे हैं।

कुमार––वे लोग कहाँ हैं?

कमलिनी––उनमें से कई आदमियों को तो आप इसी जगह बैठे देखेंगे, बाकी सब को मैंने काम पर भेजा है। जब मैं आपकी खैरख्वाह हूँ तो किशोरी की मदद भी जरूर ही करनी पड़ेगी, इसलिए मेरी एक ऐयार रोहतासगढ़ किले के अन्दर भी घुस कर बैठी है और किशोरी के हाल-चाल की खबर दिया करती है। अभी कल ही उसने एक चिट्ठी भेजी थी, (कमर से चिट्ठी निकाल कर और कुमार के हाथ में देकर) लीजिए यही चिट्ठी है, पहले आप इसे पढ़ लीजिए फिर और कुछ कहूँगी।

कुमार हाथ में चिट्ठी लेकर गौर से पढ़ने लगे। यह वही चिट्ठी थी जिस पर पहले कुमार की निगाह पड़ चुकी थी और जिसे एक गुलदस्ते के नीचे से निकाल कर कुमार पढ़ चुके थे। कुमार ने चोरी से उस चिट्ठी को पढ़ने का हाल कमलिनी से कहना मुनासिब न समझा और उसे इस तौर पर पढ़ गए जैसे पहली दफे वह चिट्ठी उनके हाथ में पड़ी हो। परन्तु इस समय इस तरह कमलिनी उनकी दुश्मन नहीं है इस बात को वे अच्छी तरह समझ गए। मगर साथ-ही-साथ उनके दिल में एक दूसरी ही तरह की उत्कण्ठा बढ़ गई और वे यह जानने के लिए व्याकुल हो गए कि कमलिनी और इसकी ऐयारा ने रोहतासगढ़ किले में पहुँच कर क्या किया!

पाठक, शायद आप इस चिट्ठी का मजमून भूल गए होंगे, मगर आप उसे याद करें या पुनः पढ़ जायँ, क्योंकि उसके एक-एक शब्द का मतलब इस समय कमलिनी से कुमार पूछना चाहते हैं।

कुमार––मैं नहीं कह सकता और न मुझे मालूम ही है कि तुम इतनी भलाई मेरे साथ क्यों कर रही हो, तो भी मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इस समय मुझे चिन्ता में डाल कर दुःख न दोगी, बल्कि जो मैं पूछूँगा उसका ठीक-ठीक जवाब दोगी।

कमलिनी––आप मेरी तरफ से किसी तरह का बुरा खयाल न रक्खें। आज मैं इस बात पर मुस्तैद हूँ कि अगर आपको कष्ट न हो तो रात भर जाग के बहुत कुछ हाल जो अब तक आपको मालूम नहीं है और आपके मतलब का है, आपसे कहूँ और जो-जो सवाल आप करें, उसका जवाब दूँ।

कुमार––मुझे तुम्हारे इस कहने से बड़ी खुशी हुई। अच्छा पहले इस बात का जवाब दो कि तुम्हारी वह ऐयारा, जो रोहतासगढ़ में है और इस चिट्ठी के पढ़ने से जिसका नाम तारा मालूम होता है, रोहतासगढ़ में किस तौर पर है? जहाँ तक मैं सोचता हूँ वह भेष बदल कर नौकरी करती होगी?

कमलिनी––नहीं, उसने नौकरी नहीं, बल्कि वहाँ इस तरह छिपकर रहती है कि वहाँ के किसी आदमी को उसका पता लग जाना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है।

कुमार––अच्छा, तो उसने यह क्या लिखा है कि––'किशोरी का आशिक भी यहाँ मौजूद है!'

कमलिनी––यह कटाक्ष माधवी के दीवान अग्निदत्त पर है, क्योंकि हम लोगों के हिसाब से वह किशोरी पर आशिक है! वह आपकी तरह सच्चा आशिक नहीं है, मगर बेईमान ऐयारों की तरह जरूर आशिक है।

कुमार––नहीं-नहीं, उसे तो हमारे आदमियों ने गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया है!

कमलिनी––आपका यह खयाल गलत है। वह चुनार नही पहुँचा, न मालूम किस तरह उसने अपनी जान बचा ली है। इसका हाल आपको लश्कर में जाने या किसी को चुनारगढ़ भेजने से मालूम होगा।

कुमार––तो क्या वह भी रोहतासगढ़ पहुँच गया?

कमलिनी––पहुँच ही गया तभी तो तारा ने लिखा है।

कुमार––अच्छा, तो ये लाली और कुन्दन कौन हैं?

कमलिनी––आपकी और मेरी दुश्मन, इन दोनों को मामूली दुश्मन न समझिएगा।

कुमार––इसमें किशोरी के आशिक के बारे में लिखा है कि 'उसे किशोरी से बहुत-कुछ उम्मीद भी है'––इसका मतलब क्या है?

कमलिनी––सो ठीक अभी मालूम नहीं हुआ।

कुमार––यह जवाब तुमने बड़े खुटके का दिया।

कमलिनी––(हँसकर) आप चिन्ता न करें। किशोरी तन-मन-धन आपको समर्पण कर चुकी है, वह किसी दूसरे की न होगी।

कुमार––खैर, जब खुलासा हाल मालूम ही नहीं है तो जो कुछ सोचा जाय, मुनासिब है। इसमें लिखा है कि 'किशोरी ने भी पूरा धोखा खाया'––सो क्या?

कमलिनी––इसका भी हाल अभी नहीं मालूम हुआ। शायद आज-कल में कोई दूसरी चिट्ठी आवेगी तो मालूम होगा। बल्कि और भी जो कुछ लिखा है, इशारा ही भर है, असल क्या बात है सो मैं नहीं कह सकती।

कुमार––अच्छा, अब मैं तुम्हारा पूरा हाल जानना चाहता हूँ और इसी के साथ रोहतासगढ़ में रहने वाली लाली और कुन्दन का वृत्तान्त भी तुम्हारी जुबानी सुनना चाहता हूँ।

कमलिनी––मैं सब हाल आपसे कहूँगी और इसके अलावा एक ऐसे भेद की खबर भी आपको दूँगी कि आप खुश हो जायँगे, मगर इसके लिए आपको तीन-चार तक दिन और सब्र करना चाहिए। इसी बीच में तारा भी रोहतासगढ़ से आ जायेगी या मैं खुद उसे बुलवा लूँगी।

कुमार––इन सब बातों को जानने के लिए मैं बहुत बेचैन हो रहा हूँ, कृपा करके जो कुछ तुम्हें कहना हो, अभी कहो।

कमलिनी––नहीं-नहीं, आप जल्दी न करें, मेरा दो-चार दिन के लिए टालना भी आप ही के फायदे के लिए है। आप यह न समझें कि मैं आपको जानबूझ कर यहाँ अटकाना चाहती हूँ। आप यदि मुझ पर भरोसा रक्खें और मुझे अपना दुश्मन न समझें तो यहाँ रहें। मैं लौंडियों की तरह आपकी ताबेदारी करने को तैयार हूँ, और यदि मुझ पर एतबार न हो तो अपने लश्कर चले जायें, चार-पाँच दिन के बाद मैं स्वयं आपसे मिलकर सब हाल कहूँगी।

कुमार––बेशक मैं तुम्हारे बारे में तरह-तरह की बातें सोचता था और तुम पर विश्वास करना मुनासिब नहीं समझता था, मगर अब तुम्हारी तरफ से मुझे किसी तरह का खुटका नहीं है। तुम्हारी बातों का मेरे दिल पर बड़ा ही असर हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम सिवाय भलाई के मेरे साथ बुराई कभी न करोगी। मैं जरूर यहाँ रहूँगा और जब तक अपने दिल का शक अच्छी तरह न मिटा लूँगा, न जाऊँगा।

कमलिनी––अहोभाग्य! (हँसकर) मगर ताज्जुब नहीं कि इसी बीच में आपके ऐयार लोग यहाँ पहुँचकर मुझे गिरफ्तार कर लें।

कुमार––क्या मजाल है!

3

कुमार कई दिनों तक कमलिनी के यहाँ मेहमान रहे। उसने बड़ी खातिरदारी और नेकनीयती के साथ इन्हें रक्खा। इस मकान में कई लौंडियाँ भी थीं जो दिलोजान से कुमार की खिदमत किया करती थीं, मगर कभी-कभी वे सब दो-दो पहर के लिए न मालूम कहाँ चली जाया करती थीं।

एक दिन शाम के वक्त उस मकान की छत पर कमलिनी और कुमार बैठे बात कर रहे थे, इसी बीच में कुमार ने पूछा––

कुमार––कमलिनी, अगर किसी तरह का हर्ज न हो तो इस मकान के बारे में कुछ कहो। इन पुतलियों की तरफ, जो इस मकान के चारों कोनों में तथा इस छत के बीचोंबीच में हैं, जब मेरी निगाह पड़ती है तो ताज्जुब से अजब हालत हो जाती है।

कमलिनी––बेशक इन्हें देख आप ताज्जुब करते होंगे। यह मकान एक तरह का छोटा-सा तिलिस्म है जो इस समय बिल्कुल मेरे अधीन है। मगर यहाँ का हाल बिना मेरे कहे थोड़े ही दिनों में आपको पूरा-पूरा मालूम हो जायगा।

कुमार––उन दोनों औरतों के साथ, जो माधवी की लौंडियाँ थीं, तुमने क्या सलूक किया?

कमलिनी––अभी तो वे दोनों कैद हैं।

कुमार––माधवी का भी कुछ हाल मालूम हुआ है?

कमलिनी––उसे आपके लश्कर और रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमते कई दफे मेरे आदमियों ने देखा है। जहाँ तक मैं समझती हूँ वह इस धुन में लगी है कि किसी तरह आप दोनों भाई और किशोरी उसके हाथ लगें और वह अपना बदला ले।

कुमार––अभी तक रोहतासगढ़ का कुछ हाल नहीं मालूम हुआ, न लश्कर का कोई समाचार मिला।

कमलिनी––मुझे भी इस बात का ताज्जुब है कि मेरे आदमी किस काम में फँसे हुए हैं। क्योंकि अभी तक एक ने भी लौटकर खबर न दी। (चौंककर और मैदान की तरफ देख के) मालूम होता है, इस समय कोई नया समाचार मिलेगा। मैदान की तरफ देखिए, दो आदमी एक बोझ लिये इसी तरफ आते दिखाई दे रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि ये मेरे ही आदमियों में से हों। कुमार––(मैदान की तरफ देख कर) हाँ ठीक है, इसी तरफ आ रहे हैं। उस गट्ठर में शायद कोई आदमी है।

कमलिनी––बेशक ऐसा ही है, (हँसकर) नहीं तो क्या मेरे आदमी मालअसबाब चुराकर लावेंगे! देखिए, वे दोनों कितनी तेजी के साथ आ रहे हैं। (कुछ अटक कर) अब मैंने पहचाना, बेशक इस गठरी में माधवी होगी।

थोड़ी देर तक दोनों आदमी चुपचाप उसी तरफ देखते रहे। जब वे लोग इस मकान के पास पहुँचे तो कमलिनी ने कुमार से कहा––

कमलिनी––मुझे आज्ञा दीजिए तो जाकर इन लोगों को यहाँ लाऊँ।

कुमार––क्या बिना तुम्हारे गये वे लोग यहाँ नहीं आ सकते?

कमलिनी––जी नहीं, जब तक मैं खुद उन्हें किश्ती पर चढ़ा कर यहाँ न लाऊँ वे लोग नहीं आ सकते। वे क्या, कोई भी नहीं आ सकता।

कुमार––क्या हरएक के लिए जब वह इस मकान में आना या जाना चाहे तुम्हीं को तकलीफ करनी पड़ती है? मैं समझता हूँ कि जिस आदमी को तुम एक दफे भी किश्ती पर चढ़ाकर ले जाओगी, उसे रास्ता मालूम हो जाएगा।

कमलिनी––अगर ऐसा ही होता तो मैं इस मकान में बेखटके कैसे रह सकती थी? आप जरा नीचे चलें, मैं इसका सबब आपको बतला देती हूँ।

कुमार खुशी-खुशी उठ खड़े हुए और कमलिनी के साथ नीचे उतर गए। कमलिनी उन्हें उस कोठरी में ले गई जो नहाने के काम में लाई जाती थी और जिसे कुमार देख चुके थे। उस कोठरी में दीवार के साथ एक आलमारी थी जिसे कमलिनी ने खोला। कुमार ने देखा कि उस दीवार के साथ चाँदी का एक मुट्ठा, जो हाथ भर से छोटा न होगा, लगा हुआ है। इसके सिवाय और कोई चीज उसमें नहीं थी।

कमलिनी––मैं पहले ही आपसे कह चुकी हूँ कि इस तालाब में चारों ओर लोहे का जाल पड़ा हुआ है।

कुमार––हाँ, ठीक है। मगर उस रास्ते में जाल न होगा, जिधर से तुम किश्ती लेकर आती-जाती हो।

कमलिनी––ऐसा खयाल न कीजिए। उस रास्ते में भी जाल है, मगर उसे यहाँ आने का दरवाजा कहना चाहिए, जिसकी ताली यह है। देखिये, अब आप अच्छी तरह समझ जायेंगे। (उस चाँदी के मुट्ठे को कई दफे घुमाकर) अब उतनी दूर का या उस रास्ते का जाल, जिधर से किश्ती लेकर मैं आती-जाती हूँ हट गया, मानो दरवाजा खुल गया। अब मैं क्या, कोई भी जिसको आने-जाने का रास्ता मालूम है, किश्ती पर चढ़ के आ-जा सकता है। जब मैं इसको उलटा घुमाऊँगी तो वह रास्ता बन्द हो जायगा अर्थात् वहाँ भी जाल फैल जायगा, फिर किश्ती नहीं आ सकती।

कुमार––(हँसकर) बेशक यह एक अच्छी बात है।

इसके बाद कमलिनी किश्ती पर सवार होकर तालाब के बाहर गई और उन दोनों आदमियों को गठरी सहित सवार कराके मकान में से आई तथा तालाब में आने का रास्ता उसी रीति से, जैसे कि हम ऊपर लिख चुके हैं, बन्द कर दिया। इस समय यहाँ कई लौंडियाँ भी मौजूद थीं। उन्होंने कमलिनी के इशारे से छत के ऊपर रोशनी का बन्दोबस्त कर दिया और सब कोई छत के ऊपर चले गए। कुमार के पास ही कमलिनी गलीचे पर बैठ गई और वे दोनों आदमी भी गठरी सामने रखकर बैठ गये। इस छत की जमीन चिकने पत्थर की बहुत साफ और सुथरी बनी हुई थी, अगर नजाकत की तरफ खयाल न किया जाय तो फर्श या बिछाबन बिछाकर वहाँ बैठने की कोई जरूरत न थी।

कमलिनी––कुमार, देखिए, इन दोनों आदमियों को मैंने माधवी को गिरफ्तार करने को भेजा था। मालूम होता है कि ये लोग अपना काम पूरा कर आए हैं और इस गठरी में शायद माधवी को ही लाए हैं। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) क्यों जी, माधवी ही है या किसी दूसरे को लाए हो?

एक––जी, माधवी को ही लाए हैं।

कमलिनी––गठरी खोलो, जरा इसकी सूरत देखू।

उन दोनों ने गठरी खोली, कमलिनी और कुमार ने बड़े चाव से माधवी की सूरत देखी, परन्तु यकायक कमलिनी चौंकी और बोली, "क्या यह जख्मी है?"

एक––जी हाँ, मुझे उम्मीद नहीं कि इसकी जान बचेगी क्योंकि चोट भारी है।

एक––इसे किसने जख्मी किया है?

एक––किसी औरत ने रोहतासगढ़ के तिलिस्मी तहखाने में इसे चोट पहुँचाई है।

कुमार––(कमलिनी की तरफ देखकर) क्या रोहतासगढ़ में कोई तिलिस्मी तहखाना भी है?

कमलिनी––जी हाँ, पर उसका भेद बहुत आदमियों को मालूम नहीं है, बल्कि जहाँ तक मैं समझती हूँ, वहाँ का राजा दिग्विजयसिंह भी उसका पूरा-पूरा हाल न जानता होगा। वहाँ का मामला भी बड़ा ही विचित्र है, किसी समय मैं आपसे उसका हाल कहूँगी।

एक––मगर अब उस तहखाने की रंगत बदल गई।

कमलिनी––सो क्यों?

एक––(कुमार की तरफ इशारा करके) आपके ऐयारों ने उसमें अपना दखल कर लिया, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि रोहतासगढ़ ही ले लिया।

कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) मुबारक हो, अच्छी खबर आई है।

कुमार––बेशक इस खबर ने मुझे खुश कर दिया। ईश्वर करे, तुम्हारी तारा भी जल्द आ जाय और किशोरी का कुछ हल मालूम हो। (माधवी को गौर से देख और चौंककर) यह क्या? माधवी की दाहिनी कलाई दिखाई नहीं देती।

कमलिनी––(हँसकर) इसका हाल आपको नहीं मालूम?

कुमार––कुछ नहीं।

कमलिनी––पूरा हाल तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर इतना सुना है कि कहीं गयाजी में इसकी और इसके दीवान अग्निदत्त की लड़की कामिनी से लड़ाई हो गई थी। उसी लड़ाई में यह अपनी दाहिनी कलाई खो बैठी। यह भी सुनने में आया है कि यह लड़ाई उसी मकान में हुई थी जिसमें आप लोग रहते थे और इसमें कमला भी शामिल थी।

कमलिनी की यह बात सुन कर कुमार को वे ताज्जुब की बातें याद आ गई जो बीमारी की हालत में गयाजी में महल के अन्दर कई दफे रात के समय देखने में आई थीं और जब कि अन्त में कोठरी के अन्दर एक लाश और औरत की कलाई पाई गई थी।

कुमार––हाँ, अब याद आया। वह मामला भी बड़ा ही विचित्र हुआ था अभी तक उसका ठीक-ठीक पता न लगा।

कमलिनी––क्या हुआ था, जरा मैं भी सुनूँ।

कुमार ने वह सब हाल कहा और जो कुछ देखने और सुनने में आया था, वह भी बताया।

कमलिनी––कमला से मुलाकात हो तो कुछ और सुनने में आवे (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) पहले माधवी को यहाँ से ले जाओ, लौंडियों के हवाले करो और कह दो, इसे कैदखाने में रक्खें और होश में लाकर इसका इलाज करें। इसके बाद आओ तो तुम्हारी जुबानी वहाँ का सब हाल सुनें। शाबाश, तुम लोगों ने बेशक अपना काम पूरा किया, जिससे मैं बहुत ही खुश हूँ।

'बहुत अच्छा' कहकर दोनों आदमी माधवी को वहाँ से उठाकर नीचे ले गए और इधर कमलिनी और कुमार में बातचीत होने लगी।

कमलिनी––(मुस्कराकर) लीजिए आपकी मुराद पूरी होना चाहती है, पहले-पहले यह खुशखबरी मेरे ही सबब से आपको मिली है, सो सबसे भारी इनाम मुझी को मिलना चाहिए।

कुमार––बेशक ऐसी ही बात है, मेरे पास इस वक्त कोई ऐसी चीज नहीं जो तुम्हारी नजर के लायक हो, खैर इसके बदले में मैं खुद अपने को तुम्हारे हाथ में देता हूँ।

कमलिनी––वाह, क्या खूब!

कुमार––सो क्यों?

कमलिनी––आपको अपने बदन पर अख्तियार ही क्या है! यह तो किशोरी की मिलकियत है!

कुमार लाजवाब हो गए और हँसकर चुप हो रहे। कमलिनी बड़ी ही खूबसूरत थी, इसके साथ-ही-साथ उसकी अच्छी चालचलन, मुरौवत, अहसान और नेकियों ने कुमार को अपना ताबेदार बना लिया। उसकी एक-एक बात पर कुमार प्रसन्न होते थे और दिल में बराबर उसकी तारीफ करते थे।

कुमार––कमलिनी, मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मगर ईश्वर के लिए सच-सच जवाब देना, बात बनाकर टालने की कोशिश न करना।

कमलिनी––कहिए तो सही, क्या बात है? रंग बेढंग मालूम होता है! कुमार––अगर सच जवाब देने का वादा करो तो पूछूँ, नहीं तो व्यर्थ मुँह क्यों दुखाऊँ।

कमलिनी––आपकी नजाकत तो औरतों से भी बढ़ गई। जरा सी बात कहने में मुँह दुखा जाता है, दम फूलने लगता है। खैर पूछिये, मैं वादा करती हूँ कि सच्चा जवाब दूँगी, अगर कहिए तो कागज पर लिख दूँ!

कुमार––(मुस्कुराकर) यह तो तुम वादा कर ही चुकी हो कि अपना हाल पूरा पूरा मुझसे कहोगी, मगर इस समय मैं तुमसे केवल इतना ही पूछता हूँ कि तुम्हारा कोई वली-वारिस भी है या नहीं? तुम्हारे व्यवहार से स्वतन्त्रता मालूम होती है और यह भी जाना जाता है कि तुम कुँआरी हो।

कमलिनी––यह सवाल जवाब देने योग्य है। (मुस्कराकर) परन्तु क्या किया जाय, वादा करके चुप रहना भी मुनासिब नहीं। वास्तव में मैं स्वतन्त्र हूँ। कुँआरी तो हूँ परन्तु शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है।

कुमार––कब और कहाँ?

कमलिनी––यह दूसरा सवाल है, इसका सच्चा जवाब देने के लिए मैंने वादा नहीं किया है, इसलिए आप इसका उत्तर न पा सकेंगे।

कुमार––अगर इसका भी जवाब दो, तो क्या कोई हर्ज है?

कमलिनी––हाँ हर्ज है, बल्कि नुकसान है।

कुमार चुप हो रहे और जिद करना मुनासिब न जाना। मगर यह सुनकर कि 'शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है' कुमार को रंज हुआ। क्यों रंज हुआ? इसमें कुमार की हानि ही क्या थी? क्या कुछ दूसरा इरादा था? नहीं, नहीं, कुमार यह नहीं चाहते थे कि हम ही इससे शादी करें, वे किशोरी के सच्चे प्रेमी थे, खूबसूरती के अतिरिक्त कमलिनी के अहसानों ने कुमार को ताबेदार बना लिया था और अभी उन्हें कमलिनी से बहुत-कुछ उम्मीद थी तथा यह भी सोचते थे कि ऐसी तरकीब निकल आवे जिससे इस अहसान का बदला चुक जाय। मगर इन बातों से कुमार के रंज होने का मतलब नहीं खुला। खैर, जो हो, पहले यह तो मालूम हो कि कमलिनी है कौन!

वे दोनों आदमी भी, जो माधवी को लाये थे, छत पर आ पहुँचे और हाथ जोड़ कर सामने बैठ गये। कमलिनी ने उनसे खुलासा हाल कहने के लिए कहा और उन दोनों में से एक ने इस तरह कहना सुरू किया।

दोनों––हम दोनों हुक्म के मुताबिक यहाँ से जाकर माधवी को खोजने लगे, मगर उसका पता गयाजी और राजगृह के इलाकों में कहीं भी न लगा। लाचार होकर रोहतासगढ़ किले के पास पहुँचे और पहाड़ी के चारों तरफ घूमने लगे। कभी-कभी रोहतासगढ़ की पहाड़ी के ऊपर भी जाते और घूम-घूमकर पता लगाते कि वहाँ क्या हो रहा है। एक दिन रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर घूमते-फिरते यकायक हम दोनों एक खोह के मुहाने पर जा पहुँचे और वहाँ कई आदमियों के धीरे-धीरे बातचीत करने की आवाज सुनकर एक झाड़ी में, जहाँ से उन लोगों की आवाज साफ सुनाई देती थी, छिपे रहे। अन्दाज से यह मालूम हुआ कि वे लोग कई आदमी हैं और उन्हीं के साथ एक औरत भी हैं। नीचे लिखी बातें हम लोगों ने सुनीं––

एक––न मालूम हम लोगों को कब तक यहाँ अटकना और राह देखना पड़ेगा।

दूसरा––अब हम लोगों को यहाँ ज्यादा दिन न रहना पड़ेगा। या तो काम हो जायेगा या खाली ही लौटकर चले जाने की नौबत आवेगी।

तीसरा––रंग तो ऐसा ही नजर आता है, भाई, जो हो, हमें तो यही विश्वास होता है कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग तहखाने में घुस गये क्योंकि पहले कभी एक आदमी तहखाने में आता-जाता दिखाई नहीं देता था, बल्कि मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ कि कल उस कब्रिस्तान में हम लोगों ने जिसे देखा था, वह कोई ऐयार ही था।

चौथा––खैर, और दो-तीन दिन में सब मालूम हो जाएगा।

औरत––तुम लोगों का काम चाहे जब हो, मगर मेरा काम तो आज हुआ ही चाहता है। माधवी और तिलोत्तमा को मैंने खूब ही धोखा दिया है। आज उसी कब्रिस्तान की राह से मैं उन दोनों को तहखाने में ले जाऊँगी।

एक––अब तुम्हें वहाँ जाना चाहिए, शायद माधवी वहाँ पहुँच गयी हो।

औरत––हाँ, अब जाती हूँ, पर अभी समय नहीं हुआ।

दूसरा––दम-भर पहले ही पहुँचना अच्छा है।

ये बातें सुनकर मैं उन लोगों को पहचान गया। वे रामू वगैरह धनपतिजी के सिपाही लोग थे और औरत चमेली थी।

इतना सुनते ही कमलिनी ने रोका और पूछा, "जिस खोह के मुहाने पर वे लोग बैठे थे, वहाँ कोई सलई का पेड़ भी है?"

इसके जवाब में उन दोनों ने कहा, "हाँ-ह, दो पेड़ सलई के वहाँ थे, पर उनके सिवाय और दूर-दूर तक कहीं सलई का पेड़ दिखाई नहीं दिया।"

कमलिनी––बस मैं समझ गयी। वह खोह का मुहाना भी तहखाने से निकलने का एक रास्ता है, शायद धनपति ने अपने आदमियों को कह रखा होगा कि मैं किशोरी को लिए हुए इसी राह से निकलूँगी तुम लोग मुस्तैद रहना, इसी से वे लोग वहाँ बैठे थे।

एक––शायद ऐसा ही हो।

कुमार––धनपति कौन है?

कमलिनी––उसे आप नहीं जानते। ठहरिए, पहले इन लोगों का हाल सुन लूँ तो कहूँगी। (उन दोनों की तरफ देखकर) हाँ, तब क्या हुआ?

उसने फिर यों कहना शुरू किया––

"थोड़ी ही देर में चमेली वहाँ से उठी और एक तरफ को रवाना हुई, हम दोनों भी उसके पीछे-पीछे चले और सुबह की सफेदी निकलना ही चाहती थी कि उस कब्रिस्तान के पास पहुँच गये जो तहखाने में जाने का दरवाजा है। हम दोनों एक आड़ की जगह में छिप रहे और तमाशा देखने लगे। उसी समय माधवी और तिलोत्तमा भी वहाँ आ पहुँचीं। तीनों में धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगी जिसे दूर होने के सबब मैं बिलकुल न सुन सका। आखिर वे तीनों तहखाने में घुस गयीं और पहरों गुजर जाने पर भी बाहर न निकलीं। हम दोनों यह निश्चय कर चुके थे कि जब तक वे तहखाने से न निकलेंगी, यहाँ से न टलेंगे। सवेरा हो गया बल्कि धीरे-धीरे तीन पहर दिन भी बीत गया। आखिर हम दोनों तहखाने में घुसने के इरादे से कब्रिस्तान में गये। वहाँ पहुँचकर हमारे साथी ने कहा, "आखिर हम लोग दिन-भर परेशान हो ही चुके हैं, अब शाम हो लेने दो, तो तहखाने में चलें।" मैंने भी यही मुनासिब समझा और हम दोनों आदमी वहाँ से लौटना ही चाहते थे कि तहखाने का दरवाजा खु‌ला और चमेली दिखाई पड़ी, हम दोनों को भी चमेली ने देखा और पहचाना, मगर उसको ठहरने या कुछ कहने का साहस न हुआ। वह कुछ परेशान मालूम होती थी और खुन से भरा हुआ एक छुरा उसके हाथ में था। हम दोनों ने भी उसको कुछ टोकना मुनासिब न समझा और यह विचार कर कि शायद कोई और भी इस तहखाने से निकले, एक कब्र की आड़ में छिपकर बीच वाली कब्र, अर्थात् तहखाने के दरवाजे की तरफ देखने लगे। चमेली हम लोगों को देखते-देखते भाग गयी और थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा।

"थोड़ी देर बाद हम लोगों ने दूर से राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार पण्डित बद्रीनाथ को आते देखा। वह तहखाने के दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि अन्दर से तिलोत्तमा निकली और पण्डित बद्रीनाथ ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ही एक बूढ़ा आदमी तहखाने से निकला और पण्डित बद्रीनाथ से बातें करने लगा। हम लोगों को कुछ-कुछ वे बातें सुनाई देती थीं। इतना मालूम हो गया कि तहखाने के अन्दर खून हुआ है और इन दोनों ने तिलोत्तमा को दोषी ठहराया है, मगर हम लोगों ने खून से भरा हुआ छुरा हाथ में लिए चमेली को देखा था, इसलिए विश्वास था कि अगर तहखाने में कोई खून हुआ है तो जरूर चमेली के ही हाथ से हुआ, तिलोत्तमा निर्दोष है।

"पण्डित बद्रीनाथ और वह बूढ़ा आदमी तिलोत्तमा को लेकर फिर तहखाने में घुस गये। हम लोगों ने भी वहाँ अटकना मनासिब न समझा और थोड़ी ही देर बाद हम लोग भी तहखाने में घुस गये तथा तहखाने की पचासों कोठरियों में घूमने और देखने लगे कि कहाँ क्या होता है। बद्रीनाथ थोड़ी ही देर बाद तहखाने के बाहर निकल गये और हम लोगों ने तिलोत्तमा को एक खम्भे से साथ बँधे हुए पाया। हम्माम वाली कोठरी में माधवी को पड़े हुए पाकर हम लोग बड़े खुश हुए और उसे उठाकर ले भागे, फिर न मालूम, पीछे क्या हुआ और किस पर क्या गुजरी ‌

कमलिनी––ताज्जुब नहीं कि वहाँ के दस्तूर के मुताबिक तिलोत्तमा की बलि दे दी गयी हो!

एक––जो भी हो।

इतने ही में नीचे से एक लौंडी दौड़ी हुई आयी और हाथ जोड़कर कमलिनी से बोली, "तारा आ गयी, तालाब के बाहर खड़ी है!"

तारा के आने की खबर सुनकर कमलिनी बहुत खुश हुई और खुशी के मारे कुँअर इन्द्रजीतसिंह की घबराहट का तो ठिकाना ही न रहा, क्योंकि तारा ही की जुबानी रोहतासगढ़ का हाल और बेचारी किशोरी की खबर सुनने वाले थे और इसी के बाद कमलिनी का असल भेद उन्हें मालूम होने को था।

कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) जिस तरह इन दोनों आदमियों को मैं तालाब के बाहर लायी हूँ उसी तरह तारा को भी लाना पड़ेगा।

कुमार––हाँ-हाँ, उसे बहुत जल्द लाओ। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

कमलिनी––आप क्यों तकलीफ करते हैं। बैठिए, मैं उसे अभी लाती हूँ। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) चलो, तुम दोनों को भी तालाब के बाहर पहुँचा दूँ।

लाचार कुमार उसी जगह बैठे रहे। उन दोनों आदमियों को साथ लेकर कमलिनी वहाँ से चली गयी तथा थोड़ी देर में तारा को लेकर आ पहुँची। कुँअर इन्द्रजीत सिंह को देखकर तारा चौंकी और बोली––

तारा––क्या कुमार यहाँ विराज रहे हैं?

कमलिनी––हाँ, कई दिनों से यहाँ हैं और तुम्हारी राह देख रहे हैं। तुम्हारी जुबानी रोहतासगढ़ और किशोरी तथा लाली और कुन्दन का असल भेद और हाल सुनने के लिए बड़े बेचैन हो रहे हैं। आओ, मेरे पास बैठ जाओ और कहो, क्या हाल है?

तारा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, मैं इस समय यहाँ बैठ नहीं सकती और न कुछ वहाँ का हाल ही कह सकती हूँ, क्योंकि हम लोगों का यह समय बड़ा ही अमूल्य है। कुमार को यहाँ देख मैं बहुत खुश हुई, अब वह काम बखूबी निकल जायगा! कुमार की तरफ देखकर) बेचारी किशोरी इस समय बड़े ही संकट में पड़ी हुई है। अगर आप उनकी जान बचाना चाहते हैं तो इस समय मुझसे कुछ न पूछिये, बस तुरन्त खड़े होइए और जहाँ मैं चलती हूँ, चले चलिये, हाँ, यदि बन बड़ा तो रास्ते में मैं वहाँ का हाल आपसे कहूँगी। (कमलिनी की तरफ देखकर) आप भी चलिए और कुछ आदमी अपने साथ लेती चलिए, मगर सब कोई घोड़े पर सवार और लड़ाई के सामान से दुरुस्त रहें।

कमलिनी––ऐसा ही होगा।

कुमार––(खड़े होकर) मैं तैयार हूँ।

तीनों आदमी छत के नीचे उतरे और तारा के कहे मुताबिक कार्रवाई की गयी।

सुबह की सफेदी आसमान पर निकलना ही चाहती है। आओ, देखो, हमारा बहादुर नौजवान कुँअर इन्द्रजीतसिंह किस ठाठ से मुश्की घोड़े पर सवार मैदान की तरफ घोड़ा फेंके चला जा रहा है और उसकी पेटी से लटकती हुई जड़ाऊ नयाम (म्यान) की तलवार किस तरह उछल-उछलकर घोड़े के पेट में थपकियाँ मार रही है, मानो उसकी चाल की तेजी पर शाबाशी दे रही है। कुमार के आगे-आगे घोड़े पर सवार तारा जा रही है, कुमार के पीछे सब्ज घोड़े पर कमलिनी सवार है और घोड़े की तेजी को बढ़ाकर कुमार के बराबर हुआ चाहती है। उसके पीछे दस दिलावर और बहादुर सवार घोड़ा फेंके चले जा रहे हैं और इस जंगली मैदान के सन्नाटे को घोड़ों के टापों की आवाज से तोड़ रहे हैं।

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यहाँ पर तो पाठक समझ ही होंगे कि तहखाने में एक बड़ी मूरत के सामने जिस औरत की बलि दी गई थी, वह माधवी की ऐयारा तिलोत्तमा थी और माधवी के लाश को ले भागने वाले ये ही दोनों कमलिनी के नौकर थे।

4

हम ऊपर लिख आये हैं कि देवीसिंह को साथ लेकर शेरसिंह कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए रोहतासगढ़ से रवाना हुए। शेरसिंह इस बात को तो जानते थे कि भी खबर कुँअर इन्द्रजीतसिंह फलाँ जगह हैं परन्तु उन्हें तालाब के गुप्त भेदों की न थी। राह में आपस में बातचीत होने लगी।

देवीसिंह––लाली का भेद कुछ मालूम हुआ?

शेरसिंह––अफसोस, उसके और कुन्दन के बारे में मुझसे बड़ी भारी भूल हुई। ऐसा धोखा खाया कि शर्म के मारे कुछ कह नहीं सकता।

देवीसिंह––इसमें शर्म की क्या बात है। ऐसा कोई ऐयार दुनिया में न होगा जिसने कभी धोखा न खाया हो। हम लोग कभी धोखा देते हैं, कभी स्वयं धोखे में आ जाते हैं, फिर इसका अफसोस कहाँ तक किया जाय!

शेरसिंह––आपका कहना बहुत ठीक है, खैर, इस बारे में मैंने जो-कुछ मालूम किया है उसे कहता हूँ! यद्यपि थोड़े दिनों तक मैंने रोहतासगढ़ से अपना सम्बन्ध छोड़ दिया था, तथापि मैं कभी-कभी वहाँ जाया करता और गुप्त राहों से महल के अन्दर जाकर वहाँ की खबर भी लिया करता था। जब किशोरी वहाँ फँस गयी तो अपनी भतीजी कमला के कहने से मैं वहाँ दूसरे-तीसरे बराबर जाने लगा। लाली और कुन्दन को मैंने महल में देखा। यह न मालूम हुआ कि ये दोनों कौन हैं। बहुत-कुछ पता लगाया मगर कुछ काम न चला। परन्तु कुन्दन के चेहरे पर जब मैं गौर करता तो मुझे शक होता कि वह सरला है।

देवीसिंह––सरला कौन?

शेरसिंह––वही, सरला जिसे तुम्हारी चम्पा ने चेली बनाकर रखा था और जो उस समय चम्पा के साथ थी जब उसने एक खोह के अन्दर माधवी के ऐयार की लाश काटी थी।

देवीसिंह––हाँ वह छोकरी, मुझे अब याद आया। मालूम नहीं कि आजकल वह कहाँ है। खैर, तब क्या हुआ? तुमने समझा कि वह सरला है मगर उस खोह का और लाश काटने का हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?

शेरसिंह––वह हाल स्वयं सरला ने कहा था। वह मेरे आपस वालों में से है। इत्तिफाक से एक दिन मुझसे मिलने के लिए रोहतासगढ़ आयी थी, तब सब हाल मैंने सुना था। मगर मुझे यह नहीं मालूम कि आजकल वह कहाँ है।

शेरसिंह––एक यही भेद खोलने की नीयत से मैं रात के समय रोहतासगढ़ महल के अन्दर गया और छिपकर सरला के सामने जाकर बोला, "मैं पहचान गया कि तू सरला है, फिर अपना भेद मुझसे क्यों छिपाती है?" इसके जवाब में कुन्दन से पूछा, "तुम कौन हो?"

मैं––शेरसिंह। सरला––मुझे जब तक निश्चय न हो कि तुम शेरसिंह ही हो, मैं अपना भेद कैसे कहूँ?

मैं––क्या तू मुझे नहीं पहचानती?

सरला––क्या जाने, कोई ऐयार सूरत बदल के आया हो। अगर तुम पहचान गए कि मैं सरला हूँ तो कोई ऐसी छिपी हुई बात कहो जो मैंने तुमसे कही हो।

इसके जवाब में मैं वही खोह वाला अर्थात् लाश काटने वाला किस्सा कह गया और अन्त में मैं बोला कि यह हाल स्वयं तूने मुझसे बयान किया था।

उस किस्से को सुनकर कुन्दन हँसी और बोली, "हाँ, अब मैं समझ गयी। मैं चम्पा के हुक्म से यहाँ का हाल-चाल लेने आयी थी और अब किशोरी को छुड़ाने की फिक्र में हूँ। मगर लाली मेरे काम में बाधा डालती है। कोई ऐसी तरकीब बताइये जिसमें लाली मुझसे दबे और डरे।"

मैं उस समय यह कहकर वहाँ से चला आया कि अच्छा, मैं सोच कर इसका जवाब दूँगा।

देवीसिंह––तब क्या हुआ?

शेरसिंह––मैं वहाँ से रवाना हुआ और पहाड़ी के नीचे उतरते समय एक विचित्र बात मेरे देखने और सुनने में आई।

देवीसिंह––वह क्या?

शेरसिंह––जब मैं अँधेरी रात में पहाड़ी के नीचे उतर रहा था तो जंगल में मालूम हुआ कि दो-तीन आदमी जो पगडण्डी के पास ही थे, आपस बातें कर रहे हैं। मैं पैर दवाता हुआ उनके पास गया और छिपकर बातें सुनने लगा, मगर उस समय उनकी बातें समाप्त हो चुकी थीं, केवल एक आखिरी बात सुनने में आई।

देवीसिंह––वह क्या थी?

शेरसिंह––एक ने कहा––'भरसक तो लाली और कुन्दन दोनों उन्हीं में से हैं, नहीं तो लाली तो जरूर इन्द्रजीतसिंह की दुश्मन है! मगर इसकी पहचान तो सहज ही में हो सकती है। केवल 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' इन दोनों जुमलों से अगर वह डर जाय, तो हम समझ जायँगे कि वीरेन्द्रसिंह की दुश्मन है। खैर, बूझा जायगा, पहले महल में जाने का मौका भी तो मिले। इसके बाद और कुछ सुनने में न आया और वे लोग वहाँ से न मालूम कहाँ चले गए। दूसरे दिन मैं फिर कुन्दन के पास गया और उससे बोला कि "तू लाली के सामने 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' का जिक्र करके देख, क्या होता है!"

देवीसिंह––फिर क्या हुआ?

शेरसिंह––तीन-चार दिन बाद मैं कुन्दन के पास गया तो उसकी जुबानी मालूम हुआ कि कुन्दन के मुँह से वे बातें सुनकर लाली बहुत डरी और उसने कुन्दन का मुकाबला करना छोड़ दिया। मगर मुझे थोड़े ही दिनों में मालूम हो गया कि कुन्दन सरला न थी, उसने मुझे धोखा दिया और चालाकी से मेरी जुबानी भेद मालूम करके अपना काम निकाल लिया। मुझे इस बात की बड़ी शर्म है कि मैंने अपने दुश्मन को दोस्त समझा और धोखा खाया।

देवीसिंह––अक्सर ऐसा धोखा हो जाता है। खैर, लाली तो अभी हम लोगों के कैद ही में है, कहीं जाती नहीं, रही कुन्दन, सो इन्द्रजीतसिंह को लेकर लौटने पर कोई तरकीब ऐसी जरूर निकाली जायगी, जिसमें बाकी लोगों का असल हाल मालूम हो।

इसी तरह की बातें करते हुए दोनों ऐयार चलते गये। रात को एक जगह दो-तीन घण्टे आराम किया और फिर चल पड़े। सवेरा होते-होते एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ एक छोटा-सा टीला ऐसा था जिस पर चढ़ने से दूर-दूर तक की जमीन दिखाई देती थी तथा वहाँ से कमलिनी का तालाब वाला मकान भी बहुत दूर न था। दोनों ऐयार उस टीले पर चढ़ गये और मैदान की तरफ देखने लगे। यकायक शेरसिंह ने चौंक कर कहा, "अहा, हम लोग क्या अच्छे मौके पर आये हैं! देखो, वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और वह औरत, जिसने उन्हें फँसा रक्खा है, घोड़े पर सवार इसी तरफ चले आ रहे हैं!"

देवीसिंह––हाँ, ठीक तो है, उनके साथ और भी कई सवार हैं।

शेरसिंह––मालूम होता है, उस औरत ने उन्हें अच्छी तरह अपने वश में कर लिया है। बेचारे इन्द्रजीतसिंह क्या जानें कि यह उनकी दुश्मन है। चाहे जो हो, इस समय इन लोगों को आगे न बढ़ने देना चाहिए।

देवीसिंह––सबके आगे एक औरत घोड़े पर सवार आ रही है। मालूम होता है कि उन लोगों को रास्ता दिखाने वाली यही है।

शेरसिंह––बेशक ऐसा ही है, तभी तो सब कोई उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं। पहले उसी को रोकना चाहिए, मगर घोड़ों की चाल बहुत तेज है।

देवीसिंह––कोई हर्ज नहीं, हम दोनों आदमी घोड़े की राह पर अड़कर खड़े हो जायँ और अपने को घोड़े से बचाने के लिए मुस्तैद रहें। अच्छी नसल का घोड़ा यकायक आदमी के ऊपर टाप न रक्खेगा, वह लोगों को राह में देख जरूर अड़ेगा या झिककेगा, बस, उसी समय घोड़े की बाग थाम लेंगे।

दोनों ऐयारों ने बहुत जल्द अपनी राय ठीक कर ली और दोनों आदमी एक साथ घोड़ों की राह में अड़ के खड़े हो गये। बात-की-बात में वे लोग भी आ पहुँचे। तारा का घोड़ा रास्ते में आदमियों को खड़ा देख कर झिझका और आड़ देकर बगल की तरफ घूमना चाहा, उसी समय देवीसिंह ने फुर्ती से लंगाम पकड़ ली। इस समय तारा का घोड़ा लाचार रुक गया और उसके पीछे आने वालों को भी रुकना पड़ा। कुँअर इन्द्रजीत सिंह शेरसिंह को तो नहीं जानते थे, मगर देवीसिंह को उन्होंने पहचान लिया और समझ गये कि ये लोग मेरी ही खोज में घूम रहे हैं। आखिर वे देवीसिंह के पास आये और बोले––

कुमार––यद्यपि आप सब काम मेरी भलाई ही के लिए करते होंगे, परन्तु इस समय हम लोगों को रोका सो अच्छा न किया।

देवीसिंह––क्या मामला है, कुछ कहिए तो!

कुमार––(जल्दी में घबराए हुए ढंग से) बेचारी किशोरी एक आफत में फँसी हुई है उसी को बचाने जा रहे हैं।

देवीसिंह––किस आफत में फँसी है?

कुमार––इतना कहने का मौका नहीं है।

देवीसिंह––यह औरत आपको अवश्य धोखा देगी जिसके साथ आप जा रहे हैं।

कुमार––ऐसा नहीं हो सकता, यह बड़ी ही नेक और मेरी हमदर्द है।

इतना सुनते ही कमलिनी आगे बढ़ आई और देवीसिंह से बोली––

कमलिनी––मैं खूब जानती हूँ कि आप लोगों को मेरी तरफ से शक है, तथापि मुझे कहना ही पड़ता है कि इस समय आप हम लोगों को न रोकें, नहीं तो पछताना पड़ेगा। यदि आप लोगों को मेरी और कुमार की बात का विश्वास न हो तो मेरे सवारों में से दो आदमी घोड़ों पर से उतर पड़ते हैं, उनके बदले में आप दोनों आदमी घोड़ों पर सवार होकर साथ चलें और देख लें कि हम आपके खैरख्वाह हैं या बदख्वाह।

देवीसिंह––बेशक यह अच्छी बात है और मैं इसे मंजूर करता हूँ।

कमलिनी के इशारा करते ही दो सवारों ने घोड़ों की पीठ खाली कर दी। उनके बदले में देवीसिंह और शेरसिंह सवार हो गए और फिर उसी तरह सफर शुरू हुआ। इस समय कुछ-कुछ सूरज निकाल चुका था और सुनहरी धूप ऊँचे पेड़ों के ऊपर वाले हिस्सों पर फैल चुकी थी।

आधे घण्टे और सफर करने के बाद वे लोग उस जगह पहुँचे जहाँ धनपति ने किशोरी को जलाकर खाक कर डालने के लिए चिता तैयार की थी और जहाँ से दीवान अग्निदत्त लड़-भिड़कर किशोरी को ले गया था। इस समय भी वह चिता कुछ बिगड़ी हुई सूरत में तैयार थी और इधर-उधर बहुत-सी लाशें पड़ी हुई थीं। उस जगह पहुँचकर तारा ने घोड़ा रोका और इसके साथ ही सब लोग रुक गये। तारा ने कमलिनी की तरफ देखकर कहा––

तारा––बस, इसी जगह मैं आप लोगों को लाने वाली थी, क्योंकि इसी जगह धनपति के बहुत से आदमी मौजूद थे और यहीं वह किशोरी को लेकर आने वाली थी। (लाशों की तरफ देखकर) मालूम होता है, यहाँ बहुत खून-खराबा हुआ है!

कमलिनी––तूने कैसे जाना कि किशोरी को लेकर धनपति इसी जगह आने वाली थी और धनपति को तूने कहाँ छोड़ा था?

तारा––रात के समय खूब छिपकर धनपति के आदमियों की बात मैंने सुनी थी जिससे बहुत-कुछ हाल मालूम हुआ था और धनपति को मैंने उसी खोह के मुहाने पर छोड़ा था जो रोहतासगढ़ तहखाने से बाहर निकलने का रास्ता है और जहाँ सलई के दो पेड़ लगे हैं। उस समय बेहोश किशोरी धनपति के कब्जे में थी और धनपति के कई आदमी वहाँ मौजूद थे। उन लोगों की बातें सुनने से मुझे विश्वास हो गया था कि वे लोग किशोरी को लिए हुए इसी जगह आवेंगे। (एक लाश की तरफ देख के और चौंक के) देखिए, पहिचानिए।

कमलिनी––बेशक यह धनपति का नौकर है। (और लाशों को भी अच्छी तरह देखकर) बेशक धनपति यहाँ तक आई थी, पर किसी से लड़ाई हो गई जो इन लाशों को देखने से जाना जाता है। मगर इनमें बहुत-सी लाशें ऐसी हैं जिन्हें मैं नहीं पहचानती। न मालूम इस लड़ाई का क्या नतीजा हुआ, धनपति गिरफ्तार हो गई या भाग गई, और किशोरी किसके कब्जे में पड़ गई! (कुमार की तरफ देखकर) शायद आपके सिपाही या ऐयार लोग यहाँ आए हों?

कुमार––नहीं। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आप क्या खयाल करते हैं?

देवीसिंह––खयाल तो मैं बहुत-कुछ करता हूँ, इसका हाल कहाँ तक पूछिएगा, मगर इन लाशों में हमारी तरफ वालों की कोई लाश नहीं है जिससे यह मालूम हो कि वे लोग यहाँ आये होंगे।

सब लोग इधर-उधर घूमकर उन लाशों को देखने लगे। यकायक देवीसिंह एक ऐसी लाश के पास पहुँचे जिसमें जान बाकी थी और वह धीरे-धीरे कराह रहा था। उसके बदन में कई जगह जख्म लगे हुए थे और कपड़े खून से तर थे। देवीसिंह ने कुमार की तरफ देख के कहा, "इसमें जान बाकी है, अगर बच जाय और कुछ बातचीत कर सके, तो बहुत-कुछ हाल मालूम होगा।"

कई आदमी उस लाश के पास जा मौजूद हुए और उसे होश में लाने की फिक्र करने लगे। उसके जख्मों पर पट्टी बाँधी गई और ताकत देने वाली दवा भी पिलाई गई। घोड़े नंगी पीठ करके दम लेने, हरारत मिटाने और चरने के लिए लम्बी बागडोरों से बाँध कर छोड़ दिए गए।

आधे घण्टे बाद उस आदमी को होश आया और उसने कुछ बोलने का इरादा किया, मगर जैसे ही उसकी निगाह कमलिनी पर पड़ी, वह काँप उठा और उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई। उसके दिल का हाल कमलिनी समझ गई और उसके पास जाकर मुलायम आवाज में बोली, "बाँकेसिंह, डरो मत, मैं वादा करती हूँ कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ न दूँगी। हाँ, होश में आओ और मेरी बात का जवाब दो।"

कमलिनी की बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत बदल गई, डर की निशानी जाती रही, और यह भी जाना गया कि वह कमलिनी की बातों का जवाब देने के लिए तैयार है।

कमलिनी––किशोरी को लेकर धनपति यहाँ आई थी?

बाँकेसिंह––(सिर हिलाकर धीरे से) हाँ, मगर …

कमलिनी––मगर क्या?

बाँकेसिंह––उसने किशोरी को जला देना चाहा था, मगर एकाएक अग्निदत्त और उसके साथी लोग आ पहुँचे और लड़-भिड़ कर किशोरी को ले गये। हम लोग उन्हीं के हाथ से जख्मी …

बाँकेसिंह ने इतनी बातें धीरे-धीरे और रुक-रुककर कहीं क्योंकि जख्मों से ज्यादे खून निकल जाने के कारण वह बहुत ही कमजोर हो रहा था, यहाँ तक कि बात पूरी न कर सका और गश में आ गया। इन लोगों ने उसे होश में लाने के लिए बहुत-कुछ उद्योग किया मगर दो घण्टे तक होश न आया। इस बीच में देवीसिंह ने उसे कई दफे दवा पिलाई। देवीसिंह––इसमें कोई शक नहीं कि यह बच जायगा।

शेरसिंह––(देवीसिंह की तरफ देखकर) हमने (कमलिनी की तरफ इशारा करके) इनके बारे में भी धोखा खाया, वास्तव में यह कुमार के साथ नेकी कर रही हैं।

देवीसिंह––बेशक यह कुमार की दोस्त हैं, मगर तुमने इनके बारे में कई बातें ऐसी कही थीं कि अब भी

कुमार––नहीं-नहीं देवीसिंह जी, मैं इन्हें अच्छी तरह आजमा चुका हूँ; सच तो यह है कि इन्हीं की बदौलत आज आप लोगों ने मेरी सूरत देखी।

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